श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| वरुण नामक दो दिव्य मुनिश्रेष्ठ उनके (मेरे पिताके) आश्रममें गये॥ ७-८॥ | |
| ऊचतुश्च महात्मानौ मां निरीक्ष्य मुहुर्मुहुः।<br>तात नन्द्ययमल्पायुः सर्वशास्त्रार्थपारगः॥ ९ | मुझको बार-बार देखकर उन दोनों महात्माओंने कहा—हे तात! यह नन्दी सभी शास्त्रोंके ज्ञानमें पारंगत होगा, किंतु यह अल्प आयुवाला है। ऐसा आश्चर्य तो कभी नहीं देखा गया है, इसकी आयु आजसे मात्र एक वर्षकी है॥ ९ १/२॥ |
| न दृष्टमेवमाश्चर्यमायुर्वर्षादतः परम्।<br>इत्युक्तवति विप्रेन्द्रः शिलादः पुत्रवत्सलः॥ १०<br><br>समालिङ्ग्य च दुःखार्तो रुरोदातीव विस्वरम्।<br>हा पुत्र पुत्र पुत्रेति पपात च समन्ततः॥ ११<br><br>अहो बलं दैवविधेर्विधातुश्चेति दुःखितः। | उनके ऐसा कहनेपर पुत्रसे स्नेह रखनेवाले विप्रवर शिलाद मेरा आलिंगन करके दुःखसे व्याकुल होकर करुण स्वरमें अत्यधिक रुदन करने लगे—हा पुत्र! हा पुत्र! हा पुत्र! अहो, दैवविधि तथा विधाताका ऐसा बल! [यह कहकर] वे दुःखित होकर भूमिपर गिर पड़े॥ १०-११ १/२॥ |
| तस्य चार्तस्वरं श्रुत्वा तदाश्रमनिवासिनः॥ १२<br><br>निपेतुर्विह्वलात्यर्थं रक्षाश्चक्रुश्च मङ्गलम्।<br>तुष्टुवुश्च महादेवं त्रियम्बकमुमापतिम्॥ १३<br><br>हुत्वा त्रियम्बकेनैव मधुनाव च सम्प्लुताम्।<br>दूर्वामयुतसंख्यातां सर्वद्रव्यसमन्विताम्॥ १४ | तब उनकी दुःखभरी वाणी सुनकर आश्रमवासी इकट्ठे हो गये। वे [इस अशुभके लिये] विह्वल होकर मंगल रक्षाकृत्य करने लगे। उन्होंने अन्य सभी सामग्रियोंसहित मधुलिप्त दस हजार दूर्वाकी त्रियम्बक मन्त्रसे आहुति देकर उमापति त्रियम्बक महादेवको सन्तुष्ट किया॥ १२—१४॥ |
| पिता विगतसंज्ञश्च तथा चैव पितामहः।<br>विचेष्टश्च ललापासौ मृतवन्निपपात च॥ १५ | पिताजी संज्ञाशून्य हो गये। पितामहने भी बहुत विलाप किया, वे भी चेतनारहित हो मृतकी भाँति पड़े रहे॥ १५॥ |
| मृत्योर्भीतोऽहमचिराच्छिरसा चाभिवन्द्य तम्।<br>मृतवत्पतितं साक्षात्पितरं च पितामहम्॥ १६<br><br>प्रदक्षिणीकृत्य च तं रुद्रजाप्यरतोऽभवम्।<br>हृत्पुण्डरीके सुषिरे ध्यात्वा देवं त्रियम्बकम्॥ १७<br><br>त्र्यक्षं दशभुजं शान्तं पञ्चवक्त्रं सदाशिवम्।<br>सरितश्चान्तरे पुण्ये स्थितं मां परमेश्वरः॥ १८ | मैं मृत्युसे भयभीत हो गया और साक्षात् मृतककी भाँति [भूमिपर पड़े हुए] अपने पिता तथा पितामहको शीघ्रतापूर्वक सिर झुकाकर प्रणाम करके एवं उनकी प्रदक्षिणा करके रुद्रजपमें संलग्न हो गया। त्रिनेत्र, दस भुजाओंवाले, शान्त, पाँच मुखोंवाले, सदाशिव भगवान् त्रियम्बकका अपने हृदयकमलमें ध्यान करके मैं जप कर रहा था; [तब मैंने देखा कि] नदीके पुण्यतटपर मैं स्थित हूँ और अर्धचन्द्रमाको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले महादेव उमासहित प्रसन्न होकर [प्रकट हुए और] मुझसे कहने लगे—॥ १६—१८ १/२॥ |
| तुष्टोऽब्रवीन्महादेवः सोमः सोमार्धभूषणः।<br>वत्स नन्दिन् महाबाहो मृत्योर्भीतिः कुतस्तव॥ १९<br><br>मयैव प्रेषितौ विप्रौ मत्समस्त्वं न संशयः।<br>वत्सैतत्तव देहं च लौकिकं परमार्थतः॥ २० | हे वत्स! हे नन्दिन्! हे महाबाहो! तुमको भला मृत्युसे भय कहाँ, मैंने ही उन दोनों विप्रोंको भेजा |
अध्याय ४३ ] शिलादद्वारा पुत्र नन्दिकेश्वरको वेदादिकी शिक्षा प्रदान करना [ १९५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नास्त्येव दैविकं दृष्टं शिलादेन पुरा तव।<br>देवैश्च मुनिभिः सिद्धैर्गन्धर्वैर्दानवोत्तमैः॥ २१<br>पूजितं यत्पुरा वत्स दैविकं नन्दिकेश्वर।<br>संसारस्य स्वभावोऽयं सुखं दुःखं पुनः पुनः॥ २२<br>नृणां योनिपरित्यागः सर्वथैव विवेकिनः। | था, तुम मेरे ही समान हो, इसमें सन्देह नहीं है। हे वत्स! वास्तवमें तुम्हारा यह देह लौकिक नहीं है, यह दिव्य है। हे वत्स! पूर्वमें शिलाद, देवताओं, मुनियों, सिद्धों, गन्धर्वों तथा श्रेष्ठ दानवोंने तुम्हारे जिस शरीरका दर्शन किया था और जिसका पूजन किया था, वह दिव्य था। हे नन्दिकेश्वर! संसारका यह स्वभाव है कि सुख-दुःख बार-बार आते रहते हैं। मनुष्योंके लिये स्त्रीभोगका परित्याग ही सर्वथा उचित है—ऐसा विवेकी पुरुष कहते हैं॥ १९—२२ १/२॥ |
| एवमुक्त्वा तु मां साक्षात्सर्वदेवमहेश्वरः॥ २३<br>कराभ्यां सुशुभाभ्यां च उभाभ्यां परमेश्वरः।<br>पस्पर्श भगवान् रुद्रः परमार्तिहरो हरः॥ २४<br>उवाच च महादेवस्तुष्टात्मा वृषभध्वजः।<br>निरीक्ष्य गणपांश्चैव देवीं हिमवतः सुताम्॥ २५ | मुझसे ऐसा कहकर महान् कष्टोंको दूर करनेवाले, सभी देवताओंके महेश्वर, भगवान् रुद्र, हर, वृषभध्वज तथा परमेश्वर महादेवने अपने दोनों अत्यन्त शुभ हाथोंसे मुझे स्पर्श किया और उनका मन प्रसन्न हो गया। तदनन्तर गणेश्वरोंको एवं हिमालयपुत्री पार्वतीको भलीभाँति देखकर वे सुरेश्वर महादेव प्रसन्नचित्त होकर मेरी ओर देखकर कहने लगे—॥ २३—२५ १/२॥ |
| समालोक्य च तुष्टात्मा महादेवः सुरेश्वरः।<br>अजरो जरया त्यक्तो नित्यं दुःखविवर्जितः॥ २६<br>अक्षयश्चाव्ययश्चैव सपिता ससुहृज्जनः।<br>ममेष्टो गणपश्चैव मद्वीर्यो मत्पराक्रमः॥ २७<br>इष्टो मम सदा चैव मम पार्श्वगतः सदा।<br>मद्बलश्चैव भविता महायोगबलान्वितः॥ २८ | तुम अपने पिता तथा सुहृज्जनोंसहित अजर-अमर, बुढ़ापारहित, दुःखसे हीन, क्षयरहित एवं अव्यय रहोगे। तुम मेरे प्रिय गणेश्वर होओ, तुम मेरे समान तेज तथा पराक्रमवाले होओ। तुम सदा मेरे इष्ट बनकर सदा मेरे समीप विराजमान रहोगे। तुम मेरे सदृश बलशाली एवं महान् योगबलसे सम्पन्न होओगे॥ २६—२८॥ |
| एवमुक्त्वा च मां देवो भगवान् सगणस्तदा।<br>कुशेशयमयीं मालां समुन्मुच्यात्मनस्तदा॥ २९<br>आबबन्ध महातेजा मम देवो वृषध्वजः।<br>तयाहं मालया जातः शुभया कण्ठसक्तया॥ ३० | मुझसे ऐसा कहकर गणोंसहित महातेजस्वी वृषभध्वज भगवान् महादेवने कुशेशयमयी अर्थात् शतदलकमलसे निर्मित अपनी माला उतारकर मेरे कण्ठमें बाँध दी। कण्ठमें बँधी हुई उस सुन्दर मालासे मैं तीन नेत्रोंवाले तथा दस भुजाओंवाले दूसरे शंकरके समान हो गया॥ २९—३० १/२॥ |
| त्र्यक्षो दशभुजश्चैव द्वितीय इव शङ्करः।<br>तत एव समादाय हस्तेन परमेश्वरः॥ ३१<br>उवाच ब्रूहि किं तेऽद्य ददामि वरमुत्तमम्।<br>ततो जटाश्रितं वारि गृहीत्वा चातिनिर्मलम्॥ ३२ | तत्पश्चात् परमेश्वरने मुझको हाथसे पकड़कर कहा—बोलो, मैं तुम्हें कौन-सा उत्तम वर प्रदान करूँ? तब उन वृषभध्वजने अपनी जटामें समाहित अति निर्मल |
| १९६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| उक्त्वा नदी भवस्वेति उत्ससर्ज वृषध्वजः।<br>ततः सा दिव्यतोया च पूर्णासितजला शुभा॥ ३३<br><br>पद्मोत्पलवनोपेता प्रावर्तत महानदी। | जलको [हाथमें] लेकर कहा—नदी हो जाओ—ऐसा कहकर उन्होंने जलको छोड़ दिया। तब दिव्य जलवाली, श्याम जलसे परिपूर्ण, कमल तथा उत्पलके वनोंसे युक्त शुभ महानदी बन गयी॥ ३१—३३१/२ ॥ | | तामाह च महादेवे नदीं परमशोभनाम्॥ ३४<br><br>यस्माज्जटोदकादेव प्रवृत्ता त्वं महानदी।<br>तस्माज्जतोदका पुण्या भविष्यसि सरिद्वरा॥ ३५<br><br>त्वयि स्नात्वा नरः कश्चित्सर्वपापैः प्रमुच्यते। | तदनन्तर महादेवने उस परम सुन्दर नदीसे कहा—चूँकि तुम जटाके जलसे महानदीके रूपमें निकली हो, अतः तुम्हारा नाम जटोदका होगा। तुम पवित्र तथा नदियोंमें श्रेष्ठ होओगी। कोई भी मनुष्य तुम्हारे जलमें स्नान करके सभी पापोंसे मुक्त हो जायगा॥ ३४-३५१/२ ॥ | | ततो देव्या महादेवः शिलादतनयं प्रभुः॥ ३६<br><br>पुत्रस्तेऽयमिति प्रोच्य पादयोः संन्यपातयत्।<br>सा मामाघ्राय शिरसि पाणिभ्यां परिमार्जती॥ ३७<br><br>पुत्रप्रेम्णाभ्यषिञ्चच्च स्रोतोभिस्तनयैस्त्रिभिः।<br>पयसा शङ्खगौरेण देवदेवं निरीक्ष्य सा॥ ३८<br><br>तानि स्रोतांसि त्रीण्यस्याः स्रोतस्विन्योऽभवंस्तदा।<br>नदीं त्रिस्रोतसं देवो भगवानवदद्भवः॥ ३९ | तत्पश्चात् प्रभु महादेवने 'यह तुम्हारा पुत्र है'—ऐसा कहकर मुझ शिलादतनयको देवी पार्वतीके चरणोंमें डाल दिया। तब उन्होंने मेरा सिर सूंघकर दोनों हाथोंसे मुझे [स्नेहपूर्वक] सहलाते हुए पुनः देवदेव शंकरकी ओर देखकर पुत्रप्रेममें तीन पुत्ररूप स्रोतोंके द्वारा शंखके समान श्वेतवर्णवाले जलरूप अश्रुबिन्दुओंसे मुझे अभिसींचित कर दिया। इनके वे ही तीनों स्रोत तीन नदियाँ बन गयीं। भगवान् भव महादेवने इसे त्रिस्रोतस् (तीन धाराओंवाली) नदीकी संज्ञा प्रदान की॥ ३६—३९॥ | | त्रिस्रोतसं नदीं दृष्ट्वा वृषः परमहर्षितः।<br>ननाद नादात्तस्माच्च सरिदन्या ततोऽभवत्॥ ४०<br><br>वृषध्वनिरिति ख्याता देवदेवेन सा नदी। | उस त्रिस्रोतस् नदीको देखकर वृषने अत्यन्त प्रसन्न होकर नाद किया, तब उस ध्वनिसे एक दूसरी नदी आविर्भूत हो गयी। देवदेव शंकरने उस नदीका नाम वृषध्वनि रखा॥ ४०१/२ ॥ | | जाम्बूनदमयं चित्रं सर्वरत्नमयं शुभम्॥ ४१<br><br>स्वं देवश्चाद्भुतं दिव्यं निर्मितं विश्वकर्मणा।<br>मुकुटं चाबबन्धेशो मम मूर्ध्नि वृषध्वजः॥ ४२<br><br>कुण्डले च शुभे दिव्ये वज्रवैडूर्यभूषिते।<br>आबबन्ध महादेवः स्वयमेव महेश्वरः॥ ४३ | इसके बाद भगवान् वृषध्वजने विश्वकर्माके द्वारा निर्मित, स्वर्णमय, सभी रत्नोंसे जटिल, अलौकिक, शुभ, अद्भुत तथा दिव्य अपने मुकुटको मेरे सिरपर बाँध दिया। उन महेश्वर महादेवने हीरे तथा वैडूर्यमणिसे मण्डित दो शुभ तथा दिव्य कुण्डल [मेरे कानोंमें] स्वयं पहना दिये॥ ४१—४३॥ | | मां तथाभ्यर्चितं व्योम्नि दृष्ट्वा मेघैः प्रभाकरः।<br>मेघाम्भसा चाभ्यषिञ्चच्छिलादनमथो मुने॥ ४४<br><br>तस्याभिषिक्तस्य तदा प्रवृत्ता स्रोतसा भृशम्।<br>यस्मात्सुवर्णान्निःसृत्य नद्येषा सम्प्रवर्तते॥ ४५<br><br>स्वर्णोदकेति तामाह देवदेवस्त्रियम्बकः।<br>जाम्बूनदमयाद्यस्माद् द्वितीया मुकुटाच्छुभा॥ ४६ | हे मुने! मुझको इस प्रकार पूजित देखकर सूर्यने आकाशमें मेघोंके जलसे मुझ नन्दीका अभिसेचन किया। तब उस अभिषेकके जलसे सोनेकी नदी बन गयी। उस स्वर्णजलसे निकलकर यह नदी बनी, इसलिये देवोंके देव त्रियम्बक शिवने उसे स्वर्णोदका (स्वर्ण जलवाली) कहा। उसी प्रकार सोनेके मुकुटसे |
