श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४७६ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| क्षेत्रस्यास्य च माहात्म्यमविमुक्तस्य शङ्करः।<br>उक्तवान् परमेशानः पार्वत्याः प्रीतये भवः॥ ११॥ | (आनन्दकानन)-को दिखाया। भगवान् परमेश्वर शंकरने पार्वतीकी प्रसन्नताके लिये इस अविमुक्तक्षेत्रके माहात्म्यका वर्णन किया॥ ५-११॥ |
| प्रफुल्लनानाविधगुल्मशोभितं लताप्रतानादिमनोहरं बहिः।<br>विरूढपुष्पैः परितः प्रियङ्गुभिः सुपुष्पितैः कण्टकितैश्च केतकैः॥ १२<br>तमालगुल्मैर्निचितं सुगन्धिभि-र्णिकामपुष्पैर्बकुलैश्च सर्वतः।<br>अशोकपुन्नागशतैः सुपुष्पितै-र्द्विरेफमालाकुलपुष्पसञ्चयैः ॥ १३ | वह उद्यान अनेक प्रकारके विकसित गुल्मोंसे सुशोभित था, बाहरसे लता-शाखाओं आदिसे अत्यन्त मनोहर था और विरूढ़ पुष्पोंवाले प्रियंगुसे तथा पूर्ण रूपसे खिले हुए काँटेदार केतकीवृक्षोंसे युक्त था। वह सुगन्धसे युक्त तमालके गुच्छोंसे घिरा हुआ था, अत्यधिक पुष्पोंवाले बकुलके वृक्षोंसे सभी ओरसे सुशोभित था और भौरोंकी पंक्तियोंसे शोभायमान तथा खिले हुए पुष्पोंवाले सैकड़ों अशोक एवं पुन्नागके वृक्षोंसे युक्त था॥ १२-१३॥ |
| क्वचित्प्रफुल्लाम्बुजरेणुभूषितै-र्विहङ्गमैश्चानुकलप्रणादिभिः ।<br>विनादितं सारसचक्रवाकैः प्रमत्तदात्यूहवरैश्च सर्वतः॥ १४ | वह उद्यान कहीं विकसित कमलोंके परागसे भूषित पक्षियों सारस, चक्रवाक तथा उन्मत्त श्रेष्ठ पपीहा नामक पक्षियोंकी मधुर ध्वनियोंसे सभी ओर विशेष रूपसे गुंजित था॥ १४॥ |
| क्वचिच्च केकारुतनादितं शुभं क्वचिच्च कारण्डवनादनादितम्।<br>क्वचिच्च मत्तालिकुलाकुलीकृतं मदाकुलाभिर्भ्रमराङ्गनादिभिः ॥ १५ | वह सुन्दर उद्यान कहीं-कहीं मयूरोंकी ध्वनिसे निनादित था, कहीं-कहीं कारण्डव पक्षीकी ध्वनिसे शब्दायमान था और कहीं-कहीं मत्त भ्रमर-समूहोंसे तथा मदसे आकुल भ्रमरांगनाओंसे गुंजायमान था॥ १५॥ |
| निषेवितं चारुसुगन्धिपुष्पकैः क्वचित्सुपुष्पैः सहकारवृक्षैः।<br>लतोपगूढैस्तिलकैश्च गूढं प्रगीतविद्याधरसिद्धचारणम् ॥ १६ | वह उद्यान कहीं-कहीं अति सुगन्धित पुष्पोंसे युक्त था, कहीं-कहीं सुन्दर पुष्पोंसे लदे हुए आमके वृक्षोंसे सुशोभित था, लताओंसे परिपूर्ण तिलक वृक्षोंसे समन्वित था और विद्याधरों-सिद्धों तथा चारणोंके गायनसे युक्त था॥ १६॥ |
| प्रवृत्तनृत्तानुगताप्सरोगणं प्रहृष्टनानाविधपक्षिसेवितम् ।<br>प्रवृत्तहारीतकुलोपनादितं मृगेन्द्रनादाकुलमत्तमानसैः ॥ १७<br>क्वचित्क्वचिद्गन्धकदम्बकैर्मृगै-र्विलूनदर्भाङ्कुरपुष्पसञ्चयम् ।<br>प्रफुल्लनानाविधचारुपङ्कजैः सरस्तडागैरुपशोभितं क्वचित्॥ १८ | वहाँ अप्सराओंका समूह नृत्य करनेमें लीन था, अनेक प्रकारके प्रसन्न पक्षी वहाँ निवास करते थे, वह उद्यान नृत्य करते हुए हारीत पक्षियोंके समुदायोंसे निनादित था। वह कहीं-कहीं सिंहोंके नादसे आकुल तथा मत्त मनवाले कस्तूरीमृग-समुदायोंसे चरे गये दर्भांकुरों तथा पुष्पोंसे सुशोभित था और कहीं-कहीं अनेकविध विकसित सुन्दर कमलोंसे युक्त सरोवरों तथा तड़ागोंसे सुशोभित था॥ १७-१८॥ |
| विटपनिचयलीनं नीलकण्ठाभिरामं मदमुदितविहङ्गं प्राप्तनादाभिरामम्।<br>कुसुमिततरुशाखालीनमत्तद्विरेफं नवकिसलयशोभाशोभितं प्रांशुशाखम्॥ १९ | वह उद्यान वृक्षोंके समुदायोंसे सम्पन्न था, नीलकण्ठ पक्षियोंके द्वारा सुन्दर प्रतीत होता था, प्रसन्न मनवाले |
| अध्याय ९२ ] | अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन | ४७७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| क्वचिच्च दन्तक्षतचारुवीरुधं<br>क्वचिल्लतालिङ्गितचारुवृक्षकम् ।<br>क्वचिद्विलासालसगामिनीभि-<br>र्निषेवितं किम्पुरुषाङ्गनाभिः॥ २० | पक्षियोंसे युक्त था, [सभी ओर] ध्वनि होनेसे यह अति सुन्दर था, खिले हुए पुष्पोंवाले वृक्षोंकी शाखाओंमें विद्यमान मस्त भौरोंसे सुशोभित था, नूतन कलियोंकी सुन्दरतासे सुशोभित था और ऊँची-ऊँची शाखाओंसे युक्त था ॥ १९ ॥<br><br>वह उद्यान कहीं-कहीं दाँतोंसे क्षत की गयी सुन्दर लताओंसे सुशोभित था, कहीं-कहीं लताओंसे वेष्टित वृक्षोंसे मण्डित था और कहीं-कहीं विलासके कारण मन्थर गतिवाली किंपुरुष अंगनाओंसे सेवित था ॥ २० ॥ |
| पारावतध्वनिविकूजितचारुशृङ्गै-<br>रभ्रङ्कषैः सितमनोहरचारुरूपैः।<br>आकीर्णपुष्यनिकरप्रविभक्तहंसै-<br>र्विभ्राजितं त्रिदशदिव्यकुलैरनेकः॥ २१<br><br>फुल्लोत्पलाम्बुजवितानसहस्रयुक्तं<br>तोयाशयैः समनुशोभितदेवमार्गम्।<br>मार्गान्तराकलितपुष्पविचित्रपंक्ति-<br>सम्बद्धगुल्मविटपैर्र्विविधैरुपेतम् ॥ २२ | वह उद्यान पारावत पक्षियोंकी ध्वनिसे निनादित तथा गगनचुम्बी शृंगोंवाले वृक्षोंसे, बिखरे हुए पुष्पसमूहोंको विभक्त कर देनेवाले श्वेत वर्णके मनोहर तथा सुन्दर रूपवाले हंसोंसे और अनेक देवताओंके दिव्य कुलोंसे सुशोभित है। वह विकसित नीलकमलके हजारों वितानोंसे युक्त है, जलाशयोंसे सुशोभित देवमार्गवाला है और मार्गके मध्यमें खिले हुए विचित्र पुष्पोंकी पंक्तिसे सम्बद्ध विविध गुल्मों तथा विटपोंसे समन्वित है॥ २१-२२॥ |
| तुङ्गाग्रैर्नीलपुष्पैस्तबकभरनतप्रांशुशाखैरशोकै-<br>र्दोलान्तान्तालीनश्रुतिसुखजनकैर्भासितान्तं मनोज्ञैः।<br>रात्रौ चन्द्रस्य भासा कुसुमिततिलकैरेकतां सम्प्रयातं<br>छायासुप्तप्रबुद्धस्थितहरिणकुलालुप्तदूर्वाङ्कुराग्रम् ॥ २३<br><br>हंसानां पक्षवातप्रचलितकमलस्वच्छविस्तीर्णतोयं<br>तोयानां तीरजातप्रचकितकदलीचाटुनृत्यन्मयूरम् ।<br>मायूरैः पक्षचन्द्रैः क्वचिदवनिगतैरञ्जितक्ष्माप्रदेशं<br>देशे देशे विलीनप्रमुदितविलसन् मत्तहारीतवृन्दम् ॥ २४ | उस वनका प्रान्तभाग तुंग अग्रभागवाले, नीलपुष्प-गुच्छोंके भारसे झुकी हुई ऊँची शाखाओंवाले, वायुके द्वारा आन्दोलित होनेपर कानोंको सुख देनेवाली ध्वनिसे भासित अन्तर्भागवाले मनोहर अशोक वृक्षोंसे युक्त है। वह रात्रिमें चन्द्रकी किरणोंसे कुसुमित तिलक वृक्षोंके साथ एकताको प्राप्त है और छायामें सोकर उठे हुए हरिणके समुदायके द्वारा चरे गये दूर्वांकुरोंके अग्रभागोंसे युक्त है। वह हंसोंके पंखोंकी वायुसे हिले हुए कमल तथा स्वच्छ और विस्तीर्ण जलसे समन्वित है, सरोवरोंके तटपर उत्पन्न तथा चकित कर देनेवाले कदलीपत्रोंकी चाटुकारितामें नाचते हुए मयूरोंसे युक्त है, कहीं पृथ्वीपर मयूरोंके पंखमें स्थित चन्दासे अलंकृत भूभागसे सुशोभित है और स्थान-स्थानपर छिपे हुए प्रमुदित, मत्त तथा क्रीड़ा करते हुए हारीत पक्षिसमूहोंसे सुशोभित है॥ २३-२४॥ |
| सारङ्गैः क्वचिदुपशोभितप्रदेशं<br>प्रच्छन्नं कुसुमचयैः क्वचिद्विचित्रैः।<br>हृष्टाभिः क्वचिदपि किन्नराङ्गनाभि-<br>र्वीणाभिः सुमधुरगीतनृत्तकण्ठम् ॥ २५ | वह उद्यान सारंग हरिणोंसे कहीं-कहीं सुशोभित भागवाला है, कहीं-कहीं विकसित पुष्पोंसे आच्छादित है। कहीं-कहीं प्रसन्नचित्त किन्नरांगनाओंके द्वारा बजायी गयी वीणाओंकी मधुर ध्वनि-गान-नृत्यसे सुशोभित है। |
| संस्पृष्टैः क्वचिदुपलिप्तकीर्णपुष्पै-<br>रावासैः परिवृतपादपं मुनीनाम्।<br>आमूलात्फलनिचितैः क्वचिद्विशालै-<br>रुत्तुङ्गैः पनसमहीरुहैरुपेतम्॥ २५-२६ | वह कहीं लीपी हुई, परस्पर सटी हुई तथा बिखरे पुष्पोंसे सुशोभित मुनियोंकी कुटियोंसे घिरे हुए वृक्षोंसे समन्वित है। वह कहीं जड़से ही फलोंसे लदे हुए, विशाल तथा ऊँचे कटहलके वृक्षोंसे व्याप्त है॥ २५-२६॥ |
|---|---|
| फुल्लातिमुक्तकलतागृहनीतसिद्ध-<br>सिद्धाङ्गनाकनकनूपुररावरम्यम् ।<br>रम्यं प्रियङ्गुतरुमञ्जरिसक्तभृङ्गं<br>भृङ्गावलीकवलिताम्रकदम्बपुष्पम् ॥ २७ | वह उद्यान पूर्णतः पुष्पित लतागृहोंमें ले जायी गयी सिद्धोंकी सिद्धांगनाओंके सुवर्णमय नूपुरकी ध्वनिसे रमणीय है, प्रियंगु वृक्षोंकी मंजरियोंपर मँडराते हुए भौंरोंसे सुशोभित है और भौंरोंकी पंक्तियोंसे आस्वादित आम्र तथा कदम्बके पुष्पोंसे समन्वित है॥ २७॥ |
| पुष्पोत्करानिलविधूर्णितवारिरम्यं<br>रम्यद्विरेफविनिपातितमञ्जुगुल्मम् ।<br>गुल्मान्तरप्रसभभीतमृगीसमूहं<br>वातेरितं तनुभृतामपवर्गदातृ॥ २८ | वह उद्यान पुष्पसमूहोंसे सुवासित वायुसे आन्दोलित जलाशयोंसे सुशोभित है, भौंरोंके द्वारा गिराये गये सुन्दर पुष्पोंके गुच्छोंसे युक्त है, वृक्षकुंजोंमें अत्यधिक डरी हुई हिरणियोंके झुण्डोंसे मण्डित है और वायुसे प्रेरित है। वह उद्यान मनुष्योंको मोक्ष देनेवाला है॥ २८॥ |
| चंद्रांशुजालशबलैस्तिलकैर्मनोज्ञैः<br>सिन्दूरकुङ्कुमकुसुम्भनिभैरशोकैः ।<br>चामीकरद्युतिसमैरथ कर्णिकारैः<br>पुष्पोत्करैरुपचितं सुविशालशाखैः॥ २९ | वह चन्द्रमाकी किरणोंके जालसे विविध रंगोंवाले मनोहर तिलकवृक्षोंसे युक्त है, सिन्दूर-कुंकुम तथा कुसुम्भ रंगकी आभावाले अशोक वृक्षोंसे युक्त है और सुवर्णकी कान्तिवाले, विशाल शाखाओंवाले तथा पुष्पोंसे लदे हुए कनेर वृक्षोंसे युक्त है॥ २९॥ |
| क्वचिदञ्जनचूर्णाभैः क्वचिद्विद्रुमसन्निभैः।<br>क्वचित्काञ्चनसङ्काशैः पुष्पैराचितभूतलम्॥ ३० | उस उद्यानकी भूमि कहीं-कहीं अंजनके चूर्णके समान आभावाले, कहीं विद्रुमके समान कान्तिवाले और कहीं सुवर्णसदृश प्रभाववाले पुष्पोंसे आच्छादित रहती थी॥ ३०॥ |
