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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२९

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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२९


भवन्तु'--किरणें अथवा दिशाएँ हमारे लिये सुखकर हों। 'स्वः स्वाहा' [ इतने अर्थवाले मन्त्रसे तृतीय ग्रास भक्षण करे ]। इसके पश्चात् सम्पूर्ण सावित्री (गायत्रीमन्त्र), 'मधु वाता ऋतायते' इत्यादि समस्त मधुमती ऋचा और 'अहमेवेदं सर्वं भूयासम्' (यह सब मैं ही हो जाऊँ) 'भूर्भुवः स्वाहा' इस प्रकार कहकर अन्तमें समस्त मन्थको भक्षण कर दोनों हाथ धो अग्निके पश्चिम भागमें पूर्वकी ओर सिर करके बैठता है। प्रातःकालमें 'दिशामेकपुण्डरीकमस्यहं...........भूयासम्'¹ इस मन्त्रद्वारा आदित्यका उपस्थान (नमस्कार) करता है। फिर जिस मार्गसे गया होता है, उसीसे लौटकर अग्निके पश्चिम भागमें बैठकर [ आगे कहे जानेवाले ] वंशको जपता है॥ ६॥

अथैनमाचामति भक्षयति । गायत्र्याः प्रथमपादेन मधुमत्यैकया व्याहृत्या च प्रथमया प्रथमग्रासमाचामति; तथा गायत्रीद्वितीयपादेन मधुमत्या द्वितीयया द्वितीयया च व्याहृत्या द्वितीयं ग्रासम्; तथा तृतीयेन गायत्रीपादेन तृतीयया मधुमत्या तृतीयया च व्याहृत्या तृतीयं ग्रासम्। सर्वां सावित्रीं सर्वाश्च मधुमतीरुक्त्वाहमेवेदं सर्वं भूयासमिति चान्ते भूर्भुवः स्वः स्वाहेति समस्तं भक्षयति ।<br><br>यथा चतुर्भिर्ग्रासैस्तद् द्रव्यं सर्वं परिसमाप्यते तथा पूर्वमेवइसके पश्चात् वह मन्थको भक्षण करता है। गायत्रीके प्रथम पाद, एक मधुमती ऋचा और एक व्याहृतिसे प्रथम ग्रास खाता है तथा गायत्रीके द्वितीय पाद, द्वितीय मधुमती ऋचा और द्वितीय व्याहृतिसे दूसरा ग्रास खाता है और गायत्रीके तृतीय पाद, तृतीय मधुमती ऋचा और तृतीय व्याहृतिसे अन्तमें तीसरा ग्रास भक्षण करता है। फिर समस्त गायत्री, सम्पूर्ण मधुमती ऋचा और 'मैं ही यह सब हो जाऊँ' ऐसा कहते हुए 'भूर्भुवः स्वः स्वाहा' ऐसा कहकर समस्त मन्थको भक्षण कर जाता है।<br><br>वह सारा द्रव्य जिस प्रकार चार ग्रासोंमें समाप्त हो जाय इसका पहले

१. तू दिशाओंका एक पुण्डरीक [अर्थात् अखण्ड श्रेष्ठ] है, मैं मनुष्योंमें एक पुण्डरीक होऊँ।

बृ० उ०—८४

१३३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

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१३३०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

| निरूपयेत् । यत्पात्रावलिप्तं तत् पात्रं सर्वं निर्णिज्य तूष्णीं पिबेत् । पाणी प्रक्षाल्याप आचम्य जघनेनाग्निं पश्चादग्नेः प्राक्शिराः संविशति । प्रातःसंध्यामुपास्यादित्यमुपतिष्ठते दिशामेकपुण्डरीकमित्यनेन मन्त्रेण । यथेतं यथागतमेत्यागत्य जघनेनाग्निमासीनो वंशं जपति ॥ ६ ॥ | ही विभाग कर ले । जो कुछ पात्रमें लगा रह जाय उस पात्रको धोकर उस सबको चुपचाप पी जाय । फिर दोनों हाथ धोकर जलसे आचमन कर 'जघनेन अग्निम्' अर्थात् अग्निके पश्चिम भागमें पूर्वकी ओर शिर करके बैठता है । प्रातःकालिक संध्योपासन कर 'दिशामेकपुण्डरीकमसि' इस मन्त्रसे आदित्यका उपस्थान करता है । फिर जिस मार्गसे गया था उसीसे लौटकर अग्निके पश्चिम भागमें बैठकर [ इस ] वंशको जपता है ॥ ६ ॥ |

मन्थकर्मका वंश

तँहैतमुद्दालक आरुणिर्वाजसनेयाय याज्ञवल्क्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनँशुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ७ ॥

उस इस मन्थका उद्दालक आरुणिने अपने शिष्य वाजसनेय याज्ञवल्क्यको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इस मन्थको सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उससे शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आयेंगे' ॥ ७ ॥

एतमु हैव वाजसनेयो याज्ञवल्क्यो मधुकाय पैङ्ग्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनँशुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ८ ॥

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १३३१

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ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १३३१

उस इस मन्थका वाजसनेय याज्ञवल्क्यने अपने शिष्य मधुक पैङ्ग्यको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आयेंगे' ॥ ८ ॥

एतमु हैव मधुकः पैङ्ग्यश्चूलाय भागवित्तयेऽन्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एन ँशुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ६ ॥

उस इस मन्थका मधुक पैङ्ग्यने अपने शिष्य चूल भागवित्तिको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आयेंगे' ॥ ६ ॥

एतमु हैव चूलो भागवित्तिर्जानकय आयस्थूणायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एन ँशुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ १० ॥

उस इस मन्थका चूल भागवित्तिने अपने शिष्य जानकि आयस्थूणको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आयेंगे' ॥ १० ॥

एतमु हैव जानकिरायस्थूणः सत्यकामाय जाबालायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एन ँशुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ११ ॥

उस इस मन्थका जानकि आयस्थूणने अपने शिष्य सत्यकाम जाबालको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आयेंगे ॥ ११ ॥

एतमु हैव सत्यकामो जाबालोऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाचापि य एन ँशुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्शाखाः

१३३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६

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१३३२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६

