बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५३
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५३
| संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी अनुवाद |
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| आस्ते' इत्यादिना आत्मज्योतिषावभासितः कार्यकारणसंघातो व्यवहरति। तेनास्य कर्तृत्वमुपचर्यते, न स्वतः कर्तृत्वम्; तथा चोक्तम् 'ध्यायतीव लेलायतीव' इति—बुद्ध्याद्युपाधिकृतमेव न स्वतः; | रहता है' इत्यादि उक्ति के अनुसार आत्मज्योतिसे अवभासित देहेन्द्रिय-संघात व्यवहार करता है। उसके कारण उसके कर्तृत्वका आरोप किया जाता है, इसमें स्वतः कर्तृत्व नहीं है; ऐसा ही कहा भी है—'ध्यान करता हुआ-सा, अत्यन्त चञ्चल होता हुआ-सा' इत्यादि इसका कर्तृत्व बुद्धि आदि उपाधिके कारण ही है, स्वतः नहीं है। |
| इह तु परमार्थापेक्षयोपाधिनिरपेक्ष उच्यते—दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च न कृत्वेति; तेन न पूर्वापरव्याघाताशङ्का; यस्मान्निरुपाधिकः परमार्थतो न करोति, न लिप्यते क्रियाफलेन; | यहाँ तो उपाधिकी अपेक्षा न रखकर परमार्थकी अपेक्षासे ही ऐसा कहा जाता है कि वह पुण्य-पापको देख-कर ही लौट आता है, करके नहीं; इसलिये यहाँ पूर्वापरके व्याघातकी आशङ्का नहीं है, क्योंकि निरुपाधिक होनेके कारण वह परमार्थतः नहीं करता और न क्रियाफलसे लिप्त ही होता है; |
| तथा च भगवतोक्तम्—"अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्मायमव्ययः। शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥" (गीता १३। ३१) इति। | ऐसा ही श्रीभगवान्ने भी कहा है—"हे कुन्तीनन्दन! यह अविनाशी परमात्मा अनादि और निर्गुण होनेके कारण शरीरमें रहते हुए भी न करता है और न लिप्त होता है" इत्यादि। |
| तथा सहस्रदानं तु कामप्रविवेकस्य दर्शितत्वात्। तथा 'स | तथा सहस्र मुद्राका दान तो कामविवेक प्रदर्शित किये जानेके कारण है। इस प्रकार 'वह |
९५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| वा एष एतस्मिन् स्वप्ने’ ‘स वा एष एतस्मिन् बुद्धान्ते’ इत्येताभ्यां कण्डिकाभ्यामसङ्गतैव प्रतिपादिता; यस्माद् बुद्धान्ते कृतेन स्वप्नान्तं गतः सम्प्रसन्नोऽसम्बद्धो भवति स्तैन्यादिकार्यादर्शनात्, तस्मात् त्रिष्वपि स्थानेषु स्वतःऽसङ्ग एवायम्; अतोऽमृतः स्थानत्रयधर्मविलक्षणः। | यह पुरुष इस स्वप्नावस्थामें’ ‘वह यह पुरुष इस जागरित-अवस्थामें इत्यादि इन दोनों कण्डिकाओंद्वारा आत्माकी असङ्गताका ही प्रतिपादन किया गया है, क्योंकि स्वप्नावस्थामें जाकर सम्यक् प्रकारसे प्रसादको प्राप्त हुआ यह पुरुष जागरितस्थानमें किये हुए कर्मसे सम्बद्ध नहीं होता, कारण, उस समय इसके चोरी आदि कार्य नहीं देखे जाते; अतः तीनों स्थानोंमें यह स्वयं असङ्ग ही है; इसलिये यह अमृत और तीनों स्थानोंके धर्मोंसे विलक्षण है। | | प्रतियोन्याद्रवति स्वप्नान्तायैव, सम्प्रसादायेत्यर्थः--दर्शनवृत्तेः स्वप्नस्य स्वप्नशब्देनाभिधानदर्शनात्, अन्तशब्देन च विशेषणोपपत्तेः; ‘एतस्मा अन्ताय धावति’ इति च सुषुप्तं दर्शयिष्यति। | यह ‘प्रतियोनि’—यथास्थान स्वप्नान्त यानी सम्प्रसादके प्रति ही लौट आता है, दर्शनवृत्ति स्वप्नका ‘स्वप्न’ शब्दसे उल्लेख देखा गया है, अतः ‘अन्त’ शब्दसे उसके विशेषणकी उपपत्ति होती है; ‘एतस्मा अन्ताय धावति’ इस वाक्यसे (वाक्यके ‘अन्ताय’ पदसे) श्रुति सुषुप्तको प्रदर्शित करेगी। | | यदि पुनरेवमुच्यते—‘स्वप्नान्ते रत्वा चरित्वा’ ‘एतावुभावन्तावनुसंचरति स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च’इति दर्शनात्, ‘स्वप्नान्तायैव’ इत्यत्रापि दर्शनवृत्तिरेव | और यदि ऐसा कहा जाय कि ‘स्वप्नान्ते रत्वा चरित्वा’ और ‘एतावुभावन्तावनुसंचरति स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च’ ऐसा देखे जानेके कारण ‘स्वप्नान्तायैव’इस प्रयोगमें भी दर्शन- |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९५५
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९५५
| संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी अनुवाद |
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| स्वप्न उच्यत इति—तथापि न किञ्चिद् दुष्यति; असङ्गता हि सिषाधयिषिता सिध्यत्येव; यस्माज्जागरिते दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च रत्वा चरित्वा च स्वप्नान्तमागतः, न जागरितदोषेणानुगतो भवति ॥ १७ ॥ | वृत्तिको ही स्वप्न कहा गया है तो भी कुछ दोष नहीं आता; क्योंकि असङ्गताकी सिद्धि अभीष्ट है और वह सिद्ध हो ही जाती है; कारण यह कि जागरितावस्थामें पुण्य और पापको देखकर हो तथा रमण और विहार कर यह स्वप्नान्तमें आता है, किंतु उस समय जागरितके दोषसे लिप्त नहीं होता ॥ १७ ॥ |