४४- भगवान् शिवद्वारा नन्दिकेश्वरको गणोंके अधिपतिके रूपमें प्रतिष्ठित करना एवं सभी देवोंके द्वारा नन्दि-केश्वरका अभिषेक तथा शिवनाममन्त्रकी महिमा
| अध्याय ४४ ] | भगवान् शिवद्वारा नन्दिकेश्वरको गणोंके अधिपतिके रूपमें प्रतिष्ठित करना | १९७ |
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| प्रावर्तत नदी पुण्या ऊचुर्जाम्बूनदीति ताम्।<br>एतत्पञ्चनदं नाम जप्येश्वरसमीपगम्॥ ४७<br><br>यः पञ्चनदमासाद्य स्नात्वा जप्येश्वरेश्वरम्।<br>पूजयेच्छिवसायुज्यं प्रयात्येव न संशयः॥ ४८ | दूसरी पवित्र तथा शुभ नदी उत्पन्न हुई, अतः उसे जाम्बूनदी कहा जाता है। इस प्रकार ये पाँच नदियाँ भगवान् जप्येश्वरके समीप जानेवाली हैं। जो पंचनदपर पहुँचकर इसमें स्नान करके भगवान् जप्येश्वरेश्वरकी पूजा करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४७-४८॥ |
| अथ देवो महादेवः सर्वभूतपतिर्भवः।<br>देवीमुवाच शर्वाणीमुमां गिरिसुतामजाम्॥ ४९<br><br>देवि नन्दीश्वरं देवमभिषिञ्चामि भूतपम्।<br>गणेन्द्रं व्याहरिष्यामि किं वा त्वं मन्यसेऽव्यये॥ ५० | इसके बाद सभी भूतोंके स्वामी भगवान् महादेवने हिमालयपुत्री, अजन्मा, शर्वाणी, उमा देवीसे कहा—हे देवि! मैं भूतोंके स्वामी देव नन्दीश्वरका अभिषेचन करता हूँ और उन्हें गणेन्द्र नामवाला कहूँगा, हे अव्यये! [इस विषयमें] तुम क्या सोचती हो?॥ ४९-५०॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भवानी हर्षितानना।<br>स्मयन्ती वरदं प्राह भवं भूतपतिं पतिम्॥ ५१<br><br>सर्वलोकाधिपत्यं च गणेशत्वं तथैव च।<br>दातुमर्हसि देवेश शैलादिस्तनयो मम॥ ५२ | उनका यह वचन सुनकर हर्षयुक्त मुखवाली भवानीने वर प्रदान करनेवाले तथा भूतोंके स्वामी अपने पति शिवसे मुसकराते हुए इस प्रकार कहा—हे देवेश! शैलादि मेरा पुत्र है, अतः आप इसे सभी लोकोंका स्वामित्व और गणेशत्व प्रदान करनेकी कृपा कीजिये॥ ५१-५२॥ |
| ततः स भगवान् शर्वः सर्वलोकेश्वरेश्वरः।<br>सस्मार गणपान् दिव्यान् देवदेवो वृषध्वजः॥ ५३ | तत्पश्चात् सभी लोकेश्वरोंके भी ईश्वर, देवोंके देव, शर्व, भगवान् वृषध्वजने अपने दिव्य गणेश्वरोंका स्मरण किया॥ ५३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे नन्दिकेश्वरप्रादुर्भावनन्दिकेश्वराभिषेकमन्त्रो नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'नन्दिकेश्वरप्रादुर्भाव तथा नन्दिकेश्वराभिषेकमन्त्र' नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४३॥
चौवालीसवाँ अध्याय
भगवान् शिवद्वारा नन्दिकेश्वरको गणोंके अधिपतिके रूपमें प्रतिष्ठित करना एवं सभी देवोंके द्वारा नन्दिकेश्वरका अभिषेक तथा शिवनाममन्त्रकी महिमा
| शैलादिरुवाच<br>स्मरणादेव रुद्रस्य सम्प्राप्ताश्च गणेश्वराः।<br>सर्वे सहस्रहस्ताश्च सहस्रायुधपाणयः॥ १<br><br>त्रिनेत्राश्च महात्मानस्त्रिदशैरपि वन्दिताः।<br>कोटिकालाग्निसङ्काशा जटामुकुटधारिणः॥ २<br><br>दंष्ट्राकरालवदना नित्या बुद्धाश्च निर्मलाः।<br>कोटिकोटिगणैस्तुल्यैरात्मना च गणेश्वराः।<br>असंख्याता महात्मानस्तत्राजग्मुर्मुदा युताः॥ ३ | **शैलादि बोले—**रुद्रके स्मरण करते ही गणेश्वर लोग उपस्थित हो गये। उन सभीकी हजार-हजार भुजाएँ थीं, उन्होंने हाथोंमें हजार अस्त्र धारण कर रखे थे, उनके तीन नेत्र थे, वे महान् गण देवताओंसे वन्दित हो रहे थे, वे करोड़ों कालाग्निके समान थे, वे जटामुकुट धारण किये हुए थे, दाढ़ोंके कारण वे विकराल मुखवाले थे, वे शाश्वत, शुद्ध तथा प्रबुद्ध थे, वे अपने ही समान करोड़ों-करोड़ों अनुचरोंसे युक्त थे—ऐसे असंख्य महात्मा गणेश्वर प्रसन्नताके साथ वहाँ आये॥ १–३॥ |
१९८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| गायन्तश्च द्रवन्तश्च नृत्यन्तश्च महाबलाः।<br>मुखाडम्बरवाद्यानि वादयन्तस्तथैव च॥ ४<br>रथैर्नागैर्हयैश्चैव सिंहमर्कटवाहनाः।<br>विमानेषु तथारूढा हेमचित्रेषु वै गणाः॥ ५ | वे महान् बलसे सम्पन्न गण गाते, दौड़ते, भागते, नाचते तथा अनेक मुखवाद्योंको बजाते हुए आये। वे रथों, हाथियों, घोड़ों, सिंहों और बन्दरोंपर सवार थे। कुछ गण स्वर्णचित्रित विमानोंपर भी आरूढ़ थे॥ ४-५॥ |
| भेरीमृदङ्गाद्यैश्च पणवानकगोमुखैः।<br>वादित्रैर्विविधैश्चान्यैः पटहैरेकपुष्करैः॥ ६<br>भेरीमुरजसंनादैराडम्बरकडिण्डिमैः ।<br>मर्दलैर्वेणुवीणाभिर्विविधैस्तालनिःस्वनैः ॥ ७<br>दर्दुरैस्तलघातैश्च कच्छपैः पणवैरपि।<br>वाद्यमानैर्महायोग्या आजग्मुर्देवसंसदम्॥ ८ | महायोगसे सम्पन्न वे गणेश्वर भेरी, मृदंग, पणव, आनक, गोमुख, पटह, एकपुष्कर, मुरज, आडम्बर, डिण्डिम, मर्दल, वेणु, वीणा, दर्दुर, तलघात, कच्छप, पणव एवं अन्य प्रकारके वाद्योंको बजाते हुए तथा विविध तालध्वनियाँ करते हुए भगवान् शिवकी सभामें आये॥ ६-८॥ |
| ते गणेशा महासत्त्वाः सर्वदेवेश्वरेश्वराः।<br>प्रणम्य देवं देवीं च इदं वचनमब्रुवन्॥ ९<br>भगवन् देवदेवेश त्र्यम्बक वृषध्वज।<br>किमर्थं च स्मृता देव आज्ञापय महाद्युते॥ १० | महान् शक्तिसे युक्त तथा सभी देवेश्वरोंके ईश्वर उन गणेश्वरोंने महादेव एवं पार्वतीको प्रणाम करके यह वचन कहा—हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे त्र्यम्बक! हे वृषध्वज! आपने हमलोगोंका स्मरण किसलिये किया है? हे देव! हे महाद्युते! आदेश दीजिये॥ ९-१०॥ |
| किं सागरान् शोषयामो यमं वा सह किङ्करैः।<br>हन्मो मृत्युसुतां मृत्युं पशुवद्धन्म पद्मजम्॥ ११<br>बद्ध्वेन्द्रं सह देवैश्च सह विष्णुं च वायुना।<br>आनयामः सुसङ्क्रुद्धा दैत्यान् वा सह दानवैः॥ १२<br>कस्याद्य व्यसनं घोरं करिष्यामस्तवाज्ञया।<br>कस्य वाद्योत्सवो देव सर्वकामसमृद्धये॥ १३ | क्या हमलोग समुद्रोंको सोख लें? क्या यमको उनके सेवकोंसहित मार डालें अथवा मृत्युपुत्री (जरा) तथा मृत्युको मार डालें अथवा पद्मयोनि ब्रह्माका पशुकी भाँति वध कर दें। क्या अत्यन्त कुपित होकर हमलोग देवताओंसहित इन्द्रको, वायुसहित विष्णुको अथवा दानवोंसहित दैत्योंको बाँधकर यहाँ ले आयें? हमलोग आपकी आज्ञासे आज किसका घोर अनर्थ कर डालें? हे देव! सभी कामनाओंकी समृद्धिके लिये आज किसका उत्सव है?॥ ११-१३॥ |
| तांस्तथावादिनः सर्वान् गणेशान् सर्वसम्मतान्।<br>उवाच देवः सम्पूज्य कोटिकोटिशतान् प्रभुः॥ १४<br>शृणुध्वं यत्कृते यूयमिहाहूता जगद्धिताः।<br>श्रुत्वा च प्रयतात्मानः कुरुध्वं तदशङ्किताः॥ १५<br>नन्दीश्वरोऽयं पुत्रो नः सर्वेषामीश्वरेश्वरः।<br>विप्रोऽयं नायकश्चैव सेनानीर्वः समृद्धिमान्॥ १६<br>तमिमं मम सन्देशाद्यूयं सर्वेऽपि सम्मताः।<br>सेनान्यमभिषिञ्चध्वं महायोगपतिं पतिम्॥ १७ | भगवान् शंकरने वैसा कहनेवाले उन करोड़ों-करोड़ों सभी सर्वपूज्य गणेश्वरोंका सम्मान करके उनसे कहा—हे जगत्के हितकारको! सुनिये, जिसलिये मैंने तुमलोगोंको यहाँ बुलाया है, उसे सुन करके हे शुद्धात्माओ [गणेश्वरो]! निःशंक होकर कीजिये। यह नन्दी हमारा पुत्र है। यह सभीका ईश्वर है। यह समृद्धिशाली विप्र तुमलोगोंका नायक तथा सेनानी है। अतः मेरे आदेशसे तुम सभी लोग अपना स्वामी एवं सेनानी मानकर इस महायोगपतिका अभिषेक करो॥ १४-१७॥ |
| एवमुक्ता भगवता गणपाः सर्व एव ते।<br>एवमस्त्विति सम्मन्त्र्य सम्भारानाहरंस्ततः॥ १८ | भगवान् शिवके इस प्रकार कहनेपर वे सभी |
अध्याय ४४ ] भगवान् शिवद्वारा नन्दिकेश्वरको गणोंके अधिपतिके रूपमें प्रतिष्ठित करना १९९
