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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

९९- नहुषका ऋषियोंपर अत्याचार तथा उसके प्रतीकारके लिये महर्षि भृगु और अगस्त्यकी बातचीत १००- नहुषका पतन, शतक्रतुका इन्द्रपदपर पुनः अभिषेक तथा दीपदानकी महिमा १०१- ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति १०२- भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्र-रूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख १०३- ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन-व्रतकी विशेष महिमा १०४- आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण १०५- बड़े और छोटे भाईके पारस्परिक बर्ताव तथा माता-पिता, आचार्य आदि गुरुजनोंके गौरवका वर्णन १०६- मास, पक्ष एवं तिथिसम्बन्धी विभिन्न व्रतोपवासके फलका वर्णन १०७- दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन १०८- मानस तथा पार्थिव तीर्थकी महत्ता १०९- प्रत्येक मासकी द्वादशी तिथिको उपवास और भगवान् विष्णुकी पूजा करनेका विशेष माहात्म्य ११०- रूप-सौन्दर्य और लोकप्रियताकी प्राप्तिके लिये मार्गशीर्षमासमें चन्द्र-व्रत करनेका प्रतिपादन १११- बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन ११२- पापसे छूटनेके उपाय तथा अन्न-दानकी विशेष महिमा ११३- बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको अहिंसा एवं धर्मकी महिमा बताकर स्वर्गलोकको प्रस्थान ११४- हिंसा और मांसभक्षणकी घोर निन्दा ११५- मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन ११६- मांस न खानेसे लाभ और अहिंसाधर्मकी प्रशंसा ११७- शुभ कर्मसे एक कीड़ेको पूर्व-जन्मकी स्मृति होना और कीट-योनिमें भी मृत्युका भय एवं सुखकी अनुभूति बताकर कीड़ेका अपने कल्याणका उपाय पूछना

११८- कीड़ेका क्रमशः क्षत्रिययोनिमें जन्म लेकर व्यासजीका दर्शन करना और व्यासजीका उसे ब्राह्मण होने तथा स्वर्गसुख और अक्षय सुखकी प्राप्ति होनेका वरदान देना ११९- कीड़ेका ब्राह्मणयोनिमें जन्म लेकर, ब्रह्मलोकमें जाकर सनातन ब्रह्मको प्राप्त करना १२०- व्यास और मैत्रेयका संवाद—दानकी प्रशंसा और कर्मका रहस्य १२१- व्यास-मैत्रेय-संवाद—विद्वान् एवं सदाचारी ब्राह्मणको अन्नदानकी प्रशंसा १२२- व्यास-मैत्रेय-संवाद—तपकी प्रशंसा तथा गृहस्थके उत्तम कर्तव्यका निर्देश १२३- शाण्डिली और सुमनाका संवाद—पतिव्रता स्त्रियोंके कर्तव्यका वर्णन १२४- नारदका पुण्डरीकको भगवान् नारायणकी आराधनाका उपदेश तथा उन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति, सामगुणकी प्रशंसा, ब्राह्मणका राक्षसके सफेद और दुर्बल होनेका कारण बताना १२५- श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद १२६- विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रह्माजीके द्वारा धर्मके गूढ़ रहस्यका वर्णन १२७- अग्नि, लक्ष्मी, अंगिरा, गार्ग्य, धौम्य तथा जमदग्निके द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन १२८- वायुके द्वारा धर्माधर्मके रहस्यका वर्णन १२९- लोमशद्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन १३०- अरुन्धती, धर्मराज और चित्रगुप्तद्वारा धर्मसम्बन्धी रहस्यका वर्णन १३१- प्रमथगणोंके द्वारा धर्माधर्मसम्बन्धी रहस्यका कथन १३२- दिग्गजोंका धर्मसम्बन्धी रहस्य एवं प्रभाव १३३- महादेवजीका धर्मसम्बन्धी रहस्य १३४- स्कन्ददेवका धर्मसम्बन्धी रहस्य तथा भगवान् विष्णु और भीष्मजीके द्वारा माहात्म्यका वर्णन १३५- जिनका अन्न ग्रहण करने योग्य है और जिनका ग्रहण करने योग्य नहीं है, उन मनुष्योंका वर्णन १३६- दान लेने और अनुचित भोजन करनेका प्रायश्चित्त १३७- दानसे स्वर्गलोकमें जानेवाले राजाओंका वर्णन १३८- पाँच प्रकारके दानोंका वर्णन १३९- तपस्वी श्रीकृष्णके पास ऋषियोंका आना, उनका प्रभाव देखना और उनसे वार्तालाप करना

१४०- नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुनः प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना १४१- शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण १४२- उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा १४३- ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन १४४- बन्धन-मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन १४५- स्वर्ग और नरक तथा उत्तम और अधम कुलमें जन्मकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोंका वर्णन १. राजधर्मका वर्णन २. योद्धाओंके धर्मका वर्णन तथा रणयज्ञमें प्राणोत्सर्गकी महिमा ३. संक्षेपसे राजधर्मका वर्णन ४. अहिंसाकी और इन्द्रिय-संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता ५. त्रिवर्गका निरूपण तथा कल्याणकारी आचार-व्यवहारका वर्णन ६. विविध प्रकारके कर्मफलोंका वर्णन ७. अन्धत्व और पंगुत्व आदि नाना प्रकारके दोषों और रोगोंके कारणभूत दुष्कर्मोंका वर्णन ८. उमा-महेश्वर-संवादमें कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयोंका विवेचन ९. प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन १०. यमलोक तथा वहाँके मार्गोंका वर्णन, पापियोंकी नरकयातनाओं तथा कर्मानुसार विभिन्न योनियोंमें उनके जन्मका उल्लेख ११. शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांस-भक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्य पालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देशकाल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण

१२- श्राद्ध विधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन १३- प्राणियोंकी शुभ और अशुभ गतिका निश्चय करानेवाले लक्षणोंका वर्णन, मृत्युके दो भेद और यत्नसाध्य-मृत्युके चार भेदोंका कथन, कर्तव्य पालनपूर्वक शरीर त्यागका महान् फल और काम, क्रोध आदिद्वारा देह त्याग करनेसे नरककी प्राप्ति १४- मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्ष साधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता १५- सांख्यज्ञानका प्रतिपादन करते हुए अव्यक्तादि चौबीस तत्त्वोंकी उत्पत्ति आदिका वर्णन १६- योगधर्मका प्रतिपादनपूर्वक उसके फलका वर्णन १७- पाशुपत योगका वर्णन तथा शिवलिंग-पूजनका माहात्म्य १४६- पार्वतीजीके द्वारा स्त्री-धर्मका वर्णन १४७- वंशपरम्पराका कथन और भगवान् श्रीकृष्णके माहात्म्यका वर्णन १४८- भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन और भीष्मजीका युधिष्ठिरको राज्य करनेके लिये आदेश देना १४९- श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् १५०- जपनेयोग्य मन्त्र और सबेरे-शाम कीर्तन करनेयोग्य देवता, ऋषियों और राजाओंके मंगलमय नामोंका कीर्तन-माहात्म्य तथा गायत्री-जपका फल १५१- ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन १५२- कार्तवीर्य अर्जुनको दत्तात्रेयजीसे चार वरदान प्राप्त होनेका एवं उनमें अभिमानकी उत्पत्तिका वर्णन तथा ब्राह्मणोंकी महिमाके विषयमें कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवताके संवादका उल्लेख १५३- वायुद्वारा उदाहरणसहित ब्राह्मणोंकी महत्ताका वर्णन १५४- ब्राह्मणशिरोमणि उतथ्यके प्रभावका वर्णन १५५- ब्रह्मर्षि अगस्त्य और वसिष्ठके प्रभावका वर्णन १५६- अत्रि और च्यवन ऋषिके प्रभावका वर्णन १५७- कप नामक दानवोंके द्वारा स्वर्गलोकपर अधिकार जमा लेनेपर ब्राह्मणोंका कपोंको भस्म कर देना, वायुदेव और कार्तवीर्य अर्जुनके संवादका उपसंहार १५८- भीष्मजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन १५९- श्रीकृष्णका प्रद्युम्नको ब्राह्मणोंकी महिमा बताते हुए दुर्वासाके चरित्रका वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिरको सुनाना

(भीष्मस्वर्गारोहणपर्व)

१६०- श्रीकृष्णद्वारा भगवान् शंकरके माहात्म्यका वर्णन १६१- भगवान् शंकरके माहात्म्यका वर्णन १६२- धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण १६३- युधिष्ठिरका विद्या, बल और बुद्धिकी अपेक्षा भाग्यकी प्रधानता बताना और भीष्मजीद्वारा उसका उत्तर १६४- भीष्मका शुभाशुभ कर्मोंको ही सुख-दुःखकी प्राप्तिमें कारण बताते हुए धर्मके अनुष्ठानपर जोर देना १६५- नित्य स्मरणीय देवता, नदी, पर्वत, ऋषि और राजाओंके नाम-कीर्तनका माहात्म्य १६६- भीष्मकी अनुमति पाकर युधिष्ठिरका सपरिवार हस्तिनापुरको प्रस्थान

(भीष्मस्वर्गारोहणपर्व)

१६७- भीष्मके अन्त्येष्टि-संस्कारकी सामग्री लेकर युधिष्ठिर आदिका उनके पास जाना और भीष्मका श्रीकृष्ण आदिसे देह-त्यागकी अनुमति लेते हुए धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरको कर्तव्यका उपदेश देना १६८- भीष्मजीका प्राणत्याग, धृतराष्ट्र आदिके द्वारा उनका दाह-संस्कार, कौरवोंका गंगाके जलसे भीष्मको जलांजलि देना, गंगाजीका प्रकट होकर पुत्रके लिये शोक करना और श्रीकृष्णका उन्हें समझाना


आश्वमेधिकपर्व

(अश्वमेधपर्व)

१- युधिष्ठिरका शोकमग्न होकर गिरना और धृतराष्ट्रका उन्हें समझाना २- श्रीकृष्ण और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना ३- व्यासजीका युधिष्ठिरको अश्वमेध यज्ञके लिये धनकी प्राप्तिका उपाय बताते हुए संवर्त और मरुत्तका प्रसंग उपस्थित करना ४- मरुत्तके पूर्वजोंका परिचय देते हुए व्यासजीके द्वारा उनके गुण, प्रभाव एवं यज्ञका दिग्दर्शन ५- इन्द्रकी प्रेरणासे बृहस्पतिजीका मनुष्यको यज्ञ न करानेकी प्रतिज्ञा करना

(अनुगीतापर्व)

६- नारदजीकी आज्ञासे मरुत्तका उनकी बतायी हुई युक्ति के अनुसार संवर्तसे भेंट करना ७- संवर्त और मरुत्तकी बातचीत, मरुत्तके विशेष आग्रहपर संवर्तका यज्ञ करानेकी स्वीकृति देना ८- संवर्तका मरुत्तको सुवर्णकी प्राप्तिके लिये महादेवजीकी नाममयी स्तुतिका उपदेश और धनकी प्राप्ति तथा मरुत्तकी सम्पत्तिसे बृहस्पतिका चिन्तित होना ९- बृहस्पतिका इन्द्रसे अपनी चिन्ताका कारण बताना, इन्द्रकी आज्ञासे अग्निदेवका मरुत्तके पास उनका संदेश लेकर जाना और संवर्तके भयसे पुनः लौटकर इन्द्रसे ब्रह्मबलकी श्रेष्ठता बताना १०- इन्द्रका गन्धर्वराजको भेजकर मरुत्तको भय दिखाना और संवर्तका मन्त्र-बलसे इन्द्रसहित सब देवताओंको बुलाकर मरुत्तका यज्ञ पूर्ण करना ११- श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको इन्द्रद्वारा शरीरस्थ वृत्रासुरका संहार करनेका इतिहास सुनाकर समझाना १२- भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको मनपर विजय करनेके लिये आदेश १३- श्रीकृष्णद्वारा ममताके त्यागका महत्त्व, काम-गीताका उल्लेख और युधिष्ठिरको यज्ञके लिये प्रेरणा करना १४- ऋषियोंका अन्तर्धान होना, भीष्म आदिका श्राद्ध करके युधिष्ठिर आदिका हस्तिनापुरमें जाना तथा युधिष्ठिरके धर्म-राज्यका वर्णन १५- भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनसे द्वारका जानेका प्रस्ताव करना

