श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
३४ रावणके पूछनेपर शूर्पणखाका उससे राम, लक्ष्मण और सीताका परिचय देते हुए सीताको भार्या बनानेके लिये उसे प्रेरित करना ३५ रावणका समुद्रतटवर्ती प्रान्तकी शोभा देखते हुए पुनः मारीचके पास जाना ३६ रावणका मारीचसे श्रीरामके अपराध बताकर उनकी पत्नी सीताके अपहरणमें सहायताके लिये कहना ३७ मारीचका रावणको श्रीरामचन्द्रजीके गुण और प्रभाव बताकर सीताहरणके उद्योगसे रोकना ३८ श्रीरामकी शक्तिके विषयमें अपना अनुभव बताकर मारीचका रावणको उनका अपराध करनेसे मना करना ३९ मारीचका रावणको समझाना ४० रावणका मारीचको फटकारना और सीताहरणके कार्यमें सहायता करनेकी आज्ञा देना ४१ मारीचका रावणको विनाशका भय दिखाकर पुनः समझाना ४२ मारीचका सुवर्णमय मृगरूप धारण करके श्रीरामके आश्रमपर जाना और सीताका उसे देखना ४३ कपटमृगको देखकर लक्ष्मणका संदेह, सीताका उस मृगको जीवित या मृत अवस्थामें भी ले आनेके लिये श्रीरामको प्रेरित करना तथा श्रीरामका लक्ष्मणको समझा-बुझाकर सीताकी रक्षाका भार सौंपकर उस मृगको मारनेके लिये जाना ४४ श्रीरामके द्वारा मारीचका वध और उसके द्वारा सीता और लक्ष्मणके पुकारनेका शब्द सुनकर श्रीरामकी चिन्ता ४५ सीताके मार्मिक वचनोंसे प्रेरित होकर लक्ष्मणका श्रीरामके पास जाना ४६ रावणका साधुवेषमें सीताके पास जाकर उनका परिचय पूछना और सीताका आतिथ्यके लिये उसे आमन्त्रित करना ४७ सीताका रावणको अपना और पतिका परिचय देकर वनमें आनेका कारण बताना, रावणका उन्हें अपनी पटरानी बनानेकी इच्छा प्रकट करना और सीताका उसे फटकारना ४८ रावणके द्वारा अपने पराक्रमका वर्णन और सीताद्वारा उसको कड़ी फटकार ४९ रावणद्वारा सीताका अपहरण, सीताका विलाप और उनके द्वारा जटायुका दर्शन ५० जटायुका रावणको सीताहरणके दुष्कर्मसे निवृत्त होनेके लिये समझाना और अन्तमें युद्धके लिये ललकारना ५१ जटायु तथा रावणका घोर युद्ध और रावणके द्वारा जटायुका वध
५२ रावणद्वारा सीताका अपहरण ५३ सीताका रावणको धिक्कारना ५४ सीताका पाँच वानरोंके बीच अपने भूषण और वस्त्रको गिराना, रावणका लङ्कामें पहुँचकर सीताको अन्तःपुरमें रखना तथा जनस्थानमें आठ राक्षसोंको गुप्तचरके रूपमें रहनेके लिये भेजना ५५ रावणका सीताको अपने अन्तःपुरका दर्शन कराना और अपनी भार्या बन जानेके लिये समझाना ५६ सीताका श्रीरामके प्रति अपना अनन्य अनुराग दिखाकर रावणको फटकारना तथा रावणकी आज्ञासे राक्षसियोंका उन्हें अशोकवाटिकाामें ले जाकर डराना (प्रक्षिप्त सर्ग)—ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवराज इन्द्रका निद्रासहित लङ्कामें जाकर सीताको दिव्य खीर अर्पित करना और उनसे विदा लेकर लौटना ५७ श्रीरामका लौटना, मार्गमें अपशकुन देखकर चिन्तित होना तथा लक्ष्मणसे मिलनेपर उन्हें उलाहना दे सीतापर संकट आनेकी आशंका करना ५८ मार्गमें अनेक प्रकारकी आशङ्का करते हुए लक्ष्मणसहित श्रीरामका आश्रममें आना और वहाँ सीताको न पाकर व्यथित होना ५९ श्रीराम और लक्ष्मणकी बातचीत ६० श्रीरामका विलाप करते हुए वृक्षों और पशुओंसे सीताका पता पूछना, भ्रान्त होकर रोना और बारम्बार उनकी खोज करना ६१ श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा सीताकी खोज और उनके न मिलनेसे श्रीरामकी व्याकुलता ६२ श्रीरामका विलाप ६३ श्रीरामका विलाप ६४ श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा सीताकी खोज, श्रीरामका शोकोद्गार, मृगोंद्वारा संकेत पाकर दोनों भाइयोंका दक्षिण दिशाकी ओर जाना, पर्वतपर क्रोध, सीताके बिखरे हुए फूल, आभूषणोंके कण और युद्धके चिह्न देखकर श्रीरामका देवता आदि सहित समस्त त्रिलोकीपर रोष प्रकट करना ६५ लक्ष्मणका श्रीरामको समझा-बुझाकर शान्त करना ६६ लक्ष्मणका श्रीरामको समझाना ६७ श्रीराम और लक्ष्मणकी पक्षिराज जटायुसे भेंट तथा श्रीरामका उन्हें गलेसे लगाकर रोना
६८ जटायुका प्राण-त्याग और श्रीरामद्वारा उनका दाह-संस्कार ६९ लक्ष्मणका अयोमुखीको दण्ड देना तथा श्रीराम और लक्ष्मणका कबन्धके बाहुबन्धमें पड़कर चिन्तित होना ७० श्रीराम और लक्ष्मणका परस्पर विचार करके कबन्धकी दोनों भुजाओंको काट डालना तथा कबन्धके द्वारा उनका स्वागत ७१ कबन्धकी आत्मकथा, अपने शरीरका दाह हो जानेपर उसका श्रीरामको सीताके अन्वेषणमें सहायता देनेका आश्वासन ७२ श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा चिताकी आगमें कबन्धका दाह तथा उसका दिव्य रूपमें प्रकट होकर उन्हें सुग्रीवसे मित्रता करनेके लिये कहना ७३ दिव्य रूपधारी कबन्धका श्रीराम और लक्ष्मणको ऋष्यमूक और पम्पासरोवरका मार्ग बताना तथा मतङ्गमुनिके वन एवं आश्रमका परिचय देकर प्रस्थान करना ७४ श्रीराम और लक्ष्मणका पम्पासरोवरके तटपर मतङ्गवनमें शबरीके आश्रमपर जाना, उसका सत्कार ग्रहण करना और उसके साथ मतङ्गवनको देखना, शबरीका अपने शरीरकी आहुति दे दिव्यधामको प्रस्थान करना. ७५ श्रीराम और लक्ष्मणकी बातचीत तथा उन दोनों भाइयोंका पम्पासरोवरके तटपर जाना
(किष्किन्धाकाण्ड)