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| तस्य सर्वाश्रयं दिव्यं जाम्बूनदमयं शुभम्।<br>आसनं मेरुसङ्काशं मनोहरमुपाहरन्॥ १९<br><br>नैकस्तम्भमयं चापि चामीकरवरप्रभम्।<br>मुक्तादामावलम्बं च मणिरत्नावभासितम्॥ २०<br><br>स्तम्भैश्च वैडूर्यमयैः किङ्किणीजालसंवृतम्।<br>चारुरत्नकसंयुक्तं मण्डपं विश्वतोमुखम्॥ २१<br><br>कृत्वा विन्यस्य तन्मध्ये तदासनवरं शुभम्।<br>तस्याग्रतः पादपीठं नीलवज्रावभासितम्॥ २२<br><br>चक्रुः पादप्रतिष्ठार्थं कलशौ चास्य पार्श्वगौ।<br>सम्पूर्णौ परमाम्भोभिररविन्दावृताननौ॥ २३<br><br>कलशानां सहस्रं तु सौवर्णं राजतं तथा।<br>ताम्रजं मृण्मयं चैव सर्वतीर्थाम्बुपूरितम्॥ २४ | गणेश्वर 'ऐसा ही होगा'—यह कहकर आपसमें परामर्श करके सामग्रियाँ एकत्र करने लगे॥ १८॥<br><br>वे स्वर्णनिर्मित, दिव्य, सुन्दर, मेरुसदृश तथा मनोहर सिंहासन ले आये। उन्होंने अनेक स्तम्भोंवाले, उत्तम स्वर्णकी प्रभासे युक्त, लटकती हुई मोतियोंकी झालरोंसे सुशोभित, मणियों एवं रत्नोंसे जटिल, वैडूर्यमणिके स्तम्भोंवाले, किंकिणियोंसे सुशोभित, सुन्दर रत्नोंसे समन्वित तथा सभी ओर मुखवाले एक मण्डपका निर्माण करके उसके मध्यमें उस सुन्दर आसनको स्थापितकर पादप्रतिष्ठाके लिये उसके आगे नीलवज्रसे जटिल एक पादपीठ रखा। उसके दोनों ओर उन्होंने दो कलश रखे, जो सुगन्धित जलसे भरे हुए थे तथा उनके मुख कमलपुष्पोंसे ढँके हुए थे। सोने, चाँदी, ताँबे और मिट्टीके हजारों कलश वहाँ रखे थे, जो सभी तीर्थोंके जलसे परिपूर्ण थे॥ १९–२४॥ |
| वासोयुगं तथा दिव्यं गन्धं दिव्यं तथैव च।<br>केयूरे कुण्डले चैव मुकुटं हारमेव च॥ २५<br><br>छत्रं शतशलाकं च बालव्यजनमेव च।<br>दत्तं महात्मना तेन ब्रह्मणा परमेष्ठिना॥ २६ | महात्मा परमेष्ठी ब्रह्माने दिव्य वस्त्रयुगल, दिव्य गन्ध, केयूर, कुण्डल, मुकुट, हार, सौ शलाकाओं (तीलियों)-वाला छत्र और एक बालव्यजन प्रदान किया॥ २५–२६॥ |
| शङ्खहाराङ्गगौरेण पृष्ठेनापि विराजितम्।<br>व्यजनं चन्द्रशुभ्रं च हेमदण्डं सुचामरम्॥ २७<br><br>ऐरावतः सुप्रतीको गजावेतौ सुपूजितौ।<br>मुकुटं काञ्चनं चैव निर्मितं विश्वकर्मणा॥ २८<br><br>कुण्डले चामले दिव्ये वज्रं चैव वरायुधम्।<br>जाम्बूनदमयं सूत्रं केयूरद्वयमेव च॥ २९<br><br>सम्भाराणि तथान्यानि विविधानि बहून्यपि।<br>समन्तान्निन्युरव्यग्रा गणपा देवसम्मताः॥ ३० | शंख तथा मोतियोंकी मालाके समान गौरवर्णवाले दण्डसे सुशोभित और चन्द्रमाके समान शुभ्र व्यजन, स्वर्णका दण्ड (मूठ) लगा हुआ चामर, भलीभाँति पूजित ऐरावत तथा सुप्रतीक—ये दो हाथी, विश्वकर्माके द्वारा बनाया हुआ एक सोनेका मुकुट, दो स्वच्छ तथा दिव्य कुण्डल, श्रेष्ठ आयुध वज्र, सोनेका सूत्र तथा दो केयूर वहाँ रखे गये। देवताओंके द्वारा पूजित उन गणेश्वरोंने चारों ओर अनेक प्रकारकी अन्य आवश्यक सामग्रियोंको सावधान होकर वहाँ उपस्थित कर दिया॥ २७–३०॥ |
| ततो देवाश्च सेन्द्राश्च नारायणमुखास्तथा।<br>मुनयो भगवान् ब्रह्मा नवब्रह्माण एव च॥ ३१<br><br>देवैश्च लोकाः सर्वे ते ततो जग्मुर्मुदा युताः।<br>तेष्वागतेषु सर्वेषु भगवान् परमेश्वरः॥ ३२ | तदनन्तर इन्द्रसहित विष्णु आदि देवता, मुनिगण, भगवान् ब्रह्मा, नवब्रह्माण*, देवताओंसहित सभी लोकपाल प्रसन्नतापूर्वक वहाँ गये। उन सभीके वहाँ आ जानेपर भगवान् परमेश्वरने समस्त संस्कारविधि सम्पन्न करानेके |
* मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ—ये नौ ऋषि ब्रह्माजीके मनसे उत्पन्न होनेके कारण तथा ब्रह्मवादी और ब्रह्मात्मक होनेसे 'नवब्रह्माण' कहलाते हैं। (लिङ्गपु० पू० ७०। १८१–१८३)
| २०० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| लिये पितामह ब्रह्माको आदेश दिया॥ ३१-३२ १/२॥ | |
|---|---|
| सर्वकार्यविधिं कर्तुमादिदेश पितामहम्।<br>पितामहोऽपि भगवान् नियोगादेव तस्य तु॥ ३३<br><br>चकार सर्वं भगवानभिषेकं समाहितः।<br>अर्चयित्वा ततो ब्रह्मा स्वयमेवाभ्यषेचयत्॥ ३४<br><br>ततो विष्णुस्ततः शक्रो लोकपालास्तथैव च।<br>अभ्यषिञ्चन्त विधिवद् गणेन्द्रं शिवशासनात्॥ ३५ | तब उनका आदेश पाते ही भगवान् ब्रह्माने भी ध्यानपूर्वक सम्पूर्ण अभिषेक-कर्म सम्पन्न कराया। तत्पश्चात् भगवान् ब्रह्माने पूजन करके स्वयं उनका अभिषेक किया। इसके बाद शिवके आदेशसे विष्णुने, फिर इन्द्रने और लोकपालोंने गणेन्द्रका विधिपूर्वक अभिषेक किया॥ ३३-३५॥ |
| ऋषयस्तुष्टुवुश्चैव पितामहपुरोगमाः।<br>स्तुतवत्सु ततस्तेषु विष्णुः सर्वजगत्पतिः॥ ३६<br><br>शिरस्यञ्जलिमादाय तुष्टाव च समाहितः।<br>प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा जयशब्दं चकार च॥ ३७ | तदनन्तर ऋषियों तथा पितामह आदिने उनकी स्तुति की। तब उन सभीके स्तुति कर लेनेपर समस्त जगत्के स्वामी विष्णुने सिरपर अंजलि बाँधकर एकाग्र-चित्त होकर उनकी स्तुति की और हाथ जोड़े हुए झुककर जय-जयकार किया। तत्पश्चात् सभी गणेश्वरों, देवताओं और असुरोंने भी क्रमसे सम्पूर्ण कृत्य किया॥ ३६-३७ १/२॥ |
| ततो गणाधिपाः सर्वे ततो देवास्ततोऽसुराः।<br>एवं स्तुतश्चाभिषिक्तो देवैः सब्रह्मकैस्तदा॥ ३८<br><br>उद्वाहश्च कृतस्तत्र नियोगात्परमेष्ठिनः।<br>मरुतां च सुता देवी सुयशाख्या बभूव या॥ ३९<br><br>लब्धं शशिप्रभं छत्रं तया तत्र विभूषितम्।<br>चामरे चामरासक्तहस्ताग्रैः स्त्रीगणैर्युता॥ ४०<br><br>सिंहासनं च परमं तया चाधिष्ठितं मया।<br>अलङ्कृता महालक्ष्म्या मुकुटाद्यैः सुभूषणैः॥ ४१ | इस प्रकार ब्रह्मसहित सभी देवताओंके द्वारा उनका अभिषेक तथा स्तवन हो जानेके बाद परमेष्ठीकी आज्ञासे उन्होंने विवाह किया। सुयशा नामक जो मरुतोंकी पुत्री थी, वह उनकी भार्या हुई। उस सुयशाको चन्द्रमाके समान प्रभायुक्त और विशेष शोभासम्पन्न एक छत्र भेंट किया गया। हाथोंमें चामर लिये हुए स्त्रियोंसे युक्त उस सुयशाको दो चामर भी प्रदान किये गये। मेरे साथ उसने भी एक अत्यन्त सुन्दर सिंहासन ग्रहण किया। भगवती महालक्ष्मीने मुकुट आदि सुन्दर आभूषणोंसे उसे अलंकृत किया॥ ३८-४१॥ |
| लब्धो हारश्च परमो देव्याः कण्ठगतस्तथा।<br>वृषेन्द्रश्च सितो नागः सिंहः सिंहध्वजस्तथा॥ ४२<br><br>रथश्च हेमच्छत्रं च चन्द्रबिम्बसमप्रभम्।<br>अद्यापि सदृशः कश्चिन्मया नास्ति विभुः क्वचित्॥ ४३ | उसे देवीके गलेका अति सुन्दर हार भी प्राप्त हुआ। वृषेन्द्र, श्वेत हाथी, सिंह, सिंहध्वज, रथ और चन्द्रमण्डलके समान प्रभाववाला स्वर्णछत्र भी भेंट किया गया। अब मेरे समान कहीं भी कोई प्रभु नहीं था॥ ४२-४३॥ |
| सान्वयं च गृहीत्वेशस्तथा सम्बन्धिबान्धवैः।<br>आरुह्य वृषमीशानो मया देव्या गतः शिवः॥ ४४ | मुझको परिवारसहित लेकर सम्बन्धियों तथा बान्धवोंको भी साथ लेकर देवीके साथ भगवान् महेश्वर वृषभपर आरूढ़ हो चल पड़े॥ ४४॥ |
| तदा देवीं भवं दृष्ट्वा मया च प्रार्थयन् गणैः।<br>मुनिदेवर्षयः सिद्धा आज्ञां पाशुपतीं द्विजाः॥ ४५ | तब मेरे तथा गणोंके साथ शिव एवं पार्वतीको देखकर मुनियों, देवर्षियों, सिद्धों और द्विजोंने शिवकी आज्ञाहेतु प्रार्थना की॥ ४५॥ |
| अथाज्ञां प्रददौ तेषामर्हाणामाज्ञया विभोः।<br>नन्दिको नगजाभर्तुस्तेषां पाशुपतीं शुभाम्॥ ४६ | तत्पश्चात् हिमालयकी पुत्रीके पति प्रभु शिवकी |
४५- भगवान् रुद्रके विराट् स्वरूप तथा सात पातालोंकोंका वर्णन
अध्याय ४५ ] भगवान् रुद्रके विराट् स्वरूप तथा सात पाताललोकोंका वर्णन २०१
| तस्माद्धि मुनयो लब्ध्वा तदाज्ञां मुनिपुङ्गवात्।<br>भवभक्तास्तदा चासंस्तस्माद्देवं समर्चयेत्॥ ४७ | आज्ञासे नन्दीने उन पूजनीय लोगोंके लिये शुभ पाशुपत आज्ञा प्रदान की॥ ४६॥<br><br>तब मुनिश्रेष्ठ (नन्दी)-से उन शिवकी आज्ञा (दीक्षा) पाकर वे मुनिलोग शिवभक्त हो गये। अतः सभीको शिवकी पूजा करनी चाहिये॥ ४७॥ |
| नमस्कारविहीनस्तु नाम उद्गिरयेद्द्रवे।<br>ब्रह्मघ्नदशसंतुल्यं तस्य पापं गरीयसम्॥ ४८<br><br>तस्मात्सर्वप्रकारेण नमस्कारादिमुच्चरेत्।<br>आदौ कुर्यान्नमस्कारं तदन्ते शिवतां व्रजेत्॥ ४९ | यदि कोई मनुष्य बिना नमस्कारके ही शिवके नामका उच्चारण करता है, तो उसे दस ब्रह्महत्याके समान घोर पाप लगता है। अतः सब प्रकारसे नामके आदिमें नमस्कार (नमः)-का उच्चारण करना चाहिये। आदिमें नमः अवश्य लगाना चाहिये, ऐसा करनेवाला शिवत्वको प्राप्त होता है* ॥ ४८-४९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे नन्दिकेश्वराभिषेको नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'नन्दिकेश्वराभिषेक' नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४४॥
पैंतालीसवाँ अध्याय
भगवान् रुद्रके विराट् स्वरूप तथा सात पाताललोकोंका वर्णन
| ऋषय ऊचुः<br>सूत सुव्यक्तमखिलं कथितं शङ्करस्य तु।<br>सर्वात्मभावं रुद्रस्य स्वरूपं वक्तुमर्हसि॥ १ | ऋषिगण बोले—हे सूतजी! आपने शंकरजीके विषयमें सब कुछ स्पष्ट रूपसे कह दिया, अब आप रुद्रके सर्वात्मभाव तथा स्वरूपको बतानेकी कृपा कीजिये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>भूर्भुवः स्वर्महश्चैव जनः साक्षात्तपस्तथा।<br>सत्यलोकश्च पातालं नरकार्णवकोटयः॥ २<br><br>तारकाग्रहसोमार्कौ ध्रुवः सप्तर्षयस्तथा।<br>वैमानिकास्तथान्ये च तिष्ठन्त्यस्य प्रसादतः॥ ३ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्य—ये लोक, पाताल, करोड़ों नरक-सागर, तारागण, ग्रहगण, चन्द्र, सूर्य, ध्रुव, सप्तर्षिगण, वैमानिक देवतागण तथा अन्य सभी उन्हीं शिवकी कृपासे प्रतिष्ठित हैं॥ २-३॥ |
| अनेन निर्मितास्त्वेवं तदात्मानो द्विजर्षभाः।<br>समष्टिरूपः सर्वात्मा संस्थितः सर्वदा शिवः॥ ४ | इन्हींके द्वारा ये सब बनाये गये हैं। हे श्रेष्ठ द्विजो! ये सब उन्हींके आत्मस्वरूप हैं। वे सर्वात्मा शिव सभीमें सर्वदा समष्टिरूपसे स्थित हैं॥ ४॥ |
