बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
११२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ११२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्माभयं वै ब्रह्माभयँ हि वै ब्रह्म भवति य एवं वेद ॥ २५ ॥
वही यह महान् अजन्मा आत्मा अजर, अमर, अमृत एवं अभय ब्रह्म है। अभय ही ब्रह्म है, जो ऐसा जानता है वह अभय ब्रह्म ही हो जाता है ॥ २५ ॥
| स वा एष महानज आत्मा अजरो न जीर्यत इति, न विपरिणमत इत्यर्थः, अमरः—यस्माच्च अजरः, तस्माद् अमरः, न म्रियत इत्यमरः; यो हि जायते जीर्यते च, स विनश्यति म्रियते वा; अयं तु अजत्वाद् अजरत्वाच्च अविनाशी यतः, अत एव अमृतः। यस्माद् जनिप्रभृतिभिस्त्रिभिर्भावविकारैर्वर्जितः तस्माद् इतरैरपि भावविकारैस्त्रिभिस्तत्कृतैश्च कामकर्ममोहादिभिर्मृत्युरूपैर्वर्जित इत्येतत् । <br><br> अभयोऽत एव; यस्माच्चैवं पूर्वोक्तविशेषणः, तस्माद् भयवर्जितः, भयं च हि नाम अविद्याकार्यम्, तत्कार्यप्रतिषेधेन भावविकारप्रतिषेधेन चाविद्यायाः प्रतिषेधः सिद्धो वेदितव्यः। अभय आत्मा | वही यह महान् अजन्मा आत्मा जीर्ण नहीं होता, इसलिये अजर है अर्थात् इसका विपरिणाम नहीं होता। 'अमरः'—क्योंकि अजर है, इसलिये अमर है, जो नहीं मरता उसे अमर कहते हैं। जो उत्पन्न होता अथवा जीर्ण होता है, वही विनष्ट होता अथवा मरता है। चूँकि यह अज और अजर होनेके कारण अविनाशी है, इसीलिये अमृत है। क्योंकि यह जन्मादि तीन भावविकारोंसे रहित है, इसलिये अन्य तीन भावविकारोंसे तथा उनसे होनेवाले मृत्युरूप काम, कर्म और मोहादिसे भी रहित है—ऐसा इसका तात्पर्य है। <br><br> इसीसे यह अभय भी है। इस प्रकार चूँकि यह पूर्वोक्त विशेषणोंवाला है, इसलिये भयशून्य है; भय तो अविद्याका ही कार्य है, अविद्याके कार्य और भावविकारोंके प्रतिषेधसे अविद्याका प्रतिषेध भी सिद्ध हुआ समझना चाहिये। इस |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११२५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११२५
| एवंगुणविशिष्टः किमसो ? ब्रह्म परिवृढं निरतिशयं महदित्यर्थः । अभयं वै ब्रह्म, प्रसिद्धमेतद् लोके—अभयं ब्रह्मेति । तस्माद्युक्तमेवंगुणविशिष्ट आत्मा ब्रह्मेति । | प्रकारके गुणोंसे युक्त यह अभय आत्मा क्या है ? ब्रह्म—सब ओरसे बढ़ा हुआ अर्थात् निरतिशय महान् । ब्रह्म अभय ही है; लोकमें यह बात प्रसिद्ध है कि ब्रह्म अभय है, इसलिये ऐसे गुणोंवाला आत्मा ब्रह्म है—यह कहना उचित ही है । | | य एवं यथोक्तमात्मानमभयं ब्रह्म वेद, सोऽभयं हि वै ब्रह्म भवति । एष सर्वस्या उपनिषदः संक्षिप्तोऽर्थ उक्तः । एतस्यैवार्थस्य सम्यक् प्रबोधाय उत्पत्तिस्थितिप्रलयादिकल्पना क्रियाकारकफलाध्यारोपणा चात्मनि कृता, तदपोहेन च नेति नेतीत्यध्यारोपितविशेषापनयद्वारेण पुनस्तत्त्वमावेदितम् । | जो इस प्रकार उपर्युक्त आत्मारूप अभय ब्रह्मको जानता है, वह निश्चय अभय ब्रह्म ही हो जाता है । यह समस्त उपनिषद्का संक्षिप्त अर्थ कहा गया । इसी अर्थका अच्छी तरह ज्ञान करानेके लिये आत्मामें उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलयादिकी कल्पना तथा क्रिया, कारक और फलका अध्यारोप किये गये हैं । तथा उसके अपोहनके द्वारा अर्थात् 'नेति-नेति' इत्यादि रूपसे अध्यारोपित विशेषकी निवृत्तिद्वारा पुनः तत्त्वका ज्ञान कराया गया है । | | यथैकप्रभृत्यापरार्धसंख्यास्वरूपपरिज्ञानाय रेखाध्यारोपणं कृत्वा एकेयं रेखा, दशेयम्, शतेयम्, सहस्रेयम्—इति ग्राह- | जिस प्रकार एकसे लेकर परार्धतककी संख्याके स्वरूपका परिज्ञान करानेके लिये रेखाओंका अध्यारोप करके [ अर्थात् अनेकों रेखाएँ खींचकर ] यह ( पहली ) रेखा एक है, यह ( दूसरी ) रेखा दश है, यह ( तीसरी ) सौ है, यह ( चौथी ) सहस्र है—इस प्रकार ग्रहण कराते हैं |
११२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४]
| ११२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४] |
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| यति, अवगमयति संख्यास्वरूपं केवलम्, न तु संख्याया रेखात्मत्वमेव, यथा च—अकारादीन्यक्षराणि विजिग्राहयिषुः पत्रमषीरेखादिसंयोगोपायमास्थाय वर्णानां सतत्त्वमावेदयति, न पत्रमष्याद्यात्मतामक्षराणां ग्राहयति—तथा चेहोत्पत्त्याद्यनेकोपायमास्थायैकं ब्रह्मतत्त्वमावेदितम्, पुनस्तत्कल्पितोपायजनितविशेषपरिशोधनार्थं नेति नेतीति तत्त्वोपसंहारः कृतः। तदुपसंहृतं पुनः परिशुद्धं केवलमेव सफलं ज्ञानमन्तेऽस्यां कण्डिकायामिति ॥ २५ ॥ | तथा उन रेखाओंके द्वारा केवल संख्याके स्वरूपका ज्ञान कराते हैं, किंतु वास्तवमें संख्या रेखारूप ही नहीं है। तथा जिस प्रकार अकारादि अक्षरोंको ग्रहण करानेकी इच्छावाला पुरुष कागज, स्याही और रेखाओंके संयोगरूप उपायका आश्रय लेकर वर्णोंका स्वरूप समझा देता है, कागज-स्याही आदि ही अक्षरोंके स्वरूप हैं—ऐसा नहीं समझाता, उसी प्रकार यहाँ उत्पत्ति आदि अनेकों उपायोंका अवलम्बन कर एक ब्रह्मतत्त्वका ही बोध कराया गया है। फिर उस कल्पित उपायसे पैदा हुए विशेषका निरास करनेके लिये 'नेति नेति' ऐसा कहकर तत्त्वका उपसंहार किया है। फिर अन्तमें वह उपसंहृत, परिशुद्ध, केवल ज्ञान ही अपने फलके सहित इस कण्डिकामें बतलाया गया है ॥ २५ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये
चतुर्थं शारीरकब्राह्मणम् ॥ ४ ॥
पञ्चम ब्राह्मण
पञ्चम ब्राह्मण
याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद
| आगमप्रधानेन मधुकाण्डेन ब्रह्मतत्त्वं निर्धारितम्। पुनः तस्यैवोपपत्तिप्रधानेन याज्ञवल्कीयेन काण्डेन पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहं कृत्वा विगृह्यवादेन विचारितम्। शिष्याचार्यसम्बन्धेन च षष्ठे प्रश्नप्रतिवचनन्यायेन सविस्तरं विचार्योपसंहृतम्। अथेदानीं निगमनस्थानीयं मैत्रेयीब्राह्मणमारभ्यते। अयं च न्यायो वाक्यकोविदैः परिगृहीतः—<br>‘हेत्वपदेशात् प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम्’ इति। | [ द्वितीय अध्यायमें ] आगमप्रधान मधुकाण्डद्वारा ब्रह्मतत्वका निश्चय किया गया। फिर [ तीसरे अध्यायमें ] युक्तिप्रधान याज्ञवल्कीय काण्डद्वारा उसीके पक्ष-प्रतिपक्ष लेकर जल्पन्यायद्वारा विचार किया गया और तदनन्तर इस छठे प्रपाठक [ अर्थात् चतुर्थ अध्यायमें ] गुरु-शिष्यसम्बन्धसे प्रश्नोत्तरकी शैलीद्वारा उसका विस्तारपूर्वक विचार करके उपसंहार किया गया। उसके पश्चात् अब निगमनस्थानीय मैत्रेयीब्राह्मण आरम्भ किया जाता है। वाक्यमर्मज्ञोंने इस न्यायको स्वीकार भी किया है यथा—‘हेतुका उल्लेख करके प्रतिज्ञाका पुनः कथन करना निगमन है’ इति। |
| अथवाऽऽगमप्रधानेन मधुकाण्डेन यदमृतत्वसाधनं ससंन्यासमात्मज्ञानमभिहितम्, तदेव तर्केणाप्यमृतत्वसाधनं ससंन्यासमात्मज्ञानमधिगम्यते । तर्कप्रधानं हि याज्ञवल्कीयं काण्डम्; तस्माच्छास्त्रतर्काभ्यां निश्चितमेतत्—यदेतदात्मज्ञानं ससंन्यासममृतत्वसाधनमिति। | अथवा आगमप्रधान मधुकाण्डने जिस संन्यासयुक्त आत्मज्ञानको अमृतत्वका साधन बतलाया है, वही ससंन्यास आत्मज्ञान तर्कसे भी अमृतत्वका साधन जाना जाता है। याज्ञवल्कीय काण्ड तर्कप्रधान ही है; अतः यह जो अमृतत्वका साधन संन्यासयुक्त आत्मज्ञान है, वह शास्त्र और तर्क दोनोंहीसे निश्चित है। |
११२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| तस्माच्छास्त्रश्रद्धावद्भिरमृतत्वप्रतिपित्सुभिरेतत् प्रतिपत्तव्यमिति आगमोपपत्तिभ्यां हि निश्चितोऽर्थः श्रद्धेयो भवति, अव्यभिचारादिति । अक्षराणां तु चतुर्थे यथा व्याख्यातोऽर्थः, तथा प्रतिपत्तव्योऽत्रापि । यान्यक्षराण्यव्याख्यातानि तानि व्याख्यास्यामः। | इसलिये अमृतत्व-प्राप्तिके इच्छुक एवं शास्त्रमें श्रद्धा रखनेवाले पुरुषोंको इसे प्राप्त करना चाहिये, क्योंकि शास्त्र और युक्ति दोनोंहीके द्वारा निश्चय किया हुआ अर्थ अव्यभिचारी होनेके कारण श्रद्धेय होता है। इन अक्षरोंके अर्थकी तो चतुर्थ प्रपाठक [यानी द्वितीय अध्याय] में जिस प्रकार व्याख्या की गयी है, वैसी ही यहाँ भी समझनी चाहिये । वहाँ जिन अक्षरोंकी व्याख्या नहीं की गयी, उनकी व्याख्या हम यहाँ करेंगे। |
याज्ञवल्क्य और उनकी दो स्त्रियाँ
अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे भार्ये बभूवतुर्मैत्रेयी च कात्यायनी च तयोर्ह मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी बभूव स्त्रीप्रज्ञैव तर्हि कात्यायन्यथ ह याज्ञवल्क्योऽन्यद्वृत्तमुपाकरिष्यन् ॥ १ ॥
यह प्रसिद्ध है कि याज्ञवल्क्यकी मैत्रेयी और कात्यायनी ये दो भार्याएँ थीं। उनमें मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी और कात्यायनी तो स्त्रियोंकी-सी बुद्धिवाली ही थी। तब याज्ञवल्क्यने दूसरे प्रकारकी चर्याका आरम्भ करनेकी इच्छासे [कहा--] ॥ १ ॥
| अथेति हेतूपदेशानन्तर्यप्रदर्शनार्थः; हेतुप्रधानानि हि वाक्यान्यतीतानि । तदनन्तरमागमप्रधानेन प्रतिज्ञातोऽर्थो निगम्यते मैत्रेयीब्राह्मणेन । ह-शब्दो वृत्तावद्योतकः । | 'अथ' यह शब्द यह दिखानेके लिये है कि यह सिद्धान्तप्रतिपादक प्रकरण हेतुका उपदेश करनेके बाद आरम्भ किया गया है; क्योंकि इससे पहले हेतुप्रधान वाक्य कहे जा चुके हैं। उनके पश्चात् अब आगमप्रधान मैत्रेयीब्राह्मणद्वारा पहले प्रतिज्ञा किये हुए अर्थका निगमन किया जाता है। 'ह' शब्द पूर्ववृत्तको सूचित करनेवाला है। |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११२९
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११२९
