बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९६१
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९६१
| फलायासशून्यं स्वमात्मानं प्रविशति ॥ १९ ॥ | के क्रिया, कारक और फलके श्रमसे रहित अपने 'आत्मामें प्रवेश करता है ॥ १६ ॥ |
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स्वप्नदर्शनकी स्थानभूता हिता नाम्नी नाडियोंका वर्णन
| यद्यस्यायं स्वभावः—सर्वसंसारधर्मशून्यता, परोपाधिनिमित्तं चास्य संसारधर्मित्वम्; यन्निमित्तं चास्य परोपाधिकृतं संसारधर्मित्वम्, सा चाविद्या—तस्या अविद्यायाः किं स्वाभाविकत्वम् ? आहोस्वित् कामकर्मादिवदागन्तुकत्वम् ? यदि चागन्तुकत्वम्, ततो विमोक्ष उपपद्यते; तस्याश्चागन्तुकत्वे कोपपत्तिः ? कथं वा नात्मधर्मोऽविद्या ? इति सर्वानर्थबीजभूताया अविद्यायाः सतत्त्वावधारणार्थं परा कण्डिका आरभ्यते— | यदि यह सर्वसंसारधर्मशून्यता, इस आत्माका स्वभाव है तो इसका सांसारिक धर्मोंसे युक्त होना अन्य उपाधिके कारण है; और जिस हेतुसे इसका परोपाधिकृत संसारधर्मित्व है, वह अविद्या है । अब प्रश्न होता है—वह अविद्या स्वाभाविक है अथवा काम एवं कर्मादिके समान आगन्तुक है ? यदि आगन्तुक है, तब तो उससे मोक्ष होना सम्भव है । किंतु उसके आगन्तुक होनेमें युक्ति क्या है ? अविद्या आत्माका ही धर्म क्यों नहीं है ? अतः सम्पूर्ण अनर्थोंकी बीजभूता अविद्याका स्वरूप निर्णय करनेके लिये आगेकी कण्डिका आरम्भ की जाती है— |
ता वा अस्यैता हिता नाम नाड्यो यथा केशः
१. सुषुप्तिमें जो जीवका आत्मामें प्रवेश करना कहा है, इससे यह नहीं समझना चाहिये कि वह मुक्त आत्माकी भाँति स्वरूपमें स्थित हो जाता है, यह स्थिति तो पूर्ण बोध होनेपर ही हो सकती है । सुषुप्त जीवका अव्याकृत मायाके अंशभूत कारण-शरीरसे सम्बन्ध बना रहता है; अतः उक्त कथनका तात्पर्य ब्रह्ममें कारण-शरीरके सहित प्रवेश करना है—ऐसा समझना चाहिये ।
बृ० उ० ६१—
९६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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सहस्रधा भिन्नस्तावताणिम्ना तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पिङ्गलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णा अथ यत्रैनं घ्नन्तीव जिनन्तीव हस्तीव विच्छादयति गर्तमिव पतति यदेव जाग्रद्भयं पश्यति तदत्राविद्यया मन्यतेऽथ यत्र देव इव राजेवाहमेवेदँ॒ सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः ॥ २० ॥
उसकी वे ये हिता नामकी नाड़ियाँ, जिस प्रकार सहस्र भागोंमें विभक्त केश होता है वैसी ही सूक्ष्मतासे रहती हैं। वे शुक्ल, नील, पीत, हरित और लाल रंगके रससे पूर्ण हैं। सो जहाँ इस पुरुषको मानो मारते, मानो अपने वशमें करते हैं और जहाँ मानो इसे हाथी खदेड़ता है अथवा जहाँ यह मानो गड़हेमें गिरता है; इस प्रकार जो कुछ भी जाग्रदवस्थाके भय देखता है, उन्हें इस स्वप्नावस्थामें अविद्यासे मानता है और जहाँ यह देवताके समान, राजाके समान अथवा मैं ही यह सब हूँ—ऐसा मानता है, वह इसका परमधाम है ॥ २० ॥
| ता वै, अस्य शिरःपाण्यादिलक्षणस्य पुरुषस्य, एता हिता नाम नाड्यः, यथा केशः सहस्रधा भिन्नः, तावता तावत्परिमाणेनाणिम्ना अणुत्वेन तिष्ठन्ति; ताश्च शुक्लस्य रसस्य नीलस्य पिङ्गलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णाः, एतैः शुक्लत्वादिभी रसविशेषैः पूर्णा इत्यर्थः; एते च रसानां वर्णविशेषा वातपित्तश्लेष्मणाम् इतरेतरसंयोगवैषम्यविशेषाद् विचित्रा बहवश्च भवन्ति। | इस शिर एवं हाथ आदि अवयवोंवाले पुरुषकी ये हिता नामकी नाडियाँ, जिस प्रकार सहस्र भागोंमें विभक्त हुआ केश रहता है, उतने ही परिमाण यानी सूक्ष्मतासे रहती हैं; और वे शुक्ल, नील, पीत, हरित एवं लोहित रसकी भरी हुई हैं अर्थात् इन शुक्लत्वादिविशिष्ट रसोंसे पूर्ण हैं; ये रसोंके वर्णविशेष वात, पित्त और कफोंके पारस्परिक संयोगकी विशेष विषमताके कारण विभिन्न और बहुत प्रकारके होते हैं। |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९६३ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९६३ |
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| तास्वेवंविधासु नाडीषु सूक्ष्मासु वालाग्रसहस्रभेदपरिमाणासु शुक्लादिरसपूर्णासु सकलदेहव्यापिनीषु सप्तदशकं लिङ्गं वर्तते। तदाश्रिताः सर्वा वासना उच्चावचसंसारधर्मानुभवजनिताः; तल्लिङ्गं वासनाश्रयं सूक्ष्मत्वात् स्वच्छं स्फटिकमणिकल्पं नाडीगतरसोपाधिसंसर्गवशाद् धर्माधर्मप्रेरितोद्भूतवृत्तिविशेषं स्त्रीरथहस्त्याद्याकारविशेषैर्वासनाभिः प्रत्यवभासते। | इन इस प्रकारकी शुक्लादि रसोंसे पूर्ण सम्पूर्ण शरीरमें फैली हुई और वालाग्रके सहस्रांश परिमाणवाली सूक्ष्म नाडियोंमें वह सतरह तत्त्वोंका लिङ्गशरीर रहता है। उसीके अधीन संसारके ऊँच-नीच धर्मोंके अनुभवसे उत्पन्न हुई सारी वासनाएँ हैं। वासनाओंका आश्रयभूत वह लिङ्गशरीर सूक्ष्म होनेके कारण स्वच्छ और स्फटिकमणिके समान है, वह नाडीगत रसरूप उपाधिके संसर्गसे धर्माधर्मप्रेरित उद्भूतवृत्तिविशेषवाला तथा स्त्री, रथ, हाथी आदि आकारवाली विशेष