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वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ
२४०संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १३७

बन जाऊँ। अधर्ममें मेरी बुद्धि कभी न जाय और मैं ओषधियोंका भी स्वामी बन जाऊँ। महादेव! आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे आनन्दित करनेके लिये यह वर देनेकी कृपा कीजिये।'

वसुंधरे! चन्द्रमाकी इन बातोंको सुनकर और उन्हें वैसा वरदान देकर मैं वहीं अन्तर्धान हो गया। महाभागे! चन्द्रमाने जहाँ एक पैरपर खड़े रहकर पाँच हजार वर्षोंतक महान् तपस्या की थी, वह 'सोमतीर्थ' नामसे विख्यात हुआ तथा उन्हें दुर्लभ सिद्धि एवं कान्ति प्राप्त हुई। जो मेरा भक्त इस सोमतीर्थमें श्रद्धासे स्नानकर प्रतिदिन दिनके आठवें भागमें भोजन करके मेरी उपासनामें लगा रहता है, अब उसके फलका वर्णन करता हूँ। वह पैंतीस हजार वर्षोंतक ब्राह्मणका शरीर पाता है और वेद-वेदाङ्गका पारगामी विद्वान्, धनवान्, गुणवान्, दानी एवं मेरा निर्दोष भक्त होता है और संसारसागरको पार कर जाता है। यशस्विनि! यह ऐसा महत्त्वपूर्ण तीर्थ है, जहाँ महात्मा चन्द्रमाने दीर्घकालतक तपस्या की थी।

अब उस 'सोमतीर्थ' का लक्षण बतलाता हूँ, सुनो। वैशाख शुक्ल द्वादशीको चन्द्रमाके अस्त होने एवं अन्धकारके प्रवृत्त होनेपर जहाँ बिना चन्द्रमाके ही पृथ्वीपर चन्द्रिका चमकती दीखे, उसे ही सोमतीर्थ समझना चाहिये। वास्तवमें यह महान् आश्चर्यका विषय है कि चन्द्रमाका आलोक (प्रकाश) तो दीखता है, पर स्वयं चन्द्रमा वहाँ नहीं दीखते। महाभागे! ये परम पवित्र सौकरवतीर्थ तथा सोमतीर्थ—मुझसे सम्बन्ध रखते हैं।

वसुंधरे! अब मैं एक दूसरी बात बतलाता हूँ, उसे सुनो; जिससे इस क्षेत्रकी अद्भुत महिमा प्रख्यायित होती है। यहाँ एक शृगाली रहती थी, जो बिना श्रद्धाके ही पूर्वकर्मवश दैवयोगसे मरकर इस क्षेत्रके प्रभावसे अगले जन्ममें गुणवती, रूपवती और चौंसठ कलाओंसे सम्पन्न श्यामा* सर्वाङ्गसुन्दरी राजाकी पुत्री हुई थी। उसी सोमतीर्थके पूर्वी भागमें 'गृध्रवट' नामका भी एक प्रसिद्ध तीर्थ है, जहाँ एक गीधकी अनायास मृत्यु हुई, जिसकी कोई कामना न थी, पर उसे मनुष्यकी योनि प्राप्त हुई थी।

पृथ्वी बोली— प्रभो! इस तीर्थके प्रभावसे तिर्यक्-योनिमें पड़े हुए गीध और शृगाली मनुष्य-शरीरको कैसे प्राप्त हुए? यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है! साथ ही उस तीर्थमें स्नान करनेसे अथवा प्राणत्याग करनेसे मनुष्य किस गतिको प्राप्त करते हैं तथा उनके शरीरपर कौनसे विशेष चिह्न होते हैं? केशव! आप मुझे यह भी बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् वराह बोले— देवि! धर्मप्रधान सत्ययुगके बाद त्रेतायुगका प्रवेश ही हुआ था। उस समय काम्पिल्य† नगरमें ब्रह्मदत्त‡ नामक एक धर्मनिष्ठ राजा रहते थे। उनका सभी लक्षणोंसे सम्पन्न एक सोमदत्त नामक पुत्र था। एक बार वह


* शास्त्रोंमें 'श्यामा' स्त्रीके अनेक रूप निर्दिष्ट हैं। (द्रष्टव्य—'वाचस्पत्य' एवं 'शब्दकल्पद्रुम' कोश अथवा 'मोनियर विलियम' का संस्कृत-अंग्रेजी कोश)। यह मुख्यतः सुवर्णके रंगकी अत्यन्त दीप्तिमती गौरवर्णकी स्त्री होती है। यथा—
श्यामा गुणवती गौरी दिव्यालंकारभूषिता। चतुरा शीलसम्पन्ना चित्तेनारुन्धती समा॥ (पुरुषोत्तममासमाहा० ३। ४५)
अथवा—'तप्तकाञ्चनवर्णाभा सा स्त्री श्यामेति कथ्यते।'
† काम्पिल्य-फर्रूखाबाद जिलेमें कायमगंजसे ६ मील, फतेहगढ़से २८ मील पूर्वोत्तर गङ्गानदीके तटपर है। यह राजा द्रुपदकी राजधानी थी। द्रौपदीका स्वयंवर यहीं हुआ था।
‡ ब्रह्मदत्तका यह चरित्र वाल्मी०रामा०बालकाण्ड, मत्स्यपुराण अध्याय १९—२१, हरिवंश १।२२—२५, शिवपुराण उमासंहिता ४१ तथा अन्यान्य पुराणोंमें भी प्राप्त होता है।

अध्याय १३७] वराहक्षेत्रकी महिमाके प्रसङ्गमें गीध और शृगालका वृत्तान्त २४१

पितरोंके उद्देश्यसे मृगोंके अन्वेषणमें आखेटके लिये बाघ और सिंहोंसे भरे वनमें गया; किंतु राजकुमारको पितृकार्यके उपयुक्त कोई वस्तु न दिखी। इस प्रकार वह इधर-उधर घूम ही रहा था कि उसकी दाहिनी ओरसे एक सियारिन निकली, जो (अनायास एक मृगपर छोड़े हुए) उसके बाणोंसे बिंध गयी और व्यथासे तड़पने लगी। फिर वह इस तीर्थमें जल पीकर एक शाखोट-वृक्षके नीचे गिर पड़ी। धूपसे व्याकुल तथा बाणसे बिंधी होनेके कारण न चाहनेपर भी उसके प्राण इस सोमतीर्थमें ही निकल गये। भद्रे! उसी समय सोमदत्त भी भूख-प्याससे पीड़ित होकर इस 'गृध्रवट' नामक तीर्थमें पहुँचा और विश्राम करनेके लिये ठहर गया। इतनेमें ही उस वटकी शाखापर उसे एक गीध बैठा दिखायी दिया। यशस्विनि! उसने उसे भी एक ही बाणसे मार गिराया, जो उसी वृक्षकी जड़पर गिरा। हृदयमें बाण लगनेसे उसे मूर्च्छा आ गयी और उसके प्राणपखेरू उड़ गये। उस गीधको देखकर राजकुमारके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। अतः उसने बाणोंके पर बनानेके लिये उस गीधके पंख काट लिये और उन्हें लेकर घर आया। इस प्रकार गीधके न चाहनेपर भी उस तीर्थमें मृत्यु होनेपर उसकी सद्गति हो गयी और कालान्तरमें वह कलिङ्गदेशके नरेशके घर रूपवान्, विद्वान् एवं गुणसम्पन्न राजपुत्र हुआ।

वसुंधरे! उधर जो शृगाली मरी थी, वह काञ्चीनरेशके यहाँ राजपुत्रीके रूपमें उत्पन्न हुई जो सर्वाङ्गसुन्दरी, श्यामा, अत्यन्त रूप-गुणसे सम्पन्न, कार्य-कुशल और चौंसठ कलाओंसे सम्पन्न थी। उसका स्वर कोयलके समान मधुर एवं सुखदायी था। इधर अनायास काञ्चीनरेश और कलिङ्ग-नरेशकी प्रीति बढ़ गयी और परिणामतः काञ्ची-नरेशकी कन्याका कलिङ्गराजके पुत्रके साथ विधिपूर्वक विवाह हो गया। काञ्चीनरेशने वर-वधूको दहेजमें अनेक प्रकारके रत्न, आभूषण, हाथी, घोड़े, भैंस और दास-दासियाँ दीं। फिर विवाहोपरान्त कलिङ्गराज वधूसहित अपने पुत्रको लेकर अपनी राजधानीको वापस लौट आये।

देवि! विवाहके बाद दम्पतीको प्रेमपूर्वक रहते कुछ वर्ष व्यतीत हो गये। उनकी प्रीति रोहिणी और चन्द्रमाकी तरह निरन्तर बढ़ती गयी। वे नन्दनवनकी उपमावाले वन-उपवन-उद्यानादि एवं क्रीडाके अन्य दिव्यस्थलोंमें आनन्दपूर्वक विहार करते। इधर कलिङ्ग-राजकुमार अपनी बुद्धि, सुशीलता और श्रेष्ठ कर्मोंसे नगरकी जनताको भी परम संतुष्ट रखता। उधर अन्तःपुर एवं नगरकी स्त्रियोंको राजकुमारीने संतुष्ट कर रखा था। इस प्रकार उन दोनोंके सौम्य गुणों एवं शीलयुक्त व्यवहारसे सभी राज्यवासी संतुष्ट थे।

एक बार उस राजकुमारीने उस राजकुमारसे वार्तालापके प्रसङ्गमें कहा कि मैं आपसे एक रहस्यकी बात पूछती हूँ। यदि मुझपर आपका स्नेह हो तो आप मुझे उसे बतानेकी कृपा करें। पत्नीकी बात सुनकर राजकुमारने कहा—'भद्रे! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हारे मनकी अभिलाषा पूरी करनेके लिये अवश्य प्रयत्न करूँगा। देवि! सत्यके आधारपर ही विश्व ठहरा है। सत्य भगवान्‌का ही स्वरूप है और तपस्याका मूल भी सत्य ही है तथा सत्यके आधारपर ही हमारा राज्य टिका हुआ है। मैं कभी भी मिथ्या नहीं बोलता। इसके पहले भी मेरे मुँहसे कभी झूठी बात नहीं निकली है। अतः तुम कहो, मैं तुम्हारे लिये कौन-सा कार्य करूँ? हाथी, घोड़े, रथ, रत्न, सवारी, धन अथवा परम श्रेष्ठ अपना पट्टबन्ध, शिरोमुकुटतक मैं तुम्हें समर्पण करनेको तैयार हूँ।

२४२संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १३७

इसपर काञ्चीनरेशकी उस कन्याने अपने पतिदेवके चरणोंको पकड़कर यह बात कही— 'पतिदेव ! मैं रत्न, हाथी, घोड़े एवं रथ कुछ भी नहीं चाहती। आपके पट्टबन्धसे मेरा क्या प्रयोजन ? मैं तो केवल यही चाहती हूँ कि मध्याह्नकालमें एकान्तमें निश्चिन्त सो सकूँ। प्राणनाथ ! आप ऐसी व्यवस्था कर दें कि मैं उस समय जितनी देरतक सोयी रहूँ, उस समय मुझे मेरे श्वशुर, सास अथवा दूसरा कोई भी देख न सके—यही मेरा व्रत है। यही नहीं अपने सगे-सम्बन्धी अथवा घरके अन्य स्वजन भी सोयी हुई अवस्थामें मुझपर कभी दृष्टि न डालें।'

