कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
प्रथम खेमसरि लीन्हों पाना । पाछे और जीव सनमाना ॥
दीन्हेउ ध्यान अंग समझाई । ध्यान नामते हंस वचाई ॥
रहनि गहनि सब दीन्ह दिढाई । सुमिरत नाम हंस घर जाई ॥
छन्द—हंस द्वादश बोधि सतजुग, गयउ सुखसागर करी ।
सतपुरुष चरन सरोज परसेउ विहँसिके अंकमें भरी ॥
बूझ कुसल प्रसन्न बहु विधि, मूल जीवनके धनी ।
बंधु हरषित सकल सोभा, मेलि अति सुन्दर बनी ॥
सोरठा—सोभा बरनि न जाय, घरमनि हंसन कान्तिकर ।
रबि षोडस ससि काय, एकहंस उजियार जों ॥
कछुदिन कीन्हों लोक निवासा । देखेउ आय बहुरि निजदासा ॥
निसि दिन रहा गुप्त जग माहीं । मो कहँ कोइ जिव चीन्हत नाही ॥
जो जीवन पर बोध्यो जायी । तिन कहँ दीन्हो लोक पठाई ॥
सत्यलोक हंसन सुख वासा । सदा वसन्त पुरुषके पास ॥
सो देखे जो पहुँचे जाई । जिनयहि रचा सो कहाचिताई ॥
इति प्रमाण अनुरागसागरका ।
सहस्रों बार महाराज सत्यगुरु सत्य-सुकृत जी प्रगट होते हैं और जिस मनुष्यको सच्चा देखते उसको अपने लोकको ले जाते हैं । झूठा तो इस धर्म में ठहरताही नहीं, सहस्रों और लाखों बारका क्या हिसाब है । सत्य सुकृतजी महाराज प्रत्येक स्थानपर, प्रत्येक समय उपस्थित ही रहते हैं । जो सच्चा जीव हो वह आपको जहाँ चाहे वहाँही देखे । सच्चे प्रेम तथा साधु गुरुकी सेवासे आप प्रसन्न होते हैं और प्रत्येक जातिको सत्य पुरुषकी भक्ति प्रदान करके कालके जालसे छुडाते हैं । जो बड़ा भाग्यवान् होता है सो सत्यगुरुको पहुँचानता है । जो कालका जीव है सो कदापि पहुँचान नहीं सकता ; कारण यह कि उसको कालके गालमें जाना है ।
ग्यारहवाँ प्रकरण ।
त्रेतायुगमें कबीर साहबका पृथ्वीपर मनुष्योंको मुक्ति प्रदान कर-
नेके निमित्त आना, मुनीन्द्रजीके नामसे प्रख्यात
होना और धर्मराय निरंजनकी चिंता ।
जब सत्ययुग बीत चुका और त्रेतायुग लगा, तब फिर सत्यपुरुषकी आज्ञा
आगेकी उत्पत्ति
हुई कि, ऐ ज्ञानीजी ! पृथ्वीपर जाओ और मनुष्योंकी मुक्ति करो । तब ज्ञानीजी सत्यपुरुषको दंडवत् और प्रणाम करके पृथ्वीपर आये । त्रेतायुगमें जब सत्य-सुकृतजी पृथ्वीपर आया करते हैं—तब आपका नाम मुनीन्द्रजी प्रख्यात हुआ करता है । जब मुनीन्द्रजी महाराज पृथ्वीपर आये तब धर्मराजके चित्तमें बड़ा संदेह उत्पन्न हुआ कि, ज्ञानीजी मेरा भवसागर उजाडा चाहें हैं । मैं सैकड़ों युक्तियाँ करता हूँ परन्तु मुनीन्द्रजीसे मेरा वश नहीं चलता है । न मुनीन्द्रजी मुझसे भयभीत होते हैं और न मेरी युक्तिपर चलते हैं । सत्यपुरुषका विशेष तेज और बल मुनीन्द्रजीमें हैं, इस कारण मेरा बल नहीं चलता है । सत्य नामके प्रभावसे सब जीव बराबर सत्यलोकको चले जाते हैं, वे लोग सत्यगुरुके शब्दमें सदैव तत्पर रहते हैं और गुरुकी आज्ञासे शिर नहीं फेरते हैं इस कारण उनकी मुक्ति होती है ।
बारहवाँ प्रकरण ।
त्रेतामें जगतके मनुष्योंके विचार ।
जब त्रेतायुगमें, पहले मुनीन्द्रजी महाराज पृथ्वीपर आये तब कितने मनुष्योंसे पूछा कि, तुम्हें मुक्ति देनेवाला कौन है ? तब वे सब मूर्ख यों उत्तर देते कि हमारी मुक्ति विष्णु महाराज करेंगे, कोई कहता है कि, शिवजी हमें छुडावेंगे, कोई कहता कि, चण्डी देवी मुझे मुक्ति देनेवाली है । मूर्खोंको इस बातका तनिक भी विचार नहीं कि, जिनका वेदनाम लेते हैं और जिनके द्वारा वे मुक्ति चाहते हैं वे सब स्वयम् फँसे हुए हैं । इनमें एक भी छूटा हुआ नहीं है । कबीर साहब कहते हैं कि, मैं क्या कहूँ इन सब मनुष्योंकी बुद्धि मारी गयी है, आपसे आप कालके गालमें जा पड़ते हैं, धर्मराजने सबकी बुद्धिपर ताला लगा दिया है, जिससे कोई नहीं सोचता कि, “फँसे हुएओंको हमने छूटा हुआ समझकर अपना इष्ट समझ लिया और छुटकारेका मार्ग मान लिया है, तो हमारा परिणाम भला कैसे होगा ?” भ्रमके कुएँमें पड़कर सब जीव मरते हैं और कालपुरुष सब जीवोंको धोखा देकर उनका काम समाप्त करता है । यदि सत्यपुरुषकी आज्ञा पाऊँ, तो सबही मनुष्योंको मुक्त करके परमधामको पहुँचा दूँ । कालपुरुषको भगा कर सर्व मनुष्योंको कालके बंधनसे छुड़ा दूँ, परन्तु बलात् करना उचित नहीं, बलप्रयोग करनेसे प्रण और बचनमें बाधा उपस्थित होगी और बात जाती रहेगी, इस कारण धीरे २ समस्त मनुष्योंको मुक्त करूँगा । जो काल है उसीको
समस्त मनुष्य सत्यपुरुष समझकर उसकी सेवा और बंदना करते हैं और अन-जानसे मृत्युके चंगुलमें जा फँसते हैं ।
तेरहवाँ प्रकरण ।
मुनीन्द्रजीका रावणके पास जाना ।
