वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय १८५ ] कांस्य-प्रतिमा-स्थापनकी विधि ३३३
स्नान कराते समय जलकी जितनी बूँदें मूर्तिके ऊपर गिरती हैं, प्रतिष्ठा करनेवाला व्यक्ति उतने वर्षोंतक मेरे लोकमें निवास पाता है।
[ अध्याय १८३-१८४ ]
कांस्य-प्रतिमा-स्थापनकी विधि
भगवान् वराह कहते हैं—'सुन्दरि! कांस्य-धातुसे स्वच्छ सुन्दर सभी अङ्ग-सम्पन्न प्रतिमा बनवाकर ज्येष्ठा नक्षत्रमें मूर्तिको घरपर लाकर माङ्गलिक ध्वनिके साथ उसकी भी प्रतिष्ठा करनी चाहिये। मेरी प्रतिमाके प्रवेशकालमें विधिके अनुकूल अर्घ्य लेकर मन्त्र पढ़ना चाहिये। उसका भाव यह है—'जगत्प्रभो! जो सम्पूर्ण यज्ञोंमें पूजा प्राप्त करते हैं, योगिजन जिनका ध्यान करते हैं, जो सदा सबकी रक्षा करते हैं, जिनकी इच्छापर विश्वकी सृष्टि, पालन आदि निर्भर है तथा जो महान् आत्मा एवं सदा प्रसन्न रहते हैं, वे आप ही हैं। भगवन्! आप भली प्रकारसे मेरी यह पूजा स्वीकार कर प्रसन्नतापूर्वक इस विग्रहमें विराजिये। फिर अर्घ्य देकर शास्त्रीय विधिका पालन करते हुए मूर्तिके मुखको उत्तरकी ओर करके रखे। प्रतिष्ठाके समय पञ्चगव्य, सभी प्रकारके चन्दन, लाजा एवं मधुसे सम्पन्न चार कलशोंको स्थापित करनेकी विधि है। पवित्रात्मा पुरुषको चाहिये कि सूर्यास्त हो जानेपर मेरी वह प्रतिमा पूजा करनेके विचारसे वहीं रख दे। साथ ही भगवन्निमित्त उन शुद्ध कलशोंको उठाकर विग्रहके पास—'ॐ नमो नारायणाय' कहकर रखना चाहिये। तत्पश्चात् आगेका मन्त्र पढ़ना चाहिये। मन्त्रका भाव यह है—'भगवन्! ब्रह्माण्ड एवं युगका आदि और अन्त आपके ही रूप हैं। आपके अतिरिक्त विश्वमें कहीं कुछ भी नहीं है। लोकनाथ! अब आप यहाँ आ गये हैं, अतः सदाके लिये विराजिये। प्रभो! आप संसाररूपसे विकार, परमात्मरूपसे निराकार, निर्गुण होनेसे आकारशून्य तथा मूर्तिमान् होनेसे साकार भी हैं। आपको मेरा प्रणाम है।'
पृथ्वि! दूसरे दिन प्रातः सूर्य-उदय होनेपर अश्विनी, मूल अथवा तीनों उत्तरा नक्षत्रसे युक्त मुहूर्तमें पूर्वोक्त विधानके अनुसार मुझे मन्दिरके द्वारदेशपर स्थापित करे। सब प्रकारसे शान्ति करनेके लिये जल, गन्ध और फलके साथ—'ॐ नमो नारायणाय' इसका उच्चारण कर प्रतिमाको भीतर ले जाय। कलशोंमें चन्दनयुक्त जल भरकर उसे अभिमन्त्रित करे। फिर उसी जलसे स्नान कराये। सम्पूर्ण अङ्गोंको शुद्ध करनेके लिये मन्त्रपूर्वक जलका आवाहन करे। मन्त्रका भाव यह है—'पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। भगवन्! ऐसी कृपा करें कि समस्त सागर, सरिताएँ, सरोवर तथा पुष्कर आदि जितने तीर्थ हैं, वे सभी यहाँ आयें, जिनसे मेरे अङ्ग शुद्ध हो जायें।'
तत्पश्चात् उपासक भक्तिपूर्वक प्रतिमाको स्नान कराकर सविधि अर्चन कर, गन्ध-धूप-दीप आदिसे पूजा कर वस्त्र अर्पित करे। साथ ही यह मन्त्र पढ़े—'ॐकारस्वरूप देवेश! ये सूक्ष्म, सुन्दर एवं सुखदायी वस्त्र आपकी सेवामें उपस्थित हैं। आप इन्हें स्वीकार करें। आपको मेरा नमस्कार है। वेद, उपवेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—ये सभी आपके रूप हैं और सभी आपकी आराधना करते हैं।' पृथ्वि! मन्त्रके विशेषज्ञ व्यक्ति विधिके साथ पूजा करके मुझे अलंकृत करनेके बाद नैवेद्य अर्पित कर आचमन करायें। फिर शान्तिपाठ करें। शान्तिपाठके मन्त्रका भाव यह है—'विद्या,
३३४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १८६
वेद, ब्राह्मण, सम्पूर्ण ग्रह, नदियाँ, समुद्र, इन्द्र, अग्नि, वरुण, आठों लोकपाल आदि देवता—ये सभी विश्वमें शान्ति प्रदान करें। भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाले भगवन्! आप सर्वत्र व्याप्त, मनोहर और यम अर्थात् अहिंसा, सत्य वचन एवं ब्रह्मचर्यस्वरूप हैं। ऐसे ॐकारमय आप परम पुरुषके लिये मेरा नमस्कार है।' फिर मेरी प्रदक्षिणा, स्तुति तथा अभिवादन करे। इसके पश्चात् भगवान् श्रीहरिमें श्रद्धा रखनेवाले ब्राह्मणोंकी पूजाकर उन्हें भी तृप्त करे। कमलनयने! विप्रवर्ग शान्ति-कलशका जल लेकर प्रतिमापर सिंचन करें। साधकको ब्राह्मणों, मेरे भक्तों एवं गुरुजनोंकी निन्दा नहीं करनी चाहिये। प्रतिष्ठाके समय मेरे अङ्गोंपर जलकी जितनी बूँदें गिरती हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह व्यक्ति विष्णुलोकमें रहनेका अधिकारी हो जाता है। जो मनुष्य इस विधिसे मेरी स्थापना करेगा, उसने मानो अपने मातृपक्ष एवं पितृपक्ष—दोनों कुलके पितरोंका उद्धार कर दिया। भद्रे! कांस्यधातुसे निर्मित मेरी प्रतिमाकी जैसे प्रतिष्ठा करनी चाहिये, वह बात मैं तुम्हें बता चुका। अब ऐसे ही चाँदीसे बनी मूर्तिकी भी स्थापना होती है, वह आगे बताऊँगा। [अध्याय १८५]
रजत-स्वर्णप्रतिमाके स्थापन तथा शालग्राम और शिवलिङ्गकी पूजाका विधान
भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! इसी प्रकार मेरी चाँदी तथा स्वर्णसे भी प्रतिमा बनाने एवं उसकी प्रतिष्ठा करनेका विधान है। मूर्ति-निर्माण एवं प्रतिष्ठा उसी प्रकार की जानी चाहिये, जैसी ताम्र या काँसेकी विधि है। वसुंधरे! इसमें भी पूजा-अर्चा, कलश-स्थापन एवं शान्तिपाठका भी पूर्वोक्त विधान ही अनुष्ठित होना चाहिये।
पृथ्वी बोली—माधव! आपने सुवर्ण आदिसे बनी हुई जिन प्रतिमाओंकी बात बतायी है, प्रायः उन सभीमें आपका निवास है। पर शालग्रामशिलामें आप स्वभावतया सदा निवास करते हैं। प्रभो! मैं यह जानना चाहती हूँ कि गृह आदिमें साधारण रूपसे किनकी पूजा करनी चाहिये अथवा विशेष-रूपसे कौन देवता पूज्य हैं? आप मुझे इसका रहस्य बतानेकी कृपा करें। साथ ही मुझे यह भी स्पष्ट करा दीजिये कि शिवपरिवारके पूजनमें कितनी संख्याएँ होनी आवश्यक हैं?
भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! गृहस्थके घरमें दो शिवलिङ्ग, तीन शालग्रामकी मूर्तियाँ, दो गोमती-चक्र, दो सूर्यकी प्रतिमाएँ, तीन गणेश तथा तीन दुर्गाकी प्रतिमाओंका पूजन करना निषिद्ध है। विषम संख्यायुक्त शालग्रामकी पूजा नहीं करनी चाहिये। युग्ममें भी दोकी संख्या नहीं होनी चाहिये। विषमसंख्यक शालग्रामकी पूजा निषिद्ध है, पर विषममें भी एक शालग्रामका पूजन विहित है। इसमें विषमताका दोष नहीं है*। अग्निसे जली हुई तथा टूटी-फूटी प्रतिमाकी पूजा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि घरमें ऐसी मूर्तियोंकी पूजा करनेसे गृह-स्वामीके मनमें उद्वेग या अनिष्ट होता है। शालग्रामकी मूर्ति यदि चक्रके चिह्नसे युक्त हो तो खण्डित होनेपर भी उसकी पूजा करनी चाहिये,
* गृहे लिङ्गद्वयं नार्च्यं शालग्रामत्रयं तथा। द्वे चक्रे द्वारकायास्तु नार्च्यं सूर्यद्वयं तथा॥
गणेशत्रितयं नार्च्यं शक्तित्रितयमेव च। शालग्रामसमाः पूज्याः समेषु द्वितयं नहि॥
विषमा नैव पूज्याः स्युर्विषमे त्वेक एव हि।
(१८६। ४०–४२)
अध्याय १८७ ] सृष्टि और श्राद्धकी उत्पत्ति-कथा एवं पितृयज्ञका वर्णन [ ३३५
क्योंकि वह टूटा-फूटा दीखनेपर भी शुभप्रद माना जाता है। देवि! जिसने शालग्रामकी बारह मूर्तिका विधिवत् पूजन कर लिया, अब मैं तुम्हें उसका पुण्य बताता हूँ। यदि बारह करोड़ शिवके लिङ्गोंका सोनेके कमलपुष्प चढ़ाकर बारह कल्पोंतक पूजन किया जाय, उससे जितना पुण्य प्राप्त होता है, उतना पुण्य केवल एक दिन बारह शालग्रामकी पूजासे होता है। श्रद्धाके साथ सौ शालग्रामका अर्चन करनेवाला जो फल पाता है, उसका वर्णन मेरे लिये सौ वर्षोंमें भी सम्भव नहीं है। अन्य देवताओंकी तथा मणि आदिसे बने हुए शिवलिङ्गोंकी पूजा सर्वसाधारण व्यक्ति कर सकते हैं, पर शालग्रामकी पूजा स्त्री एवं हीन अपवित्र व्यक्तियोंको नहीं करनी चाहिये। शालग्रामके चरणामृत लेनेसे सम्पूर्ण पाप भस्म हो जाते हैं। शिवजीपर चढ़े हुए फल, फूल, नैवेद्य, पत्र एवं जल ग्रहण करना निषिद्ध है। हाँ, यदि शालग्रामकी शिलासे उसका स्पर्श हो जाय तो वह सदा पवित्र माना जा सकता है। देवि! जो व्यक्ति स्वर्णके साथ किसी भगवद्भक्त पुरुषको शालग्रामकी मूर्तिका दान करता है, उसका पुण्य कहता हूँ, सुनो। वसुंधरे! उसे वन एवं पर्वतसहित समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वी सत्पात्र ब्राह्मणको देनेका पुण्य प्राप्त होता है। यदि शालग्रामकी मूर्तिके मूल्यका निश्चय करके कभी कोई उसे बेचता और खरीदता है तो वे दोनों निश्चय ही नरकमें जाते हैं। वस्तुतः शालग्रामके पूजनके फलका वर्णन तो कोई सौ वर्षमें भी नहीं कर सकता। [अध्याय १८६]
सृष्टि और श्राद्धकी उत्पत्ति-कथा एवं पितृयज्ञका वर्णन
पृथ्वी बोली— भगवन्! मैं आपके वराह तथा मथुराक्षेत्रकी महिमा सुन चुकी। प्रभो! मैं अब पितृयज्ञके सम्बन्धमें जानना चाहती हूँ कि यह क्या है और इसे किस प्रकार आरम्भ करना चाहिये? सर्वप्रथम किसने इस यज्ञका शुभारम्भ किया तथा इसका प्रयोजन एवं स्वरूप क्या है?