| सर्वात्मानं महात्मानं महादेवं महेश्वरम्।<br>न विजानन्ति सम्मूढा मायया तस्य मोहिताः॥ ५<br><br>तस्य देवस्य रुद्रस्य शरीरं वै जगत्त्रयम्।<br>तस्मात्प्रणम्य तं वक्ष्ये जगतां निर्णयं शुभम्॥ ६ | उन्हींकी मायासे मोहित होकर अज्ञानी लोग सर्वात्मरूप, महात्मा, महादेव तथा महेश्वरको नहीं जानते हैं। उन भगवान् रुद्रका शरीर ही तीनों लोक है, अतः उन्हें प्रणाम करके मैं जगत्के शुभ विस्तारका वर्णन करूँगा॥ ५-६॥ |
* शिवमन्त्रकी दीक्षा प्राप्तकर विधिपूर्वक जप करनेके लिये यह वचन है। नामजपकी महिमाके अनुसार श्रद्धापूर्वक नामजप भी किया जा सकता है।
२०२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुरा वः कथितं सर्वं मयाण्डस्य यथा कृतिः।<br>भुवनानां स्वरूपं च ब्रह्माण्डे कथयाम्यहम्॥ ७<br>पृथिवी चान्तरिक्षं च स्वर्महर्जन एव च।<br>तपः सत्यं च सप्तैते लोकास्त्वण्डोद्भवाः शुभाः॥ ८<br>अधस्तादत्र चैतेषां द्विजाः सप्त तलानि तु।<br>महातलादयस्तेषां अधस्तान्ररकाः क्रमात्॥ ९ | पहले जैसा मैंने आपलोगोंसे कहा है—अण्डके आकार और ब्रह्माण्ड तथा भुवनोंके स्वरूपको बता रहा हूँ। पृथिवी, अन्तरिक्ष, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्य—ये सात शुभ लोक अण्डसे प्रादुर्भूत हुए हैं। हे ब्राह्मणो! उनके नीचे महातल आदि सात तल हैं। उनके भी नीचे क्रमसे नरक स्थित हैं॥ ७-९॥ |
| महातलं हेमतलं सर्वरत्नोपशोभितम्।<br>प्रासादैश्च विचित्रैश्च भवस्यायतनैस्तथा॥ १०<br>अनन्तेन च संयुक्तं मुचुकुन्देन धीमता।<br>नृपेण बलिना चैव पातालस्वर्गवासिना॥ ११ | महातल स्वर्णका बना हुआ है और यह सभी रत्नोंसे सुशोभित है। यह अद्भुत प्रासादों तथा शिवके मन्दिरोंसे युक्त है। यह अनन्त (शेषनाग), बुद्धिमान् मुचुकुन्द और पाताल तथा स्वर्गवासी राजा बलिसे युक्त है॥ १०-११॥ |
| शैलं रसातलं विप्राः शार्कं हि तलातलम्।<br>पीतं सुतलमित्युक्तं वितलं विद्रुमप्रभम्॥ १२<br>सितं हि अतलं तच्च तलं यच्च सितेतरम्।<br>क्षमायास्तु यावद्विस्तारो ह्यधस्तेषां च सुव्रताः॥ १३<br>तलानां चैव सर्वेषां तावत्संख्या समाहिता।<br>सहस्त्रयोजनं व्योम दशसाहस्त्रमेव च॥ १४<br>लक्षं सप्तसहस्त्रं हि तलानां सघनस्य तु।<br>व्योम्नः प्रमाणं मूलं तु त्रिंशत्साहस्त्रकेण तु॥ १५ | हे विप्रो! रसातल चट्टानोंसे युक्त है, तलातल बालुकामय है, सुतल पीले वर्णका कहा गया है और वितल विद्रुम (मूँगे)-की प्रभावाला है। अतलं श्वेतवर्णका है और तल कालेवर्णका है। हे सुव्रतो! उन नीचेके तलोंका विस्तार पृथ्वीके समान है। सभी तलोंकी जो समाहित संख्या है, उन सभीके अन्तर्वर्ती आकाश ग्यारह हजार योजनके विस्तारवाले हैं। सभी तलोंके मेघाच्छादित अन्तरिक्षभागको तीस हजार योजनवाला माना गया है तथा इन सभी तलोंका भौगोलिक विस्तार एक लाख सात हजार योजन है॥ १२-१५॥ |
| सुवर्णेन मुनिश्रेष्ठास्तथा वासुकिना शुभम्।<br>रसातलमिति ख्यातं तथान्यैश्च निषेवितम्॥ १६<br>विरोचनहिरण्याक्षनरकाद्यैश्च सेवितम्।<br>तलातलमिति ख्यातं सर्वशोभासमन्वितम्॥ १७ | हे मुनिश्रेष्ठो! शुभ रसातल सुवर्ण, वासुकि तथा अन्य नागोंसे युक्त कहा गया है। सब प्रकारकी शोभासे समन्वित तलातल विरोचन, हिरण्याक्ष, नरक आदिसे सेवित है॥ १६-१७॥ |
| वैनावकादिभिश्चैव कालनेमिपुरोगमैः।<br>पूर्वदेवैः समाकीर्णं सुतलं च तथापरैः॥ १८<br>वितलं दानवाद्यैश्च तारकाग्निमुखैस्तथा।<br>महान्तकाद्यैर्नागैश्च प्रह्लादेनासुरेण च॥ १९ | सुतल वैनावक आदि देवों तथा कालनेमि आदि अन्य प्रमुख दैत्योंसे परिपूरित है। वितल तारकाग्नि आदि प्रधान दानवों, महान्तक आदि नागों तथा असुर प्रह्लादसे समन्वित है॥ १८-१९॥ |
| अतलं चात्र विख्यातं कम्बलाश्वनिषेवितम्।<br>महाकुम्भेन वीरेण हयग्रीवेण धीमता॥ २०<br>शङ्कुकर्णेन सम्भिन्नं तथा नमुचिपूर्वकैः।<br>तथान्यैर्विविधैर्वीरैस्तलं चैव सुशोभितम्॥ २१ | अतल कम्बल तथा अश्वतर, वीर महाकुम्भ और बुद्धिमान् हयग्रीवके अधिकारमें कहा गया है। इसी प्रकार शोभासम्पन्न तल शंकुकर्ण, नमुचि आदि विविध वीरोंसे सुशोभित है॥ २०-२१॥ |
४६- भुवनसन्निवेशमें सात द्वीपों तथा सात समुद्रोंका वर्णन एवं सर्वत्र भगवान् शिवकी व्यापकता, स्वायम्भुव मन्वन्तरके प्रियव्रतादि राजवंशोंका वर्णन, जम्बूद्वीप, कुशद्वीप तथा क्रौञ्चद्वीपके राजाओंका वर्णन
| अध्याय ४६ ] | भुवनसन्निवेशमें सात द्वीपों तथा सात समुद्रोंका वर्णन | २०३ |
|---|
| तलेषु तेषु सर्वेषु चाम्बया परमेश्वरः।<br>स्कन्देन नन्दिना सार्धं गणपैः सर्वतो वृतः॥ २२<br><br>तलानां चैव सर्वेषामूर्ध्वतः सप्त सत्तमाः।<br>क्ष्मातलानि धरा चापि सप्तधा कथयामि वः॥ २३ | उन सभी तलोंमें परमेश्वर शिव अम्बा (पार्वती), स्कन्द (कार्तिकेय), नन्दी तथा अन्य गणेश्वरोंके द्वारा सभी ओरसे घिरे हुए विद्यमान रहते हैं। हे श्रेष्ठ मुनियो! इन सभी तलोंके ऊपर सात पृथ्वीतल हैं, पृथ्वी भी सात खण्डोंमें विभक्त है; मैं आपलोगोंसे इसका वर्णन कर रहा हूँ॥ २२-२३ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पातालवर्णनं नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पातालवर्णन' नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥
छियालीसवाँ अध्याय
भुवनसन्निवेशमें सात द्वीपों तथा सात समुद्रोंका वर्णन एवं सर्वत्र भगवान् शिवकी व्यापकता, स्वायम्भुव मन्वन्तरके प्रियव्रतादि राजवंशोंका वर्णन, जम्बूद्वीप, कुशद्वीप तथा क्रौञ्चद्वीपके राजाओंका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| सप्तद्वीपा तथा पृथ्वी नदीपर्वतसङ्कुला।<br>समुद्रैः सप्तभिश्चैव सर्वतः समलङ्कृता॥ १ | [हे ऋषियो!] पृथ्वी सात द्वीपोंसे युक्त है, नदियों तथा पर्वतोंसे भरी पड़ी है और सात समुद्रोंसे सभी ओरसे भलीभाँति अलंकृत है॥ १॥ |
| जम्बूः प्लक्षः शाल्मलिश्च कुशः क्रौञ्चस्तथैव च।<br>शाकः पुष्करनामा च द्वीपास्त्वभ्यन्तरे क्रमात्॥ २ | जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक तथा पुष्कर नामवाले—ये [सात] द्वीप क्रमसे इसके भीतर अवस्थित हैं॥ २॥ |
| सप्तद्वीपेषु सर्वेषु साम्बः सर्वगणैर्वृतः।<br>नानावेषधरो भूत्वा सान्निध्यं कुरुते हरः॥ ३ | इन समस्त सातों द्वीपोंमें उमासहित भगवान् शिव सभी गणोंसे घिरे हुए तथा अनेक प्रकारके वेष धारण करके निवास करते हैं॥ ३॥ |
| क्षारोदेक्षुरसोदश्च सुरोदश्च घृतोदधिः।<br>दध्यर्णवश्च क्षीरोदः स्वादूदश्चाप्यनुक्रमात्॥ ४ | क्षारोद, इक्षुरसोद, सुरोद, घृतोदधि, दध्यर्णव, क्षीरोद, स्वादूद—ये [सात समुद्र] क्रमसे हैं। इन सभी समुद्रोंमें जलरूपी श्रीसम्पन्न भगवान् शिव अपने गणोंके साथ लहररूपी भुजाओंसे क्रीड़ा करते हैं॥ ४-५॥ |
| समुद्रेष्विह सर्वेषु सर्वदा सगणः शिवः।<br>जलरूपी भवः श्रीमान् क्रीडते चोर्मिबाहुभिः॥ ५ | |
| क्षीरार्णवामृतमिव सदा क्षीरार्णवे हरिः।<br>शेते शिवज्ञानधिया साक्षाद्वै योगनिद्रया॥ ६ | क्षीरसागर अमृतके समान है। भगवान् विष्णु उस क्षीरसागरमें शिवज्ञानका चिन्तन करते हुए साक्षात् योगनिद्राके साथ सदा शयन करते हैं। जब भगवान् जागते हैं, तब सम्पूर्ण जगत् जागता है और जब वे सोते हैं, तब यह चराचर जगत् उनमें विलीन होकर सोता है॥ ६-७॥ |
| यदा प्रबुद्धो भगवान् प्रबुद्धमखिलं जगत्।<br>यदा सुप्तस्तदा सुप्तं तन्मयं च चराचरम्॥ ७ | |
| तेनैव सृष्टमखिलं धृतं रक्षितमेव च।<br>संहतं देवदेवस्य प्रसादात्परमेष्ठिनः॥ ८ | परमेष्ठी देवदेव शिवकी कृपासे उन्हीं विष्णुके द्वारा सम्पूर्ण जगत्का सृजन, धारण, रक्षण तथा संहार किया जाता है॥ ८॥ |
| सुषेणा इति विख्याता यजन्ते पुरुषर्षभम्।<br>अनिरुद्धं मुनिश्रेष्ठाः शङ्खचक्रगदाधरम्॥ ९ | हे मुनिश्रेष्ठो! सुषेणा—इस नामसे प्रसिद्ध लोग |
| २०४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शंख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले पुरुषश्रेष्ठ [भगवान्] अनिरुद्धका पूजन करते हैं॥ ९॥ | |
| ये चानिरुद्धं पुरुषं ध्यायन्त्यात्मविदां वराः।<br>नारायणसमाः सर्वे सर्वसम्पत्समन्विताः॥ १०<br>सनन्दनश्च भगवान् सनकश्च सनातनः।<br>बालखिल्याश्च सिद्धाश्च मित्रावरुणकौ तथा॥ ११<br>यजन्ति सततं तत्र विश्वस्य प्रभवं हरिम्। | हे आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ [मुनियो!]! जो लोग अनिरुद्ध पुरुषका ध्यान करते हैं, वे सब नारायणतुल्य हैं और सभी सम्पत्तियोंसे सम्पन्न रहते हैं। भगवान् सनन्दन, सनक, सनातन, बालखिल्यगण, सिद्धगण एवं मित्रावरुण वहाँ विश्वकी उत्पत्ति करनेवाले प्रभु श्रीहरिकी सदा पूजा करते हैं॥ १०-११ १/२॥ |
| सप्तद्वीपेषु तिष्ठन्ति नानाशृङ्गाः महोदयाः॥ १२<br>आसमुद्रायताः केचिद् गिरयो गह्वरैस्तथा।<br>धरायाः पतयश्चासन् बहवः कालगौरवात्॥ १३<br>सामर्थ्यात्परमेशानाः क्रौञ्चारेर्जनकात्प्रभोः। | सातों द्वीपोंमें अनेक शिखरोंवाले ऊँचे-ऊँचे पर्वत हैं। कुछ पर्वत गुफाओंसहित समुद्रतक फैले हुए हैं। काल-गौरवसे वहाँ बहुत-से भूपति (राजा) हुए, जो क्रौंचके शत्रु कार्तिकेयके पिता प्रभु शिवकी कृपासे परम ऐश्वर्यसे सम्पन्न थे॥ १२-१३ १/२॥ |