वसुंधरे ! इसपर कलिङ्गदेशके उस राजकुमारने उसका समर्थन कर दिया और कहा—'तुम विश्वास करो, सोते समय तुम्हें कोई भी न देखेगा।' कुछ समयके बाद कलिङ्गनरेशने उस राजकुमारको राज्यपदपर अभिषिक्त कर दिया। फिर कुछ दिनोंके पश्चात् उनकी मृत्यु हो गयी। अब राजकुमार राज्यका विधिपूर्वक समुचित ढंगसे संचालन करने लगा। राजकुमारी जिस स्थानपर अकेली सोती, वहाँ उसे कोई देख नहीं पाता था। फिर यथासमय उस राजकुमारके कलिङ्ग-कुलको आनन्दित करनेवाले सूर्यके समान तेजस्वी पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। इस प्रकार उस राजकुमारके निष्कण्टक राज्य करते हुए सतहत्तर वर्ष बीत गये। अठहत्तरवें वर्ष एक दिन जब सूर्य मध्य आकाशमें स्थित थे, तब वह एकान्तमें बैठकर इन बातोंको प्रारम्भसे सोचने लगा। उस दिन माघमासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथि थी, अतः उसके मनमें आया कि 'मैं अपनी पत्नीको देखूँ कि वह एकान्तमें किसकी अर्चना करती है अथवा उसका व्रत कौन-सा है? निर्जनस्थानमें सोती रहकर क्या करती है? कोई स्त्री सोकर व्रत करे, ऐसा तो कोई धर्म-संग्रह नहीं दीखता है। मनुने भी किसी ऐसे धर्मका उल्लेख नहीं किया। बृहस्पति अथवा धर्मराजके बनाये हुए धर्मशास्त्रमें भी कहीं इस प्रकारका उल्लेख नहीं पाया जाता है। ऐसा तो कहीं देखा-सुना नहीं गया कि कोई स्त्री सोयी रहकर किसी व्रतका आचरण करे। यह तो इच्छानुसार भोगोंका उपभोग करती—बना-बनाया भोजन-पान करती और अत्यन्त महीन रेशमी वस्त्र धारणकर श्रेष्ठ गन्धोंसे विभूषित तथा सब प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत रहती है। पर सम्भव है, इस प्रकार देखनेपर वह प्रकुपित हो जाय, जो कुछ हो उसे एक बार देखना अवश्य चाहिये कि वह किस प्रकार कौन-सा व्रत करती है? किंनरोंने बतलाया है कि वशीकरण मन्त्रको सिद्ध कर लेनेपर स्त्री योगीश्वरी बनकर जहाँ उसकी इच्छा हो, जा सकती है। इस प्रकार इसमें वह शक्ति आ जायगी, जो कामरागसे दूसरेका भी स्पर्श कर सकती है तथा दूसरोंसे इसका भाव भी हो सकता है।'

पृथ्वि ! इस प्रकार राजकुमारके सोचते-विचारते सूर्य अस्त हो गये और सबको विश्राम देनेवाली भगवती रात्रिका आगमन हुआ। फिर रात्रि बीतनेपर मङ्गलमय प्रभातका भी उदय हुआ। मागध, वन्दीगण, सूत और वैतालिक राजाकी स्तुति करने लगे। शङ्ख और दुन्दुभिकी ध्वनियोंसे उसकी निद्रा भङ्ग हुई। इधर अखिललोकनायक भगवान् भास्कर भी उदित हो गये। उस समय पहलेकी बातोंका स्मरण करते हुए राजकुमारके मनमें अन्य कोई चिन्ता नहीं रह गयी थी, केवल वही चिन्ता उसके हृदयमें व्याप्त थी। उसने विधिपूर्वक स्नानकर दो रेशमी वस्त्र पहन लिये। इस प्रकार भलीभाँति तैयार होकर उसने सबको दूर हटा दिया और कहा कि 'मैं किसी व्रतमें

११७- भगवान्‌के मन्दिरमें लेपन एवं संकीर्तनका माहात्म्य

अध्याय १३७ ] वराहक्षेत्रकी महिमाके प्रसङ्गमें गीध और शृगालका वृत्तान्त २४३

दीक्षित हो गया हूँ, अतः कोई भी स्त्री अथवा पुरुष मेरा स्पर्श न करे; अन्यथा वह दण्ड-विधानके अनुसार मेरा वध्य हो सकता है?'

वसुंधरे! कलिङ्गनरेश इस प्रकारकी आज्ञा देकर शीघ्रतापूर्वक चलकर जहाँ राजकुमारी रहती थी, वहाँ पहुँचा और अपनी स्त्रीको देखा। वह चारपाईके पास नीचे आसन लगाकर बैठी थी और अपने मनमें इष्टदेवका चिन्तन कर रही थी, साथ ही सिरके दर्दसे पीड़ित होकर रो रही थी। राजकुमारी कह रही थी—'मैंने पूर्वजन्ममें कौन-सा ऐसा दुष्कर कर्म किया है, जिससे मैं इस दयनीय दशाको प्राप्त हो गयी हूँ। मैं अनाथकी भाँति क्लेश सहती हूँ, किंतु मेरे पतिदेवको भी इसका पता नहीं है। मेरा व्रत सब तरहसे विकृत ही कहा जा सकता है। मेरा बड़ा सौभाग्य होता यदि मैं कभी सौकरवक्षेत्रमें जा सकती और मेरे हृदयमें जो बात बसी है, उसे अपने पतिसे कह पाती।'

कलिङ्गनरेश अपनी स्त्रीकी बात सुन रहा था। उसने उठकर दोनों हाथोंसे अपनी पत्नीको पकड़कर कहा—'भद्रे! तुम यह क्या कह रही हो? अपनेको तुम इस प्रकार बार-बार कोसती क्यों हो? तुम प्रारब्धकी बातोंको क्यों सोचती हो और अपनेको क्यों कोसती हो? तुम्हें तो यह एक महान् शिरोरोग है। इसे दूर करनेके लिये अष्टाङ्ग-कुशल वैद्य क्या तुम्हें नहीं मिलते, जो तुम्हारे सिरकी कठिन पीड़ाको दूर कर सकें? वायु, कफ, पित्त आदि रोगोंसे तुम्हें संनिपात हो गया है, अथवा असमयपर तुममें पित्तका प्रकोप हो गया है। तुम व्रतके बहाने व्यर्थमें इतना क्लेश क्यों पाती हो? तुम कहती हो कि 'सौकरवक्षेत्रमें चलनेपर कहूँगी', इस विषयमें ऐसा क्या गोपनीय है, जिसे तुम कहना नहीं चाहती हो?'

अब राजकुमारी बड़े संकोचमें पड़ गयी। वह दुःखसे पीड़ित तो थी ही, उसने स्वामीके चरण पकड़ लिये और कहने लगी—'महाराज! आप मुझपर प्रसन्न हों, यह बात आप इस समय पूछ रहे हैं, यह ठीक नहीं। वीरवर! मेरा यह वृत्त जन्मान्तरीय कर्मोंसे सम्बद्ध है।' पत्नीकी बात सुनकर कलिङ्गदेशके उस नरेशने परम हित करनेके विचारसे उसके प्रति मधुर वचन कहा—'देवि! मेरे सामने यह कौन-सी गोपनीय बात है? तुम ठीक-ठीक बात बतला दो।' पतिकी बात सुनकर राजकुमारीकी आँखें आश्चर्यसे भर गयीं। वह मधुर वाणीमें बोली—'प्राणनाथ! शास्त्रोंके अनुसार स्त्रीके लिये स्वामी ही धर्म, अर्थ और सर्वस्व है। उसका पति ही परमात्मा है। अतएव आप जो मुझसे पूछ रहे हैं, वह मुझे अवश्य कहना चाहिये। फिर भी जो बात मेरे हृदयमें बैठ गयी है उसे कहनेमें मैं असमर्थ हूँ। पीड़ा पहुँचानेवाली मेरी यह बात आप मुझसे पूछें, यह उचित नहीं जान पड़ता। महाभाग! इस दुःखका मेरे शरीरसे दूर होना असम्भव-सा दीखता है। आप सुखमें सदा समय बिताते हैं, यह बड़ी अच्छी बात है। स्वामिन्! मेरे समान बहुत-सी स्त्रियाँ आपके अन्तःकरणमें हैं। जिन्हें आप विविध प्रकारके अन्न और उत्तम भूषण दिया करते हैं और वे आपकी सेवा करती हैं, फिर मुझसे आपका क्या तात्पर्य? राजन्! आप हाथी, रथ और घोड़ेपर यात्रा किया करते हैं, यह सब ठीक है। पर राजन्! इस विषयमें मुझसे आपको कुछ नहीं पूछना चाहिये। आप मेरे इष्ट देवता, गुरु एवं साक्षात् सनातन यज्ञपुरुष हैं। मानद! मेरे लिये आप धर्म, अर्थ, काम, यश और स्वर्ग सब कुछ हैं। आपके पूछनेपर मुझको चाहिये कि सदा सभी बातें सत्य एवं प्रिय कहूँ। क्योंकि सभी

२४४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १३७

पतिव्रताओंके लिये यह सनातन धर्म है। तथापि मेरी बातोंपर निश्चित विचार करके मेरी पीड़ाके विषयमें आपको नहीं पूछना चाहिये।'

उस समय कलिङ्ग-नरेशको अपनी पत्नीकी पीड़ासे भीषण मानसिक संताप हो रहा था, अतएव उसने मधुर वाणीमें कहा—'देवि! मैं तुम्हारा पति हूँ, ऐसी स्थितिमें मेरे पूछनेपर तुम्हें शुभ हो या अशुभ उसे अवश्य बताना चाहिये। धर्मके मार्गपर चलनेवाली स्त्रीका कर्तव्य है कि वह गुप्त बात भी पतिके सामने प्रकट कर दे। जो स्त्री किसी राग या लोभसे मोहित होकर अपकर्म-कर उसे पतिसे छिपाती है तो विद्वत्समाज उसे सती नहीं कहता। यशस्विनि! ऐसा विचार करके तुम्हें मुझसे अपनी गुप्त बात भी अवश्य कहनी चाहिये। यदि इस गोपनीय बातको तुम मुझे बता देती हो तो तुम्हें अधर्मका भागी नहीं होना पड़ेगा।'

राजकुमारी बोली—'प्राणनाथ! राजा देवता, गुरु एवं ईश्वरके समान पूज्य हैं—आप मेरे पति भी हैं। महाराज! सुनिये! यद्यपि मेरा कार्य बहुत गुह्य नहीं है, तब भी मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ, स्वामिन्! अपने राज्यपर बड़े राजकुमारका अभिषेक कर दीजिये, यह नियम कुलके अनुसार है और आप मेरे साथ 'सौकरव (वराह)-क्षेत्र' में चलनेकी कृपा करें।'

पत्नीकी यह बात सुनकर कलिङ्ग-नरेशने सहर्ष उसका अनुमोदन कर दिया। अपने वाक्योंसे पत्नीको प्रसन्नकर उसने कहा—'सुन्दरि! तुम्हारे कथनानुसार मैं पुत्रको राज्यपर बैठा दूँगा। फिर वे दोनों रनिवाससे बाहर निकले। राजकुमारने कञ्चुकीको देखकर कहा—'द्वारपाल! तुम यहाँके सब लोगोंको सूचित कर दो। वे आकर यहाँ उपस्थित हों।

इसके बाद कलिङ्ग-नरेशने अपनी रुचिके अनुसार उस समय कुछ खाने योग्य अन्न-जल ग्रहण किया और आचमन करके कुछ समयतक विश्राम किया। फिर उन्होंने अपने पुत्रका अभिषेक करनेके लिये मन्त्रिमण्डलको बुलाया और आज्ञा दी—'सब लोग आचारके अनुसार माङ्गलिक कृत्य करके राजधानीका संस्कार करनेमें जुट जायें।' फिर कलिङ्ग-नरेशने अपने वृद्ध मन्त्रीसे कहा—'तात! कल मैं राज्यपर अपने पुत्रका विधिके अनुसार अभिषेक करना चाहता हूँ। उसकी आप शीघ्र तैयारी करें।' नरेशकी बात सुनकर मन्त्रियोंने कहा—'राजन्! सभी वस्तुएँ तैयार ही हैं। आप जो कह रहे हैं, वह हम सभीको पसंद है। महाराज! आपके ये राजकुमार सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें सदा संलग्न रहते हैं। प्रजापर प्रेम रखनेवाले, नीतिके पूर्ण जानकार, विचारशील और शूरवीर भी हैं। प्रभो! आपके मनमें जो अभिलाषा है, वह हमलोगोंको सम्यक् प्रकारसे प्रिय लगती है।' ऐसी बात कहकर मन्त्रीलोग अपने स्थानपर चले गये और भगवान् सूर्य अस्त हो गये। राजा और रानीने सुखपूर्वक शयन किया। रात आनन्दपूर्वक बीत गयी।

प्रातःकाल गन्धर्वों, वन्दीजनों, सूतों एवं मागधोंने अपने समुचित स्तुति-पाठसे राजाको जगाया। राजाने शुभ मुहूर्तका अवसर पाकर उस परम योग्य अपने कुमारका अभिषेक कर दिया। कलिङ्गनरेश धर्मका पूर्ण ज्ञाता था। राजगद्दीपर बैठानेके पश्चात् उसने राजकुमारका मस्तक सूंघा। साथ ही उससे यह मधुर वचन कहा—'बेटा! तुम पुत्रोंमें श्रेष्ठ हो। मैं तुम्हें राजधर्म बताता हूँ, वह सुनो—तात! यदि तुम चाहते हो कि मुझे परम धर्म प्राप्त हो जाय तथा मेरे पितर तर जायें तो तुम्हें धर्मात्मा पुरुषोंको किसी प्रकार क्लेश नहीं देना चाहिये। जो दूसरोंकी स्त्रियोंपर बुरी दृष्टि