| एवमयं पुरुष आत्मा स्वयंज्योतिः कार्यकारणविलक्षणस्तत्प्रयोजकाभ्यां कामकर्मभ्यां विलक्षणः—यस्मादसङ्गो ह्ययं पुरुषः असङ्गत्वात्—इत्ययमर्थः ‘स वा एष एतस्मिन् सम्प्रसादे’ इत्यादिभिस्तिसृभिः कण्डिकाभिः प्रतिपादितः; तत्रासङ्गतैव आत्मनः; कुतः ? यस्माज्जागरितात् स्वप्नम्, स्वप्नाच्च सम्प्रसादम्, सम्प्रसादाच्च पुनः स्वप्नम्, क्रमेण बुद्धान्तं जागरितम्, बुद्धान्ताच्च पुनः स्वप्नान्तम् इत्येवमनुक्रमसंचारेण स्थानत्रयस्य व्यतिरेकः साधितः। पूर्वमप्युपन्यस्तोऽयमर्थः ‘स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति मृत्यो रूपाणि’ | इस प्रकार यह पुरुष आत्मा स्वयंज्योति, देह और इन्द्रियोंसे विलक्षण और उनके प्रयोजक काम एवं कर्मसे भी विलक्षण है, क्योंकि यह पुरुष असङ्ग ही है, असङ्ग होनेके कारण ही ‘स वा एष एतस्मिन् सम्प्रसादे’ इत्यादि तीन मन्त्रोंद्वारा इस अर्थका प्रतिपादन किया गया है; इससे आत्माकी असङ्गता ही सिद्ध होती है; क्यों ? क्योंकि वह जागरितसे स्वप्नको, स्वप्नसे सुषुप्ति को और सुषुप्तिसे पुनः स्वप्नको तथा क्रमशः बुद्धान्त यानी जागरितको और जागरितसे पुनः स्वप्नको—इस प्रकार क्रमिक संचारके द्वारा उससे तीनों स्थानोंका व्यतिरेक सिद्ध किया गया है। पहले भी ‘स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति मृत्यो रूपाणि’ इस वाक्यद्वारा इस अर्थका उल्लेख किया |
९५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
९५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| इति—तं विस्तरेण प्रतिपाद्य, केवलं दृष्टान्तमात्रमवशिष्टम्, तद् वक्ष्यामीत्यारभ्यते— | गया है। उसका विस्तारसे प्रतिपादन कर अब जो केवल दृष्टान्तमात्र रह गया है, उसका वर्णन करूँगी-इस उद्देश्यसे श्रुति आरम्भ करती है— |
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पुरुषके अवस्थान्तर-संचारमें महामत्स्यका दृष्टान्त
तद् यथा महामत्स्य उभे कूले अनुसंचरति पूर्वं चापरं चैवमेवायं पुरुष एतावुभावन्तावनुसंचरति स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च ॥ १८ ॥
जिस प्रकार कोई बड़ा भारी मत्स्य नदीके पूर्व और अपर दोनों तीरोंपर क्रमशः संचार करता है, उसी प्रकार यह पुरुष स्वप्नस्थान और जागरितस्थान इन दोनों ही स्थानोंमें क्रमशः संचार करता है ॥ १८ ॥
| तत्तत्रैतस्मिन् यथा प्रदर्शितेऽर्थे दृष्टान्तोऽयमुपादीयते—यथा लोके महामत्स्यः, महांश्चासौ मत्स्यश्च, नादेयेन स्रोतसाहार्य इत्यर्थः, स्रोतश्च विष्टम्भयति, स्वच्छन्दचारी, उभे कूले नद्याः पूर्वं चापरञ्चानुक्रमेण संचरति; संचरन्नपि कूलद्वयं तन्मध्यवर्तिना उदकस्रोतोवेगेन न परवशीक्रियते—एवमेवायं पुरुष एता- | तत्का अर्थ है; तत्र ( वहाँ ) अर्थात् इस ऊपर दिखाये हुए विषयमें यह दृष्टान्त बताया जाता है—जिस प्रकार लोकमें महामत्स्य—जो महान् हो और मत्स्य हो अर्थात् जो नदीके स्रोतसे अक्षुण्ण रहनेवाला हो तथा स्रोतको भी रोक देता हो, वह स्वच्छन्द विचरनेवाला महामत्स्य जैसे नदीके पूर्व और अपर दोनों तीरोंपर क्रमशः संचार करता है और संचार करता हुआ भी उन दोनों तीरोंके बीचमें रहनेवाले जलप्रवाहके वेगसे विवश नहीं होता, इसी प्रकार यह पुरुष इन दोनों स्थानोंमें क्रमशः |
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ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९५७
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९५७
| वुभौ अन्तौ अनुसंचरति; कौ तौ ? स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च ।<br><br>दृष्टान्तप्रदर्शनफलं तु— मृत्युरूपः कार्यकारणसंघातः सहतत्प्रयोजकाभ्यां कामकर्मभ्याम् अनात्मधर्मः, अयं चात्मा एतस्माद् विलक्षणः—इति विस्तरतो व्याख्यातम् ॥ १८ ॥ | संचार करता है; वे दोनों स्थान कौन से हैं ? स्वप्नस्थान और जागरित-स्थान ।<br><br>दृष्टान्त-प्रदर्शन करनेका फल तो यह है कि अपने प्रयोजक काम और कर्मोंके सहित मृत्युरूप देहेन्द्रियसंघात अनात्मधर्म है और यह आत्मा इससे विलक्षण है—इस प्रकार इसकी विस्तारसे व्याख्या कर दी गयी ॥ १८ ॥ |
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| अत्र च स्थानत्रयानुसंचारेण स्वयंज्योतिष आत्मनः कार्यकारणसंघातव्यतिरिक्तस्य कामकर्मभ्यां विविक्ततोक्ता; स्वतः नायं संसारधर्मवान्, उपाधिनिमित्तमेव त्वस्य संसारित्वम् अविद्याध्यारोपितम्—इत्येष समुदायर्थ उक्तः ।<br><br>तत्र च जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तस्थानानां त्रयाणां विप्रकीर्णरूप उक्तः, न पुञ्जीकृत्यैकत्र दर्शितः—यस्माज्जागरिते ससङ्गः समृृत्युः सकार्यकरणसंघात उपलक्ष्यतेऽविद्यया; स्वप्ने तु कामसंयुक्तो | यहाँ स्थानत्रयके क्रमिक संचारके द्वारा देहेन्द्रियसंघातसे व्यतिरिक्त स्वयंप्रकाश आत्माकी काम और कर्मोंसे भिन्नता बतलायी गयी है; यह स्वयं संसारधर्मवान् नहीं है, इसका संसारित्व अविद्यासे आरोपित उपाधिके कारण ही है—इस प्रकार यह समुदायका सारांश बतलाया गया ।<br><br>परंतु यहाँ जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्त तीनों स्थानोंका पृथक्-पृथक् रूप कहा गया है, सबको मिलाकर एक स्थानमें नहीं दिखाया गया; क्योंकि जागरित-अवस्थामें वह अविद्यावश, ससङ्ग (आसक्तियुक्त), मृत्युयुक्त और कार्यकारणसंघात सहित देखा जाता है, किंतु स्वप्नमें |