इसी प्रकार मुनीन्द्रजी अपने मनमें सोचते विचारते लड़काहूीपमें जा पहुँचे । उस समय राजा रावण बहो राज करता था । जब आपने लंका नगरमें चरण रक्खा तब पहले आपको विचित्र नामका एक भोट मिला । वह आपको पहचानकर चरणों पर गिर पड़ा और निवेदन किया कि आप मेरा उद्धार कीजिये । तब सत्यगुरु मुनीन्द्रजी उसपर दयाल हुए और उसको उपदेश देकर उद्धारका अधिकारी बना दिया । तब विचित्र भोटकी स्त्रीने रानी मन्दो-दरीको समाचार दिया कि, एक सिद्ध ऐसे आये हैं, जिनकी कृपा कटाक्षसे मेरा पति बडभागी हुआ और मुक्तिमार्ग पाया । यह बात सुनकर रानी मन्दोदरी सत्यगुरुके दर्शनोंके निमित्त आयी और आपका ज्ञान सुनकर उसने भी सत्य-गुरु की दीक्षा लेली ।
फिर मुनीन्द्र महाराज राजा रावणके दरबारको गये और द्वारपालसे कहा कि, राजा रावणको मेरे समीप बुला ले आओ । तब उस द्वारपालने निवेदन किया कि, राजा रावण बडा भयानक और अति क्रोधी है, यदि मैं जाकर उससे कहूँगा कि, आपको एक साधु बुलाता है तो वह निश्चय मेरा प्राण लेलेगा, मुझको उसका बडा भय है । तब मुनीन्द्रजीने कहा कि, द्वारपालको संदेश पहुँचानेमें कुछ भय करना नहीं चाहिये । तब वह द्वारपाल रावणके पास गया और कहा कि महाराज ! एक सिद्ध आया है और वह आपको बुलाता है । यह सुनकर रावण अत्यंत क्रुद्ध हुआ और कहा कि, तू बडा मूर्ख द्वारपाल है कि, एक निर्धन दरिद्री साधुके कहनेसे मुझको बुलाने आया, मेरा दर्शन तो शिवके पुत्र भी नहीं पाते हैं । ऐ द्वारपाल ! तू इस, सिद्धके रूपका वर्णन कर । तब उसने कहा कि, ऐ महाराज ! उस सिद्धका रूप तो पूर्णमाके चन्द्रके सदृश देदीप्यमान बडा सुन्दर है और चन्द्रकेही समान उसका समस्त शरीर चमकता है, श्वेत तिलक उसके मस्तकपर है, श्वेत तुलसीकी माला और कंठी गलेमें है और उसके समस्त वस्त्रादिभी श्वेत हैं । तब रानी मन्दोदरीने राजासे कहा और समझाने लगी कि, हे राजा ! यह साधु तो सत्यपुरुषका रूप हैं, आप शीघ्र चलकर उनका चरण छुओ तो तुम्हारा राज्य अक्षय हो जावेगा । आप राज्याभिमान छोड़
दो और चलकर उनका दर्शन करो, संत महात्माओंसे अभिमान करना अच्छा नहीं। इतनी बातके सुनतेही रावण क्रोधसे भडक उठा, मानों बलती अग्निमें घृत पड गया और तलवार लेकर चला कि अभी उस भिखारीका शिर उतार लेता हूँ। देखूं वह दरिद्री मेरा क्या बना लेता है? यह कहकर वह तुरन्त मुनीन्द्रजीके पास जा पहुँचा और आपका शिर काटनेके निमित्त तलवार मारने लगा। सत्तर बार उसने तलवार चलाया, पर मुनीन्द्रजीका एक बालभी नहीं कटा। तब रावण मनही मन लज्जित हो दौल निकालकर रह गया। तब फिर रानी मन्दोदरीने समझाया कि, हे महाराज! आप सत्य गुरुके चरणोंपर गिर पडो। तब रावण घमंडके साथ कहने लगा कि, मैं शिवजीके अतिरिक्त और किसीके सामने मस्तक नहीं नवाऊंगा और न सहायता मांगूंगा। उसी महाराजने मुझको अटल राज्य दिया है, उसकी दया तथा अनुग्रह मेरे ऊपर है, उसीको मैं प्रत्येक क्षण और प्रत्येक समय दंडवत् करता हूँ! तब मुनीन्द्रजीने उससे कहा कि, ऐ रावण! मैंने भलीभाँति पहचान लिया कि, तू बड़ा अहंकारी है। मुझको तूने नहीं पहचाना और हमारा भेद नहीं जाना, पर एक बात मे तुझसे कहता हूँ कि, रामचन्द्र आकर तुमको मारेंगे और तेरा मांस कुत्ते भी न खावेंगे। ऐसा कहकर मुनीन्द्रजी लड़कासे चले।
चौदहवाँ प्रकरण।
मुनीन्द्रजीका अयोध्या जाना और मधुकर आदि अनेक जीवोंको उपदेश देना।
लंकासे चलकर वे अयोध्याको पहुँचे राहमें मधुकर नामक एक ब्राह्मण मिला और आपको पहचानकर चरणोंपर गिरा। उसने आपका बचन सुनकर आपपर विश्वास किया तब उस ब्राह्मणपर आपकी दया हुई और उसको और उसके समस्त बाल बच्चोंको घराने सहित मुक्ति योग्य बना दिया। रामचंद्रजी और हनुमान इत्यादिको भी शिक्षा दी। मुनीन्द्रजी महाराजकी कृपासेही रामचंद्रजी समुद्रके ऊपर पुल बाँधकर पार उतरे। मुनीन्द्रजी महाराजनेही जब "सत्यरेखा" लिखी तो उस सत्यनामके प्रभावसे पत्थर जलपर तैरने लगे और रामचंद्रवानरको सेना सहित समुद्रके पार उतरकर लंकापर विजयी हुए आप उस समय बहुतेरे ऋषि मुनियोंको उपदेश करते फिरे।
इस त्रेतायुगमें सहस्रों बेर मुनीन्द्रजी प्रगट हुए, अधिकारी मनुष्योंको
सत्यपथपर लगाते और परमधामको पहुँचाते रहे । फिर कितनेही मनुष्योंको लेकर सत्यलोकमें पहुँचे ।
राजा जनक बड़े ज्ञानी थे फिर उनको मुनीन्द्रजीका पूरा उपदेश मिला । रामचन्द्रको कबीरसाहबने सब योगशक्ति सिखलाया और उनके समस्त संदेह मोचन किये देखो ग्रंथ अनुराग सागर और ज्ञान संबोध में, जैसे कबीर साहबने रामचन्द्रको सिखलाया तथा उनको पथ दिखलाया ।
रामचन्द्र वसिष्ठ हनुमान् इत्यादिको इस सत्यगुरुकी भली भाँति पहिचान नहीं हुई, इस कारण उनके आवागमनका दुःख दूर नहीं हुआ और मधुकर ब्राह्मण इत्यादिने उन्हें पहचानकर विश्वास पूर्वक पूर्ण भक्ति की इस कारण वे सत्य-गुरुके देशकों पहुँच गये ।
