श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३- सगेश्वर, भद्रेश्वर, शूलेश्वर, नारदेश्वर, वरणेश्वर तथा कोटीश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन
| ७७२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
तीसरा अध्याय
सगरेश्वर, भद्रेश्वर, शूलेश्वर, नारदेश्वर, वरणेश्वर तथा कोटीश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
|---|---|
| वायव्ये तु दिशाभागे तस्य पीठस्य सुन्दरि।<br>सगरेण पुरा देवि तस्मिन् देशे प्रतिष्ठितम्॥ १<br>चतुर्मुखं तु तल्लिङ्गं सर्वपापप्रणाशनम्। | हे सुन्दरि! हे देवि! उस पीठके वायव्य (पश्चिम-उत्तर) दिशाभागमें उस स्थानपर पूर्वकालमें सगरके द्वारा चार मुखवाला लिङ्ग स्थापित किया गया है; वह लिङ्ग समस्त पापोंका नाश करनेवाला है॥ १<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| तस्यैवोत्तरपूर्वेण नाम्ना वालीश्वरं शुभम्॥ २<br>वालिना स्थापितं लिङ्गं कपिना सुमहात्मना।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि तिर्यग्योनिं न गच्छति॥ ३ | उसीके उत्तर-पूर्वमें परम महात्मा कपि वालिके द्वारा वालीश्वर नामक शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य तिर्यक् (पशु-पक्षी)-योनि नहीं प्राप्त करता है॥ २-३॥ |
| तस्य चोत्तरदिग्भागे सुग्रीवस्य महात्मनः।<br>लिङ्गं तस्य शुभं भद्रे सर्वकिल्बिषनाशनम्॥ ४<br>तथा हनुमतात्रैव स्थापितं लिङ्गमुत्तमम्। | उसके उत्तर दिशाभागमें महात्मा सुग्रीवके द्वारा शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है; हे भद्रे! वह सभी पापोंका नाश करनेवाला है और यहींपर हनुमान्जीने भी उत्तम लिङ्गकी स्थापना की है॥ ४<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| सगरात्पश्चिमेनैव लिङ्गं तत्र प्रतिष्ठितम्॥ ५<br>मम भक्त्या च सुश्रोणि अश्विभ्यां परमेश्वरि। | हे सुश्रोणि! हे परमेश्वरि! वहींपर सगरेश्वरके पश्चिममें दोनों अश्विनीकुमारोंने भक्तिपूर्वक मेरे लिङ्गकी स्थापना की है॥ ५<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| तस्यैवोत्तरपार्श्वे तु भद्रदोहमिति स्मृतम्॥ ६<br>गवां क्षीरेण सञ्जातं सर्वपातकनाशनम्।<br>कपिलानां सहस्रस्य सम्यग्दत्तस्य यत्फलम्।<br>तत्फलं लभते मर्त्यः स्नातस्तत्र न संशयः॥ ७ | उसीके उत्तरभागमें भद्रदोह [लिङ्ग] बताया गया है; गायोंके दुग्धसे निर्मित वह लिङ्ग सभी पापोंका नाश करनेवाला है। उसमें स्नान किया हुआ मनुष्य हजार कपिला गायोंके दानका जो फल होता है, उस फलको प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ६-७॥ |
| पूर्वभाद्रपदायुकता पौर्णमासी यदा भवेत्।<br>तदा पुण्यतमः कालो ह्यश्वमेधफलप्रदः॥ ८ | पूर्वभाद्रपदसे युक्त पूर्णिमा जब हो, उस समयका पुण्यतम काल अश्वमेधयज्ञका फल देनेवाला होता है॥ ८॥ |
| ह्रदस्य पश्चिमे तीरे भद्रेश्वरमिति स्थितम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो भद्रे गोलोकं लभते ध्रुवम्॥ ९ | [उस] ह्रद (सरोवर)-के पश्चिम तटपर भद्रेश्वर [लिङ्ग] स्थित है; हे भद्रे! उसका दर्शन करके मनुष्य निश्चित रूपसे गोलोक प्राप्त करता है॥ ९॥ |
| भद्रेश्वरस्य दिग्भागे नैर्ऋते तु यशस्विनि।<br>उपशान्तशिवं नाम ख्यातं सर्वसुरासुरैः॥ १०<br>उपशान्तस्य देवस्य उत्तरे वरवर्णिनि।<br>चक्रेश्वरमिति ख्यातं सर्वदेवनमस्कृतम्॥ ११<br>पश्चिमाभिमुखं देवि ह्रदस्तस्यैव चाग्रतः।<br>तस्मिन् ह्रदे नरः स्नात्वा पूजयित्वा महेश्वरम्॥ १२<br>शिवलोकमवाप्नोति भावितेनान्तरात्मना। | हे यशस्विनि! भद्रेश्वरके नैर्ऋत्य दिशाभागमें उपशान्तशिव नामक लिङ्ग बताया गया है। हे वरवर्णिनि! उपशान्तदेवके उत्तरमें सभी देवताओंद्वारा नमस्कृत पश्चिमकी ओर मुखवाला चक्रेश्वरलिङ्ग कहा गया है। हे देवि! उसीके आगे [एक] सरोवर है; उस सरोवरमें स्नान करके तथा भक्तियुक्त मनसे महेश्वरकी पूजा करके मनुष्य शिवलोक प्राप्त करता है॥ १०-१२<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| तस्य पश्चिमदिग्भागे शूलेश्वरमिति स्थितम्॥ १३ | उसके पश्चिम दिशाभागमें शूलेश्वरलिङ्ग विराजमान |
अध्याय ३ ] सगरेश्वर, भद्रेश्वर, शूलेश्वर, नारदेश्वर, वरणेश्वर तथा कोटीश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन ७७३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शूलयन्त्रं पुरा न्यस्तं स्नानार्थं वरवर्णिनि।<br>ह्रदस्तत्र समुत्पन्नो देवदेवस्य चाग्रतः॥ १४<br>स्नानं कृत्वा ह्रदे तस्मिन् दृष्ट्वा शूलेश्वरं प्रभुम्।<br>रुद्रलोकमवाप्नोति त्यक्त्वा संसारसागरम्॥ १५ | है; पूर्वकालमें वहाँ शूलयन्त्र स्थापित किया गया है। हे वरवर्णिनि! वहाँ देवदेवके समक्ष स्नानके लिये ह्रद उत्पन्न हुआ है; उस ह्रदमें स्नान करके तथा भगवान् शूलेश्वरका दर्शनकर मनुष्य संसार-सागरका त्याग करके रुद्रलोक प्राप्त करता है॥ १३-१५॥ |
| शूलेश्वरस्य पूर्वेण अन्यदायतनं शुभम्।<br>तप्तं तत्र तपस्तीव्रं नारदेन सुरर्षिणा॥ १६<br>स्थापितं मम लिङ्गं तु कुण्डस्य पुरतः शुभम्।<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा वै नारदेश्वरम्॥ १७<br>संसारमाया या घोरा तां तरेन्नात्र संशयः।<br>नारदेशस्य पूर्वेण नाम्ना धर्मेश्वरं शुभम्॥ १८ | शूलेश्वरके पूर्वमें दूसरा शुभ आयतन (तीर्थ) स्थित है, देवर्षि नारदने वहाँ घोर तपस्या की थी। कुण्डके सामने मेरा [एक] शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है। उस कुण्डमें स्नान करके नारदेश्वरका दर्शन करके मनुष्य जो घोर संसारमाया है, उसे पार कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ १६-१७ १/२॥ |
| स्थापितं मम लिङ्गं तु कुण्डस्य पुरतः शुभे।<br>वायव्ये तु दिशाभागे तस्य देवस्य सुन्दरि॥ १९<br>विनायकमिति ख्यातं कुण्डं तत्र शुभोदकम्।<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चैव विनायकम्॥ २०<br>सर्वविघ्नविनिर्मुक्तो ह्यस्मिन् क्षेत्रे वसेच्चिरम्।<br>विनायकस्य संलग्न उत्तरेण यशस्विनि॥ २१ | हे शुभे! नारदेश्वरके पूर्वमें तथा कुण्डके सामने ही धर्मेश्वर नामक मेरा शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है। हे सुन्दरि! उन देवके वायव्य (पश्चिम-उत्तर) दिशाभागमें विनायक बताये गये हैं, वहाँपर पवित्र जलवाला एक कुण्ड है। उस कुण्डमें स्नान करके तथा विनायकका दर्शनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त होकर इस क्षेत्रमें चिरकालतक वास करता है॥ १८-२० १/२॥ |
| ह्रदस्तत्र सुविख्यातोऽमरको नाम नामतः।<br>दक्षिणेन तु कुण्डस्य मुखलिङ्गं तु तिष्ठति॥ २२<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चामरकेश्वरम्।<br>अज्ञानाच्चैव यत्किञ्चिदिह क्षेत्रे तु यत्कृतम्॥ २३<br>विलयं याति तत्सर्वं दृष्ट्वा तल्लिङ्गमुत्तमम्।<br>तस्य चोत्तरदिग्भागे नातिदूरे यशस्विनि॥ २४ | हे यशस्विनि! विनायकके समीपमें उत्तर दिशामें वहाँपर अति प्रसिद्ध ह्रद है और उस कुण्डके दक्षिणमें अमरक नामसे विख्यात मुखलिङ्ग स्थित है; उस कुण्डमें स्नान करके और उस उत्तम अमरकेश्वरलिङ्गका दर्शन करके [मनुष्यके द्वारा] इस क्षेत्रमें अज्ञानपूर्वक जो भी [पाप] किया गया रहता है, वह सब नष्ट हो जाता है॥ २१-२३ १/२॥ |
| वरणायास्तटे शुद्धे लिङ्गं तत्रैव संस्थितम्।<br>वरणेश्वरं तु विख्यातं पश्चिमाभिमुखं स्थितम्॥ २५<br>तस्मिन् पाशुपतः सिद्ध अश्वपादो यशस्विनि।<br>अनेनैव शरीरेण शाश्वतीं सिद्धिमङ्गतः॥ २६ | हे यशस्विनि! उसके उत्तर दिशामें वहींपर समीपमें ही वरणाके पवित्र तटपर एक लिङ्ग स्थित है; वरणेश्वर नामसे विख्यात वह लिङ्ग पश्चिमाभिमुख स्थित है॥ २४-२५॥<br>हे यशस्विनि! अश्वपाद नामक सिद्ध पाशुपत उसमें इसी शरीरसे शाश्वत सिद्धिको प्राप्त हुए हैं॥ २६॥ |
| ममापि तत्र सान्निध्यं तस्मिँल्लिङ्गे यशस्विनि।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि गन्धर्वत्वं च विन्दति॥ २७ | हे यशस्विनि! वहाँ उस लिङ्गमें [सदा] मेरा भी सान्निध्य रहता है; हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे गन्धर्वत्वकी प्राप्ति होती है॥ २७॥ |
| तस्य पश्चिमदिग्भागे नाम्ना शैलेश्वरं शुभम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि पूर्वोक्तं लभते फलम्॥ २८ | हे देवि! उसके पश्चिम दिशाभागमें शैलेश्वर नामक शुभ लिङ्ग है; उसका दर्शन करके मनुष्य पूर्वोक्त [समस्त] फल प्राप्त करता है॥ २८॥ |
४- कपालमोचन, ऋणमोचन एवं कपिलेश्वर आदि तीर्थोंका माहात्म्य
| ७७४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| दक्षिणे चापि तस्यैव कोटीश्वरमिति स्थितम्।<br>यत्र सा दृश्यते देवि विश्रुता भीष्मचण्डिका॥ २९ | हे देवि! उसीके दक्षिणमें कोटीश्वर [नामक] लिङ्ग भी स्थित है, जहाँ वे प्रसिद्ध भीष्मचण्डिका दिखायी देती हैं॥ २९॥ |
| बीभत्सविकृते भीमे श्मशाने वसते सदा।<br>तेन सा प्रोच्यते देवि विश्रुता भीष्मचण्डिका॥ ३० | हे देवि! वे सदा बीभत्स रूपवाले भयानक श्मशानमें वास करती हैं, इसलिये वे प्रसिद्ध भीष्मचण्डिका कही जाती हैं॥ ३०॥ |
| कोटितीर्थेषु यः स्नात्वा कोटीश्वरमथार्चयेत्।<br>गवां कोटिप्रदानेन यत्फलं लभते नरः॥ ३१ | कोटितीर्थोंमें स्नान करके कोटीश्वरका पूजन करना चाहिये। हे सुन्दरि! मनुष्य करोड़ों गायोंके दानसे जो फल प्राप्त करता है, वह सम्पूर्ण फल उसे यहाँपर मात्र एक बार स्नान करनेसे प्राप्त हो जाता है॥ ३१ १/२॥ |
| तत्फलं सकलं तस्य स्नानेनैकेन सुन्दरि।<br>कोटीश्वरस्य पूर्वेण ऋषिभिश्चैः प्रतिष्ठितम्॥ ३२ | कोटीश्वरके पूर्वमें ऋषियोंके द्वारा एक लिङ्ग स्थापित किया गया है; उस लिङ्गके दर्शनसे चराचरसहित सम्पूर्ण जगत् दृष्टिगत हो जाता है॥ ३२-३३॥ |
