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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

५८ कथासरित्सागर

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५८ कथासरित्सागर खड्गहस्त समुत्पत्य परिभ्रम्य हिमालयम्। प्राप वीरपुरस्य त समरं खचरेश्वरम् ॥१८६॥ तेन युद्धजितेनात्र प्रदत्तां परिणीय सः। तामनङ्गप्रभां भेजे दिव्यां सम्भोगसम्पदम् ॥१८७॥ कञ्चित्काल स्थितश्चात्र श्वशुर समरं च सम्। जीवदत्तो जगादैव तां चानङ्गप्रभां प्रियाम् ॥१८८॥ मनुष्यलोकं गच्छावस्त प्रत्युत्कण्ठितोऽस्मि यत्। प्राणिनां हि निकृष्टापि जन्मभूमिः परा प्रिया ॥१८९॥ एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य श्वशुरः सोऽन्वमन्यत। सा स्वनङ्गप्रभा इच्छादनुमेने विजानती ॥१९०॥ अथाङ्गोपात्तया साकमनङ्गप्रभया तया। जीवदत्त स नभसा मर्त्यलोकमवातरत् ॥१९१॥ दृष्ट्वात्र रम्यमेकं च पर्वतं सा जगाद तम्। श्रान्तानङ्गप्रभा क्षिप्रमिह विश्राम्यतामिति ॥१९२॥ ततस्तथेति तत्रैव सोऽवतीर्य तया सह। चकाराहारपानादि तत्तद्विद्याप्रभावतः ॥१९३॥ ततोऽनङ्गप्रभां जीवदत्तोऽसौ विधिचोदितः। सामुवाच प्रिये किञ्चिन्मधुरं गीयतां त्वया ॥१९४॥ तच्छ्रुत्वा गातुमारभे सा भक्त्या धूर्जटे स्तुतिम्। तेन तद्गीतशब्देन सोऽथ निद्रामगावृक्षिजः ॥१९५॥ साश्वदाखेटकभ्रान्तो निर्झराम्भोऽभिलाषुकः। राजा हरिवरो नाम पथा तेन किलाययौ ॥१९६॥ स तेन गीतशब्देन श्रुतेन हरिणो यथा। आकृष्टोऽभ्यापतत्तत्र रथमुत्सृज्य केवलः ॥१९७॥ शकुने पूर्वमाख्यातलक्ष्मोऽपश्यत् स भूपतिः। तामनङ्गप्रभां सत्यामनङ्गस्य प्रभामिव ॥१९८॥ यदा तद्गीतरूपाभ्यां नीत तस्य विहस्तताम्¹। निर्बिभेद यथाकामं हृदय मदनः शरैः ॥१९९॥ १ विहस्ततां = विवशतां नीतं = प्राप्तम्।

नवम लम्बक ५९

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नवम लम्बक ५९ वह हाथ में खड्ग लेकर आकाश में उड़ा और समस्त हिमालय में घूमकर वीरपुर में रहनेवाले विद्याधरों के राजा समर को प्राप्त किया ॥१८६॥ युद्ध में जीते हुए समर द्वारा प्रदत्त अनंगप्रभा को प्राप्त कर जीवदत्त दिव्य सम्पत्ति का उपभोग करने लगा ॥१८७॥ तदनन्तर, कुछ दिनों तक वहीं रहने के पश्चात् उसने एक दिन अपने श्वशुर समर और पत्नी अनंगप्रभा से कहा- 'हम दोनों (जीवदत्त और अनंगप्रभा) मनुष्य-लोक जाते। वहाँ जाने के लिए मैं उत्सुक हो रहा हूँ। प्राणियों को अपनी जन्म-भूमि निकृष्ट होने पर भी बहुत प्यारी लगती है ॥१८८-१८९॥ उसकी यह बात श्वशुर ने मान ली लेकिन भविष्य को समझती हुई अनंगप्रभा ने कठिनाई से इसे माना ॥१९०॥ तदनन्तर जीवदत्त अनंगप्रभा को गोद में लिये हुए मर्त्यलोक में उतरा। मार्ग में एक रमणीय पर्वत को देखकर अनंगप्रभा ने उससे कहा- 'मैं श्रान्त हो गई हूँ अतः इस पर्वत पर विश्राम करो' ॥१९१-१९२॥ 'ऐसा ही हो' इस प्रकार कहकर जीवदत्त उसके साथ उस पर्वत पर उतर गया और अनंगप्रभा की विद्याओं के प्रभाव से भोजन-पान आदि किया ॥१९३॥ तब दैव से प्रेरित जीवदत्त अनंगप्रभा से बोला--'प्यारी कुछ मधुर संगीत सुनाओ' ॥१९४॥ यह सुनकर अनंगप्रभा भक्ति से शिव की स्तुति गाने लगी। तब उसके गान के मधुर शब्द से वह जीवदत्त ब्राह्मण धीरे-धीरे निद्रामग्न हो गया ॥१९५॥ तबतक हरिवर नाम का राजा शिकार खेलता हुआ और झरने का जल ढूँढ़ता हुआ उस मार्ग से जा निकला ॥१९६॥ वह राजा हिरण के समान अनंगप्रभा के गीत से खिंचा हुआ रथ को छोड़कर वहाँ आ गया ॥१९७॥ अच्छे शकुनों से पहले ही शुभ सूचना प्राप्त राजा ने वहाँ कामदेव की शान्ति के समान सुन्दरी अनंगप्रभा को देखा ॥१९८॥ उसे देखते ही उसके गान और रूप से विवश राजा के हृदय को कामदेव ने बाणों से बींध दिया ॥१९९॥

५१२ कथासरित्सागर

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५१२ कथासरित्सागर स्वनामख्याञ्जने तस्मिन् सोऽनङ्गप्रभया तया। सह दिव्यसुखस्तस्थौ ततो हरिवरो नृपः ॥२१५॥ साप्यनङ्गप्रभा तमेवासीत्तदनुरागिणी। विस्मृत्य स्वं प्रभावं स सर्वं शापविमोहिता ॥२१६॥ अत्रान्तरे स सप्ताद्रौ जीवदत्तो न केवलम्। प्रबुद्धो नैक्षतानङ्गप्रभां यावत् स्वमप्यसिम् ॥२१७॥ क्व साऽनङ्गप्रभा कष्टं क्व स खड्गोऽपि किं नु तम्। हृत्वा गता सा किं वा तौ नीतौ द्वावपि केनचित् ॥२१८॥ इत्युद्भ्रान्तो बहून् कुर्वन् वितर्कान् स दिनत्रयम्। गिरिं तं विचिनोति स्म दह्यमानः स्मराग्निना ॥२१९॥ ततोऽवतीर्य चिन्वानो वनानि दिवसान् दश। स बभ्राम न चापश्यत् तस्याः पदमपि क्वचित् ॥२२०॥ हा दुर्जनविधे कृच्छ्रात् सा दत्तापि कथं त्वया। खड्गसिद्ध्या सह हृता प्रियानङ्गप्रभा मम ॥२२१॥ इत्याक्रन्दन्निराहारो भ्रमन्नेकमवाप्तवान्। ग्रामं तत्र विवेशैकमार्तं द्विजगृहं च सः ॥२२२॥ गृहिणी तत्र सुभगा सुवस्त्रा चोपवेश्य तम्। आसने प्रियदत्ताख्यां स्वचेटीं शीघ्रमार्दिशत् ॥२२३॥ त्वरितं जीवदत्तस्य पादौ क्षाल्यतामस्य हि। निराहारस्य विरहाद्दिनमद्य त्रयोदशम् ॥२२४॥ तच्छ्रुत्वा विस्मितो जीवदत्तोऽन्तर्विममर्श सः। इहानङ्गप्रभा प्राप्ता किं किमेषाथ योगिनी ॥२२५॥ इति ध्यायन् धौतपादो भुक्तसद्दत्तभोजनः। प्रणतां प्रियदत्तां तामत्याश्चर्यात् पृच्छति स्म सः ॥२२६॥ एकं ब्रूहि कथं वेत्सि मद्वृत्तान्तमनिन्दिते। द्वितीयं चापि कथय प्रियाखड्गौ क्व मे गतौ ॥२२७॥ तच्छ्रुत्वा तमवोचत् सा प्रियदत्ता पतिव्रता। भर्तुरन्यो न मे चित्ते स्वप्नेऽपि कुरुते पदम् ॥२२८॥ पुत्रभ्रातृसमानन्यान् पश्यामि पुरुषानहम्। न च मेऽनर्चितो याति कदाचिदतिथिर्गृहात् ॥२२९॥