अध्याय १३७ ] वराहक्षेत्रकी महिमाके प्रसङ्गमें गीध और शृगालका वृत्तान्त २४५

डालते हैं, बालकोंका वध करते हैं तथा स्त्रीकी हत्या करनेमें नहीं हिचकते, ऐसे व्यक्ति दण्डके पात्र हैं। कोई भी सुन्दर स्त्री सामने आ जाय तो तुम्हें आँखें मूँद लेनी (कुदृष्टि नहीं डालनी) चाहिये। दूसरोंके अर्जित धनके प्रति तुम्हें लोभ नहीं करना चाहिये और न अन्यायसे ही धन कमाना चाहिये। तुम्हें न्यायपूर्वक पूरी तैयारी तथा दक्षतासे अपने देशकी रक्षा करनी चाहिये। तुम सदा उद्योगशील होकर तत्पर रहना और मन्त्रियोंकी मन्त्रणाका पालन करना, वे जो बात बतायें, उन्हें विचारपूर्वक करना। अपने शरीरकी रक्षापर पूरा ध्यान देना है। बेटा! यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो तुम्हारे जिस व्यवहारसे प्रजा आनन्दसे रहे एवं ब्राह्मण जिससे संतुष्ट रहें, तुम्हें वही कर्म करना चाहिये। राजाओंके लिये सात प्रकारके महान् व्यसन कहे गये हैं—उनसे तुम्हें सदा दूर रहना चाहिये। तुम्हारी सम्पत्तिमें किसी प्रकार दोष आ जाय, ऐसा काम तुम्हें कभी भी नहीं करना चाहिये। राज्यकर्मके सम्बन्धमें अपने मन्त्रीसे तुम्हें किसी प्रकार अप्रिय वचन नहीं कहना चाहिये। मैं इस समय तीर्थमें जानेके लिये प्रस्तुत हूँ, तुमको मुझे रोकना नहीं चाहिये। पुत्र! यदि मुझे प्रसन्न करना चाहते हो तो इतना काम करनेके लिये शीघ्र उद्यत हो जाओ।'

पृथ्वीदेवि! उस समय पिताकी बात सुनकर राजकुमारने उनके पैर पकड़ लिये और उनसे करुणापूर्वक वचन कहना आरम्भ किया। राजकुमारने कहा—'पिताजी! आप यदि यहाँ नहीं रहेंगे तो राज्य, खजाना और सेनासे मुझे कोई प्रयोजन नहीं है। आपके बिना मैं जीवित नहीं रह सकता। भले ही आपने अभिषेक करके मुझे राजा बना दिया। पर पिताजी! मैं तो केवल बालकोंके खेल ही जानता हूँ। राजालोग जिस प्रकार राज्यकी व्यवस्था करते हैं, उन सभीसे तो मैं सर्वथा अनभिज्ञ हूँ।'

अपने पुत्रकी बात सुनकर राजाने उससे सामपूर्वक कहा—'पुत्र! तुम जो कहते हो कि 'मैं कुछ नहीं जानता' तो इस विषयमें तुम्हारे मन्त्री एवं नगरके रहनेवाले सत्पुरुष सब कुछ बता देंगे।' देवि! उस समय अपने पुत्रको इस प्रकारका उपदेश देकर कलिङ्गनरेश धर्मशास्त्रकी विधिके अनुसार 'सौकरव (वराह) क्षेत्र' में जानेके लिये तैयार हो गया। उसे वहाँ जाते देखकर वहाँके रहनेवाले लोग भी अपनी स्त्री तथा पुत्रोंके सहित सब-के-सब पीछे चल पड़े। इतना ही नहीं, अन्तःपुरकी स्त्रियाँ भी बड़ी प्रसन्नतासे हाथी, घोड़े, रथ आदि सवारियोंपर चढ़कर उसके पीछे-पीछे चल पड़ीं।

इस प्रकार वह कलिङ्गराज बहुत समयके पश्चात् 'सौकरव' तीर्थमें पहुँचा और वहाँ पहुँचकर धन-धान्यका यथोचित दान किया और इस प्रकार धर्म करते हुए धीरे-धीरे समय बीतता गया। इस प्रकार कुछ दिन बीत जानेके पश्चात् राजाने अपनी पत्नीसे यह मधुर वचन कहा—'सुन्दरि! आज मेरे जीवनके हजार वर्ष पूरे हो गये। अब मैंने तुमसे जो पूछा था, उस परम गोपनीय विषयको मुझे बताओ।' इसपर वह राजकुमारी राजाके दोनों चरणोंको पकड़कर बोली—'मानद! महाभाग! आप मुझसे जो बात पूछ रहे हैं, उसे तीन रातोंतक उपवास करनेके बाद आप सुननेकी कृपा करें।' उसने पत्नीकी बातका अनुमोदन किया और कहा—'कमलनयनि! तुम जैसी बात कहती हो, वह मुझे पसंद है। फिर स्नानकर तीन राततक नियमपूर्वक रहनेके लिये संकल्प किया। तदनन्तर तीन राततक नियमपूर्वक रहकर दम्पतीने स्नान किया और पवित्र रेशमी

२४६संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय १३७

वस्त्र धारणकर अलंकारोंसे अपने शरीरको आभूषित किया तथा भगवान् विष्णुको प्रणाम किया। फिर राजकुमारीने अपने अलंकारोंको उतारकर मुझे (विष्णु-वराहको) अर्पण कर दिया तथा उस नरेशसे बोली—'नाथ! आइये! हम दोनों एकान्त स्थानपर चलें। आपके मनमें जिस गोपनीय बातको जाननेकी इच्छा है, उसे समझें।'

तत्पश्चात् कलिङ्गनरेश और काञ्ची-राजकुमारी एकान्त स्थानमें गये। फिर राजकुमारीने कहा—'राजन्! मैं पूर्वजन्ममें एक शृगाली थी, मेरा जन्म तिर्यक्-योनिमें हुआ था। मृगके भ्रमसे सोमदत्त नामक एक राजकुमारने बाण चलाया और मैं उससे बिंध गयी। मेरे सिरमें अब भी उस तीखे बाणके चिह्न (संस्कार) अवशेष हैं, आप इसे देखनेकी कृपा कीजिये। उसीके दोषसे मेरे सिरमें यह रोग सदा बना रहता है। काशीनरेशके कुलमें मेरा जन्म हुआ। फिर संयोग तथा अपने पिताजीकी कृपासे मैं आपकी पत्नी बन गयी हूँ। सौकरक्षेत्रके प्रभावसे मेरा ऐसा जन्म हुआ है और सिद्धि सुलभ हुई है। प्राणनाथ! आपको मेरा प्रणाम है।' यह कहकर फिर वह चुप हो गयी।

अब राजकुमारको भी अपने पूर्वजन्मकी स्मृति हो आयी। वह कहने लगा—'महाभागे! देखो, मैं भी पूर्वजन्ममें एक गीध था। उसी सोमदत्तने एक बाणद्वारा मुझे भी मार डाला था। इस तीर्थके परिणामस्वरूप मैं कलिङ्गदेशका राजा बना हूँ। मुझे बहुत कष्टका सामना करना पड़ता था। पर वही आज मैं महान् राज्यका अधिकारी बन गया था। सुशोभने! आज सिद्धि भी मेरे हाथमें आ गयी है। देखो, मेरे मनमें कोई भी संकल्प नहीं था, फिर भी सूकरक्षेत्रकी ऐसी महिमा है।'

वसुंधरे! इसके बाद वे दोनों दम्पती तथा वहाँ जो भी नगर-ग्रामनिवासी मेरे भक्त एवं प्रेमी उपस्थित थे, वे सभी यह प्रसङ्ग सुनकर हानि-लाभका विचार छोड़कर सर्वथा शुभ ध्यानमें संलग्न हो गये और वहीं प्राण त्यागकर आसक्तियोंसे शून्य होकर चतुर्भुज-रूप धारणकर शङ्ख, चक्रादि आयुधोंसे सज्जित होकर श्वेतद्वीप पहुँचे।

जो व्यक्ति इस प्रकार नियमके अनुसार इस तीर्थमें निवास करता है और उसकी वहाँ मृत्यु हो जाती है तो वह श्वेतद्वीपको अवश्य प्राप्त कर लेता है। वसुंधरे! यहीं एक आखेटक तीर्थ है। उसमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है, वह सुनो। यहाँ स्नान करनेवाले प्राणी नन्दनवनमें पहुँचकर ग्यारह हजार वर्षोंतक निरन्तर परमानन्दका उपभोग करते हैं। फिर जब वे स्वर्गसे च्युत होते हैं तो विशाल कुलमें उत्पन्न होकर मेरे भक्त होते हैं—इसमें कोई संशय नहीं। एक बात और, जो कोई मनुष्य यहाँके 'गृध्रवटनामक' तीर्थमें स्नान करता और संध्या, तर्पण आदि कर्म करता है, वह जो फल प्राप्त करता है, वह बतलाता हूँ। वह इस पुण्यके प्रभावसे नौ हजार नौ सौ वर्षोंतक इन्द्रलोकमें पहुँचकर देवताओंके साथ आनन्दका उपभोग करता है। फिर जब वह इन्द्रलोकसे च्युत होता है तो मेरे इस तीर्थके प्रभावसे वह मेरा भक्त बन जाता है और उसकी सारी आसक्तियाँ दूर हो जाती हैं।

भगवान् नारायणसे ऐसा सुनकर उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली देवी पृथ्वी समस्त लोकोंके स्वामी भगवान् जनार्दनसे मधुर वचनोंमें बोली—'देव! किस कर्मके फलस्वरूप प्राणीको यह तीर्थ प्राप्त होता है अथवा वहाँ स्नान करने और मरनेका कैसे संयोग प्राप्त होता है, इसे यथार्थरूपसे कहनेकी कृपा कीजिये।

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! तुम महान्

अध्याय १३८ ] वराहक्षेत्रान्तर्वर्ती 'आदित्यतीर्थ' का प्रभाव [ २४७

भाग्यशालिनी हो। सुनो! जिन मनुष्योंने पूर्वजन्ममें सद्धर्मोंका पालन किया है, पर किसी बुरे कर्मके दोषसे पशुकी योनिमें जन्म पा जाते हैं, वे किन्हीं अन्य जन्मोंके उपार्जित पुण्यों तथा तीर्थ-स्नान, जप एवं महान् दान तथा देवार्चनोंके प्रभावसे ही भले तीर्थमें मरनेका संयोग प्राप्त करते हैं।

तीर्थोंके दर्शन एवं अवगाहन करनेके प्रभावसे पाप नष्ट हो जाते हैं। वस्तुतः धर्मानुमोदित इस वराहक्षेत्र-कर्मकी गति बड़ी गहन है। उसके प्रभावसे जो बहुत छोटा-सा दीखता है, वह बहुत बड़ा बननेकी शक्ति प्राप्त कर लेता है और उसे अद्भुत पुण्यकी प्राप्ति होती है। इसीसे उस शृगाली एवं गीधको मनुष्ययोनि एवं साम्राज्यकी प्राप्ति हुई थी और उन्हें जन्मान्तरकी भी स्मृति बनी रही। यह सब इस तीर्थका ही प्रभाव है और अन्तमें वे श्वेतद्वीपको प्राप्त हुए।

देवि! अब अन्य तीर्थकी बात बतलाता हूँ, उसे सुनो। यहाँ एक 'वैवस्वत' नामका तीर्थ है, जहाँ पुत्रकी कामनासे कभी सूर्यदेवने कठोर तपस्या की थी और बादमें उन्होंने वहाँ दस हजार वर्षोंतक निरन्तर चान्द्रायण-व्रत भी किया था, फिर सात हजार वर्षोंतक वे मात्र वायुके आहारपर रहे। भद्रे! तब मैं उनपर संतुष्ट हुआ और उनसे वर माँगनेके लिये कहा। इसपर उन्होंने कहा—'भगवन्! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे एक पुत्र प्रदान करनेकी कृपा कीजिये।