| तेन लिङ्गेन दृष्टेन दृष्टं स्यात् सचराचरम्॥ ३३ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३॥
चौथा अध्याय
कपालमोचन, ऋणमोचन एवं कपिलेश्वर आदि तीर्थोंका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
|---|---|
| कोटीश्वरस्य देवस्य आग्नेय्यां दिशि संस्थितः।<br>श्मशानस्तम्भसंज्ञेति विख्यातः सुप्रतिष्ठितः॥ १ | देवकोटीश्वरके आग्नेय दिशामें प्रसिद्ध तथा सुप्रतिष्ठित श्मशानस्तम्भ स्थित है। वहाँपर वे मनुष्य गिराये जाते हैं, जिन्होंने इस लोकमें बुरा कर्म किया है॥ १ १/२॥ |
| मानवास्तत्र पात्यन्ते इह यैर्दुष्कृतं कृतम्।<br>यत्र स्तम्भे सदा देवि अहं तिष्ठामि भामिनि॥ २ | हे भामिनि! हे देवि! मैं उस स्तम्भमें सदा विराजमान हूँ। हे देवि! वहाँ जाकर जो मेरी पूजा करेगा, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जायगा और परम गति प्राप्त करेगा॥ २-३॥ |
| तत्र गत्वा तु यः पूजां मम देवि करिष्यति।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो गच्छेच्च परमां गतिम्॥ ३ | |
| अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि महातीर्थं यशस्विनि।<br>कपालमोचनं नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥ ४ | हे यशस्विनि! अब मैं तुम्हें तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध कपालमोचन नामक महातीर्थके विषयमें बताऊँगा॥ ४॥ |
| कपालं पतितं तत्र स्नातस्य मम सुन्दरि।<br>तस्मिन् स्नातो वरारोहे ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ ५ | हे सुन्दरि! वहाँ स्नान करते हुए मेरा कपाल गिर पड़ा था; हे वरारोहे! उसमें स्नान करनेवाला ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है॥ ५॥ |
| कपालेश्वरनामानं तस्मिंस्तीर्थे व्यवस्थितम्।<br>अश्वमेधमवाप्नोति दर्शनात्तस्य सुन्दरि॥ ६ | उस तीर्थमें कपालेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है; हे सुन्दरि! उसके दर्शनसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करता है॥ ६॥ |
| तस्यैव चोत्तरे पार्श्वे तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>तत्र स्नात्वा वरारोहे ऋणैर्मुक्त्तो भवेन्नरः॥ ७ | उसीके उत्तरमें पासमें ही त्रैलोक्यप्रसिद्ध एक तीर्थ है, हे वरारोहे! उसमें स्नान करके मनुष्य [सभी] ऋणोंसे मुक्त हो जाता है॥ ७॥ |
अध्याय ४] कपालमोचन, ऋणमोचन एवं कपिलेश्वर आदि तीर्थोंका माहात्म्य [७७५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋणमोचनकं नाम्ना विख्यातं भुवि सुन्दरि।<br>त्रीणि लिङ्गानि तिष्ठन्ति तत्रैव मम सुन्दरि॥ ८<br>तानि दृष्ट्वा तु सुश्रोणि नश्यति त्रिविधम् ऋणम्। | हे सुन्दरि! वह [तीर्थ] ऋणमोचन नामसे पृथ्वीलोकमें विख्यात है। हे सुन्दरि! वहींपर मेरे तीन लिङ्ग स्थित हैं; हे सुश्रोणि! उनका दर्शन करनेसे तीनों प्रकारके ऋण विनष्ट हो जाते हैं॥ ८ १/२॥ |
| दक्षिणे तु दिशाभागे तस्य तीर्थस्य सुन्दरि॥ ९<br>अङ्गारेश्वरनामानं मुखलिङ्गं व्यवस्थितम्।<br>पश्चिमाभिमुखं देवि कुण्डस्य पुरतः स्थितम्॥ १० | हे सुन्दरि! उस तीर्थके दक्षिण दिशाभागमें अंगारेश्वर नामक मुखलिङ्ग विराजमान है। हे देवि! पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग कुण्डके सामने स्थित है॥ ९-१०॥ |
| अङ्गारेण यदा योगश्चतुर्थ्यामष्टमीषु वा।<br>तीर्थे तस्मिन्नरः स्नात्वा दृष्ट्वा वै मङ्गलेश्वरम्॥ ११<br>व्याधिभिश्च विनिर्मुक्तो यत्र तत्राभिजायते। | जब अंगार [मंगल]-के साथ चतुर्थी अथवा अष्टमीका योग हो, तब उस तीर्थमें स्नान करके तथा मंगलेश्वरका दर्शन करके मनुष्य जहाँ-कहीं भी रहे, व्याधियोंसे पूर्णतः मुक्त हो जाता है॥ ११ १/२॥ |
| तस्यैव च समीपस्थमुत्तरेण यशस्विनि॥ १२<br>लिङ्गं तु सुमहत् पुण्यं विश्वकर्मप्रतिष्ठितम्।<br>पश्चिमाभिमुखं दृष्ट्वा सर्वज्ञत्वमवाप्नुयात्॥ १३ | हे यशस्विनि! इसीके समीप उत्तर दिशामें विश्वकर्माके द्वारा स्थापित महापुण्यप्रद पश्चिमाभिमुख लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य सर्वज्ञत्व प्राप्त कर लेता है॥ १२-१३॥ |
| बुधेश्वरं तु तत्रैव दृष्ट्वा भक्त्या दृढव्रतः।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति दृष्ट्वा देवं बुधेश्वरम्॥ १४ | वहींपर देव बुधेश्वरका भक्तिपूर्वक दर्शन करके दृढ व्रतवाला भक्त सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है॥ १४॥ |
| बुधेश्वराद्दक्षिणतो लिङ्गं चैव चतुर्मुखम्।<br>महामुण्डेश्वरं नाम सर्वसिद्धिप्रदायकम्॥ १५ | बुधेश्वरके दक्षिणमें सभी सिद्धियोंको देनेवाला महामुण्डेश्वर नामक चतुर्मुखलिङ्ग है॥ १५॥ |
| तस्य देवस्य पुरतः कूपस्तिष्ठति वै शुभः।<br>तस्य कूपस्य सा देवी उपरिष्टात् स्थिता शुभा॥ १६<br>स्नानार्थं तत्र सा क्षिप्ता माला मुण्डमयी मया।<br>तेन सम्प्रोच्यते देवि महामुण्डेति मानवैः॥ १७ | उन देवके समक्ष [एक] शुभ कूप विद्यमान है, उस कूपके ऊपर वे कल्याणमयी देवी विराजमान हैं। स्नानके लिये वहाँ मेरे द्वारा वह मुण्डमयी माला प्रक्षिप्त की गयी है, अतः हे देवि! मनुष्य उन्हें महामुण्डा कहते हैं॥ १६-१७॥ |
| खट्वाङ्गं तत्र वै क्षिप्तं स्नानार्थं वरवर्णिनि।<br>खट्वाङ्गेश्वर नाम्ना तु स्थितं तत्रैव सुव्रते॥ १८ | हे वरवर्णिनि! स्नानहेतु वहींपर खट्वांग भी प्रक्षिप्त किया गया है; हे सुव्रते! वहींपर खट्वांगेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है॥ १८॥ |
| भुवनेश्वरनाम्ना तु लिङ्गं देवि फलप्रदम्।<br>उत्तराभिमुखं लिङ्गं कुण्डाद्वै दक्षिणे तटे॥ १९<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा वै भुवनेश्वरम्।<br>न दुर्गतिमवाप्नोति कल्मषैश्च विमुच्यते॥ २० | हे देवि! वहाँ कुण्डके दक्षिण तटपर भुवनेश्वर नामक फलदायक लिङ्ग विराजमान है; वह लिङ्ग उत्तरकी ओर मुखवाला है। उस कुण्डमें स्नान करके तथा भुवनेश्वरका दर्शन करके मनुष्य दुर्गति नहीं प्राप्त करता है और पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १९-२०॥ |
| दक्षिणे भुवनेशस्य कुण्डमन्यच्च तिष्ठति।<br>नाम्ना विमलमीशं च लिङ्गं तस्यैव पूर्वतः॥ २१ | भुवनेश्वरके दक्षिणमें एक अन्य कुण्ड भी स्थित है, उसीके पूर्वमें विमलेश नामक लिङ्ग है॥ २१॥ |
| वैमल्यं तु नरा यान्ति तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्।<br>तत्र स्नात्वा वरारोहे मोदते दिवि देवतैः॥ २२ | उस लिङ्गके दर्शनसे मनुष्य शुद्ध हो जाते हैं। हे वरारोहे! वहाँ स्नान करके मनुष्य स्वर्गमें देवताओंके साथ आनन्दित रहता है॥ २२॥ |
| ७७६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| तस्मिन् पाशुपतः सिद्धस्त्र्यम्बको नाम वै मुनिः।<br>अनेनैव शरीरेण रुद्रलोकमवाप्नुयात्॥ २३ | उस स्थानपर त्र्यम्बक नामक सिद्ध पाशुपतमुनिने इसी शरीरसे रुद्रलोक प्राप्त किया था॥ २३॥ | | तस्याङ्गारककुण्डस्य पश्चिमेन यशस्विनि।<br>महदायतनं पुण्यं भृगुणा स्थापितं पुरा॥ २४<br>यस्तदायतनं दृष्ट्वा अर्चितं स्तुतिपूर्वकम्।<br>शिवलोकाच्च ते पुण्यान्न च्यवन्ति कदाचन॥ २५ | हे यशस्विनि! उस अंगारककुण्डके पश्चिममें पूर्व-कालमें महर्षि भृगुके द्वारा [एक] पुण्यप्रद विशाल आयतन (लिङ्ग) स्थापित किया गया है। उस लिङ्गका दर्शन करके जो लोग स्तुतिपूर्वक उसकी पूजा करते हैं, वे पुण्यमय शिवलोकसे कभी च्युत नहीं होते हैं॥ २४-२५॥ | | दक्षिणेन तु तस्यैव अन्यदायतनं शुभम्।<br>नन्दीश्वरवरात्मानं देवानामपि दुर्लभम्॥ २६<br>तस्य दर्शनमात्रेण व्रतं पाशुपतं लभेत्।<br>तत्र सिद्धो महात्मा वै कपिलर्षिर्महातपाः॥ २७<br>त्रिकालमर्चयद्देवं गुहाशायी यतात्मवान्।<br>एवं वर्षसहस्रेण तस्य तुष्टोऽस्म्यहं प्रिये॥ २८<br>मम देवि प्रसादेन साङ्ख्यवेत्ता महायशाः।<br>कपिलेश्वरस्याधस्ताद्गुहा तत्रैव संस्थिता।<br>तां गुहां वीक्षते यो वै न स पापेन लिप्यते॥ २९ | उसीके दक्षिणमें देवताओंके लिये भी दुर्लभ नन्दीश्वर नामक अन्य शुभ लिङ्ग स्थित है; उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य पाशुपतव्रत प्राप्त करता है। वहाँपर सिद्ध, महात्मा तथा महातपस्वी ऋषि कपिलने गुहामें रहकर जितेन्द्रिय होकर शिवजीकी त्रिकाल पूजा की थी, हे प्रिये! इस प्रकार एक हजार वर्षके अनन्तर मैं उनपर प्रसन्न हो गया और हे देवि! मेरी कृपासे वे महायशस्वी सांख्यवेत्ता हो गये। वहींपर कपिलेश्वरके नीचे [वह] गुहा स्थित है; जो उस गुहाका दर्शन करता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता है॥ २६—२९॥ | | देव्युवाच<br>कपिलेश्वरं कथं देवमोङ्कारेश्वरसंज्ञितम्।<br>कथयस्व प्रसादेन देवदेव महेश्वर॥ ३० | देवी बोलीं—हे देवदेव! हे महेश्वर! देव कपिलेश्वर किस प्रकार ओंकारेश्वर नामवाले हुए? कृपापूर्वक इसे बताइये॥ ३०॥ | | ईश्वर उवाच<br>त्रीणि लिङ्गानि गुह्यानि वाराणस्यां मम प्रिये।<br>येषां चैव तु सान्निध्यं मम चैव सुरेश्वरि॥ ३१ | ईश्वर बोले—हे प्रिये! हे सुरेश्वरि! वाराणसीमें मेरे तीन गुह्य लिङ्ग हैं, जिनमें मेरा सदा सान्निध्य रहता है॥ ३१॥ | | एवं चान्यप्रकारेण ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>क्रमान्मात्रा समुद्दिष्टा नन्दीशस्य तु सुन्दरि॥ ३२ | हे सुन्दरि! इस प्रकार क्रमसे ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वररूप तीन मात्राएँ नन्दीश्वरकी कही गयी हैं॥ ३२॥ | | अकारे च स्थितो विष्णुः पञ्चायतनसंस्थितः।<br>उकारो ब्रह्मणो रूपं तस्य दक्षिणतः प्रिये॥ ३३ | पंचायतनमें विराजमान विष्णु अकारमें स्थित हैं और हे प्रिये! ब्रह्माका रूप उकार उनके दक्षिणमें है॥ ३३॥ | | नन्दीशेश्वरनामाहमुत्तरेण व्यवस्थितः।<br>तं च देवि तदोङ्कारं मम रूपं सुरेश्वरि॥ ३४<br>मानवानां हितार्थाय तत्र स्थाने स्थितो ह्यहम्।<br>मत्स्योदर्यास्तु कूलेऽहमुत्तरे चोत्तरे प्रिये॥ ३५ | मैं नन्दीशेश्वर नामसे उत्तरमें स्थित हूँ। हे देवि! हे सुरेश्वरि! वही ओंकार मेरा रूप है, मनुष्योंके कल्याणके लिये मैं उस स्थानपर विराजमान हूँ॥ ३४ १/२॥ | | नन्दीशेश्वरनामाहमुत्तरेण व्यवस्थितः।<br>नन्दीशं परमं ब्रह्म नन्दीशं परमा गतिः॥ ३६<br>नन्दीशं परमं स्थानं दुःखसंसारमोचनम्।<br>अप्रकाशयमिदं कान्ते तव स्नेहात् प्रकाशितम्॥ ३७ | हे प्रिये! मैं मत्स्योदरीके उत्तर तटपर उत्तर दिशामें नन्दीशेश्वर नामसे स्थित हूँ। नन्दीश परम ब्रह्म हैं, नन्दीश परम गति हैं, नन्दीश परम पद हैं और वे दुःखरूप सागरसे मुक्ति दिलानेवाले हैं॥ ३५-३६ १/२॥ | | अन्यथा गोपनीयं तु मम भक्तिविवर्जिते।<br>युगे सप्तदशे देवि कृत्वा चैकां वसुन्धराम्॥ ३८ | हे कान्ते! यह रहस्य [सर्वथा] अप्रकाश्य है, मैंने तुम्हारे स्नेहके कारण इसे बताया है, मेरी भक्तिसे रहित व्यक्तिसे इसे गुप्त रखना चाहिये। हे देवि! सत्रहवें युगमें |