भगवान् वराह कहते हैं— देवि! सर्वप्रथम मैंने स्वर्गलोककी रचना की, जो देवताओंका पहले आवास बना। जगत् प्रकाशशून्य था और सर्वत्र अन्धकार व्याप्त था। उस समय मेरे मनमें ऐसा विचार उत्पन्न हुआ कि चर और अचर प्राणियोंसे सम्पन्न तीनों लोकोंका सृजन करूँ। उस समय मैं संसारकी सृष्टिसे विमुख शेषनागकी शय्यापर शयन कर रहा था। ऐसा मेरा अनन्त शयन हुआ करता है। माया-स्वरूपिणी निद्रा मेरी सहचरी है। इसका सृजन मेरी इच्छापर निर्भर है। इसीसे मैं सोता और जागता हूँ। सृष्टिके प्रारम्भमें सर्वत्र जल-ही-जल था। कहीं कुछ भी पता नहीं चलता था। उस जलमें एक वट-वृक्षके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं था। वह वट भी बीजजनित नहीं था, बल्कि मुझ विष्णुद्वारा ही उत्पन्न था*। मायाका आश्रय लेकर एक बालकके रूपमें मैं उसपर निवास करता था। मेरी आज्ञा पाकर मायाने चर और अचरसे परिपूर्ण तीनों लोकोंको सजाया है। ये सभी मेरी आँखोंके सामने हैं। शुभे! मैं ही इस विविध वैचित्र्योपेत चराचर
* प्रायः लोग प्रश्न करते हैं कि बीज पहले या वट पहले। यह उसीका उत्तर है, जिसमें विष्णुको ही वटका तथा विश्ववृक्षका बीज बतलाया गया है।
| ३३६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १८७ |
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विश्वका आधार हूँ। समयानुसार मैं ही बडवामुख नामक अग्नि बन जाता हूँ। माया मेरा ही आश्रय पाकर काम करती है, जिससे सभी जल बडवानलसे निकलकर मुझमें लीन हो जाते हैं। प्रलयकी अवधि पूरी हो जानेपर लोकपितामह ब्रह्माने मुझसे पूछा कि मैं क्या करूँ? तब मैंने उनसे यह वचन कहा—'ब्रह्मन्! तुम यथाशीघ्र सुर-असुर एवं मानवोंकी सृष्टि करो।'
देवि! इस प्रकार मेरे कहनेपर ब्रह्माने हाथसे कमण्डलु उठाया और उसके जलसे आचमनकर देवताओंकी सृष्टिका कार्य आरम्भ कर दिया। पितामहने बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, दो अश्विनीकुमार, उनचास मरुद्गण एवं सबका उद्धार करनेके लिये ब्राह्मण तथा सुरसमुदायकी सृष्टि की। उनकी भुजाओंसे क्षत्रियोंकी, ऊरुओंसे वैश्योंकी तथा चरणोंसे शूद्रोंकी उत्पत्ति हुई। देवि! उन्हींसे देवता और असुर सब-के-सब धराधामपर विराजने लगे। देवता और दानवोंमें तप तथा बलकी अधिकता हुई। अदिति देवीसे आदित्य वसुगण, रुद्रगण, मरुद्गण, अश्विनीकुमार आदि तैंतीस करोड़ देवता उत्पन्न हुए। दिति देवीसे देवताओंके विरोधी दानवोंकी उत्पत्ति हुई। उसी समय प्रजापतिने तपोधन ऋषियोंको उत्पन्न किया। वे सभी तीव्र तेजके कारण सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे। उन्हें सभी शास्त्रोंका पूर्ण ज्ञान था। अब उनके पुत्रों तथा पौत्रोंकी संख्या सीमित न रही। उन्हींमें एक निमि हुए*। उन निमिको भी एक पुत्र हुआ, जो आत्रेय नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह जन्मसे ही सुन्दर, संयतचित्त एवं उदार स्वभावका था। वह मनको एकाग्रकर अविचल भावसे सावधान होकर तपस्या करता। वसुंधरे! पञ्चाग्नि तापना, वायु पीकर रहना, भुजा ऊपर उठाकर एक पैरसे खड़े रहना, सूखे पत्ते एवं जल ग्रहण करना, शीतकालमें जलशयन करना, फलोंके आहारपर रहना तथा चान्द्रायणव्रतका पालन करना—ये उसकी तपस्याके अङ्ग थे। इन सभी नियमोंका पालन करते हुए वह दस हजार वर्षोंतक तपस्यामें लीन रहा। इतनेमें कालवश उसका देहान्त हो गया। ऐसे सुयोग्य पुत्रकी मृत्युसे निमिका हृदय शोकपूर्ण हो गया। इस प्रकार पुत्रशोकके कारण ये निमि दिन-रात चिन्तित रहने लगे।
माधवि! उस समय निमिने तीन राततक शोक मनाया। उनकी बुद्धि बहुत विस्तृत थी। अतः इस शोकसे मुक्त होनेका विचार किया कि माघमासकी द्वादशीका दिन उपयुक्त है और फिर उस दिन पुत्रके लिये श्राद्धकी व्यवस्था की। उस बालक (आत्रेय)-को खाने एवं पीनेके लिये जितने भोजनके पदार्थ अन्न, फल, मूल तथा रस थे, उन्हें एकत्रकर फिर स्वयं पवित्र होकर सावधानीके साथ ब्राह्मणको आमन्त्रित किया और अपसव्य-विधानसे सभी श्राद्ध-कार्य सम्पन्न किये। सुन्दरि! इसके बाद सात दिनोंका कृत्य एक साथ सम्पन्न किया। शाक, फल और मूल—इन वस्तुओंसे पिण्डदान किया। सात ब्राह्मणोंकी विधिवत् पूजा की। कुशोंको दक्षिणकी ओर अग्रभाग करके रखकर नाम और गोत्रका उच्चारण करके मुनिवर निमिने धार्मिक भावनासे अपने पुत्रके नाम पिण्ड अर्पण किया। भद्रे! इस प्रकार विधान पूरा करते रहे, दिन समाप्त हो गया और भगवान् सूर्य अस्ताचलको चले गये। यह परम
* ये 'निमि' मिथिला-नरेश—'मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥' (रामचरित० १।२२९।२)—से भिन्न कोई ब्राह्मण हैं।
१५३- श्राद्धके दोष और उसकी रक्षाकी विधि
अध्याय १८७] सृष्टि और श्राद्धकी उत्पत्ति-कथा एवं पितृयज्ञका वर्णन [३३७
दिव्य उत्तम कर्म श्रेष्ठभावसे सम्पन्न हुआ। उन्होंने मन और इन्द्रियोंको वशमें करके आशाएँ त्याग दीं और अकेले ही शुद्ध भूमिमें पहले कुश, तब मृगचर्म और इसके बाद वस्त्र बिछाकर बैठ गये। उनका वह आसन न बहुत ऊँचा था न अति नीचा। चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको वशमें करके एकाग्र हो अपने अन्तःकरणको शुद्ध करनेके लिये उन्होंने योगासन लगाया और अपने शरीर तथा सिरको समान रखकर अचल कर लिया। उनकी दृष्टि नासिकाके अग्रभागपर जमी थी। चित्तमें किसी प्रकारका क्षोभ भी न था। फिर निर्भीक एवं ब्रह्मचर्यसे रहकर श्रद्धाके साथ एकनिष्ठ होकर उन्होंने मुझमें अपने चित्तको लगाया। इस प्रकार सायंकालकी संध्या समाप्त हुई। पर रात्रिमें पुनः चिन्ता और शोकके कारण उनका मन सहसा क्षुब्ध हो उठा और इस प्रकार पिण्डदानकी क्रिया करनेसे उनके मनमें महान् पश्चात्ताप हुआ। वे सोचने लगे—'अहो, मैंने जो श्राद्ध-तर्पणकी क्रियाएँ की हैं, इन्हें आजतक किन्हीं मुनियोंने तो नहीं किया है। जन्म और मृत्यु पूर्वकर्मके फलसे सम्बद्ध हैं। पुत्रकी मृत्युके बाद मैंने जो तर्पण किया, यह अपवित्र कार्य है। अहो! स्नेह एवं मोहके कारण मेरी बुद्धि नष्ट हो गयी थी। इसीसे मैंने यह कर्म किया। पितृ-पदपर स्थित जो देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, उरग और राक्षस आदि हैं, वे अब मुझे क्या कहेंगे।'
वसुंधरे! इस प्रकार निमि सारी रात चिन्तामें व्यग्र रहे। फिर रात्रि बीती, सूर्य उदित हुए। फिर निमिने प्रातःसंध्या कर, जैसे-तैसे अग्निहोत्र किया। पर वे चिन्ता-दुःखसे पुनः संतप्त हो उठे और अकेले बैठकर प्रलाप करने लगे। उन्होंने कहा—'ओह! मेरे कर्म, बल एवं जीवनको धिक्कार है। पुत्रसे सभी सुख सुलभ होते हैं। पर आज मैं उस सुपुत्रको देखनेमें असमर्थ हूँ। विवेकी पुरुषोंका कथन है कि 'पूतिका' नामका नरक घोर क्लेशदायक है, पर पुत्र इससे रक्षा करता है। अतः सभी मनुष्य इस लोक तथा परलोकके लिये ही पुत्रकी इच्छा करते हैं। अनेक देवताओंकी पूजा, विविध प्रकारके दान तथा विधिवत् अग्निहोत्र करनेके फलस्वरूप मनुष्य स्वर्गमें जानेका अधिकारी होता है, पर वही स्वर्ग पिताको पुत्रद्वारा सहज ही सुलभ हो जाता है। यही नहीं, पौत्रसे पितामह तथा प्रपौत्रसे प्रपितामह भी आनन्द पाते हैं। अतः अब अपने पुत्रके बिना मैं जीवित नहीं रहना चाहता हूँ।'
देवि! इस प्रकार वे चिन्तासे अत्यन्त दुःखी हो रहे थे कि देवर्षि नारद सहसा उन निमिके आश्रममें पहुँच गये। उस अलौकिक आश्रममें सभी ऋतुएँ अनुकूल थीं। अनेक प्रकारके फल-फूल एवं जल उपलब्ध थे। स्वयंप्रकाशसे प्रकाशमान नारदजी निमिके आश्रमके भीतर गये। धर्मज्ञ निमिने उन्हें आया देखकर उनका स्वागत और पूजन किया। देवि! उस समय निमिके द्वारा आसन, पाद्य एवं अर्घ्य आदि दिये गये। नारदजीने उन्हें ग्रहणकर फिर उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया।
नारद बोले—'निमे! तुम्हारे-जैसे ज्ञानी पुरुषको इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिये। जिनके प्राण चले गये हैं, उनके लिये तथा जिनके प्राण नहीं गये हैं, उनके लिये पण्डितजन शोक नहीं करते। यदि कोई मर जाय, नष्ट हो जाय अथवा कहीं चला जाय, इनके लिये जो व्यक्ति शोक करता
३३८ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १८७
