बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१३४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| सा चेदस्मै न दद्यान्मैथुनं कर्तुं काममेनामवक्रीणीयादाभरणादिना ज्ञापयेत्। <br><br> तथापि सा नैव दद्यात् काममेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपहत्यातिक्रामेन्मैथुनाय। <br><br> शप्स्यामि त्वां दुर्भगांकरिष्यामीति प्रख्याप्य तामनेन मन्त्रेणोपगच्छेत्—'इन्द्रियेण ते यशसा यश आददे' इति। सा तस्मात्तदभिशापाद् वन्ध्या दुर्भगेति ख्यातायशा एव भवति ॥ ७ ॥ | वह (धर्म) पत्नी यदि इस पतिको मैथुन न करने दे तो वह आभूषण आदिके द्वारा उसपर अपना प्रेम प्रकट करे। <br><br> यदि वैसा करनेपर भी वह मैथुनका अवसर न दे तो पति अपनी इच्छाके अनुसार दण्डका भय दिखाकर उसके साथ बलपूर्वक मैथुनके लिये प्रयत्न करे। <br><br> [ यह भी सम्भव न हो तो ] 'मैं तुझे शाप दे दूँगा, दुर्भगा (वन्ध्या अथवा भाग्यहीना) बना दूँगा।' ऐसा कहकर 'मैं अपने यशोरूप इन्द्रियसे तेरे यशको छीन लेता हूँ' इस मन्त्रका पाठ करते हुए उसके पास जाय। उस अभिशापसे वह 'दुर्भगा' एवं 'वन्ध्या' कही जानेवाली अयशस्विनी ही हो जाती है ॥ ७ ॥ |
सा चेदस्मै दद्यादिन्द्रियेण ते यशसा यश आदधामीति यशस्विनावेव भवतः ॥ ८ ॥
वह पत्नी यदि उस पतिको मैथुनका अवसर दे तो उसे आशीर्वाद देते हुए कहे—'मैं अपनी यशोरूप इन्द्रियद्वारा तुझमें यशकी ही स्थापना करता हूँ।' तब वे दोनों दम्पति यशस्वी ही होते हैं ॥ ८ ॥
| सा चेदस्मै दद्यादनुगुणैव स्याद् भर्तुस्तदानेन मन्त्रेणोपगच्छेत् 'इन्द्रियेण ते यशसा यश आदधामि' | वह पत्नी यदि इस पतिको मैथुनका अवसर दे—पतिके सर्वथा अनुकूल ही रहे, तब पति 'मैं यशोरूप इन्द्रियद्वारा तुझमें यशकी ही स्थापना करता हूँ' इस मन्त्रका पाठ करते हुए उसके |
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३४५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३४५
| इति तदा यशस्विनावेवोभावपि भवतः ॥ ८ ॥ | समीप जाय। तब वे दोनों दम्पति यशस्वी (सन्तानवान्) ही होते हैं॥ ८॥ |
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स यामिच्छेत् कामयेत मेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखँ संधायोपस्थमस्या अभिमृश्य जपेदङ्गादङ्गात् संभवसि हृदयादधिजायसे। स त्वमङ्गकषायोऽसि दिग्घविद्धामिव मादयेमाममूं मयीति ॥६॥
वह पुरुष अपनी जिस पत्नीके सम्बन्धमें ऐसी इच्छा करे कि यह मुझे हृदयसे चाहे, उसकी योनिमें अपनी जननेन्द्रियको स्थापित करके और अपने मुखसे उसके मुखको मिलाकर उसके उपस्थभागका स्पर्श करते हुए इस मन्त्रका जप करे—'हे वीर्य ! तुम मेरे प्रत्येक अङ्गसे प्रकट होते हो, विशेषतः हृदयसे नाड़ीद्वारा तुम्हारा प्रादुर्भाव होता है, तुम मेरे अङ्गोंके रस हो। अतः जिस प्रकार विष लगाये हुए बाणसे घायल हुई हरिणी मूर्च्छित हो जाती है, उसी प्रकार तुम मेरी इस पत्नीको मेरे प्रति उन्मत्त बना दो—इसे मेरे अधीन कर दो' ॥ ६ ॥
| स यां स्वभार्यामिच्छेदियं मां कामयेतेति तस्यामर्थं प्रजनननेन्द्रियं निष्ठाय निक्षिप्य मुखेन मुखं संधायोपस्थमस्या अभिमृश्य जपेदिमं मन्त्रमङ्गादङ्गादिति ॥९॥ | वह पुरुष अपनी जिस पत्नीके सम्बन्धमें ऐसी इच्छा करे कि यह मेरे प्रति कामनायुक्त हो मुझे मन-से चाहने लगे, उसका योनिमें अपनी जननेन्द्रियको स्थापित करके उसके मुखसे अपना मुख मिलाकर उसके उपस्थका स्पर्श करते हुए इस मन्त्रका जप करे—'अङ्गादङ्गादित्यादि' ॥ ६ ॥ |
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अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखँ संधायाभिप्राण्यापान्यादिन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदद इत्यरेता एव भवति ॥ १० ॥
बृ० उ० ८५—
१३४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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अपनी जिस पत्नीके विषयमें ऐसी इच्छा हो कि वह गर्भधारण न करे तो उसकी योनिमें अपनी जननेन्द्रियको स्थापित करके उसके मुखसे अपना मुख मिलाकर अभिप्राणन¹ कर्म करके अपानन क्रिया करे और कहे—'इन्द्रियस्वरूप वीर्यके द्वारा मैं तेरे रेतस्को ग्रहण करता हूँ', ऐसा करनेपर वह रेतोहीन ही हो जाती है—गर्भिणी नहीं होती ॥ १० ॥
| अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीत न धारयेद् गर्भिणी मा भूदिति तस्यामर्थमिति पूर्ववत् ।<br><br>अभिप्राण्याभिप्राणं प्रथमं कृत्वा पश्चादपान्यात्—‘इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आददे' इत्यनेन मन्त्रेणारेता एव भवति न गर्भिणी भवतीत्यर्थः ॥ १० ॥ | पुरुष अपनी जिस पत्नीके विषयमें ऐसी इच्छा करे कि यह गर्भ धारण न करे—गर्भवती न हो तो वह उसकी योनिमें इत्यादि अर्थ पूर्ववत् समझ लेना चाहिये ।<br><br>अभिप्राण्य—प्रथम अभिप्राणन करके पश्चात् 'इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आददे' इस मन्त्रके द्वारा अपानन करे । इससे वह अरेता ही हो जाती है । तात्पर्य यह है कि गर्भवती नहीं होती ॥ १० ॥ |