१ पम्पासरोवरके दर्शनसे श्रीरामकी व्याकुलता, श्रीरामका लक्ष्मणसे पम्पाकी शोभा तथा वहाँकी उद्दीपनसामग्रीका वर्णन करना, लक्ष्मणका श्रीरामको समझाना तथा दोनों भाइयोंको ऋष्यमूककी ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरोंका भयभीत होना २ सुग्रीव तथा वानरोंकी आशङ्का, हनुमान्जीद्वारा उसका निवारण तथा सुग्रीवका हनुमान्जीको श्रीराम-लक्ष्मणके पास उनका भेद लेनेके लिये भेजना ३ हनुमान्जीका श्रीराम और लक्ष्मणसे वनमें आनेका कारण पूछना और अपना तथा सुग्रीवका परिचय देना, श्रीरामका उनके वचनोंकी प्रशंसा करके लक्ष्मणको अपनी ओरसे बात करनेकी आज्ञा देना तथा लक्ष्मणद्वारा अपनी प्रार्थना स्वीकृत होनेसे हनुमान्जीका प्रसन्न होना ४ लक्ष्मणका हनुमान्जीसे श्रीरामके वनमें आने और सीताजीके हरे जानेका वृत्तान्त बताना तथा इस कार्यमें सुग्रीवके सहयोगकी इच्छा प्रकट करना, हनुमान्जीका उन्हें आश्वासन देकर उन दोनों भाइयोंको अपने साथ ले जाना
५ श्रीराम और सुग्रीवकी मैत्री तथा श्रीरामद्वारा वालिवधकी प्रतिज्ञा ६ सुग्रीवका श्रीरामको सीताजीके आभूषण दिखाना तथा श्रीरामका शोक एवं रोषपूर्ण वचन ७ सुग्रीवका श्रीरामको समझाना तथा श्रीरामका सुग्रीवको उनकी कार्यसिद्धिका विश्वास दिलाना ८ सुग्रीवका श्रीरामसे अपना दुःख निवेदन करना और श्रीरामका उन्हें आश्वासन देते हुए दोनों भाइयोंमें वैर होनेका कारण पूछना ९ सुग्रीवका श्रीरामचन्द्रजीको वालीके साथ अपने वैर होनेका कारण बताना १० भाईके साथ वैरका कारण बतानेके प्रसङ्गमें सुग्रीवका वालीको मनाने और वालीद्वारा अपने निष्कासित होनेका वृत्तान्त सुनाना ११ सुग्रीवके द्वारा वालीके पराक्रमका वर्णन— वालीका दुन्दुभि दैत्यको मारकर उसकी लाशको मतङ्गवनमें फेंकना, मतङ्गमुनिका वालीको शाप देना, श्रीरामका दुन्दुभिके अस्थिसमूहको दूर फेंकना और सुग्रीवका उनसे साल-भेदनके लिये आग्रह करना १२ श्रीरामके द्वारा सात साल-वृक्षोंका भेदन, श्रीरामकी आज्ञासे सुग्रीवका किष्किन्धामें आकर वालीको ललकारना और युद्धमें उससे पराजित होकर मतङ्गवनमें भाग जाना, वहाँ श्रीरामका उन्हें आश्वासन देना और गलेमें पहचानके लिये गजपुष्पीलता डालकर उन्हें पुनः युद्धके लिये भेजना १३ श्रीराम आदिका मार्गमें वृक्षों, विविध जन्तुओं, जलाशयों तथा सप्तजन आश्रमका दूरसे दर्शन करते हुए पुनः किष्किन्धापुरीमें पहुँचना १४ वाली-वधके लिये श्रीरामका आश्वासन पाकर सुग्रीवकी विकट गर्जना १५ सुग्रीवकी गर्जना सुनकर वालीका युद्धके लिये निकलना और ताराका उसे रोककर सुग्रीव और श्रीरामके साथ मैत्री कर लेनेके लिये समझाना १६ वालीका ताराको डाँटकर लौटाना और सुग्रीवसे जूझना तथा श्रीरामके बाणसे घायल होकर पृथ्वीपर गिरना १७ वालीका श्रीरामचन्द्रजीको फटकारना १८ श्रीरामका वालीकी बातका उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्डका औचित्य बताना, वालीका निरुत्तर होकर भगवान्से अपने अपराधके लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गदकी रक्षाके लिये प्रार्थना करना और श्रीरामका उसे आश्वासन देना
१९ अङ्गदसहित ताराका भागे हुए वानरोंसे बात करके वालीके समीप आना और उसकी दुर्दशा देखकर रोना २० ताराका विलाप २१ हनुमान्जीका ताराको समझाना और ताराका पतिके अनुगमनका ही निश्चय करना २२ वालीका सुग्रीव और अङ्गदसे अपने मनकी बात कहकर प्राणोंको त्याग देना २३ ताराका विलाप २४ सुग्रीवका शोकमग्न होकर श्रीरामसे प्राणत्यागके लिये आज्ञा माँगना, ताराका श्रीरामसे अपने वधके लिये प्रार्थना करना और श्रीरामका उसे समझाना २५ लक्ष्मणसहित श्रीरामका सुग्रीव, तारा और अङ्गदको समझाना तथा वालीके दाह-संस्कारके लिये आज्ञा प्रदान करना, फिर तारा आदिसहित सब वानरोंका वालीके शवको श्मशानभूमिमें ले जाकर अङ्गदके द्वारा उसका दाह-संस्कार कराना और उसे जलाञ्जलि देना २६ हनुमान्जीका सुग्रीवके अभिषेकके लिये श्रीरामचन्द्रजीसे किष्किन्धामें पधारनेकी प्रार्थना, श्रीरामका पुरीमें न जाकर केवल अनुमति देना तत्पश्चात् सुग्रीव और अङ्गदका अभिषेक २७ प्रस्त्रवणगिरिपर श्रीराम और लक्ष्मणकी परस्पर बातचीत २८ श्रीरामके द्वारा वर्षा-ऋतुका वर्णन. २९ हनुमान्जीके समझानेसे सुग्रीवका नीलको वानर-सैनिकोंको एकत्र करनेका आदेश देना ३० शरद्-ऋतुका वर्णन तथा श्रीरामका लक्ष्मणको सुग्रीवके पास जानेका आदेश देना ३१ सुग्रीवपर लक्ष्मणका रोष, श्रीरामका उन्हें समझाना, लक्ष्मणका किष्किन्धाके द्वारपर जाकर अङ्गदको सुग्रीवके पास भेजना, वानरोंका भय तथा प्लक्ष और प्रभावका सुग्रीवको कर्तव्यका उपदेश देना ३२ हनुमान्जीका चिन्तित हुए सुग्रीवको समझाना ३३ लक्ष्मणका किष्किन्धापुरीकी शोभा देखते हुए सुग्रीवके महलमें प्रवेश करके क्रोधपूर्वक धनुषको टंकारना, भयभीत सुग्रीवका ताराको उन्हें शान्त करनेके लिये भेजना तथा ताराका समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुरमें ले आना ३४ सुग्रीवका लक्ष्मणके पास जाना और लक्ष्मणका उन्हें फटकारना ३५ ताराका लक्ष्मणको युक्तियुक्त वचनोंद्वारा शान्त करना ३६ सुग्रीवका अपनी लघुता तथा श्रीरामकी महत्ता बताते हुए लक्ष्मणसे क्षमा माँगना और लक्ष्मणका उनकी प्रशंसा करके उन्हें अपने साथ चलनेके लिये कहना.