अध्याय ४ ] कपालमोचन, ऋणमोचन एवं कपिलेश्वर आदि तीर्थोंका माहात्म्य ७७७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| संहारं तु तपः कृत्वा अस्मिन् देशे समागतः।<br>ओङ्कारमूर्तिमास्थाय त्रिभेदेन स्थितो ह्यहम्॥ ३९ | सम्पूर्ण पृथ्वीको एक करके (जलाप्लावित करके) तथा संहाररूप तप करके मैं इस स्थानपर आ गया और ओंकाररूप धारणकर तीन रूपोंमें स्थित हो गया हूँ॥ ३७-३९॥ |
| सर्वेषामेव सिद्धानां तत् स्थानं परिकीर्तितम्।<br>तस्मिँल्लिङ्गं शिवः साक्षात् स्वयमेव व्यवस्थितः॥ ४० | वह सभी सिद्धोंका स्थान कहा गया है। उस लिङ्गमें स्वयं साक्षात् शिव विराजमान हैं॥ ४०॥ |
| पूर्वामुखं तु तं देवं सिद्धसङ्घैः प्रपूजितम्।<br>ओङ्कारेश्वरनामानं देवानामपि दुर्लभम्॥ ४१ | पूर्वकी ओर मुखवाला वह ओंकारेश्वर नामक लिङ्ग सिद्धोंके द्वारा पूजित है तथा देवताओंके लिये भी दुर्लभ है॥ ४१॥ |
| वामदेवस्तु सावर्णिर्घोरः कपिलस्तथा।<br>तत्र सिद्धिं परां प्राप्ता योगे पाशुपते स्थिताः॥ ४२ | वहाँपर वामदेव, सावर्णि, अघोर तथा कपिल पाशुपतयोगमें स्थित होकर परम सिद्धिको प्राप्त हुए॥ ४२॥ |
| अन्ये च ऋषयो देवा यक्षगन्धर्वगुह्यकाः।<br>युगे युगे गमिष्यन्ति तस्मिन् स्थाने स्थितः सदा॥ ४३ | अन्य ऋषि, देवता, यक्ष, गन्धर्व तथा गुह्यक युग-युगमें उस स्थानपर जायँगे, मैं सदा वहाँ स्थित रहूँगा। |
| दिव्या हि सा परा मूर्तिः कपिलेश्वरसंज्ञिता।<br>कदाचिदस्य देवस्य दर्शने जाह्नवी प्रिये॥ ४४ | कपिलेश्वर नामक वह मूर्ति परम दिव्य है॥ ४३<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥<br>हे प्रिये! कभी-कभी इन प्रभुके दर्शनके लिये गंगा मत्स्योदरी स्थानपर आती हैं, वहाँ स्नान करना मोक्षदायक होता है॥ ४४<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| मत्स्योदरीं समायाति तत्र स्नानं तु मोक्षदम्।<br>आराध्य कपिलेशं तु त्रैलोक्यपालनक्षमाः॥ ४५<br><br>भवन्ति पुरुषा देवि मम नित्यं च वल्लभाः।<br>ओङ्कारं तत्परं ब्रह्म सकलं निष्कलं स्थितम्॥ ४६ | हे देवि! कपिलेश्वरकी आराधना करके मनुष्य तीनों लोकोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हो जाते हैं और सदा मेरे प्रिय बने रहते हैं। वे ओंकारेश्वर परब्रह्म हैं और निष्कल होते हुए भी सकल (साकार)-रूपमें स्थित हैं॥ ४५-४६॥ |
| रुद्रलोकस्य तद्द्वारं रहस्यं परिकीर्तितम्।<br>कपिलेश्वरस्याधस्ताद्दक्षिणे वरवर्णिनि॥ ४७<br><br>मत्स्योदरीं समेष्यन्ति तीर्थानि सह सागरैः।<br>षष्टिकोटिसहस्राणि षष्टिकोटिशतानि च॥ ४८ | वह लिङ्ग रुद्रलोकका रहस्यमय द्वार कहा गया है। हे वरवर्णिनि! कपिलेश्वरके नीचे दक्षिणमें मत्स्योदरीमें साठ हजार करोड़ तथा साठ सौ करोड़ तीर्थ सभी सागरोंके साथ प्रत्येक पक्षकी अष्टमी तथा चतुर्दशी तिथिको आते हैं॥ ४७-४८<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| पक्षे पक्षे समेष्यन्ति चतुर्दश्यष्टमीषु च।<br>मत्स्योदर्यां यदा गङ्गा पश्चिमे कपिलेश्वरे॥ ४९<br><br>समायाति महादेवि स च योगः सुदुर्लभः।<br>तस्मिन् स्नानं महाभागे अश्वमेधसहस्रदम्॥ ५० | हे महादेवि! जब कपिलेश्वरके पश्चिममें मत्स्योदरीमें गंगा आती हैं, तब वह योग परम दुर्लभ होता है, हे महाभागे! उसमें [किया गया] स्नान हजार अश्वमेधयज्ञका फल देनेवाला होता है॥ ४९-५०॥ |
| तस्य लिङ्गस्य माहात्म्यं कपिलेशस्य कीर्तितम्।<br>न कस्यचिद्देयं च गोपनीयं प्रयत्नतः॥ ५१<br><br>तत्रैव अक्षरं ब्रह्म नादेयं परिकीर्तितम्॥ ५२ | [हे देवि!] उस कपिलेश्वरलिङ्गका माहात्म्य कह दिया गया। इसे जिस किसीको नहीं बताना चाहिये, अपितु प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिये, वहींपर नादेय अक्षर ब्रह्म कहा गया है॥ ५१-५२॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे कपिलेश्वरमाहात्म्ये ओङ्कारनिर्णयो नाम चतुर्थोऽध्यायः॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'कपिलेश्वरमाहात्म्यमें ओंकारनिर्णय' नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४॥
५- कपिलेश्वरमें सिद्धि प्राप्त करनेवाले मुनियोंका वर्णन
| ७७८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
पाँचवाँ अध्याय
कपिलेश्वरमें सिद्धि प्राप्त करनेवाले मुनियोंका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ईश्वर उवाच<br>तत्र स्थाने तु ये सिद्धास्तान् प्रवक्ष्याम्यहं पुनः।<br>महापाशुपता श्रेष्ठा मम पुत्रा महौजसः॥ १<br>अनन्यमनसः शुद्धाः सेवितोऽहं पुरा सदा। | ईश्वर बोले—[हे देवि!] उस स्थानमें जो सिद्ध हुए हैं, अब मैं उनके विषयमें बताऊँगा। महापाशुपत, श्रेष्ठ, महातेजस्वी, अनन्य चित्तवाले तथा विशुद्धात्मा मेरे पुत्र वहाँ रहते हैं, उन्होंने पूर्वकालमें सदा मेरी सेवा की थी॥ १ १/२॥ |
| शीतातपविनिर्मुक्तं प्रासादैरुपशोभितम्॥ २<br>कैलासपृष्ठे देवस्य यादृग्देवि गृहं शुभम्।<br>तदभ्यधिकरूपं तु कृत्वा देवस्य मन्दिरम्॥ ३<br>सेव्यते सिद्धतुल्यैस्तु सर्वसिद्धानुकम्पिभिः।<br>तदा सिद्धिरनुप्राप्ता निर्वाणाया गतिः पुरा॥ ४ | हे देवि! कैलासशिखरपर शीत-आतपसे रहित तथा महलोंसे सुशोभित भगवान् शिवका जैसा सुन्दर भवन है, उससे भी अधिक रूपवाला शिवमन्दिर बनाकर सिद्धतुल्य तथा सभी सिद्धोंपर अनुकम्पा करनेवालोंके द्वारा वह स्थान सेवित होता है, उस समय जो निर्वाणगति है, उन्होंने उस सिद्धिको प्राप्त किया॥ २–४॥ |
| कपिलेश्वरस्य चैवाग्रे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्मृतम्।<br>उद्दालक ऋषिस्तत्र सिद्धिं परमिकां गतः॥ ५ | कपिलेश्वरके आगे पश्चिमाभिमुख लिङ्ग बताया गया है, वहाँ ऋषि उद्दालक परम सिद्धिको प्राप्त हुए थे॥ ५॥ |
| अन्यत् पश्चान्मुखं लिङ्गं स्थितं तत्र तथोत्तरे।<br>तस्मिँल्लिङ्गे तु संसिद्धः पाराशर्यो महामुनिः॥ ६ | वहाँ उत्तर दिशामें पश्चिमकी ओर मुखवाला दूसरा लिङ्ग भी स्थित है, उस लिङ्गमें महामुनि पाराशर्य (व्यास) पूर्ण रूपसे सिद्ध हुए॥ ६॥ |
| अन्यत्तत्रैव संलग्ने स्थितं पश्चान्मुखं शुभम्।<br>तस्मिन्नायतने सिद्धो महाज्ञानी हि बाष्कलिः॥ ७ | वहींपर समीपमें पश्चिमकी ओर मुखवाला दूसरा शुभ लिङ्ग विराजमान है, उस स्थानपर बाष्कलि [मुनि] सिद्ध तथा महाज्ञानी हुए॥ ७॥ |
| तस्यैव तु समीपस्थं स्थितं पूर्वामुखं प्रिये।<br>तत्र पाशुपतः सिद्धो भाववृत्तस्तु वै मुनिः॥ ८ | हे प्रिये! उसीके समीपमें [अन्य] पूर्वमुख लिङ्ग स्थित है, वहाँ पशुपतिके भक्त मुनि भाववृत्त सिद्ध हुए॥ ८॥ |
| तस्यैव पश्चिमे देवि मुखलिङ्गं तु तिष्ठति।<br>तत्र सिद्धिं परां प्राप्त अरुणिर्नाम नामतः॥ ९ | हे देवि! उसीके पश्चिममें मुखलिङ्ग स्थित है, वहाँ अरुणि नामवाले ऋषिने परम सिद्धि प्राप्त की॥ ९॥ |
| पश्चिमे अरुणीशस्य अन्यल्लिङ्गं तु तिष्ठति।<br>अस्मिन् पाशुपताचार्यो योगसिद्धो महामुनिः॥ १०<br>अन्यत्तत्रैव संलग्नं दक्षिणे लिङ्गमुत्तमम्।<br>तत्र सिद्धिं गतो देवि कौस्तुभो नाम वै ऋषिः॥ ११ | अरुणीशके पश्चिममें दूसरा लिङ्ग भी स्थित है, यहाँपर महामुनि पाशुपताचार्य योगमें सिद्ध हुए। वहींपर दक्षिण दिशामें समीपमें ही एक दूसरा उत्तम लिङ्ग विराजमान है, हे देवि! वहाँपर कौस्तुभ नामक ऋषिने सिद्धि प्राप्त की॥ १०-११॥ |
| तस्य दक्षिणपार्श्वे तु लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>महापाशुपतः सिद्धः सावणिस्तत्र वै मुनिः॥ १२ | उसके दक्षिण भागमें पूर्वकी ओर मुखवाला लिङ्ग स्थित है, वहाँ महापाशुपत मुनि सावणि सिद्ध हुए॥ १२॥ |
| तस्याग्रे तु महल्लिङ्गं स्थितं पूर्वामुखं शुभम्।<br>अस्मिँल्लिङ्गे शिवः साक्षात् स्वयमेव व्यवस्थितः॥ १३ | उसके आगे पूर्वकी ओर मुखवाला महान् तथा |
६- श्रीकण्ठ, ओंकारेश्वर और बृहस्पतीश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन
अध्याय ६ ] श्रीकण्ठ, ओंकारेश्वर और बृहस्पतीश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन ७७९
| ओङ्कारमूर्तिमास्थाय स्थितोऽहं तत्र सुव्रते।<br>चत्वारो मुनयः सिद्धास्तस्मिँल्लिङ्गे यशस्विनि॥ १४<br><br>वामदेवस्तु सावर्णिर्घोरः कपिलस्तथा।<br>तस्मिँल्लिङ्गे तु संसिद्धा नन्दीशस्य प्रभावतः॥ १५ | उत्तम लिङ्ग स्थित है। इस लिङ्गमें स्वयं साक्षात् शिव व्यवस्थित हैं, हे सुव्रते! मैं ओंकारमूर्ति धारण करके वहाँ स्थित हूँ। हे यशस्विनि! उस लिङ्गमें चार मुनि सिद्ध हुए हैं। वामदेव, सावर्णि, अघोर तथा कपिल उस लिङ्गमें नन्दीशके प्रभावसे सिद्ध हुए॥ १३-१५॥ |
| तस्य देवस्य चाधस्ताद्गुहा सिद्धैस्तु वन्दिता।<br>श्रीमुखी नाम सा ज्ञेया योगसिद्धैस्तु सेविता॥ १६ | उन प्रभुके नीचे सिद्धोंद्वारा वन्दित एक गुहा है, योगसिद्धोंके द्वारा सेवित उस गुहाको श्रीमुखी नामवाली जानना चाहिये॥ १६॥ |
