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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सूत्र १ ] अध्याय २ १३९

सूत्र १ ] अध्याय २ १३९ प्रधानको जगत्का कारण अवश्य मानना चाहिये'' तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि सांख्यशास्त्रको मान्यता देकर यदि प्रकृतिको जगत्का कारण मान लें तो दूसरे-दूसरे महर्षियोंद्वारा बनायी हुई स्मृतियोंको न माननेका दोष उपस्थित हो सकता है; इसलिये वेदानुकूल स्मृतियोंको ही प्रमाण मानना उचित है; न कि वेदके प्रतिकूल अपनी इच्छाके अनुसार बनायी हुई स्मृतिको। दूसरी स्मृतियोंमें स्पष्ट ही परब्रह्म परमेश्वरको जगत्का कारण बताया है। श्रीमद्भगवद्गीता,१ विष्णुपुराण२ और मनुस्मृति३ आदिमें समस्त जगत्की उत्पत्ति परमात्मासे ही बतायी गयी है। इसलिये वास्तवमें श्रुतियोंके साथ स्मृतियोंका कोई विरोध नहीं है। यदि कहीं विरोध हो भी तो वहाँ स्मृतिको छोड़कर श्रुतिके कथनको ही मान्यता देनी चाहिये; क्योंकि वेद और स्मृतिके विरोधमें वेद ही बलवान् माना गया है। १-एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय। अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥ (गीता ७।६) 'पहले कही हुई मेरी परा और अपरा प्रकृतियाँ सम्पूर्ण प्राणियोंकी योनि हैं, ऐसा समझो। तथा मैं जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति और प्रलयका कारण हूँ।' प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥ (गीता ९।८) 'मैं अपनी प्रकृतिका अवलम्बन करके, प्रकृतिके वशसे विवश हुए इस समस्त भूत- समुदायको बारम्बार नाना प्रकारसे रचता हूँ।' २-विष्णोः सकाशादुद्भूतं जगत्तत्रैव च स्थितम्। स्थितिसंयमकर्ताऽसौ जगतोऽस्य जगच्च सः॥ (वि० पु० १।१।३१) 'यह सम्पूर्ण जगत् भगवान् विष्णुसे उत्पन्न हुआ है और उन्हींमें स्थित है। वे इस जगत्के पालक और संहारकर्ता हैं तथा सम्पूर्ण जगत् उन्हींका स्वरूप है।' ३-सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः। अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत्॥ (मनु० १।८) 'उन्होंने अपने शरीरसे नाना प्रकारकी प्रजाको उत्पन्न करनेकी इच्छासे संकल्प करके पहले जलकी ही सृष्टि की, फिर उस जलमें अपनी शक्तिरूप वीर्यका आधान किया।'

१४० वेदान्त-दर्शन [ पाद १

१४० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ सम्बन्ध— सांख्यशास्त्रोक्त 'प्रधान' को जगत्का कारण न माननेमें कोई दोष नहीं है, इस बातकी पुष्टिके लिये दूसरा कारण उपस्थित करते हैं— इतरेषां चानुपलब्धेः ॥ २ । १ । २ ॥ च=तथा; इतरेषाम्=अन्य स्मृतिकारोंके (मतमें); अनुपलब्धेः=प्रधान- कारणवादकी उपलब्धि नहीं होती, इसलिये (भी प्रधानको जगत्का कारण न मानना उचित ही है)। व्याख्या— मनु आदि जो दूसरे स्मृतिकार हैं, उनके ग्रन्थोंमें सांख्य- शास्त्रोक्त प्रक्रियाके अनुसार प्रधानको कारण मानने और उससे सृष्टिके होनेका वर्णन नहीं मिलता है; इसलिये इस विषयमें सांख्यशास्त्रको प्रमाण न मानना उचित ही है। सम्बन्ध— सांख्यकी सृष्टि-प्रक्रियाको योगशास्त्रके प्रवर्तक पातंजल भी मानते हैं, अतः उसको मान्यता क्यों न देनी चाहिये ? इसपर कहते हैं— एतेन योगः प्रत्युक्तः ॥ २ । १ । ३ ॥ एतेन=इस पूर्वोक्त विवेचनसे; योगः=योगशास्त्रका भी; प्रत्युक्तः=प्रत्युत्तर हो गया। व्याख्या— उपर्युक्त विवेचनसे अर्थात् पूर्वसूत्रोंमें जो कारण बताये गये हैं, उन्हींसे पातंजल-योगशास्त्रकी भी उस मान्यताका निराकरण हो गया, जिसमें उन्होंने दृश्य (जडप्रकृति)-को जगत्का स्वतन्त्र कारण कहा है; क्योंकि अन्य विषयोंमें योगका सांख्यके साथ मतभेद होनेपर भी जड प्रकृतिको जगत्का कारण माननेमें दोनों एकमत हैं; अतः एकके ही निराकरणसे दोनोंका निराकरण हो गया। सम्बन्ध— पूर्वप्रकरणमें यह कहा गया है कि वेदानुकूल स्मृतियोंको ही प्रमाण मानना आवश्यक है, इसलिये वेदविरुद्ध सांख्यस्मृतियोंको मान्यता न देना अनुचित नहीं है। इसलिये पूर्वपक्षी वेदके वर्णनसे सांख्यमतकी एकता दिखानेके लिये कहता है—