फिर मेरे वरदानसे 'यम' और 'यमुना' नामकी उन्हें दो जुड़वीं संतानें हुईं। तबसे 'सौकरव' क्षेत्रके अन्तर्गतका यह तीर्थ 'वैवस्वततीर्थ' नामसे प्रसिद्ध हुआ। वसुंधरे! जो मनुष्य वहाँ जाकर दिनके आठवें भागमें अर्थात् सूर्यास्तके कुछ पूर्व स्नानकर भोजन करता है, वह दस हजार वर्षोंतक सूर्यके लोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। यदि किसी प्राणीकी वहाँ अनायास मृत्यु हो जाती है तो वह इस तीर्थके प्रभावसे यमपुरीमें नहीं जाता। भद्रे! इस 'सौकरव' तीर्थ (वराहक्षेत्र)-में स्नान करने और मरनेका फल तथा वहाँकी घटनाएँ मैंने तुम्हें बतला दीं। यह आख्यान भी आख्यानोंमें महान् तथा पवित्रोंमें परम पवित्र 'आख्यान' है तथा यह सौकरव-तीर्थोंमें परम श्रेष्ठ तीर्थ है। यहाँ संध्योपासन तथा जप-तप-अनुष्ठानके फल परम उत्तम हैं। यह परम तेज एवं सभी भागवत पुरुषोंका परम प्रिय रहस्य है। जिसे दूसरोंकी निन्दा करनेका स्वभाव है एवं जो अज्ञानी हैं, उनके सामने इसका उपदेश नहीं करना चाहिये। जिनकी भगवान्में श्रद्धा है, जो वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ हैं, जिन्होंने दीक्षा ले रखी है, जो सम्पूर्ण शास्त्रोंको जानते हैं, उन्हीं लोगोंके सामने यह दिव्य प्रसङ्ग सुनाना चाहिये। यह सौकरव-क्षेत्रमें प्राप्त होनेवाला महान् पुण्य तुमसे बतला दिया। पृथ्वि! जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करता है, उसने मानो बारह वर्षोंतक मेरा ध्यान कर लिया, इसमें कोई संदेह नहीं है, उसे शाश्वत मुक्ति सुलभ हो जाती है। जो इसके केवल एक अध्यायका भी पाठ कर लेता है, वह अपने दस कुलोंको तार देता है। [अध्याय १३७]


वराहक्षेत्रान्तर्वर्ती 'आदित्यतीर्थ' का प्रभाव (खञ्जरीटकी कथा)

सूतजी कहते हैं—भगवान् वराहके मुखारविन्दसे वराहक्षेत्रकी महिमा, गुणस्तुति और जात्यन्तर-परिवर्तनकी शक्ति सुनकर पृथ्वीदेवीका हृदय आश्चर्यसे भर गया, अतः उन्होंने भगवान् नारायणसे कहा—प्रभो! 'वराहक्षेत्र' में मरा हुआ प्राणी न चाहनेपर भी मनुष्य-जन्म पानेका अधिकारी

११८- कोकामुख-बदरी-क्षेत्रका माहात्म्य

२४८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १३८

हो जाता है; अतः निःसंदेह यह क्षेत्र बहुत पवित्र है। प्रभो! अब आप वहाँका कोई दूसरा प्रसङ्ग बतानेकी कृपा कीजिये। देवेश्वर! मैं यह जानना चाहती हूँ कि शास्त्रोंमें वहाँ गायन-वादन करने, नृत्य एवं जागरण करने, गोदान, अन्नदान और जलदान करने, सम्यक् प्रकारसे स्नान करने अथवा गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदिसे आपकी पूजा करनेका क्या फल होता है? जप और यज्ञ आदि अन्य कर्म करनेसे शुद्ध मनवाले प्राणी वहाँ किस गतिको प्राप्त करते हैं? भगवन्! आप अपने भक्तको सुख पहुँचानेके विचारसे यह सब प्रसङ्ग बतलानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् वराह बोले—देवि! यह कथा अत्यन्त पुण्यप्रद एवं सुख देनेवाली है। पहले इसी सौकरव-क्षेत्रमें एक खञ्जरीट* (खञ्जन, खंडरिच, wagtail) पक्षी रहता था। उसने एक बार बहुत-से कीड़ोंको खा लिया, फलतः वह अजीर्णसे अत्यन्त पीड़ित होकर मरणासन्न हो गया और इस 'सूकरक्षेत्र' में ही गिर पड़ा। इतनेमें ही बहुत-से बालक इधर-उधरसे दौड़ते एवं खेलते हुए वहाँ पहुँचे और उस शिथिलगात्र पक्षीको देखकर कहने लगे—'हमलोग इसे पकड़ेंगे।' फिर उनमें परस्पर विवाद छिड़ गया, कोई कहता 'यह मेरा है' और कोई कहता कि 'मेरा।' इस प्रकार खेल-खेलमें ही उनमें झगड़ा होने लग गया और महान् कलह-कोलाहल मच गया। तबतक एक बालकने उसे उठाकर गङ्गाके जलमें फेंक दिया, साथ ही कहा—'भाई! यह तुम्हीं लोगोंका है, इससे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है।'

वसुंधरे! इस प्रकार वह मृत खञ्जरीट (खंडरिच) पक्षी गङ्गाके जलसे भलीभाँति भीग गया। जहाँ वह गङ्गामें पड़ा था, वह 'आदित्यतीर्थ' था। फिर तो वह उस तीर्थके प्रभावसे अनेक उत्तम यज्ञ करनेवाले धन एवं रत्नसे परिपूर्ण किसी वैश्यके घरमें उत्पन्न हुआ। वसुंधरे! वह रूपवान्, गुणवान्, विवेकी, पवित्र तथा मुझमें भक्ति रखनेवाला पुरुष हुआ।

सुव्रते! इस प्रकार उस बालकके बारह वर्ष बीत गये। एक बार जब माता और पिता सुखसे बैठे हुए थे, उनपर उस गुणी बालककी दृष्टि पड़ी। उसने पृथ्वीपर सिर रखकर उन्हें प्रणाम करके कहा—'पिताजी! यदि आपलोग मेरा प्रिय करना चाहते हों तो मुझे एक वर देनेकी कृपा करें। मेरी प्रार्थना यह है कि आप दोनों मेरे मनोरथमें किसी प्रकारकी बाधा न डालें। पिताजी! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ, आप मेरे गुरु हैं, जैसा आप कहेंगे वही होगा।'

देवि! अपने पुत्रकी यह बात सुनकर दम्पती हर्षसे भर गये और उन्होंने सुन्दर नेत्रोंवाले बालकसे यह बात कही—'पुत्र! तुम जो-जो कहोगे और जो कुछ तुम्हारे हृदयमें बात हो, हमलोग वह सब कर देंगे। बस, अब तुम विश्वासपूर्वक बोलो। पुत्र! हमारी तीन हजार गायें हैं, जो सभी खूब दूध देती हैं। तुम जिसे चाहो, उसे इन्हें दे सकते हो, इसमें लेशमात्र विचारनेकी आवश्यकता नहीं है। यदि तुम चाहो तो हमारा व्यापारका काम बहुत विख्यात है, उसका भी सारा अधिकार तुम्हें सौंप दूँ। तुम न्यायपूर्वक उसकी व्यवस्था करो अथवा मित्रोंको धन बाँट दो। पुत्र! तुम धन-धान्य, रत्न आदि जिसे जो भी चाहो, उसे दे सकते हो, इसमें कोई भी प्रतिबन्ध नहीं है। हम अच्छे कुल तथा जातिमें उत्पन्न


* इसे 'ममोला' या 'धोबिन'-चिड़िया भी कहते हैं। गोस्वामीजीने 'कृष्णगीतावली' २२।२ के 'मनहुँ इन्दुपर 'खंजरीट' दोऊ कछुक करुन विधि रचे सँवारी'—पदम 'खञ्जरीट' का तथा मानस २।१९६।७, ३।२९।१० और ४।१५।६ तथा 'विनयपत्रिका' १५।२ आदिमें 'खंजन' शब्दका प्रयोग किया है।

अध्याय १३८ ] वराहक्षेत्रान्तर्वर्ती 'आदित्यतीर्थ' का प्रभाव २४९


बहुत-सी सुन्दरी भली कन्याओंको भी विवाह-विधिके द्वारा तुम्हें प्राप्त करा सकते हैं। सौम्य! यदि तुम्हारे मनमें जैसे पूर्वके वैश्यलोग वेदमें कहे हुए विधानके अनुसार यज्ञ करते थे—वैसे यज्ञकी इच्छा हो तो तुम उसे भी कर सकते हो। वैश्यका कर्म खेती है। इसके लिये आठ-आठ बलवान् बैलोंद्वारा चलनेवाले एक सौ हल भी हमारे पास हैं। फिर तुम और क्या पाना चाहते हो? जितने ब्राह्मणोंको भोजन कराकर तुम तृप्त करना चाहते हो, यह कार्य तथा अन्य कुछ कार्य भी जैसे चाहो, वह सब स्वेच्छानुसार सम्पन्न कर सकते हो।'

वसुंधरे! अपने माता-पिताकी बात सुनकर उस धर्मात्मा बालकने उनके चरण पकड़ लिये और उनसे कहने लगा—गोदानसे इस समय मेरा कोई प्रयोजन नहीं है, न मित्रोंके विषयमें ही मुझे कोई चिन्ता है। मुझे विवाह या यज्ञके फल भी अभीष्ट नहीं हैं। मैं व्यापारका काम करूँ, खेती और गोरक्षामें मेरा समय व्यतीत हो अथवा सम्पूर्ण अतिथियोंका सत्कार करूँ—इन बातोंके लिये भी मेरे हृदयमें कोई आसक्ति नहीं। पिताजी! मेरे मनमें तो बस, भगवान् नारायणके क्षेत्र 'सौकरव' (वराहक्षेत्र)-की ही एक प्रगाढ़ चिन्ता है।

देवि! बालकके माता-पिता दोनों ही मेरे उपासक थे, उन्होंने पुत्रकी यह बात सुनी तो वे दोनों ही दुःखमें भरकर करुण विलाप करने लग गये और कहने लगे (माता कहती है)—'बेटा! अभी तुम्हें जनमे केवल बारह वर्ष ही बीते हैं, वत्स! भगवान् नारायणकी शरणमें जानेकी चिन्ता तुम्हें अभीसे कैसे हो गयी? जिस समय तुम्हें उसके योग्य आयु प्राप्त होगी, तब उस विषयमें विचार करना। अभी तो मैं भोजन लेकर तुम्हारे पीछे-पीछे दौड़ती चलती हूँ। पुत्र! तुम 'सौकरव' (वराहक्षेत्र)-में जानेकी बात अभी क्यों सोचते हो? तुम तो अभी दुधमुँहे बच्चे हो। मेरे स्तन धन्य हैं, जिससे सदा दूध स्रवित होता है (और तुम उसे पीते हो)। बेटा! तुमने अपने स्पर्शसुखकी आशा लगानेवाली मुझ माँके प्रति यह क्या सोचा? जब तुम रातमें सोकर करवटें बदलते हो तो उस समय अब भी मुझे 'माँ-माँ' कहकर पुकारते हो। फिर (वराहक्षेत्र जाने तथा नारायणके आश्रमकी) इस प्रकारकी बातें क्यों सोचते हो? तुम जब खेलते हो तो अन्य स्त्रियाँ भी बड़े स्नेहसे तुम्हारा स्पर्श करती हैं। वत्स! किसीने भी कहीं खेलमें, घरपर अथवा अपने परिजनमें तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया, नौकरोंने तुम्हें कोई कटु वचन नहीं कहे। तुम्हें डरवानेके लिये भी मैंने कभी अपने हाथमें छड़ी नहीं ली। फिर पुत्र! तुम्हारे इस निर्वेद (वैराग्य)-का कारण क्या है?'