प्ररोहेयुः पलाशानीति तमेतं नापुत्राय वानन्तेवासिने वा ब्रूयात् ॥ १२ ॥

उस इस मन्थका सत्यकाम जाबालने अपने शिष्योंको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आयेंगे।' उस इस मन्थका जो पुत्र या शिष्य न हो, उसे उपदेश न करे ॥ १२ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तं हैतमुद्दालक इत्यादि सत्यकामो जाबालोऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेञ्जायेरन्नेवास्मिञ्शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीत्येवमन्तमेनं मन्थमुद्दालकात् प्रभृत्येकैकाचार्यक्रमागतं सत्यकाम आचार्यो बहुभ्योऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाच । किमन्यदुवाचेत्युच्यते—अपि य एनं शुष्के स्थाणौ गतप्राणेऽप्येनं मन्थं भक्षणाय संस्कृतं निषिञ्चेत् प्रक्षिपेज्जायेरन्नुत्पद्येरन्नेवास्मिन् स्थाणौ शाखा अवयवा वृक्षस्य प्ररोहेयुश्च पलाशानि पर्णानि यथा जीवितः स्थाणोः; किमुतानेन कर्मणा कामः सिद्ध्येदिति । ध्रुवफलमिदं कर्मेति कर्मस्तुत्यर्थमेतत् ।'तं हेतमुद्दालकः' यहाँसे आरम्भ करके 'सत्यकामो जाबालोऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाचापि······प्ररोहेयुः पलाशानि' यहाँतक उद्दालकसे लेकर एक-एक आचार्यके क्रमसे प्राप्त हुए इस मन्थका सत्यकाम जाबालने बहुत-से शिष्योंको उपदेश करके कहा । और क्या कहा, सो बतलाया जाता है—'यदि कोई भक्षणके लिये संस्कार किये गये इस मन्थको किसी शुष्क—गतप्राण स्थाणु (ठूँठ) पर भी डाल दे तो इस ठूँठमें शाखाएँ—वृक्षके अवयव उत्पन्न हो जायँगे और पत्ते भी निकल आयेंगे, जैसे कि जीवित स्थाणु (हरे ठूँठ) में होत हैं; फिर इस कर्मसे यदि कामनाकी सिद्धि हो जाय तो कौन बड़ी बात है ? तात्पर्य यह है कि यह कर्म निश्चित फल देनेवाला है—इस प्रकार यह उक्ति कर्मकी स्तुतिके लिये है।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३३

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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३३


| विद्याधिगमे षट्तीर्थानि तेषामिह सप्राणदर्शनस्य मन्थविज्ञानस्याधिगमे द्वे एव तीर्थे अनुज्ञायेते पुत्रश्चान्तेवासी च ॥ ७-१२ ॥ | विद्याप्राप्तिके छः^१ तीर्थ (अधिकारी) हैं, उनमेंसे इस प्राणदर्शनयुक्त मन्थविज्ञानकी प्राप्तिकी अनुज्ञा पुत्र और शिष्य दो ही तीर्थोंके लिये है ॥ ७-१२ ॥ |


मन्थकर्मकी सामग्रीका विवरण

चतुरौदुम्बरो भवत्यौदुम्बरः स्रुव औदुम्बरश्चमस औदुम्बर इध्म औदुम्बर्या उपमन्थन्यौ दश ग्राम्याणि धान्यानि भवन्ति व्रीहियवास्तिलमाषा अणुप्रियङ्गवो गोधूमाश्च मसूराश्च खल्वाश्च खलकुलाश्च तान् पिष्टान् दधनि मधुनि घृत उपसिञ्चत्याज्यस्य जुहोति ॥ १३ ॥

यह मन्थकर्म चतुरौदुम्बर (चार औदुम्बर काष्ठके पदार्थोंवाला) है। इसमें औदुम्बरकाष्ठ (गूलरकी लकड़ी) का स्रुव, औदुम्बरकाष्ठका चमस, औदुम्बरकाष्ठका इध्म और औदुम्बरकाष्ठकी दो उपमन्थनी होती हैं। इसमें व्रीहि (धान), यव (जौ), तिल, माष (उड़द), अणु (साँवा), प्रियङ्गु (काँगनी), गोधूम (गेहूँ), मसूर, खल्व (बाल) और खलकुल (कुलथी)—दश ग्रामीण अन्न उपयुक्त होते हैं। उन्हें पीसकर दही, मधु और घृतमें मिलाकर घृतसे हवन करता है ॥ १३ ॥

| चतुरौदुम्बरो भवतीति व्याख्यातम् । दश ग्राम्याणि धान्यानि भवन्ति ग्राम्याणां | 'चतुरौदुम्बरो भवति' इस वाक्यकी व्याख्या श्रुतिने स्वयं की है। दश ग्राम्य धान्य होते हैं। हम पहले कह चुके हैं कि ग्राम्य धान्योंमेंसे |


१. शिष्य, वेदाध्यायी श्रोत्रिय, धारणाशक्तिसम्पन्न पुरुष, धन देनेवाला, प्रिय पुत्र और जो एक विद्या सीखकर दूसरी सिखानेवाला हो—ये छः विद्यादानके अधिकारी हैं।

१३३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

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१३३४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

| तु धान्यानां दश नियमेन ग्राह्या इत्यवोचाम । के त इति निर्दिश्यन्ते—व्रीहियवास्तिलमाषा अणुप्रियङ्गवोऽणवश्चाणुशब्दवाच्याः। क्वचिद्देशे प्रियङ्गवः प्रसिद्धाः कङ्गुशब्देन। खल्वा निष्पावा वल्लशब्दवाच्या लोके खलकुलाः कुलत्थाः । एतद्व्यतिरेकेण यथाशक्ति सर्वौषधयोग्राह्याः फलानि चेत्यवोचामायाज्ञिकानि वर्जयित्वा ॥ १३ ॥ | दश तो अवश्य ग्रहण करने चाहिये। वे कौन-से हैं, सो बतलाये जाते हैं—व्रीहि, यव, तिल, माष, अणु, प्रियङ्गु, ‘अणु’ शब्दके वाच्य अणु (चावलोंका एक भेद) हे तथा प्रियङ्गु किसी-किसी देशमें कङ्गु (काँगनी) शब्दसे प्रसिद्ध हैं। खल्व या निष्पाव लोकमें वल्ल (बाल) शब्दसे कहे जाते हैं। खलकुल कुलत्थों (कुलथी) को कहते हैं। इनके अतिरिक्त जो यज्ञसम्बन्धी नहीं हैं, उन्हें छोड़कर यथाशक्ति सभी ओषधियां और फल लेने चाहिये—यह हम कह चुके हैं ॥ १३ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये तृतीयं श्रीमन्थब्राह्मणम् ॥ ३ ॥