सूत्र ४-५ ] अध्याय २ १४१

सूत्र ४-५ ] अध्याय २ १४१ न विलक्षणत्वादस्य तथात्वं च शब्दात् ॥ २ । १ । ४ ॥ न=चेतन ब्रह्म जगत्का कारण नहीं है; अस्य विलक्षणत्वात्=क्योंकि यह कार्यरूप जगत् उस (कारण)-से विलक्षण (जड) है; च=और; तथात्वम्= उसका जड होना; शब्दात्=शब्द (वेद) प्रमाणसे सिद्ध है। व्याख्या— श्रुतिमें परब्रह्म परमात्माको ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ (तै० उ० २। १) इस प्रकार सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त आदि लक्षणोंवाला बताया गया है और जगत्को ज्ञानरहित विचारणीय (तै० उ० १। ७) अर्थात् जड कहा गया है। अतः श्रुति-प्रमाणसे ही इसकी परमेश्वरसे विलक्षणता सिद्ध होती है। कारणसे कार्यका विलक्षण होना युक्तिसंगत नहीं है; इसलिये चेतन परब्रह्म परमात्माको अचेतन जगत्का उपादान कारण नहीं मानना चाहिये। सम्बन्ध— यदि कहो, अचेतन कहे जानेवाले आकाश आदि तत्त्वोंका भी श्रुतिमें चेतनकी भाँति वर्णन मिलता है। जैसे—‘तत्तेज ऐक्षत’ (छा० उ० ६। २। ३) ‘उस तेजने विचार किया।’ ‘ता आप ऐक्षन्त’ (छा० उ० ६। २। ४) ‘उस जलने विचार किया’ इत्यादि। तथा पुराणोंमें नदी, समुद्र, पर्वत आदिका भी चेतन-जैसा वर्णन किया गया है। इस प्रकार चेतन होनेके कारण यह जगत् चेतन परमात्मासे विलक्षण नहीं है, इसलिये चेतन परमात्माको इसका कारण माननेमें कोई आपत्ति नहीं है तो इसका उत्तर इस प्रकार दिया जाता है— अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ॥ २ । १ । ५ ॥ तु=किंतु; (वहाँ तो) अभिमानिव्यपदेशः=उन-उन तत्त्वोंके अभिमानी देवताओंका वर्णन है; (यह बात) विशेषानुगतिभ्याम्=विशेष शब्दोंके प्रयोगसे तथा उन तत्त्वोंमें देवताओंके प्रवेशका वर्णन होनेसे (सिद्ध होती है)। व्याख्या— श्रुतिमें जो ‘तेज, जल आदिने विचार किया’ इत्यादि रूपसे जड तत्त्वोंमें चेतनके व्यवहारका कथन है, वह तो उन तत्त्वोंके अभिमानी देवताओंको लक्ष्य करके है। यह बात उन-उन स्थलोंमें प्रयुक्त हुए विशेष शब्दोंसे सिद्ध होती है। जैसे तेज, जल और अन्न—इन तीनोंकी उत्पत्तिका वर्णन करनेके बाद इन्हें ‘देवता’ कहा गया है (छा० उ० ६। ३। २)। तथा

१४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

१४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ ऐतरेयोपनिषद् (१।२।४)-में 'अग्नि वाणी बनकर मुखमें प्रविष्ट हुआ, वायु प्राण बनकर नासिकामें प्रविष्ट हुआ।' इस प्रकार उनकी अनुगतिका उल्लेख होनेसे भी उनके अभिमानी देवताओंका ही वर्णन सिद्ध होता है। इसलिये ब्रह्मको जगत्का उपादान कारण बताना युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि आकाश आदि जड तत्त्व भी इस जगत्में उपलब्ध होते हैं; जो कि चेतन ब्रह्मके धर्मोंसे सर्वथा विपरीत लक्षणोंवाले हैं। सम्बन्ध—ऊपर उठायी हुई शंकाका ग्रन्थकार उत्तर देते हैं— दृश्यते तु॥ २। १। ६॥ तु=किंतु; दृश्यते=श्रुतिमें उपादानसे विलक्षण वस्तुकी उत्पत्तिका वर्णन भी देखा जाता है (अतः ब्रह्मको जगत्का उपादान कारण मानना अनुचित नहीं है)। व्याख्या—यह कहना ठीक नहीं है कि उपादानसे उत्पन्न होनेवाला कार्य उससे विलक्षण नहीं हो सकता; क्योंकि मनुष्य आदि चेतन व्यक्तियोंसे नख-लोम आदि जड वस्तुओंकी उत्पत्तिका वर्णन वेदमें देखा जाता है। जैसे—'यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाक्षरात् सम्भवतीह विश्वम्॥' (मु० उ० १।१।७) अर्थात् 'जैसे जीवित मनुष्यसे केश और रोएँ उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार अविनाशी परब्रह्मसे यह सब जगत् उत्पन्न होता है।' सजीव चेतन पुरुषसे जड नख-लोम आदिकी उत्पत्ति उससे सर्वथा विलक्षण ही तो है। अतः ब्रह्मको जगत्का कारण मानना युक्तिसंगत तथा श्रुति- स्मृतियोंसे अनुमोदित है। इसमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—इसी विषयमें दूसरी शंका उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं— असदिति चेन्न प्रतिषेधमात्रत्वात्॥ २। १। ७॥ चेत्=यदि कहो; (ऐसा माननेसे) असत्=असत्कार्यवाद अर्थात् जिसकी सत्ता नहीं है, ऐसी वस्तुकी उत्पत्तिका प्रसंग उपस्थित होगा; इति न=तो ऐसी

सूत्र ८ ] अध्याय २ १४३

सूत्र ८ ] अध्याय २ १४३ बात नहीं है; प्रतिषेधमात्रत्वात् = क्योंकि वहाँ 'असत्' शब्द प्रतिषेधमात्रका अर्थात् सर्वथा अभावका बोधक है। व्याख्या - यदि कहो 'अवयवरहित चेतन ब्रह्मसे सावयव जड वर्गकी उत्पत्ति माननेपर जो वस्तु पहले नहीं थी, उसकी उत्पत्ति माननेका दोष उपस्थित होगा, जो कि श्रुति-प्रमाणके विरुद्ध है, क्योंकि वेदमें असत्से सत्की उत्पत्तिको असम्भव बताया गया है।' तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि वहाँ वेदमें कारणसे विलक्षण कार्यकी उत्पत्तिका निषेध नहीं है; अपितु 'असत्' शब्दवाच्य अभावसे भावकी उत्पत्तिको असम्भव कहा गया है। वेदान्त-शास्त्रमें अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं मानी गयी है; किंतु सत्स्वरूप सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमात्मामें जो जड-चेतनात्मक जगत् शक्तिरूपसे विद्यमान होते हुए भी अप्रकट रहता है, उसीका उसके संकल्पसे प्रकट होना उत्पत्ति है। इसलिये परब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति मानना असत्से सत्की उत्पत्ति मानना नहीं है। सम्बन्ध - इसपर पुनः पूर्वपक्षिकी ओरसे शंका उपस्थित की जाती है— अपीतौ तद्वत्प्रसंगादसमंजसम् ॥ २ । १ । ८ ॥ अपीतौ = (ऐसा माननेपर) प्रलयकालमें; तद्वत्प्रसंगात् = ब्रह्मको उस संसारके जडत्व और सुख-दुःखादि धर्मोंसे युक्त माननेका प्रसंग उपस्थित होगा, इसलिये; असमंजसम् = उपर्युक्त मान्यता युक्तिसंगत नहीं है। व्याख्या - यदि प्रलयकालमें भी सम्पूर्ण जगत्का उस परब्रह्म परमात्मामें विद्यमान रहना माना जायगा, तब तो उस ब्रह्मको जड प्रकृतिके जडत्व तथा जीवोंके सुख-दुःख आदि धर्मोंसे युक्त माननेका प्रसंग आ जायगा, जो किसीको मान्य नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें उस परब्रह्म परमेश्वरको सदैव जडत्व आदि धर्मोंसे रहित, निर्विकार और सर्वथा विशुद्ध बताया गया है। इसलिये उपर्युक्त मान्यता युक्तियुक्त नहीं है। सम्बन्ध - अब सूत्रकार उपर्युक्त शंकाका निराकरण करते हैं—