| पुन्नागेषु द्विजशतविरुतं<br>रक्ताशोकस्तबकभरनतम् ।<br>रम्योपान्तक्लमहरभवनं<br>फुल्लाब्जेषु भ्रमरविलसितम्॥ ३१ | उस उद्यानमें पुन्नागके वृक्षोंपर सैकड़ों पक्षियोंकी ध्वनि होती रहती थी, गुच्छोंके भारसे रक्त अशोकवृक्ष झुके रहते थे, रम्य सीमास्थलपर थकानको हरनेवाले भवन थे और खिले हुए कमलोंपर भौंरे मँडराते रहते थे॥ ३१॥ |
| सकलभुवनभर्ता लोकनाथस्तदानीं<br>तुहिनशिखरपुत्र्या सार्धमिष्टैर्गणेशैः।<br>विविधतरुविशालं मत्तहृष्टान्नपुष्टै-<br>रुपवनमतिरम्यं दर्शयामास देव्याः॥ ३२ | उस समय हिमालयपुत्री [पार्वती] और मत्त, प्रसन्न तथा शरीरसे पुष्ट प्रिय गणेश्वरोंके साथ विद्यमान सम्पूर्ण भवनोंके भर्ता शिवने अनेकविध विशाल वृक्षोंवाले अत्यन्त रम्य उपवनको देवीको दिखाया॥ ३२॥ |
| पुष्पैर्वन्यैः शुभ्रशुभतमैः कल्पितैर्दिव्यभूषै-<br>र्देवीं दिव्यामुपवनगतां भूषयामास शर्वः।<br>सा चाप्येनं तुहिनगिरिसुता शङ्करं देवदेवं<br>पुष्पैर्दिव्यैः शुभतरतमैर्भूषयामास भक्त्या॥ ३३ | शिवजीने अत्यन्त सुन्दर वन्य पुष्पोंसे बनाये गये दिव्य आभूषणोंसे उपवनमें गयी हुई दिव्य देवीको सजाया और उन पार्वतीने भी अत्यन्त सुन्दर दिव्य |
अध्याय ९२] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४७९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| — | पुष्पोंसे इन देवदेव शंकरको भक्तिपूर्वक अलंकृत किया॥ ३३॥ |
| सम्पूज्य पूज्यं त्रिदशेश्वराणां<br>सम्प्रेक्ष्य चोद्यानमतीव रम्यम्।<br>गणेश्वरैर्नन्दिमुखैश्च सार्ध-<br>मुवाच देवं प्रणिपत्य देवी॥ ३४ | तदनन्तर उस अत्यन्त रम्य उद्यानको देखकर नन्दी आदि गणेश्वरोंके साथ देवताओंके लिये पूज्य देव [शंकर]-की पूजा करके और उन्हें प्रणामकर देवी [पार्वती] कहने लगीं॥ ३४॥ |
| श्रीदेव्युवाच<br>उद्यानं दर्शितं देव प्रभया परया युतम्।<br>क्षेत्रस्य च गुणान् सर्वान् पुनर्मे वक्तुमर्हसि॥ ३५<br>अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्यमविमुक्तस्य सर्वथा।<br>वक्तुमर्हसि देवेश देवदेव वृषध्वज॥ ३६ | श्रीदेवी बोलीं—हे देव! आपने परम शोभासे युक्त उद्यानको मुझे दिखाया; अब आप इस क्षेत्रके समस्त गुणोंको मुझे बतानेकी कृपा करें। हे देवेश! हे देवदेव! हे वृषभध्वज! आप इस अविमुक्तक्षेत्रका माहात्म्य पूर्णरूपसे बतायें॥ ३५-३६॥ |
| सूत उवाच<br>देव्यास्तद्वचनं श्रुत्वा देवदेवो वरप्रभुः।<br>आघ्राय वदनाम्भोजं तदाह गिरिजां हसन्॥ ३७ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] तब देवीका वह वचन सुनकर देवदेव श्रेष्ठ प्रभु उनके मुखकमलको सूँघकर हँसते हुए पार्वतीसे कहने लगे॥ ३७॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>इदं गुह्यतमं क्षेत्रं सदा वाराणसी मम।<br>सर्वेषामेव जन्तूनां हेतुर्मोक्षस्य सर्वदा॥ ३८<br>अस्मिन् सिद्धाः सदा देवि मदीयं व्रतमास्थिताः।<br>नानालिङ्गधरा नित्यं मम लोकाभिकाङ्क्षिणः॥ ३९<br>अभ्यस्यन्ति परं योगं युक्तात्मानो जितेन्द्रियाः।<br>नानावृक्षसमाकीर्णे नानाविहगशोभिते॥ ४०<br>कमलोत्पलपुष्पाढ्यैः सरोभिः समलङ्कृते।<br>अप्सरोगणगन्धर्वैः सदा संसेविते शुभे॥ ४१ | श्रीभगवान् बोले—वाराणसी नामक यह मेरा नित्य गुह्यतम क्षेत्र है; यह सर्वदा सभी प्राणियोंके मोक्षका हेतु है। हे देवि! इस [क्षेत्र]-में सिद्ध लोग सदा मेरे व्रतमें स्थित रहते हैं और मेरे लोककी अभिलाषा करनेवाले लोग नित्य अनेकविध लिङ्गोंको धारण किये रहते हैं। अनेक प्रकारके वृक्षोंसे युक्त, अनेक प्रकारके पक्षियोंसे सुशोभित, कमल तथा उत्पलके पुष्पोंसे सम्पन्न सरोवरोंसे अलंकृत और अप्सराओं तथा गन्धर्वोंसे सेवित इस शुभ क्षेत्रमें युक्तात्मा जितेन्द्रिय लोग श्रेष्ठ योगका अभ्यास करते हैं॥ ३८-४१॥ |
| रोचते मे सदा वासो येन कार्येण तच्छृणु।<br>मन्मना मम भक्तश्च मयि नित्यार्पितक्रियः॥ ४२<br>यथा मोक्षमवाप्नोति अन्यत्र न तथा क्वचित्।<br>कामं ह्यत्र मृतो देवि जन्तुर्मोक्षाय कल्पते॥ ४३<br>एतन्मम पुरं दिव्यं गुह्याद् गुह्यतमं महत्।<br>ब्रह्मादयो विजानन्ति ये च सिद्धा मुमुक्षवः॥ ४४<br>अतः परमिदं क्षेत्रं परा चेयं गतिर्मम।<br>विमुक्तं न मया यस्मान्मोक्ष्यते वा कदाचन॥ ४५ | [हे देवि!] जिस कारणसे मुझे यहाँ निवास करना अच्छा लगता है, उसे सुनो। मुझमें अपने मनको स्थिर रखनेवाला तथा मुझमें सदा सभी क्रियाएँ अर्पित करनेवाला मेरा भक्त जिस प्रकारका मोक्ष यहाँ प्राप्त करता है, वैसा अन्यत्र कहीं भी नहीं। हे देवि! यहाँ मरनेवाला प्राणी मोक्ष प्राप्त करता है। मेरा यह पुर दिव्य, गुह्यसे भी गुह्यतम तथा महान् है—इसे ब्रह्मा आदि, सिद्धगण तथा मुक्तिके इच्छुक लोग जानते हैं। अतः यह परम क्षेत्र मेरी परम गति है। मैंने कभी भी इसका त्याग नहीं किया है और न तो कभी इसका त्याग करूँगा, अतः मेरा यह क्षेत्र अविमुक्त कहा गया |
| ४८० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| है॥ ४२-४५ ^{१}/_{२} ॥ | |
| मम क्षेत्रमिदं तस्मादविमुक्तमिति स्मृतम्।<br>नैमिषे च कुरुक्षेत्रे गङ्गाद्वारे च पुष्करे॥ ४६<br>स्नानात्संसेवनाद्वापि न मोक्षः प्राप्यते यतः।<br>इह सम्प्राप्यते येन तत एतद्विशिष्यते॥ ४७<br>प्रयागे वा भवेन्मोक्ष इह वा मत्परिग्रहात्।<br>प्रयागादपि तीर्थाग्र्यादविमुक्तमिदं शुभम्॥ ४८ | नैमिषारण्य, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार तथा पुष्करमें स्नान करने तथा वहाँ निवास करनेसे मोक्ष नहीं प्राप्त होता है, बल्कि यहाँ प्राप्त हो जाता है, अतः यह [अन्य तीर्थोंसे] विशिष्ट है। प्रयागमें अथवा यहाँपर मेरे परिग्रहके कारण मुक्ति होती है; तीर्थोंमें अग्रणी (श्रेष्ठ) प्रयागसे भी शुभ यह अविमुक्त [क्षेत्र] है॥ ४६-४८ ^{१}/_{२} ॥ |
| धर्मस्योपनिषत्सत्यं मोक्षस्योपनिषच्छमः।<br>क्षेत्रतीर्थोपनिषदं न विदुर्बुधसत्तमाः॥ ४९ | धर्मका सारतत्त्व सत्य है, मोक्षका सारतत्त्व शम है; किंतु क्षेत्रतीर्थके सारतत्त्वको ऋषिगण भी नहीं जानते हैं॥ ४९॥ |
| कामं भुञ्जन् स्वपन् क्रीडन् कुर्वन् हि विविधाः क्रियाः।<br>अविमुक्ते त्यजेत्प्राणान् जन्तुर्मोक्षाय कल्पते॥ ५० | इच्छानुसार खाता हुआ, सोता हुआ, क्रीड़ा करता हुआ तथा अनेक क्रियाएँ करता हुआ भी प्राणी इस अविमुक्तक्षेत्रमें प्राणत्याग करे, तो वह मोक्ष प्राप्त करता है॥ ५०॥ |
| कृत्वा पापसहस्राणि पिशाचत्वं वरं नृणाम्।<br>न तु शक्रसहस्रत्वं स्वर्गे काशीपुरीं विना॥ ५१<br>तस्मात्संसेवनीयं हि अविमुक्तं हि मुक्तये।<br>जैगीषव्यः परां सिद्धिं गतो यत्र महातपाः॥ ५२<br>अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्याद्भक्त्या च मम भावितः।<br>जैगीषव्यगुहा श्रेष्ठा योगिनां स्थानमिष्यते॥ ५३<br>ध्यायन्तस्तत्र मां नित्यं योगाग्निर्दप्यते भृशम्।<br>कैवल्यं परमं याति देवानामपि दुर्लभम्॥ ५४ | यहाँ हजारों पाप करके पिशाचत्वको प्राप्त होना मनुष्योंके लिये अच्छा है, किंतु काशीपुरीको छोड़कर स्वर्गमें हजार बार इन्द्र होना अच्छा नहीं है। अतएव मुक्तिके लिये इस अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करना चाहिये। महातपस्वी महर्षि जैगीषव्यने इस क्षेत्रके माहात्म्यसे तथा मेरी भक्तिसे युक्त होकर परम सिद्धि प्राप्त की थी। महर्षि जैगीषव्यकी श्रेष्ठ गुफा योगियोंकी स्थली मानी जाती है। योगी लोग वहाँ सदा मेरा ध्यान करते हैं और वहाँ योगकी अग्नि तीव्रतासे प्रज्वलित होती रहती है। मनुष्य [यहाँ] परम कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त करता है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है॥ ५१-५४॥ |
| अव्यक्तलिङ्गैर्मुनिभिः सर्वसिद्धान्तवेदिभिः।<br>इह सम्प्राप्यते मोक्षो दुर्लभोऽन्यत्र कर्हिचित्॥ ५५<br>तेभ्यश्चाहं प्रवक्ष्यामि योगैश्वर्यमनुत्तमम्।<br>आत्मनश्चैव सायुज्यमीप्सितं स्थानमेव च॥ ५६ | अव्यक्त लिङ्गोंवाले तथा सभी सिद्धान्तोंको जाननेवाले मुनिगण यहाँ मोक्ष प्राप्त करते हैं, जो अन्यत्र कहीं भी दुर्लभ है। मैं उनके लिये अत्युत्तम योगैश्वर्य तथा अपने सायुज्यरूप अभीष्ट स्थानको बताऊँगा। |
| कुबेरोऽत्र मम क्षेत्रे मयि सर्वार्पितक्रियः।<br>क्षेत्रसंसेवनादेव गणेशत्वमवाप ह॥ ५७ | मेरे क्षेत्रमें अपनी सभी क्रियाएँ मुझमें समर्पित करनेवाले कुबेरने क्षेत्रके सेवनसे ही गणेशत्वको प्राप्त किया था। |
| संवर्तो भविता यश्च सोऽपि भक्तो ममैव तु।<br>इहैवाराध्य मां देवि सिद्धिं यास्यत्यनुत्तमाम्॥ ५८ | हे देवि! जो ऋषि संवर्त नामक मेरे भक्त जन्म लेंगे, वे भी यहाँ मेरी आराधना करके उत्तम सिद्धि प्राप्त करेंगे। |
| पाराशरसुतो योगी ऋषिव्यासो महातपाः।<br>मम भक्तो भविष्यश्च वेदसंस्थाप्रवर्तकः॥ ५९ | हे कमलनयने! महातपस्वी पराशरपुत्र योगी ऋषि व्यास मेरे भक्त होंगे; वेदसंहिताओंका प्रवर्तन |
