भारतकोश
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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

अध्याय २२ ] महादेवजीद्वारा विष्णु और ब्रह्माको वरदान···रुद्रोंकी सृष्टि [ १०३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उवाच भगवान् देवो मधुरं श्लक्ष्णया गिरा।<br>भो भो हिरण्यगर्भ त्वां त्वां च कृष्ण ब्रवीम्यहम्॥ ७<br>प्रीतोऽहमनया भक्त्या शाश्वताक्षरयुक्तया।<br>भवन्तौ हृदयस्यास्य मम हृद्यतरावुभौ॥ ८उन दोनोंकी वह बात सुनकर भगवान् शंकर प्रसन्न होकर सम्मानपूर्वक कोमल वाणीमें धीरेसे बोले—हे हिरण्यगर्भ! हे कृष्ण! मैं आप दोनोंको बता रहा हूँ कि मैं आपकी इस शाश्वत तथा दृढ़ भक्तिसे प्रसन्न हूँ॥ ६-७ १/२॥<br><br>आप दोनों लोगोंके प्रति मेरे हृदयमें अपार प्रेम है। मैं आज आपलोगोंको श्रेष्ठ तथा मनोवांछित कौन-सा वर प्रदान करूँ?॥ ८ १/२॥
युवाभ्यां किं ददाम्यद्य वराणां वरमीप्सितम्।<br>अथोवाच महाभागो विष्णुर्भवमिदं वचः॥ ९<br>सर्वं मम कृतं देव परितुष्टोऽसि मे यदि।<br>त्वयि मे सुप्रतिष्ठा तु भक्तिर्भवतु शङ्कर॥ १०तदनन्तर महाभाग विष्णुने रुद्रसे यह वचन कहा—हे देव! मेरा यही सर्व अभीष्ट है कि यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, तो हे शंकर! मुझे अपने प्रति अचल भक्ति प्रदान कीजिये॥ ९-१०॥
एवमुक्तस्तु विज्ञाय सम्भावयत केशवम्।<br>प्रददौ च महादेवो भक्तिं निजपदाम्बुजे॥ ११विष्णुके ऐसा कहनेपर महादेवने विष्णुभगवान्‌को स्नेहपूर्वक अपने चरणकमलोंमें स्थिर भक्ति प्रदान की॥ ११॥
भवान् सर्वस्य लोकस्य कर्ता त्वमधिदैवतम्।<br>तदेवं स्वस्ति ते वत्स गमिष्याम्यम्बुजेक्षण॥ १२<br>एवमुक्त्वा तु भगवान् ब्रह्माणं चापि शङ्करः।<br>अनुगृह्यास्पृशद्देवो ब्रह्माणं परमेश्वरः॥ १३<br>कराभ्यां सुशुभाभ्यां च प्राह हृष्टतरः स्वयम्।<br>मत्समस्त्वं न सन्देहो वत्स भक्तश्च मे भवान्॥ १४<br>स्वस्त्यस्तु ते गमिष्यामि संज्ञा भवतु सुव्रत।तत्पश्चात् भगवान् शंकरने ब्रह्माजीसे कहा—हे कमलनयन! आप समस्त लोकके कर्ता हैं तथा आप ही अधिष्ठातृ देवता हैं। अतः हे वत्स! आपका कल्याण हो। मैं तो अब प्रस्थान करूँगा। ब्रह्माजीसे इस प्रकार कहकर भगवान् शंकरने अपने दोनों पवित्र हाथोंसे अनुग्रहपूर्वक ब्रह्माजीका स्पर्श किया। पुनः उन परमेश्वर शंकरने प्रसन्न मनसे ब्रह्मासे स्वयं कहा—आप भी मेरे ही तुल्य हैं; इसमें सन्देह नहीं है। हे वत्स! आप मेरे भक्त हैं। आपका कल्याण हो और आपको यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति हो। हे सुव्रत! अब मैं प्रस्थान कर रहा हूँ॥ १२-१४ १/२॥
एवमुक्त्वा तु भगवांस्ततोऽन्तर्धानमीश्वरः॥ १५इस प्रकार कहकर समस्त देवताओंके वन्दनीय, गणोंके रक्षक, परमेश्वर भगवान् महादेव अन्तर्धान हो गये॥ १५ १/२॥
गतवान् गणपो देवः सर्वदेवनमस्कृतः।<br>अवाप्य संज्ञां गोविन्दात् पद्मयोनिः पितामहः॥ १६<br>प्रजाः स्रष्टुमनाश्चक्रे तप उग्रं पितामहः।भगवान् गोविन्दसे ज्ञान प्राप्त करके पितामह ब्रह्माने प्रजाओंकी सृष्टिकी कामनासे भीषण तप करना आरम्भ कर दिया॥ १६ १/२॥
तस्यैवं तप्यमानस्य न किञ्चित्समवर्तत॥ १७<br>ततो दीर्घेण कालेन दुःखात्क्रोधो ह्यजायत।<br>क्रोधाविष्टस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः॥ १८इस प्रकार दीर्घ कालतक तपस्या करते हुए उनका जब कुछ भी सिद्ध नहीं हुआ, तब उन्हें बहुत दुःख हुआ और उस दुःखसे वे बहुत क्रोधित हो उठे। कोपसे
१०४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततस्तेभ्योऽश्रुबिन्दुभ्यो वातपित्तकफात्मकाः।<br>महाभागा महासत्त्वाः स्वस्तिकैरप्यलङ्कृताः॥ १९युक्त उन ब्रह्माके दोनों नेत्रोंसे आँसुओंकी बूँदें गिरने लगीं॥ १७-१८॥<br><br>तत्पश्चात् उन अश्रुबिन्दुओंसे वात-पित्त-कफयुक्त, महान् सत्त्वसे सम्पन्न, महाभाग्यशाली तथा महाविषधर सर्प उत्पन्न हुए। वे स्वस्तिक चिह्नसे विभूषित थे तथा उनके केश फैले हुए थे॥ १९ १/२॥
प्रकीर्णकेशाः सर्पास्ते प्रादुर्भूता महाविषाः।<br>सर्पांस्तानग्रजान् दृष्ट्वा ब्रह्मात्मानमनिन्दयत्॥ २०उन सर्पोंको पहले उत्पन्न हुआ देखकर ब्रह्माजीको बड़ी आत्मग्लानि हुई। वे अपनी भर्त्सना करते हुए कहने लगे—'अहो, मुझे धिक्कार है। मेरी तपस्याका मुझे यही फल प्राप्त हुआ कि आरम्भमें ही मेरी लोकविनाशक सर्परूप प्रजा उत्पन्न हुई'॥ २०-२१॥
अहो धिक् तपसो मह्यं फलमीदृशकं यदि।<br>लोकवैनाशिकी जज्ञे आदावेव प्रजा मम॥ २१
तस्य तीव्राभवन्मूर्च्छा क्रोधामर्षसमुद्भवा।<br>मूर्च्छाभिपरितापेन जहौ प्राणान् प्रजापतिः॥ २२अत्यधिक क्रोध तथा अधीरतासे युक्त होनेके कारण ब्रह्माजीको तीव्र मूर्च्छा उत्पन्न हुई और उस मूर्च्छासे आक्रान्त पितामहने अपने प्राण त्याग दिये॥ २२॥
तस्याप्रतिमवीर्यस्य देहात्कारुण्यपूर्वकम्।<br>अथैकादश ते रुद्रा रुदन्तोऽभ्यक्रमंस्तथा॥ २३इसके पश्चात् अप्रतिम वीर्यवाले उन ब्रह्माके देहसे दीनभावसे कारुण्यपूर्वक ग्यारह रुद्र रोते हुए निकले। रुदन करनेके कारण ही उनका नाम रुद्र पड़ा॥ २३ १/२॥
रोदनात्खलु रुद्रत्वं तेषु वै समजायत।<br>ये रुद्रास्ते खलु प्राणाः ये प्राणास्ते तदात्मकाः॥ २४जो रुद्र हैं, वे ही प्राणरूप हैं तथा जो प्राण हैं, वे उन्हीं रुद्रके आत्मारूप हैं। सभी प्राणियोंमें स्थित उन रुद्रोंको ही जीवोंके प्राणरूपमें जानना चाहिये॥ २४ १/२॥
प्राणाः प्राणवतां ज्ञेयाः सर्वभूतेष्ववस्थिताः।<br>अत्युग्रस्य महत्त्वस्य साधुराचरितस्य च॥ २५नीललोहित त्रिशूलधारी शिवजीने अत्यन्त उग्र स्वभाववाले, महिमाशाली तथा उत्तम आचरणवाले उन ब्रह्माको पुनः उनके प्राण प्रदान कर दिये॥ २५ १/२॥
प्राणांस्तस्य ददौ भूयस्त्रिशूली नीललोहितः।<br>लब्ध्वासून् भगवान् ब्रह्मा देवदेवमुमापतिम्॥ २६तत्पश्चात् प्राण प्राप्तकर भगवान् ब्रह्माने खड़े होकर देवाधिदेव उमापतिको प्रणामकर गायत्रीके ध्यानसे विश्वरूप परमात्मा शिवको वहाँ देखा॥ २६ १/२॥
प्रणम्य संस्थितोऽपश्यद् गायत्र्या विश्वमीश्वरम्।<br>सर्वलोकमयं देवं दृष्ट्वा स्तुत्वा पितामहः॥ २७समस्त लोकोंमें व्याप्त रहनेवाले महादेवको देखकर ब्रह्माजीने उनकी स्तुति की। तत्पश्चात् उन्होंने आश्चर्यचकित होकर शिवजीको बार-बार प्रणामकर उनसे पूछा—हे विभो! 'सद्योजात' आदि रूपमें आपका प्रादुर्भाव क्यों हुआ?॥ २७-२८॥
ततो विस्मयमापन्नः प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः।<br>उवाच वचनं शर्वं सद्यादित्वं कथं विभो॥ २८

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे रुद्रोत्पत्तिवर्णनं नाम द्वाविंशतितमोऽध्यायः ॥ २२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'रुद्रोत्पत्तिवर्णन' नामक बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २२ ॥

२३- विभिन्न कल्पोंमें होनेवाले सद्योजातादि शिवावतारोंका वर्णन, विभिन्न लोकोंकी स्थिति तथा महारुद्रका विश्वरूपत्व

अध्याय २३ ] विभिन्न कल्पोंमें होनेवाले सद्योजातादि शिवावतारोंका वर्णन १०५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

तेईसवाँ अध्याय

विभिन्न कल्पोंमें होनेवाले सद्योजातादि शिवावतारोंका वर्णन, विभिन्न लोकोंकी स्थिति तथा महारुद्रका विश्वरूपत्व