३७ सुग्रीवका हनुमान्जीको वानरसेनाके संग्रहके लिये दोबारा दूत भेजनेकी आज्ञा देना, उन दूतोंसे राजाकी आज्ञा सुनकर समस्त वानरोंका किष्किन्धाके लिये प्रस्थान और दूतोंका लौटकर सुग्रीवको भेंट देनेके साथ ही वानरोंके आगमनका समाचार सुनाना ३८ लक्ष्मणसहित सुग्रीवका भगवान् श्रीरामके पास आकर उनके चरणोंमें प्रणाम करना, श्रीरामका उन्हें समझाना, सुग्रीवका अपने किये हुए सैन्यसंग्रहविषयक उद्योगको बताना और उसे सुनकर श्रीरामका प्रसन्न होना ३९ श्रीरामचन्द्रजीका सुग्रीवके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना तथा विभिन्न वानर-यूथपतियोंका अपनी सेनाओंके साथ आगमन ४० श्रीरामकी आज्ञासे सुग्रीवका सीताकी खोजके लिये पूर्व दिशामें वानरोंको भेजना और वहाँके स्थानोंका वर्णन करना ४१ सुग्रीवका दक्षिण दिशाके स्थानोंका परिचय देते हुए वहाँ प्रमुख वानर वीरोंको भेजना. ४२ सुग्रीवका पश्चिम दिशाके स्थानोंका परिचय देते हुए सुषेण आदि वानरोंको वहाँ भेजना ४३ सुग्रीवका उत्तर दिशाके स्थानोंका परिचय देते हुए शतबलि आदि वानरोंको वहाँ भेजना ४४ श्रीरामका हनुमान्जीको अँगूठी देकर भेजना ४५ विभिन्न दिशाओंमें जाते हुए वानरोंका सुग्रीवके समक्ष अपने उत्साहसूचक वचन सुनाना ४६ सुग्रीवका श्रीरामचन्द्रजीको अपने भूमण्डल-भ्रमणका वृत्तान्त बताना ४७ पूर्व आदि तीन दिशाओंमें गये हुए वानरोंका निराश होकर लौट आना ४८ दक्षिण दिशामें गये हुए वानरोंका सीताकी खोज आरम्भ करना ४९ अङ्गद और गन्धमादनके आश्वासन देनेपर वानरोंका पुनः उत्साहपूर्वक अन्वेषण-कार्यमें प्रवृत्त होना ५० भूखे-प्यासे वानरोंका एक गुफामें घुसकर वहाँ दिव्य वृक्ष, दिव्य सरोवर, दिव्य भवन तथा एक वृद्धा तपस्विनीको देखना और हनुमान्जीका उससे उसका परिचय पूछना ५१ हनुमान्जीके पूछनेपर वृद्धा तापसीका अपना तथा उस दिव्य स्थानका परिचय देकर सब वानरोंको भोजनके लिये कहना ५२ तापसी स्वयंप्रभाके पूछनेपर वानरोंका उसे अपना वृत्तान्त बताना और उसके प्रभावसे गुफाके बाहर निकलकर समुद्रतटपर पहुँचना ५३ लौटनेकी अवधि बीत जानेपर भी कार्य सिद्ध न होनेके कारण सुग्रीवके कठोर दण्डसे डरनेवाले अङ्गद आदि वानरोंका उपवास करके प्राण त्याग देनेका निश्चय
५४ हनुमान्जीका भेदनीतिके द्वारा वानरोंको अपने पक्षमें करके अङ्गदको अपने साथ चलनेके लिये समझाना ५५ अङ्गदसहित वानरोंका प्रायोपवेशन ५६ सम्पातिसे वानरोंको भय, उनके मुखसे जटायुके वधकी बात सुनकर सम्पातिका दुःखी होना और अपनेको नीचे उतारनेके लिये वानरोंसे अनुरोध करना ५७ अङ्गदका सम्पातिको पर्वत-शिखरसे नीचे उतारकर उन्हें जटायुके मारे जानेका वृत्तान्त बताना तथा राम-सुग्रीवकी मित्रता एवं वालिवधका प्रसङ्ग सुनाकर अपने आमरण उपवासका कारण निवेदन करना ५८ सम्पातिका अपने पंख जलनेकी कथा सुनाना, सीता और रावणका पता बताना तथा वानरोंकी सहायतासे समुद्रतटपर जाकर भाईको जलाञ्जलि देना ५९ सम्पातिका अपने पुत्र सुपार्श्वके मुखसे सुनी हुई सीता और रावणको देखनेकी घटनाका वृत्तान्त बताना ६० सम्पातिकी आत्मकथा ६१ सम्पातिका निशाकर मुनिको अपने पंखके जलनेका कारण बताना ६२ निशाकर मुनिका सम्पातिको सान्त्वना देते हुए उन्हें भावी श्रीरामचन्द्रजीके कार्यमें सहायता देनेके लिये जीवित रहनेका आदेश देना ६३ सम्पातिका पंखयुक्त होकर वानरोंको उत्साहित करके उड़ जाना और वानरोंका वहाँसे दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान करना ६४ समुद्रकी विशालता देखकर विषादमें पड़े हुए वानरोंको आश्वासन दे अङ्गदका उनसे पृथक्-पृथक् समुद्र-लङ्घनके लिये उनकी शक्ति पूछना ६५ बारी-बारीसे वानर-वीरोंके द्वारा अपनी-अपनी गमनशक्तिका वर्णन, जाम्बवान् और अंगदकी बातचीत तथा जाम्बवान्का हनुमान्जीको प्रेरित करनेके लिये उनके पास जाना ६६ जाम्बवान्का हनुमान्जीको उनकी उत्पत्तिकथा सुनाकर समुद्रलङ्घनके लिये उत्साहित करना ६७ हनुमान्जीका समुद्र लाँघनेके लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान्के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारनेके लिये हनुमान्जीका महेन्द्र पर्वतपर चढ़ना
(सुन्दरकाण्ड)
४- हनुमान्जीका लङ्कापुरी एवं रावणके अन्तःपुरमें प्रवेश
५- हनुमान्जीका रावणके अन्तःपुरमें घर-घरमें सीताको ढूँढ़ना और उन्हें न देखकर दुःखी होना
६- हनुमान्जीका रावण तथा अन्यान्य राक्षसोंके घरोंमें सीताजीकी खोज करना
७- रावणके भवन एवं पुष्पक विमानका वर्णन
८- हनुमान्जीके द्वारा पुनः पुष्पक विमानका दर्शन
१७- भयंकर राक्षसियोंसे घिरी हुईं सीताके दर्शनसे हनुमान्जीका प्रसन्न होना
१८- अपनी स्त्रियोंसे घिरे हुए रावणका अशोक-वाटिकामें आगमन और हनुमान्जीका उसे देखना