अथ यामिच्छेद् दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखँ् संधायापान्याभिप्राण्यादिन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामीति गर्भिण्येव भवति ॥ ११ ॥
पुरुषको अपनी जिस पत्नीके सम्बन्धमें ऐसी इच्छा हो कि यह गर्भ धारण करे, वह उसकी योनिमें अपनी जननेन्द्रिय स्थापित करके उसके मुखसे मुख मिलाकर पहले अपानन² क्रिया करके पश्चात् अभिप्राणन कर्म करे और कहे—'मैं इन्द्रियरूप वीर्यके द्वारा तेरे रेतस्का आधान करता हूँ।' ऐसा करनेसे वह गर्भवती ही होती है ॥ ११ ॥
१. पुरुष अपनी शिश्नेन्द्रियद्वारा स्त्रीकी योनिमें जो वायुको प्रविष्ट करता है, उसे 'अभिप्राणन' कर्म कहते हैं और वह जो अपना शिश्नेन्द्रियको बाहर निकालते हुए उस वायुको भी बाहर निकाल देता है, उस क्रियाको 'अपानन' कहते हैं । २. भावनाद्वारा पहले स्त्रीके रेतसयुक्त वायुका आकर्षण करना यहाँ प्रथम 'अपानन-क्रिया' है । अभिप्राणन कर्म तो पूर्ववत् ही है ।
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १३४७
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १३४७
| अथ यामिच्छेद् दधीत गर्भमिति तस्यामर्थमित्यादि पूर्ववत्। पूर्वविपर्ययेणापान्याभिप्राण्यात्— ‘इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामि’ इति गर्भिण्येव भवति ॥ ११ ॥ | जिस पत्नीके सम्बन्धमें ऐसी इच्छा हो कि यह गर्भ धारण करे उसकी योनिमें…इत्यादि अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये। पूर्व मन्त्रके विपरीत पहले अपानन क्रिया करके 'इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामि' इस मन्त्रके द्वारा अभिप्राणन कर्म करे। ऐसा करनेसे वह गर्भवती ही होती है ॥ |
अथ यस्य जायायै जारः स्यात्तं चेद् द्विष्यादामापात्रेऽग्निमुपसमाधाय प्रतिलोमँ शरबर्हिस्तीर्त्वा तस्मिन्नेताः शरभृष्टीः प्रतिलोमाः सर्पिषाक्ता जुहुयान्मम समिद्धेऽहौषीः प्राणापानौ त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीः पुत्रपशूँस्त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीरिष्टासुकृते त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीराशापराकाशौ त आददेऽसाविति स वा एष निरिन्द्रियो विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रैति यमेवंविद् ब्राह्मणः शपति तस्मादेवंविच्छ्रोत्रियस्य दारेण नोपहासमिच्छेदुत ह्येवंवित् परो भवति ॥ १२ ॥
जिस गृहस्थ विद्वान्की पत्नीका किसी जार पुरुषसे सम्बन्ध हो, वह पति उस जारसे द्वेषभाव रखकर उसे दण्ड देना चाहे तो वह मिट्टीके कच्चे बर्तनमें [ पञ्चभूसंस्कारपूर्वक ] अग्नि-स्थापन करके विपरीत क्रमसे अर्थात् दक्षिणाग्र या पश्चिमाग्रभावसे सरकंडोंका बर्हिष बिछाकर उनकी बाणाकार सींकोंको घीसे भिगोकर उनके अग्रभागको विपरीत दिशामें ही रखते हुए उस अग्निमें उनकी चार आहुतियां दे। उन आहुतियोंके मन्त्र
१३४८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ६
१३४८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ६
इस प्रकार हैं—] 'मम समिद्धेऽहौषीः प्राणापानौ त आददे※' [ यह मन्त्र पढ़कर 'फट्' शब्दका उच्चारण करके पहली आहुति दे, [ आहुतिके अन्तमें ] 'असौ मम शत्रुः' इस प्रकार बोलकर शत्रु का नाम लेना चाहिये। पूर्ववत् 'मम समिद्धेऽहौषीः पुत्रपशूंस्त आददे' यह मन्त्र बोलकर दूसरी आहुति दे और अन्तमें 'असौ⋯' कहकर शत्रु का नाम ले। इसी प्रकार 'मम समिद्धेऽहौषीरिष्टासुकृते त आददे' यह मन्त्र बोलकर तीसरी आहुति दे और अन्तमें 'असौ' कहकर शत्रु का नाम ले तथा 'मम समिद्धेऽहौषी-राशापराकाशौ त आददे' यह मन्त्र पढ़कर चौथी आहुति दे और पूर्ववत् 'असौ' कहकर शत्रुके नामका उच्चारण करे। इस प्रकार मन्थ कर्मको जाननेवाला प्राणदर्शी विद्वान् ब्राह्मण जिसको शाप देता है, वह इन्द्रिय-रहित एवं पुण्यहीन होकर इस लोकसे चल बसता है। अतः परस्त्रीगमनके इस भयंकर परिणामको जाननेवाला पुरुष किसी श्रोत्रियकी पत्नीसे समा-गमकी तो बात ही क्या है, परिहासकी भी इच्छा न करे; क्योंकि उक्त अभिचार कर्मको जाननेवाला श्रोत्रिय उसका शत्रु बन जाता है ॥ १२ ॥
| अथ पुनर्यस्य जायायै जार उपपतिः स्यात्तं चेद् द्विष्यादभि-चरिष्याम्येनमिति मन्येत तस्येदं कर्म। आमपात्रेऽग्निमुपसमाधाय सर्वं प्रतिलोमं कुर्यात्तस्मिन्नग्ना- | अब अभिचार कर्म बताते हैं। जिस गृहस्थ विद्वान्की पत्नीका कोई जार उपपति हो, वह पति उस जारसे यदि द्वेष रखता हो तथा इसके प्रति अभिचारका प्रयोग करूँगा, ऐसा निश्चित संकल्प रखता हो तो उसके लिये यह कर्म है। वह मिट्टीके कच्चे बर्तनमें [ पञ्चभूसंस्कारपूर्वक ] अग्नि-स्थापन करके सारी क्रिया विपरीत क्रमसे करे; यथा ईशानसे अग्निकोण- |