| याज्ञवल्क्यस्य ऋषेः किल द्वे भार्ये पत्न्यौ बभूवतुः—आस्ताम्—मैत्रेयी च नामत एका, अपरा कात्यायनी नामतः। तयोर्भार्ययोर्मैत्रेयी ह किल ब्रह्मवादिनी ब्रह्मवदनशीला बभूव आसीत् स्त्रीप्रज्ञा—स्त्रियां या उचिता सा स्त्रीप्रज्ञा—सैव यस्याः प्रज्ञा गृहप्रयोजनान्वेषणलक्षणा, सा स्त्रीप्रज्ञैव तर्हि तस्मिन् काल आसीत् कात्यायनी। अथैवं सति ह किल याज्ञवल्क्योऽन्यत् पूर्वस्माद् गार्हस्थ्यलक्षणाद् वृत्तात् पारिव्राज्यलक्षणं वृत्तमुपाकरिष्यन्नुपाचिकीर्षुः सन् ॥ १ ॥ | प्रसिद्ध है, याज्ञवल्क्य ऋषिकी दो भार्याएँ--पत्नियां थीं; एक मैत्रेयी नामवाली थी और दूसरी कात्यायनी नामवाली। उन दोनों पत्नियोंमें मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी--ब्रह्मसम्बन्धी भाषण करनेवाली थी। किंतु कात्यायनी उस समय 'स्त्रीप्रज्ञा'--जो प्रज्ञा स्त्रियोंके योग्य हो, उसे स्त्रीप्रज्ञा कहते हैं, जिसकी वह स्त्रीप्रज्ञा अर्थात् गृहसम्बन्धी प्रयोजनकी ही खोजमें रहनेवाली बुद्धि थी, ऐसी स्त्रीप्रज्ञा ही थी। ऐसी स्थितिमें याज्ञवल्क्यने अन्य अर्थात् गार्हस्थ्यरूप पूर्वचर्यासे भिन्न संन्यासरूप चर्याका आरम्भ करनेके इच्छुक होकर [ कहा-- ] ॥ १ ॥ |
याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद
मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः प्रव्रजिष्यन् वा अरेऽहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्यान्तं करवाणीति ॥ २ ॥
'अरी मैत्रेयि !' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा—'मैं इस स्थान (गार्हस्थ्य-आश्रम ) से अन्यत्र सब कुछ त्याग कर जानेवाला हूँ, अर्थात् संन्यास लेनेका विचार है। इसलिये [ मैं तेरी अनुमति लेता हूँ और चाहता हूँ ] इस कात्यायनीके साथ तेरा बँटवारा कर दूँ' ॥ २ ॥
| हे मैत्रेयीति ज्येष्ठां भार्यामामन्त्रयामास, आमन्त्र्य चोवाच | 'हे मैत्रेयि !' इस प्रकार याज्ञवल्क्यने बड़ी स्त्रीको लक्ष्य करके सम्बोधन किया और उसे बुलाकर |
११३० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
११३० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
| ह—प्रव्रजिष्यन् पारिव्राज्यं करिष्यन् वै अरे मैत्रेयि । अस्मात् स्थानाद् गार्हस्थ्यादहमस्मि भवामि । मैत्रेयि अनुजानीहि माम्, हन्त इच्छसि यदि, ते अनया कात्यायन्या अन्तं करवाणि—इत्यादि व्याख्यातम् । २। | कहा, 'अरी मैत्रेयि ! मैं इस गार्हस्थ्य-आश्रमसे प्रव्रजन--पारिव्राज्य (संन्यास) स्वीकार करनेवाला हूँ। सो हे मैत्रेयि ! तू मुझे अपनी अनुमति दे, और यदि तेरी इच्छा हो तो इस कात्यायनीके साथ तेरा बँटवारा कर दूँ'--इत्यादि वाक्यकी व्याख्या पहले की जा चुकी है ॥ २ ॥ |
सा होवाच मैत्रेयी यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् स्यां न्वहं तेनामृताऽहो ३ नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितँ् स्यादमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेनेति ॥ ३ ॥
उस मैत्रेयीने कहा, 'भगवन् ! यदि यह धनसे सम्पन्न सारी पृथिवी मेरी हो जाय तो क्या मैं उससे अमर हो सकती हूँ, अथवा नहीं ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'नहीं, भोग सामग्रियोंसे सम्पन्न मनुष्योंका जैसा जीवन होता है, वैसा ही तेरा जीवन हो जायगा, धनसे अमृतत्वकी तो आशा है नहीं' ॥ ३ ॥
मैत्रेयीका अमृतत्व-साधनविषयक प्रश्न
सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥४॥
उस मैत्रेयीने कहा, 'जिससे मैं अमर नहीं हो सकती, उसे लेकर मैं क्या करूँगी ? श्रीमान् जो कुछ अमृतत्वका साधन जानते हों, वही मुझे बतलावें' ॥ ४ ॥
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३१
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३१
| सा एवमुक्ता उवाच मैत्रेयी— सर्व्वेयं पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात्, नु किं स्याम्, किमहं वित्तसाध्येन कर्मणा अमृता, आहो न स्यामिति । नेति होवाच याज्ञवल्क्य इत्यादि समानमन्यत् ॥ | इस प्रकार कहे जानेपर उस मैत्रेयीने कहा, 'यदि यह सारी पृथिवी धनसे पूर्ण हो जाय तो क्या उस धनसाध्य कर्मसे मैं अमर हो जाऊँगी अथवा नहीं ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'नहीं' इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३-४ ॥ |
याज्ञवल्क्यजीका सान्त्वनापूर्वक समाधान
स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया वै खलु नो भवती सती प्रियमवृधद्धन्त तर्हि भवत्येतद् व्याख्यास्यामि ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ५ ॥
उन याज्ञवल्क्यजीने कहा, 'निश्चय ही तू पहले भी हमारी प्रिया रही है और इस समय भी तूने हमारे प्रिय (प्रसन्नता) को बढ़ाया है। अतः हे देवि ! मैं प्रसन्नतापूर्वक तेरे प्रति इस ( अमृतत्वके साधन ) की व्याख्या करूँगा। तू मेरे व्याख्या किये हुए विषयका चिन्तन करना' ॥ ५ ॥