चतुर्थ ब्राह्मण

सन्तानोत्पत्ति-विज्ञान अथवा पुत्रमन्थ कर्म¹

यादृग्जन्मा यथोत्पादितो यैर्वा गुणैर्विशिष्टः पुत्र आत्मनःजिस प्रकार जन्म लेनेवाला, जिस विधिसे उत्पन्न किया हुआ अथवा जिन गुणोंसे विशिष्टताको प्राप्त हुआ पुत्र

¹ १. पूर्वोक्त तीसरे ब्राह्मणमें धनार्थी प्राणोपासकके लिये ‘श्रीमन्थ’ कर्मका विधिपूर्वक वर्णन किया गया है; अब इच्छानुसार सद्गुणयुक्त संतान उत्पन्न करनेकी युक्ति बतानेके लिये ‘पुत्रमन्थ’ कर्मका वर्णन आरम्भ करते हैं ।

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १३३५

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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १३३५


| पितुश्च लोक्यो भवतीति तत्सम्पादनाय ब्राह्मणमारभ्यते। प्राणदर्शिनः श्रीमन्थं कर्म कृतवतः पुत्रमन्थेऽधिकारः। यदा पुत्रमन्थं चिकीर्षति तदा श्रीमन्थं कृत्वर्तुकालं पत्न्याः प्रतीक्षत इत्येतद्रेतस ओषध्यादिरसतमत्वस्तुत्यावगम्यते— | अपने तथा पिताके लिये लोक-परलोकमें हितकारी होता है; वैसे पुत्रकी उत्पत्ति कैसे हो ? यह बतानेके लिये अथवा ऐसे पुत्रकी प्राप्तिके उपायका सम्पादन करनेके लिये यह चतुर्थ ब्राह्मण प्रारम्भ किया जाता है। जिस प्राणोपासक पुरुषने श्रीमन्थ कर्मका सम्पादन कर लिया है, उसीका पुत्रमन्थ-कर्ममें अधिकार है। साधक जब पुत्रमन्थ करना चाहता है, तब वह श्रीमन्थ-कर्मका अनुष्ठान करके पत्नीके ऋतुकालकी प्रतीक्षा करता है; यह बात रेतस् (शुक्र) को ओषधि आदिका रसतम (सारतम) बताकर उसकी प्रशंसा करनेसे जानी जाती है— |

एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामोषधय ओषधीनां पुष्पाणि पुष्पाणां फलानि फलानां पुरुषः पुरुषस्य रेतः ॥ १ ॥

इन भूतोंका रस पृथिवी है, पृथिवीका रस जल है, जलका रस-ओषधियाँ हैं, ओषधियोंका रस पुष्प है, पुष्पोंका रस फल है, फलोंका रस (आधार) पुरुष है तथा पुरुषका रस (सार) शुक्र है ॥ १ ॥

| एषां वै चराचराणां भूतानां पृथिवी रसः सारभूतः, सर्वभूतानां मध्विति ह्युक्तम् । पृथिव्या आपो रसः; अप्सु हि पृथिव्योता च | इन चर-अचर समस्त भूतोंका रस-सारभूत तत्त्व पृथिवी है; क्योंकि 'पृथिवी सब भूतोंका मधु (सार) है', यह बात मधु ब्राह्मणमें कह आये हैं। पृथिवी- |

१३३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६

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१३३६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६

| प्रोता च। अपामोषधयो रसः कार्यत्वाद् रसत्वमोषध्यादीनाम्। ओषधीनां पुष्पाणि पुष्पाणां फलानि; फलानां पुरुषः; पुरुषस्य रेतः। "सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतम्" (ऐतरेय० २।१।१) इति श्रुत्यन्तरात् ॥ १ ॥ | का रस जल है; क्योंकि पृथिवी जलमें ओतप्रोत है। जलका रस ओषधियाँ (अन्न) है। जलका कार्य होनेके कारण ओषधियोंको उसका रस बताया गया है। ओषधियोंका रस फूल, फूलोंका रस फल, फलोंका रस पुरुष और पुरुषका रस रेतस् (शुक्र) है। यह बात 'यह वीर्य पुरुषके सम्पूर्ण अङ्गोंसे उत्पन्न हुआ तेज हे' इस दूसरी श्रुतिसे भी प्रमाणित होती है ॥ १ ॥ | | यत्त एवं सर्वभूतानां सारतममेतद् रेतोऽतः का नु खल्वस्य योग्या प्रतिष्ठेति— | यदि इस प्रकार यह रेतस् (वीर्य) सम्पूर्ण भूतोंका सारतम तत्त्व है, तो इसके आधानके योग्य प्रतिष्ठा (आधारभूमि) क्या है? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— |

स ह प्रजापतिरीक्षांचक्रे हन्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति स स्त्रियँ ससृजे ताँ सृष्ट्वाध उपास्त तस्मात् स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव समुदपारयत्तैनेनामभ्यसृजत ॥ २ ॥

सुप्रसिद्ध प्रजापतिने विचार किया कि मैं इस वीर्यकी स्थापनाके लिये किसी योग्य प्रतिष्ठा (आधार-भूमि) का निर्माण करूँ, अतः उन्होंने स्त्रीकी सृष्टि की। उसकी सृष्टि करके उन्होंने उसके अधोभागकी उपासना की (मैथुनकर्मका विधान किया); अतः स्त्रीके अधोभागकी उपासना (सेवन) करे। प्रजापतिने इस उत्कृष्ट गतिशील प्रस्तरखण्ड-सदृश शिश्नेन्द्रियको (उत्पन्न करके उसे) स्त्रीकी (योनिकी) ओर प्रेरित किया, उससे इस स्त्रीका संसर्ग किया ॥ २ ॥

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३७

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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३७