नवम लम्बक ५१५

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नवम लम्बक ५१५ राजा हरिवर, अपने नाम से ही प्रसिद्ध हरिवर नगर, में उस परम सुन्दरी दिव्य रमणी अनंगप्रभा के साथ दिव्य सुख प्राप्त करता हुआ रहने लगा॥२१५॥ वह अनंगप्रभा भी राजा के प्रति अनुराग रखती हुई वहीं रहने लगी किन्तु वह अपने प्रभाव को भूलकर शाप से मोहित हो गई थी॥२१६॥ इसी बीच उस पर्वत पर सोकर उठे हुए जीवदत्त ने केवल अनंगप्रभा को ही नहीं देखा यह नहीं प्रत्युत अपनी तलवार को भी उसने नहीं देखा॥२१७॥ वह अनंगप्रभा कहाँ है वह तलवार भी कहाँ गई ? क्या अनंगप्रभा तलवार लेकर चली गई या उन दोनों को ही कोई तीसरा ले गया ? ॥२१८॥ इस प्रकार, उन्मत्त के समान विविध प्रकार की शंकाएं करता हुआ वह जीवदत्त कामाग्नि से जलता हुआ तीन दिनों तक सारे पर्वत पर उसे ढूँढता रहा॥२१९॥ तब पर्वत से उतरकर दस दिनों तक उसके नीचे वन में उसे ढूँढते हुए वह घूमता रहा किन्तु कहीं उसने उसके चरण का चिह्न भी न पाया॥२२०॥ 'हे दुष्ट दैव अत्यन्त कठिनाई से दी हुई तून खड्गसिद्धि के साथ मेरी प्राणप्यारी अनंगप्रभा को भी हर लिया' ॥२२१॥ इस प्रकार, रोते-कलपते और निराहार भ्रमण करते हुए उसे एक ग्राम मिला वहाँ वह एक सम्पन्न ब्राह्मण के घर में प्रवेश किया ॥२२२॥ उस घर में सुन्दरी और अच्छे वस्त्र पहने हुए गृहिणी प्रियव्रता ने उसे आसन देकर बैठाया और अपनी दासियों को आज्ञा दी कि शीघ्र ही इस जीवदत्त के चरण धुलाओ। स्त्री के वियोग से निराहार रहते हुए आज इसका तेरहवाँ दिन है॥२२३-२२४॥ यह सुनकर जीवदत्त मन में सोचने लगा कि क्या अनंगप्रभा यहाँ आई है या यह स्त्री ही कोई योगिनी है॥२२५॥ ऐसा सोचता हुआ धुले हुए पैरोंवाला और उसके दिये हुए भोजन से तृप्त जीवदत्त ने प्रणाम करते हुए बड़ी ही दीनतापूर्वक प्रियव्रता से पूछा-॥२२६॥ 'हे सदाचारिणी एक तो यह बताओ कि तुम मेरा वृत्तान्त कैसे जानती हो ? और, दूसरा यह बताओ कि मेरी प्रियतमा और तलवार कहाँ है ? ॥२२७॥ यह सुनकर वह पतिव्रता प्रियव्रता उससे बोली—'पति के सिवा दूसरा पुरुष स्वप्न में भी मेरे चित्त में स्थान नहीं पाता ॥२२८॥ दूसरे पुरुषों को मैं पुत्र और भ्राता के समान समझती हूँ। मेरे घर से कोई भी अतिथि बिना सत्कार प्राप्त किये हुए वापस नहीं जा सकता ॥२२९॥ ६५

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सापि तं वीक्ष्य सहसा सुभगं पुष्पधन्वनः। पतिता गोधरेऽनङ्गप्रभा क्षणमचिन्तयत् ॥२००॥ कोऽयं किमयममुक्तपुष्पचापॊ मनोभवः। किं मूर्तो गीततुष्टस्य शर्वस्यानुग्रहो मयि ॥२०१॥ इति सञ्चिन्त्य पप्रच्छ सा तं मदनमोहिता। कस्त्वं कथं वनं खेदमागतोऽस्युच्यतामिति ॥२०२॥ ततो यथागतो यः स सर्वं तस्यै शशंस तत्। स राजा तामथापृच्छत् का त्वं सुन्दरि शंस मे ॥२०३॥ यश्च सुप्तस्थितोऽत्रायमेष कः कमलानने। इति तं पृच्छन्तं च सङ्क्षेपेण जगाद सा ॥२०४॥ अहं विद्याधरी खड्गसिद्धश्चैष पतिर्मम। दृष्टमात्रे च जातास्मि सानुरागाधुना त्वयि ॥२०५॥ तदेहि तावद् गच्छावस्त्वदीयं नगरं द्रुतम्। यावत् प्रबुध्यते नायं तत्र वक्ष्यामि विस्तरात् ॥२०६॥ श्रुत्वैतत्तद्वचो राजा प्रतिपद्य तथेति सः। त्रैलोक्यराज्यसम्प्राप्तिहर्षं हरिवरो दधे ॥२०७॥ नृपमङ्के गृहीत्वैमं गन्त्वाभ्युत्पत्य खं जवात्। इत्यनङ्गप्रभा सान्तः सत्वरा समचिन्तयत् ॥२०८॥ तावच्च भ्रष्टविद्याभूवद्भर्तृद्रोहेण तेन सा। स्मरन्ती पितृशापं च विषादं सहसा ययौ ॥२०९॥ तद्दृष्ट्वा कारणं पृष्ट्वा स राजा तामभाषत। न विषादस्य कालोऽयं प्रबुध्येतैष ते पतिः ॥२१०॥ दैवायत्तं च यत्सर्वं तच्छोचितुं नार्हसि प्रिये। को हि स्वशिरसश्छायां विभेद्योत्सृजयेद् गतिम् ॥२११॥ तदेहि याम इत्युक्त्वा तां स त्वरितद्विगरम्। अङ्के हरिवरश्चक्रे राजानङ्गप्रभां द्रुतम् ॥२१२॥ ततो निधानलब्ध्येव तुष्टो गत्वा यथागतं। राजारुरोह स्वरथं स भृत्यैरभिनन्दितः ॥२१३॥ तेन स्वनगरं प्राप स नभश्शीघ्रगामिना। रथेन रमणीयुक्तः प्रजानां दत्तकौतुकः ॥२१४॥

अष्टम लम्बक ५११

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[Page Header] अष्टम लम्बक ५११

