श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ३३४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| श्लोक (संस्कृत) | हिन्दी-अनुवाद |
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| रहा करता था॥ १८–२२॥ | |
| एवं बभूवुर्दैत्यानामतिदुर्गाणि सुव्रताः।<br>पुराणि त्रीणि विप्रेन्द्रास्त्रैलोक्यमिव चापरम्॥ २३<br>पुरत्रये तदा जाते सर्वे दैत्या जगत्त्रये।<br>पुरत्रयं प्रविश्यैव बभूवुस्ते बलाधिकाः॥ २४ | हे सुव्रतो! हे विप्रेन्द्रो! इस प्रकार दैत्योंके सुदृढ़ किलोंसे युक्त वे तीनों पुर दूसरे त्रिलोकीके समान थे। तब तीनों पुरोंके [निर्मित] हो जानेपर वे सभी दैत्य उन तीनों पुरोंमें प्रवेश करके तीनों लोकोंमें अत्यधिक बलशाली हो गये॥ २३-२४॥ |
| कल्पद्रुमसमाकीर्णं गजवाजिसमाकुलम्।<br>नानाप्रासादसङ्कीर्णं मणिजालैः समावृतम्॥ २५<br>सूर्यमण्डलसङ्काशैर्विमानैर्विश्वतोमुखैः।<br>पद्मरागमयैः शुभ्रैः शोभितं चन्द्रसन्निभैः॥ २६<br>प्रासादैर्गोपुरैर्दिव्यैः कैलासशिखरोपमैः।<br>शोभितं त्रिपुरं तेषां पृथक्पृथगनुत्तमैः॥ २७<br>दिव्यस्त्रीभिः सुसम्पूर्णं गन्धर्वैः सिद्धचारणैः।<br>रुद्रालयैः प्रतिगृहं साग्निहोत्रैर्द्विजोत्तमाः॥ २८ | उनके तीनों पुर कल्पवृक्षोंसे भरे हुए, हाथी-घोड़ोंसे परिपूर्ण, अनेक भवनोंसे सुशोभित, मणियोंके जालोंसे घिरे हुए, सभी ओर द्वारोंवाले, सूर्यमण्डलसदृश विमानोंसे युक्त, पद्मरागमय चन्द्रसदृश उज्ज्वल महलोंसे सुशोभित और कैलासशिखरके समान दिव्य तथा अत्युत्तम फाटकोंसे पृथक्-पृथक् मण्डित थे। हे श्रेष्ठ द्विजो! वे पुर दिव्य स्त्रियों, गन्धर्वों, सिद्धों एवं चारणोंसे भरे हुए थे। प्रत्येक घरमें रुद्रालय थे और अग्निहोत्र होता था। |
| वापीकूपतडागैश्च दीर्घिकाभिस्तु सर्वतः।<br>मत्तमातङ्गयूथैश्च तुरङ्गैश्च सुशोभनैः॥ २९<br>रथैश्च विविधाकारैर्विचित्रैर्विश्वतोमुखैः।<br>सभाप्रपादिभिश्चैव क्रीडास्थानैः पृथक् पृथक्॥ ३०<br>वेदाध्ययनशालाभिर्विविधाभिः समन्ततः।<br>अधृष्यं मनसाप्यन्यैर्मयस्यैव च मायया॥ ३१ | वे पुर सभी ओर बावलियों, कुओं, तालाबों और बड़ी-बड़ी झीलोंसे युक्त थे; मत्त हाथियोंके झुण्डों, अति सुन्दर घोड़ों, चारों ओर मुखवाले अनेक प्रकारके अद्भुत रथों, सभाभवनों, पानीय (जल)-की शालाओं तथा क्रीड़ास्थलोंसे पृथक्-पृथक् समन्वित थे। वे पुर चारों ओर अनेकविध वेदाध्ययनशालाओंसे युक्त थे और मय [दानव]-की मायासे अन्य लोगोंद्वारा मनसे भी अलंघ्य थे। |
| पतिव्रताभिः सर्वत्र सेवितं मुनिपुङ्गवाः।<br>कृत्वापि सुमहत्पापमपापैः शङ्करार्चनात्॥ ३२<br>दैत्येश्वरैर्महाभागैः सदारैः ससुतैर्द्विजाः।<br>श्रौतस्मार्तार्थधर्मज्ञैस्तद्धर्मनिरतैः सदा॥ ३३<br>महादेवेतरं त्यक्त्वा देवं तस्यार्चनं स्थितैः।<br>व्यूढोरस्कैर्वृषस्कन्धैः सर्वायुधधरैः सदा॥ ३४<br>सर्वदा क्षुधितैश्चैव दावाग्निसदृशेक्षणैः।<br>प्रशान्तैः कुपितैश्चैव कुब्जैर्वामनकैस्तथा॥ ३५<br>नीलोत्पलदलप्रख्यैर्नीलकुञ्चितमूर्धजैः।<br>नीलाद्रिमेरुसङ्काशैर्नीरदोपमनिःस्वनैः।<br>मयेन रक्षितैः सर्वैः शिक्षितैर्युद्धलालसैः॥ ३६ | हे मुनिश्रेष्ठो! वे पुर सर्वत्र पतिव्रता स्त्रियोंके द्वारा सेवित थे। हे द्विजो! वे पुर बड़े-बड़े पाप करके भी शंकरजीकी पूजाके कारण पापरहित, श्रौत-स्मार्त धर्मोंके ज्ञाता तथा अपने धर्मके प्रति परायण भार्यासहित महाभाग्यशाली दैत्योंसे सदा समन्वित थे; महादेवके अतिरिक्त अन्य देवताको छोड़कर उन [शिव]-के अर्चनमें स्थित, चौड़ी छातीवाले, बैलके समान कंधेवाले, सर्वदा समस्त आयुध धारण करनेवाले, सदा उपवास करनेवाले, दावानलके समान नेत्रोंवाले, उनमें कुछ शान्त तथा कुछ कुपित, कुबड़े, बौने, नील कमलदलकी आभाके सदृश, काले एवं घुँघराले बालोंवाले, नीलपर्वत तथा मेरुके समान प्रतीत होनेवाले, मेघके समान गर्जन करनेवाले, मयके द्वारा रक्षित तथा शिक्षित और युद्धकी तीव्र इच्छावाले दैत्योंसे परिपूर्ण थे। इस प्रकार वे पुर |
| अथ समररतैः सदासमन्ता-<br>च्छिवपदपूजनया सुलब्धवीर्यैः। |
अध्याय ७१ ] तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त ३३५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| रविमरुदमरेन्द्रसन्निकाशैः<br>सुरमथनैः सुदृढैः सुसेवितं तत् ॥ ३७ | सदा युद्धपरायण, भलीभाँति शिवके चरणोंकी पूजाके द्वारा प्राप्त पराक्रमवाले, सूर्य-वायु-इन्द्रसदृश, देवताओंका दमन करनेवाले तथा अत्यन्त दृढ़ दैत्योंसे सेवित थे॥ २५-३७॥ |
| सेन्द्रा देवा द्विजश्रेष्ठा द्रुमा दावाग्निना यथा।<br>पुरत्रयाग्निना दग्धा ह्यभवन् दैत्यवैभवात् ॥ ३८ | हे द्विजश्रेष्ठो! दैत्योंके वैभवके कारण तीनों पुरोंकी अग्निसे इन्द्रसहित देवतागण उसी प्रकार दग्ध हो गये, जैसे दावाग्निसे वृक्ष दग्ध हो जाते हैं॥ ३८॥ |
| अथैवं ते तदा दग्धा देवा देवेश्वरं हरिम्।<br>अभिवन्द्य तदा प्राहुस्तमप्रतिमवर्चसम् ॥ ३९ | इस प्रकार उन दग्ध देवताओंने अतुलनीय तेजवाले देवेश्वर विष्णुको प्रणाम करके उनको [यह सब] बताया॥ ३९॥ |
| सोऽपि नारायणः श्रीमान् चिन्तयामास चेतसा।<br>किं कार्यं देवकार्येषु भगवानिति स प्रभुः ॥ ४०<br><br>तदा सस्मार वै यज्ञं यज्ञमूर्तिर्जनार्दनः।<br>यज्वा यज्ञभुगीशानो यज्वनां फलदः प्रभुः ॥ ४१ | तब उन श्रीमान् प्रभु भगवान् नारायणने मनमें सोचा कि देवताओंके कार्यके विषयमें क्या किया जाना चाहिये। इसके बाद यज्ञभोक्ता, यज्ञकर्ता, यज्ञकर्ताओंको फल प्रदान करनेवाले तथा यज्ञमूर्ति प्रभु जनार्दनने यज्ञदेवका स्मरण किया॥ ४०-४१॥ |
| ततो यज्ञः स्मृतस्तेन देवकार्यार्थसिद्धये।<br>देवं ते पुरुषं चैव प्रणेमुस्तुष्टुवुस्तदा ॥ ४२<br><br>भगवानपि तं दृष्ट्वा यज्ञं प्राह सनातनम्।<br>सनातनस्तदा सेन्द्रान् देवानालोक्य चाच्युतः ॥ ४३ | तदनन्तर देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये उनके द्वारा स्मरण किये गये यज्ञदेव उपस्थित हुए। तब उन देवताओंने यज्ञदेवको प्रणाम किया और उनकी स्तुति की। इसके बाद सनातन यज्ञको देखकर पुनः इन्द्रसहित देवताओंकी ओर देखकर सनातन भगवान् अच्युत (विष्णु) उनसे कहने लगे॥ ४२-४३॥ |
| श्रीविष्णुरुवाच<br>अनेनोपसदा देवा यजध्वं परमेश्वरम्।<br>पुरत्रयविनाशाय जगत्त्रयविभूतये ॥ ४४ | श्रीविष्णु बोले—हे देवताओ! तीनों पुरोंके विनाशके लिये तथा तीनों लोकोंकी समृद्धिके लिये इन [उपस्थित] उपसद नामक यज्ञके द्वारा परमेश्वरका यजन कीजिये॥ ४४॥ |
| सूत उवाच<br>अथ तस्य वचः श्रुत्वा देवदेवस्य धीमतः।<br>सिंहनादं महत्कृत्वा यज्ञेशं तुष्टुवुः सुराः ॥ ४५ | सूतजी बोले—उन बुद्धिमान् देवदेवका वचन सुनकर महान् सिंहनाद करके देवतागण [उन] यज्ञेशकी स्तुति करने लगे॥ ४५॥ |
| ततः सञ्चिन्त्य भगवान् स्वयमेव जनार्दनः।<br>पुनः प्राह स सर्वांस्तांस्त्रिदशांस्त्रिदशेश्वरः ॥ ४६<br><br>हत्वा दग्ध्वा च भूतानि भुक्त्वा चान्यायतोऽपि वा।<br>यजेद्यदि महादेवमपापो नात्र संशयः ॥ ४७ | इसके बाद स्वयं विचार करके देवताओंके स्वामी वे भगवान् जनार्दन पुनः सभी देवताओंसे बोले—प्राणियोंको मारकर तथा जलाकर और अन्यायपूर्वक भोग-विलास करके भी यदि कोई महादेवकी पूजा करे, तो वह पापरहित हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ४६-४७॥ |
| अपापा नैव हन्तव्याः पापा एव न संशयः।<br>हन्तव्याः सर्वयत्नेन कथं वध्याः सुरोत्तमाः ॥ ४८ | 'निष्पाप लोगोंकी हत्या नहीं की जानी चाहिये; केवल पापियोंकी ही हत्या पूर्णप्रयत्नसे की जानी |
| ३३६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| असुरा दुर्मदाः पापा अपि देवैर्महाबलैः।<br>तस्मान्न वध्या रुद्रस्य प्रभावात्परमेष्ठिनः॥ ४९<br><br>कोऽहं ब्रह्माथवा देवा दैत्या देवारिसूंदनाः।<br>मुनयश्च महात्मानः प्रसादेन विना प्रभोः॥ ५० | चाहिये; इसमें सन्देह नहीं है। हे श्रेष्ठ देवताओ! पापी होते हुए भी दुर्मद असुर महाबली देवताओंके द्वारा वध्य कैसे हो सकते हैं? क्योंकि परमेष्ठी रुद्रके प्रभावके कारण वे वध्य नहीं हैं। हे देवताओ! प्रभु [शिव]-की कृपाके बिना मैं कौन हूँ, ब्रह्मा कौन हैं, दैत्य कौन हैं, देवशत्रुओंके विनाशक कौन हैं और महात्मा मुनिगण कौन हैं?॥ ४८-५०॥ | | यः सप्तविंशको नित्यः परात्परतरः प्रभुः।<br>विश्वामरेश्वरो वन्द्यो विश्वाधारो महेश्वरः॥ ५१<br><br>स एव सर्वदेवेशः सर्वेषामपि शङ्करः।<br>लीलया देवदैत्येन्द्रविभागमकरोद्धरः॥ ५२ | जो सत्ताईस तत्त्वोंसे युक्त, शाश्वत, महान्से भी महत्तर, प्रभुतासम्पन्न, सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी, वन्दनीय, विश्वके आधार, महेश्वर, सर्वदेवेश तथा सबके स्वामी हैं; उन हर शंकरने ही [अपनी] लीलासे देवताओं एवं दैत्योंका विभाजन किया है॥ ५१-५२॥ | | तस्यांशमेकं सम्पूज्य देवा देवत्वमागताः।<br>ब्रह्मा ब्रह्मत्वमापन्नो ह्यहं विष्णुत्वमेव च॥ ५३<br><br>तमपूज्य जगत्यस्मिन् कः पुमान् सिद्धिमिच्छति।<br>तस्मात्तेनैव हन्तव्या लिङ्गार्चनविधेर्बलात्॥ ५४<br><br>धर्मनिष्ठाश्च ते सर्वे श्रौतस्मार्तविधौ स्थिताः।<br>तथापि यजमानेन रौद्रेणोपसदा प्रभुम्।<br>रुद्रमिष्ट्वा यथान्यायं जेष्यामो दैत्यसत्तमान्॥ ५५<br><br>सतारकाक्षेण मयेन गुप्तं<br>स्वस्थं च गुप्तं स्फटिकाभमेकम्।<br>को नाम हन्तुं त्रिपुरं समर्थो<br>मुक्त्वा त्रिनेत्रं भगवन्तमेकम्॥ ५६ | उनके एक अंश (लिङ्गरूप)-की पूजा करके देवताओंने देवत्व प्राप्त किया है, ब्रह्माने ब्रह्मत्व प्राप्त किया है और मुझ विष्णुने विष्णुत्व प्राप्त किया है। उनकी पूजा किये बिना इस जगत्में कौन व्यक्ति सिद्धि प्राप्त कर सकता है? अतः लिङ्गार्चनविधिके प्रभावसे उन्हींके द्वारा वे दैत्य हन्तव्य हैं। यद्यपि वे सभी [दैत्य] धर्मनिष्ठ हैं तथा श्रौत-स्मार्तविधानमें स्थित हैं, फिर भी उपसद नामक रुद्रयज्ञसे यजमानके द्वारा विधिपूर्वक प्रभु रुद्रका यजन करके हमलोग महादैत्योंको जीत सकेंगे। एकमात्र त्रिनेत्र भगवान् [शिव]-को छोड़कर तारकाक्षसहित [दानव] मयके द्वारा सुरक्षित, स्वस्थ, गुप्त तथा स्फटिकके समान आभावाले तीनों पुरोंको नष्ट करनेमें भला कौन समर्थ है?॥ ५३-५६॥ | | सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा हरिश्चेष्ट्वा यज्ञेनोपसदा प्रभुम्।<br>उपविष्टो ददर्शाथ भूतसङ्घान् सहस्रशः॥ ५७<br><br>शूलशक्तिगदाहस्तान् टङ्कोपलशिलायुधान्।<br>नानाप्रहरणोपेतान्नानावेषधरांस्तदा ॥ ५८<br><br>कालाग्निरुद्रसङ्काशान् कालरुद्रोपमांस्तदा।<br>प्राह देवो हरिः साक्षात्प्रणिपत्य स्थितान् प्रभुः॥ ५९ | सूतजी बोले— इस प्रकार उपसद [नामक] यज्ञके द्वारा प्रभु [शिव]-का यजन करके बैठे हुए विष्णुने हजारों भूतसमुदायोंको देखा। तब शूल-शक्ति-गदासे युक्त हाथोंवाले, टंक-उपल-शिलाको आयुधके रूपमें धारण किये हुए, अनेक प्रकारके प्रहारयोग्य अस्त्रोंसे समन्वित, अनेक वेषोंको धारण किये हुए, कालाग्नि रुद्रके समान प्रतीत होनेवाले तथा कालरुद्रके सदृश उन उपस्थित भूतोंको प्रणाम करके साक्षात् प्रभु विष्णुदेव कहने लगे॥ ५७-५९॥ |
अध्याय ७१] तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त ३३७
| विष्णुरुवाच | विष्णु बोले— |
|---|---|
| दग्ध्वा भित्त्वा च भुक्त्वा च गत्वा दैत्यपुरत्रयम्।<br>पुनर्यथागतं वीरा गन्तुमर्हथ भूतले॥ ६० | हे वीरो! उस [त्रिपुर] दैत्यके तीनों पुरोंमें जाकर सभीको जलाकर, छिन्न-भिन्न करके और उनका भक्षण करके पुनः आपलोग जैसे आये हैं, वैसे ही भूतलपर चले जायँ॥ ६०॥ |
| ततः प्रणम्य देवेशं भूतसङ्घाः पुरत्रयम्।<br>प्रविश्य नष्टास्ते सर्वे शलभा इव पावकम्॥ ६१ | तत्पश्चात् देवेशको प्रणाम करके तीनों पुरोंमें प्रवेश करके वे भूतगण उसी तरह नष्ट हो गये, जैसे अग्निमें प्रवेश करके शलभ (पतिंगे) नष्ट हो जाते हैं॥ ६१॥ |
| ततस्तु नष्टास्ते सर्वे भूता देवेशवराज्ञया।<br>ननृतुर्मुदुशुश्चैव जगुर्दैत्याः सहस्त्रशः॥ ६२<br>तुष्टुवुर्देवदेवेशं परमात्मानमीश्वरम्।<br>ततः पराजिता देवा ध्वस्तवीर्याः क्षणेन तु॥ ६३<br>सेन्द्राः सङ्गम्य देवेशमुपेन्द्रं धिष्ठिता भयात्।<br>तान् दृष्ट्वा चिन्तयामास भगवान् पुरुषोत्तमः॥ ६४<br>किं कृत्यमिति सन्तप्तः सन्तप्तान् सेन्द्रकान् क्षणम्।<br>कथं तु तेषां दैत्यानां बलं हत्वा प्रयत्नतः॥ ६५<br>देवकार्यं करिष्यामि प्रसादात्परमेष्ठिनः।<br>पापं विचारतो नास्ति धर्मिष्ठानां न संशयः॥ ६६<br>तस्माद्दैत्या न वध्यास्ते भूतैश्चोपसदोद्भवैः।<br>पापं नुदति धर्मेण धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्॥ ६७<br>धर्मादैश्वर्यमित्येषा श्रुतिरेषा सनातनी।<br>दैत्याश्चैते हि धर्मिष्ठाः सर्वे त्रिपुरवासिनः॥ ६८<br>तस्मादवध्यतां प्राप्ता नान्यथा द्विजपुङ्गवाः।<br>कृत्वापि सुमहत्पापं रुद्रमभ्यर्चयन्ति ये॥ ६९<br>मुच्यन्ते पातकैः सर्वैः पद्मपत्रमिवाम्भसा।<br>पूजया भोगसम्पत्तिरवश्यं जायते द्विजाः॥ ७०<br>तस्मात्ते भोगिनो दैत्या लिङ्गार्चनपरायणाः।<br>तस्मात्कृत्वा धर्मविघ्नमहं देवाः स्वमायया॥ ७१<br>दैत्यानां देवकार्यार्थं जेष्येऽहं त्रिपुरं क्षणात्। | तब देवेश्वरकी आज्ञासे उन सभी भूतोंके नष्ट हो जानेपर हजारों दैत्य आनन्द मनाने लगे, नाचने-गाने लगे और देवेश परमात्मा ईश्वरकी स्तुति करने लगे॥ ६२ १/२॥<br><br>तदनन्तर क्षणभरमें पराजित तथा नष्ट पराक्रमवाले इन्द्रसहित देवतागण देवेश विष्णुके पास पहुँचकर भयपूर्वक खड़े हो गये। तब इन्द्रसहित उन सन्तप्त देवताओंको देखकर भगवान् पुरुषोत्तम उस समय दुःखी होकर सोचने लगे—क्या किया जाना चाहिये? प्रयत्नपूर्वक उन दैत्योंका बल नष्ट करके मैं कैसे देवताओंका कार्य करूँगा? विचारपूर्वक देखा जाय, तो शिवकी कृपासे उन धर्मनिष्ठ दैत्योंमें पाप नहीं है, अतः वे दैत्य उपसद [नामक] यज्ञसे उत्पन्न भूतोंके द्वारा वध्य नहीं हैं। धर्मसे ही पाप नष्ट होता है; सब कुछ धर्ममें ही प्रतिष्ठित है। धर्मसे ऐश्वर्य प्राप्त होता है—यह सनातनी श्रुति है। [सूतजीने कहा—] हे द्विजश्रेष्ठो! तीनों पुरोंमें निवास करनेवाले वे सभी दैत्य धर्मनिष्ठ थे, अर्थात् अनुष्ठानमें तत्पर थे। अतः वे अवध्यताको प्राप्त हो गये थे; इसमें सन्देह नहीं है। बहुत बड़ा पाप करके भी जो लोग रुद्रका अर्चन करते हैं, वे सभी पापोंसे मुक्त हो जाते हैं; जैसे जलसे कमल मुक्त रहता है। हे द्विजो! शिवकी पूजासे भोगसम्पदा अवश्य प्राप्त होती है; वे दैत्य लिङ्ग-पूजामें परायण हैं, अतः वे भोगोंसे युक्त हैं। [विष्णुने कहा—] हे देवताओ! इसलिये मैं देवताओंके कार्यके लिये अपनी मायासे दैत्योंके धर्म (अनुष्ठान)-में विघ्न डालकर क्षणभरमें तीनों पुरोंको जीत लूँगा॥ ६३—७१ १/२॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| विचार्यैवं ततस्तेषां भगवान् पुरुषोत्तमः।<br>कर्तुं व्यवसितश्चाभूद्धर्मविघ्नं सुरारिणाम्॥ ७२<br>असृजच्च महातेजाः पुरुषं चात्मसम्भवम्।<br>मायी मायामयं तेषां धर्मविघ्नार्थमच्युतः॥ ७३ | ऐसा विचार करके भगवान् पुरुषोत्तम उन देवशत्रुओं (दैत्यों)-के धर्ममें विघ्न उत्पन्न करनेके लिये प्रवृत्त हुए। महातेजस्वी मायावी अच्युतने उनके धर्मविघ्नके |
| ३३८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शास्त्रं च शास्ता सर्वेषामकरोत्कामरूपधृक्।<br>सर्वसम्मोहनं मायी दृष्टप्रत्ययसंयुतम्॥ ७४<br><br>एतत्त्वाङ्गभवायैव पुरुषायोपदिश्य तु।<br>मायी मायामयं शास्त्रं ग्रन्थषोडशलक्षकम्॥ ७५<br><br>श्रौतस्मार्तविरुद्धं च वर्णाश्रमविवर्जितम्।<br>इहैव स्वर्गनरकं प्रत्ययं नान्यथा पुनः॥ ७६<br><br>तच्छास्त्रमुपदिश्यैव पुरुषायच्युतः स्वयं।<br>पुरत्रयविनाशाय प्राहैनं पुरुषं हरिः॥ ७७<br><br>गन्तुमर्हसि नाशाय भो तूर्णं पुरवासिनाम्।<br>धर्मास्तथा प्रणश्यन्तु श्रौतस्मार्ता न संशयः॥ ७८ | लिये अपने शरीरसे मायामय पुरुषका सृजन किया। सबके शासक तथा स्वेच्छासे रूप धारण करनेवाले मायापति [विष्णु]-ने देखनेमात्रसे विश्वास उत्पन्न करनेवाले भावसे युक्त अतएव सबको मोहित करनेवाले शास्त्रका निर्माण किया। षोडशलक्षक अर्थात् अत्यन्त विस्तृत श्रुति-स्मृतिसे विरुद्ध तथा वर्णाश्रम-धर्मोंसे रहित इस मायामय शास्त्रका उपदेश अपने शरीरसे उत्पन्न पुरुषको करना चाहिए और स्वर्ग-नरक यहींपर है, ऐसा विश्वास करना चाहिये, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं—इसे प्रतिपादित करनेवाले उस शास्त्रको उस पुरुषको स्वयं पढ़ाकर मायामय अच्युत विष्णुने तीनों पुरोंके विनाशहेतु उस पुरुषसे कहा—[हे पुरुष!] त्रिपुरवासियोंके नाशके लिये तुम शीघ्र जाओ और ऐसा प्रयत्न करो, जिससे [वहाँके] श्रौत-स्मार्त धर्म नष्ट हो जायें; इसमें संशय नहीं है॥ ७२—७८॥ |
| ततः प्रणम्य तं मायी मायाशास्त्रविशारदः।<br>प्रविश्य तत्पुरं तूर्णं मुनिर्मायां तदाकरोत्॥ ७९ | तत्पश्चात् उन्हें प्रणाम करके मायाशास्त्रविशारद मायावी मुनिने उन पुरोंमें शीघ्र प्रवेश करके माया रची॥ ७९॥ |
| मायया तस्य ते दैत्याः पुरत्रयनिवासिनः।<br>श्रौतं स्मार्तं च सन्त्यज्य तस्य शिष्यास्तदाभवन्॥ ८०<br><br>तत्यजुश्च महादेवं शङ्करं परमेश्वरम्।<br>नारदोऽपि तदा मायी नियोगान्मायिनः प्रभोः॥ ८१ | तब तीनों पुरोंमें निवास करनेवाले वे दैत्य उसकी मायाके कारण श्रौत-स्मार्त धर्मोंका त्याग करके उसके शिष्य हो गये और उन्होंने महादेव परमेश्वर शंकरको छोड़ दिया॥ ८०१/२॥ |
| प्रविश्य तत्पुरं तेन मायिना सह दीक्षितः।<br>मुनिः शिष्यैः प्रशिष्यैश्च संवृतः सर्वतः स्वयम्॥ ८२<br><br>स्त्रीधर्मं चाकरोस्त्रीणां दुश्चारफलसिद्धिदम्।<br>चक्रुस्ताः सर्वदा लब्ध्वा सद्य एव फलं स्त्रियः॥ ८३<br><br>जनासक्ता बभूवुस्ता विनिन्द्य पतिदेवताः।<br>अद्यापि गौरवात्तस्य नारदस्य कलौ मुनेः॥ ८४ | तत्पश्चात् मायामय प्रभुके आदेशसे [अपने] शिष्यों-प्रशिष्योंसे चारों ओरसे घिरे हुए मायावी नारदमुनि भी उस पुरमें प्रवेश करके उस मायावी [पुरुष]-से स्वयं दीक्षित हुए। उन्होंने स्त्रियोंको दुराचार फलकी सिद्धि देनेवाले स्त्रीधर्मका उपदेश दिया। उन स्त्रियोंने उसका सदा पालन किया और शीघ्र ही उसका फल प्राप्तकर वे अपने पतिदेवोंकी अवहेलना करके अन्य लोगोंमें आसक्त हो गयीं। उन नारदमुनिके गुरुत्वके कारण आज भी कलियुगमें अधम स्त्रियाँ पतियोंका त्याग करके व्यभिचार करती हैं॥ ८१—८४१/२॥ |