| मन्वन्तरेषु सर्वेषु अतीतानागतेष्विह॥ १४<br>प्रवक्ष्यामि धरेशान् वो वक्ष्ये स्वायम्भुवेऽन्तरे।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु अतीतानागतेषु च॥ १५<br>तुल्याभिमानिनश्चैव सर्वे तुल्यप्रयोजनाः।<br>स्वायम्भुवस्य च मनोः पौत्रास्त्वासन्महाबलाः॥ १६<br>प्रियव्रतात्मजा वीरास्ते दशैह प्रकीर्तिताः।<br>आग्नीध्रश्चाग्निबाहुश्च मेधा मेधातिथिर्वसुः॥ १७ | [हे ऋषियो!] अब मैं स्वायम्भुव मन्वन्तरसे प्रारम्भ करके भूत तथा भविष्यत्कालके सभी मन्वन्तरोंके राजाओंका वर्णन आपलोगोंसे करूँगा। भूत एवं भविष्यत्कालके सभी मन्वन्तरोंमें सभी राजा तुल्य अभिमानवाले तथा तुल्य प्रयोजनवाले थे। स्वायम्भुव मनुके [सभी] पौत्र महाबली थे। प्रियव्रतके दस वीर पुत्र थे। वे इस प्रकार कहे गये हैं—आग्नीध्र, अग्निबाहु, मेधा, मेधातिथि, वसु, ज्योतिष्मान्, द्युतिमान्, हव्य, सवन और पुत्र॥ १४-१७ १/२॥ |
| ज्योतिष्मान् द्युतिमान् हव्यः सवनः पुत्र एव च।<br>प्रियव्रतोऽभ्यषिञ्चत्तान् सप्त सप्तसु पार्थिवान्॥ १८<br>जम्बूद्वीपेश्वरं चक्रे आग्नीध्रं सुमहाबलम्।<br>प्लक्षद्वीपेश्वरश्चापि तेन मेधातिथिः कृतः॥ १९<br>शाल्मलेशञ्च वपुष्मन्तं राजानमभिषिक्तवान्।<br>ज्योतिष्मन्तं कुशद्वीपे राजानं कृतवान्नृपः॥ २०<br>द्युतिमन्तं च राजानं क्रौञ्चद्वीपे समादिशत्।<br>शाकद्वीपेश्वरं चापि हव्यं चक्रे प्रियव्रतः॥ २१<br>पुष्कराधिपतिं चक्रे सवनं चापि सुव्रताः। | प्रियव्रतने उनमेंसे सात पुत्रोंको सात द्वीपोंमें राजाके रूपमें अभिषिक्त कर दिया। उन्होंने महान् बलशाली आग्नीध्रको जम्बूद्वीपका राजा बनाया। उनके द्वारा मेधातिथि प्लक्षद्वीपके राजा बनाये गये। उन राजा प्रियव्रतने वपुष्मान्को शाल्मलिद्वीपके राजाके रूपमें अभिषिक्त किया और ज्योतिष्मान्को कुशद्वीपका राजा बनाया। प्रियव्रतने द्युतिमान्को क्रौंचद्वीपका राजा बनाया, हव्यको शाकद्वीपका राजा बनाया और हे सुव्रतो! सवनको पुष्करद्वीपका राजा बनाया॥ १८-२१ १/२॥ |
| पुष्करे सवनस्यापि महावीतः सुतोऽभवत्॥ २२<br>धातकी चैव द्वावेतौ पुत्रौ पुत्रवतां वरौ।<br>महावीतं स्मृतं वर्षं तस्य नाम्ना महात्मनः॥ २३<br>नाम्ना तु धातकेश्र्चैव धातकीखण्डमुच्यते। | पुष्करद्वीपमें सवनके यहाँ महावीत तथा धातकी नामक पुत्र हुए। ये दोनों पुत्र पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ हुए। उस महात्मा महावीतके नामसे महावीतवर्ष कहा गया है और धातकीके नामसे धातकीखण्ड कहा गया है। |
| हव्योऽप्यजनयत्पुत्राञ्छाकद्वीपेश्वरः प्रभुः॥ २४ | शाकद्वीपके |
अध्याय ४६ ] भुवनसन्निवेशमें सात द्वीपों तथा सात समुद्रोंका वर्णन २०५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| जलदं च कुमारं च सुकुमारं मणीचकम्।<br>कुसुमोत्तरमोदाकी सप्तमस्तु महाद्रुमः॥ २५<br>जलदं जलदस्याथ वर्षं प्रथममुच्यते।<br>कुमारस्य तु कौमारं द्वितीयं परिकीर्तितम्॥ २६<br>सुकुमारं तृतीयं तु सुकुमारस्य कीर्त्यते।<br>मणीचकं चतुर्थं तु माणीचकमिहोच्यते॥ २७<br>कुसुमोत्तरस्य वै वर्षं पञ्चमं कुसुमोत्तरम्।<br>मोदकं चापि मोदाकेर्वर्षं षष्ठं प्रकीर्तितम्॥ २८<br>महाद्रुमस्य नाम्ना तु सप्तमं तन्महाद्रुमम्।<br>तेषां तु नामभिस्तानि सप्त वर्षाणि तत्र वै॥ २९ | शक्तिशाली राजा हव्यने भी जलद, कुमार, सुकुमार, मणीचक्र, कुसुमोत्तर, मोदाकी और सातवें महाद्रुम—इन पुत्रोंको उत्पन्न किया। जलदके नामसे जलद नामक प्रथम वर्ष कहा जाता है। कुमारके नामसे कौमार नामक दूसरा वर्ष कहा गया है। सुकुमारके नामसे सुकुमार नामक तीसरा वर्ष कहा जाता है। मणीचकके नामसे माणीचक नामक चौथा वर्ष कहा जाता है। कुसुमोत्तरके नामसे कुसुमोत्तर नामक पाँचवाँ वर्ष एवं मोदाकीके नामसे मोदक नामक छठा वर्ष कहा गया है। महाद्रुमके नामसे सातवाँ महाद्रुम नामक वर्ष कहा गया है। इस प्रकार उनके नामोंसे वे सात वर्ष हैं॥ २२—२९॥ |
| क्रौञ्चद्वीपेश्वरस्यापि पुत्रा द्युतिमतस्तु वै।<br>कुशलो मनुगश्चोष्णः पीवरश्चान्धकारकः॥ ३०<br>मुनिश्च दुन्दुभिश्चैव सुता द्युतिमतस्तु वै।<br>तेषां स्वनामभिर्देशाः क्रौञ्चद्वीपाश्रयाः शुभाः॥ ३१ | क्रौञ्चद्वीपके राजा द्युतिमान्के भी कुशल, मनुग, उष्ण, पीवर, अन्धकार, मुनि और दुन्दुभि—ये पुत्र उत्पन्न हुए। जो द्युतिमान्के पुत्र थे, उन्हींके अपने-अपने नामोंसे क्रौञ्चद्वीपमें स्थित शुभ देश प्रसिद्ध हुए॥ ३०-३१॥ |
| कुशलदेशः कुशलो मनुगस्य मनोज्ञनुगः।<br>उष्णास्योष्णः स्मृतो देशः पीवरः पीवरस्य च॥ ३२<br>अन्धकारस्य कथितो देशो नाम्नान्धकारकः।<br>मुनेर्देशो मुनिः प्रोक्तो दुन्दुभेर्दुन्दुभिः स्मृतः॥ ३३<br>एते जनपदाः सप्त क्रौञ्चद्वीपेषु भास्वराः। | कुशलके देशको कुशल, मनुगके देशको मनोज्ञनुग, उष्णके देशको उष्ण और पीवरके देशको पीवर कहा गया है। अन्धकारके देशको उनके नामपर अन्धकार कहा गया है। मुनिके देशको मुनि कहा गया है और दुन्दुभिके देशको दुन्दुभि कहा गया है। क्रौञ्चद्वीपमें ये सात प्रकाशमान जनपद (देश) हैं॥ ३२-३३½॥ |
| ज्योतिष्मन्तः कुशद्वीपे सप्त चासन्महौजसः॥ ३४<br>उद्भिदो वेणुमांश्चैव द्वैरथो लवणो धृतिः।<br>षष्ठः प्रभाकरश्चापि सप्तमः कपिलः स्मृतः॥ ३५<br>उद्भिदं प्रथमं वर्षं द्वितीयं वेणुमण्डलम्।<br>तृतीयं द्वैरथं चैव चतुर्थं लवणं स्मृतम्॥ ३६<br>पञ्चमं धृतिमत्षष्ठं प्रभाकरमनुत्तमम्।<br>सप्तमं कपिलं नाम कपिलस्य प्रकीर्तितम्॥ ३७ | कुशद्वीपके राजा ज्योतिष्मान्के सात महापराक्रमी पुत्र हुए। वे उद्भिद, वेणुमान्, द्वैरथ, लवण, धृति, छठें प्रभाकर और सातवें कपिल कहे गये हैं। [उद्भिदके नामसे] पहला वर्ष उद्भिद, [वेणुमान्के नामसे] दूसरा वर्ष वेणुमण्डल, [द्वैरथके नामसे] तीसरा वर्ष द्वैरथ और [लवणके नामसे] चौथा वर्ष लवण कहा गया है। इसी प्रकार [धृतिके नामसे] पाँचवाँ वर्ष धृति, [प्रभाकरके नामसे] छठा उत्तम वर्ष प्रभाकर और कपिलके नामसे सातवाँ वर्ष कपिल कहा गया है॥ ३४—३७॥ |
| शाल्मलस्येश्वराः सप्त सुतास्ते वै वपुष्मतः।<br>श्वेतश्च हरितश्चैव जीमूतो रोहितस्तथा॥ ३८<br>वैद्युतो मानसश्चैव सुप्रभः सप्तमस्तथा।<br>श्वेतस्य देशः श्वेतस्तु हरितस्य च हारितः॥ ३९ | शाल्मलिद्वीपके राजा वपुष्मान्के भी सात पुत्र हुए। वे [पृथक्-पृथक् देशोंके] राजा बने। श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत, मानस और सातवाँ सुप्रभ—ये पुत्रोंके नाम हैं। श्वेतके देशको श्वेत, हरितके देशको |
४७- जम्बूद्वीपके अधिपति प्रियव्रतके पुत्र महाराज आग्नीध्रका वंशवर्णन तथा आग्नीध्रके शिवभक्त नौ पुत्रोंका अजनाभवर्ष (भारतवर्ष), किम्पुरुषवर्ष आदि नौ वर्षों (देशों)-का स्वामी बनना
| २०६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| जीमूतस्य च जीमूतो रोहितस्य च रोहितः।<br>वैद्युतो वैद्युतस्यापि मानसस्य च मानसः॥ ४०<br>सुप्रभः सुप्रभस्यापि सप्त वै देशलाञ्छकाः।<br>प्लक्षद्वीपे तु वक्ष्यामि जम्बूद्वीपादनन्तरम्॥ ४१<br>सप्त मेधातिथेः पुत्राः प्लक्षद्वीपेश्वराः नृपाः।<br>ज्येष्ठः शान्तभयस्तेषां सप्तवर्षाणि तानि वै॥ ४२<br>तस्माच्छान्तभयाच्चैव शिशिरस्तु सुखोदयः।<br>आनन्दश्च शिवश्चैव क्षेमकश्च ध्रुवस्तथा॥ ४३<br>तानि तेषां तु नामानि सप्तवर्षाणि भागशः।<br>निवेशितानि तैस्तानि पूर्वं स्वायम्भुवेऽन्तरे॥ ४४<br>मेधातिथेस्तु पुत्रैस्तैः प्लक्षद्वीपनिवासिभिः।<br>वर्णाश्रमाचारयुताः प्रजास्तत्र निवेशिताः॥ ४५<br>प्लक्षद्वीपादिवर्षेषु शाकद्वीपान्तिकेषु वै।<br>ज्ञेयः पञ्चसु धर्मो वै वर्णाश्रमविभागशः॥ ४६<br>सुखमायुः स्वरूपं च बलं धर्मो द्विजोत्तमाः।<br>पञ्चस्वेतेषु द्वीपेषु सर्वसाधारणं स्मृतम्॥ ४७<br>रुद्रार्चनरता नित्यं महेश्वरपरायणाः।<br>अन्ये च पुष्करद्वीपे प्रजाताश्च प्रजेश्वराः॥ ४८<br>प्रजापतेश्च रुद्रस्य भावामृतसुखोत्कटाः॥ ४९ | हारित, जीमूतके देशको जीमूत, रोहितके देशको रोहित, वैद्युतके देशको वैद्युत, मानसके देशको मानस और सुप्रभके देशको सुप्रभ कहा गया है। इस प्रकार राजाओंके नामसे सात देश हैं॥ ३८-४०^{१}/२॥<br>अब मैं जम्बूद्वीपके बाहर स्थित प्लक्षद्वीपका वर्णन करूँगा। प्लक्षद्वीपके राजा मेधातिथिके सात पुत्र थे, वे सब प्लक्षद्वीपमें [अलग-अलग देशोंके] शासक नरेश हुए। उनमें शान्तभय ज्येष्ठ थे। उस द्वीपमें सात देश हैं। उस शान्तभयके बाद शिशिर, सुखोदय, आनन्द, शिव, क्षेमक और ध्रुव—ये अन्य पुत्रोंके नाम थे। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें उनके नामोंसे द्वीपके भागानुसार सात वर्ष (देश) बसाये गये॥ ४१-४४॥<br>मेधातिथिके प्लक्षद्वीपनिवासी उन पुत्रोंद्वारा वर्णाश्रम-धर्मसे सम्पन्न प्रजाएँ वहाँ बसायी गयीं। प्लक्षद्वीप तथा शाकद्वीप आदि पाँचों द्वीपोंमें वर्ण एवं आश्रमके धर्मोंका सम्यक् पालन होता था। हे श्रेष्ठ द्विजो! इन पाँचों द्वीपोंमें सुख, आयु, स्वरूप, बल तथा धर्म सबके लिये समान बताया गया है। सभी लोग सदा रुद्रके अर्चनमें लीन रहते हैं तथा महेश्वरमें भक्ति रखते हैं। पुष्कर-द्वीपमें अन्य जो प्रजाएँ एवं राजा हैं, वे सब प्रजापालक रुद्रके श्रद्धारूपी अमृतपानके सुखकी प्रबल इच्छा रखते हैं॥ ४५-४९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनकोशे द्वीपद्वीपेश्वरकथनं नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनकोशमें द्वीपद्वीपेश्वरकथन' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४६ ॥