[Page Body] वह अनंगप्रभा भी सुन्दर राजा को देखकर, कामदेव के बाणों का लक्ष्य बन गई और अपने मन में सोचने लगी— ॥२ ०॥ यह कौन है? क्या यह धनुषहीन कामदेव है अथवा मेरे गात्र या स्तुति से सन्तुष्ट शिव का मुझपर मूर्त्तिमान् अनुग्रह है ॥२ १॥ ऐसा सोचकर काम-मोहिता अनंगप्रभा ने उससे पूछा—'तुम कौन हो और इस वन में कैसे आये हो बताओ' ॥२ २॥ तब राजा जहाँ जैसे आया था वह सब उसे उसने बताया और राजा ने भी उससे पूछा—'सुन्दरि, तू कौन है? मुझे बता ॥२ ३॥ हे कमलनयनी यहाँ यह जो सो रहा है, यह कौन है। ऐसा पूछते हुए राजा को अनंग प्रभा ने संक्षेप में सब वृत्तान्त सुना दिया ॥२ ४॥ मैं विद्याधरी हूँ और यह खड्गसिद्ध मानव मेरा पति है। किन्तु, मैं तुम्हें देखते ही तुम्हारे प्रति अनुरागिणी हो गई हूँ। तो आओ। शीघ्र ही तुम्हारे नगर को चलें। जबतक यह जागता नहीं तबतक तुम्हें विस्तार से सब समाचार सुनाती हूँ' ॥२ ५–२ ६॥ राजा ने उसका प्रस्ताव सुनकर और उसे स्वीकार करके माना तीनों लोकों का राज्य पा लिया ॥२ ७॥ अनंगप्रभा ने राजा को गोद में रखकर, क्या वेग से आकाश में उड़ जाऊँ—ऐसा शीघ्र ही मन में सोचा ॥२ ८॥ इतने में ही वह पति-विद्रोह के कारण भ्रष्ट विद्यावाली हो गई, अर्थात् अपनी विद्याओं को भूल गई। तब पिता के शाप का स्मरण करती हुई वह अत्यन्त दुःखी हो गई ॥२ ९॥ उसे दुःखी देखकर और उसका कारण पूछकर राजा ने उससे कहा—यह शोक करने का समय नहीं है, तेरा पति जग जायगा ॥२१०॥ प्रिये यह बात तो दैवाधीन है। इस पर सोच न करो। अपने सिर की छाया और दैव की गति का कौन उल्लंघन कर सकता है? ॥२११॥ तो आओ अब चलें'—ऐसा कहकर उस पर विश्वास करती हुई अनंगप्रभा को राजा ने शीघ्रता से गोद में उठा लिया ॥२१२॥ तब माना गड़ा हुआ खजाना प्राप्त किया हुआ-सा वह राजा शीघ्र ही जाकर अपने रथ पर चढ़ गया और सेवकों ने उसका अभिनन्दन किया ॥२१३॥ वह राजा मन के समान शीघ्रगामी उस रथ से उस रमणी के साथ प्रजाओं को कौतुक देता हुआ अपनी राजधानी में जा पहुँचा ॥२१४॥

५१२ कथासरित्सागर

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५१२ कथासरित्सागर स्वनामलाञ्छने तस्मिन् सोऽनङ्गप्रमया तया। सह दिव्यसुरस्तस्थौ ततो हरिवरो नृपः॥२१५॥ साप्यनङ्गप्रभा तत्रवासीत्तदनुरागिणी। विस्मृत्य स्वं प्रभावं तं सर्वं पापेविमोहिता॥२१६॥ अत्रान्तरे स तत्राद्रौ जीवदत्तो न केवलम्। प्रबुद्धो नैक्षतानङ्गप्रभां यावत् स्वमप्यसिम्॥२१७॥ क्व साऽनङ्गप्रभा कष्टं क्व स खड्गोऽपि किं नु तम्। हृत्वा गता सा किं वा तौ नीतौ द्वावपि केनचित्॥२१८॥ इत्युद्विभ्रान्तो बहून् कुर्वन् वितर्कांन् स दिनत्रयम्। गिरिं तं विचिनोति स्म दह्यमानः स्मराग्निना॥२१९॥ ततोऽश्वतीर्थं चिन्वानो वनानि दिवसान् दश। स बभ्राम न चापश्यत् तस्याः पदमपि क्वचित्॥२२०॥ हा दुर्जनविधे दुःखात् सा दत्तापि कथं त्वया। खड्गसिद्ध्या सह हृता प्रयानङ्गप्रभा मम॥२२१॥ इत्याक्रन्दन्निराहारो भ्रमन्नेकमवाप्तवान्। ग्रामं तत्र विवेशैक्रमाढ्यं द्विजगृहं च सः॥२२२॥ गृहिणी तत्र सुभगा सुवस्त्रा चोपवेश्य तम्। आसने प्रियदत्ताख्या स्वचेटीं शीघ्रमादिशत्॥२२३॥ त्वरितं जीवदत्तस्य पादौ क्षालयतास्य हि। निराहारस्य विरहाद्दिनमद्य त्रयोदशम्॥२२४॥ तच्छ्रुत्वा विस्मितो जीवदत्तोऽन्तर्विममर्श सः। इहानङ्गप्रभा प्राप्ता किं किमेषाथ योगिनी॥२२५॥ इति ध्यायन् धौतपादो भुक्तसद्दत्तभोजनः। प्रणतः प्रियदत्तां तामत्याश्चर्यां पृच्छति स्म सः॥२२६॥ एकं ब्रूहि कथं वेत्सि मद्द्वृत्तान्तमनिन्दिते। द्वितीयं चापि कथय प्रियासङ्गो क्व मे गतो॥२२७॥ तच्छ्रुत्वा तमवोचत् सा प्रियदत्ता पतिव्रता। भर्तुरन्यो न मे चित्ते स्वप्नेऽपि कुरुते पदम्॥२२८॥ पुत्रभ्रातृसमान् यान् पश्यामि पुरुषानहम्। न च मेऽनर्चितो याति क्वाप्यतिथिर्गृहात्॥२२९॥