१४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

१४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ न तु दृष्टान्तभावात् ॥ २ । १ । ९ ॥ (उपर्युक्त वेदसम्मत सिद्धान्तमें) तु=निःसंदेह; न=पूर्वसूत्रमें बताये हुए दोष नहीं हैं; दृष्टान्तभावात्=क्योंकि ऐसे बहुत-से दृष्टान्त उपलब्ध होते हैं (जिनसे कारणमें कार्यके विलीन हो जानेपर भी उसमें कार्यके धर्म नहीं रहनेकी बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—पूर्वसूत्रमें की हुई शंका समीचीन नहीं है; क्योंकि कार्यके अपने कारणमें विलीन हो जानेके बाद उसके धर्म कारणमें रहते हैं, ऐसा नियम नहीं है; अपितु इसके विपरीत बहुत-से दृष्टान्त मिलते हैं। अर्थात् जब कार्य कारणमें विलीन होता है, तब उसके धर्म भी कारणमें विलीन हो जाते हैं, ऐसा देखा जाता है। जैसे सुवर्णसे बने हुए आभूषण जब अपने कारणमें विलीन हो जाते हैं, तब उन आभूषणोंके धर्म सुवर्णमें नहीं देखे जाते हैं तथा मिट्टीसे बने हुए घट आदि पात्र जब अपने कारण मृत्तिकामें विलीन हो जाते हैं, तब घट आदिके धर्म उस मृत्तिकामें नहीं देखे जाते हैं। इसी प्रकार और भी बहुत-से दृष्टान्त हैं। इससे यही सिद्ध हुआ कि प्रलयकाल या सृष्टिकालमें और किसी भी अवस्थामें कारण अपने कार्यके धर्मोंसे लिप्त नहीं होता है। सम्बन्ध—उपर्युक्त सूत्रमें वादीकी शंकाका निराकरण किया गया। अब उसके द्वारा उठाये हुए दोषोंकी उसीके मतमें व्याप्ति बताकर अपने मतको निर्दोष सिद्ध करते हैं— स्वपक्षदोषाच्च ॥ २ । १ । १०॥ स्वपक्षदोषात्=वादीके अपने पक्षमें उपर्युक्त सभी दोष आते हैं इसलिये; च=भी (प्रधानको जगत्का कारण मानना ठीक नहीं है)। व्याख्या—सांख्यमतावलम्बी स्वयं यह मानते हैं कि जगत्का कारणरूप प्रधान अवयवरहित, अव्यक्त और अग्राह्य है। उससे साकार, व्यक्त तथा देखने-सुननेमें आनेवाले जगत्की उत्पत्ति मानना तो कारणसे विलक्षण कार्यकी उत्पत्ति माननेका दोष स्वीकार करना है तथा जगत्की उत्पत्तिके पहले

सूत्र ११ ] अध्याय २ १४५

सूत्र ११ ] अध्याय २ १४५ कार्यके शब्द, स्पर्श आदि धर्म प्रधानमें नहीं रहते और कार्यकी उत्पत्तिके पश्चात् कार्यमें आ जाते हैं, यह माननेके कारण उनके मतमें असत्से सत्की उत्पत्ति स्वीकार करनेका दोष भी ज्यों-का-त्यों रहा। इसके सिवा, प्रलयकालमें जब समस्त कार्य प्रधानमें विलीन हो जाते हैं, उस समय कार्यके शब्द, स्पर्श आदि धर्म प्रधानमें नहीं रहते; ऐसी मान्यता होनेके कारण वादीके मतमें भी कारणमें कार्यके धर्म आ जानेकी शंका पूर्ववत् बनी रहती है। इसलिये वादीके द्वारा उपस्थित किये हुए तीनों दोष उसके प्रधानकारणवादमें ही पाये जाते हैं, अतः प्रधानको जगत्का कारण मानना कदापि उचित नहीं है। सम्बन्ध — उपर्युक्त कथनपर वादीद्वारा किये जा सकनेवाले आक्षेपका स्वयं उपस्थित करके सूत्रकार उसका निराकरण करते हैं— तर्काप्रतिष्ठानादप्यन्यथानुमेयमिति चेदेवमप्यनि- र्मोक्षप्रसंगः ॥ २ । १ । ११ ॥ चेत् इति=यदि ऐसा कहो कि; तर्काप्रतिष्ठानात्=तर्कोंकी स्थिरता न होनेपर; अपि=भी; अन्यथानुमेयम्=दूसरे प्रकारसे अनुमानके द्वारा कारणका निश्चय करना चाहिये; एवम् अपि=तो ऐसी स्थितिमें भी; अनिर्मोक्षप्रसंगः=मोक्ष न होनेका प्रसंग आ जायगा। व्याख्या—एक मतावलम्बीद्वारा उपस्थित की हुई युक्तिको दूसरा नहीं मानता, वह उसमें दोष सिद्ध करके दूसरी युक्ति उपस्थित करता है; किंतु इस दूसरी युक्तिको वह पहला नहीं मानता, वह उसमें भी दोष सिद्ध करके नयी ही युक्ति प्रस्तुत करता है। इस प्रकार एकके बाद दूसरे तर्क उठते रहनेसे उनकी कोई स्थिरता या समाप्ति नहीं है, यह कहना ठीक है तथापि दूसरे प्रकारसे अनुमानके द्वारा कारणतत्त्वका निश्चय करना चाहिये, ऐसा कोई कहे तो ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसी स्थितिमें वेदप्रमाणरहित कोई भी अनुमान वास्तविक ज्ञान करानेवाला सिद्ध नहीं होगा। अतएव उसके द्वारा तत्त्वज्ञान