※ 'अरे ! यौवन आदिसे प्रकाशित मेरी पत्नीरूप प्रज्वलित अग्निमें तूने वीर्यकी आहुति डाली है, अतः मैं तुझ अपराधीके प्राण और अपानको लिये लेता हूँ।' चारों मन्त्रके अर्थ एक-से हैं। पहलेमें शत्रुके प्राण और अपानको, दूसरेमें पुत्र और पशुओंको, तीसरेमें यज्ञ और पुण्यको तथा चौथेमें प्रार्थना एवं प्रतिज्ञा-पूर्तिकी प्रतीक्षाके अपहरणकी बात कही गयी है।
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १३४९
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १३४९
| वेताः शरभृष्टीः शरेषीकाः प्रति- | की ओर दक्षिणाग्र या पश्चिमाग्र भावसे बर्हिषोंका परिस्तरण करे |
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| लोमाः सर्पिषाक्ता घृताभ्यक्ता | इत्यादि। उस अग्निमें इन बाणाकार सरकंडोंकी सींकोंका प्रतिलोम (दक्षिणाग्र या पश्चिमाग्र) भावसे |
| जुहुयान्मम समिद्धेऽहौषीरित्याद्या | ही रखते हुए घीमें भिगोकर उनकी आहुति दे। 'मम समिद्धेऽहौषीः' इत्यादि चार आहुतियाँ दे और |
| आहुतीरन्ते सर्वासामसाविति नाम | सबके अन्तमें प्रत्येकके साथ 'असौ' बोलकर शत्रुके नामका |
| ग्रहणं प्रत्येकम्। | उच्चारण करे। |
| स एष एवंविद् यं ब्राह्मणः | वह यह इस प्रकार जाननेवाला ब्राह्मण जिसे शाप देता है, |
| शपति स विसुकृतो विगतपुण्य- | वह विसुकृत-पुण्यकर्मशून्य हो इस लोकसे चल बसता है। अतः |
| कर्मा प्रैति। तस्मादेवंविच्छ्रोत्रियस्य | परस्त्रीगमनके ऐसे भीषण परिणामको जाननेवाला पुरुष श्रोत्रिय |
| दारेण नोपहासमिच्छेन्मर्मापि न | विद्वान्की पत्नीसे उपहास-परिहासकी भी इच्छा न करे, फिर |
| कुर्यात् किमुताधोपहासं हि यस्मा- | समागमकी तो बात ही क्या है। |
| देवंविदपि तावत् परो भवति शत्रु- | क्योंकि ऐसे अभिचार कर्मको जाननेवाला विद्वान् भी उसका पराया |
| र्भवतीत्यर्थः ॥ १२ ॥ | अर्थात् शत्रु बन जाता है॥ १२ ॥ |
अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत् त्र्यहं कँसे न पिबेदहतवासा नैनां वृषलो न वृषल्युपहन्यात् त्रिरात्रान्त आप्लुत्य व्रीहीनवघातयेत् ॥ १३ ॥
जिसकी पत्नीको ऋतुभाव (रजोधर्म) प्राप्त हो, उसकी वह पत्नी तीन दिनोंतक काँसके बर्तनोंमें न खाय और चौथे दिन स्नानके बाद ऐसा वस्त्र
१३५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६
| १३५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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पहने जो फटा न हो, साफ-सुथरा हो। इसे कोई शूद्रजातीय स्त्री या पुरुष न छुए। वह रजस्वला नारी जब तीन दिन बीतनेपर स्नान कर ले तो उसे धान कूटनेके काममें लगावे ॥ १३ ॥
| अथ यस्य जायामार्तवं विन्देदृ- | ‘अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत्’ इत्यादि ग्रन्थको ‘श्रीर्ह वा | | तुभावः प्राप्नुयादित्येवमादिग्रन्थः | एषा स्त्रीणां’ इस मन्त्रभागके पहले समझना चाहिये; क्योंकि अर्थबल- | | श्रीर्ह वा एषा स्त्रीणामित्यतःपूर्व | से ऐसा ही ठीक जान पड़ता है। जिसकी पत्नीको आर्तव—ऋतु- | | द्रष्टव्यः सामर्थ्यात् । त्र्यहं कंसेन | भाव (रजोधर्म) प्राप्त हो, उसकी वह पत्नी तीन दिनोंतक काँसेके | | पिबेदहतवासाश्च स्यात् । नैनां | बर्तनमें न खाय और चौथे दिन स्नान करके ऐसा वस्त्र पहने जो | | स्नातामस्नातां च वृषलो वृषली वा | फटा न हो, साफ-सुथरा हो। स्नानके बाद और पहले भी उस | | नोपहन्यान्नोपस्पृशेत् । | ऋतुमती स्त्रीको कोई शूद्रजातीय स्त्री या पुरुष न छुए। | | त्रिरात्रान्ते त्रिरात्र- | तीन रात बीतनेपर—त्रिरात्र-व्रतकी समाप्ति होनेपर वह आप्ल- | | व्रतसमाप्तावाप्लुत्य स्नात्वा- | वन-स्नान करनेके पश्चात् जो फटा न हो, ऐसा स्वच्छ वस्त्र पहने, इस | | हतवासाः स्यादिति व्यवहितेन | प्रकार व्यवधानयुक्त अहतवासा | | सम्बन्धः । तामाप्लुतां व्रीहीनव- | पदके साथ इस वाक्यका अन्वय है। स्नान करनेके पश्चात् उस स्त्री- | | घातयेद् व्रीह्यवघाताय तामेव | से धान कुटावे। धान कूटनेके | | विनियुञ्ज्यात् ॥ १३ ॥ | कार्यमें उसीको लगावे ॥ १३ ॥ |
स य इच्छेत् पुत्रो मे शुक्लो जायेत वेदमनुब्रुवीत सर्वमायुरियादिति क्षीरौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १४ ॥
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३५१
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३५१
जो पुरुष चाहता हो कि मेरा पुत्र शुक्ल वर्णका हो, एक वेदका अध्ययन करे और पूरे सौ वर्षोंकी आयुतक जीवित रहे, उस दशामें वे दोनों पति-पत्नी दूध और चावलको पकाकर खीर बना लें और उसमें घी मिलाकर खायें। इससे वे उपर्युक्त योग्यतावाले पुत्रको उत्पन्न करनेमें समर्थ होते हैं ॥ १४ ॥