स ह स्रष्टा प्रजापतिरीक्षाञ्चक्रे।<br><br>ईक्षां कृत्वा स स्त्रियं ससृजे।<br><br>तां च सृष्ट्वाध उपास्त मैथुनाख्यं<br><br>कर्माधउपासनं नाम कृतवान्।<br><br>तस्मात् स्त्रियमध उपासीत।<br><br>श्रेष्ठानुश्रयणा हि प्रजाः।<br><br>अत्र वाजपेयसामान्य-<br>क्लृप्तिमाह—स एतं प्राञ्चं प्रकृष्टगतियुक्तमात्मनो ग्रावाणं सोमाभिषवोपलस्थानीयं काठिन्यसामान्यात् प्रजननेन्द्रियमुदपारयदुत्पूरितवान् स्त्रीव्यञ्जनं प्रति तेनैनां स्त्रियमभ्यसृजदभिसंसर्गं कृतवान् ॥ २ ॥उस सुप्रसिद्ध सृष्टिकर्ता प्रजापतिने विचार किया। विचार करके उन्होंने स्त्रीकी सृष्टि की। उसकी सृष्टि करके अधोभागकी उपासना की। मैथुन नामक कर्मका ही नाम अधोभागको उपासना है; उसीको सम्पन्न किया। इसलिये स्त्रीके अधोभागकी उपासना (सेवन) करे; क्योंकि सारी प्रजा श्रेष्ठ पुरुषके आचार-व्यवहारका अनुकरण करनेवाली होती है।<br><br>इस मैथुन-कर्ममें वाजपेय यज्ञकी समानताकी कल्पना करते हैं—उन प्रजापतिने इस प्रकृष्ट गतियुक्त लोढ़ेको, सोमरस निकालनेके लिये उपयोगमें लाये जानेवाले प्रस्तर-खण्डके समान अपने शिश्न—जननेन्द्रियको, जो मैथुनकालमें कठोर हो जाता है, उत्पूरित किया—स्त्री-योनिकी ओर प्रेरित किया। उस जननेन्द्रियसे इस स्त्री का संसर्ग किया¹ ॥ २ ॥

१. सृष्टि-कार्यमें इस क्रियाकी अत्यन्त आवश्यकता है। भोगबुद्धिसे न होकर यदि केवल उत्तम संतानोत्पादनके लिये यह क्रिया हो तो वह धर्मसम्मत है और आवश्यक है। इस क्रियामें प्राणिमात्रकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है। यह प्रवृत्ति संयमित हो, भोगार्थ न होकर केवल संतानोत्पादनार्थ हो, पुरुषोंकी स्वेच्छाचारिता और असंयमका निरोध हो, शुभ एवं श्रेष्ठ संतानोत्पादनके विज्ञानसे लोग परिचित हों; यह मनुष्यका पतन करनेवाली पाशविक क्रियामात्र न रहकर लोक-कल्याणकारी नर-रत्नोंके उत्पादन तथा निर्माणमें सफल साधन हो, इसीके लिये शास्त्रमें इस विषयका स्पष्ट विधान किया गया है। जगत्के प्रातःस्मरणीय महान् पुरुषोंका

१३३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

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१३३८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

तस्या वेदिरुपस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणे समिद्धो मध्यतस्तौ मुष्कौ स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमानस्य लोको भवति तावानस्य लोको भवति य एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासाँ स्त्रीणाँ सुकृतं वृङ्क्तेऽथ य इदमविद्वानधोपहासं चरत्यास्य स्त्रियः सुकृतं वृञ्जते ॥ ३ ॥

स्त्रीकी उपस्थेन्द्रिय वेदी है, वहाँके रोएँ कुशा हैं, योनिका मध्यभाग प्रज्वलित अग्नि है, योनिके पार्श्वभागमें जो दो कठोर मांसखण्ड हैं उनको मुष्क कहते हैं, वे दोनों मुष्क ही 'अधिषवण' नामसे प्रसिद्ध चर्ममय सोम-फलक हैं। वाजपेय यज्ञ करनेसे यजमानको जितना पुण्यलोक प्राप्त होता है, उतना ही उसे भी प्राप्त होता है। जो कि इस प्रकार जानकर मैथुनका आचरण करता है, वह इन स्त्रियोंके पुण्यको अवरुद्ध कर लेता है और जो इसे नहीं जानता है, वह यदि मैथुन करता है तो स्त्रियाँ ही उसके पुण्यको अवरुद्ध कर लेती हैं ॥ ३ ॥

| तस्या वेदिरित्यादि सर्वं सामान्यं प्रसिद्धम् । समिद्धोऽग्निर्मध्यतः स्त्रीव्यञ्जनस्य तौ मुष्कावधिषवणफलके इति व्यव- | 'तस्या वेदिः' इत्यादि सभी समानताएँ प्रसिद्ध हैं। स्त्री-योनिका मध्यभाग प्रज्वलित अग्नि है। वे दोनों मुष्क (योनिके पार्श्वभागके युगल मांसखण्ड) 'अधिषवण' नामसे प्रसिद्ध सोमफलक हैं; इस प्रकार 'चर्माधिषवणे' पदका दूरस्थित |


उत्पत्तिमें यही विज्ञान साधन-स्वरूप रहा है। अतएव इसको जानकर ही प्रत्येक पुरुष इसके द्वारा विश्व-कल्याणमें सहायक हो सकता है। अवश्य ही यह विज्ञान उन्हीं लोगोंके लिये है, जो प्रजोत्पादनके योग्य गृहस्थ-आश्रममें तथा तरुण-अवस्थामें हैं। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, यति एवं बालक-वृद्धोंके लिये अथवा संसारसे सर्वथा विरक्त पुरुषोंके लिये यह विषय त्याज्य है। इस विज्ञानके प्रतिपादनमें उन वाक्यों या शब्दोंका आना अनिवार्य है, जो अश्लील समझे जाते हैं; क्योंकि उसी विषयको समझाना है; अतएव इस प्रसंगके पाठक इसी दृष्टिसे इसको पढ़ें और सोचें।

| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | १३३९ |

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ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्यार्थे१३३९

| हितेन सम्बध्यते। वाजपेययाजिनो यावाँल्लोकः प्रसिद्धस्तावन् विदुषो मैथुनकर्मणो लोकः फलमिति स्तूयते। तस्माद् बीभत्सा नो कार्येति। <br><br> य एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासां स्त्रीणां सुकृतं वृङ्क्त आवर्जयति। अथ पुनर्येा वाजपेयसम्पत्तिं न जानात्यविद्वान् रेतसो रसतमत्वं चाधोपहासं चरति; अस्य स्त्रियः सुकृतमावृञ्जतेऽविदुषः ॥ ३ ॥ | 'तौ मुष्कौ' इन पदोंके साथ सम्बन्ध है। वाजपेय यज्ञद्वारा यजन करनेवालेको जितना लोक प्राप्त होता है, उतना ही लोक विद्वान्‌के मैथुन कर्मका फल है, ऐसा कहकर यहाँ मैथुनकर्मकी स्तुति की जाती है; अतः इससे घृणा नहीं करनी चाहिये। <br><br> जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष मैथुनकर्म करता है, वह इन स्त्रियोंके पुण्यको अवरुद्ध कर लेता है और जो वाजपेय यज्ञ-सम्पादनकी प्रणालीको नहीं जानता है, रेतस्को रसतम रूपमें नहीं अनुभव करता है, वह यदि मैथुनका सेवन करता है तो उस अज्ञानीके पुण्यको स्त्रियाँ ही अवरुद्ध कर लेती हैं ॥ ३ ॥ |