| तत्र पाशुपताः श्रेष्ठा मम लिङ्गार्चने रताः।<br>तेषां चैव निवासार्थं सा गुहा निर्मिता मया॥ १७ | वहाँ श्रेष्ठ पाशुपत [भक्त] मेरे लिङ्गार्चनमें संलग्न रहते हैं, मैंने उन्हींके निवासके लिये उस गुहाका निर्माण किया है॥ १७॥ |
| तस्य द्वारे तु सुश्रोणि सिद्ध अघोरो महामुनिः।<br>अनेनैव शरीरेण रुद्रत्वं गतवान् मुनिः॥ १८ | हे सुश्रोणि! उसके द्वारपर महामुनि अघोर सिद्ध हुए हैं, वे मुनि इसी शरीरसे रुद्रत्वको प्राप्त हुए॥ १८॥ |
| तत्र गत्वा त्रिरात्रं तु क्षपयेदेकमानसः।<br>नरो वा यदि वा नारी संसारं न विशेत् पुनः॥ १९ | वहाँ जाकर कोई पुरुष अथवा स्त्री यदि एकाग्रचित्त होकर [उपवासपूर्वक] तीन रात व्यतीत करे, तो वह पुनः संसारमें प्रवेश नहीं करता है॥ १९॥ |
| अघोरेश्वरदेवस्य चोत्तरे कूपमुत्तमम्।<br>तस्योपस्पर्शनाद्देवि वाजपेयं च विन्दति॥ २० | अघोरेश्वरदेवके उत्तरमें एक उत्तम कूप स्थित है, हे देवि! उसमें स्नान करनेसे वाजपेययज्ञका फल प्राप्त होता है॥ २०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनावर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५॥
छठा अध्याय
श्रीकण्ठ, ओंकारेश्वर और बृहस्पतीश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
|---|---|
| अन्यदायतनं वक्ष्ये वाराणस्यां सुरेश्वरि।<br>यत्र साक्षात्स्वयं भद्रे रममाणं तु सर्वदा॥ १ | हे सुरेश्वरि! हे भद्रे! अब मैं वाराणसीमें स्थित अन्य आयतनका वर्णन करूँगा, जहाँ सर्वदा साक्षात् स्वयं मैं विहार करता हूँ॥ १॥ |
| मत्स्योदरीतटे रम्ये सुरसिद्धनमस्कृते।<br>रोचते मे सदा वासस्तस्मिन्नायतने शुभे॥ २ | मत्स्योदरीके मनोहर तटपर देवताओं तथा सिद्धोंद्वारा नमस्कृत उस शुभ आयतनमें सदा निवास करना मुझे अच्छा लगता है॥ २॥ |
| स्थानानामेव सर्वेषामतिरम्यं मम प्रियम्।<br>यत्र पाशुपता देवि मम लिङ्गार्चने रताः॥ ३<br><br>मम पुत्रास्तु ते सर्वे ब्रह्मचर्येण संयुताः।<br>शान्ता दान्ता जितक्रोधा सिद्धास्तत्र न संशयः॥ ४ | हे देवि! वह सभी स्थानोंसे अधिक रम्य तथा मुझे [अत्यन्त] प्रिय है, जहाँ पशुपतिके भक्त मेरे लिङ्गार्चनमें रत रहते हैं। वहाँ ब्रह्मचर्यसे युक्त, शान्त, जितेन्द्रिय तथा क्रोधपर विजय प्राप्त किये हुए वे मेरे सभी पुत्र सिद्ध हुए हैं, इसमें सन्देह नहीं है॥ ३-४॥ |
७८० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट ---|--- लोभादिविषयासक्तो नरकाच्च निवर्तते।<br>मम लिङ्गानि पुण्यानि पूजयति सदात्र यः॥ ५ | यहाँपर जो सदा मेरे पुण्यप्रद लिङ्गकी पूजा करता है, वह लोभ आदि विषयोंमें आसक्त होनेपर भी नरकसे छूट जाता है॥ ५॥ तेषां मध्ये तु तत्रैव लिङ्गं वै पश्चिमामुखम्।<br>श्रीकण्ठनाम विख्यातं कपिलेश्वरदक्षिणे॥ ६<br>तस्मिन् पाशुपतः सिद्धः ऋतुध्वज इति स्मृतः।<br>मम चैव प्रसादेन योगैश्वर्यमवाप्नुयात्॥ ७ | उनके मध्यमें वहींपर कपिलेश्वरके दक्षिणमें श्रीकण्ठ नामसे विख्यात पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, उसमें पाशुपत ऋतुध्वज सिद्ध हुए हैं—ऐसा कहा गया है, और उन्होंने मेरी कृपासे योगैश्वर्य प्राप्त किया था॥ ६-७॥ तस्यैव चाग्रतो भद्रे लिङ्गं पूर्वमुखं स्थितम्।<br>तस्मिँल्लिङ्गे तु जाबालः सिद्धिं परमिकां गतः॥ ८ | हे भद्रे! उसीके आगे पूर्वकी ओर मुखवाला लिङ्ग स्थित है, उस लिङ्गमें [ऋषि] जाबाल परम सिद्धिको प्राप्त हुए॥ ८॥ अपरं चैव लिङ्गं तु तस्य दक्षिणतः स्थितम्।<br>ओङ्कारेश्वरनामानं देवाना मपि दुर्लभम्॥ ९<br>तत्र सिद्धिं परां प्राप्तो मुनिः कालिकवृक्षिकः।<br>सर्वेषामेव सिद्धानामुत्तमोत्तमसंस्थितः॥ १० | उसके दक्षिणमें देवताओंके लिये भी दुर्लभ ओंकारेश्वर नामक दूसरा लिङ्ग स्थित है, वहाँ मुनि कालिकवृक्षिक परम सिद्धिको प्राप्त हुए और सभी सिद्धोंमें श्रेष्ठतम हो गये॥ ९-१०॥ तस्यैव दक्षिणे भद्रे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>तस्मिँल्लिङ्गे तु संसिद्धो गार्ग्यश्च सुमहातपाः॥ ११ | हे भद्रे! उसीके दक्षिणमें पश्चिमकी ओर मुखवाला [एक] लिङ्ग स्थित है, उस लिङ्गमें परम तपस्वी गार्ग्य सिद्ध हुए हैं॥ ११॥ पञ्चायतनमेतं ते मया च कथितं शुभे।<br>न कस्यचिन्मयाख्यातं रहस्यं परमाद्भुतम्॥ १२ | हे शुभे! मैंने तुमसे इस पंचायतनका वर्णन किया, मैंने इस अत्यन्त अद्भुत रहस्यको किसीको भी नहीं बताया है॥ १२॥ पञ्चब्रह्मेति विख्यातमेतदद्यापि सुन्दरि।<br>एतस्मात्कारणाद्देवि पञ्चायतनमुच्यते॥ १३ | हे सुन्दरि! यह आज भी पंचब्रह्म नामसे विख्यात है, हे देवि! इसी कारणसे इसे पंचायतन कहा जाता है॥ १३॥ चतुराश्रमिणां पुण्यं यत्फलं प्रतिपद्यते।<br>तत्फलं सकलं प्रोक्तं पञ्चायतनदर्शनात्॥ १४ | चारों आश्रमियोंके लिये जो भी पुण्यफल कहा गया है, वह समस्त फल पंचायतनका दर्शन करनेमात्रसे बताया गया है॥ १४॥ इदं पाशुपतं श्रेष्ठं मदीयव्रतचारिणाम्।<br>योगिनां मोक्षलिप्सूनां संसारभयनाशनम्॥ १५ | मेरा व्रत करनेवालोंके लिये यह श्रेष्ठ पाशुपतव्रत है और मोक्षकी इच्छावाले योगियोंके लिये संसारभयका नाश करनेवाला है॥ १५॥ नराणामल्पबुद्धीनां पापोपहतचेतसाम्।<br>भेषजं परमं प्रोक्तं पञ्चायतनमुत्तमम्॥ १६ | यह उत्तम पंचायतन अल्प बुद्धिवाले तथा पापसे नष्ट चित्तवाले मनुष्योंके लिये महान् औषध कहा गया है। तस्माद्यत्नं सदा कुर्यात्पञ्चायतनदर्शने।<br>पञ्चायतनसामीप्ये कूपस्तिष्ठति सुन्दरि॥ १७ | अतः पंचायतनके दर्शनका सदा प्रयत्न करना चाहिये। हे सुन्दरि! पंचायतनके समीपमें एक कूप स्थित है, उस तस्मिन् कूप उपस्पृश्य दीक्षाफलमवाप्नुयात्।<br>तस्मिन् दक्षिणदिग्भागे रुद्रवासः प्रकीर्तितः॥ १८ | कूपमें मार्जन-स्नान करके मनुष्य [शिव-] दीक्षाका फल
अध्याय ६ ] श्रीकण्ठ, ओंकारेश्वर और बृहस्पतीश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन ७८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्राप्त करता है। उसके दक्षिण दिशाभागमें रुद्रवास कहा गया है॥ १६-१८॥ | |
| रुद्रस्योत्तरपार्श्वे तु पञ्चायतनदक्षिणे।<br>तत्र कुण्डं महत् प्रोक्तं महापातकनाशनम्॥ १९<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा अभीष्टं फलमाप्नुयात्।<br>चतुर्दश्यां यदा योग आर्द्रानक्षत्रसंयुतः॥ २०<br>तदा पुण्यतमः कालस्तस्मिन् स्नाने महाफलम्।<br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा रुद्रं च भामिनि॥ २१<br>यत्र तत्र मृतो देवि रुद्रलोकं तु गच्छति। | वहॉँपर रुद्रके उत्तरभागमें तथा पंचायतनके दक्षिणमें महापापोंका नाश करनेवाला एक विशाल कुण्ड बताया गया है, उस कुण्डमें स्नान करके मनुष्य अभीष्ट फल प्राप्त करता है। जब चतुर्दशी तिथिमें आर्द्रा नक्षत्रसे संयुक्त योग हो, तब पुण्यतम काल होता है, उस समय उस [कुण्ड]-में स्नान करनेसे महान् फल होता है। हे भामिनि! हे देवि! उस तीर्थमें स्नान करके तथा रुद्रका दर्शन करके जहाँ कहीं भी मनुष्य मरता है, [तत्काल] रुद्रलोकको जाता है॥ १९-२१ १/२॥ |
| पूर्वामुखस्थितश्चाहं तस्मिँल्लिङ्गे महेश्वरि॥ २२<br>रुद्राणां कोटिजप्येन यत्फलं प्रतिपद्यते।<br>तत्फलं लभते भद्रे तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्॥ २३ | हे महेश्वरि! मैं उस लिङ्गमें पूर्वकी ओर मुख किये हुए स्थित हूँ। हे भद्रे! करोड़ों रुद्रोंका जप करनेसे जो फल होता है, वह फल उस लिङ्गके दर्शनसे प्राप्त हो जाता है॥ २२-२३॥ |
| रुद्रस्य च समीपे तु ऋषिभिः स्थापितानि च।<br>लिङ्गानि मम सुश्रोणि सर्वकामफलानि च॥ २४<br>रुद्रस्य नैर्ऋते भागे महालयमिति स्मृतम्।<br>दर्शनाच्च पदं तस्य महाभाग्यस्य सुन्दरि॥ २५ | हे सुश्रोणि! रुद्रके समीपमें समस्त वांछित फल प्रदान करनेवाले [अनेक] लिङ्ग ऋषियोंके द्वारा स्थापित किये गये हैं। रुद्रके नैर्ऋत्य दिशामें महालय बताया गया है, हे सुन्दरि! उसके दर्शनसे महाभाग्यका पद प्राप्त होता है॥ २४-२५॥ |
| तत्र स्थाने शुभे रम्ये स्वयं तिष्ठति पार्वती।<br>तस्यैव चाग्रतो देवि कूपस्तिष्ठति निर्मलम्॥ २६<br>पितरस्तत्र तिष्ठन्ति ये दिव्या ये च मानुषाः।<br>तस्मिन् कूप उपस्पृश्य जलं सङ्गृह्य भामिनि॥ २७ | उस शुभ तथा रम्य स्थानपर स्वयं पार्वती विराजमान हैं। हे देवि! उसीके आगे निर्मल कूप स्थित है। जो दिव्य तथा मानुष पितर हैं, वे वहाँ रहते हैं। हे भामिनि! हे देवि! मेरे लोककी इच्छा रखनेवालेको चाहिये कि उस कूपमें स्नान करके जल लेकर वहाँ पिण्डदान करे॥ २६-२७ १/२॥ |
| पिण्डस्तत्र प्रदातव्यो मम देवि पदस्पृहः।<br>श्राद्धं तत्र प्रकुर्वीत अन्नाद्येनोदकेन च॥ २८<br>पिण्डः कूपे तु तत्रैव प्रेक्षप्तव्यः शुभानने।<br>एवं कृत्वा तु यस्तस्मिंस्तीर्थे रुद्रमहाालये॥ २९<br>एकविंशकुलोपेतो रुद्रलोकं स गच्छति।<br>तत्र वैतरणी नाम दीर्घिका पश्चिमामुखी॥ ३०<br>तस्यां स्नात्वा वरारोहे नरकं न च पश्यति। | हे शुभानने! अन्न आदिसे तथा उस जलसे श्राद्ध करना चाहिये और वहींपर कूपमें पिण्डको छोड़ देना चाहिये। जो उस रुद्रमहालय तीर्थमें इस प्रकारसे [श्राद्ध] करता है, वह [अपनी] इक्कीस पीढ़ियोंसहित रुद्रलोकको जाता है। वहाँपर पश्चिमकी ओर मुखवाली वैतरणी नामक दीर्घिका (बावली) है, हे वरारोहे! उसमें स्नान करके मनुष्यको नरक नहीं देखना पड़ता है॥ २८-३० १/२॥ |
| खण्डस्फुटितसंस्कारं यस्तत्र कुरुते शुभे॥ ३१<br>रुद्रलोकोऽक्षयस्तस्य सर्वकालं यशस्विनि।<br>महाालयस्योत्तरेण लिङ्गानि सुमहन्ति च॥ ३२ | हे शुभे! हे यशस्विनि! जो वहाँपर खण्डस्फुटित-संस्कार करता है, उसे सदाके लिये अक्षय रुद्रलोक प्राप्त होता है। महालयके उत्तरमें अति महान् लिङ्ग विद्यमान |
७- कामेश्वर, भीष्मेश्वर, बालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेश्वर, दधीचेश्वर तथा कालेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन
| ७८२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