१९- रावणको देखकर दुःख, भय और चिन्तामें डूबी हुई सीताकी अवस्थाका वर्णन २०- रावणका सीताजीको प्रलोभन २१- सीताजीका रावणको समझाना और उसे श्रीरामके सामने नगण्य बताना २२- रावणका सीताको दो मासकी अवधि देना, सीताका उसे फटकारना, फिर रावणका उन्हें धमकाकर राक्षसियोंके नियन्त्रणमें रखकर स्त्रियोंसहित पुनः महलको लौट जाना २३- राक्षसियोंका सीताजीको समझाना २४- सीताजीका राक्षसियोंकी बात माननेसे इनकार कर देना तथा राक्षसियोंका उन्हें मारने-काटनेकी धमकी देना २५- राक्षसियोंकी बात माननेसे इनकार करके शोक-संतप्त सीताका विलाप करना २६- सीताका करुण-विलाप तथा अपने प्राणोंको त्याग देनेका निश्चय करना २७- त्रिजटाका स्वप्न, राक्षसोंके विनाश और श्रीरघुनाथजीकी विजयकी शुभ सूचना. २८- विलाप करती हुई सीताका प्राण-त्यागके लिये उद्यत होना २९- सीताजीके शुभ शकुन ३०- सीताजीसे वार्तालाप करनेके विषयमें हनुमान्जीका विचार करना ३१- हनुमान्जीका सीताको सुनानेके लिये श्रीराम-कथाका वर्णन करना ३२- सीताजीका तर्क-वितर्क ३३- सीताजीका हनुमान्जीको अपना परिचय देते हुए अपने वनगमन और अपहरणका वृत्तान्त बताना ३४- सीताजीका हनुमान्जीके प्रति संदेह और उसका समाधान तथा हनुमान्जीके द्वारा श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका गान ३५- सीताजीके पूछनेपर हनुमान्जीका श्रीरामके शारीरिक चिह्नों और गुणोंका वर्णन करना तथा नर-वानरकी मित्रताका प्रसङ्ग सुनाकर सीताजीके मनमें विश्वास उत्पन्न करना ३६- हनुमान्जीका सीताको मुद्रिका देना, सीताका ‘श्रीराम कब मेरा उद्धार करेंगे’ यह उत्सुक होकर पूछना तथा हनुमान्जीका श्रीरामके सीताविषयक प्रेमका वर्णन करके उन्हें सान्त्वना देना ३७- सीताका हनुमान्जीसे श्रीरामको शीघ्र बुलानेका आग्रह, हनुमान्जीका सीतासे अपने साथ चलनेका अनुरोध तथा सीताका अस्वीकार करना
३८- सीताजीका हनुमान्जीको पहचानके रूपमें चित्रकूट पर्वतपर घटित हुए एक कौएके प्रसङ्गको सुनाना, भगवान् श्रीरामको शीघ्र बुला लानेके लिये अनुरोध करना और चूड़ामणि देना ३९- चूड़ामणि लेकर जाते हुए हनुमान्जीसे सीताका श्रीराम आदिको उत्साहित करनेके लिये कहना तथा समुद्र-तरणके विषयमें शङ्कित हुई सीताको वानरोंका पराक्रम बताकर हनुमान्जीका आश्वासन देना ४०- सीताका श्रीरामसे कहनेके लिये पुनः संदेश देना तथा हनुमान्जीका उन्हें आश्वासन दे उत्तर दिशाकी ओर जाना ४१- हनुमान्जीके द्वारा प्रमदावन (अशोक-वाटिका)-का विध्वंस ४२- राक्षसियोंके मुखसे एक वानरके द्वारा प्रमदावनके विध्वंसका समाचार सुनकर रावणका किंकर नामक राक्षसोंको भेजना और हनुमान्जीके द्वारा उन सबका संहार ४३- हनुमान्जीके द्वारा चैत्यप्रासादका विध्वंस तथा उसके रक्षकोंका वध ४४- प्रहस्त-पुत्र जम्बुमालीका वध ४५- मन्त्रीके सात पुत्रोंका वध ४६- रावणके पाँच सेनापतियोंका वध ४७- रावणपुत्र अक्षकुमारका पराक्रम और वध ४८- इन्द्रजित् और हनुमान्जीका युद्ध, उसके दिव्यास्त्रके बन्धनमें बँधकर हनुमान्जीका रावणके दरबारमें उपस्थित होना ४९- रावणके प्रभावशाली स्वरूपको देखकर हनुमान्जीके मनमें अनेक प्रकारके विचारोंका उठना ५०- रावणका प्रहस्तके द्वारा हनुमान्जीसे लङ्कामें आनेका कारण पुछवाना और हनुमान्का अपनेको श्रीरामका दूत बताना. ५१- हनुमान्जीका श्रीरामके प्रभावका वर्णन करते हुए रावणको समझाना ५२- विभीषणका दूतके वधको अनुचित बताकर उसे दूसरा कोई दण्ड देनेके लिये कहना तथा रावणका उनके अनुरोधको स्वीकार कर लेना ५३- राक्षसोंका हनुमान्जीकी पूँछमें आग लगाकर उन्हें नगरमें घुमाना ५४- लङ्कापुरीका दहन और राक्षसोंका विलाप ५५- सीताजीके लिये हनुमान्जीकी चिन्ता और उसका निवारण ५६- हनुमान्जीका पुनः सीताजीसे मिलकर लौटना और समुद्रको लाँघना
५७- हनुमान्जीका समुद्रको लाँघकर जाम्बवान् और अङ्गद आदि सुहृदोंसे मिलना ५८- जाम्बवान्के पूछनेपर हनुमान्जीका अपनी लङ्कायात्राका सारा वृत्तान्त सुनाना ५९- हनुमान्जीका सीताकी दुरवस्था बताकर वानरोंको लङ्कापर आक्रमण करनेके लिये उत्तेजित करना ६०- अङ्गदका लङ्काको जीतकर सीताको ले आनेका उत्साहपूर्ण विचार और जाम्बवान्के द्वारा उसका निवारण ६१- वानरोंका मधुवनमें जाकर वहाँके मधु एवं फलोंका मनमाना उपभोग करना और वनरक्षकको घसीटना ६२- वानरोंद्वारा मधुवनके रक्षकों और दधिमुखका पराभव तथा सेवकोंसहित दधिमुखका सुग्रीवके पास जाना ६३- दधिमुखसे मधुवनके विध्वंसका समाचार सुनकर सुग्रीवका हनुमान् आदि वानरोंकी सफलताके विषयमें अनुमान ६४- दधिमुखसे सुग्रीवका संदेश सुनकर अङ्गद-हनुमान् आदि वानरोंका किष्किन्धामें पहुँचना और हनुमान्जीका श्रीरामको प्रणाम करके सीता देवीके दर्शनका समाचार बताना ६५- हनुमान्जीका श्रीरामको सीताका समाचार सुनाना ६६- चूड़ामणिको देखकर और सीताका समाचार पाकर श्रीरामका उनके लिये विलाप ६७- हनुमान्जीका भगवान् श्रीरामको सीताका संदेश सुनाना ६८- हनुमान्जीका सीताके संदेह और अपने द्वारा उनके निवारणका वृत्तान्त बताना
(युद्धकाण्ड)