सूत उवाचसूतजी बोले—ब्रह्माजीका वह वचन सुनकर उनके प्रबोधनके लिये ब्रह्मरूप भगवान् शिवने मुसकराकर उनसे कहा— ॥ १ ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणो भगवान् भवः।<br>ब्रह्मरूपी प्रबोधार्थं ब्रह्माणं प्राह सस्मितम्॥ १
श्वेतकल्पो यदा ह्यासीदहमेव तदाभवम्।<br>श्वेतोष्णीषः श्वेतमाल्यः श्वेताम्बरधरः सितः॥ २जब श्वेतकल्प था, उस समय मैं श्वेत वर्णका था। मेरी श्वेत पगड़ी, श्वेत माला, श्वेत वस्त्र, श्वेत अस्थि, श्वेत रोम, श्वेत त्वचा तथा श्वेत ही मेरा रुधिर था। इसी कारणसे वह कल्प 'श्वेतकल्प' नाम से विख्यात हुआ॥ २-३॥
श्वेतास्थिः श्वेतरौमा च श्वेतासृक् श्वेतलोहितः।<br>तेन नाम्ना च विख्यातः श्वेतकल्पस्तदा ह्यसौ ॥ ३
मत्प्रसूता च देवेशी श्वेताङ्गा श्वेतलोहिता।<br>श्वेतवर्णा तदा ह्यासीद् गायत्री ब्रह्मसंज्ञिता॥ ४उस कल्पमें मुझसे उत्पन्न ब्रह्म नामसे जानी जानेवाली देवेश्वरी गायत्री भी श्वेत अंगोंवाली, श्वेत रक्तवाली तथा श्वेत वर्णवाली थीं॥ ४॥
तस्मादहं च देवेश त्वया गुह्येन वै पुनः।<br>विज्ञातः स्वेन तपसा सद्योजातत्वमागतः॥ ५तदनन्तर हे देवेश! आपने अपने उग्र तपसे सद्योजातत्वको प्राप्त मुझ शिवको जाना॥ ५॥
सद्योजातेति ब्रह्मैतद् गुह्यं चैतत्प्रकीर्तितम्।<br>तस्माद् गुह्यत्वमापन्नं ये वेत्स्यन्ति द्विजातयः॥ ६मेरा यह सद्योजातरूप गुह्य ब्रह्मके रूपमें जाना जाता है। अतएव गुह्यत्वको प्राप्त मुझ सद्योजात शिवको जो द्विजातिगण जानेंगे, वे मेरे सान्निध्यको प्राप्त होंगे, जहाँसे उनका पुनरागमन नहीं होता अर्थात् वे जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं॥ ६१/२॥
मत्समीपं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।<br>यदा चैव पुनस्त्व्ाासील्लोहितो नाम नामतः॥ ७पुनः जब मेरा नाम लोहित था, तब मेरे द्वारा धारित लोहित वर्णके कारण वह कल्प लोहितकल्प नामसे कहा गया॥ ७१/२॥
मत्कृतेन च वर्णेन कल्पो वै लोहितः स्मृतः।<br>तदा लोहितमांसास्थिलोहितक्षीरसम्भवा॥ ८उस कल्पमें रक्तवर्णके मांस तथा हड्डियोंवाली, रक्त-वर्णका दूध प्रदान करनेवाली, लाल आँखोंवाली तथा लाल स्तनवाली धेनुरूपमें गायत्री अधिष्ठित हुईं॥ ८१/२॥
लोहिताक्षी स्तनवती गायत्री गौः प्रकीर्तिता।<br>ततोऽस्या लोहितत्वेन वर्णस्य च विपर्ययात्॥ ९तदनन्तर उस धेनुके लोहितत्व, उस कल्पमें वर्णके बदल जाने तथा योगकी वामताके कारण मैं वामदेवत्वको प्राप्त हुआ अर्थात् मेरा नाम वामदेव पड़ गया॥ ९१/२॥
वामत्वाच्चैव देवस्य वामदेवत्वमागतः।<br>तत्रापि च महासत्त्व त्वयाहं नियतात्मना॥ १०हे महासत्त्व ! उस कल्पमें भी नियत आत्मावाले आपने अपने योगबलसे लोहितवर्ण-स्थित मुझ परमेश्वरको जाना और तभीसे मैं पृथ्वीलोकमें वामदेव नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हो गया॥ १०-११॥
विज्ञातः स्वेन योगेन तस्मिन् वर्णान्तरे स्थितः।<br>ततश्च वामदेवेति ख्यातिं यातोऽस्मि भूतले ॥ ११
१०६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ये चापि वामदेवत्वं ज्ञास्यन्तीह द्विजातयः।<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ १२जो भी द्विजातिगण मेरे वामदेवस्वरूपको जानेंगे, वे जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्ति प्राप्त करानेवाले मेरे रुद्रलोकमें निवास करेंगे॥ १२॥
यदाहं पुनरेवेह पीतवर्णो युगक्रमात्।<br>मत्कृतेन च नाम्ना वै पीतकल्पोऽभवत्तदा॥ १३जब मैं युगक्रमसे पीतवर्णवाला हुआ, तब मेरे वर्णनामपर उस कल्पका नाम पीतकल्प हुआ॥ १३॥
मत्प्रसूता च देवेशी पीताङ्गी पीतलोहिता।<br>पीतवर्णा तदा ह्यासीद् गायत्री ब्रह्मसंज्ञिता॥ १४मेरे द्वारा उत्पन्न तथा ब्रह्म नामसे जानी जानेवाली देवेश्वरी गायत्रीका भी अंग पीला, रक्त पीला तथा वर्ण आदि सब पीला था॥ १४॥
तत्रापि च महासत्त्व योगयुक्तेन चेतसा।<br>यस्मादहं तैर्विज्ञातो योगतत्परमानसैः॥ १५<br><br>तत्र तत्पुरुषत्वेन विज्ञातोऽहं त्वया पुनः।<br>तस्मात्तत्पुरुषत्वं वै ममैतत्कनकाण्डज॥ १६हे महासत्त्व! उस कल्पमें भी योगपरायण मनवाले उन द्विजातियोंने योगयुक्त चित्तसे मुझे जाना। हे कनकाण्डज! उस कल्पमें तुमने भी मुझे पुनः तत्पुरुषरूपमें जाना; उसी कारणसे मेरा यह तत्पुरुष नाम हुआ॥ १५-१६॥
ये मां रुद्रं च रुद्राणीं गायत्रीं वेदमातरम्।<br>वेत्स्यन्ति तपसा युक्ता विमला ब्रह्मसङ्गताः॥ १७<br><br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।तपस्यासे युक्त, विशुद्ध मनवाले तथा ब्रह्मपरायण जो लोग मुझ रुद्र तथा वेदमाता रुद्राणी गायत्रीकी आराधना करेंगे, वे पुनर्जन्मसे मुक्ति दिलानेवाले रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ १७ १/२॥
यदाहं पुनरेवासं कृष्णवर्णो भयानकः॥ १८पुनः जब मैंने भयानक कृष्णवर्ण धारण किया, तब मेरे वर्णके नामसे वह कल्प कृष्णकल्प कहा गया॥ १८ १/२॥
मत्कृतेन च वर्णेन सङ्कल्पः कृष्ण उच्यते।<br>तत्राहं कालसङ्काशः कालो लोकप्रकालकः॥ १९हे ब्रह्मन्! उस कल्पमें भी तुमने कालसदृश, कालरूप, लोकोंके लिये महाकाल तथा घोर पराक्रमवाले मुझ घोरको जाना॥ १९ १/२॥
विज्ञातोऽहं त्वया ब्रह्मन् घोरो घोरपराक्रमः।<br>मत्प्रसूता च गायत्री कृष्णाङ्गी कृष्णलोहिता॥ २०हे देवेश! उस कल्पमें मुझसे उत्पन्न ब्रह्मसंज्ञावाली गायत्री भी कृष्ण अंगोंवाली, कृष्ण रक्तवाली तथा कृष्ण रूपवाली थीं॥ २० १/२॥
कृष्णरूपा च देवेश तदासीद् ब्रह्मसंज्ञिता।<br>तस्माद् घोरत्वमापन्नं ये मां वेत्स्यन्ति भूतले॥ २१अतएव इस भूतलपर जो लोग घोरत्वको प्राप्त मुझ शिवको जान लेंगे, शाश्वत रूपवाला मैं उनके लिये सौम्य तथा शान्त हो जाऊँगा॥ २१ १/२॥
तेषामघोरः शान्तश्च भविष्याम्यहमव्ययः।<br>पुनश्च विश्वरूपत्वं यदा ब्रह्मन् ममाभवत्॥ २२<br><br>तदाप्यहं त्वया ज्ञातः परमेण समाधिना।<br>विश्वरूपा च संवृत्ता गायत्री लोकधारिणी॥ २३हे ब्रह्मन्! पुनः जब मैं विश्वरूपत्वको प्राप्त हुआ, उस समय भी आपने परम समाधिसे मुझे जाना था। उस समय समस्त लोकोंको धारण करनेवाली गायत्री भी विश्वरूपा अर्थात् अनेक वर्णोंवाली थीं॥ २२-२३॥
तस्मिन् विश्वत्वमापन्नं ये मां वेत्स्यन्ति भूतले।<br>तेषां शिवश्च सौम्यश्च भविष्यामि सदैव हि॥ २४इस भूतलपर जो लोग विश्वत्वको प्राप्त मुझ परमात्माको जान लेंगे, उनके प्रति मैं सदाके लिये सौम्य तथा शान्त हो जाऊँगा॥ २४॥

अध्याय २३ ] विभिन्न कल्पोंमें होनेवाले सद्योजातादि शिवावतारोंका वर्णन १०७

यस्माच्च विश्वरूपो वै कल्पोऽयं समुदाहृतः।<br>विश्वरूपा तथा चेयं सावित्री समुदाहृता॥ २५<br><br>सर्वरूपा तथा चेमे संवृत्ता मम पुत्रकाः।<br>चत्वारस्ते मया ख्याताः पुत्रा वै लोकसम्मताः॥ २६इसी कारण यह कल्प विश्वरूपकल्प नामसे जाना गया और ये गायत्री विश्वरूपा नामसे कही गयीं। वे सर्वरूपा थीं और ये सद्योजात आदि चार कुमार मेरे पुत्ररूपमें प्रकट हुए, जिनकी लोकमें विशेष प्रसिद्धि हुई॥ २५-२६॥
यस्माच्च सर्ववर्णत्वं प्रजानां च भविष्यति।<br>सर्वभक्षा च मेध्या च वर्णतश्च भविष्यति॥ २७ये गायत्री शब्द और अर्थरूपसे मेध्या अर्थात् यज्ञयोग्या होंगी, सर्वभक्षा अर्थात् पातकादिविनाशि़का होंगी। गायत्रीके [सावित्रीके] सर्ववर्णा (सर्वशब्दात्मिका) होनेसे ही चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था प्रजामें व्यवस्थित होगी॥ २७॥
मोक्षो धर्मस्तथार्थश्च कामश्चेति चतुष्टयम्।<br>यस्माद्वेदाश्च वेदां च चतुर्था वै भविष्यति॥ २८<br><br>भूतग्रामाश्च चत्वार आश्रमाश्च तथैव च।<br>धर्मस्य पादाश्चत्वारश्चत्वारो मम पुत्रकाः॥ २९इसीलिये धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष—चार प्रकारके ये पुरुषार्थ हैं और वेद भी चार हैं। जीव-समुदायोंके भी जरायुज, अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज—ये चार प्रकारके रूप हैं तथा आश्रम भी चार हैं। दया, दान, तप, सत्य—ये धर्मके चार पाद हैं एवं मेरे पुत्र भी चार हैं॥ २८-२९॥
तस्माच्चतुर्युगावस्थं जगद्वै सचराचरम्।<br>चतुर्धावस्थितश्चैव चतुष्पादो भविष्यति॥ ३०इसीलिये यह चराचर जगत् युगरूप चार अवस्थाओंवाला है और यह चतुष्पादात्मक लोक भी भेदानुसार चार रूपोंमें अवस्थित है॥ ३०॥
भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकश्च महस्तथा।<br>जनस्तपश्च सत्यं च विष्णुलोकस्ततः परम्॥ ३१भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपलोक तथा सत्यलोक—इन सबके परे विष्णुलोक स्थित है॥ ३१॥
अष्टाक्षरस्थितो लोकः स्थाने स्थाने तदक्षरम्।<br>भूर्भुवः स्वर्महश्चैव पादाश्चत्वार एव च॥ ३२<br><br>भूर्लोकः प्रथमः पादो भुवर्लोकस्ततः परम्।<br>स्वर्लोको वै तृतीयश्च चतुर्थस्तु महस्तथा॥ ३३अष्टाक्षररूप लोक अपने-अपने स्थानपर अक्षरात्मकरूपमें विद्यमान हैं। भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक तथा महर्लोक ही चार पादके रूपमें अवस्थित हैं। इनमें भूर्लोक पहला पाद है, भुवर्लोक दूसरा पाद है, स्वर्लोक तीसरा तथा महर्लोक चौथा पाद है॥ ३२-३३॥
पञ्चमस्तु जनस्तत्र षष्ठश्च तप उच्यते।<br>सत्यं तु सप्तमो लोको ह्यपुनर्भवगामिनाम्॥ ३४पाँचवाँ जनलोक, छठा तपलोक तथा पुनर्जन्मकी प्राप्ति न करनेवाले लोगोंका सत्यलोक सातवाँ लोक कहा गया है॥ ३४॥
विष्णुलोकः स्मृतं स्थानं पुनरावृत्तिदुर्लभम्।<br>स्कान्दमोमं तथा स्थानं सर्वसिद्धिसमन्वितम्॥ ३५विष्णुलोक वह पद है, जहाँ पहुँचकर जीवका पुनः आगमन नहीं होता है। उससे भी आगे स्कन्दलोक तथा उससे भी परे पार्वतीलोक है, जो सर्वविध सिद्धियोंसे युक्त माना गया है॥ ३५॥
रुद्रलोकः स्मृतस्तस्मात्पदं तद्योगिनां शुभम्।<br>निर्ममा निरहङ्काराः कामक्रोधविवर्जिताः॥ ३६रुद्रलोक उससे परे विद्यमान है। वह पद योगियोंके लिये अत्यन्त शुभकर कहा गया है। ममतारहित, अहंकार-
१०८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
द्रक्ष्यन्ति तद् द्विजा युक्ता ध्यानतत्परमानसाः।<br>यस्माच्चतुष्पदा ह्येषा त्वया दृष्टा सरस्वती ॥ ३७शून्य, काम-क्रोधसे विवर्जित तथा ध्यानपरायण चित्तवाले योगीजन ही उस लोकका दर्शन करेंगे॥ ३६ १/२॥<br><br>और जो आपने चार पादोंवाली इस गायत्री (सरस्वती)-को देखा है, उसीके चार चरणोंके रूपमें चरम पदवाला विष्णुलोक, शान्त तथा उत्तम स्कन्दलोक, पार्वतीलोक एवं रुद्रलोक अवस्थित हैं। ऐसी माहात्म्ययुक्त सरस्वतीका आपने दर्शन किया है॥ ३७-३८॥
पादान्तं विष्णुलोकं वै कौमारं शान्तमुत्तमम्।<br>औमं माहेश्वरं चैव तस्माद् दृष्टा चतुष्पदा ॥ ३८
तस्मात्तु पशवः सर्वे भविष्यन्ति चतुष्पदाः।<br>ततश्चैषां भविष्यन्ति चत्वारस्ते पयोधराः ॥ ३९इससे सभी पशु भी चार पैरोंवाले होंगे और इसीसे इनके चार स्तन भी होंगे। हे ब्रह्मन्! मेरे मुखसे गिरा हुआ मन्त्रयुक्त सोमरूप अमृत प्राणधारियोंका जीवन बनकर उनके स्तनमें निवास करेगा। इसलिये वे स्तन 'पीतस्तन' कहे जायेंगे॥ ३९-४०॥
सोमश्च मन्त्रसंयुक्तो यस्मान्मम मुखाच्च्युतः।<br>जीवः प्राणभृतां ब्रह्मन् पुनः पीतस्तनाः स्मृताः ॥ ४०
तस्मात्सोममयं चैव अमृतं जीवसंज्ञितम्।<br>चतुष्पादा भविष्यन्ति श्वेतत्वं चास्य तेन तत् ॥ ४१उसीके कारण सोममय अमृत जीवनसंज्ञावाला होगा और उनके दुग्धका श्वेतत्व उसी सोमरूपत्वके कारण होगा—ऐसे गुणोंवाले वे चतुष्पाद होंगे॥ ४१॥
यस्माच्चैव क्रिया भूत्वा द्विपदा च महेश्वरी।<br>दृष्टा पुनस्तथैवैषा सावित्री लोकभाविनी ॥ ४२आपके द्वारा देखी गयी यह लोकभाविनी सावित्री महेश्वरी पुनः दो पादोंवाली होकर क्रियारूप धारण करेगी; जिससे सभी शुभ नर-नारी दो पादों तथा दो स्तनोंवाले होंगे॥ ४२ १/२॥
तस्माच्च द्विपदाः सर्वे द्विस्तनाश्च नराः शुभाः।<br>तस्माच्चेयमजा भूत्वा सर्ववर्णा महेश्वरी ॥ ४३सभी प्राणियोंको धारण करनेवाली तथा महान् शक्तिसे सम्पन्न जिस देवीका आपने दर्शन किया है; वह महेश्वरी अजा होकर जब सर्ववर्णमय विश्वरूप धारण करेगी, तब उसीसे सभी प्रजाएँ भी अनेक वर्णोंवाली होंगी॥ ४३-४४॥
या वै दृष्टा महासत्त्वा सर्वभूतधरा त्वया।<br>तस्माच्च विश्वरूपत्वं प्रजानां वै भविष्यति ॥ ४४
अजश्चैव महातेजा विश्वरूपो भविष्यति।<br>अमोघरेताः सर्वत्र मुखे चास्य हुताशनः ॥ ४५तब महातेज तथा अमोघ वीर्यवाले अज विश्वरूप धारण करेंगे और इनके मुखमें सर्वत्र अग्नि विराजमान होगी; उसी कारण सर्वव्यापी पशुरूपी अग्नि पवित्र मानी जायगी॥ ४५ १/२॥
तस्मात्सर्वगतो मेध्यः पशुरूपी हुताशनः।<br>तपसा भावितात्मानो ये मां द्रक्ष्यन्ति वै द्विजाः ॥ ४६विशुद्ध आत्मावाले जो द्विजगण अपनी तपस्यासे ईशित्व (ईश्वरत्व) तथा वशित्व (योगसिद्धि)-में सभी जगह मुझे भी सर्वव्यापी रूपमें विराजमान देखेंगे; वे रजोगुण तथा तमोगुणसे रहित होकर मानवशरीरका त्याग करके मेरा सान्निध्य प्राप्त करेंगे और उनका पुनर्जन्म नहीं होगा॥ ४६-४७ १/२॥
ईशित्वे च वशित्वे च सर्वगं सर्वतः स्थितम्।<br>रजस्तमोभ्यां निर्मुक्तास्त्यक्त्वा मानुष्यकं वपुः ॥ ४७
मत्समीपमुपेष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।<br>इत्येवमुक्तो भगवान् ब्रह्मा रुद्रेण वै द्विजाः ॥ ४८सूतजी कहते हैं कि हे द्विजो! शिवजीके इस