९५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| मृत्यूरुपविनिर्मुक्त उपलक्ष्यते; सुषुप्ते पुनः सम्प्रसन्नोऽसङ्गो भवतीत्यसङ्गत्यापि दृश्यते; एकवाक्यतया तूपसंह्रियमाणं फलं नित्यमुक्तबुद्धशुद्धस्वभावतास्य नैकत्र पुञ्जीकृत्य प्रदर्शिता, इति तत्प्रदर्शनाय कण्डिका आरभ्यते ।<br><br>सुषुप्ते ह्येवंरूपतास्य वक्ष्यमाणा 'तद् वा अस्यैतदतिच्छन्दा अपहतपाप्माभयं रूपम्' इति; यस्मादेवंरूपं विलक्षणं सुषुप्तं प्रविविक्षाति; तत् कथम् ? इत्याह दृष्टान्तेनास्यार्थस्य प्रकटीभावो भवतीति तत्र दृष्टान्त उपादीयते— | कामयुक्त तथा मृत्युके रूपोंसे विनिर्मुक्त दिखायी देता है और फिर सुषुप्तिमें संप्रसादको प्राप्त होकर असङ्ग हो जाता है--इस प्रकार उसकी असङ्गता भी देखी जाती है। अतः एकवाक्यता रूपसे जो उपसंहार किया जानेवाला फल है, वह इसकी नित्य शुद्ध-बुद्धमुक्तस्वभावता एक स्थानपर संगृहीत करके नहीं दिखायी गयी; अतः अब उसे दिखानेके लिये यह कण्डिका आरम्भ की जाती है।<br><br>इसका ऐसा रूप 'तद् वा अस्यैतदतिच्छन्दा अपहतपाप्माभयं रूपम्' इस वाक्यद्वारा सुषुप्तिमें ही बतलाया जानेवाला है; क्योंकि ऐसे विलक्षणरूपवाले सुषुप्तस्थानमें आत्मा प्रवेश करना चाहता है; वह किस प्रकार, सो श्रुति बतलाती है—दृष्टान्तसे इस अर्थकी स्पष्टता होती है, इसलिये इस विषयमें दृष्टान्त दिया जाता है— |
१. यह सम्प्रसाद भी क्षणिक ही है; चित्तका लय होनेसे सब प्रकारकी चिन्ताओं और क्लेशोंका बोध न होनेके कारण प्रसन्नता रहती है; उस समय मानसिक विकारोंका सम्पर्क न रहनेसे वह असङ्ग होता है; इसी असङ्गताको बतानेके लिये यह दृष्टान्तमात्र है, वास्तविक असङ्गता तो तत्त्व-बोधसे ही होती है; और उसकी पूर्णतया समानता कहीं नहीं है।
२. जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओंकी अपेक्षा सुषुप्तिमें विलक्षणता अवश्य है; क्योंकि उसमें वह कामना, पाप और भय आदिसे रहित होता है; किंतु इसकी यह अकामता आदि क्षणिक ही है। वस्तुतः अकाम, निष्पाप एवं निर्भय तो मुक्त आत्मा ही है, जो सब अवस्थाओंसे परेकी स्थिति है।
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५९
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५९
सुषुप्ति आत्माका विश्रान्तिस्थान है, इसमें श्येनका दृष्टान्त
तद् यथास्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य श्रान्तः सꣳहत्य पक्षौ संलयायैव ध्रियत एवमेवायं पुरुष एतस्मा अन्ताय धावति यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति ॥ १६ ॥
जिस प्रकार इस आकाशमें श्येन (बाज) अथवा सुपर्ण (तेज उड़नेवाला बाज) सब ओर उड़कर थक जानेपर पंखोंको फैलाकर घोंसलेकी ओर ही उड़ता है, इसी प्रकार यह पुरुष इस स्थानकी ओर दौड़ता है, जहाँ सोनेपर यह किसी भोगकी इच्छा नहीं करता, और न कोई स्वप्न ही देखता है ॥ १६ ॥
| तद् यथा-अस्मिन्नाकाशे भौतिके श्येनो वा सुपर्णो वा, सुपर्णशब्देन क्षिप्रः श्येन उच्यते; यथा आकाशेऽस्मिन् विहृत्य विपरिपत्य श्रान्तो नानापरिपतनलक्षणेन कर्मणा परिखिन्नः; संहत्य पक्षौ सङ्गमय्य सम्प्रसार्य पक्षौ; सम्यग्लीयते अस्मिन्निति संलयो नीडः; नीडायैव ध्रियते स्वात्मनैव धार्यते स्वयमेव; यथायं दृष्टान्तः, एवमेवायं पुरुषः; एतस्मा एतस्मै अन्ताय धावति । अन्तशब्दवाच्यस्य विशेषणम्-यत्र यस्मिन्नन्ते सुप्तः, न कञ्चन न कञ्चिदपि; | जिस प्रकार इस भौतिक आकाशमें श्येन अथवा सुपर्ण—सुपर्ण शब्दसे वेगवान् श्येन कहा गया है, जिस प्रकार इस आकाशमें विहार कर-सब ओर उड़कर थक जानेपर कई बार उड़ान भरना-रूप कर्मसे खिन्न होकर पंखोंके संहत-सङ्गत अर्थात् फैलाकर संलय--जिसमें सम्यक् प्रकारसे लीन होता है, उस घोंसलेका नाम संलय है, उस घोंसलेके प्रति स्वयं ही अपनेको धारण करता है; जैसा यह दृष्टान्त है, इसी प्रकार यह पुरुष एतस्मै-इस स्थानके प्रति दौड़ता है। अन्त-शब्दवाच्य स्थानका विशेषण-जिस स्थानमें शयन करनेपर यह किसी |
९६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| कामं कामयते; तथा न कञ्चन स्वप्नं पश्यति। <br><br> 'न कञ्चन कामम्' इति स्वप्नबुद्धान्तयोरविशेषेण सर्वः कामः प्रतिषिध्यते, 'कञ्चन' इत्यविशेषिताभिधानात्; तथा 'न कञ्चन स्वप्नम्, इति—जागरितेऽपि यद् दर्शनम्, तदपि स्वप्नं मन्यते श्रुतिः, अत आह—न कञ्चन स्वप्नं पश्यतीति; तथा च श्रुत्यन्तरम्—"तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्नाः" (ऐ०उ० १।३।