एतद्ध स्म वै तद् विद्वानुद्दालक आरुणिराहौतद्ध स्म वै तद्विद्वानाको मौद्गल्य आहौतद्ध स्म वै तद्विद्वान् कुमारहारित आह बहवो मर्या ब्राह्मणायाना निरिन्द्रिया विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रयन्ति य इदमविद्वाँसोऽधोपहासं चरन्तीति बहु वा इदँ सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः स्कन्दति ॥ ४ ॥

निश्चय ही इस मैथुनकर्मको वाजपेयसम्पन्न जाननेवाले अरुणनन्दन उद्दालक कहते हैं, इसे उस रूपमें जाननेवाले मुद्गलपुत्र नाक कहते हैं तथा इसे उक्त रूपमें जाननेवाले कुमारहारित मुनि भी कहते हैं कि

१३४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

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१३४०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

'बहुत-से ऐसे मरणधर्मा नाममात्रके ब्राह्मण हैं, जो निरिन्द्रिय, सुकृतहीन और मैथुन-विज्ञानसे अपरिचित होकर भी मैथुनकर्ममें आसक्तिपूर्वक प्रवृत्त होते हैं, वे परलोकसे भ्रष्ट हो जाते हैं। यदि पत्नीका ऋतुकाल प्राप्त होने-से पूर्व इस प्राणोपासकका वीर्य अधिक या कम सोते समय अथवा जागते समय गिर जाता है (तो उसे निम्नाङ्कित प्रायश्चित्त करना चाहिये) ॥ ४॥

| एतद्ध स्म वै तद् विद्वानुद्दालक आरुणिराहाधोपहासाख्यं मैथुनकर्म वाजपेयसम्पन्नं विद्वानित्यर्थः; तथा नाको मौद्गल्यः कुमारहारितश्च किं त आहुः ? इत्युच्यते—बहवो मर्या मरणधर्मिणो मनुष्या ब्राह्मणा अयनं येषां ते ब्राह्मणायना ब्रह्मबन्धवो जातिमात्रोपजीविन इत्येतत् । निरिन्द्रिया विश्लिष्टेन्द्रिया विसुकृतो विगतसुकृतकर्माणोऽविद्वांसो मैथुनकर्मासक्ता इत्यर्थः। ते किमस्माल्लोकात् प्रयन्ति परलोकात् परिभ्रष्टा इति । मैथुनकर्मणोऽत्यन्तपापहेतुत्वं दर्शयति—य इदमविद्वांसोऽधोपहासं चरन्तीति । | अरुणनन्दन उद्दालक निश्चय ही इसको पूर्वोक्त रूपसे जानकर अर्थात् 'अधोपहास' नामक मैथुनकर्म वाजपेय यज्ञके महत्त्वसे सम्पन्न है, ऐसा जानकर तथा मुद्गलपुत्र नाक और कुमारहारित भी इसे उक्त रूपमें जानकर कहते हैं; वे क्या कहते हैं? यह बता रहे हैं—बहुत-से ऐसे मर्य—मरणधर्मी मनुष्य ब्राह्मणायन—ब्राह्मण हैं अयन जिनके वे ब्रह्मबन्धु अर्थात् ब्राह्मण जातिका नाम लेकर जीनेवाले, निरिन्द्रिय—जिनकी इन्द्रियाँ संयुक्त न रहकर बिलग-बिलग बिखरी रहती हैं तथा विसुकृत्—पुण्यकर्मरहित अर्थात् मैथुन-विज्ञानसे अपरिचित होते हुए भी मैथुनकर्ममें आसक्त पुरुष हैं, वे क्या होते हैं? वे परलोकभ्रष्ट हो जाते हैं। मैथुनकर्म अत्यन्त पापका हेतु है—यह दिखाते हैं—'जो अविद्वान् इसे न जानते हुए भी मैथुनका सेवन करते हैं' इत्यादि। |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३४१

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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३४१


श्रीमन्थं कृत्वा पत्न्या ऋतु-श्रीमन्थ करके जो ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक पत्नीके ऋतुकालकी
कालं ब्रह्मचर्येण प्रतीक्षते यदीदंप्रतीक्षा करता हे, उसका यह वीर्य
रेतः स्कन्दति बहु वाल्पं वायदि रागकी प्रबलताके कारण थोड़ा या अधिक, सोते समय
सुप्तस्य वा जाग्रतो वा राग-अथवा जागते समय गिर जाय,
प्राबल्यात् ॥ ४ ॥(तो वह निम्नाङ्कित प्रायश्चित्त करे) ॥ ४ ॥

तदभिमृशेदनु वा मन्त्रयेत यन्मेऽद्य रेतः पृथिवीमस्कान्त्सीद् यदोषधीरप्यसरद् यदपः। इदमहं तद्रेत आददे पुनर्मामैत्विन्द्रियं पुनस्तेजः पुनर्भगः। पुनरग्नर्धिष्ण्या यथास्थानं कल्पन्तामित्यनामिकाङ्गुष्ठाभ्यामादायान्तरेण स्तनौ वा भ्रुवौ वा निमृज्यात् ॥५॥

उस वीर्यको हाथसे छूए तथा अभिमन्त्रित करे—स्पर्श करते समय इस प्रकार कहे—'आज जो मेरा वीर्य स्खलित होकर पृथिवीपर गिरा है, जो पहले कभी अन्नमें भी गिरा है तथा जो जलमें पड़ा है उस इस वीर्यको मैं ग्रहण करता हूँ।' ऐसा कहकर अनामिका और अङ्गुष्ठसे उस वीर्यको ग्रहण करके दोनों स्तनों अथवा भौंहोंके बीचमें लगावे। लगाते समय इस प्रकार कहे—'(जो स्खलित वीर्यरूपसे बाहर निकल गयी थी, वह मेरी) इन्द्रिय पुनः मेरे पास लौट आवे। मुझे पुनः तेज और पुनः सौभाग्यकी प्राप्ति हो। अग्नि ही जिनके स्थान हैं, वे देवगण पुनः मेरे शरीरमें उस वीर्यको यथास्थान स्थापित कर दें' ॥ ५ ॥