नवम लम्बक ५१५

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नवम लम्बक ५१५ राजा हरिवर, अपने नाम से ही प्रसिद्ध हरिवर नगर, में उस परम सुन्दरी दिव्य रमणी अनंगप्रभा के साथ विषय सुख प्राप्त करता हुआ रहने लगा॥२१५॥ वह अनंगप्रभा भी राजा के प्रति अनुराग रखती हुई वहीं रहने लगी किन्तु वह अपने प्रभाव को भूलकर शाप से मोहित हो गई थी॥२१६॥ इसी बीच उस पर्वत पर सोकर उठे हुए जीवदत्त ने केवल अनंगप्रभा को ही नहीं देखा यह नहीं प्रत्युत अपनी तलवार को भी उसने नहीं देखा ॥२१७॥ वह अनंगप्रभा कहाँ है वह तलवार भी कहाँ गई ? क्या अनंगप्रभा तलवार लेकर चली गई या उन दोनों को ही कोई तीसरा ले गया ? ॥२१८॥ इस प्रकार, उन्मत्त के समान विविध प्रकार की शंकाएँ करता हुआ वह जीवदत्त कामाग्नि से जलता हुआ तीन दिनों तक सारे पर्वत पर उसे ढूँढ़ता रहा॥२१९॥ तब पर्वत से उतरकर दस दिनों तक उसके नीचे वन में उसे ढूंढते हुए वह घूमता रहा किन्तु कहीं उसने उसके चरण का चिह्न भी न पाया॥२२ ॥ 'हे दुष्ट दैव अत्यन्त कठिनाई से दी हुई तूने खड्गसिद्धि के साथ मेरी प्राणप्यारी अनंगप्रभा को भी हर लिया' ॥२२१॥ इस प्रकार, रोते-कलपते और निराहार भ्रमण करते हुए उसे एक ग्राम मिला जहाँ वह एक सम्पन्न ब्राह्मण के घर में प्रविष्ट किया ॥२२२॥ उस घर में सुन्दरी और अच्छे वस्त्र पहने हुए गृहिणी प्रियदत्ता ने उसे आसन देकर बैठाया और अपनी दासियों को आज्ञा दी कि शीघ्र ही इस जीवदत्त के चरण धुलाओ। स्त्री के वियोग से निराहार रहते हुए आज इसका तेरहवां दिन है॥२२३-२२४॥ यह सुनकर जीवदत्त मन में सोचने लगा कि क्या अनंगप्रभा यहाँ आई है या यह स्त्री ही कोई योगिनी है॥२२५॥ ऐसा सोचता हुआ धुले हुए पैरोंवाला और उसके दिये हुए भोजन से तृप्त जीवदत्त ने प्रणाम करते हुए बड़ी ही दीनतापूर्वक प्रियदत्ता से पूछा—॥२२६॥ 'हे सदाचारिणी एक तो यह बताओ कि तुम मेरा वृत्तान्त कैसे जानती हो ? और, दूसरा यह बताओ कि मेरी प्रियतमा और तलवार कहाँ है ? ॥२२७॥ यह सुनकर वह पतिव्रता प्रियदत्ता उससे बोली—'पति के सिवा दूसरा पुरुष स्वप्न में भी मेरे चित्त में स्थान नहीं पाता ॥२२८॥ दूसरे पुरुषों को मैं पुत्रों और भाइया के समान समझती हूँ। मेरे घर से कोई भी अतिथि बिना सत्कार प्राप्त किये हुए वापस नहीं जा सकता ॥२२९॥ ६५

५१२ कथासरित्सागर

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५१२ कथासरित्सागर स्वनामलाञ्छने तस्मिन् सोऽनङ्गप्रमया तया। सह विषयसुखस्तस्थौ ततो हरिवरो नृप ॥२१५॥ साप्यनङ्गप्रभा तत्रैवासीत्तदनुरागिणी। विस्मृत्य स्व प्रभावं तं सर्वं शापविमोहिता ॥२१६॥ अत्रान्तरे स तत्राद्रौ जीवदत्तो न केवलम्। प्रबुद्धो नैक्षतानङ्गप्रभां यावत् स्वमप्यसिम् ॥२१७॥ क्व साऽनङ्गप्रभा कष्टं क्व स खड्गोऽपि किं नु सम्। ह्रुत्वा गता सा किं वा तौ नीतौ द्वावपि केनचित् ॥२१८॥ इत्युद्भ्रान्तो बहून् कुर्वन् वितर्कान् स दिनत्रयम्। गिरि तं विचिनोति स्म वह्यमानः स्मराग्निना ॥२१९॥ ततोऽवतीर्य चिन्वानो वनानि दिवसान् दश। स बभ्राम न चापश्यत् तस्या पादमपि क्वचित् ॥२२०॥ हा दुर्जनविषे कुब्धात् सा दत्तापि कथ त्वया। खड्गसिद्ध्या सह ह्रुता प्रियानङ्गप्रभा मम ॥२२१॥ इत्याक्रन्दन्निराहारो भ्रमन्नेकमवाप्तवान्। ग्रामं तत्र विवेशैक्रमाढ्य द्विजगृहं च सः ॥२२२॥ गृहिणी तत्र सुभगा सुवस्त्रा चोपवेश्य तम्। आसने प्रियदत्ताख्या स्वचटीं शीघ्रमाविशत् ॥२२३॥ त्वरितं जीवदत्तस्य पादौ क्षालयतास्य हि। निराहारस्य विरहाद्दिनमद्य त्रयोदशम् ॥२२४॥ तच्छ्रुत्वा विस्मितो जीवदत्तोऽन्तर्विममर्श सः। इहानङ्गप्रभा प्राप्ता किं किमेषाथ योगिनी ॥२२५॥ इति ध्यायन् धौतपादो भुक्ततद्दत्तभोजनः। प्रणतः प्रियदत्तां तामरयार्थ्या पृच्छति स्म सः ॥२२६॥ एकं ब्रूहि कथं वेत्सि मद्वृत्तान्तमनिन्दिते। द्वितीयं चापि कथय प्रियासङ्गो क्व मे गतो ॥२२७॥ तच्छ्रुत्वा तमबोधत् सा प्रियदत्ता पतिव्रता। भर्तुरन्यो न मे चित्ते स्वप्नेऽपि कुरुते पदम् ॥२२८॥ पुत्रभ्रातृसमान् यान् पश्यामि पुरुषानहम्। न च मेऽनर्चितो याति कदाचिदतिथिगृहात् ॥२२९॥

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नवम लम्बक ५१५ राजा हरिवर, अपने नाम से ही प्रसिद्ध हरिवर नगर, में उस परम सुन्दरी दिव्य रमणी अनंगप्रभा के साथ दिव्य सुख प्राप्त करता हुआ रहने लगा ॥२१५॥ वह अनंगप्रभा भी राजा के प्रति अनुराग रखती हुई वहीं रहने लगी किन्तु वह अपने प्रभाव को भूलकर आप से मोहित हो गई थी ॥२१६॥ इसी बीच उस पर्वत पर सोकर उठे हुए जीवदत्त ने केवल अनंगप्रभा को ही नहीं देखा यह नहीं प्रत्युत अपनी तलवार को भी उसने नहीं देखा ॥२१७॥ वह अनंगप्रभा कहाँ है वह तलवार भी कहाँ गई ? क्या अनंगप्रभा तलवार लेकर चली गई या उन दोनों को ही कोई तीसरा ले गया ? ॥२१८॥ इस प्रकार, उन्मत्त के समान विविध प्रकार की शंकाएं करता हुआ वह जीवदत्त कामाग्नि से जलता हुआ तीन दिनों तक सारे पर्वत पर उसे ढूंढता रहा ॥२१९॥ तब पर्वत से उतरकर दस दिनों तक उसके नीचे वन में उसे ढूंढते हुए वह घूमता रहा किन्तु कहीं उसने उसके चरण का चिह्न भी न पाया ॥२२ ०॥ 'हे दुष्ट दैव अत्यन्त कठिनाई से दी हुई तूने खड्गसिद्धि के साथ मेरी प्राणप्यारी अनंगप्रभा को भी हर लिया' ॥२२१॥ इस प्रकार, रोते-कलपते और निराहार भ्रमण करते हुए उसे एक ग्राम मिला जहाँ वह एक सम्पन्न ब्राह्मण के घर में प्रवेश किया ॥२२२॥ उस घर में सुन्दरी और अच्छे वस्त्र पहने हुए गृहिणी प्रियदत्ता ने उसे आसन देकर बैठाया और अपनी दासियों को आज्ञा दी कि शीघ्र ही इस जीवदत्त के चरण धुलाओ । स्त्री के वियोग से निराहार रहते हुए आज इसका तेरहवाँ दिन है ॥२२३-२२४॥ यह सुनकर जीवदत्त मन में सोचने लगा कि क्या अनंगप्रभा यहाँ आई है या यह स्त्री ही कोई योगिनी है ॥२२५॥ ऐसा सोचता हुआ धुले हुए पैरोंवाला और उसके दिये हुए भोजन से तृप्त जीवदत्त ने प्रणाम करते हुए बड़ी ही दीनतापूर्वक प्रियदत्ता से पूछा- ॥२२६॥ 'हे सदाचारिणी एक तो यह बताओ कि तुम मेरा वृत्तान्त कैसे जानती हो ? और दूसरा यह बताओ कि मेरी प्रियतमा और तलवार कहाँ है ? ॥२२७॥ यह सुनकर वह पतिव्रता प्रियदत्ता उससे बोली-'पति के सिवा दूसरा पुरुष स्वप्न में भी मेरे चित्त में स्थान नहीं पाता ॥२२८॥ दूसरे पुरुष को मैं पुत्रों और भाइयों के समान समझती हूँ। मेरे घर से कोई भी अतिथि बिना सत्कार प्राप्त किये हुए वापस नहीं जा सकता ॥२२९॥ ६५