१२) इति। <br><br> यथा दृष्टान्ते पक्षिणः परिपतनजश्रमापनुत्तये स्वनीडोपसर्पणम्, एवं जाग्रत्स्वप्नयोः कार्यकारणसंयोगजक्रियाफलैः संयुज्यमानस्य, पक्षिणः परिपतनज इव, श्रमो भवति; तच्छ्रमापनुत्तये स्वात्मनो नीडमायतनं सर्वसंसारधर्मविलक्षणं सर्वक्रियाकारक- | भोगकी इच्छा नहीं करता और इसी प्रकार न किसी स्वप्नको ही देखता है। <br><br> 'न कञ्चन कामम्' इससे स्वप्न और जागरितके सभी भोगोंका समानरूपसे प्रतिषेध किया जाता है, क्योंकि 'कञ्चन' (किसी भी) इस पदके द्वारा किसी भोगविशेषका नाम न लेकर समानरूपसे ही कहा गया है। इसी प्रकार 'न कञ्चन स्वप्नम्' इस वाक्यसे भी समझना चाहिये; जागरितमें भी जो कुछ देखा जाता है, उसे भी श्रुति स्वप्न ही मानती है, इसीसे कहती है कि कोई स्वप्न नहीं देखता; ऐसी ही एक अन्य श्रुति भी है—"उसके तीन आवसथ (स्थान) हैं और तीन स्वप्न हैं" इत्यादि। <br><br> जिस प्रकार दृष्टान्तमें उड़ानसे उत्पन्न हुए श्रमकी निवृत्तिके लिये पक्षीका अपने घोंसलेमें जाना दिखाया है, इसी प्रकार जाग्रत् और स्वप्न-अवस्थाओंमें देहेन्द्रियके संयोगसे होनेवाले क्रियाफलोंसे संयुक्त हुए जीवको, पक्षीके उड़नेसे होनेवाले श्रमके समान ही, श्रम होता है; उस श्रमकी निवृत्तिके लिये वह अपने घोंसले-निवासस्थान अर्थात् सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे विलक्षण तथा सब प्रकार- |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९६१
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९६१
| फलायासशून्यं स्वमात्मानं प्रविशति ॥ १९ ॥ | के क्रिया, कारक और फलके श्रमसे रहित अपने 'आत्मामें प्रवेश करता है ॥ १६ ॥ |
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स्वप्नदर्शनकी स्थानभूता हिता नाम्नी नाडियोंका वर्णन
| यद्यस्यायं स्वभावः—सर्वसंसारधर्मशून्यता, परोपाधिनिमित्तं चास्य संसारधर्मित्वम्; यन्निमित्तं चास्य परोपाधिकृतं संसारधर्मित्वम्, सा चाविद्या—तस्या अविद्यायाः किं स्वाभाविकत्वम् ? आहोस्वित् कामकर्मादिवदागन्तुकत्वम् ? यदि चागन्तुकत्वम्, ततो विमोक्ष उपपद्यते; तस्याश्चागन्तुकत्वे कोपपत्तिः ? कथं वा नात्मधर्मोऽविद्या ? इति सर्वानर्थबीजभूताया अविद्यायाः सतत्त्वावधारणार्थं परा कण्डिका आरभ्यते— | यदि यह सर्वसंसारधर्मशून्यता, इस आत्माका स्वभाव है तो इसका सांसारिक धर्मोंसे युक्त होना अन्य उपाधिके कारण है; और जिस हेतुसे इसका परोपाधिकृत संसारधर्मित्व है, वह अविद्या है । अब प्रश्न होता है—वह अविद्या स्वाभाविक है अथवा काम एवं कर्मादिके समान आगन्तुक है ? यदि आगन्तुक है, तब तो उससे मोक्ष होना सम्भव है । किंतु उसके आगन्तुक होनेमें युक्ति क्या है ? अविद्या आत्माका ही धर्म क्यों नहीं है ? अतः सम्पूर्ण अनर्थोंकी बीजभूता अविद्याका स्वरूप निर्णय करनेके लिये आगेकी कण्डिका आरम्भ की जाती है— |
ता वा अस्यैता हिता नाम नाड्यो यथा केशः
१. सुषुप्तिमें जो जीवका आत्मामें प्रवेश करना कहा है, इससे यह नहीं समझना चाहिये कि वह मुक्त आत्माकी भाँति स्वरूपमें स्थित हो जाता है, यह स्थिति तो पूर्ण बोध होनेपर ही हो सकती है । सुषुप्त जीवका अव्याकृत मायाके अंशभूत कारण-शरीरसे सम्बन्ध बना रहता है; अतः उक्त कथनका तात्पर्य ब्रह्ममें कारण-शरीरके सहित प्रवेश करना है—ऐसा समझना चाहिये ।
बृ० उ० ६१—
९६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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सहस्रधा भिन्नस्तावताणिम्ना तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पिङ्गलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णा अथ यत्रैनं घ्नन्तीव जिनन्तीव हस्तीव विच्छादयति गर्तमिव पतति यदेव जाग्रद्भयं पश्यति तदत्राविद्यया मन्यतेऽथ यत्र देव इव राजेवाहमेवेदँ॒ सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः ॥ २० ॥
उसकी वे ये हिता नामकी नाड़ियाँ, जिस प्रकार सहस्र भागोंमें विभक्त केश होता है वैसी ही सूक्ष्मतासे रहती हैं। वे शुक्ल, नील, पीत, हरित और लाल रंगके रससे पूर्ण हैं। सो जहाँ इस पुरुषको मानो मारते, मानो अपने वशमें करते हैं और जहाँ मानो इसे हाथी खदेड़ता है अथवा जहाँ यह मानो गड़हेमें गिरता है; इस प्रकार जो कुछ भी जाग्रदवस्थाके भय देखता है, उन्हें इस स्वप्नावस्थामें अविद्यासे मानता है और जहाँ यह देवताके समान, राजाके समान अथवा मैं ही यह सब हूँ—ऐसा मानता है, वह इसका परमधाम है ॥ २० ॥
| ता वै, अस्य शिरःपाण्यादिलक्षणस्य पुरुषस्य, एता हिता नाम नाड्यः, यथा केशः सहस्रधा भिन्नः, तावता तावत्परिमाणेनाणिम्ना अणुत्वेन तिष्ठन्ति; ताश्च शुक्लस्य रसस्य नीलस्य पिङ्गलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णाः, एतैः शुक्लत्वादिभी रसविशेषैः पूर्णा इत्यर्थः; एते च रसानां वर्णविशेषा वातपित्तश्लेष्मणाम् इतरेतरसंयोगवैषम्यविशेषाद् विचित्रा बहवश्च भवन्ति। | इस शिर एवं हाथ आदि अवयवोंवाले पुरुषकी ये हिता नामकी नाडियाँ, जिस प्रकार सहस्र भागोंमें विभक्त हुआ केश रहता है, उतने ही परिमाण यानी सूक्ष्मतासे रहती हैं; और वे शुक्ल, नील, पीत, हरित एवं लोहित रसकी भरी हुई हैं अर्थात् इन शुक्लत्वादिविशिष्ट रसोंसे पूर्ण हैं; ये रसोंके वर्णविशेष वात, पित्त और कफोंके पारस्परिक संयोगकी विशेष विषमताके कारण विभिन्न और बहुत प्रकारके होते हैं। |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९६३ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९६३ |