| स ह उवाच—प्रियैव पूर्वं खलु नः—अस्मभ्यं भवती, भवन्ती सती, प्रियमेव अवृधद् वर्धितवती निर्धारितवती असि; अतस्तुष्टोऽहम्, हन्त इच्छसि चेदमृतत्वसाधनं ज्ञातुम्, हे भवति, ते तुभ्यं तदमृतत्वसाधनं व्याख्यास्यामि ॥ ५ ॥ | उन्होंने कहा, तू निश्चय ही पहले भी हमारी प्रिया रही है, अब भी तूने हमारे प्रियकी ही वृद्धि की है, प्रसन्नताको ही बढ़ाया है—संतोषजनक निश्चय किया है, इसलिये मैं तुझपर प्रसन्न हूँ। अब यदि तू अमृतत्वका साधन जानना चाहती है तो हे भवति--हे देवि ! मैं तेरे प्रति उस अमृतत्वके साधनकी व्याख्या करूँगा ॥ ५ ॥ |
११३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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प्रियतम आत्माके लिये ही सब वस्तुएँ प्रिय होती हैं
स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति । न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति । न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति। न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति । न वा अरे पशूनां कामाय पशवः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पशवः प्रिया भवन्ति । न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति । न वा अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति । न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति। न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति । न वा अरे वेदानां कामाय वेदाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय वेदाः प्रिया भवन्ति । न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति । न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति । आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञात इदँ सर्वं विदितम् ॥ ६ ॥
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३३
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३३
उन्होंने कहा—'अरी मैत्रेयि ! यह निश्चय है कि पतिके प्रयोजनके लिये पति प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये पति प्रिय होता है; स्त्रीके प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया नहीं होती, अपने ही प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया होती है; पुत्रोंके प्रयोजनके लिये पुत्र प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये पुत्र प्रिय होते हैं; धनके प्रयोजनके लिये धन प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये धन प्रिय होता है; पशुओंके प्रयोजनके लिये पशु प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये पशु प्रिय होते हैं, ब्राह्मणके प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय होता है; क्षत्रियके प्रयोजनके लिये क्षत्रिय प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये क्षत्रिय प्रिय होता है; लोकोंके प्रयोजनके लिये लोक प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये लोक प्रिय होते है; देवोंके प्रयोजनके लिये देव प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये देव प्रिय होते हैं; वेदोंके प्रयोजनके लिये वेद प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये वेद प्रिय होते हैं; भूतोंके प्रयोजनके लिये भूत प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये भूत प्रिय होते हैं; सबके प्रयोजनके लिये सब प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये सब प्रिय होते हैं, अतः अरी मैत्रेयि ! आत्मा ही दर्शनीय, श्रवणीय, मननीय और निदिध्यासन ( ध्यान ) करनेयोग्य है । हे मैत्रेयि ! निश्चय ही आत्माका दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान हो जानेपर इन सबका ज्ञान हो जाता है' ॥ ६ ॥
| आत्मनि खलु अरे मैत्रेयि दृष्टे; कथं दृष्ट आत्मनि ? इत्युच्यते—पूर्वमाचार्य्यागमाभ्यां श्रुते, पुनः तर्केणोपपत्त्या मते विचारिते, श्रवणं त्वागममात्रेण, मते उपपत्त्या, पश्चाद् | 'हे मैत्रेयि ! निश्चय ही आत्माका दर्शन हो जानेपर; किस प्रकार आत्माका दर्शन हो जानेपर, सो कहा जाता है—पहले आचार्य और शास्त्रद्वारा श्रवण और फिर तर्क एवं युक्तिसे मनन और विचार करनेपर; शास्त्रमात्रसे तो श्रवण, युक्तिसे मनन और पीछे विशेषरूपसे जान लेनेपर |