१- हनुमान्जीकी प्रशंसा करके श्रीरामका उन्हें हृदयसे लगाना और समुद्रको पार करनेके लिये चिन्तित होना २- सुग्रीवका श्रीरामको उत्साह प्रदान करना ३- हनुमान्जीका लङ्काके दुर्ग, फाटक, सेनाविभाग और संक्रम आदिका वर्णन करके भगवान् श्रीरामसे सेनाको कूच करनेकी आज्ञा देनेके लिये प्रार्थना करना ४- श्रीराम आदिके साथ वानर-सेनाका प्रस्थान और समुद्र-तटपर उसका पड़ाव ५- श्रीरामका सीताके लिये शोक और विलाप ६- रावणका कर्तव्य-निर्णयके लिये अपने मन्त्रियोंसे समुचित सलाह देनेका अनुरोध करना
७- राक्षसोंका रावण और इन्द्रजित्के बल-पराक्रमका वर्णन करते हुए उसे रामपर विजय पानेका विश्वास दिलाना ८- प्रहस्त, दुर्मुख, वज्रदंष्ट्र, निकुम्भ और वज्रहनुका रावणके सामने शत्रु-सेनाको मार गिरानेका उत्साह दिखाना ९- विभीषणका रावणसे श्रीरामकी अजेयता बताकर सीताको लौटा देनेके लिये अनुरोध करना १०- विभीषणका रावणके महलमें जाना, उसे अपशकुनोंका भय दिखाकर सीताको लौटा देनेके लिये प्रार्थना करना और रावणका उनकी बात न मानकर उन्हें वहाँसे विदा कर देना ११- रावण और उसके सभासदोंका सभाभवनमें एकत्र होना १२-नगरकी रक्षाके लिये सैनिकोंकी नियुक्ति, रावणका सीताके प्रति अपनी आसक्ति बताकर उनके हरणका प्रसंग बताना और भावी कर्तव्यके लिये सभासदोंकी सम्मति माँगना, कुम्भकर्णका पहले तो उसे फटकारना, फिर समस्त शत्रुओंके वधका स्वयं ही भार उठाना १३- महापार्श्वका रावणको सीतापर बलात्कारके लिये उकसाना और रावणका शापके कारण अपनेको ऐसा करनेमें असमर्थ बताना तथा अपने पराक्रमके गीत गाना १४- विभीषणका रामको अजेय बताकर उनके पास सीताको लौटा देनेकी सम्मति देना १५- इन्द्रजित्द्वारा विभीषणका उपहास तथा विभीषणका उसे फटकारकर सभामें अपनी उचित सम्मति देना १६- रावणके द्वारा विभीषणका तिरस्कार और विभीषणका भी उसे फटकारकर चल देना १७- विभीषणका श्रीरामकी शरणमें आना और श्रीरामका अपने मन्त्रियोंके साथ उन्हें आश्रय देनेके विषयमें विचार करना १८- भगवान् श्रीरामका शरणागतकी रक्षाका महत्त्व एवं अपना व्रत बताकर विभीषणसे मिलना १९- विभीषणका आकाशसे उतरकर भगवान् श्रीरामके चरणोंकी शरण लेना, उनके पूछनेपर रावणकी शक्तिका परिचय देना और श्रीरामका रावण-वधकी प्रतिज्ञा करके विभीषणको लङ्काके राज्यपर अभिषिक्त कर उनकी सम्मतिसे समुद्रतटपर धरना देनेके लिये बैठना २०- शार्दूलके कहनेसे रावणका शुकको दूत बनाकर सुग्रीवके पास संदेश भेजना, वहाँ वानरोंद्वारा उसकी दुर्दशा, श्रीरामकी कृपासे उसका संकटसे छूटना और सुग्रीवका रावणके लिये उत्तर देना २१- श्रीरामका समुद्रके तटपर कुशा बिछाकर तीन दिनोंतक धरना देनेपर भी समुद्रके दर्शन न देनेसे कुपित हो उसे बाण मारकर विक्षुब्ध कर देना
२२- समुद्रकी सलाहके अनुसार नलके द्वारा सागरपर सौ योजन लंबे पुलका निर्माण तथा उसके द्वारा श्रीराम आदिसहित वानरसेनाका उस पार पहुँचकर पड़ाव डालना २३- श्रीरामका लक्ष्मणसे उत्पातसूचक लक्षणोंका वर्णन और लङ्कापर आक्रमण २४- श्रीरामका लक्ष्मणसे लङ्काकी शोभाका वर्णन करके सेनाको व्यूहबद्ध खड़ी होनेके लिये आदेश देना, श्रीरामकी आज्ञासे बन्धनमुक्त हुए शुकका रावणके पास जाकर उनकी सैन्यशक्तिकी प्रबलता बताना तथा रावणका अपने बलकी डींग हाँकना २५- रावणका शुक और सारणको गुप्तरूपसे वानरसेनामें भेजना, विभीषणद्वारा उनका पकड़ा जाना, श्रीरामकी कृपासे छुटकारा पाना तथा श्रीरामका संदेश लेकर लङ्कामें लौटकर उनका रावणको समझाना २६- सारणका रावणको पृथक्-पृथक् वानरयूथ पतियोंका परिचय देना २७- वानरसेनाके प्रधान यूथपतियोंका परिचय २८- शुकके द्वारा सुग्रीवके मन्त्रियोंका, मैन्द और द्विविदका, हनुमान्का, श्रीराम, लक्ष्मण, विभीषण और सुग्रीवका परिचय देकर वानर-सेनाकी संख्याका निरूपण करना २९- रावणका शुक और सारणको फटकारकर अपने दरबारसे निकाल देना, उसके भेजे हुए गुप्तचरोंका श्रीरामकी दयासे वानरोंके चंगुलसे छूटकर लङ्कामें आना ३०- रावणके भेजे हुए गुप्तचरों एवं शार्दूलका उससे वानर-सेनाका समाचार बताना और मुख्य- मुख्य वीरोंका परिचय देना ३१- मायारचित श्रीरामका कटा मस्तक दिखाकर रावणद्वारा सीताको मोहमें डालनेका प्रयत्न ३२- श्रीरामके मारे जानेका विश्वास करके सीताका विलाप तथा रावणका सभामें जाकर मन्त्रियोंके सलाहसे युद्धविषयक उद्योग करना ३३- सरमाका सीताको सान्त्वना देना, रावणकी मायाका भेद खोलना, श्रीरामके आगमनका प्रिय समाचार सुनाना और उनके विजयी होनेका विश्वास दिलाना ३४- सीताके अनुरोधसे सरमाका उन्हें मन्त्रियोंसहित रावणका निश्चित विचार बताना ३५- माल्यवान्का रावणको श्रीरामसे संधि करनेके लिये समझाना ३६- माल्यवान्पर आक्षेप और नगरकी रक्षाका प्रबन्ध करके रावणका अपने अन्तःपुरमें जाना ३७- विभीषणका श्रीरामसे रावणद्वारा किये गये लङ्काकी रक्षाके प्रबन्धका वर्णन तथा श्रीरामद्वारा लङ्काके विभिन्न द्वारोंपर आक्रमण करनेके लिये अपने सेनापतियोंकी नियुक्ति ३८- श्रीरामका प्रमुख वानरोंके साथ सुवेल पर्वतपर चढ़कर वहाँ रातमें निवास करना
३९- वानरोंसहित श्रीरामका सुवेल-शिखरसे लङ्कापुरीका निरीक्षण करना
४०- सुग्रीव और रावणका मल्लयुद्ध.