अध्याय ९२ ] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रंस्यते सोऽपि पद्माक्षि क्षेत्रेऽस्मिन् मुनिपुङ्गवः ।<br>ब्रह्मा देवर्षिभिः सार्धं विष्णुर्वापि दिवाकरः ॥ ६०<br>देवराजस्तथा शक्रो येऽपि चान्ये दिवौकसः ।<br>उपासते महात्मानः सर्वे मामिह सुव्रते ॥ ६१ | करनेवाले वे मुनिश्रेष्ठ भी इस क्षेत्रमें विहार करेंगे। हे सुव्रते ! देवर्षियोंके साथ ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, देवराज इन्द्र अन्य देवता लोग तथा महात्मा—ये सब यहाँपर मेरी उपासना करते हैं॥ ५५-६१॥ |
| अन्येऽपि योगिनो दिव्याश्छन्नरूपा महात्मनः ।<br>अनन्यमनसो भूत्वा मामिहोपासते सदा ॥ ६२<br>विषयासक्तचित्तोऽपि त्यक्तधर्मरतिर्नरः ।<br>इह क्षेत्रे मृतः सोऽपि संसारे न पुनर्भवेत् ॥ ६३<br>ये पुनर्निर्ममा धीराः सत्त्वस्था विजितेन्द्रियाः ।<br>व्रतिनश्च निरारम्भाः सर्वे ते मयि भाविताः ॥ ६४<br>देवदेवं समासाद्य धीमन्तः सङ्गवर्जिताः ।<br>गता इह परं मोक्षं प्रसादान्मम सुव्रते ॥ ६५<br>जन्मान्तरसहस्रेषु यं न योगी समाप्नुयात् ।<br>तमिहैव परं मोक्षं प्रसादान्मम सुव्रते ॥ ६६ | अन्य दिव्य योगी तथा महात्मा लोग भी प्रच्छन्न [गुप्त] रूप धारणकर एकाग्रचित्त होकर यहाँपर सदा मेरी उपासना करते रहते हैं। विषयोंमें आसक्त मनवाला तथा धर्मका त्याग किया हुआ मनुष्य भी यदि इस क्षेत्रमें मृत हो जाय, तो वह भी संसारमें पुनः जन्म नहीं प्राप्त करता है; तो फिर हे सुव्रते ! जो ममतारहित, धीर, सत्त्वगुणमें स्थित, जितेन्द्रिय, व्रती, कर्मप्रवृत्तिसे रहित, मुझमें ध्यानरत, बुद्धिमान् तथा संगरहित हैं—वे सब [मुझ] देवदेवको प्राप्त करके मेरी कृपासे यहाँ श्रेष्ठ मोक्ष अवश्य प्राप्त करते हैं। हे सुव्रते ! हजारों जन्मोंमें भी योगी जिस [मोक्ष]-को प्राप्त नहीं कर पाता है, उस उत्तम मोक्षको वह यहाँपर मेरी कृपासे प्राप्त कर लेता है॥ ६२–६६॥ |
| गोप्रेक्षकमिदं क्षेत्रं ब्रह्मणा स्थापितं पुरा।<br>कैलासभवनं चात्र पश्य दिव्यं वरानने ॥ ६७<br>गोप्रेक्षकमथागम्य दृष्ट्वा मामत्र मानवः ।<br>न दुर्गतिमवाप्नोति कल्मषैश्च विमुच्यते ॥ ६८<br>कपिलाह्रदमित्येवं तथा वै ब्रह्मणा कृतम् ।<br>गवां स्तन्यजतोयेन तीर्थं पुण्यतमं महत् ॥ ६९<br>अत्रापि स्वयमेवाहं वृषध्वज इति स्मृतः ।<br>सान्निध्यं कृतवान् देवि सदाहं दृश्यते त्वया ॥ ७० | हे वरानने ! पूर्वकालमें यहाँ ब्रह्माके द्वारा स्थापित किये गये कैलास भवन नामक इस गोप्रेक्षक क्षेत्रको देखो। इस गोप्रेक्षक [क्षेत्र]-में आकर मेरा दर्शन करके मनुष्य दुर्गति नहीं प्राप्त करता है और पापोंसे छूट जाता है। इसी प्रकार यहाँपर ब्रह्माने गायोंके दूधसे कपिलाह्रद नामक विशाल तथा पुण्यतम तीर्थका निर्माण किया है। यहाँ भी मैं स्वयं वृषभध्वज—इस नामसे विख्यात हूँ। हे देवि ! मैंने सदासे यहाँ निवास किया है; ऐसा आप देखती भी हैं॥ ६७–७०॥ |
| भद्रतोयं च पश्येह ब्रह्मणा च कृतं ह्रदम्।<br>सर्वैर्देवैरहं देवि अस्मिन् देशे प्रसादितः ॥ ७१<br>गच्छोपशममीशेति उपशान्तः शिवस्तथा।<br>अत्राहं ब्रह्मणानीय स्थापितः परमेष्ठिना ॥ ७२<br>ब्रह्मणा चापि सङ्गृह्य विष्णुना स्थापितः पुनः ।<br>ब्रह्मणापि ततो विष्णुः प्रोक्तः संविग्नचेतसा ॥ ७३<br>मयानीतमिदं लिङ्गं कस्मात्स्थापितवानसि ।<br>तमुवाच पुनर्विष्णुर्ब्रह्माणं कुपिताननम् ॥ ७४ | यहाँ ब्रह्माके द्वारा निर्मित किये गये भद्रतोय नामक सरोवरको देखो। हे देवि! सभी देवताओंने 'हे ईश! शान्त हो जाइए'—ऐसा कहकर इस स्थानपर मुझ शिवको प्रसन्न किया था, तब मैं शान्त हो गया था। परमेष्ठी ब्रह्माने यहाँ लाकर मुझे स्थापित किया। ब्रह्माजीसे प्राप्त करके विष्णुने पुनः स्थापित किया। तब दुःखी चित्तवाले ब्रह्माने विष्णुसे कहा—आपने मेरे द्वारा लाये गये इस लिङ्गको क्यों स्थापित किया? तत्पश्चात् विष्णु कुपितमुखवाले उन ब्रह्मासे पुनः बोले—रुद्र |
| ४८२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| रुद्रे देवे ममात्यन्तं परा भक्तिर्महत्तरा।<br>मयैव स्थापितं लिङ्गं तव नाम्ना भविष्यति॥ ७५ | देवतामें मेरी अत्यधिक, श्रेष्ठ तथा महत्तर भक्ति है; मेरे द्वारा स्थापित किया गया यह लिङ्ग आपके ही नामसे प्रसिद्ध होगा॥ ७१-७५॥ | | हिरण्यगर्भ इत्येवं ततोऽत्राहं समास्थितः।<br>दृष्ट्वैनमपि देवेशं मम लोकं व्रजेन्नरः॥ ७६<br><br>ततः पुनरपि ब्रह्मा मम लिङ्गमिदं शुभम्।<br>स्थापयामास विधिवद्भक्त्या परमया युतः॥ ७७<br><br>स्वर्लीनेश्वर इत्येवमत्राहं स्वयमागतः।<br>प्राणानिह नरस्त्यक्त्वा न पुनर्जायते क्वचित्॥ ७८ | [हे देवि!] मैं तभीसे यहाँ हिरण्यगर्भ—इस नामसे स्थित हूँ। इन देवेश्वरका दर्शन करके मनुष्य मेरा लोक प्राप्त करता है। तत्पश्चात् ब्रह्माने परम भक्तिसे युक्त होकर मेरे इस पवित्र लिङ्गको विधिपूर्वक पुनः स्थापित किया। मैं यहाँ स्वर्लीनेश्वर नामसे स्वयं विद्यमान हूँ; यहाँ प्राणत्याग करनेपर मनुष्य कभी जन्म नहीं लेता है। जो गति योगियोंकी कही गयी है, वह अनन्य गति उसकी भी होती है॥ ७६-७८ १/२॥ | | अनन्या सा गतिस्तस्य योगिनां चैव या स्मृता।<br>अस्मिन्नपि मया देशे दैत्यो दैवतकण्टकः॥ ७९<br><br>व्याघ्ररूपं समास्थाय निहतो दर्पितो बली।<br>व्याघ्रेश्वर इति ख्यातो नित्यमत्राहमास्थितः॥ ८०<br><br>न पुनदुर्गतिं याति दृष्ट्वैनं व्याघ्रीमीश्वरम्।<br>उत्पलो विदलश्चैव यौ दैत्यौ ब्रह्मणा पुरा॥ ८१<br><br>स्त्रीवध्यौ दर्पितौ दृष्ट्वा त्वयैव निहतौ रणे।<br>सावज्ञं कन्दुकेनात्र तस्येदं देहमास्थितम्॥ ८२ | इसी स्थानपर मैंने व्याघ्रका रूप धारण करके देवताओंके लिये कंटकस्वरूप एक अभिमानी तथा बलवान् दैत्यका वध किया था; [तभीसे] व्याघ्रेश्वर इस नामसे प्रसिद्ध होकर मैं यहाँ सदा स्थित हूँ। इन व्याघ्रेश्वरका दर्शन करके मनुष्य पुनः दुर्गति को प्राप्त नहीं होता है। पूर्वकालमें उत्पल तथा विदल नामक जिन दो दैत्योंके लिये ब्रह्माने स्त्रीके द्वारा वध्य होनेका विधान किया था, उन्हें अभिमानयुक्त देखकर आपने ही रणमें अवज्ञापूर्वक एक कन्दुकसे मार डाला था; आपके उसी कन्दुकका यह देह यहाँ स्थापित हो गया अर्थात् वह कन्दुक लिङ्गरूपमें परिणत होकर स्थापित हो गया॥ ७९-८२॥ | | आदावत्राहमागम्य प्रस्थितो गणपैः सह।<br>ज्येष्ठस्थानमिदं तस्मादेतन्मे पुण्यदर्शनम्॥ ८३<br><br>देवैः समन्तादेतानि लिङ्गानि स्थापितान्यतः।<br>दृष्ट्वापि नियतो मर्त्यो देहभेदे गणो भवेत्॥ ८४ | प्रारम्भमें गणपोंके साथ आकर मैं यहाँ स्थित हो गया, अतः यह ज्येष्ठस्थान है; यहाँ मेरा दर्शन पुण्यप्रद है। देवताओंने यहाँ सभी ओर इन लिङ्गोंको स्थापित किया है; अतः भक्तियुक्त होकर इन लिङ्गोंका केवल दर्शन करके मनुष्य मृत्यु होनेपर [शिवका] गण हो जाता है॥ ८३-८४॥ | | पित्रा ते शैलराजेन पुरा हिमवता स्वयम्।<br>मम प्रियहितं स्थानं ज्ञात्वा लिङ्गं प्रतिष्ठितम्॥ ८५<br><br>शैलेश्वरमिति ख्यातं दृश्यतामिह चादरात्।<br>दृष्ट्वैतन्मनुजो देवि न दुर्गतिमतो व्रजेत्॥ ८६ | [हे देवि!] पूर्वकालमें स्वयं तुम्हारे पिता पर्वत-राज हिमालयने इसे मेरा प्रिय तथा हितकर स्थान समझकर यहाँ लिङ्गकी स्थापना की थी। शैलेश्वर नामसे प्रसिद्ध इस लिङ्गको तुम आदरपूर्वक देखो। हे देवि! इसका दर्शन करके मनुष्य दुर्गति को नहीं प्राप्त होता है॥ ८५-८६॥ | | नद्येषा वरुणा देवि पुण्या पापप्रमोचनी।<br>क्षेत्रमेतदलङ्कृत्य जाह्नव्या सह सङ्गता॥ ८७ | हे देवि! पुण्यमयी तथा पापको नष्ट करनेवाली |
अध्याय ९२] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८३
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| स्थापितं ब्रह्मणा चापि सङ्गमे लिङ्गमुत्तमम्।<br>सङ्गमेश्वरमित्येवं ख्यातं जगति दृश्यताम्॥ ८८<br>सङ्गमे देवनद्या हि यः स्नात्वा मनुजः शुचिः।<br>अर्चयेत्सङ्गमेशानं तस्य जन्मभयं कुतः॥ ८९ | यह वरुणा नदी इस क्षेत्रको अलंकृत करके गंगाके साथ मिल जाती है। इनके संगमपर भी ब्रह्माके द्वारा उत्तम लिङ्ग स्थापित किया गया है; यह संगमेश्वर—इस नामसे जगत्में प्रसिद्ध है, तुम इसका दर्शन करो। देवनदीके संगमपर स्नान करके शुद्ध होकर जो मनुष्य संगमेश्वरकी पूजा करता है, उसे जन्मभय कहाँसे हो सकता है!॥ ८७—८९ ॥ |
| इदं मन्ये महाक्षेत्रं निवासो योगिनां परम्।<br>क्षेत्रमध्ये च यत्राहं स्वयं भूत्वाग्रमास्थितः॥ ९०<br>मध्यमेश्वरमित्येवं ख्यातः सर्वसुरासुरैः।<br>सिद्धानां स्थानमेतद्धि मदीयव्रतधारिणाम्॥ ९१<br>योगिनां मोक्षलिप्सूनां ज्ञानयोगरतात्मनाम्।<br>दृष्ट्वैनं मध्यमेशानं जन्म प्रति न शोचति॥ ९२ | [हे देवि!] मैं इसे महाक्षेत्र मानता हूँ; यह योगियोंका परम निवास-स्थान है। इस श्रेष्ठ क्षेत्रके मध्यमें मैं स्वयं प्रकट होकर अधिष्ठित हूँ। सभी सुर तथा असुर [यहाँ] मुझे मध्यमेश्वर—इस नामसे कहते हैं। मेरा व्रत धारण करनेवाले सिद्धों और मोक्षकी अभिलाषावाले तथा ज्ञानयोगमें परायण मनवाले योगियोंका यह निवास-स्थान है। इन मध्यमेश्वरका दर्शन कर लेनेपर मनुष्य अपने जन्मके विषयमें चिन्ता नहीं करता है॥ ९०—९२ ॥ |