है, उसके शत्रु हर्षित होते हैं। जो मर गया, नष्ट हो गया, वह पुनः लौट आये, यह सम्भव नहीं है। चर और अचर प्राणियोंसे सम्पन्न इन तीनों लोकोंमें मैं किसीको अमर नहीं देखता। देवता, दानव, गन्धर्व-मनुष्य, मृग—ये सभी कालके ही अधीन हैं। तुम्हारा पुत्र ‘श्रीमान्’ निश्चय ही एक महान् आत्मा था। उसने पूरे दस हजार वर्षोंतक अत्यन्त कठिन तपस्याकर परम दिव्य गति प्राप्त की है। इन सब बातोंको जानकर तुम्हें सोच नहीं करना चाहिये।’
नारदजीके इस प्रकार कहनेपर निमिने उनके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम किया। किंतु फिर भी उनका मन पूरा शान्त न हुआ। वे बारम्बार दीर्घ साँस ले रहे थे और उनका हृदय करुणासे व्याप्त था। वे लज्जित होकर कुछ डरते हुए-से गद्गदवाणीमें बोले—‘मुनिवर! आप अवश्य ही महान् धर्मज्ञानी पुरुष हैं। आपने अपनी मधुर वाणीद्वारा मेरे हृदयको शान्त कर दिया। फिर भी प्रणय, सौहार्द अथवा स्नेहके कारण मैं कुछ कहना चाहता हूँ, आप उसे सुननेकी कृपा कीजिये। मेरा चित्त एवं हृदय इस पुत्रशोकसे व्याकुल है। अतएव मैं उसके लिये संकल्प करके अपसव्य होकर श्राद्ध, तर्पण आदि क्रियाएँ कर चुका हूँ। साथ ही सात ब्राह्मणोंको अन्न एवं फल आदिसे तृप्त किया है तथा जमीनपर कुशा बिछाकर पिण्ड अर्पण किये हैं। द्विजवर! पर अनार्य पुरुष ही ऐसा कर्म करता है, इससे स्वर्ग अथवा कीर्ति उपलब्ध नहीं हो सकती। मेरी बुद्धि मारी गयी थी। मैं कौन हूँ—यह मुझे स्मरण न था। अज्ञानसे मोहित होनेके कारण यह काम मैं कर बैठा। पहलेके किसी भी देवता-ऋषियोंने ऐसा काम नहीं किया है। प्रभो! मैं ऊहापोहमें पड़ा हूँ कि कहीं मुझे कोई प्रत्यवाय या शाप न लग जाय।’
नारदजी बोले—‘द्विजश्रेष्ठ! तुम्हें भय नहीं करना चाहिये। मेरे देखनेमें यह अधर्म नहीं, किंतु परम धर्म है। इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिये। अब तुम अपने पिताकी शरणमें जाओ।’
नारदजीके इस प्रकार कहनेपर निमिने अपने पिताका मन, वाणी और कर्मसे ध्यानपूर्वक शरण ग्रहण किया और उनके पिता भी उसी समय उनके सामने उपस्थित हो गये। उन्होंने निमिको पुत्र-शोकसे संतप्त देखकर उन्हें कभी व्यर्थ न होनेवाले अभीष्ट वचनोंद्वारा आश्वासन देना आरम्भ किया—‘निमे! तुम्हारे द्वारा जो संकल्पित कार्य हुआ है, तपोधन! यह ‘पितृयज्ञ’ है। स्वयं ब्रह्माने इसका नाम ‘पितृयज्ञ’ रखा है। तभीसे यह धर्म ‘व्रत’ एवं ‘क्रतु’ नामसे अभिहित होता आया है। बहुत पहले स्वयंभू ब्रह्माने भी इसका आचरण किया था। उस समय विधिके उत्तम जानकार ब्रह्माने जो यज्ञ किया था, उसमें श्राद्धकर्मकी विधि और प्रेत-कर्मका विधान है। उसे उन्होंने नारदको भी सुनाया था।
भगवान् वराह कहते हैं—सुन्दरि! अब मैं ब्रह्माद्वारा उपदिष्ट उस श्राद्धविधिका भलीभाँति प्रतिपादन करता हूँ, सुनो। इससे ज्ञात हो जायगा कि पुत्र पिताके लिये किस प्रकार श्राद्ध करता है। जितने प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबकी समयानुसार मृत्यु हो जाती है। चींटी आदिसे लेकर जितने भी जन्तु हैं, उनमें किसीको मैं अमर नहीं देखता; क्योंकि जिसका जन्म होता है, उसकी मृत्यु और जो मरता है, उसका जन्म
अध्याय १८७ ] सृष्टि और श्राद्धकी उत्पत्ति-कथा एवं पितृयज्ञका वर्णन [ ३३९
निश्चित है। हाँ, कोई विशेष कर्म अथवा प्रायश्चित्तका सहयोग प्राप्त होनेसे मोक्ष होना भी निश्चित है।^१ सत्त्व, रज और तम—ये तीनों शरीरके गुण कहे जाते हैं। कुछ दिनोंके पश्चात् युगके अन्तमें मनुष्य अल्पायु हो जायँगे। तमोगुणकी प्रधानतावाले मानव कर्म-दोषके प्रभावसे सात्त्विक विषयपर ध्यान नहीं देते, अतः उस कर्मके प्रभावसे उन्हें नरकमें जाना पड़ता है। फिर अगले जन्मोंमें उन्हें पशु, पक्षी अथवा राक्षसकी योनि मिलती है। वेदको जाननेवाले सात्त्विक ज्ञानी लोग धर्म, ज्ञान और वैराग्यके सहारे मुक्ति-मार्गकी ओर अग्रसर होते हैं। क्रूर, भयभीत, हिंसक, निर्लज्ज, अज्ञानी, श्रद्धाहीन मनुष्यको और पिशाचके समान व्यवहार करनेवालेको तमोगुणी जानना चाहिये। उसे कोई अच्छी बात बतायी जाय तो वह समझता नहीं है। इसी प्रकार पराक्रमी, अपने वचनके पालन करनेवाले, स्थिरबुद्धि, सदा संयमशील, शूरवीर तथा प्रसिद्ध व्यक्तिको राजस पुरुष मानना चाहिये। जो क्षमाशील, इन्द्रियविजयी, परम पवित्र, उत्तम ज्ञानवान्, श्रद्धालु तथा तप एवं स्वाध्यायमें सदा संलग्न रहते हैं, वे सात्त्विक पुरुष हैं।
ब्रह्माजीने निमिसे कहा था—पुत्र! इस प्रकार सोच-विचारकर तुम्हें शोक करना अनुचित है; क्योंकि शोक सबका संहारक है। वह लोगोंके शरीरको जला देता है, उसके प्रभावसे मनुष्यकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। लज्जा, धृति, धर्म, श्री, कीर्ति, नीति तथा सम्पूर्ण शोकाकुल मनुष्यका परित्याग कर देते हैं।^२ अतएव पुत्र! तुम शोकका त्याग करके परम सुखी बननेका प्रयत्न करो। मूर्ख मनुष्य मोहवश हिंसा तथा मिथ्या-भाषण करनेमें तत्पर हो जाता है। ऐसे मनुष्यको अपने दोषोंके कारण घोर नरकमें निवास करना पड़ता है, अतः अब मैं धार्मिक जगत्का कल्याण होनेके लिये सच्ची बात बताता हूँ, तुम उसे सुनो। सम्पूर्ण संसारसे आसक्ति हटाकर धर्ममें बुद्धिको लगाना चाहिये—यह सार वस्तु है। स्वायम्भुव मनुने जो कहा है तथा तुमने जो श्राद्ध किया है, इसपर विचार करके मैं चारों वर्णोंके लिये विधान बतलाता हूँ, उसे सुनो।
जिस समय प्राण कण्ठस्थानपर पहुँच जाता है, उस समय मनुष्य भय और भ्रान्तिवश अत्यन्त घबड़ा जाता है और वह सभी दिशाओंमें दृष्टि डालनेमें असमर्थ हो जाता है। किसी क्षणमें स्मृति भी आ जाती है। माधवि! जीवकी जबतक आँख नहीं खुलती, तबतक भूमिके देवता ब्राह्मणगण स्नेहपूर्वक सामने सत्-शास्त्र पढ़ें और यथायोग्य दान आदि धर्म कराना समुचित है। दूसरे लोकमें उस प्राणीका कल्याण हो—इसलिये गोदान करना चाहिये। इसकी विशेष महिमा है, धरातलपर विचरना और अमृत-तुल्य दुग्ध प्रदान करना गौका स्वाभाविक गुण है। इसके दानसे मनुष्य यथाशीघ्र तापसे छूट जाता है। इसके बाद मरणासन्न प्राणीके कानमें श्रुतिकथित दिव्य मन्त्र सुनाना चाहिये। जब प्राणी अत्यन्त विवश हो जाय तो मनुष्य उसे देखकर मन्त्र पढ़कर मरणकालोचित कर्म विधिपूर्वक सम्पन्न करे। इस
१. जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। मोक्षः कर्मविशेषेण प्रायश्चित्तेन निश्चितम्॥
(१८७।८७)
२. शोको दहति गात्राणि बुद्धिः शोकेन नश्यति। लज्जा धृतिश्च धर्मश्च श्रीः कीर्तिश्च स्मृतिर्वयः॥
त्यजन्ति सर्वधर्माश्च शोकेनोपहतं नरम्। (१८७। ९७८, तुलनीय-वाल्मी०रामा० २।६२। १५-१६ आदि)
१५४- श्राद्ध और पितृयज्ञकी विधि तथा दानका प्रकरण
| ३४० | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १८८ |
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मन्त्रमें सम्पूर्ण संसारसे प्राणीको मुक्त करनेकी शक्ति है। फिर तत्काल मधुपर्क हाथमें लेकर कहे—'ओंकारस्वरूप भगवन्! आप मेरा अर्पण किया हुआ मधुपर्क स्वीकार करनेकी कृपा करें। यह परम स्वच्छ संसारमें आने-जानेका नाशक, अमृतके समान भगवत्प्रेमी व्यक्तियोंके लिये नारायणरचित, दाह मिटानेवाला तथा देवलोकमें परम पूजनीय है। यह कहकर उसे मरणासन्न प्राणीके मुखमें डाल दे। इसके फलस्वरूप व्यक्ति परलोकमें सुख पाता है। इस प्रकारकी विधि सम्पन्न होनेपर यदि प्राण निकलते हैं तो वह प्राणी फिर संसारमें जन्म नहीं पाता। मृत प्राणीकी सद्गतिके उद्देश्यसे उसे वृक्षके नीचे ले जाकर अनेक प्रकारके गन्धों तथा घृत, तेलके द्वारा उस प्राणीके शरीरका शोधन करे। साथ ही तैजस एवं अविनाशी सभी कार्य उसके लिये करना उचित है। जलके संनिकट दक्षिणकी ओर पैर करके लेटा देना चाहिये। तीर्थ आदिका आवाहन करके उसे स्नान करानेका विधान है। गया आदि जितने तीर्थ, ऊँचे, विशाल एवं पुण्यमय पर्वत, कुरुक्षेत्र, गङ्गा, यमुना, कौशिकी, पयोष्णी, गण्डकी, भद्रा, सरयू, बलदा, अनेक वन, वराहतीर्थ, पिण्डारक्षेत्र, पृथ्वीके सम्पूर्ण तीर्थ तथा चारों समुद्र—इन सभीका मनमें ध्यान करके मृत प्राणीको उस जलसे स्नान कराना चाहिये। फिर विधिके अनुसार उसे चितापर रखना चाहिये। उसके पैर दक्षिणकी दिशामें हों। प्रधान दिव्य अग्नियोंका ध्यान करके हाथमें अग्नि उठा ले। उसे प्रज्वलित करके विधिवत् यह मन्त्र पढ़ना चाहिये। मन्त्रका भाव है—'अग्निदेव! यह मानव जाने अथवा अनजाने जो कुछ भी कठिन काम कर चुका है, किंतु अब मृत्युकालके अधीन होकर यह इस लोकसे चल बसा। धर्म, अधर्म, लोभ और मोहसे यह सदा सम्पन्न रहा है। फिर भी आप इसके गात्रोंको भस्म कर दें और यह स्वर्गलोकमें चला जाय।' इस प्रकार कहकर प्रदक्षिणा कर जलती हुई अग्नि उसके सिरके स्थानमें प्रज्वलित कर दे। फिर तर्पणकर मृत व्यक्तिका नाम लेकर पृथ्वीपर उसके लिये पिण्ड दे। पुत्र! चारों वर्णोंमें इसी प्रकारका संस्कार होता है। फिर शरीर और वस्त्रोंको धोकर वहाँसे लौटना चाहिये। उसी समयसे दस दिनपर्यन्त सभी सगोत्रके लोग अशौचके भागी बन जाते हैं और उन्हें देवकर्मोंमें अधिकार नहीं रह जाता है।