| नार्यश्चरन्ति सन्त्यज्य भर्तॄन् स्वैरं वृथाधमाः।<br>स्त्रीणां माता पिता बन्धुः सखा मित्रं च बान्धवः॥ ८५<br><br>भर्ता एव न सन्देहस्तथाप्यासहमायया।<br>कृत्वापि सुमहत्पापं या भर्तुः प्रेमसंयुता॥ ८६ | पति ही स्त्रियोंका माता-पिता, बन्धु, सखा, मित्र तथा बान्धव होता है; इसमें सन्देह नहीं है। फिर भी विष्णुकी असह मायाके कारण उन स्त्रियोंने वैसा किया। बड़ा-से-बड़ा पाप करके भी जो [स्त्री] पतिके प्रति |
अध्याय ७९ ] तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त [ ३३९
| प्राप्नुयात्परमं स्वर्गं नरकं च विपर्ययात्।<br>पुरैका मुनिशार्दूलाः सर्वधर्मान् सदा पतिम् ॥ ८७<br><br>सन्त्यज्यापूजयन् साध्व्यो देवानन्याञ्जगद्गुरून्।<br>ताः स्वर्गलोकमासाद्य मोदन्ते विगतज्वराः ॥ ८८<br><br>नरकं च जगामान्या तस्माद्भर्त्ता परा गतिः।<br>तथापि भर्तॄन् स्वांस्त्यक्त्वा बभूवुः स्वैरवृत्तयः ॥ ८९<br><br>मायया देवदेवस्य विष्णोस्तस्याज्ञया प्रभोः।<br>अलक्ष्मीश्च स्वयं तस्य नियोगात्त्रिपुरं गता ॥ ९०<br><br>या लक्ष्मीस्तपसा तेषां लब्धा देवेश्वरादजात्।<br>बहिर्गता परित्यज्य नियोगाद् ब्रह्मणः प्रभोः ॥ ९१<br><br>बुद्धिमोहं तथाभूतं विष्णुमायाविनिर्मितम्।<br>तेषां दत्त्वा क्षणं देवस्तासां मायी च नारदः ॥ ९२<br><br>सुखासीनौ ह्यसम्भ्रान्तौ धर्मविघ्नार्थमव्ययौ।<br>एवं नष्टे तदा धर्मे श्रौतस्मार्ते सुशोभने ॥ ९३<br><br>पाषण्डे ख्यापिते तेन विष्णुना विश्वयोनिना।<br>त्यक्ते महेश्वरे दैत्यैस्त्यक्ते लिङ्गार्चने तथा ॥ ९४<br><br>स्त्रीधर्मे निखिले नष्टे दुराचारे व्यवस्थिते।<br>कृतार्थ इव देवेशो देवैः सार्धमुमापतिम् ॥ ९५<br><br>तपसा प्राप्य सर्वज्ञं तुष्टाव पुरुषोत्तमः। | प्रेमयुक्त रहती है, वह परम स्वर्ग प्राप्त करती है और इससे विपरीत आचरणसे नरक प्राप्त करती है। हे मुनिश्रेष्ठो! पूर्वकालमें स्त्रियाँ सभी धर्मों, अन्य देवताओं तथा जगद्गुरुओंको त्यागकर सर्वदा पतिकी पूजा करती थीं; वे स्वर्गलोक प्राप्त करके निश्चिन्त होकर आनन्द मनाती थीं, [इसके विपरीत] अन्य स्त्रियाँ नरक जाती थीं। अतः पति ही [स्त्रियोंके लिये] परम गति है। तथापि देवदेव प्रभु विष्णुकी आज्ञासे तथा उनकी मायाके कारण वे [त्रिपुरवासिनी स्त्रियाँ] अपने पतियोंका त्याग करके व्यभिचारिणी हो गयीं॥ ८५—८९ १/२ ॥<br><br>उन [विष्णु]-की आज्ञासे अलक्ष्मी तीनों पुरोंमें चली गयीं और जो लक्ष्मी उन [दैत्यों]-की तपस्याके द्वारा देवेश्वर ब्रह्मासे उन्हें प्राप्त थीं, वे [उन्हीं] प्रभु ब्रह्माके आदेशसे [त्रिपुरको] छोड़कर बाहर चली गयीं। इस प्रकार धर्मविघ्नके लिये उन दैत्योंको उस प्रकारका विष्णुमाया-निर्मित बुद्धिमोह देकर भगवान् [पुरुष] और उन स्त्रियोंको विपरीत आचरणका उपदेश देकर मायावी नारद—ये दोनों अव्यय देव निराकुल होकर सुखपूर्वक बैठ गये॥ ९०—९२ १/२ ॥<br><br>इस प्रकार परम उत्तम श्रौत-स्मार्त धर्मके नष्ट हो जानेपर, विश्वकर्ता उन विष्णुके द्वारा [वहाँ] पाखण्ड स्थापित कर दिये जानेपर, दैत्योंके द्वारा महेश्वरका त्याग कर दिये जानेपर तथा लिङ्गपूजाका परित्याग कर दिये जानेपर, सम्पूर्ण स्त्रीधर्मके नष्ट हो जानेपर और दुराचार स्थापित हो जानेपर देवेश [विष्णु] कृतार्थ हो गये और वे पुरुषोत्तम सभी देवताओंके साथ तपस्याद्वारा सर्वज्ञ उमापतिको प्राप्त करके उनकी स्तुति करने लगे॥ ९३—९५ १/२ ॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>महेश्वराय देवाय नमस्ते परमात्मने ॥ ९६<br><br>नारायणाय शर्वाय ब्रह्मणे ब्रह्मरूपिणे।<br>शाश्वताय ह्यनन्ताय अव्यक्ताय च ते नमः ॥ ९७ | श्रीभगवान् बोले— आप महेश्वर, देव, परमात्माको नमस्कार है। आप नारायण, शर्व, ब्रह्म, ब्रह्मरूप, शाश्वत, अनन्त तथा अव्यक्तको नमस्कार है॥ ९६-९७॥ |
| सूत उवाच<br>एवं स्तुत्वा महादेवं दण्डवत्प्रणिपत्य च।<br>जजाप रुद्रं भगवान् कोटिवारं जले स्थितः ॥ ९८<br><br>देवाश्च सर्वे ते देवं तुष्टुवुः परमेश्वरम्।<br>सेन्द्राः साध्याः सयमाः सरुद्राः समरुद्गणाः ॥ ९९ | सूतजी बोले— इस प्रकार भगवान् [विष्णु]-ने महादेवकी स्तुति करके दण्डवत् प्रणाम करके जलमें स्थित होकर एक करोड़ बार रुद्रमन्त्रका जप किया। इसके बाद वे सभी देवता इन्द्र, साध्यगण, यम, रुद्रगण |
| ३४० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| देवा ऊचुः | तथा मरुद्गणोंके साथ देव परमेश्वरकी स्तुति करने लगे॥ ९८-९९॥ | | नमः सर्वात्मने तुभ्यं शङ्करायार्तिहारिणे।<br>रुद्राय नीलरुद्राय कद्रुद्राय प्रचेतसे॥ १००<br><br>गतिर्नः सर्वदास्माभिर्वन्द्यो देवारिमर्दनः।<br>त्वमादिस्त्वमनन्तश्च अनन्तश्चाक्षयः प्रभुः॥ १०१<br><br>प्रकृतिः पुरुषः साक्षात्स्रष्टा हर्ता जगद्गुरो।<br>त्राता नेता जगत्यस्मिन् द्विजानां द्विजवत्सल॥ १०२<br><br>वरदो वाङ्मयो वाच्यो वाच्यवाचकवर्जितः।<br>याज्यो मुक्त्यर्थमीशानो योगिभिर्योगविभ्रमैः॥ १०३<br><br>हृत्पुण्डरीकसुषिरे योगिनां संस्थितः सदा।<br>वदन्ति सूरयः सन्तं परं ब्रह्मस्वरूपिणम्॥ १०४<br><br>भवन्तं तत्त्वमित्यार्यास्तेजोराशिं परात्परम्।<br>परमात्मानमित्याहुरस्मिञ्जगति तद्विभो॥ १०५<br><br>दृष्टं श्रुतं स्थितं सर्वं जायमानं जगद्गुरो।<br>अणोरल्पतरं प्राहुर्महतोऽपि महत्तरम्॥ १०६<br><br>सर्वतः पाणिपादं त्वां सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।<br>सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि॥ १०७ | देवता बोले— आप सर्वात्मा, शंकर, दुःखनाशक, रुद्र, नीलरुद्र, कद्रुद्र (प्रशस्त रुद्र) तथा प्रचेताको नमस्कार है। आप हमलोगोंकी गति हैं। दैत्योंका संहार करनेवाले आप हमलोगोंद्वारा सर्वदा वन्द्य हैं। आप आदि तथा अन्तरहित हैं; आप अनन्त (शेषरूप), अविनाशी एवं प्रभुतासम्पन्न हैं। हे जगद्गुरो! आप प्रकृति, पुरुष, साक्षात् स्रष्टा, रक्षक तथा संहारक हैं। हे द्विजवत्सल! आप इस जगत्में द्विजोंके नेता हैं। आप वरदाता, वाणीमय, वाच्य, वाच्य-वाचकसे रहित ईशान हैं; आप मुक्तिके लिये योगपरायण योगियोंके द्वारा पूज्य हैं। आप योगियोंके हृदयरूपी कमलके छिद्रमें सदा स्थित हैं। विद्वान्लोग आपको सर्वत्र विद्यमान्, श्रेष्ठ तथा ब्रह्मस्वरूप कहते हैं। हे विभो! ऋषिगण आपको इस जगत्में तत्त्वरूप, तेजोराशि, परात्पर एवं परमात्मा कहते हैं। हे जगद्गुरो! आप दृष्ट, श्रुत, स्थित तथा जायमान सब कुछ हैं। लोग आपको अणुसे भी अल्पतर, महान्से भी महत्तर, सभी ओर हाथ-पैरवाला, सभी ओर नेत्र-सिर-मुखवाला तथा सभी ओर कानवाला कहते हैं। आप संसारमें सभीको आच्छादित करके स्थित हैं॥ १००-१०७॥ | | महादेमनिर्देश्यं सर्वज्ञं त्वामनामयम्।<br>विश्वरूपं विरूपाक्षं सदाशिवमनामयम्॥ १०८<br><br>कोटिभास्करसङ्काशं कोटिशीतांशुसन्निभम्।<br>कोटिकालाग्निसङ्काशं षड्विंशकमनीश्वरम्॥ १०९<br><br>प्रवर्तकं जगत्यस्मिन् प्रकृतेः प्रपितामहम्।<br>वदन्ति वरदं देवं सर्वावासं स्वयम्भुवम्॥ ११०<br><br>श्रुतयः श्रुतिसारं त्वां श्रुतिसारविदो जनाः॥ १११ | लोग आपको महादेव, अनिर्देश्य, सर्वज्ञ, अनामय, विश्वरूप, विरूपाक्ष, सदाशिव, निर्विकार, करोड़ों सूर्योंके समान [तेजस्वी], करोड़ों चन्द्रमासदृश [प्रकाशमान], करोड़ों कालाग्निके समान [प्रज्वलित], छब्बीस तत्त्वोंसे युक्त, अनीश्वर, इस जगत्में प्रकृतिके प्रवर्तक, प्रपितामह, सबके आवास-स्वरूप तथा स्वयम्भू (स्वयं उत्पन्न होनेवाला) एवं वर देनेवाला देव कहते हैं; श्रुतियाँ तथा श्रुति-तत्त्वोंको जाननेवाले लोग आपको वेदोंका सार कहते हैं॥ १०८-१११॥ | | अदृष्टमस्माभिरनेकमूर्ते<br>विना कृतं यद्भवताथ लोके।<br>त्वमेव दैत्यान् सुरभूतसङ्घान्<br>देवान्नरान् स्थावरजङ्गमांश्च॥ ११२ | हे अनेक रूपोंवाले [प्रभो]! हमलोगोंने संसारमें ऐसा कुछ भी नहीं देखा है, जो आपके बिना [किसी अन्यके द्वारा] रचित हो; आपने ही दैत्यों, सुरोंके भूतसमुदायों, देवताओं, मनुष्यों, स्थावर-जंगम आदिको उत्पन्न किया है॥ ११२॥ | | पाहि नान्या गतिः शम्भो विनिहत्यासुरोत्तमान्।<br>मायया मोहिताः सर्वे भवतः परमेश्वर॥ ११३ | हे शम्भो! हमलोगोंकी कोई अन्य गति नहीं है; |