| देवैः सर्वैर्महाभागैः स्थापितानि शुभार्थिभिः। | हैं, जो मंगलकी कामनावाले सभी महाभाग्यशाली देवताओंके द्वारा स्थापित किये गये हैं॥ ३१-३२१/२॥ |
| पश्चिमे तु दिशाभागे रुद्रकुण्डस्य भामिनि॥ ३३<br><br>लिङ्गं तत्र स्थितं शुभ्रं देवाचार्य प्रतिष्ठितम्।<br>बृहस्पतीश्वरं नाम सर्वदुःखविनाशनम्॥ ३४ | हे भामिनि! वहाँ रुद्रकुण्डके पश्चिम दिशाभागमें एक शुभ्र लिङ्ग स्थित है, सभी दुःखोंका नाश करनेवाला बृहस्पतीश्वर नामक वह लिङ्ग देवताओंके आचार्य (बृहस्पति)-के द्वारा स्थापित किया गया है॥ ३३-३४॥ |
| पितृभिः स्थापितं लिङ्गं तटे कूपस्य दक्षिणे।<br>तेन पूजितमात्रेण पितरस्तृप्तिमाप्नुयुः॥ ३५ | कूपके दक्षिण तटपर पितरोंके द्वारा [एक] लिङ्ग स्थापित किया गया है, उसके पूजनमात्रसे पितर तृप्त हो जाते हैं॥ ३५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६॥
सातवाँ अध्याय
कामेश्वर, भीष्मेश्वर, वालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर, दधीचेश्वर तथा कालेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
|---|---|
| अन्यदायतनं श्रेष्ठं कालिपुर्य्यां सुरेश्वरि।<br>दक्षिणेन स्थितं देवं रुद्रवासस्य सुन्दरि॥ १<br><br>कामेश्वरमिति ख्यातं सर्वकामफलप्रदम्। | —हे सुरेश्वरि! हे सुन्दरि! कालिपुरीमें रुद्रवासके दक्षिणमें दूसरा श्रेष्ठ आयतन भी स्थित है, कामेश्वर नामसे विख्यात वह लिङ्ग सभी कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला है॥ १ १/२ ॥ |
| तप्तं तत्र तपस्तीव्रं कामदेवेन वै पुरा॥ २<br><br>कुण्डं तदुद्भवं देवि पद्मोत्पलसमन्वितम्।<br>कुण्डस्यैव तटे रम्ये उत्तमे वरवर्णिनि॥ ३<br><br>लिङ्गं तत्र स्थितं दिव्यं पश्चिमाभिमुखं प्रिये।<br>गन्धधूपनमस्कारैर्मुखवाद्यैश्च सर्वशः॥ ४<br><br>यो मामर्चयते तत्र तस्य तुष्याम्यहं सदा।<br>तुष्टे तु मयि देवेशि सर्वान् कामाँल्लभेत सः॥ ५ | पूर्वकालमें वहाँ कामदेवने घोर तपस्या की थी, इससे हे देवि! कमलोंसे युक्त एक कुण्ड वहाँ उत्पन्न हो गया। हे वरवर्णिनि! हे प्रिये! वहाँ कुण्डके ही रम्य तथा उत्तम तटपर पश्चिमकी ओर मुखवाला दिव्य लिङ्ग स्थित है। वहाँपर जो [व्यक्ति] गन्ध, धूप, नमस्कार तथा मुखवादनके द्वारा विधिवत् मेरा अर्चन करता है, उसके ऊपर मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ, हे देवेशि! मेरे प्रसन्न हो जानेपर वह सभी इच्छित फलोंको प्राप्त कर लेता है॥ २—५॥ |
| ततः प्रभृति वै तस्मिन्नन्येऽपि सुरपुङ्गवाः।<br>आराधयन्तो मां तस्मिंस्तीर्थं वक्तुं महातपाः॥ ६ | उसी समयसे दूसरे श्रेष्ठ देवता भी उस लिङ्गमें मेरी आराधना करते हुए वहाँ निवास करते हैं, महान् तपस्वी भी उस तीर्थके माहात्म्यका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं॥ ६॥ |
| यस्य यस्य यदा कामस्तत्र तं तं ददाम्यहम्।<br>ददामि सर्वकामांश्च धर्मं मोक्षं तथैव च॥ ७ | जिस किसीकी भी जो कामना होती है, मैं उस कामनाको पूर्ण करता हूँ। मैं सभी कामनाओं, धर्म तथा मोक्षको प्रदान करता हूँ॥ ७॥ |
| अध्याय ७] कामेश्वर, भीष्मेश्वर, वालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन | ७८३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्मादन्येऽपि ये केचित्तीर्थे तस्मिन् जनाः स्थिताः।<br>आराधयन्ते देवेशं कामेशं चैव सर्वदा॥ ८ | अतः अन्य जो कोई भी लोग उस तीर्थमें रहते हैं, वे देवेश कामेश्वरकी सदा आराधना करते हैं॥ ८॥ |
| यो यस्य मनसः कामः तं तमाप्नोति निश्चितम्।<br>कामेश्वरसमीपे तु दक्षिणे वरवर्णिनि॥ ९<br>तत्र स्नात्वा वरारोहे रुद्रस्यानुचरो भवेत्।<br>चैत्रे मासि सिते पक्षे त्रयोदश्यां तु मानवाः॥ १०<br>स्नानं ये च प्रकुर्वन्ति ते कामसदृशा नराः। | उस समय जिसकी जो भी कामना होती है, वह [व्यक्ति] उस-उस कामनाको निश्चित रूपसे प्राप्त करता है। हे वरवर्णिनि! कामेश्वरके समीपमें दक्षिणमें जो कुण्ड है, हे वरारोहे! चैत्रमासमें शुक्लपक्षकी त्रयोदशीको उसमें स्नान करके मनुष्य रुद्रका अनुचर हो जाता है। जो मनुष्य उसमें स्नान करते हैं, वे कामदेवके समान हो जाते हैं॥ ९-१०१/२॥ |
| कामेश्वरं सदा लिङ्गं योऽर्चयतीह मानवः॥ ११<br>लभेद्विद्याधरं लोकमेवमेव न संशयः। | जो मनुष्य यहाँपर कामेश्वरलिङ्गकी सदा पूजा करता है, वह विद्याधरलोक प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं है॥ १११/२॥ |
| कामेश्वरस्य पूर्वेण नाम्ना पञ्चालकेश्वरम्॥ १२<br>धनदस्य तु पुत्रेण पूजितोऽहं सुरेश्वरि।<br>क्षेत्रं मम प्रियं ज्ञात्वा तस्मिन् देशे व्यवस्थितः॥ १३<br>आराधयति मां नित्यं मम पूजारतः सदा।<br>पञ्चालेश्वरनामाहं तस्मिन् देशे व्यवस्थितः॥ १४<br>नराणां धनदानं तु करिष्यामि यशस्विनि। | कामेश्वरके पूर्वमें पंचालकेश्वर नामक लिङ्ग है, हे सुरेश्वरि! मैं वहाँ धनद (कुबेर)-के पुत्रके द्वारा पूजित हूँ। मेरा प्रिय क्षेत्र जानकर वह उस देशमें स्थित रहकर प्रतिदिन मेरी आराधना करता है और सदा मेरी पूजामें संलग्न रहता है। हे यशस्विनि! मैं उस स्थानमें पंचालश्वर नामसे स्थित हूँ और मनुष्योंको धनका दान करता हूँ॥ १२-१४१/२॥ |
| तत्र पूर्वमुखं देवि मुखलिङ्गं तु तिष्ठति॥ १५<br>पञ्चकेशवरनामाहं तत्र देवि प्रतिष्ठितः।<br>कूपस्तस्यैव चाग्रे तु पावनः सर्वदेहिनाम्॥ १६ | हे देवि! वहाँ पूर्वकी ओर मुखवाला मुखलिङ्ग विराजमान है, हे देवि! मैं वहाँ पंचकेश्वर नामसे स्थित हूँ। उसीके आगे सभी देहधारियोंको पवित्र करनेवाला एक कूप स्थित है॥ १५-१६॥ |
| तस्मिन् स्थाने स्थिता देवि अघोरेशेति नामतः।<br>मानवानां हितार्थाय स्वयं तत्र व्यवस्थिता॥ १७<br>नव लिङ्गानि गुह्यानि स्थापितानि तु किन्नरैः।<br>पञ्चकेशवरपूर्वेण दिवाकरनिशाकरौ॥ १८ | हे देवि! उस स्थानपर अघोरेशा—इस नामसे भगवती स्थित हैं, वे मनुष्योंके कल्याणके लिये वहाँ स्वयं विराजमान हैं। वहाँ किन्नरोंके द्वारा नौ गुह्य लिङ्ग स्थापित किये गये हैं। पंचकेश्वरके पूर्वमें सूर्य-चन्द्रलिङ्ग स्थित हैं॥ १७-१८॥ |
| लिङ्गानि तानि पुण्यानि सर्वपापहराणि च।<br>दक्षिणेन तु तस्यैव अन्धकेशेति नामतः॥ १९<br>तत्र लिङ्गं महत्पुण्यमन्धकेन प्रतिष्ठितम्।<br>मम चैव प्रसादेन गतोऽसौ परमां गतिम्॥ २० | वे लिङ्ग पुण्यप्रद तथा सभी पापोंको नष्ट करनेवाले हैं। वहाँपर उसीके दक्षिणमें अन्धकेश—इस नामवाला महापुण्यप्रद लिङ्ग है, यह अन्धकके द्वारा स्थापित किया गया है, मेरी कृपासे वह [अन्धक] वहाँ परम गतिको प्राप्त हुआ था॥ १९-२०॥ |
| पश्चिमे तु दिशाभागे तस्य देवस्य सुन्दरि।<br>नाम्ना देवेश्वरं लिङ्गं कामकुण्डस्य दक्षिणे॥ २१<br>अहमेव सदा भद्रे तस्मिन् स्थाने व्यवस्थितः।<br>भीष्मेश्वरं तु तत्रैव सिद्धेश्वरमतः परम्॥ २२ | हे सुन्दरि! उस देवके पश्चिम दिशाभागमें तथा कामकुण्डके दक्षिणमें देवेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है। हे भद्रे! मैं ही उस स्थानपर सदा विराजमान हूँ। वहींपर भीष्मेश्वर तथा सिद्धेश्वर स्थित हैं॥ २१-२२॥ |
| गङ्गेश्वरं तु तत्रैव यमुनेश्वरमेव च।<br>मण्डलेश्वरं तु तत्रैव उर्वशीलिङ्गमुत्तमम्॥ २३ | वहींपर गंगेश्वर तथा यमुनेश्वर हैं। वहींपर |
| ७८४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मण्डलेश्वर तथा उत्तम उर्वशीलिङ्ग विद्यमान हैं॥ २३ ॥ | |
| अन्यानि तत्र लिङ्गानि स्थापितानि महात्मभिः ।<br>तानि दृष्ट्वा तु मनुजः सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ २४ | [हे देवि!] वहाँपर महात्माओंके द्वारा अन्य लिङ्ग भी स्थापित किये गये हैं, उनका दर्शन करके मनुष्य सभी यज्ञोंका फल प्राप्त करता है॥ २४॥ |
| मण्डलेश्वरसामीप्ये मुखलिङ्गं च तिष्ठति ।<br>शान्तेन स्थापितं लिङ्गं सर्वपापहरं शुभम् ॥ २५ | मण्डलेश्वरके समीपमें मुखलिङ्ग स्थित है, सभी पापोंका नाश करनेवाला वह शुभ लिङ्ग 'शान्त' के द्वारा स्थापित किया गया है॥ २५॥ |
| वायव्ये तु दिशाभागे द्रोणेश्वरसमीपतः ।<br>वालखिल्येश्वरं नाम सुखदं सर्वदेहिनाम् ॥ २६ | वायव्य दिशाभागमें द्रोणेश्वरके समीप वालखिल्येश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वह सभी प्राणियोंको सुख देनेवाला है॥ २६॥ |
| तच्च पश्चान्मुखं लिङ्गं कामकुण्डस्य पश्चिमे ।<br>वालखिल्येश्वरं दृष्ट्वा सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ २७<br><br>तस्यैव चाग्रतो भद्रे मुखलिङ्गं च तिष्ठति ।<br>वाल्मीकेश्वरनामानं तं च दृष्ट्वा न शोचति ॥ २८ | कामकुण्डके पश्चिममें स्थित वह लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुखवाला है, वालखिल्येश्वरका दर्शन करके मनुष्य सभी यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। हे भद्रे! उसीके आगे वाल्मीकेश्वर नामक मुखलिङ्ग स्थित है, उसका दर्शन करके मनुष्य शोकयुक्त नहीं होता है॥ २७-२८॥ |
| तस्यैव कामकुण्डस्य पुरा संस्थापितं तटे ।<br>लिङ्गं तत्र महापुण्यं च्यवनेन प्रतिष्ठितम् ॥ २९<br><br>तस्य दर्शनमात्रेण ज्ञानवान् जायते नरः । | उसी कामकुण्डके तटपर पूर्वकालमें [महर्षि] च्यवनके द्वारा स्थापित किया गया महापुण्यप्रद लिङ्ग स्थित है, उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य ज्ञानी हो जाता है॥ २९ १/२॥ |
| वालखिल्येश्वरस्यैव दक्षिणे वरवर्णिनि ॥ ३०<br><br>नाम्ना वातेश्वरं देवं सर्वपातकनाशनम् ।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि वायुलोकं च गच्छति ॥ ३१ | हे वरवर्णिनि! वालखिल्येश्वरके दक्षिणमें सभी पापोंका नाश करनेवाला वातेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य वायुलोकको जाता है॥ ३०-३१॥ |