तदभिमृशेदतुमन्त्रयेत वानुज-उसका स्पर्श एवं अनुमन्त्रण (अभिमन्त्रण) अर्थात् बार-बार जप
पेदित्यर्थः। यदाभिमृशति तदा-करे। जब स्पर्श करे तब 'यन्मे... ......से लेकर आददे' तक मन्त्र पढ़
नामिकाङ्गुष्ठाभ्यां तद्रेत आदत्तकर अनामिका और अङ्गुष्ठसे उस

१३४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६

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१३४२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६

| आदद इत्येवमन्तेन मन्त्रेण पुन- <br> र्मामित्येतेन निमृज्यादन्तरेण <br> मध्ये भ्रुवौ भ्रुवोर्वा स्तनौ <br> स्तनयोर्वा ॥ ५ ॥ | वीर्यको हाथमें ले। फिर 'पुनर्माम्... <br> से लेकर ......'निमृज्यात्' तक मन्त्र <br> पढ़कर उस वीर्यको दोनों <br> भौंहों अथवा स्तनोंके बीचमें <br> लगावे* ॥ ५ ॥ |

अथ यद्युदक आत्मानं पश्येत्तदभिमन्त्रयेत मयि तेज इन्द्रियं यशो द्रविणँ सुकृतमिति श्रीर्ह वा एषा स्त्रीणां यन्मलोद्वासास्तस्मान्मलोद्वाससं यशस्विनीमभिक्रम्योपमन्त्रयेत ॥ ६ ॥

यदि कभी भूलसे जलमें वीर्य स्खलित हो जानेपर वहां अपनी परछाईं देख ले, तब उस जलको इस प्रकार अभिमन्त्रित करे—'देवगण मुझमें तेज, इन्द्रिय (वीर्य), यश, धन और सत्कर्मकी प्रतिष्ठा करें।' [तत्पश्चात् जिसके गर्भसे पुत्र उत्पन्न करना हो उस पत्नीकी इस प्रकार स्तुति (प्रशंसा) करे—] 'यह मेरी पत्नी संसारकी समस्त स्त्रियोंमें लक्ष्मी-स्वरूपा है; क्योंकि इसके वस्त्रमें रजस्वलापनके चिह्न स्पष्ट दिखायी देते हैं।' तदनन्तर [जब वह] रजस्वला एवं यशस्विनी पत्नी [तीन रातके बाद स्नान कर ले तब उस] के पास जाकर कहे—[आज हम दोनोंको वह कार्य करना है, जिससे पुत्रकी उत्पत्ति होती है] ॥ ६ ॥

| अथ यदि कदाचिदुदक आत्मा- <br> नमात्मच्छायां पश्येत्तत्राप्यभिम- <br> न्त्रयेतानेन मन्त्रेण मयि तेज इति। | यदि कभी जलमें [वीर्य स्खलित हो जानेपर वहाँ] अपने-को—अपनी छायाको देखे तब 'मयि तेजः' इत्यादि मन्त्रसे जलको अभिमन्त्रित करे। |


* इस मन्त्रद्वारा दो कार्य किये जाते हैं—वीर्यका आदान और मार्जन। हाथमें लेना आदान है और भौंहों अथवा स्तनोंके बीचमें उसे लगाना मार्जन है। इन कार्योंकी दृष्टिसे मन्त्रके भी दो भाग हो जाते हैं। 'यन्मे' से लेकर 'आददे' तक आदान-मन्त्र है और 'पुनर्माम्' से लेकर 'निमृज्यात्' तक मार्जन-मन्त्र।

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३४३

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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३४३


| श्रीर्ह वा एषा पत्नी स्त्रीणां मध्ये यद्यस्मान्मलोद्वासा उद्गतमलवद्वासास्तस्मात्तां मलोद्वाससं यशस्विनीं श्रीमतीमभिक्रम्याभिगत्योपमन्त्रयेतेदमद्यावाभ्यां कार्यं यत् पुत्रोत्पादनमिति त्रिरात्रान्त आप्लुताम् ॥ ६ ॥ | [ जिसके गर्भसे पुत्रकी उत्पत्ति करनी हो उस पत्नीकी स्तुति इस प्रकार करे—] यह पत्नी सब स्त्रियोंमें लक्ष्मीस्वरूपा है, क्योंकि यह मलोद्वासा है, रजस्वला होनेके कारण इसके वस्त्रमें रजके चिह्न स्पष्ट दीखते हैं। अतः उस मलोद्वासा ( रजस्वला ), यशस्विनी श्रीमती पत्नीके पास, जब वह तीन रातके बाद स्नान करके शुद्ध हो गयी हो, जाकर उससे उपमन्त्रणा करे—कहे—'आज हम दोनोंको यह करना है, जिससे पुत्रकी उत्पत्ति हो' ॥ ६ ॥ |


सा चेदस्मै न दद्यात् काममेनामवक्रीणीयात् सा चेदस्मै नैव दद्यात् काममेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपहत्यातिक्रामेदिन्द्रियेण ते यशसा यश आदद इत्ययशा एव भवति ॥ ७ ॥

वह पत्नी यदि इस पतिको मैथुन न करने दे तो पति उसे उसकी इच्छाके अनुसार वस्त्र, आभूषण आदि देकर उसके प्रति अपना प्रेम प्रकट करे । इतने पर भी यदि वह इसे मैथुनका अवसर न दे तो वह पति इच्छानुसार दण्डका भय दिखाकर उसके साथ बलपूर्वक समागम करे । यदि यह भी सम्भव न हो तो कहे 'मैं तुझे शाप देकर दुर्भगा ( वन्ध्या ) बना दूँगा।' ऐसा कहकर वह उसके निकट जाय और 'मैं अपनी यशःस्वरूप इन्द्रियद्वारा तेरे यशको छीने लेता हूँ।' इस मन्त्रका उच्चारण करे । इस प्रकार शाप देनेपर वह अयशस्विनी ( वन्ध्या अथवा दुर्भगा ) हो ही जाती है ॥ ७ ॥

