श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय २०] शेषशय्यापर आसीन भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव [८९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एतस्मिन्नन्तरे ताभ्यामेकैकस्य तु कृत्स्नशः।<br>वर्तमाने तु सङ्घर्षे मध्ये तस्यार्णवस्य तु॥ ३३<br><br>कुतोऽप्यपरिमेयात्मा भूतानां प्रभुरीश्वरः।<br>शूलपाणिर्महादेवो हेमवीराम्बरच्छदः॥ ३४<br><br>अगच्छद्यत्र सोऽनन्तो नागभोगपतिर्हरिः। | उस समुद्रके मध्य ब्रह्मा और विष्णुमें अनेक प्रकारसे संघर्ष चल रहा था, उसी समय श्रेष्ठ स्वर्णके समान वस्त्रको धारण करनेवाले, अमेयात्मावाले, जीवोंके स्वामी शूलपाणि महादेव कहींसे वहाँपर पहुँच गये, जहाँ वे शेषशायी अनन्त विष्णुभगवान् थे॥ ३३-३४ १/२॥ |
| शीघ्रं विक्रमदस्तस्य पद्भ्यामाक्रान्तपीडिताः॥ ३५<br><br>उद्भूतास्तूर्णामाकाशे पृथुलास्तोयबिन्दवः।<br>अत्युष्णश्चातिशीतश्च वायुस्तत्र ववौ पुनः॥ ३६ | उनके शीघ्रतापूर्वक चलनेसे चरणोंके प्रहारसे संपीड़ित होकर समुद्र-जलकी बड़ी-बड़ी बूँदें आकाशतक पहुँचने लगीं और वहाँ कभी अत्यन्त गर्म तथा कभी अत्यन्त शीतल वायु बहने लगी॥ ३५-३६॥ |
| तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं ब्रह्मा विष्णुमभाषत।<br>अब्बिन्दवश्च शीतोष्णाः कम्पयन्त्यम्बुजं भृशम्॥ ३७<br><br>एतन्मे संशयं ब्रूहि किं वा त्वन्यच्चिकीर्षसि। | उस महान् आश्चर्यको देखकर ब्रह्माने विष्णुसे कहा कि ये शीतल एवं उष्ण जलकी बूँदें इस कमलको अत्यधिक कम्पायमान कर रही हैं। इस विषयमें मेरी शंकाका समाधान कीजिये अथवा आप कुछ और करना तो नहीं चाहते?॥ ३७ १/२॥ |
| एतदेवंविधं वाक्यं पितामहमुखोद्गतम्॥ ३८<br><br>श्रुत्वाप्रतिमकर्मा हि भगवानसुरान्तकृत्।<br>किं नु खल्वत्र मे नाभ्यां भूतमन्यत्कृतालयम्॥ ३९<br><br>वदति प्रियमत्यर्थं मन्युश्चास्य मया कृतः।<br>इत्येवं मनसा ध्यात्वा प्रत्युवाचेदमुत्तरम्॥ ४० | ब्रह्माके मुखसे निर्गत इस प्रकारकी बात सुनकर अप्रतिम कर्मवाले असुरसंहारक भगवान् विष्णु सोचने लगे कि मेरी नाभिमें इस कौन-से जीवने अपना स्थान बना लिया है, जो इस तरह प्रेमपूर्वक मधुर-मधुर बोल रहा है; तथा मैंने इसके प्रति कहीं क्रोध किया है—ऐसा मनमें ध्यान करके विष्णुभगवान् यह उत्तर देने लगे॥ ३८-४०॥ |
| किमत्र भगवानद्य पुष्करे जातसम्भ्रमः।<br>किं मया च कृतं देव यन्मां प्रियमनुत्तमम्॥ ४१<br><br>भाषसे पुरुषश्रेष्ठ किमर्थं ब्रूहि तत्त्वतः। | आप भगवान् हैं और आपको यहाँ कमलके विषयमें व्याकुलता क्यों हो रही है? हे देव! मैंने कौन-सा श्रेष्ठ कार्य किया है, जो आप मुझसे प्रेमपूर्वक बोल रहे हैं? हे पुरुषश्रेष्ठ! इसका कारण मुझे यथार्थ रूपसे बताइये॥ ४१ १/२॥ |
| एवं ब्रुवाणं देवेशं लोकयात्रानुगं ततः॥ ४२ | लोकयात्राका अनुवर्तन करनेवाले तथा कमलकी आभाके समान नेत्रवाले देवेश्वर विष्णुके इस प्रकार बोलनेपर वेदनिधि प्रभु ब्रह्माने उनसे कहा॥ ४२ १/२॥ |
| प्रत्युवाचाम्बुजाभाक्षं ब्रह्मा वेदनिधिः प्रभुः।<br>योऽसौ तवोदरं पूर्वं प्रविष्टोऽहं त्वदिच्छया॥ ४३<br><br>यथा ममोदरे लोकाः सर्वे दृष्टास्त्वया प्रभो।<br>तथैव दृष्टाः कात्स्न्येन मया लोकास्तवोदरे॥ ४४ | यह मैं आपकी ही इच्छासे पूर्वकालमें आपके उदरमें प्रविष्ट हुआ था। हे प्रभो! जिस प्रकार प्रथम मेरे उदरमें प्रवेश करके आपने सभी लोकोंको देखा था, उसी प्रकार मैंने भी आपके उदरमें उन सम्पूर्ण लोकोंका दर्शन किया है॥ ४३-४४॥ |
| ९० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततो वर्षसहस्रात्तु उपावृत्तस्य मेऽनघ।<br>त्वया मत्सरभावेन मां वशीकर्तुमिच्छता॥ ४५<br><br>आशु द्वाराणि सर्वाणि पिहितानि समन्ततः। | हे अनघ! वहाँ मैं हजार वर्षोंतक चक्कर लगाता रहा। इसके बाद ईर्ष्याभावसे युक्त होकर आपने मुझे वशमें करनेकी इच्छासे चारों ओरसे सभी इन्द्रियद्वार शीघ्रतापूर्वक बन्द कर लिये॥ ४५ १/२ ॥ |
| ततो मया महाभाग सञ्चिन्त्य स्वेन तेजसा॥ ४६<br><br>लब्धो नाभिप्रदेशेन पद्मसूत्राद्विनिर्गमः।<br>मा भूत्ते मनसोऽल्पोऽपि व्याघातोऽयं कथञ्चन॥ ४७ | तदनन्तर हे महाभाग! मैं अपने तेजके प्रभावसे विवेकपूर्वक अतिसूक्ष्मरूप धारणकर आपके नाभि-स्थलसे कमलनालके सहारे बाहर निकल आया। इसके लिये आपके मनमें थोड़ा भी विषाद नहीं होना चाहिये॥ ४६-४७॥ |
| इत्येषानुगतिर्विष्णो कार्याणामौपसर्पिणी।<br>यन्मयानन्तरं कार्यं ब्रूहि किं करवाण्यहम्॥ ४८ | हे विष्णो! जो यह मेरा बाहर निकलना हुआ है, वह किसी विशेष कार्यके लिये है। अब आप मुझे यह बताइये कि मैं क्या करूँ?॥ ४८॥ |
| ततः परममेयात्मा हिरण्यकशिपो रिपुः।<br>अनवद्यां प्रियामिष्टां शिवां वाणीं पितामहात्॥ ४९<br><br>श्रुत्वा विगतमात्सर्य वाक्यमस्मै ददौ हरिः।<br>न ह्येवमीदृशं कार्यं मयाध्यक्षवसितं तव॥ ५० | तदनन्तर पितामह ब्रह्माकी प्रिय, मधुर, पवित्र तथा कल्याणमयी वाणी सुनकर हिरण्यकशिपुके शत्रु अप्रमेयात्मा भगवान् विष्णुने ईर्ष्यारहित होकर उनसे यह वचन कहा कि आपके नाभिकमलोद्भावरूप इस कार्यके लिये मैंने कोई प्रयास नहीं किया है॥ ४९-५०॥ |
| त्वां बोधयितुकामेन क्रीडापूर्वं यदृच्छया।<br>आशु द्वाराणि सर्वाणि घटितानि मयात्मनः॥ ५१<br><br>न तेऽन्यथावगन्तव्यं मान्यः पूज्यश्च मे भवान्।<br>सर्वं मर्षय कल्याण यन्मयापकृतं तव॥ ५२ | आपको बोध करानेकी इच्छासे मैंने तो क्रीड़ापूर्वक दैवयोगसे यों ही अपने सभी दरवाजे शीघ्र बन्द कर लिये थे। इसे आप कुछ भी अन्यथा न समझें। हे कल्याणकारक! आप मेरे मान्य तथा पूज्य हैं, अतएव मैंने आपका जो भी अपकार किया है, वह सब आप क्षमा करें॥ ५१-५२॥ |
| अस्मान् मयोह्यमानस्त्वं पद्मादवतर प्रभो।<br>नाहं भवन्तं शक्नोमि सोढुं तेजोमयं गुरुम्॥ ५३ | हे प्रभो! मेरे द्वारा वहन किये जाते हुए आप अब कमलसे उतर आइये; क्योंकि आपके अत्यन्त गुरुतर तथा तेजसम्पन्न होनेके कारण मैं आपका भार सहन करनेमें समर्थ नहीं हूँ॥ ५३॥ |
| स होवाच वरं ब्रूहि पद्मादवतर प्रभो।<br>पुत्रो भव ममारिघ्न मुदं प्राप्स्यसि शोभनाम्॥ ५४ | तब ब्रह्माने कहा कि आप मुझसे वरदान माँगिये। इसपर विष्णु कहने लगे—हे प्रभो! आप कमलसे नीचे उतर आइये और यही वर दीजिये कि आप मेरे पुत्र बनेंगे। हे शत्रुदलन! इससे आपको भी अपार हर्ष प्राप्त होगा॥ ५४॥ |
| सद्भाववचनं ब्रूहि पद्मादवतर प्रभो।<br>स त्वं च नो महायोगी त्वमीड्यः प्रणवात्मकः॥ ५५<br><br>अद्यप्रभृति सर्वेशः श्वेतोष्णीषविभूषितः।<br>पद्मयोनिरिति ह्येवं ख्यातो नाम्ना भविष्यसि॥ ५६ | हे प्रभो! आप सद्भावनापूर्ण वचन बोलिये और कमलसे नीचे उतर आइये। आप महायोगी तथा प्रणवरूप हैं। आप हमारे पूज्य हैं। आजसे आप सबके |
अध्याय २० ] शेषशय्यापर आसीन भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव ९१
| पुत्रो मे त्वं भव ब्रह्मन् सप्तलोकाधिपः प्रभो।<br>ततः स भगवान् देवो वरं दत्त्वा किरीटिने॥ ५७<br><br>एवं भवतु चेत्युक्त्वा प्रीतात्मा गतमत्सरः।<br>प्रत्यासन्नमथायान्तं बालार्कभं महाननम्॥ ५८ | स्वामी हैं तथा श्वेत पगड़ीसे सदा शोभायमान रहेंगे और इस प्रकार 'पद्मयोनि' नामसे लोकमें प्रसिद्ध होंगे। हे ब्रह्मन्! हे प्रभो! आप मेरे पुत्र तथा सात लोकोंके स्वामी हों॥ ५५-५६ १/२॥<br><br>तत्पश्चात् किरीटधारी विष्णुसे 'ऐसा ही होगा' कहकर अर्थात् वर देकर ब्रह्माजी प्रसन्नतायुक्त तथा द्वेषरहित हो गये। इसके बाद पितामहने उदीयमान सूर्यकी आभाके समान विशाल मुखवाले तथा अत्यन्त अद्भुत रूपवाले शिवको अति समीप आते हुए देखकर भगवान् विष्णुसे कहा—॥ ५७-५८ १/२॥ | | भवमत्यद्भुतं दृष्ट्वा नारायणमथाब्रवीत्।<br>अप्रमेयो महावक्त्रो दंष्ट्री ध्वस्तशिरोरुहः॥ ५९<br><br>दशबाहुस्त्रिशूलाङ्को नयनैर्विश्वतः स्थितः।<br>लोकप्रभुः स्वयं साक्षाद्विकृतो मुञ्जमेखली॥ ६०<br><br>मेढ्रेणोर्ध्वेेन महता नर्दमानोऽतिभैरवम्।<br>कः खल्वेष पुमान् विष्णो तेजोरशिर्महाद्युतिः॥ ६१ | हे विष्णो! अप्रमेय, विशाल वक्त्रसम्पन्न, वाराहके समान दाढ़ोंवाला, फैले हुए केशोंवाला, दश भुजाओंवाला, त्रिशूलधारी, नेत्रोंसे हर जगह स्थित अर्थात् सर्वदर्शी, मुंजकी मेखला धारण किये, विकृत रूपवाला, उन्नत तथा विशाल मेढ्रवाला, अत्यन्त भयंकर ध्वनि करता हुआ साक्षात् लोक-प्रभुतुल्य, महान् कान्तिसम्पन्न तथा तेजपुंज-सा यह कौन प्राणी सभी दिशाओं तथा आकाशको व्याप्त करके इधर ही चला आ रहा है?॥ ५९—६१ १/२॥ | | व्याप्य सर्वा दिशो द्यां च इत एवाभिवर्तते।