[अध्याय १८७]
अशौच, पिण्डकल्प और श्राद्धकी उत्पत्तिका प्रकरण
धरणीने कहा— माधव! प्रभो! अब मैं आपसे 'अशौच'–सम्बन्धी कर्मको विधिवत् सुनना चाहती हूँ, आप उसे बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् वराह कहते हैं— कल्याणि! जिस प्रकार अशौचसे मनुष्योंकी शुद्धि होती है, वह सुनो। क्षयाहके तीसरे दिन श्राद्धकर्ता नदीके जलसे स्नान कर चूर्णसे निर्मित तीन पिण्ड एवं तीन अञ्जलि जल दे। चौथे, पाँचवें और छठे दिन, सातवें दिन भी ऐसे ही एक-एक पिण्ड तथा जल देनेका विधान है। पिण्डकी जगह पृथक्-पृथक् हो। दस दिनपर्यन्त क्रमशः इस प्रकारकी विधिका पालन करना आवश्यक है।
अध्याय १८८ ] अशौच, पिण्डकल्प और श्राद्धकी उत्पत्तिका प्रकरण ३४१
दसवें दिन क्षौर-कर्म कराकर दूसरा पवित्र वस्त्र धारण करना चाहिये। गोत्रके सभी स्वजन तिल, आँवला और तेल लगाकर स्नान करें। दसवें दिन बाल बनवाकर विधिपूर्वक स्नान करनेके पश्चात् भाई-बन्धुओंके साथ अपने घर जाना चाहिये। ग्यारहवें दिन समुचित विधिसे एकोद्दिष्ट श्राद्ध करनेका नियम है। स्नान करके शुद्ध होनेके बाद अपने उस प्रेतको अन्य पितरोंमें सम्मिलित करनेके लिये पिण्ड दे। माधवि! चारों वर्णोंके मनुष्योंके लिये एकोद्दिष्टका विधान एक समान है। तेरहवें दिन ब्राह्मणोंको श्रद्धापूर्वक पक्वान्न भोजन कराना चाहिये। इसमें जिस दिवंगत व्यक्तिके लिये श्राद्ध किया जाता हो, उसका नाम लेकर संकल्प करना आवश्यक है। इसके लिये पहले ब्राह्मणके घरपर जाकर स्वस्थ चित्तसे नम्रतापूर्वक निमन्त्रण देना चाहिये। देवि! उस समय मन-ही-मन यह मन्त्र पढ़ना चाहिये, जिसका भाव है—'विप्रवर! तुम इस समय यमराजके आदेशानुसार दिव्य लोकमें पहुँच गये हो, अब वायुका रूप धारण करके मानसिक प्रयत्नद्वारा इस ब्राह्मणके शरीरमें स्थित होनेकी कृपा करो।' फिर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणको नमस्कार करके पाद्यार्पण करना चाहिये।
सुन्दरि! उस समय ब्राह्मणके शरीरमें प्रेतके विग्रहकी कल्पनाकर उसका हित करनेके विचारसे पाद-संवाहन (पैर दबाना) आदि कार्य परम उपयोगी है। भूमे! मनुष्यका कर्तव्य है कि अशौचके दिनोंमें मेरे गात्रका स्पर्श न करे। रात बीत जानेपर प्रातःकाल सूर्योदयके पश्चात् श्राद्धकर्ताको विधिपूर्वक बाल बनवाकर तेल आदि लगाकर स्नान करना चाहिये। फिर पृथ्वीको स्वच्छ करके यहाँ वेदी बनाये। इसका उपयुक्त देश नदीतट अथवा श्राद्धकर्मके लिये निश्चित भूमि है। ऐसे स्थानपर पिण्डदान करना उत्तम है। चौंसठ पिण्ड देनेसे यथार्थ सुकृत सुलभ होता है। सुन्दरि! दक्षिण और पूर्वकी ओर मुख करके ये सभी पितृभाग सम्पन्न होते हैं। नदीके तटपर वृक्षके नीचे अथवा कुंजर* (पीपल) वृक्षकी छायामें भी इस कार्यको करनेका विधान है। उस स्थानपर हीन प्राणियोंकी दृष्टि न पड़े। जिस स्थानमें प्रेत-सम्बन्धी कार्य किये जायँ, वहाँ मुर्गा, कुत्ता, सूकर प्रभृति पशु-पक्षियोंका प्रवेश या नेत्र-दृष्टि निषिद्ध हैं। उनके शब्द भी वहाँ नहीं होने चाहिये। वसुंधरे! मुर्गेकी पाँख-सम्बन्धी वायुसे तथा चण्डालकी दृष्टिसे युक्त स्थानमें श्राद्ध करनेसे पितरोंको बन्धन प्राप्त होता है।
सुन्दरि! इसलिये विवेकी मनुष्यका परम कर्तव्य है कि वे प्रेतकार्यमें इनका उपयोग न करें। देवता, दानव, गन्धर्व, उरग, नाग, यक्ष-राक्षस, पिशाच तथा स्थावर और जङ्गम आदि जितने प्राणी हैं, वे सभी तुम्हारे पृष्ठभागपर प्रतिष्ठित हो स्नान आदि क्रियाएँ यथावसर करते रहते हैं। यह सारा जगत् भगवान् विष्णुकी मायाका क्षेत्र है। चण्डालसे लेकर ब्राह्मणपर्यन्त सभी वर्णके मनुष्य शुभ अथवा अशुभ कार्य करनेके लिये स्वतन्त्र हैं। भूमे! इसलिये आवश्यकता यह है कि प्रेत-कार्य करनेके समय पहले स्नानपूर्वक स्थानकी
* संस्कृतके कोशोंमें 'कुञ्जर' शब्दके अनेक अर्थ हैं, जिनमें यह पीपल वृक्ष भी एक है, किंतु इस अर्थमें इसका प्रयोग प्रायः नहीं मिलता, जो यहाँ दृष्ट होता है।
| ३४२ | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय १८८ |
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शुद्धि करे। भूमिको बिना पवित्र किये श्राद्ध करना अनुपयुक्त होता है। भद्रे! जगत् तुमपर आधारित है और तुम स्वभावतः शुद्ध हो। पर अपवित्र कार्योंके द्वारा तुम्हें दूषित बना दिया जाता है। इसलिये कभी बिना पवित्र किये स्थानपर श्राद्ध नहीं करना चाहिये; क्योंकि उसे देवता और पितर स्वीकार नहीं करते। यहाँतक कि उस उच्छिष्ट स्थानके प्रभावसे उन्हें घोर नरकमें गिरना पड़ता है। अतएव स्थानकी शुद्धि करके ही प्रेतको पिण्ड देना चाहिये। माधवि! नाम और गोत्रके साथ संकल्प करके पिण्ड अर्पण करनेकी विधि है। यह सभी कार्य पूरा हो जानेपर अपने गोत्र एवं कुल-सम्बन्धी सभी सज्जन एक स्थानपर बैठकर भोजन करें। चारों वर्णोंके लिये प्रेत-निमित्त कार्योंमें यही नियम है।
देवि! इस प्रकार पिण्डदान करनेसे प्रेतलोकमें गये हुए प्राणी पूर्णतः तृप्त हो जाते हैं। जो असपिण्ड मनुष्य पिण्ड दान नहीं करता, किंतु अशौचग्रस्त व्यक्तियोंके भोजनमें सम्मिलित रहता है, उसकी भी शुद्धि आवश्यक है। वह किसी नदीपर जाकर वस्त्रसहित उसमें स्नान करे। यदि वह वहाँ जानेमें असमर्थ हो तो मानसिक तीर्थयात्रा करके मन्त्रमार्जनपूर्वक जलके छींटे दे। माधवि! उस समय पूर्ण स्वस्थ पुरुषको चाहिये कि ब्राह्मणके लिये अर्घ्य एवं पाद्य अर्पण करे। सर्वप्रथम मन्त्र पढ़कर विधिपूर्वक आसन देनेका नियम है। आसनके मन्त्रका भाव यह है—'द्विजवर! आपकी सेवामें यह आसन प्रस्तुत है। आप इसपर विश्राम करें। विप्रवर! साथ ही परम प्रसन्न होकर मुझे कृतार्थ करना आपकी कृपापर ही निर्भर है।' जब ब्राह्मण आसनपर बैठ जायँ, तब संकल्पपूर्वक छातेका दान करना चाहिये। आकाशमें बहुत-से देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस एवं सिद्धोंका समुदाय तथा पितरोंका समाज उपस्थित रहता है, जो अत्यन्त तेजस्वी होते हैं। अतः उनसे तथा आतपवर्षादिसे बचनेके लिये छत्र धारण करना आवश्यक है। वसुंधरे! प्रेतका हित हो, इस विचारसे भी छत्र-दान अनिवार्य है। पहले प्रसन्नतापूर्वक प्रेतभाग देना चाहिये। प्रेत किसी आवरणके नीचे रहे, इसलिये भी उसके निमित्त ब्राह्मणको छत्र-दान करना परम उपयोगी है। देवता-दानव, सिद्ध-गन्धर्व तथा मांसभक्षी राक्षस आकाशमें रहकर नीचे देखते रहते हैं। उन सबकी दृष्टि पड़नेपर प्रेत विशेष लज्जाका अनुभव करता है। जब प्रेत लज्जित हो जाता है तो उसे देखकर असुर एवं राक्षस उसका उपहास करते हैं। इसलिये बहुत पहलेसे ही भगवान् आदित्यने इसके निवारणके निमित्त छत्रकी व्यवस्था कर रखी है।
देवि! पूर्वकालकी बात है एक बार अनेक देवता एवं ऋषि प्रेतलोकमें पहुँचे, पर वहाँ उनपर अग्नि, पत्थर, जलते हुए जल तथा भस्मकी दिन-रात वर्षा होने लगी। उसी उपद्रवको शान्त करनेके लिये भगवान् आदित्यको छत्रकी व्यवस्था करनी पड़ी थी, अतः प्रेत-कार्यमें ब्राह्मणको छत्र-दान अवश्य करना चाहिये।
शुभे! इसके पश्चात् उपानह (जूता) दान करनेका भी विधान है। इसे धारण करनेसे पैरोंको आराम पहुँचता है। इसके दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह भी बताता हूँ। यमराजकी पुरीमें जाते समय उपानह-दान करनेसे प्रेतके पैर नहीं तपते। यममार्ग अत्यन्त अन्धकारसे व्याप्त, महान् कठिन एवं देखनेमें भयावह है। उसी
अध्याय १८८] अशौच, पिण्डकल्प और श्राद्धकी उत्पत्तिका प्रकरण ३४३