अध्याय ७१ ] तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त ३४१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यथा तरङ्गा लहरीसमूहा<br>युध्यन्ति चान्योन्यमपांनिधौ च।<br>जलाशयादेव जडीकृताश्च<br>सुरासुरास्तद्वदजस्य सर्वम्॥ ११४॥<br><br>सूत उवाच<br>य इदं प्रातरुत्थाय शुचिर्भूत्वा जपेन्नरः।<br>शृणुयाद्वा स्तवं पुण्यं सर्वकाममवाप्नुयात्॥ ११५॥<br>स्तुतस्त्वेवं सुरैर्विष्णोर्जपेन च महेश्वरः।<br>सोमः सोमामथालिङ्ग्य नन्दिदत्तकरः स्मयन्॥ ११६॥<br>प्राह गम्भीरया वाचा देवानावलोक्य शङ्करः।<br>ज्ञातं मयेदमधुना देवकार्यं सुरेश्वराः॥ ११७॥<br>विष्णोर्मायाबलं चैव नारदस्य च धीमतः।<br>तेषामधर्मनिष्ठानां दैत्यानां देवसत्तमाः॥ ११८॥<br>पुरत्रयविनाशं च करिष्येऽहं सुरोत्तमाः।<br><br>सूत उवाच<br>अथ सब्रह्मका देवाः सेन्द्रोपेन्द्राः समागताः॥ ११९॥<br>श्रुत्वा प्रभोस्तदा वाक्यं प्रणेमुस्तुष्टुवुश्च ते।<br>अप्येतदन्तरं देवी देवमालोक्य विस्मिता॥ १२०॥<br>लीलाम्बुजेन चाहत्य कलमाह वृषध्वजम्।<br><br>देव्युवाच<br>क्रीडमानं विभो पश्य षण्मुखं रविसन्निभम्॥ १२१॥<br>पुत्रं पुत्रवतां श्रेष्ठ भूषितं भूषणैः शुभैः।<br>मुकुटैः कटकैश्चैव कुण्डलैर्वलयैः शुभैः॥ १२२॥<br>नूपुरैश्छन्नवारैश्च तथा ह्युदरबन्धनैः।<br>किङ्किणीभिरनेकाभिर्हैमैरश्वत्थपत्रकैः॥ १२३॥<br>कल्पद्रुमजैः पुष्पैः शोभितैरलकैः शुभैः।<br>हारैर्वारीजरागादिमणिचित्रैस्तथाङ्गदैः॥ १२४॥<br>मुक्ताफलमयैर्हारैः पूर्णचन्द्रसमप्रभैः।<br>तिलकैश्च महादेव पश्य पुत्रं सुशोभनम्॥ १२५॥<br>अङ्कितं कुङ्कुमाद्यैश्च वृत्तं भसितनिर्मितम्।<br>वक्त्रवृन्दं च पश्येश वृन्दं कामलकं यथा॥ १२६॥ | महादैत्योंका संहार करके आप [हमारी] रक्षा कीजिये। हे परमेश्वर! सभीलोग आपकी मायासे मोहित हैं॥ ११३॥<br><br>जिस प्रकार तरंगें तथा लहरें समुद्रमें परस्पर टकराती हैं और जलाश्रयसे ही जड़ीभूत होकर उसीमें विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार ब्रह्माकी सृष्टिके देवता-असुर सभी कोई आपसमें टकराते हैं और अन्तमें जड़ीभूत होकर आपमें ही विलीन हो जाते हैं॥ ११४॥<br><br>**सूतजी बोले—**जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर शुद्ध होकर इस पवित्र स्तुतिको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है॥ ११५॥<br><br>इस प्रकार देवताओंके द्वारा स्तुति किये जाने तथा विष्णुके जपसे प्रसन्न हुए महेश्वर शंकरने उमाका आलिङ्गन करके नन्दीके ऊपर हाथ रखकर देवताओंकी ओर देखकर गम्भीर वाणीमें मुसकराते हुए कहा—'हे सुरेश्वरो! अब मैंने इस देवकार्यको और विष्णु तथा बुद्धिमान् नारदके मायाबलको जान लिया है। हे श्रेष्ठ देवताओ! मैं अधर्ममें निष्ठा रखनेवाले उन दैत्योंके तीनों पुरोंका विनाश [अवश्य] करूँगा'॥ ११६—११८ १/२॥<br><br>**सूतजी बोले—**इसके बाद [वहाँ] आये हुए वे इन्द्र-ब्रह्मा-विष्णुसहित देवताओंने प्रभुका वचन सुनकर उन्हें प्रणाम किया तथा उनकी स्तुति की। इसके अनन्तर शिवकी ओर देखकर विस्मित देवी भी अपने लीला-कमलसे शिवजीको मारकर (स्पर्शकर) यह वचन कहने लगीं॥ ११९-१२० १/२॥<br><br>**देवी बोलीं—**हे विभो! हे पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ! उत्तम आभूषणोंसे सुशोभित तथा सूर्यके समान प्रतीत होनेवाले [अपने] इस खेलते हुए श्रेष्ठ पुत्र षडाननको देखिये। हे महादेव! मुकुटों, कटकों, कुण्डलों, सुन्दर कँगनों, नूपुरों, छन्नवारों, करधनियों, अनेक किंकिणियों, सुवर्णमय पीपलके पत्तों, कल्पद्रुमके पुष्पोंसे शोभित सुन्दर अलकों, पद्मराग आदि मणियोंसे चमत्कृत हारों तथा बाजूबन्दों, पूर्णचन्द्रमाके समान प्रभावाले मुक्ताफलमय हारों और तिलकोंसे मण्डित परम सुन्दर पुत्रको देखिये। हे ईश! कुंकुम आदिसे अंकित तथा भस्मनिर्मित |
| ३४२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| नेत्राणि च विभो पश्य शुभानि त्वं शुभानि च।<br>अञ्जनानि विचित्राणि मङ्गलार्थं च मातृभिः॥ १२७<br><br>गङ्गादिभिः कृत्तिकाद्यैः स्वाहया च विशेषतः।<br>इत्येवं लोकमातुश्च वाग्भिः सम्बोधितः शिवः॥ १२८ | वृत्ताकार तिलकसे युक्त इसके कमलसमूह-सदृश मुखोंको देखिये। हे विभो! आप इसके अत्यन्त सुन्दर नेत्रोंको देखिये, गंगा आदि, कृत्तिका आदि तथा विशेष रूपसे स्वाहा माताओंके द्वारा मंगलके लिये लगाये गये भव्य तथा विचित्र काजलोंको देखिये॥ १२१-१२७१/२॥ | | न ययौ तृप्तिमीशानः पिबन् स्कन्दाननामृतम्।<br>न सस्मार च तान् देवान् दैत्यशस्त्रनिपीडितान्॥ १२९<br><br>स्कन्दमालिङ्ग्य चाघ्राय नृत्य पुत्रेत्युवाच ह।<br>सोऽपि लीलालसो बालो ननर्तातिहरः प्रभुः॥ १३०<br><br>सहैव ननृतुश्चान्ये सह तेन गणेश्वराः।<br>त्रैलोक्यमखिलं तत्र ननर्तेशाज्ञया क्षणम्॥ १३१<br><br>नागाश्च ननृतुः सर्वे देवाः सेन्द्रपुरोगमाः।<br>तुष्टुवुर्गणपाः स्कन्दं मुमोदाम्बा च मातरः॥ १३२<br><br>ससृजुः पुष्पवर्षाणि जगुर्गन्धर्वकिन्नराः।<br>नृत्यामृतं तदा पीत्वा पार्वतीपरमेश्वरौ।<br>अवापतुस्तदा तृप्तिं नन्दिना च गणेश्वराः॥ १३३ | इस प्रकार जगज्जननी [उमा]-के वचनोंसे सम्बोधित किये गये ईशान शिव कार्तिकेयके मुखामृतका पान करते हुए तृप्त नहीं हुए। उन्हें दैत्योंके शस्त्रोंसे पीड़ित उन देवताओंका स्मरण नहीं रहा। उन्होंने स्कन्दका आलिङ्गन करके उसका सिर सूँघकर कहा—'हे पुत्र! नृत्य करो।' तब कष्ट दूर करनेवाले बालकरूप प्रभु [स्कन्द] भी लीला करते हुए नाचने लगे। सभी गणेश्वर भी उनके साथ नृत्य करने लगे और क्षणभरमें शिवकी आज्ञासे सम्पूर्ण त्रिलोकी वहाँ नृत्य करने लगा। नाग और इन्द्रसहित सभी देवता भी नाचने लगे। गणेश्वरोंने स्कन्दकी स्तुति की। [उस समय] पार्वती तथा [अन्य] माताएँ आनन्दित हुईं। गन्धर्व तथा किन्नर पुष्पवृष्टि करने लगे एवं गाने लगे। तब [उस] नृत्यरूपी अमृतका पान करके पार्वती तथा परमेश्वर तृप्त हो गये और नन्दीसहित गणेश्वर भी तृप्त हुए॥ १२८-१३३॥ | | ततः स नन्दी सह षण्मुखेन<br>तथा च सार्धं गिरिराजपुत्र्या।<br>विवेश दिव्यं भवनं भवोऽपि<br>यथाम्बुदोऽन्याम्बुदमम्बुदाभः॥ १३४ | तदनन्तर सूर्यके समान कान्तिवाले शिवजीने भी नन्दी, षडानन (स्कन्द) तथा गिरिराजपुत्री [पार्वती]-के साथ दिव्य भवनमें प्रवेश किया, जैसे मेघ अन्य मेघमें प्रवेश करता है॥ १३४॥ | | द्वारस्य पार्श्वे ते तस्थुर्देवा देवस्य धीमतः।<br>तुष्टुवुश्च महादेवं किञ्चिदुद्विग्नचेतसः॥ १३५<br><br>किन्तु किन्विति चान्योन्यं प्रेक्ष्य चैतत्समाकुलाः।<br>पापा वयमिति ह्यान्ये अभाग्याश्चेति चापरे॥ १३६<br><br>भाग्यवन्तश्च दैत्येन्द्रा इति चान्ये सुरेश्वराः।<br>पूजाफलमिमं तेषामित्यन्ये नेति चापरे॥ १३७ | वे देवता उन बुद्धिमान् शिवके द्वारके पास खड़े हो गये और कुछ-कुछ व्याकुलचित्त होकर महादेवकी स्तुति करने लगे। वे व्याकुल होकर एक-दूसरेकी ओर देखकर कहने लगे—'यह क्या, यह क्या; हमलोग पापी हैं' अन्य दूसरोंने कहा—'हम अभागे हैं' अन्य सुरेश्वरोंने कहा—'ये महादैत्य भाग्यशाली हैं।' कुछने कहा—'यह उनकी पूजाका फल है' और कुछने कहा—'ऐसा नहीं है'॥ १३५-१३७॥ | | एतस्मिन्नन्तरे तेषां श्रुत्वा शब्दाननेकशः।<br>कुम्भोदरो महातेजा दण्डेनाताडयत्सुरान्॥ १३८<br><br>दुद्रुवुस्ते भयाविष्टा देवा हाहेतिवादिनः।<br>अपतन् मुनयश्चान्ये देवाश्च धरणीतले॥ १३९ | इसी बीच उनके अनेक शब्दोंको सुनकर महातेजस्वी कुम्भोदर [नामक शिवगण] दण्डसे देवताओंको पीटने लगा। तब वे देवता भयभीत होकर 'हा-हा' कहते हुए |
| अध्याय ७१ ] | तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त | ३४३ |
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| अहो विधेर्बलं चेति मुनयः कश्यपादयाः।<br>दृष्ट्वापि देवदेवेशं देवानां चासुरद्विषाम्॥ १४०<br><br>अभाग्यान्न समाप्तं तु कार्यमित्यपरे द्विजाः।<br>प्रोचुर्नमः शिवायेति पूज्य चाल्पतरं हृदि॥ १४१<br><br>ततः कपर्दी नन्दीशो महादेवप्रियो मुनिः।<br>शूली माली तथा हाली कुण्डली वलयी गदी॥ १४२<br><br>वृषमारुह्य सुश्वेतं ययौ तस्याज्ञया तदा।<br>ततो वै नन्दिनं दृष्ट्वा गणः कुम्भोदरोऽपि सः॥ १४३<br><br>प्रणम्य नन्दिनं मूर्ध्ना सह तेन त्वरन् ययौ।<br>नन्दी भाति महातेजा वृषपृष्ठे वृषध्वजः॥ १४४<br><br>सगणो गणसेनानीर्मेघपृष्ठे यथा भवः।<br>दशयोजनविस्तीर्णं मुक्ताजालैरलङ्कृतम्॥ १४५<br><br>सितातपत्रं शैलादेराकाशमिव भाति तत्।<br>तत्रान्तर्बद्धमाला सा मुक्ताफलमयी शुभा॥ १४६<br><br>गङ्गाकाशान्निपतिता भाति मूर्ध्नि विभोर्यथा।<br>अथ दृष्ट्वा गणाध्यक्षं देवदुन्दुभयः शुभाः॥ १४७<br><br>नियोगाद्वज्रिणः सर्वे विनेदुर्मुनिपुङ्गवाः।<br>तुष्टुवुश्च गणेशानं वाग्भिरिष्टप्रदं शुभम्॥ १४८<br><br>यथा देवा भवं दृष्ट्वा प्रीतिकण्टकितत्वचः।<br>नियोगाद्वज्रिणो मूर्ध्नि पुष्पवर्षं च खेचराः॥ १४९<br><br>ववृषुश्च सुगन्धाढ्यं नन्दिनो गगनोदितम्।<br>वृष्ट्या तुष्टस्तदा रेजे तुष्ट्या पुष्ट्या यथार्थया॥ १५०<br><br>नन्दी भवश्चान्द्रया तु स्नातया गन्धवारिणा।<br>पुष्पैर्नानाविधैस्तत्र भाति पृष्ठं वृषस्य तत्॥ १५१<br><br>सङ्कीर्णं तु दिवः पृष्ठं नक्षत्रैरिव सुव्रताः।<br>कुसुमैः संवृतो नन्दी वृषपृष्ठे रराज सः॥ १५२ | भागने लगे; कुछ मुनि तथा देवता पृथ्वीतलपर गिर पड़े॥ १३८-१३९॥<br>कश्यप आदि मुनियोंने कहा—'विधिकी बल कैसा अद्भुत है!' हे द्विजो! अन्य लोगोंने कहा—'देव-देवेशका दर्शन करके भी असुरशत्रु देवताओंके अभाग्यसे ही कार्य पूर्ण नहीं हो सका। इसके बाद वे सब हृदयमें थोड़ा अर्चन करके 'शिवको नमस्कार है'—ऐसा कहने लगे॥ १४०-१४१॥<br>तत्पश्चात् जटाजूट धारण किये, [हाथमें] त्रिशूल लिये, माला पहने हुए, हाला धारण किये हुए, कुण्डल धारण किये हुए, कंगन पहने हुए तथा गदा धारण किये हुए महादेवप्रिय मुनि नन्दीश सुन्दर श्वेत बैलपर चढ़कर उन [शिव]—की आज्ञासे वहाँ जाने लगे। तब नन्दीको देखकर कुम्भोदर [नामक] वह गण भी नन्दीको प्रणाम करके शीघ्रता करते हुए उनके साथ चल दिया। गणसहित वे महातेजस्वी वृषध्वज गणोंके सेनापति नन्दी बैलकी पीठपर उसी तरह प्रतीत हो रहे थे, मानो मेघस्वरूप विष्णुके पृष्ठपर शिवजी विराजमान हों। नन्दीश्वरका दस योजन विस्तृत तथा मुक्ताजालोंसे अलंकृत श्वेत छत्र आकाशकी भाँति प्रतीत हो रहा था। उस छत्रमें भीतरसे बँधी हुई मुक्ताफलोंकी वह श्वेत माला ऐसी लग रही थी, मानो शिवजीके सिरपर आकाशसे गंगा गिर रही हों॥ १४२–१४६१/२॥<br>हे मुनिश्रेष्ठो! तदनन्तर गणाध्यक्ष [नन्दी]-को देखकर इन्द्रकी आज्ञासे दिव्य देवदुन्दुभियाँ बजने लगीं; सभी लोग वाणीद्वारा वांछित फल प्रदान करनेवाले शुभ गणेश्वरकी स्तुति करने लगे, जैसे शिवको देखकर देवतालोग प्रसन्नतासे रोमांचित होकर उनकी स्तुति करते हैं॥ १४७-१४८१/२॥<br>आकाशचारियोंने इन्द्रकी आज्ञासे नन्दीके सिरपर आकाशसे सुगन्धमय पुष्पवृष्टि की। तुष्टि-पुष्टिसे युक्त यथार्थ वृष्टिसे प्रसन्न होकर नन्दी उसी तरह शोभा पा रहे थे, जैसे शिवजी गन्धजलसे अभिसिंचित चन्द्रलेखासे शोभा प्राप्त करते हैं। हे सुव्रतो! वृषभका पृष्ठ अनेक प्रकारके पुष्पोंसे ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो आकाशपृष्ठ |