| स्थापितं लिङ्गमेतत्तु शुक्रेण भृगुसूनुना।<br>नाम्ना शुक्रेश्वरं नाम सर्वसिद्धामरार्चितम्॥ ९३<br>दृष्ट्वैनं नियतः सद्यो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः।<br>मृतश्च न पुनर्जन्तुः संसारी तु भवेन्नरः॥ ९४ | भृगुपुत्र शुक्राचार्यने भी यहाँ लिङ्गको स्थापित किया है; शुक्रेश्वर नामसे विख्यात यह लिङ्ग सभी सिद्धों तथा देवताओंसे पूजित है। नियमित होकर इनका दर्शन करके मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और मरनेपर पुनः संसारी जीव नहीं होता है॥ ९३-९४॥ |
| पुरा जम्बुकरूपेण असुरो देवकण्टकः।<br>ब्रह्मणो हि वरं लब्ध्वा गोमायुर्बन्धशङ्कितः॥ ९५<br>निहतो हिमवत्पुत्रि जम्बुकेशस्ततो ह्यहम्।<br>अद्यापि जगति ख्यातं सुरासुरनमस्कृतम्॥ ९६<br>दृष्ट्वैनमपि देवेशं सर्वान् कामानवाप्नुयात्।<br>ग्रहैः शुक्रपुरोगैश्च एतानि स्थापितानि ह॥ ९७<br>पश्य पुण्यानि लिङ्गानि सर्वकामप्रदानि तु।<br>एवमेतानि पुण्यानि मन्निवासानि पार्वति॥ ९८<br>कथितानि मम क्षेत्रे गुह्यं चान्यदिदं शृणु।<br>चतुःक्रोशं चतुर्दिक्षु क्षेत्रमेतत्प्रकीर्तितम्॥ ९९ | पूर्वकालमें देवताओंके लिये कंटकस्वरूप एक दैत्य सियारके रूपमें विद्यमान था। अपने बन्धनसे सशंकित उस दैत्यने ब्रह्मासे वर प्राप्त करके गोमायु (सियार)-का रूप धारण कर लिया था। हे पार्वति! मैंने उसका वध किया और तब मैं जम्बुकेश कहा जाने लगा; आज भी लोकमें प्रसिद्ध तथा देवताओं और असुरोंसे नमस्कृत इन देवेश्वरका दर्शन करके मनुष्य समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। [हे देवि!] शुक्र आदि प्रधान ग्रहोंके द्वारा स्थापित किये गये इन पुण्यमय तथा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले लिङ्गोंका दर्शन करो। हे पार्वति! इस प्रकार मैंने अपने निवासस्वरूप इन पवित्र लिङ्गोंका वर्णन किया; मेरे क्षेत्रमें एक अन्य गुप्त रहस्य भी है, इसे सुनो॥ ९५-९८ १/२॥ |
| ४८४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| योजनं विद्धि चार्वङ्गि मृत्युकालेऽमृतप्रदम्।<br>महालयगिरिस्थं मां केदारे च व्यवस्थितम्॥ १००<br><br>गणत्वं लभते दृष्ट्वा ह्यस्मिन् मोक्षो ह्यवाप्यते।<br>गाणपत्यं लभेदस्माद्यतः सा मुक्तिरुत्तमा॥ १०१<br><br>ततो महालयात्तस्मात्केदारान्मध्यमादपि।<br>स्मृतं पुण्यतमं क्षेत्रमविमुक्तं वरानने॥ १०२<br><br>केदारं मध्यमं क्षेत्रं स्थानं चैव महालयम्।<br>मम पुण्यानि भूलोके तेभ्यः श्रेष्ठतमं त्विदम्॥ १०३ | यह क्षेत्र चारों दिशाओंमें चार कोस अतएव एक योजनमें कहा गया है; हे सुन्दर अंगोंवाली! मृत्युकालमें इसे अमरता प्रदान करनेवाला जानो। महालय गिरिमें विराजमान और केदारपर स्थित मेरा दर्शन करके मनुष्य गणत्व प्राप्त करता है, किंतु इस क्षेत्रमें मोक्षकी प्राप्ति होती है। उन स्थानोंमें गणपति पद प्राप्त होता है और यहाँपर उत्तम मुक्ति प्राप्त होती है, अतः हे वरानने! उस महालय, केदार तथा मध्यम क्षेत्र—इन सबसे पुण्यप्रद यह अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है। केदार, मध्यमक्षेत्र तथा महालय स्थान—ये तीनों पृथ्वीलोकमें मेरे पवित्र क्षेत्र हैं, किंतु यह [अविमुक्तक्षेत्र] उनसे भी अधिक श्रेष्ठ है॥ ९९–१०३॥ | | यतः सृष्टास्त्विमे लोकास्ततः क्षेत्रमिदं शुभम्।<br>कदाचिन्न मया मुक्तमविमुक्तं ततोऽभवत्॥ १०४<br><br>अविमुक्तेश्वरं लिङ्गं मम दृष्ट्वेह मानवः।<br>सद्यः पापविनिर्मुक्तः पशुपाशैर्विमुच्यते॥ १०५<br><br>शैलेशं सङ्गमेशं च स्वर्लीनं मध्यमेश्वरम्।<br>हिरण्यगर्भमीशानं गोप्रेक्षं वृषभध्वजम्॥ १०६<br><br>उपशान्तं शिवं चैव ज्येष्ठस्थाननिवासिनम्।<br>शुक्रेस्वरं च विख्यातं व्याघ्रेशं जम्बुकेश्वरम्॥ १०७<br><br>दृष्ट्वा न जायते मर्त्यः संसारे दुःखसागरे। | जबसे इन लोकोंकी सृष्टि की गयी है, तबसे मैंने इस पवित्र क्षेत्रका परित्याग कभी नहीं किया, इसलिये यह अविमुक्त [क्षेत्र] हो गया। यहाँ मेरे अविमुक्तेश्वर लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य शीघ्र ही पापोंसे मुक्त होकर पशुपाशों (जीवबन्धन)—से छूट जाता है। शैलेश्वर, संगमेश्वर, स्वर्लीनेश्वर, मध्यमेश्वर, हिरण्यगर्भ, ईशान, गोप्रेक्ष, वृषभध्वज, उपशान्त, ज्येष्ठस्थानमें निवास करनेवाले शिव, शुक्लेश्वर, प्रसिद्ध व्याघ्रेश्वर तथा जम्बुकेश्वरका दर्शन करके मनुष्य दुःखके सागररूप संसारमें [पुनः] जन्म नहीं लेता है॥ १०४–१०७ १/२॥ | | सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा महादेवे दिशः सर्वा व्यलोकयत्॥ १०८<br><br>विलोक्य संस्थिते पश्चाद्देवदेवे महेश्वरे।<br>अकस्मादभवत्सर्वः स देशोज्ज्वलितो यथा॥ १०९<br><br>ततः पाशुपताः सिद्धा भस्माभ्यङ्गसितप्रभाः।<br>माहेश्वरा महात्मानस्तथा वै नियतव्रताः॥ ११०<br><br>बहवः शतशोऽभ्येत्य नमश्चक्रुर्महेश्वरम्।<br>पुनर्निरीक्ष्य योगेशं ध्यानयोगं च कृत्स्नशः॥ १११<br><br>तस्थुरात्मानमास्थाय लीयमाना इवेश्वरे।<br>स्थितानां स तदा तेषां देवदेव उमापतिः॥ ११२<br><br>स बिभ्रत्परमां मूर्तिं बभूव पुरुषः प्रभुः।<br>कृत्स्नं जगदिहैकस्थं कर्तुमन्त इव स्थितः॥ ११३ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] ऐसा कहकर महादेवने सभी दिशाओंकी ओर देखा। [दिशाओंकी ओर] देखकर देवदेव महेश्वरके बैठ जानेके अनन्तर वह सम्पूर्ण स्थान सहसा देदीप्यमान हो गया। तत्पश्चात् भस्म लगानेसे श्वेत प्रभाववाले, नियम-व्रत धारण करनेवाले, पशुपतिके भक्त और महेश्वरके प्रति समर्पित बहुत-से सैकड़ों सिद्ध तथा महात्माओंने वहाँ आकर महेश्वरको प्रणाम किया; पुनः वे ध्यानयोगमें स्थित योगेश्वर [शिव]—को बार-बार देखकर अपने मनको स्थिर करके उन ईश्वरमें लीन होते हुए—से स्थित हो गये। उनके इस प्रकार स्थित होनेपर वे देवदेव उमापति परम मूर्ति धारण करते हुए विराट् पुरुषके रूपमें हो गये; वे सम्पूर्ण जगत्को एक स्थानपर एकत्र करनेके |
अध्याय ९२ ] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८५
| तस्य तां परमां मूर्तिमास्थितस्य जगत्प्रभोः।<br>न शशाक पुनर्द्रष्टुं हृष्टरोमा गिरीन्द्रजा ॥ ११४<br>ततस्त्वदृष्टमाकारं बुद्ध्वा सा प्रकृतिस्थितम्।<br>प्रकृतेर्मूर्तिमास्थाय योगेन परमेश्वरी ॥ ११५<br>तं शशाक पुनर्द्रष्टुं हरस्य च महात्मनः।<br>ततस्ते लयमाधाय योगिनः पुरुषस्य तु ॥ ११६<br>विविशुर्हृदयं सर्वे दग्धसंसारबीजिनः।<br>पञ्चाक्षरस्य वै बीजं संस्मरन्तः सुशोभनम् ॥ ११७<br>सर्वपापहरं दिव्यं पुरा चैव प्रकाशितम्।<br>नीललोहितमूर्तिस्थं पुनश्चक्रे वपुः शुभम् ॥ ११८<br>तं दृष्ट्वा शैलजा प्राह हृष्टसर्वतनूरुहा।<br>स्तुवती चरणौ नत्वा क इमे भगवन्निति ॥ ११९<br>तामुवाच सुरश्रेष्ठस्तदा देवीं गिरीन्द्रजाम्।<br><br>श्रीभगवानुवाच<br>मदीयं व्रतमाश्रित्य भक्तिमद्भिर्द्विजोत्तमैः ॥ १२०<br>यैर्यैर्योग इहाभ्यस्तास्तेषामेकेन जन्मना।<br>क्षेत्रस्यास्य प्रभावेन भक्त्या च मम भामिनि ॥ १२१<br>अनुग्रहो मया ह्येवं क्रियते मूर्तितः स्वयम्।<br>तस्मादेतन्महत्क्षेत्रं ब्रह्माद्यैः सेवितं तथा ॥ १२२<br>श्रुतिमद्भिश्च विप्रेन्द्रैः संसिद्धैश्च तपस्विभिः।<br>प्रतिमासं तथाष्टम्यां प्रतिमासं चतुर्दशीम् ॥ १२३<br>उभयोः पक्षयोर्देवि वाराणस्यामुपास्यते।<br>शशिभानूपरागे च कार्तिका्यां च विशेषतः ॥ १२४<br>सर्वपर्वसु पुण्येषु विषुवेष्वयनेषु च।<br>पृथिव्यां सर्वतीर्थानि वाराणस्यां तु जाह्नवीम् ॥ १२५<br>उत्तरप्रवहां पुण्यां मम मौलिविनिःसृताम्।<br>पितुस्ते गिरिराजस्य शुभां हिमवतः सुताम् ॥ १२६<br>पुण्यस्थानस्थितां पुण्यां पुण्यदिक्प्रवहां सदा।<br>भजन्ते सर्वतोऽभ्येत्य ये ताञ्छृणु वरानने ॥ १२७ | लिये प्रलयकालके समान खड़े हो गये॥ १०८–११३॥<br><br>तब पुलकित रोमोंवाली पार्वती वहाँ स्थित उन जगत्प्रभुकी उस परम मूर्तिको पुनः देखनेमें समर्थ न हो सकीं। तदनन्तर पहले कभी न देखे गये उस स्वरूपको प्रकृतिमें स्थित समझकर वे परमेश्वरी योगके द्वारा प्रकृतिका रूप धारणकर महात्मा शिवके उस स्वरूपको पुनः देखनेमें समर्थ हो गयीं॥ ११४-११५ १/२॥<br><br>तब अत्यन्त सुन्दर पंचाक्षर मन्त्रका स्मरण करते हुए दग्ध लिङ्गवाले वे सभी योगी शिवके ध्यानमें लीन होकर उन [विराट्] पुरुषके हृदयमें प्रविष्ट हुए। तदनन्तर शिवजीने सभी पापोंका हरण करनेवाले, दिव्य तथा पूर्वमें प्रकट किये गये नीललोहितमूर्तिस्थ रूपको पुनः धारण किया॥ ११६–११८॥<br><br>उस रूपको देखकर पुलकित समस्त रोमोंवाली पार्वती स्तुति करते हुए तथा उनके चरणोंमें प्रणाम करके कहा—‘हे भगवन्! ये कौन हैं?’ तब सुरश्रेष्ठ [शिव] पर्वतराजकी उन पुत्रीसे कहने लगे॥ ११९ १/२॥<br><br>श्रीभगवान् बोले—हे भामिनि! मेरे व्रतका आश्रय लेकर जिन-जिन भक्तियुक्त श्रेष्ठ द्विजोंने यहाँ योगका अभ्यास किया है, उनके एक जन्ममें ही इस क्षेत्रके प्रभाव तथा उनकी भक्तिके कारण मैं स्वयं विग्रहरूपसे इस प्रकारका अनुग्रह करता हूँ। अतः यह महान् क्षेत्र ब्रह्मा आदि [देवताओं], वेदज्ञ श्रेष्ठ ब्राह्मणों, सिद्धों तथा तपस्वियोंके द्वारा सेवित है। हे देवि! प्रत्येक महीनेमें दोनों पक्षोंकी अष्टमी तथा चतुर्दशीको वाराणसीमें शिवकी पूजा की जाती है। सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहणके अवसरपर, विशेषकर कार्तिक महीनेमें, पुण्यप्रद सभी पर्वोंमें, विषुवत् एवं अयन संक्रान्तियोंमें पृथ्वीपर स्थित सभी तीर्थ वाराणसीमें विद्यमान उत्तरवाहिनी, पुण्यमयी, मेरे सिरसे निकली हुई, तुम्हारे पिता गिरिराज हिमालयकी पुत्री, पुण्यमयस्थानमें विराजमान और सदा पुण्य दिशाकी ओर प्रवाहित होनेवाली पवित्र गंगाका सेवन करते हैं। हे वरानने! सभी ओरसे आकर जो उन भागीरथीका सेवन करते हैं, उन्हें सुनो॥ १२०–१२७॥ |