मार्गसे यमके लोकमें प्राणी अकेले ही जाता है। वहाँ यमराजके दूत पीछे-पीछे दण्ड लेकर शासन करनेमें सदा तत्पर रहते हैं। माधवि! दिन-रात दूतकी चेष्टा प्रेतको यमपुरीमें ले जानेके लिये बनी रहती है। अतः पैर सुखपूर्वक काम करते रहें—इस निमित्त ब्राह्मणको उपानहका दान करना अत्यन्त आवश्यक है। यमपुरीके मार्गकी भूमिपर तपती हुई बालुकाएँ बिछी रहती हैं। कण्टक भी बिखरे रहते हैं। ऐसी स्थितिमें वह उस दिये गये उपानहकी सहायतासे कठिन मार्गको पार कर पाता है।
भूमे! इसके पश्चात् मन्त्र पढ़कर धूप और दीप देनेका विधान है। प्रेतके साथ पृथक्-पृथक् इनकी योजना उपयुक्त है। नाम और गोत्रके उच्चारणसे प्रेत उन्हें प्राप्त करता है। इसके बाद भूमिपर कुश बिछाकर प्रेतका आवाहन करना चाहिये। आवाहनके मन्त्रका भाव यह है—'प्रेत! तुम इस लोकको परित्यागकर परमगतिको प्राप्त कर चुके हो। मैंने भक्तिपूर्वक तुम्हारे लिये यह गन्ध उपस्थित किया है, तुम प्रसन्न होकर इसे स्वीकार करो।' साथ ही विप्रके प्रति कहे—'विप्रवर! मेरे प्रयाससे ये सब प्रकारके गन्ध, पुष्प, धूप एवं दीप प्रेतके सेवार्थ समर्पित हैं। आप इन्हें स्वीकार करके प्रेतका उद्धार करनेकी कृपा करें।'
वसुंधरे! इसी प्रकार प्रेतके निमित्त सिद्ध अन्न, वस्त्र एवं आभूषण भी ब्राह्मणको दान करना चाहिये। माधवि! प्रेतके उपभोगके योग्य अनेक द्रव्य-दान करनेके पश्चात् तीन बार अपने पैरकी शुद्धि भी समुचित है। चारों वर्णोंको ऐसी ही विधिको पालन करना चाहिये। ग्रहीता ब्राह्मण भी मन्त्रका उच्चारण करके ही दातव्य वस्तु ग्रहण करे। प्रेतश्राद्धमें भोजन करनेवाले ब्राह्मणको ज्ञानी एवं शुद्धस्वरूप होना अनिवार्य है। सर्वप्रथम प्रेतके लिये अन्न देना चाहिये। उस समय एक-दूसरेका स्पर्श होना निषिद्ध है। उन सभी व्यञ्जनोंकी कल्पना प्रेतके निमित्त ही हो—ऐसा नियम है। सुव्रते! प्रेतके लिये पिण्डदान करते समय देवता और ब्राह्मण भी भाग पानेके अधिकारी हैं। बुद्धिमान् पुरुषको इस बातपर सदा ध्यान रखना चाहिये कि ऐसे अवसरोंपर मानवोचित व्यवहार भी बना रहे। विधिके साथ मन्त्र पढ़कर पितृतीर्थसे* पिण्ड अर्पण करना चाहिये। इस प्रकारके कार्य प्रेतों और ब्राह्मणोंके लिये स्वल्पान्तरके समयसे होना उचित है। प्रेतकार्यसे निवृत्त होकर हाथ-पैर धोना तथा विधिवत् आचमन करना चाहिये। फिर मन्त्रपूर्वक भक्षण करनेके योग्य सिद्ध अन्न हाथमें उठाये। जो ब्राह्मण प्रेतकार्यमें सदासे भोजन करता हो, अपनी जाति, बन्धु एवं गोत्रोंमें जो भोजनका अधिकारी हो तथा जिसके लिये जैसा उचित हो, उसको समुचित रूपसे वैसा ही भाग देना चाहिये। ब्राह्मणको जब कुछ दिया जा रहा हो, उस समय किसीको मना नहीं करना चाहिये। यदि कोई दूसरा दान करता हो और कोई दूसरा उसे रोकता है तो गुरुकी हत्या-जैसे बुरे फलका भागी होता है। यही नहीं, ऐसे व्यक्तिके दिये हुए पदार्थको देवता, अग्नि और पितर भी ग्रहण नहीं करते और प्रेतको भी
* अँगूठे तथा तर्जनी अँगुलीके बीचका स्थान 'पितृतीर्थ' कहलाता है—'कायमङ्गुलिमूलेऽग्रे दैवं पित्र्यं तयोरधः।' (मनु० २।५९ तथा द्रष्टव्य भविष्यपुराण १।१३। ६१–९५; बौधायनधर्मसूत्र ५।१४–१८, याज्ञवल्क्यस्मृति १।१९ आदिकी व्याख्याएँ।)
| ३४४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १८८ |
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प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती है। अतएव मनुष्यको ऐसा कार्य करना चाहिये कि जिससे दान-धर्मका लोप न हो सके। जातिवाले तथा सम्बन्धियोंके बीच प्रसन्नमनसे जो ब्राह्मणको विशेषरूपसे प्रेतभाग भोजनके लिये प्रदान करता है, उसकी अचल प्रतिष्ठा होती है, केवल देखनेमात्रसे कोई तृप्त नहीं होता। इस प्रकार प्रेतकी भावना करके भोजन आदि पदार्थ अर्पण करनेके प्रभावसे प्राणी यथाशीघ्र पापसे मुक्त हो जाता है।
शान्तिके लिये जलसे विधिवत् स्नानकर सिर झुकाकर प्रणाम करना चाहिये। तत्पश्चात् पितरोंके लिये दान देनेके स्थानपर आ जाय। देवि! तुम्हारी भक्तिमें निष्ठा रखते हुए मानवको इन मन्त्रोंको पढ़कर स्तुति करनेकी विधि है। मन्त्रका भाव यह है—'वसुधे! आप जगत्की माता हैं तथा मेदिनी, उर्वी, महाशैलशिलाधारा—आदि नामोंसे विभूषित हैं। आप जगत्की जननी तथा उसे आश्रय प्रदान करनेवाली हैं। जगत् आपपर आधारित है। आपको मेरा निरन्तर नमस्कार है।' सुन्दरि! इस विधिसे जब भक्त पिण्डदान करता है तो उसे महान् पुण्य प्राप्त होता है। फिर प्रेतके नाम और गोत्रका उच्चारण करके तिलोदक देना चाहिये। साथ ही दोनों घुटनोंको जमीनपर टेककर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको नमस्कार करे। मन्त्रपूर्वक अपने हाथसे ब्राह्मणका हाथ पकड़कर उठाये और उन्हें शय्यापर बैठाकर अञ्जन आदि वस्तुओंको अर्पित करे। कुछ क्षणतक वहाँ विश्राम करके निवाप (श्राद्ध)-स्थानपर आ जाय और गौकी पूँछ पकड़कर ब्राह्मणके हाथमें उसका दान करना चाहिये। गूलरकी लकड़ीसे बने हुए पात्रमें काला तिल और जल लेकर द्विजातिगण 'सौरभेय्यः सर्वहिताः०'—'इन मन्त्रोंका उच्चारण करे। मन्त्रसे जब जलकी शुद्धि हो जाती है तो उसके उपयोगसे सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। इसके बाद प्रेतका विसर्जन करके ब्राह्मणको दान देना उचित है। अन्तमें अपसव्य रूपसे काकबलि देनी चाहिये। इसके बाद प्रेतके लिये बने हुए पदार्थसे चींटी आदि प्राणियोंके लिये भी सम्यक् प्रकारसे बलि देकर तर्पण करनेकी विधि है। माधवि! सब लोग भोजन कर लें, इसके बाद अनाथों और गरीबोंको भी संतुष्ट करना चाहिये। इससे वे यमपुरीमें जाकर मृत प्राणीकी सहायता करते हैं। सुन्दरि! अनाथोंको दिया हुआ सम्पूर्ण अन्न अक्षय हो जाता है। अतः प्रेतका संस्कार अवश्य करना चाहिये।
इस प्रकार चारों वर्णोंके लिये निमि प्रभृति आदर्श ऋषियों तथा स्वायम्भुव आदि मनुओँने सब प्रकारसे शुद्ध होनेके नियम प्रदर्शित किये हैं। अतः इससे पुरुष शुद्ध होता है, इसमें कोई संदेह नहीं। प्रेतसम्बन्धी कार्यमें धर्मपूर्वक संकल्प करनेकी विशेष आवश्यकता है। आत्रेयने भी कहा था—'पुत्र! तुमने जो प्रेतकार्य किया है और इसके विषयमें भयका अनुभव करते हो, यह कार्य अनुचित है। यह प्रसङ्ग मैं नारदके सामने विस्तारसे व्यक्त कर चुका हूँ। पुत्र! तुम्हारे लिये मैं एक यज्ञकी प्रतिष्ठा कर देता हूँ। आजसे लेकर यह यज्ञ अखिल जगत्में पितृयज्ञके नामसे प्रसिद्ध होगा। वत्स! अब तुम जा सकते हो। शोक करना तुम्हारे लिये अशोभनीय है। ब्रह्मा, विष्णु और शिवके लोकमें रहनेका तुम्हें सुअवसर मिलेगा। इसमें कोई संशय नहीं।'
इस प्रकार पितृसम्बन्धी कर्मका वर्णन करके
१५५- 'मधुपर्क' की विधि और शान्तिपाठकी महिमा
अध्याय १८९ ] श्राद्धके दोष और उसकी रक्षाकी विधि ३४५
आत्रेय मुनिने निमिको आश्वासन दिया। अतएव तीसरे, सातवें, नवें, ग्यारहवें मासोंमें सांवत्सरिक क्रियाका नियम चल पड़ा। इन मासोंमें पिण्डदानकी विधि बन गयी है। प्रेतका यह कार्य पूरे एक वर्षमें पूर्ण होता है। कितने प्राणी इस लोकसे जाते हैं और जाकर बहुतोंको अन्य लोकमें भी पहुँचना पड़ता है। पिता-पितामह, पुत्रवधू, स्त्री, जातिवाले, सम्बन्धीजन और बन्धु एवं बान्धव—इन बहुसंख्यक प्राणियोंसे सम्बन्ध रखनेवाला यह संसार स्वप्नके समान मिथ्या और सारहीन है। किसीकी मृत्यु हो गयी तो उसका स्वजन कुछ समय रोता है और फिर मुँह पीछे करके लौट जाता है। स्नेहरूपी बन्धनसे प्राणी जकड़ा हुआ है। फिर आधे क्षणमें वह स्नेह-बन्धन कट भी जाता है। किसकी कौन माता, किसका कौन पिता, किसकी कौन स्त्री और किसके कौन पुत्र हैं! प्रत्येक युगमें इनके सम्बन्ध होते-टूटते रहते हैं। अतः इनपर कोई आस्था नहीं रखनी चाहिये। संसार मोहकी रस्सीमें बँधा है। मृतक व्यक्तिके लिये संस्कारकी विधि श्रद्धा एवं स्नेहपूर्वक की जाती है, इसीलिये उसे 'श्राद्ध' कहते हैं।
माता, पिता, पुत्र और स्त्री प्रभृति संसारमें आते हैं तथा चले भी जाते हैं। अतः वे किसके हैं और हमारा किससे सम्बन्ध है? मृत प्राणीके प्रेत-संस्कार सम्पन्न हो जानेपर वह पितरोंकी श्रेणीमें सम्मिलित हो जाता है। फिर प्रत्येक मासकी अमावास्या तिथिके दिन उसके लिये तर्पण करना चाहिये। ब्राह्मणके मुखमें हवन करनेसे अर्थात् ब्राह्मणको भोजन करानेसे पितामह एवं प्रपितामह सदाके लिये तृप्त हो जाते हैं। पितृयज्ञके प्रतिनिधि आत्रेयमुनिने इस प्रकारकी निश्चयात्मक बात बताकर कुछ समयतक भगवान् श्रीहरिका ध्यान किया और वहीं अन्तर्धान हो गये।