वासनाओंसे युक्त भासित होता है। | | अथैवं सति, यत्र यस्मिन् काले <br> [अविद्याप्रत्ययोद्भूतदुःखानुभवप्रदर्शनम्] <br> केचन शत्रवोऽन्ये वा तस्करा मामागत्य घ्नन्ति-इति मृषैव वासनानिमित्तः प्रत्ययोऽविद्याख्यो जायते, तदेतदुच्यते—एनं स्वप्नदृशं घ्नन्तीवेति; तथा जिनन्तीव वशीकुर्वन्तीव; न केचन घ्नन्ति, नापि वशीकुर्वन्ति, केवलं त्वविद्यावासनोद्भवनिमित्तं भ्रान्तिमात्रम्; तथा हस्तीवैनं विच्छादयति वि- | ऐसी स्थितिमें, जिस समय वासनाओंके कारण 'कोई शत्रु अथवा अन्य चोर आदि आकर मुझे मारते हैं' ऐसा अविद्यासंज्ञक वृथा ही प्रत्यय हो जाता है, उसके विषयमें यह कहा जाता है—इस स्वप्नद्रष्टाको मानो मारते हैं, तथा 'जिनन्तीव'—मानो वशमें करते हैं। [वास्तवमें] उस समय न कोई मारते हैं और न वशमें ही करते हैं, यह तो केवल अविद्याजनित वासनाके उद्भवके कारण भ्रान्तिमात्र हो जाती है; इसी प्रकार हाथीके समान कोई इसे विच्छायित- |
९६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ९६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| च्छादयति विद्रावयति धावयतीवेत्यर्थः; गर्तमिव पतति— गर्तं जीर्णकूपादिकमिव पतन्तमात्मानमुपलक्षयति; तादृशी ह्यस्य मृषा वासनोद्भवत्यत्यन्तनिकृष्टाधर्मोद्भासितान्तःकरणवृत्त्याश्रया, दुःखरूपत्वात् । | विद्रावित करता अर्थात् दौड़ाता (पीछा करता) है तथा यह मानो गर्तमें गिरता है अर्थात् अपनेको गर्त-पुराने कूपादिमें गिरता-सा देखता है; इसे इस प्रकारकी मिथ्या वासना पैदा हो जाती है, जो दुःखरूपा होनेके कारण अत्यन्त निकृष्ट और अन्तःकरणकी अधर्मोद्भासिता वृत्तिके आश्रित रहती है । | | किं बहुना, यदेव जाग्रद्भयं पश्यति हस्त्यादिलक्षणम्, तदेव भयरूपम् अत्रास्मिन् स्वप्ने विनैव हस्त्यादिरूपं भयमविद्यावासनया मृषैवोद्भूतया मन्यते । | अधिक क्या, जागरित-अवस्थामें जो कुछ यह हाथी आदिरूप भय देखता है, इस स्वप्नावस्थामें भी हस्त्यादिरूप भयके बिना ही जाग्रत् हुई अविद्यावासनासे उस भयरूपको, जो मिथ्या ही है, सच मानने लगता है । | | (विद्याप्रत्ययोद्भूत-देवात्मत्वप्रदर्शनम्)<br>अथ पुनर्यत्राविद्यापकृष्यमाणा विद्या चोत्कृष्यमाणा—किंविषया किंलक्षणा च ? इत्युच्यते—अथ पुनर्यत्र यस्मिन् काले, देव इव स्वयं भवति, देवताविषया विद्या यदोद्भूता जागरितकाले, तदोद्भूतया वासनया देवमिवात्मानं मन्यते; स्वप्नेऽपि तदुच्यते—देव इव, राजेव; | और फिर जब अविद्याका अपकर्ष और विद्याका उत्कर्ष होने लगता है, तो उसका क्या विषय और क्या लक्षण होता है ? सो बतलाया जाता है—फिर जब-जिस समय वह स्वयं देवताके समान हो जाता है; अर्थात् जब जागरितकालमें देवताविषयिणी विद्याका उद्भव होता है, तब उस उद्भूत हुई वासनासे वह अपनेको देवताके समान मानता है, स्वप्नमें भी ऐसा ही कहा जाता है कि वह देवताके समान तथा राजाके समान होता है; |
ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९६५
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९६५ |
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| मूल संस्कृत भाष्यार्थ | हिन्दी अनुवाद |
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| राज्यस्थोऽभिषिक्तः स्वप्नेऽपि राजाहमिति मन्यते राजवासना-वासितः । | [ तात्पर्य यह है कि ] जागरित-अवस्थामें अभिषेकपूर्वक राज्यपर स्थित हुआ पुरुष उस राजवासना-से युक्त होनेके कारण स्वप्नमें भी 'मैं राजा हूँ' ऐसा मानता है । |
| एवमत्यन्तप्रक्षीयमाणाविद्या उद्भूता च विद्या सर्वात्मविषया यदा, तदा स्वप्नेऽपि तद्भाव-भावितः—अहमेवेदं सर्वोऽस्मीति मन्यते; स यः सर्वात्मभावः, सोऽस्यात्मनः परमो लोकः परम आत्मभावः स्वाभाविकः । | इसी प्रकार जब अविद्या अत्यन्त क्षीण हो जाती है और सर्वात्म-विषयिणी विद्याका उद्भव हो जाता है, उस समय उस भावसे भावित रहनेके कारण वह स्वप्नमें भी 'मैं ही यह सर्वरूप हूँ' ऐसा मानता है; यह जो सर्वात्मभाव है, वह इस आत्माका परम लोक-स्वाभाविक परम आत्मभाव है । |
| (विद्याविद्योर्भेदः) यत्तु सर्वात्मभावादर्वाग् वालाग्रमात्रमप्यन्यत्वेन दृश्यते—नाहमस्मीति, तदवस्थाविद्या; तया अविद्यया ये प्रत्युपस्थापिता अनात्मभावा लोकाः, तेऽपरमाः स्थावरान्ताः; तान् संव्यवहारविषयाँल्लोकानपेक्ष्यायं सर्वात्मभावःसमस्तोऽनन्तरोऽबाह्यः, सोऽस्य परमो लोकः । तस्मादपकृष्यमाणायामविद्यायां विद्यायां च काष्ठां गतायां सर्वात्मभावो मोक्षः,यथा स्वयंज्योतिष्ट्वं स्वप्ने प्रत्यक्षत उपलभ्यते तद्वद् विद्याफलमुपलभ्यत इत्यर्थः । | और जो सर्वात्मभावसे उतर-कर अपनेको वालाग्रमात्र भी 'मैं यह नहीं हूँ' इस प्रकार अन्यरूपसे देखता है, वह अवस्था अविद्या है, उस अविद्याद्वारा प्रस्तुत किये गये जो अनात्मभाव हैं, वे स्थावरपर्यन्त लोक अपरम हैं; उन व्यवहारविषयक लोकोंकी अपेक्षा यह सर्वात्मभाव पूर्ण तथा अन्तर-बाह्यशून्य है, वह इसका परम लोक है; अतः अविद्याका अपकर्ष और विद्याकी पराकाष्ठा होनेपर सर्वात्मभावकी प्राप्ति ही मोक्ष है, तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार स्वप्नमें आत्माका स्वयंप्रकाशत्व प्रत्यक्ष उपलब्ध होता है, उसी प्रकार विद्याके फल मोक्षकी प्रत्यक्ष उपलब्धि होती है । |