<br>तेनैवमुक्तो भगवान् विष्णुर्ब्रह्माणमब्रवीत्॥ ६२<br><br>पद्भ्यां तलनिपातेन यस्य विक्रमतोऽर्णवे।<br>वेगेन महताकाशोऽप्युत्थिताश्च जलाशयाः॥ ६३<br><br>स्थूलाद्भिर्विश्वतोऽत्यर्थं सिच्यसे पद्मसम्भव।<br>घ्राणजेन च वातेन कम्प्यमानं त्वया सह॥ ६४<br><br>दोधूयते महापद्मं स्वच्छन्दं मम नाभिजम्।<br>समागतो भवानीशो ह्यनादिश्चान्तकृत्प्रभुः॥ ६५<br><br>भवानहं च स्तोत्रेण उपतिष्ठाव गोध्वजम्।<br>ततः क्रुद्धोऽम्बुजाभाक्षं ब्रह्मा प्रोवाच केशवम्॥ ६६ | ब्रह्माके इस प्रकार कहनेपर भगवान् विष्णुने उनसे कहा—इस सागरमें चलनेके कारण जिनके दोनों पैरोंके आघातसे आकाशमें महान् वेगसे जलाशय उठ रहे हैं, सभी ओर उठी हुई विशाल जल-बूँदोंसे आप सिक्त हो चुके हैं, जिनकी नासिकासे निकली वायुसे आपके साथ कम्पायमान यह महापद्म—जो मेरी नाभिसे उत्पन्न है, स्वच्छन्दतापूर्वक दोलायमान हो रहा है, वे ही आदि-अन्तरहित पार्वतीनाथ प्रभु शिव आ रहे हैं। अब हम दोनों मिलकर स्तोत्रके द्वारा इन वृषध्वज महादेवकी प्रार्थना करें॥ ६२—६५ १/२॥ | | भवान् नूनमात्मानं वेत्ति लोकप्रभुं विभुम्।<br>ब्रह्माणं लोककर्तारं मां न वेत्सि सनातनम्॥ ६७<br><br>को ह्यसौ शङ्करो नाम आवयोर्व्यतिरिच्यते।<br>तस्य तत्क्रोधजं वाक्यं श्रुत्वा हरिरभाषत॥ ६८ | तत्पश्चात् कमलकी आभाके समान नेत्रोंवाले भगवान् विष्णुसे ब्रह्माजीने कुपित होकर कहा कि लोकोंके स्वामी तथा सर्वव्यापी स्वयं अपनेको एवं जगत्के कर्ता मुझ सनातन ब्रह्माको आप नहीं जानते। हम दोनोंसे बढ़कर यह शंकर नामवाला कौन है?॥ ६६-६७ १/२॥ | | मा मैवं वद कल्याण परिवादं महात्मनः।<br>महायोगेन्धनो धर्मो दुराधर्षो वरप्रदः॥ ६९ | उन ब्रह्माका वह क्रोधयुक्त वचन सुनकर भगवान् विष्णु बोले—हे कल्याणकारक! महात्मा शिवके लिये |
| ९२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हेतुरस्याथ जगतः पुराणपुरुषोऽव्ययः।<br>बीजी खल्वेष बीजानां ज्योतिरेकः प्रकाशते॥ ७० | ऐसा निन्दित वचन मत बोलिये। ये महादेव साक्षात् धर्मस्वरूप हैं, अत्यन्त प्रचण्ड हैं, महायोग प्रदीप्त करनेवाले तथा वर प्रदान करनेवाले हैं॥ ६८-६९॥<br>ये शिव ही इस जगत्के कारण हैं। ये प्राचीन पुरुष हैं, समस्त बीजों अर्थात् कारणोंके मूल बीज अर्थात् परम कारण हैं, निर्विकार हैं एवं एकमात्र ज्योतिके रूपमें जगत्को प्रकाशित कर रहे हैं। जिस प्रकार बच्चे खिलौनोंसे खेलते हैं, उसी प्रकार ये महादेव स्वयं जगत्के साथ खेलते रहते हैं अर्थात् नानाविध लीलाएँ रचते रहते हैं॥ ७० १/२॥ |
| बालक्रीडनकैर्देवः क्रीडते शङ्करः स्वयम्।<br>प्रधानमव्ययो योनिरव्यक्तं प्रकृतिस्तमः॥ ७१<br><br>मम चैतानि नामानि नित्यं प्रसवधर्मिणः।<br>यः कः स इति दुःखार्तैर्दृश्यते यतिभिः शिवः॥ ७२ | प्रधान, अव्यय, योनि, अव्यक्त, प्रकृति, तम, नित्य आदि ये नाम मुझ प्रसवधर्मीके हैं और जिनके विषयमें आपने पूछा है कि ये कौन हैं, वे शिव जन्म-मरण आदि दुःखोंका भलीभाँति अनुभव करके वैराग्यको प्राप्त यतियोंद्वारा दृष्टिगत किये जाते हैं। ये शिव बीजवान् हैं, आप (ब्रह्मा) बीज हैं तथा सनातनरूप मैं (विष्णु) योनि हूँ॥ ७१-७२ १/२॥ |
| एष बीजी भवान् बीजमहं योनिः सनातनः।<br>स एवमुक्तो विश्वात्मा ब्रह्मा विष्णुमपृच्छत॥ ७३<br><br>भवान् योनिरहं बीजं कथं बीजी महेश्वरः।<br>एतन्मे सूक्ष्ममव्यक्तं संशयं छेत्तुमर्हसि॥ ७४ | विष्णुके इस प्रकार कहनेपर विश्वात्मा ब्रह्माने उनसे पूछा—आप योनि, मैं बीज तथा महेश्वर शिव बीजी (बीजवान्) किस प्रकार हैं? आप मेरे इस सूक्ष्म तथा अव्यक्त संदेहका निवारण करनेकी कृपा करें॥ ७३-७४॥ |
| ज्ञात्वा च विविधोत्पत्तिं ब्रह्मणो लोकतन्त्रिणः।<br>इमं परमसादृश्यं प्रश्नमभ्यवदद्धरिः॥ ७५<br><br>अस्मान्महत्तरं भूतं गुह्यमन्यन्न विद्यते।<br>महतः परमं धाम शिवमध्यात्मिनां पदम्॥ ७६ | अनेक प्रकारसे लोकतन्त्री ब्रह्माकी उत्पत्ति जानकर भगवान् विष्णुने उनके इस परम निगूढ़ प्रश्नका उत्तर दिया। इन महादेवसे बढ़कर अन्य कोई भी गूढ़ तत्त्व नहीं है। महत्तत्त्वका सर्वोत्कृष्ट स्थान अध्यात्मज्ञानियोंका कल्याणमय पद है॥ ७५-७६॥ |
| द्विविधं चैवमात्मानं प्रविभज्य व्यवस्थितः।<br>निष्कलस्तत्र योऽव्यक्तः सकलश्च महेश्वरः॥ ७७ | उन्होंने अपनेको सगुण तथा निर्गुण—इन दो रूपोंमें विभाजित किया। उनमें जो निर्गुण हैं, वे अव्यक्तरूपमें तथा जो सगुण हैं, वे महेश्वररूपमें प्रतिष्ठित हैं॥ ७७॥ |
| यस्य मायाविधिज्ञस्य अगम्यगहनस्य च।<br>पुरा लिङ्गोद्भवं बीजं प्रथमं त्वादिसर्गिकम्॥ ७८<br><br>मम योनौ समायुक्तं तद् बीजं कालपर्ययात्।<br>हिरण्मयमकूपारे योन्यामण्डमजायत॥ ७९ | प्राचीनकालमें सृष्टिके आदिमें मायाकी विधिको भी जाननेवाले, अगम्य तथा दुर्बोध उन्हीं महादेवके लिङ्गसे प्रादुर्भूत बीज सर्वप्रथम मेरी योनिमें गिरा। पुनः कालान्तरमें उस सागररूप योनिमें वह बीज स्वर्णके |
अध्याय २०] शेषशय्यापर आसीन भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव ९३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शतानि दशवर्षाणामण्डमप्सु प्रतिष्ठितम् ।<br>अन्ते वर्षसहस्रस्य वायुना तद् द्विधा कृतम् ॥ ८०<br><br>कपालमेकं द्यौर्जज्ञे कपालमपरं क्षितिः ।<br>उल्बं तस्य महोत्सेधो योऽसौ कनकपर्वतः ॥ ८१ | अण्डमें परिवर्तित हो गया ॥ ७८-७९ ॥<br>एक हजार वर्षांतक वह अण्ड जलमें ही स्थित रहा; इस अवधिके अन्तमें वायुके द्वारा यह दो भागोंमें विभक्त हो गया। एक खण्डसे आकाश तथा दूसरे खण्डसे पृथ्वीका प्रादुर्भाव हुआ। यह अति उन्नत जो स्वर्णपर्वत मेरु है, वह उस अण्डके गर्भावरणसे निर्मित हुआ ॥ ८०-८१ ॥ |
| ततश्च प्रतिसन्ध्यात्मा देवदेवो वरः प्रभुः।<br>हिरण्यगर्भो भगवांस्त्वभिजज्ञे चतुर्मुखः ॥ ८२ | तत्पश्चात् प्रतिसन्ध्यात्मा देवाधिदेव हिरण्यगर्भ चतुर्मुख महाप्रभु भगवान् ब्रह्मा आविर्भूत हुए ॥ ८२ ॥ |
| आतारार्केन्दु नक्षत्रं शून्यं लोकमवेक्ष्य च।<br>कोऽहमित्यपि च ध्याते कुमारास्तेऽभवंस्तदा ॥ ८३<br><br>प्रियदर्शनास्तु यतयो यतीनां पूर्वजास्तव ।<br>भूयो वर्षसहस्रान्ते तत एवात्मजास्तव ॥ ८४<br><br>भुवनानलसङ्काशाः पद्मपत्रायतेक्षणाः ।<br>श्रीमान् सनत्कुमारश्च ऋभुश्चैवोर्ध्वरेतसौ ॥ ८५<br><br>सनकः सनातनश्चैव तथैव च सनन्दनः ।<br>उत्पन्नाः समकालं ते बुद्ध्यातीन्द्रियदर्शनाः ॥ ८६<br><br>उत्पन्नाः प्रतिभात्मानो जगतां स्थितिहेतवः ।<br>नारप्स्यन्ते च कर्माणि तापत्रयविवर्जिताः ॥ ८७ | तारा, सूर्य, चन्द्र तथा नक्षत्रपर्यन्त समस्त लोकोंको शून्य देखकर 'मैं कौन हूँ'—ऐसा आपके विचार करनेपर पुनः एक हजार वर्षके अनन्तर यतियोंके पूर्वज, यलशील, प्रिय दर्शनवाले, समस्त भुवनोंको अपने तेजसे व्याप्त करनेवाले, कमलपत्रके समान विशाल नेत्रोंवाले श्रीमान् सनत्कुमार, ऋभु, सनक, सनातन तथा सनन्दन नामक वे कुमार आपके पुत्ररूपमें आविर्भूत हुए, जिनमें सनत्कुमार तथा ऋभु ऊर्ध्वरेता थे। बुद्धि तथा इन्द्रियोंसे अगोचर, विशिष्ट ज्ञानसम्पन्न, जगत्की स्थितिके कारणरूप तथा तीन प्रकारके तापोंसे रहित वे कुमार एक साथ उत्पन्न हुए थे, जिनकी कर्ममार्गमें प्रवृत्ति नहीं थी ॥ ८३—८७ ॥ |
| अल्पसौख्यं बहुक्लेशं जराशोकसमन्वितम्।<br>जीवनं मरणं चैव सम्भवश्च पुनः पुनः ॥ ८८<br><br>अल्पभूतं सुखं स्वर्गे दुःखानि नरके तथा।<br>विदित्वा चागमं सर्वमवश्यं भवितव्यताम् ॥ ८९<br><br>ऋभुं सनत्कुमारं च दृष्ट्वा तव वशे स्थितौ ।<br>त्रयस्तु त्रीन् गुणान् हित्वा चात्मजाः सनकादयः ॥ ९०<br><br>वैवर्तेन तु ज्ञानेन प्रवृत्तास्ते महौजसः ।<br>ततस्तेषु प्रवृत्तेषु सनकादिषु वै त्रिषु ॥ ९१ | जीवनमें सुख कम तथा दुःख अधिक है, जीवन जरा तथा शोकसे युक्त है, जीवनमें जन्म तथा मरण बार-बार होते रहते हैं, स्वर्गमें अत्यल्प सुख तथा नरकमें दुःख-ही-दुःख है और भावी अटल है—ये सब बातें अवश्यम्भावी हैं, ऐसा जानकर ऋभु तथा सनत्कुमारको आपके वशमें स्थित देखकर त्रिगुणातीत सनक-सनातन-सनन्दन—ये आपके तीनों महातेजस्वी पुत्र अध्यात्मसम्बन्धी ब्रह्मज्ञानकी ओर प्रवृत्त हो गये ॥ ८८—९० १/२ ॥ |
| भविष्यसि विमूढस्त्वं मायया शङ्करस्य तु ।<br>एवं कल्पे तु वै वृत्ते संज्ञा नश्यति तेऽनघ ॥ ९२ | तत्पश्चात् उन सनक आदि तीनों कुमारोंके ज्ञानमार्गमें प्रवृत्त हो जानेपर आप महादेवकी मायासे विमूढ़ (मोहित) हो गये। हे अनघ! इस प्रकार कल्पके प्रवृत्त होनेपर आपका ज्ञान नष्ट हो जाया करता है ॥ ९१-९२ ॥ |