अनुराग सागरका प्रमाण ।
त्रेतायुग में मुनीन्द्रजी (कबीर साहब) के पृथ्वी पर आने की कथा सतजुग गयो त्रेता युग आवा । नाम मुनीन्द्र जीव समुझावा ॥
जब आयेउ जीवन उपदेशा । धरमराय चित्त भयउ अँदेशा ॥
धरमरायकी चिन्ता ।
इन भगवागर मोर उजारा । जिव लै जाहिं पुरुष दरबारा ॥
केतो छल बल करें उपार्ई । ज्ञानी डर मोरे नाहिं डराई ॥
पुरुष प्रताप ज्ञान तिहिं पासा । ताते मोरे न लागे फांसा ॥
इतते हम कछु पावैं नाहीं । नाम प्रताप हंस घर जाहीं ।
परबस होय मौन सो गहिया । सोच विचार मनहिंमन रहिया ॥
छन्द— सत्यनाम प्रताप धर्मनि, हंस धर निज कै चलै ॥
जिमि देख केहरि त्रास गज, हिय कंप कर धरनी रले ॥
पुरुष नाम प्रताप केहरि, काल गज सम जानिये ।
नाम गहि सत लोक पहुँचे, गिरा मम फुर मानिये ॥
सोरठा—सतगुरु सब्द समय, गुरु आज्ञा निरखत रहे ।
रहे नाम लौ लाय, करम भरम मनमति तजे ॥
त्रेताजुग जबहीं पगु धारा । मृत्यु लोक कीन्ह पैसारा ॥
जीव अनेकन पूछा जाई । जमसे को तुहि लेहैं छुड़ाई ॥
कहे भरम वश जीव अजाना । हमरा करता पुरुष पुराना ॥
विस्नु सदा हमरे रखवारा । जमतें मोहि छुडावनहारा ॥
कोई महेसकी आस लगावे । कोई चंडी देवीहिं गावे ॥
कहा कहीं जिव भयो बिगाना । तजेउ खसमकहिं जारविकाना ॥
भरम कोठरी सब दइ डारा । फंदा दे सब जीवन मारा ॥
सत्व पुरुषकी आयसु पाऊँ । कालहिं भेटि छोर जिवलाऊँ ॥
जोर तो करों वचन नसायी । सहजहीं जीवन लेऊं चित्ताई ॥
जो ग्रासे जिव सेवैं ताही । अन चीन्हे जमके मुख जाही ॥
विचित्र भाटकी कथा लंकामें ।
चहुँदिश फिर आयेउँ गढ लंका । भाट विचित्र मिलो निःसंका ॥
तिनि पुनि पूछ मुक्ति संदेशा । तासो कहा ज्ञान उपदेशा ॥
सुना विचित्र तबहीं भ्रम भागा । अतिअधीन ह्वै चरनन लागा ॥
कहे सरन मुहि दीजै स्वामी । तुम सतपुरुष सदा सुखधामी ॥
कीजे मोहिं किरतारथ आजू । मोरे जिवकर कीजे काजू ॥
कहचो ताही आरतिको लेखा । खेमतरीहिं भाषेउ रेखा ॥
आनेउ भाव सहित सब साजा । आरति कीन्ह शब्द धुनि गाजा ॥
त्रिन तोरि बीरा तिही दीन्हा । ताके ग्रहम काहु न चीन्हा ॥
सुमिरन ध्यान ताहिंसों भाखा । पुरुष डोरि गेय नहिं राखा ॥
छन्द— विचित्र वनिता गयी नृप ढिग, जाय रानी सो कही ।
इक जोगी सुन्दर है महामुनि, तासु महिमा का कही ॥
स्वेत कला अपार उत्तम, और नहिं अस देखऊ ।
पति हमारे सरन गहि तिहि, जन्म सुभ करि लेखेऊ ॥
मंदोदरीकी कथा ।
सोरठा—सुनत मंदोदरी चाव, दरस लेन अकुलानेऊ ।
बिरली संग आव, कनक रतन लै पगुधरचो ॥
चरन टेकिके नायो सीसा । तब मुनींद्र पुनि दीन्ह असीसा ॥
मंदोदरी वचन ।
कहे मँदोदरी सुभादेन मोरी । विनती करों दोइ कर जोरी ॥
ऐसा तपसी कबहुँ न देखा । स्वेत अंग सब स्वेतहिं भेखा ॥
पम जिवकारज हो जिहिंभांती । सो मोहि कहो तजों कुल जाती ॥
हे समरथ मोहिं करहु सनाथा । भव बूडत गहि राखो हाथा ॥
अब अति प्रिय मोहिं तुम लागे । हो दयाल सकलो भ्रम भागे ॥
मुनीन्द्रवचन संदोदरी प्रति ।
सुनहु वधू प्रिय रावन केरी । नाम प्रताप कटे जम बेरी ॥
ज्ञान दिष्टिओं परखहु आई । खराखोट तोहि देउँ चिन्हाई ॥
पुरुष अमान अजर मान सारा । सो तो तीन लोकते न्यारा ॥
तेहि साहिब कहैं सुमिरे कोई । आवागमन रहित सो होई ॥
विचित्र वधूवचन संदोरीको ।
चिवित्र वधू रानी समुझावा । गहो सरन जीवन मुकतावा ॥
विचित्र नारिगहिरानि सिखापन । लीन्हेंसि पान तजि भ्रम आपन ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
सुनतहिं सब्द तासु भ्रम भागा । गह्यो सब्द सुचि मन अनुरागा ॥
है साहब मोहि लीजे सरना । मेटहु मोर जन्म अरु मरना ॥
दीन्हों ताहि पान परवाना । पुरुष डोर सौप्यो सहिदाना ॥
गद गद भई पाय घर डोरी । मिलि रंकिहि जिमि द्रव्य करोरी ॥
रानी टेकेउ चरन हमारा । ता पाछे महलन पगु धारा ॥
मुनींद्रजीका रावणके पास जाना ।
तब मैं सवनपहैं चलि गयऊ । द्वारपालसों वचन सुनयऊ ॥
मुनींद्रवचन द्वारपाल प्रति ।
तासु कह एक बात समुझाई । राजा कहैं तुम आव लिवाई ॥
द्वारपाल वचन ।
तब पौरिया विनय यह लाया । महा प्रचंड है रावन राया ॥
सिव बल हिये संक नहि आने । काहूकेर वचन नहि भाने ॥
महा गरब अरु क्रोध अपारा । कहों जाय तो पलमें मारा ॥
मुनींद्रवचन द्वारपाल प्रति ।
सुनत वचन मुनीन्द्र तिहि बारा । द्वारपालहिं कहे परचारा ॥
मानहु वचन जाय यहि बारा । रोम बंक नहि होय तुम्हारा ॥
सत्य वचन तुम हमरो मानो । रावन जाइ तुरत तुम आनो ॥
प्रतिहार वचन ।
तेज देखि प्रतिहार सकाना । मुखते बोल न सका निदाना ॥
ततछन गा प्रतिहार जनायी । द्वै कर जोरे ठाढ़ रहायी ॥
सिद्ध एक जो हम पहैं आई । ते कह राजहिं लाव बुलाई ॥