९६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ९६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| तथाविद्यायामप्युत्कृष्यमाणायाम्, तिरोधीयमानायां च विद्यायाम्, अविद्यायाः फलं प्रत्यक्षत एवोपलभ्यते—'अथ यत्रैनं घ्नन्तीव जिनन्तीव' इति। ते एते विद्याविद्याकार्ये सर्वात्मभावः परिच्छिन्नात्मभावश्च; विद्यया शुद्धया सर्वात्मा भवति; अविद्यया चासर्वो भवति; अन्यतः कुतश्चित् प्रविभक्तो भवति; यतः प्रविभक्तो भवति, तेन विरुध्यते; विरुद्धत्वाद् हन्यते जीयते विच्छाद्यते च। असर्वविषयत्वे च भिन्नत्वादेतद् भवति; समस्तस्तु सन् कुतो भिद्यते येन विरुध्येत; विरोधाभावे केन हन्यते जीयते विच्छाद्यते च ? | इसी प्रकार अविद्याका उत्कर्ष और विद्याका तिरोभाव होनेपर भी 'जिस समय मानो इसे कोई मारते हैं अथवा वशमें करते हैं' इत्यादि रूपसे अविद्याका फल प्रत्यक्ष ही उपलब्ध होता है। वे ये सर्वात्मभाव और परिच्छिन्नात्मभाव क्रमशः विद्या और अविद्याके कार्य हैं; शुद्ध विद्यासे पुरुष सर्वात्मा हो जाता है और अविद्यासे असर्व होता है; वह किसी अन्यसे विभक्त हो जाता है और जिससे विभक्त होता है, उससे विरुद्ध रहता है तथा विरुद्ध रहनेके कारण मारा जाता है, जीता जाता है तथा खदेड़ा जाता है। असर्वका विषय रहनेपर ही भिन्न होनेके कारण यह सब होता है; यदि सर्वरूप रहता तो किससे भिन्न होता, जिससे कि उसका विरोध हो सकता और विरोध न होनेपर वह किसके द्वारा मारा जाता, जीता जाता अथवा खदेड़ा जाता ? | | अत इदमविद्यायाः सतत्त्वमुक्तं भवति—सर्वात्मानं सन्तमसर्वात्मत्वेन ग्राहयति, आत्मनोऽन्यद् वस्त्वन्तरमविद्यमानं प्रत्युपस्थापयति आत्मानमसर्वमापादयति; | अतः यह अविद्याका स्वभाव बतलाया जाता है कि पुरुष सर्वात्मा होते हुए अपनेको असर्वात्मरूपसे ग्रहण कराता है, आत्मासे भिन्न कोई दूसरी वस्तु न होनेपर भी उसे उपस्थित करता है तथा आत्माको असर्वरूप बना देता है; फिर |
ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९६७
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९६७ |
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| संस्कृत मूल (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी अनुवाद |
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| ततस्तद्विषयः कामो भवति यतोऽभिद्यते, कामतः क्रियामुपादत्ते ततः फलम्—तदेतदुक्तं वक्ष्यमाणं च—'यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति' इत्यादि ।<br><br>इदमविद्यायाः सतत्त्वं सह कार्येण प्रदर्शितम्; विद्यायाश्च कार्यं सर्वात्मभावः प्रदर्शितोऽविद्याया विपर्ययेण । सा चाविद्या नात्मनः स्वाभाविको धर्मः—यस्माद् विद्यायामुत्कृष्यमाणायां स्वयमपचीयमाना सती, काष्ठां गतायां विद्यायां परिनिष्ठिते सर्वात्मभावे सर्वात्मना निवर्तते, रज्ज्वामिव सर्पज्ञानं रज्जुनिश्चये । तच्चोक्तम्—"यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत् केन कं पश्येत्" (बृ० उ० ४ । ५ । १५) इत्यादि; तस्मान्नात्मधर्मोऽविद्या; न हि स्वाभाविकस्योच्छित्तिः कदाचिदप्युपपद्यते, सवितुरिवौष्ण्यप्रकाशयोः । तस्मात् तस्या मोक्ष उपपद्यते ॥२०॥ | जिससे भेद मानता है, उसके विषयमें कामना होती है, कामनासे क्रिया स्वीकार करता है और उससे फल होता है, इसीसे यह कहा है और आगे कहा भी जायगा कि 'जहाँ द्वैत-सा होता है, वहीं अन्य अन्यको देखता है' इत्यादि ।<br><br>यह अविद्याका स्वरूप उसके कार्यके सहित दिखाया गया तथा अविद्याके विपरीतरूपसे विद्याका कार्य सर्वात्मभाव दिखाया गया । वह अविद्या आत्माका स्वाभाविक धर्म नहीं है, क्योंकि विद्याका उत्कर्ष होनेपर वह स्वयं क्षीण होने लगती है और जिस समय विद्याकी परात्मभावकी पूर्ण प्रतिष्ठा हो जाती है, उस समय रज्जुका निश्चय होनेपर रज्जुमें सर्पज्ञानके समान उसकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है । ऐसा ही कहा भी है—"जहां इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वहां किसके द्वारा क्या देखे ?" इत्यादि; इसलिये अविद्या आत्माका धर्म नहीं है, क्योंकि सूर्यके उष्णता और प्रकाशके समान स्वाभाविक धर्मोंका कभी उच्छेद नहीं हो सकता । अतः उससे मोक्ष होना सम्भव है ॥ २० ॥ |
९६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ९६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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मोक्षका स्वरूप प्रदर्शित करनेमें स्त्रीसे मिले हुए पुरुषका दृष्टान्त
| इदानीं योऽसौ सर्वात्मभावो मोक्षो विद्याफलं क्रियाकारकफलशून्यम्, स प्रत्यक्षतो निर्दिश्यते, यत्राविद्याकामकर्माणि न सन्ति। तदेतत् प्रस्तुतम्—‘यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति’ इति— | अब, यह जो विद्याका फल क्रियाकारक एवं फलसे रहित सर्वात्मभावरूप मोक्ष है, जिसमें कि अविद्या, काम और कर्मका अभाव है, उसका प्रत्यक्षतया निर्देश किया जाता है। 'जिस अवस्थामें सोया हुआ पुरुष किसी भोगकी इच्छा नहीं करता और न कोई स्वप्न देखता है' इस प्रकार जिसका प्रकरण चला था— |