| ३४४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| दिवः पृष्ठे यथा चन्द्रो नक्षत्रैरिव सुव्रताः।<br>तं दृष्ट्वा नन्दिनं देवाः सेन्द्रोपेन्द्रास्तथाविधम् ॥ १५३<br><br>तुष्टुवुर्गणपेशानं देवदेवमिवापरम्।<br><br>देवा ऊचुः<br>नमस्ते रुद्रभक्ताय रुद्रजाप्यरताय च ॥ १५४<br><br>रुद्रभक्तार्तिनाशाय रौद्रकर्मरताय ते।<br>कूष्माण्डगणनाथाय योगिनां पतये नमः ॥ १५५<br><br>सर्वदाय शरण्याय सर्वज्ञायार्तिहारिणे।<br>वेदानां पतये चैव वेदवेद्याय ते नमः ॥ १५६<br><br>वज्रिणे वज्रदंष्ट्राय वज्रिवज्रनिवारिणे।<br>वज्रालङ्कृतदेहाय वज्रिणाराधिताय ते ॥ १५७<br><br>रक्ताय रक्तनेत्राय रक्ताम्बरधराय ते।<br>रक्तानां भवपादाब्जे रुद्रलोकप्रदायिने ॥ १५८<br><br>नमः सेनाधिपतये रुद्राणां पतये नमः।<br>भूतानां भुवनेशानां पतये पापहारिणे ॥ १५९<br><br>रुद्राय रुद्रपतये रौद्रपापहराय ते।<br>नमः शिवाय सौम्याय रुद्रभक्ताय ते नमः ॥ १६० | तारोंसे भर गया हो। हे सुव्रतो! पुष्पोंसे ढँके हुए नन्दी बैलकी पीठपर उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जैसे आकाशपृष्ठपर [विराजमान] चन्द्रमा तारोंसे आच्छादित होकर सुशोभित होते हैं॥ १४९-१५२१/२॥<br>उस प्रकारकी शोभावाले उन नन्दीको देखकर इन्द्र तथा विष्णुसहित देवता साक्षात् महादेवजीकी भाँति प्रतीत होनेवाले गणाधिपोंके स्वामी नन्दीकी स्तुति करने लगे॥ १५३१/२॥<br><br>देवता बोले—आप रुद्रभक्त तथा रुद्रजपपरायणको नमस्कार है। रुद्रभक्तोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले, रौद्रकर्ममें संलग्न, कूष्माण्डगणोंके स्वामी तथा योगियोंके पति आप [नन्दी]-को नमस्कार है। सब कुछ प्रदान करनेवाले, शरण देनेवाले, सब कुछ जाननेवाले, कष्ट दूर करनेवाले, वेदोंके पति तथा वेदोंसे जाननेयोग्य आप [नन्दी]-को नमस्कार है। वज्रधारी, वज्रतुल्य दंष्ट्रावाले, इन्द्रके वज्रका निवारण करनेवाले, वज्रसे अलंकृत देहवाले तथा इन्द्रके द्वारा आराधित आप [नन्दी]-को नमस्कार है। रक्त वर्णवाले, रक्त नेत्रवाले, रक्त वस्त्र धारण करनेवाले तथा शिवके चरणकमलमें अनुरागयुक्त लोगोंको रुद्रलोक प्रदान करनेवाले आप [नन्दी]-को नमस्कार है। सेनाके अधिपति, रुद्रोंके पति, भूतों तथा भुवनेशोंके पति और पापोंका हरण करनेवाले आप [नन्दी]-को नमस्कार है। रुद्र, रुद्रपति, रौद्र पापोंका हरण करनेवाले आप [नन्दी]-को नमस्कार है। शिवस्वरूप, सौम्य [स्वभाववाले] तथा रुद्रभक्त आप [नन्दी]-को नमस्कार है॥ १५४-१६०॥ | | सूत उवाच<br>ततः प्रीतो गणाध्यक्षः प्राह देवांश्छिलात्मजः।<br>रथं च सारथिं शम्भोः कार्मुकं शरमुत्तमम् ॥ १६१<br><br>कर्तुमर्हथ यत्नेन नष्टं मत्वा पुरत्रयम्।<br>अथ ते ब्रह्मणा सार्धं तथा वै विश्वकर्मणा ॥ १६२<br><br>रथं चक्रुः सुसंरब्धा देवदेवस्य धीमतः ॥ १६३ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] तदनन्तर प्रसन्न हुए शिलादपुत्र गणेश्वर [नन्दी]-ने देवताओंसे कहा—'अब तीनों पुरोंको नष्ट मानकर आपलोग शम्भुके लिये रथ, सारथि, धनुष तथा उत्तम बाण प्रयत्नपूर्वक तैयार कराइये।' इसके बाद उन देवताओंने अतिशीघ्रतासे युक्त होकर ब्रह्माके साथ विश्वकर्माके द्वारा बुद्धिमान् देवदेव [शिव]-का रथ बनवाया॥ १६१-१६३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पुरदाहे नन्दिकेश्वरवाक्यं नामैकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पुरदाहप्रसंगमें नन्दिकेश्वरवाक्य' नामक इकहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७१ ॥
७२- त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण तथा भगवान् महेश्वरका उस रथपर आरूढ़ हो त्रिपुरासुरको दग्ध करना एवं ब्रह्माद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति
अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति | ३४५
बहत्तरवाँ अध्याय
त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण तथा भगवान् महेश्वरका उस रथपर आरूढ़ हो त्रिपुरासुरको दग्ध करना एवं ब्रह्माद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति
| सूत उवाच | |
|---|---|
| अथ रुद्रस्य देवस्य निर्मितो विश्वकर्मणा।<br>सर्वलोकमयो दिव्यो रथो यत्नेन सादरम्॥ १<br><br>सर्वभूतमयश्चैव सर्वदेवनमस्कृतः।<br>सर्वदेवमयश्चैव सौवर्णः सर्वसम्मतः॥ २<br><br>रथाङ्गं दक्षिणं सूर्यो वामाङ्गं सोम एव च।<br>दक्षिणं द्वादशारं हि षोडशारं तथोत्तरम्॥ ३<br><br>अरेषु तेषु विप्रेन्द्राश्चादित्या द्वादशैव तु।<br>शशिनः षोडशारेषु कला वामस्य सुव्रताः॥ ४<br><br>ऋक्षाणि च तदा तस्य वामस्यैव तु भूषणम्।<br>नेम्यः षडृतवश्चैव तयोर्वे विप्रपुङ्गवाः॥ ५<br><br>पुष्करं चान्तरिक्षं वै रथनीडश्च मन्दरः।<br>अस्ताद्रिरुदयाद्रिश्च उभौ तौ कूबरौ स्मृतौ॥ ६<br><br>अधिष्ठानं महामेरुराश्रयाः केसराचलाः।<br>वेगः संवत्सरस्तस्य अयने चक्रसङ्गमौ॥ ७<br><br>मुहूर्ता बन्धुरास्तस्य शम्याश्चैव कलाः स्मृताः।<br>तस्य काष्ठाः स्मृता घोणा चाक्षदण्डाः क्षणाश्च वै॥ ८<br><br>निमेषाश्चानुकर्षश्च ईषा चास्य लवाः स्मृताः। | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] विश्वकर्माने प्रयत्नके साथ आदरपूर्वक भगवान् रुद्रका रथ बनाया; वह सर्वलोकमय, दिव्य, सर्वभूतमय, सभी देवताओंसे नमस्कृत, सभी देवताओंसे युक्त, सुवर्णमय तथा सबके अनुकूल था। उसका दाहिना चक्र सूर्य एवं बायाँ चक्र चन्द्रमा थे। दाहिना चक्र बारह अरोंवाला तथा बायाँ चक्र सोलह अरोंवाला था। हे विप्रेन्द्रो! हे सुव्रतो! [दाहिने चक्रके] उन अरोंमें बारह आदित्य थे और बायें चक्रके सोलह अरोंमें चन्द्रमाकी [सोलह] कलाएँ थीं। हे मुनिश्रेष्ठो! नक्षत्रगण उस बाएँ चक्रके भूषण थे और छः ऋतुएँ उन दोनों चक्रोंकी नेमियाँ थीं। आकाश इसकी छत थी और मन्दर पर्वत रथका सारथि-स्थान था। अस्ताचल तथा उदयाचल उसके दोनों स्तम्भ कहे गये हैं। महामेरु [पर्वत] उसका अधिष्ठान [मुख्य स्थान] था और केसरपर्वत मेरुको आश्रय देनेवाले थे। संवत्सर उसका वेग था और दोनों अयन (उत्तरायण, दक्षिणायन) उसके चक्रसंगम (अक्षके प्रान्तभाग) थे। मुहूर्त उस रथके बंधुर [तल्पभाग] और कलाएँ उसकी शम्या (वर्तुलपट्टिकाएँ) कही गयी हैं। काष्ठाएँ उसकी नासिका तथा क्षण उसके अक्षदण्ड (चक्रोंका आधारदण्ड) कहे गये हैं। निमेष इस रथके अनुकर्ष (नीचेका तल) तथा लव (निमेषसे भी छोटा समय) इसकी ईषा (दोनों अक्षोंको जोड़नेवाला काष्ठ) कहे गये हैं॥ १—८ ½॥ |
| द्यौर्वरूथं रथस्यास्य स्वर्गमोक्षावुभौ ध्वजौ॥ ९<br><br>धर्मो विरागो दण्डोऽस्य यज्ञा दण्डाश्रयाः स्मृताः।<br>दक्षिणाः सन्ध्यतस्तस्य लोहाः पञ्चाशदग्नयः॥ १०<br><br>युगान्तकोटी तौ तस्य धर्मकामावुभौ स्मृतौ।<br>ईषादण्डस्तथाव्यक्तं बुद्धिस्तस्यैव नड्वलः॥ ११ | अन्तरिक्ष इस रथका वरूथ (कवच) था और स्वर्ग तथा मोक्ष इस रथके दोनों ध्वज थे। धर्म तथा विराग इसके दण्ड थे; यज्ञ इस दण्डको आश्रय (सहारा) देनेवाले कहे गये हैं। दक्षिणाएँ उस रथकी सन्थियाँ थीं और पचासों अग्नियाँ इसकी कीलें थीं। धर्म तथा काम—ये दोनों उसके जुओंके सिरे कहे गये हैं। अव्यक्त [तत्त्व] उसका ईषादण्ड था तथा बुद्धि इसका |