रावनका क्रोध प्रतिहार प्रति ।
सुनि नृप क्रोध कीन्ह तेहि बारा । तैं अतिहीन आहि प्रतिहारा ॥
यह मति ज्ञान हरो किन तोरा । जो तैं मोहि बुलावन दोरा ॥
दरस मोर सिव सुत नहि पावत । मो कहै भिच्छुक कहा बुलावत ॥
हे प्रतिहार सुनहु मम वानी । सिद्ध रूप कहो मोहि बखानी ॥
वरन है कौन कौन तिहि भेषा । मो सन कहो दिष्टि जस देषा ॥
प्रतिहार बचन ।
अहो राजन तेहि स्वेत स्वरूपा । स्वेतहिं माला तिलक अनूपा ॥
ससि समान तिहि रूप विराजा । स्वेत वसन सब स्वेतहिं साजा ॥
मन्दोदरी बचन ।
कहे मंदोदरि रावन राजा । ऐसो रूप पुरुषको छाजा ॥
वेगहिं जाय गहो तुम पाई । तो तुव राज अटल होय जाई ॥
छोड़हुं राजा मान बडाई । चरन टेकि जो सीस नवाई ॥
कबीरबचन धर्मदास प्रति ।
रावन सुनत क्रोध अति कीन्हा । जरत हुतासन मनु घृत दीन्हा ॥
रावन चला सस्त्र लै हाथा । तुरत जाय तिहिं काटों माथा ॥
मारा ताहि सीस खसि परयी । देखों भिच्छुक मुहि का करयी ॥
जहँ मुनींद्र तहँ रावन आया । सत्तर बार अस्त्र कर लाया ॥
लीन्ह मुनीन्द्र त्रिन कर ओटा । अति बल रावन मारै चोटा ॥
छन्द-- त्रिन ओट यहि कारने, है गर्व धारी राव हो ।
तेहि कारने यह जुगत कीन्ही, लाज रावन आय हो ॥
मन्दोदरी बचन ।
कहे मंदोदरि सुनहु राजा, गर्व छोड़ो लाज हो ।
पांव टेकहु पुरुषके गहि, अटल होवै राज हो ॥
रावण बचन ।
सो०--सेवा करें सिव जाय, जिन मोहि राज अटल दिये ।
ताकर टेकों पांय, पल दंडवत छन ताहिको ॥
मुनींद्र बचन ।
सुन अस बचन मुनींद्र पुकारी । तुम हो रावन गरब अहारी ॥
भेद हमारा तुम नहि जाना । बचन एक तोहि कहों निसाना ॥
रामचंद्र मारें तुहि आयी । मांस तुम्हार स्वान नहि खायी ॥
कबीर वचन धर्मदास प्रति ।
रावनको कीन्हो अयमाना । अवधनगर पुनि कीन्ह पयाना ॥
मधुकरकी कथा छंद—
तीन जीव परबोधि लंका, तब अवधनगरहिं आयऊ ।
विप्र मधुकर मिलेउ मारग, दरस तिन मम पायऊ ॥
मिलेउ मो कहैं चरण गहि, तब सीस नाय अधीनता ।
करि विनय बहु, लेगयो मंदिर, कीन्ह बहु बिधि दीनता ॥
सोरठा—रंक विप्र थिर ज्ञान, बहुत प्रेम मोसों किया ।
सब्द ज्ञान सहिदान, सुधा सरित बिहँसत वदन ॥
देख्यो ताहि बहुत लवलीना । तासों कह्यो ज्ञानको चीना ॥
पुरुष सँदेस कहेउ तिहिं पासा । सुनतबचन जिय भयउ हुलासा ॥
जिमि अंकुर तपै विन बारी । पूरन उदक जो मिले खरारी ॥
अम्बु मिलत अंकुर सुख माना । तैसहिं मधुकर सब्दहिं जाना ॥
मधुकर वचन ।
पुरुष भाव सुन तेहि हरषंता । मोकहैं लोक दिखावहु संता ॥
मुनीन्द्र वचन ।
चलहु तोहि लै लोक दिखाओं । लोक दिखाय बहुरि लै आवों ॥
कबीर वचन धर्मदास प्रति ।
राख्यो देह हंस लै धाये । अमर लोक लैं तिहिं पहुँचाये ॥
सोभा लोक देख हरषाना । तब मधुकरको मन पतियाना ॥
मधुकर वचन ।
परचो चरण मधुकर अकुलाई । हे साहिब अब त्रिषा बुझाई ॥
अब मोहिं लेइ चलो ग माहीं । और न जीव उपदेश सो ताहीं ॥
और जीव गृहमाहिं जो आई । तिन कहैं हम उपदेसब जाई ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
हंसहिं लै आये संसारा । पैठ देह जाग्यो द्विजबारा ॥
मधुकर घर षोडस जिव रहई । पुरुष संदेश सबनसों कहई ॥
गहहु चरण समरथके जाई । वही लेहिं जमसों मुकताई ॥
मधुकर वचन सबन मिलि माना । मुक्ति जान लीन्हों परवाना ॥
मधुकर वचन ।
कह मधुकर बिनतीसुन लीजै । लोक निवास सबन कहैं दीजै ॥
यहिं जम देश बहुत दुख होई । जीव अम्बु बूझै नहिं कोई ॥
मोहि सब जीवन लै चलु स्वामी । कृपा करहु प्रभु अंतरजामी ॥
छन्द— यहिं देश है जम महा परबल, जीव सकल सतावई ।
कष्ट नाना भांति व्यापे, मरन जीवन लावई ॥
काम क्रोध कठोर त्रिस्ना, लोभ माया अति बली ।
देव मुनिगन सर्बाहिं व्यापे, कोट जीवन दलमली ॥
सोरठा—तिहुपुर जमको देस, जीवन कहैं सुख छनक नहिं ।
मेटहु काल कलैस, लेइ चलहु निज देशकहैं ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
बहुत अधीन ताहि हम जाना । कर चौका दीन्हा परवाना ॥
षोडश जिव परवाना पाये । तिनकहैंलैं सतलोक पठाये ॥
जमके दूत देख सब ठाडे । चितर्वाहिं जे जन ऊद्व अखाडे ॥
पहुँचे जाय पुरुष दरवारा । अंशन हंसन हरष अपारा ॥
परसे चरन पुरुषके हंसा । जनम मरनको मेटेउ संसा ॥
सकल हंस पूछी कुसलाई । कहु द्विज कुसल भये अब आई ॥
धरमदास यह अचरज बानी । गुप्त परगट चीन्ह सो ज्ञानी ॥
हंसन अमर चीर पहिराये । देह हिरम्मर लखि सुध पाये ॥
षोडश भान हंस उजियारा । अमृत भोजन करें अहारा ॥
अगर वासना त्रिप्त सरीरा । पुरुष दरस गदगद मितड धीरा ॥
यहिं विधि त्रेतायुगको भावा । हंस मुक्त ये नाम प्रभावा ॥
इति अनुरागसागरान्तर्गत त्रेतायुगकी कथा समाप्त ।
पंद्रहवाँ प्रकरण ।
द्रापर युगमें कबीर साहबका पृथ्वीपर प्रकट होना और