५१४ कथासरित्सागर

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५१४ कथासरित्सागर सत्प्रभावेण जानामि भूतं भव्यं च भावि च। सा चानङ्गप्रभा नीता राज्ञा हरिवरेण तु॥२३०॥ सुप्ते त्वयि विधियोगात् तन्मार्गगामिना तदा। गीताकृष्टोपयातेन स्वनामपुरवासिना॥२३१॥ सा न शक्या न ते प्राप्तुं स हि राजा महाबलः। सा पुनस्तमपि त्यक्त्वा कुलटान्‍यत्र यास्यति॥२३२॥ खड्गं च देवी प्रादात्ते सत्प्राप्त्यै तद्विधाय सः। तस्यां हृतायां दिव्यत्वाद्भ्रष्टया एवान्तिकं गतः॥२३३॥ किं न वेत्स्येव तेऽनङ्गप्रभाशापोपवर्णने। स्वप्ने भावि यदादिष्टं तत्कथं विस्मृतं तव॥२३४॥ तदेष भवितव्योऽयं व्यामोहोस्ते वृथैव कः। पापानुबन्धं मुञ्चैनं भूयो भूयोऽतिदुःखदम्॥२३५॥ किं चाधुना तव तया पापयान्यानुरक्तया। मानुषीभूतया ज्ञातस्वद्रोहाद्भ्रष्टविद्यया॥२३६॥ इत्युक्तः स तया साध्व्या त्यक्तानङ्गप्रभास्पृहः। तज्जातखेदविरक्तात्मा जीवदत्तो जगाद ताम्॥२३७॥ शान्तस्त्वद्वचसा मोहः सत्येनाम्बामुना मम। कामं न श्रेयसे कस्य सङ्गमः पुण्यकर्मभिः॥२३८॥ पूर्वपापवशादेतद् समापतितं मम। तत्क्षालनाय यास्यामि तीर्थान्युज्झितमत्सरः॥२३९॥ को मेऽनङ्गप्रभाहर्तोर्वैरेणार्थः परे सह। जितक्रोधेन सर्वं हि जगदेतद्विजीयते॥२४०॥ इति यावत् स वक्त्यत्र तावत्तस्याः पतिर्गृहे। आययो प्रियदत्ताया धार्मिकोऽतिथिवात्सलः॥२४१॥ कृतातिथ्येन तेनाऽपि त्याजितो दुःखमत्र सः। विश्रम्य तीर्थयात्राय प्रायादापृच्छय ताबुभौ॥२४२॥ ततः श्रमण सर्वाणि पृथ्व्यां तीर्थानि सोऽभ्रमत्। विमोढानेककान्तारस्पृष्टो मूलफलाशनः॥२४३॥ भ्राम्यन्तीर्थेष्व तामेव स ययौ विन्ध्यवासिनीम्। तत्र तप स्तपस्तीव्रं निराहारः कुशास्तरे॥२४४॥

नवम लम्बक ५१५

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नवम लम्बक ५१५ इसके प्रभाव से ही भूत भविष्य और वर्तमान को मैं जानती हूँ। वही उस अनंगप्रभा को राजा हरिवर ले गया ॥२५०॥ तेरे सोये रहने पर वह राजा हरिवर उसके गान से आकृष्ट होकर उसी मार्ग से आ गया था किन्तु वह दुराचारिणी उसे भी छोड़कर फिर दूसरे के पास चली जायगी ॥२५१ २५२॥ उस खड्ग को देवी ने तुझे उसी की प्राप्ति के लिए दिया था। उसके हरण हो जाने पर वह दिव्य खड्ग फिर देवी के पास ही चला गया ॥२५३॥ और, देवी ने ही अनंगप्रभा के शाप का वर्णन करते हुए स्वप्न में तुझे जो उसका भविष्य बतलाया था वह तू क्यों भूल गया ? ॥२५४॥ तो इस असत्यंवादी बात में तुझे यह मिथ्या मोह क्यों हो रहा है ? तू बार-बार अति दुःख देनेवाले इस पाप के बन्धन को तोड़ दे ॥२५५॥ आर्त, दूसरे पुरुष से प्रेम करनेवाली और मनुष्य बनी हुई तथा तुम्हारे साथ धोखा करने के कारण भ्रष्ट विद्यावाली उस पापिन को पाकर भी तुम क्या करोगे ? ॥२५६॥ उस पतिव्रता द्वारा इस प्रकार समझाये गये जीवदत्त ने अनंगप्रभा की आशा छोड़ दी और उसकी चंचलता से विरक्त होकर वह प्रियव्रता से बोला—॥२५७॥ 'हे माता तेरे इन सत्य वाक्यों से मेरा मोह शान्त हो गया। पुण्यात्माओं का सम्पर्क किसके कल्याण के लिए नहीं होता ? ॥२५८॥ मेरे पूर्वजन्म के पापों के कारण मुझे यह दुःख प्राप्त हुआ। अब उन पापों को धोने के लिए राग-द्वेष हीन होकर मैं तीर्थों की यात्रा करूँगा ॥२५९॥ अनंगप्रभा के कारण दूसरों से विरोध करने में मुझे क्या लाभ है? जिसने क्रोध को जीत लिया उसने सारे संसार को जीत लिया' ॥२६०॥ जीवदत्त के इस प्रकार कहते ही प्रियव्रता का पति वहाँ आ गया जो परम धार्मिक और अतिथियों का प्रेमी था ॥२४१॥ उसने भी जीवदत्त का आतिथ्य करके उसके दुःख को दूर किया। तब जीवदत्त उनके घर में विश्राम करके और उनसे सम्मति लेकर तीर्थयात्रा को चला गया ॥२४२॥ तदनन्तर निर्जन वनों में अनेक कष्टों को सहन करता हुआ और कन्द-मूल फल खाता हुआ वह पृथ्वी के सभी तीर्थों का भ्रमण करने लगा ॥२४३॥ सभी तीर्थों का पर्यटन करने के उपरान्त अन्त में उसी विन्ध्यवासिनी की शरण में आकर निराहार रहकर उसने कुश के आस्तरण पर कठिन तपस्या आरम्भ की ॥२४४॥