| ४८६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| सन्निहत्य कुरुक्षेत्रं सार्धं तीर्थशतैस्तथा।<br>पुष्करं निमिषं चैव प्रयागं च पृथूदकम्॥ १२८<br>द्रुमक्षेत्रं कुरुक्षेत्रं नैमिषं तीर्थसंयुतम्।<br>क्षेत्राणि सर्वतो देवि देवता ऋषयस्तथा॥ १२९<br>सन्ध्या च ऋतवश्चैव सर्वा नद्यः सरांसि च।<br>समुद्राः सप्त चैवात्र देवतीर्थानि कृत्स्नशः॥ १३०<br>भागीरथीं समेष्यन्ति सर्वपर्वसु सुव्रते।<br>अविमुक्तेश्वरं दृष्ट्वा दृष्ट्वा चैव त्रिविष्टपम्॥ १३१<br>कालभैरवमासाद्य धूतपापानि सर्वशः।<br>भवन्ति हि सुरेशानि सर्वपर्वसु पर्वसु॥ १३२<br>पृथिव्यां यानि पुण्यानि महत्यायतनानि च।<br>प्रविशन्ति सदाभ्येत्य पुण्यं पर्वसु पर्वसु।<br>अविमुक्तं क्षेत्रवरं महापापनिबर्हणम्॥ १३३ | हे देवि! हे सुव्रते! कुरुक्षेत्र, पुष्कर, निमिष, प्रयाग, पृथूदक, द्रुमक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, तीर्थमय नैमिष, सभी क्षेत्र, देवता, ऋषिगण, सन्ध्या, ऋतुएँ, सभी नदियाँ, सभी सरोवर, सातों समुद्र तथा समस्त देवतीर्थ एकीभूत होकर सैकड़ों तीर्थोंसहित सभी पर्वोंके अवसरपर भागीरथीमें आकर मिल जाते हैं और हे सुरेशानि! सभी पर्वोंपर अविमुक्तेश्वर तथा त्रिविष्टपका दर्शन करके पुनः कालभैरव पहुँचकर पूर्णरूपसे पापमुक्त हो जाते हैं। पृथिवीपर जो भी पवित्र तथा महान् आयतन (देवालय) हैं, वे समस्त पर्वोंके अवसरपर महापापोंका नाश करनेवाले क्षेत्रश्रेष्ठ पुण्यमय अविमुक्तमें आकर प्रविष्ट हो जाते हैं॥ १२८-१३३॥ | | केदारे चैव यल्लिङ्गं यच्च लिङ्गं महालये॥ १३४<br>मध्यमेश्वरसंज्ञं च तथा पाशुपतेश्वरम्।<br>शङ्कुकर्णेश्वरं चैव गोकर्णौ च तथा ह्युभौ॥ १३५<br>द्रुमचण्डेश्वरं नाम भद्रेश्वरमनुत्तमम्।<br>स्थानेश्वरं तथैकाग्रं कालेश्वरमजेश्वरम्॥ १३६<br>भैरवेश्वरमीशानं तथोङ्कारकसञ्ज्ञितम्।<br>अमरेशं महाकालं ज्योतिषं भस्मगात्रकम्॥ १३७<br>यानि चान्यानि पुण्यानि स्थानानि मम भूतले।<br>अष्टषष्टिसमाख्यानि रूढान्यान्यानि कृत्स्नशः॥ १३८<br>तानि सर्वाण्यशेषाणि वाराणस्यां विशन्ति माम्।<br>सर्वपर्वसु पुण्येषु गुह्यं चैतदुदाहृतम्॥ १३९<br>तेनेह लभते जन्तुर्मृतो दिव्यामृतं पदम्। | केदार [खण्ड]-में स्थित लिङ्ग, महालयमें स्थित लिङ्ग, मध्यमेश्वर नामक लिङ्ग, पाशुपतेश्वर, शंकुकर्णेश्वर, दोनों गोकर्णेश्वर, द्रुमचण्डेश्वर, अत्युत्तम भद्रेश्वर, स्थानेश्वर, एकाग्रेश्वर, कालेश्वर, अजेश्वर, भैरवेश्वर, ईशान, ओंकारेश्वर, अमरेश्वर, महाकालेश्वर, ज्योतिष, भस्मगात्र आदि तथा अन्य जो प्रसिद्ध अड़सठ मेरे पवित्र स्थान इस भूतलपर हैं एवं जो अन्य सभी लोकप्रसिद्ध स्थान हैं; वे सब वाराणसीमें मेरे पास सभी पुण्यप्रद पर्वोंपर आ जाते हैं। [हे देवि!] इसी कारणसे यहाँपर मृत्युको प्राप्त प्राणी दिव्य अमृत (अमर) पद प्राप्त करता है; मैंने यह रहस्यमय बात कही है॥ १३४-१३९ १/२॥ | | स्नातस्य चैव गङ्गायां दृष्टेन च मया शुभे॥ १४०<br>सर्वयज्ञफलैस्तुल्यमिष्टैः शतसहस्रशः।<br>सद्य एव समाप्नोति किं ततः परमाद्भुतम्॥ १४१<br>सर्वायतनमुख्यानि दिवि भूमौ गिरिष्वपि।<br>परात्परतरं देवि बुध्यस्वेति मयोदितम्॥ १४२<br>अविशब्देन पापस्तु वेदोक्तः कथ्यते द्विजैः।<br>तेन मुक्तं मया जुष्टमविमुक्तमतोच्यते॥ १४३ | हे शुभे! [वाराणसीमें] गंगामें स्नान करके मेरा दर्शन करनेसे मनुष्य सैकड़ों-हजारों समस्त यज्ञोंके अभीष्ट फलोंके समान फल शीघ्र ही प्राप्त करता है, इससे बढ़कर आश्चर्य क्या हो सकता है? हे देवि! स्वर्गमें, पृथ्वीपर तथा पर्वतोंपर जो भी सभी प्रधान देवस्थान हैं, उनमें मेरे द्वारा बताये गये इस वाराणसीक्षेत्रको सबसे श्रेष्ठ जानो। ब्राह्मणोंने वेदोंमें वर्णित पापको 'अवि' शब्दसे कहा है; यह क्षेत्र उस [पाप]-से मुक्त है तथा मेरे द्वारा सेवित है, अतः इसे 'अविमुक्त' कहा जाता है॥ १४०-१४३॥ |
अध्याय १२] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इत्युक्त्वा भगवान् रुद्रः सर्वलोकमहेश्वरः।<br>सुदृष्टं कुरु देवेशि अविमुक्तं गृहं मम॥ १४४<br>इत्युक्त्वा भगवान् देवस्तया सार्धमुमापतिः।<br>दर्शयामास भगवान् श्रीपर्वतमनुत्तमम्॥ १४५<br>अविमुक्तेश्वरं नित्यमवसच्च सदा तया।<br>सर्वगत्वाच्च सर्वत्वात्सर्वात्मा सदसन्मयः॥ १४६<br>श्रीपर्वतमनुप्राप्य देव्या देवेश्वरो हरः।<br>क्षेत्राणि दर्शयामास सर्वभूतपतिर्भवः॥ १४७ | ऐसा कहकर सभी लोकोंके स्वामी भगवान् रुद्र पुनः बोले—‘देवेशि! मेरे इस अविमुक्त निवास-स्थानको भली-भाँति देखो।’ ऐसा कहनेके बाद उन देवीको साथ लेकर भगवान् उमापतिने उन्हें अत्युत्तम श्रीपर्वत दिखाया और वे वहाँ अविमुक्तेश्वरमें उनके साथ नित्य रहने लगे। सर्वत्र गमनकी शक्तिसे युक्त होने तथा सर्वव्यापी होनेके कारण सर्वात्मा, सत्-असत्स्वरूपवाले, देवताओंके स्वामी तथा सभी प्राणियोंके स्वामी भगवान् शिव उन देवीके साथ श्रीपर्वतपर पहुँचकर वहाँके [पवित्र] क्षेत्र दिखाने लगे॥ १४४-१४७॥ |
| कुण्डिप्रभं च परमं दिव्यं वैश्रवणेश्वरम्।<br>आशालिङ्गं च देवेशं दिव्यं यच्च बिलेश्वरम्॥ १४८<br>रामेश्वरं च परमं विष्णुना यत्प्रतिष्ठितम्।<br>दक्षिणद्वारपार्श्वे तु कुण्डलेश्वरमीश्वरम्॥ १४९<br>पूर्वद्वारसमीपस्थं त्रिपुरान्तकमुत्तमम्।<br>विवृद्धं गिरिणा सार्धं देवदेवनमस्कृतम्॥ १५०<br>मध्यमेश्वरमित्युक्तं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>अमरेश्वरं च वरदं देवैः पूर्वं प्रतिष्ठितम्॥ १५१<br>गोचर्मेश्वरमीशानं तथेन्द्रेश्वरमद्भुतम्।<br>कर्मेश्वरं च विपुलं कार्यार्थं ब्रह्मणा कृतम्॥ १५२<br>श्रीमत्सिद्धवटं चैव सदावासो ममाव्यये।<br>अजेन निर्मितं दिव्यं साक्षादजबिलं शुभम्॥ १५३<br>तत्रैव पादुके दिव्ये मदीये च बिलेश्वरे।<br>तत्र शृङ्गाटकाकारं शृङ्गाटाचलमध्यमे॥ १५४<br>शृङ्गाटकेश्वरं नाम श्रीदेव्या तु प्रतिष्ठितम्।<br>मल्लिकार्जुनकं चैव मम वासमिदं शुभम्॥ १५५<br>राजेश्वरं च पर्याये रजसा सुप्रतिष्ठितम्।<br>गजेश्वरं च वैशाखं कपोतेश्वरमव्ययम्॥ १५६<br>कोटीश्वरं महातीर्थं रुद्रकोटिगणैः पुरा।<br>सेवितं देवि पश्याद्य सर्वस्मादधिकं शुभम्॥ १५७ | यहाँ कुण्डिप्रभ, परम दिव्य वैश्रवणेश्वर, आशालिङ्ग, देवेश्वर, दिव्य बिलेश्वर, विष्णुके द्वारा स्थापित महान् रामेश्वर, दक्षिण द्वारके पार्श्वभागमें भगवान् कुण्डलेश्वर, पूर्व द्वारके समीप स्थित और पर्वतके साथ वृद्धिको प्राप्त सर्वदेवनमस्कृत उत्तम त्रिपुरान्तक, तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध मध्यमेश्वर, पूर्वकालमें देवताओंके द्वारा स्थापित वरप्रद अमरेश्वर, गोचर्मेश्वर, ईशान, अद्भुत इन्द्रेश्वर और अपने कार्यके लिये ब्रह्माके द्वारा स्थापित विशाल कर्मेश्वर लिङ्ग हैं। हे अव्यये! श्रीमत्सिद्धवट सदा मेरा निवासस्थान है। साक्षात् ब्रह्माके द्वारा निर्मित यह दिव्य तथा पवित्र अजबिल नामक स्थान है; वहीं बिलेश्वरमें मेरी दिव्य पादुकाएँ भी हैं। वहाँ शृङ्गाटक पर्वतके मध्य शिखरपर शृङ्गाटकके आकारवाला (त्रिकोण) शृङ्गाटकेश्वर नामक लिङ्ग है, जो श्रीदेवी (लक्ष्मी)-के द्वारा स्थापित किया गया है। यह मल्लिकार्जुन [लिङ्ग] मेरा शुभ निवासस्थान है। हे देवि! युगादिके परिवर्तित होनेपर ब्रह्माके द्वारा स्थापित राजेश्वरको, स्कन्दके द्वारा स्थापित गजेश्वरको, अविनाशी कपोतेश्वरको तथा सबसे अधिक शुभ और करोड़ों रुद्रगणोंके द्वारा सेवित कोटीश्वर नामक महातीर्थको इस समय देखो॥ १४८-१५७॥ |
| द्विदेवकुलसंज्ञं च ब्रह्मणा दक्षिणे शुभम्।<br>उत्तरे स्थापितं चैव विष्णुना चैव शैलजम्॥ १५८<br>महाप्रमाणलिङ्गं च मया पूर्वं प्रतिष्ठितम्।<br>पश्चिमे पर्वते पश्य ब्रह्मोश्वरमलेश्वरम्॥ १५९ | दक्षिणमें ब्रह्माके द्वारा तथा उत्तरमें विष्णुके द्वारा स्थापित किये गये पाषाणनिर्मित सुन्दर द्विदेवकुल नामक लिङ्गको, पूर्वमें मेरे द्वारा स्थापित महाप्रमाण लिङ्ग तथा पश्चिममें पर्वतपर स्थित ब्रह्मोश्वर अलेश्वर नामक |
| ४८८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| Sanskrit Shloka | Hindi Translation |
|---|---|
| अलङ्कृतं त्वया ब्रह्मन् पुरस्तान्मुनिभिः सह।<br>इत्युक्त्वा तद्गृहेऽतिष्ठदलङ्गृहमिति स्मृतम्॥ १६० | लिङ्गको देखो। महादेवने ब्रह्मासे कहा था—‘हे ब्रह्मन्! आपने मुनियोंके साथ इसे अलंकृत किया है’—ऐसा कहकर वे रुद्र उस गृहमें स्थित हो गये, अतः उसे अलंगृह कहा गया है॥ १५८–१६०॥ |