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तद् वा अस्यैतदतिच्छन्दा अपहतपाप्माभयँ रूपम्। तद् यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरं तद् वा अस्यैतदाप्तकाममात्मकाममकामँ रूपँ शोकान्तरम् ॥ २१ ॥
वह इसका कामरहित, पापरहित और अभयरूप है। व्यवहारमें जिस प्रकार अपनी प्रिया भार्याको आलिङ्गन करनेवाले पुरुषको न कुछ बाहरका ज्ञान रहता है और न भीतरका, इसी प्रकार यह पुरुष प्राज्ञात्मासे आलिङ्गित होनेपर न कुछ बाहरका विषय जानता है और न भीतरका; यह इसका आप्तकाम, आत्मकाम, अकाम और शोकशून्य रूप है ॥ २१ ॥
| तदेतद् वा अस्य रूपम्—यः सर्वात्मभावः 'सोऽस्य परमो लोकः' इत्युक्तः—तदतिच्छन्दा अतिच्छन्द- | इसका यह रूप, जो कि सर्वात्मभाव एवं 'यह इसका परम लोक है' इस प्रकार कहा गया है, वह अतिच्छन्दा अर्थात् अतिच्छन्द-रूप |
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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९६९
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९६९
| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी अनुवाद |
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| मित्यर्थः; रूपपरत्वात्; छन्दः कामः, अतिगतश्छन्दो यस्माद्रूपात् तदतिच्छन्दं रूपम्; अन्योऽसौ सान्तश्छन्दःशब्दो गायत्र्यादिच्छन्दोवाची; अयं तु कामवचनः, अतः स्वरान्त एव; तथाप्यतिच्छन्दा इति पाठः स्वाध्यायधर्मो द्रष्टव्यः । अस्ति च लोके कामवचनप्रयुक्तश्छन्दशब्दः 'स्वच्छन्दः' 'परच्छन्दः' इत्यादौ; अतः 'अतिच्छन्दम्' इत्येवमुपनेयम्, कामवर्जितमेतद् रूपमित्यस्मिन्नर्थे । | है; क्योंकि अतिच्छन्द शब्द रूपका विशेषण है।¹ छन्द कामको कहते हैं, अतः जिस रूपसे छन्द ( काम ) की निवृत्ति हो गयी है, वह अतिच्छन्दरूप कहलाता है; जो सान्त छन्दस् शब्द है, वह इससे भिन्न है, जो गायत्री आदि छन्दोंका वाचक है; यह छन्द शब्द तो कामवाची है, इसलिये स्वरान्त ही है। फिर भी 'अतिच्छन्दा' ऐसा दीर्घान्त पाठ तो स्वाध्यायधर्म ही समझना चाहिये । लोकमें 'स्वच्छन्द' 'परच्छन्द' इत्यादि शब्दोंमें छन्द शब्दका काम अर्थमें प्रयोग प्रसिद्ध है; अतः कामवर्जित इस अर्थमें इस रूपका 'अतिच्छन्दम्' इस प्रकार परिवर्तन कर लेना चाहिये । |
| तथापहतपाप्म—पाप्मशब्देन धर्माधर्मावुच्येते, "पाप्मभिः संसृज्यते" (बृ० उ० ४।३।८) "पाप्मनो विजहाति" (४।३।८) इत्युक्तत्वात्; अपहतपाप्म धर्माधर्मवर्जितमित्येतत् । | इसी प्रकार वह अपहतपाप्म है—यहाँ पाप्म शब्दमें धर्म-अधर्म दोनों ही कहे गये हैं जैसा कि "पाप्मभिः संसृज्यते"² "पाप्मनो विजहाति"³ इन वाक्योंमें कहा गया है; अतः 'अपहतपाप्म' अर्थात् धर्माधर्मसे रहित । |
| किञ्च, अभयम्—भयं हि नामाविद्याकार्यम्, 'अविद्यया | तथा अभय है—भय तो अविद्याका ही कार्य है, 'अविद्यासे |
१. इसलिये इसका 'अतिच्छन्दम्' ऐसा नपुंसकलिङ्ग प्रयोग होना चाहिये ।
२. "धर्माधर्मके आश्रयभूत देह और इन्द्रियोंसे संयुक्त हो जाता है।"
३. "धर्माधर्मके आश्रयभूत देह-इन्द्रियोंको त्याग देता है।"
९७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| भयं मन्यते' इति ह्युक्तम् । तत्कार्यद्वारेण कारणप्रतिषेधोऽयम्; अभयं रूपमित्यविद्यावर्जितमित्येतत् । यदेतद् विद्याफलं सर्वात्मभावः, तदेतदतिच्छन्दापहतपाप्माभयं रूपम्–सर्वसंसारधर्मवर्जितम्, अतोऽभयं रूपमेतत् । <br><br> इदं च पूर्वमेवोपन्यस्तमतीतानन्तरब्राह्मणसमाप्तौ “अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि” (४।२।४) इत्यागमतः । इह तु तर्कतः प्रपञ्चितं दर्शितागमार्थप्रत्ययदाढर्याय । | भय मानता है' ऐसा पहले कहा जा चुका है। यह उस (अविद्या) के कार्यके द्वारा कारणका प्रतिषेध किया गया है; अभयरूप अर्थात् जो अविद्यासे रहित है। [इस प्रकार] यह जो विद्याका फल सर्वात्मभाव है, वह कामरहित, पुण्यपापरहित एवं अभयरूप है, यह सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे रहित है, इसलिये अभयरूप है। इसका इससे पूर्ववर्ती ब्राह्मणकी समाप्तिमें “हे जनक ! तू अभयको प्राप्त हो गया है” इस वाक्यद्वारा पहले ही वर्णन कर दिया गया है। यहां तो पूर्वप्रदर्शित वेदार्थमें प्रत्यय (विश्वास) की दृढताके लिये ही उसका युक्तिपूर्वक विस्तार किया गया है। | | अयमात्मा स्वयं चैतन्यज्योतिःस्वभावः सर्वं स्वेन चैतन्यज्योतिषावभासयति–स यत्तत्र किञ्चित् पश्यति, रमते, चरति, जानाति चेत्युक्तम्; स्थितं चैतन्न्यायतो नित्यं स्वरूपं चैतन्यज्योतिष्ट्वमात्मनः । | यह स्वयं चैतन्यज्योतिःस्वरूप आत्मा सबको अपने चैतन्यप्रकाशसे प्रकाशित करता है—'वह जो कुछ उस अवस्थामें देखता, रमण करता, विहार करता एवं जानता है [उस सबसे असङ्ग रहता है]' ऐसा पहले कहा जा चुका है; यह चैतन्यज्योतिष्ट्व आत्माका नित्यस्वरूप है—ऐसा युक्तिसे भी निश्चय होता है। | | स यद्यात्मा अत्राविनष्टः स्वेनैव रूपेण वर्तते, कस्मादयम्–अहम- | इस सुषुप्तावस्थामें यदि वह आत्मा नष्ट न होकर अपने स्वरूपसे ही विद्य- |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९७१