| अग्नीश्वरं तु तत्रैव भरतेशं तथैव च ।<br>वरुणेशं तथा चैव सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ ३२<br><br>एतान् दृष्ट्वा महादेवि यथेष्टां गतिमाप्नुयात् ।<br>अन्यदायतनं पुण्यं सनकेन प्रतिष्ठितम् ॥ ३३<br><br>सनकेश्वरनामानं सर्वसिद्धामरार्चितम् ।<br>तेन दृष्टेन देवेशि राजसूयफलं लभेत् ॥ ३४ | वहींपर अग्नीश्वर, भरतेश तथा सभी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला वरुणेश—ये लिङ्ग स्थित हैं, हे महादेवि! इनका दर्शन करके मनुष्य अभीष्ट गति प्राप्त करता है। वहाँ दूसरा पुण्यप्रद लिङ्ग भी स्थित है, जो [महामुनि] सनकके द्वारा स्थापित किया गया है, सनकेश्वर नामक वह लिङ्ग सभी सिद्धों तथा देवताओंके द्वारा पूजित है। हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य राजसूययज्ञका फल प्राप्त करता है॥ ३२-३४॥ |
| धर्मेश्वरं तु तत्रैव दक्षिणे वरवर्णिनि ।<br>नाम्ना धर्मेश्वरं देवं सर्वकामफलप्रदम् ॥ ३५ | हे वरवर्णिनि! वहींपर दक्षिण दिशामें धर्मेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वह धर्मेश्वरलिङ्ग सभी वांछित फलोंको प्रदान करनेवाला है। |
| अन्यत्तत्रैव लिङ्गं तु ऋषिभिः स्थापितं पुरा ।<br>सनकेश्वरस्योत्तरतो नाम्ना गरुडकेश्वरम् ॥ ३६<br><br>सिद्धिकामेन सुश्रोणि स्थापितं गरुडेन तु ।<br>गरुडेश्वरस्य पुरतः स्थापितं ब्रह्मसूनुना ॥ ३७ | वहींपर पूर्वकालमें ऋषियोंके द्वारा स्थापित किया गया अन्य लिङ्ग भी स्थित है। हे सुश्रोणि! सनकेश्वरके उत्तरमें गरुडकेश्वर नामक लिङ्ग है, जो सिद्धिकी इच्छावाले गरुडके द्वारा |
| अध्याय ७] कामेश्वर, भीष्मेश्वर, बालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन | ७८५ |
|---|---|
| स्थापित किया गया है॥ ३५-३६१/२॥ | |
| भक्त्या सनत्कुमारेण स्थापितोऽहं वरानने।<br>तेन दृष्टेन देवेशि ज्ञानवान् जायते नरः॥ ३८ | गरुडेश्वरके सामने एक लिङ्ग स्थित है, हे वरानने! ब्रह्माके पुत्र सनत्कुमारने भक्तिपूर्वक [वहाँ] मुझे स्थापित किया था, हे देवेशि! उस [लिङ्ग]-के दर्शनसे मनुष्य ज्ञानसम्पन्न हो जाता है॥ ३७-३८॥ |
| तस्यैव चोत्तरे पार्श्वे सनन्देन प्रतिष्ठितम्।<br>तस्य दर्शनमात्रेण प्राप्यते सिद्धिरुत्तमा॥ ३९ | उसीके उत्तरभागमें [मुनि] सनन्दके द्वारा स्थापित किया गया लिङ्ग है, उसके दर्शनमात्रसे उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है॥ ३९॥ |
| तस्यैव दक्षिणे पार्श्वे स्थापितं ह्यासुरिश्वरम्।<br>तथैव पञ्चशिखिना स्थापितं च महात्मना॥ ४० | उसीके दक्षिण भागमें आसुरीश्वर लिङ्ग स्थापित है, वह महात्मा पंचशिखिके द्वारा स्थापित किया गया है॥ ४०॥ |
| तस्य दक्षिणपार्श्वे तु नातिदूरे व्यवस्थितम्।<br>शनैश्चरेण तत्रैव मुखलिङ्गं प्रतिष्ठितम्॥ ४१<br><br>शनैश्चरेश्वरं नाम सर्वलोकनमसकृतम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि रोगैर्नैवाभिभूयते॥ ४२ | वहींपर उसके दक्षिणभागमें समीपमें ही शनैश्चरके द्वारा स्थापित किया गया मुखलिङ्ग स्थित है, वह शनैश्चरेश्वर नामक लिङ्ग सभी लोकोंद्वारा नमस्कृत है। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य रोगोंसे पीड़ित नहीं होता है॥ ४१-४२॥ |
| अन्यच्चैव महापुण्यं काशीपुर्यां महाशये।<br>मार्कण्डेयस्तु विख्यातो मम चैव सदा प्रियः॥ ४३ | हे महाशये! काशीपुरीमें अन्य महापुण्यप्रद लिङ्ग भी है, वह मार्कण्डेय नामसे विख्यात है और सर्वदा मेरा प्रिय है॥ ४३॥ |
| तस्य लिङ्गस्य चाग्रे तु पश्चिमेन यशस्विनि।<br>मार्कण्डेयह्रदो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥ ४४<br><br>मार्कण्डेयह्रदे स्नात्वा किं भूयः परिशोचति।<br>स्नानं दानं जपो होमः श्राद्धं च पितृतर्पणम्॥ ४५<br><br>तत्सर्वमक्षयं तत्र भवतीति न संशयः।<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चैव चतुर्मुखम्॥ ४६<br><br>रुद्रलोकः सदा तस्य पुनरावृत्तिदुर्लभः। | हे यशस्विनि! उस लिङ्गके आगे पश्चिममें तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध मार्कण्डेयह्रद (कुण्ड) है, मार्कण्डेयह्रदमें स्नान करके मनुष्य किसी प्रकारके शोकसे सन्तप्त नहीं रहता है। वहाँ किया गया स्नान, दान, जप, होम, श्राद्ध तथा पितृतर्पण—सब कुछ अक्षय होता है, इसमें सन्देह नहीं है। उस कुण्डमें स्नान करके तथा चतुर्मुखका दर्शन करके मनुष्य पुनर्जन्मकी प्राप्ति न करानेवाले रुद्रलोकको जाता है॥ ४४-४६१/२॥ |
| मार्कण्डेश्वरसामीप्ये उत्तरेण यशस्विनि॥ ४७<br><br>कूपो वै तिष्ठते तत्र सर्वतीर्थवरोऽनघे।<br>कूपस्य चोत्तरेणैव कुण्डमध्ये यशस्विनि॥ ४८<br><br>कुण्डेश्वरमिति ख्यातं सर्वसिद्धैस्तु वन्दितम्। | हे यशस्विनि! हे अनघे! मार्कण्डेश्वरके समीपमें उत्तर दिशामें वहाँ सभी तीर्थोंमें श्रेष्ठ एक कूप विद्यमान है। हे यशस्विनि! कूपके उत्तरमें ही कुण्डके मध्यमें सभी सिद्धोंसे वन्दित कुण्डेश्वर—इस नामसे विख्यात लिङ्ग स्थित है॥ ४७-४८१/२॥ |
| दीक्षां पाशुपतीं तीर्त्वा द्वादशाक्षरेण यत्फलम्॥ ४९<br><br>तत्फलं लभते देवि ब्राह्मणस्तु न संशयः।<br>कुण्डस्य पश्चिमे तीरे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ५०<br><br>स्कन्देन स्थापितं देवि ब्रह्मलोकगतिप्रदम्।<br>मार्कण्डेयस्य पूर्वेण नातिदूरे व्यवस्थितम्॥ ५१ | हे देवि! द्वादशाक्षरके द्वारा पाशुपत दीक्षा प्राप्त करके ब्राह्मण जो फल पाता है, उस फलको उसके दर्शनमात्रसे प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। कुण्डके पश्चिम तटपर पश्चिमकी ओर मुखवाला लिङ्ग स्थित है, हे देवि! वह [लिङ्ग] स्कन्दके द्वारा स्थापित किया गया है, वह ब्रह्मलोककी गति प्रदान |
| ७८६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| करनेवाला है॥ ४९-५० १/२॥ | |
| शाण्डिल्येश्वरनामानं स्थितं तत्रैव सुन्दरि।<br>मुखलिङ्गं तु तं भद्रे पश्चिमाभिमुखं स्थितम्॥ ५२ | मार्कण्डेयके पूर्व समीपमें ही शाण्डिलेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है। हे सुन्दरि! वहींपर मुखलिङ्ग स्थित है। हे भद्रे! वह लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुख किये हुए स्थित है॥ ५१-५२॥ |
| तं दृष्ट्वा मानवो देवि पशुपाशैः प्रमुच्यते।<br>अस्यैव दक्षिणे पार्श्वे नाम्ना भद्रेश्वरं स्मृतम्॥ ५३<br>तत्र पश्चान्मुखं लिङ्गं स्थापितं च ब्रह्मर्षिभिः।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि ब्राह्मण्यं लभते नरः॥ ५४<br>अन्यच्चैव महादेवि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः। | हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य पशुपाशोंसे मुक्त हो जाता है। इसीके दक्षिण भागमें भद्रेश्वर नामक लिङ्ग कहा गया है, पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग ब्रह्मर्षियोंके द्वारा स्थापित किया गया है। हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे मनुष्य ब्राह्मण्य प्राप्त करता है। हे महादेवि! अब मैं क्रमसे अन्य लिङ्गोंका वर्णन करूँगा॥ ५३-५४ १/२॥ |
| यो वै पूर्वं मया तुभ्यं कपालीशः प्रवर्तितः॥ ५५<br>तस्य दक्षिणदिग्भागे लिङ्गानि कथयाम्यहम्।<br>तत्र देवी स्वयं देवी श्रीर्वै तिष्ठति सर्वदा॥ ५६ | मैंने पूर्वमें आपसे जिस कपालीशके विषयमें बताया था, उसके दक्षिण दिशाभागमें स्थित लिङ्गोंको मैं बता रहा हूँ। हे देवि! वहाँपर स्वयं भगवती श्री सर्वदा विराजमान हैं॥ ५५-५६॥ |
| श्रीकुण्डमिति विख्यातं तत्र कुण्डे वरानने।<br>तस्मिन् कुण्डेश्वरी देवी वरदा सर्वदेहिनाम्॥ ५७ | हे वरानने! वहाँ श्रीकुण्ड बताया गया है, उस कुण्डमें सभी प्राणियोंको वर देनेवाली कुण्डेश्वरी देवी विराजमान हैं॥ ५७॥ |
| तत्र कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा देवीं महाश्रियम्।<br>श्रिया न रहितः सो वै यत्र तत्राभिजायते॥ ५८ | उस कुण्डमें स्नान करके तथा देवी महालक्ष्मीका दर्शन करके मनुष्य जहाँ-कहीं भी रहता है, लक्ष्मीसे विहीन नहीं होता है॥ ५८॥ |
| श्रियश्चोत्तरपार्श्वे तु कपालीशस्य दक्षिणे।<br>तत्र लिङ्गं महाभागे महालक्ष्म्या प्रतिष्ठितम्॥ ५९ | हे महाभागे! उस श्रीके उत्तरभागमें तथा कपालीशके दक्षिणमें महालक्ष्मीके द्वारा लिङ्ग स्थापित किया गया है॥ ५९॥ |
| पूर्वाभिमुखोऽहं तस्मिन् कुण्डस्यैव तु दक्षिणे।<br>स्नात्वा कुण्डे तु वै देवि तल्लिङ्गं ह्यर्चयिष्यति॥ ६०<br>नरो वा यदि वा नारी तस्य पुण्यफलं शृणु।<br>चामरासक्तहस्ताभिः स्त्रीभिः परिवृतः सदा॥ ६१<br>तिष्ठते सुविमानस्थो यावदाभूतसम्प्लवम्।<br>इह लोके यदा याति लक्ष्मीवान् रूपसंयुतः॥ ६२<br>धनधान्यसमायुक्तः कुले महति जायते।<br>स्वर्गलोकस्य तद्द्वारं रहस्यं देवनिर्मितम्॥ ६३ | मैं कुण्डके दक्षिणमें पूर्वाभिमुख होकर स्थित हूँ। हे देवि! उस कुण्डमें स्नान करके यदि कोई पुरुष या स्त्री उस लिङ्गका अर्चन करेगा, तो उसके पुण्यफलको सुनो, वह प्रलयपर्यन्त हाथोंमें चँवर धारण की हुई स्त्रियोंसे सदा घिरा हुआ रहकर उत्तम विमानमें स्थित रहता है और जब इस लोकमें जन्म लेता है, तब लक्ष्मीवान्, रूपवान् तथा धनधान्यसे युक्त होकर महान् कुलमें उत्पन्न होता है। वह [कुण्ड] स्वर्गलोकका देवनिर्मित रहस्यमय द्वार है॥ ६०-६३॥ |
| यदा मत्स्योदरीं यान्ति देवलोकादिवौकसः।<br>तदा तेनैव मार्गेण स्त्रीभिः परिवृतः सुखम्॥ ६४<br>तेन सा प्रोच्यते देवि महाश्रीर्वरवर्णिनि।<br>एतत्तुभ्यं मया देवि रहस्यं परिकीर्तितम्॥ ६५ | जब देवतालोग देवलोकसे मत्स्योदरीमें जाते हैं, तब उसी मार्गसे वह मनुष्य स्त्रियोंसे घिरा हुआ सुखपूर्वक प्रवेश करता है। हे देवि! हे वरवर्णिनि! इसीलिये वे महाश्री कही जाती हैं। हे देवि! मैंने यह |
अध्याय ७ ] कामेश्वर, भीष्मेश्वर, बालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन । ७८७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रहस्य आपको बता दिया॥ ६४-६५॥ | |