(अनुगीतापर्व)

१६- अर्जुनका श्रीकृष्णसे गीताका विषय पूछना और श्रीकृष्णका अर्जुनसे सिद्ध, महर्षि एवं कश्यपका संवाद सुनाना १७- कश्यपके प्रश्नोंके उत्तरमें सिद्ध महात्माद्वारा जीवकी विविध गतियोंका वर्णन १८- जीवके गर्भ-प्रवेश, आचार-धर्म, कर्म-फलकी अनिवार्यता तथा संसारसे तरनेके उपायका वर्णन १९- गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन २०- ब्राह्मणगीता—एक ब्राह्मणका अपनी पत्नीसे ज्ञानयज्ञका उपदेश करना २१- दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन २२- मन-बुद्धि और इन्द्रियरूप सप्त होताओंका, यज्ञ तथा मन-इन्द्रिय-संवादका वर्णन २३- प्राण, अपान आदिका संवाद और ब्रह्माजीका सबकी श्रेष्ठता बतलाना २४- देवर्षि नारद और देवमतका संवाद एवं उदानके उत्कृष्ट रूपका वर्णन

२५- चातुर्होम यज्ञका वर्णन २६- अन्तर्यामीकी प्रधानता २७- अध्यात्मविषयक महान् वनका वर्णन २८- ज्ञानी पुरुषकी स्थिति तथा अध्वर्यु और यतिका संवाद २९- परशुरामजीके द्वारा क्षत्रिय-कुलका संहार ३०- अलर्कके ध्यान-योगका उदाहरण देकर पितामहोंका परशुरामजीको समझाना और परशुरामजीका तपस्याके द्वारा सिद्धि प्राप्त करना ३१- राजा अम्बरीषकी गायी हुई आध्यात्मिक स्वराज्यविषयक गाथा ३२- ब्राह्मण-रूपधारी धर्म और जनकका ममत्वत्याग विषयक संवाद ३३- ब्राह्मणका पत्नीके प्रति अपने ज्ञाननिष्ठ स्वरूपका परिचय देना ३४- भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा ब्राह्मण, ब्राह्मणी और क्षेत्रज्ञका रहस्य बतलाते हुए ब्राह्मण-गीताका उपसंहार ३५- श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष-धर्मका वर्णन—गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर ३६- ब्रह्माजीके द्वारा तमोगुणका, उसके कार्यका और फलका वर्णन ३७- रजोगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल ३८- सत्त्वगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल ३९- सत्त्व आदि गुणोंका और प्रकृतिके नामोंका वर्णन ४०- महत्तत्त्वके नाम और परमात्मतत्त्वको जाननेकी महिमा ४१- अहंकारकी उत्पत्ति और उसके स्वरूपका वर्णन ४२- अहंकारसे पंच महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश ४३- चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता ४४- सब पदार्थोंके आदि-अन्तका और ज्ञानकी नित्यताका वर्णन ४५- देहरूपी कालचक्रका तथा गृहस्थ और ब्राह्मणके धर्मका कथन ४६- ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासीके धर्मका वर्णन ४७- मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान-खड्गसे उसे काटनेका वर्णन ४८- आत्मा और परमात्माके स्वरूपका विवेचन ४९- धर्मका निर्णय जाननेके लिये ऋषियोंका प्रश्न ५०- सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान्‌की प्रशंसा, पंचभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन

५१- तपस्याका प्रभाव, आत्माका स्वरूप और उसके ज्ञानकी महिमा तथा अनुगीताका उपसंहार ५२- श्रीकृष्णका अर्जुनके साथ हस्तिनापुर जाना और वहाँ सबसे मिलकर युधिष्ठिरकी आज्ञा ले सुभद्राके साथ द्वारकाको प्रस्थान करना ५३- मार्गमें श्रीकृष्णसे कौरवोंके विनाशकी बात सुनकर उत्तंकमुनिका कुपित होना और श्रीकृष्णका उन्हें शान्त करना ५४- भगवान् श्रीकृष्णका उत्तंकसे अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करना तथा दुर्योधनके अपराधको कौरवोंके विनाशका कारण बतलाना ५५- श्रीकृष्णका उत्तंक मुनिको विश्वरूपका दर्शन कराना और मरुदेशमें जल प्राप्त होनेका वरदान देना ५६- उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना ५७- उत्तंकका सौदाससे उनकी रानीके कुण्डल माँगना और सौदासके कहनेसे रानी मदयन्तीके पास जाना ५८- कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना ५९- भगवान् श्रीकृष्णका द्वारकामें जाकर रैवतक पर्वतपर महोत्सवमें सम्मिलित होना और सबसे मिलना ६०- वसुदेवजीके पूछनेपर श्रीकृष्णका उन्हें महाभारत-युद्धका वृत्तान्त संक्षेपसे सुनाना ६१- श्रीकृष्णका सुभद्राके कहनेसे वसुदेवजीको अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनाना ६२- वसुदेव आदि यादवोंका अभिमन्युके निमित्त श्राद्ध करना तथा व्यासजीका उत्तरा और अर्जुनको समझाकर युधिष्ठिरको अश्वमेधयज्ञ करनेकी आज्ञा देना ६३- युधिष्ठिरका अपने भाइयोंके साथ परामर्श करके सबको साथ ले धन ले आनेके लिये प्रस्थान करना ६४- पाण्डवोंका हिमालयपर पहुँचकर वहाँ पड़ाव डालना और रातमें उपवासपूर्वक निवास करना ६५- ब्राह्मणोंकी आज्ञासे भगवान् शिव और उनके पार्षद आदिकी पूजा करके युधिष्ठिरका उस धनराशिको खुदवाकर अपने साथ ले जाना ६६- श्रीकृष्णका हस्तिनापुरमें आगमन और उत्तराके मृत बालकको जिलानेके लिये कुन्तीकी उनसे प्रार्थना ६७- परीक्षित्को जिलानेके लिये सुभद्राकी श्रीकृष्णसे प्रार्थना ६८- श्रीकृष्णका प्रसूतिकागृहमें प्रवेश, उत्तराका विलाप और अपने पुत्रको जीवित करनेके लिये प्रार्थना