| स य इच्छेत् पुत्रो मे शुक्लो वर्णतो जायेत वेदमेकमनुब्रुवीत सर्वमायुरियाद् वर्षशतं क्षीरौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ समर्थौ जनयितवै जनयितुम् ॥ १४ ॥ | जो पुरुष चाहता हो कि मेरा पुत्र शुक्ल वर्णका उत्पन्न हो, एक वेदका अध्ययन करे तथा पूरी आयु भर—सौ वर्षोंतक जीवित रहे तो वे दोनों पति-पत्नी दूध-चावलका खीर पकाकर उसमें घी डालकर खायें। इससे वे वैसे पुत्रको जन्म देनेमें समर्थ होते हैं ॥ १४ ॥ |
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अथ य इच्छेत् पुत्रो मे कपिलः पिङ्गलो जायेत द्वौ वेदावनुब्रुवीत सर्वमायुरियादिति दध्योदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १५॥
जो चाहे कि मेरा पुत्र कपिल या पिङ्गल वर्णका हो, दो वेदोंका अध्ययन करे और पूरे सौ वर्षोंतक जीवित रहे तो वह और उसकी पत्नी दहीके साथ भात पकाकर उसमें घी मिलाकर खायें। इससे वे वैसे पुत्रको जन्म देनेमें समर्थ होते हैं ॥ १५ ॥
| दध्योदनं दध्ना चरुं पाचयित्वा द्विवेदं चेदिच्छति पुत्रं तदैवमशननियमः ॥ १५ ॥ | दध्योदन बनाकर—दहीके साथ चरु पकाकर (दोनों दम्पति भोजन करें) यदि द्विवेदी पुत्रको पानेकी इच्छा हो, तब ऐसे भोजनका नियम है ॥१५॥ |
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१३५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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अथ य इच्छेत् पुत्रो मे श्यामो लोहिताक्षो जायेत त्रीन् वेदाननुब्रुवीत सर्वमायुरियादित्यौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १६ ॥
जो चाहे कि मेरा पुत्र श्याम वर्ण, अरुण नयन हो, तीन वेदोंका स्वाध्याय करे तथा पूरे सौ वर्षोंतक जीवित रहे, वह और उसकी पत्नी केवल जलमें चावल पकाकर भात तैयार कर लें और उसमें घी मिलाकर खायँ। इससे वे उक्त योग्यतावाले पुत्रको जन्म देनेमें समर्थ होते हैं ॥ १६ ॥
| केवलमेव स्वाभाविकमोदनम् । उदग्रहणमन्यप्रसङ्गनिवृत्त्यर्थम् ॥ १६ ॥ | केवल स्वाभाविक ही भात खायँ, 'उद' शब्दका प्रयोग दुग्ध आदि अन्य प्रसङ्गोंकी निवृत्तिके लिये है ॥ १६ ॥ |
अथ य इच्छेद् दुहिता मे पण्डिता जायेत सर्वमायुरियादिति तिलौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १७ ॥
जो चाहता हो कि मेरी पुत्री विदुषी हो और पूरे सौ वर्षोंकी आयुतक जीवित रहे, वह और उसकी पत्नी तिल और चावलकी खिचरी पकाकर उसमें घी मिलाकर खायँ। इससे वे उक्त योग्यतावाली कन्याको जन्म देनेमें समर्थ होते हैं ॥ १७ ॥
| दुहितुः पाण्डित्यं गृह्तन्त्रविषयमेव वेदेऽनधिकारात् । तिलौदनं कृशरम् ॥ १७ ॥ | गृहशास्त्रमें निपुण होना ही पुत्रीका पाण्डित्य है; क्योंकि वेदमें उसका अधिकार नहीं है। तिलौदनका अर्थ है तिल-चावलकी खिचड़ी ॥ १७ ॥ |
अथ य इच्छेत् पुत्रो मे पण्डितो विगीतः समितिंगमः शुश्रूषितां वाचं भाषिता जायेत सर्वान् वेदाननुब्रु-
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५३
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५३
वीत सर्वमायुरियादिति माँ सौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्रीयातामीश्वरौ जनयितवा औक्षेण वार्षभेण वा ॥ १८ ॥
जो चाहता हो कि मेरा पुत्र प्रख्यात पण्डित, विद्वानोंकी सभामें निर्भय प्रवेश करनेवाला तथा श्रवणसुखद वाणी बोलनेवाला हो, सम्पूर्ण वेदोंका स्वाध्याय करे और पूरे सौ वर्षोंतक जीवित रहे, वह पुरुष और उसकी पत्नी ओषधियोंका गूदा और चावल पकाकर उसमें घी मिलाकर खायें। इससे वे उक्त योग्यतावाले पुत्रको जन्म देनेमें समर्थ होते हैं। उक्षा अथवा ऋषभ नामक ओषधिके गूदेके साथ खानेका नियम है ॥ १८ ॥
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| विविधं गीतो विगीतः प्रख्यात इत्यर्थः । समितिङ्गमः सभां गच्छतीति प्रगल्भ इत्यर्थः । पाण्डित्यस्य पृथग्ग्रहणात् । शुश्रूषितां श्रोतुमिष्टां रमणीयां वाचं भाषिता संस्कृताया अर्थवत्या वाचो भाषितेत्यर्थः । <br><br> मांसमिश्रमोदनं मांसौदनम् । <br><br> तन्मांसनियमार्थमाह— <br><br> औक्षेण वा मांसेन । उक्षा सेचनस- | नाना प्रकारसे जिसकी महत्ता गायी जाय, वह विगीत कहलाता हे। विगीत अर्थात् प्रख्यात। समितिङ्गम—विद्वानोंकी सभामें जानेवाला निर्भीक या प्रगल्भ। 'समितिङ्गमः' का अर्थ विद्वान् या पण्डित इसलिये नहीं किया गया कि मन्त्रमें पाण्डित्यका पृथक् ग्रहण देखा जाता है। शुश्रूषिता—सुननेमें प्रिय, रमणीयवाणीका वक्ता अर्थात् संस्कारयुक्त सार्थकवाणी बोलनेवाला। <br><br> ओषधि अथवा फलके गूदेको मांस कहते हैं; उससे मिश्रित भातको यहाँ 'मांसोदन' कहा गया है। उस ओषधिके गूदेका नियम करनेके लिये कहते हैं—उक्षाके गूदेके साथ। गर्भाधानमें समर्थ साँडको उक्षा कहते हैं। उसीके समान शक्तिशाली होनेसे ओषधि-विशेषका नाम भी उक्षा* हे, |