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११३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| विज्ञाते—एवमेतन्नान्यथेति<br><br>निर्धारिते; किं भवति ? इत्यु-<br><br>च्यते—इदं विदितं भवति; इदं<br><br>सर्वमिति यदात्मनोऽन्यत्,<br><br>आत्मव्यतिरेकेणाभावात् ॥६॥ | अर्थात् यह ऐसा ही है, अन्य प्रकारका नहीं है—ऐसा निश्चय कर लेनेपर क्या होता है ? सो बतलाया जाता है—यह ज्ञात हो जाता है अर्थात् यह सब जो कि आत्मासे भिन्न है, जान लिया जाता है; क्योंकि आत्मासे भिन्न कुछ है ही नहीं ॥ ६ ॥ |
भेददृष्टिसे हानि दिखाकर ‘सब कुछ आत्मा ही है’ इस तत्त्वका उपदेश—
ब्रह्म तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनः क्षत्रं वेद लोकास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो लोकान् वेद देवास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो देवान् वेद वेदास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान् वेद भूतानि तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेदेदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमे वेदा इमानि भूतानीदँ सर्वं यदयमात्मा ॥ ७ ॥
ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है, जो ब्राह्मणजातिको आत्मासे भिन्न समझता है। क्षत्रियजाति उसे परास्त कर देती है, जो क्षत्रियजातिको आत्मासे भिन्न जानता है। लोक उसे परास्त कर देते हैं, जो लोकोंको आत्मासे भिन्न जानता है। देवता उसे परास्त कर देते हैं, जो देवताओंको आत्मासे भिन्न समझता है। वेद उसे परास्त कर देते हैं, जो वेदोंको आत्मासे भिन्न जानता है। भूत उसे परास्त कर देते हैं, जो भूतोंको आत्मासे भिन्न समझते हैं। सब उसे परास्त कर देते हैं, जो सबको आत्मासे भिन्न जानता है। यह ब्राह्मणजाति, यह क्षत्रियजाति, ये लोक, ये देव, ये वेद, ये भूत और ये सब जो कुछ भी हैं, यह सब आत्मा ही है ॥ ७ ॥
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३५
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३५
| तमयथार्थदर्शिनं परादात् पराकुर्यात्, कैवल्यासम्बन्धिनं कुर्यात्—अय्यमनात्मस्वरूपेण मां पश्यतीत्यपराधादिति भावः ।७। | तात्पर्य यह हे कि उस अनात्मदर्शीको 'यह मुझे आत्मासे भिन्नरूपमें देखता है' इस अपराधसे परादात्—पराकृत—परास्त अर्थात् कैवल्यसे सम्बन्धरहित कर देते हैं ॥ ७ ॥ |
सबको 'आत्मा' रूपसे ग्रहण करनेमें दृष्टान्त—
स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥
वह दृष्टान्त ऐसा है कि जिसपर लकड़ी आदिसे आघात किया जाता है, उस दुन्दुभि (नक्कारे) के बाह्य शब्दोंको जिस प्रकार कोई ग्रहण नहीं कर सकता, किंतु दुन्दुभि या दुन्दुभिके आघातको ग्रहण करनेसे उसका शब्द भी गृहीत हो जाता है ॥ ८ ॥
स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य॑ न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद् ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥
वह [दूसरा] दृष्टान्त ऐसा है कि जैसे मुँहसे फूँके जाते हुए शङ्खके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें कोई समर्थ नहीं होता, किंतु शङ्ख या शङ्खके बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है ॥ ९ ॥
स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद् ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ १० ॥
११३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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वह [ तीसरा ] दृष्टान्त ऐसा है कि जैसे बजायी जाती हुई वीणाके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें कोई समर्थ नहीं होता, किंतु वीणा या वीणाके बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है ॥१०॥
स यथाऽऽर्दैंधाग्नेरभ्याहितस्य पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानीष्ट ँ हुतमाशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतान्यस्यैवैतानि सर्वाणि निश्वसितानि ॥११॥ स यथा सर्वासामपा ँ समुद्र एकायनमेव ँ सर्वेषा ँ स्पर्शानां त्वगेकायनमेव ँ सर्वेषां गन्धानां नासिके एकायनमेव ँ सर्वेषा ँ रसानां जिह्वैकायनमेव ँ सर्वेषा ँ रूपाणां चक्षुरेकायनमेव ँ सर्वेषा ँ शब्दाना ँ श्रोत्रमेकायनमेव ँ सर्वेषा ँ संकल्पानां मन एकायनमेव ँ सर्वासां विद्याना ँ हृदयमेकायनमेव ँ सर्वेषां कर्मणा ँ हस्तावेकायनमेव ँ सर्वेषामा- नन्दानामुपस्थ एकायनमेव ँ सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेव ँ सर्वेषामध्वनां पादावेकायनमेव ँ सर्वेषां वेदानां वागेकायनम् ॥ १२ ॥
वह [ चौथा ] दृष्टान्त ऐसा है कि जिस प्रकार जिसका ईंधन गीला है, ऐसे आधान किये हुए अग्निसे पृथक् धूएँ निकलते हैं, उसी प्रकार हे मैत्रेयि ! ये जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक (ब्राह्मण-मन्त्र), सूत्र (वैदिक वस्तुसंग्रहवाक्य), सूत्रोंकी