| कल्पे शेषाणि भूतानि सूक्ष्माणि पार्थिवानि च।<br>सर्वेषां ह्यैश्वरी माया जागृतिः समुदाहृता ॥ ९३ | कल्पमें जो सूक्ष्म जीव तथा पार्थिव पदार्थ अवशिष्ट रह जाते हैं। उन सबको जाग्रत् करनेवाली |
२१- ब्रह्मा तथा विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति एवं उसका माहात्म्य
९४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| यथैष पर्वतो मेरुर्देवलोको ह्युदाहृतः।<br>तस्य चेदं हि माहात्म्यं विद्धि देववरस्य ह॥ ९४ | शक्ति ही ऐश्वरी माया कही गयी है॥ ९३॥<br>जिस प्रकार यह मेरुपर्वत देवलोकके रूपमें प्रसिद्ध है, उसी प्रकार उन देवश्रेष्ठ महादेवके इस माहात्म्यको भी प्रसिद्ध समझिये॥ ९४॥ |
|---|---|
| ज्ञात्वा चेश्वरसद्भावं ज्ञात्वा मामम्बुजेक्षणम्।<br>महादेवं महाभूतं भूतानां वरदं प्रभुम्॥ ९५<br><br>प्रणवेनाथ साम्ना तु नमस्कृत्य जगद्गुरुम्।<br>त्वां च मां चैव सङ्क्रुद्धो निःश्वासानिर्दहेदयम्॥ ९६ | परमेश्वर महादेवका सद्भाव जानकर तथा मुझ कमलनयनको जानकर प्रणवयुक्त साममन्त्रोंके द्वारा भूतोंके भी महाभूत वरदाता जगद्गुरु प्रभु महादेवको नमस्कार करके उठिये, अन्यथा ये क्रोधित होकर अपने निःश्वाससे मुझे तथा आपको दग्ध कर डालेंगे॥ ९५-९६॥ |
| एवं ज्ञात्वा महायोगमभ्युत्तिष्ठन्महाबलम्।<br>अहं त्वामग्रतः कृत्वा स्तोष्याम्यनलसप्रभम्॥ ९७ | इस प्रकार उनके महान् योग तथा अमित बलको जानकर आपको आगे करके अग्निसदृश प्रभाववाले महादेवके निकट खड़ा होकर मैं उनकी स्तुति करूँगा॥ ९७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ब्रह्मप्रबोधनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ब्रह्मप्रबोधन' नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २०॥
इक्कीसवाँ अध्याय
ब्रह्मा तथा विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति एवं उसका माहात्म्य
| सूत उवाच<br>ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा ततः स गरुडध्वजः।<br>अतीतैश्च भविष्यैश्च वर्तमानैस्तथैव च॥ १<br>नामभिश्छान्दसैश्चैव इदं स्तोत्रमुदीरयेत्। | सूतजी बोले—तदनन्तर ब्रह्माको आगे करके वे गरुड़ध्वज भगवान् विष्णु अतीत, भविष्य तथा वर्तमान कल्पोंसे सम्बन्धित महादेवजीके वेदप्रतिपादित नामोंसे इस स्तोत्रका वाचन करने लगे॥ १ १/२ ॥ |
|---|---|
| विष्णुरुवाच<br>नमस्तुभ्यं भगवते सुव्रतानन्ततेजसे॥ २<br>नमः क्षेत्राधिपतये बीजिने शूलिने नमः।<br>सुमेंद्रायार्च्यमेंद्राय दण्डिने रूक्षरेतसे॥ ३ | विष्णुजी बोले—हे सुव्रत! आप अनन्त तेजसम्पन्न भगवान्को नमस्कार है। क्षेत्राधिपति, बीजी तथा त्रिशूलधारीको नमस्कार है। सुमेंद्र (सुन्दर लिङ्गवाले), अर्च्यमेंद्र (पूजनीय लिङ्गवाले), दण्डी तथा रूक्षरेता (रूक्ष वीर्यवाले)-को नमस्कार है॥ २-३॥ |
| नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय पूर्वाय प्रथमाय च।<br>नमो मान्याय पूज्याय सद्योजाताय वै नमः॥ ४<br>गहराय घटेशाय व्योमचीराम्बराय च।<br>नमस्ते ह्यस्मदादीनां भूतानां प्रभवे नमः॥ ५ | ज्येष्ठको, श्रेष्ठको, पूर्वको तथा प्रथमको नमस्कार है। मान्यको, पूज्यको तथा सद्योजातको नमस्कार है। गहर (अगम्य)-को, घटेश (चेष्टमान जीवोंके स्वामी)-को तथा आकाश एवं वृक्षकी छालको अम्बर (वस्त्र)-के रूपमें धारण करनेवाले तथा हम-जैसे प्राणियोंकें स्वामीको नमस्कार है॥ ४-५॥ |
| वेदानां प्रभवे चैव स्मृतीनां प्रभवे नमः।<br>प्रभवे कर्मदानानां द्रव्याणां प्रभवे नमः॥ ६ | वेदोंके स्वामी तथा स्मृतियोंके स्वामीको नमस्कार है। कर्मों तथा दान आदिके स्वामी और द्रव्योंके |
अध्याय २१ ] ब्रह्मा तथा विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति एवं उसका माहात्म्य ९५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नमो योगस्य प्रभवे सांख्यस्य प्रभवे नमः।<br>नमो ध्रुवनिबद्धानामृषीणां प्रभवे नमः॥ ७ | स्वामीको नमस्कार है॥ ६॥<br>योगके प्रभुको नमस्कार है और सांख्यके प्रभुको नमस्कार है। ध्रुवसे सम्बन्धित ऋषियों अर्थात् सप्तर्षियोंके प्रभुको नमस्कार है॥ ७॥ |
| ऋक्षाणां प्रभवे तुभ्यं ग्रहाणां प्रभवे नमः।<br>वैद्युताशनिमेघानां गर्जितप्रभवे नमः॥ ८ | नक्षत्रोंके स्वामीको नमस्कार है, ग्रहोंके स्वामीको नमस्कार है, आपको नमस्कार है। विद्युताग्निसे युक्त मेघोंकी गर्जनाके स्वामीको नमस्कार है॥ ८॥ |
| महोदधीनां प्रभवे द्वीपानां प्रभवे नमः।<br>अद्रीणां प्रभवे चैव वर्षाणां प्रभवे नमः॥ ९<br><br>नमो नदीनां प्रभवे नदानां प्रभवे नमः।<br>महौषधीनां प्रभवे वृक्षाणां प्रभवे नमः॥ १० | महासागरोंके स्वामी तथा द्वीपोंके स्वामीको नमस्कार है। पर्वतों तथा भारत आदि नौ वर्षोंके स्वामीको नमस्कार है। नदियों तथा नदोंके स्वामीको नमस्कार है। महौषधियों तथा वृक्षोंके स्वामीको नमस्कार है॥ ९-१०॥ |
| धर्मवृक्षाय धर्माय स्थितीनां प्रभवे नमः।<br>प्रभवे च परार्धस्य परस्य प्रभवे नमः॥ ११ | अनेकविध धर्मोंके कारणरूप धर्मवृक्षको नमस्कार है, धर्मको नमस्कार है तथा स्थितियोंके स्वामीको नमस्कार है। परार्धके स्वामी तथा परके स्वामीको नमस्कार है॥ ११॥ |
| नमो रसानां प्रभवे रत्नानां प्रभवे नमः।<br>क्षणानां प्रभवे चैव लवानां प्रभवे नमः॥ १२<br><br>अहोरात्रार्धमासानां मासानां प्रभवे नमः।<br>ऋतूनां प्रभवे तुभ्यं संख्यायाः प्रभवे नमः॥ १३ | सभी रसोंके स्वामी तथा रत्नोंके स्वामीको नमस्कार है। क्षणोंके स्वामी तथा लवों (क्षणांश)-के स्वामीको नमस्कार है। दिन, रात, अर्धमास (पक्ष) तथा मासोंके स्वामीको नमस्कार है। ऋतुओंके स्वामी तथा संख्याओंके स्वामी आप शिवको नमस्कार है॥ १२-१३॥ |
| प्रभवे चापरार्धस्य परार्धप्रभवे नमः।<br>नमः पुराणप्रभवे सर्गाणां प्रभवे नमः॥ १४<br><br>मन्वन्तराणां प्रभवे योगस्य प्रभवे नमः।<br>चतुर्विधस्य सर्गस्य प्रभवेऽनन्तचक्षुषे॥ १५ | अपरार्ध तथा परार्धके स्वामीको नमस्कार है। पुराणोंके स्वामीको नमस्कार है। सर्गोंके स्वामीको नमस्कार है। मन्वन्तरोंके स्वामी तथा योगके स्वामीको नमस्कार है। (जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज्जरूप) चार प्रकारकी सृष्टिके स्वामीको नमस्कार है। अनन्त ज्योतिको नमस्कार है॥ १४-१५॥ |
| कल्पोदयनिबन्धनां वार्तानां प्रभवे नमः।<br>नमो विश्वस्य प्रभवे ब्रह्माधिपतये नमः॥ १६<br><br>विद्यानां प्रभवे चैव विद्याधिपतये नमः।<br>नमो व्रताधिपतये व्रतानां प्रभवे नमः॥ १७ | कल्पके उदयमें प्रणीत धर्मशास्त्रों तथा वार्ताओं (कृषि एवं वाणिज्यशास्त्रों)-के स्वामीको नमस्कार है। विश्वके स्वामीको नमस्कार है। ब्रह्माधिपतिको नमस्कार है। विद्याओंके स्वामी तथा विद्याधिपतिको नमस्कार है। व्रतोंके स्वामीको नमस्कार है। व्रताधिपतिको नमस्कार है॥ १६-१७॥ |
| मन्त्राणां प्रभवे तुभ्यं मन्त्राधिपतये नमः।<br>पितॄणां पतये चैव पशूनां पतये नमः॥ १८ | मन्त्रोंके स्वामी तथा मन्त्रोंके अधिपति आपको नमस्कार है। पितरोंके पति तथा पशुओंके पतिको |
| ९६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वाग्वृषाय नमस्तुभ्यं पुराणवृषभाय च।<br>नमः पशूनां पतये गोवृषेन्द्रध्वजाय च॥ १९ | नमस्कार है। श्रेष्ठ वाणीवाले तथा पुराणश्रेष्ठ आप शिवको नमस्कार है। पशुओंके पति तथा गोवृषेन्द्रध्वजको नमस्कार है॥ १८-१९॥ |
| प्रजापतीनां पतये सिद्धीनां पतये नमः।<br>दैत्यदानवसंङ्घानां रक्षांसां पतये नमः॥ २०<br><br>गन्धर्वाणां च पतये यक्षाणां पतये नमः।<br>गरुडोरगसर्पाणां पक्षिणां पतये नमः॥ २१ | प्रजाओंके पति तथा सिद्धियोंके पतिको नमस्कार है। दैत्य, दानव तथा राक्षससमूहोंके पतिको नमस्कार है। गन्धर्वों तथा यक्षोंके पतिको नमस्कार है। गरुड़, उरग, सर्प तथा पक्षियोंके पतिको नमस्कार है॥ २०-२१॥ |
| सर्वगुह्यपिशाचानां गुह्याधिपतये नमः।<br>गोकर्णाय च गोप्त्रे च शङ्कुकर्णाय वै नमः॥ २२<br><br>वराहायाप्रमेयाय ऋक्षाय विरजाय च।<br>नमो सुराणां पतये गणानां पतये नमः॥ २३ | सभी गुप्त पिशाचोंके गुह्याधिपतिको नमस्कार है। गोकर्ण, गोप्ता तथा शंकुकर्णको नमस्कार है। वाराहको, अप्रमेयको, ऋक्षको तथा विरजको नमस्कार है। देवताओंके पति तथा गणोंके पतिको नमस्कार है॥ २२-२३॥ |
| अम्भसां पतये चैव ओजसां पतये नमः।<br>नमोऽस्तु लक्ष्मीपतये श्रीपाय क्षितिपाय च॥ २४<br><br>बलाबलसमूह्याय अक्षोभ्यक्षोभणाय च।<br>दीप्तशृङ्गैकशृङ्गाय वृषभाय ककुद्मिने॥ २५ | जलोंके पति तथा ओजोंके पतिको नमस्कार है। लक्ष्मीपति, लक्ष्मीके रक्षक तथा पृथ्वीके पालन-कर्ताको नमस्कार है। शक्तिमान् तथा शक्तिहीन प्राणियोंके समुच्चयस्वरूप शिवको नमस्कार है। अक्षोभ्यक्षोभणको नमस्कार है। दीप्तशृंग, एकशृंग, वृषभ तथा ककुद्मीको नमस्कार है॥ २४-२५॥ |