सैंतालीसवाँ अध्याय
जम्बूद्वीपके अधिपति प्रियव्रतके पुत्र महाराज आग्नीध्रका वंशवर्णन तथा आग्नीध्रके शिवभक्त नौ पुत्रोंका अजनाभवर्ष (भारतवर्ष), किम्पुरुषवर्ष आदि नौ वर्षों (देशों)-का स्वामी बनना
| सूत उवाच<br>आग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं काम्यपुत्रं महाबलम्।<br>प्रियव्रतोऽभ्यषिञ्चद्वै जम्बूद्वीपेश्वरं नृपः॥ १<br>सोऽतीव भवभक्तश्च तपस्वी तरुणः सदा।<br>भवार्चनरतः श्रीमान् गोमान् धीमान् द्विजर्षभाः॥ २ | सूतजी बोले—राजा प्रियव्रतने अपने ज्येष्ठ उत्तराधिकारी महाबली प्रिय पुत्र आग्नीध्रको जम्बूद्वीपके राजाके रूपमें अभिषिक्त किया॥ १॥<br>हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वह महान् शिवभक्त, तपस्वी, तरुण, सदा शिवपूजनमें रत रहनेवाला, ऐश्वर्यसम्पन्न, |
अध्याय ४७] जम्बूद्वीपके अधिपति प्रियव्रतके पुत्र महाराज आग्नीध्रका वंशवर्णन २०७
| अनेक गायोंका स्वामी तथा बुद्धिमान् था॥ २॥ | |
|---|---|
| तस्य पुत्रा बभूवुस्ते प्रजापतिसमा नव।<br>सर्वे माहेश्वराश्चैव महादेवपरायणाः॥ ३ | उसके प्रजापतिके समान नौ पुत्र हुए। वे सभी शिवभक्त तथा शिवपरायण थे॥ ३॥ |
| ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरुषोऽनुजः।<br>हरिवर्षस्तृतीयस्तु चतुर्थो वै त्विलावृतः॥ ४<br>रम्यस्तु पञ्चमस्तत्र हिरण्मन् षष्ठ उच्यते।<br>कुरुस्तु सप्तमस्तेषां भद्राश्वस्त्वष्टमः स्मृतः॥ ५<br>नवमः केतुमालस्तु तेषां देशान्निबोधत। | उनमें ज्येष्ठ पुत्र नाभि नामसे प्रसिद्ध था। उसके छोटे भाईका नाम किम्पुरुष था। तीसरा पुत्र हरिवर्ष तथा चौथा पुत्र इलावृत था। रम्य पाँचवाँ पुत्र था। हिरण्मन् छठा पुत्र कहा जाता है। कुरु उनमें सातवाँ था और भद्राश्व आठवाँ पुत्र कहा गया है। नौवाँ केतुमाल था। अब उनके देशोंके विषयमें सुनिये॥ ४-५ १/२॥ |
| नाभेस्तु दक्षिणं वर्षं हेमाख्यं तु पिता ददौ॥ ६<br>हेमकूटं तु यद्वर्षं ददौ किम्पुरुषाय सः।<br>नैषधं यत्स्मृतं वर्षं हरये तत्पिता ददौ॥ ७ | पिताने [ज्येष्ठ पुत्र] नाभिको दक्षिणमें स्थित हेम नामक वर्ष (देश) प्रदान किया। उन्होंने हेमकूट नामक जो वर्ष था, उसे किम्पुरुषको दिया। नैषध नामक जो वर्ष कहा गया है, उसे पिताने हरिको दे दिया॥ ६-७॥ |
| इलावृताय प्रददौ मेरूर्यत्र तु मध्यमः।<br>नीलाचलाश्रितं वर्षं रम्याय प्रददौ पिता॥ ८<br>श्वेतं यदुत्तरं तस्मात्पित्रा दत्तं हिरण्मते।<br>यदुत्तरं शृङ्गवर्षं पिता तत्कुरवे ददौ॥ ९<br>वर्षं माल्यवतं चापि भद्राश्वस्य न्यवेदयत्।<br>गन्धमादनवर्षं तु केतुमालाय दत्तवान्॥ १० | पिताने मेरु पर्वतसे आवृत मध्य देश इलावृतको दिया और नीलाचल नामक वर्ष रम्यको दिया। पिताने हिरण्मन्को उत्तरमें स्थित श्वेत नामक वर्ष दिया और उत्तरमें जो शृंगवर्ष है, उसे उन्होंने कुरु नामक पुत्रको दिया। इसी प्रकार उन्होंने भद्राश्वको माल्यवान्वर्ष दिया और केतुमालको गन्धमादनवर्ष दिया॥ ८-१०॥ |
| इत्येतानि महान्तीह नव वर्षाणि भागशः।<br>आग्नीध्रस्तेषु वर्षेषु पुत्रांस्तानभिषिच्य वै॥ ११<br>यथाक्रमं स धर्मात्मा ततस्तु तपसि स्थितः।<br>तपसा भावितश्चैव स्वाध्यायनिरतस्त्वभूत्॥ १२<br>स्वाध्यायनिरतः पश्चाच्छिवध्यानरतस्त्वभूत्। | विभागके अनुसार ये नौ महान् वर्ष हैं। धर्मात्मा राजा आग्नीध्र उन वर्षोंमें अपने उन पुत्रोंको [राजपदपर] क्रमानुसार अभिषिक्त करके तपस्यामें रत हो गये। तपसे अपनेको शुद्ध करनेके अनन्तर वे स्वाध्यायमें संलग्न हो गये और स्वाध्यायमें रत रहनेवाले वे बादमें शिवके ध्यानमें निमग्न हो गये॥ ११-१२ १/२॥ |
| यानि किम्पुरुषाद्यानि वर्षाण्यष्टौ शुभानि च॥ १३<br>तेषां स्वभावतः सिद्धिः सुखप्राया ह्ययत्नतः।<br>विपर्ययो न तेष्वस्ति जरामृत्युभयं न च॥ १४<br>धर्माधर्मौ न तेष्वास्तां नोत्तमाधममध्यमाः।<br>न तेष्वस्ति युगावस्था क्षेत्रेष्वष्टसु सर्वतः॥ १५ | किम्पुरुष आदि जो आठ शुभ वर्ष थे, उनमें स्वभावतः बिना प्रयत्नके ही सुखमय सिद्धि थी। उनमें [किसी प्रकारका] विपरीत भाव नहीं था और [प्रजाओंमें] बुढ़ापे तथा मृत्युका भय नहीं था। उनमें न धर्म था न अधर्म और उत्तम, मध्यम तथा अधम—ये भाव नहीं थे। उन आठों क्षेत्रोंमें हर प्रकारसे युगकी अवस्था नहीं थी॥ १३-१५॥ |
| रुद्रक्षेत्रे मृताश्चैव जङ्गमाः स्थावरास्तथा।<br>भक्ताः प्रासङ्गिकाश्चापि तेषु क्षेत्रेषु यान्ति ते॥ १६<br>तेषां हिताय रुद्रेण चाष्टक्षेत्रं विनिर्मितम्।<br>तत्र तेषां महादेवः सान्निध्यं कुरुते सदा॥ १७ | रुद्रक्षेत्रमें जो भी स्थावर, जंगम, भक्त अथवा अस्थायी आगन्तुक प्राणी मृत होते हैं, वे उन्हीं क्षेत्रोंमें जाते हैं। रुद्रने उनके कल्याणके लिये ही आठों क्षेत्रोंका निर्माण किया है। वहाँपर महादेव सदा उनका सान्निध्य |
४८- भूमध्यमें स्थित मेरु (सुमेरु) पर्वत और इन्द्र आदि लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन
| २०८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| करते हैं॥ १६-१७॥ | |
|---|---|
| दृष्ट्वा हृदि महादेवमष्टक्षेत्रनिवासिनः।<br>सुखिनः सर्वदा तेषां स एवेह परा गतिः॥ १८ | आठों क्षेत्रोंके निवासी [अपने] हृदयमें महादेवको देखकर सदा सुखी रहते हैं। वे [महादेव] ही उनकी परम गति हैं॥ १८॥ |
| नाभेर्निसर्गं वक्ष्यामि हिमाङ्गेऽस्मिन्निबोधत।<br>नाभिस्त्वजनयत्पुत्रं मेरुदेव्यां महामतिः॥ १९<br><br>ऋषभं पार्थिवश्रेष्ठं सर्वक्षत्रस्य पूजितम्।<br>ऋषभाद्भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताग्रजः॥ २० | अब मैं हिमसे चिह्नित इस [हिमालय]-में विद्यमान नाभिके वंशका वर्णन करूँगा, आपलोग सुनें। महाबुद्धिमान् नाभिने मेरुदेवीसे राजाओंमें श्रेष्ठ तथा सभी राजाओंसे पूजित ऋषभ नामक पुत्रको उत्पन्न किया। ऋषभसे पराक्रमी भरत उत्पन्न हुए, जो उनके सौ पुत्रोंमें सबसे बड़े थे॥ १९-२०॥ |
| सोऽभिषिच्याथ ऋषभो भरतं पुत्रवत्सलः।<br>ज्ञानवैराग्यमाश्रित्य जित्वेन्द्रियमहोरगान्॥ २१<br><br>सर्वात्मनात्मनि स्थाप्य परमात्मानमीश्वरम्।<br>नग्नो जटी निराहारो चीरी ध्वान्तगतो हि सः॥ २२<br><br>निराशस्त्यक्तसन्देहः शैवमाप परं पदम्।<br>हिमाद्रेर्दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्॥ २३ | उन पुत्रवत्सल ऋषभने भरतका राज्याभिषेक करके ज्ञान-वैराग्यका आश्रय लेकर सर्परूप इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करके परमात्मा ईश्वरको पूर्णरूपसे अपनेमें स्थापितकर [स्वयं] दिगम्बर, जटाधारी, वल्कलधारी तथा निराहार होकर वनमें प्रवेश किया। उन्होंने [समस्त] आशाओंसे रहित तथा सन्देहमुक्त होकर शिवका परम पद प्राप्त किया॥ २१-२२ १/२॥<br><br>उन्होंने हिमालय पर्वतके दक्षिणमें स्थित वर्ष भरतको प्रदान किया था, इसीलिये विद्वान् लोग उनके नामसे उसे भारतवर्ष कहते हैं॥ २३ १/२॥ |
| तस्मात्तु भारतं वर्षं तस्य नाम्ना विदुर्बुधाः।<br>भरतस्यात्मजो विद्वान् सुमतिर्नाम धार्मिकः॥ २४<br><br>बभूव तस्मिंस्तद्राज्यं भरतः सन्यवेशयत्।<br>पुत्रसङ्क्रामितश्रीको वनं राजा विवेश सः॥ २५ | भरतके सुमति नामक विद्वान् तथा धार्मिक पुत्र हुए। भरतने वह राज्य उन्हें सौंप दिया। पुत्रको राज्य प्रदान करके वे राजा [भरत] वनमें प्रविष्ट हुए॥ २४-२५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भरतवर्षकथनं नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भरतवर्षकथन' नामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४७॥
अड़तालीसवाँ अध्याय
भूमध्यमें स्थित मेरु (सुमेरु) पर्वत और इन्द्र आदि लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन
| सूत उवाच | |
|---|---|
| अस्य द्वीपस्य मध्ये तु मेरुर्नाम महागिरिः।<br>नानारत्नमयैः शृङ्गैः स्थितः स्थितिमतां वरः॥ १ | **सूतजी बोले—**इस द्वीपके मध्यमें मेरु नामक महान् पर्वत है। पर्वतोंमें श्रेष्ठ यह अनेक प्रकारके रत्नोंसे पूर्ण शिखरोंसे युक्त होकर स्थित है॥ १॥ |
| चतुराशीतिसाहस्रमुत्सेधेन प्रकीर्तितः।<br>प्रविष्टः षोडशाधस्ताद्विस्तृतः षोडशैव तु॥ २ | यह चौरासी हजार योजन ऊँचाईवाला कहा गया है। यह सोलह हजार योजन पृथिवीके नीचे प्रविष्ट है और सोलह हजार योजन ही फैला हुआ है। |
अध्याय ४८ ] भूमध्यमें स्थित मेरु ( सुमेरु ) पर्वत और इन्द्र आदि लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन २०९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शराववत्संस्थितत्वाद् द्वात्रिंशन्मूर्ध्नि विस्तृतः।<br>विस्तारात्त्रिगुणश्चास्य परिणाहोऽनुमण्डलः॥ ३ | यह एक चौड़े शराव (कसोरा)-के समान स्थित है और बत्तीस हजार योजन चोटीपर फैला हुआ है। इसका घेरा इसके विस्तारसे तीन गुना है॥ २-३॥ |