६९- उत्तराका विलाप और भगवान् श्रीकृष्णका उसके मृत बालकको जीवन-दान देना ७०- श्रीकृष्णद्वारा राजा परीक्षित्का नामकरण तथा पाण्डवोंका हस्तिनापुरके समीप आगमन ७१- भगवान् श्रीकृष्ण और उनके साथियोंद्वारा पाण्डवोंका स्वागत, पाण्डवोंका नगरमें आकर सबसे मिलना और व्यासजी तथा श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको यज्ञके लिये आज्ञा देना ७२- व्यासजीकी आज्ञासे अश्वकी रक्षाके लिये अर्जुनकी, राज्य और नगरकी रक्षाके लिये भीमसेन और नकुलकी तथा कुटुम्ब-पालनके लिये सहदेवकी नियुक्ति ७३- सेनासहित अर्जुनके द्वारा अश्वका अनुसरण ७४- अर्जुनके द्वारा त्रिगर्तोंकी पराजय ७५- अर्जुनका प्राग्ज्योतिषपुरके राजा वज्रदत्तके साथ युद्ध ७६- अर्जुनके द्वारा वज्रदत्तकी पराजय ७७- अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध ७८- अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध और दुःशलाके अनुरोधसे उसकी समाप्ति ७९- अर्जुन और बभ्रुवाहनका युद्ध एवं अर्जुनकी मृत्यु ८०- चित्रांगदाका विलाप, मूर्च्छासे जगनेपर बभ्रुवाहनका शोकोद्गार और उलूपीके प्रयत्नसे संजीवनीमणिके द्वारा अर्जुनका पुनः जीवित होना ८१- उलूपीका अर्जुनके पूछनेपर अपने आगमनका कारण एवं अर्जुनकी पराजयका रहस्य बताना, पुत्र और पत्नीसे विदा लेकर पार्थका पुनः अश्वके पीछे जाना ८२- मगधराज मेघसन्धिकी पराजय ८३- दक्षिण और पश्चिम समुद्रके तटवर्ती देशोंमें होते हुए अश्वका द्वारका, पंचनद एवं गान्धार देशमें प्रवेश ८४- शकुनिपुत्रकी पराजय ८५- यज्ञभूमिकी तैयारी, नाना देशोंसे आये हुए राजाओंका यज्ञकी सजावट और आयोजन देखना ८६- राजा युधिष्ठिरका भीमसेनको राजाओंकी पूजा करनेका आदेश और श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे अर्जुनका संदेश कहना ८७- अर्जुनके विषयमें श्रीकृष्ण और युधिष्ठिरकी बातचीत, अर्जुनका हस्तिनापुरमें जाना तथा उलूपी और चित्रांगदाके साथ बभ्रुवाहनका आगमन ८८- उलूपी और चित्रांगदाके सहित बभ्रुवाहनका रत्न-आभूषण आदिसे सत्कार तथा अश्वमेधयज्ञका आरम्भ ८९- युधिष्ठिरका ब्राह्मणोंको दक्षिणा देना और राजाओंको भेंट देकर विदा करना

(वैष्णवधर्मपर्व)

९०- युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छ-वृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना ९१- हिंसामिश्रित यज्ञ और धर्मकी निन्दा ९२- महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा

(वैष्णवधर्मपर्व)

१- युधिष्ठिरका वैष्णवधर्मविषयक प्रश्न और भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन २- चारों वर्णोंके कर्म और उनके फलोंका वर्णन तथा धर्मकी वृद्धि और पापके क्षय होनेका उपाय ३- व्यर्थ जन्म, दान और जीवनका वर्णन, सात्त्विक दानोंका लक्षण, दानका योग्य पात्र और ब्राह्मणकी महिमा ४- बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन ५- यमलोकके मार्गका कष्ट और उससे बचनेके उपाय ६- जल-दान, अन्न-दान और अतिथि-सत्कारका माहात्म्य ७- भूमिदान, तिलदान और उत्तम ब्राह्मणकी महिमा ८- अनेक प्रकारके दानोंकी महिमा ९- पंचमहायज्ञ, विधिवत् स्नान और उसके अंगभूत कर्म, भगवान्‌के प्रिय पुष्प तथा भगवद्भक्तोंका वर्णन १०- कपिला गौका तथा उसके दानका माहात्म्य और कपिला गौके दस भेद ११- कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन १२- ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है, उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन १३- धर्म और शौचके लक्षण, संन्यासी और अतिथिके सत्कारके उपदेश, शिष्टाचार, दानपात्र ब्राह्मण तथा अन्नदानकी प्रशंसा १४- भोजनकी विधि, गौओंको घास डालनेका विधान और तिलका माहात्म्य तथा ब्राह्मणके लिये तिल और गन्ना पेरनेका निषेध १५- आपद्धर्म, श्रेष्ठ और निन्द्य ब्राह्मण, श्राद्धका उत्तमकाल और मानव-धर्म-सारका वर्णन १६- अग्निके स्वरूपमें अग्निहोत्रकी विधि तथा उसके माहात्म्यका वर्णन