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९७१
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| स्मित्यात्मानं वा, बहिर्वा—इमानि भूतानीति’ जाग्रत्स्वप्नयोरिव न जानाति ? इत्यत्रोच्यते; शृण्वत्राज्ञानहेतुम्—एकत्वमेवाज्ञानहेतुः; तत् कथम् ? इत्युच्यते । दृष्टान्तेन हि प्रत्यक्षीभवति विवक्षितोऽर्थ इत्याह— | मान रहता है तो जाग्रत् और स्वप्नके समान 'मैं यह हूँ' इस प्रकार अपनेको और अपनेसे बाहर इन भूतोंको क्यों नहीं जानता ?—इसपर यहाँ कहा जाता है—इस अवस्थामें उसके न जाननेका जो हेतु है, सो सुनो—उसके न जाननेका कारण एकत्व ही है; सो किस प्रकार ? यह बतलाया जाता है । विवक्षित अर्थ दृष्टान्तसे स्पष्ट हो जाता है, इसलिये श्रुति कहती है— |
| तत्तत्र यथा लोके प्रिययेष्टया स्त्रिया सम्परिष्वक्तः सम्यक् परिष्वक्तः कामयन्त्या कामुकः सन् न बाह्यमात्मनः किञ्चन किञ्चिदपि वेद—मत्तोऽन्यद् वस्त्विति, न चान्तरम्—अयमहमस्मि सुखी दुःखी वेति; अपरिष्वक्तस्तु तया प्रविभक्तो जानाति सर्वमेव बाह्यम् आभ्यन्तरं च; परिष्वङ्गोत्तरकालं त्वेकत्वापत्तेर्न जानाति—एवमेव, यथा दृष्टान्तोऽयं पुरुषः क्षेत्रज्ञो | इस विषयमें ऐसा समझना चाहिये कि जिस प्रकार लोकमें अपनी कामना करनेवाली प्रिया-इष्ट स्त्रीसे स्वयं भी कामुक होकर सम्यक् प्रकारसे आलिङ्गित हुआ पुरुष अपनेसे बाहर 'मुझसे भिन्न कोई भी वस्तु है' ऐसा नहीं जानता और न भीतर ही 'यह मैं सुखी अथवा दुःखी हूँ' ऐसा ही जानता है; उससे आलिङ्गित न होनेपर तो उससे अलग रहकर बाहरी और भीतरी सब बातोंको जानता है; आलिङ्गनके बाद तो एकाकारता हो जानेसे वह कुछ नहीं जानता—इसी प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त है, |
१. यहाँ एकत्वका अर्थ आत्माका अद्वैत-बोध नहीं समझना चाहिये; क्योंकि सुषुप्तिमें यह बोध नहीं होता, बोध होनेपर तो किसी अवस्थाविशेषसे, जिसका शब्दद्वारा निर्देश किया जा सके, सम्बन्ध रहता ही नहीं । सुषुप्तिमें चित्तका लय होनेसे कुछ क्षणके लिये नानात्वका भान नहीं होता; इसी आशयसे एकत्वको कारण बताया है ।
९७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| भूतमात्रासंसर्गतः सैन्धवखिल्यवत् प्रविभक्तः, जलादौ चन्द्रादिप्रतिविम्बवत् कार्यकारण इह प्रविष्टः, सोऽयं पुरुषः, प्राज्ञेन परमार्थेन स्वाभाविकेने स्वेनात्मना परेण ज्योतिषा, सम्परिष्वक्तः सम्यक् परिष्वक्त एकीभूतो निरन्तरः सर्वात्मा, न बाह्यं किञ्चन वस्त्वन्तरम्, नाप्यान्तरमात्मनि-–अयमहस्मि सुखी दुःखी वेति वेद ।<br><br>तत्र चैतन्यज्योतिःस्वभावत्वे कस्मादिह न जानातीति यद्-प्राक्षीः, तत्रायं हेतुर्मयोक्त एकत्वम्, यथा स्त्रीपुंसयोः सम्परिष्वक्तयोः। | क्षेत्रज्ञ पुरुष भूतमात्राके संसर्गसे लवणखण्डके समान विभक्त होकर, जलादिमें चन्द्रमादिके प्रतिबिम्बके समान इस देहेन्द्रियमें प्रविष्ट हो रहा है, वह यह पुरुष अपने स्वाभाविक परमार्थस्वरूप परज्योति प्राज्ञसे सम्यक् प्रकारसे परिष्वक्त अर्थात् एकीभूत होकर निरन्तर और सर्वात्मा होनेके कारण न तो किसी बाह्य वस्त्वन्तरको जानता है और न आन्तर अर्थात् आत्मामें ही 'यह सुखी अथवा दुःखी मैं हूँ' ऐसा समझता है।¹<br><br>इस प्रकार तुमने जो पूछा था कि चैतन्यात्मज्योतिःस्वरूप होनेपर भी वह इस अवस्थामें क्यों नहीं जानता, सो उसमें मैंने एकत्व यह हेतु बतलाया, जिस प्रकार कि परस्पर आलिङ्गित स्त्री और पुरुषका |
१. इस प्रसङ्गसे कोई यह न समझ ले कि सुषुप्तिमें जीव वस्तुतः आत्मनिष्ठ एक अद्वितीय एवं सर्वात्मा हो जाता है। यह तो बोधवान्का स्वरूप है। जो किसी अवस्थाविशेषसे परिच्छिन्न होगा, वह सर्वात्मा कैसे हो सकता है ? इस प्रकरणका तात्पर्य, जैसा कि पहले टिप्पणीमें बताया गया है, इतना ही है कि उस समय कुछ भी भान नहीं रहता; सुषुप्तिसे जागनेपर मनुष्य यही अनुभव सुनाता है कि 'मैं सुखसे सोया, कुछ नहीं जाना' इत्यादि। उसको सर्वात्मभावका बोध नहीं रहता; क्योंकि आवरण दूर हुए बिना यह बोध प्रकाशित नहीं होता और बोध हो जानेपर आवरण रहता नहीं; सुषुप्तिसे जीव पुनः जाग्रत्-अवस्थामें आता है; इससे इसकी स्वरूपस्थिति नहीं मानी जा सकती; स्त्री-पुरुषके मिलनका दृष्टान्त अथवा सुषुप्ति-का दृष्टान्त वस्तुको समझानेके लिये सब एकदेशी दृष्टान्तमात्र है; मुक्त पुरुषकी किसी दूसरेसे वास्तविक तुलना हो ही नहीं सकती।
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थे ९७३
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थे ९७३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| तत्रार्थान्नानात्वं विशेषविज्ञानहेतुरित्युक्तं भवति; नानात्वे च कारणम्—आत्मनो वस्त्वन्तरस्य प्रत्युपस्थापिकाविद्येत्युक्तम्। तत्र चाविद्याया यदा प्रविभक्तो भवति, तदा सर्वेणैकत्वमेवास्य भवति; ततश्च ज्ञानज्ञेयादिकारकविभागेऽसति, कुतो विशेषविज्ञानप्रादुर्भावः कामो वा सम्भवति स्वाभाविके स्वरूपस्थ आत्मज्योतिषि? | एकत्व होता है। इससे स्वतः ही यह बात बतला दी गयी कि नानात्व विशेष विज्ञानका हेतु है और नानात्वका कारण आत्मासे भिन्न वस्तुको प्रस्तुत करनेवाली अविद्या है—यह बतलाया जा चुका है। सो जिस समय यह अविद्यासे अलग हो जाता है, उस समय इसकी सबके साथ एकता ही हो जाती है; तब आत्मज्योतिके अपने स्वाभाविक स्वरूपमें स्थित हो जानेपर ज्ञान-ज्ञेयादि कारकविभागके न रहनेपर विशेष विज्ञानका प्रादुर्भाव तथा कामना कैसे हो सकते हैं? |