करुणामय स्वामीके नामसे प्रख्यात होकर
मनुष्योंको मुक्ति देनेका वृत्तान्त ।
रानी इन्द्रमतीकी कथा ।
जब त्रतायुग बीत गया और द्रापरयुगका समय आया तब सत्यपुरुषने कहा कि, हे ज्ञानी ! पृथ्वीपर जाकर सत्यपुरुषोंको उपदेश देकर मेरे लोकमें लेआओ । सत्यपुरुषकी जब आज्ञा हुई तब सत्यपुरुषको दंडवत् प्रणाम करके
ज्ञानीजी पृथ्वीपर आये । इस समय करुणामय स्वामी गिरिनारमें प्रकट हुए । बहोंका राजा चन्द्रविजय था और उस राजाकी रानीका नाम इन्द्रमती था। वह रानी साधुसेवा तन मनसे करती थी । साधुकी सेवा तथा प्रेममें अपना धन तथा मन सब कुछ समर्पण करती थी । जब कभी साधुको देखती तो बड़े प्रेम और भक्तिके साथ उनकी सेवा किया करती और सब साधुओंका ज्ञान सुना करती थी । उस रानीकी सेवा, प्रेम और साधुभक्ति देखकर करुणामय स्वामी प्रसन्न हुए और जहाँपर रानी इन्द्रमतीका महल था उस पथसे होकर आप निकले ॥ रानी अपनी अटारीके ऊपर बैठी थी । उसने देखा कि, कोई साधु जाता है, तब उसे अपनी दासीको भेजा कि, तू जाकर उस साधुको बुलालेआ । जब वह दासी गयी और दंडवत् प्रणाम करके रानीका समाचार कहा, तब करुणामय ऋषिने उत्तर दिया कि, राजाओंमें अपने धन ऐश्वर्यका बड़ा अभिमान होता है, हम साधु हैं राजाओंके घर नहीं जाते । यह बात सुनकर वह दासी रानीके पास पलट आयी और कहा कि, वह साधु तो मेरे बुलानेसे नहीं आता है । यह बात सुनतेही स्वयम् रानी इन्द्रमती दौड़ती हुई आयी और सत्यगुरुको दंडवत् करके निवेदन करने लगी कि, हे महाराज ! आप मेरे गृहमें पधारकर मुझको सुभागी कीजिये । रानी इन्द्रमतीके प्रेम, निवेदन और नम्रताको देखकर करुणामय स्वामी उसके घर पधारे । रानीने चरण धोकर सत्यगुरुका चरणोदक लिया और बड़े आदर तथा सत्कारके साथ बैठाया । जब भोजनादि खिलाकर निश्चित होचुकी तब आपके पास ज्ञान सुननेके निमित्त आयी । जब सत्यगुरुकी बातें सुन चुकी तब कहने लगी, हे महाराज ! मुझको आप अपनी दीक्षा दीजिये । तब सत्यगुरुने रानीको अपना उपदेश दिया और वह आपकी चेली हुई । सत्यगुरुने उसको अपना ज्ञान भली भाँति समझा दिया । तब तो वह इन्द्रमती और भी भक्ति और प्रेमके साथ साधुसेवा करने लगी । उसने अपने पति राजा चन्द्रविजयसे कहा कि, हे महाराज ! आप भी सत्यगुरुकी दीक्षा ग्रहण कीजिये । तब राजाने कहा कि, हे रानी ! तू मेरी अधीक्षिनी है, तेरी भक्तिसे मेराभी उपकार होगा और मैं मुक्ति पाऊँगा । राजा चन्द्रविजयन सत्यगुरुकी दीक्षा नहीं ली । करुणामय स्वामी रानीको उपदेश देकर चले गये ।
यहाँपर अनुरागसागरका प्रमाण ।
त्रेता गत द्वापर जग आवा । तब पुनि भयो काल परभावा ॥
द्वापर जुग प्रवेस भा जबहीं । पुरुष अवाज कीन्ह पुनि तबहीं ॥
पुरुष वचन
ज्ञानी बेगि जाहु संसारा । जमसों जीवन करहु उबारा ॥
काल देत जीवन कहैं त्रासा । काटो जाय तिनहिंको फांसा ॥
ज्ञानी वचन ।
तब हम कहा पुरुषसों बानी । आज्ञा करहु सब्द परवानी ॥
कालहिं मेटि जीव लै आवो । बार बार का जगहिं सिधावो ॥
पुरुष वचन ।
कहा पुरुष सुन जोग सँतायन । सब्द चिताय जीव मुक्तायन ॥
जो अब कालहिं मेटो जाई । हो सुत तब मम वचन नसाई ॥
अबतो परे जीव यह फंदा । जगतिहिं आनहु परम अनंदा ॥
काल चरित परगट ह्वैं जाई । तब सब जीव चरन गह आई ॥
ज्ञान अज्ञान चीन्ह नहिं जायी । जाय प्रगट ह्वैं जिवन चितायी ॥
सहज भाव जग प्रगटहु जाई । जब लग जीव काल बस भाई ॥
देखहु भाव जीवनको भाई । काल चरित सब देहु बताई ॥
तोहि गहे सो जिव मुहि पैहैं । जिन परतीत नहीं जम खेहैं ॥
जाइ करहु जीवन कडिहारी । तोपर है परताप हमारी ॥
हमसों तुमसों अंतर नाही । जिमि तरंग जलमांहि समाहीं ॥
हम है तुमहि जो दुइकर जाना । ता घट जम सब करिहैं थाना ॥
जाहु बेगि तुम वा संसारा । जीवन खेइ उतारहु पारा ॥
कबीरवचन—धर्मदास प्रति ।
चले हम तब माथ नवायी । पुरुष आज्ञा जग मांहि सिधायी ॥
पुरुष अवाज चल्यो संसारा । चरण टेकु मम धरम लवारा ॥
निरंजन वचन ।
छंद—धरमराय तबहीं अधीन ह्वैं, विनती बहुत कीन्हैउ ।
किहि कारने अब जग सिधारेहु, मोहि सो मति दीन्हैउ ॥
अस करहु जनि सब जग चितावहु, इहै विनती मैं करौं ।
तुम बंधु जेठे छोट मैं, कर जोर तुम पायन परौं ॥
ज्ञानी वचन ।
सोरठा—कह्यो धरम सुन बात, विरल जीव मोहि चीन्हैहै ॥
सब्दनको पतियात, तुम अस कै जीवन ठगे ॥
तीनों देवोंकी प्राकट्य
कबीरवचन—धर्मदास प्रति ।
अस कह मृत्यु लोक पगु धारा । पुनि परमारथ शब्द पुकारा ॥
छोडया लोक लोककी काया । नरकी देह धरि तब आया ॥
मृत्यु लोकमें हम पगु धारा । जीवन सो सत शब्द पुकारा ॥
करुनामय तब नाम धराया । द्वापर जुग जब मंहिमें आया ॥