| नमः स्थैर्याय वपुषे तेजसानुव्रताय च।<br>अतीताय भविष्याय वर्तमानाय वै नमः॥ २६<br><br>सुवर्चसे च वीर्याय शूराय ह्यजिताय च।<br>वरदाय वरेण्याय पुरुषाय महात्मने॥ २७ | स्थैर्य, तेजोमयवपु तथा अनुव्रतको नमस्कार है। अतीत, भविष्य तथा वर्तमानरूप शिवको नमस्कार है। सुवर्चा, वीर्य, शूर, अजित, वरद, वरेण्य, पुरुष तथा महात्माको नमस्कार है॥ २६-२७॥ |
| नमो भूताय भव्याय महते प्रभवाय च।<br>जनाय च नमस्तुभ्यं तपसे वरदाय च॥ २८<br><br>अणवे महते चैव नमः सर्वगताय च।<br>नमो बन्धाय मोक्षाय स्वर्गाय नरकाय च॥ २९ | भूत, भव्य, महत् तथा प्रभवको नमस्कार है। जन, तप तथा वरदको नमस्कार है; आपको नमस्कार है। अणु (परम सूक्ष्म), महत् (महा-आकारसम्पन्न) तथा सर्वगत (सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले)-को नमस्कार है। बन्ध (जन्म-मरण-बन्धन), मोक्ष, स्वर्ग तथा नरकरूपको नमस्कार है॥ २८-२९॥ |
| नमो भवाय देवाय इज्याय याजकाय च।<br>प्रत्युदीर्णाय दीप्ताय तत्त्वायातिगुणाय च॥ ३०<br><br>नमः पाशाय शस्त्राय नमस्त्वाभरणाय च।<br>हुताय उपहूताय प्रहुतप्राशिताय च॥ ३१ | भव, देव, इज्य (देवताओंके आचार्य) तथा याजक (यज्ञ करानेवाले)-को नमस्कार है। प्रत्युदीर्ण (महान्), दीप्त (आलोकयुक्त), तत्त्व तथा अतिगुण (गुणातीत)-को नमस्कार है। पाश, शस्त्र तथा आभरणको नमस्कार है। हुत (हविद्रव्यरूप), उपहूत (यज्ञ आदिमें आवाहन किये जानेवाले), प्रहुतप्राशित (भक्तिपूर्वक दी गयी आहुतिको भोज्यरूपमें ग्रहण करनेवाले) शिवको नमस्कार है॥ ३०-३१॥ |
अध्याय २१ ] ब्रह्मा तथा विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति एवं उसका माहात्म्य ९७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नमोऽस्त्विष्टाय पूर्ताय अग्निष्टोमद्विजाय च।<br>सदस्याय नमश्चैव दक्षिणावभृथाय च॥ ३२<br><br>अहिंसायाप्रलोभाय पशुमन्त्रौषधाय च।<br>नमः पुष्टिप्रदानाय सुशीलाय सुशीलिने॥ ३३ | इष्ट (यज्ञकर्म आदि), पूर्त (कूप-तड़ागादि-निर्माण), अग्निष्टोमद्विजरूप शिवको नमस्कार है। सदस्यरूप, दक्षिणारूप तथा अवभृथ (यज्ञकी समाप्तिके अनन्तर शुद्धिके लिये किये जानेवाले स्नान)-रूप शिवको नमस्कार है। अहिंसा-अप्रलोभ-पशुमन्त्रौषधरूप, पुष्टिप्रदायक, सुशील तथा सदाचारीको नमस्कार है॥ ३२-३३॥ |
| अतीताय भविष्याय वर्तमानाय ते नमः।<br>सुवर्चसे च वीर्याय शूराय ह्यजिताय च॥ ३४<br><br>वरदाय वरेण्याय पुरुषाय महात्मने।<br>नमो भूताय भव्याय महते चाभयाय च॥ ३५ | अतीत, भविष्य तथा वर्तमानकालरूप अर्थात् सर्वकालव्यापी शिवको नमस्कार है। सुवर्चा (महान् शक्तिमान्), वीर्य, शूर, अजित, वरद, वरेण्य, पुरुष, महात्मा, भूत, भव्य, महत् तथा अभयरूप शिवको नमस्कार है॥ ३४-३५॥ |
| जरासिद्ध नमस्तुभ्यमयसे वरदाय च।<br>अधरे महते चैव नमः सस्तुपताय च॥ ३६ | जरासिद्ध (नित्य तरुणरूप), सुवर्णरूप तथा वरदानी शिव आपको नमस्कार है। अधोरूप, महानीरूप तथा निद्रितोंके पतिको नमस्कार है॥ ३६॥ |
| नमश्चेन्द्रियपत्राणां लेलिहानाय स्रग्विणे।<br>विश्वाय विश्वरूपाय विश्वतः शिरसे नमः॥ ३७<br><br>सर्वतः पाणिपादाय रुद्रायप्रतिमाय च।<br>नमो हव्याय कव्याय हव्यवाहाय वै नमः॥ ३८ | इन्द्रियरूप वाहनवाले, आस्वादनरूप, हार धारण करनेवाले, विश्व, विश्वरूप तथा सभी ओरसे सिरवाले शिवको नमस्कार है। सभी दिशाओंमें हाथों तथा पैरोंवाले, अप्रतिम, हव्य, कव्य तथा हव्यवाहरूप रुद्रको नमस्कार है॥ ३७-३८॥ |
| नमः सिद्धाय मेध्याय इष्टायेज्ज्यापराय च।<br>सुवीराय सुघोराय अक्षोभ्यक्षोभणाय च॥ ३९<br><br>सुप्रजाय सुमेधाय दीप्ताय भास्कराय च।<br>नमो बुद्धाय शुद्धाय विस्तृताय मताय च॥ ४० | सिद्ध, पवित्रात्मा, यज्ञरूप, यज्ञपरायण, सुवीर, सुघोर, अक्षोभ्यका भी क्षोभण करनेवाले, सुन्दर प्रजाओंवाले, तीव्र मेधावाले, दीप्त, भास्कर, बुद्ध, शुद्ध, प्रतिष्ठित तथा विस्तृत शिवको नमस्कार है॥ ३९-४०॥ |
| नमः स्थूलाय सूक्ष्माय दृश्यादृश्याय सर्वशः।<br>वर्षते ज्वलते चैव वायवे शिशिराय च॥ ४१<br><br>नमस्ते वक्रकेशाय ऊरुवक्षःशिखाय च।<br>नमो नमः सुवर्णाय तपनीयनिभाय च॥ ४२ | स्थूल, सूक्ष्म, दृश्य, अदृश्य, वृष्टि, ताप, वायु तथा शिशिर (ठंड)-रूप शिवको नमस्कार है। वक्रकेश (टेढ़े बालोंवाले) तथा उन्नत ऊरुप्रदेश एवं वक्षःस्थलवाले शिवको नमस्कार है। सुन्दर वर्णवाले तथा तप्त स्वर्णके तुल्य आभावाले शिवको बार-बार नमस्कार है॥ ४१-४२॥ |
| विरूपाक्षाय लिङ्गाय पिङ्गलाय महौजसे।<br>वृष्टिघ्नाय नमश्चैव नमः सौम्येक्षणाय च॥ ४३ | विरूपाक्ष, लिङ्गरूप, पिंगल, महान् ओजसे सम्पन्न, वृष्टिका अवरोध करनेवाले तथा सौम्य दृष्टिवाले शिवको नमस्कार है, नमस्कार है॥ ४३॥ |
| नमो धूम्राय श्वेताय कृष्णाय लोहिताय च।<br>पिशिताय पिशाङ्गाय पीताय च निष्डिङ्गिणे॥ ४४ | धूम्र, श्वेत, कृष्ण, लोहित, पिशित, पिशंग तथा पीतरूप धनुर्धर शिवको नमस्कार है। विशेषतायुक्त तथा |
| ९८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नमस्ते सविशेषाय निर्विशेषाय वै नमः।<br>नम ईज्याय पूज्याय उपजीव्याय वै नमः॥ ४५ | विशेषतारहित शिवको नमस्कार है। ईज्य, पूज्य तथा उपजीव्यको नमस्कार है॥ ४४-४५॥ |
| नमः क्षेम्याय वृद्धाय वत्सलाय नमो नमः।<br>नमो भूताय सत्याय सत्यासत्याय वै नमः॥ ४६<br><br>नमो वै पद्मवर्णाय मृत्युघ्नाय च मृत्यवे।<br>नमो गौराय श्यामाय कद्रवे लोहिताय च॥ ४७ | क्षेम्य, वृद्ध, वत्सलको बार-बार नमस्कार है। भूत, सत्य तथा सत्य-असत्यरूप शिवको नमस्कार है। पद्मवर्ण, मृत्युके विनाशक तथा मृत्युरूप शिवको नमस्कार है। गौर, श्याम, कद्रू (भूरावर्ण) तथा लोहितवर्ण शिवको नमस्कार है॥ ४६-४७॥ |
| महासन्ध्याभ्रवर्णाय चारुदीप्ताय दीक्षिणे।<br>नमः कमलहस्ताय दिग्वासाय कपर्दिने॥ ४८<br><br>अप्रमाणाय सर्वाय अव्ययायामराय च।<br>नमो रूपाय गन्धाय शाश्वतायाक्षताय च॥ ४९ | महासन्ध्याकालीन बादलोंके समान वर्णवाले, सुन्दर दीप्तिवाले, दीक्षा प्रदान करनेवाले, हाथमें कमल धारण करनेवाले, दिग्वास (दिशाओंमें वास करनेवाले अथवा दिगम्बर) तथा जटाजूटधारी शिवको नमस्कार है। अप्रमाणरूप (इयत्तारहित), समग्ररूप, अव्यय, मरणरहित, रूप, गन्ध, नित्य तथा अविनाशी शिवको नमस्कार है॥ ४८-४९॥ |
| पुरस्ताद् बृंहते चैव विभ्रान्ताय कृताय च।<br>दुर्गमाय महेशाय क्रोधाय कपिलाय च॥ ५०<br><br>तर्क्यातर्क्यशरीराय बलिने रंहसाय च।<br>सिकत्याय प्रवाह्याय स्थिताय प्रसृताय च॥ ५१<br><br>सुमेधसे कुलालाय नमस्ते शशिखण्डिने।<br>चित्राय चित्रवेषाय चित्रवर्णाय मेधसे॥ ५२ | उपस्थित होकर पालन-पोषण करनेवाले, अस्थिर, कर्मरूप, दुर्गम, महेश, क्रोधरूप, कपिल, तर्क-अतर्कसे परे विग्रहवाले, बलवान्, वेगरूप, बालुकामोंमें विराजमान, प्रवाहरूप, स्थित, व्यापक, उत्तम मेधासम्पन्न, पृथिवीका लालन-पालन करनेवाले, चन्द्रकला धारण करनेवाले, चित्ररूप, विचित्र वेष धारण करनेवाले, विचित्र वर्णवाले तथा यज्ञरूप शिव आपको नमस्कार है॥ ५०-५२॥ |
| चेकितानाय तुष्टाय नमस्ते निहिताय च।<br>नमः क्षान्ताय दान्ताय वज्रसंहननाय च॥ ५३ | चेकितान (विशिष्ट ज्ञानवाले), संतोषरूप तथा निहित (अत्यन्त हितकारक) आपको नमस्कार है। क्षमाशील, इन्द्रियजित् तथा वज्रके समान आघात करनेवाले शिवको नमस्कार है॥ ५३॥ |
| रक्षोघ्नाय विषघ्नाय शितिकण्ठोर्ध्वमन्यवे।<br>लेलिहाय कृतान्ताय तिग्मायुधधराय च॥ ५४<br><br>प्रमोदाय सम्मोदाय यतिवेद्याय ते नमः।<br>अनामयाय सर्वाय महाकालाय वै नमः॥ ५५ | राक्षसोंका विनाश करनेवाले, विषका शमन करनेवाले, शुभ्र ग्रीवावाले, क्रुद्ध प्रतीत होते हुए भी सौम्य रूपवाले, सर्परूप, यमराजस्वरूप, तीक्ष्ण शस्त्र धारण करनेवाले, आनन्दस्वरूप, मोदसदृश, संन्यासियोंके द्वारा ज्ञेय आप शिवको नमस्कार है। रोगविकारसे रहित, सर्वरूप महाकालको नमस्कार है॥ ५४-५५॥ |
| प्रणवप्रणवेशाय भगनेत्रान्तकाय च।<br>मृगव्याधाय दक्षाय दक्षयज्ञान्तकाय च॥ ५६<br><br>सर्वभूतात्मभूताय सर्वेशातिशयाय च।<br>पुरघ्नाय सुशस्त्राय धन्विनेऽथ परश्वधे॥ ५७ | ओंकार, ओंकारेश्वर, भग नामक देवताके नेत्रका नाश करनेवाले, मृगव्याधरूप, दक्षरूप, दक्षप्रजापतिके यज्ञका विध्वंस करनेवाले, सभी प्राणियोंके आत्मस्वरूप, सर्वेश्वर, अतिशयरूप, त्रिपुरके संहर्ता, सुन्दर शस्त्र |