| ३४६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| कोणस्तथा ह्यहङ्कारो भूतानि च बलं स्मृतम्।<br>इन्द्रियाणि च तस्यैव भूषणानि समन्ततः॥ १२<br><br>श्रद्धा च गतिरस्यैव वेदास्तस्य हयाः स्मृताः।<br>पदानि भूषणान्येव षडङ्गान्युपभूषणम्॥ १३<br><br>पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राणि सुव्रताः।<br>वालाश्रयाः पटाश्चैव सर्वलक्षणसंयुताः॥ १४<br><br>मन्त्रा घण्टाः स्मृतास्तेषां वर्णाः पादास्तथाश्रमाः।<br>अवच्छेदो ह्यनन्तस्तु सहस्रफणभूषितः॥ १५ | नड़वल (अक्षको स्निग्ध बनानेवाले द्रव्यका पात्र) थी। अहंकार इसका कोण था। पंचमहाभूतोंको इसका बल बताया गया है। [सभी] इन्द्रियाँ उसके सभी ओर लगे हुए आभूषण थे। श्रद्धा इस [रथ]-की गति थी। वेद उसके घोड़े कहे गये हैं। वेदोंके पदविभाग इसके भूषण थे तथा [शिक्षा आदि] छः वेदांग इसके उपभूषण थे। हे सुव्रतो! पुराण, न्याय, मीमांसा तथा धर्मशास्त्र इसके वालाश्रय पट थीं, जो सभी लक्षणोंसे युक्त थे। [गायत्री आदि] मन्त्र, [क आदि] वर्ण, पाद (छन्दोंके चतुर्थांश) तथा [ब्रह्मचर्य आदि] आश्रम उन पटोंके घंटे कहे गये हैं। हजार फणोंसे विभूषित अनन्त [शेषनाग] उसके बन्धनरज्जु थे॥ ९-१५॥ | | दिशः पादा रथस्यास्य तथा चोपदिशश्च ह।<br>पुष्कराद्याः पताकाश्च सौवर्णा रत्नभूषिताः॥ १६<br><br>समुद्रास्तस्य चत्वारो रथकम्बलिकाः स्मृताः।<br>गङ्गाद्याः सरितः श्रेष्ठाः सर्वाभरणभूषिताः॥ १७<br><br>चामरासक्तहस्ताग्राः सर्वाः स्त्रीरूपशोभिताः।<br>तत्र तत्र कृतस्थानाः शोभयाञ्चक्रिरे रथम्॥ १८ | दिशाएँ तथा उपदिशाएँ इस रथके पाद थे। पुष्कर आदि [मेघ] रत्नभूषित सुवर्णनिर्मित पताकाएँ थीं। चारों समुद्र उस रथके बाह्य कम्बल कहे गये हैं। गंगा आदि सभी श्रेष्ठ नदियाँ समस्त आभूषणोंसे अलंकृत होकर [अपने] हाथोंके अग्रभागमें चामर (चँवर) धारण किये हुए स्त्रीरूपसे शोभित होती हुई जहाँ-तहाँ अपना स्थान बनाकर रथको सुशोभित कर रही थीं॥ १६-१८॥ | | आवहाद्यास्तथा सप्त सोपानं हैममुत्तमम्।<br>सारथिर्भगवान् ब्रह्मा देवाभीषुधराः स्मृताः॥ १९<br><br>प्रतोदो ब्रह्मणस्तस्य प्रणवो ब्रह्मदैवतम्।<br>लोकालोकाचलस्तस्य ससोपानः समन्ततः॥ २०<br><br>विषमश्च तदा बाह्यो मानसाद्रिः सुशोभनः।<br>नासाः समन्ततस्तस्य सर्व एवाचलाः स्मृताः॥ २१ | आवह आदि सात वायु उसकी सुवर्णमय उत्तम सीढ़ियाँ थीं। भगवान् ब्रह्मा सारथि थे और देवतालोग रथकी रश्मियोंको पकड़नेवाले कहे गये हैं। ब्रह्मदैवत प्रणव ब्रह्माके हाथमें स्थित उसका प्रतोद (चाबुक) था। विस्तृत लोकालोक पर्वत उसके सात वायुओंके स्कन्धरूप सोपानसे युक्त था। परम सुन्दर मानस पर्वत उसमें पैर रखनेका अधोभाग (पायदान) था। समस्त पर्वत सभी ओर इस रथकी नासा (नासिका) कहे गये हैं॥ १९-२१॥ | | तलाः कपोताः कापोताः सर्वे तलनिवासिनः।<br>मेरुरेव महाछत्रं मन्दरः पार्श्वडिण्डिमः॥ २२<br><br>शैलेन्द्रः कार्मुकं चैव ज्याभुजङ्गाधिपः स्वयम्।<br>कालरात्र्या तथैवेह तथेन्द्रधनुषा पुनः॥ २३<br><br>घण्टा सरस्वती देवी धनुषः श्रुतिरूपिणी।<br>इषुर्विष्णुर्महातेजाः शल्यं सोमः शरस्य च॥ २४ | सातों तल उस रथके मज्जन थे; उन तलोंमें रहनेवाले सभी लोग कपोतपक्षीके समान थे। मेरु पर्वत उस रथका महाछत्र था और मन्दर पर्वत पृष्ठवाद्यके रूपमें था। शैलराज [मेरु] धनुष थे और स्वयं भुजंगपति [वासुकि] कालरात्रि तथा इन्द्रधनुषके साथ ज्या (धनुषकी डोरी) थे। वेदस्वरूपिणी सरस्वती देवी [उस] धनुषकी घण्टा थीं, महातेजस्वी विष्णु बाण थे |
अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति ३४७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कालाग्निरस्तच्छल्यश्चैव साक्षात्तीक्ष्णः सुदारुणः।<br>अनीकं विषसम्भूतं वायवो वाजकाः स्मृताः॥ २५ | और चन्द्रमा [उस] बाणके शल्य (लौहनिर्मित अग्रभाग) थे। साक्षात् प्रलयाग्नि उस बाणके तीक्ष्ण तथा अतिभयंकर विषमयं अनीक (बल) थे। [आवह आदि] वायु [उस बाणके] पंख कहे गये हैं॥ २२—२५॥ |
| एवं कृत्वा रथं दिव्यं कार्मुकं च शरं तथा।<br>सारथिं जगतां चैव ब्रह्माणं प्रभुमीश्वरम्॥ २६<br><br>आरुरोह रथं दिव्यं रणमण्डनधृग्भवः।<br>सर्वदेवगणैर्युक्तं कम्पयन्निव रोदसी॥ २७ | इस प्रकार [देवताओंके द्वारा] दिव्य रथ, धनुष, बाण तथा जगत्के स्वामी प्रभु ब्रह्माको सारथि बनाकर तथा [कवच, मुकुट आदि] रणभूषणोंको धारण करनेवाले शिवजी सभी देवताओंसहित पृथ्वी तथा स्वर्गको कम्पित करते हुए [उस] दिव्य रथपर आरूढ़ हुए॥ २६-२७॥ |
| ऋषिभिः स्तूयमानश्च वन्द्यमानश्च वन्दिभिः।<br>उपनृत्यच्चाप्सरसां गणैर्नृत्यविशारदैः॥ २८<br><br>सुशोभमानो वरदः सम्प्रेक्ष्यैव च सारथिम्।<br>तस्मिन्नारोहति रथं कल्पितं लोकसम्भृतम्॥ २९<br><br>शिरोभिः पतिता भूमिं तुरगा वेदसम्भवाः।<br>अथाधस्ताद्रथस्यास्य भगवान् धरणीधरः॥ ३०<br><br>वृषेन्द्ररूपी चोत्थाप्य स्थापयामास वै क्षणम्।<br>क्षणान्तरे वृषेन्द्रोऽपि जानुभ्यामगमद्धराम्॥ ३१<br><br>अभीषुहस्तो भगवानुद्यम्य च हयान् विभुः।<br>स्थापयामास देवस्य वचनाद्वै रथं शुभम्॥ ३२<br><br>ततोऽश्वांश्चोदयमास मनोमारुतरंहसः।<br>पुराण्युद्दिश्य खस्थानि दानवानां तरस्विनाम्॥ ३३ | ऋषियोंके द्वारा स्तुत होते हुए और बन्दीजनों तथा नृत्य करती हुई नृत्यप्रवीण अप्सराओंके द्वारा वन्दित होते हुए वे वरद शिव अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे। सारथिकी ओर देखकर उस लोकसम्भृत कल्पित रथपर उनके आरूढ़ होते ही वेदसम्भूत घोड़े सिरके बल भूमिपर गिर पड़े। तदनन्तर वृषेन्द्रका रूप धारण किये हुए भगवान् शेषने इस रथको नीचेसे उठाकर क्षणभरमें स्थापित करना चाहा, किंतु वे वृषेन्द्र भी एक क्षणके बाद घुटनोंके बल पृथ्वीपर गिर पड़े। तब हाथमें लगाम पकड़े हुए सर्वव्यापी भगवान् [ब्रह्माने] शिवके आदेशसे घोड़ोंको उद्यत (उत्साहित) करके [उस] शुभ रथको स्थापित कर दिया और उन्होंने मन तथा वायुके समान वेगवाले घोड़ोंको साहसी दानवोंके आकाश-स्थित पुरोंको उद्देश्य करके प्रेरित किया॥ २८—३३॥ |
| अथाह भगवान् रुद्रो देवानालोक्य शङ्करः।<br>पशूनामाधिपत्यं मे दत्तं हन्मि ततोऽसुरान्॥ ३४<br><br>पृथक्पशुत्वं देवानां तथान्येषां सुरोत्तमाः।<br>कल्पयित्वैव वध्यास्ते नान्यथा नैव सत्तमाः॥ ३५ | इसके बाद भगवान् शंकर रुद्रने देवताओंको देखकर कहा—'मुझे ही पशुओं (जीवों)-का आधिपत्य दिया गया है; अतः मैं असुरोंका हनन करता हूँ। हे श्रेष्ठ देवताओ! देवों तथा असुरोंके लिये पृथक्-पृथक् पशुत्व होनेके कारण ही वे महादानव वधके योग्य होंगे; अन्यथा नहीं॥ ३४-३५॥ |
| इति श्रुत्वा वचः सर्वं देवदेवस्य धीमतः।<br>विषादमगमन् सर्वे पशुत्वं प्रति शङ्किताः॥ ३६ | बुद्धिमान् देवदेव [शिव]-का सम्पूर्ण वचन सुनकर पशुत्वके प्रति शंकित होते हुए सभी देवता विषादग्रस्त हो गये॥ ३६॥ |
| तेषां भावं ततो ज्ञात्वा देवस्तानीदमब्रवीत्।<br>मा वोऽस्तु पशुभावेऽस्मिन् भयं विबुधसत्तमाः॥ ३७<br><br>श्रूयतां पशुभावस्य विमोक्षः क्रियतां च सः।<br>यो वै पाशुपतं दिव्यं चरिष्यति स मोक्ष्यति॥ ३८ | तब उनके इस भावको जानकर शिवजीने उनसे यह वचन कहा—'हे श्रेष्ठ देवताओ! इस पशुभावमें आपलोगोंको भय नहीं होना चाहिये। अब पशुभावकी |
| ३४८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पशुत्वादिति सत्यं च प्रतिज्ञातं समाहिताः ।<br>ये चाप्यन्ये चरिष्यन्ति व्रतं पाशुपतं मम ॥ ३९<br>मोक्ष्यन्ति ते न सन्देहः पशुत्वात्सुरसत्तमाः ।<br>नैष्ठिकं द्वादशाब्दं वा तदर्थं वर्षकत्रयम् ॥ ४०<br>शुश्रूषां कारयेद्यस्तु स पशुत्वाद्विमुच्यते ।<br>तस्मात्परमिदं दिव्यं चरिष्यथ सुरोत्तमाः ॥ ४१ | मुक्तिका उपाय सुनिये और उसे कीजिये। जो दिव्य पाशुपतव्रतको करेगा, वह पशुत्वसे मुक्त हो जायगा; यह सत्य तथा प्रतिज्ञात है। हे श्रेष्ठ देवताओ! एकाग्रचित्त होकर जो अन्य लोग भी मेरे पाशुपतव्रतको करेंगे, वे पशुत्वसे मुक्त हो जायँगे; इसमें सन्देह नहीं है। जो निष्ठापूर्वक बारह वर्ष, उसके आधे [छः वर्ष] अथवा तीन वर्षतक शुश्रूषा करेगा, वह पशुत्वसे मुक्त हो जायगा। अतः हे श्रेष्ठ देवताओ! [आपलोग] इस परम दिव्य व्रतको कीजिये' ॥ ३७-४१ ॥ |
| तथेति चाब्रुवन् देवाः शिवे लोकनमस्कृते ।<br>तस्माद्वै पशवः सर्वे देवासुरनराः प्रभोः ॥ ४२<br>रुद्रः पशुपतिश्चैव पशुपाशविमोचकः ।<br>यः पशुस्तत्पशुत्वं च व्रतेनानेन सन्त्यजेत् ॥ ४३<br>तत्कृत्वा न च पापीयानिति शास्त्रस्य निश्चयः ।<br>ततो विनायकः साक्षाद् बालोऽबालपराक्रमः ॥ ४४<br>अपूजितस्तदा देवैः प्राह देवान्निवारयन् । | लोकनमस्कृत शिवके ऐसा कहनेपर देवताओंने कहा—'ऐसा ही होगा।' अतः समस्त देवता, असुर तथा मनुष्य शिवजीके पशु हैं। रुद्र पशुपति हैं और पशुपाशसे मुक्त करनेवाले हैं। जो पशु है, उसे इस व्रतके द्वारा पशुभावका त्याग कर देना चाहिये; इसे करके वह पापी नहीं रह जाता है—यह शास्त्रका निश्चय है ॥ ४२-४३ १/२ ॥<br><br>तत्पश्चात् अमित पराक्रमवाले बालकरूप साक्षात् विनायक देवताओंद्वारा पूजित न होनेके कारण उन्हें रोकते हुए कहने लगे ॥ ४४ १/२ ॥ |
| श्रीविनायक उवाच<br>मामपूज्य जगत्यस्मिन् भक्ष्यभोज्यादिभिः शुभैः ॥ ४५<br>कः पुमान् सिद्धिमाप्नोति देवो वा दानवोऽपि वा ।<br>ततस्तस्मिन् क्षणादेव देवकार्ये सुरेश्वराः ॥ ४६<br>विघ्नं करिष्ये देवेशः कथं कर्तुं समुद्यताः ।<br>ततः सेन्द्राः सुराः सर्वे भीताः सम्पूज्य तं प्रभुम् ॥ ४७<br>भक्ष्यभोज्यादिभिश्चैव उण्डरैश्चैव मोदकैः ।<br>अब्रुवंस्ते गणेशानं निर्विघ्नं चास्तु नः सदा ॥ ४८ | श्रीविनायक बोले—शुभ भक्ष्य, भोज्य आदि पदार्थोंके द्वारा मेरी पूजा किये बिना इस संसारमें कौन मनुष्य, देवता अथवा दानव सिद्धि प्राप्त कर सकता है? अतः हे सुरेश्वरो! मैं देवेश क्षणभरमें ही उस देवकार्यमें विघ्न करूँगा; [मेरी पूजा किये बिना] आपलोग कार्य करनेमें कैसे तत्पर हो गये? ॥ ४५-४६ १/२ ॥<br><br>तत्पश्चात् इन्द्रसहित सभी देवता भयभीत हो गये और भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थों, आटेसे बने लड्डुओं तथा मोदकोंसे उन प्रभुकी विधिवत् पूजा करके वे गणेश्वरसे बोले—'हमलोगोंका कार्य सदा निर्विघ्न सम्पन्न हो' ॥ ४७-४८ ॥ |