| हैमीकृतो महेशस्य शुभाङ्गस्पर्शनेन च।<br>धत्तूरपुष्पसङ्काशः सर्वदेवनिकेतनः॥ ४ | यह महेश्वरके शुभ शरीरके स्पर्शसे सुवर्णका हो गया है। यह धतूरेके पुष्पके समान आभावाला, सभी देवताओंका निवासस्थान तथा देवताओंकी क्रीड़ाभूमि है और अनेक आश्चर्योंसे भरा हुआ है॥ ४ १/२॥ |
| क्रीडाभूमिश्च देवानामेकाश्चर्यसंयुतः।<br>लक्षयोजन आयामस्तस्यैवं तु महागिरेः॥ ५<br><br>ततः षोडशसाहस्रं योजनानि क्षितेरधः।<br>शेषञ्चोपरि विप्रेन्द्रा धरायास्तस्य शृङ्गिणः॥ ६<br><br>मूलायामप्रमाणं तु विस्तारान्मूलतो गिरेः।<br>ऊर्ध्वविस्तारमस्यैव द्विगुणं मूलतो गिरेः॥ ७ | इस महान् पर्वतका आयाम एक लाख योजन है। पृथ्वीके नीचे यह सोलह हजार योजनतक है और हे विप्रेन्द्रो! उस पर्वतका शेष भाग पृथ्वीके ऊपर है। इस पर्वतके मूलके आयाम (दैर्घ्य)-का प्रमाण विस्तारमें है; उसके विस्तारको पर्वतके मूलसे दुगुना कहा गया है॥ ५-७॥ |
| पूर्वतः पद्मरागाभो दक्षिणे हेमसंन्निभः।<br>पश्चिमे नीलसङ्काश उत्तरे विद्रुमप्रभः॥ ८ | यह पूर्वमें पद्मरागकी आभाके समान, दक्षिणमें स्वर्णके समान, पश्चिममें नीलमणिके समान और उत्तरमें मूँगेके समान है॥ ८॥ |
| अमरावती पूर्वभागे नानाप्रासादसङ्कुला।<br>नानादेवगणैः कीर्णा मणिजालसमावृता॥ ९<br><br>गोपुरैर्विविधाकारैर्हेमरत्नविभूषितैः ।<br>तोरणैर्हेमचित्रैस्तु मणिक्लृप्तैः पथि स्थितैः॥ १०<br><br>सँल्लापालापकुशलैः सर्वाभरणभूषितैः।<br>स्तनभारविनम्रैश्च मदघूर्णितलोचनैः॥ ११<br><br>स्त्रीसहस्रैः समाकीर्णा चाप्सरोभिः समन्ततः।<br>दीर्घिकाभिर्विचित्राभिः फुल्लाम्भोरुहसङ्कुलैः॥ १२<br><br>हेमसोपानसंयुक्तैर्हेमसैकतराशिभिः ।<br>नीलोत्पलैश्चोत्पलैश्च हैमैश्चापि सुगन्धिभिः॥ १३<br><br>एवंविधैस्तटाकैश्च नदीभिश्च नदैर्युता।<br>विराजते पुरी शुभ्रा तयासौ पर्वतः शुभः॥ १४ | इसके पूर्वभागमें अमरावती (इन्द्रपुरी) है, जो अनेक प्रकारके महलोंसे युक्त, अनेक देवताओंसे भरी हुई और मणिमय जालोंसे घिरी हुई है। यह विविध आकारवाले तथा स्वर्ण एवं रत्नोंसे विभूषित गोपुरों, सोने तथा मणियोंके बने हुए अद्भुत तोरणों, राजमार्गपर स्थित-वार्तालापमें प्रवीण-सभी आभूषणोंसे अलंकृत-स्तनके भारसे झुकी हुई एवं मदके कारण घूर्णित नेत्रोंवाली हजारों स्त्रियोंसे भरी और चारों ओरसे अप्सराओंसे घिरी हुई है। यह विचित्र बावलियोंसे युक्त है। यह खिले हुए कमलोंसे सुशोभित, स्वर्णकी बनी हुई सीढ़ियोंवाले, स्वर्णमय बालुओंवाले, नीलकमलों तथा अन्य प्रकारके कमलोंसे शोभायमान, सुगन्धित नील कमलों एवं स्वर्णकमलोंवाले इस प्रकारके सरोवरोंसे तथा नदियों और नदोंसे युक्त यह सुन्दर पुरी [अत्यन्त] शोभित है। उस पुरीसे यह सुन्दर पर्वत भी सुशोभित होता है॥ ९-१४॥ |
| तेजस्विनी नाम पुरी आग्नेय्यां पावकस्य तु।<br>अमरावतीसमा दिव्या सर्वभोगसमन्विता॥ १५ | इस पर्वतके आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) भागमें अग्निदेवकी तेजस्विनी नामक पुरी है। यह अमरावतीतुल्य, दिव्य तथा समस्त भोगोंसे परिपूर्ण है॥ १५॥ |
| २१० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वैवस्वती दक्षिणे तु यमस्य यमिनां वराः।<br>भवनैरावृता दिव्यैर्जाम्बूनदमयैः शुभैः॥ १६ | हे व्रतियोंमें श्रेष्ठ मुनिगण! इसके दक्षिणमें यमकी उत्तम वैवस्वती नामक पुरी है। यह सुवर्णमय, दिव्य तथा शुभ भवनोंसे घिरी हुई है॥ १६॥ |
| नैर्ऋते कृष्णवर्णा च तथा शुद्धवती शुभा।<br>तादृशी गन्धवन्ती च वायव्यां दिशि शोभना॥ १७ | इसके नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम)-में कृष्णवर्णकी सुन्दर शुद्धवतीपुरी है और वायव्य (पश्चिम-उत्तर) दिशामें उसी प्रकारकी सुन्दर पुरी गन्धवती है। इसके उत्तरमें महोदया तथा ईशान (उत्तर-पूर्व)-में यशोवती नामक पुरी है। इस प्रकार मेरु पर्वतकी सभी दिशाओंमें द्युलोकमें पुरियाँ सर्वदा सुशोभित रहती हैं॥ १७-१८॥ |
| महोदया चोत्तरे च ऐशान्यां तु यशोवती।<br>पर्वतस्य दिगन्तेषु शोभते दिवि सर्वदा॥ १८ | |
| ब्रह्मविष्णुमहेशानां तथान्येषां निकेतनम्।<br>सर्वभोगयुतं पुण्यं दीर्घिकाभिर्नगोत्तमम्॥ १९ | यह पर्वत ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा अन्य देवताओंका निवासस्थान है। यह समस्त सुख-साधनोंसे सम्पन्न, पुण्यमय, अनेक झीलों और उत्तम वृक्षोंसे युक्त है। यह सिद्धों, यक्षों, गन्धर्वों, श्रेष्ठ मुनियों एवं विविध आकारवाले चारों प्रकारके प्राणियोंसे परिपूर्ण है॥ १९-२०॥ |
| सिद्धैर्यक्षैस्तु सम्पूर्णं गन्धर्वैर्मुनिपुङ्गवैः।<br>तथान्यैर्विविधाकारैर्भूतसङ्घैश्चतुर्विधैः ॥ २० | |
| गिरेरुपरि विप्रेन्द्राः शुद्धस्फटिकसन्निभम्।<br>सहस्रभौमं विस्तीर्णं विमानं वामतः स्थितम्॥ २१ | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इस पर्वतके ऊपर शुद्ध स्फटिकके समान, हजार मण्डपोंसे युक्त तथा विस्तृत विमान बायीं ओर स्थित हैं। विशाल भुजाओंवाले तथा चन्द्र-सूर्य-अग्निरूप नेत्रोंवाले शिव उसमें मणिमय सिंहासनपर पार्वती-देवी तथा कार्तिकेयके साथ विराजमान रहते हैं॥ २१-२२॥ |
| तस्मिन् महाभुजः शर्वः सोमसूर्याग्निलोचनः।<br>सिंहासने मणिमये देव्यास्ते षण्मुखेन च॥ २२ | |
| हरेस्तदर्धं विस्तीर्णं विमानं तत्र सोऽपि च।<br>पद्मरागमयं दिव्यं पद्मजस्य च दक्षिणे॥ २३ | वहाँ विष्णुका भी विमान है, जो उन शिवके विमानके आधे विस्तारवाला है और दक्षिणमें पद्मयोनि ब्रह्माका पद्मरागमय दिव्य विमान है॥ २३॥ |
| तस्मिन् शक्रस्य विपुलं पुरं रम्यं यमस्य च।<br>सोमस्य वरुणस्याथ निर्ऋतेः पावकस्य च॥ २४ | उस मेरुपर शिवके भवनके चारों ओर इन्द्र, यम, चन्द्रमा, वरुण, निर्ऋति, पावक, वायु और रुद्रका विशाल तथा सुन्दर पुर है। विविध दिव्य विमानोंमें अन्य लोगोंका निवास है। उस ईश्वरक्षेत्र (शिवविमान)-में ईशानदिशामें नित्य पूजा होती रहती है। वहाँ भगवान् नन्दी सिद्धेश्वरोंके साथ रहते हैं और शिष्योंसहित सुरेश्वर सनत्कुमार सिद्धोंके साथ सुखपूर्वक आसीन रहते हैं। इसी प्रकार सनक, सनन्द और उन्हींके समान अन्य हजारों लोग विराजमान रहते हैं॥ २४-२७॥ |
| वायोश्चैव तु रुद्रस्य सर्कालयसमन्ततः।<br>तेषां तेषां विमानेषु दिव्येषु विविधेषु च॥ २५ | |
| ईशान्यामीश्वरक्षेत्रे नित्यार्चा च व्यवस्थिता।<br>सिद्धेश्वरैश्च भगवाँच्छैलादिः शिष्यसम्मतः॥ २६ | |
| सनत्कुमारः सिद्धैस्तु सुखासीनः सुरेश्वरः।<br>सनकश्च सनन्दश्च सदृशाश्च सहस्रशः॥ २७ | |
| योगभूमिः क्वचित्त्तस्मिन् भोगभूमिः क्वचित्क्वचित्।<br>बालसूर्यप्रतीकाशं विमानं तत्र शोभनम्॥ २८ | उस पर्वतपर कहीं-कहीं योगभूमि है और कहीं- |
४९- जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन, वहाँके कुलपर्वतों, नदियों, वनों तथा वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन
अध्याय ४९] जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन...वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन २११
| शैलादिनः शुभं चास्ति तस्मिन्नास्ते गणेश्वरः।<br>षण्मुखस्य गणेशस्य गणानां तु सहस्रशः॥ २९<br><br>सुयशायाः सुनेत्रायाः मातृणां मदनस्य च।<br>तस्य जम्बूनदी नाम मूलमावेष्ट्य संस्थिता॥ ३०<br><br>तस्य दक्षिणपार्श्वे तु जम्बूवृक्षः सुशोभनः।<br>अत्युच्छ्रितः सुविस्तीर्णः सर्वकालफलप्रदः॥ ३१<br><br>मेरोः समन्ताद्विस्तीर्णं शुभं वर्षमिलावृतम्।<br>तत्र जम्बूफलाहाराः केचिच्चामृतभोजनाः॥ ३२<br><br>जाम्बूनदसमप्रख्या नानावर्णाश्च भोगिनः।<br>मेरुपादाश्रितो विप्रा द्वीपोऽयं मध्यमः शुभः॥ ३३<br><br>नववर्षान्वितश्चैव नदीनदगिरीश्वरैः।<br>नववर्षं तु वक्ष्यामि जम्बूद्वीपं यथातथम्॥ ३४<br><br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव योजनैश्च निबोधत॥ ३५। | कहीं भोगभूमि है। वहाँ उगते हुए सूर्यके सदृश, सुन्दर तथा शुभ विमान है, उसमें वे गणेश्वर विराजमान रहते हैं। वहाँ छः मुखोंवाले कार्तिकेय, गणेश, हजारों गणों, सुयशा तथा सुनेत्रा—इन पार्वतीकी सखियों, सभी माताओं तथा मदन (कामदेव)-के भी विमान हैं॥ २८-२९¹/₂॥<br><br>उस पर्वतके मूलको चारों ओरसे घेरकर जम्बू नामक नदी प्रवाहित होती है। उसके दक्षिण भागमें अत्यन्त सुन्दर, बहुत ऊँचा, अतिविस्तृत तथा सभी समयोंमें फल प्रदान करनेवाला जम्बूवृक्ष है॥ ३०-३१॥<br><br>मेरु पर्वतके चारों ओर इलावृत नामक विस्तृत तथा सुन्दर वर्ष (देश) है। वहाँपर लोग जम्बूफलका आहार करनेवाले हैं और कुछ लोग अमृतका आहार करनेवाले हैं। वहाँके लोग स्वर्णके समान आभावाले तथा अन्य वर्णोंवाले भी हैं और [सब प्रकारके] सुखोंको भोगनेवाले हैं। हे विप्रो! यह द्वीप मेरुके मूलके चारों ओर फैला हुआ, सुन्दर, मध्यमें स्थित, नौ वर्षोंसे युक्त और नदियों-नदों तथा महान् पर्वतोंसे समन्वित है। अब मैं नौ वर्षोंसे युक्त जम्बूद्वीपका यथार्थ वर्णन करूँगा; योजनोंमें इसके विस्तार, मण्डल आदिको [आपलोग] सुनिये॥ ३२-३५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे मेरुगिरिवर्णनं नामाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'मेरुगिरिवर्णन' नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४८॥