वसुंधे! माताकी यह बात सुनकर उस बालकने उससे मधुर वचनोंमें कहा—'माँ! मैं तुम्हारे गर्भमें रह चुका हूँ, तुम्हारे उदरसे ही मेरा जन्म हुआ है, तुम्हारी गोदमें खेला हूँ, प्रेमसे मैंने तुम्हारे स्तनोंका पान किया है। धूल लगे हुए शरीरसे तुम्हारी गोदमें बैठा हूँ। मातः! तुम मुझपर जो इतनी करुणा करती हो, यह तुम्हारे लिये उचित ही है, किंतु मेरी पूजनीया माँ! तुम अब पुत्र-सम्बन्धी मोहका परित्याग करो। यह संसार एक घोर महा-सागरके समान है। यहाँ प्राणी आते हैं और चले जाते हैं, कुछ लोग तो चले गये और कुछ लोग जा रहे हैं। कोई जीव दीखता है, फिर वह नष्ट हो जाता है और आगे कभी दिखायी नहीं पड़ता। इस प्रकार कौन किससे जनमा, कहाँ उसका सम्बन्ध हुआ, किसकी कौन माता हुई और कौन किसका पिता हुआ, इसका कोई ठिकाना नहीं।

२५० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १३८

हजारों माता-पिता, सैकड़ों पुत्र और स्त्रियाँ प्रत्येक जन्ममें आते-जाते रहते हैं। फिर वे किस-किसके हुए या हम ही किसके रहे? अतः माँ! इस प्रकारकी चिन्तामें पड़कर तुम्हें कभी भी सोच नहीं करना चाहिये।' पुत्रकी इस प्रकारकी बातें सुनकर माता और पिताको बड़ा आश्चर्य हुआ, अतः वे फिर बोले—'बेटा! अहो! यह तो बड़ी मार्मिक बात है। पुत्र! इसका रहस्य बतलाओ।' उनकी यह बात सुनकर वह वैश्यकुमार मधुर वाणीमें अपने माता-पितासे कहने लगा—'पूज्यवरो! यदि इस गुह्य बातको सुनकर और विचारकर आप कुछ कहना चाहते हैं तो आपको 'वराहक्षेत्र' का रहस्य पूछना चाहिये और उसे सुननेके लिये 'सौकरवक्षेत्र' में ही पधारनेकी कृपा कीजिये और वहीं यह गुह्य विषय आपलोगोंको पूछना समुचित होगा। वहीं मैं अपनी भी एक आश्चर्यकारी बात बतलाऊँगा। पिताजी! 'सौकरवक्षेत्र'में एक 'सूर्य' तीर्थ है। वहाँ पहुँच जानेपर यह बात बतलाऊँगा।' इसपर दम्पतीने पुत्रसे कहा—'बहुत अच्छा।'

फिर उस बालकके माता-पिता दोनोंने सौकरवतीर्थमें जानेका संकल्प किया। उन्होंने सब प्रकारके द्रव्य साथमें लिये और 'सौकरवतीर्थ'के लिये चल पड़े। कमलपत्रके समान बड़े-बड़े नेत्रोंवाले उस वैश्योंके नेताने अपने जानेके पहले बीस हजार गायोंको ही सबसे आगे हँकवाया, फिर उसके सभी परिजन द्रव्योंसहित प्रस्थित हुए। उनके घरमें जो कुछ था, सब कुछ उन्होंने भगवान् नारायणको समर्पित कर दिया। फिर माघमासकी त्रयोदशी तिथिके दिन पूर्वाह्न-कालमें अपने सभी स्वजनों और सम्बन्धियोंको बुलाकर विधिपूर्वक शुभ मुहूर्तमें उसने स्वयं भी यात्रा कर दी। 'भगवान् नारायणका दर्शन होगा' इससे उनके मनमें बड़ा हर्ष था। श्रीहरिके प्रेममें प्रवाहित वे सभी लोग बहुत समयके पश्चात् वैशाखमासकी द्वादशी तिथिके दिन मेरे क्षेत्रमें आ गये। वहाँ पहुँचनेपर सभीने विधिपूर्वक स्नानकर पितरोंका तर्पण किया। उस वैश्यने दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित बीस हजार गौओंको साथ ले लिया था और उन्हें भाङ्गुरस नामक व्यक्तिको सौंपकर आगे प्रस्तुत कर रखा था। उनमेंसे बीस गायोंको वहीं दान कर दिया। इसी प्रकार वह प्रतिदिन बहुत-से धन और रत्न दानमें बाँटने लगा।

इस प्रकार अपने स्त्री-पुत्र और स्वजनोंके साथ उसके वहाँ रहते-रहते सभी (सस्य—) धान्य-पौधोंको संवर्धन और पालन करनेवाली 'वर्षा-ऋतु' आ गयी, जिससे कदम्ब, कुटज (कौरैया) और अर्जुन नामके वृक्ष पुष्पित हो गये। नदियोंके गर्जन, मोरोंके मधुर स्वर, कौरैया, अर्जुन और कदम्ब आदि वृक्षोंकी सुखद गन्ध और भौरोंका गुञ्जन, पवनका प्रवाह—यह सब उस ऋतुकी विशेषता थी। फिर शरद् ऋतुका प्रवेश हुआ और अगस्त्य-नक्षत्रका उदय हुआ। तड़ागोंके जलमें स्वच्छता आ गयी और उनमें कमल, कुमुद आदि पुष्प खिल गये। अन्य सुरम्य कमल-फूलोंसे भी सर्वत्र शोभाकी वृद्धि होने लगी। अब शीतल, सुगन्ध एवं परम सुखदायी वायु बहने लगी। फिर धीरे-धीरे यह ऋतु भी समास हो चली और कार्तिक महीनेके शुक्ल-पक्षकी एकादशी तिथि आयी। सुभ्रु! उस समय उस वैश्य दम्पतीने स्नानकर, रेशमी वस्त्र धारण किया और अपने पुत्रसे कहा—'पुत्र! हमलोग यहाँ छः महीने सुखपूर्वक रह चुके। आज द्वादशी तिथि आ गयी है, अब वह गोपनीय बात हमलोगोंको तुम क्यों नहीं बताते, जिसे तुमने यहाँ आकर बतानेको कहा था?'

देवि! अपने माता-पिताकी बात सुनकर उस धर्मात्मा पुत्रने उनसे मधुर वचनोंमें कहा—'महाभाग! आपने जो बात पूछी है, वह प्रसङ्ग

११९- 'बदरिकाश्रम' का माहात्म्य

अध्याय १३९ ] भगवान्‌के मन्दिरमें लेपन एवं संकीर्तनका माहात्म्य २५१

बड़ा रहस्यपूर्ण एवं गोपनीय है। इसे मैं कल प्रातः आपलोगोंको बतलाऊँगा। पिताजी! आज यह द्वादशी तिथि है। इस पुण्य अवसरपर दीक्षित योगियोंके कुलमें उत्पन्न तथा विष्णुकी भक्तिमें तत्पर रहनेवाले जो व्यक्ति दान करते हैं, वे भगवत्कृपासे भयंकर संसार-सागरको पार कर जाते हैं।'

वसुंधरे! इस प्रकार उन लोगोंमें परस्पर बात करते-करते मङ्गलमयी रात्रि समाप्त हो गयी और फिर दिन-रात्रिकी संधिका समय आ गया एवं सूर्यमण्डल उदित हुआ। तब वह बालक यथाविधि स्नानादिसे शुद्ध होकर रेशमी वस्त्र धारणकर शङ्ख-चक्र एवं गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीहरिको प्रणामकर माता-पिताके दोनों चरणोंको पकड़कर बोला—'महाभाग! पिताजी! जिस प्रयोजनसे हमलोग यहाँ आये हुए हैं तथा जो बात आप मुझसे बार-बार पूछ रहे हैं एवं जिस गोपनीय बातको इस 'सौकरवक्षेत्र' में कहनेके लिये मैंने प्रतिज्ञा की थी, उसे सुनें, वह प्रसङ्ग इस प्रकार है—"मैं पूर्वजन्ममें एक खञ्जरीट (खंडरिच) पक्षी था। एक बार मैं बहुत-से कीड़ोंको खाकर अजीर्ण-ग्रस्त होकर हिलने-डुलनेमें भी असमर्थ हो गया। उसी समय कुछ बालकोंने मुझे पकड़ लिया और खेल-खेलमें, एकके हाथसे दूसरे लेते रहे। एक कहता 'इसे मैंने देखा' और दूसरा कहता 'मैंने'। इस प्रकार वे आपसमें झगड़ने लगे। इसी बीच विवादसे ऊबकर एक बालकने मुझे घुमाकर गङ्गाके 'आदित्यतीर्थ' नामक स्थानपर जलमें फेंक दिया, जहाँ मेरे प्राण प्रयाण कर गये। यद्यपि मेरे मनमें कोई अभिलाषा न थी, फिर भी उस तीर्थके प्रभावसे मुझे आपलोगोंका पुत्र होनेका सौभाग्य मिला। इस प्रकार तेरह वर्ष पूरे हो चुके। यही वह गोपनीय बात थी, जिसे मैंने आपसे कह दी।"

इसपर माता-पिता पुनः बोले—'पुत्र! भगवान् विष्णुके बतलाये जितने कर्म हैं, उनमें तुम जिस-जिस कर्मको करोगे, उन्हें हम भी विधिपूर्वक सम्पन्न करेंगे।' शास्त्र कहते हैं कि 'घटमाला' कर्म संसारसे मुक्त करनेके लिये परम साधन है, अतः वे सभी कुछ दिनोंतक उसका आचरण करते हुए मेरी उपासनामें संलग्न रहे। पर्याप्त धर्मानुष्ठानके बाद उनका नश्वर शरीर छूट गया और वे अपने धर्मके प्रभावसे तथा मेरे क्षेत्रकी महिमासे संसारसे मुक्त होकर श्वेतद्वीपमें पधारे। जो लोग उनके साथ गये थे, वे योगमें निरत हो गये। उनके शरीरसे कमलके समान गन्ध निकलती थी। देवि! मेरे क्षेत्रके प्रसादसे वे भी यथायोग्य आनन्दका उपभोग करने लगे तथा इस क्षेत्रके प्रभावसे बहुत-से प्राणी पशुयोनिसे छूटकर श्वेतद्वीपमें पहुँच गये। जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करता है, वह अपने दस आगे और दस पीछेके पुरुषोंको तार देता है। मूर्ख, पापी, शास्त्रनिन्दक और चुगलखोर व्यक्तियोंके सामने इसकी व्याख्या या पाठ नहीं करना चाहिये। ब्राह्मणोंके समाजमें अथवा अकेले एकान्त स्थानमें इसका अध्ययन करे; क्योंकि यह सम्पूर्ण संसारसे मुक्त करनेके लिये परम साधन है। [अध्याय १३८]


भगवान्‌के मन्दिरमें लेपन एवं संकीर्तनका माहात्म्य

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! मेरे मन्दिरका गोमयसे लेपन करनेवालेको जो फल प्राप्त होता है, वह ध्यान देकर मुझसे सुनो। (मन्दिरको) लीपते हुए मनुष्य जितने पग चलता है, उतने हजार वर्षोंतक वह दिव्य लोकोंमें आनन्द करता है। देवि! यदि मेरा कोई भक्त व्यक्ति बारह वर्षोंतक मन्दिर लीपनेका कार्य करता है, तो वह धन और धान्यसे भरे-पूरे किसी शुद्ध एवं

२५२संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १३१

विशाल कुलमें जन्म पाता है और देवताओंद्वारा अभिवन्दित होता हुआ कुशद्वीपको प्राप्त करता है और वहाँ दस हजार वर्षोंतक निवास करता है। शुभे! देवि! जो मेरे अन्तर्गृहका स्वयं लेपन करता है अथवा न्यायपूर्वक दूसरोंसे लेपन कराता है, वह मेरे लोकको प्राप्त होता है। वसुंधरे! अब मैं गोबरकी महिमा बताता हूँ, तुम उसे सुनो। मन्दिर लीपनेके लिये जो प्राणी किसी समीपके स्थानसे अथवा कहीं दूर जाकर जितने पग चलकर गोमय लाता है, वह (गोबरको लानेवाला व्यक्ति) उतने ही हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठा पाता है। स्वर्गकी अवधि समाप्त हो जानेपर वह शाल्मलिद्वीपमें (जन्म प्राप्तकर) आनन्दका उपभोग करता है और वहाँ बारह हजार एक सौ वर्षोंतक निवास करता है। फिर वह भारतवर्षमें राजा होकर मेरा भक्त होता है तथा सभी धर्मज्ञोंमें वह श्रेष्ठ तथा मेरा उपासक होता है। अगले जन्ममें भी अपने प्राक्तन संस्कार एवं अभ्यासके कारण पुनः गोमय ला करके मेरे मन्दिरका लेपन करता है तथा उसके फलस्वरूप मेरे लोकको प्राप्त होता है। कोई गौको स्नान करा रहा हो या गायके गोबरसे मेरे मन्दिरका उपलेपन करता हो, उस समय जो व्यक्ति उसके पास जल पहुँचाता है, वह उस जलकी बूँदोंके तुल्य सहस्र वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है और वहाँसे जब भ्रष्ट होता है तो वह क्रौञ्चद्वीपमें जाता है और क्रौञ्चद्वीपसे भ्रष्ट होकर भूमण्डलपर धार्मिक राजा होता है। पुनः उसी पुण्यके प्रभावसे वह प्राणी मेरे श्वेतद्वीपमें पहुँचता है।

वसुंधरे! जो स्त्री-पुरुष मेरे मन्दिरमें मार्जन-कर्म करते (झाड़ू लगाते) हैं, वे सभी अपराधोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें सम्मानपूर्वक निवास करते हैं तथा मार्जनके समय धूलके जितने कण उड़ते हैं, उतने सौ वर्षोंतक स्वर्गलोकमें निवास करते हैं और वहाँसे च्युत होनेपर वे शाकद्वीपको प्राप्त होते हैं। ऐसा व्यक्ति वहाँ बहुत दिनोंतक निवासकर फिर पवित्र भारतभूमिपर धार्मिक राजा होता है और सब प्रकारके भोगोंको प्राप्तकर मेरी उपासनाकर श्वेतद्वीपको प्राप्त होता है।

देवि! अब तुम्हें कुछ अन्य बातें बताता हूँ, वह सुनो। जो प्राणी मेरी आराधनाके समय पद्य-गान करते हैं, उन्हें जो फल प्राप्त होता है, उसे बतलाता हूँ, तुम सुनो। गाये जानेवाले पद्यकी पङ्क्तियोंके जितने अक्षर होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक गायक पुरुष इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठा पाता है। गायनमें सदा परायण रहनेवाला मेरा वह भक्त इन्द्रलोक तथा रमणीय नन्दनवनमें देवताओंके साथ आनन्द करनेके बाद जब वहाँसे च्युत होता है तो भूमण्डलमें वैष्णव कुलमें जन्म पाकर वैष्णवोंके साथ ही निवास करता है और वहाँ भी भक्तिके साथ मेरे यशोगानमें संलग्न रहता है। फिर आयु समाप्त होनेपर शुद्ध अन्तःकरणवाला वह पुरुष मेरी कृपासे मेरे ही लोकमें चला जाता है।

पृथ्वी बोली— अहो, भक्ति-संगीतका कैसा विस्मयकारी प्रभाव है, अतः अब मैं सुनना चाहती हूँ कि इस गायनके प्रभावसे कितने पुरुष सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं?