आश्रमवासिकपर्व

१७- चान्द्रायणव्रतकी विधि, प्रायश्चित्तरूपमें उसके करनेका विधान तथा महिमाका वर्णन १८- सर्वहितकारी धर्मका वर्णन, द्वादशीव्रतका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके द्वारा भगवान्‌की स्तुति १९- विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त २०- उत्तम और अधम ब्राह्मणोंके लक्षण, भक्त, गौ और पीपलकी महिमा २१- भगवान्‌के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन


आश्रमवासिकपर्व

(आश्रमवासपर्व)

१- भाइयोंसहित युधिष्ठिर तथा कुन्ती आदि देवियोंके द्वारा धृतराष्ट्र और गान्धारीकी सेवा २- पाण्डवोंका धृतराष्ट्र और गान्धारीके अनुकूल बर्ताव ३- राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिरसे और कुन्ती आदिका दुःखी होना ४- व्यासजीके समझानेसे युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको वनमें जानेके लिये अनुमति देना ५- धृतराष्ट्रके द्वारा युधिष्ठिरको राजनीतिका उपदेश ६- धृतराष्ट्रद्वारा राजनीतिका उपदेश ७- युधिष्ठिरको धृतराष्ट्रके द्वारा राजनीतिका उपदेश ८- धृतराष्ट्रका कुरुजांगल देशकी प्रजासे वनमें जानेके लिये आज्ञा माँगना ९- प्रजाजनोंसे धृतराष्ट्रकी क्षमा-प्रार्थना १०- प्रजाकी ओरसे साम्बनामक ब्राह्मणका धृतराष्ट्रको सान्त्वनापूर्ण उत्तर देना ११- धृतराष्ट्रका विदुरके द्वारा युधिष्ठिरसे श्राद्धके लिये धन माँगना, अर्जुनकी सहमति और भीमसेनका विरोध १२- अर्जुनका भीमको समझाना और युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको यथेष्ट धन देनेकी स्वीकृति प्रदान करना १३- विदुरका धृतराष्ट्रको युधिष्ठिरका उदारतापूर्ण उत्तर सुनाना १४- राजा धृतराष्ट्रके द्वारा मृत व्यक्तियोंके लिये श्राद्ध एवं विशाल दान-यज्ञका अनुष्ठान १५- गान्धारीसहित धृतराष्ट्रका वनको प्रस्थान

(पुत्रदर्शनपर्व)

१६- धृतराष्ट्रका पुरवासियोंको लौटाना और पाण्डवोंके अनुरोध करनेपर भी कुन्तीका वनमें जानेसे न रुकना १७- कुन्तीका पाण्डवोंको उनके अनुरोधका उत्तर १८- पाण्डवोंका स्त्रियोंसहित निराश लौटना, कुन्तीसहित गान्धारी और धृतराष्ट्र आदिका मार्गमें गंगा-तटपर निवास करना १९- धृतराष्ट्र आदिका गंगातटपर निवास करके वहाँसे कुरुक्षेत्रमें जाना और शतयूपके आश्रमपर निवास करना २०- नारदजीका प्राचीन राजर्षियोंकी तपः सिद्धिका दृष्टान्त देकर धृतराष्ट्रकी तपस्याविषयक श्रद्धाको बढ़ाना तथा शतयूपके पूछनेपर धृतराष्ट्रको मिलनेवाली गतिका भी वर्णन करना २१- धृतराष्ट्र आदिके लिये पाण्डवों तथा पुरवासियोंकी चिन्ता २२- माताके लिये पाण्डवोंकी चिन्ता, युधिष्ठिरकी वनमें जानेकी इच्छा, सहदेव और द्रौपदीका साथ जानेका उत्साह तथा रनिवास और सेनासहित युधिष्ठिरका वनको प्रस्थान २३- सेनासहित पाण्डवोंकी यात्रा और उनका कुरुक्षेत्रमें पहुँचना २४- पाण्डवों तथा पुरवासियोंका कुन्ती, गान्धारी और धृतराष्ट्रके दर्शन करना २५- संजयका ऋषियोंसे पाण्डवों, उनकी पत्नियों तथा अन्यान्य स्त्रियोंका परिचय देना २६- धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा विदुरजीका युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश २७- युधिष्ठिर आदिका ऋषियोंके आश्रम देखना, कलश आदि बाँटना और धृतराष्ट्रके पास आकर बैठना, उन सबके पास अन्यान्य ऋषियोंसहित महर्षि व्यासका आगमन २८- महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना

(पुत्रदर्शनपर्व)

२९- धृतराष्ट्रका मृत बान्धवोंके शोकसे दुःखी होना तथा गान्धारी और कुन्तीका व्यासजीसे अपने मरे हुए पुत्रोंके दर्शन करनेका अनुरोध ३०- कुन्तीका कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्त्वना देना ३१- व्यासजीके द्वारा धृतराष्ट्र आदिके पूर्वजन्मका परिचय तथा उनके कहनेसे सब लोगोंका गंगा-तटपर जाना ३२- व्यासजीके प्रभावसे कुरुक्षेत्रके युद्धमें मारे गये कौरव-पाण्डववीरोंका गंगाजीके जलसे प्रकट होना

(नारदागमनपर्व)

३३- परलोकसे आये हुए व्यक्तियोंका परस्पर राग-द्वेषसे रहित होकर मिलना और रात बीतनेपर अदृश्य हो जाना, व्यासजीकी आज्ञासे विधवा क्षत्राणियोंका गंगाजीमें गोता लगाकर अपने-अपने पतिके लोकको प्राप्त करना तथा इस पर्वके श्रवणकी महिमा ३४- मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुनः दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान ३५- व्यासजीकी कृपासे जनमेजयको अपने पिताका दर्शन प्राप्त होना ३६- व्यासजीकी आज्ञासे धृतराष्ट्र आदिका पाण्डवोंको विदा करना और पाण्डवोंका सदलबल हस्तिनापुरमें आना