१४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

१४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ होना असम्भव है और तत्त्वज्ञानके बिना मोक्ष नहीं हो सकता। अतः सांख्यमतमें संसारसे मोक्ष न होनेका प्रसंग आ जायगा। सम्बन्ध— उपर्युक्त प्रकारसे प्रधानकारणवादका खण्डन करके उन्हीं युक्तियोंसे अन्य वेदविरुद्ध मतोंका भी निराकरण हो जाता है, ऐसा कहते हैं— एतेन शिष्टापरिग्रहा अपि व्याख्याताः ॥ २ । १ । १२ ॥ एतेन=इस पूर्वनिरूपित सिद्धान्तसे; शिष्टापरिग्रहाः=शिष्ट पुरुषोंद्वारा अस्वीकृत अन्य सब मतोंका; अपि=भी; व्याख्याताः=प्रतिवाद कर दिया गया। व्याख्या—पाँचवें सूत्रसे ग्यारहवें सूत्रतक जो सांख्यमतावलम्बियोंद्वारा उपस्थित की हुई शंकाओंका निराकरण करके वैदिक सिद्धान्तका प्रतिपादन किया गया है; इसीसे दूसरे मत-मतान्तरोंका भी, जो वेदानुकूल न होनेके कारण शिष्ट पुरुषोंको मान्य नहीं है, निराकरण हो गया; क्योंकि उनके मत भी इस विषयमें सांख्यमतसे ही मिलते-जुलते हैं। सम्बन्ध— पूर्वप्रकरणमें प्रधानकारणवादका निराकरण किया गया। अब ब्रह्मकारणवादमें दूसरे प्रकारके दोषोंकी उद्भावना करके उनका निवारण किया जाता है— भोक्त्रापत्तेरविभागश्चेत् स्याल्लोकवत् ॥ २ । १ । १३ ॥ चेत्=यदि कहो; भोक्त्रापत्तेः=(ब्रह्मको जगत्का कारण माननेसे उसमें) भोक्तापनका प्रसंग आ जायगा, इसलिये; अविभागः=जीव और ईश्वरका विभाग सिद्ध नहीं होगा, उसी प्रकार जीव और जडवर्गका भी परस्पर विभाग सिद्ध नहीं होगा; ( इति न= ) तो यह कहना ठीक नहीं है; लोकवत्=क्योंकि लोकमें जैसे विभाग देखा जाता है, वैसे; स्यात्=हो सकता है। व्याख्या—यदि कहो कि 'ब्रह्मको जगत्का कारण मान लेनेसे स्वयं ब्रह्मका ही जीवके रूपमें कर्म-फलरूप सुख-दुःख आदिका भोक्ता होना सिद्ध हो जायगा, इससे जीव और ईश्वरका विभाग सम्भव नहीं रहेगा तथा जडवर्गमें भोक्तापन आ जानेसे भोक्ता (जीवात्मा) और भोग्य (जडवर्ग)-का भी विभाग

सूत्र १४] अध्याय २ १४७ असम्भव हो जायगा, तो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि लोकमें एक कारणसे उत्पन्न हुई वस्तुओंमें ऐसा विभाग प्रत्यक्ष देखा जाता है; उसी प्रकार ब्रह्म और जीवात्मा तथा जीव और जडवर्गका विभाग होनेमें भी कोई बाधा नहीं रहेगा। अर्थात् लोकमें जैसे यह बात देखी जाती है कि पिताका अंशभूत बालक जब गर्भमें रहता है तो गर्भजनित पीड़ाका भोक्ता वही होता है, पिता नहीं होता तथा उस बालक और पिताका विभाग भी प्रत्यक्ष देखा जाता है। उसी प्रकार ब्रह्ममें भोक्तापन आनेकी आशंका नहीं है तथा जीवात्मा और परमात्माके परस्पर विभाग होनेमें भी कोई अड़चन नहीं है। इसके सिवा, जैसे एक ही पितासे उत्पन्न बहुत-से लड़के परस्पर एक-दूसरेके सुख-दुःखके भोक्ता नहीं होते, इसी प्रकार भिन्न-भिन्न जीवोंको कर्मानुसार जो सुख-दुःख प्राप्त होते हैं, उनका उपभोग वे पृथक्-पृथक् ही करते हैं, एक-दूसरेके नहीं। इसी तरह यह भी देखा जाता है कि एक ही पृथिवी-तत्त्वके नाना प्रकारके कार्य घट, पट, कपाट आदिमें परस्पर भेदकी उपलब्धि अनायास हो रही है, उसमें कोई बाधा नहीं आती। घड़ा वस्त्र या कपाट नहीं बनता और वस्त्र घड़ा नहीं बनता और कपाट वस्त्र नहीं बनता। सबके अलग-अलग नाम, रूप और व्यवहार चलते रहते हैं। उसी प्रकार एक ही ब्रह्मके असंख्य कार्य होनेपर भी उनके विभागमें किसी प्रकारकी बाधा नहीं आती है। सम्बन्ध — ऐसा माननेसे कारण और कार्यमें अनन्यता सिद्ध नहीं होगी, ऐसी शंका प्राप्त होनेपर कहते हैं— तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ॥ २। १। १४॥ आरम्भणशब्दादिभ्यः = आरम्भण शब्द आदि हेतुओंसे; तदनन्यत्वम् = उसकी अर्थात् कार्यकी कारणसे अनन्यता सिद्ध होती है। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्में यह कहा गया है कि 'यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातँ स्याद् वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥' (छा० उ० ६।१।४) अर्थात् 'हे सोम्य ! जैसे मिट्टीके

१४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ एक ढेलेका तत्त्व जान लेनेपर मिट्टीसे उत्पन्न होनेवाले समस्त कार्य जाने हुए हो जाते हैं, उनके नाम और आकृतिके भेद तो व्यवहारके लिये हैं, वाणीसे उनका कथनमात्र होता है, वास्तवमें तो कार्यरूपमें भी वह मिट्टी ही है।' इसी प्रकार यह कार्यरूपमें वर्तमान जगत् भी ब्रह्मरूप ही है। इस कथनसे जगत्की ब्रह्मसे अनन्यता सिद्ध होती है; तथा सूत्रमें 'आदि' शब्दका प्रयोग होनेसे यह अभिप्राय निकलता है कि इस प्रकरणमें आये हुए दूसरे वाक्योंसे भी यही बात सिद्ध होती है। उक्त प्रकरणमें 'ऐतदात्म्यमिदँ सर्वम्' का (छा० उ० ६।८ से लेकर १६ वें खण्डतक) प्रयोग कई बार हुआ है। इसका अर्थ है कि 'यह सब कुछ ब्रह्मस्वरूप है।' इस प्रकार श्रुतिने कारणरूप ब्रह्मसे कार्यरूप जगत्की अनन्यताका स्पष्ट शब्दोंमें प्रतिपादन किया है। उसी प्रकरणमें उपदेशका आरम्भ करके आचार्यने कहा है— 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्।' (छा० उ० ६।२।१) अर्थात् 'हे सौम्य ! यह समस्त जगत् प्रकट होनेसे पहले एकमात्र अद्वितीय सत्यस्वरूप ब्रह्म ही था।' इससे अनन्यताके साथ-साथ यह भी सिद्ध होता है कि यह जड़-चेतन भोग्य और भोक्ताके आकारमें प्रत्यक्ष दीखनेवाला जगत् उत्पत्तिके पहले भी अवश्य था। परंतु था परब्रह्म परमात्माकी शक्तिरूपमें। इसका वर्तमान रूप उस समय अप्रकट था। जैसे स्वर्णके विकार हार-कंकण- कुण्डल आदि उत्पत्तिके पहले और विलीन होनेके बाद अपने कारणरूप स्वर्णमें शक्तिरूपसे रहते हैं। शक्ति, शक्तिमान्‌में अभेद होनेके कारण उनकी अनन्यतामें किसी प्रकारका दोष नहीं आता, उसी प्रकार यह जड़- चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् उत्पत्तिके पहले और प्रलयके बाद परब्रह्म परमेश्वरमें शक्तिरूपसे अव्यक्त रहता है। अतः जगत्की ब्रह्मसे अनन्यतामें किसी प्रकारकी बाधा नहीं आती। गीतामें भगवान्‌ने स्वयं कहा है कि 'यह आठ भेदोंवाली जड़-प्रकृति तो मेरी अपरा प्रकृतिरूपा शक्ति है और जीवरूप चेतनसमुदाय मेरी परा प्रकृति है' (७।५)। इसके बाद यह भी बताया है कि 'ये दोनों समस्त प्राणियोंके कारण हैं और मैं सम्पूर्ण