भगवान् वराह कहते हैं— देवि! वराहक्षेत्रमें मेरे मन्दिरके पास एक चण्डाल रहता था, जो मेरी भक्तिमें तत्पर रहकर सारी रात जगकर मेरा यश गाता रहता था। कभी वह सुदूर अन्य प्रदेशतक भ्रमण करते हुए मेरा भक्ति-संगीत गाता रहता। इस प्रकार उसने बहुत-से संवत्सर व्यतीत कर दिये।

एक समयकी बात है, कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी द्वादशीकी रातमें जब सभी लोग सो

१२०- उपासनाकर्म एवं नारीधर्मका वर्णन

अध्याय १३९ ] भगवान्‌के मन्दिरमें लेपन एवं संकीर्तनका माहात्म्य २५३

गये थे, उसने वीणा उठायी और भक्ति-गीत गाते हुए भ्रमण करना प्रारम्भ किया। इसी बीच उसे एक ब्रह्मराक्षसने पकड़ लिया। चण्डाल बेचारा निर्बल था और ब्रह्मराक्षस अत्यन्त बली, अतः वह अपनेको उससे छुड़ा न सका और दुःख एवं शोकसे व्याकुल होकर वह निश्चेष्ट-सा हो गया। फिर उस ब्रह्मराक्षससे कहने लगा— 'अरे! मुझसे तुम्हारा क्या अभीष्ट सिद्ध होनेवाला है, जो तुम इस प्रकार मुझपर चढ़ बैठे हो?' उसकी यह बात सुनकर मनुष्योंके मांसके लोभी ब्रह्मराक्षसने चण्डालसे कहा—'आज दस रातोंसे मुझे कोई भोजन नहीं मिला है। ब्रह्माने मेरे भोजनके लिये ही तुम्हें यहाँ भेज दिया है। आज मैं मज्जा, मांस और रक्तोंसे भरे-पूरे तेरे शरीरका भक्षण करूँगा। इससे मेरी तृप्ति हो जायगी।'

वसुंधरे! चण्डाल मेरे गुणगानके लिये लालायित था। उस व्यक्तिने ब्रह्मराक्षससे प्रार्थना की—'महाभाग! मैं तुम्हारी बात मानता हूँ। ब्रह्माने तुम्हारे खानेके लिये ही मुझे भेजा है, परंतु परम प्रभुकी भक्तिसे सम्पन्न होकर इस जागरणमें मैं देवाधिदेव जगदीश्वरके पद्यगानके लिये समुत्सुक हूँ। अतः वनमें उनके आवासस्थलके पास जाकर संगीत सुनाकर मैं लौट आऊँ, तब तुम मुझे खा लेना परंतु इस समय मुझे जाने दो, क्योंकि मैंने यह व्रत धारण कर रखा है कि निशीथ (आधी रात)-में भगवान् श्रीहरिको प्रसन्न करनेके लिये भक्तिसंगीत सुनाया करूँगा। व्रत पूरा होनेपर तुम मुझे खा लेना। इसपर क्षुधार्त ब्रह्मराक्षस कठोर शब्दोंमें बोला—'"अरे मूर्ख! क्यों ऐसी झूठी बात बनाता है? तू कहता है कि 'तुम्हारे पास फिर मैं आऊँगा'। भला ऐसा कौन मनुष्य है, जो मृत्युके मुखमें पहुँचकर फिर जीवित लौट जाय? तुम ब्रह्मराक्षसके मुखमें पड़कर भी फिर जानेकी इच्छा करते हो?' चण्डाल बोला—'ब्रह्मराक्षस! मैं यद्यपि पहलेके निन्दित कर्मोंके प्रभावसे इस समय चण्डाल बना हूँ, किंतु मेरे अन्तःकरणमें धर्म स्थित है। तुम मेरी प्रतिज्ञा सुनो, मैं धर्मानुसार पुनः निश्चित आऊँगा। ब्रह्मराक्षस! अपने जागरणव्रतको पूराकर मैं लौटकर यहाँ अवश्य आऊँगा। देखो, सम्पूर्ण जगत् सत्यके आधारपर ही टिका है। अन्य सब लोक भी सत्यपर ही आधृत हैं। ब्रह्मवादी ऋषियोंने सत्यके द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की थी। कन्या सत्यप्रतिज्ञापूर्वक ही दान की जाती है। ब्राह्मणलोग भी सदा सत्य ही बोलते हैं। राजालोग सत्य-भाषण करनेके प्रभावसे ही तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करते हैं^१। स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति भी सत्यके प्रभावसे ही सुलभ होती है। सूर्य भी सत्यके प्रतापसे ही तपते हैं और चन्द्रमा भी सत्यके ही प्रभावसे जगत्‌को रञ्जित—आनन्दित करते हैं।^२ मैं सत्यतापूर्वक प्रतिज्ञा करता हूँ कि 'यदि मैं लौटकर तुम्हारे पास फिर न आऊँ तो षष्ठी, अष्टमी, अमावास्या, दोनों पक्षकी चतुर्दशी—इन तिथियोंमें जो स्नातक नहीं करता, उसकी जो दुर्गति होती है, वह गति मुझे प्राप्त हो। जो व्यक्ति अज्ञान तथा मोहमें पड़कर गुरु और राजाकी पत्नीके साथ गमन करता है, उसे जो गति मिलती है, वही गति यदि मैं फिर न लौटूँ तो मुझे प्राप्त हो। मिथ्या यज्ञ करनेवाले पुरुषोंको तथा मिथ्या भाषण करनेवाले लोगोंको जो गति प्राप्त होती है, वही गति यदि मैं पुनः न आ सकूँ तो मुझे प्राप्त हो। ब्राह्मणका वध करनेपर, मदिरा-पान, चोरी और


१. सत्यमूलं जगत्सर्वं लोकाः सत्ये प्रतिष्ठिताः। सत्येन दीयते कन्या सत्यं जल्पन्ति ब्राह्मणाः॥
सत्यं जयन्ति राजानस्त्रीण्येतान्यब्रुवन्नृतम्। (वराहपु० १३९।५०-५१)
२. सत्येन गम्यते स्वर्गो मोक्षः सत्येन चाप्यते। सत्येन तपते सूर्यः सोमः सत्येन रज्यते। (वराहपु० १३९।५३)

१२१- मन्दारकी महिमाका निरूपण

२५४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १३१

व्रतभङ्ग करनेपर मनुष्यको जो गति प्राप्त होती है, यदि मैं पुनः न लौटूँ तो वह मुझे प्राप्त हो।'

देवि! उस समय चण्डालकी बात सुनकर वह ब्रह्मराक्षस प्रसन्न हो गया। अतः वह मधुर वाणीमें कहने लगा—'अच्छा, तुम जाओ, नमस्कार।' इस प्रकार अपने निश्चयमें अडिग चण्डाल ब्रह्मराक्षससे ऐसा कहकर मेरे संगीतमें तल्लीन हो गया। उसके नाचते-गाते सम्पूर्ण रात्रि बीत गयी। प्रातःकाल होनेपर जब वह ब्रह्मराक्षसके पास वापस चला तो इतनेमें कोई पुरुष उसके सामने आकर खड़ा हो गया और उसने उससे कहा—'साधो! तुम इतनी शीघ्रतासे कहाँ चले जा रहे हो? तुम्हें उस ब्रह्मराक्षसके पास कदापि नहीं जाना चाहिये। वह ब्रह्मराक्षस तो शवतकको खा जाता है; अतः तुम्हें वहाँ प्रत्यक्ष मृत्युमुखमें नहीं जाना चाहिये।'

चण्डालने कहा—'पहले जब मुझे ब्रह्मराक्षस खानेको तैयार था, तब मैंने उसके सामने प्रतिज्ञा की थी कि मैं वापस आ जाऊँगा। सत्यका पालन करना परम आवश्यक है।' इसपर उस पुरुषने उसके हितकी इच्छासे कहा—'चण्डाल! वहाँ मत जाओ; क्योंकि जीवनकी रक्षाके लिये सत्यत्यागका दोष नहीं होता।' किंतु चण्डाल अपने व्रतमें अटल था। अतः वह मधुर वाणीमें बोला—'मित्र! तुम जो कह रहे हो, वह मुझे अभीष्ट नहीं है। मुझसे सत्यका त्याग नहीं हो सकता; क्योंकि मेरा व्रत अचल है। जगत्की जड़ सत्य है और सत्यपर ही यह सारा संसार टिका है। सत्य ही परम धर्म है। परमात्मा भी सत्यपर ही प्रतिष्ठित है; अतः मैं किसी प्रकार भी असत्यका आचरण नहीं करूँगा।' इस प्रकार कहकर वह चण्डाल ब्रह्मराक्षसके पास चला गया और उसका सम्मान करते हुए बोला—'महाभाग! मैं आ गया हूँ। अब मुझे भक्षण करनेमें तुम विलम्ब न करो। तुम्हारी कृपासे अब मैं भगवान् विष्णुके उत्तम स्थानको जाऊँगा। अब तुम अपनी इच्छाके अनुसार मेरे शरीरके इन अङ्गोंको खा सकते हो।

अब वह ब्रह्मराक्षस मधुर वाणीमें कहने लगा—'साधु वत्स! साधु! मैं तुमसे संतुष्ट हो गया, क्योंकि तुमने सत्य-धर्मका भलीभाँति पालन किया है। चण्डालोंको प्रायः किसी धर्मका ज्ञान नहीं होता, पर तुम्हारी बुद्धि पवित्र है।'

'भद्र! यदि तुम्हें जीनेकी इच्छा है तो विष्णु-मन्दिरके पास जाकर गत रातमें तुमने जो गान किया है, उसका फल मुझे दे दो, मैं तुम्हें छोड़ दूँगा, न तो खाऊँगा और न डराऊँगा।' ब्रह्मराक्षसकी बात सुनकर चण्डाल बोला—'ब्रह्मराक्षस! तुम्हारे इस वाक्यका क्या अभिप्राय है? मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ। पहले 'मैं खाना चाहता हूँ'—'यह कहकर अब तुम भगवद्गुणानुवादका पुण्य क्यों चाहते हो?' चण्डालकी बात सुनकर ब्रह्मराक्षस बोला—'बस, तुम अपने एक पहरके गीतका ही पुण्य मुझे दे दो। फिर मैं तुम्हें छोड़ दूँगा और स्त्री-पुत्रके साथ तुम जीवित रह सकोगे।' पर उस चण्डालको गीतके पुण्यका लोभ था। अतः वह बोला—'ब्रह्मराक्षस! मैं संगीतका फल नहीं दे सकता। तुम अपने नियमके अनुसार मुझे खा जाओ और मनोऽभिलषित रुधिरका पान कर लो।' अब वह ब्रह्मराक्षस कहने लगा, 'तात! तुमने जो विष्णुके मन्दिरमें गायन-कार्य किये हैं, उनमेंसे केवल एक गीतका ही फल मुझे देनेकी कृपा करो। तुम्हारे इस एक गीतके फलसे ही मैं तर सकता हूँ और अपने परिवारको भी तार सकता हूँ।' इसपर चण्डालने उसे सान्त्वना देते हुए, आश्चर्यचकित होकर उससे पूछा—'ब्रह्मराक्षस! तुमने कौन-सा विकृत कर्म किया है, जिस दोषसे