अध्याय २१ ] ब्रह्मा तथा विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति एवं उसका माहात्म्य ९९
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| पूषदन्तविनाशाय भग्ननेत्रान्तकाय च।<br>कामदाय वरिष्ठाय कामाङ्गदहनाय च॥ ५८<br><br>रङ्गे करालवक्त्राय नागेन्द्रवदनाय च।<br>दैत्यानामन्तकेशाय दैत्याक्रन्दकराय च॥ ५९<br><br>हिमघ्नाय च तीक्ष्णाय आर्द्रचर्मधराय च।<br>श्मशानरतिनित्याय नमोऽस्तूल्यूकधारिणे॥ ६० | धारण करनेवाले, धनुर्धर, कुठार धारण करनेवाले, दक्षके यज्ञमें पूषानामक देवताका दाँत तोड़नेवाले तथा भग नामक देवताको नेत्रविहीन करनेवाले, मनोरथ पूर्ण करनेवाले, वरिष्ठ, कामदेवका शरीर दग्ध करनेवाले, रणभूमिमें विकराल वक्त्रवाले, गजाननरूप, दैत्योंके संहारक हम ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओंके भी स्वामी, दैत्योंको क्रन्दित करनेवाले, शीतका निवारण करनेवाले, तीक्ष्ण रूपवाले, मृदुचर्म धारण करनेवाले, नित्य श्मशानसे अनुराग रखनेवाले तथा हाथमें प्रज्वलित काष्ठ धारण करनेवाले भगवान् शिवको नमस्कार है॥ ५६—६०॥ |
| नमस्ते प्राणपालाय मुण्डमालाधराय च।<br>प्रहीणशोकैर्विविधैर्भूतैः परिवृताय च॥ ६१<br><br>नरनारीशरीराय देव्याः प्रियकराय च।<br>जटिने मुण्डिने चैव व्यालयज्ञोपवीतिने॥ ६२<br><br>नमोऽस्तु नृत्यशीलाय उपनृत्यप्रियाय च।<br>मन्यवे गीतशीलाय मुनिभिर्गीयते नमः॥ ६३ | प्रिय भक्तोंका पालन करनेवाले, मुण्डकी माला धारण करनेवाले, शोकरहित, अनेकविध भूतोंसे घिरे रहनेवाले शिवको नमस्कार है। नर-नारीका विग्रह धारण करनेवाले (अर्धनारीश्वर), देवी पार्वतीका सदा प्रिय करनेवाले, जटाधारी, मुण्डी, सर्पोंका यज्ञोपवीत धारण करनेवाले, नृत्यमें अभिरुचि रखनेवाले, नृत्यशालाके प्रति प्रीति रखनेवाले, क्रोधरूप, गीतप्रिय तथा मुनियोंके द्वारा स्तुत्य शिवको नमस्कार है॥ ६१—६३॥ |
| कटङ्कटाय तिग्माय अप्रियाय प्रियाय च।<br>विभीषणाय भीष्माय भगप्रमथनाय च॥ ६४<br><br>सिद्धसङ्घानुगीताय महाभागाय वै नमः।<br>नमो मुक्ताट्टहासाय क्ष्वेडितास्फोटिताय च॥ ६५ | हाथीका मस्तक काटनेवाले अर्थात् सिंहरूप, तीक्ष्ण, अप्रिय, प्रिय, अति भयानक, प्रचण्ड, भगका प्रमथन करनेवाले, सिद्धसमुदायद्वारा नित्य अनुगीत महाभागको नमस्कार है। मुक्तरूपसे अट्टहास करनेवाले, क्रोधावस्थामें सिंहगर्जना करके प्रकम्पित शरीरवाले शिवको नमस्कार है॥ ६४-६५॥ |
| नर्दते कूर्दते चैव नमः प्रमुदितात्मने।<br>नमो मृडाय श्वसते धावतेऽधिष्ठिते नमः॥ ६६<br><br>ध्यायते जृम्भते चैव रुदते द्रवते नमः।<br>वल्गते क्रीडते चैव लम्बोदरशरीरिणे॥ ६७ | तीव्र नाद करनेवाले, कूदने-फाँदनेवाले तथा प्रमुदित आत्मावाले शिवको नमस्कार है। श्वास लेनेवाले, दौड़नेवाले, अधिष्ठाता तथा आनन्दरूप शिवको नमस्कार है। ध्यान करनेवाले, जम्भाई लेनेवाले, रुदन करनेवाले तथा द्रवित होनेवाले शिवको नमस्कार है। छलाँग लगानेवाले, क्रीड़ा करनेवाले तथा लम्बे उदरयुक्त शरीरवाले शिवको नमस्कार है॥ ६६-६७॥ |
| नमोऽकृत्याय कृत्याय मुण्डाय विकटाय च।<br>नम उन्मत्तदेहाय किङ्किणीकाय वै नमः॥ ६८<br><br>नमो विकृतवेषाय क्रूरायामर्शणाय च।<br>अप्रमेयाय गोप्त्रे च दीप्तायानिर्गुणाय च॥ ६९ | विधि-निषेधरूप (कृत्य-अकृत्य), मुण्ड, विकटरूप शिवको नमस्कार है। उन्मत्त देहवाले तथा किंकिणीसे शोभायमान शरीरवाले शिवको नमस्कार है। विकृत वेष धारण करनेवाले, क्रूर, कोपाविष्ट, अप्रमेय, |
| १०० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रक्षा करनेवाले, दीप्त तथा सगुणरूप शिवको नमस्कार है॥ ६८-६९ ॥ | |
| वामप्रियाय वामाय चूडामणिधराय च।<br>नमस्तोकाय तनवे गुणैरप्रमिताय च॥ ७० | वामभागमें अपनी प्रिया गौरीसे विभूषित, सुन्दर, चूड़ामणि धारण करनेवाले, बालरूप विग्रहवाले तथा अप्रमेय गुणोंसे सम्पन्न शिवको नमस्कार है॥ ७०॥ |
| नमो गुण्याय गुह्याय अगम्यगमनाय च।<br>लोकधात्री त्वियं भूमिः पादौ सज्जनसेवितौ॥ ७१<br><br>सर्वेषां सिद्धियोगानामधिष्ठानं तवोदरम्।<br>मध्येऽन्तरिक्षं विस्तीर्णं तारागणविभूषितम्॥ ७२<br><br>स्वातेः पथ इवाभाति श्रीमान् हारस्तवोरसि।<br>दिशो दशभुजास्तुभ्यं केयूराङ्गदभूषिताः॥ ७३ | सद्गुणोंसे युक्त, निगूढ़ तथा अगम्य गतिवाले शिवको नमस्कार है। सदाचारीजनोंद्वारा सेवित आपके दोनों चरण लोकधात्री इस पृथ्वीके तुल्य हैं। सभी सिद्धियों तथा योगोंका अधिष्ठानस्वरूप मध्यस्थित आपका उदर तारासमूहोंसे विभूषित विस्तृत अन्तरिक्षके समान है। आपके वक्षःस्थलपर शोभायमान श्रीयुक्त हार तारापुंजोंके मार्गकी भाँति प्रतीत होता है। केयूर तथा अंगदसे विभूषित आपके दस हाथ दसों दिशाओंके तुल्य हैं॥ ७१–७३॥ |
| विस्तीर्णपरिणाहश्च नीलाञ्जनचयोपमः।<br>कण्ठस्ते शोभते श्रीमान् हेमसूत्रविभूषितः॥ ७४<br><br>दंष्ट्रा करालं दुर्धर्षमनौपम्यं मुखं तथा।<br>पद्ममालाकृतोष्णीषं शिरो द्यौः शोभतेऽधिकम्॥ ७५ | नीले अंजनके समूहके तुल्य विस्तृत परिधिवाला आपका श्रीयुक्त कण्ठ स्वर्णसूत्रसे सुशोभित है। विकराल दाँतोंवाला आपका मुख अत्यन्त भयावह तथा अनुपमेय है। पद्ममाला तथा पगड़ीसे शोभायमान आपका सिर आकाशकी भाँति अत्यधिक शोभाको प्राप्त हो रहा है॥ ७४-७५॥ |
| दीप्तिः सूर्ये वपुश्चन्द्रे स्थैर्यं शैलेऽनिले बलम्।<br>औष्ण्यमग्नौ तथा शैत्यमप्सु शब्दोऽम्बरे तथा॥ ७६<br><br>अक्षरान्तरनिष्पन्दाद् गुणानेतान् विदुर्बुधाः।<br>जपो जप्यो महादेवो महायोगो महेश्वरः॥ ७७<br><br>पुरेशयो गुहावासी खेचरो रजनीचरः।<br>तपोनिधिर्गुहगुरुर्नन्दनो नन्दवर्धनः॥ ७८<br><br>हयशीर्षा पयोधाता विधाता भूतभावनः।<br>बोद्धव्यो बोधिता नेता दुर्धर्षो दुष्प्रकम्पनः॥ ७९<br><br>बृहद्रथो भीमकर्मा बृहत्कीर्तिर्धनञ्जयः।<br>घण्टाप्रियो ध्वजी छत्री पिनाकी ध्वजिनीपतिः॥ ८० | सूर्यमें प्रकाश, चन्द्रमामें कान्ति, पर्वतमें स्थिरता, वायुमें शक्ति, अग्निमें उष्णता, जलमें शीतलता तथा आकाशमें शब्दरूप विद्यमान—ये गुण अविनाशी शिवके निष्पन्द अर्थात् अल्पांशसे उत्पन्न हुए हैं—ऐसा मनीषी लोग मानते हैं। जप, जप्य, महादेव, महायोग, महेश्वर, पुरेशय, गुहावासी (गुफामें निवास करनेवाले), खेचर (आकाशमें विचरणशील), रजनीचर (रात्रिमें भ्रमण करनेवाले), तपोनिधि, कार्तिकेयके गुरु, आनन्दरूप, आनन्दकी वृद्धि करनेवाले, हयशीर्ष (घोड़ेके सिरवाले विष्णुरूप), पयोधाता (जल धारण करनेवाले इन्द्ररूप), विधाता (ब्रह्मारूप), भूतभावन, बोद्धव्य (बोध करनेयोग्य), बोधिता (बोध करानेवाले), नेता, दुर्धर्ष (अपराजेय), दुष्प्रकम्पन, बृहद्रथ (विशाल रथवाले), भीमकर्मा (भयंकर कर्मवाले), बृहत्कीर्ति (महान् यशवाले), धनंजय, घण्टाप्रिय, ध्वजी (ध्वज धारण |
अध्याय २१ ] ब्रह्मा तथा विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति एवं उसका माहात्म्य १०१
| कवची पट्टिशी खड्गी धनुर्हस्तः परश्वधी।<br>अघस्मरोऽनघः शूरो देवराजोऽरिमर्दनः ॥ ८१ | करनेवाले), छत्री (छत्र धारण करनेवाले), पिनाकी (धनुर्धर), ध्वजिनीपति (सेनापति), कवची (कवच धारण करनेवाले), पट्टिशी (एक प्रकारका तीक्ष्ण लौह-दण्डरूप शस्त्र धारण करनेवाले), खड्गी (तलवार धारण करनेवाले), धनुर्हस्त (हाथमें धनुष धारण करनेवाले), परश्वधी (परशु धारण करनेवाले), अघस्मर (सबके पापकर्मोंको स्मृतिमें रखनेवाले), निष्पाप, पराक्रमी, देवताओंके स्वामी तथा शत्रुओंका संहार करनेवाले सब कुछ आप ही हैं॥ ७६—८१॥ |
| त्वां प्रसाद्य पुरास्माभिर्द्विषन्तो निहता युधि।<br>अग्निः सदार्णवाम्भस्त्वं पिबन्नपि न तृप्यसे ॥ ८२ | पूर्वकालमें आपको प्रसन्न करके हम देवताओंने अपने शत्रुओंका युद्धमें संहार किया था। अग्निरूप आप सदा महासागरका जल पीते हुए भी कभी तृप्त नहीं होते हैं॥ ८२॥ |
| क्रोधाकारः प्रसन्नात्मा कामदः कामगः प्रियः।<br>ब्रह्मचारी चागाधश्च ब्रह्मण्यः शिष्टपूजितः॥ ८३<br><br>देवानामक़्षयः कोशस्त्वया यज्ञः प्रकल्पितः।<br>हव्यं तवेदं वहति वेदोक्तं हव्यवाहनः।<br>प्रीते त्वयि महादेव वयं प्रीता भवामहे॥ ८४ | आप क्रोधमय भावाकृतिवाले, प्रसन्न आत्मावाले, मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले, अपनी इच्छासे विचरण करनेवाले, प्रिय, ब्रह्मचारी, दुस्तर, ब्रह्मण्य, शिष्टजनोंद्वारा पूजित तथा देवताओंकी अक्षय निधि हैं। आपने ही यज्ञोंका विधान किया है। अग्निदेव आपके ही वेदोक्त हव्यका वहन करते हैं। हे महादेव! आपके प्रसन्न होनेपर हम देवतालोग प्रसन्न हो जाते हैं॥ ८३-८४॥ |