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| तास्वेवंविधासु नाडीषु सूक्ष्मासु वालाग्रसहस्रभेदपरिमाणासु शुक्लादिरसपूर्णासु सकलदेहव्यापिनीषु सप्तदशकं लिङ्गं वर्तते। तदाश्रिताः सर्वा वासना उच्चावचसंसारधर्मानुभवजनिताः; तल्लिङ्गं वासनाश्रयं सूक्ष्मत्वात् स्वच्छं स्फटिकमणिकल्पं नाडीगतरसोपाधिसंसर्गवशाद् धर्माधर्मप्रेरितोद्भूतवृत्तिविशेषं स्त्रीरथहस्त्याद्याकारविशेषैर्वासनाभिः प्रत्यवभासते। | इन इस प्रकारकी शुक्लादि रसोंसे पूर्ण सम्पूर्ण शरीरमें फैली हुई और वालाग्रके सहस्रांश परिमाणवाली सूक्ष्म नाडियोंमें वह सतरह तत्त्वोंका लिङ्गशरीर रहता है। उसीके अधीन संसारके ऊँच-नीच धर्मोंके अनुभवसे उत्पन्न हुई सारी वासनाएँ हैं। वासनाओंका आश्रयभूत वह लिङ्गशरीर सूक्ष्म होनेके कारण स्वच्छ और स्फटिकमणिके समान है, वह नाडीगत रसरूप उपाधिके संसर्गसे धर्माधर्मप्रेरित उद्भूतवृत्तिविशेषवाला तथा स्त्री, रथ, हाथी आदि आकारवाली विशेष वासनाओंसे युक्त भासित होता है। | | अथैवं सति, यत्र यस्मिन् काले <br> [अविद्याप्रत्ययोद्भूतदुःखानुभवप्रदर्शनम्] <br> केचन शत्रवोऽन्ये वा तस्करा मामागत्य घ्नन्ति-इति मृषैव वासनानिमित्तः प्रत्ययोऽविद्याख्यो जायते, तदेतदुच्यते—एनं स्वप्नदृशं घ्नन्तीवेति; तथा जिनन्तीव वशीकुर्वन्तीव; न केचन घ्नन्ति, नापि वशीकुर्वन्ति, केवलं त्वविद्यावासनोद्भवनिमित्तं भ्रान्तिमात्रम्; तथा हस्तीवैनं विच्छादयति वि- | ऐसी स्थितिमें, जिस समय वासनाओंके कारण 'कोई शत्रु अथवा अन्य चोर आदि आकर मुझे मारते हैं' ऐसा अविद्यासंज्ञक वृथा ही प्रत्यय हो जाता है, उसके विषयमें यह कहा जाता है—इस स्वप्नद्रष्टाको मानो मारते हैं, तथा 'जिनन्तीव'—मानो वशमें करते हैं। [वास्तवमें] उस समय न कोई मारते हैं और न वशमें ही करते हैं, यह तो केवल अविद्याजनित वासनाके उद्भवके कारण भ्रान्तिमात्र हो जाती है; इसी प्रकार हाथीके समान कोई इसे विच्छायित- |
९६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ९६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| च्छादयति विद्रावयति धावयतीवेत्यर्थः; गर्तमिव पतति— गर्तं जीर्णकूपादिकमिव पतन्तमात्मानमुपलक्षयति; तादृशी ह्यस्य मृषा वासनोद्भवत्यत्यन्तनिकृष्टाधर्मोद्भासितान्तःकरणवृत्त्याश्रया, दुःखरूपत्वात् । | विद्रावित करता अर्थात् दौड़ाता (पीछा करता) है तथा यह मानो गर्तमें गिरता है अर्थात् अपनेको गर्त-पुराने कूपादिमें गिरता-सा देखता है; इसे इस प्रकारकी मिथ्या वासना पैदा हो जाती है, जो दुःखरूपा होनेके कारण अत्यन्त निकृष्ट और अन्तःकरणकी अधर्मोद्भासिता वृत्तिके आश्रित रहती है । | | किं बहुना, यदेव जाग्रद्भयं पश्यति हस्त्यादिलक्षणम्, तदेव भयरूपम् अत्रास्मिन् स्वप्ने विनैव हस्त्यादिरूपं भयमविद्यावासनया मृषैवोद्भूतया मन्यते । | अधिक क्या, जागरित-अवस्थामें जो कुछ यह हाथी आदिरूप भय देखता है, इस स्वप्नावस्थामें भी हस्त्यादिरूप भयके बिना ही जाग्रत् हुई अविद्यावासनासे उस भयरूपको, जो मिथ्या ही है, सच मानने लगता है । | | (विद्याप्रत्ययोद्भूत-देवात्मत्वप्रदर्शनम्)<br>अथ पुनर्यत्राविद्यापकृष्यमाणा विद्या चोत्कृष्यमाणा—किंविषया किंलक्षणा च ? इत्युच्यते—अथ पुनर्यत्र यस्मिन् काले, देव इव स्वयं भवति, देवताविषया विद्या यदोद्भूता जागरितकाले, तदोद्भूतया वासनया देवमिवात्मानं मन्यते; स्वप्नेऽपि तदुच्यते—देव इव, राजेव; | और फिर जब अविद्याका अपकर्ष और विद्याका उत्कर्ष होने लगता है, तो उसका क्या विषय और क्या लक्षण होता है ? सो बतलाया जाता है—फिर जब-जिस समय वह स्वयं देवताके समान हो जाता है; अर्थात् जब जागरितकालमें देवताविषयिणी विद्याका उद्भव होता है, तब उस उद्भूत हुई वासनासे वह अपनेको देवताके समान मानता है, स्वप्नमें भी ऐसा ही कहा जाता है कि वह देवताके समान तथा राजाके समान होता है; |
ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९६५
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९६५ |
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| मूल संस्कृत भाष्यार्थ | हिन्दी अनुवाद |
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| राज्यस्थोऽभिषिक्तः स्वप्नेऽपि राजाहमिति मन्यते राजवासना-वासितः । | [ तात्पर्य यह है कि ] जागरित-अवस्थामें अभिषेकपूर्वक राज्यपर स्थित हुआ पुरुष उस राजवासना-से युक्त होनेके कारण स्वप्नमें भी 'मैं राजा हूँ' ऐसा मानता है । |