अध्याय १३९ ] भगवान्‌के मन्दिरमें लेपन एवं संकीर्तनका माहात्म्य २५५


तुम्हें ब्रह्मराक्षस होना पड़ा है। तुम मुझे बताओ।'

ब्रह्मराक्षस बोला—'मैं पूर्वजन्ममें चरकगोत्रीय सोमशर्मा नामका एक यायावर ब्राह्मण था। मुझे यद्यपि वेदके सूत्र और मन्त्र कुछ भी ठीक-ठीक ज्ञात न थे, फिर भी यज्ञादि कर्म करानेमें लगा रहता था। लोभ और मोहसे आकृष्ट होकर फिर मैं मूर्खोँका पौरोहित्य करने लगा—उनके यज्ञ, हवन आदिका कार्य कराने लगा। एक समयकी बात है कि जब मैं संयोगवश एक 'पाञ्चरात्र' संज्ञक यज्ञ करा रहा था कि इतनेमें ही मुझे उदरशूल उत्पन्न हुआ और मेरे प्राण निकल गये। उसकी पूर्णाहुति नहीं हुई। अतः मेरी यह स्थिति हुई है। उस दूषित कर्मके प्रभावसे ही मैं ब्रह्मराक्षस हो गया। मैंने उस यज्ञमें मन्त्रहीन, स्वरहीन और नियमविरुद्ध प्राग्वंश* आदिकी स्थापना की थी, हवन भी अविधिपूर्वक ही कराया। उसी कर्म-दोषके परिणामस्वरूप मुझे यह राक्षसी योनि प्राप्त हुई है। अब तुम अपने गीतका फल देकर मेरा उद्धार करो। विष्णुगीतके पुण्यद्वारा अब मुझ अधमको शीघ्र ही इस पापसे मुक्त कर दो।'

देवि! वह चण्डाल एक उत्तमव्रती व्यक्ति था। उसने ब्रह्मराक्षसकी बात सुनकर उसके वचनोंका सहर्ष अनुमोदन किया, साथ ही बोला—'राक्षस! यदि मेरे गीतके फलसे तुम शुद्धमना एवं क्लेशमुक्त हो सकते हो तो लो, मैंने अत्यन्त सुन्दर स्वरोंसे जो सर्वोत्कृष्ट गान किया है, उसीका फल मैं तुम्हें प्रदान करता हूँ। जो पुरुष श्रीहरिके सामने इस भक्ति-संगीतका गान करता है, वह लोगोंको अत्यन्त कठिन परिस्थितियोंसे भी तार देता है।' ऐसा कहकर उस चण्डालने उस गीतका फल ब्रह्मराक्षसको दे दिया। भद्रे! फलतः वह ब्रह्मराक्षस तत्काल एक दिव्य पुरुषके रूपमें परिवर्तित हो गया। ऐसा जान पड़ता था, मानो वह शरद्-ऋतुका चन्द्रमा हो। मेरे गुणयुक्त गीतोंका फल अनन्त है। देवि! यह मैंने भक्ति-संगीतके गायनके श्रेष्ठ फलका वर्णन कर दिया, जिस गीतके एक शब्दके प्रभावसे मनुष्य संसार-सागरसे तर जाता है।

अब जो वाद्यका फल होता है, उसे बताता हूँ, इसकी सहायतासे वसिष्ठने देवताओंसे शबला गौको प्राप्त किया था। (शम्पा) झाँप और ताल अथवा इनके संयोग-प्रयोगसे मनुष्य नौ हजार नौ सौ वर्षोंतक कुबेरके भवनमें जाकर इच्छानुसार आनन्दका उपभोग करता है। फिर वहाँसे अवकाश मिलनेपर झाँप और तालोंसे सम्पन्न होकर स्वतन्त्रतापूर्वक मेरे लोकोंमें पहुँच जाता है। अब जो मनुष्य मेरी आराधनाके समय नृत्य करता है, उसका पुण्य कहता हूँ, सुनो। इसके फलस्वरूप वह संसार-बन्धनको काटकर मेरे लोकको प्राप्त करता है।

जो मानव जागरण करके गीत और वाद्यके साथ मेरे सामने नृत्य करता है, वह जम्बूद्वीपमें जन्म पाकर, राजाओंका भी राजा होता है और सम्पूर्ण धर्मोंसे सम्पन्न होकर वह सम्पूर्ण पृथ्वीका रक्षक होता है। मेरा भक्त मुझे पुष्प और उपहार अर्पणकर मेरे लोकको प्राप्त होता है। वसुंधरे! जो सत्कर्मके पथपर पैर रखकर मेरी उपासना करता है तथा जो पुष्पोंको लाकर मेरे ऊपर चढ़ाता है, वह महान् उत्तम कर्मका सम्पादन कर लेता है, अतः वह मेरे लोकमें जानेका अधिकारी हो जाता है। वसुंधरे! जो मनुष्य प्रातःकाल


* 'प्राग्वंशशाला'—यह वेदीके पूर्व ओरमें बनी हुई पत्नी-शाला है, जिसमें घरके स्त्री, बच्चे आदि बैठते हैं। भागवत (४।५।१४)-की टीकामें अधिकांश व्याख्याताओंने इसे यज्ञशालाका बाँस माना है, पर वह ठीक नहीं लगता। द्रष्टव्य—श्रौतकोश भाग ३, 'श्रौतपदार्थनिर्वचनम्' ३।१३—१५।

१२२- सोमेश्वरलिङ्ग, मुक्तिक्षेत्र (मुक्तिनाथ) और त्रिवेणी आदिका माहात्म्य

२५६संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय १४०

उठकर इसका पाठ करता है, वह अपने पूर्वकी दस तथा आगे होनेवाली दस पीढ़ियोंको तार देता है। मूर्खों एवं निन्दकोंके सामने इसका प्रवचन नहीं करना चाहिये। यह धर्मोंमें परम धर्म और क्रियाओंमें परम क्रिया है। शास्त्रकी निन्दा करनेवाले व्यक्तिके सामने कभी भी इसका कथन नहीं करना चाहिये। जो मुझमें श्रद्धा रखते हैं तथा जिनमें मुक्तिकी अभिलाषा है, उनके सामने ही उसका पठन-पाठन करना चाहिये।

[ अध्याय १३९ ]


कोकामुख-बदरी-क्षेत्रका माहात्म्य

पृथ्वी बोली— भगवन्! आपने जिन तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन किया है, उन्हें मैं सुन चुकी। अब मैं यह जानना चाहती हूँ कि आप सगुण-साकार विग्रह धारणकर सदा किस क्षेत्रमें सुशोभित होते हैं; जहाँ आपका उत्तम कर्म सम्पादनकर श्रेष्ठ गति प्राप्त की जाय?

भगवान् वराह कहते हैं— देवि! कोकामुख-^१ तीर्थका नाम तो मैं तुम्हें पहले बता ही चुका हूँ, जो गिरिराज हिमालयकी तलहटीमें स्थित है। इसके अतिरिक्त दूसरा लोहार्गल^२ नामका एक स्थान है, जिसे मैं एक क्षण भी नहीं छोड़ता। ऐसे तो ज्ञानकी दृष्टिसे चर-अचर सारा जगत् मुझसे व्याप्त है और कोई भी स्थान मुझसे रिक्त नहीं, किंतु जो लोग मेरी गूढ़ गतिको जानना चाहते हैं, वे मेरी आराधनामें लगनेकी इच्छासे यथाशीघ्र 'कोकामुख' जानेका प्रयल करें।

धरणीने पूछा— जगत्प्रभो! जब आप सर्वत्र रहते हैं, तो आप 'कोकामुख' क्षेत्रको ही कैसे श्रेष्ठ बतलाते हैं?

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! 'कोकामुख' क्षेत्रसे बढ़कर कोई भी स्थान मेरे लिये श्रेष्ठ, पवित्र, उत्तम या प्रिय नहीं है। जो व्यक्ति 'कोकामुख' क्षेत्रमें पहुँच गया, वह पुनः इस संसारमें जन्म नहीं पाता। 'कोकामुख' क्षेत्रके समान दूसरा कोई स्थान न हुआ, न आगे होगा। वहाँ मेरी मूर्तिकी गुप्तरूपसे निवास है।

पृथ्वी बोली— देवेश्वर! आप सर्वोपरि देवता हैं। भक्तोंको अभय प्रदान करना आपका स्वाभाविक गुण है। अब इस 'कोकामुख' क्षेत्रमें जितने गोपनीय स्थान हैं, उन्हें मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् वराह कहते हैं— देवि! जहाँ इसमें मुख्य पर्वतसे सदा जलकी बूँदें भूमिपर गिरती हैं, उस स्थानको 'जलबिन्दु' तीर्थ कहते हैं। वहाँ पृथ्वीपर मूसलकी तुलना करनेवाली पर्वतसे एक धारा गिरती है, जिसका नाम 'विष्णुधारा' है। जो वहाँ मात्र एक दिन-रात उपवासकर यत्नपूर्वक स्नान करता है, उसे एक हजार 'अग्निष्टोम-यज्ञों' के अनुष्ठान करनेका फल प्राप्त होता है और उसकी बुद्धिमें कर्तव्यनिर्धारणमें कभी व्यामोह नहीं होता। फिर अन्तमें वह 'विष्णुधारा' के तटपर ही मरनेका सौभाग्य प्राप्तकर नित्य मेरी इस मूर्तिक दर्शन करता रहता है, इसमें कोई संशय नहीं। उस 'कोकामुख' क्षेत्रमें एक 'विष्णुपद' नामका स्थान है। वसुंधरे! वहाँ भी मेरी मूर्ति है, किंतु इस रहस्यको कोई नहीं जानता। देवि! जो व्यक्ति वहाँ स्नानकर एक रात निवास करता है, वह मुझमें श्रद्धा रखनेवाला व्यक्ति 'क्रौञ्च' द्वीपमें जन्म पाता है और अन्तमें जब प्राणोंका त्याग


१. देखिये पृष्ठ १९७ और उसकी टिप्पणी।
२. द्रष्टव्य-अध्याय १५१ तथा पृष्ठ २६४ की टिप्पणी।

अध्याय १४० ] कोकामुख-बदरी-क्षेत्रका माहात्म्य २५७

करता है, तब आसक्तियोंसे मुक्त होकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।

इसी 'कोका' मण्डलमें 'चतुर्धारा' नामक एक स्थान है। वहाँ ऊँचे पर्वतसे धाराएँ गिरती हैं। जो मानव पाँच राततक निवास करते हुए वहाँ स्नान करता है, वह कुशद्वीपमें निवास करनेके पश्चात् मेरे लोकमें स्थान पाता है। कर्मफलको सुखमें परिवर्तित करनेवाला यहाँ एक 'अनित्य' नामक प्रसिद्ध क्षेत्र है, जिसे देवतालोग भी जाननेमें असमर्थ हैं, फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या? श्रेष्ठ गन्धोंवाली पृथ्वि! वहाँ एक दिन-रात निवास करके स्नान करनेवाला पुरुष पुष्करद्वीपमें जन्म पाता है और फिर वह सभी पापोंसे मुक्त होकर मेरे लोकको जाता है। वहीं मेरा एक अत्यन्त गोपनीय 'ब्रह्मसर' नामसे प्रसिद्ध स्थान है, जहाँ शिलातलपर एक पवित्र धारा गिरती है। जो मेरा भक्त पाँच राततक वहाँ निवासकर स्नान करता है, वह सूर्यलोकको प्राप्त होता है। सूर्यधाराके आश्रयमें रहनेवाला वह व्यक्ति जब प्राणोंका त्याग करता है तो वह मेरे लोकको प्राप्त होता है।

देवि! यहीं मेरा एक परम गुप्त स्थान है, जिसे 'धेनुवट' कहते हैं। वहाँ ऊँची शिलासे एक मोटी धारा गिरती है। मेरे कर्ममें संलग्न जो पुरुष वहाँ प्रतिदिन स्नान करता और सात राततक रह जाता है तो उसे ऐसा माना जाता है कि उसने सातों समुद्रोंमें स्नान कर लिया है। फलतः वह मेरी उपासनामें लगा हुआ सातों द्वीपोंमें विहार करता चलता है तथा अन्तमें मेरा ध्यान-भजन करते हुए मरकर वह सातों द्वीपोंका अतिक्रमण-कर मेरे लोकको प्राप्त कर लेता है। देवि! यहाँपर 'कोटिवट' नामका एक गुप्तक्षेत्र है, जहाँ वटवृक्षकी जड़से निकलकर एक धारा गिरती है। वहाँ एक राततक निवास करके स्नान करनेवाला मनुष्य मेरे उस पर्वत-शृङ्गपर वटके पत्तोंकी संख्याके हजार गुने वर्षोंतक रूप और सम्पत्तिसे सम्पन्न रहता है। फिर देवि! मृत्यु होनेपर वह अग्निके समान तेजस्वी होकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।