(नारदागमनपर्व)

३७- नारदजीसे धृतराष्ट्र आदिके दावानलमें दग्ध हो जानेका हाल जानकर युधिष्ठिर आदिका शोक करना ३८- नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन ३९- राजा युधिष्ठिरद्वारा धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती—इन तीनोंकी हड्डियोंको गंगामें प्रवाहित कराना तथा श्राद्धकर्म करना


मौसलपर्व

१- युधिष्ठिरका अपशकुन देखना, यादवोंके विनाशका समाचार सुनना, द्वारकामें ऋषियोंके शापवश साम्बके पेटसे मूसलकी उत्पत्ति तथा मदिराके निषेधकी कठोर आज्ञा २- द्वारकामें भयंकर उत्पात देखकर भगवान् श्रीकृष्णका यदुवंशियोंको तीर्थयात्राके लिये आदेश देना ३- कृतवर्मा आदि समस्त यादवोंका परस्पर संहार ४- दारुकका अर्जुनको सूचना देनेके लिये हस्तिनापुर जाना, बभ्रुका देहावसान एवं बलराम और श्रीकृष्णका परमधाम-गमन ५- अर्जुनका द्वारकामें आना और द्वारका तथा श्रीकृष्ण-पत्नियोंकी दशा देखकर दुःखी होना ६- द्वारकामें अर्जुन और वसुदेवजीकी बातचीत

महाप्रस्थानिकपर्व

७- वसुदेवजी तथा मौसलयुद्धमें मरे हुए यादवोंका अन्त्येष्टि-संस्कार करके अर्जुनका द्वारकावासी स्त्री-पुरुषोंको अपने साथ ले जाना, समुद्रका द्वारकाको डुबो देना और मार्गमें अर्जुनपर डाकुओंका आक्रमण, अवशिष्ट यादवोंको अपनी राजधानीमें बसा देना ८- अर्जुन और व्यासजीकी बातचीत


महाप्रस्थानिकपर्व

१- वृष्णिवंशियोंका श्राद्ध करके प्रजाजनोंकी अनुमति ले द्रौपदीसहित पाण्डवोंका महाप्रस्थान २- मार्गमें द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन, और भीमसेनका गिरना तथा युधिष्ठिरद्वारा प्रत्येकके गिरनेका कारण बताया जाना ३- युधिष्ठिर इन्द्र और धर्म आदिके साथ वार्तालाप, युधिष्ठिरका अपने धर्ममें दृढ़ रहना तथा सदेह स्वर्गमें जाना


स्वर्गारोहणपर्व

१- स्वर्गमें नारद और युधिष्ठिरकी बातचीत २- देवदूतका युधिष्ठिरको नरकका दर्शन कराना तथा भाइयोंका करुणक्रन्दन सुनकर उनका वहीं रहनेका निश्चय करना ३- इन्द्र और धर्मका युधिष्ठिरको सान्त्वना देना तथा युधिष्ठिरका शरीर त्यागकर दिव्य लोकको जाना ४- युधिष्ठिरका दिव्यलोकमें श्रीकृष्ण, अर्जुन आदिका दर्शन करना ५- भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य १- महाभारत श्रवणविधि २- महाभारत-माहात्म्य

चित्र-सूची

चित्र-सूची

(सादा)

क्रमसंख्याविषय

१- [धर्मात्मा शुक और इन्द्रकी बातचीत](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/80) २- [महर्षि वसिष्ठका ब्रह्माजीके साथ प्रश्नोत्तर](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/81) ३- [भगवान् श्रीकृष्ण एवं विभिन्न महर्षियोंका युधिष्ठिरको उपदेश](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/276) ४- [भयभीत कबूतर महाराज शिबिकी गोदमें](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/404) ५- [पृथ्वी और श्रीकृष्णका संवाद](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/418) ६- [जालके साथ नदीमेंसे निकाले गये महर्षि च्यवन](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/511) ७- [महर्षि च्यवनका मूल्यांकन](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/516) ८- [इन्द्रका ब्रह्माजीके साथ गौओंके सम्बन्धमें प्रश्नोत्तर](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/654) ९- [महर्षि वसिष्ठका राजा सौदासे गौओंका माहात्म्य-कथन](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/690) १०- [भगवती लक्ष्मीकी गौओंसे आश्रयके लिये प्रार्थना](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/709) ११- [गृहस्थ-धर्मके सम्बन्धमें श्रीकृष्णका पृथ्वीके साथ संवाद](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/80) १२- [बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको उपदेश](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/81) १३- [देवलोकमें पतिव्रता शाण्डिली और सुमनाकी बातचीत](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/276) १४- [सामनीतिकी विजय](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/404) १५- [इन्द्रका भगवान् विष्णुके साथ प्रश्नोत्तर](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/418) १६- [भगवान् श्रीकृष्णकी तपस्या](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/511) १७- [भगवान् शंकर श्रीकृष्णका माहात्म्य कह रहे हैं](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/516) १८- [भगवान् दत्तात्रेयकी कार्तवीर्यपर कृपा](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/654) १९- [शर-शय्यापर पड़े भीष्मकी युधिष्ठिरसे बातचीत](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/690) २०- [श्रीकृष्ण और व्यासजीके द्वारा पुत्र-शोकाकुला गंगाजीको सान्त्वना](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/1564) २१- [महाराज मरुत्तकी देवर्षिसे भेंट](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/80) २२- [महाराज मरुत्तका संवर्त मुनिसे संवाद](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/81) २३- [ब्रह्माजीका ऋषियोंको उपदेश](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/276) २४- [उत्तंक मुनिकी श्रीकृष्णसे विश्वरूप दिखानेके लिये प्रार्थना](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/404) २५- [महारानी मदयन्तीका उत्तंकको कुण्डल-दान](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/418) २६- [उत्तंकका गुरुपत्नीको कुण्डल अर्पण करना](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/511) २७- [भगवान् श्रीकृष्ण अपने माता-पिता आदिको महाभारतका वृत्तान्त सुना रहे हैं](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/516) २८- [अश्वमेधयज्ञके लिये छोड़े हुए घोड़ेका अर्जुनके द्वारा अनुगमन](/granth/mahabharat-by-gita-press-vol-6/654)