| भवानीशोऽनादिमांस्त्वं च सर्व-<br>लोकानां त्वं ब्रह्मकर्तादिसर्गः।<br>सांख्याः प्रकृतेः परं त्वां विदित्वा<br>क्षीणध्यानास्त्वाममृतं विशन्ति ॥ ८५ | आप भवानीके ईश हैं तथा आदिसे रहित हैं। सभी लोकोंके ब्रह्मरूप कर्ता आप ही हैं। आप ही आदि सृष्टि हैं। क्षीण ध्यानवाले सांख्यशास्त्री आपको प्रकृतिसे परे जानकर अमृतरूप आपको ही प्राप्त होते हैं॥ ८५॥ |
| योगाच्च त्वां ध्यायिनो नित्यसिद्धं<br>ज्ञात्वा योगान् सन्त्यजन्ते पुनस्तान्।<br>ये चाप्यन्ये त्वां प्रसन्ना विशुद्धाः<br>स्वकर्मभिस्ते दिव्यभोगा भवन्ति॥ ८६ | ध्यानपरायण योगी अपने योगबलसे नित्य-सिद्ध आपको जानकर पुनः उन योगोंका परित्याग कर देते हैं। और भी अन्य जो प्रसन्नचित्त तथा विशुद्ध मनवाले लोग हैं, वे अपने उत्तम कर्मोंके द्वारा आपको जानकर दिव्य भोगोंकी प्राप्ति करते हैं॥ ८६॥ |
| अप्रसङ्ख्येयतत्त्वस्य यथा विद्मः स्वशक्तितः।<br>कीर्तितं तव माहात्म्यमपारस्य महात्मनः॥ ८७<br><br>शिवो नो भव सर्वत्र योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते। | गणनातीत तत्त्वोंवाले तथा सीमारहित आप महात्माका जैसा माहात्म्य हम जानते हैं, वैसा अपनी सामर्थ्यके अनुसार हमने कह दिया। आप हमारे लिये सर्वत्र कल्याणकारी हों। आप जो कुछ भी हैं, आपको नमस्कार है॥ ८७ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>य इदं कीर्तयेद्भक्त्या ब्रह्मन्नारायणस्तवम्॥ ८८ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] जो प्राणी एकाग्र |
२२- महादेवजीद्वारा विष्णु और ब्रह्माको वरदान, सृष्टिके लिये ब्रह्माजीद्वारा तप करना तथा सर्पों एवं रुद्रोंकी सृष्टि
| [ पूर्वभाग | | :---: | :---: | | १०२ | श्रीलिङ्गमहापुराण |
| श्रावयेद्वा द्विजान् विद्वान् शृणुयाद्वा समाहितः।<br>अश्वमेधायुतं कृत्वा यत्फलं तदवाप्नुयात्॥ ८९ | होकर भक्तिपूर्वक ब्रह्मा तथा विष्णुके द्वारा की गयी इस शिवस्तुतिको कहता है, सुनता है अथवा द्विजों तथा विद्वानोंको सुनाता है; वह दस हजार अश्वमेध यज्ञ करके जो फल मिलता है, उस फलको प्राप्त कर लेता है॥ ८८-८९॥ |
| पापाचारोऽपि यो मर्त्यः शृणुयाच्छिवसन्निधौ।<br>जपेद्वापि विनिर्मुक्तो ब्रह्मलोकं स गच्छति॥ ९० | घोर पापकर्म करनेवाला जो कोई भी प्राणी शिवके समीप इस स्तुतिका पाठ करता है अथवा इसे सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकको जाता है॥ ९०॥ |
| श्राद्धे वा दैविके कार्ये यज्ञे वावभृथान्तिके।<br>कीर्तयेद्वा सतां मध्ये स याति ब्रह्मणोऽन्तिकम्॥ ९१ | जो सज्जनोंके बीचमें, श्राद्धकर्ममें, देवकर्ममें, यज्ञधर्मादि अनुष्ठानोंके बाद किये जानेवाले स्नानके अनन्तर इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है॥ ९१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ब्रह्मविष्णुस्तुतिर्नामैकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ब्रह्मविष्णुस्तुति' नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २१॥
बाईसवाँ अध्याय
महादेवजीद्वारा विष्णु और ब्रह्माको वरदान, सृष्टिके लिये ब्रह्माजीद्वारा तप करना तथा सर्पों एवं रुद्रोंकी सृष्टि
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| अत्यन्तावनतौ दृष्ट्वा मधुपिङ्गायतेक्षणः।<br>प्रहृष्टवदनोऽत्यर्थमभवत्सत्यकीर्तनात् ॥ १<br><br>उमापतिर्विरूपाक्षो दक्षयज्ञविनाशनः।<br>पिनाकी खण्डपरशुः सुप्रीतस्तु त्रिलोचनः॥ २ | [हे मुनियो!] उन ब्रह्मा तथा विष्णुको अत्यन्त विनीत भावसे सत्य स्तुति करते देखकर सुन्दर, लालिमायुक्त तथा विशाल नेत्रोंवाले उमापति, विरूपाक्ष, दक्षयज्ञके विध्वंसक, पिनाकी, खण्डपरशु धारण करनेवाले, त्रिनेत्र शिवजीका मुख प्रसन्नतासे प्रफुल्लित हो उठा और उनके मनमें उन दोनोंके प्रति अत्यधिक प्रीति उत्पन्न हुई॥ १-२॥ |
| ततः स भगवान् देवः श्रुत्वा वागमृतं तयोः।<br>जानन्नपि महादेवः क्रीडापूर्वमथाब्रवीत्॥ ३<br><br>कौ भवन्तौ महात्मानौ परस्परहितैषिणौ।<br>समेतावम्बुजाभाक्षावस्मिन् घोरे महापल्लवे॥ ४ | तत्पश्चात् उन दोनोंकी अमृतमयी वाणी सुनकर उन्हें जानते हुए भी भगवान् महादेवने क्रीड़ाके निमित्त उनसे पूछा—हे महात्माद्वय! एक-दूसरेका हित चाहनेवाले, कमलकी आभाके तुल्य नेत्रोंवाले आप दोनों लोग कौन हैं तथा इस घोर महासागरमें क्यों स्थित हैं?॥ ३-४॥ |
| तावूचतुर्महात्मानौ सन्निरीक्ष्य परस्परम्।<br>भगवन् किं तु यत्तेऽद्य न विज्ञातं त्वया विभो॥ ५<br><br>विभो रुद्र महामाय इच्छया वां कृतौ त्वया।<br>तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा अभिनन्द्याभिमान्य च॥ ६ | महादेवके ऐसा पूछनेपर एक-दूसरेकी ओर देखकर महात्मा ब्रह्मा तथा विष्णु बोले—हे भगवन्! हे विभो! हे रुद्र! हे महामाय! क्या आज आपको विदित नहीं है कि आपने ही अपनी इच्छासे हम दोनोंको उत्पन्न किया है?॥ ५ १/२॥ |
अध्याय २२ ] महादेवजीद्वारा विष्णु और ब्रह्माको वरदान···रुद्रोंकी सृष्टि [ १०३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| उवाच भगवान् देवो मधुरं श्लक्ष्णया गिरा।<br>भो भो हिरण्यगर्भ त्वां त्वां च कृष्ण ब्रवीम्यहम्॥ ७<br>प्रीतोऽहमनया भक्त्या शाश्वताक्षरयुक्तया।<br>भवन्तौ हृदयस्यास्य मम हृद्यतरावुभौ॥ ८ | उन दोनोंकी वह बात सुनकर भगवान् शंकर प्रसन्न होकर सम्मानपूर्वक कोमल वाणीमें धीरेसे बोले—हे हिरण्यगर्भ! हे कृष्ण! मैं आप दोनोंको बता रहा हूँ कि मैं आपकी इस शाश्वत तथा दृढ़ भक्तिसे प्रसन्न हूँ॥ ६-७ १/२॥<br><br>आप दोनों लोगोंके प्रति मेरे हृदयमें अपार प्रेम है। मैं आज आपलोगोंको श्रेष्ठ तथा मनोवांछित कौन-सा वर प्रदान करूँ?॥ ८ १/२॥ |
| युवाभ्यां किं ददाम्यद्य वराणां वरमीप्सितम्।<br>अथोवाच महाभागो विष्णुर्भवमिदं वचः॥ ९<br>सर्वं मम कृतं देव परितुष्टोऽसि मे यदि।<br>त्वयि मे सुप्रतिष्ठा तु भक्तिर्भवतु शङ्कर॥ १० | तदनन्तर महाभाग विष्णुने रुद्रसे यह वचन कहा—हे देव! मेरा यही सर्व अभीष्ट है कि यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, तो हे शंकर! मुझे अपने प्रति अचल भक्ति प्रदान कीजिये॥ ९-१०॥ |
| एवमुक्तस्तु विज्ञाय सम्भावयत केशवम्।<br>प्रददौ च महादेवो भक्तिं निजपदाम्बुजे॥ ११ | विष्णुके ऐसा कहनेपर महादेवने विष्णुभगवान्को स्नेहपूर्वक अपने चरणकमलोंमें स्थिर भक्ति प्रदान की॥ ११॥ |
| भवान् सर्वस्य लोकस्य कर्ता त्वमधिदैवतम्।<br>तदेवं स्वस्ति ते वत्स गमिष्याम्यम्बुजेक्षण॥ १२<br>एवमुक्त्वा तु भगवान् ब्रह्माणं चापि शङ्करः।<br>अनुगृह्यास्पृशद्देवो ब्रह्माणं परमेश्वरः॥ १३<br>कराभ्यां सुशुभाभ्यां च प्राह हृष्टतरः स्वयम्।<br>मत्समस्त्वं न सन्देहो वत्स भक्तश्च मे भवान्॥ १४<br>स्वस्त्यस्तु ते गमिष्यामि संज्ञा भवतु सुव्रत। | तत्पश्चात् भगवान् शंकरने ब्रह्माजीसे कहा—हे कमलनयन! आप समस्त लोकके कर्ता हैं तथा आप ही अधिष्ठातृ देवता हैं। अतः हे वत्स! आपका कल्याण हो। मैं तो अब प्रस्थान करूँगा। ब्रह्माजीसे इस प्रकार कहकर भगवान् शंकरने अपने दोनों पवित्र हाथोंसे अनुग्रहपूर्वक ब्रह्माजीका स्पर्श किया। पुनः उन परमेश्वर शंकरने प्रसन्न मनसे ब्रह्मासे स्वयं कहा—आप भी मेरे ही तुल्य हैं; इसमें सन्देह नहीं है। हे वत्स! आप मेरे भक्त हैं। आपका कल्याण हो और आपको यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति हो। हे सुव्रत! अब मैं प्रस्थान कर रहा हूँ॥ १२-१४ १/२॥ |
| एवमुक्त्वा तु भगवांस्ततोऽन्तर्धानमीश्वरः॥ १५ | इस प्रकार कहकर समस्त देवताओंके वन्दनीय, गणोंके रक्षक, परमेश्वर भगवान् महादेव अन्तर्धान हो गये॥ १५ १/२॥ |
| गतवान् गणपो देवः सर्वदेवनमस्कृतः।<br>अवाप्य संज्ञां गोविन्दात् पद्मयोनिः पितामहः॥ १६<br>प्रजाः स्रष्टुमनाश्चक्रे तप उग्रं पितामहः। | भगवान् गोविन्दसे ज्ञान प्राप्त करके पितामह ब्रह्माने प्रजाओंकी सृष्टिकी कामनासे भीषण तप करना आरम्भ कर दिया॥ १६ १/२॥ |
| तस्यैवं तप्यमानस्य न किञ्चित्समवर्तत॥ १७<br>ततो दीर्घेण कालेन दुःखात्क्रोधो ह्यजायत।<br>क्रोधाविष्टस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः॥ १८ | इस प्रकार दीर्घ कालतक तपस्या करते हुए उनका जब कुछ भी सिद्ध नहीं हुआ, तब उन्हें बहुत दुःख हुआ और उस दुःखसे वे बहुत क्रोधित हो उठे। कोपसे |