२४- श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले अट्ठाईस व्यासों, अट्ठाईस शिवावतारों तथा विविध शिवयोगियोंका वर्णन

अध्याय २४] श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले व्यासोंका वर्णन १०९


प्रणम्य प्रयतो भूत्वा पुनराह पितामहः।<br>य एवं भगवान् विद्वान् गायत्र्या वै महेश्वरम्॥ ४९<br><br>विश्वात्मानं हि सर्वं त्वां गायत्र्यास्तव चेश्वर।<br>तस्य देहि परं स्थानं तथास्त्विति च सोऽब्रवीत्॥ ५०प्रकार कहनेपर भगवान् ब्रह्माने प्रणाम करके विनम्रतापूर्वक रुद्रसे पुनः कहा—हे भगवन्! जो विद्वान् सर्वव्यापी विश्वात्मा आप महेश्वरको गायत्रीसहित सर्वत्र स्थित देखे तथा हे ईश्वर! आपकी एवं गायत्रीकी आराधना करे, उसे आप परमपद दें। इसपर उन शिवजीने कहा—वैसा ही होगा॥ ४८-५०॥
तस्माद्विद्वान् हि विश्वत्वमस्याश्चास्य महात्मनः।<br>स याति ब्रह्मसायुज्यं वचनाद् ब्रह्मणः प्रभोः॥ ५१इसलिये प्रभु शिवद्वारा ब्रह्माजीके प्रति कहे गये वचनके अनुसार जो विद्वान् गायत्री तथा महात्मा रुद्रका विश्वरूपत्व जान लेता है, वह ब्रह्मसायुज्यको प्राप्त होता है अर्थात् ब्रह्मके साथ उसका तादात्म्य स्थापित हो जाता है॥ ५१॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ‘विविधकल्पवर्णनं’ नाम त्रयोविंशोऽध्यायः॥ २३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘विविधकल्पवर्णन’ नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २३॥


चौबीसवाँ अध्याय

श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले अट्ठाईस व्यासों, अट्ठाईस शिवावतारों तथा विविध शिवयोगियोंका वर्णन

सूत उवाचसूतजी बोले—
श्रुतैवमखिलं ब्रह्मा रुद्रेण परिभाषितम्।<br>पुनः प्रणम्य देवेशं रुद्रमाह प्रजापतिः॥ १[हे मुनियो!] शिवके द्वारा कथित सम्पूर्ण वचनोंको सुनकर प्रजापति ब्रह्माने उन देवाधिदेव शिवको प्रणाम करके पुनः उनसे कहा—॥ १॥
भगवन् देवेश विश्वरूप महेश्वर।<br>उमाधव महादेव नमो लोकाभिवन्दित॥ २हे भगवन्! हे देवेश! हे विश्वरूप! हे महेश्वर! हे उमापते! हे महादेव! हे लोकवन्द्य! आपको नमस्कार है॥ २॥
विश्वरूप महाभाग कस्मिन् काले महेश्वर।<br>या इमास्ते महादेव तनवो लोकवन्दिताः॥ ३<br>कस्यां वा युगसम्भूतयां द्रक्ष्यन्तीह द्विजातयः।<br>केन वा तपसा देव ध्यानयोगेन केन वा॥ ४हे विश्वरूप! हे महाभाग! हे महेश्वर! हे महादेव! आपके ये जो लोकवन्द्य अवतार हैं, वे किस कालमें तथा किस युगमें द्विजातियोंके द्वारा इस लोकमें देखे जा सकेंगे?॥ ३½॥<br>हे देव! हे महादेव! आपको नमस्कार है। द्विजातिगण किस तप या ध्यानयोगके द्वारा आपका दर्शन कर पानेमें समर्थ हो सकते हैं?॥ ४½॥
नमस्ते वै महादेव शक्यो द्रष्टुं द्विजातिभिः।<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शर्वः सम्प्रेक्ष्य तं पुरः॥ ५<br>स्मयन् प्राह महादेवो ऋग्यजुःसामसम्भवः।ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदसे प्रादुर्भूत महादेव रुद्र अपने सम्मुख-स्थित उन पितामहको देखकर मुसकराते हुए उनसे बोले॥ ५½॥
श्रीभगवानुवाच<br>तपसा नैव वृत्तेन दानधर्मफलेन च॥ ६भगवान् शिव बोले— मानव मुझे न तो केवल
११०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| न तीर्थफलयोगेन क्रतुभिर्वाप्तदक्षिणैः।<br>न वेदाध्ययनैर्वापि न वित्तेन न वेदनैः॥ ७<br>न शक्यं मानवैर्द्रष्टुमृते ध्यानादहं त्विह। | तपसे, न आचारसे, न दानसे, न धर्मफलसे, न तीर्थाटनसे, न योगसे, न पुष्कल दक्षिणावाले यज्ञोंसे, न वेदोंके अध्ययनसे, न धनसे तथा न तो शास्त्रोंके परिशीलनमात्रसे ही देख सकनेमें समर्थ हैं, मेरा दर्शन ध्यानरहित साधनाके द्वारा नहीं किया जा सकता॥ ६-७१/२॥ | | सप्तमे चैव वाराहे ततस्तस्मिन् पितामह॥ ८<br>कल्पेश्वरोऽथ भगवान् सर्वलोकप्रकाशकः।<br>मनुर्वैवस्वतश्चैव तव पौत्रो भविष्यति॥ ९ | हे पितामह! वाराहकल्पके सातवें मन्वन्तरमें सभी लोकोंको प्रकाशित करनेवाला और कल्पका स्वामी मेरा अवताररूप वैवस्वत मनु आपके पौत्रके रूपमें अवतरित होगा॥ ८-९॥ | | तदा चतुर्युगावस्थे तस्मिन् कल्पे युगान्तिके।<br>अनुग्रहार्थं लोकानां ब्राह्मणानां हिताय च॥ १०<br>उत्पत्स्यामि तदा ब्रह्मन् पुनरस्मिन् युगान्तिके।<br>युगप्रवृत्त्या च तदा तस्मिंश्च प्रथमे युगे॥ ११<br>द्वापरे प्रथमे ब्रह्मन् यदा व्यासः स्वयं प्रभुः।<br>तदाहं ब्राह्मणार्थाय कलौ तस्मिन् युगान्तिके॥ १२<br>भविष्यामि शिखायुक्तः श्वेतो नाम महामुनिः।<br>हिमवच्छिखरे रम्ये छागले पर्वतोत्तमे॥ १३ | उसी कल्पके द्वापरयुगके अन्तमें लोकोंपर अनुग्रह तथा ब्राह्मणोंके हितके लिये मैं अवतार ग्रहण करूँगा। पुनः हे ब्रह्मन्! युगप्रवृत्तिके अनुसार इसी प्रथम द्वापरयुगके अन्तमें जब स्वयं प्रभु व्यास होंगे, उस समय ब्राह्मणोंके हितार्थ मेरा अवतार होगा। इसके अनन्तर उसी युगकी समाप्तिपर कलिमें मैं शिखाधारी ‘श्वेत’ नामक महामुनिके रूपमें अवतीर्ण होऊँगा और पर्वतोंमें उत्तम हिमालयके छागल नामवाले शिखरपर निवास करूँगा॥ १०-१३॥ | | तत्र शिष्याः शिखायुक्ता भविष्यन्ति तदा मम।<br>श्वेतः श्वेतशिखश्चैव श्वेतास्यः श्वेतलोहितः॥ १४<br>चत्वारस्तु महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगाः।<br>ततस्ते ब्रह्मभूयिष्ठा दृष्ट्वा ब्रह्मगतिं पराम्॥ १५<br>मत्समीपं गमिष्यन्ति ध्यानयोगपरायणाः। | वहाँपर उस समय श्वेत, श्वेतशिख, श्वेतास्य तथा श्वेतलोहित नामक शिखायुक्त मेरे चार शिष्य प्रकट होंगे। ये चारों महात्मा, ब्रह्मनिष्ठ और वेदोंके पारगामी विद्वान् होंगे। तदनन्तर ध्यानयोगमें पूर्ण तत्पर वे ब्रह्मभूयिष्ठ शिष्य ब्रह्मकी परम गतिको जानकर मेरा सान्निध्य प्राप्त करेंगे॥ १४-१५१/२॥ | | ततः पुनर्यदा ब्रह्मन् द्वितीये द्वापरे प्रभुः॥ १६<br>प्रजापतिर्यदा व्यासः सद्यो नाम भविष्यति।<br>तदा लोकहितार्थाय सुतारो नाम नामतः॥ १७<br>भविष्यामि कलौ तस्मिन् शिष्यानुग्रहकाम्यया। | हे ब्रह्मन्! इसके बाद द्वितीय द्वापरके अन्तमें पुनः जब ‘सद्य’ नामक प्रजापतिरूप प्रभु व्यास होंगे, उसके अनन्तर कलिमें अपने शिष्योंके अनुग्रहकी कामनासे तथा लोकके कल्याणार्थ मैं सुतार नामसे अवतार ग्रहण करूँगा॥ १६-१७१/२॥ | | तत्रापि मम ते शिष्या नामतः परिकीर्तिताः॥ १८<br>दुन्दुभिः शतरूपश्च ऋचीकः केतुमांस्तदा।<br>प्राप्य योगं तथा ध्यानं स्थाप्य ब्रह्म च भूतले॥ १९<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति सहचारित्वमेव च। | वहाँ भी दुन्दुभि, शतरूप, ऋचीक तथा केतुमान् नामसे प्रसिद्ध मेरे शिष्य प्रकट होंगे। वे योग तथा ध्यानको पूर्णतः प्राप्त होकर भूतलपर ब्रह्मज्ञान स्थापित करके शिवलोकको प्राप्त होंगे और सदा मेरे सान्निध्यमें रहेंगे॥ १८-१९१/२॥ | | तृतीये द्वापरे चैव यदा व्यासस्तु भार्गवः॥ २०<br>तदाप्यहं भविष्यामि दमनस्तु युगान्तिके।<br>तत्रापि च भविष्यन्ति चत्वारो मम पुत्रकाः॥ २१ | पुनः तीसरे द्वापरके अन्तमें जब ‘भार्गव’ नामक व्यास होंगे, तब मैं दमन नामसे अवतीर्ण होऊँगा और |