१३४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

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१३४४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

| सा चेदस्मै न दद्यान्मैथुनं कर्तुं काममेनामवक्रीणीयादाभरणादिना ज्ञापयेत्। <br><br> तथापि सा नैव दद्यात् काममेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपहत्यातिक्रामेन्मैथुनाय। <br><br> शप्स्यामि त्वां दुर्भगांकरिष्यामीति प्रख्याप्य तामनेन मन्त्रेणोपगच्छेत्—'इन्द्रियेण ते यशसा यश आददे' इति। सा तस्मात्तदभिशापाद् वन्ध्या दुर्भगेति ख्यातायशा एव भवति ॥ ७ ॥ | वह (धर्म) पत्नी यदि इस पतिको मैथुन न करने दे तो वह आभूषण आदिके द्वारा उसपर अपना प्रेम प्रकट करे। <br><br> यदि वैसा करनेपर भी वह मैथुनका अवसर न दे तो पति अपनी इच्छाके अनुसार दण्डका भय दिखाकर उसके साथ बलपूर्वक मैथुनके लिये प्रयत्न करे। <br><br> [ यह भी सम्भव न हो तो ] 'मैं तुझे शाप दे दूँगा, दुर्भगा (वन्ध्या अथवा भाग्यहीना) बना दूँगा।' ऐसा कहकर 'मैं अपने यशोरूप इन्द्रियसे तेरे यशको छीन लेता हूँ' इस मन्त्रका पाठ करते हुए उसके पास जाय। उस अभिशापसे वह 'दुर्भगा' एवं 'वन्ध्या' कही जानेवाली अयशस्विनी ही हो जाती है ॥ ७ ॥ |


सा चेदस्मै दद्यादिन्द्रियेण ते यशसा यश आदधामीति यशस्विनावेव भवतः ॥ ८ ॥

वह पत्नी यदि उस पतिको मैथुनका अवसर दे तो उसे आशीर्वाद देते हुए कहे—'मैं अपनी यशोरूप इन्द्रियद्वारा तुझमें यशकी ही स्थापना करता हूँ।' तब वे दोनों दम्पति यशस्वी ही होते हैं ॥ ८ ॥

सा चेदस्मै दद्यादनुगुणैव स्याद् भर्तुस्तदानेन मन्त्रेणोपगच्छेत् 'इन्द्रियेण ते यशसा यश आदधामि'वह पत्नी यदि इस पतिको मैथुनका अवसर दे—पतिके सर्वथा अनुकूल ही रहे, तब पति 'मैं यशोरूप इन्द्रियद्वारा तुझमें यशकी ही स्थापना करता हूँ' इस मन्त्रका पाठ करते हुए उसके

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३४५

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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३४५

इति तदा यशस्विनावेवोभावपि भवतः ॥ ८ ॥समीप जाय। तब वे दोनों दम्पति यशस्वी (सन्तानवान्) ही होते हैं॥ ८॥

स यामिच्छेत् कामयेत मेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखँ संधायोपस्थमस्या अभिमृश्य जपेदङ्गादङ्गात् संभवसि हृदयादधिजायसे। स त्वमङ्गकषायोऽसि दिग्घविद्धामिव मादयेमाममूं मयीति ॥६॥

वह पुरुष अपनी जिस पत्नीके सम्बन्धमें ऐसी इच्छा करे कि यह मुझे हृदयसे चाहे, उसकी योनिमें अपनी जननेन्द्रियको स्थापित करके और अपने मुखसे उसके मुखको मिलाकर उसके उपस्थभागका स्पर्श करते हुए इस मन्त्रका जप करे—'हे वीर्य ! तुम मेरे प्रत्येक अङ्गसे प्रकट होते हो, विशेषतः हृदयसे नाड़ीद्वारा तुम्हारा प्रादुर्भाव होता है, तुम मेरे अङ्गोंके रस हो। अतः जिस प्रकार विष लगाये हुए बाणसे घायल हुई हरिणी मूर्च्छित हो जाती है, उसी प्रकार तुम मेरी इस पत्नीको मेरे प्रति उन्मत्त बना दो—इसे मेरे अधीन कर दो' ॥ ६ ॥

स यां स्वभार्यामिच्छेदियं मां कामयेतेति तस्यामर्थं प्रजनननेन्द्रियं निष्ठाय निक्षिप्य मुखेन मुखं संधायोपस्थमस्या अभिमृश्य जपेदिमं मन्त्रमङ्गादङ्गादिति ॥९॥वह पुरुष अपनी जिस पत्नीके सम्बन्धमें ऐसी इच्छा करे कि यह मेरे प्रति कामनायुक्त हो मुझे मन-से चाहने लगे, उसका योनिमें अपनी जननेन्द्रियको स्थापित करके उसके मुखसे अपना मुख मिलाकर उसके उपस्थका स्पर्श करते हुए इस मन्त्रका जप करे—'अङ्गादङ्गादित्यादि' ॥ ६ ॥

अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखँ संधायाभिप्राण्यापान्यादिन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदद इत्यरेता एव भवति ॥ १० ॥

बृ० उ० ८५—

१३४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

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१३४६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

अपनी जिस पत्नीके विषयमें ऐसी इच्छा हो कि वह गर्भधारण न करे तो उसकी योनिमें अपनी जननेन्द्रियको स्थापित करके उसके मुखसे अपना मुख मिलाकर अभिप्राणन¹ कर्म करके अपानन क्रिया करे और कहे—'इन्द्रियस्वरूप वीर्यके द्वारा मैं तेरे रेतस्को ग्रहण करता हूँ', ऐसा करनेपर वह रेतोहीन ही हो जाती है—गर्भिणी नहीं होती ॥ १० ॥

| अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीत न धारयेद् गर्भिणी मा भूदिति तस्यामर्थमिति पूर्ववत् ।<br><br>अभिप्राण्याभिप्राणं प्रथमं कृत्वा पश्चादपान्यात्—‘इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आददे' इत्यनेन मन्त्रेणारेता एव भवति न गर्भिणी भवतीत्यर्थः ॥ १० ॥ | पुरुष अपनी जिस पत्नीके विषयमें ऐसी इच्छा करे कि यह गर्भ धारण न करे—गर्भवती न हो तो वह उसकी योनिमें इत्यादि अर्थ पूर्ववत् समझ लेना चाहिये ।<br><br>अभिप्राण्य—प्रथम अभिप्राणन करके पश्चात् 'इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आददे' इस मन्त्रके द्वारा अपानन करे । इससे वह अरेता ही हो जाती है । तात्पर्य यह है कि गर्भवती नहीं होती ॥ १० ॥ |

अथ यामिच्छेद् दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखँ् संधायापान्याभिप्राण्यादिन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामीति गर्भिण्येव भवति ॥ ११ ॥