उनचासवाँ अध्याय
जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन, वहाँके कुलपर्वतों, नदियों, वनों तथा वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन
| सूत उवाच<br>शतमेकं सहस्त्राणां योजनानां स तु स्मृतः।<br>अनुद्वीपं सहस्त्राणां द्विगुणं द्विगुणोत्तरम्॥ १<br><br>पञ्चाशत्कोटिविस्तीर्णा ससमुद्रा धरा स्मृता।<br>द्वीपैश्च सप्तभिर्युक्ता लोकालोकावृता शुभा॥ २<br><br>नीलस्तथोत्तरे मेरोः श्वेतस्तस्योत्तरे पुनः।<br>शृङ्गी तस्योत्तरे विप्रास्त्रयस्ते वर्षपर्वताः॥ ३ | **सूतजी बोले—**यह द्वीप एक लाख योजन विस्तृत कहा गया है। इसके समीपमें स्थित प्लक्ष नामक द्वीप उसका दुगुना है और बादवाले द्वीप क्रमशः दुगुने विस्तारवाले हैं॥ १॥<br><br>समुद्रोंसहित यह पृथ्वी पचास करोड़ योजन विस्तृत है। यह सात द्वीपोंसे युक्त, लोकालोक पर्वतसे घिरी हुई तथा [अत्यन्त] सुन्दर है॥ २॥<br><br>हे विप्रो! मेरुके उत्तरमें नील पर्वत, उसके उत्तरमें श्वेत पर्वत और पुनः उसके उत्तरमें शृंगी पर्वत है; वे |
२१२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| तीनों वर्षपर्वत हैं॥ ३॥ | |
|---|---|
| जठरो देवकूटश्च पूर्वस्यां दिशि पर्वतौ।<br>निषधो दक्षिणे मेरोस्तस्य दक्षिणतो गिरिः।<br>हेमकूट इति ख्यातो हिमवांस्तस्य दक्षिणे॥ ४<br>मेरोः पश्चिमतश्चैव पर्वतौ द्वौ धराधरो।<br>माल्यवान् गन्धमादश्च द्वावेतावुद्गायतो॥ ५ | इसके पूर्वमें जठर तथा देवकूट पर्वत हैं। मेरुके दक्षिणमें निषध पर्वत है। उसके दक्षिणमें हेमकूट पर्वत कहा गया है और उसके दक्षिणमें हिमवान् पर्वत है। मेरुके पश्चिममें माल्यवान् एवं गन्धमादन नामक दो पर्वत हैं; ये दोनों पर्वत उत्तरकी ओर फैले हुए हैं॥ ४-५॥ |
| एते पर्वतराजानः सिद्धचारणसेविताः।<br>तेषामन्तरविष्कम्भो नवसाहस्रमेकशः॥ ६<br>इदं हैमवतं वर्षं भारतं नाम विश्रुतम्।<br>हेमकूटं परं तस्मान्नाम्ना किम्पुरुषं स्मृतम्॥ ७<br>नैषधं हेमकूटात्तु हरिवर्षं तदुच्यते।<br>हरिवर्षात्परं चैव मेरोः शुभमिलावृतम्॥ ८<br>इलावृतात्परं नीलं रम्यकं नाम विश्रुतम्।<br>रम्यात्परतरं श्वेतं विख्यातं तद्धिरण्मयम्॥ ९<br>हिरण्मयात्परं चापि शृङ्गी चैव कुरुः स्मृतः।<br>धनुःसंस्थे तु विज्ञेये द्वे वर्षे दक्षिणोत्तरे॥ १० | ये पर्वतराज सिद्धों तथा चारणोंसे सेवित हैं और उनके बीचमें नौ हजार योजनका अन्तर है। हिमवान्का वर्ष भारतवर्ष नामवाला कहा गया है; उसके बाद हेमकूट और उसके परे किम्पुरुष वर्ष कहा गया है। हेमकूटसे परे नैषध है, उसके परे हरिवर्ष कहा गया है। हरिवर्ष और मेरुसे परे शुभ इलावृत है। इलावृतसे परे नील एवं रम्यक् कहे गये हैं। रम्यक्से परे श्वेत है, उसके परे हिरण्मय नामक वर्ष कहा गया है। हिरण्मयसे परे शृङ्गी पर्वत है और उसके परे कुरुवर्ष कहा गया है। धनुषके आकारवाले इन दोनों वर्षोंको दक्षिण तथा उत्तरमें स्थित जानना चाहिये॥ ६-१०॥ |
| दीर्घाणि तत्र चत्वारि मध्यतस्तदिलावृतम्।<br>मेरोः पश्चिमपूर्वेण द्वे तु दीर्घेतरे स्मृते॥ ११<br>अर्वाक्तु निषधस्याथ वेद्यर्धं चोत्तरं स्मृतम्।<br>वेद्यर्धे दक्षिणे त्रीणि वर्षाणि त्रीणि चोत्तरे॥ १२ | अन्य चार बड़े वर्ष हैं। मध्यमें इलावृत है। मेरुके पश्चिम-पूर्वमें दो वर्ष हैं, जो छोटे कहे गये हैं। निषधके बाद वेदीका अर्धभाग उत्तर माना गया है, वेदीके अर्ध भागमें दक्षिणमें तीन वर्ष और उत्तर भागमें भी तीन वर्ष माने गये हैं॥ ११-१२॥ |
| तयोर्मध्ये च विज्ञेयं मेरुमध्यमिलावृतम्।<br>दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु॥ १३<br>उद्गायतो महाशैलो माल्यवान्नाम पर्वतः।<br>योजनानां सहस्रे द्वे उपरिष्टात्तु विस्तृतः॥ १४<br>आयामतश्चतुस्त्रिंशत्सहस्राणि प्रकीर्तितः। | नीलके दक्षिण तथा निषधके उत्तरमें उन दोनोंके बीच मेरुके मध्य इलावृतवर्षको जानना चाहिये। माल्यवान् नामक महापर्वत उत्तरकी ओर फैला हुआ है। यह ऊपरकी ओर दो हजार योजन फैला है। इसका आयाम चौंतीस हजार योजन बताया गया है॥ १३-१४ १/२॥ |
| तस्य प्रतीच्यां विज्ञेयः पर्वतो गन्धमादनः॥ १५<br>आयामतः स विज्ञेयो माल्यवानिव विस्तृतः।<br>जम्बूद्वीपस्य विस्तारात्समेन तु समन्ततः॥ १६<br>प्रागायताः सुपर्वाणः षडेते वर्षपर्वताः।<br>अवगाढाश्चोभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ॥ १७ | उसके पश्चिममें गन्धमादन पर्वतको जानना चाहिये। उसे आयाममें माल्यवान्के समान विस्तृत समझना चाहिये। जम्बूद्वीपके विस्तारसे चारों ओर यह पर्वत बराबर फैला है। अच्छे पर्वोंवाले ये छः वर्षपर्वत पूर्वकी ओर फैले हुए हैं और पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्रोंसे दोनों ओरसे बँधे हुए हैं॥ १५-१७॥ |
| हिमप्रायस्तु हिमवान् हेमकूटस्तु हेमवान्।<br>तरुणादित्यसङ्काशो हैरण्यो निषधः स्मृतः॥ १८ | हिमवान् सदा बर्फसे आच्छादित रहता है। हेमकूट |
अध्याय ४९] जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन...वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन [२१३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चतुर्वर्णः स सौवर्णो मेरुश्चोध्र्वायतः स्मृतः।<br>वृत्ताकृतिपरीणाहश्चतुरस्रः समुत्थितः॥ १९<br><br>नीलश्च वैडूर्यमयः श्वेतः शुक्लो हिरण्मयः।<br>मयूरबर्हवर्णस्तु शातकुम्भस्त्रिशृङ्गवान्॥ २० | स्वर्णयुक्त है। निषध पर्वत मध्याह्नकालीन सूर्यके समान स्वर्णमय कहा गया है। चार वर्णोंवाला वह सुवर्णमय मेरु पर्वत ऊपरकी ओर फैला हुआ बताया गया है। यह परिधिमें वृत्ताकार है और चौकोर ऊँचा उठा हुआ है। नील पर्वत वैडूर्यमय है। श्वेत पर्वत शुक्लवर्णवाला है एवं स्वर्णसे पूर्ण रहता है। तीन चोटियोंवाला शृंगी पर्वत सुवर्णमय तथा मोरके पंखके रंगका है॥ १८—२०॥ |
| एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्ताः पुनः शृणु गिरीश्वरान्।<br>मन्दरो देवकूटश्च पूर्वस्यां दिशि पर्वतौ॥ २१<br><br>कैलासो गन्धमादश्च हेमवांश्चैव पर्वतौ।<br>पूर्वतश्चायतौवेतावर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥ २२<br><br>निषधः पारियात्रश्च द्वावेतौ वरपर्वतौ।<br>यथा पूर्वौ तथा याम्यावेतौ पश्चिमतः श्रितौ॥ २३<br><br>त्रिशृङ्गो जारुचिश्चैव उत्तरौ वरपर्वतौ।<br>पूर्वतश्चायतौवेतावर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥ २४<br><br>मर्यादापर्वतानेतानष्टावाहुर्मनीषिणः । | इस प्रकार पर्वतोंका वर्णन कर दिया गया, अब श्रेष्ठ पर्वतोंके विषयमें सुनिये। मन्दर तथा देवकूट पर्वत पूर्व दिशामें है। कैलास एवं स्वर्णमय गन्धमादन—ये दोनों पर्वत पूर्वकी ओर फैले हुए हैं और उनका अन्त समुद्रके भीतर होता है। निषध तथा पारियात्र—ये दोनों श्रेष्ठ पर्वत पश्चिमसे पूर्व तथा दक्षिणमें स्थित हैं। त्रिशृंग एवं जारुचि—ये दोनों महापर्वत उत्तरमें हैं तथा पूर्वकी ओर फैले हैं और समुद्रके भीतर व्यवस्थित हैं। विद्वान् लोग इन आठों पर्वतोंको मर्यादापर्वत कहते हैं॥ २१—२४ १/२॥ |
| योऽसौ मेरुर्द्विजश्रेष्ठाः प्रांशुः कनकपर्वतः॥ २५<br><br>तस्य पादास्तु चत्वारश्चतुर्दिक्षु नगोत्तमाः।<br>यैर्विष्टब्धा न चलति सप्तद्वीपवती मही॥ २६<br><br>दशयोजनसाहस्रमायामस्तेषु पठ्यते। | हे श्रेष्ठ द्विजो! मेरु नामक जो पर्वत है, वह ऊँचा स्वर्णमय पर्वत है। उसके चार चरणोंके रूपमें उसके चारों दिशाओंमें बड़े-बड़े चार उत्तम पर्वत हैं, जिनसे सहारा प्राप्त की हुई सात द्वीपवाली पृथ्वी हिलती नहीं है। उनका आयाम दस हजार योजन कहा गया है॥ २५-२६ १/२॥ |
| पूर्वे तु मन्दरो नाम दक्षिणे गन्धमादनः॥ २७<br><br>विपुलः पश्चिमे पार्श्वे सुपार्श्वश्चोत्तरे स्मृतः।<br>महावृक्षाः समुत्पन्नाश्चत्वारो द्वीपकेतवः॥ २८<br><br>मन्दरस्य गिरेः शृङ्गे महावृक्षः स केतुराट्।<br>प्रलम्बशाखाशिखरः कदम्बश्चैत्यपादपः॥ २९ | पूर्वमें मन्दर, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिम भागमें विपुल और उत्तरमें सुपार्श्व नामक पर्वत कहा गया है। इनपर चार विशाल वृक्ष उगे हुए हैं, जो द्वीपके पताकातुल्य प्रतीत होते हैं। मन्दर पर्वतकी चोटीपर कदम्बका विशाल वृक्ष है। वह पताकाओंका राजा है और वह लम्बी लटकती हुई शाखाओंवाला है। यह कदम्बवृक्ष चैत्यपादप (पवित्र स्थानमें लगे वृक्ष)-के रूपमें प्रतिष्ठित है॥ २७—२९॥ |
| दक्षिणस्यापि शैलस्य शिखरे देवसेविता।<br>जम्बूः सदा पुण्यफला सदा माल्योपशोभिता॥ ३०<br><br>सकेतुर्दक्षिणे द्वीपे जम्बूर्लोकेषु विश्रुता।<br>विपुलस्यापि शैलस्य पश्चिमे च महात्मनः॥ ३१ | दक्षिणमें स्थित [गन्धमादन] पर्वतके शिखरपर सदा देवताओंसे सेवित पवित्र फलोंसे सम्पन्न तथा पुष्पोंसे सुशोभित जम्बूवृक्ष है। यह जम्बूवृक्ष दक्षिण द्वीपमें पताकाके रूपमें है और सभी लोकोंमें प्रसिद्ध है॥ ३० १/२॥ |