| भवोऽप्यनेकैः कुसुमैर्गणेशं<br>भक्ष्यैश्च भोज्यैः सुरसैः सुगन्धैः ।<br>आलिङ्ग्य चाघ्राय सुतं तदानी-<br>मपूजयत्सर्वसुरेन्द्रमुख्यः ॥ ४९ | उस समय समस्त सुरेश्वरोंमें मुख्य शिवने भी [अपने] पुत्र गणेशका आलिङ्गन करके उनका सिर सूँघकर अनेक प्रकारके सुगन्धित पुष्पों, भक्ष्य-भोज्य पदार्थों तथा उत्तम रसोंसे उनकी पूजा की ॥ ४९ ॥ |
| सम्पूज्य पूज्यं सह देवसङ्घै-<br>र्विनायकं नायकमिश्वराणाम् ।<br>गणेश्वरैरैव नगेन्द्रधन्वा<br>पुरत्रयं दग्धुमसो जगाम ॥ ५० | इसके बाद वे मेरुधन्वा शिवजी देवताओंके साथ |
अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति ३४९
| ईश्वरोंके नायक पूजनीय विनायककी पूजा करके तीनों पुरोंको जलानेके लिये गणेश्वरोंके साथ चल पड़े ॥ ५० ॥ | |
|---|---|
| तं देवदेवं सुरसिद्धसङ्घा<br>महेश्वरं भूतगणाश्च सर्वे।<br>गणेश्वरा नन्दिमुखास्तदानीं<br>स्ववाहनैरन्वय्युरीशमीशाः ॥ ५१ | उस समय सभी देवता, सिद्ध, भूतगण, नन्दी आदि गणेश्वर तथा अन्य ईश्वर अपने-अपने वाहनोंसे उन देवदेव ईश महेश्वरके पीछे-पीछे चले ॥ ५१ ॥ |
| अग्रे सुराणां च गणेश्वराणां<br>तदाथ नन्दी गिरिराजकल्पम्।<br>विमानमारुह्य पुरं प्रहर्तुं<br>जगाम मृत्युं भगवानिवेशः॥ ५२ | हिमालयसदृश विमानपर चढ़कर नन्दी [सभी] देवताओं तथा गणेश्वरोंके आगे होकर त्रिपुरपर प्रहार करनेके लिये चले, मानो भगवान् शिव मृत्युपर प्रहारहेतु चले हों ॥ ५२ ॥ |
| यान्तं तदानीं तु शिलादपुत्र-<br>मारुह्य नागेन्द्रवृषाश्ववर्यान्।<br>देवास्तदानीं गणपाश्च सर्वे<br>गणा ययुः स्वायुधचिह्नहस्ताः ॥ ५३ | उस समय जाते हुए शिलादपुत्र [नन्दी]-के पीछे सभी देवता, गणेश्वर तथा गणलोग विशाल हाथियों, बैलों और घोड़ोंपर आरूढ़ होकर हाथोंमें अपने शस्त्र तथा चिह्न धारण किये हुए चले ॥ ५३ ॥ |
| खगेन्द्रमारुह्य नगेन्द्रकल्पं<br>खगध्वजो वामत एव शम्भोः।<br>जगाम तूर्णं जगतां हिताय<br>पुरत्रयं दग्धमुलुप्तशक्तिः ॥ ५४ | महाशक्तिशाली गरुड़ध्वज [विष्णु] गिरीन्द्रसदृश पक्षिराज [गरुड़]-पर आरूढ़ होकर लोकोंके हितार्थ तीनों पुरोंको दग्ध करनेके लिये शिवजीके बायें होकर शीघ्रतापूर्वक चले ॥ ५४ ॥ |
| तं सर्वदेवाः सुरलोकनाथं<br>समन्ततश्चान्वयुरप्रमेयम् ।<br>सुरासुरेशं शितशक्तिटङ्क-<br>गदात्रिशूलासिवरायुधैश्च ॥ ५५ | सभी देवता तीक्ष्ण शक्ति (बर्छी), टंक, गदा, त्रिशूल, खड्ग आदि उत्तम आयुधोंसे युक्त होकर देवलोकके नाथ, देवताओं तथा असुरोंके स्वामी और अप्रमेय उन शिवके पीछे-पीछे सभी ओरसे चले ॥ ५५ ॥ |
| रराज मध्ये भगवान् सुराणां<br>विवाहनो वारिजपत्रवर्णः।<br>यथा सुमेरोः शिखराधिरूढः<br>सहस्ररश्मिर्भगवान् सुतीक्ष्णः ॥ ५६ | कमलपत्रके समान वर्णवाले गरुड़वाहन भगवान् विष्णु देवताओंके मध्य ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो सुमेरु [पर्वत]-के शिखरपर आरूढ़ हजार किरणोंवाले भगवान् सूर्य हों ॥ ५६ ॥ |
| सहस्रनेत्रः प्रथमः सुराणां<br>गजेन्द्रमारुह्य च दक्षिणेऽस्य।<br>जगाम रुद्रस्य पुरं निहन्तुं<br>यथोरगांस्तत्र तु वैनतेयः ॥ ५७ | गजेन्द्र (ऐरावत)-पर आरूढ़ होकर देवताओंके प्रमुख सहस्र नेत्रवाले [इन्द्र] रुद्रके दाहिनी ओर होकर त्रिपुरका नाश करनेके लिये चले; मानो गरुड़ सर्पोंका नाश करनेके लिये चल दिये हों ॥ ५७ ॥ |
| तं सिद्धगन्धर्वसुरेन्द्रवीराः<br>सुरेन्द्रवृन्दाधिपमिन्द्रमीशम् ।<br>समन्ततस्तुष्टुवुरिष्टदं ते<br>जयेति शक्रं वरपुष्पवृष्ट्या ॥ ५८ | सिद्ध, गन्धर्व, श्रेष्ठ देवता तथा अन्य वीर देवताओंके स्वामी प्रभु उन इन्द्रकी स्तुति कर रहे थे और वे श्रेष्ठ पुष्पवृष्टिके साथ कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले इन्द्रकी जय-जयकार कर रहे थे ॥ ५८ ॥ |
| तदा ह्यहल्योपपतिं सुरेशं<br>जगत्पतिं देवपतिं दिविष्ठाः। | उस समय स्वर्गमें स्थित देवताओंने अहल्याके उपपति, देवताओंके ईश, जगत्के स्वामी, देवताओंके |
| ३५० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रणेमुरालोक्य सहस्रनेत्रं<br>सलीलमम्बा तनयं यथेन्द्रम् ॥ ५९ | स्वामी तथा हजार नेत्रोंवाले इन्द्रको देखकर लीलापूर्वक उसी प्रकार प्रणाम किया, जैसे माता पार्वती पुत्र कार्तिकेयको प्रणाम करती हैं ॥ ५९ ॥ |
| यमपावकवित्तेशा वायुर्निर्ऋतिरेव च।<br>अपां पतिस्तथेशानो भवं चानुसमागताः ॥ ६० | यम, अग्नि, कुबेर, वायु, निर्ऋति, वरुण तथा ईशान भी शिवजीके पीछे-पीछे चले ॥ ६० ॥ |
| वीरभद्रो रणे भद्रो नैर्ऋत्यां वै रथस्य तु।<br>वृषभेन्द्रं समारुह्य रोमजैश्र्च समावृतः ॥ ६१<br>सेवां चक्रे पुरं हन्तुं देवदेवं त्रियम्बकम्।<br>महाकालो महातेजा महादेव इवापरः ॥ ६२<br>वायव्यां सगणैः सार्धं सेवां चक्रे रथस्य तु ॥ ६३ | युद्धमें प्रवीण वीरभद्र वृषभेन्द्रपर आरूढ़ होकर रथके नैर्ऋत्यकोण (दक्षिण-पश्चिम)-में होकर त्रिपुरका नाश करनेके लिये चले; अपने रोमजसंज्ञक बाणोंसे घिरे हुए वे देवदेव त्रियम्बककी सेवा कर रहे थे। दूसरे महादेवके समान प्रतीत होनेवाले महातेजस्वी महाकाल रथके वायव्यकोण (उत्तर-पश्चिम)-में होकर गणोंके साथ रथकी सेवा कर रहे थे ॥ ६१-६३ ॥ |
| षण्मुखोऽपि सह सिद्धचारणैः<br>सेनया च गिरिराजसन्निभः।<br>देवनाथगणवृन्दसंवृतो<br>वारणेन च तथाग्निसम्भवः ॥ ६४ | गिरिराजके समान प्रतीत होनेवाले तथा अग्निसे उत्पन्न षडानन भी सिद्धों, चारणों एवं देवसेनाके साथ शिवके गणोंसे आवृत होकरके हाथीपर सवार होकर चले ॥ ६४ ॥ |
| विघ्नं गणेशोऽप्यसुरेश्वराणां<br>कृत्वा सुराणां भगवानविघ्नम्।<br>विघ्नेश्वरो विघ्नगणैश्च सार्धं<br>तं देशमीशानपदं जगाम ॥ ६५ | विघ्नेश्वर भगवान् गणेश भी असुरेश्वरोंका विघ्न करके तथा देवताओंका अविघ्न करके विघ्नगणोंके साथ उस देश (त्रिपुर)-की ओर शिवजीके पीछे-पीछे चले ॥ ६५ ॥ |
| काली तदा कालनिशाप्रकाशां<br>शूलं कपालाभरणा करेण।<br>प्रकम्पयन्ती च तदा सुरेन्द्रान्<br>महासुरासृङ्मधुपानमत्ता ॥ ६६<br>मत्तेभगामी मदलोलनेत्रा<br>मत्तैः पिशाचैश्च गणैश्च मत्तैः।<br>मत्तेभचर्माम्बरवेष्टिताङ्गी<br>ययौ पुरस्ताच्च गणेश्वरस्य ॥ ६७ | उस समय हाथमें कालरात्रिके समान प्रकाशमान त्रिशूल धारण किये, कपालके आभूषणवाली, बड़े-बड़े असुरोंके रक्तरूपी मधुके पानसे मत्त, मतवाले हाथीके समान चालवाली, मदसे चंचल नेत्रोंवाली, मतवाले हाथियोंके चर्मरूपी वस्त्रसे वेष्टित अंगोंवाली काली देवताओंको कम्पित करती हुई मत्तपिशाचों तथा मतवाले गणोंके साथ गणेशजीके आगे-आगे चलीं ॥ ६६-६७ ॥ |
| तां सिद्धगन्धर्वपिशाचयक्ष-<br>विद्याधराहीन्द्रसुरेन्द्रमुख्याः।<br>प्रणेमुरुच्चैरभितुष्टुवुश्च<br>जयेति देवीं हिमशैलपुत्रीम् ॥ ६८ | सिद्धों, गन्धर्वों, पिशाचों, यक्षों, विद्याधरों, सर्पों तथा प्रमुख देवताओंने उन देवी पार्वतीको प्रणाम किया, उच्च स्वरसे उनकी स्तुति की तथा उनका जयकार किया ॥ ६८ ॥ |
| मातरः सुरवरारिसूधनाः<br>सादरं सुरगणैः सुपूजिताः।<br>मातरं ययुरथ स्ववाहनैः<br>स्वैर्गणैरूर्ध्वजधरैः समन्ततः ॥ ६९ | इसी प्रकार देवशत्रुओंका संहार करनेवाली तथा देवताओंके द्वारा आदरपूर्वक पूजित देवमाताएँ सभी ओर ध्वज धारण किये हुए अपने-अपने गणोंके साथ अपने-अपने वाहनोंसे माताके पीछे-पीछे चलीं ॥ ६९ ॥ |
अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति ३५१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दुर्गारूढमृगाधिपा दुरतिगा दोर्दण्डवृन्दैः शिवा<br>बिभ्राणाङ्कुशशूलपाशपरशुं चक्रासिशङ्खायुधम् ।<br>प्रौढादित्यसहस्रवह्निसदृशैर्नेत्रैर्दहन्ती पथं<br>बाला बालपराक्रमा भगवती दैत्यान् प्रहर्तुं ययौ ॥ ७० | बालरूपा होते हुए भी अमित पराक्रमवाली तथा [सबके द्वारा] अनतिक्रमणीय भगवती दुर्गा सिंहपर सवार होकर [अपनी] भुजाओंमें अंकुश, शूल, पाश, परशु, चक्र, खड्ग, शंख आदि आयुध धारण किये हुए और मध्याह्नकालीन सूर्य तथा हजार अग्नियोंके समान [देदीप्यमान] नेत्रोंसे मार्गको जलाती हुई [उन] दैत्योंपर प्रहार करनेके लिये चलीं ॥ ७० ॥ |
| तं देवमीशं त्रिपुरं निहन्तुं<br>तदा तु देवेन्द्ररविप्रकाशाः ।<br>गजैर्हयैः सिंहवरैरथैश्च<br>वृषैर्ययुस्ते गणराजमुख्याः ॥ ७१ | उस समय इन्द्र तथा सूर्यके समान कान्तिवाले मुख्य गणेश्वर त्रिपुरका नाश करनेके लिये हाथियों, घोड़ों, उत्तम सिंहों, रथों तथा वृषभोंपर सवार होकर उन भगवान् शिवके पीछे चले ॥ ७१ ॥ |
| हलैश्च फालैर्मुसलैर्भुशुण्डै-<br>र्गिरीन्द्रकूटैर्गिरिसन्निभास्ते ।<br>ययुः पुरस्ताद्धि महेश्वरस्य<br>सुरेश्वरा भूतगणेश्वराश्च ॥ ७२ | हलों, फालों, मुसलों, लोहनिर्मित गदाओं तथा पर्वतशिखरोंको धारण किये हुए गिरिसदृश वे सुरेश्वर, भूत तथा गणेश्वर महेश्वरके आगे-आगे चले ॥ ७२ ॥ |
| तथेन्द्रपद्मोद्भवविष्णुमुख्याः<br>सुरा गणेशाश्च गणेशमीशम् ।<br>जयेति वाग्भिर्भगवन्तमूचुः<br>किरीटदत्ताञ्जलयः समन्तात् ॥ ७३ | इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता और [सभी] गणेश्वर अपने मुकुटोंको अंजलिपर टिकाकर [प्रणाम करते हुए] चारों ओरसे वाणीद्वारा ईश भगवान् गणेशकी जय बोल रहे थे ॥ ७३ ॥ |
| ननृतुर्मुनयः सर्वे दण्डहस्ता जटाधराः ।<br>ववृषुः पुष्पवर्षाणि खेचराः सिद्धचारणाः ।<br>पुरत्रयं च विप्रेन्द्राः प्राणदत्सर्वतस्तथा ॥ ७४ | हाथमें दण्ड लिये हुए जटाधारी सभी मुनियोंने नृत्य किया और आकाशचारी सिद्धों तथा चारणोंने पुष्पवर्षा की। हे विप्रेन्द्रो! त्रिपुर चारों ओरसे गूँज उठा ॥ ७४ ॥ |