| एवमत्यन्तप्रक्षीयमाणाविद्या उद्भूता च विद्या सर्वात्मविषया यदा, तदा स्वप्नेऽपि तद्भाव-भावितः—अहमेवेदं सर्वोऽस्मीति मन्यते; स यः सर्वात्मभावः, सोऽस्यात्मनः परमो लोकः परम आत्मभावः स्वाभाविकः । | इसी प्रकार जब अविद्या अत्यन्त क्षीण हो जाती है और सर्वात्म-विषयिणी विद्याका उद्भव हो जाता है, उस समय उस भावसे भावित रहनेके कारण वह स्वप्नमें भी 'मैं ही यह सर्वरूप हूँ' ऐसा मानता है; यह जो सर्वात्मभाव है, वह इस आत्माका परम लोक-स्वाभाविक परम आत्मभाव है । |
| (विद्याविद्योर्भेदः) यत्तु सर्वात्मभावादर्वाग् वालाग्रमात्रमप्यन्यत्वेन दृश्यते—नाहमस्मीति, तदवस्थाविद्या; तया अविद्यया ये प्रत्युपस्थापिता अनात्मभावा लोकाः, तेऽपरमाः स्थावरान्ताः; तान् संव्यवहारविषयाँल्लोकानपेक्ष्यायं सर्वात्मभावःसमस्तोऽनन्तरोऽबाह्यः, सोऽस्य परमो लोकः । तस्मादपकृष्यमाणायामविद्यायां विद्यायां च काष्ठां गतायां सर्वात्मभावो मोक्षः,यथा स्वयंज्योतिष्ट्वं स्वप्ने प्रत्यक्षत उपलभ्यते तद्वद् विद्याफलमुपलभ्यत इत्यर्थः । | और जो सर्वात्मभावसे उतर-कर अपनेको वालाग्रमात्र भी 'मैं यह नहीं हूँ' इस प्रकार अन्यरूपसे देखता है, वह अवस्था अविद्या है, उस अविद्याद्वारा प्रस्तुत किये गये जो अनात्मभाव हैं, वे स्थावरपर्यन्त लोक अपरम हैं; उन व्यवहारविषयक लोकोंकी अपेक्षा यह सर्वात्मभाव पूर्ण तथा अन्तर-बाह्यशून्य है, वह इसका परम लोक है; अतः अविद्याका अपकर्ष और विद्याकी पराकाष्ठा होनेपर सर्वात्मभावकी प्राप्ति ही मोक्ष है, तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार स्वप्नमें आत्माका स्वयंप्रकाशत्व प्रत्यक्ष उपलब्ध होता है, उसी प्रकार विद्याके फल मोक्षकी प्रत्यक्ष उपलब्धि होती है । |
९६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ९६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| तथाविद्यायामप्युत्कृष्यमाणायाम्, तिरोधीयमानायां च विद्यायाम्, अविद्यायाः फलं प्रत्यक्षत एवोपलभ्यते—'अथ यत्रैनं घ्नन्तीव जिनन्तीव' इति। ते एते विद्याविद्याकार्ये सर्वात्मभावः परिच्छिन्नात्मभावश्च; विद्यया शुद्धया सर्वात्मा भवति; अविद्यया चासर्वो भवति; अन्यतः कुतश्चित् प्रविभक्तो भवति; यतः प्रविभक्तो भवति, तेन विरुध्यते; विरुद्धत्वाद् हन्यते जीयते विच्छाद्यते च। असर्वविषयत्वे च भिन्नत्वादेतद् भवति; समस्तस्तु सन् कुतो भिद्यते येन विरुध्येत; विरोधाभावे केन हन्यते जीयते विच्छाद्यते च ? | इसी प्रकार अविद्याका उत्कर्ष और विद्याका तिरोभाव होनेपर भी 'जिस समय मानो इसे कोई मारते हैं अथवा वशमें करते हैं' इत्यादि रूपसे अविद्याका फल प्रत्यक्ष ही उपलब्ध होता है। वे ये सर्वात्मभाव और परिच्छिन्नात्मभाव क्रमशः विद्या और अविद्याके कार्य हैं; शुद्ध विद्यासे पुरुष सर्वात्मा हो जाता है और अविद्यासे असर्व होता है; वह किसी अन्यसे विभक्त हो जाता है और जिससे विभक्त होता है, उससे विरुद्ध रहता है तथा विरुद्ध रहनेके कारण मारा जाता है, जीता जाता है तथा खदेड़ा जाता है। असर्वका विषय रहनेपर ही भिन्न होनेके कारण यह सब होता है; यदि सर्वरूप रहता तो किससे भिन्न होता, जिससे कि उसका विरोध हो सकता और विरोध न होनेपर वह किसके द्वारा मारा जाता, जीता जाता अथवा खदेड़ा जाता ? | | अत इदमविद्यायाः सतत्त्वमुक्तं भवति—सर्वात्मानं सन्तमसर्वात्मत्वेन ग्राहयति, आत्मनोऽन्यद् वस्त्वन्तरमविद्यमानं प्रत्युपस्थापयति आत्मानमसर्वमापादयति; | अतः यह अविद्याका स्वभाव बतलाया जाता है कि पुरुष सर्वात्मा होते हुए अपनेको असर्वात्मरूपसे ग्रहण कराता है, आत्मासे भिन्न कोई दूसरी वस्तु न होनेपर भी उसे उपस्थित करता है तथा आत्माको असर्वरूप बना देता है; फिर |
ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९६७
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९६७ |
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| संस्कृत मूल (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी अनुवाद |
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| ततस्तद्विषयः कामो भवति यतोऽभिद्यते, कामतः क्रियामुपादत्ते ततः फलम्—तदेतदुक्तं वक्ष्यमाणं च—'यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति' इत्यादि ।<br><br>इदमविद्यायाः सतत्त्वं सह कार्येण प्रदर्शितम्; विद्यायाश्च कार्यं सर्वात्मभावः प्रदर्शितोऽविद्याया विपर्ययेण । सा चाविद्या नात्मनः स्वाभाविको धर्मः—यस्माद् विद्यायामुत्कृष्यमाणायां स्वयमपचीयमाना सती, काष्ठां गतायां विद्यायां परिनिष्ठिते सर्वात्मभावे सर्वात्मना निवर्तते, रज्ज्वामिव सर्पज्ञानं रज्जुनिश्चये । तच्चोक्तम्—"यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत् केन कं पश्येत्" (बृ० उ० ४ । ५ । १५) इत्यादि; तस्मान्नात्मधर्मोऽविद्या; न हि स्वाभाविकस्योच्छित्तिः कदाचिदप्युपपद्यते, सवितुरिवौष्ण्यप्रकाशयोः । तस्मात् तस्या मोक्ष उपपद्यते ॥२०॥ | जिससे भेद मानता है, उसके विषयमें कामना होती है, कामनासे क्रिया स्वीकार करता है और उससे फल होता है, इसीसे यह कहा है और आगे कहा भी जायगा कि 'जहाँ द्वैत-सा होता है, वहीं अन्य अन्यको देखता है' इत्यादि ।