सूत्र १५-१६ ] अध्याय २ १४९

सूत्र १५-१६ ] अध्याय २ १४९ जगत्की उत्पत्ति एवं प्रलयरूप महाकारण हूँ।' (गीता ७। ६) इस कथनसे भगवान्ने अपनी प्रकृतियोंके साथ अनन्यता सिद्ध की है। इसी प्रकार सर्वत्र समझ लेना चाहिये। सम्बन्ध— पहले जो यह बात कही थी कि कार्य केवल वाणीका विषय है, कारण ही सत्य है, उससे यह भ्रम हो सकता है कि कार्यकी वास्तविक सत्ता नहीं है। अतः इस शंकाको दूर करनेके लिये यह सिद्ध करते हैं कि अपनी वर्तमान अवस्थाके पहले भी शक्तिरूपमें कार्यकी सत्ता रहती है— भावे चोपलब्धेः ॥ २ । १ । १५ ॥ भावे=(कारणमें शक्तिरूपसे) कार्यकी सत्ता होनेपर; च=ही; उपलब्धेः=उसकी उपलब्धि होती है, इसलिये (यह सिद्ध होता है कि यह जगत् अपने कारण ब्रह्ममें शक्तिरूपसे सदैव स्थित है)। व्याख्या—यह बात दृढ़ करते हैं कि कार्य अपने कारणमें शक्तिरूपसे सदैव विद्यमान रहता है, तभी उसकी उपलब्धि होती है; क्योंकि जो वस्तु वास्तवमें विद्यमान होती है, उसीकी उपलब्धि हुआ करती है। जो वस्तु नहीं होती अर्थात् खरगोशके सींग और आकाशके पुष्पकी भाँति जिसका सर्वथा अभाव होता है, उसकी उपलब्धि भी नहीं होती। इसलिये यह जड-चेतनात्मक जगत् अपने कारणरूप परब्रह्म परमेश्वरमें शक्तिरूपसे अवश्य विद्यमान है और सदैव अपने कारणसे अभिन्न है। सम्बन्ध—सत्कार्यवादकी सिद्धिके लिये पुनः कहते हैं— सत्त्वाच्चावरस्य ॥ २ । १ । १६ ॥ अवरस्य=कार्यका, सत्त्वात्=सत् होना श्रुतिमें कहा गया है, इससे; च=भी (प्रकट होनेके पहले उसका होना सिद्ध होता है)। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (६। २। १)-में कहा गया है कि 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्'—'हे सोम्य! यह प्रकट होनेसे पहले भी सत्य था।'

१५० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ बृहदारण्यकमें भी कहा है 'तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्' (१।४।७)— 'उस समय यह अप्रकट था।' इन वर्णनोंसे यह सिद्ध है कि स्थूलरूपमें प्रकट होनेके पहले यह सम्पूर्ण जगत् अपने कारणमें शक्तिरूपसे विद्यमान रहता है और वही सृष्टिकालमें प्रकट होता है। सम्बन्ध— श्रुतिमें विरोध प्रतीत होनेपर उसका निराकरण करते हैं— असद्व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्यशेषात् ॥ २।१।१७ ॥ चेत्=यदि कहो; (दूसरी श्रुतिमें) असद्व्यपदेशात्=उत्पत्ति के पहले इस जगत्को 'असत्' बतलाया है, इसलिये; न=कार्यका कारणमें पहलेसे ही विद्यमान होना सिद्ध नहीं होता; इति न=तो ऐसी बात नहीं है; (क्योंकि) धर्मान्तरेण=वैसा कहना धर्मान्तरकी अपेक्षासे है; वाक्यशेषात्=यह बात अन्तिम वाक्यसे सिद्ध होती है। व्याख्या— तैत्तिरीयोपनिषद्में कहा है कि 'असद् वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत। तदात्मानँ् स्वयमकुरुत। तस्मात्तत्सुकृतमुच्यते॥' (तै० उ० २।७) अर्थात् 'यह सब पहले 'असत्' ही था, उसीसे सत् उत्पन्न हुआ; उसने स्वयं ही अपनेको इस रूपमें बनाया, इसलिये उसे 'सुकृत' कहते हैं।' इस श्रुतिमें जो यह बात कही गयी है कि 'पहले असत् ही था।' उसका अभिप्राय यह नहीं है कि यह जगत् प्रकट होनेके पहले नहीं था; क्योंकि इसके बाद 'आसीत्' पदसे उसका होना कहा है। फिर उससे सत्की उत्पत्ति बतलायी है। तत्पश्चात् यह कहा है कि उसने स्वयं ही अपनेको इस रूपमें प्रकट किया है। अतः यहाँ यह समझना चाहिये कि धर्मान्तरकी अपेक्षासे उसको 'असत्' कहा है। अर्थात् प्रकट होनेसे पहले जो अप्रकट रूपमें विद्यमान रहना धर्मान्तर है, इसीको 'असत्' नामसे कहा गया है, उसकी अविद्यमानता बतानेके लिये नहीं। तात्पर्य यह कि उत्पत्तिसे पूर्व यह जगत् असत्— अप्रकट था। फिर उससे सत्की उत्पत्ति हुई—अर्थात् अप्रकट