४१- श्रीरामका सुग्रीवको दुःसाहससे रोकना, लङ्काके चारों द्वारोंपर वानरसैनिकोंकी नियुक्ति,
रामदूत अङ्गदका रावणके महलमें पराक्रम तथा वानरोंके आक्रमणसे राक्षसोंको भय
४२- लङ्कापर वानरोंकी चढ़ाई तथा राक्षसोंके साथ उनका घोर युद्ध
४३- द्वन्द्वयुद्धमें वानरोंद्वारा राक्षसोंकी पराजय
४४- रातमें वानरों और राक्षसोंका घोर युद्ध, अङ्गदके द्वारा इन्द्रजित्की पराजय, मायासे अदृश्य
हुए इन्द्रजित्का नागमय बाणोंद्वारा श्रीराम और लक्ष्मणको बाँधना
४५- इन्द्रजित्के बाणोंसे श्रीराम और लक्ष्मणका अचेत होना और वानरोंका शोक करना
४६- श्रीराम और लक्ष्मणको मूर्च्छित देख वानरोंका शोक, इन्द्रजित्का हर्षोद्गार, विभीषणका
सुग्रीवको समझाना, इन्द्रजित्का लङ्कामें जाकर पिताको शत्रुवधका वृत्तान्त बताना और
प्रसन्न हुए रावणके द्वारा अपने पुत्रका अभिनन्दन
४७- वानरोंद्वारा श्रीराम और लक्ष्मणकी रक्षा, रावणकी आज्ञासे राक्षसियोंका सीताको
पुष्पकविमानद्वारा रणभूमिमें ले जाकर श्रीराम और लक्ष्मणका दर्शन कराना और सीताका
दुःखी होकर रोना
४८- सीताका विलाप और त्रिजटाका उन्हें समझा-बुझाकर श्रीराम-लक्ष्मणके जीवित होनेका
विश्वास दिलाकर पुनः लङ्कामें ही लौटा लाना
४९- श्रीरामका सचेत होकर लक्ष्मणके लिये विलाप करना और स्वयं प्राणत्यागका विचार
करके वानरोंको लौट जानेकी आज्ञा देना
५०- विभीषणको इन्द्रजित् समझकर वानरोंका पलायन और सुग्रीवकी आज्ञासे जाम्बवान्का
उन्हें सान्त्वना देना, विभीषणका विलाप और सुग्रीवका उन्हें समझाना, गरुड़का आना और
श्रीराम-लक्ष्मणको नागपाशसे मुक्त करके चला जाना
५१- श्रीरामके बन्धनमुक्त होनेका पता पाकर चिन्तित हुए रावणका धूम्राक्षको युद्धके लिये
भेजना और सेनासहित धूम्राक्षका नगरसे बाहर आना
५२- धूम्राक्षका युद्ध और हनुमान्जीके द्वारा उसका वध
५३- वज्रदंष्ट्रका सेनासहित युद्धके लिये प्रस्थान, वानरों और राक्षसोंका युद्ध, वज्रदंष्ट्रद्वारा
वानरोंका तथा अङ्गदद्वारा राक्षसोंका संहार
५४- वज्रदंष्ट्र और अङ्गदका युद्ध तथा अङ्गदके हाथसे उस निशाचरका वध
५५- रावणकी आज्ञासे अकम्पन आदि राक्षसोंका युद्धमें आना और वानरोंके साथ उनका घोर युद्ध ५६- हनुमान्जीके द्वारा अकम्पनका वध ५७- प्रहस्तका रावणकी आज्ञासे विशाल सेनासहित युद्धके लिये प्रस्थान ५८- नीलके द्वारा प्रहस्तका वध ५९- प्रहस्तके मारे जानेसे दुःखी हुए रावणका स्वयं ही युद्धके लिये पधारना, उसके साथ आये हुए मुख्य वीरोंका परिचय, रावणकी मारसे सुग्रीवका अचेत होना, लक्ष्मणका युद्धमें आना, हनुमान् और रावणमें थप्पड़ोंकी मार, रावणद्वारा नीलका मूर्च्छित होना, लक्ष्मणका शक्तिके आघातसे मूर्च्छित एवं सचेत होना तथा श्रीरामसे परास्त होकर रावणका लङ्कामें घुस जाना ६०- अपनी पराजयसे दुःखी हुए रावणकी आज्ञासे सोये हुए कुम्भकर्णका जगाया जाना और उसे देखकर वानरोंका भयभीत होना ६१- विभीषणका श्रीरामसे कुम्भकर्णका परिचय देना और श्रीरामकी आज्ञासे वानरोंका युद्धके लिये लङ्काके द्वारोंपर डट जाना ६२- कुम्भकर्णका रावणके भवनमें प्रवेश तथा रावणका रामसे भय बताकर उसे शत्रुसेनाके विनाशके लिये प्रेरित करना ६३- कुम्भकर्णका रावणको उसके कुकृत्योंके लिये उपालम्भ देना और उसे धैर्य बँधाते हुए युद्धविषयक उत्साह प्रकट करना ६४- महोदरका कुम्भकर्णके प्रति आक्षेप करके रावणको बिना युद्धके ही अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिका उपाय बताना ६५- कुम्भकर्णकी रणयात्रा ६६- कुम्भकर्णके भयसे भागे हुए वानरोंका अङ्गदद्वारा प्रोत्साहन और आवाहन, कुम्भकर्णद्वारा वानरोंका संहार, पुनः वानर-सेनाका पलायन और अङ्गदका उसे समझा-बुझाकर लौटाना ६७- कुम्भकर्णका भयंकर युद्ध और श्रीरामके हाथसे उसका वध ६८- कुम्भकर्णके वधका समाचार सुनकर रावणका विलाप ६९- रावणके पुत्रों और भाइयोंका युद्धके लिये जाना और नरान्तकका अङ्गदके द्वारा वध ७०- हनुमान्जीके द्वारा देवान्तक और त्रिशिराका, नीलके द्वारा महोदरका तथा ऋषभके द्वारा महापार्श्वका वध