- 'उक्षा' शब्दके कोषमें दो प्रकारके अर्थ मिलते हैं। कलकत्तेसे प्रकाशित 'वाचस्पत्य' नामक बृहत् संस्कृताभिधानमें उसे अष्टवर्गान्तर्गत ऋषभ' नामक
१३५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| मर्थः पुंगवस्तदीयं मांसम् ।<br><br>ऋषभस्ततोऽप्यधिकवयास्तदीय-<br><br>मार्षभं मांसम् ॥ १८ ॥ | उसीका गूदा यहां अभीष्ट है। पूर्वोक्त सांडसे भी अधिक अवस्था वाले बैलको ऋषभ कहते हैं, उसके समान शक्तिशाली ओषधिशेषका नाम भी ऋषभ※ है। उसीके गूदे- को यहाँ 'आर्षभ' समझना चाहिये ॥ १ ॥ |
ओषधिका पर्याय माना गया है—'ऋषभ ओषधौ च'। प्रसिद्ध अंग्रेज विद्वान् सर मोनियर विलियम्सने अपने बृहत् संस्कृत-अंग्रेजीकोषमें इसे 'सोम' नामक पौधेका पर्याय माना है।
※ 'ऋषभ' नामक ओषधिका आयुर्वेदके अत्यन्त प्राचीन एवं प्रामाणिक ग्रन्थ 'सुश्रुत-संहिता' के 'सूत्रस्थान' नामक प्रथम खण्डके ३८ वें अध्यायमें (जो द्रव्यसंग्रहणीयाध्याय भी कहलाता है) सैंतीस द्रव्यगणोंके अन्तर्गत उल्लेख हुआ है। 'भावप्रकाश' नामक प्रसिद्ध संग्रह ग्रन्थमें उसका वर्णन इस रूपमें आया है—
जीवकर्षभकौ ज्ञेयौ हिमाद्रिशिखरोद्भवौ ।
रसोतकन्दवत् कन्दौ निःसारौ सूक्ष्मपत्रकौ ॥
................... ऋषभो वृषशृङ्गवत् ।
.............................................॥
ऋषभो वृषभो वीरो विषाणी ब्राह्म इत्यपि ।
जीवकर्षभकौ बल्यौ शीतौ शुक्रकफप्रदौ ।
मधुरौ पित्तदाहघ्नौ काशवातक्षयावहौ ॥
जीवक और ऋषभक, (ऋषभ) नामकी ओषधियाँ हिमालयके शिखरपर उत्पन्न होती हैं। उनकी जड़ लहसुनके सदृश होती है। दोनोंमें ही गूदा नहीं होता, केवल त्वचा होती है; दोनोंमें छोटी-छोटी पत्तियाँ होती हैं। इनमेंसे ऋषभ बैलके सींगकी आकृतिका होता है। इसके दूसरे नाम हैं—वृषभ, वीर, विषाणी, ब्राह्म आदि। जीवक और ऋषभ दोनों ही बलकारक, शीत, वीर्य और कफ बढ़ानेवाले, मधुर, पित्त और दाहका शमन करनेवाले तथा खाँसी एवं वातरोगका नाश करनेवाले हैं।
ऋषभकी प्रसिद्ध अष्टवर्ग नामक ओषधियोंमें गणना है। भावप्रकाशकार लिखते हैं—
जीवकर्षभकौ मेदे काकोल्यौ ऋद्धिवृद्धिके ।
अष्टवर्गोऽष्टभिर्द्रव्यैः कथितश्चरकादिभिः ॥
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५५
अथाभिप्रतरेव स्थालीपाकावृताज्यं चेष्टित्वा स्थालीपाकस्योपघातं जुहोत्यग्नये स्वाहानुमतये स्वाहा देवाय सवित्रे सत्यप्रसवाय स्वाहेति हुत्वोद्धृत्य प्राश्नाति प्राश्येतरस्याः प्रयच्छति प्रक्षाल्य पाणी उदपात्रं पूरयित्वा तेनैनां त्रि॑रभ्युक्षत्युत्तिष्ठातो विश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्यां सं जायां पत्या सहेति ॥ १६ ॥
तदनन्तर चौथे दिन प्रातःकाल ही [ संध्या आदिका अनुष्ठान करके ] पत्नीके कूटे हुए चावलोंको लेकर स्थालीपाककी विधिसे घीका संस्कार करके चरु पकाकर उसका भी संस्कार करके स्थालीपाकके अन्नमें से थोड़ा-थोड़ा लेकर प्रधान आहुतियां दे, उनके मन्त्र इस प्रकार हैं—'अग्नये स्वाहा, अनुमतये स्वाहा, देवाय सवित्रे सत्यप्रसवाय स्वाहा'। इस प्रकार आहुति देकर 'स्विष्टकृत्' होम करके स्थालीमें बचे हुए चरुको एक पात्रमें निकालकर उसमें घी मिलाकर पहले पति उस अन्नको खाता है। खाकर उसी उच्छिष्ट अन्नको अपनी पत्नीके लिये देता है। तत्पश्चात् हाथ-पैर धोकर शुद्ध आचमन करके जलपात्रको भरकर उसी जलसे अपनी पत्नीका तीन बार अभिषेक करे। अभिषेकका मन्त्र इस प्रकार है—'उत्तिष्ठातो विश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्यां सं जायां पत्या सह' ॥१६॥
| अथाभिप्रतरेव कालेऽवघातनिर्वृत्तांस्तण्डुलानादाय स्थालीपाकावृता स्थालीपाकविधिनाज्यं चेष्टित्वाज्यसंस्कारं कृत्वा चरुं श्रपयित्वा स्थालीपाकस्याहुतीर्जुहोत्युपघातमुपहृत्योपहृत्याग्नये स्वाहेत्याद्याः। गा०ः सर्वो विधिर्द्रष्टव्योऽत्र । | तदनन्तर प्रातःकाल ही कूटनेसे तैयार हुए चावलोंको लेकर स्थालीपाककी विधिसे घीका संस्कार करके चरुको पकाकर स्थालीपाककी आहुति दे। स्थालीपाकमेंसे थोड़ा-थोड़ा अन्न लेकर 'अग्नये स्वाहा' इत्यादि मन्त्रोंसे तीन आहुतियां दे। यहां सारी विधि अपने-अपने गृह्यसूत्रके अनुसार समझनी चाहिये। |
१३५६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६
१३५६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६
| हुत्वोद्धृत्य चरुशेषं प्राश्नाति स्वयं प्राश्येतरस्याः पत्न्यै प्रयच्छत्युच्छिष्टम्। प्रक्षाल्य पाणी आचम्योदपात्रं पूरयित्वा तेनोदकेनैनां त्रिरभ्युक्षत्यनेन मन्त्रेणोत्तिष्ठात इति सकृन्मन्त्रोच्चारणम् ॥ १९ ॥ | हवन करके शेष चरुको एक पात्रमें निकालकर पति स्वयं भोजन करे। भोजन करके उच्छिष्ट भाग पत्नीको अर्पण करे। तत्पश्चात् हाथ पैर धोकर शुद्ध आचमन करके जलपात्र भरकर उसी जलसे पत्नीका तीन बार 'उत्तिष्ठात' इत्यादि मन्त्रके द्वारा अभिषेक करे। मन्त्रका पाठ एक ही बार करना चाहिये ॥ १९ ॥ |