२५- लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत शरीर एवं मनकी शुद्धिके लिये अन्तः एवं बाह्य स्नानकी प्रक्रिया और विविध मन्त्रोंसे आत्माभिषेचन

अध्याय २४ ] श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले व्यासोंका वर्णन १११

| विकोशश्च विकेशश्च विपाशः शापनाशनः।<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण योगोक्तेन महौजसः॥ २२<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्। | उस समय भी विकोश, विकेश, विपाश तथा शापनाशन नामवाले मेरे चार शिष्य होंगे। उसी पूर्वोक्त ध्यान-योगके द्वारा वे महान् ओजस्वी शिष्य भी शिव-लोकको प्राप्त होंगे, जहाँसे जीवका पुनः आगमन नहीं होता है॥ २०—२२१/२॥ | | चतुर्थे द्वापरे चैव व्यासोऽङ्गिराः स्मृतः॥ २३<br>तदाप्यहं भविष्यामि सुहोत्रो नाम नामतः।<br>तत्रापि मम ते पुत्राश्चत्वारोऽपि तपोधनाः॥ २४<br>द्विजश्रेष्ठा भविष्यन्ति योगात्मानो दृढव्रताः।<br>सुमुखो दुर्मुखश्चैव दुर्द्ररो दुरतिक्रमः॥ २५ | चौथे द्वापरके अन्तमें जब 'अंगिरा' नामक व्यास होंगे, तब मैं भी सुहोत्र नामसे अवतीर्ण होऊँगा और उस समय भी मेरे चार पुत्र प्रकट होंगे। सुमुख, दुर्मुख, दुर्दर तथा दुरतिक्रम नामवाले मेरे वे सभी पुत्र तपस्वी, द्विजश्रेष्ठ, योगात्मा एवं दृढ़ व्रतवाले होंगे॥ २३—२५॥ | | प्राप्य योगगतिं सूक्ष्मां विमला दग्धकिल्बिषाः।<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण योगयुक्ता महौजसः॥ २६<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्। | विशुद्ध मन तथा नष्टपापवाले, योगयुक्त और महान् ओजस्वी वे पुत्र भी उसी मार्गसे योगकी सूक्ष्म गतिको प्राप्त होकर रुद्रलोकको जायँगे, जहाँसे जीवका पुनर्जन्म नहीं होता है॥ २६१/२॥ | | पञ्चमे द्वापरे चैव व्यासस्तु सविता यदा॥ २७<br>तदा चापि भविष्यामि कङ्को नाम महातपाः।<br>अनुग्रहार्थं लोकानां योगात्मकैकलागतिः॥ २८ | पाँचवें द्वापरके अन्तमें जब 'सविता' नामक व्यास होंगे; उस समय भी लोकोंके अनुग्रहार्थ योगात्मा, एककलागतिवाला तथा महान् तपोव्रती मैं 'कंक' नामसे अवतार ग्रहण करूँगा॥ २७-२८॥ | | चत्वारस्तु महाभागा विमलाः शुद्धयोनयः।<br>शिष्या मम भविष्यन्ति योगात्मानो दृढव्रताः॥ २९<br>सनकः सनन्दनश्चैव प्रभुर्यश्च सनातनः।<br>विभुः सनत्कुमारश्च निर्ममा निरहङ्कृताः॥ ३०<br>मत्समीपमुपेष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्। | उस समय सनक, सनन्दन, प्रभु सनातन तथा विभु सनत्कुमार नामक मेरे चार शिष्य प्रकट होंगे। महाभाग्यशाली, विशुद्ध चित्तवाले, शुद्धयोनि, योगात्मा, दृढ़व्रती, ममतारहित तथा अहंकारशून्य वे शिष्य पुनर्जन्मसे मुक्ति प्राप्त करानेवाले मेरे सान्निध्यको प्राप्त होंगे॥ २९-३०१/२॥ | | परिवर्ते पुनः षष्ठे मृत्युर्व्यासो यदा विभुः॥ ३१<br>तदाप्यहं भविष्यामि लोगाक्षिर्नाम नामतः।<br>तत्रापि मम ते शिष्या योगात्मानो दृढव्रताः॥ ३२<br>भविष्यन्ति महाभागाश्चत्वारो लोकसम्मताः।<br>सुधामा विरजाश्चैव शङ्खपाद्रज एव च॥ ३३ | पुनः छठे द्वापरके अन्तमें जब 'मृत्यु' नामक महान् ऐश्वर्यशाली व्यासका अवतार होगा, तब मैं लोगाक्षि नामसे आविर्भूत होऊँगा। उस समय भी सुधामा, विरजा, शंखपाद तथा रज नामक मेरे चार शिष्य होंगे। वे योगात्मा, दृढ़ व्रतवाले, महाभाग्यवान् एवं लोकविश्रुत होंगे॥ ३१—३३॥ | | योगात्मानो महात्मानः सर्वे वै दग्धकिल्बिषाः।<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण ध्यानयोगसमन्विताः॥ ३४<br>मत्समीपं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्। | योगात्मा, महान् आत्मावाले तथा ध्यानयोगसे सम्पन्न वे सभी शिष्य उसी मार्गका आश्रय लेकर मेरे समीप पहुँचेंगे, जहाँसे पुनर्जन्म नहीं होता है॥ ३४१/२॥ | | सप्तमे परिवर्ते तु यदा व्यासः शतक्रतुः॥ ३५<br>विभुनामा महातेजाः प्रथितः पूर्वजन्मनि।<br>तदाप्यहं भविष्यामि कलौ तस्मिन् युगान्तिके॥ ३६ | पूर्वजन्ममें विभु नामसे प्रख्यात महातेजस्वी शतक्रतु नामक व्यास जब सातवें द्वापरके अन्तमें होंगे, उस समय भी मैं उस द्वापरकी समाप्तिपर कलिमें सभी |

११२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जैगीषव्यो विभुः ख्यातः सर्वेषां योगिनां वरः।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति युगे तथा॥ ३७<br>सारस्वतश्च मेघश्च मेघवाहः सुवाहनः।<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण ध्यानयोगपरायणाः॥ ३८<br>गमिष्यन्ति महात्मानो रुद्रलोकं निरामयम्।योगियोंमें श्रेष्ठ विभु जैगीषव्य नामसे प्रसिद्ध होऊँगा। उस युगमें भी सारस्वत, मेघ, मेघवाह तथा सुवाहन नामक मेरे चार पुत्र होंगे। ध्यानयोगमें परायण वे महात्मा उसी योगमार्गपर चलकर निर्विकार शिवलोकको प्राप्त होंगे॥ ३५–३८ १/२ ॥
वसिष्ठश्चाष्टमे व्यासः परिवर्ते भविष्यति॥ ३९<br>यदा तदा भविष्यामि नाम्नाहं दधिवाहनः।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा योगात्मानो दृढव्रताः॥ ४०<br>भविष्यन्ति महायोगा येषां नास्ति समो भुवि।<br>कपिलश्चासुरिश्चैव तथा पञ्चशिखो मुनिः॥ ४१<br>बाष्कलश्च महायोगी धर्मात्मानो महौजसः।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं ज्ञानिनो दग्धकिल्बिषाः॥ ४२<br>मत्समीपं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।पुनः आठवें द्वापरके अन्तमें जब 'वसिष्ठ' नामक व्यास होंगे, तब दधिवाहन नामसे मैं अवतरित होऊँगा। उस समय भी कपिल, आसुरि, पंचशिखमुनि तथा महायोगी बाष्कल—ये मेरे परम योगात्मा एवं दृढ़व्रती चार पुत्र होंगे, जिनके सदृश महान् योगी भूतलपर कोई नहीं होगा। वे धर्मात्मा तथा महान् ओजस्वी पुत्र भी माहेश्वर योगमें सिद्ध होकर ज्ञानसम्पन्न और पापमुक्त हो मेरे सान्निध्यको प्राप्त होंगे, जहाँसे जीवका पुनः आगमन (जन्म) नहीं होता है॥ ३९–४२ १/२ ॥
परिवर्ते तु नवमे व्यासः सारस्वतो यदा॥ ४३<br>तदाप्यहं भविष्यामि ऋषभो नाम नामतः।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति महौजसः॥ ४४<br>पराशरश्च गर्गश्च भार्गवाङ्गिरसौ तथा।<br>भविष्यन्ति महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगाः॥ ४५<br>ध्यानमार्गं समासाद्य गमिष्यन्ति तथैव ते।<br>सर्वे तपोबलोत्कृष्टाः शापानुग्रहकोविदाः॥ ४६<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण योगोक्तेन तपस्विनः।<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ ४७नौवें द्वापरके अन्तमें जब 'सारस्वत' नामके व्यास होंगे, तब मैं भी ऋषभनामसे अवतीर्ण होऊँगा। उस समय भी पराशर, गर्ग, भार्गव तथा अंगिरा नामवाले मेरे चार पुत्र होंगे, जो महान् ओजस्वी, ब्रह्मनिष्ठ, वेदोंके पारगामी विद्वान् एवं महान् आत्मावाले होंगे। वे भी उसी प्रकार ध्यानमार्गको प्राप्त होकर इस लोकसे प्रस्थान करेंगे। तपोबलमें उत्कृष्ट, शाप-अनुग्रहके पूर्ण विद्वान् एवं तपोव्रती वे सभी पुत्र भी पूर्वोक्त उसी योगमार्गका आश्रय लेकर रुद्रलोकको प्राप्त होंगे, जहाँसे पुनः आगमन नहीं होता है॥ ४३–४७॥
दशमे द्वापरे व्यासः त्रिपाद्वै नाम नामतः।<br>यदा भविष्यते विप्रस्तदाहं भविता मुनिः॥ ४८<br>हिमवच्छिखरे रम्ये भृगुतुङ्गे नगोत्तमे।<br>नाम्ना भृगोस्तु शिखरं प्रथितं देवपूजितम्॥ ४९<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति दृढव्रताः।दसवें द्वापरके अन्तमें जब त्रिपाद् नामक विप्ररूप व्यास होंगे, तब मैं भृगुमुनिके रूपमें पर्वतोंमें उत्तम हिमालयके रमणीक भृगुतुंग नामक श्रेष्ठ पर्वत-शिखरपर अवतीर्ण होऊँगा। वह शिखर मेरे ही नामपर 'भृगुतुंग' नामसे प्रसिद्ध होगा तथा देवताओंद्वारा पूजित होगा॥ ४८-४९॥
बलबन्धुर्निरामित्रः केतुशृङ्गस्तपोधनः॥ ५०<br>योगात्मानो महात्मानस्तपोयोगसमन्विताः।<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति तपसा दग्धकिल्बिषाः॥ ५१उस समय भी बलबन्धु, निरामित्र, केतुशृंग तथा तपोधन—ये मेरे चार पुत्र होंगे, जो दृढ़व्रती, योगात्मा, महात्मा एवं तपोयोगसे युक्त होंगे। वे अपनी तपस्यासे पापोंको दग्ध करके रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ ५०–५१॥
एकादशे द्वापरे तु व्यासस्तु त्रिव्रतो यदा।<br>तदाप्यहं भविष्यामि गङ्गाद्वारे कलौ तथा॥ ५२ग्यारहवें द्वापरके अन्तमें जब 'त्रिव्रत' नामक व्यास होंगे, उस समय भी मैं कलिमें गंगाद्वारक्षेत्रमें