| १०४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततस्तेभ्योऽश्रुबिन्दुभ्यो वातपित्तकफात्मकाः।<br>महाभागा महासत्त्वाः स्वस्तिकैरप्यलङ्कृताः॥ १९ | युक्त उन ब्रह्माके दोनों नेत्रोंसे आँसुओंकी बूँदें गिरने लगीं॥ १७-१८॥<br><br>तत्पश्चात् उन अश्रुबिन्दुओंसे वात-पित्त-कफयुक्त, महान् सत्त्वसे सम्पन्न, महाभाग्यशाली तथा महाविषधर सर्प उत्पन्न हुए। वे स्वस्तिक चिह्नसे विभूषित थे तथा उनके केश फैले हुए थे॥ १९ १/२॥ |
| प्रकीर्णकेशाः सर्पास्ते प्रादुर्भूता महाविषाः।<br>सर्पांस्तानग्रजान् दृष्ट्वा ब्रह्मात्मानमनिन्दयत्॥ २० | उन सर्पोंको पहले उत्पन्न हुआ देखकर ब्रह्माजीको बड़ी आत्मग्लानि हुई। वे अपनी भर्त्सना करते हुए कहने लगे—'अहो, मुझे धिक्कार है। मेरी तपस्याका मुझे यही फल प्राप्त हुआ कि आरम्भमें ही मेरी लोकविनाशक सर्परूप प्रजा उत्पन्न हुई'॥ २०-२१॥ |
| अहो धिक् तपसो मह्यं फलमीदृशकं यदि।<br>लोकवैनाशिकी जज्ञे आदावेव प्रजा मम॥ २१ | |
| तस्य तीव्राभवन्मूर्च्छा क्रोधामर्षसमुद्भवा।<br>मूर्च्छाभिपरितापेन जहौ प्राणान् प्रजापतिः॥ २२ | अत्यधिक क्रोध तथा अधीरतासे युक्त होनेके कारण ब्रह्माजीको तीव्र मूर्च्छा उत्पन्न हुई और उस मूर्च्छासे आक्रान्त पितामहने अपने प्राण त्याग दिये॥ २२॥ |
| तस्याप्रतिमवीर्यस्य देहात्कारुण्यपूर्वकम्।<br>अथैकादश ते रुद्रा रुदन्तोऽभ्यक्रमंस्तथा॥ २३ | इसके पश्चात् अप्रतिम वीर्यवाले उन ब्रह्माके देहसे दीनभावसे कारुण्यपूर्वक ग्यारह रुद्र रोते हुए निकले। रुदन करनेके कारण ही उनका नाम रुद्र पड़ा॥ २३ १/२॥ |
| रोदनात्खलु रुद्रत्वं तेषु वै समजायत।<br>ये रुद्रास्ते खलु प्राणाः ये प्राणास्ते तदात्मकाः॥ २४ | जो रुद्र हैं, वे ही प्राणरूप हैं तथा जो प्राण हैं, वे उन्हीं रुद्रके आत्मारूप हैं। सभी प्राणियोंमें स्थित उन रुद्रोंको ही जीवोंके प्राणरूपमें जानना चाहिये॥ २४ १/२॥ |
| प्राणाः प्राणवतां ज्ञेयाः सर्वभूतेष्ववस्थिताः।<br>अत्युग्रस्य महत्त्वस्य साधुराचरितस्य च॥ २५ | नीललोहित त्रिशूलधारी शिवजीने अत्यन्त उग्र स्वभाववाले, महिमाशाली तथा उत्तम आचरणवाले उन ब्रह्माको पुनः उनके प्राण प्रदान कर दिये॥ २५ १/२॥ |
| प्राणांस्तस्य ददौ भूयस्त्रिशूली नीललोहितः।<br>लब्ध्वासून् भगवान् ब्रह्मा देवदेवमुमापतिम्॥ २६ | तत्पश्चात् प्राण प्राप्तकर भगवान् ब्रह्माने खड़े होकर देवाधिदेव उमापतिको प्रणामकर गायत्रीके ध्यानसे विश्वरूप परमात्मा शिवको वहाँ देखा॥ २६ १/२॥ |
| प्रणम्य संस्थितोऽपश्यद् गायत्र्या विश्वमीश्वरम्।<br>सर्वलोकमयं देवं दृष्ट्वा स्तुत्वा पितामहः॥ २७ | समस्त लोकोंमें व्याप्त रहनेवाले महादेवको देखकर ब्रह्माजीने उनकी स्तुति की। तत्पश्चात् उन्होंने आश्चर्यचकित होकर शिवजीको बार-बार प्रणामकर उनसे पूछा—हे विभो! 'सद्योजात' आदि रूपमें आपका प्रादुर्भाव क्यों हुआ?॥ २७-२८॥ |
| ततो विस्मयमापन्नः प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः।<br>उवाच वचनं शर्वं सद्यादित्वं कथं विभो॥ २८ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे रुद्रोत्पत्तिवर्णनं नाम द्वाविंशतितमोऽध्यायः ॥ २२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'रुद्रोत्पत्तिवर्णन' नामक बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २२ ॥
२३- विभिन्न कल्पोंमें होनेवाले सद्योजातादि शिवावतारोंका वर्णन, विभिन्न लोकोंकी स्थिति तथा महारुद्रका विश्वरूपत्व
अध्याय २३ ] विभिन्न कल्पोंमें होनेवाले सद्योजातादि शिवावतारोंका वर्णन १०५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
तेईसवाँ अध्याय
विभिन्न कल्पोंमें होनेवाले सद्योजातादि शिवावतारोंका वर्णन, विभिन्न लोकोंकी स्थिति तथा महारुद्रका विश्वरूपत्व
| सूत उवाच | सूतजी बोले—ब्रह्माजीका वह वचन सुनकर उनके प्रबोधनके लिये ब्रह्मरूप भगवान् शिवने मुसकराकर उनसे कहा— ॥ १ ॥ |
|---|---|
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणो भगवान् भवः।<br>ब्रह्मरूपी प्रबोधार्थं ब्रह्माणं प्राह सस्मितम्॥ १ | |
| श्वेतकल्पो यदा ह्यासीदहमेव तदाभवम्।<br>श्वेतोष्णीषः श्वेतमाल्यः श्वेताम्बरधरः सितः॥ २ | जब श्वेतकल्प था, उस समय मैं श्वेत वर्णका था। मेरी श्वेत पगड़ी, श्वेत माला, श्वेत वस्त्र, श्वेत अस्थि, श्वेत रोम, श्वेत त्वचा तथा श्वेत ही मेरा रुधिर था। इसी कारणसे वह कल्प 'श्वेतकल्प' नाम से विख्यात हुआ॥ २-३॥ |
| श्वेतास्थिः श्वेतरौमा च श्वेतासृक् श्वेतलोहितः।<br>तेन नाम्ना च विख्यातः श्वेतकल्पस्तदा ह्यसौ ॥ ३ | |
| मत्प्रसूता च देवेशी श्वेताङ्गा श्वेतलोहिता।<br>श्वेतवर्णा तदा ह्यासीद् गायत्री ब्रह्मसंज्ञिता॥ ४ | उस कल्पमें मुझसे उत्पन्न ब्रह्म नामसे जानी जानेवाली देवेश्वरी गायत्री भी श्वेत अंगोंवाली, श्वेत रक्तवाली तथा श्वेत वर्णवाली थीं॥ ४॥ |
| तस्मादहं च देवेश त्वया गुह्येन वै पुनः।<br>विज्ञातः स्वेन तपसा सद्योजातत्वमागतः॥ ५ | तदनन्तर हे देवेश! आपने अपने उग्र तपसे सद्योजातत्वको प्राप्त मुझ शिवको जाना॥ ५॥ |
| सद्योजातेति ब्रह्मैतद् गुह्यं चैतत्प्रकीर्तितम्।<br>तस्माद् गुह्यत्वमापन्नं ये वेत्स्यन्ति द्विजातयः॥ ६ | मेरा यह सद्योजातरूप गुह्य ब्रह्मके रूपमें जाना जाता है। अतएव गुह्यत्वको प्राप्त मुझ सद्योजात शिवको जो द्विजातिगण जानेंगे, वे मेरे सान्निध्यको प्राप्त होंगे, जहाँसे उनका पुनरागमन नहीं होता अर्थात् वे जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं॥ ६१/२॥ |
| मत्समीपं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।<br>यदा चैव पुनस्त्व्ाासील्लोहितो नाम नामतः॥ ७ | पुनः जब मेरा नाम लोहित था, तब मेरे द्वारा धारित लोहित वर्णके कारण वह कल्प लोहितकल्प नामसे कहा गया॥ ७१/२॥ |
| मत्कृतेन च वर्णेन कल्पो वै लोहितः स्मृतः।<br>तदा लोहितमांसास्थिलोहितक्षीरसम्भवा॥ ८ | उस कल्पमें रक्तवर्णके मांस तथा हड्डियोंवाली, रक्त-वर्णका दूध प्रदान करनेवाली, लाल आँखोंवाली तथा लाल स्तनवाली धेनुरूपमें गायत्री अधिष्ठित हुईं॥ ८१/२॥ |
| लोहिताक्षी स्तनवती गायत्री गौः प्रकीर्तिता।<br>ततोऽस्या लोहितत्वेन वर्णस्य च विपर्ययात्॥ ९ | तदनन्तर उस धेनुके लोहितत्व, उस कल्पमें वर्णके बदल जाने तथा योगकी वामताके कारण मैं वामदेवत्वको प्राप्त हुआ अर्थात् मेरा नाम वामदेव पड़ गया॥ ९१/२॥ |
| वामत्वाच्चैव देवस्य वामदेवत्वमागतः।<br>तत्रापि च महासत्त्व त्वयाहं नियतात्मना॥ १० | हे महासत्त्व ! उस कल्पमें भी नियत आत्मावाले आपने अपने योगबलसे लोहितवर्ण-स्थित मुझ परमेश्वरको जाना और तभीसे मैं पृथ्वीलोकमें वामदेव नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हो गया॥ १०-११॥ |
| विज्ञातः स्वेन योगेन तस्मिन् वर्णान्तरे स्थितः।<br>ततश्च वामदेवेति ख्यातिं यातोऽस्मि भूतले ॥ ११ |
| १०६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ये चापि वामदेवत्वं ज्ञास्यन्तीह द्विजातयः।<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ १२ | जो भी द्विजातिगण मेरे वामदेवस्वरूपको जानेंगे, वे जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्ति प्राप्त करानेवाले मेरे रुद्रलोकमें निवास करेंगे॥ १२॥ |
| यदाहं पुनरेवेह पीतवर्णो युगक्रमात्।<br>मत्कृतेन च नाम्ना वै पीतकल्पोऽभवत्तदा॥ १३ | जब मैं युगक्रमसे पीतवर्णवाला हुआ, तब मेरे वर्णनामपर उस कल्पका नाम पीतकल्प हुआ॥ १३॥ |
| मत्प्रसूता च देवेशी पीताङ्गी पीतलोहिता।<br>पीतवर्णा तदा ह्यासीद् गायत्री ब्रह्मसंज्ञिता॥ १४ | मेरे द्वारा उत्पन्न तथा ब्रह्म नामसे जानी जानेवाली देवेश्वरी गायत्रीका भी अंग पीला, रक्त पीला तथा वर्ण आदि सब पीला था॥ १४॥ |
| तत्रापि च महासत्त्व योगयुक्तेन चेतसा।<br>यस्मादहं तैर्विज्ञातो योगतत्परमानसैः॥ १५<br><br>तत्र तत्पुरुषत्वेन विज्ञातोऽहं त्वया पुनः।<br>तस्मात्तत्पुरुषत्वं वै ममैतत्कनकाण्डज॥ १६ | हे महासत्त्व! उस कल्पमें भी योगपरायण मनवाले उन द्विजातियोंने योगयुक्त चित्तसे मुझे जाना। हे कनकाण्डज! उस कल्पमें तुमने भी मुझे पुनः तत्पुरुषरूपमें जाना; उसी कारणसे मेरा यह तत्पुरुष नाम हुआ॥ १५-१६॥ |
| ये मां रुद्रं च रुद्राणीं गायत्रीं वेदमातरम्।<br>वेत्स्यन्ति तपसा युक्ता विमला ब्रह्मसङ्गताः॥ १७<br><br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्। | तपस्यासे युक्त, विशुद्ध मनवाले तथा ब्रह्मपरायण जो लोग मुझ रुद्र तथा वेदमाता रुद्राणी गायत्रीकी आराधना करेंगे, वे पुनर्जन्मसे मुक्ति दिलानेवाले रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ १७ १/२॥ |
| यदाहं पुनरेवासं कृष्णवर्णो भयानकः॥ १८ | पुनः जब मैंने भयानक कृष्णवर्ण धारण किया, तब मेरे वर्णके नामसे वह कल्प कृष्णकल्प कहा गया॥ १८ १/२॥ |