| तत्रापि तीर्थं तीर्थज्ञे व्योमलिङ्गं च पश्य मे।<br>कदम्बेश्वरमेतद्धि स्कन्देनैव प्रतिष्ठितम्॥ १६१<br><br>गोमण्डलेश्वरं चैव नन्दाद्यैः सुप्रतिष्ठितम्।<br>देवैः सर्वैस्तु शक्राद्यैः स्थापितानि वरानने॥ १६२<br><br>श्रीमद्देवह्रदप्रान्ते स्थानानीमानि पश्य मे।<br>तथा हारपुरे देवि तव हारे निपातिते॥ १६३<br><br>त्वया हिताय जगतां हारकुण्डमिदं कृतम्।<br>शिवरुद्रपुरे चैव तत्कायोपरि सुव्रते॥ १६४<br><br>तत्र पित्रा सुशैलेन स्थापितं त्वचलेश्वरम्।<br>अलङ्कृतं मया ब्रह्मपुरस्तान्मुनिभिः सह॥ १६५<br><br>चण्डिकेश्वरकं देवि चण्डिकेशा तवात्मजा।<br>चण्डिकानिर्मितं स्थानमम्बिकातीर्थमुत्तमम्॥ १६६<br><br>रुचिकेश्वरकं चैव धारैषा कपिला शुभा।<br>एतेषु देवि स्थानेषु तीर्थेषु विविधेषु च॥ १६७ | हे तीर्थज्ञे! वहाँपर स्थित मेरे व्योमलिङ्ग तीर्थको भी देखो; कदम्बेश्वर नामवाला यह तीर्थ स्कन्दके द्वारा स्थापित किया गया है। नन्द आदिके द्वारा विधिवत् स्थापित गोमण्डलेश्वरको भी देखो। हे वरानने! शोभासम्पन्न देव-ह्रद (सरोवर)-के तटपर इन्द्र आदि सभी देवताओंके द्वारा स्थापित किये गये मेरे इन स्थानोंका अवलोकन करो। हे देवि! हारपुरमें तुम्हारे हारके गिर जानेपर तुमने जगत्के हितके लिये इसे हारकुण्ड बना दिया था। हे सुव्रते! शिवरुद्रपुरमें उस पर्वतपर तुम्हारे पिता सुशैलने अचलेश्वरकी स्थापना की थी, जिसे मैंने ब्रह्मा आदि ऋषियोंके साथ सुशोभित किया था। हे देवि! तुम्हारी पुत्री चण्डिकेशाने चण्डिकेश्वरको स्थापित किया है; चण्डिकाके द्वारा स्थापित यह स्थान उत्तम अम्बिकातीर्थ है। यह रुचिकेश्वर तीर्थ है; यह पवित्र कपिलधारा [तीर्थ] है॥ १६१–१६६ १/२॥ |
| पूजयेन्मां सदा भक्त्या मया सार्धं हि मोदते।<br>श्रीशैले सन्त्यजेद्देहं ब्राह्मणो दग्धकिल्बिषः॥ १६८<br><br>मुच्यते नात्र सन्देहो ह्यविमुक्ते यथा शुभम्।<br>महास्नानं च यः कुर्याद् घृतेन विधिनैव तु॥ १६९<br><br>स याति मम सायुज्यं स्थानेष्वेतेषु सुव्रते।<br>स्नानं पलशतं ज्ञेयमभ्यङ्गं पञ्चविंशति॥ १७०<br><br>पलानां द्वे सहस्रे तु महास्नानं प्रकीर्तितम्।<br>स्नाप्य लिङ्गं मदीयं तु गव्येनैव घृतेन च॥ १७१ | हे देवि! जो इन विविध स्थानों तथा तीर्थोंमें भक्तिपूर्वक सदा मेरी पूजा करता है, वह मेरे साथ आनन्द करता है। जो ब्राह्मण श्रीशैलपर शरीरत्याग करता है, वह पापरहित होकर मुक्त हो जाता है, जिस प्रकार अविमुक्तक्षेत्रमें शुभ फल होता है; इसमें सन्देह नहीं है। हे सुव्रते! जो इन स्थानोंमें विधिपूर्वक घृतसे महास्नान कराता है, वह मेरा सायुज्य प्राप्त करता है। पचीस पल [घृत]-का ‘अभ्यंग’ तथा सौ पलका ‘स्नान’ जानना चाहिये। दो हजार पलोंसे स्नान करानेको ‘महास्नान’ कहा गया है॥ १६७–१७० १/२॥ |
| विशोध्य सर्वद्रव्यैस्तु वारिभिरभिषिञ्चति।<br>सम्मार्ज्य शतयज्ञानां स्नानेन प्रयुतं तथा॥ १७२<br><br>पूजया शतसाहस्रमनन्तं गीतवादिनाम्।<br>महास्नाने प्रसक्ते तु स्नानमष्टगुणं स्मृतम्॥ १७३<br><br>जलेन केवलेनैव गन्धतोयेन भक्तितः।<br>अनुलेपनं तु तत्सर्वं पञ्चविंशतपलेन वै॥ १७४ | जो मेरे लिङ्गको गायके घीसे स्नान कराकर सभी पूजाद्रव्योंसे विशुद्ध करके जलसे मेरा अभिषेक करता है—इस प्रकार मार्जन करनेसे सौ यज्ञोंका, स्नान करानेसे तथा पूजा करानेसे लाख-लाख यज्ञोंका, गीतवाद्य आदिसे अर्चन करनेपर अनन्त यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। महास्नानमें रुचि रखनेवाले भक्तोंको स्नानका आठ गुना (आठ लाख यज्ञोंका) फल बताया गया है। केवल जलसे अथवा भक्ति- |
अध्याय १२ ] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८९
| शमीपुष्पं च विधिना बिल्वपत्रं च पङ्कजम्।<br>अन्यान्यपि च पुष्पाणि बिल्वपत्रं न सन्त्यजेत्॥ १७५<br><br>चतुर्द्रोणैर्महादेवमष्टद्रोणैरथापि वा।<br>दशद्रोणैस्तु नैवेद्यमष्टद्रोणैरथापि वा॥ १७६<br><br>शतद्रोणसमं पुण्यमाढकेऽपि विधीयते।<br>वित्तहीनस्य विप्रस्य नात्र कार्या विचारणा॥ १७७ | पूर्वक गन्धयुक्त जलसे अभ्यंग पचीस पलसे करना चाहिये॥ १७१–१७४॥<br><br>विधिपूर्वक शमीपुष्प, बिल्वपत्र, कमल तथा अन्य पुष्प अर्पित करना चाहिये; बिल्वपत्रका त्याग [कभी नहीं] करना चाहिये। महादेवकी पूजा चार अथवा आठ द्रोण पुष्पोंसे करनी चाहिये और दस अथवा आठ द्रोण नैवेद्य अर्पित करना चाहिये। धनहीन ब्राह्मणके लिये एक आढक नैवेद्यका पुण्य सौ द्रोण नैवेद्यके पुण्यके समान बताया गया है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ १७५–१७७॥ | | भेरीमृदङ्गमुरजतिमिरापटहादिभिः ।<br>वादित्रैर्विविधैश्चान्यैर्निनादैर्विविधैरपि ॥ १७८<br><br>जागरं कारयेद्यस्तु प्रार्थयेच्च यथाक्रमम्।<br>स भृत्यपुत्रदारैश्च तथा सम्बन्धिबान्धवैः॥ १७९<br><br>सार्धं प्रदक्षिणं कृत्वा प्रार्थयेल्लिङ्गमूत्तमम्।<br>द्रव्यहीनं क्रियाहीनं श्रद्धाहीनं सुरेश्वर॥ १८०<br><br>कृतं वा न कृतं वापि क्षन्तुमर्हसि शङ्कर।<br>इत्युक्त्वा वै जपेद्रुद्रं त्वरितं शान्तिमेव च॥ १८१<br><br>जपित्वैवं महाबीजं तथा पञ्चाक्षरस्य वै।<br>स एवं सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु यत्फलम्॥ १८२<br><br>तत्फलं समवाप्नोति वाराणस्यां यथा मृतः।<br>तथैव मम सायुज्यं लभते नात्र संशयः॥ १८३<br><br>मत्प्रियार्थमिदं कार्यं मद्भक्तैर्विधिपूर्वकम्।<br>ये न कुर्वन्ति ते भक्ता न भवन्ति न संशयः॥ १८४ | भेरी, मृदंग, मुरज, तिमिर, पटह आदि विविध वाद्य यन्त्रों और अन्य प्रकारके निनादोंके द्वारा [रात्रिमें] जो जागरण करे, उसे अपने सेवकों, पुत्रों, पत्नी, सम्बन्धियों तथा बन्धुओंके साथ प्रदक्षिणा करके उत्तम लिङ्गसे इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—'हे सुरेश्वर! हे शंकर! मैंने जो भी द्रव्यहीन, क्रियाहीन तथा श्रद्धाहीन [पूजन] किया है अथवा जो नहीं भी किया गया है, उसे आप कृपा करके क्षमा करें'—यह प्रार्थना करके त्वरित रुद्र तथा शान्तिमन्त्रका जप करना चाहिये। पंचाक्षरके महाबीजका जप करके वह सभी तीर्थोंमें जाने तथा सभी यज्ञोंको करनेसे जो फल होता है, उस फलको प्राप्त कर लेता है और वाराणसीमें मरनेपर जो सायुज्य गति होती है, मेरे उस सायुज्यको प्राप्त कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं है। [हे देवि!] मेरे भक्तोंको चाहिये कि मेरी प्रसन्नताके लिये विधिपूर्वक यह सब करें। जो ऐसा नहीं करते, वे मेरे भक्त नहीं होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है॥ १७८–१८४॥ | | सूत उवाच<br>निशम्य वचनं देवी गत्वा वाराणसीं पुरीम्।<br>अविमुक्तेश्वरं लिङ्गं पयसा च घृतेन च॥ १८५<br><br>अर्चयामास देवेशं रुद्रं भुवननायकम्।<br>अविमुक्ते च तपसा मन्दरस्य महात्मनः॥ १८६<br><br>कल्पयामास वै क्षेत्रं मन्दरे चारुकन्दरे।<br>तत्रान्धकं महादैत्यं हिरण्याक्षसुतं प्रभुः॥ १८७ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] यह वचन सुनकर वाराणसीपुरी जाकर देवीने दूध तथा घीसे अविमुक्तेश्वर लिङ्गको स्नान कराकर भुवननायक देवेश रुद्रका अर्चन किया और अविमुक्त [काशी]-में तपस्याके द्वारा मन्दर-पर्वतपर एक सुन्दर कन्दरामें महात्मा मन्दरका क्षेत्र निर्मित किया; वहाँ प्रभु [शिव]-ने हिरण्याक्षके |
९३- हिरण्याक्षपुत्र अन्धकासुरका आख्यान तथा शिवानुग्रहसे उसे गाणपत्यपदकी प्राप्ति
| ४९० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| अनुगृह्य गणत्वं च प्रापयामास लीलया।<br>एतद्वः कथितं सर्वं कथासर्वस्वमादरात्॥ १८८<br><br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि क्षेत्रमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>सर्वक्षेत्रेषु यत्पुण्यं तत्सर्वं सहसा लभेत्॥ १८९<br><br>श्रावयेद्वा द्विजान् सर्वान् कृतशौचान् जितेन्द्रियान्।<br>स एव सर्वयज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ १९० | पुत्र महादैत्य अन्धकपर अनुग्रह करके लीलापूर्वक उसे गणत्व प्राप्त कराया था। [हे ऋषियो!] इस प्रकार मैंने आप लोगोंसे आदरपूर्वक सम्पूर्ण कथासार कहा। जो मनुष्य इस क्षेत्रके उत्तम माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सभी क्षेत्रोंमें वासका जो पुण्य होता है, वह सब तत्काल प्राप्त कर लेता है अथवा जो सभी पवित्र तथा जितेन्द्रिय द्विजोंको सुनाता है, वह भी समस्त यज्ञोंका फल प्राप्त कर लेता है॥ १८५-१९०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वाराणसीश्रीशैलमाहात्म्यकथनं नाम द्विनवतितमोऽध्यायः॥ ९२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'वाराणसीश्रीशैलमाहात्म्यकथन' नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९२॥
तिरानबेवाँ अध्याय
हिरण्याक्षपुत्र अन्धकासुरका आख्यान तथा शिवानुग्रहसे उसे गाणपत्यपदकी प्राप्ति