कोइ न बूझे हेला मेरी । बांधे काल विषय भ्रम बेरी ॥
रानी इन्द्रमती कथा ।
गढ गिरनार जबहिं चलि आये । चंद्रविजय नृप तहाँ रहाये ॥
तेहि नृप ग्रह रह नारि सयानी । पूजे साधु महात्म जानी ॥
चढी अटारी बाट निहारे । संत दरस कहैं काया गारे ॥
रानी प्रीति बहुत हम जाना । तेहि मारग कहैं कीन्ह पयाना ॥
मोहि पहुँ द्रिष्टि परी जब रानी । त्रिषली रसना कह यह बानी ॥
इन्द्रमती वचन ।
मारग बेगि जाहु तुम धाई । देखहु साधु आनु गहि पाई ॥
दासी वचन ।
त्रिषली आय चरन लपटानी । नृप वनिता मुख भाष सयानी ॥
कही त्रिषली रानि अस भाषा । तुव दरशन कहैं बहु अभिलाषा ॥
देहु दरश मोहि दीनदयाला । तुम्हरे दरस मिटे सब साला ॥
करुणामय वचन—दासी प्रति ।
तब ज्ञानी कंहि वचन सुनावें । राज राव घर हम नहिं जावें ॥
राज काज है मान बढाई । हम साधु नृप गृह नहिं जाई ॥
दासीवचन—रानी प्रति ।
चलि त्रिषली रानीपहुँ आयी । दुई कर जोरे विनय सुनाई ॥
साधु न आवे मोर बुलावें । राज राव घर हम नहिं जावें ॥
यह सुन इन्द्रमती उठि धाई । किन्ह दंडवत टेक्यो पाई ॥
इन्द्रमती वचन ।
हे साहिब मोपर करु दया । मोरे गृह अब धरिये पाया ॥
कह रानी चलु मन्दिर मोरे । होब सुखी दरसन लिये तोरे ॥
कबीरवचन—धर्मदास प्रति ।
प्रीति देख हम भवन सिधारें । राजा घर तबहीं पग धारे ॥
प्रीति देखि तेहि भवन सिधाये । दीन्ह सिंहासन चरन खटाये ॥
चरन धोय पुनि राखेसि रानी । ले चरनाम्रित जन्म सुभ जानी ॥
इन्द्रमतीवचन ।
पुनि प्रसादको अज्ञा मांगी । हेप्रभु मोकहैं करहु सुभागी ॥
जूठन परै मो गृह माही । सीत प्रसाद लै हमहैं खाहीं ॥
कुरुणामय वचन ।
सुनुरानी मुहि छुधा न होई । पंच तत्त्व पावे जेहि सोई ॥
अमृत नाम अहार है मोरा । सुनु रानी यह भाष्यो थोरा ॥
देह हमारी तत्त्व गुन न्यारी । तत्त्वप्रकृतिहि काल रचिवारी ॥
असी पंच किहु काल समीरा । पंचतत्त्वकी देह खमीरा ॥
तामहैं आदि पवन इक आही । जीव सोहंगम बोलत ताही ॥
यह जिव अहै पुरुषको अंसा । रोकसि काल ताहि दे संसा ॥
नाना फंद रचि जीव गरासै । देह लोभ तब जीवहिं फांसै ॥
जिव तारन हम यहि जग आये । जो जिव चीन्ह ताहि मुकताये ॥
धर्मराय अस बाजी कीन्हा । धोक अनेक जीव कहैं दीन्हा ॥
नीर पवन कृत्रिम किय काला । विनसि जाय बहु करै बिहाला ॥
तन हमार यहि साजहिं न्यारा । मम तन नहिं सिरज्यो करतारा ॥
सब्द अमान देह है मोरा । परखि गहहु भाष्यो कछु थोरा ॥
कबीर वचन धर्मदास प्रति ।
सुनत वचन अचरज भौ भारी । तब रानी अस वचन उचारी ॥
रानी इन्द्रमती वचन ।
हे प्रभु अचरज यह होई । अस सुभाव दूजा नहिं कोई ॥
छन्द— इन्द्रमति आधीन होय कहै, कृपा करहु दयानिधी ।
एक एक बिलोय बरनहु, सब मोहिते सकलहु विधी ॥
विस्तु सम दूजा नाहिं कोई, रुद्र चतुरानन मुनी ।
पंचतत्त्व है खमीर तन तिहि, तत्त्वनके वश गुन गुनी ॥
सोरठा—तुम प्रभु अगम अपार, बरनो माने किन भये ।
मेटहु त्रिषा हमार, अपने परिचय मोहि कहु ॥
हे प्रभु अस अचरज मोहि होई । अस सुभाव दूजा नहिं कोई ॥
कौन आहु कहवाँते आये । तन अर्चित प्रभु कहैवा पाये ॥
कौन नाम तुम्हरो गुरु देवा । यह सब वरनि कहो मोहि भेवा ॥
हम का जानहिं भेद तुम्हारा । ताते पूछा यह व्यवहारा ॥
करुणामय वचन ।
इन्द्रमती सुन कथा सुहावन । तोहि समुझाय कहों गुनपावन ॥
देस हमार न्यार तिहुँ पुरते । अहिपुर नरपुर अरु सुरपुरते ॥
तहाँ नहीं जम कर परवेसा । आदि पुरुषको जहवाँ देसा ॥
सत्य लोक तेहि देस सुहेला । सत्य नाम गहि कीजे मेला ॥
अद्भुत जोति पुरुष की काया । हंसन सोभा अधिक सुहाया ॥
आदि पुरुष सोभा अधिकारा । पटतर कहा देहुँ संसारा ॥
द्वीपकरी सोभा उजियारी । पटतर देहुँकाहि संसारी ॥
यहि तीनों पुर अस नहि कोई । जाकर पटतर दीजै सोई ॥
चन्द्र सूर यदि देश मंझारा । इन सम और नहीं उजियारा ॥
सत्य लोककी ऐसी बाता । कोटिक ससि इकरोम लजाता ॥
एक रोमकी सोभा ऐसी । और बदनकी बरणौ कँसी ॥
ऐसे पुरुष कान्ति उजियारा । हंसन सोभा कहों बिचारा ॥
एक हंस जस षोडस भाना । अगर वासना हंस अधाना ॥
तब कबहुँ जामिनि नहि होई । सदा अँजोर पुरुष तन सोई ॥
कहा कहों कछु कहत न आवे । धन्य भाग जे हंस सिधाये ॥
ताहि देसते हम चलि आये । करुणामय निज नाम धराये ॥
सतयुग त्रेता द्वापर आये । तोसन वचन कहों सुखदाये ॥
जुगन जुगनमें मैं चलि आवों । जो चेत तेहि लोक पठावों ॥
इन्द्रमती वचन ।
हे प्रभु औरो जुग तुम आये । कौन नाम उन जुगन धराये ॥
करुणामय वचन ।
सतजुगमें मैं सतनाम कहायो । त्रेता नाम मुनीन्द्र धरायो ॥
अब करुणामय नाम धरावों । जो चीन्हे तिहि लोक पठावों ॥
कबीरवचन धर्मवास प्रति ।
धरमदास तेहि कहयो बुझायी । सतयुग त्रेता कथा सुनायी ॥