| मत्कृतेन च वर्णेन सङ्कल्पः कृष्ण उच्यते।<br>तत्राहं कालसङ्काशः कालो लोकप्रकालकः॥ १९ | हे ब्रह्मन्! उस कल्पमें भी तुमने कालसदृश, कालरूप, लोकोंके लिये महाकाल तथा घोर पराक्रमवाले मुझ घोरको जाना॥ १९ १/२॥ |
| विज्ञातोऽहं त्वया ब्रह्मन् घोरो घोरपराक्रमः।<br>मत्प्रसूता च गायत्री कृष्णाङ्गी कृष्णलोहिता॥ २० | हे देवेश! उस कल्पमें मुझसे उत्पन्न ब्रह्मसंज्ञावाली गायत्री भी कृष्ण अंगोंवाली, कृष्ण रक्तवाली तथा कृष्ण रूपवाली थीं॥ २० १/२॥ |
| कृष्णरूपा च देवेश तदासीद् ब्रह्मसंज्ञिता।<br>तस्माद् घोरत्वमापन्नं ये मां वेत्स्यन्ति भूतले॥ २१ | अतएव इस भूतलपर जो लोग घोरत्वको प्राप्त मुझ शिवको जान लेंगे, शाश्वत रूपवाला मैं उनके लिये सौम्य तथा शान्त हो जाऊँगा॥ २१ १/२॥ |
| तेषामघोरः शान्तश्च भविष्याम्यहमव्ययः।<br>पुनश्च विश्वरूपत्वं यदा ब्रह्मन् ममाभवत्॥ २२<br><br>तदाप्यहं त्वया ज्ञातः परमेण समाधिना।<br>विश्वरूपा च संवृत्ता गायत्री लोकधारिणी॥ २३ | हे ब्रह्मन्! पुनः जब मैं विश्वरूपत्वको प्राप्त हुआ, उस समय भी आपने परम समाधिसे मुझे जाना था। उस समय समस्त लोकोंको धारण करनेवाली गायत्री भी विश्वरूपा अर्थात् अनेक वर्णोंवाली थीं॥ २२-२३॥ |
| तस्मिन् विश्वत्वमापन्नं ये मां वेत्स्यन्ति भूतले।<br>तेषां शिवश्च सौम्यश्च भविष्यामि सदैव हि॥ २४ | इस भूतलपर जो लोग विश्वत्वको प्राप्त मुझ परमात्माको जान लेंगे, उनके प्रति मैं सदाके लिये सौम्य तथा शान्त हो जाऊँगा॥ २४॥ |
अध्याय २३ ] विभिन्न कल्पोंमें होनेवाले सद्योजातादि शिवावतारोंका वर्णन १०७
| यस्माच्च विश्वरूपो वै कल्पोऽयं समुदाहृतः।<br>विश्वरूपा तथा चेयं सावित्री समुदाहृता॥ २५<br><br>सर्वरूपा तथा चेमे संवृत्ता मम पुत्रकाः।<br>चत्वारस्ते मया ख्याताः पुत्रा वै लोकसम्मताः॥ २६ | इसी कारण यह कल्प विश्वरूपकल्प नामसे जाना गया और ये गायत्री विश्वरूपा नामसे कही गयीं। वे सर्वरूपा थीं और ये सद्योजात आदि चार कुमार मेरे पुत्ररूपमें प्रकट हुए, जिनकी लोकमें विशेष प्रसिद्धि हुई॥ २५-२६॥ |
| यस्माच्च सर्ववर्णत्वं प्रजानां च भविष्यति।<br>सर्वभक्षा च मेध्या च वर्णतश्च भविष्यति॥ २७ | ये गायत्री शब्द और अर्थरूपसे मेध्या अर्थात् यज्ञयोग्या होंगी, सर्वभक्षा अर्थात् पातकादिविनाशि़का होंगी। गायत्रीके [सावित्रीके] सर्ववर्णा (सर्वशब्दात्मिका) होनेसे ही चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था प्रजामें व्यवस्थित होगी॥ २७॥ |
| मोक्षो धर्मस्तथार्थश्च कामश्चेति चतुष्टयम्।<br>यस्माद्वेदाश्च वेदां च चतुर्था वै भविष्यति॥ २८<br><br>भूतग्रामाश्च चत्वार आश्रमाश्च तथैव च।<br>धर्मस्य पादाश्चत्वारश्चत्वारो मम पुत्रकाः॥ २९ | इसीलिये धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष—चार प्रकारके ये पुरुषार्थ हैं और वेद भी चार हैं। जीव-समुदायोंके भी जरायुज, अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज—ये चार प्रकारके रूप हैं तथा आश्रम भी चार हैं। दया, दान, तप, सत्य—ये धर्मके चार पाद हैं एवं मेरे पुत्र भी चार हैं॥ २८-२९॥ |
| तस्माच्चतुर्युगावस्थं जगद्वै सचराचरम्।<br>चतुर्धावस्थितश्चैव चतुष्पादो भविष्यति॥ ३० | इसीलिये यह चराचर जगत् युगरूप चार अवस्थाओंवाला है और यह चतुष्पादात्मक लोक भी भेदानुसार चार रूपोंमें अवस्थित है॥ ३०॥ |
| भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकश्च महस्तथा।<br>जनस्तपश्च सत्यं च विष्णुलोकस्ततः परम्॥ ३१ | भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपलोक तथा सत्यलोक—इन सबके परे विष्णुलोक स्थित है॥ ३१॥ |
| अष्टाक्षरस्थितो लोकः स्थाने स्थाने तदक्षरम्।<br>भूर्भुवः स्वर्महश्चैव पादाश्चत्वार एव च॥ ३२<br><br>भूर्लोकः प्रथमः पादो भुवर्लोकस्ततः परम्।<br>स्वर्लोको वै तृतीयश्च चतुर्थस्तु महस्तथा॥ ३३ | अष्टाक्षररूप लोक अपने-अपने स्थानपर अक्षरात्मकरूपमें विद्यमान हैं। भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक तथा महर्लोक ही चार पादके रूपमें अवस्थित हैं। इनमें भूर्लोक पहला पाद है, भुवर्लोक दूसरा पाद है, स्वर्लोक तीसरा तथा महर्लोक चौथा पाद है॥ ३२-३३॥ |
| पञ्चमस्तु जनस्तत्र षष्ठश्च तप उच्यते।<br>सत्यं तु सप्तमो लोको ह्यपुनर्भवगामिनाम्॥ ३४ | पाँचवाँ जनलोक, छठा तपलोक तथा पुनर्जन्मकी प्राप्ति न करनेवाले लोगोंका सत्यलोक सातवाँ लोक कहा गया है॥ ३४॥ |
| विष्णुलोकः स्मृतं स्थानं पुनरावृत्तिदुर्लभम्।<br>स्कान्दमोमं तथा स्थानं सर्वसिद्धिसमन्वितम्॥ ३५ | विष्णुलोक वह पद है, जहाँ पहुँचकर जीवका पुनः आगमन नहीं होता है। उससे भी आगे स्कन्दलोक तथा उससे भी परे पार्वतीलोक है, जो सर्वविध सिद्धियोंसे युक्त माना गया है॥ ३५॥ |
| रुद्रलोकः स्मृतस्तस्मात्पदं तद्योगिनां शुभम्।<br>निर्ममा निरहङ्काराः कामक्रोधविवर्जिताः॥ ३६ | रुद्रलोक उससे परे विद्यमान है। वह पद योगियोंके लिये अत्यन्त शुभकर कहा गया है। ममतारहित, अहंकार- |
| १०८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| द्रक्ष्यन्ति तद् द्विजा युक्ता ध्यानतत्परमानसाः।<br>यस्माच्चतुष्पदा ह्येषा त्वया दृष्टा सरस्वती ॥ ३७ | शून्य, काम-क्रोधसे विवर्जित तथा ध्यानपरायण चित्तवाले योगीजन ही उस लोकका दर्शन करेंगे॥ ३६ १/२॥<br><br>और जो आपने चार पादोंवाली इस गायत्री (सरस्वती)-को देखा है, उसीके चार चरणोंके रूपमें चरम पदवाला विष्णुलोक, शान्त तथा उत्तम स्कन्दलोक, पार्वतीलोक एवं रुद्रलोक अवस्थित हैं। ऐसी माहात्म्ययुक्त सरस्वतीका आपने दर्शन किया है॥ ३७-३८॥ |
| पादान्तं विष्णुलोकं वै कौमारं शान्तमुत्तमम्।<br>औमं माहेश्वरं चैव तस्माद् दृष्टा चतुष्पदा ॥ ३८ | |
| तस्मात्तु पशवः सर्वे भविष्यन्ति चतुष्पदाः।<br>ततश्चैषां भविष्यन्ति चत्वारस्ते पयोधराः ॥ ३९ | इससे सभी पशु भी चार पैरोंवाले होंगे और इसीसे इनके चार स्तन भी होंगे। हे ब्रह्मन्! मेरे मुखसे गिरा हुआ मन्त्रयुक्त सोमरूप अमृत प्राणधारियोंका जीवन बनकर उनके स्तनमें निवास करेगा। इसलिये वे स्तन 'पीतस्तन' कहे जायेंगे॥ ३९-४०॥ |
| सोमश्च मन्त्रसंयुक्तो यस्मान्मम मुखाच्च्युतः।<br>जीवः प्राणभृतां ब्रह्मन् पुनः पीतस्तनाः स्मृताः ॥ ४० | |
| तस्मात्सोममयं चैव अमृतं जीवसंज्ञितम्।<br>चतुष्पादा भविष्यन्ति श्वेतत्वं चास्य तेन तत् ॥ ४१ | उसीके कारण सोममय अमृत जीवनसंज्ञावाला होगा और उनके दुग्धका श्वेतत्व उसी सोमरूपत्वके कारण होगा—ऐसे गुणोंवाले वे चतुष्पाद होंगे॥ ४१॥ |
| यस्माच्चैव क्रिया भूत्वा द्विपदा च महेश्वरी।<br>दृष्टा पुनस्तथैवैषा सावित्री लोकभाविनी ॥ ४२ | आपके द्वारा देखी गयी यह लोकभाविनी सावित्री महेश्वरी पुनः दो पादोंवाली होकर क्रियारूप धारण करेगी; जिससे सभी शुभ नर-नारी दो पादों तथा दो स्तनोंवाले होंगे॥ ४२ १/२॥ |
| तस्माच्च द्विपदाः सर्वे द्विस्तनाश्च नराः शुभाः।<br>तस्माच्चेयमजा भूत्वा सर्ववर्णा महेश्वरी ॥ ४३ | सभी प्राणियोंको धारण करनेवाली तथा महान् शक्तिसे सम्पन्न जिस देवीका आपने दर्शन किया है; वह महेश्वरी अजा होकर जब सर्ववर्णमय विश्वरूप धारण करेगी, तब उसीसे सभी प्रजाएँ भी अनेक वर्णोंवाली होंगी॥ ४३-४४॥ |
| या वै दृष्टा महासत्त्वा सर्वभूतधरा त्वया।<br>तस्माच्च विश्वरूपत्वं प्रजानां वै भविष्यति ॥ ४४ | |
| अजश्चैव महातेजा विश्वरूपो भविष्यति।<br>अमोघरेताः सर्वत्र मुखे चास्य हुताशनः ॥ ४५ | तब महातेज तथा अमोघ वीर्यवाले अज विश्वरूप धारण करेंगे और इनके मुखमें सर्वत्र अग्नि विराजमान होगी; उसी कारण सर्वव्यापी पशुरूपी अग्नि पवित्र मानी जायगी॥ ४५ १/२॥ |
| तस्मात्सर्वगतो मेध्यः पशुरूपी हुताशनः।<br>तपसा भावितात्मानो ये मां द्रक्ष्यन्ति वै द्विजाः ॥ ४६ | विशुद्ध आत्मावाले जो द्विजगण अपनी तपस्यासे ईशित्व (ईश्वरत्व) तथा वशित्व (योगसिद्धि)-में सभी जगह मुझे भी सर्वव्यापी रूपमें विराजमान देखेंगे; वे रजोगुण तथा तमोगुणसे रहित होकर मानवशरीरका त्याग करके मेरा सान्निध्य प्राप्त करेंगे और उनका पुनर्जन्म नहीं होगा॥ ४६-४७ १/२॥ |
| ईशित्वे च वशित्वे च सर्वगं सर्वतः स्थितम्।<br>रजस्तमोभ्यां निर्मुक्तास्त्यक्त्वा मानुष्यकं वपुः ॥ ४७ | |
| मत्समीपमुपेष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।<br>इत्येवमुक्तो भगवान् ब्रह्मा रुद्रेण वै द्विजाः ॥ ४८ | सूतजी कहते हैं कि हे द्विजो! शिवजीके इस |