नारदजी कहते हैं— मुने! हमने आत्रेयके लिये जो संस्कार-सम्बन्धी बात बतायी है और तुमने उसका श्रवण भी किया है, वह प्रायः चारों वर्णोंसे सम्बन्ध रखता है, अतः उसे विधिपूर्वक करना चाहिये। तभीसे तपके परम धनी ऋषियोंके द्वारा प्रत्येक मासकी अमावास्याके दिन न्यायके अनुसार यह पितृयज्ञ होता आ रहा है। निमिद्वारा निर्दिष्ट यह यज्ञ द्विजातियोंको मन्त्रसहित और शूद्रवर्गको बिना मन्त्र पढ़े करना चाहिये—यह विधि है। तबसे इसका नाम 'नेमिश्राद्ध' पड़ गया और द्विजातिवर्णके प्राणी सदा इसे करते आ रहे हैं। महाभाग! तुम मुनिगणोंमें परम प्रतिष्ठित हो। तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जाना चाहता हूँ। माधवि! इस प्रकार कहकर नारदमुनि अमरावतीके लिये प्रस्थान कर गये। [अध्याय १८८]
श्राद्धके दोष और उसकी रक्षाकी विधि
धरणीने कहा— भगवन्! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चारों वर्णोंको जिस विधिसे श्राद्ध करना चाहिये, इन्हें जैसे अशौच लगता है और जैसे शुद्ध होते हैं तथा जिस विधिसे प्रेतकी सद्गतिके लिये भोजन आदि करानेका विधान है—यह प्रसङ्ग मैं सुन चुकी। प्रभो! ऐसा वर्णन मिलता है कि चारों वर्णोंके सभी व्यक्तियोंका कर्तव्य है कि उत्तम ब्राह्मणको ही दान दें। मेरे
| ३४६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १८९ ] |
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हृदयमें यह शङ्का है कि दान किसे देना उचित है? प्रेतश्राद्धका दान ग्रहण करना निन्दित एवं गर्हित कार्य है, अतः पुरुषोत्तम! आपसे मैं यह भी जानना चाहती हूँ कि विप्रसमाजमें जिस ब्राह्मणने प्रेतभाग स्वीकार कर लिया, वह क्या कर्म करे, जिससे उसके पाप दूर हो जायँ और दाताका भी श्रेय हो।
**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! जब पृथ्वीदेवीने इस प्रकार परम प्रभुसे प्रश्न किया तो शङ्ख एवं दुन्दुभियोंकी ध्वनि होने लगी। उस समय वराहरूपधारी भगवान् नारायणने भगवती वसुंधरासे कहा।
**भगवान् वराह बोले—**देवि! ब्राह्मण जिस प्रकार दाताका उद्धार कर सकते हैं, वह मैं तुम्हें बताता हूँ। जो ब्राह्मण अज्ञानमें प्रेतके निमित्त दिया हुआ अन्न ग्रहण कर लेता है, उसे शरीरकी शुद्धिके लिये एक दिन और रात निराहार रहकर प्रायश्चित्त करना चाहिये। ऐसा करनेसे वह ब्राह्मण शुद्ध हो जाता है। उसे पूर्वकी ओर बहनेवाली नदीमें विधिके अनुसार स्नानकर प्रातः-संध्या करनेके बाद तर्पण, अग्निमें तिलका हवन, शान्तिपाठ एवं मङ्गलपाठ करना चाहिये। फिर पञ्चगव्य-पान और मधुपर्कका सेवन परम शुद्धिका साधन है। तदनन्तर गूलरकी लकड़ीसे बने हुए पात्रमें शान्तिका जल लेकर वह ब्राह्मण अपने घरका मार्जन करे। पापोंको भस्म करनेके लिये देवताओंका मुख अग्निका काम करता है, अतः समस्त देवताओंका क्रमशः तर्पण, भूतोंके लिये बलि तथा इसके बाद ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। गौके दान करनेसे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, अतः गोदान भी करे। ऐसी विधिका पालन करनेसे परमगति होती है। जिसके पेटमें प्रेतनिमित्तक अन्न हो और काल-धर्मके अनुसार उसके प्राण प्रयाण कर जायँ तो वह ब्राह्मण कल्पपर्यन्त भयंकर नरकमें निवास करता है और उसे कठिन दुःख भोगने पड़ते हैं। बादमें उसे राक्षसकी योनि मिलती है। इसलिये दाता और भोक्ता—दोनोंको स्वकल्याणार्थ प्रायश्चित्त करना नितान्त आवश्यक है। माधवि! गौ, हाथी, घोड़ा तथा समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण सम्पत्तियाँ दानमें लेनेवाला ब्राह्मण भी यदि मन्त्रपूर्वक प्रायश्चित्तका कार्य सम्पन्न कर ले तो निश्चय ही उसमें दाताके उद्धार करनेकी शक्ति आ जाती है।
जो ज्ञानसे सम्पन्न तथा वेदका अभ्यास करनेमें सदा संलग्न रहता है, वह ब्राह्मण स्वयं अपनेको एवं दाताको तारनेमें पूर्ण समर्थ है—इसमें कोई संशय नहीं। वसुंधरे! तीनों वर्णोंका परम कर्तव्य है कि वे कभी भी ब्राह्मणका अनादर न करें। देवकार्यके अवसरपर, जन्मनक्षत्रके दिन, श्राद्धकी तिथिमें, किसी पर्वकालपर अथवा प्रेत-सम्बन्धी कार्यमें प्रवीण ब्राह्मणको सम्मिलित करे। जो वैदिक विद्या जानता हो, जिसकी व्रतमें निष्ठा हो, जो सदा धर्मका पालन करता हो, शीलवान्, परम संतोषी, धर्मज्ञानी, सत्यवादी, क्षमासे सम्पन्न, शास्त्रका पारगामी तथा अहिंसाव्रती हो, ऐसे ब्राह्मणको पाकर उसे तुरंत दान देना चाहिये। वही ब्राह्मण दाताका उद्धार करनेमें समर्थ है। 'कुण्ड' अथवा 'गोलक' ब्राह्मणको दिया हुआ दान निष्फल हो जाता है।* वह
* पिताके रहते हुए जार पुरुषसे जिसकी उत्पत्ति होती है, वह बालक 'कुण्ड' कहलाता है और जिसे पतिकी मृत्युके पश्चात् स्त्री अन्य पुरुषसे जन्म देती है, उसे 'गोलक' संतान कहते हैं।
अध्याय १८९ ] श्राद्धके दोष और उसकी रक्षाकी विधि ३४७
दाताको नरकमें पहुँचा देता है। पितृसम्बन्धी या देवकार्यमें कदाचित् एक भी कुण्ड या गोलक ब्राह्मण उपस्थित हो जाय तो उसे देखकर पितर निराश होकर लौट जाते हैं।
यशस्विनि! अपात्रको भी कभी दान न दे। इस सम्बन्धमें एक प्राचीन प्रसङ्ग कहता हूँ, तुम उसे सुनो। अवन्तीपुरीमें पहले एक मनुके वंशमें उत्पन्न परम धार्मिक राजा रहते थे, जिनका नाम मेधातिथि था। उनके अत्रिगोत्रकुलोद्भव पुरोहितका नाम चन्द्रशर्मा था, जो सदा वेद-पाठमें संलग्न रहते थे। राजा मेधातिथि अत्यन्त दानी थे। वे प्रतिदिन ब्राह्मणोंको गौएँ दान दिया करते थे। विधिके साथ सौ गौएँ रोज दान करनेके पश्चात् ही उनका अन्न ग्रहण करनेका नियम था। वैशाखमासमें उन महाराजने अपने पिताके श्राद्ध-दिवसपर अनेक ब्राह्मणोंको आमन्त्रित किया। फिर उन ब्राह्मणों एवं गुरु (राजपुरोहित)-के आनेपर उन्होंने उन्हें प्रणाम किया और विधिके साथ श्राद्धकार्य प्रारम्भ हुआ। पिण्ड-प्रदानके बाद अन्नदानका संकल्प करके उसे ब्राह्मणोंमें वितरित किया गया, पर उसी विप्रसमाजमें एक गोलक ब्राह्मण भी था। राजाने श्राद्धमें संकल्पित अन्न उस ब्राह्मणको भी दिया, जिससे श्राद्धमें एक महान् दोष उत्पन्न हो गया। इसी कारणसे राजा मेधातिथिके पितर स्वर्गसे नीचे उतर आये और उन्हें काँटोंसे भरे हुए जंगलमें रहना पड़ा और रात-दिन भूख-प्यासकी पीड़ा उन्हें सताने लगी। एक समयकी बात है—स्वयं राजा मेधातिथि संयोगवश दो-तीन परिजनोंके साथ मृगयाके लिये उसी जंगलमें पहुँच गये। राजाने वहाँ उन पितरोंको देखकर पूछा—‘महानुभाव! आपलोग कौन हैं? और आपलोगोंकी ऐसी दशा कैसे हुई? आप सभी किस कर्मके कारण यह दारुण दुःख भोग रहे हैं?—यह मुझे बतानेकी कृपा करें।’
पितरोंने कहा—हमारे वंशकी निरन्तर वृद्धि करनेवाला एक शक्तिसम्पन्न पुरुष है। लोग उसे मेधातिथि कहते हैं। हम सभी उसीके पितर हैं; किंतु इस समय नरकमें पड़े हैं। देवि! उस समय पितरोंकी यह बात सुनकर राजा मेधातिथिके हृदयमें अवर्णनीय दुःख हुआ। उन्होंने पितरोंको सान्त्वना दी। साथ ही कहा—‘पितृगण! मेधातिथि तो मैं ही हूँ। आपलोग मेरे ही पितर हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि किस कर्मके दोषसे आपको नरकमें जाना पड़ा है।’
पितर बोले—पुत्र! तुमने जो हमलोगोंके लिये श्राद्धमें अन्न संकल्प किये, दैववश वह अन्न एक गोलक ब्राह्मणके पास पहुँच गया। अतः श्राद्ध-कर्म दूषित हो गया, उसीके फलस्वरूप हमें नरकमें जाना पड़ा और उसी समयसे हम दुःख भोग रहे हैं। हमारे मनमें इच्छा है कि हमको किसी प्रकार पुनः स्वर्ग सुलभ हो। पुत्र! तुम तो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें सदा संलग्न रहते हो। दान करना तुम्हारा स्वाभाविक गुण है। तुम्हारे द्वारा अनगिनत गौएँ दानमें दी जा चुकी हैं। दक्षिणाएँ भी तुमने पर्याप्त दी हैं। उसी पुण्यके प्रभावसे हम स्वर्ग पाना चाहते हैं। पर तुम्हें पुनः एक बार श्राद्ध करना चाहिये, जिससे हम सभी पितरोंका उद्धार हो सके।
१५६- नचिकेताद्वारा यमपुरीकी यात्रा
| ३४८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १९० |