<br><br>यह अविद्याका स्वरूप उसके कार्यके सहित दिखाया गया तथा अविद्याके विपरीतरूपसे विद्याका कार्य सर्वात्मभाव दिखाया गया । वह अविद्या आत्माका स्वाभाविक धर्म नहीं है, क्योंकि विद्याका उत्कर्ष होनेपर वह स्वयं क्षीण होने लगती है और जिस समय विद्याकी परात्मभावकी पूर्ण प्रतिष्ठा हो जाती है, उस समय रज्जुका निश्चय होनेपर रज्जुमें सर्पज्ञानके समान उसकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है । ऐसा ही कहा भी है—"जहां इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वहां किसके द्वारा क्या देखे ?" इत्यादि; इसलिये अविद्या आत्माका धर्म नहीं है, क्योंकि सूर्यके उष्णता और प्रकाशके समान स्वाभाविक धर्मोंका कभी उच्छेद नहीं हो सकता । अतः उससे मोक्ष होना सम्भव है ॥ २० ॥ |
९६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ९६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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मोक्षका स्वरूप प्रदर्शित करनेमें स्त्रीसे मिले हुए पुरुषका दृष्टान्त
| इदानीं योऽसौ सर्वात्मभावो मोक्षो विद्याफलं क्रियाकारकफलशून्यम्, स प्रत्यक्षतो निर्दिश्यते, यत्राविद्याकामकर्माणि न सन्ति। तदेतत् प्रस्तुतम्—‘यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति’ इति— | अब, यह जो विद्याका फल क्रियाकारक एवं फलसे रहित सर्वात्मभावरूप मोक्ष है, जिसमें कि अविद्या, काम और कर्मका अभाव है, उसका प्रत्यक्षतया निर्देश किया जाता है। 'जिस अवस्थामें सोया हुआ पुरुष किसी भोगकी इच्छा नहीं करता और न कोई स्वप्न देखता है' इस प्रकार जिसका प्रकरण चला था— |
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तद् वा अस्यैतदतिच्छन्दा अपहतपाप्माभयँ रूपम्। तद् यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरं तद् वा अस्यैतदाप्तकाममात्मकाममकामँ रूपँ शोकान्तरम् ॥ २१ ॥
वह इसका कामरहित, पापरहित और अभयरूप है। व्यवहारमें जिस प्रकार अपनी प्रिया भार्याको आलिङ्गन करनेवाले पुरुषको न कुछ बाहरका ज्ञान रहता है और न भीतरका, इसी प्रकार यह पुरुष प्राज्ञात्मासे आलिङ्गित होनेपर न कुछ बाहरका विषय जानता है और न भीतरका; यह इसका आप्तकाम, आत्मकाम, अकाम और शोकशून्य रूप है ॥ २१ ॥
| तदेतद् वा अस्य रूपम्—यः सर्वात्मभावः 'सोऽस्य परमो लोकः' इत्युक्तः—तदतिच्छन्दा अतिच्छन्द- | इसका यह रूप, जो कि सर्वात्मभाव एवं 'यह इसका परम लोक है' इस प्रकार कहा गया है, वह अतिच्छन्दा अर्थात् अतिच्छन्द-रूप |
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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९६९
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९६९
| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मित्यर्थः; रूपपरत्वात्; छन्दः कामः, अतिगतश्छन्दो यस्माद्रूपात् तदतिच्छन्दं रूपम्; अन्योऽसौ सान्तश्छन्दःशब्दो गायत्र्यादिच्छन्दोवाची; अयं तु कामवचनः, अतः स्वरान्त एव; तथाप्यतिच्छन्दा इति पाठः स्वाध्यायधर्मो द्रष्टव्यः । अस्ति च लोके कामवचनप्रयुक्तश्छन्दशब्दः 'स्वच्छन्दः' 'परच्छन्दः' इत्यादौ; अतः 'अतिच्छन्दम्' इत्येवमुपनेयम्, कामवर्जितमेतद् रूपमित्यस्मिन्नर्थे । | है; क्योंकि अतिच्छन्द शब्द रूपका विशेषण है।¹ छन्द कामको कहते हैं, अतः जिस रूपसे छन्द ( काम ) की निवृत्ति हो गयी है, वह अतिच्छन्दरूप कहलाता है; जो सान्त छन्दस् शब्द है, वह इससे भिन्न है, जो गायत्री आदि छन्दोंका वाचक है; यह छन्द शब्द तो कामवाची है, इसलिये स्वरान्त ही है। फिर भी 'अतिच्छन्दा' ऐसा दीर्घान्त पाठ तो स्वाध्यायधर्म ही समझना चाहिये । लोकमें 'स्वच्छन्द' 'परच्छन्द' इत्यादि शब्दोंमें छन्द शब्दका काम अर्थमें प्रयोग प्रसिद्ध है; अतः कामवर्जित इस अर्थमें इस रूपका 'अतिच्छन्दम्' इस प्रकार परिवर्तन कर लेना चाहिये । |
| तथापहतपाप्म—पाप्मशब्देन धर्माधर्मावुच्येते, "पाप्मभिः संसृज्यते" (बृ० उ० ४।३।८) "पाप्मनो विजहाति" (४।३।८) इत्युक्तत्वात्; अपहतपाप्म धर्माधर्मवर्जितमित्येतत् । | इसी प्रकार वह अपहतपाप्म है—यहाँ पाप्म शब्दमें धर्म-अधर्म दोनों ही कहे गये हैं जैसा कि "पाप्मभिः संसृज्यते"² "पाप्मनो विजहाति"³ इन वाक्योंमें कहा गया है; अतः 'अपहतपाप्म' अर्थात् धर्माधर्मसे रहित । |
| किञ्च, अभयम्—भयं हि नामाविद्याकार्यम्, 'अविद्यया | तथा अभय है—भय तो अविद्याका ही कार्य है, 'अविद्यासे |
१. इसलिये इसका 'अतिच्छन्दम्' ऐसा नपुंसकलिङ्ग प्रयोग होना चाहिये ।
२. "धर्माधर्मके आश्रयभूत देह और इन्द्रियोंसे संयुक्त हो जाता है।"
३. "धर्माधर्मके आश्रयभूत देह-इन्द्रियोंको त्याग देता है।"