| गणेश्वरैर्देवगणैश्च भृङ्गी<br>समावृतः सर्वगणेन्द्रवर्यः ।<br>जगाम योगी त्रिपुरं निहन्तुं<br>विमानमारुह्य यथा महेन्द्रः ॥ ७५ | सभी गणेश्वरोंमें श्रेष्ठ योगपरायण भृंगी देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति गणेश्वरोंसे घिरे होकर विमानपर चढ़कर त्रिपुरका नाश करनेके लिये चले ॥ ७५ ॥ |
| केशो विगतवासाश्च महाकेशो महाज्वरः ।<br>सोमवल्ली सवर्णश्च सोमपः सेनकस्तथा ॥ ७६<br>सोमधृक् सूर्यवाचश्च सूर्यपेषणकस्तथा ।<br>सूर्याक्षः सूरिनामा च सुरः सुन्दर एव च ॥ ७७<br>प्रकुदः ककुदन्तश्च कम्पनश्च प्रकम्पनः ।<br>इन्द्रश्चेन्द्रजयश्चैव महाभीर्भीमकस्तथा ॥ ७८<br>शताक्षश्चैव पञ्चाक्षः सहस्राक्षो महोदरः ।<br>यमजिह्वः शताश्वश्च कण्ठनः कण्ठपूजनः ॥ ७९<br>द्विशिखस्त्रिशिखश्चैव तथा पञ्चशिखो द्विजाः ।<br>मुण्डोऽर्धमुण्डो दीर्घश्च पिशाचास्यः पिनाकधृक् ॥ ८०<br>पिप्पलायतनश्चैव तथा ह्यङ्गारकाशनः ।<br>शिथिलः शिथिलास्यश्च अक्षपादो ह्यजः कुजः ॥ ८१<br>अजवक्त्रो हयवक्त्रो गजवक्त्रोर्ध्ववक्त्रकः ।<br>इत्याद्याः परिवायेशं लक्ष्यलक्षणवर्जिताः ॥ ८२<br>वृन्दशतं समावृत्य जग्मुः सोमं गणैर्वृताः ।<br>सहस्राणां सहस्राणि रुद्राणामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ८३ | हे द्विजो! केश, विगतवास, महाकेश, महाज्वर, सोमवल्ली, सवर्ण, सोमप, सेनक, सोमधृक्, सूर्यवाच, सूर्यपेषण, सूर्याक्ष, सूरिनामा, सुर, सुन्दर, प्रकुद, ककुदन्त, कम्पन, प्रकम्पन, इन्द्र, इन्द्रजय, महाभी, भीमक, शताक्ष, पंचाक्ष, सहस्राक्ष, महोदर, यमजिह्व, शताश्व, कण्ठन, कण्ठपूजन, द्विशिख, त्रिशिख, पंचशिख, मुण्ड, अर्धमुण्ड, दीर्घ, पिशाचास्य, पिनाकधृक्, पिप्पलायतन, अंगारकाशन, शिथिल, शिथिलास्य, अक्षपाद, अज, कुज, अजवक्त्र, हयवक्त्र, गजवक्त्र, ऊर्ध्ववक्त्र तथा अन्य लक्ष्यलक्षण-वर्जित गणेश्वर एक साथ मिलकर |
| ३५२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| समावृत्य महादेवं देवदेवं महेश्वरम्।<br>दग्धुं पुरत्रयं जग्मुः कोटिकोटिगणैर्वृताः ॥ ८४<br><br>त्रयस्त्रिंशत्सुराश्चैव त्रयश्च त्रिशतास्तथा।<br>त्रयश्च त्रिसहस्त्राणि जग्मुर्देवाः समन्ततः ॥ ८५ | अपने गणसमुदायोंके साथ उन शिवजीको घेरकर चले। इसी प्रकार [अपने] करोड़ों-करोड़ गणोंसे घिरे हुए हजारों-हजार रुद्र तीनों पुरोंको दग्ध करनेके लिये महादेव देवदेव महेश्वरको घेरकर चले ॥ ७६-८४॥<br><br>[वसु, रुद्र, आदित्य आदि] तैंतीस देवता; ब्रह्मा, विष्णु, महेश—ये तीनों देवता और उनके भेदरूप तीन सौ तथा तीन हजार तीन अन्य देवता सभी ओरसे वहाँ गये ॥ ८५॥ |
| मातरः सर्वलोकानां गणानां चैव मातरः।<br>भूतानां मातरश्चैव जग्मुर्देवस्य पृष्ठतः ॥ ८६ | सभी लोकोंकी माताएँ, गणोंकी माताएँ तथा भूतोंकी माताएँ शिवजीके पीछे-पीछे चलीं ॥ ८६॥ |
| भाति मध्ये गणानां च रथमध्ये गणेश्वरः।<br>नभस्यमलनक्षत्रे तारामध्ये इवोडुराट् ॥ ८७ | रथके मध्य [विराजमान] गणेश्वर गणोंके बीच उसी तरह प्रतीत हो रहे थे, जैसे निर्मल नक्षत्रोंवाले आकाशमें ताराओंके बीच चन्द्रमा ॥ ८७॥ |
| रराज देवी देवस्य गिरिजा पार्श्वसंस्थिता।<br>तदा प्रभावतो गौरी भवस्येव जगन्मयी ॥ ८८<br><br>शुभावती तदा देवी पार्श्वसंस्था विभाति सा।<br>चामरासक्तहस्ताग्रा सा हेमाम्बुजवर्णिका ॥ ८९ | उस समय शिवके प्रभाव (सामर्थ्य)-के कारण ही जगन्मयी पार्वती देवी [उन] शिवके वामभागमें स्थित होकर सुशोभित हो रही थीं। उस समय सुवर्णकमलके समान वर्णवाली देवी शुभावती (पार्वतीकी सखी) हाथके अग्रभागमें चँवर लिये हुए उनके बगलमें स्थित होकर सुशोभित हो रही थीं ॥ ८८-८९॥ |
| अथ विभाति विभोर्विशदं वपु-<br>र्भसितभासितमम्बिकया तया।<br>सितमिवाभ्रमहो इह विद्युता<br>नभसि देवपतेः परमेष्ठिनः ॥ ९० | सर्वव्यापी देवेश्वर शिवका भस्मसे दीप्यमान अतिस्वच्छ विग्रह उन पार्वतीके साथ उसी प्रकार प्रतीत हो रहा था, जैसे आकाशमें विद्युत्के साथ श्वेत बादल ॥ ९०॥ |
| भातीन्द्रधनुषाकाशं मेरुणा च यथा जगत्।<br>हिरण्यधनुषा सौम्यं वपुः शम्भोः शशिद्युति ॥ ९१ | सुवर्णमय धनुषसे युक्त तथा चन्द्रमाकी प्रभावाला शंकरजीका सौम्य शरीर इन्द्रधनुषसे युक्त आकाश अथवा मेरुपर्वतसे युक्त जगत्की भाँति प्रतीत हो रहा था ॥ ९१॥ |
| सितातपत्रं रत्नांशुमिश्रितं परमेष्ठिनः।<br>यथोदये शशाङ्कस्य भात्यखण्डं हि मण्डलम् ॥ ९२ | रत्नोंकी किरणोंसे मिश्रित शिवजीका श्वेत छत्र उदयकालमें चन्द्रमाके पूर्णमण्डलके समान प्रतीत हो रहा था ॥ ९२॥ |
| सदुकूला शिवे रक्ता लम्बिता भाति मालिका।<br>छत्रान्ता रत्नजाकाशात्पतन्तीव सरिद्वरा ॥ ९३ | शिवजीके गलेमें रेशमी वस्त्रसहित लटकती हुई रत्नमयी मोतियोंकी माला उनके छत्रके पास आकाशसे गिरती हुई गंगाके समान प्रतीत हो रही थी ॥ ९३॥ |
| अथ महेन्द्रविरिञ्चिविभावसु-<br>प्रभृतिभिर्नतपादसरोरुहः ।<br>सह तदा च जगाम तयाम्बया<br>सकललोकहिताय पुरत्रयम् ॥ ९४ | इस प्रकार महेन्द्र, ब्रह्मा, अग्नि आदिके द्वारा वन्दित चरणकमलवाले शिवजीने समस्त संसारके हितके लिये उन पार्वतीके साथ त्रिपुरके लिये प्रस्थान किया ॥ ९४॥ |
अध्याय ७२] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति ३५३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दग्धुं समर्थो मनसा क्षणेन<br>चराचरं सर्वमिदं त्रिशूली।<br>किमत्र दग्धुं त्रिपुरं पिनाकी<br>स्वयं गतश्चात्र गणैश्च सार्धम्॥ ९५॥<br><br>रथेन किं चेषुवरेण तस्य<br>गणैश्च किं देवगणैश्च शम्भोः।<br>पुरत्रयं दग्धुमलुप्तशक्तेः<br>किमेतदित्याहुरजेन्द्रमुख्याः ॥ ९६॥<br><br>मन्वाम नूनं भगवान् पिनाकी<br>लीलार्थमेतत्सकलं प्रवृर्तुम्।<br>व्यवस्थितश्चेति तथान्यथा चे-<br>दाडम्बरेणास्य फलं किमन्यत्॥ ९७॥ | त्रिशूलधारी पिनाकी (शिव) मनसे ही क्षणभरमें इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को दग्ध करनेमें समर्थ हैं, तो फिर वे त्रिपुरको जलानेके लिये गणोंके साथ वहाँ क्यों जा रहे हैं? तीनों पुरोंको जलानेके लिये उन अलुप्त शक्तिवाले शम्भुको रथसे, उत्तम बाणसे, गणोंसे तथा देवताओंसे क्या प्रयोजन है—ब्रह्मा, इन्द्र आदि प्रमुख देवोंने ऐसा कहा। हमलोग तो समझते हैं कि पिनाकधारी भगवान् [शिव]-लीलाके लिये यह सब करनेके लिये प्रवृत्त हैं; अन्यथा [इस] आडम्बरसे इन्हें दूसरा कौन-सा लाभ है?॥ ९५–९७॥ |
| पुरत्रयस्यास्य समीपवर्ती<br>सुरेशवैरैर्नन्दिमुखैश्च नन्दी।<br>गणैर्गणेशस्तु रराज देव्या<br>जगद्रथो मेरुरिवाष्टशृङ्गैः॥ ९८॥ | इस त्रिपुरके समीपस्थित नन्दी, नन्दिकेश्वर आदि सुरेश्वरोंके साथ, गणेशजी गणोंके साथ तथा मेरुपर्वत आठ शिखरोंके साथ जिस प्रकार सुशोभित हो रहे थे, उसी प्रकार जगद्रथ (शिव) देवी [पार्वती]-के साथ शोभायमान थे॥ ९८॥ |
| अथ निरीक्ष्य सुरेश्वरमीश्वरं<br>सगणमद्रिसुतासहितं तदा।<br>त्रिपुररङ्गतलोपरि संस्थितः<br>सुरगणोऽनुजगाम स्वयं तथा॥ ९९॥ | इसके बाद गणों तथा पार्वतीसहित सुरेश्वर शिवको देखकर त्रिपुरके युद्धक्षेत्रमें उपस्थित देवसमूहने स्वयं उनका अनुगमन किया॥ ९९॥ |
| जगत्त्रयं सर्वमिवापरं तत्<br>पुरत्रयं तत्र विभाति सम्यक्।<br>नरेश्वरैश्चैव गणैश्च देवैः<br>सुरेतरैश्च त्रिविधैर्मुनीन्द्राः॥ १००॥ | हे मुनीश्वरो ! युद्धकालमें तीन प्रकारके दैत्योंसे युक्त वे तीनों पुर राजाओं, [सिद्ध आदि] गणों तथा देवताओंसे युक्त तीनों लोकके समान प्रतीत हो रहे थे॥ १००॥ |
| अथ सज्यं धनुः कृत्वा शर्वः संधाय तं शरम्।<br>युक्त्वा पाशुपतास्त्रेण त्रिपुरं समचिन्तयत्॥ १०१॥ | इसके बाद धनुषपर डोरी चढ़ाकर उसपर बाण रखकर उसे पाशुपत-अस्त्रसे युक्त करके शिवजीने त्रिपुरका चिन्तन किया॥ १०१॥ |
| तस्मिंस्थिते महादेवे रुद्रे विततकार्मुके।<br>पुराणि तेन कालेन जग्मुरेकत्वमाशु वै॥ १०२॥<br><br>एकीभावं गते चैव त्रिपुरे समुपगते।<br>बभूव तुमलो हर्षो देवतानां महात्मनाम्॥ १०३॥ | धनुष ताने हुए उन महादेवके खड़े होनेपर उसी समय तीनों पुर शीघ्र ही आपसमें जुड़ गये। तीनों पुरोंके एकमें मिल जानेपर तथा समीपमें आ जानेपर महान् आत्मावाले [इन्द्र आदि] देवताओंको परम हर्ष हुआ॥ १०२-१०३॥ |
| ततो देवगणाः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः।<br>जयेति वाचो मुमुचुः संस्तुवन्तोऽष्टमूर्तिनम्॥ १०४॥ | तदनन्तर सभी देवगण, सिद्ध तथा महर्षिगण अष्टमूर्ति [शिव]-की स्तुति करते हुए उनकी जय बोलने लगे॥ १०४॥ |
| अथाह भगवान् ब्रह्मा भगनेत्रनिपातनम्।<br>पुष्ययोगेऽपि सम्प्राप्ते लीलावशमुमापतिम्॥ १०५॥<br><br>स्थाने तव महादेव चेष्टेयं परमेश्वर।<br>पूर्वदेवाश्च देवाश्च समास्तव यतः प्रभो॥ १०६॥<br><br>तथापि देवा धर्मिष्ठाः पूर्वदेवाश्च पापिनः।<br>यतस्तस्माज्जगन्नाथ लीलां त्यक्तुमिहार्हसि॥ १०७॥ | इसके बाद पुष्य नक्षत्रका योग प्राप्त होनेपर भगवान् ब्रह्माने भगके नेत्रका विनाश करनेवाले लीलासक्त उमापतिसे कहा—हे महादेव ! हे परमेश्वर ! हे प्रभो ! इस स्थानपर आपकी यह भावना है कि दैत्य तथा देवता आपके लिये समान हैं, फिर भी देवता धर्मनिष्ठ हैं और दैत्य पापी हैं; अतः हे जगन्नाथ! |