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११३७ |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११३७ |
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व्याख्या, मन्त्रोंकी व्याख्या, इष्ट (यज्ञ), हुत (हवन किया हुआ), आशित (खिलाया हुआ), पायित (पिलाया हुआ) यह लोक, परलोक और सम्पूर्ण भूत हैं, सब इसीके निःश्वास हैं ॥ ११ ॥ वह [पाँचवाँ] दृष्टान्त ऐसा है कि जिस प्रकार समस्त जलोंका समुद्र एक अयन [प्रलयस्थान] है, इसी प्रकार समस्त स्पर्शोंका त्वचा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त गन्धोंका दोनों नासिकाएँ एक अयन है, इसी प्रकार समस्त रसोंका जिह्वा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त रूपोंका चक्षु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त शब्दोंका श्रोत्र एक अयन है, इसी प्रकार समस्त संकल्पोंका मन एक अयन है, इसी प्रकार समस्त विद्याओंका हृदय एक अयन है, इसी प्रकार समस्त कर्मोंका दोनों हाथ एक अयन है, इसी प्रकार समस्त आनन्दोंका उपस्थ एक अयन है, इसी प्रकार समस्त विसर्गोंका पायु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त मार्गोंका दोनों चरण एक अयन है और इसी प्रकार समस्त वेदोंका वाक् एक अयन है ॥ १२ ॥
| चतुर्थे शब्दनिश्र्वासेनैव लोकाद्यर्थनिश्र्वासः सामर्थ्यादुक्तो भवतीति पृथङ् नोक्तः । इह तु सर्वशास्त्रार्थोपसंहार इति कृत्वा- र्थप्राप्तोऽप्यर्थः स्पष्टीकर्तव्य इति पृथगुच्यते ॥ ११-१२ ॥ | चतुर्थ प्रपाठक [अर्थात् द्वितीय 'अध्याय] में शब्द-निःश्वासके द्वारा ही सामर्थ्यसे लोकादि अर्थनिःश्वास भी कह दिये गये—ऐसा विचार कर उन्हें अलग नहीं कहा। किंतु यहाँ तो सारे शास्त्रका उपसंहार करना है, इसलिये अर्थतः प्राप्त विषयको भी स्पष्ट कर देना चाहिये, इसीलिये उन्हें अलग कहा गया है ॥ ११-१२ ॥ |
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१. द्वितीय अध्यायके चतुर्थ ब्राह्मणका दसवाँ मन्त्र भी इसी प्रकार है, परंतु वहाँ 'व्याख्यानानि' तक कहा है। ये सब शब्दमय निःश्वास हैं। यहाँ 'इष्टं हुतं...सर्वाणि च भूतानि' इतना पाठ अधिक है। ये सब अर्थरूप निःश्वास हैं। अतः वहाँ शब्दनिश्र्वासोंसे ही अर्थनिःश्वासोंका भी उपलक्षण समझना चाहिये।
बृ० उ० ७२—
११३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ११३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वा अरेऽयमात्मानन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १३ ॥
उसमें [ छठा ] दृष्टान्त इस प्रकार है—जिस प्रकार नमकका डला अन्तर और बाह्यसे रहित सम्पूर्ण रसघन ही है, हे मैत्रेयि ! उसी प्रकार यह आत्मा अन्तर-बाह्य-भेदसे शून्य सम्पूर्ण प्रज्ञानघन ही है । यह इन भूतोंसे [ विशेषरूपसे ] उत्थित होकर उन्हींके साथ नष्ट हो जाता है । इस प्रकार मर जानेपर इसकी संज्ञा नहीं रहती । हे मैत्रेयि ! इस प्रकार मैं कहता हूँ—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा ॥ १३ ॥
| सर्वकार्यप्रलयेऽविद्यानिमित्ते सैन्धवघनवदनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एक आत्मावतिष्ठते पूर्वं तु भूतमात्रासंसर्गविशेषाल्लब्धविशेषविज्ञानः सन्, तस्मिन् प्रविलापिते विद्यया विशेषविज्ञाने तन्निमित्ते च भूतसंसर्गे न प्रेत्य संज्ञा अस्ति—इत्येवं याज्ञवल्क्येनोक्ता ॥ १३ ॥ | अविद्याजनित सम्पूर्ण कार्यका सर्वथा लय हो जानेपर लवणखण्डके समान अन्तर और बाह्यसे रहित परिपूर्ण, प्रज्ञानघन एक आत्मा ही स्थित रहता है । पहले तो वह भूतमात्राके संसर्गविशेषसे विशेष विज्ञानको प्राप्त रहता है, फिर विद्याके द्वारा उस विशेष विज्ञान और उससे होनेवाले भूतमात्रके संसर्गके सर्वथा लीन कर दिये जानेपर मरणके पश्चात् उसकी संज्ञा नहीं रहती—ऐसा याज्ञवल्क्यने मैत्रेयीके प्रति कहा ॥ १३ ॥ |
निर्विशेष आत्माके विषयमें मैत्रेयीकी शङ्का और याज्ञवल्क्यका समाधान
सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवान् मोहान्तमापीपिपन्न वा अहममं विजानामीति स होवाच न वा
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११३९
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११३९
अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा ॥ १४ ॥
वह मैत्रेयी बोली, 'यहीं श्रीमान्ने मुझे मोहको प्राप्त करा दिया है। मैं इसे विशेषरूपसे नहीं समझती।' उन्होंने कहा, 'अरी मैत्रेयी! मैं मोहकी बात नहीं कह रहा हूँ। अरी! यह आत्मा निश्चय ही अविनाशी और अनुच्छेदरूप धर्मवाला है' ॥ १४ ॥