अथैनामभिपद्यतेऽमोऽहमस्मि सा त्वँ॒ सा त्वमस्य- मोऽहं सामाहमस्मि ऋक् त्वं द्यौरहं पृथिवी त्वं तावेहि सँ॒रभावहै सह रेतो दधावहै पुँ॒से पुत्राय वित्तय इति ॥ २० ॥
तदनन्तर पति अपनी कामनाके अनुसार पत्नीको खीर आदि भोजन करानेके पश्चात् शयनकालमें 'अमोऽहमस्मि' इत्यादि मन्त्र पढ़कर उसका आलिङ्गन करे। [उस मन्त्रका भाव इस प्रकार है—] 'देवि! मैं प्राण हूँ, तुम वाक् हो; तुम वाक् हो, मैं प्राण हूँ; मैं साम हूँ, तुम ऋत हो; मैं आकाश हूँ, तुम पृथिवी हो; अतः आओ, हम दोनों दम्पति एक दूसरेका आलिङ्गन करें, एक साथ रेतस् धारण करें, जिससे हमें पुरुषत्वविशिष्ट पुत्रका लाभ हो ॥ २० ॥
| अथैनामभिमन्त्र्य क्षीरौदनादि यथापत्यकामं भुक्त्वेति क्रमो द्रष्टव्यः। संवेशनकालेऽमोऽहमस्मीत्यादिमन्त्रेणाभिपद्यते। २०। | तदनन्तर इस पत्नीको अभिमन्त्रित करके जैसी संतानकी इच्छा हो, उसके अनुसार खीर आदि भोजन करनेके पश्चात् उसके साथ शयन करे। यह क्रम समझना चाहिये। शयन-कालमें 'अमोऽहमस्मि' इत्यादि मन्त्रसे पत्नीका आलिङ्गन करे ॥ २० ॥ |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५७
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५७
अथास्या ऊरू विहापयति विजिहीथां द्यावा-पृथिवी इति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखँ संधाय त्रिरेनामनुलोमामनुमार्ष्टि विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिँशतु । आसिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते । गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि पृथुष्टुके । गर्भं ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ ॥ २१॥
तत्पश्चात् पत्नीके ऊरुद्वय (दोनों जांघों) को एक दूसरेसे विलग करे । [उस समय यह मन्त्र पढ़ना चाहिये—] 'विजिहीथां द्यावापृथिवी इति' (हे ऊरुस्वरूप आकाश और पृथिवी ! तुम दोनों विलग होओ) इसके बाद पत्नीकी योनिमें अपनी जननेन्द्रिय स्थापित करके उसके मुँहसे मुँह मिलाकर अनुलोम-क्रमसे पत्नीके [केशादि पादान्त] सम्पूर्ण शरीरका तीन बार मार्जन करे [मार्जन-कालमें 'विष्णुर्योनिं कल्पयतु' इत्यादि मन्त्रका पाठ करे, जिसका भाव इस प्रकार है--] 'प्रिये ! सर्वव्यापी भगवान् विष्णु तेरी जननेन्द्रियको पुत्रकी उत्पत्तिमें समर्थ बनावें। भगवान् सूर्य तेरे [तथा उत्पन्न होनेवाले बालकके] अङ्गोंको विभाग-पूर्वक पुष्ट एवं दर्शनीय बनावें। विराट् पुरुष भगवान् प्रजापति मुझसे अभिन्नरूपमें स्थित हो तुझमें वीर्यका आधान करें। भगवान् धाता मुझसे अभिन्न भावसे स्थित हो तेरे गर्भका धारण एवं पोषण करें। देवि ! जिसकी भूरि-भूरि स्तुति की जाती है, वह सिनीवाली (जिसमें चन्द्रमाकी एक कला शेष रहती है, वह अमावास्या) तुम हो, तुम यह गर्भ धारण करो, धारण करो। देव अश्विनीकुमार (सूर्य और चन्द्रमा) अपनी किरणरूपी कमलोंकी माला धारण करके मुझसे अभिन्नरूपमें स्थित हो तुझमें गर्भका आधान करें ॥ २१ ॥
| अथास्या ऊरू विहापयति<br>विजिहीथां द्यावापृथिवी इत्यनेन।<br>तस्यामर्थमित्यादिपूर्ववत् । त्रिरेनां | तदनन्तर 'विजिहीथां द्यावापृथिवी इस मन्त्रसे पत्नीके ऊरुद्वयको एक दूसरेसे अलग करे । 'तस्यामर्थं' इत्यादि मन्त्रभागका अर्थ पूर्ववत् है । |
१३५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६
| १३५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| शिरःप्रभृत्यनुलोममनुमार्ष्टि विष्णुर्योनिमित्यादि प्रतिमन्त्रम् ॥ २१ ॥ | ‘विष्णुर्योनिं’ इत्यादि मन्त्रोंमेंसे प्रत्येकको पढ़कर पत्नीके मस्तकसे लेकर पैरतकके अङ्गोंको तीन-तीन बार मार्जन (स्पर्श) करे ॥ २१ ॥ |
हिरण्मयी अरणी याभ्यां निर्मन्थतामश्विनौ, तं ते गर्भं हवामहे दशमे मासि सूतये । यथाग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी । वायुर्दिशां तथा गर्भ एवं गर्भं दधामि तेऽसाविति ॥२२॥
प्राचीन कालमें ज्योतिर्मयी अरणियां थीं, जिनसे अश्विनीकुमारोंने मन्थन किया। उस मन्थनसे अमृतरूप गर्भ प्रकट हुआ। उसी अमृतरूप गर्भको हम तेरी कुक्षिमें स्थापित करते हैं। इसलिये कि तू इसे दशवें महीनेमें उत्पन्न कर सके। जैसे पृथ्वीका गर्भ अग्नि है, जैसे स्वर्गीय भूमि इन्द्रसे गर्भवती है, जैसे दिशाओंका गर्भ वायु है, उसी प्रकार मैं तुझमें पुत्ररूप गर्भ स्थापित करता हूँ, अमुक देवि ! ॥ २२ ॥
| अन्ते नाम गृह्णात्यसाविति तस्याः ॥ २२ ॥ | ‘असौ’ पदके द्वारा यह सूचित किया गया है कि अन्तमें पत्नीका नामोच्चारण करना चाहिये ॥ २२ ॥ |
सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति । यथा वायुः पुष्करिणीँ समिङ्गयति सर्वतः । एवा ते गर्भ एजतु सहावैतु जरायुणा । इन्द्रस्यायं व्रजः कृतः सार्गलः सपरिश्रयः । तमिन्द्र निर्जहि गर्भेण सावराँसहेति ॥ २३ ॥
प्रसवकालमें प्रसव करनेवाली स्त्रीके ऊपर ‘यथा वायुः............’ इत्यादि मन्त्र पढ़कर जल छिड़के। [ मन्त्रार्थ इस प्रकार है—] ‘जैसे