सोसुनि अधिक चाह तिन कीन्हा । और बात सो पूछन लीन्हा ॥
उत्पति परलय और बहु भाऊ । जमचरित्र सब वरनि सुनाऊ ॥
जेहि विधि षोडश सुत प्रगटाने । सो सब भाष सुनाया ज्ञाने ॥
कूर्म विदार देवी उत्पानी । सो सब ताहि कहा सहिदानी ॥
ग्रास अष्टंगी और निकासा । जेहि विधि भये मही आकासा ॥
सिन्धु मथन त्रय सुत उत्पानी । सबही कहे पाछिल महिदानी ॥
जेहि विधिजीवन जमठगिराखी । सो सब ताहि सुनायउ भाखी ॥
मुक्त ज्ञान पाछिल भ्रम भागा । हरषि सो चरन गहे अनुरागा ॥
इन्द्रमती वचन ।
जोरि पानि बोली बिलखाई । हे प्रभु जमलेहु छुडाई ॥
राज पाट सब तुमपर वारों । धनसम्पति यह सब तजि डारों ॥
देहु सरन मुहि दीनदयाला । बंदिछोर मुहि करहैं निहाला ॥
करुणामय वचन ।
इन्द्रमती सुनु वचन हमारा । छोरों निश्चय बन्दि तुम्हारा ॥
चीन्हेंउ मोहि परतीत दिढाना । अबदे हूँ तोहि नाम परवाना ॥
कराइ आरति लेहु परवाना । भागे जम तब दूर षयाना ॥
चीन्हो मोहि करो परतीती । लहु पान चलु भौजल जीती ॥
आनहु जो कछु आरति साजा । राजपाट कर मोहि न काजा ॥
धन सम्पति कछु मोहि न भावा । जीव चितावनयहि जग आवा ॥
धन सम्पति परमारथ लायी । करहु सन्त सन्मान बतायी ॥
सकल जीवहैं साहिब केरा । मोह विवस जिवपरे अंधेरा ॥
सब घट पुरुषअंश कियो बासा । कहीं प्रगट कहि गुप्तनिवासा ॥
छन्द— सब जीवहैं सतपुरुषके, बस मोह भरम विमानहो ।
जमराजको यह चरित सब भ्रम, जालजमपरधान हो ॥
जीवकाल बसहो लरत मोसे भ्रम वश मोहिन चीन्हही ।
तजि सुधा कीन्हो नेह विषसे, छोड़िघृत अँचवे मही ॥
सोरठा—कोई इकविरला जीव, परखि शब्द मोहिचीन्हई ॥
धाय मिले निज पीब, तजे जारको आसरो ॥
इन्द्रमती वचन ।
इन्द्रमती सुन वचन अमानी । बोली मधुर ज्ञान गुन खानी ॥
मोहि अधमको तुमसुख दीन्हा । तुव परसाद आगम ममचीन्हा ॥
हे प्रभु चिन्हतोहि अब पाहूँ । निश्चय सत्य पुरुष तुम आहूँ ॥
सत्य पुरुष जिन लोक सँवारा । करहु कृपा सो मोहि उदारा ॥
आपन हिरदय अस हम जाना । तुमते अधिक और नहिं आना ॥
अब भाषहु प्रभु आरति भाऊ । जो चहिय सो मोहि बताऊ ॥
अम्बुसागरका प्रमाण
कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।
हे धरमनि सो ताहि सुनावा । जस खेमसरी सो भाषेउ भावा ॥
चौका कर लेवहु परवाना । पाछ कहीं अपने सहिदाना ॥
आनेउ सकल साज तब रानी । चौका बैठि शब्द धुनि ठानी ॥
आरति कर दीन्हा परवाना । पुरुषध्यान सुमिरन सहिदाना ॥
उठि रानी तब माथ नवायी । ले आज्ञा परवाना पायी ॥
पुनि रानी राजहि समुझावा । हे प्रभु बहुरि न ऐसो दावा ॥
गहो सरन जो कारज चाहो । इतना वचन मोर निरबाहो ॥
राजा चन्द्रविजय वचन ।
तुम रानी अरधंगी सोई । हम तुम भगत होय नहिं दोई ॥
तेरि भगति कर देखों भाऊ । किहिविधि मोहि लेहु मुकताऊ ॥
देखों तोरि भगती परतापा । पहुँचो लोक मिटे संतापा ॥
कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।
रानी बहुरि मोहिपहँ आयी । हम तिहिकालचरित्र लखायी ॥
रानी आई हमारे पास । तासो किया वचन परकासा ॥
सुनु रानी एक वचन हमारा । कालहु कला करे छल धारा ॥
काल ब्याल हँ तो पहुँ आयी । डसे तोहि सो देऊँ बतायी ॥
तो कहँ शिष्यकीन हमजानी । डसे काल तच्छक हँ आनी ॥
अब हमतो कहँ मन्त्र लखाओं । काल गाल सब दूर भागाओं ॥
लेहु शब्द विरहुली हम पाहीं । काल गरल जेहि व्यापे नाही ॥
पनि अरू दूसर छल तोहि ठानी । सो चरित्र में कहीं बखानी ॥
छल कर जम आवे तुव पास । सो तुहि भेद कहीं परगासा ॥
हंस वरण वह रूप बनायी । हम सब ज्ञान तोहि समझाई ॥
तुम सन कहे चीन्ह मुहि रानी । मरदन काल नाम ममज्ञानी ॥
यहि विधि काल ठगे तोहि आयी । काल भेख सब देऊँ बतायी ॥
मस्तक छोटा काल कर जानू । आखिन गुंजन रंग बखानू ॥
काल लच्छ में तोहि बतायी । और अंग लब सेत रहायी ॥
इन्द्रमती वचन ।
रानी चरण गहे तब धायी । हे प्रभु मोहि लोक लै जायी ॥
यह तो देश आहि जम केरा । लै चलुलोक मिटै झकझोरा ॥
यह तो देस कालकर थानी । हे प्रभु लै चलु देस अमानी ॥
आद्या लीला, रागोंके नाम
करुणामय वचन ।
तब रानीसों कहेउ बुझाई । वचन हमार सुनो चितलाई ॥
अब तुम्हार तिनका जम टूटा । परिचय भयो सकल भ्रमछूटा ॥
निसिदिन सुमरो नाम हमारा । कहा करे जम धरम लबारा ॥
जवलगि ठेका पूरे आई । तब लग रहो नाम लौलाई ॥
छंद-सुमरहु नाम हमारसु निसिदिन, काल तो कहैं जब छले ।
आयु ठीका पुरे नाहिं जौलौं, तौलों जीव नाहीं चले ॥
काल कला परचंड देखु, गज रूप धर जग आवई ।
देखि केहरि गजत्रास माने, धीर बहुरि न लावई ॥
सोरठा-गजरूपी है काल, केहरि पुरुष प्रताप है ।
रोक रहो तुम ढाल, काल खडग व्यापे नहीं ॥
इन्द्रमती वचन ।
हे साहिब मैं तुम कह जानी । वचन तुम्हार लीन्ह सिरमानी ॥