| सा होवाचात्रैव मा भगवान् तस्मिन्नेव वस्तुनि प्रज्ञानघन एव न प्रेत्य संज्ञा अस्ति, इति मोहान्तं मोहमध्यमापीपिपत्—आपीपदद् अवगमितवानसि संमोहितवानसीत्यर्थः। अतो न वा अहमिममात्मानमुक्तलक्षणं विजानामि विवेकत इति ।<br><br>स होवाच नाहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा अरेऽयमात्मा। यतो विनष्टुं शीलमस्येति विनाशी न विनाश्यविनाशी, विनाशशब्देन विक्रिया, अविनाशीत्यविक्रिय आत्मेत्यर्थः। अरे मैत्रेय्ययमात्मा प्रकृतोऽनुच्छित्तिधर्मा—उच्छित्तिरुच्छेदः, उच्छेदोऽन्तो विनाशः, उच्छित्तिधर्मोऽस्येत्यु- | वह बोली—यहीं इस प्रज्ञानघनके विषयमें ही, 'मरनेपर इसकी संज्ञा नहीं रहती' ऐसा कहकर श्रीमान्ने मुझे मोहमें—मोहके बीचमें 'आपीपिपत्' प्राप्त करा दिया है, अर्थात् मुझे संमोहित कर दिया है। अतः इस उपर्युक्त लक्षणवाले आत्माको मैं विवेकपूर्वक नहीं समझती।<br><br>उन्होंने कहा—मैं मोहकी बात नहीं कहता, क्योंकि हे मैत्रेयि! यह आत्मा अविनाशी है। जिसका विनष्ट होनेका स्वभाव हो उसे विनाशी कहते हैं, जो विनाशी न हो वह अविनाशी कहलाता है, विनाश शब्दसे विकार सूचित होता है, अतः आत्मा अविनाशी अर्थात् अविकारी है। अरी मैत्रेयि! यह आत्मा, जिसका प्रकरण है, अनुच्छित्तिधर्मा है—उच्छित्ति उच्छेदको कहते हैं, उच्छेद—अन्त अर्थात् विनाश, उच्छित्ति जिसका धर्म हो उसे |
११४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| च्छित्तिधर्मा, नोच्छित्तिधर्मा अनुच्छित्तिधर्मा। नापि विक्रियालक्षणो नाप्युच्छेदलक्षणो विनाशोऽस्य विद्यत इत्यर्थः ॥ १४ ॥ | उच्छित्तिधर्मा कहते हैं, जो उच्छित्तिधर्मा नहीं है वही अनुच्छित्तिधर्मा कहा गया है। तात्पर्य यह है कि इसका न तो विकाररूप विनाश होता है और न उच्छेद रूप ही ॥ १४ ॥ |
उपदेशका उपसंहार और याज्ञवल्क्यका संन्यास
| चतुर्ष्वपि प्रपाठकेष्वेक आत्मा तुल्यो निर्धारितः, परं ब्रह्म। उपायविशेषस्तु तस्याधिगमेऽन्यश्चान्यश्च, उपेयस्तु स एवात्मा यश्चतुर्थे 'अथात आदेशो नेति नेति' इति निर्दिष्टः। स एव पञ्चमे प्राणपणोपन्यासेन शाकल्ययाज्ञवल्क्यसंवादे निर्धारितः, पुनः पञ्चमसमाप्तौ, पुनर्जनकयाज्ञवल्क्यसंवादे, पुनरिहोपनिषत्समाप्तौ। चतुर्णामपि प्रपाठकानामेतदात्मनिष्ठता, नान्योऽन्तराले कश्चिदपि विवक्षितोऽर्थः—इत्येतत्प्रदर्शनायान्त उपसंहारः— स एष नेति नेत्यादिः। | चारों ही प्रपाठकोंमें एक ही समान आत्माका निश्चय किया गया है; वह परब्रह्म है। किंतु उसके बोधके लिये उपायविशेष भिन्न-भिन्न है, उपेय तो वह आत्मा ही है, जिसका चतुर्थ प्रपाठक [अर्थात् द्वितीय अध्याय] में 'अथात आदेशो नेति नेति' इस प्रकार निर्देश किया है। उसीका पञ्चम प्रपाठक (तृतीय अध्याय) में प्राणरूप पणके उल्लेखद्वारा शाकल्य-याज्ञवल्क्यसंवादमें निश्चय किया गया है; फिर पञ्चम प्रपाठककी समाप्तिमें, तत्पश्चात् जनक-याज्ञवल्क्य-संवादमें और फिर यहाँ उपनिषद्की समाप्तिमें भी उसीका निर्णय किया गया है। इन चारों ही प्रपाठकोंका तात्पर्य इस आत्मामें ही है; इनके बीचमें कोई और अर्थ विवक्षित नहीं है—यह दिखानेके लिये अन्तमें 'स एष नेति नेति' इत्यादि उपसंहार किया गया है। |
ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११४१
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११४१ |
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| यस्मात् प्रकारशतेनापि निरूप्यमाणे तत्त्वे नेति नेत्यात्मैव निष्ठा नान्येोपलभ्यते तर्केण वागमेन वा, तस्मादेतदेवामृतत्वसाधनं यदेतन्नेति नेत्यात्मपरिज्ञानं सर्वसंन्यासश्चेत्येतमर्थमुपसंजिहीर्षन्नाह— | चूँकि तत्त्वका सैकड़ों प्रकारसे निरूपण होनेपर भी उसका पर्यवसान 'नेति नेति' इस प्रकारसे निरूपण किये गये आत्मामें ही है, युक्ति अथवा शास्त्रसे कहीं अन्यत्र उसका तात्पर्य नहीं देखा जाता, अतः यह जो 'नेति नेति' इस प्रकार आत्माका परिज्ञान होना तथा सम्पूर्ण कर्मोंका संन्यास करना है, वही अमृतत्वका साधन है—इस प्रकार इस अर्थका उपसंहार करनेकी इच्छासे याज्ञवल्क्यजी कहते हैं— |
यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरँ रसयते तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरँ शृणोति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरँ स्पृशति तदितर इतरं विजानाति यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत् तत्केन कं जिघ्रेत् तत् केन कँ रसयेत् तत् केन कमभिवदेत् तत् केन कँ शृणुयात् तत् केन कं मन्वीत तत् केन कँ स्पृशेत् तत् केन कं विजानीयाद् येनेदँ सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात् स एष नेति नेत्यात्मागृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो न हि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यति विज्ञातारमरे केन विजानीयादित्युक्तानुशासनासि मैत्रेय्येतावदरे खल्वमृतत्वमिति होक्त्वा याज्ञवल्क्यो विजहार ॥ १५ ॥