अध्याय २४ ] श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले व्यासोंका वर्णन ११३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उग्रो नाम महातेजाः सर्वलोकेषु विश्रुतः।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति महौजसः॥ ५३<br>लम्बोदरश्च लम्बाक्षो लम्बकेशः प्रलम्बकः।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकं गता हि ते॥ ५४अवतीर्ण होऊँगा तथा महातेजस्वी मैं उग्र नामसे सभी लोकोंमें विख्यात होऊँगा। उस समय भी लम्बोदर, लम्बाक्ष, लम्बकेश एवं प्रलम्बक नामवाले मेरे चार महातेजस्वी पुत्र होंगे। वे माहेश्वरयोगको प्राप्त होकर रुद्रलोक जायँगे ॥ ५२–५४॥
द्वादशे परिवर्ते तु शततेजा यदा मुनिः।<br>भविष्यति महातेजा व्यासस्तु कविसत्तमः॥ ५५<br>तदाप्यहं भविष्यामि कलाविह युगान्तिके।<br>हैतुकं वनमासाद्य अत्रिर्नाम्ना परिश्रुतः॥ ५६बारहवें द्वापरयुगके अन्तमें जब मुनि 'शततेजा' नामक महातेजस्वी तथा कविश्रेष्ठ व्यास होंगे, उस समय भी युगान्तमें इस लोकमें कलिमें मैं हैतुकवनमें अवतीर्ण होऊँगा और 'अत्रि' नामसे विख्यात होऊँगा॥ ५५-५६ ॥
तत्रापि मम ते पुत्रा भस्मस्नानानुलेपनाः।<br>भविष्यन्ति महायोगा रुद्रलोकपरायणाः॥ ५७<br>सर्वज्ञः समबुद्धिश्च साध्यः सर्वस्तथैव च।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकं गता हि ते॥ ५८उस समय भी सर्वज्ञ, समबुद्धि, साध्य तथा सर्व नामक मेरे चार पुत्र होंगे, जो रुद्रलोककी प्राप्तिके लिये तत्पर, महान् योगी तथा सदा भस्मसे अनुलिप्त शरीरवाले होंगे। वे भी माहेश्वरयोगको प्राप्त होकर शिवलोकको प्रस्थान करेंगे॥ ५७-५८ ॥
त्रयोदशे पुनः प्राप्ते परिवर्ते क्रमेण तु।<br>धर्मो नारायणो नाम व्यासस्तु भविता यदा॥ ५९<br>तदाप्यहं भविष्यामि बलिर्नाम महामुनिः।<br>बालखिल्य्याश्रमे पुण्ये पर्वते गन्धमादने॥ ६०पुनः क्रमसे तेरहवें द्वापरयुगका अन्त आनेपर जब धर्मरूप 'नारायण' नामक व्यास होंगे, उस समय भी मैं गन्धमादन पर्वतपर पवित्र बालखिल्य आश्रममें महामुनि 'बलि' नामसे अवतरित होऊँगा॥ ५९-६० ॥
तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपोधनाः।<br>सुधामा काश्यपश्चैव वासिष्ठो विरजस्तथा॥ ६१<br>महायोगबलोपेता विमला ऊर्ध्वरेतसः।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकं गता हि ते॥ ६२उस समय भी सुधामा, काश्यप, वासिष्ठ तथा विरजा नामक मेरे चार पुत्र होंगे। वे महान् तपस्वी, महायोगसे सम्पन्न, विशुद्धात्मा एवं नैष्ठिक ब्रह्मचारी होंगे और माहेश्वरयोगको प्राप्त होकर रुद्रलोक जायँगे॥ ६१-६२॥
यदा व्यासस्तरक्षुस्तु पर्याये तु चतुर्दशे।<br>तत्रापि पुनरेवाहं भविष्यामि युगान्तिके॥ ६३<br>वंशे त्वङ्गिरसां श्रेष्ठे गौतमो नाम नामतः।<br>भविष्यति महापुण्यं गौतमं नाम तद्वनम्॥ ६४चौदहवें द्वापरके अन्तमें जब 'तरक्षु' नामक व्यास होंगे, उस समय भी मैं अंगिरामुनिके उत्तम वंशमें गौतम नामसे अवतार ग्रहण करूँगा और वह स्थान परम पवित्र 'गौतमवन' नामसे प्रसिद्ध होगा॥ ६३-६४॥
तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति कलौ तदा।<br>अत्रिर्देवसदश्चैव श्रवणोऽथ श्रविष्ठकः॥ ६५<br>योगात्मानो महात्मानः सर्वे योगसमन्विताः।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय ते गताः॥ ६६उस कलिमें भी अत्रि, देवसद, श्रवण तथा श्रविष्ठक नामक मेरे चार पुत्र होंगे। वे सभी योगात्मा, महान् आत्मावाले और योगयुक्त पुत्र माहेश्वरयोगमें सिद्ध होकर रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ ६५-६६॥
ततः पञ्चदशे प्राप्ते परिवर्ते क्रमागते।<br>त्रैय्यारुणिर्यदा व्यासो द्वापरे समपद्यत॥ ६७<br>तदाप्यहं भविष्यामि नाम्ना वेदशिरा द्विजः।<br>तत्र वेदशिरो नाम अस्त्रं तत्पारमेश्वरम्॥ ६८पुनः क्रमसे पन्द्रहवें द्वापरका अन्त होनेपर जब 'त्रैय्यारुणि' नामक व्यास होंगे, उस समय भी द्विजस्वरूप 'वेदशिरा' नामसे मैं अवतार ग्रहण करूँगा।

११४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भविष्यति महावीर्य वेदशीर्षश्च पर्वतः।<br>हिमवत्पृष्ठमासाद्य सरस्वत्यां नगोत्तमे॥ ६९वहाँ मैं 'वेदशिरा' नामक अति दिव्य पारमेश्वर अस्त्र प्रकट करूँगा और पर्वतोंमें श्रेष्ठ हिमालयके पृष्ठदेशमें सरस्वतीके तटपर वेदशीर्ष नामक पर्वत मेरा आश्रयस्थल होगा॥ ६७–६९॥
तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपोधनाः।<br>कुणिश्च कुणिबाहुश्च कुशीरः कुनेत्रकः॥ ७०<br>योगात्मानो महात्मानः सर्वे ते ह्यूर्ध्वरेतसः।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय ते गताः॥ ७१उस समय भी कुणि, कुणिबाहु, कुशीर तथा कुनेत्रक नामवाले मेरे तपस्वी पुत्र प्रकट होंगे। योगात्मा, महात्मा एवं नैष्ठिक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले वे सभी पुत्र माहेश्वरयोगकी सिद्धि करके शिवलोकको प्राप्त होंगे॥ ७०–७१॥
व्यासो युगे षोडशे तु यदा देवो भविष्यति।<br>तत्र योगप्रदानाय भक्तानां च यतात्मनाम्॥ ७२<br>तदाप्यहं भविष्यामि गोकर्णो नाम नामतः।<br>भविष्यति सुपुण्यं च गोकर्णं नाम तद्वनम्॥ ७३सोलहवें द्वापरके अन्तमें जब देव नामक व्यास होंगे, तब भक्तों तथा संयत आत्मावाले जनोंको योग प्रदान करनेके निमित्त मैं गोकर्ण नामसे अवतार लूँगा और वह स्थान परम पवित्र गोकर्णवनके नामसे प्रसिद्ध होगा॥ ७२–७३॥
तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति च योगिनः।<br>काश्यपो ह्युशनाश्चैव च्यवनोऽथ बृहस्पतिः॥ ७४<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण ध्यानयोगसमन्विताः।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं गन्तारो रुद्रमेव हि॥ ७५उस समय भी काश्यप, उशना, च्यवन तथा बृहस्पति नामक मेरे चार महायोगी पुत्र होंगे। वे भी उसी मार्गसे ध्यानयोगसे युक्त होकर माहेश्वरयोग प्राप्त करके रुद्रलोक जायँगे॥ ७४–७५॥
ततः सप्तदशे चैव परिवर्ते क्रमागते।<br>यदा भविष्यति व्यासो नाम्ना देवकृतञ्जयः॥ ७६<br>तदाप्यहं भविष्यामि गुहावासीति नामतः।<br>हिमवच्छिखरे रम्ये महोत्तुङ्गे महालये॥ ७७<br>सिद्धक्षेत्रं महापुण्यं भविष्यति महालयम्।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा योगज्ञा ब्रह्मवादिनः॥ ७८<br>भविष्यन्ति महात्मानो निर्मला निरहङ्कृताः।<br>उतथ्यो वामदेवश्च महायोगो महाबलः॥ ७९पुनः क्रमसे सत्रहवें द्वापरके अन्तमें जब देवकृतंजय नामक व्यास होंगे, तब भी मैं हिमालयके अति उच्च महालय नामक रमणीक शिखरपर गुहावासी नामसे अवतीर्ण होऊँगा। वह महालयस्थल परम पवित्र तथा सिद्धक्षेत्र माना जायगा। वहाँपर भी उतथ्य, वामदेव, महायोग एवं महाबल नामवाले मेरे चार पुत्र होंगे। वे योगवेत्ता, ब्रह्मवादी, महात्मा, मोहरहित तथा अहंकारशून्य होंगे॥ ७६–७९॥
तेषां शतसहस्रं तु शिष्याणां ध्यानयोगिनाम्।<br>भविष्यन्ति तदा काले सर्वे ते ध्यानयुञ्जकाः॥ ८०<br>योगाभ्यासरताश्चैव हृदि कृत्वा महेश्वरम्।<br>महालये पदं न्यस्तं दृष्ट्वा यान्ति शिवं पदम्॥ ८१कलियुगमें उन पुत्रोंके ध्यानयोग करनेवाले हजारों शिष्य होंगे। ध्यान करनेवाले तथा योगाभ्यासपरायण वे सभी शिष्य महेश्वरको हृदयमें धारण करके महालय-क्षेत्रमें मेरे चरणोंका दर्शन करके शिवपदको प्राप्त होंगे॥ ८०–८१॥
ये चान्येऽपि महात्मानः कलौ तस्मिन् युगान्तिके।<br>ध्याने मनः समाधाय विमलाः शुद्धबुद्धयः॥ ८२<br>मम प्रसादाद्यास्यन्ति रुद्रलोकं गतज्वराः।<br>गत्वा महालयं पुण्यं दृष्ट्वा माहेश्वरं पदम्॥ ८३इनके अतिरिक्त अन्य जो भी महात्मा उस द्वापरके अन्तमें कलिमें अपना मन ध्यानमें लगाकर निर्मल आत्मा तथा शुद्ध बुद्धिवाले हो जायँगे, वे शोकरहित होकर मेरे अनुग्रहसे रुद्रलोकको प्राप्त होंगे। पुण्यप्रद