| तस्य विष्णुध्रुवस्यैव पश्चिमाया दिशः स्थितम्।<br>स्थापितं मम लिङ्गं तु दधीचेन महर्षिणा॥ ६६<br><br>दधीचेश्वरनामानं ख्यातं सर्वसुरासुरैः।<br>तं दृष्ट्वा मनुजो देवि ऐश्वरं लोकमाप्नुयात्॥ ६७ | उसी विष्णुध्रुवके पश्चिम दिशामें महर्षि दधीचिके द्वारा स्थापित किया गया मेरा लिङ्ग स्थित है। वह लिङ्ग सभी देवताओं तथा असुरोंके द्वारा दधीचेश्वर नामसे कहा गया है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य ईश्वरका लोक प्राप्त करता है॥ ६६-६७॥ |
| दक्षिणे तु तदा तत्र गायत्र्या स्थापितं पुरा।<br>गायत्र्या दक्षिणे चैव सावित्र्या स्थापितं पुनः॥ ६८<br><br>एतौ पश्चान्मुखौ लिङ्गौ मम देवि प्रियौ सदा।<br>अस्य चैव तु पूर्वेण लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ६९ | उसके दक्षिणमें पूर्वकालमें गायत्रीके द्वारा स्थापित किया गया लिङ्ग स्थित है और गायत्रीके दक्षिणमें सावित्रीके द्वारा स्थापित किया गया लिङ्ग स्थित है। हे देवि! ये दोनों लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुखवाले हैं तथा मेरे सर्वदा प्रिय हैं। इसके पूर्वमें पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ ६८-६९॥ |
| मत्स्योदरीतटे रम्ये स्थितं सत्पतयेश्वरम्।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि उत्तमां सिद्धिमवाप्नुयात्॥ ७० | यह सत्पतयेश्वर नामक लिङ्ग मत्स्योदरीके रम्य तटपर स्थित है, हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे मनुष्य उत्तम सिद्धि प्राप्त करता है॥ ७०॥ |
| लक्ष्मीलिङ्गस्य देवेन लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>उग्रेश्वरे महत्पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥ ७१<br><br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि भवेज्जातिस्मरो नरः।<br>तस्यैव दक्षिणे देवि महत्कुण्डं व्यवस्थितम्॥ ७२ | लक्ष्मीलिङ्गके पास देवताके द्वारा पश्चिमकी ओर मुखवाला उग्रेश्वर नामक महापुण्यप्रद तथा सभी पापोंका नाश करनेवाला लिङ्ग स्थित है, हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे मनुष्य जातिस्मर (पूर्वजन्मकी स्मृतिवाला) हो जाता है॥ ७१ १/२॥ |
| स्नात्वा कनखले यद्वत्पुण्यमुक्तं यशस्विनि।<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा फलमाप्नोति तत्समम्॥ ७३ | हे देवि! उसीके दक्षिणमें एक विशाल कुण्ड स्थित है, हे यशस्विनि! कनखलमें स्नान करनेसे जो पुण्य कहा गया है, मनुष्य उस कुण्डमें स्नान करके उसके समान फल प्राप्त कर लेता है॥ ७२-७३॥ |
| दधीचेशात्पश्चिमतो नाम्ना तु धनदेश्वरम्।<br>यत्र देवि तपस्तप्तं धनदेन महात्मना॥ ७४<br><br>तत्र कुण्डं महादेवि धनदेशस्य धीमतः।<br>तत्र स्नात्वा नरो देवि धनदेशं च पश्यति॥ ७५<br><br>तस्य तुष्टः कुबेरस्तु देवत्वं सम्प्रयच्छति।<br>अन्यानि तत्र लिङ्गानि स्थापितानि सुरासुरैः॥ ७६ | हे देवि! दधीचेश्वरके पश्चिममें धनदेश्वर नामक लिङ्ग है, जहाँ महात्मा धनदने तपस्या की थी। हे महादेवि! वहाँपर बुद्धिमान् धनदेश्वरका कुण्ड स्थित है, हे देवि! जो मनुष्य उसमें स्नान करके धनदेश्वरका दर्शन करता है, उसपर प्रसन्न होकर कुबेर उसे देवत्व प्रदान करते हैं॥ ७४-७५ १/२॥ |
| तानि दृष्ट्वातिपुण्यानि स्वर्गलोकं व्रजेन्नरः।<br>धनदेशात् पश्चिमतो नाम्ना तु करवीरकम्॥ ७७<br><br>तेन दृष्टेन देवेशि सिद्धिं प्राप्नोति मानवः।<br>पुण्यानि तत्र लिङ्गानि स्थितानि परमेश्वरि॥ ७८ | [हे देवि!] वहाँपर देवताओं तथा असुरोंके द्वारा अन्य लिङ्ग भी स्थापित किये गये हैं, उन महापुण्यप्रद लिङ्गोंका दर्शन करके मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त करता है। हे देवेशि! धनदेश्वरके पश्चिममें करवीरक नामक लिङ्ग स्थित है, उसके दर्शनसे मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है। हे परमेश्वरि! वहाँ [अन्य] पुण्यप्रद लिङ्ग भी स्थित हैं॥ ७६-७८॥ |
| तस्य वायव्यकोणे तु लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>मारीचेश्वरनामानं सर्वपातकनाशनम्॥ ७९ | उस [करवीरक]-के वायव्यकोणमें पश्चिमकी |
| ७८८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ओर मुखवाला मारीचेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वह सभी पापोंका नाश करनेवाला है॥ ७९ ॥ | |
| तस्य चैवाग्रतो देवि स्थापितं कुण्डमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो भक्त्या भ्राजते भास्करो यथा॥ ८० | हे देवि! उसके आगे एक उत्तम कुण्ड स्थापित किया गया है, उसमें भक्तिपूर्वक स्नान करके मनुष्य सूर्यके समान दीप्तिमान् हो जाता है॥ ८०॥ |
| मारीचेशात्पश्चिमतो लिङ्गमिन्द्रेश्वरं महत्।<br>पश्चिमाभिमुखं देवि कुण्डस्य तटसंस्थितम्॥ ८१ | मारीचेश्वरके पश्चिममें इन्द्रेश्वर नामक महान् लिङ्ग है। हे देवि! पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग कुण्डके तटपर स्थित है॥ ८१॥ |
| इन्द्रेश्वराद्दक्षिणतो वापी कर्कोटकस्य च।<br>तत्र वीरजले स्नात्वा दृष्ट्वा कर्कोटकेश्वरम्॥ ८२<br>नागानां चाधिपत्यं तु जायते नात्र संशयः।<br>कर्कोट्काद्दक्षिणतो नातिदूरे व्यवस्थितम्॥ ८३ | इन्द्रेश्वरके दक्षिणमें कर्कोटककी वापी है, उस वीरजलमें स्नान करके तथा कर्कोटकेश्वरका दर्शन करके [मनुष्यको] नागोंका आधिपत्य प्राप्त हो जाता है। इसमें सन्देह नहीं है॥ ८२१/२॥ |
| दृगिचण्डेश्वरं नाम ब्रह्महत्यापहारकम्।<br>तत्र पाशुपतः सिद्धः कौथुमिर्नाम नामतः॥ ८४<br>ज्ञानं पाशुपतं प्राप्य रुद्रलोकमितो गतः।<br>पश्चिमाभिमुखं लिङ्गं कुण्डस्योत्तरतः स्थितम्॥ ८५ | कर्कोटकेश्वरके दक्षिण समीपमें ही ब्रह्महत्याका नाश करनेवाला दृगिचण्डेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वहाँपर पाशुपत कौथुमि नामवाले ऋषि सिद्धिको प्राप्त हुए और पाशुपत ज्ञान प्राप्त करके यहाँसे रुद्रलोकको गये॥ ८३-८४१/२॥ |
| तत्र कुण्डे नरः स्नात्वा दृगिचण्डेश्वरस्य तु।<br>रुद्रलोकमवाप्नोति त्यक्त्वा संसारसागरम्॥ ८६<br>तस्य पूर्वेण देवेशि दीर्घिकायास्तटे शुभे।<br>अग्नीश्वरं तु नामानं सर्वपापक्षयङ्करम्॥ ८७ | पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग कुण्डके उत्तरमें स्थित है, वहाँपर दृगिचण्डेश्वरके कुण्डमें स्नान करके मनुष्य संसारसागरका त्यागकर रुद्रलोक प्राप्त करता है॥ ८५-८६॥ |
| तं दृष्ट्वा मानवो देवि अग्निलोकं तु गच्छति।<br>तस्यैव पूर्वदिग्भागे नाम्ना ह्याम्नातकेश्वरम्॥ ८८ | हे देवेशि! उसके पूर्वमें कुण्डके उत्तम तटपर सभी पापोंका नाश करनेवाला अग्नीश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य अग्निलोकको जाता है॥ ८७१/२॥ |
| तं दृष्ट्वा मनुजो भद्रे रुद्रस्यानुचरो भवेत्।<br>एकलिङ्गं तु तद्विद्यात् सूक्ष्मं च वरवर्णिनि॥ ८९ | उसीके पूर्व दिशाभागमें आम्नातकेश्वर नामक लिङ्ग है, हे भद्रे! उसका दर्शन करके मनुष्य रुद्रका अनुचर हो जाता है। हे वरवर्णिनि! उसे सूक्ष्म एकलिङ्ग जानना चाहिये॥ ८८-८९॥ |
| तस्यैवाम्नातकेशस्य दक्षिणे नातिदूरतः।<br>कुण्डं तदुद्भवं दिव्यं सुरलोकप्रदायकम्॥ ९० | उसी आम्नातकेश्वरके दक्षिण समीपमें ही देवलोककी प्राप्ति करानेवाला दिव्य कुण्ड स्थित है॥ ९०॥ |
| उर्वशीश्वरनामानं स्थितं पश्चान्मुखं भुवि।<br>तं दृष्ट्वा मनुजो देवि गणत्वं लभते ध्रुवम्॥ ९१ | वहाँ पश्चिमकी ओर मुखवाला उर्वशीश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य निश्चित रूपसे गणत्व प्राप्त करता है॥ ९१॥ |
| कुण्डस्य नैर्ऋते भागे नातिदूरे कथञ्चन।<br>उर्वशीशसमीपे तु तालकर्णेश्वरं स्मृतम्॥ ९२<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि चण्डस्यैति सलोकताम्।<br>तस्यैव तु समीपे तु लिङ्गानि स्थापितानि च॥ ९३ | कुण्डके नैर्ऋत्यभागमें समीपमें ही उर्वशीश्वरके पासमें तालकर्णेश्वरलिङ्ग बताया गया है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य चण्डका सालोक्य प्राप्त करता है॥ ९२१/२॥ |
| अध्याय ७ ] कामेश्वर, भीष्मेश्वर, बालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन | ७८९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| गणैस्तु मम धर्मज्ञैः श्रेष्ठानि सुमहन्ति च।<br>तस्य पूर्वेण कूपस्तु तिष्ठते सुमहान् प्रिये॥ ९४<br>तस्मिन् कूपे जलं स्पृश्य पूतो भवति मानवः।<br>चण्डेश्वरस्य पूर्वं तु स्थितं चित्रेश्वरं शुभम्॥ ९५ | [हे देवि!] उसीके समीपमें मेरे धर्मज्ञ गणोंके द्वारा श्रेष्ठ तथा अति महान् लिङ्ग स्थापित किये गये हैं। हे प्रिये! उसके पूर्वमें एक अति महान् कूप स्थित है, उस कूपके जलका स्पर्श करके मनुष्य पवित्र हो जाता है॥ ९३-९४ १/२॥<br>चण्डेश्वरके पूर्वमें शुभ चित्रेश्वरलिङ्ग स्थित है, |
| तेन दृष्टेन देवेशि चित्रस्य समतां व्रजेत्।<br>चित्रेश्वरसमीपे तु स्थितं कालेश्वरं महत्॥ ९६<br>तेन दृष्टेन देवेशि कालं वञ्चति मानवः॥ ९७ | हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य चित्रकी समता प्राप्त करता है। चित्रेश्वरके समीपमें महान् कालेश्वरलिङ्ग स्थित है, हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य कालको भी वंचित कर देता है॥ ९५-९७॥ |
| देव्युवाच<br>कथं कालेश्वरो देवः केन वा वञ्चितः प्रभुः।<br>कस्मिन् स्थाने तु कः सिद्धस्तन्मे ब्रूहि सुरेश्वर॥ ९८ | देवी बोलीं—हे सुरेश्वर! प्रभु कालेश्वरदेव किस प्रकार तथा किसके द्वारा वंचित किये गये और किस स्थानपर कौन सिद्ध हुआ? इसे मुझे बताइये॥ ९८॥ |
| ईश्वर उवाच<br>तस्मिन् स्थाने पुरा भद्रे पिङ्गाक्षो नाम वै मुनिः।<br>ज्ञानस्य वक्ता पञ्चार्थे लोके पाशुपतः स्थितः॥ ९९ | ईश्वर बोले—हे भद्रे! पूर्वकालमें उस स्थानमें पंचभूतात्मक लोकमें ज्ञानके वक्ता पशुपतिभक्त पिंगाक्ष नामक मुनि रहते थे॥ ९९॥ |