७१- अतिकायका भयंकर युद्ध और लक्ष्मणके द्वारा उसका वध ७२- रावणकी चिन्ता तथा उसका राक्षसोंको पुरीकी रक्षाके लिये सावधान रहनेका आदेश ७३- इन्द्रजित्के ब्रह्मास्त्रसे वानरसेनासहित श्रीराम और लक्ष्मणका मूर्च्छित होना ७४- जाम्बवान्के आदेशसे हनुमान्जीका हिमालयसे दिव्य ओषधियोंके पर्वतको लाना और उन ओषधियोंकी गन्धसे श्रीराम, लक्ष्मण एवं समस्त वानरोंका पुनः स्वस्थ होना ७५- लङ्कापुरीका दहन तथा राक्षसों और वानरोंका भयंकर युद्ध ७६- अङ्गदके द्वारा कम्पन और प्रजङ्घका, द्विविदके द्वारा शोणिताक्षका, मैन्दके द्वारा यूपाक्षका और सुग्रीवके द्वारा कुम्भका वध ७७- हनुमान्के द्वारा निकुम्भका वध ७८- रावणकी आज्ञासे मकराक्षका युद्धके लिये प्रस्थान ७९- श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा मकराक्षका वध ८०- रावणकी आज्ञासे इन्द्रजित्का घोर युद्ध तथा उसके वधके विषयमें श्रीराम और लक्ष्मणकी बातचीत ८१- इन्द्रजित्के द्वारा मायामयी सीताका वध ८२- हनुमान्जीके नेतृत्वमें वानरों और निशाचरोंका युद्ध, हनुमान्जीका श्रीरामके पास लौटना और इन्द्रजित्का निकुम्भिला-मन्दिरमें जाकर होम करना ८३- सीताके मारे जानेकी बात सुनकर श्रीरामका शोकसे मूर्च्छित होना और लक्ष्मणका उन्हें समझाते हुए पुरुषार्थके लिये उद्यत होना ८४- विभीषणका श्रीरामको इन्द्रजित्की मायाका रहस्य बताकर सीताके जीवित होनेका विश्वास दिलाना और लक्ष्मणको सेनासहित निकुम्भिला-मन्दिरमें भेजनेके लिये अनुरोध करना ८५- विभीषणके अनुरोधसे श्रीरामचन्द्रजीका लक्ष्मणको इन्द्रजित्के वधके लिये जानेकी आज्ञा देना और सेनासहित लक्ष्मणका निकुम्भिला-मन्दिरके पास पहुँचना ८६- वानरों और राक्षसोंका युद्ध, हनुमान्जीके द्वारा राक्षससेनाका संहार और उनका इन्द्रजित्को द्वन्द्वयुद्धके लिये ललकारना तथा लक्ष्मणका उसे देखना ८७- इन्द्रजित् और विभीषणकी रोषपूर्ण बातचीत ८८- लक्ष्मण और इन्द्रजित्की परस्पर रोषभरी बातचीत और घोर युद्ध ८९- विभीषणका राक्षसोंपर प्रहार, उनका वानरयूथ पतियोंको प्रोत्साहन देना, लक्ष्मणद्वारा इन्द्रजित्के सारथिका और वानरोंद्वारा उसके घोड़ोंका वध
९०- इन्द्रजित् और लक्ष्मणका भयंकर युद्ध तथा इन्द्रजित्का वध ९१- लक्ष्मण और विभीषण आदिका श्रीरामचन्द्रजीके पास आकर इन्द्रजित्के वधका समाचार सुनाना, प्रसन्न हुए श्रीरामके द्वारा लक्ष्मणको हृदयसे लगाकर उनकी प्रशंसा तथा सुषेणद्वारा लक्ष्मण आदिकी चिकित्सा ९२- रावणका शोक तथा सुपार्श्वके समझानेसे उसका सीता-वधसे निवृत्त होना ९३- श्रीरामद्वारा राक्षससेनाका संहार ९४- राक्षसियोंका विलाप ९५- रावणका अपने मन्त्रियोंको बुलाकर शत्रुवधवि षयक अपना उत्साह प्रकट करना और सबके साथ रणभूमिमें आकर पराक्रम दिखाना ९६- सुग्रीवद्वारा राक्षससेनाका संहार और विरूपाक्षका वध ९७- सुग्रीवके साथ महोदरका घोर युद्ध तथा वध ९८- अङ्गदके द्वारा महापार्श्वका वध. ९९- श्रीराम और रावणका युद्ध १००- राम और रावणका युद्ध, रावणकी शक्तिसे लक्ष्मणका मूर्च्छित होना तथा रावणका युद्धसे भागना १०१- श्रीरामका विलाप तथा हनुमान्जीकी लायी हुई ओषधिके सुषेणद्वारा किये गये प्रयोगसे लक्ष्मणका सचेत हो उठना १०२- इन्द्रके भेजे हुए रथपर बैठकर श्रीरामका रावणके साथ युद्ध करना १०३- श्रीरामका रावणको फटकारना और उनके द्वार घायल किये गये रावणको सारथिका रणभूमिसे बाहर ले जाना १०४- रावणका सारथिको फटकारना और सारथिका अपने उत्तरसे रावणको संतुष्ट करके उसके रथको रणभूमिमें पहुँचाना १०५- अगस्त्य मुनिका श्रीरामको विजयके लिये ‘आदित्यहृदय’ के पाठकी सम्मति देना १०६- रावणके रथको देख श्रीरामका मातलिको सावधान करना, रावणकी पराजयके सूचक उत्पातों तथा रामकी विजय सूचित करनेवाले शुभ शकुनोंका वर्णन १०७- श्रीराम और रावणका घोर युद्ध १०८- श्रीरामके द्वारा रावणका वध
१०९- विभीषणका विलाप और श्रीरामका उन्हें समझाकर रावणके अन्त्येष्टि-संस्कारके लिये आदेश देना ११०- रावणकी स्त्रियोंका विलाप १११- मन्दोदरीका विलाप तथा रावणके शवका दाह-संस्कार ११२- विभीषणका राज्याभिषेक और श्रीरघुनाथजीका हनुमान्जीके द्वारा सीताके पास संदेश भेजना ११३- हनुमान्जीका सीताजीसे बातचीत करके लौटना और उनका संदेश श्रीरामको सुनाना ११४- श्रीरामकी आज्ञासे विभीषणका सीताको उनके समीप लाना और सीताका प्रियतमके मुखचन्द्रका दर्शन करना ११५- सीताके चरित्रपर संदेह करके श्रीरामका उन्हें ग्रहण करनेसे इनकार करना और अन्यत्र जानेके लिये कहना ११६- सीताका श्रीरामको उपालम्भपूर्ण उत्तर देकर अपने सतीत्वकी परीक्षा देनेके लिये अग्निमें प्रवेश करना ११७- भगवान् श्रीरामके पास देवताओंका आगमन तथा ब्रह्माद्वारा उनकी भगवत्ताका प्रतिपादन एवं स्तवन ११८- मूर्तिमान् अग्निदेवका सीताको लेकर चितासे प्रकट होना और श्रीरामको समर्पित करके उनकी पवित्रताको प्रमाणित करना तथा श्रीरामका सीताको सहर्ष स्वीकार करना ११९- महादेवजीकी आज्ञासे श्रीराम और लक्ष्मणका विमानद्वारा आये हुए राजा दशरथको प्रणाम करना और दशरथका दोनों पुत्रों तथा सीताको आवश्यक संदेश दे इन्द्रलोकको जाना १२०- श्रीरामके अनुरोधसे इन्द्रका मरे हुए वानरोंको जीवित करना, देवताओंका प्रस्थान और वानरसेनाका विश्राम १२१- श्रीरामका अयोध्या जानेके लिये उद्यत होना और उनकी आज्ञासे विभीषणका पुष्पकविमानको मँगाना १२२- श्रीरामकी आज्ञासे विभीषणद्वारा वानरोंका विशेष सत्कार तथा सुग्रीव और विभीषणसहित वानरोंको साथ लेकर श्रीरामका पुष्पकविमानद्वारा अयोध्याको प्रस्थान करना १२३- अयोध्याकी यात्रा करते समय श्रीरामका सीताजीको मार्गके स्थान दिखाना