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५९
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५९
वायु पोखरीके जलको सब ओरसे चञ्चल कर देती है, उसी प्रकार तेरा गर्भ अपने स्थानसे चले और जरायुके साथ बाहर निकले। इन्द्र (प्रसूति वायुके) लिये यह योनिरूप मार्ग निर्मित हुआ है; जो अर्गला--गर्भवेष्टन (जरायु) के साथ है। इन्द्र! (प्रसव-वायो!) उस मार्गपर पहुँचकर तुम गर्भ एवं मांसपेशीके साथ बाहर निकलो ॥ २३ ॥
| सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति प्रसवकाले सुखप्रसवनार्थमनेन मन्त्रेण । यथा वायुः पुष्करिणीं समिङ्गयति सर्वतः । एवा ते गर्भ एजत्विति ॥ २३ ॥ | प्रसवकालमें सुखपूर्वक बच्चा पैदा करनेके लिये 'यथा वायुः पुष्करिणीं समिङ्गयति सर्वतः । एवा ते गर्भ एजतु' इत्यादि मन्त्र पढ़कर प्रसव करनेवाली स्त्रीको जलसे सींचे ॥ २३ ॥ |
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| अथ जातकर्म— | अब जातकर्मका वर्णन करते हैं— |
जातेऽग्निमुपसमाधायाङ्क आधाय कँसे पृषदाज्यँ संनीय पृषदाज्यस्योपघातं जुहोत्यस्मिन् सहस्रं पुष्यासमेधमानः स्वे गृहे । अस्योपसन्त्यां मा च्छैत्सीत् प्रजया च पशुभिश्च स्वाहा । मयि प्राणाँस्त्वयि मनसा जुहोमि स्वाहा । यत् कर्मणा त्यरीरिचं यद् वा न्यूनमिहाकरम् । अग्निष्टत्स्विष्टकृद् विद्वान् स्विष्टँ सुहुतं करोतु नः स्वाहेति ॥ २४ ॥
पुत्र उत्पन्न होनेपर पिता उसे अपनी गोदमें लेकर अग्निकी स्थापना करके काँसके कटोरेमें दधिमिश्रित घी रखकर उसका थोड़ा-थोड़ा-सा अंश लेकर "अस्मिन् सहस्रम्" इत्यादि मन्त्रोंद्वारा अग्निमें आहुति दे। [मन्त्रार्थ इस प्रकार है] अपने इस घरमें पुत्ररूपसे वृद्धिको प्राप्त हुआ मैं सहस्रों मनुष्योंका एकमात्र पोषण करनेवाला होऊँ। मेरे इस पुत्रकी संततिमें प्रजा तथा पशुओंके साथ सम्पत्तिका कभी उच्छेद न हो—स्वाहा। मुझ पितामें जो प्राण हैं, उन प्राणोंका तुझ पुत्रमें मैं मन-ही-मन होम करता हूँ, स्वाहा। मैंने प्रधान कर्म करनेके साथ-साथ जो कुछ अधिक कार्य कर डाला हो
१३६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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अथवा आवश्यक कर्ममें भी जो न्यूनता (त्रुटि) कर दी हो, हमारे उस कर्मको विद्वान् अग्निदेव स्विष्टकृत् (अभीष्टसाधक) होकर स्विष्ट और सुहुत (न्यूनातिरिक्त दोषसे रहित) कर दें—स्वाहा ॥ २४ ॥
| जातेऽग्निमुपसमाधायाङ्क<br>आधाय पुत्रं कंसे पृषदाज्यं संनीय<br>संयोज्य दधि घृते पृषदाज्यस्योप-<br>घातं जुहोत्यस्मिन् सहस्रमित्या-<br>द्यावापस्थाने ॥ २४ ॥ | पुत्र जन्म होनेपर अग्निस्थापन करके पुत्रको गोदमें लेकर और काँसके कटोरेमें दधिमिश्रित घृत रखकर दहीको घीमें मिलाकर उसका थोड़ा-थोड़ा-सा अंश लेकर 'अस्मिन् सहस्रम्' इत्यादि मन्त्रसे अग्निके आवाप स्थानमें आहुति दे ॥ २४ ॥ |
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अथास्य दक्षिणं कर्णमभिनिधाय वाग् वागिति त्रिरथ दधि मधु घृतँ संनीयानन्तर्हितेन जातरूपेण प्राशयति। भूस्ते दधामि भुवस्ते दधामि स्वस्ते दधामि भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दधामीति ॥ २५ ॥
स्विष्टकृत् होमके अनन्तर पिता शिशुके दाहिने कानको अपने मुखके पास ले आकर 'वाक् वाक् वाक्' इस प्रकार तीन बार कहे¹। तत्पश्चात् दही, मधु और घी एकमें मिलाकर उसे दूसरे धातुओंके मेलसे रहित विशुद्ध सोनेकी चम्मचसे बालकको चटावे [ उस समय इन चार मन्त्रोंका पाठ करे ] 'भूस्ते दधामि' 'भुवस्ते दधामि' 'स्वस्ते दधामि' 'भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दधामि'² ॥ २५ ॥
| अथास्य दक्षिणं कर्णम-<br>भिनिधाय स्वं ' मुखं<br>वाग् वागिति त्रिजपेत् । | तदनन्तर इस बालकके दाहिने<br>कानको अपने मुखके पास ले जाकर<br>'वाक् वाक्' यह तीन बार जपे । |
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१. तीन बार कहनेका तात्पर्य यह है कि तेरी बुद्धिमें वेदत्रयीरूप वाणी प्रवेश करे।
२. मैं तुझमें भूर्लोककी स्थापना करता हूँ, भुवर्लोककी स्थापना करता हूँ, स्वर्लोककी स्थापना करता हूँ तथा भूर्भुवः स्वः सब लोकोंकी स्थापना करता हूँ।
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १३६१
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १३६१
| अथ दधि मधु घृतं संनीयानन्त-<br><br>र्हितेनाव्यवहितेन जातरूपेण<br><br>हिरण्येन प्राशयत्येतैर्मन्त्रैः<br><br>प्रत्येकम् ॥ २५ ॥ | तत्पश्चात् काँसके कटोरेमें दही, मधु और घी लेकर किसी दूसरे द्रव्यके व्यवधानसे रहित विशुद्ध सोनेकी चम्मचद्वारा 'भूस्ते' इत्यादि मन्त्र पढ़कर बालकको प्रत्येक वस्तु चटावे ॥ २५ ॥ |
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नाम-कर्म