११४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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जहाँ [अविद्यावस्थामें] द्वैत-सा होता है, वहीं अन्य अन्यको देखता है, अन्य अन्यको सूँघता है, अन्य अन्यका रसास्वादन करता है, अन्य अन्यका अभिवादन करता है, अन्य अन्यको सुनता है, अन्य अन्यका मनन करता है, अन्य अन्यका स्पर्श करता है और अन्य अन्यको विशेषरूपसे जानता है। किंतु जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वहाँ किसके द्वारा किसे देखे, किसके द्वारा किसे सूँघे, किसके द्वारा किसका रसास्वादन करे, किसके द्वारा किसका अभिवादन करे, किसके द्वारा किसे सुने, किसके द्वारा किसका मनन करे, किसके द्वारा किसका स्पर्श करे और किसके द्वारा किसे जाने ? जिसके द्वारा पुरुष इस सबको जानता है, उसे किस साधनसे जाने ? वह यह 'नेति-नेति' इस प्रकार निर्देश किया गया आत्मा अगृह्य है—उसका ग्रहण नहीं किया जाता, अशीर्य है—उसका विनाश नहीं होता, असङ्ग है—आसक्त नहीं होता, अबद्ध है—वह व्यथित और क्षीण नहीं होता। हे मैत्रेयि ! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने ? इस प्रकार तुझे उपदेश कर दिया गया। अरी मैत्रेयि ! निश्चय जान, इतना ही अमृतत्व है, ऐसा कहकर याज्ञवल्क्यजी परिव्राजक (संन्यासी) हो गये ॥ १५ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| एतावदेतावन्मात्रं यदेतन्नेति नेत्यद्वैतात्मदर्शनमिदं चान्यसहकारिकारणनिरपेक्षमेवारे मैत्रेय्यमृतत्वसाधनम् । यत् पृष्टवत्यसि 'यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूह्यमृतत्वसाधनम्' इति, तदेतावदेवेति विज्ञेयं त्वयेति हैवं किलामृतत्वसाधनमात्मज्ञानं प्रियायै भार्यायै उक्त्वा याज्ञवल्क्यः किं कृतवान् ? यत् पूर्वं प्रतिज्ञातं | हे मैत्रेयि ! 'एतावत्'—बस, इतना ही जो कि यह 'नेति नेति' इस प्रकार अद्वैत आत्माका साक्षात्कार करना है, वही किसी दूसरे सहकारी कारणकी अपेक्षासे रहित अमृतत्वका साधन है। तूने जो पूछा था कि श्रीमान् जो अमृतत्वका साधन जानते हों, वही मुझे बतलावें,' सो वह साधन इतना ही है—ऐसा तुझे जानना चाहिये। इस प्रकार अपनी प्रिया भार्याको यह अमृतत्वका साधनरूप आत्मज्ञान बतलाकर याज्ञवल्क्यने क्या किया ? जिसकी उन्होंने पहले प्रतिज्ञा |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११४३ |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११४३ |
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| संस्कृत मूल (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी अनुवाद |
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| प्रव्रजिष्यन्नस्मीति तच्चकार विजहार प्रव्रजितवानित्यर्थः । | की थी कि मैं परिव्राजक (संन्यासी) होनेवाला हूँ वही किया अर्थात् परिव्राजक हो गये । |
| परिसमाप्ता ब्रह्मविद्या संन्यासपर्यवसाना । एतावानुपदेशः, एतद् वेदानुशासनम्, एषा परमनिष्ठा, एष पुरुषार्थकर्तव्यतान्त इति । | इस प्रकार जिसका संन्यासमें पर्यवसान हुआ है, वह ब्रह्मविद्या समाप्त हुई । इतना ही उपदेश है, यही वेदकी आज्ञा है, यही परमनिष्ठा है और यही पुरुषार्थ अर्थात् कर्तव्यताका अन्त है । |
| इदानीं विचार्यते शास्त्रार्थशास्त्रार्थपरामर्शो विवेकप्रतिपत्तये । मिथोविरुद्धवच- यत आकुलानि हि नोपन्यासश्च वाक्यानि दृश्यन्ते—<br>“यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहुयात्”<br>“यावज्जीवं दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत” “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः” (ईश० २) “एतद् वै जरामर्यं सत्रं यदग्निहोत्रम्” (महानारा० २५ । १) इत्यादीन्येकाश्रम्यज्ञापकानि, अन्यानि चाश्रमान्तरप्रतिपादकानि वाक्यानि—<br>“विदित्वा व्युत्थाय प्रव्रजन्ति”<br>“ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद् गृहाद् वनी भूत्वा प्रव्रजेत्” (जाबालोप० ४) “यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद् वा वनाद् वा” | अब शास्त्रके तात्पर्यका विवेकज्ञान होनेके लिये विचार किया जाता है, क्योंकि परस्परविरोधी वाक्य देखे जाते हैं— “जीवनपर्यन्त अग्निहोत्र करे”, “जीवनपर्यन्त दर्शपूर्ण-मासद्वारा यजन करे”, “इस लोकमें कर्म करते हुए ही सौ वर्षतक जीवित रहनेकी इच्छा करे”, “यह जो अग्निहोत्र है, जरामरणपर्यन्त होनेवाला सत्र है” इत्यादि वाक्य गार्हस्थ्यरूप एक ही आश्रमके ज्ञापक हैं और इनके सिवा दूसरे वाक्य अन्य आश्रमके प्रतिपादक हैं— “ज्ञान होनेपर गृहस्थाश्रमसे ऊँचे उठकर परिव्राजक हो जाते हैं”, “ब्रह्मचर्य समाप्त करके गृहस्थाश्रमी बने और गृहस्थसे वानप्रस्थ होकर परिव्राजक हो जाय”, “अथवा इसके विपरीत ब्रह्मचर्यसे, गृहसे या वनसे ही परिव्राजक |