देवि! मेरे इस क्षेत्रमें 'पाप-प्रमोचन' नामका एक गुप्त स्थान है। जो कोई वहाँ एक दिन-रात रहकर स्नान करता है, वह चारों वेदोंमें पारंगत होकर जन्म पाता है। वहीं एक कौशिकी नामकी नदी है। जो मानव वहाँ पाँच रात्रितक निवास करता हुआ स्नान करता है, वह इन्द्रलोकमें जाता है। कौशिकी नदीसे होकर वहाँ एक धारा बहती है। जो मनुष्य एक रात रहकर उसमें स्नान करता है, उसे यमलोकके घोर कष्टोंको नहीं भोगना पड़ता। मेरा वह भक्त प्राणोंका त्यागकर मेरे धाममें चला जाता है।

भद्रे! मेरे बदरीक्षेत्रमें एक और विशिष्ट स्थान है, जिसके प्रभावसे मनुष्य संसार-सागरको लाँघ जाते हैं। उसका नाम 'द्रंष्ट्राङ्कुर' है और यहीं कोका नदीका उद्गम स्थान है। इस गुह्य स्थानको जाननेमें सभी असमर्थ हैं, इस कारण लोग वहाँ जा नहीं पाते। भद्रे! वहाँ स्नान करके एक दिन-रात पवित्रभावसे निवास करनेवाला मानव 'शाल्मलि' द्वीपमें जन्म पाता है। फिर मेरी उपासनामें संलग्न रहता हुआ वह व्यक्ति प्राणत्याग करनेके उपरान्त 'शाल्मलि' द्वीपका भी परित्यागकर मेरे संनिकट पहुँच जाता है।

महाभागे! वहीं एक परम फलदायक दूसरा गुप्त स्थान भी है, जिसे 'विष्णुतीर्थ' कहते हैं। वहाँ पर्वतके बीचसे जलकी धारा निकलकर 'कोका' नदीमें गिरती है। उस जलको 'त्रिस्रोतस्' कहते हैं, यह सम्पूर्ण संसारसे मुक्त करानेवाला है। पृथ्वीदेवि! वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य संसारके बन्धनको काटकर वायुदेवताके लोकको प्राप्त होता है और वायुका स्वरूप धारण करके ही वह

२५८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १४०

वहाँ निवास करता है। फिर मेरी उपासनामें संलग्न रहता हुआ वह व्यक्ति जब प्राणोंका त्याग करता है, तब उस लोकसे चलकर मेरे लोकमें पहुँच जाता है। यहीं 'कौशिकी' और 'कोका' के सङ्गमपर एक श्रेष्ठ स्थान है, जिसके उत्तर भागमें 'सर्वकामिका' नामकी शिला शोभा पाती है। वहाँ स्नानपूर्वक जो एक दिन-रात निवास करता है, उसकी प्रशस्त एवं विशाल कुलमें उत्पत्ति होती है और उसे जातिस्मरता प्राप्त होती है (पूर्वजन्मकी सारी बातें याद रहती हैं)। इस कौशिकी-कोकासङ्गममें (सर्वकामिका शिलाके पास) स्नान करनेसे मनुष्य स्वर्ग अथवा भूमण्डल जहाँ कहीं भी जाना चाहता है या जो कुछ प्राप्त करना चाहता है, वह सब कुछ ही प्राप्त कर लेता है। मेरी आराधनामें तत्पर रहनेवाला मानव उस स्थानपर प्राणोंके परित्याग करनेके बाद सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त हो करके मेरे लोकमें चला जाता है। भद्रे! 'कोकामुख' क्षेत्रमें 'मत्स्यशिला' नामक एक गुह्य स्थान है। उस श्रेष्ठ स्थानपर कौशिकी नदीसे निकली हुई तीन धाराएँ गिरती हैं। देवि! यदि उसमें स्नान करते समय जलमें मछली दिखलायी पड़ जाय तो उसे समझना चाहिये कि स्वयं भगवान् नारायण ही मुझे प्राप्त हो गये। सुन्दरि! मत्स्यको देखनेके पश्चात् यजन (पूजन) करता हुआ पुरुष मधु और लाजा (लावा)-से समन्वित अर्घ्य प्रदान करे। देवि! जो मेरे ऐसे उत्तम एवं परम गुह्य क्षेत्रमें स्नान करता है, वह मेरुपर्वतके उत्तर भागमें 'पद्मपत्र' नामक स्थानपर निवास करता है। कुछ दिन वहाँ रहनेके पश्चात् मेरे उस गोपनीय स्थानको जब छोड़ता है, तब मेरे लोकमें चला जाता है।

वसुंधरे! पाँच योजनके विस्तारमें मेरा 'कोकामुख' नामक क्षेत्र है। उसे जाननेवाला पापकर्ममें लिप्त नहीं होता। अब एक दूसरे स्थानका परिचय सुनो। परम रमणीय इस 'कोकामुख' क्षेत्रमें जहाँ मैं दक्षिण दिशाकी ओर मुख करके बैठता हूँ, वहीं 'शिलाचन्दन' नामका एक स्थान है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। पुरुषकी आकृतिसे सम्पन्न होनेपर भी मैं वहाँ वराहका रूप धारण करके रहता हूँ। वहाँ सुन्दर ऊँचा मुख और ऊपरतक उठे हुए दाढ़सहित मैं अखिल विश्वको देखता हूँ। देवि! जो मेरे प्रेमी भक्त मुझे स्मरण करते हैं तथा मेरे उपास्य कर्मोंमें रत रहते हैं, उनके पापोंका सर्वथा नाश हो जाता है। अतः वे पवित्रात्मा पुरुष संसार-बन्धनसे छूट जाते हैं। यह महत्त्वपूर्ण 'कोकामुखस्थान' गुह्योंमें भी परम गुह्य है और सिद्धोंके लिये परम सिद्धि-प्रदाता है। साधक पुरुष सांख्ययोगके प्रभावसे जिस महान् सिद्धिको प्राप्त नहीं कर पाते, वही सिद्धि 'कोकामुख' क्षेत्रमें जानेपर सहज सुलभ हो जाती है। वसुंधरे! यह रहस्य मैं तुम्हें बता चुका।

महाभागे! तुम्हारे प्रश्नके उत्तरमें मैंने श्रेष्ठ स्थानोंका वर्णन कर दिया। अब तुम अन्य कौन-सा प्रसङ्ग सुनना चाहती हो ? पृथ्वी देवि! मेरा कहा हुआ यह 'कोकामुख' तीर्थ सर्वोत्तम स्थान है। जो वहाँ जाकर दर्शन-स्नानादि करता है, वह अपने दस पूर्वके पुरुषोंको और दस आगे होनेवाले कुटुम्बियोंको तार देता है। फिर यदि वहाँ दैवयोगसे कदाचित् शरीरका परित्याग कर देता है तो वह परम शुद्ध भगवद्भक्तके कुलमें जन्म लेता है। उसका मन एकमात्र मुझमें लगता है और वह मेरे धर्मका प्रचारक होता है। जो मानव प्रातःकाल उठकर इसका सदा श्रवण करता है, वह शरीर त्यागनेके पश्चात् मेरे लोकमें जाता है। उसके पाँच सौ जन्मोंके सब पाप मिट जाते हैं और वह मेरा प्रिय भक्त हो जाता है। जो प्रातःकाल इस उपाख्यानको नित्य पढ़ता है, उसे मेरा उत्तम स्थान प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं।

[अध्याय १४०]

अध्याय १४१ ] 'बदरिकाश्रम' का माहात्म्य २५९

'बदरिकाश्रम' का माहात्म्य

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! उसी हिमालय पर्वतपर एक अत्यन्त गुह्य स्थान है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। इसे 'बदरिकाश्रम' कहते हैं। इसमें संसारसे उद्धार करनेकी दिव्य शक्ति है। जिनकी मुझमें श्रद्धा है, केवल वे ही उस भूमिमें पहुँचनेमें सफल होते हैं। उसे प्राप्त करनेपर मानवके सभी मनोरथ पूर्ण हो सकते हैं। उस ऊँचे पर्वतशिखरपर 'ब्रह्मकुण्ड' नामका एक प्रसिद्ध स्थान है, जहाँ मैं हिममें स्थित होकर निवास करता हूँ। जो मनुष्य वहाँ तीन राततक उपवास रहकर स्नान करता है, वह 'अग्निष्टोम' यज्ञका फल प्राप्त करता है। मेरे व्रतमें आस्था रखनेवाला जितेन्द्रिय मनुष्य यदि वहाँ प्राणोंका त्याग करता है तो वह सत्यलोकका उल्लङ्घन कर मेरे धामको प्राप्त होता है। मेरे उसी उत्तम क्षेत्रमें एक 'अग्निसत्यपद' नामक स्थान है, जहाँ हिमालयके तीन शृङ्गोंसे जलकी विशाल धाराएँ गिरती हैं। मेरे कर्ममें परायण रहनेवाला जो मानव वहाँ तीन राततक निवास कर स्नान करता है, वह सत्यवादी एवं कार्यमें परम कुशल होता है। वहाँके जलका स्पर्श करके यदि कोई प्राणोंका त्याग करता है तो वह मेरे लोकमें आनन्दपूर्वक निवास करता है।

देवि! इसी बदरिकाश्रममें 'इन्द्रलोक' नामका भी मेरा एक प्रसिद्ध आश्रम है। वहाँ इन्द्रने मुझे भलीभाँति संतुष्ट किया था। हिमालयके शृङ्गोंसे निरन्तर वहाँ जलकी मोटी धाराएँ गिरती हैं। उस विशाल शिलातलपर मेरा धर्म सदा व्यवस्थित रहता है। जो मानव वहाँ एक रात भी रहकर स्नान करता है, वह सत्यवक्ता एवं परम पवित्र होकर 'सत्यलोक' में प्रतिष्ठा पाता है। जो वहाँ नित्य व्रत करनेके पश्चात् अपने प्राणोंका त्याग करता है, वह मेरे लोकमें जाता है। बदरिकाश्रमसे सम्बन्ध रखनेवाला 'पञ्चशिख' नामका एक ऐसा तीर्थ है, जहाँ हिमालयकी पाँच चोटियोंसे जलकी धाराएँ गिरती हैं। वे धाराएँ पाँच नदीके रूपमें परिवर्तित हो गयी हैं। वहाँ जो मानव स्नान करता है, वह 'अश्वमेधयज्ञ' का फल प्राप्तकर देवताओंके साथ आनन्दका उपभोग करता है। दुष्कर तप करनेके पश्चात् यदि वहाँ कोई प्राण-त्याग करता है तो वह स्वर्गलोकका अतिक्रमण कर मेरे लोकमें प्रतिष्ठित होता है। मेरे उसी क्षेत्रमें 'चतुःस्रोत' नामसे प्रसिद्ध एक स्थान है। जहाँ हिमालयकी चारों दिशाओंसे जलकी चार धाराएँ गिरती हैं। जो मनुष्य एक रात भी वहाँ निवास कर स्नान करता है, वह स्वर्गके ऊर्ध्वभागमें आनन्दपूर्वक निवास करता है और वहाँसे भ्रष्ट होकर मनुष्यलोकमें जन्म लेनेपर मेरा भक्त होता है। फिर संसारके दुष्कर कर्म (कठिन साधना) करके प्राणोंका त्यागकर स्वर्गका अतिक्रमण कर मेरे लोकको प्राप्त होता है।

वसुंधरे! मेरे उसी क्षेत्रमें एक 'वेदधार' नामका तीर्थ है, जहाँ ब्रह्माजीके मुखसे चारों वेद प्रकट हुए थे। यहाँ चार विशाल जलकी धाराएँ ऊँची शिलापर गिरती हैं, जो मनुष्य चार राततक यहाँ रहकर स्नान करता है, वह चारों वेदोंके अध्ययनका अधिकारी होता है। जो मेरा उपासक मनुष्य वहाँ अपने प्राणोंका त्याग करता है, वह मेरे लोकमें प्रतिष्ठित होता है। यहीं द्वादश दिव्य 'कुण्ड' नामक वह स्थान है, जहाँ मैंने बारह सूर्योंको स्थापित किया था। वहाँके पर्वत-शृङ्गकी जड़ विशाल है। इसके नीचे बहुत-सी शिलाएँ हैं। किसी भी द्वादशी तिथिको यदि कोई वहाँ स्नान करता है तो जहाँ द्वादश सूर्य रहते हैं, वह उस लोकमें जाता है, इसमें कोई संशय नहीं। फिर