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तपस्तुष्टा च सा साक्षादुवाचैव तमम्बिका। उत्तिष्ठ तत्र यूयं हि चत्वारो मामका गणाः॥२४५॥ पञ्चचूलश्चतुर्वक्त्रमहोदरमुखास्तथा । त्वं चतुर्थश्च विकटवदनाख्यः क्रमोत्तमः ॥२४६॥ ते यूयं जातु गङ्गाया विहर्तुं पुलिनं गताः। तत्र स्नान्ती च युष्माभिर्दृष्टैका मुनिकन्यका ॥२४७॥ चापलेस्सि कपिञ्जटाख्यस्य मुनेः सुता। प्रार्थ्यते स्म च सर्वैः सा भवद्भिर्मदनातुरैः ॥२४८॥ कन्याहमनपेयातेति तयोक्ते ते त्रयोऽपरे। तूष्णीमासंस्त्वया सा तु हठाद्बाहावगृह्यत ॥२४९॥ क्रन्दति स्म च सा 'तात तात त्रायस्व मा' मिति। तच्छ्रुत्वा निकटस्थोऽत्र स क्रुद्धो मुनिरागमत् ॥२५ ॥ तं दृष्ट्वा सा त्वया मुक्ता ततो युष्मान् शशाप सः। मनुष्ययोनिं पापिष्ठाः सर्वे यातेति तत्क्षणात् ॥२५१॥ प्रार्थितः सोऽथ शापान्तमेव वो मुनिरभ्यधात्। यदानङ्गरतीराजसुता युष्माभिरर्चिता ॥२५२॥ गता विद्याधरं लोकं मोक्ष्याध्वामी तदा त्रयः। त्वं तु विद्याधरीभूतां प्राप्यैतां हारयिष्यसि ॥२५३॥ ततः प्राप्स्यसि विकटवदन व्यसनं महत्। चिराच्च देवीमाराध्य शापादस्माद्विमोक्ष्यसे ॥२५४॥ त्वयास्याश्चापलेखाया हस्तस्पर्शो यतः कृतः। परदारापहारोत्थं पापमस्ति च ते महत् ॥२५५॥ इति ये मद्गणा यूयं शप्तास्तेन महर्षिणा। तेऽद्य जाताः स्थ चत्वारः प्रवीरा दक्षिणापथे ॥२५६॥ पञ्चपट्टिचनामाऽसौ यो तौ खड्गधरश्च यः। सतायस्ते त्रयस्त्वं च चतुर्थो जीवदत्तकः ॥२५७॥ ते च त्रयोऽनङ्गरतौ प्रयातायां निजं पदम्। इहागत्यैव निम्मुक्ता मत्प्रभावेन शापतः ॥२५८॥ त्वया चाराधिताऽस्म्यद्य जातः शापक्षयश्च ते। तन्नानयीं गृहीत्वैनां धारणां स्वतनूं त्यज ॥२५९॥

नवम लम्बक ५१७

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नवम लम्बक ५१७ उसके तप से सन्तुष्ट अम्बिका ने प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष रूप में उससे कहा—'उठो बेटा तुम चार मेरे गण हो। तीन तो पंचशूल, चतुर्वक्त्र और महावर हैं और चौथा तुम विकटवदन नाम का है ॥२४५ २४६॥ किसी समय तुम चारों गण विहार के लिए गंगा-तट पर गये। वहाँ कपिसजट नाम के मुनि की कन्या चापलता स्नान करती हुई तुम्हें दीख पड़ी और तुम लोग उसे देखकर काम से व्याकुल हो गये और उसकी इच्छा करने लगे ॥२४७-२४८॥ 'मैं ऋषी कन्या हूँ तुम लोग यहाँ से दूर हटो' उसके ऐसा कहने पर अन्य तीन गण तो चुप रहे किन्तु तुमने बलपूर्वक उसके हाथ पकड़ लिये ॥२४९॥ तब 'हे पिता हे पिता मुझे बचाओ'—इस प्रकार वह चिल्लाने लगी। उसका चिल्लाना सुनकर पास ही स्थित उसका पिता मुनि वहाँ आया। उसे देखकर तुमने उसे छोड़ दिया। तब मुनि ने तुम चारों को शाप दिया कि 'हे पापियो तुम मानव-लोक में जाओ' ॥२५० २५१॥ तब प्रार्थना करने पर मुनि ने इस प्रकार शाप का अन्त किया कि 'जब राजकुमारी अनंग प्रभा को तुम लोग सौंपोगे तब वह विद्याधर-लोक में चली जायगी। ये तीनों तो उसी समय शाप मुक्त हो जायेंगे किन्तु तुम विद्याधरी बनी हुई उसे पाकर भी गँवा दोगे ॥२५२ २५३॥ हे विकटवदन अब तुम महान् कष्ट प्राप्त करोगे और चिरकाल तक देवी की आराधना करके इस शाप से छूटोगे ॥२५४॥ तुमने उस चापलता कन्या के हाथ का स्पर्श किया है। इसलिए तुम्हे परदारापहरण का भारी पाप लगा है ॥२५५॥ इस प्रकार उस महर्षि ने मेरे गणों को जो शाप दिया, उसके परिणामस्वरूप तुम चारो दक्षिण दिशा में वीर रूप में उत्पन्न हुए थे। पंचशूष्टिक (जुलाहा) भाषाविज्ञानी (वैद्य) और गङ्गाधर (क्षत्रिय) ये तीनों और चौथा जीवदत्त चारो मित्र हुए ॥२५६ २५७॥ ये तीनों अनंगति के अपने पद को प्राप्त कर सम पर यहाँ आकर ही मेरी कृपा से शाप-मुक्त हुए ॥२५८॥ आज मेरी आराधना से तुम्हारा भी शाप नष्ट हो गया। इसलिए अब तुम मुझमें अग्नि सम्बन्धी धारणा रखकर अपना शरीर त्याग करो ॥२५९॥

५१८ कथासरित्सागर

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५१८ कथासरित्सागर

अष्टजन्मोपभोग्यं च पातकं तत्सदुद्वह। इत्युक्त्वा धारणां दत्त्वा देवी तस्य तिरोदधे॥२६०॥ स मर्त्यदेहं पापं च दग्ध्वा धारणया तया। जीवद्वसश्चिराच्छापमुक्तो जज्ञे गणोत्तमः॥२६१॥ देवानामध्येहो येन पापेन क्लेश ईदृशः। परस्त्रीसङ्गमोत्थेन ह्यन्येषां तेन का गतिः॥२६२॥ सावञ्च तत्र सानङ्गप्रभा हरिवरे पुरे। राज्ञो हरिवरस्यान्तः पुराणां प्राप मुख्यताम्॥२६३॥ स च राजा तदेकाग्रमनास्तस्थौ दिवानिशम्। स्वमन्त्रिणि सुमन्त्राख्ये न्यस्तराज्यमहाभरः॥२६४॥ एकदा तस्य राज्ञश्च निकटं भव्यवंशजः। आगाल्लभधरो नाम नाट्याचार्योऽत्र नूतनः॥२६५॥ स दृष्टकौशलस्तेन भूभृता वाद्यनाट्ययोः। सम्भाव्यान्तःपुरस्त्रीणां नाट्याचार्यो व्यधीयत॥२६६॥ तेनानङ्गप्रभा नृत्ते प्रकर्षं प्रापिता तथा। नृत्यन्त्यपि सपत्नीनां स्पृहणीयाऽभवद्यथा॥२६७॥ सहवासाच्च तस्याथ नृत्तशिक्षारसावपि। नाट्याचार्यस्य सानङ्गप्रभाभूदनुरागिणी॥२६८॥ तस्याश्च रूपनृत्ताभ्यामाकृष्टः स शनैरहो। नाट्याचार्योऽपि कामेन किमप्यन्यदनृत्यत्॥२६९॥ विजने चैकदामङ्गप्रभा सा नाट्यवेश्मनि। प्रसाद्य नाट्याचार्यं समुपागाद्रतलालसा॥२७०॥ सुरतान्ते च सास्रमुत्सानुरागा जगाद तम्। 'त्वया विना कृता नाहं स्थातुं शक्ष्याम्यहं क्षणम्॥२७१॥ राजा हरिवरश्चैतद्बुद्ध्वा नैव क्षमिष्यते। तदह्य यत्र गच्छावो यत्र राजा न बुध्यते॥२७२॥ अस्ति हेमहयोष्ट्रादि धनं च तव भूभृता। नाट्यतुष्टेन यद्दत्तमस्ति चाभरणं मम॥२७३॥ तत्तत्र त्वरितं यामः स्थास्यामो यत्र निर्भयाः। एतत् स तद्वशो हृष्टो नाट्याचार्योऽन्वमन्यत॥२७४॥