अनुशासनपर्व

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

श्रीमहाभारतम्

अनुशासनपर्व

दानधर्मपर्व

प्रथमोऽध्यायः

युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत) का पाठ करना चाहिये ॥

युधिष्ठिर उवाच
शमो बहुविधाकारः सूक्ष्म उक्तः पितामह ।
न च मे हृदये शान्तिरस्ति श्रुत्वेदमीदृशम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— पितामह! आपने नाना प्रकारसे शान्तिके सूक्ष्म स्वरूपका (शोकसे मुक्त होनेके विविध उपायोंका) वर्णन किया; परंतु आपका यह ऐसा उपदेश सुनकर भी मेरे हृदयमें शान्ति नहीं है ॥ १ ॥
अस्मिन्नर्थे बहुविधा शान्तिरुक्ता पितामह ।
स्वकृते का नु शान्तिः स्याच्छमाद् बहुविधादपि ॥ २ ॥
दादाजी! आपने इस विषयमें शान्तिके बहुत-से उपाय बताये, परंतु इन नाना प्रकारके शान्तिदायक उपायोंको सुनकर भी स्वयं ही किये गये अपराधसे मनको शान्ति कैसे प्राप्त हो सकती है ॥ २ ॥
शराचितशरीरं हि तीव्रव्रणमुदीक्ष्य च ।

शर्म नोपलभे वीर दुष्कृतान्येव चिन्तयन् ॥ ३ ॥ वीरवर! बाणोंसे भरे हुए आपके शरीर और इसके गहरे घावको देखकर मैं बार-बार अपने पापोंका ही चिन्तन करता हूँ; अतः मुझे तनिक भी चैन नहीं मिलता है ॥ ३ ॥ रुधिरेणावसिक्ताङ्गं प्रसवन्तं यथाचलम् । त्वां दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्र सीदे वर्षास्विवाम्बुजम् ॥ ४ ॥ पुरुषसिंह! पर्वतसे गिरनेवाले झरनेकी तरह आपके शरीरसे रक्तकी धारा बह रही है—आपके सारे अङ्ग खूनसे लथपथ हो रहे हैं। इस अवस्थामें आपको देखकर मैं वर्षाकालके कमलकी तरह गला (दुःखित होता) जाता हूँ ॥ ४ ॥ अतः कष्टतरं किं नु मत्कृते यत् पितामहः । इमामवस्थां गमितः प्रत्यमित्रै रणाजिरे ॥ ५ ॥ मेरे ही कारण समराङ्गणमें शत्रुओंने जो पितामहको इस अवस्थामें पहुँचा दिया, इससे बढ़कर कष्टकी बात और क्या हो सकती है? ॥ ५ ॥ तथा चान्ये नृपतयः सहपुत्राः सबान्धवाः । मत्कृते निधनं प्राप्ताः किं नु कष्टतरं ततः ॥ ६ ॥ आपके सिवा और भी बहुत-से नरेश मेरे ही कारण अपने पुत्रों और बान्धवोंसहित युद्धमें मारे गये हैं। इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या होगी? ॥ ६ ॥ वयं हि धार्तराष्ट्राश्च कालमन्युवशंगताः । कृत्वेदं निन्दितं कर्म प्राप्स्यामः कां गतिं नृप ॥ ७ ॥ नरेश्वर! हम पाण्डव और धृतराष्ट्रके सभी पुत्र काल और क्रोधके वशीभूत हो यह निन्दित कर्म करके न जाने किस दुर्गतिको प्राप्त होंगे! ॥ ७ ॥ इदं तु धार्तराष्ट्रस्य श्रेयो मन्ये जनाधिप । इमामवस्थां सम्प्राप्तं यदसौ त्वां न पश्यति ॥ ८ ॥ नरेश्वर! मैं राजा दुर्योधनके लिये उसकी मृत्युको श्रेष्ठ समझता हूँ, जिससे कि वह आपको इस अवस्थामें पड़ा हुआ नहीं देखता है ॥ ८ ॥ सोऽहं तव ह्यन्तकरः सुहृद्वधकरस्तथा । न शान्तिमधिगच्छामि पश्यंस्त्वां दुःखितं क्षितौ ॥ ९ ॥ मैं ही आपके जीवनका अन्त करनेवाला हूँ और मैं ही दूसरे-दूसरे सुहृदोंका भी वध करनेवाला हूँ। आपको इस दुःखमयी दुरवस्थामें भूमिपर पड़ा देख मुझे शान्ति नहीं मिलती है ॥ ९ ॥ दुर्योधनो हि समरे सहसैन्यः सहानुजः । निहतः क्षत्रधर्मेऽस्मिन् दुरात्मा कुलपांसनः ॥ १० ॥ दुरात्मा एवं कुलाङ्गार दुर्योधन सेना और बन्धुओं सहित क्षत्रियधर्मके अनुसार होनेवाले इस युद्धमें मारा गया ॥ १० ॥

न स पश्यति दुष्टात्मा त्वामद्य पतितं क्षितौ । अतः श्रेयो मृतं मन्ये नेह जीवितमात्मनः ॥ ११ ॥ वह दुष्टात्मा आज आपको इस तरह भूमिपर पड़ा हुआ नहीं देख रहा है, अतः उसकी मृत्युको ही मैं यहाँ श्रेष्ठ मानता हूँ; किन्तु अपने इस जीवनको नहीं ॥ ११ ॥