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वसुंधरे! पितरोंकी बात सुनकर राजा मेधातिथि घर वापस गये और उन्होंने अपने पुरोहित चन्द्रशर्माको बुलाया और उनसे उपर्युक्त वृत्तान्त कहा तथा पुनः श्राद्ध करनेकी इच्छा व्यक्त की और निवेदन किया कि इस श्राद्धमें 'कुण्ड-गोलक' ब्राह्मण सर्वथा न बुलाये जायें।
देवि! राजा मेधातिथिके आदेशसे पुरोहित चन्द्रशर्माने ब्राह्मणोंको पुनः बुलाकर पिण्डदान एवं श्राद्ध सम्पन्न कराया और ब्राह्मणोंको भोजन कराया फिर दक्षिणाएँ देकर उनकी पूजा की। इसके बाद सबको विदा करके उन्होंने स्वयं प्रसाद ग्रहण किया। तत्पश्चात् राजा पुनः वनमें गये और वहाँ उन्होंने अपने उन पितरोंको हृष्ट-पुष्ट तथा परम पराक्रमीरूपमें देखा। अब उन नरेशके हर्षकी सीमा न रही। उस अवसरपर पितरोंमें श्रद्धा रखनेवाले राजा मेधातिथिको देखकर पितरोंके मुखमण्डलपर भी प्रसन्नता छा गयी और उन्होंने कहा—'तुम्हारा कल्याण हो। तुमने हमारा हित कर महान् कार्य सम्पन्न किया है। अब हम स्वर्गको जाते हैं।'
देवि! श्राद्धमें संकल्पित अन्नपात्र ब्राह्मणके अभावमें गौको दे अथवा गौके अभावमें भी यत्नपूर्वक उसे नदीमें छोड़ दे, पर किसी प्रकार भी अपात्र, नास्तिक, गुरुद्रोही, गोलक अथवा कुण्डको वह अन्न न दे।
भामिनि! इस प्रकार अपना उद्गार प्रकट करके सभी पितर स्वर्ग चले गये और राजा मेधातिथि ब्राह्मणोंके साथ अपनी पुरीको लौटे। उन्होंने पितरोंकी आज्ञाका यथाविधि पालन किया। देवि! यह इसीलिये मैंने तुम्हें बताया है कि एक भी उत्तम ब्राह्मण मिल जाय तो वही पर्याप्त है। उसीकी कृपासे यज्ञकर्ता कठिनाइयोंसे तर सकता है—इसमें कोई संशय नहीं। वह एक ही विप्र दाताको इस प्रकार पार करनेमें समर्थ है, जैसे अगाध जलको पार करनेके लिये एक नाव। वसुंधरे! अतएव सुपात्र ब्राह्मणको ही दान देना चाहिये। देवता, दानव, मानव, राक्षस, गन्धर्व और उरग—इन सभीके लिये यह विधान है।
[ अध्याय १८९]
श्राद्ध और पितृयज्ञकी विधि तथा दानका प्रकरण
पृथ्वी बोली— भगवन्! देवता, मनुष्य, पशु, एवं पक्षी-प्रभृति सभी प्राणी कालवश प्रेत होते हैं, वे कभी नरकोंमें जाते हैं और पुनः संसारमें भी आते हैं। अब मैं यह जानना चाहती हूँ कि पितर कौन-से हैं, जिन्हें विधिपूर्वक अर्पण करनेसे श्राद्ध-सम्बन्धी पदार्थ भोजनके लिये उपलब्ध होता है? प्रत्येक मासमें संकल्पपूर्वक दिया गया पिण्ड किस प्रकार पितरोंके पास पहुँचता है? पितृक्रियासे सम्बन्ध रखनेवाले श्राद्धमें कौन पितर भोजन पानेके अधिकारी हैं? इस विषयमें मुझे महान् कौतूहल हो रहा है, कृपया निर्णयपूर्वक बतलायें।
भगवान् वराह बोले— देवि! तुम मुझसे जो पूछती हो, उसे मैं बताता हूँ। माधवि! पितृसम्बन्धी यज्ञोंमें भाग पानेके जो अधिकारी हैं, उन्हें सुनो—पिता, पितामह तथा प्रपितामह—इन पितरोंके लिये पिण्डका संकल्प करना चाहिये। पितृपक्ष आनेपर नक्षत्र और तिथिकी जानकारी प्राप्त
अध्याय १९०] श्राद्ध और पितृयज्ञकी विधि तथा दानका प्रकरण [३४९
करके पितरके लिये उन्हें पुण्यपर्व मान ले। उन्हीं अवसरोंपर पिण्डदान करनेसे विशेष फल प्राप्त होता है। शुभलोचने! जिन ज्ञानवान् पुरुषोंको जिस प्रकार श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करनेका विधान है, वह सभी मैं तुम्हें बताता हूँ, तुम सावधान होकर सुनो। ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ—ये अनेक प्रकारके यज्ञ हैं। कुछ द्विजाति ब्रह्मयज्ञ, कुछ गृहस्थाश्रममें रहकर भूतयज्ञ तथा मनुष्ययज्ञ करके इष्टदेवकी उपासना करते हैं। अब मैं पितृयज्ञका वर्णन करता हूँ, उसे सुनो। वरारोहे! जो लोग सौ यज्ञ करते हैं, उन सभीके द्वारा प्रायः मेरी ही आराधना होती है। तुम्हें मैं यह बिलकुल सत्य बात बताता हूँ। माधवि! हव्य एवं कव्य ग्रहण करनेके लिये देवताओंका मुख अग्नि है। यज्ञोंमें आवस्थ्य (उत्तराग्नि), दक्षिणाग्नि और आहवनीयाग्नि प्रयुक्त होती हैं। इन सभी अग्नियोंमें मैं ही व्याप्त हूँ एवं समस्त कार्यों तथा देवयज्ञोंमें भी पावनरूपसे मैं ही व्यवस्थित हूँ। देवतीर्थोंमें भिक्षुक, वानप्रस्थी और संन्यासी—इनका सत्कार करना उचित है; किंतु श्राद्धमें इन्हें भोजन नहीं कराना चाहिये; क्योंकि देवताओंके निमित्त ही इनकी पूजा करनेका विधान है। अब जो व्रती ब्राह्मण श्राद्धमें निमन्त्रित करनेके लिये योग्य हैं, उनका निर्देश करता हूँ। जो अपने घरपर सदा संतुष्ट रहता है तथा क्षमाशील, संयमी, इन्द्रिय-विजयी, उदासीन, सत्यवादी, श्रोत्रिय एवं धर्मका प्रचारक है—ऐसे ब्राह्मणको श्राद्धके लिये ग्राह्य मानना चाहिये। माधवि! जो वेद-विद्याके पारगामी तथा स्वच्छ एवं मधुर अन्न खानेके स्वभाववाले हों, ऐसे ब्राह्मणोंको पितृयज्ञ-सम्बन्धी श्राद्धमें भोजन कराना हितकर है। सुन्दरि! श्राद्धमें सर्वप्रथम देवतीर्थोंमें अवगाहन करनेकी आवश्यकता है। पहले अग्निमें हवन कर बादमें विधिका पालन करते हुए पितरके निमित्त ब्राह्मणोंके मुखमें हवन करना उचित है।
देवि! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र—ये चारों वर्ण श्राद्ध करनेके अधिकारी हैं। श्राद्धके पदार्थको कुत्ते, मुर्गे, सूअर तथा अपवित्र व्यक्ति न देख सकें। जो अपनी श्रेणीसे च्युत हो गये हैं, जिनका संस्कार नहीं हुआ है, जो सब प्रकारके अकार्य कर्म करते रहते हैं तथा जो सर्वभक्षी हैं, ऐसे ब्राह्मणको पितृयज्ञसे सम्बन्धित श्राद्धको नहीं देखना चाहिये। यदि कदाचित् ऐसे ब्राह्मणोंकी दृष्टि श्राद्धपर पड़ गयी तो उसे ‘आसुरी श्राद्ध’ कहते हैं। बहुत पहले जब मैंने इन्द्रका कार्य सिद्ध करनेके लिये वामनका अवतार ग्रहण किया था तो ऐसे श्राद्धोंको मैं बलिको दे चुका हूँ। इसलिये विद्वान् पुरुषको चाहिये कि पितृयज्ञोंमें ऐसे ब्राह्मणोंको सम्मिलित न करे, जहाँ सर्व-साधारणकी दृष्टि न पड़े, ऐसे स्थानमें पवित्र होकर तर्पणपूर्वक ब्राह्मणको श्राद्धमें भोजन कराये। भूमे! मन्त्र पढ़कर पितरोंका आवाहनकर तीन पिण्ड देने चाहिये। इन पिण्डोंके अधिकारी पिता, पितामह तथा प्रपितामह हैं। प्रति मासमें अपसव्य होकर इनके लिये तिलोदक तथा पिण्डदान करना चाहिये। फिर वैष्णवी, काश्यपी और अजया—इन नामोंका उच्चारणकर सिर झुकाकर तुम्हें भी प्रणाम करना चाहिये।
१५७- यमपुरीका वर्णन
३५० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १९०
देवी! इस प्रकार पिण्ड-दान करनेसे पितर प्रसन्न हो जाते हैं—इसमें कोई संशय नहीं है। सृष्टिके प्रारम्भमें तीन पुरुष पितरोंके रूपमें प्रकट हुए थे। पिण्ड ही उनका आहार है। देवता, असुर, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व एवं पन्नग—ये सब-के-सब वायुका रूप धारण करके पितृयज्ञ करनेवाले पुरुषकी श्राद्धक्रियाके छिद्रपर दृष्टि लगाये रहते हैं—यह निश्चित है। जो विवेकी व्यक्ति पितृयज्ञ करते हैं, उन्हें पितरोंकी कृपासे आयु, कीर्ति, बल, तेज, धन, पुत्र, पशु, स्त्री तथा आरोग्य सदाके लिये सुलभ हो जाते हैं—इसमें कोई संशय नहीं। यही नहीं—अपने इस उत्तम कर्मके प्रभावसे वे मनुष्य परम पवित्र लोकोंके अधिकारी हो जाते हैं और वे प्रेत एवं पशु-पक्षीकी योनिमें नहीं पड़ते हैं। ऐसा पुरुष नरकमें गये हुए अपने पितरोंका उद्धार करनेमें पूर्ण समर्थ बन जाता है। देवताओं तथा पितरोंकी उपासना करनेवाला मनुष्य गृहस्थाश्रममें रहता हुआ भी पूरी विधिके साथ द्विजाति वर्गके पितरोंको तृप्त कर सकता है। श्राद्धमें तृप्त हुए पितर उस प्राप्त वस्तुको अविनाशी मानते हैं। जिनकी पितरोंके प्रति श्रद्धा है, उनकी भी परमगति होती है। इस प्रकारके ज्ञानीजन मृत्युके पश्चात् सत्त्वगुणसे सम्पन्न शुक्लमार्गसे प्रयाण करते हैं।
देवी! जिनके मनपर अज्ञानका आवरण है, जो कृतघ्न एवं प्रचण्ड मूर्ख हैं, ऐसे मनुष्य स्नेहमयी सैकड़ों रस्सियोंसे बँधकर भयंकर नरकमें गिरते हैं। पर जो मानव कल्पपर्यन्तके लिये नरकमें पड़े हैं, उनके भी पुत्र अथवा पौत्र यदि कहीं श्राद्ध-क्रिया कर दें तो उसके प्रभावसे उन प्राणियोंकी सद्गति हो जाती है। अमावास्याको जो जलाशयमें जाकर पितरोंके निमित्त विन्दुमात्र भी जल देते हैं, उससे उनके नरकस्थित पितरोंको भी तृप्ति प्राप्त हो जाती है। जो द्विजातिवर्गके पुरुष पितरोंके लिये भक्तिपूर्वक तर्पण, तिलाञ्जलि एवं पिण्डपातप्रभृति श्राद्ध कार्य करते हैं, उनके पितरोंकी नरकसे मुक्ति मिल जाती है और वे सदाके लिये तृप्त हो जाते हैं। श्राद्धमें गूलरकी लकड़ीके पात्रसे तिल और जलद्वारा तर्पणकी बड़ी महिमा है। पितरोंका उद्धार करनेके लिये ब्राह्मणोंके वचनपर श्रद्धा रखना और अपने वैभवके अनुसार उन्हें दक्षिणा देना परम आवश्यक है। नीले साँड़ छोड़नेसे जो पुण्य भूमण्डलपर होता है, उसके प्रभावसे पुरुषके पितर छाछठ हजार वर्षोंतक चन्द्रमाके लोकमें आनन्दपूर्वक निवास करते हैं। उन्हें भूख-प्यास नहीं लगती।