नवम लम्बक ५१९

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नवम लम्बक ५१९ और, साठ जन्मों तक भोगने योग्य पाप को एक ही बार में भस्म कर दो। ऐसा कहकर और अग्नि की धारणा देकर देवी अन्तर्धान हो गई ॥२६०॥ उस जीवदत्त ने उस अग्नि की धारणा से अपने पापों और मानव-शरीर को दग्ध करके पाप से मुक्ति प्राप्त की और फिर वह गणों में श्रेष्ठ हो गया ॥२६१॥ परस्त्री के संगम से होनेवाले पाप के कारण जब देवताओं की भी इतनी दुर्दशा होती है, तब दूसरों की बात ही क्या है ? ॥२६२॥ उधर, इतने दिनों तक वह अनंगप्रभा राजा हरिवर के रनिवास में प्रधान रानी बन कर रही ॥२६३॥ वह राजा रात-दिन उसी की ओर आकृष्ट रहता था और उसने अपने राज्य का कार्य भार सुमन्त्र नाम के मन्त्री पर डाल दिया ॥२६४॥ एक बार उस राजा के पास मध्यदेश से लब्धवर नाम का नया नाट्याचार्य आया ॥२६५॥ राजा ने वाद्य-नाट्य में उसकी अपूर्व कुशलता देखकर उसे सम्मानित किया और रनिवास का नाट्याचार्य बना दिया ॥२६६॥ उसने अनंगप्रभा को नाट्य-शिक्षा में इतना प्रवीण कर दिया कि वह नाचती हुई भी अपनी सौतों के लिए ईर्ष्या का कारण बनती थी ॥२६७॥ उस नाट्याचार्य के सम्पर्क से और नृत्य की शिक्षा के रस से वह अनंगप्रभा नाट्याचार्य के प्रति प्रेम से आसक्त हो गई ॥२६८॥ नाट्याचार्य भी उसके सौन्दर्य और नृत्य से आकृष्ट होकर कामदेव द्वारा कुछ और ही प्रकार से नचाया जाने लगा ॥२६९॥ एकबार एकान्त में वह अनंगप्रभा रति की लालसा से नाट्यशाला में ही नाट्याचार्य द्वारा भ्रष्ट हो गई ॥२७ ॥ और, काम क्रीडा के अन्त में अत्यन्त अनुरागवती होकर उससे बोली—'मैं तुम्हारे बिना अब एक क्षण भी नहीं रह सकती। राजा हरिवर यह सब जानकर हमें कदापि क्षमा न करेगा। तो आओ कहीं दूसरे स्थान पर चलें। जहाँ राजा को हमारा पता न चले ॥२७१-२७२॥ तुम्हारे पास राजा द्वारा प्रदत्त सोना घोड़े ऊँट आदि धन है। मेरे नाट्य से प्रसन्न होकर राजा के दिये हुए आभरण मेरे पास हैं ॥२७३॥ तो चलो वहाँ चलें जहाँ निर्भय होकर रह सकें। उसकी ये बातें सुनकर प्रसन्न नाट्या चार्य ने उसे मान लिया ॥२७४॥

५२ कथासरित्सागर

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५२ कथासरित्सागर ततः पुरुषवेषं सा कृत्वाऽनङ्गप्रभा ययौ। नाट्याचार्यगृहं च्छेदया सह सुस्निग्धयैकया ॥२७५॥ ततस्तदैव तेनोष्ट्रपृष्ठार्पितधनद्विना। साकं सा तुरगारूढा प्रायान्नाट्योपदेशिना ॥२७६॥ साऽदौ विद्याधरीं लक्ष्मीं त्यक्त्वा राजश्रियं पुनः। शिश्रिये चारणत्वं सा धिक् स्त्रीणां चपलं मनः ॥२७७॥ गत्वा च नाट्याचार्येण तेनानङ्गप्रभा सह। दूरं सा नगरं प्राप वियोगपुरसञ्ज्ञकम् ॥२७८॥ तत्र तत्सहिता तस्थौ सुखं सा सोऽपि लब्धया। तया मन्मथराश्या स्वां सत्यां मेने नटाग्रणीः ॥२७९॥ तावच्च तां गतां क्वाऽपि मुद्यमानङ्गप्रभां प्रियाम्। राजा हरिवरः सोऽभूद्देहत्यागोन्मुखः शुचा ॥२८०॥ ततः सुमन्त्रो मन्त्री तमुवाचाश्वासयन् नृपम्। देव किं यन्न वेत्सि त्वं पर्यालोचय तत्स्वयम् ॥२८१॥ सङ्गविद्याधरं त्यक्त्वा पतिं त्वां दृष्टमेव या। उपाश्रिता कथं तस्याः स्थैर्यं स्यात् त्वय्यपि प्रभो ॥२८२॥ लघु कञ्चिद् गृहीत्वा सा गता सद्वस्तुनिःस्पृहा। तूर्णरत्नशलाकेव तृणवृष्ट्यनुरागतः ॥२८३॥ नाट्याचार्येण सा नूनं नीता स हि न दृश्यते। सङ्गीतगृहे प्रातस्तौ स्थिताविति च श्रुतम् ॥२८४॥ तदेवं वद कस्तस्यां जानतोऽपि वृथाग्रहः। विलासिनी हि सर्वस्य सन्ध्येव क्षणरागिणी १ ॥२८५॥ इत्युक्तो मन्त्रिणा सोऽथ विचारपतितो नृपः। अचिन्तयदहो सत्यमुक्तं मे सुधियामुना ॥२८६॥ पर्यन्तविरसा कष्टा प्रतिक्षणविवर्तिनी। भवस्थितिरिवानित्यसम्बन्धा हि विलासिनी ॥२८७॥ १ यथा सन्ध्या किञ्चित् कालमेव रक्ता भवति पुनः कृष्णा। तथा विलासिन्यपि किञ्चित् कालमेवानुरागवती भवतीति भावः।