| अध्याय २४ ] | श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले व्यासोंका वर्णन | १९५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तीर्णस्तारयते जन्तुर्दश पूर्वान् दशोत्तरान्।<br>आत्मानमेकविंशं तु तारयित्वा महालये ॥ ८४<br><br>मम प्रसादाद्यास्यन्ति रुद्रलोकं गतज्वराः।<br>ततोऽष्टादशमे चैव परिवर्ते यदा विभो ॥ ८५महालयक्षेत्रमें जाकर माहेश्वरपदका दर्शन करके प्राणी अपनी दस पूर्वकी तथा दस बादकी और अपनी स्वयं—इस प्रकार इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। इस प्रकार महालयक्षेत्रमें पहुँचकर लोग अपने वंशका उद्धार करके मेरी कृपासे कष्टसे रहित होकर रुद्रलोकको प्राप्त करेंगे॥ ८२-८४ १/२ ॥
तदा ऋतञ्जयो नाम व्यासस्तु भविता मुनिः।<br>तदाप्यहं भविष्यामि शिखण्डी नाम नामतः ॥ ८६<br><br>सिद्धक्षेत्रे महापुण्ये देवदानवपूजिते।<br>हिमवच्छिखरे रम्ये शिखण्डी नाम पर्वतः ॥ ८७<br><br>शिखण्डिनो वनं चापि यत्र सिद्धनिषेवितम्।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपोधनाः ॥ ८८हे विभो! पुनः अठारहवें द्वापरके अन्तमें जब ऋतंजयमुनि नामक व्यास होंगे, तब मैं सिद्धिप्रदायक, पुण्यप्रद तथा देव-दानवोंसे पूजित रमणीक हिमालय-शिखरपर शिखण्डी नामसे अवतार ग्रहण करूँगा और वह शिखर मेरे नामसे शिखण्डी पर्वत तथा वह क्षेत्र शिखण्डीका वन कहा जायगा, जहाँ सिद्ध महात्मा निवास करेंगे॥ ८५-८७ १/२ ॥
वाचश्रवा ऋचीकश्च श्यावाश्वश्च यतीश्वरः।<br>योगात्मानो महात्मानः सर्वे ते वेदपारगाः ॥ ८९<br><br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय संवृताः।<br>अथ एकोनविंशे तु परिवर्ते क्रमागते ॥ ९०वहाँपर भी वाचश्रवा, ऋचीक, श्यावाश्व तथा यतीश्वर नामक मेरे पुत्र होंगे। वे सब परम तपस्वी, योगात्मा, महात्मा तथा वेदोंके पारगामी विद्वान् होंगे, जो माहेश्वर योगमें सिद्ध होकर रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ ८८-८९ १/२ ॥
व्यासस्तु भविता नाम्ना भरद्वाजो महामुनिः।<br>तदाप्यहं भविष्यामि जटामाली च नामतः ॥ ९१<br><br>हिमवच्छिखरे रम्ये जटायुर्यत्र पर्वतः।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति महौजसः ॥ ९२<br><br>हिरण्यनाभः कौशल्यो लोकाक्षी कुथुमिस्तथा।<br>ईश्वरा योगधर्माणः सर्वे ते ह्यूर्ध्वरेतसः ॥ ९३<br><br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय संस्थिताः।<br>ततो विंशतिमश्चैव परिवर्तो यदा तदा ॥ ९४तदनन्तर क्रमसे उन्नीसवें द्वापरके अन्तमें महामुनि भरद्वाज तो व्यास होंगे और उस समय मैं हिमालयके शिखरपर विराजमान रमणीक जटायु पर्वतपर जटामाली नामसे अवतीर्ण होऊँगा। उस समय भी हिरण्यनाभ, कौशल्य, लोकाक्षी तथा कुथुमि नामक मेरे चार पुत्र होंगे। वे महाप्रतापी, ऐश्वर्ययुक्त, योग-ध्यानपरायण और नैष्ठिक ब्रह्मचारी होंगे। वे सब माहेश्वरयोगको प्राप्त होकर रुद्रलोकको प्रस्थान करेंगे॥ ९०-९३ १/२ ॥
गौतमस्तु तदा व्यासो भविष्यति महामुनिः।<br>तदाप्यहं भविष्यामि अट्टहासस्तु नामतः ॥ ९५<br><br>अट्टहासप्रियाश्चैव भविष्यन्ति तदा नराः।<br>तत्रैव हिमवत्पृष्ठे अट्टहासो महागिरिः ॥ ९६<br><br>देवदानवयक्षेन्द्रसिद्धचारणसेवितः ।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति महौजसः ॥ ९७पुनः जब बीसवें द्वापरका अन्त होगा, तब उस समय महामुनि गौतम तो व्यास होंगे और मैं भी उसी समय हिमालय-क्षेत्रमें अट्टहास नामसे अवतरित होऊँगा। तभीसे लोगोंकी अट्टहासके प्रति महान् प्रीति हो जायगी। वह क्षेत्र महागिरि अट्टहासके नामसे विख्यात होगा और देवता, दानव, यक्ष, इन्द्र, सिद्ध-महात्मा तथा चारण वहाँ सदा निवास करेंगे॥ ९४-९६ १/२ ॥
योगात्मानो महात्मानो ध्यायिनो नियतव्रताः।<br>सुमन्तुर्बर्बरी विद्वान् कबन्धः कुशिकन्धरः ॥ ९८वहाँपर सुमन्तु, बर्बरी, विद्वान् कबन्ध तथा कुशिकन्धर—ये मेरे चार पुत्र होंगे। वे महान् ओजस्वी,
११६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय ते गताः।योगात्मा, महात्मा, ध्यानपरायण एवं दृढ़व्रती होंगे, जो माहेश्वरयोगमें सिद्ध होकर रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ ९७-९८१/२॥
एकविंशे पुनः प्राप्ते परिवर्ते क्रमागते॥ ९९<br>वाचश्रवाः स्मृतो व्यासो यदा स ऋषिसत्तमः।<br>तदाप्यहं भविष्यामि दारुको नाम नामतः॥ १००<br>तस्माद्भविष्यते पुण्यं देवदारुवनं शुभम्।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति महौजसः॥ १०१<br>प्लक्षो दार्भायणिश्चैव केतुमान् गौतमस्तथा।<br>योगात्मानो महात्मानो नियता ऊर्ध्वरेतसः॥ १०२<br>नैष्ठिकं व्रतमास्थाय रुद्रलोकाय ते गताः।पुनः क्रमसे इक्कीसवें द्वापरके अन्तमें जब ऋषिप्रवर वाचश्रवा व्यास होंगे, तब मैं भी दारुक नामसे आविर्भूत होऊँगा; इसलिये वह स्थान कल्याणप्रद तथा पुण्यकर होगा और मेरे नामपर वह देवदारुवनके नामसे प्रसिद्ध होगा। वहाँपर भी प्लक्ष, दार्भायणि, केतुमान् तथा गौतम नामवाले मेरे चार पुत्र होंगे; जो महाप्रतापी, योगात्मा, महात्मा, संयत आत्मावाले एवं ब्रह्मचारी होंगे। वे सब निष्ठापूर्वक योगव्रतका पालन करके रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ ९९-१०२१/२॥
द्वाविंशे परिवर्ते तु व्यासः शुष्मायणो यदा॥ १०३<br>तदाप्यहं भविष्यामि वाराणस्यां महामुनिः।<br>नाम्ना वै लाङ्गली भीमो यत्र देवाः सवासवाः॥ १०४<br>द्रक्ष्यन्ति मां कलौ तस्मिन् भवं चैव हलायुधम्।बाईसवें द्वापरके अन्तमें जब शुष्मायण नामक व्यास होंगे, उस समय मैं महामुनि 'भीम' नामसे हल धारण किये काशीमें अवतार ग्रहण करूँगा, जहाँपर उस कलिमें इन्द्रसहित सभी देवतागण अस्त्ररूपमें हल धारण करनेवाले हलायुध मुझ शिवका दर्शन प्राप्त करेंगे॥ १०३-१०४१/२॥
तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति सुधार्मिकाः॥ १०५<br>भल्लवी मधुपिङ्गाक्षश्च श्वेतकेतुः कुशस्तथा।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं तेऽपि ध्यानपरायणाः॥ १०६<br>विमला ब्रह्मभूयिष्ठा रुद्रलोकाय संस्थिताः।वहाँपर भी भल्लवी, मधुपिंग, श्वेतकेतु तथा कुश नामक मेरे चार पुत्र होंगे। अतिशय धर्मनिष्ठ, ध्यानपरायण, विशुद्धात्मा एवं ब्रह्मभावको प्राप्त वे पुत्र भी माहेश्वरयोगमें सिद्ध होकर शिवलोकको प्राप्त होंगे॥ १०५-१०६१/२॥
परिवर्ते त्रयोविंशे तृणबिन्दुर्यदा मुनिः॥ १०७<br>व्यासो हि भविता ब्रह्मांस्तदाहं भविता पुनः।<br>श्वेतो नाम महाकायो मुनिपुत्रस्तु धार्मिकः॥ १०८<br>तत्र कालं जरिष्यामि तदा गिरिवरोत्तमे।<br>तेन कालञ्जरो नाम भविष्यति स पर्वतः॥ १०९<br>तत्रापि मम ते शिष्या भविष्यन्ति तपस्विनः।<br>उशिको बृहदश्वश्च देवलः कविरेव च॥ ११०<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय ते गताः।हे ब्रह्मन्! पुनः तेईसवें द्वापरके अन्तमें जब मुनि तृणबिन्दु नामक व्यास होंगे, उस समय मैं धर्मनिष्ठ तथा महाकाय मुनिपुत्रके रूपमें 'श्वेत' नामसे अवतीर्ण होऊँगा। वहाँ उत्तम पर्वतपर मैं कालको जीर्ण (व्यतीत) करूँगा, अतः वह पर्वत 'कालंजर' नामसे विख्यात होगा। वहाँपर भी उशिक, बृहदश्व, देवल तथा कवि नामक मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे। वे माहेश्वर योगको प्राप्त होकर रुद्रलोक जायेंगे॥ १०७-११०१/२॥
परिवर्ते चतुर्विंशे व्यासो ऋक्षो यदा विभो॥ १११<br>तदाप्यहं भविष्यामि कलौ तस्मिन् युगान्तिके।<br>शूली नाम महायोगी नैमिषे देववन्दिते॥ ११२<br>तत्रापि मम ते शिष्या भविष्यन्ति तपोधनाः।<br>शालिहोत्रोऽग्निवेशश्च युवनाश्वः शरद्वसुः॥ ११३<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण रुद्रलोकाय संस्थिताः।हे विभो! चौबीसवें द्वापरके अन्तमें जब ऋक्षमुनि व्यास होंगे, तब मैं उस युगान्त तथा कलिके प्रारम्भमें देववन्द्य नैमिषारण्यमें महान् योगीके रूपमें 'शूली' नामसे अवतार लूँगा। वहाँ भी शालिहोत्र, अग्निवेश, युवनाश्व एवं शरद्वसु नामक मेरे चार तपोधन शिष्य होंगे। वे भी उसी योगमार्गसे रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ १११-११३१/२॥
पञ्चविंशे पुनः प्राप्ते परिवर्ते क्रमागते॥ ११४