| तेन चैव पुरा भद्रे लिङ्गेऽस्मिन् स प्रसादितः।<br>ततो लिङ्गप्रभावेण कालं वञ्चितवान् मुनिः॥ १०० | हे भद्रे! उन्होंने ही पूर्वकालमें इस लिङ्गमें शिवको प्रसन्न किया था, इसीलिये उन मुनिने लिङ्गके प्रभावसे कालको वंचित किया॥ १००॥ |
| नान्ततो दृश्यते काल ईश्वररासक्तचेतसः।<br>तत्र स्थित्वा तु सुमहत्कालं यः कालयेत्प्रजाः॥ १०१<br>न तस्य क्रमितुं शक्तः कालो वै घोररूपिणः। | ईश्वरमें आसक्त चित्तवालेको अन्ततक काल दृष्टिगत नहीं होता है। [हे देवि!] वहाँ सन्तानसहित रहकर जो दीर्घकालतक समय व्यतीत करता है, घोररूपी काल उसपर आक्रमण करनेमें समर्थ नहीं होता है॥ १०१ १/२॥ |
| ततः प्रभृति येऽन्येऽपि तस्मिन्नायतने स्थिताः॥ १०२<br>तेषां नाक्रमते कालः वर्षलक्षायुतैरपि।<br>अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि रहस्यं वरवर्णिनि॥ १०३ | उसी समयसे जो अन्य लोग भी उस आयतनमें स्थित रहते हैं, लाखों वर्षोंमें भी काल उनपर आक्रमण नहीं कर सकता है। हे वरवर्णिनि! मैं आपको दूसरा रहस्य भी बताऊँगा॥ १०२-१०३॥ |
| तस्य देवस्य चाग्रे तु कूपस्तिष्ठति वै श्रुतः।<br>तत्र कालोदकं नाम उदकं देवि तिष्ठति॥ १०४<br>तस्यैव प्राशनाद्देवि पूतो भवति मानवः।<br>यैस्तु तत्रोदकं पीतं नरैः स्त्रीभिश्च कर्मभिः॥ १०५<br>स्वयं देवेन शर्वेण त्रिशूलाङ्केन चाङ्कितः।<br>न तेषां परिवर्तों वै कल्पकोटिशतैरपि॥ १०६ | उस लिङ्गके आगे एक प्रसिद्ध कूप स्थित है, हे देवि! वहाँपर कालोदक नामक उदक स्थित है, हे देवि! उसके प्राशन (पान)-से मनुष्य पवित्र हो जाता है। जिन पुरुषों तथा स्त्रियोंने पुण्यकर्मोंके प्रभावसे उस जलका पान कर लिया, उन्हें मानो स्वयं भगवान् शिवने त्रिशूलांकसे अंकित कर दिया, सैकड़ों-करोड़ कल्पोंमें भी उनका पुनर्जन्म नहीं होता है। उसका पान करके मनुष्य भवबन्धनसे होनेवाले भयसे मुक्त हो जाते हैं॥ १०४-१०६ १/२॥ |
| यत्पीत्वा भवबन्धोत्थभयं मुञ्चन्ति मानवाः।<br>एतद्देवि रहस्यं तु कालोदकमुदाहृतम्॥ १०७ | हे देवि! मैंने इस रहस्यमय कालोदकका वर्णन |
| ७९० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| दर्शनात्तस्य देवस्य महापातकिनोऽपि ये।<br>तेऽपि भोगान् समश्नन्ति न तेषां क्रमते भवः॥ १०८ | कर दिया। [हे देवि!] जो महापातकी हैं, वे भी उस देवके दर्शनसे सुखोंको प्राप्त करते हैं और संसार उनपर आक्रमण नहीं करता है॥ १०७-१०८॥ | | तल्लिङ्गं सर्वलिङ्गानामुत्तमं परिकीर्तितम्।<br>दर्शनात्तस्य लिङ्गस्य रुद्रत्वं याति मानवः॥ १०९ | वह लिङ्ग सभी लिङ्गोंमें श्रेष्ठ कहा गया है, उस लिङ्गके दर्शनसे मनुष्य रुद्रत्व प्राप्त करता है॥ १०९॥ | | तत्र वापि हि यद्दत्तं दानं रुद्ररतात्मनाम्।<br>तद्वै महाफलं तेषां यच्छते भावितात्मनाम्॥ ११० | वहाँपर जो भी दान किया जाता है, वह उन भक्तिमय चित्तवालों तथा रुद्रमें रत मनवालोंको महाफल प्रदान करता है॥ ११०॥ | | खण्डस्फुटितसंस्कारं तत्र कुर्वन्ति ये नराः।<br>रुद्रलोकं समासाद्य मोदन्ते सुखिनः सदा॥ १११ | जो मनुष्य वहाँपर खण्डस्फुटित संस्कार करते हैं, वे रुद्रलोक प्राप्त करके सदा आनन्दित तथा सुखी रहते हैं॥ १११॥ | | सिद्धलिङ्गाश्रमं भग्नं दृष्ट्वा राज्ञे निवेदयेत्।<br>स्वतो वा परतो वापि ये कुर्वन्ति यथा तथा॥ ११२ | जो सिद्धलिङ्गाश्रमको भग्न देखकर [उसके उद्धारके लिये] राजासे निवेदन करता है और जो लोग स्वयं अथवा दूसरोंके माध्यमसे इसे व्यवस्थित करते हैं, वे मनुष्य सुखोंके भागी होते हैं और अन्तमें मोक्षके भाजन होते हैं॥ ११२१/२॥ | | ते भोगानां नराः पात्रमन्ते मोक्षस्य भाजनाः।<br>मोक्षप्रदायिनं लिङ्गं यत्कार्यार्थस्य लिप्सया॥ ११३<br><br>राजप्रतिग्रहासक्ताः कृतघ्नान् पूजयन्ति ये।<br>ते रुद्रशापनिर्दग्धाः पतन्ति नरके ध्रुवम्॥ ११४ | राजप्रतिग्रहमें निरत जो लोग अपने स्वार्थकी अभिलाषासे मोक्ष प्रदान करनेवाले लिङ्गका पूजन-सत्कार आदि नहीं करते हैं, अपितु कृतघ्नोंका सम्मान करते हैं, वे रुद्रके शापसे दग्ध होकर निश्चित रूपसे नरकमें पड़ते हैं॥ ११३-११४॥ | | ये पुनः सिद्धलिङ्गानां प्रासादानां स्वशक्तितः।<br>कुर्वन्ति पूजां सत्कारं ते मुक्ता नात्र संशयः॥ ११५ | जो लोग अपने सामर्थ्यके अनुसार सिद्धलिङ्गोंके प्रासादोंका पूजन तथा सत्कार करते हैं; वे मुक्त हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं है॥ ११५॥ | | कालेश्वरे तु यो देवि नरः कारयते पुरम्।<br>एकविंशकुलोपेतो रुद्रलोके वसेच्चिरम्॥ ११६ | हे देवि! जो मनुष्य कालेश्वरमें पुरका निर्माण कराता है, वह [अपनी] इक्कीस पीढ़ियोंसहित रुद्रलोकमें दीर्घकालतक वास करता है॥ ११६॥ | | तत्र पूजा जपो होमः कालेशे क्रियते हि यत्।<br>तत्र दीपप्रदानेन ज्ञानचक्षुर्भवेन्नरः॥ ११७<br><br>प्राप्नोति धूपदानेन तत्स्थानं रुद्रसेवितम्।<br>जागरं ये प्रकुर्वन्ति कालेशस्यैव चाग्रतः॥ ११८ | वहाँ कालेश्वरमें जो भी पूजन, जप, होम किया जाता है, वह फलदायक होता है। वहाँ दीपदान करनेसे मनुष्य ज्ञानचक्षु हो जाता है और धूपदानसे रुद्रसेवित स्थान प्राप्त करता है॥ ११७१/२॥ | | ते मृता वृषभारूढाः शूलहस्तास्त्रिलोचनाः।<br>भूत्वा रुद्रसमा भद्रे रुद्रलोकं तु ते गताः॥ ११९ | जो लोग कालेश्वरके समक्ष [रात्रि] जागरण करते हैं, हे भद्रे! वे मरनेपर वृषभपर आरूढ होकर हाथमें त्रिशूल धारण किये हुए तीन नेत्रोंसे युक्त हो रुद्रतुल्य होकर रुद्रलोकको जाते हैं॥ ११८-११९॥ | | बहुनात्र किमुक्तेन कालेशे देवि यत्कृतम्।<br>तत्सर्वमक्षयं देवि पुनर्जन्मनि जन्मनि॥ १२० | हे देवि! अधिक कहनेसे क्या लाभ, हे देवि! कालेश्वरमें जो भी किया जाता है, वह सब कुछ जन्म-जन्ममें अक्षय होता है॥ १२०॥ |
अध्याय ७] कामेश्वर, भीष्मेश्वर, वालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन ७९१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एतत्ते सर्वमाख्यातं भूयो विस्तरतो मया।<br>न कस्यचिदिहाख्यातं गोपनीयं प्रयत्नतः॥ १२१ | मैंने यह सब विस्तारसे आपसे कह दिया, मैंने इसे किसीको भी नहीं बताया था, आपको इसे प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये॥ १२१॥ |
| कालेश्वरस्य देवस्य शिवस्यायतनं शुभम्।<br>कालेश्वरसमीपे तु दक्षिणे वरवर्णिनि॥ १२२<br>मृत्युना स्थापितं लिङ्गं सर्वरोगविनाशनम्।<br>कूपस्य चोत्तरे भागे महालिङ्गानि सुव्रते॥ १२३ | यह कालेश्वर देव शिवका आयतन [अत्यन्त] शुभ है। हे वरवर्णिनि! कालेश्वरके समीप दक्षिण दिशामें मृत्युके द्वारा स्थापित किया गया लिङ्ग विद्यमान है, वह सभी रोगोंका नाश करनेवाला है॥ १२२१/२॥ |
| एकं दक्षेश्वरं नाम द्वितीयं कश्यपेश्वरम्।<br>पश्चान्मुखं तु यल्लिङ्गं तद्दक्षेश्वरसंज्ञकम्॥ १२४ | हे सुव्रते! कूपके उत्तरभागमें [अनेक] महालिङ्ग स्थित हैं। उनमें एक दक्षेश्वर तथा दूसरा कश्यपेश्वर नामक लिङ्ग है। जो पश्चिमकी ओर मुखवाला लिङ्ग है, वह दक्षेश्वर नामवाला है॥ १२३-१२४॥ |
| दक्षेश्वरस्य पूर्वेण महाकालस्तु तिष्ठति।<br>कुण्डे स्नानं नरः कृत्वा महाकालं तु योऽर्चयेत्॥ १२५<br>अर्चितं तेन सुश्रोणि जगदेतच्चराचरम्।<br>दक्षिणस्यां दिशि तथा तस्य कुण्डस्य वै तटे॥ १२६ | दक्षेश्वरके पूर्वमें महाकाल स्थित हैं। हे सुश्रोणि! जो मनुष्य कुण्डमें स्नान करके महाकालका अर्चन करता है, उसने मानो इस चराचर जगत्का पूजन कर लिया॥ १२५१/२॥ |
| स्थापितं देवलिङ्गं तु अन्तकेन महात्मना।<br>महत्फलमवाप्नोति तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्॥ १२७ | उसके दक्षिण दिशामें तथा कुण्डके तटपर ही महात्मा अन्तकके द्वारा देवलिङ्ग स्थापित किया गया है, उस लिङ्गके दर्शनसे मनुष्य महान् फल प्राप्त करता है॥ १२६-१२७॥ |
| अन्तकेश्वरसामीप्ये लिङ्गं वै दक्षिणे स्थितम्।<br>शक्रेश्वरेति नामानं स्थापितं शक्रहस्तिना॥ १२८ | अन्तकेश्वरके समीप दक्षिणमें शक्रेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वह शक्रहस्तीके द्वारा स्थापित किया गया है॥ १२८॥ |
| तस्यैव दक्षिणे भागे मातलीश्वरमुत्तमम्।<br>संस्थापितं मातलिना सर्वसौख्यप्रदायकम्॥ १२९ | उसीके दक्षिण भागमें उत्तम मातलीश्वर [नामक] लिङ्ग है, सभी प्रकारका सुख प्रदान करनेवाला वह लिङ्ग मातलिके द्वारा स्थापित किया गया है॥ १२९॥ |
| देवस्य चाग्रतः कुण्डे तत्र तीर्थं वरानने।<br>हस्तिपालेश्वरस्याग्रे कुण्डे तिष्ठति भामिनि॥ १३०<br>तप्तं यत्र पुरा भद्रे अन्तकेनान्तकारिणा।<br>हस्तीश्वरस्य पूर्वेण लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ १३१<br>विजयेश्वरनामानं सुरसिद्धैस्तु पूजितम्।<br>महाकालस्य कुण्डं तु उत्तरे वरवर्णिनि॥ १३२ | हे वरानने! वहाँपर देवके आगे कुण्डमें एक तीर्थ विद्यमान है, हे भामिनि! हस्तिपालेश्वरके आगे कुण्डमें वह स्थित है, जहाँ हे भद्रे! अन्त (मृत्यु) करनेवाले अन्तकके द्वारा पूर्वकालमें तप किया गया था। हस्तीश्वरके पूर्वमें देवताओं तथा सिद्धोंद्वारा पूजित विजयेश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे वरवर्णिनि! उत्तरमें महाकालका कुण्ड है॥ १३०-१३२॥ |
| बलिनाराधितश्चाहं तस्मिन् स्थाने तु पार्वति।<br>बलिकुण्डं तु विख्यातं वाराणस्यां मम प्रियम्॥ १३३<br>तस्य कुण्डस्य पूर्वेण लिङ्गं स्थापितवान् बलिः॥ १३४ | हे पार्वति! बलिने उस स्थानमें मेरी आराधना की थी। वाराणसीमें मेरा प्रिय बलिकुण्ड विख्यात है, उस कुण्डके पूर्वमें बलिने मेरे लिङ्गकी स्थापना की थी॥ १३३-१३४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनावर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनावर्णन' नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