अथास्य नाम करोति वेदोऽसीति तदस्य तद्गुह्यमेव नाम भवति ॥ २६ ॥
इसके बाद बालकका नामकरण करे। 'तुम वेद हो।' अतः वेद यह उस बालकका गुप्त नाम ही होता है ॥ २६ ॥
| अथास्य नामधेयं करोति वेदोऽसीति । तदस्य तद् गुह्यं नाम भवति वेद इति ॥ २६ ॥ | इसके बाद इस बालकका नामकरण करे 'तुम वेद हो' अतः वेद उस बालकका गोपनीय नाम होता है ॥ २६ ॥ |
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अथैनं मात्रे प्रदाय स्तनं प्रयच्छति यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः । येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवे करिति ॥ २७ ॥
तदनन्तर इस बालकको माताकी गोदमें देकर 'यस्ते स्तनः' इत्यादि मन्त्र पढ़ते हुए स्तन पिलावे [मन्त्रका भाव इस प्रकार है-] 'हे सरस्वति ! तुम्हारा जो स्तन दूधका अक्षयभण्डार तथा पोषणका आधार है, जो रत्नोंकी खान है तथा सम्पूर्ण धन-राशिका ज्ञाता और उदार दानी है तथा जिसके द्वारा तुम समस्त वरणीय पदार्थोंका पोषण करती हो, इस सत्पुत्रके जीवनधारणार्थ उस स्तनको तुम मेरी पत्नीके शरीरमें प्रविष्ट होकर इस शिशुके मुखमें दे दो ॥ २७ ॥
बृ० उ० ८६—
१३६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६
| १३६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| अथैनं मात्रे प्रदाय स्वाङ्कस्थं स्तनं प्रयच्छति यस्ते स्तन इत्यादिमन्त्रेण ॥ २७ ॥ | तदनन्तर अपने अङ्कमें बैठे हुए इस शिशुको माताकी गोदमें देकर ‘यस्ते स्तनः’ इत्यादि मन्त्रके द्वारा उसका स्तन बालकके मुँहमें दे ॥ २७ ॥ |
अथास्य मातरमभिमन्त्रयते । इलासि मैत्रावरुणी वीरे वीरमजीजनत् । सा त्वं वीरवती भव यास्मान् वीरवतोऽकरदिति । तं वा एतमाहुरतिपितां बताभूरतिपितामहो बताभूः परमां बत काष्ठां प्रापच्छ्रिया यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवंविदो ब्राह्मणस्य पुत्रो जायत इति ॥ २८ ॥
इसके बाद बालककी माताको इस प्रकार ‘इलासि’ इत्यादि मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित करे [ मन्त्रका भाव इस प्रकार है ] ‘हे देवि ! तू ही स्तुतिके योग्य मैत्रावरुणी (अरुन्धती) है। वीरे ! तूने वीर पुत्रको जन्म देकर हमें वीरवान्—वीर पुत्रका पिता बनाया है, अतः तू वीरवती हो। इस बालकको देखकर दूसरे लोग कहें—‘तू सचमुच अपने पितासे भी आगे बढ़ गया, तू निःसंदेह अपने पितामहसे भी श्रेष्ठ निकला, तू लक्ष्मी, कीर्ति तथा ब्रह्मतेजके द्वारा उन्नतिकी चरम सीमाको पहुँच गया।’ इस प्रकार विशिष्टज्ञानसम्पन्न जिस ब्राह्मणके ऐसा पुत्र उत्पन्न होता है, वह पिता भी इसी प्रकार स्तुत्य होता है ॥ २८ ॥
| अथास्य मातरमभिमन्त्रयत इलासीत्यनेन। तं वा एतमाहुरित्यनेन विधिना जातः पुत्रः पितरं पितामहं चातिशेत इति श्रिया यशसा ब्रह्मवर्चसेन परमां | इसके बाद ‘इलासि’ इत्यादि मन्त्रद्वारा इस बालककी माताको अभिमन्त्रित करे। ‘तं वा एतमाहुः’ इस वाक्यद्वारा यह बताया गया है कि शास्त्रीय विधिसे उत्पन्न किया हुआ पुत्र अपने पिता और पितामहसे भी आगे बढ़ जाता है तथा ‘तू लक्ष्मी, कीर्ति तथा ब्रह्मचर्यके द्वारा उन्नतिकी परा- |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३६३
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३६३
| निष्ठां प्रापादित्येवं स्तुत्यो भवतीत्यर्थः। यस्य चैवंविदो ब्राह्मणस्य पुत्रो जायते स चैवं स्तुत्यो भवतीत्यध्याहार्यम् ॥ २८ ॥ | काष्ठाको पहुँच गया' इस प्रकार कहकर लोग उसकी स्तुति करते हैं। ऐसे विशिष्टज्ञानसे सम्पन्न जिस ब्राह्मणके ऐसा पुत्र होता है, वह पिता भी उस पुत्रकी भाँति ही स्तुतिका पात्र हो जाता है ॥ २८ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये चतुर्थब्राह्मणम् ॥ ४ ॥
पञ्चम ब्राह्मण
समस्त प्रवचनका वंश
अथ वँशः । पौतिमाषीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात् कात्यायनीपुत्रो गौतमीपुत्राद् गौतमीपुत्रो भारद्वाजीपुत्राद् भारद्वाजीपुत्रः पाराशरीपुत्रात् पाराशरीपुत्र औपस्वस्तीपुत्रादौपस्वस्तीपुत्रः पाराशरीपुत्रात् पाराशरीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात् कात्यायनीपुत्रः कौशिकीपुत्रात् कौशिकीपुत्र आलम्बीपुत्राच्च वैयाघ्रपदीपुत्राच्च वैयाघ्रपदीपुत्रः काण्वीपुत्राच्च कापीपुत्राच्च कापीपुत्रः ॥ १ ॥ आत्रेयीपुत्रादात्रेयीपुत्रो गौतमीपुत्राद् गौतमीपुत्रो भारद्वाजीपुत्राद् भारद्वाजीपुत्रः पाराशरीपुत्रात् पाराशरीपुत्रो वात्सीपुत्राद् वात्सीपुत्रः पाराशरीपुत्रात् पाराशरीपुत्रो वार्कारुणीपुत्राद् वार्कारुणीपुत्रो वार्कारुणीपुत्राद् वार्कारुणीपुत्र आर्तभागीपुत्रादार्तभागीपुत्रः शौङ्गीपुत्राच्छौङ्गीपुत्रः सांकृतीपुत्रात् सांकृतीपुत्र आलम्बायनीपुत्रादालम्बायनीपुत्र आलम्बीपुत्रादालम्बीपुत्रो जायन्तीपुत्राज्जायन्तीपुत्रो