सूत्र १८-१९] अध्याय २ १५१ जगत् अपने अप्राकट्यरूप धर्मको त्यागकर प्राकट्यरूप धर्मसे युक्त हुआ—अप्रकटसे प्रकट हो गया। छान्दोग्योपनिषद्में इस बातको स्पष्ट रूपसे समझाया है। वहाँ श्रुतिका वर्णन इस प्रकार है—'तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसत: सज्जायत॥' (६।२।१) अर्थात् 'कोई-कोई कहते हैं, यह जगत् पहले 'असत्' ही था, अकेला वही था, दूसरा कोई नहीं, फिर उस 'असत्' से 'सत्' उत्पन्न हुआ।' इतना कहकर श्रुति स्वयं ही अभावके भ्रमका निवारण करती हुई कहती है—'कुतस्तु खलु सोम्यैवँ स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति।' (६।२।२) 'किंतु हे सोम्य! ऐसा होना कैसे सम्भव है, असत्से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है।' तात्पर्य यह है कि अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इसलिये 'सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीत्।' (६।२।२) 'यह सब पहले सत् ही था।' यह श्रुतिने निश्चय किया है। इस प्रकार वाक्यशेषसे सत्कार्यवादकी ही सिद्धि होती है। सम्बन्ध—पुनः इसी बातको दृढ़ करते हैं— युक्तेः शब्दान्तराच्च ॥ २ । १ । १८ ॥ युक्तेः = युक्तिसे; च = तथा; शब्दान्तरात् = दूसरे शब्दोंसे भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—जो वस्तु वास्तवमें नहीं होती, उसका उत्पन्न होना भी नहीं देखा जाता, जैसे आकाशमें फूल और खरगोशके सींग होना आजतक किसीने नहीं देखा है। इस युक्तिसे तथा बृहदारण्यक आदिमें जो उसके लिये अव्याकृत आदि शब्द प्रयुक्त हैं, उन शब्दोंसे भी यही बात सिद्ध होती है कि 'यह जगत् उत्पन्न होनेसे पहले भी 'सत्' ही था।' सम्बन्ध—अब पुनः उसी बातको कपड़ेके दृष्टान्तसे सिद्ध करते हैं— पटवच्च ॥ २ । १ । १९ ॥ पटवत् = सूतमें वस्त्रकी भाँति; च = भी (ब्रह्ममें यह जगत् पहलेसे ही स्थित है)।

१५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—जबतक कपड़ा शक्तिरूपसे सूतमें अप्रकट रहता है, तबतक वह नहीं दीखता, वही जब बुननेवालेके द्वारा बुन लिये जानेपर कपड़ेके रूपमें प्रकट हो जाता है, तब अपने रूपमें दीखने लगता है। प्रकट होनेसे पहले और प्रकट होनेके बाद दोनों ही अवस्थाओंमें वस्त्र अपने कारणमें विद्यमान है और उससे अभिन्न भी है—इसी प्रकार जगत्‌को भी समझ लेना चाहिये। वह उत्पत्तिसे पहले भी ब्रह्ममें स्थित है और उत्पन्न होनेके बाद भी उससे पृथक् नहीं हुआ है। सम्बन्ध—इसी बातको प्राण आदिके दृष्टान्तसे समझाते हैं— यथा च प्राणादि॥ २। १। २०॥ च=तथा; यथा=जैसे; प्राणादि=प्राण और इन्द्रियाँ (स्थूल शरीरसे बाहर निकलनेपर नहीं दीखतीं तो भी उनकी सत्ता अवश्य रहती है, उसी प्रकार प्रलयकालमें भी अव्यक्तरूपसे जगत्‌की स्थिति अवश्य है)। व्याख्या—जैसे मृत्युकालमें प्राण और इन्द्रिय आदि जीवात्माके साथ-साथ शरीरसे बाहर अन्यत्र चले जाते हैं, तब उनके स्वरूपकी उपलब्धि नहीं होती तथापि उनकी सत्ता अवश्य है। उसी प्रकार प्रलयकालमें इस जगत्‌की अप्रकट अवस्था उपलब्ध न होनेपर भी इसकी कारणरूपमें सत्ता अवश्य है, ऐसा समझना चाहिये। सम्बन्ध—ब्रह्मको जगत्‌का कारण और जगत्‌की उसके साथ अनन्यता माननेमें दूसरे प्रकारकी शंका उठाकर उसका निराकरण करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— इतरव्यपदेशाद्धिताकरणादिदोषप्रसक्तिः॥ २। १। २१॥ इतरव्यपदेशात्=ब्रह्म ही जीवरूपसे उत्पन्न होता है, ऐसा कहनेसे; हिताकरणादिदोषप्रसक्तिः=(ब्रह्ममें) अपना हित न करने या अहित करने आदिका दोष आ सकता है।

सूत्र २२ ] अध्याय २ १५३

सूत्र २२ ] अध्याय २ १५३ व्याख्या — श्रुतिमें कहा है कि 'तत्त्वमसि श्वेतकेतो' (छा० उ० ६। ८। ७) — 'हे श्वेतकेतु! तू वही है।' 'अयमात्मा ब्रह्म' (बृह० उ० २। ५।१९) — 'यह आत्मा ब्रह्म है।' तथा 'सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत्' (छा० उ० ६। ३। ३)— अर्थात् 'इस देवता (ब्रह्म)-ने तेज आदि तत्त्वसे निर्मित शरीरमें इस जीवात्मारूपसे प्रवेश करके नाम-रूपोंको प्रकट किया।' इसके सिवा यह भी कहा गया है कि 'त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी' (श्वेता० ४। ३) — 'तू स्त्री है, तू पुरुष है, तू ही कुमार और कुमारी है' इत्यादि। इस वर्णनसे स्पष्ट है कि ब्रह्म स्वयं ही जीवरूपसे उत्पन्न हुआ है। इससे ब्रह्ममें अपना हित न करने अथवा अहित करनेका दोष आता है, जो उचित नहीं है; क्योंकि जगत्में ऐसा कोई भी प्राणी नहीं देखा जाता जो कि समर्थ होकर भी दुःख भोगता रहे और अपना हित न करे। यदि वह स्वयं ही जीव बनकर दुःख भोग रहा है, तब तो सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् परमेश्वरका इस प्रकार अपना हित न करना और अहित करना अर्थात् अपनेको जन्म-मरणके चक्करमें डाले रहना आदि अनेक दोष संघटित होने लगेंगे, जो कि सर्वथा अयुक्त हैं, अतः ब्रह्मको जगत्का कारण मानना उचित नहीं है। सम्बन्ध — अब उक्त शंकाका निराकरण करनेके लिये कहते हैं— अधिकं तु भेदनिर्देशात् ॥ २ । १ । २२ ॥ तु=किंतु (ब्रह्म जीव नहीं है, अपितु उससे); अधिकम्=अधिक है; भेदनिर्देशात्=क्योंकि जीवात्मासे ब्रह्मका भेद बताया गया है। व्याख्या — बृहदारण्यकोपनिषद्में जनक और याज्ञवल्क्यके संवादका वर्णन है। वहाँ सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि आदि दैवी ज्योतियोंका तथा वाणी आदि आध्यात्मिक ज्योतियोंका वर्णन करनेके पश्चात् इनके अभावमें 'आत्मा' को 'ज्योति' अर्थात् प्रकाशक बतलाया है। (बृह० उ० ४। ३। ४-६) फिर उस आत्माका स्वरूप पूछे जानेपर विज्ञानमय जीवको आत्मा बताया। (बृह० उ०