| यस्मादेवं सर्वैकत्वमेवास्य रूपम् अतस्तद् वा अस्यात्मनः स्वयंज्योतिःस्वभावस्यैतद् रूपमाप्तकामम्। यस्मात् समस्तमेतत्, तस्मादाप्ताः कामा अस्मिन् रूपे तदिदमाप्तकामम्; यस्य ह्यन्यत्वेन प्रविभक्तः कामः, तदनाप्तकामं भवति, यथा जागरितावस्थायां देवदत्तादिरूपम्; न त्विदं तथा कुतश्चित् प्रविभज्यते; अतस्तदाप्तकामं भवति। | क्योंकि इस प्रकार सबके साथ एकता ही इसका रूप है, इसलिये इस स्वयंज्योतिःस्वरूप आत्माका यह रूप आप्तकाम है। चूँकि यह इसका समस्त रूप है, इसलिये इस रूपमें समस्त काम प्राप्त रहते हैं, अतः यह आप्तकाम है; जिसकी इच्छा उससे अन्य रूपसे विभक्त रहती है, वह अनाप्तकाम होता है, जिस प्रकार जागरित-अवस्थामें देवदत्तादि रूप; किंतु यह आत्मतत्त्व उनकी तरह किसीसे विभक्त नहीं है; इसलिये यह आप्तकाम है। |
९७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| किमन्यस्माद् वस्त्वन्तरान्न प्रविभज्यते ? आहोस्विदात्मैव तद् वस्त्वन्तरम् ? अत आह—नान्यदस्त्यात्मनः, कथम् ? यत आत्मकामम्—आत्मैव कामा यस्मिन् रूपे, अन्यत्र प्रविभक्ता इवान्यत्वेन काम्यमाना यथा जाग्रत्स्वप्नयोः, तस्यात्मैव अन्यत्वप्रत्युपस्थापकहेतोरविद्याया<sup>१</sup> अभावात्—आत्मकामम्; अत एवाकाममेतद्रूपं काम्यविषयाभावात्; शोकान्तरं शोकच्छिद्रं शोकशून्यमित्येतत्, शोकमध्यमिति वा, सर्वथाप्यशोकमेतद् रूपं शोकवर्जितमित्यर्थः ॥२१॥ | क्या यह (आत्माका ज्योतिर्मय रूप) किसी अन्य वस्तुसे विभिन्न नहीं है? अथवा आत्मा ही वह वस्त्वन्तर है ? इसपर श्रुति कहती है—आत्मासे भिन्न कोई दूसरी वस्तु ही नहीं है—कैसे नहीं है ? क्योंकि वह रूप आत्मकाम है; जिस प्रकार स्वप्न और जागरित-अवस्थाओंमें आत्मासे अन्यत्र विभक्तके समान तथा अन्य रूपसे कामना किये जानेवाले काम होते हैं, उस प्रकार सुषुप्तिमें अन्यत्वको प्रस्तुत करनेवाले अविद्यारूप हेतुका<sup>१</sup> अभाव होनेके कारण आत्मा ही उसके काम हैं, इसलिये वह रूप आत्मकाम है। इसीसे काम्य विषयोंका अभाव होनेके कारण यह रूप अकाम है; तथा शोकान्तर—शोकच्छिद्र अर्थात् शोकशन्य है अथवा यह शोकमध्य है; तात्पर्य यह कि यह रूप सर्वथा ही अशोक अर्थात् शोकरहित है ॥ २१ ॥ |
सुषुप्तिस्थ आत्माकी निःसङ्ग और निःशोक स्थितिका वर्णन
| प्रकृतः स्वयंज्योतिरात्मा-विद्याकामकर्मविनिर्मुक्त इत्यु- | जिसका प्रकरण चल रहा है, वह स्वयंज्योति आत्मा अविद्या, काम और कर्मसे रहित है—ऐसा कहा जा |
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१. यहाँ अविद्याका तात्पर्य सांसारिक राग-द्वेष, सुख-दुःख आदिसे है, उसका अभाव हो जानेका अर्थ है, उसका भान न होना। सुषुप्तिमें जैसा कि पहले बता आये हैं, अव्याकृत मायासे सम्पर्क तो बना ही रहता है। भान तो इसलिये नहीं होता है कि चित्त लीन रहता है; अन्यथा अविद्याका अत्यन्ताभाव मान लेनेपर तो मुक्त और सुषुप्तमें अन्तर ही नहीं रह जायगा।
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९७५ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९७५ |
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| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| क्तम्, असङ्गत्वादात्मनः, आगन्तुकत्वाच्च तेषाम्। तत्रैवमाशङ्का जायते; चैतन्यस्वभावत्वे सत्यप्येकीभावान्न जानाति स्त्रीपुंसयोरिव सम्परिष्वक्तयोरित्युक्तम्, तत्र प्रासङ्गिकमेतदुक्तम्—कामकर्मादिवत् स्वयंज्योतिष्ट्वमप्यस्यात्मनो न स्वभावः, यस्मात् सम्प्रसादे नोपलभ्यते—इत्याशङ्कायां प्राप्तायां तन्निराकरणाय स्त्रीपुंसयोः दृष्टान्तोपादानेन विद्यमानस्यैव स्वयंज्योतिष्ट्वस्य सुषुप्तेऽग्रहणमेकीभावाद्धेतोः, न तु कामकर्मादिवदागन्तुकम्। | चुका है, क्योंकि आत्मा असङ्ग है और वे (अविद्यादि) आगन्तुक हैं। इससे यह आशङ्का होती है—ऊपर यह कहा गया है कि चैतन्यस्वभाव होनेपर भी परस्पर आलिङ्गित स्त्री और पुरुषोंके समान एकीभाव होनेके कारण आत्मा नहीं-जानता; वहाँ प्रसङ्गानुसार यह-कहा गया था कि काम और-कर्मादिके समान स्वयं-ज्योतिष्ट्व भी इस आत्माका स्वभाव नहीं है, क्योंकि सुषुप्तिमें इसकी उपलब्धि नहीं होती, इस आशङ्काके प्राप्त होनेपर उसका निराकरण करनेके लिये 'स्त्री पुरुष' का दृष्टान्त देकर [ यह बतलाया गया था कि ]-एकी-भावरूप हेतुके कारण सुषुप्तिमें विद्यमान स्वयंज्योतिष्ट्वका ही ग्रहण नहीं होता, वह काम-कर्मादिके समान आगन्तुक नहीं है। |