अध्याय २४ ] श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले व्यासोंका वर्णन ११७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वासिष्ठस्तु यदा व्यासः शक्तिर्नाम्ना भविष्यति।<br>तदाप्यहं भविष्यामि दण्डी मुण्डीश्वरः प्रभुः॥ ११५<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपोधनाः।<br>छागलः कुण्डकर्णश्च कुभाण्डश्च प्रवाहकः॥ ११६<br>प्राप्य माहेश्वरं योगममृतत्वाय ते गताः।पुनः क्रमिक रूपसे पचीसवें द्वापरके अन्तमें जब वसिष्ठजीके पुत्र शक्तिमुनि व्यास होंगे, उस समय जगत्प्रभु मैं दण्ड धारण किये हुए मुण्डीश्वर नामसे अवतार ग्रहण करूँगा। उस समय भी छागल, कुण्डकर्ण, कुभाण्ड तथा प्रवाहक नामक मेरे चार तपोव्रती पुत्र होंगे। माहेश्वरयोगमें सिद्ध होकर वे अमरत्वको प्राप्त होंगे॥ ११४-११६ १/२॥
षड्विंशे परिवर्ते तु यदा व्यासः पराशरः॥ ११७<br>तदाप्यहं भविष्यामि सहिष्णुर्नाम नामतः।<br>पुरं भद्रवटं प्राप्य कलौ तस्मिन् युगान्तिके॥ ११८<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति सुधार्मिकाः।<br>उलूको विद्युतश्चैव शम्बूको ह्याश्वलायनः॥ ११९<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय ते गताः।छब्बीसवें द्वापरके अन्तमें जब पराशर नामक व्यास होंगे, उस समय भी उस युगान्तमें मैं कलिके प्रारम्भमें भद्र-वटक्षेत्रमें सहिष्णु नामसे अवतीर्ण होऊँगा। वहाँ भी उलूक, विद्युत, शम्बूक तथा आश्वलायन नामक अत्यन्त धर्मपरायण मेरे चार पुत्र होंगे। वे माहेश्वरयोगको प्राप्त होकर रुद्रलोकको प्रस्थान करेंगे॥ ११७-११९ १/२॥
सप्तविंशे पुनः प्राप्ते परिवर्ते क्रमागते॥ १२०<br>जातूकर्ण्यो यदा व्यासो भविष्यति तपोधनः।<br>तदाप्यहं भविष्यामि सोमशर्मा द्विजोत्तमः॥ १२१<br>प्रभासतीर्थमासाद्य योगात्मा योगविश्रुतः।<br>तत्रापि मम ते शिष्या भविष्यन्ति तपोधनाः॥ १२२<br>अक्षपादः कुमारश्च उलूको वत्स एव च।<br>योगात्मानो महात्मानो विमलाः शुद्धबुद्धयः॥ १२३<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकं ततो गताः।पुनः क्रमिक रूपसे सत्ताईसवें द्वापरके अन्तमें जब तपस्वी जातूकर्ण्य व्यास होंगे, तब मैं योगविश्रुत तथा योगात्मा द्विजश्रेष्ठ सोमशर्माके रूपमें प्रभासक्षेत्रमें अवतरित होऊँगा। वहाँपर भी अक्षपाद, कुमार, उलूक एवं वत्स नामक मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे। योगात्मा, महात्मा, निर्विकारहृदय तथा शुद्ध बुद्धिवाले वे शिष्य माहेश्वरयोग प्राप्त करके अन्तमें रुद्रलोक जायँगे॥ १२०-१२३ १/२॥
अष्टाविंशे पुनः प्राप्ते परिवर्ते क्रमागते॥ १२४<br>पराशरसुतः श्रीमान् विष्णुर्लोकपितामहः।<br>यदा भविष्यति व्यासो नाम्ना द्वैपायनः प्रभुः॥ १२५<br>तदा षष्ठेन चांशेन कृष्णः पुरुषसत्तमः।<br>वसुदेवाद्यदुश्रेष्ठो वासुदेवो भविष्यति॥ १२६<br>तदाप्यहं भविष्यामि योगात्मा योगमायया।<br>लोकविस्मयनार्थाय ब्रह्मचारिशरीरकः॥ १२७<br>श्मशाने मृतमुत्सृष्टं दृष्ट्वा कायमनाथकम्।<br>ब्राह्मणानां हितार्थाय प्रविष्टो योगमायया॥ १२८<br>दिव्यां मेरुगुहां पुण्यां त्वया सार्धं च विष्णुना।<br>भविष्यामि तदा ब्रह्मन् लकुली नाम नामतः॥ १२९<br>कायावतार इत्येवं सिद्धक्षेत्रं च वै तदा।<br>भविष्यति सुविख्यातं यावद्भूमिर्धरिष्यति॥ १३०पुनः क्रमसे अट्ठाईसवें द्वापरके आनेपर जब श्रीमान् लोकपितामह विष्णु अपने छठे अंशसे पराशरपुत्र 'कृष्णद्वैपायन' नामक व्यास होंगे, तब यदुश्रेष्ठ पुरुषोत्तम वासुदेव कृष्ण वसुदेवसे उत्पन्न होंगे। उस समय योगात्मा मैं लोगोंको विस्मित करनेके उद्देश्यसे योगमायासे एक ब्रह्मचारीका शरीर धारणकर प्रकट होऊँगा और योगमायाके प्रभावसे ब्राह्मणोंके कल्याणार्थ श्मशानमें मृत पड़े एक अनाथ ब्राह्मणका शरीर देखकर उसमें प्रवेश करूँगा। दिव्य तथा पुण्य प्रदान करनेवाली मेरुगुहामें आपके एवं विष्णुके साथ मैं निवास करूँगा। हे ब्रह्मन्! उस समय मैं लकुली नामसे विख्यात होऊँगा और मेरा अवतार-स्थल जबतक भूमिकी सत्ता रहेगी, तबतक एक सिद्धक्षेत्रके रूपमें कायावतार—इस नामसे विख्यात रहेगा॥ १२४-१३०॥
११८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपस्विनः।<br>कुशिकश्चैव गर्गश्च मित्रः कौरुष्य एव च ॥ १३१<br>योगात्मानो महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगाः।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं विमला ह्यूर्ध्वरेतसः॥ १३२<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।वहाँपर भी कुशिक, गर्ग, मित्र तथा कौरुष्य नामक मेरे चार तपस्वी, योगात्मा, ब्रह्मज्ञानी और वेदोंके पारगामी विद्वान् पुत्र होंगे। विशुद्ध आत्मावाले तथा नैष्ठिक ब्रह्मचर्यव्रत धारण करनेवाले वे पुत्र माहेश्वरयोगमें सिद्ध होकर पुनरागमनसे मुक्ति दिलानेवाले रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ १३१-१३२ १/२॥
एते पाशुपताः सिद्धा भस्मोद्धूलितविग्रहाः ॥ १३३<br>लिङ्गार्चनरता नित्यं बाह्याभ्यन्तरतः स्थिताः।<br>भक्त्या मयि च योगेन ध्याननिष्ठा जितेन्द्रियाः ॥ १३४ये पाशुपतयोगमें सिद्ध, भस्मसे विभूषित शरीरवाले, नित्य शिवलिङ्गके अर्चनमें तत्पर रहनेवाले, बाहर एवं भीतरसे भक्तिपूर्वक योगके द्वारा मुझमें स्थित रहनेवाले, ध्यानपरायण तथा जितेन्द्रिय होंगे॥ १३३-१३४॥
संसारबन्धच्छेदार्थं ज्ञानमार्गप्रकाशकम्।<br>स्वरूपज्ञानसिद्ध्यर्थं योगं पाशुपतं महत् ॥ १३५ज्ञानमार्गका प्रकाशक यह पाशुपतयोग सांसारिक बन्धनसे मुक्ति प्राप्त करने तथा आत्मज्ञान सिद्ध करनेके लिये एक महान् उपाय है॥ १३५॥
योगमार्गा अनेकाश्च ज्ञानमार्गास्त्वनेकशः।<br>न निवृत्तिमपायान्ति विना पञ्चाक्षरीं क्वचित् ॥ १३६इस जगत्में अनेक योगमार्ग हैं तथा अनेक ज्ञानमार्ग हैं; किंतु पंचाक्षरी विद्या (नमः शिवाय)-के बिना प्राणी सांसारिक बन्धनसे मुक्त नहीं हो सकते॥ १३६॥
यदाचरेत्तपश्चार्यं सर्वद्वन्द्वविवर्जितम्।<br>तदा स मुक्तो मन्तव्यः पक्वं फलमिव स्थितः ॥ १३७जो मनुष्य सभी द्वन्द्वोंसे रहित होकर तप करता है, वह पके फलकी भाँति मुक्तिके लिये उपस्थित रहता है॥ १३७॥
एकाहं यः पुमान् सम्यक् चरेत्पाशुपतव्रतम्।<br>न सांख्ये पञ्चरात्रे वा न प्राप्नोति गतिं कदा ॥ १३८जो पुरुष मात्र एक दिन भलीभाँति पाशुपतव्रत धारण करता है, वह उस गतिको प्राप्त कर लेता है, जो उसे सांख्य तथा पञ्चरात्रसे कभी नहीं मिलती॥ १३८॥
इत्येतद्वै मया प्रोक्तमवतारेषु लक्षणम्।<br>मन्वादिकृष्णपर्यन्तमष्टाविंशद्युगक्रमात् ॥ १३९<br>तत्र श्रुतिसमूहानां विभागो धर्मलक्षणः।<br>भविष्यति तदा कल्पे कृष्णद्वैपायनो यदा ॥ १४०इस प्रकार मैंने युगक्रमसे मनुसे लेकर कृष्णद्वैपायन पर्यन्त अट्ठाईस अवतारोंका वर्णन आपसे कर दिया। उस कल्पमें जब धर्मस्वरूप श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास होंगे, तब वे ही वेदसमूहोंका विभाग करेंगे॥ १३९-१४०॥
सूत उवाच<br>निशम्यैवं महातेजा महादेवेन कीर्तितम्।<br>रुद्रावतारं भगवान् प्रणिपत्य महेश्वरम् ॥ १४१<br>तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः पुनः प्राह च शङ्करम्।सूतजी बोले— इस प्रकार महादेवके द्वारा कही गयी रुद्रावतारकी बातें सुनकर महातेजस्वी भगवान् ब्रह्माने प्रणामपूर्वक प्रिय वाणीसे महेश्वर शिवकी स्तुति की और पुनः उनसे कहा॥ १४१ १/२॥
पितामह उवाच<br>सर्वे विष्णुमया देवाः सर्वे विष्णुमया गणाः ॥ १४२<br>न हि विष्णुसमा काचिद् गतिरन्या विधीयते।<br>इत्येवं सततं वेदा गायन्ति नात्र संशयः ॥ १४३पितामह बोले— सभी देवता तथा सभी गण विष्णुसे ही व्याप्त हैं। विष्णुके समान कोई अन्य गति हो ही नहीं सकती। ऐसा वेद निरन्तर गाते हैं; इसमें कोई संशय नहीं है॥ १४२-१४३॥
स देवदेवो भगवांस्तव लिङ्गार्चने रतः।<br>तव प्रणामपरमः कथं देवो ह्यभूत्प्रभुः ॥ १४४वे देवाधिदेव भगवान् विष्णु आपके लिङ्गार्चनमें

अध्याय २५ ] लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत शरीर एवं मनकी शुद्धिकी प्रक्रिया १११


| सूत उवाच<br>निशम्य वचनं तस्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।<br>प्रपिबन्निव चक्षुर्भ्यां प्रीतस्तत्प्रश्नगौरवात्॥ १४५<br><br>पूजाप्रकरणं तस्मै तमालोक्याह शङ्करः।<br>भवान्नारायणश्चैव शक्रः साक्षात्सुरोत्तमः॥ १४६<br><br>मुनयश्च सदा लिङ्गं सम्पूज्य विधिपूर्वकम्।<br>स्वं स्वं पदं विभो प्राप्तास्तस्मात्सम्पूजयन्ति ते॥ १४७ | निरन्तर रत क्यों रहते हैं तथा जगत्पति होकर भी सदा आपको प्रणाम क्यों करते हैं?॥ १४४॥<br><br>सूतजी बोले—परमेष्ठी ब्रह्माजीका वचन सुनकर हर्षातिरेकसे युक्त नेत्रोंवाले भगवान् शंकर उनके इस महत्त्वपूर्ण प्रश्नसे अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्हें लिङ्ग-पूजा-प्रकरणके विषयमें बताया। भगवान् विष्णु, साक्षात् सुरश्रेष्ठ इन्द्र तथा मुनियोंने विधिविधानसे लिङ्गकी पूजा करके ही अपने-अपने पद प्राप्त किये हैं। हे विभो! इसीलिये वे लिङ्गपूजनमें तत्पर रहते हैं॥ १४५–१४७॥ | | लिङ्गार्चनं विना निष्ठा नास्ति तस्माज्जनार्दनः।<br>आत्मनो यजते नित्यं श्रद्धया भगवान् प्रभुः॥ १४८ | लिङ्गके अर्चनके बिना निष्ठाकी प्राप्ति नहीं हो सकती, इसलिये जगत्पति भगवान् विष्णु श्रद्धापूर्वक मेरे लिङ्गका पूजन करते हैं॥ १४८॥ | | इत्येवमुक्त्वा ब्रह्माणमनुगृह्य महेश्वरः।<br>पुनः सम्प्रेक्ष्य देवेशं तत्रैवान्तरधीयत॥ १४९ | देवेश ब्रह्माजीसे ऐसा कहकर तथा पुनः उनके ऊपर कृपादृष्टि डालकर महेश्वर वहींपर अन्तर्धान हो गये॥ १४९॥ | | तमुद्दिश्य तदा ब्रह्मा नमस्कृत्य कृताञ्जलिः।<br>स्रष्टुं त्वशेषं भगवान् लब्धसंज्ञस्तु शङ्करात्॥ १५० | तत्पश्चात् उन शिवको हाथ जोड़कर प्रणाम करके और उनसे आज्ञा प्राप्त करके वे भगवान् ब्रह्मा सृष्टिकी रचना करनेमें प्रवृत्त हो गये॥ १५०॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे विविधव्यासावतारवर्णनं नाम चतुर्विंशतितमोऽध्यायः॥ २४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणे अन्तर्गत पूर्वभागमें 'विविधव्यासावतारवर्णन' नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २४॥


पचीसवाँ अध्याय

लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत शरीर एवं मनकी शुद्धिके लिये अन्तः एवं बाह्य स्नानकी प्रक्रिया और विविध मन्त्रोंसे आत्माभिषेचन

ऋषय ऊचुः<br>कथं पूज्यो महादेवो लिङ्गमूर्तिर्महेश्वरः।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं रोमहर्षण साम्प्रतम्॥ १ऋषिगण बोले—हे सूतजी! लिङ्गस्वरूप महेश्वर महादेवकी पूजा किस प्रकार की जानी चाहिये? अब आप हमलोगोंको यह बतानेकी कृपा करें॥ १॥
सूत उवाच<br>देव्या पृष्टो महादेवः कैलासे तां नगात्मजाम्।<br>अङ्कस्थाम्राह देवेशो लिङ्गार्चनविधिं क्रमात्॥ २सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] इसी विषयमें कैलास पर्वतपर देवी पार्वतीके द्वारा पूछे जानेपर देवाधिदेव महादेवने अपने अंकमें विराजमान गिरिराजकिशोरी पार्वतीसे लिङ्गार्चन विधिका क्रमसे वर्णन किया था॥ २॥
तदा पार्श्वे स्थितो नन्दी शालङ्कायनकात्मजः।<br>श्रुत्वाखिलं पुरा प्राह ब्रह्मपुत्राय सुव्रताः॥ ३हे सुव्रतो! उस समय समीपमें ही स्थित शालंकायनके पुत्र नन्दीने उस विधिका श्रवण करके पहले ब्रह्मापुत्र