अहं हि समरे वीर गमितः शत्रुभिः क्षयम् । अभविष्यं यदि पुरा सह भ्रातृभिरच्युत ॥ १२ ॥ न त्वामेवं सुदुःखार्तमद्राक्षं सायकार्दितम् । अपनी मर्यादासे कभी नीचे न गिरनेवाले वीरवर! यदि भाइयोंसहित मैं शत्रुओंद्वारा पहले ही युद्धमें मार डाला गया होता तो आपको इस प्रकार सायकोंसे पीड़ित और अत्यन्त दुःखसे आतुर अवस्थामें नहीं देखता ॥ १२ १/२ ॥

नूनं हि पापकर्मणो धात्रा सृष्टाः स्म हे नृप ॥ १३ ॥ अन्यस्मिन्नपि लोके वै यथा मुच्येम किल्बिषात् । तथा प्रशाधि मां राजन् मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥ १४ ॥ नरेश्वर! निश्चय ही विधाताने हमें पापी ही रचा है। राजन्! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो मुझे ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे परलोकमें भी मुझे इस पापसे छुटकारा मिल सके ॥ १३-१४ ॥

भीष्म उवाच

परतन्त्रं कथं हेतुमात्मानमनुपश्यसि । कर्मणां हि महाभाग सूक्ष्मं ह्येतदतीन्द्रियम् ॥ १५ ॥ भीष्मजी कहते हैं—महाभाग! तुम तो सदा परतन्त्र हो (काल, अदृष्ट और ईश्वरके अधीन हो), फिर अपनेको शुभाशुभ कर्मोंका कारण क्यों समझते हो? वास्तवमें कर्मोंका कारण क्या है, यह विषय अत्यन्त सूक्ष्म तथा इन्द्रियोंकी पहुँचसे बाहर है ॥ १५ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । संवादं मृत्युगौतम्योः काललुब्धकपन्नगैः ॥ १६ ॥ इस विषयमें विद्वान् पुरुष गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ १६ ॥

गौतमी नाम कौन्तेय स्थविरा शमसंयुता । सर्पेण दष्टं स्वं पुत्रमपश्यद्गतचेतनम् ॥ १७ ॥ कुन्तीनन्दन! पूर्वकालमें गौतमी नामवाली एक बूढ़ी ब्राह्मणी थी, जो शान्तिके साधनमें संलग्न रहती थी। एक दिन उसने देखा, उसके इकलौते बेटेको साँपने डँस लिया और उसकी चेतनाशक्ति लुप्त हो गयी ॥

अथ तं स्नायुपाशेन बद्ध्वा सर्पममर्षितः ।

लुब्धकोऽर्जुनको नाम गौतम्याः समुपानयत् ।। १८ ।।
इतनेहीमें अर्जुनक नामवाले एक व्याधने उस साँपको ताँतके फाँसमें बाँध लिया और अमर्षवश वह उसे गौतमीके पास ले आया ।। १८ ।।
स चाब्रवीदयं ते स पुत्रहा पन्नगाधमः ।
ब्रूहि क्षिप्रं महाभागे वध्यतां केन हेतुना ।। १९ ।।
लाकर उसने कहा—‘महाभागे! यही वह नीच सर्प है, जिसने तुम्हारे पुत्रको मार डाला है। जल्दी बताओ, मैं किस तरह इसका वध करूँ? ।। १९ ।।
अग्नौ प्रक्षिप्यतामेष च्छिद्यतां खण्डशोऽपि वा ।
न ह्ययं बालहा पापश्चिरं जीवितुमर्हति ।। २० ।।
‘मैं इसे आगमें झोंक दूँ या इसके टुकड़े-टुकड़े कर डालूँ? बालककी हत्या करनेवाला यह पापी सर्प अब अधिक समयतक जीवित रहने योग्य नहीं है’ ।।

गौतम्युवाच
विसृजैनमबुद्धिस्त्वमवध्योऽर्जुनक त्वया ।
को ह्यात्मानं गुरुं कुर्यात् प्राप्तव्यमविचिन्तयन् ।। २१ ।।
गौतमी बोली— अर्जुनक! छोड़ दे इस सर्पको। तू अभी नादान है। तुझे इस सर्पको नहीं मारना चाहिये। होनहारको कोई टाल नहीं सकता—इस बातको जानते हुए भी इसकी उपेक्षा करके कौन अपने ऊपर पापका भारी बोझ लादेगा? ।। २१ ।।
प्लवन्ते धर्मलघवो लोकेऽम्भसि यथा प्लवाः ।
मज्जन्ति पापगुरवः शस्त्रं स्कन्नमिवोदके ।। २२ ।।
संसारमें धर्माचरण करके जो अपनेको हलके रखते हैं (अपने ऊपर पापका भारी बोझ नहीं लादते हैं), वे पानीके ऊपर चलनेवाली नौकाके समान भवसागरसे पार हो जाते हैं; परंतु जो पापके बोझसे अपनेको बोझिल बना लेते हैं, वे जलमें फेंके हुए हथियारकी भाँति नरक-समुद्रमें डूब जाते हैं ।। २२ ।।
हत्वा चैनं नामृतः स्यादयं मे
जीवत्यस्मिन् कोऽत्ययःस्यादयं ते ।
अस्योत्सर्गे प्राणयुक्तस्य जन्तो-
र्मृत्योर्लोकं को नु गच्छेदन्नन्तम् ।। २३ ।।
इसको मार डालनेसे मेरा यह पुत्र जीवित नहीं हो सकता और इस सर्पके जीवित रहनेपर भी तुम्हारी क्या हानि हो सकती है? ऐसी दशामें इस जीवित प्राणीके प्राणोंका नाश करके कौन यमराजके अनन्त लोकमें जाय? ।। २३ ।।

लुब्धक उवाच
जानाम्यहं देवि गुणागुणज्ञे