पुरुषको अपनी जिस पत्नीके सम्बन्धमें ऐसी इच्छा हो कि यह गर्भ धारण करे, वह उसकी योनिमें अपनी जननेन्द्रिय स्थापित करके उसके मुखसे मुख मिलाकर पहले अपानन² क्रिया करके पश्चात् अभिप्राणन कर्म करे और कहे—'मैं इन्द्रियरूप वीर्यके द्वारा तेरे रेतस्‌का आधान करता हूँ।' ऐसा करनेसे वह गर्भवती ही होती है ॥ ११ ॥


१. पुरुष अपनी शिश्नेन्द्रियद्वारा स्त्रीकी योनिमें जो वायुको प्रविष्ट करता है, उसे 'अभिप्राणन' कर्म कहते हैं और वह जो अपना शिश्नेन्द्रियको बाहर निकालते हुए उस वायुको भी बाहर निकाल देता है, उस क्रियाको 'अपानन' कहते हैं । २. भावनाद्वारा पहले स्त्रीके रेतसयुक्त वायुका आकर्षण करना यहाँ प्रथम 'अपानन-क्रिया' है । अभिप्राणन कर्म तो पूर्ववत् ही है ।

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १३४७

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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १३४७


| अथ यामिच्छेद् दधीत गर्भमिति तस्यामर्थमित्यादि पूर्ववत्। पूर्वविपर्ययेणापान्याभिप्राण्यात्— ‘इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामि’ इति गर्भिण्येव भवति ॥ ११ ॥ | जिस पत्नीके सम्बन्धमें ऐसी इच्छा हो कि यह गर्भ धारण करे उसकी योनिमें…इत्यादि अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये। पूर्व मन्त्रके विपरीत पहले अपानन क्रिया करके 'इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामि' इस मन्त्रके द्वारा अभिप्राणन कर्म करे। ऐसा करनेसे वह गर्भवती ही होती है ॥ |


अथ यस्य जायायै जारः स्यात्तं चेद् द्विष्यादामापात्रेऽग्निमुपसमाधाय प्रतिलोमँ शरबर्हिस्तीर्त्वा तस्मिन्नेताः शरभृष्टीः प्रतिलोमाः सर्पिषाक्ता जुहुयान्मम समिद्धेऽहौषीः प्राणापानौ त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीः पुत्रपशूँस्त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीरिष्टासुकृते त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीराशापराकाशौ त आददेऽसाविति स वा एष निरिन्द्रियो विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रैति यमेवंविद् ब्राह्मणः शपति तस्मादेवंविच्छ्रोत्रियस्य दारेण नोपहासमिच्छेदुत ह्येवंवित् परो भवति ॥ १२ ॥

जिस गृहस्थ विद्वान्‌की पत्नीका किसी जार पुरुषसे सम्बन्ध हो, वह पति उस जारसे द्वेषभाव रखकर उसे दण्ड देना चाहे तो वह मिट्टीके कच्चे बर्तनमें [ पञ्चभूसंस्कारपूर्वक ] अग्नि-स्थापन करके विपरीत क्रमसे अर्थात् दक्षिणाग्र या पश्चिमाग्रभावसे सरकंडोंका बर्हिष बिछाकर उनकी बाणाकार सींकोंको घीसे भिगोकर उनके अग्रभागको विपरीत दिशामें ही रखते हुए उस अग्निमें उनकी चार आहुतियां दे। उन आहुतियोंके मन्त्र

१३४८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ६

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१३४८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ६


इस प्रकार हैं—] 'मम समिद्धेऽहौषीः प्राणापानौ त आददे※' [ यह मन्त्र पढ़कर 'फट्' शब्दका उच्चारण करके पहली आहुति दे, [ आहुतिके अन्तमें ] 'असौ मम शत्रुः' इस प्रकार बोलकर शत्रु का नाम लेना चाहिये। पूर्ववत् 'मम समिद्धेऽहौषीः पुत्रपशूंस्त आददे' यह मन्त्र बोलकर दूसरी आहुति दे और अन्तमें 'असौ⋯' कहकर शत्रु का नाम ले। इसी प्रकार 'मम समिद्धेऽहौषीरिष्टासुकृते त आददे' यह मन्त्र बोलकर तीसरी आहुति दे और अन्तमें 'असौ' कहकर शत्रु का नाम ले तथा 'मम समिद्धेऽहौषी-राशापराकाशौ त आददे' यह मन्त्र पढ़कर चौथी आहुति दे और पूर्ववत् 'असौ' कहकर शत्रुके नामका उच्चारण करे। इस प्रकार मन्थ कर्मको जाननेवाला प्राणदर्शी विद्वान् ब्राह्मण जिसको शाप देता है, वह इन्द्रिय-रहित एवं पुण्यहीन होकर इस लोकसे चल बसता है। अतः परस्त्रीगमनके इस भयंकर परिणामको जाननेवाला पुरुष किसी श्रोत्रियकी पत्नीसे समा-गमकी तो बात ही क्या है, परिहासकी भी इच्छा न करे; क्योंकि उक्त अभिचार कर्मको जाननेवाला श्रोत्रिय उसका शत्रु बन जाता है ॥ १२ ॥

| अथ पुनर्यस्य जायायै जार उपपतिः स्यात्तं चेद् द्विष्यादभि-चरिष्याम्येनमिति मन्येत तस्येदं कर्म। आमपात्रेऽग्निमुपसमाधाय सर्वं प्रतिलोमं कुर्यात्तस्मिन्नग्ना- | अब अभिचार कर्म बताते हैं। जिस गृहस्थ विद्वान्‌की पत्नीका कोई जार उपपति हो, वह पति उस जारसे यदि द्वेष रखता हो तथा इसके प्रति अभिचारका प्रयोग करूँगा, ऐसा निश्चित संकल्प रखता हो तो उसके लिये यह कर्म है। वह मिट्टीके कच्चे बर्तनमें [ पञ्चभूसंस्कारपूर्वक ] अग्नि-स्थापन करके सारी क्रिया विपरीत क्रमसे करे; यथा ईशानसे अग्निकोण- |


※ 'अरे ! यौवन आदिसे प्रकाशित मेरी पत्नीरूप प्रज्वलित अग्निमें तूने वीर्यकी आहुति डाली है, अतः मैं तुझ अपराधीके प्राण और अपानको लिये लेता हूँ।' चारों मन्त्रके अर्थ एक-से हैं। पहलेमें शत्रुके प्राण और अपानको, दूसरेमें पुत्र और पशुओंको, तीसरेमें यज्ञ और पुण्यको तथा चौथेमें प्रार्थना एवं प्रतिज्ञा-पूर्तिकी प्रतीक्षाके अपहरणकी बात कही गयी है।