श्राद्ध-तर्पण गृहस्थोंके लिये महान् धर्म है। चींटी आदि जङ्गम प्राणी एवं आकाशमें विचरनेवाले जीव गृहस्थोंके आश्रयपर ही जीवन धारण करते हैं, इसमें कोई संशय नहीं। गृहस्थाश्रम ही सभी धर्मोंका मूल है। सारे वर्ण एवं आश्रम इसीपर आधृत हैं। इस आश्रममें रहकर जो व्यक्ति प्रति मास पर्व तथा प्रत्येक निर्दिष्ट तिथिपर श्राद्ध करते हैं, उनके द्वारा पितरोंका निश्चय ही उद्धार हो जाता है। गृहस्थके घरमें धर्मपूर्वक श्राद्ध करनेसे जैसा फल प्राप्त होता है, वैसा फल यज्ञ, दान, अध्ययन, उपवास, तीर्थस्नान, अग्निहोत्र तथा विधिपूर्वक अनेक प्रकारके दानोंसे भी प्राप्य नहीं है। ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्रके शरीरमें प्रविष्ट पितृगण पिता, पितामह एवं प्रपितामहके रूपसे प्रकट होकर विराजते हैं। कश्यप उनके जनक हैं। पहले कभी अग्निमें हवन न करके ब्राह्मणके मुखमें हवन किया गया अर्थात् ब्राह्मणको भोजन कराया गया। भूमिपर कुश बिछाकर पिण्ड संकल्प करके
अध्याय १९० ] श्राद्ध और पितृयज्ञकी विधि तथा दानका प्रकरण [ ३५१
उनपर रख दिये गये। उस पिण्डसे पितृदेवोंको अजीर्ण हो गया और उन्हें महान् पीड़ा होने लगी। उन्होंने भोजन करना छोड़ दिया और दुःखसे अत्यन्त संतप्त होकर वे सोमदेवके पास गये। सुश्रोणि! अजीर्णसे दुःखी उन पितरोंपर चन्द्रमाकी दृष्टि पड़ी तो उन्होंने मधुर वाक्योंसे उनका स्वागत किया।
सोमने पूछा—'पितरो! तुम्हारे इस दुःखका क्या कारण है?' इसपर पितरोंने कहा—'सोमदेव! आप हमारी बातें सुननेकी कृपा करें। ब्रह्मा, विष्णु और शंकरके शरीरसे उत्पन्न हुए हम तीनों पितृदेवता हैं। हमलोगोंकी नियुक्ति श्राद्धमें हुई थी। पुत्र आदि द्वारा दिये गये पिण्डोंसे हम अत्यन्त तृप्त हो गये। यहाँतक कि हमें अजीर्ण हो गया। इसीसे हम दुःख पा रहे हैं।'
सोमने कहा—'पितृगण! मैं तुमलोगोंका मित्र बन जाता हूँ। अब तुम तीन ही नहीं रहे। एक चौथा पितर मैं भी बन गया। अब हम सभी ऐसी जगह चलें, जहाँ हमारे कल्याण होनेकी सम्भावना हो।' वसुंधरे! सोमके इस प्रकार कहनेपर वे पितर उनके साथ सुमेरुपर्वतके शिखरपर गये, जहाँ पितामह ब्रह्माजी ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित एवं सुशोभित हो रहे थे। सभीने उन्हें प्रणाम किया। फिर सोमने उनसे कहा—'भगवन्! ये पितर अजीर्णसे पीड़ित होकर आपकी शरण आये हैं, आप इन्हें क्लेश-नाशका उपाय करें।'
इसपर श्रीब्रह्माजी एक मुहूर्ततक परम योगीश्वर भगवान् श्रीहरिके ध्यानमें लीन रहे। फिर भगवान् श्रीहरिने प्रकट होकर उनसे कहा—ब्रह्मन्! यह मेरी वैष्णवी मायाका ही प्रभाव है कि पहले जो देवता थे, वे अब पितरके रूपमें प्रकट हैं। मेरे अङ्गसे निकले हुए पिता ब्रह्माके रूप, पितामह विष्णुके रूप तथा प्रपितामह रुद्रके रूप माने जाते हैं। मर्त्यलोकमें श्राद्धके अवसरपर इन्हें पितृ-देवताके रूपमें नियोजित किया गया है। ब्राह्मणोंके हितार्थ विष्णुमायाकी आज्ञासे प्रजा इन्हें पितृयज्ञोंसे तृप्त करती है। अब मैं इनके अजीर्ण दूर होनेका उपाय बतला रहा हूँ। धूम्रकेतु और विभावसु* नामके शाण्डिल्य मुनिके दो तेजस्वी पुत्र हैं। मानवमात्रके लिये यह कर्तव्य है कि वे श्राद्ध करते समय पहले अग्निको भाग देकर शेष पिण्ड उन तेजस्वी विभावसुके साथ ही पितरोंको अर्पित करें।'
परम प्रभुके इस कथनपर ब्रह्माजीने मन-ही-मन हव्यवाहन अग्निका आवाहन किया। उनके स्मरण करते ही सर्वभक्षी अग्निदेव उनके पास आये। अग्निका शरीर प्रचण्ड तेजसे उद्दीप्त हो रहा था। मेरी प्रेरणासे ब्रह्माजीने उन्हें पाँच प्रकारके यज्ञोंमें भाग पानेका अधिकारी बनाया और अग्निसे कहा—'हुताशन! तुम ब्रह्मस्वरूप हो। पितरोंके निमित्त श्राद्धमें दिये गये पिण्डके भागमें—'ॐ अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा'—इस मन्त्रद्वारा सर्वप्रथम तुम्हें ही भाग पानेका अधिकार दिया जाता है। तुम्हारे बाद मरुद्गणसहित देवता भाग प्राप्त करनेके अधिकारी होंगे। तुम सभीके ग्रहण कर लेनेपर श्राद्धका अन्न पितरोंके लिये पथ्यस्वरूप हो जायगा और सोमसहित पितर उसके अधिकारी होंगे।
वसुंधरे! ब्रह्माकी इस व्यवस्थासे अग्नि, देवता एवं पितर श्राद्धके भागी बने। तबसे अग्नि एवं सोमके साथ पितृयज्ञमें सभीका पितरोंके साथ भोजन करनेका सदाके लिये नियम बन
* ये अग्निके भी नामान्तर हैं।
३५२ संक्षिप्तश्रीमद्वराहपुराण [ अध्याय १९०
गया। जगत्को प्रश्रय देनेवाली पृथ्वी देवि! इस नियमका अनुसरणकर पितरोंके निमित्त श्राद्ध करते समय सर्वप्रथम पिण्ड अग्निको देकर पश्चात् पितरोंको तृप्त करना चाहिये। वसुंधरे! इस प्रकार जो मनुष्य मन्त्रोंका उच्चारणकर विधिके साथ पितरोंके लिये श्राद्ध करते हैं, वे तृप्त हुए पितरोंकी कृपासे निरन्तर सुख-समृद्धिके भागी होते हैं।
देवि! अब श्राद्धकी श्रेणीमें जो निन्द्य हैं, उन ब्राह्मणोंका विवेचन करता हूँ। नपुंसक, चित्रकार, पशुपाल, कुमार्गी, काले दाँतवाला, कण (एक नेत्रसे रहित), लम्बोदर, नाच करनेवाला, गायक, कपड़ा रँगकर जीविका चलानेवाला, वेदविक्रयी, सभी वर्णोंसे यज्ञ करानेवाला, राजाका सेवक, व्यापारके निमित्त खरीदने एवं बेचनेवाले, ब्रह्म-योनिमें उत्पन्न, निन्दक, पतित, संस्काररहित, गणक, गाँवमें घूमकर याचना करनेवाला, दीक्षित, काण्डपृष्ठ, (शस्त्र लेकर घूमनेवाला), सूदखोर, रसविक्रेता, वैश्यकी वृत्तिसे जीविका चलानेवाला, चोर, लेखकार, याजक, शौण्डिक (शराब बनानेवाला), गैरिक (गेरुआ कपड़ा पहननेवाला) दम्भी, सभी वर्णसे सम्बन्धित कार्यमें रत तथा सब कुछ बेचनेमें तत्पर—ये सभी ब्राह्मण श्राद्ध-कर्मके लिये निन्द्य माने जाते हैं। इन्हें पितरोंके निमित्त श्राद्धमें भोजन नहीं कराना चाहिये। पण्डितसमाजका कथन है कि जो जीविकाके निमित्त दूर चले जाते हैं, रस बेचते हैं तथा धूर्त एवं तिलविक्रयी हैं, ऐसे ब्राह्मणोंके श्राद्धमें सम्मिलित हो जानेसे वह श्राद्ध राजस हो जाता है। देवि! इनके अतिरिक्त मैंने जिन निन्दित ब्राह्मणोंको बताया है, वे सभी ब्राह्मण राजस हैं। माधवि! श्राद्धसम्बन्धी कर्मोंमें पितरोंके लिये पिण्डदान करते समय ऐसे पङ्क्तिदूषित ब्राह्मणोंका दर्शनतक नहीं करना चाहिये। यदि ऐसे ब्राह्मण श्राद्धमें भोजन करते हों और उनपर श्राद्धकर्ताकी दृष्टि पड़ गयी तो उसके पितर छः महीनोंतक दारुण दुःख उठाते हैं। वसुधे! यदि कहीं ऐसी त्रुटि हो जाय तो श्राद्धकर्ता और भोक्ता दोनोंके लिये आवश्यक है कि वे यथाशीघ्र प्रायश्चित्त करें। प्रायश्चित्तका स्वरूप है कि प्रज्वलित अग्निमें घृतका हवन, सूर्यका दर्शन, सिरका मुण्डन, पिता-पितामह आदिके लिये पुनः गन्ध-पुष्प-धूप आदिसे पूजन, अर्घ्य तथा तिलोदकका दान एवं विधिके साथ पवित्र होकर वह ब्राह्मण-भोजन आदि कराये।
सुन्दरि! अब पुनः एक अन्य बात बताता हूँ, उसे सुनो। ज्ञानद्वारा जिसका अन्तःकरण पवित्र हो गया है, वह ब्राह्मण विधिके अनुसार मन्त्रशुद्धि करे। माधवि! जो कभी भी मृतक सम्बन्धित अन्नका भक्षण नहीं करते हैं, ऐसे ब्राह्मणको वैश्वदेवनिमि्त्तक भाग देना चाहिये, उन्हें श्राद्धोंमें भोजन कराना अनुचित है। जो ब्राह्मण श्राद्धमें प्रेतान्न खाते हैं, अब उनका दोष बताता हूँ। प्रेतान्न खानेके प्रभावसे ऐसे दम्भी मनुष्यको नरकमें जाना पड़ता है। अब उसकी शुद्धिका उपाय बतलाता हूँ। ऐसे द्विजातिपुरुषका कर्तव्य है कि माघमासके द्वादशी तिथिको पुष्य नक्षत्रमें मधु और फलसे पितरोंको तृप्त करके घृतयुक्त खीरका प्राशन करे। 'मुझे पवित्रता प्राप्त हो जाय'—इस संकल्पसे वह कपिला गौका दान करे तथा अपने कल्याणकी अभिलाषासे पितृ-श्राद्ध सम्पन्न कर, युग्म ब्राह्मणको भोजन कराकर विसर्जन करना चाहिये।
विशालाक्षि! अमावास्या तिथिको दन्तधावन