| इत्येतत् प्रासङ्गिकमभिधाय यत् प्रकृतं तदेवानुप्रवर्तयति। अत्र चैतत् प्रकृतम्—अविद्याकामकर्मविनिर्मुक्तमेव तद् रूपम्, यत् सुषुप्तं आत्मनो गृह्यते प्रत्यक्षत | इस प्रकार इस प्रासङ्गिक स्वयं ज्योतिष्ट्वका निरूपण कर जो प्रकृत है, उसका ही श्रुति उल्लेख करती है। यहाँ प्रकरण यह है कि सुषुप्तिमें आत्माके जिस रूपका प्रत्यक्षतया ग्रहण किया जाता है, वह अविद्या, काम और कर्मसे रहित ही है।^२ |
१. इस एकीभाव या एकत्वका तात्पर्य पहले टिप्पणी (पृष्ठ ६७१) में बताया जा चुका है।
२. इस प्रसङ्गको समझनेके लिये पृष्ठ ६४५ और ६७२ की टिप्पणी देखिये।
९७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ९७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| इति। तदेतद् यथाभूतमेवाभिहितम्—सर्वसम्बन्धातीतमेतद् रूपमिति; यस्मादत्रैतस्मिन् सुषुप्तस्थाने अतिच्छन्दापहतपाप्माभयमेतद् रूपम्, तस्मात्— | अतः यह बात ठीक ही कही गयी है कि यह रूप सब प्रकारके-सम्बन्धोंसे परे है; चूँकि यहाँ इस सुषुप्त-स्थानमें यह रूप कामरहित, धर्माधर्म रहित और अभय होता है, इसलिये— |
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अत्र पितापिता भवति मातामाता लोका अलोका देवा अदेवा वेदा अवेदाः । अत्र स्तेनोऽस्तेनो भवति भ्रूणहाभ्रूणहा चाण्डालोऽचाण्डालः पौल्कसोऽपौल्कसः श्रमणोऽश्रमणस्तापसोऽतापसोऽनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान् हृदयस्य भवति ॥ २२ ॥
इस सुषुप्तावस्थामें पिता अपिता हो जाता है, माता अमाता हो जाती है, लोक अलोक हो जाते हैं, देव अदेव हो जाते हैं और वेद अवेद हो जाते हैं। यहाँ चोर अचोर हो जाता है, भ्रूणहत्या करनेवाला अभ्रूणहा हो जाता है, तथा चाण्डाल अचाण्डाल, पौल्कस अपौल्कस, श्रमण अश्रमण और तापस अतापस हो जाते हैं। उस समय यह पुरुष पुण्यसे असम्बद्ध तथा पापसे भी असम्बद्ध होता है और हृदयके सम्पूर्ण शोकोंको पार कर लेता है ॥ २२ ॥
| **अत्र पिता जनकः—**तस्य च जनयितृत्वाद् यत् पितृत्वं पुत्रं प्रति, तत् कर्मनिमित्तम्, तेन च कर्मणायमसम्बद्धोऽस्मिन् काले । तस्मात् पितापुत्रसम्बन्धनिमित्तात् कर्मणो विनिर्मुक्तत्वात् पिताप्यपिता भवति; तथा पुत्रोऽपि पितुःपुत्रो | यहाँ पिता अर्थात् जनक—जन्म देनेके कारण जो उसका पुत्रके प्रति पिताका भाव होता है, वह 'कर्म' रूप निमित्तसे है, उस कर्मसे इस कालमें ( सुषुप्तिमें ) यह असम्बद्ध रहता है। अतः पिता-पुत्र-सम्बन्धके हेतुभूत कर्मसे रहित होनेके कारण इस अवस्थामें पिता भी अपिता हो जाता है; इसी प्रकार पुत्र भी पिताका अपुत्र हो जाता है—ऐसा |
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| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९७७ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९७७ |
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| भवतीति सामर्थ्याद् गम्यते; उभयोर्हि सम्बन्धनिमित्तं कर्म, तदयमतिक्रान्तो वर्तते; 'अपहतपाप्म' इति ( ४ । ३ । २१ ) ह्युक्तम् । | वाक्यके सामर्थ्यसे जाना जाता है; क्योंकि दोनोंहीके सम्बन्धका कारण कर्म है, उसका यह अतिक्रमण कर जाता है; क्योंकि इसके स्वरूपको 'अपहतपाप्म' ( पापरहित ) ऐसा कहा गया है । |
| तथा मातामाता, लोकाः कर्मणा जेतव्या जिताश्च--तत्कर्मसम्बन्धाभावाल्लोका अलोकाः। तथा देवाः कर्माङ्गभूताः--तत्कर्मसम्बन्धात्ययाद् देवा अदेवाः । तथा वेदाः साध्यसाधनसम्बन्धाभिधायकाः, मन्त्रलक्षणाश्चाभिधायकत्वेन कर्माङ्गभूताः, अधीता अध्येतव्याश्च—कर्मनिमित्तमेव सम्बध्यन्ते पुरुषेण; तत्कर्मातिक्रमणादेतस्मिन् काले वेदा अप्यवेदाः सम्पद्यन्ते । | इसी प्रकार माता अमाता हो जाती है। कर्मसे जीते जानेवाले तथा जीते हुए लोक, उस कर्मसम्बन्धके न रहनेके कारण अलोक हो जाते हैं। और कर्मके अङ्गभूत देवता, उस कर्मसम्बन्धका अतिक्रमण हो जानेके कारण देव अदेव हो जाते हैं। तथा साध्यसाधनसम्बन्धका वर्णन करनेवाले और अभिधायकरूपसे कर्मके अङ्गभूत मन्त्रात्मक वेद, वे अध्ययन किये हुए हों अथवा अध्ययन किये जानेवाले हों, कर्मके कारण ही पुरुषसे सम्बद्ध हैं; उस कर्मका अतिक्रमण करनेके कारण इस अवस्थामें वेद भी अवेद हो जाते हैं। |
| न केवलं शुभकर्मसम्बन्धातीतः, किं तर्हि ? अशुभैरप्यत्यन्तघोरैः कर्मभिरसम्बद्ध एवायं वर्तत इत्येतमर्थमाह—अत्र स्तेनो | [ उस अवस्थामें ] यह केवल शुभ कर्मके सम्बन्धसे ही परे नहीं होता, तो क्या बात है ? यह अशुभ अर्थात् अत्यन्त घोर कर्मोंसे भी असम्बद्ध ही रहता है—यही बात श्रुति बतलाती है—यहाँ चोर अर्थात् |
बृ० उ० ६२—