नवम लम्बक ५२१

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नवम लम्बक ५२१ तदनन्तर, अनंगप्रभा पुरुष का वेष धारण कर एक अत्यन्त अंतरंग दासी के साथ नाट्याचार्य के घर पर गई ॥२७५॥ तब उसी समय नाट्याचार्य ने सारी धन-सम्पत्ति ऊँट की पीठ पर लाद दी और अनंग- प्रभा पुरुष के वेष में घोड़े पर सवार होकर नाट्य-शिक्षक के साथ निकल गई ॥२७६॥ उसने पहले विद्याधर की लक्ष्मी का परित्याग करके राजलक्ष्मी को स्वीकार किया उसके उपरान्त गान-नाचनेवाले चारण का आश्रय लिया। स्त्रियों के इस प्रकार चंचल मन को धिक्कार है! ॥२७७॥ अनंगप्रभा नाट्याचार्य के साथ जाकर क्रमशः विशाखपुर नामक नगर में पहुँची और वहाँ नाट्याचार्य के साथ सुख और स्वतन्त्रतापूर्वक रहने लगी ॥२७८॥ उस नाट्याचार्य ने उस सुन्दरी स्त्री को प्राप्त कर अपने गन्धर्वजन्म को सार्थक समझा ॥२७९॥ उधर राजा हरिवर अनंगप्रभा को कहीं भागी हुई जानकर उसके शोक से अपना शरीर त्याग करने को तैयार हुआ ॥२८०॥ तब सुमन्त्र नाम के मन्त्री ने राजा को धीरज बँधाते हुए कहा-'महाराज आप क्या नहीं जानते स्वयं ही विचार कीजिए ॥२८१॥ जो सहस्रविद्याधर को छोड़कर तुम्हें देखते ही तुम्हारे साथ भाग आई, वह भला आपके साथ स्थिर होकर कैसे रह सकती है ? अच्छी और उत्तम वस्तु से निस्पृह यह स्त्री किसी क्षुद्र पुरुष के साथ वैसे ही चली गई, जैसे बांस की सलाई बांस की ओर ही जाती है।।।२८२-२८३।। उसे अवश्य ही नाट्याचार्य भगा ले गया है क्योंकि वह यहाँ नहीं है। वे दोनों नाट्यशाला में प्रातःकाल उपस्थित थे ऐसा सुना गया है ॥२८४॥ अतः हे स्वामिन् इस प्रकार उसकी चंचलता को जानते हुए भी तुम्हें उसके प्रति इतना आग्रह क्यों है ? क्योंकि विलासिनी स्त्री सन्ध्या के समान क्षण-भर के लिए ही अनुरागिनी होती है ॥२८५॥ मन्त्री द्वारा इस प्रकार कहा गया राजा हरिवर, विचार में पड़ गया और सोचने लगा कि इस बुद्धिमान् मन्त्री ने ठीक ही कहा है ॥२८६॥ विलासिनी स्त्री संसार की स्थिति के समान अन्त में नीरस दुःखदायिनी प्रत्येक क्षण में बदलनेवाली और अनित्य सम्बन्धवाली होती है ॥२८७॥ ६६

५३२ कथासरित्सागर

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५३२ कथासरित्सागर पतित मज्जयन्तीषु दर्शितोत्कलिकासु च। प्राज्ञ पतरणगाधासु न स्त्रीषु च नदीषु च॥२८८॥ व्यसनपु निस्सङ्गा विभवेष्वप्यगर्विता । कार्येष्वकातरा ये च ते धीरास्तैर्जित जगत्॥२८९॥ इत्यालोच्य शुचं त्यक्त्वा मन्त्रिणो वचनेन सः। स्वदारेष्वेव सन्तोष राजा हरिवरो व्यधात्॥२९ ॥ साप्यनङ्गप्रभा तत्र वियोगपुरनामनि। नाट्याचार्यमुखा तावत् कञ्चित्काल स्थिता पुरे॥२९१॥ तावत्तत्रापि सजज्ञे नाट्याचार्यस्य दैवत्। यूना सुदर्शननाम्नेम द्यूतकारेण सङ्गतिः॥२९२॥ सेन द्यूतहताशेषधनोऽनङ्गप्रभाप्रत । कृत सुदर्शनेनात्र नाट्याचार्योऽचिरेण सः॥२९३॥ तद्रोषादिव निःश्रीक त्यक्त्वाऽनङ्गप्रभाञ्च तम्। सा सुदर्शनमेवैत प्रसन्नाऽशिश्रियत् पतिम्॥२९४॥ नष्टदारधन सोऽथ नाट्याचार्योऽप्रतिष्ठयः। वैराग्यात्तपसे बद्धजटो गङ्गातट ययौ॥२९५॥ सा स्वनङ्गप्रभा तेन द्यूतकारेण सङ्गता। सुदर्शनेन तत्रैव तस्थौ नवनवप्रिया॥२९६॥ एकदा च पतिस्तस्यास्तस्करैः स सुदर्शनः। मुषिताशेषसर्वस्व प्रविद्य रजनी कृतः॥२९७॥ सतस्तां द्रविणाभावादुःखितामनुतापिनीम्। दृष्ट्वा सुदर्शनोऽनङ्गप्रभामिदमुवाच सः॥२९८॥ हिरण्यगुप्तनामा यः सुहृन्मेऽस्ति महाधनः। तत्सकाशादृण किञ्चिदेहाद्य मृगयामहे॥२९९॥ इत्युक्त्वा दैवहतधी स गत्वैव तया सह। ऋण हिरण्यगुप्तं त वणिङ्मुख्यमयाचत॥३ ०॥ स धानङ्गप्रभां दृष्ट्वा वणिक साऽपि च स तदा। अन्योन्याभिलाषी तौ बभूवतुरुभावपि॥३ ०१॥ उवाच चैव स वणिक त सुदर्शनमावरात्। प्रातर्दास्ये हिरण्य वामद्यहैव सु मुच्यताम्॥३ ०२॥

नवम लम्बक ५२३

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नवम लम्बक ५२३ गिरे हुए को डुबाती हुई और उत्कण्ठा को बढ़ाती हुई अथाह नदियों और स्त्रियों के चक्कर में बुद्धिमान् फँस जाते हैं और उनमें डूब जाते हैं॥२८८॥ जो विपत्ति में व्याकुल नहीं होते सम्पत्ति में घमण्ड नहीं करते और कार्य के समय भागते नहीं वे ही धीर पुरुष हैं। उन्होंने संसार को जीत लिया है॥२८९॥ राजा हरिवर ने ऐसा सोचकर और मन्त्री के कथन से शोच को त्याग कर अपनी अन्य स्त्रियों से ही सन्तोष किया ॥२९०॥ वह अनंगप्रभा भी उस वियोगपुर नगर में नाट्यवाचार्य के साथ कुछ समय तक रही॥२९१॥ उस नगर में दैवयोग से उस नाट्यवाचार्य की एक युवा जुआरी सुदर्शन से मित्रता हो गई ॥२९२॥ उस जुआरी सुदर्शन ने शीघ्र ही नाट्यवाचार्य का समस्त धन नष्ट कराकर उसे अनंगप्रभा के सामने दरिद्र बना दिया ॥२९३॥ इस क्षोभ से अनंगप्रभा ने उस दरिद्र नाट्यवाचार्य को त्याग कर सुदर्शन को ही अपना पति बना लिया ॥२९४॥ स्त्री और धन के नाश से निराश होकर नाट्यवाचार्य वैराग्य के कारण तपस्या करने के लिए जग छोड़कर गंगा के तट पर जा बैठा ॥२९५॥ नये-नये पुरुषों को चाहनेवाली वह अनंगप्रभा अब उस जुआरी सुदर्शन के साथ रहने लगी ॥२९६॥ एक बार रात्रि के समय चोरों ने उसके घर में घुसकर अनंगप्रभा के नये पति जुआरी सुदर्शन का सर्वस्व चुराकर उसे कंगाल बना दिया ॥२९७॥ उस धन के अपहरण से दुःख में डूबी हुई और पश्चात्ताप करती हुई अनंगप्रभा को देखकर सुदर्शन ने उससे कहा—॥२९८॥ 'हिरण्यगुप्त नाम का एक धनवान् मेरा मित्र है। चलो उससे कुछ धन उधार लें' ॥२९९॥ भाग्य से नष्टबुद्धि सुदर्शन ऐसा कहकर उसके साथ हिरण्यगुप्त के समीप गया और उससे कुछ धन माँगा ॥३००॥ वह बनिया और वह अनंगप्रभा दोनों परस्पर आँखें मिलने पर एक दूसरे के प्रति आसक्त हो गये ॥३०१॥ तब उस वैश्य ने सुदर्शन से आदर के साथ कहा—'प्रातःकाल तुम दोनों को धन दूँगा। आज यहीं रहो और यहाँ भोजन करो' ॥३०२॥