| ऋषय ऊचुः<br>अन्धको नाम दैत्येन्द्रो मन्दरे चारुकन्दरे।<br>दमितस्तु कथं लेभे गाणपत्यं महेश्वरात्॥ १<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं यथावृत्तं यथाश्रुतम्। | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] अन्धक नामक दैत्यराजने मन्दरपर्वतकी सुन्दर गुफामें दमित होकर किस प्रकार महेश्वरसे गाणपत्य (गणपतिपद) प्राप्त किया; जिस प्रकार यह घटित हुआ और जैसा आपने सुना है, वह कृपापूर्वक हम लोगोंको बताइये॥ १ १/२॥ |
|---|---|
| सूत उवाच<br>अन्धकानुग्रहं चैव मन्दरे शोषणं तथा॥ २<br>वरलाभमशेषं च प्रवदामि समासतः।<br>हिरण्याक्षस्य तनयो हिरणयनयनोपमः॥ ३<br>पुरान्धक इति ख्यातस्तपसा लब्धविक्रमः।<br>प्रसादाद् ब्रह्मणः साक्षादवध्यत्वमवाप्य च॥ ४<br>त्रैलोक्यमखिलं भुक्त्वा जित्वा चेन्द्रपुरं पुरा।<br>लीलया चाप्रयत्नेन त्रासयामास वासवम्॥ ५ | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] मैं अन्धकपर [शिवजीके] अनुग्रह, मन्दरपर उसके दमन तथा वरप्राप्ति—यह सब संक्षेपमें बता रहा हूँ। प्राचीनकालमें हिरण्याक्षका एक पुत्र था; हिरण्याक्षके समान शक्तिशाली वह अन्धक—इस नामसे प्रसिद्ध हुआ और उसने तपस्यासे महान् पराक्रम प्राप्त कर लिया। वह साक्षात् ब्रह्माकी कृपासे [किसीसे] न मारे जानेका वर प्राप्त करके सम्पूर्ण त्रिलोकोंका उपभोग करके इन्द्रलोकको लीलापूर्वक बिना प्रयासके ही जीतकर इन्द्रको पीड़ित करने लगा॥ २-५॥ |
| बाधितास्ताडिता बद्धाः पातितास्तेन ते सुराः।<br>विविशुर्मन्दरं भीता नारायणपुरोगमाः॥ ६ | उसके द्वारा कष्ट पहुँचाये गये, पीटे गये, बाँधे गये, गिराये गये नारायण आदि वे देवता डरकर मन्दरपर्वतकी गुफामें प्रविष्ट हो गये॥ ६॥ |
| एवं सम्पीड्य वै देवानन्धकोऽपि महासुरः।<br>यदृच्छया गिरिं प्राप्तो मन्दरं चारुकन्दरम्॥ ७ | इस प्रकार देवताओंको बहुत पीड़ित करके |
अध्याय ९३] हिरण्याक्षपुत्र अन्धकासुरका आख्यान तथा शिवानुग्रहसे उसे गाणपत्यपदकी प्राप्ति | ४९१
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| ततस्ते समस्ताः सुरेन्द्राः ससाध्याः<br>सुरेशं महेशं पुरेत्याहुरेवम्।<br>द्रुतं चाल्पवीर्यप्रभिन्नाङ्गभिन्ना<br>वयं दैत्यराजस्य शस्त्रैर्निकृत्ताः॥ ८ | महादैत्य अन्धक भी अपनी इच्छासे सुन्दर गुफावाले मन्दरपर्वतपर पहुँच गया॥ ७॥<br><br>तब साध्योंसहित वे सभी देवगण शीघ्र ही सुरेश्वर महेशके सामने पहुँचकर इस प्रकार बोले—'दैत्यराज [अन्धक]-के शस्त्रोंसे काटे गये हमलोग छिन्न-भिन्न अंगोंवाले हो गये हैं और अल्प पराक्रमवाले हो गये हैं'॥ ८॥ |
| इतीदमखिलं श्रुत्वा दैत्यागमनमौपमम्।<br>गणेश्वरैश्च भगवानन्धकाभिमुखं ययौ॥ ९ | तब दैत्यका अद्भुत आगमन-सम्बन्धी यह सब वृत्तान्त सुनकर भगवान् शिव अपने गणेश्वरोंके साथ अन्धकके समक्ष पहुँचे॥ ९॥ |
| तत्रेन्द्रपद्मोद्भवविष्णुमुख्याः<br>सुरेश्वरा विप्रवराश्च सर्वे।<br>जयेति वाचा भगवन्तमूचुः<br>किरीटबद्धाञ्जलयः समन्तात्॥ १० | उस समय इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु आदि प्रधान सुरेश्वर तथा श्रेष्ठ विप्र—ये सब बद्ध अञ्जलियोंको सिरसे लगाकर चारों ओरसे भगवान् शिवकी जय बोलने लगे॥ १०॥ |
| अथाशेषासुरांस्तस्य कोटिकोटिशतैस्ततः।<br>भस्मीकृत्य महादेवो निर्बिभेदान्धकं तदा॥ ११ | तब महादेवने सैकड़ों-करोड़ों सैनिकोंके साथ उस अन्धकके समस्त राक्षसोंको भस्म करके अन्धकको [अपने त्रिशूलसे] बींध डाला॥ ११॥ |
| शूलेन शूलिना प्रोतं दग्धकल्मषकञ्चुकम्।<br>दृष्ट्वान्धकं ननादेशं प्रणम्य स पितामहः॥ १२ | शिवके द्वारा त्रिशूलसे बींधे गये उस दग्धपापरूपी कंचुकवाले अन्धकको देखकर ब्रह्माजी ईश्वर (शिव)-को प्रणाम करके [प्रसन्नतासे] निनाद करने लगे॥ १२॥ |
| तन्नादश्रवणान्नेदुर्देवा देवं प्रणम्य तम्।<br>ननृतुर्मुनयः सर्वे मुमुदुर्गणपुङ्गवाः॥ १३<br><br>ससृजुः पुष्पवर्षाणि देवाः शाम्भोस्तदोपरि।<br>त्रैलोक्यमखिलं हर्षान्ननन्द च ननाद च॥ १४ | उस ध्वनिको सुनकर सभी देवता, मुनि तथा श्रेष्ठ गण भी उन्हें प्रणाम करके हर्षध्वनि करने लगे, नाचने लगे और आनन्द मनाने लगे। देवताओंने उस समय शिवजीके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा की और सम्पूर्ण त्रैलोक्य हर्षके कारण आनन्दित हो उठा तथा ध्वनि करने लगा॥ १३-१४॥ |
| दग्धोऽग्निना च शूलेन प्रोतः प्रेत इवान्धकः।<br>सात्त्विकं भावमास्थाय चिन्तयामास चेतसा॥ १५ | प्रज्वलित अग्निवाले त्रिशूलसे बींधा हुआ प्रेततुल्य वह अन्धक सात्त्विक भावमें स्थित होकर मनमें सोचने लगा— |
| जन्मान्तरेऽपि देवेन दग्धो यस्माच्छिवेन वै।<br>आराधितो मया शम्भुः पुरा साक्षान्महेश्वरः॥ १६<br><br>तस्मादेतन्मया लब्धमन्यथा नोपपद्यते।<br>यः स्मरेन्मनसा रुद्रं प्राणान्ते सकृदेव वा॥ १७ | 'पूर्वजन्ममें भी शिवने मुझे दग्ध किया था, मैंने पहले साक्षात् महेश्वर शिवकी आराधना की थी, इसीलिये मैंने ऐसी गति प्राप्त की, अन्यथा ऐसा कभी न होता। जो [व्यक्ति] मृत्युकालके समय एक बार भी मनसे शिवका स्मरण करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त |
| स याति शिवसायुज्यं किं पुनर्बहुशः स्मरन्।<br>ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः सर्वे देवाः सवासवाः॥ १८ | करता है, तो फिर जो बहुत बार स्मरण करे, उसका कहना ही क्या! ब्रह्मा, भगवान् विष्णु और इन्द्रसहित सभी |
९४- भगवान्के वाराहावतारकी कथा, हिरण्याक्षका वध तथा देवताओंद्वारा भगवान् वाराहकी स्तुति
| ४९२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| शरणं प्राप्य तिष्ठन्ति तमेव शरणं व्रजेत्।<br>एवं सञ्चिन्त्य तुष्टात्मा सोऽन्धकश्चान्धकार्दनम्॥ १९<br><br>सगणं शिवमीशानमस्तुवत्पुण्यगौरवात्।<br>प्रार्थितस्तेन भगवान् परमार्तिहरो हरः॥ २०<br><br>हिरण्यनेत्रतनयं शूलाग्रस्थं सुरेश्वरः।<br>प्रोवाच दानवं प्रेक्ष्य घृणया नीललोहितः॥ २१<br><br>तुष्टोऽस्मि वत्स भद्रं ते कामं किं करवाणि ते।<br>वरान् वरय दैत्येन्द्र वरदोऽहं तवान्धक॥ २२<br><br>श्रुत्वा वाक्यं तदा शम्भोर्हिरण्यनयनात्मजः।<br>हर्षगद्गदया वाचा प्रोवाचेदं महेश्वरम्॥ २३<br><br>भगवन् देवदेवेश भक्तार्तिहर शङ्कर।<br>त्वयि भक्तिः प्रसीदेश यदि देयो वरश्च मे॥ २४<br><br>श्रुत्वा भवोऽपि वचनमन्धकस्य महात्मनः।<br>प्रददौ दुर्लभां श्रद्धां दैत्येन्द्राय महाद्युतिः॥ २५<br><br>गाणपत्यं च दैत्याय प्रददौ चावरोप्य तम्।<br>प्रणेमुस्तं सुरेन्द्राद्या गाणपत्ये प्रतिष्ठितम्॥ २६ | देवता उन्हींकी शरण ग्रहण करके स्थित हैं, अतः उन्हीं [शिव]-की शरणमें जाना चाहिये'॥ १५-१८<sup>१/२</sup>॥<br><br>इस प्रकार विचार करके वह अन्धक अपने पुण्यगौरवके कारण गणोंसहित अन्धकका संहार करनेवाले उन ईशान शिवकी स्तुति करने लगा। तब उसके द्वारा प्रार्थित होकर बड़े-से-बड़े दुःखका हरण करनेवाले नीललोहित सुरेश्वर भगवान् हर [अपने] त्रिशूलके अग्रभागपर स्थित हिरण्याक्षपुत्र [अन्धक]-की ओर दयापूर्वक देखकर उससे बोले—'हे वत्स! मैं [तुमपर] प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; मैं तुम्हारी कौन-सी कामना पूर्ण करूँ? हे दैत्येन्द्र! वर माँगो। हे अन्धक! मैं तुम्हें वर देनेवाला हूँ'॥ १९-२२॥<br><br>तब शम्भुका वचन सुनकर हिरण्याक्षपुत्रने हर्षके कारण गद्गद वाणीमें महेश्वरसे यह कहा—'हे भगवन्! हे देवदेवेश! भक्तोंका कष्ट हरनेवाले हे शंकर! मुझपर प्रसन्न होइये। हे ईश! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं, तो यही वर प्रदान करें कि आपमें [सदा] मेरी भक्ति हो'॥ २३-२४॥<br><br>महान् आत्मावाले अन्धकका वचन सुनकर परम कान्तिवाले शिवने [उस] दैत्येन्द्रको [अपनी] दुर्लभ भक्ति प्रदान की और उस दैत्यको त्रिशूलपरसे उतारकर उसे गणाधिप पद प्रदान किया। तब इन्द्र आदि देवताओंने गाणपत्य पदपर प्रतिष्ठित उस अन्धकको प्रणाम किया॥ २५-२६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अन्धकगाणपत्यात्मको नाम त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अन्धकगाणपत्यात्मक' नामक तिरानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९३॥
चौरानबेवाँ अध्याय
भगवान्के वाराहावतारकी कथा, हिरण्याक्षका वध तथा देवताओंद्वारा भगवान् वाराहकी स्तुति
| ऋषय ऊचुः<br>कथमस्य पिता दैत्यो हिरण्याक्षः सुदारुणः।<br>विष्णुना सूदतो विष्णुर्वाराहत्वं कथं गतः॥ १<br>तस्य शृङ्गं महेशस्य भूषणत्वं कथं गतम्।<br>एतत्सर्वं विशेषेण सूत वक्तुमिहार्हसि॥ २ | ऋषिगण बोले—हे सूतजी! [भगवान्] विष्णुके द्वारा इस [अन्धक]-का पिता महाभयंकर दैत्य हिरण्याक्ष कैसे मारा गया, विष्णुने वाराहका रूप क्यों धारण किया और उनकी सींगने महेश्वरका भूषणत्व कैसे प्राप्त किया? यह सब आप विशेषरूपसे बताइये॥ १-२॥ |
अध्याय ९४] भगवान्के वाराहावतारकी कथा, हिरण्याक्षका वध... भगवान् वराहकी स्तुति ४९३
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| हिरण्यकशिपोर्भ्राता हिरण्याक्ष इति स्मृतः।<br>पुरान्धकासुरेशस्य पिता कालान्तकोपमः॥ ३<br>देवाञ्जित्वाथ दैत्येन्द्रो बद्ध्वा च धरणीमिमाम्।<br>नीत्वा रसातलं चक्रे बन्दीमिन्दीवरप्रभाम्॥ ४ | —[हे ऋषियो!] हिरण्याक्ष हिरण्य-कशिपुका भाई कहा गया है। पूर्वकालमें असुरेन्द्र अन्धकके पिता दैत्येन्द्र हिरण्याक्षने, जो कालान्तकके समान था, देवताओंको जीतकर कमलके समान प्रभावृाली इस पृथ्वीको बाँधकर रसातलमें ले जाकर उसे बन्दी बना लिया॥ ३-४॥ |