९७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ९७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| ब्राह्मणसुवर्णहर्ता, भ्रूणघ्ना सह पाठादवगम्यते—स तेन घोरेण कर्मणैतस्मिन् काले विनिर्मुक्तो भवति, येनायं कर्मणा महापातकी स्तेन उच्यते । | ब्राह्मणका सुवर्ण चुरानेवाला, यह, बात स्तेन शब्दका भ्रूणहाके साथ पाठ होनेसे जानी जाती है,¹ वह इस कालमें उस घोर कर्मसे मुक्त हो जाता है, जिस कर्मके कारण कि यह महापापी स्तेन ( चोर ) कहा जाता है । | | तथा भ्रूणहाऽभ्रूणहा; तथा चाण्डालो न केवलं प्रत्युत्पन्नेनैव कर्मणा विनिर्मुक्तः, किं तर्हि ? सहजेनाप्यत्यन्त निकृष्टजातिप्रापकेणापि विनिर्मुक्त एवायम्, चाण्डालो नाम शूद्रेण ब्राह्मण्यामुत्पन्नश्चण्डाल एव चाण्डालः, स जातिनिमित्तेन कर्मणाऽसम्बद्धत्वादचाण्डालो भवति । पौल्कसः, पुल्कस एव पौल्कसः, शूद्रेणैव क्षत्रियायामुत्पन्नः, सोऽप्यपौल्कसो भवति । | इसी प्रकार भ्रूणहत्या ( श्रेष्ठ ब्राह्मणकी हत्या ) करनेवाला अभ्रूणहा हो जाता है; तथा चाण्डाल केवल आगन्तुक कर्मसे ही मुक्त नहीं होता, तो फिर क्या-क्या होता है ? वह अत्यन्त निकृष्ट जातिकी प्राप्ति करानेवाले अपने स्वाभाविक कर्मसे भी मुक्त हो जाता है; चाण्डाल--शूद्रसे ब्राह्मणीमें उत्पन्न हुए चण्डालको कहते हैं, वह चण्डाल ही चाण्डाल है । वह अपने जाति सम्बन्धी कर्मसे असम्बद्ध होनेके कारण अचाण्डाल हो जाता है । पौल्कस – शूद्रसे क्षत्राणीमें उत्पन्न हुआ पुल्कस ही पौल्कस कहलाता है; वह भी अपौल्कस हो जाता है । | | तथा आश्रमलक्षणैश्च कर्मभिरसम्बद्धो भवतीत्युच्यते, श्रमणः | इसी प्रकार पुरुष आश्रमसम्बन्धी कर्मोंसे भी असम्बद्ध हो जाता है, सो बतलाते हैं-श्रमण अर्थात् जिस |
१. 'भ्रूणहा' श्रेष्ठ ब्राह्मणकी हत्या करनेवालेको कहते हैं, इसलिये 'स्तेन' शब्दसे भी साधारण चोर न समझकर ब्राह्मणका सुवर्ण चुरानेवाला समझना चाहिये ।
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्याथ | ९७९ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्याथ | ९७९ |
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| परिव्राट्—यत्कर्मनिमित्तो भवति, स तेन विनिर्मुक्तत्वादश्रमणः; तथा तापसो वानप्रस्थोऽतापसः। सर्वेषां वर्णाश्रमादीनाम् उपलक्षणार्थमुभयोर्ग्रहणम् । | कर्मके कारण पुरुष परिव्राट् होता है, उससे मुक्त होनेके कारण वह अश्रमण हो जाता है तथा तापस यानी वानप्रस्थ अतापस हो जाता है। इन दोनोंका ग्रहण सम्पूर्ण वर्ण और आश्रमोंके उपलक्षके लिये है। | | किं बहुना ? अनन्वागतम्—नान्वागतमनन्वगतम् असम्बद्धमित्येतत्, पुण्येन शास्त्रविहितेन कर्मणा, तथा पापेन विहिताकरणप्रतिषिद्धक्रियालक्षणेन; रूपपरत्वान्नपुंसकलिङ्गम्; 'अभयं रूपम्' इति ह्यनुवर्तते । | अधिक क्या, वह पुण्य अर्थात् शास्त्रविहित कर्मसे अनन्वागत—असम्बद्ध रहता है तथा विहितका न करना और अविहितका - करनारूप पापसे भी असम्बद्ध रहता है; रूपपरक होनेके कारण अनन्वागतम् ऐसा नपुंसकलिंग प्रयोग किया गया है; क्योंकि 'अभयं रूपम्' इसकी यहां अनुवृत्ति की जाती है। | | किं पुनरसम्बद्धत्वे कारणम् ? इति तद्धेतुरुच्यते—तीर्णोऽतिक्रान्तः, हि यस्मात् एवंरूपः, तदा तस्मिन् काले सर्वाञ्छोकान्—शोकाः कामाः, इष्टविषयप्रार्थना हि तद्विषयवियोगे शोकत्वमापद्यते। इष्टं हि विषयमप्राप्तं वियुक्तं चोद्दिश्य चिन्तयानस्तद्गुणान् संतप्यते पुरुषः, अतः शोकोऽरतिः काम इति पर्यायाः । | किंतु उसको असम्बद्धतामें कारण क्या है ? सो उसका हेतु बतलाया जाता है—चूँकि उस समय इस प्रकारका यह पुरुष सम्पूर्ण शोकोंको पार कर जाता है; शोक अर्थात् काम, क्योंकि इष्ट विषयकी प्रार्थना ही उस विषयका वियोग होनेपर शोकरूप हो जाती है। अप्राप्त अथवा वियुक्त हुए इष्टविषयके उद्देश्यसे उसके गुणोंका चिन्तन करनेवाला पुरुष संतप्त होता है, इसलिये शोक, अरति, काम-ये पर्याय शब्द हैं। |
९८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| यस्मात् सर्वकामातीतो ह्यत्रायं भवति, 'न कञ्चन कामं कामयते' 'अतिच्छन्दा' इति ह्युक्तम्, तत्प्रक्रियापतितोऽयं शोकशब्दः कामवचन एव भवितुमर्हति । कामश्च कर्महेतुः, वक्ष्यति हि— स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते' इति । अतः सर्वकामातितीर्णत्वाद् युक्तमुक्तम्—'अनन्वागतं पुण्येन' इत्यादि । | क्योंकि इस अवस्थामें पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंसे पार हो जाता है, कारण, 'वह किसी कामको कामना नहीं करता', अतिच्छन्दा है' ऐसा उसके विषयमें कहा गया है, इसलिये उस प्रकरणमें आया हुआ यह 'शोक' शब्द कामका ही वाचक होना चाहिये । काम ही कर्मका कारण है; श्रुति ऐसा कहेगी भी कि 'वह जैसी कामनावाला होता है, वैसे संकल्पवाला होता है, और जैसे संकल्पवाला होता है वैसा कर्म करता है।' अतः समस्त कर्मोंसे अतिक्रान्त होनेके कारण 'वह पुण्यसे असम्बद्ध है' इत्यादि कथन ठीक ही है । |
| हृदयस्य-हृदयमिति पुण्डरीकाकारो मांसपिण्डः, तत्स्थमन्तःकरणं बुद्धिर्हृदयमित्युच्यते; तात्स्थ्यात्, मञ्चक्रोशनवत् । हृदयस्य बुद्धेर्ये शोकाः बुद्धिसंश्रया हि ते, "कामः संकल्पो विचिकित्सेत्यादि सर्वं मन एव" (१ । ५ । ३) | 'हृदयस्य'—हृदय कमलके आकारवाले मांसपिण्डको कहते हैं, उसमें स्थित अन्तःकरण अर्थात् बुद्धि हृदयस्थ होनेके कारण मञ्चके चिल्लानेके^१ समान 'हृदय' कही जाती है । हृदयके अर्थात् बुद्धिके जो शोक हैं; वे बुद्धिके ही आश्रित होते हैं; क्योंकि "काम, संकल्प, विचिकित्सा—ये सब |
१. जिस प्रकार 'मञ्चाः क्रोशन्ति' ( मञ्च चिल्लाते हैं ) इस वाक्यके 'मञ्च' शब्दसे मञ्चस्थ पुरुष ग्रहण किये जाते हैं, उसी प्रकार यहाँ 'हृदय' शब्दसे हृदयस्थ बुद्धि ग्रहण करनी चाहिये ।