१२४- श्रीरामका भरद्वाज-आश्रमपर उतरकर महर्षिसे मिलना और उनसे वर पाना १२५- हनुमान्जीका निषादराज गुह तथा भरतजीको श्रीरामके आगमनकी सूचना देना और प्रसन्न हुए भरतका उन्हें उपहार देनेकी घोषणा करना १२६- हनुमान्जीका भरतको श्रीराम, लक्ष्मण और सीताके वनवाससम्बन्धी सारे वृत्तान्तोंको सुनाना १२७- अयोध्यामें श्रीरामके स्वागतकी तैयारी, भरतके साथ सबका श्रीरामकी अगवानीके लिये नन्दिग्राममें पहुँचना, श्रीरामका आगमन, भरत आदिके साथ उनका मिलाप तथा पुष्पकविमानको कुबेरके पास भेजना १२८- भरतका श्रीरामको राज्य लौटाना, श्रीरामकी नगरयात्रा, राज्याभिषेक, वानरोंकी विदाई तथा ग्रन्थका माहात्म्य
(उत्तरकाण्ड)
१- श्रीरामके दरबारमें महर्षियोंका आगमन, उनके साथ उनकी बातचीत तथा श्रीरामके प्रश्न २- महर्षि अगस्त्यके द्वारा पुलस्त्यके गुण और तपस्याका वर्णन तथा उनसे विश्रवा मुनिकी उत्पत्तिका कथन ३- विश्रवासे वैश्रवण (कुबेर)-की उत्पत्ति, उनकी तपस्या, वरप्राप्ति तथा लङ्कामें निवास ४- राक्षसवंशका वर्णन—हेति, विद्युत्केश और सुकेशकी उत्पत्ति ५- सुकेशके पुत्र माल्यवान्, सुमाली और मालीकी संतानोंका वर्णन ६- देवताओंका भगवान् शङ्करकी सलाहसे राक्षसोंके वधके लिये भगवान् विष्णुकी शरणमें जाना और उनसे आश्वासन पाकर लौटना, राक्षसोंका देवताओंपर आक्रमण और भगवान् विष्णुका उनकी सहायताके लिये आना ७- भगवान् विष्णुद्वारा राक्षसोंका संहार और पलायन ८- माल्यवान्का युद्ध और पराजय तथा सुमाली आदि सब राक्षसोंका रसातलमें प्रवेश ९- रावण आदिका जन्म और उनका तपके लिये गोकर्ण-आश्रममें जाना १०- रावण आदिकी तपस्या और वर-प्राप्ति ११- रावणका संदेश सुनकर पिताकी आज्ञासे कुबेरका लङ्काको छोड़कर कैलासपर जाना, लङ्कामें रावणका राज्याभिषेक तथा राक्षसोंका निवास १२- शूर्पणखा तथा रावण आदि तीनों भाइयोंका विवाह और मेघनादका जन्म
१३- रावणद्वारा बनवाये गये शयनागारमें कुम्भकर्णका सोना, रावणका अत्याचार, कुबेरका दूत भेजकर उसे समझाना तथा कुपित हुए रावणका उस दूतको मार डालना १४- मन्त्रियोंसहित रावणका यक्षोंपर आक्रमण और उनकी पराजय १५- मणिभद्र तथा कुबेरकी पराजय और रावणद्वारा पुष्पकविमानका अपहरण १६- नन्दीश्वरका रावणको शाप, भगवान् शङ्करद्वारा रावणका मान-भङ्ग तथा उनसे चन्द्रहास नामक खड्गकी प्राप्ति १७- रावणसे तिरस्कृत ब्रह्मर्षि कन्या वेदवतीका उसे शाप देकर अग्निमें प्रवेश करना और दूसरे जन्ममें सीताके रूपमें प्रादुर्भूत होना १८- रावणद्वारा मरुत्तकी पराजय तथा इन्द्र आदि देवताओंका मयूर आदि पक्षियोंको वरदान देना १९- रावणके द्वारा अनरण्यका वध तथा उनके द्वारा उसे शापकी प्राप्ति २०- नारदजीका रावणको समझाना, उनके कहनेसे रावणका युद्धके लिये यमलोकको जाना तथा नारदजीका इस युद्धके विषयमें विचार करना २१- रावणका यमलोकपर आक्रमण और उसके द्वारा यमराजके सैनिकोंका संहार २२- यमराज और रावणका युद्ध, यमका रावणके वधके लिये उठाये हुए कालदण्डको ब्रह्माजीके कहनेसे लौटा लेना, विजयी रावणका यमलोकसे प्रस्थान २३- रावणके द्वारा निवातकवचोंसे मैत्री, कालकेयोंका वध तथा वरुणपुत्रोंकी पराजय २४- रावणद्वारा अपहृत हुईं देवता आदिकी कन्याओं और स्त्रियोंका विलाप एवं शाप, रावणका रोती हुईं शूर्पणखाको आश्वासन देना और उसे खरके साथ दण्डकारण्यमें भेजना २५- यज्ञोंद्वारा मेघनादकी सफलता, विभीषणका रावणको पर-स्त्री-हरणके दोष बताना, कुम्भीनसीको आश्वासन दे मधुको साथ ले रावणका देवलोकपर आक्रमण करना २६- रावणका रम्भापर बलात्कार करना और नल-कूबरका रावणको भयंकर शाप देना २७- सेनासहित रावणका इन्द्रलोकपर आक्रमण, इन्द्रकी भगवान् विष्णुसे सहायताके लिये प्रार्थना, भविष्यमें रावण-वधकी प्रतिज्ञा करके विष्णुका इन्द्रको लौटाना, देवताओं और राक्षसोंका युद्ध तथा वसुके द्वारा सुमालीका वध २८- मेघनाद और जयन्तका युद्ध, पुलोमाका जयन्तको अन्यत्र ले जाना, देवराज इन्द्रका युद्धभूमिमें पदार्पण, रुद्रों तथा मरुद्गणोंद्वारा राक्षससेनाका संहार और इन्द्र तथा रावणका युद्ध