| ततः सब्रह्मका देवाः परिम्लानमुखश्रियः।<br>बाधितास्ताडिता बद्धा हिरण्याक्षेण तेन वै॥ ५<br>बलिना दैत्यमुख्येन क्रूरेण सुदुरात्मना।<br>प्रणम्य शिरसा विष्णुं दैत्यकोटिविमर्दनम्॥ ६<br>सर्वे विज्ञापयामासुर्धरणीबन्धनं हरेः।<br>श्रुत्वैतद्भगवान् विष्णुर्धरणीबन्धनं हरिः॥ ७ | तदनन्तर बलशाली, क्रूर तथा अति दुरात्मा उस महादैत्य हिरण्याक्षके द्वारा सताये गये, पीटे गये तथा बाँधे गये ब्रह्मासहित मुरझाये मुखश्रीवाले सभी देवताओंने करोड़ों दैत्योंका संहार करनेवाले विष्णुको प्रणाम करके पृथ्वीके बन्धनका वृत्तान्त उन हरिको बताया॥ ५-६ १/२॥ |
| भूत्वा यज्ञवराहोऽसौ यथा लिङ्गोद्भवे तथा।<br>दैत्यैश्च सार्धं दैत्येन्द्रं हिरण्याक्षं महाबलम्॥ ८<br>दंष्ट्राग्रकोट्या हत्वैनं रेजे दैत्यान्तकृत्प्रभुः।<br>कल्पादिषु यथापूर्वं प्रविश्य च रसातलम्॥ ९<br>आनीय वसुधां देवीमङ्कस्थामकरोद् बहिः।<br>ततस्तुष्टाव देवेशं देवदेवः पितामहः॥ १० | इस पृथ्वीबन्धनको सुनकर उन भगवान् श्रीहरि विष्णुने लिङ्ग-प्रादुर्भावके समय जैसा रूप धारण किया था, वैसा ही यज्ञवराहका रूप धारणकर वे अपने दाँतोंके आगेके नुकीले भागसे [सभी] दैत्योंसहित महाबली दैत्यराज हिरण्याक्षका वध करके सुशोभित हुए। दैत्योंका अन्त करनेवाले उन प्रभुने जैसे पूर्व कल्पोंमें रसातलमें प्रवेश किया था, वैसे ही रसातलमें प्रवेश करके पृथ्वीदेवीको अपनी गोदमें रखकर वहाँसे लाकर पुनः बाहर स्थापित कर दिया॥ ७-९ १/२॥ |
| शक्राद्यैः सहितो भूत्वा हर्षगद्गदया गिरा।<br>शाश्वताय वराहाय दंष्ट्रिणे दण्डिने नमः॥ ११<br>नारायणाय सर्वाय ब्रह्मणे परमात्मने।<br>कर्त्रे धर्त्रे धरायास्तु हर्त्रे देवारिणां स्वयम्।<br>कर्त्रे नेत्रे सुरेन्द्राणां शास्त्रे च सकलस्य च॥ १२ | तत्पश्चात् देवदेव ब्रह्मा हर्षयुक्त गद्गद वाणीमें इन्द्र आदि [देवताओं]-के साथ मिलकर [उन] देवेशकी स्तुति करने लगे—शाश्वत, दंष्ट्र (दाढ़)-वाले, दण्डधारी, नारायण, सर्वमय, ब्रह्मस्वरूप, परमात्मा, पृथ्वीकी रचना तथा रक्षा करनेवाले, देवताओंके शत्रुओंका नाश करनेवाले, सुरेन्द्रोंके जनक एवं नायक और सबके नियन्ता [भगवान्] वराहको नमस्कार है॥ १०-१२॥ |
| त्वमष्टमूर्तिस्त्वमनन्तमूर्ति-<br>स्त्वमादिदेवस्त्वमनन्तवेदितः।<br>त्वया कृतं सर्वमिदं प्रसीद<br>सुरेश लोकेश वराह विष्णो॥ १३ | हे सुरेश! हे लोकेश! हे वराह! हे विष्णो! आप अष्टमूर्ति हैं, आप अनन्तमूर्ति हैं, आप आदिदेव हैं, आप सर्वज्ञ हैं; आपने ही इस सम्पूर्ण जगत्की रचना की है; आप प्रसन्न होइये॥ १३॥ |
| तथैकदंष्ट्राग्रमुखाग्रकोटि-<br>भागैकभागार्धतमेन विष्णो।<br>हताः क्षणात्कामददैत्यमुख्याः<br>स्वदंष्ट्रकोट्या सह पुत्रभृत्यैः॥ १४ | हे विष्णो! आपने एक दाढ़के अग्र भागकी कोटिके एक भागके आधे भागके बराबर अपनी दाढ़की कोटिसे ही पुत्रों तथा सेवकोंसमेत कामद आदि प्रधान दैत्योंको क्षणभरमें मार डाला॥ १४॥ |
| श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग ] |
|---|---|
| ४९४ |
| श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्वयोद्धृता देव धरा धरेश<br>धराधराकार धृताग्रदंष्ट्रे।<br>धराधरैः सर्वजनैः समुद्रैः<br>सुरासुरैः सेवितचन्द्रवक्त्र ॥ १५ | हे देव! हे धरेश! हे पर्वताकार! हे सेवितचन्द्रवक्त्र!<br>आपने दिग्गजों, सभी प्राणियों, समुद्रों, देवताओं तथा असुरोंसहित पृथ्वीको उठा लिया और उसे अपनी दाढ़के अग्र भागपर रख लिया ॥ १५ ॥ |
| त्वयैव देवेश विभो कृतश्च<br>जयः सुराणामसुरेश्वराणाम्।<br>अहो प्रदत्तस्तु वरः प्रसीद<br>वाग्देवतावारिजसम्भवाय ॥ १६ | हे देवेश! हे विभो! आपने ही असुरोंपर देवताओंकी विजय दिलायी है। अहो, आपने ही सरस्वतीयुक्त ब्रह्माको वर दिया था; आप प्रसन्न हो जाइये ॥ १६ ॥ |
| तव रोम्णि सकलाम्रेश्वरा<br>नयनद्वये शशिरवी पदद्वये।<br>निहिता रसातलगता वसुन्धरा<br>तव पृष्ठतः सकलतारकादयः ॥ १७ | सभी देवता आपके रोममें स्थित हैं, चन्द्रमा तथा सूर्य आपके दोनों नेत्रोंमें विराजमान हैं, रसातलमें गयी हुई पृथ्वी आपके दोनों चरणोंमें निहित है, सम्पूर्ण तारे आदि आपकी पीठपर स्थित हैं ॥ १७ ॥ |
| जगतां हिताय भवता वसुन्धरा<br>भगवन् रसातलपुटं गता तदा।<br>अबलोद्धृता च भगवंस्त्वयैव<br>सकलं त्वयैव हि धृतं जगद्गुरो ॥ १८ | हे भगवन्! आपने रसातलमें गयी हुई अबला पृथ्वीका उद्धार जगत्के हितके लिये किया है। हे भगवन्! हे जगद्गुरो! आपने ही सबको धारण किया है ॥ १८ ॥ |
| इति वाक्पतिर्बहुविधैस्तवार्त्चनैः<br>प्रणिपत्य विष्णुममरैः प्रजापतिः।<br>विविधान् वरान् हरिमुखात्तु लब्धवान्<br>हरिनाभिवारिजदेहभृत्स्वयम् ॥ १९ | इस प्रकार श्रीहरिके नाभिकमलसे उत्पन्न होनेवाले प्रजापति ब्रह्माने देवताओंके साथ अनेक प्रकारके स्तुतिवचनोंसे [वाराहरूपधारी] विष्णुको प्रणाम करके उन [भगवान्] विष्णुके मुखसे अनेक वर प्राप्त किये ॥ १९ ॥ |
| अथ तामुद्धृतां तेन धरां देवा मुनीश्वराः।<br>मूर्ध्न्यारोप्य नमश्चक्रुश्चक्रिणः सन्निधौ तदा ॥ २० | इसके बाद सभी देवताओं तथा मुनीश्वरोंनै उन विष्णुके द्वारा लायी गयी पृथ्वीको [अपने] सिरसे |
अध्याय ९४] भगवान्के वाराहावतारकी कथा, हिरण्याक्षका वध... भगवान् वराहकी स्तुति | ४९५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अनेनैव वराहेण चोद्धृतासि वरप्रदे।<br>कृष्णेनाक्लिष्टकार्येण शतहस्तेन विष्णुना॥ २१<br><br>धरणि त्वं महाभोगे भूमिस्त्वं धेनुरव्यये।<br>लोकानां धारणी त्वं हि मृत्तिके हर पातकम्॥ २२<br><br>मनसा कर्मणा वाचा वरदे वारिजेक्षणे।<br>त्वया हतेन पापेन जीवामस्त्वत्प्रसादतः॥ २३ | लगाकर चक्रधारी विष्णुके सामने ही उसे नमस्कार किया। [वे बोले—] हे वरप्रदे! सहज क्रिया-कलापोंवाले तथा सैकड़ों हाथोंवाले वाराहरूपधारी इन विष्णुने ही आपका उद्धार किया है। हे धरणि! हे महाभोगे! आप भूमि हैं। हे अव्यये! आप धेनु हैं। हे मृत्तिके! आप लोकोंको धारण करनेवाली हैं; [हमारे] पापको दूर कीजिये। हे वरदे! हे कमलनयने! हमलोगोंद्वारा मन-वचन-कर्मसे किये गये पाप आपके द्वारा नष्ट किये जानेपर ही हमलोग आपकी कृपासे जीते हैं॥ २०–२३॥ |
| इत्युक्ता सा तदा देवी धरा देवैरथाब्रवीत्।<br>वराहदंष्ट्राभिन्नायां धरायां मृत्तिकां द्विजाः॥ २४<br><br>मन्त्रेणानेन योऽबिभ्रत् मूर्ध्नि पापात्प्रमुच्यते।<br>आयुष्मान् बलवान् धन्यः पुत्रपौत्रसमन्वितः॥ २५<br><br>क्रमाद्भुवि दिवं प्राप्य कर्मान्ते मोदते सुरैः। | देवताओंके द्वारा ऐसा कहे जानेपर उन पृथ्वीदेवीने कहा—'हे द्विजो! जो [व्यक्ति] वराहके दंष्ट्रासे खोदी गयी पृथ्वीकी मिट्टीको [पूर्वोक्त] इस मन्त्रसे अपने सिरपर धारण करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है; वह क्रमसे पृथ्वीलोकमें दीर्घजीवी, बलवान्, धन्य और पुत्र-पौत्रसे युक्त होता है, पुनः प्रारब्ध कर्मके क्षीण होनेपर स्वर्ग प्राप्त करके देवताओंके साथ आनन्द मनाता है'॥ २४-२५ १/२॥ |
| अथ देवे गते त्यक्त्वा वराहे क्षीरसागरम्॥ २६<br><br>वाराहरूपमनघं चचाल च धरा पुनः।<br>तस्य दंष्ट्राभराक्रान्ता देवदेवस्य धीमतः॥ २७<br><br>यदृच्छया भवः पश्यन् जगाम जगदीश्वरः।<br>दंष्ट्रां जग्राह दृष्ट्वा तां भूषणार्थमथात्मनः॥ २८<br><br>दधार च महादेवः कूर्चान्ते वै महोरसि। | इसके बाद निष्पाप वाराहरूपको त्यागकर भगवान् वराहके क्षीरसागर चले जानेपर उन बुद्धिमान् देवदेवके दाढ़ोंके भारसे आक्रान्त पृथ्वी एक बार पुनः हिल गयी। संयोगवश यह सब देखते हुए जगत्के स्वामी शिव वहाँ पहुँच गये और उन्होंने उस दंष्ट्राको देखकर उसे अपने भूषणके लिये ग्रहण कर लिया। महादेवने उसे अपने श्मश्रु (दाढ़ी)-के केशके समीप विशाल वक्षःस्थलपर धारण कर लिया॥ २६–२८ १/२॥ |
| देवाश्च तुष्टुवुः सेन्द्रा देवदेवस्य वैभवम्॥ २९<br><br>धरा प्रतिष्ठिता ह्येवं देवदेवेन लीलया।<br>भूतानां सम्प्लवे चापि विष्णोश्चैव कलेवरम्॥ ३०<br><br>ब्रह्मणश्च तथान्येषां देवानापि लीलया।<br>विभुरङ्गविभागेन भूषितो न यदि प्रभुः॥ ३१<br><br>कथं विमुक्तिर्विप्राणां तस्माद्दंष्ट्री महेश्वरः॥ ३२ | तब इन्द्रसहित सभी देवगण देवदेव [शिव]-के ऐश्वर्यकी स्तुति करने लगे। इस प्रकार देवदेवने लीलापूर्वक पृथ्वीको प्रतिष्ठित किया। महाप्रलयकालमें भी विष्णु, ब्रह्मा तथा अन्य देवताओंके कलेवरको देखकर यदि सर्वव्यापक प्रभु [शिव] भक्तवात्सल्यके कारण [विष्णुके] अंगके अंश [उस द्रंष्ट्रा]-से विभूषित न होते, तो विप्रोंकी मुक्ति कैसे होती; अतः महेश्वर दंष्ट्री हैं॥ २९–३२॥ |
॥ इति श्रीमल्लिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वाराहप्रादुर्भावो नाम चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'वाराहप्रादुर्भाव' नामक चौरानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९४॥