१२० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सनत्कुमाराय शुभं लिङ्गार्चनविधिं परम्।<br>तस्माद् व्यासो महातेजाः श्रुतवाञ्छ्रुतिसम्मितम्॥ ४सनत्कुमारको वह परम पवित्र लिङ्गार्चनविधि बतायी और उनसे महातेजस्वी व्यासजीने वह श्रुतिप्रतिपादित विधि सुनी॥ ३-४॥
स्नानयोगोपचारं च यथा शैलादिनो मुखात्।<br>श्रुतवान् तत्प्रवक्ष्यामि स्नानाद्यं चार्चनाविधिम्॥ ५शैलादि (नन्दी)-के मुखसे स्नान तथा लिङ्ग-पूजानुष्ठानकी जो विधि कही गयी है एवं जो मैंने भी सुनी है, उस स्नान तथा अर्चनविधिका आपलोगोंसे वर्णन करूँगा॥ ५॥
शैलादिरुवाच<br>अथ स्नानविधिं वक्ष्ये ब्राह्मणानां हिताय च।<br>सर्वपापहरं साक्षाच्छिवेन कथितं पुरा॥ ६**शैलादि (नन्दिकेश्वर) बोले—**ब्राह्मणोंके कल्याणके निमित्त अब मैं स्नान-विधिके विषयमें कहूँगा। यह [विधिपूर्वक किया गया स्नान] सभी पापोंको दूर करनेवाला है। पूर्वकालमें स्वयं भगवान् शंकरने इसके महत्त्वका वर्णन किया है॥ ६॥
अनेन विधिना स्नात्वा सकृत्पूज्य च शङ्करम्।<br>ब्रह्मकूर्चं च पीत्वा तु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ७इस विधिसे स्नान करनेके बाद भक्तिपूर्वक एक बार शंकरजीकी पूजा करके विधिपूर्वक निर्मित ब्रह्मकूर्च (पंचगव्य)-का पानकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ७॥
त्रिविधं स्नानमाख्यातं देवदेवेन शम्भुना।<br>हिताय ब्राह्मणाद्यानां चतुर्मुखसुतोत्तम॥ ८हे ब्रह्माजीके उत्तम पुत्र! ब्राह्मण आदिके हितके लिये देवाधिदेव शंकरने तीन प्रकारके स्नानोंका वर्णन किया है॥ ८॥
वारुणं पुरतः कृत्वा ततश्चाग्नेयमुत्तमम्।<br>मन्त्रस्नानं ततः कृत्वा पूजयेत्परमेश्वरम्॥ ९सर्वप्रथम जलस्नान करनेके बाद श्रेष्ठ अग्निस्नान (भस्मस्नान)-और फिर मार्जनरूप मन्त्रस्नान करके परमेश्वरकी पूजा करनी चाहिये॥ ९॥
भावदुष्टोऽम्भसि स्नात्वा भस्मना च न शुध्यति।<br>भावशुद्धश्चरेच्छौचमन्यथा न समाचरेत्॥ १०भावदुष्ट अर्थात् श्रद्धारहित प्राणी जलमें स्नान करके तथा भस्म लगा लेनेसे शुद्ध नहीं हो जाता है। भावनासे शुद्ध होकर ही मनुष्यको शुद्धि करनी चाहिये, अन्यथा नहीं॥ १०॥
सरित्सरस्तडागेषु सर्वेष्वाप्रलयं नरः।<br>स्नात्वापि भावदुष्टश्चेन्न शुध्यति न संशयः॥ ११प्रलयपर्यन्त सभी नदियों, सरोवरों तथा तड़ागोंमें स्नान करके भी भावनासे दूषित मनवाला व्यक्ति शुद्ध नहीं हो सकता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ११॥
नृणां हि चित्तकमलं प्रबुद्धमभवद्यदा।<br>प्रसुप्तं तमसा ज्ञानभानोर्भासा तदा शुचिः॥ १२तमोगुणके प्रभावसे मनुष्यका प्रसुप्त चित्तकमल जब ज्ञानरूपी सूर्यके प्रकाशसे चेतनायुक्त हो जाता है, तभी शुद्धि हो पाती है॥ १२॥
मृच्छकृत्तिलपुष्पं च स्नानार्थं भसितं तथा।<br>आदाय तीरे निःक्षिप्य स्नानतीर्थे कुशानि च॥ १३<br><br>प्रक्षाल्याचम्य पादौ च मलं देहाद्विशोध्य च।<br>द्रव्यैस्तु तीरदेशस्थैस्ततः स्नानं समाचरेत्॥ १४मिट्टी, गोमय, तिल, पुष्प तथा भस्म आदि लेकर स्नानके लिये स्नानतीर्थ जाकर वहाँ तटपर कुश बिछा लेना चाहिये। तदनन्तर दोनों पैर धोकर पुनः आचमन

अध्याय २५ ] लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत शरीर एवं मनकी शुद्धिकी प्रक्रिया [ १२१


श्लोक (संस्कृत)अर्थ (हिन्दी)
करके तीर्थदेशमें स्थित द्रव्योंसे शरीरके मलका शोधन करनेके उपरान्त स्नान करना चाहिये॥ १३-१४॥
उद्धृतासीति मन्त्रेण पुनर्देहं विशोधयेत्।<br>मृदादाय ततश्चान्यद्वस्त्रं स्नात्वा ह्यनुल्बणम्॥ १५तत्पश्चात् 'उद्धृतासि वराहेण'^१ यह मन्त्र पढ़कर मिट्टी लेकर उससे शरीरकी शुद्धि करनी चाहिये। इसके अनन्तर स्नान करके दूसरा पवित्र वस्त्र धारण करना चाहिये॥ १५॥
गन्धद्वारां दुराधर्षामिति मन्त्रेण मन्त्रवित्।<br>कपिलागोमयेनैव खस्थेनैव तु लेपयेत्॥ १६<br><br>पुनः स्नात्वा परित्यज्य तद्वस्त्रं मलिनं ततः।<br>शुक्लवस्त्रपरीधानो भूत्वा स्नानं समाचरेत्॥ १७पुनः मन्त्रवित् पुरुषको चाहिये कि वह 'गन्धद्वारां दुराधर्षाम्'^२ इस मन्त्रको पढ़कर कपिला गायके भूस्पर्शरहित गोमयका शरीरपर लेपन करे। इसके बाद स्नान करके उस मलिन वस्त्रको छोड़कर पुनः श्वेत वस्त्र धारण करके स्नान करना चाहिये॥ १६-१७॥
सर्वपापविशुद्ध्यर्थमावाह्य वरुणं तथा।<br>सम्पूज्य मनसा देवं ध्यानयज्ञेन वै भवम्॥ १८<br><br>आचम्य त्रिस्तदा तीर्थे ह्यवगाह्य भवं स्मरन्।<br>पुनराचम्य विधिवदभिमन्त्र्य महाजलम्॥ १९<br><br>अवगाह्य पुनस्तस्मिन् जपेद्वै चाघमर्षणम्।<br>तत्तोये भानुसोमाग्निमण्डलं च स्मरेदृशी॥ २०समस्त पापोंसे विमुक्तिके लिये वरुणदेवका आवाहन करके तथा मानसिक उपचारोंसे भगवान् शंकरकी विधिवत् पूजा करके तीन बार आचमनकर जलको अभिमन्त्रित करके शिवका स्मरण करते हुए तीर्थजलमें प्रवेश करे। इसके बाद गोता लगाकर 'ऋतञ्च सत्यञ्च'^३ इस अघमर्षण मन्त्रका जप करते हुए उस जलमें सूर्य, चन्द्र तथा अग्नि—इन तीनोंके मण्डलोंका उस संयमी व्यक्तिको ध्यान करना चाहिये॥ १८-२०॥
आचम्य च पुनस्तस्माजलादुत्तीर्य मन्त्रवित्।<br>प्रविश्य तीर्थमध्ये तु पुनः पुण्यविवृद्धये॥ २१फिर आचमन करके उस जलसे निकलकर पुण्यकी वृद्धिहेतु उस मन्त्रवित्को पुनः जलमध्यमें प्रवेश करना चाहिये॥ २१॥
शृङ्गेण पर्णपुटकैः पालाशैः क्षालितैस्तथा।<br>सकुशेन सपुष्पेण जलेनैवाभिषेचयेत्॥ २२<br><br>रुद्रेण पवमानेन त्वरिताख्येन मन्त्रवित्।<br>तरत्समन्दीवर्गाद्यैस्तथा शान्तिद्वयेन च॥ २३<br><br>शान्तिधर्मेण चैकेन पञ्चब्रह्मपवित्रकैः।<br>तत्तन्मन्त्राधिदेवानां स्वरूपं च ऋषीन् स्मरन्॥ २४मन्त्रवेत्ता गोशृंगके द्वारा अथवा प्रक्षालित पलाश-पत्ररचित पुटकद्वारा अथवा कुशा और पुष्प आदिद्वारा गृहीत जलसे रुद्र-सूक्त (शु०यजुर्वेद अ० १९ के नमस्ते रुद्र० इत्यादि ६६ मन्त्र), पवमानसूक्त (ऋग्वेदकी पावमानी ऋचाएँ), यो रुद्र० इत्यादि त्वरितसंज्ञक मन्त्र, तरत्समन्दी इत्यादि आद्याक्षरवाले मन्त्रों (ऋग्वेद ९।५८), शं नो मित्र० आदि दो मन्त्रों (यजु० ३६।९-१०), शान्तिधर्मक शं नो देवी० (शु०यजु० ३६।१२) एक मन्त्र, पञ्चब्रह्मपवित्रक सद्योजातादि मन्त्र-पंचकका^४ पाठ करते

१. उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना। मृत्तिके त्वां च गृह्णामि प्रजया च धनेन च॥
२. गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्। ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप ह्वये श्रियम्॥
३. ॐ ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत। ततः समुद्रो अर्णवः। समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत। अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी। सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्। दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः। (ऋग्वेद १०।१९०।१)
४. (क) सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः। भवे भवे नातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः॥ (ख) वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय

२६- भगवती गायत्रीका आवाहन तथा जप, सूर्यकी प्रार्थना, सूर्यसूक्तोंका पाठ, देव-ऋषि-पितृतर्पण, पंचमहा-यज्ञोंका अनुष्ठान, भस्मस्नान एवं मन्त्रस्नान

१२२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| एवं हि चाभिषिच्याथ स्वमूर्ध्नि पयसा द्विजाः।<br>ध्यायेच्च त्र्यम्बकं देवं हृदि पञ्चास्यमीश्वरम्॥ २५<br><br>आचम्याचमनं कुर्यात्स्वसूत्रोक्तं समीक्ष्य च।<br>पवित्रहस्तः स्वासीनः शुचौ देशे यथाविधि॥ २६<br><br>अभ्युक्ष्य सकुशं चापि दक्षिणेन करेण तु।<br>पिबेत्प्रक्षिप्य त्रिस्तोयं चक्री भूत्वा ह्यातन्द्रितः॥ २७<br><br>प्रदक्षिणं ततः कुर्याद्विंसापापप्रशान्तये।<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तं स्नानाचमनमुत्तमम्॥ २८<br><br>सर्वेषां ब्राह्मणानां तु हितार्थे द्विजसत्तमाः॥ २९। | हुए इन मन्त्रोंके अधिदेवताओंके स्वरूप एवं ऋषियोंका स्मरण करते हुए आत्माभिषेचन करे॥ २२–२४॥<br><br>हे द्विजो! इस प्रकार जलसे अपने मस्तकपर अभिषेक करके त्रिनेत्र तथा पंचमुख परमेश्वर महादेवका हृदयमें ध्यान करना चाहिये और अपने गृह्यसूत्रकी रीतिके अनुसार आचमन करना चाहिये। तदनन्तर पवित्र स्थानमें सुन्दर आसनपर बैठकर हाथमें पवित्रक लेकर उस कुशके द्वारा दाहिने हाथसे अपने ऊपर जल छिड़के। पुनः जल लेकर तीन बार आचमन करके सभी हिंसा तथा पापोंके शमनके लिये आलस्यरहित होकर अपने स्थानपर घूमते हुए प्रदक्षिणा करनी चाहिये। हे श्रेष्ठ द्विजो! इस प्रकार मैंने सभी ब्राह्मणोंके कल्याणके लिये संक्षेपमें स्नान तथा आचमनके अत्युत्तम विधानका वर्णन कर दिया॥ २५–२९॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे स्नानविधिर्नाम पञ्चविंशोऽध्यायः॥ २५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'स्नानविधि' नामक पचीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २५॥


छब्बीसवाँ अध्याय

भगवती गायत्रीका आवाहन तथा जप, सूर्यकी प्रार्थना, सूर्यसूक्तोंका पाठ, देव-ऋषि-पितृतर्पण, पंचमहायज्ञोंका अनुष्ठान, भस्मस्नान एवं मन्त्रस्नान

| नन्द्युवाच<br>आवाहयेत्ततो देवीं गायत्रीं वेदमातरम्।<br>आयातु वरदा देवीत्यनेनैव महेश्वरीम्॥ १<br><br>पाद्यमाचमनीयं च तस्याश्चार्घ्यं प्रदापयेत्।<br>प्राणायामत्रयं कृत्वा समासीनः स्थितोऽपि वा॥ २<br><br>सहस्रं वा तदर्थं वा शतमष्टोत्तरं तु वा।<br>गायत्रीं प्रणवेनैव त्रिविधेष्वेक्रमाचरेत्॥ ३<br><br>अर्घ्यं दत्त्वा समभ्यर्च्य प्रणम्य शिरसा स्वयम्।<br>उत्तमे शिखरे देवीत्युक्त्वोद्वास्य च मातरम्॥ ४ | नन्दिकेश्वर बोले—[हे सनत्कुमार!] इस विधिसे स्नान करनेके पश्चात् 'आयातु वरदा देवी' इस मन्त्रसे महेश्वरी वेदमाता गायत्रीका आवाहन करना चाहिये और पुनः पाद्य, आचमन, अर्घ्य आदि अर्पित करना चाहिये। पुनः तीन बार प्राणायाम करके बैठे-बैठे अथवा खड़े होकर एक हजार अथवा पाँच सौ अथवा एक सौ आठ बार गायत्रीजप प्रणवके साथ नियमपूर्वक करना चाहिये। इन तीनोंमें किसी एक विधिसे ही जप करना चाहिये॥ १–३॥<br><br>सूर्यको अर्घ्य देकर उनका पूजनकर सिर झुकाकर |


नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः॥ (ग) अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥ (घ) तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ (ङ) ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम्॥