विनती एक करौं तुहि स्वामी । तुमतो साहिब अंतरयामी ॥
काल व्याल ह्वै मोहि सतायी । अरु पुनि हंस रूप भरमाई ॥
तब पुनि साहिब मो पहुँ आऊ । हंस हमार लोक लै जाऊ ॥
करुणामय वचन ।
कह ज्ञानी सुन रानी बाता । तुमसों एक कहों विख्याता ॥
काल कला धरि तो पहुँ आवे । नाना रंग चरित्र बनावे ॥
सब्द तोही हम दीन्ह लखाई । निसिदिन सुमरो चित लगायी ॥
तोरो ताहिकर मान गुमाना । कालके दावसो मिटै निदाना ॥
तेहि पीछे हम तुम लग अइहैं । मोहि देख तब काल परैहैं ॥
हंस तुम्हार लोक कहैं जाई । काल दगा रहन न पाई ॥
कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।
इतना कह हम गुप्त छिपाया । तच्छक रूप काल होआया ॥
चित्रसार पर तच्छक आया । रानी केर तहैं पलँग रहाया ॥
जबहीं रात बीत गइ आधी । रानी उठि चलीं सेवा साधी ॥
रानी सब कहैं सीस नवायी । चली तबैं महलन कहैं आयी ॥
सेज आय रानी पौढायी । डसेउ व्याल मस्तकमहैं आयी ॥
इन्द्रमती वचन ।
इन्द्रमती अस वचन सुनाई । तच्छक डसेउ मोहिकहैं आयी ॥
इकसठ रागिनियोंके नाम
सुन राजा व्याकुल ह्वै धावा । गुनी गारुडी वेगि बुलावा ॥
राय कहे सम प्राण पियारी । लेहु चिताय जो अबकी बारी ॥
तच्छक गरल दूर होय जायी । देहुँ परगना तोहि दिवायी ॥
इन्द्रमती वचन ।
छंद—सब्द विरहुली जपेउ रानी, सुरति साहिब राखिहो ।
वैद गारुडि सब दूर भागो, दूर नरपति नाहि हो ॥
मंत्र मोहि लखाय सतगुरु गरल मोहि न लागई ।
होत सूर परकास जेहि छन, अंध अघोर नसावई ॥
सोरठा—ऐसे गुरु हमार, बार बार विनती करौं ।
ठाढ भयी उठि नार, राजा लखि हरषित भयो ॥
यमदूत वचन ।
चला दूत तब उहँवा जायी । ब्रह्मा विस्नु महेश रहायी ॥
कहे दूत विष तेज न लागा । नाम परताप अन्ध हो भागा ॥
विष्णुवचन
कहे विस्नु सुनुं हो जम दूता । सेवहीं अंग करो तुम पूता ॥
छल करि जाइ लिवाइय रानी । वचन हमार लेहु तुम मानी ॥
कीन्हो दूत सेत सब अंगा । चलेउ नारि पहुँ बहुत उमंगा ॥
देखत रानी छल मतिचीन्हा । आदर भाव न तनिको कीन्हा ॥
यमदूत वचन ।
तबहीं अस दूत वचन परगासा । तुम कस रानी भई उदासा ॥
जानि बूझि कस भई अचीन्हा । दीच्छा मंत्र तोहि हम दीन्हा ॥
ज्ञानी नाम हमारो रानी । मरदों काल करौं पिसमानी ॥
तच्छक काल होय तोहि खाये । तब हम राखलीन्ह तोहि आये ॥
छोड़हु पलँग गहो तुम पाई । तजहु आपनी मान बडाई ॥
अब हम लैन तोहि कहँ आवा । प्रभुके दरसन तोहि करावा ॥
इन्द्रमती वचन ।
इन्द्रमती तब चीन्हेंउ रेषा । जस कछु साहिब कहेउ विसेषा ॥
तीनों रेख देख चख माहीं । जरद सेत अरु राता आहीं ॥
मस्तक ओछ देख पुनि ताको । भयो प्रतीत वचनको साको ॥
जाहु दूत तुम अपने देसा । अब हम चीन्हेंउ तुम्हरो भेसा ॥
काग रूप जो बहुत बनायी । हंस रूप सोभा किमि पायी ॥
तस हम तोरा रूप निहारा । है समरथ बड गुरु हमारा ॥
२ अध्याय । कबीर साहिबके प्राकट्य
यमदूत वचन ।
यह सुनि दूत रोष बड़ कीन्हा । इन्द्रमतीसों बोले लीन्हा ॥
बार बार तोकहैं समुझावा । नाहि न समुझतमती हिरावा ॥
बोलत वचन निकट चलिआवा । इन्द्रमती पर थाप चलावा ॥
थाप चलायी मुखपर मारा । रानी खसिपरि भूमि मँझारा ॥
इन्द्रमती वचन ।
इन्द्रमती तब सुमिरन लायी । हे गुरु ज्ञानी होहु सहायी ॥
हम कहैं काल बहुत विधि ग्रासा । तुम साहिब काटो जमफाँसा ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
सुनत पुकार मुहिं रहो न जायी । सुनहु धर्मनि यह मोर सुभायी ॥
रानी जबहीं कीन्ह पुकारा । तत छिन मैं तहाँहि पगुधारा ॥
देखत रानी भयी हुलासा । मनते भग्यो कालको त्रासा ॥
आवत हमरे काल पराया । भयी सुद्ध रानीकी काया ॥
इन्द्रमती वचन ।
तब कह इन्द्रमती कर जोरी । हे प्रभु सुनु विनती यक मोरी ॥
चीन्हि परी मोहि जमकी छाहीं । अब यहि देस रहब हम नाहीं ॥
हे साहब लै चलु निज देसा । इहवां है बहु काल कलेसा ॥
इहि विधि कही भयी उदासा । अबहीं लै चलु पुरुषके पास ॥
कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।
तबहीं रानी लीनो संग। मेटयो काल कठिन परसंगा ॥
तबहीं ठीका पूर भराया । ले रानी सत लोक सिधाय। ॥
ले पहुँचायो मान सरोवर । जहवां कामिनि करहिं कलाहर ॥
अमी सरोवर अमी चखायी । सागर कबीर पांव परायी ॥
जब कबीर सागर कहैं परसेउ । सुरति सागर तबहीं सरसेउ ॥
तेहि आगे सुरतिको सागर । पहुँची रानी भई उजागर ॥
लोक द्वार ठाढ तब कीन्ही । देखत रानी अति सुख भीनी ॥
हंस धाय अंकम भर लीन्हा । गावहिं मंगल आरति कीन्हा ॥
सकल हंस कीन्हे सनमाना । धन्य हंस सतगुरु पहिचाना ॥
भल तुम छोड़े कालके फन्दा । तुम्हरे कष्ट मिटेउ दुखदुन्दा ॥
आवहु हंस हमारे साथ। चलहु पुरुष कहैं नावहु माथा ॥
इन्द्रमती आवहु संग मोरे । पुरुष दरश होवे अब तोरे ॥