१५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ ४।३।७) तदनन्तर जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्ति आदि अवस्थाओंके भेदोंका वर्णन करते हुए कहा है कि 'यह जीव सुषुप्तिकालमें बाहर- भीतरके ज्ञानसे शून्य होकर परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त होता है।' (बृ० उ० ४।३।२१) तत्पश्चात् मरणकालकी स्थितिका निरूपण करते हुए बताया है कि 'उस परब्रह्मसे अधिष्ठित हुआ यह एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है।' (बृ० उ० ४।३।३५) इस वर्णनसे जीव और ब्रह्मका भेद स्पष्ट हो जाता है। इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद्में जो यह कहा है कि 'अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य' इत्यादि; इसका अर्थ जीवरूपसे ब्रह्मका प्रवेश करना नहीं, अपितु जीवके सहित ब्रह्मका प्रवेश करना है। ऐसा माननेसे ही श्वेताश्वतरोपनिषद् (४।६)-में जो जीव और ईश्वरको एक ही शरीररूप वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षियोंकी भाँति बताया गया है, वह संगत होता है।१ (एवं) कठोपनिषद्में जो द्विवचनका प्रयोग करके हृदयरूपी गुहामें प्रविष्ट दो तत्त्वों (जीवात्मा और परमात्मा)-का वर्णन किया गया है।२ श्वेताश्व० (१।९)-में जो सर्वज्ञ और अल्पज्ञ विशेषण देकर दो अजन्मा आत्माओं (जीव और ईश्वर)-का प्रतिपादन हुआ है तथा श्रुतिमें जो परब्रह्म परमेश्वरको प्रकृति एवं जीवात्मा दोनोंपर शासन करनेवाला कहा गया है, इन सब वर्णनोंकी संगति भी जीव और ब्रह्ममें भेद माननेपर ही हो सकती है। अन्तर्यामिब्राह्मणमें तो स्पष्ट शब्दोंमें जीवात्माको ब्रह्मका शरीर कहा गया है (बृ० उ० ३।७।२२)३ मैत्रेयी ब्राह्मण (बृ० उ० २।४।५)-में परमात्माको जानने तथा ध्यान करनेयोग्य बताया है। इस प्रकार वेदमें जीवात्मा और परमात्माके भेदका वर्णन होनेसे यही सिद्ध होता है कि वह जगत्का कर्ता, धर्ता और संहर्ता परमेश्वर १-यह मन्त्र सूत्र १।३।७ की व्याख्यामें आया है। २-यह मन्त्र सूत्र १।२।११ की व्याख्यामें आया है। ३-यह मन्त्र सूत्र १।२।२० की टिप्पणीमें आ गया है।

जीव नहीं; किंतु उससे अधिक अर्थात् जीवके स्वामी हैं। 'तत्त्वमसि', 'अयमात्मा ब्रह्म' इत्यादि वाक्योंद्वारा जो जीवको ब्रह्मरूप बताया गया है, वह पूर्ववर्णित कारण और कार्यकी अनन्यताको लेकर है। परमेश्वर कारण है और जड-चेतनात्मक जगत् उनका कार्य है। कारणसे कार्य अभिन्न होता है; क्योंकि वह उसकी ही शक्तिका विस्तार है। इसी दृष्टिसे जीव भी परमात्मासे अभिन्न है। फिर भी उनमें स्वरूपगत भेद तो है ही। जीव अल्पज्ञ है, ब्रह्म सर्वज्ञ है। जीव ईश्वरके अधीन है, परमात्मा सबके शासक और स्वामी हैं। अतः जीव और ब्रह्मका अत्यन्त अभेद नहीं सिद्ध होता। जिस प्रकार कार्यरूप जड प्रपंचकी कारणरूप ब्रह्मसे अभिन्नता होते हुए भी भेद प्रत्यक्ष है। उसी प्रकार जीवात्माका भी ब्रह्मसे भेद है। ब्रह्म नित्यमुक्त है; अतः अपना अहित करना—आवागमनके चक्रमें अपनेको डाले रहना आदि दोष उसपर नहीं लगाये जा सकते। सम्बन्ध— इसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— अश्मादिवच्च तदनुपपत्तिः ॥ २। १। २३॥ च=तथा; अश्मादिवत्=(जड) पत्थर आदिकी भाँति (अल्पज्ञ) जीवात्मा भी ब्रह्मसे भिन्न है, इसलिये; तदनुपपत्तिः=जीवात्मा और परमात्माका अत्यन्त अभेद नहीं सिद्ध होता। व्याख्या—जिस प्रकार परमेश्वर चेतन, ज्ञानस्वरूप, आनन्दमय तथा सबके रचयिता होनेके कारण अपनी अपरा प्रकृतिके विस्ताररूप पत्थर, काठ, लोहा और सुवर्ण आदि निर्जीव जड पदार्थोंसे भिन्न हैं, केवल कारणरूपसे उन वस्तुओंमें अनुगत होनेके कारण ही उनसे अभिन्न कहे जाते हैं, उसी प्रकार अपनी परा प्रकृतिके विस्तारभूत जीवसमुदायसे भी वे भिन्न ही हैं; क्योंकि जीव अल्पज्ञ एवं सुख- दुःख आदिका भोक्ता है और परमात्मा सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वनियन्ता तथा सुख-दुःखसे परे है। कारण और कार्यकी अनन्यताको लेकर ही जीवमात्र परमेश्वरसे अभिन्न बतलाये जाते हैं। इसलिये

१५६ वेदान्त-दर्शन [पाद १

१५६ वेदान्त-दर्शन [पाद १ ब्रह्ममें यह दोष नहीं आता कि 'वह अपना अहित करता है।' वह हित-अहितसे ऊपर है। सबका हित उसीसे होता है। सम्बन्ध - यहाँतक सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् परमेश्वरको समस्त जगत्का कारण होते हुए भी सबसे विलक्षण तथा सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया गया है। उसमें प्रतीत होनेवाले दोषोंका भी भलीभाँति निराकरण किया गया। अब उस सत्यसंकल्प परमेश्वरका बिना किसीकी सहायता और परिश्रमके केवल संकल्पमात्रसे ही विचित्र जगत्की रचना कर देना उन्हींके अनुरूप है, यह सिद्ध करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि॥२।१।२४॥ चेत्=यदि कहो; उपसंहारदर्शनात्=(लोकमें घट आदि बनानेके लिये) साधन-सामग्रीका संग्रह देखा जाता है, (किंतु ब्रह्मके पास कोई साधन नहीं है) इसलिये; न=ब्रह्म जगत्का कर्ता नहीं है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; हि=क्योंकि; क्षीरवत्=दूधकी भाँति (ब्रह्मको अन्य साधनोंकी अपेक्षा नहीं है)। व्याख्या—यदि कहो कि लोकमें घड़ा, वस्त्र आदि बनानेके लिये सक्रिय कार्यकर्त्ताका होना तथा मिट्टी, दण्ड, चाक और सूत, करघा आदि साधनोंका संग्रह अवश्य देखा जाता है; उन साधन-सामग्रियोंके बिना कोई भी कार्य होता नहीं दिखायी देता है। परंतु ब्रह्मको एकमात्र, अद्वितीय, निराकार, निष्क्रिय आदि कहा गया है, उसके पास कोई भी साधन-सामग्री नहीं है; इसलिये वह इस विचित्र जगत्की सृष्टिका कार्य नहीं कर सकता तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि जैसे दूध अपनी सहज शक्तिसे, किसी बाह्य साधनकी सहायता लिये बिना ही दहीरूपमें परिणत हो जाता है, उसी प्रकार परमात्मा भी अपनी स्वाभाविक शक्तिसे जगत्का स्वरूप धारण कर लेता है। जैसे मकड़ीको जाला बनानेके लिये किसी अन्य साधनकी अपेक्षा नहीं होती, उसी प्रकार परब्रह्म भी किसी अन्य साधनका सहारा लिये बिना अपनी अचिन्त्य

सूत्र २५ ] अध्याय २ १५७

सूत्र २५ ] अध्याय २ १५७ शक्तिसे ही जगत्‌की रचना करता है। श्रुति परमेश्वरकी उस अचिन्त्य शक्तिका वर्णन इस प्रकार करती है—'उस परमात्माको किसी साधनकी आवश्यकता नहीं है, उसके समान और उससे बढ़कर भी कोई नहीं देखा जाता है। उसकी ज्ञान, बल और क्रियारूप स्वाभाविक पराशक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी जाती है।' (श्वेता० ६।८)१ सम्बन्ध— यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'दूध-जल आदि जड वस्तुओंमें तो इस प्रकारका परिणाम होना सम्भव है, क्योंकि उसमें संकल्पपूर्वक विचित्र रचना करनेकी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती; परंतु ब्रह्म तो ईक्षण (संकल्प या विचार)- पूर्वक जगत्‌की रचना करता है, अतः उसके लिये दूधका दृष्टान्त देना ठीक नहीं है। जो लोग सोच-विचारकर कार्य करनेवाले हैं ऐसे लोगोंको साधन- सामग्रीकी आवश्यकता होती ही है। ब्रह्म अद्वितीय होनेके कारण साधनशून्य है, इसलिये वह जगत्‌का कर्ता कैसे हो सकता है?' इसपर कहते हैं— देवादिवदपि लोके॥ २। १। २५॥ लोके=लोकमें; देवादिवत्=देवता आदिकी भाँति; अपि=(बिना उपकरणके) भी (कार्य करनेकी शक्ति देखी जाती है)। व्याख्या—जैसे लोकमें देवता और योगी आदि बिना किसी उपकरणकी सहायताके अपनी अद्भुत शक्तिके द्वारा ही बहुत-से शरीर आदिकी रचना कर लेते हैं; बिना किसी साधन-सामग्रीके संकल्पमात्रसे मनोवांछित विचित्र पदार्थोंको प्रकट कर लेते हैं२, उसी प्रकार अचिन्त्यशक्तिसम्पन्न परमेश्वर अपने संकल्पमात्रसे यदि जड-चेतनके समुदायरूप विचित्र जगत्‌की रचना कर दे या स्वयं उसके रूपमें प्रकट हो जाय तो क्या आश्चर्य है। साधारण मकड़ी भी अपनी ही शक्तिसे अन्य साधनोंके बिना ही जाला बना लेती है, तब सर्वशक्तिमान् १-यह मन्त्र सूत्र १। १। २ की टिप्पणीमें आ गया है। २-देखिये वाल्मीकिरामायण तथा रामचरितमानसमें भरद्वाजजीके द्वारा भरतके आतिथ्यसत्कारका प्रसंग।

१५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

१५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ परमेश्वरको इस जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण माननेमें क्या आपत्ति हो सकती है। सम्बन्ध— उपर्युक्त बातको दृढ़ करनेके लिये शंका उपस्थित करते हैं— कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा॥ २।१।२६॥ कृत्स्नप्रसक्तिः = (ब्रह्मको जगत्का कारण माननेपर) वह पूर्णरूपसे जगत्के रूपमें परिणत हो गया, ऐसा माननेका दोष उपस्थित होगा; वा = अथवा; निरवयवत्वशब्दकोपः = उसको अवयवरहित बतानेवाले श्रुतिके शब्दोंसे विरोध होगा। व्याख्या— पूर्वपक्षका कहना है कि यदि ब्रह्मको जगत्का कारण माना जायगा तो उसमें दो दोष आवेंगे। एक तो यह कि ब्रह्म अवयवरहित होनेके कारण अपने सम्पूर्ण रूपसे ही जगत्के आकारमें परिणत हो गया, ऐसा मानना पड़ेगा, फिर जगत्से भिन्न ब्रह्मनामकी कोई वस्तु नहीं रही। यदि ब्रह्म सावयव होता तो ऐसा समझते कि उसके शरीरका एक अंश विकृत होकर जगत्-रूपमें परिणत हो गया और शेष अंश ब्रह्मरूपमें ही स्थित है; परंतु वह अवयवयुक्त तो है नहीं; क्योंकि श्रुति उसे 'निष्कल, निष्क्रिय, शान्त, निरवद्य और निरंजन' बताती है१, दिव्य और अमूर्त आदि विशेषणोंसे विभूषित करती है।२ ऐसी दशामें पूर्णतः ब्रह्मका परिणाम मान लेनेपर उसके श्रवण, मनन और निदिध्यासन आदिका उपदेश व्यर्थ होगा। और यदि इस दोषसे बचनेके लिये ब्रह्मको सावयव मान लिया जाय तब तो उसे 'अवयवरहित अजन्मा' आदि बतानेवाले श्रुतिके शब्दोंसे स्पष्ट ही विरोध आता है; सावयव होनेपर वह नित्य और सनातन भी नहीं रह सकेगा; इसलिये ब्रह्मको जगत्का कारण मानना युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध— इस शंकाके उत्तरमें कहते हैं— १-निष्कलँ निष्क्रियँ शान्तं निरवद्यं निरंजनम्। (श्वेता० ६।१९) २-दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः। (मु० उ० २।१।२)