९७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| भयं मन्यते' इति ह्युक्तम् । तत्कार्यद्वारेण कारणप्रतिषेधोऽयम्; अभयं रूपमित्यविद्यावर्जितमित्येतत् । यदेतद् विद्याफलं सर्वात्मभावः, तदेतदतिच्छन्दापहतपाप्माभयं रूपम्–सर्वसंसारधर्मवर्जितम्, अतोऽभयं रूपमेतत् । <br><br> इदं च पूर्वमेवोपन्यस्तमतीतानन्तरब्राह्मणसमाप्तौ “अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि” (४।२।४) इत्यागमतः । इह तु तर्कतः प्रपञ्चितं दर्शितागमार्थप्रत्ययदाढर्याय । | भय मानता है' ऐसा पहले कहा जा चुका है। यह उस (अविद्या) के कार्यके द्वारा कारणका प्रतिषेध किया गया है; अभयरूप अर्थात् जो अविद्यासे रहित है। [इस प्रकार] यह जो विद्याका फल सर्वात्मभाव है, वह कामरहित, पुण्यपापरहित एवं अभयरूप है, यह सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे रहित है, इसलिये अभयरूप है। इसका इससे पूर्ववर्ती ब्राह्मणकी समाप्तिमें “हे जनक ! तू अभयको प्राप्त हो गया है” इस वाक्यद्वारा पहले ही वर्णन कर दिया गया है। यहां तो पूर्वप्रदर्शित वेदार्थमें प्रत्यय (विश्वास) की दृढताके लिये ही उसका युक्तिपूर्वक विस्तार किया गया है। | | अयमात्मा स्वयं चैतन्यज्योतिःस्वभावः सर्वं स्वेन चैतन्यज्योतिषावभासयति–स यत्तत्र किञ्चित् पश्यति, रमते, चरति, जानाति चेत्युक्तम्; स्थितं चैतन्न्यायतो नित्यं स्वरूपं चैतन्यज्योतिष्ट्वमात्मनः । | यह स्वयं चैतन्यज्योतिःस्वरूप आत्मा सबको अपने चैतन्यप्रकाशसे प्रकाशित करता है—'वह जो कुछ उस अवस्थामें देखता, रमण करता, विहार करता एवं जानता है [उस सबसे असङ्ग रहता है]' ऐसा पहले कहा जा चुका है; यह चैतन्यज्योतिष्ट्व आत्माका नित्यस्वरूप है—ऐसा युक्तिसे भी निश्चय होता है। | | स यद्यात्मा अत्राविनष्टः स्वेनैव रूपेण वर्तते, कस्मादयम्–अहम- | इस सुषुप्तावस्थामें यदि वह आत्मा नष्ट न होकर अपने स्वरूपसे ही विद्य- |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९७१
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९७१
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| स्मित्यात्मानं वा, बहिर्वा—इमानि भूतानीति’ जाग्रत्स्वप्नयोरिव न जानाति ? इत्यत्रोच्यते; शृण्वत्राज्ञानहेतुम्—एकत्वमेवाज्ञानहेतुः; तत् कथम् ? इत्युच्यते । दृष्टान्तेन हि प्रत्यक्षीभवति विवक्षितोऽर्थ इत्याह— | मान रहता है तो जाग्रत् और स्वप्नके समान 'मैं यह हूँ' इस प्रकार अपनेको और अपनेसे बाहर इन भूतोंको क्यों नहीं जानता ?—इसपर यहाँ कहा जाता है—इस अवस्थामें उसके न जाननेका जो हेतु है, सो सुनो—उसके न जाननेका कारण एकत्व ही है; सो किस प्रकार ? यह बतलाया जाता है । विवक्षित अर्थ दृष्टान्तसे स्पष्ट हो जाता है, इसलिये श्रुति कहती है— |
| तत्तत्र यथा लोके प्रिययेष्टया स्त्रिया सम्परिष्वक्तः सम्यक् परिष्वक्तः कामयन्त्या कामुकः सन् न बाह्यमात्मनः किञ्चन किञ्चिदपि वेद—मत्तोऽन्यद् वस्त्विति, न चान्तरम्—अयमहमस्मि सुखी दुःखी वेति; अपरिष्वक्तस्तु तया प्रविभक्तो जानाति सर्वमेव बाह्यम् आभ्यन्तरं च; परिष्वङ्गोत्तरकालं त्वेकत्वापत्तेर्न जानाति—एवमेव, यथा दृष्टान्तोऽयं पुरुषः क्षेत्रज्ञो | इस विषयमें ऐसा समझना चाहिये कि जिस प्रकार लोकमें अपनी कामना करनेवाली प्रिया-इष्ट स्त्रीसे स्वयं भी कामुक होकर सम्यक् प्रकारसे आलिङ्गित हुआ पुरुष अपनेसे बाहर 'मुझसे भिन्न कोई भी वस्तु है' ऐसा नहीं जानता और न भीतर ही 'यह मैं सुखी अथवा दुःखी हूँ' ऐसा ही जानता है; उससे आलिङ्गित न होनेपर तो उससे अलग रहकर बाहरी और भीतरी सब बातोंको जानता है; आलिङ्गनके बाद तो एकाकारता हो जानेसे वह कुछ नहीं जानता—इसी प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त है, |
१. यहाँ एकत्वका अर्थ आत्माका अद्वैत-बोध नहीं समझना चाहिये; क्योंकि सुषुप्तिमें यह बोध नहीं होता, बोध होनेपर तो किसी अवस्थाविशेषसे, जिसका शब्दद्वारा निर्देश किया जा सके, सम्बन्ध रहता ही नहीं । सुषुप्तिमें चित्तका लय होनेसे कुछ क्षणके लिये नानात्वका भान नहीं होता; इसी आशयसे एकत्वको कारण बताया है ।
९७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| भूतमात्रासंसर्गतः सैन्धवखिल्यवत् प्रविभक्तः, जलादौ चन्द्रादिप्रतिविम्बवत् कार्यकारण इह प्रविष्टः, सोऽयं पुरुषः, प्राज्ञेन परमार्थेन स्वाभाविकेने स्वेनात्मना परेण ज्योतिषा, सम्परिष्वक्तः सम्यक् परिष्वक्त एकीभूतो निरन्तरः सर्वात्मा, न बाह्यं किञ्चन वस्त्वन्तरम्, नाप्यान्तरमात्मनि-–अयमहस्मि सुखी दुःखी वेति वेद ।<br><br>तत्र चैतन्यज्योतिःस्वभावत्वे कस्मादिह न जानातीति यद्-प्राक्षीः, तत्रायं हेतुर्मयोक्त एकत्वम्, यथा स्त्रीपुंसयोः सम्परिष्वक्तयोः। | क्षेत्रज्ञ पुरुष भूतमात्राके संसर्गसे लवणखण्डके समान विभक्त होकर, जलादिमें चन्द्रमादिके प्रतिबिम्बके समान इस देहेन्द्रियमें प्रविष्ट हो रहा है, वह यह पुरुष अपने स्वाभाविक परमार्थस्वरूप परज्योति प्राज्ञसे सम्यक् प्रकारसे परिष्वक्त अर्थात् एकीभूत होकर निरन्तर और सर्वात्मा होनेके कारण न तो किसी बाह्य वस्त्वन्तरको जानता है और न आन्तर अर्थात् आत्मामें ही 'यह सुखी अथवा दुःखी मैं हूँ' ऐसा समझता है।¹<br><br>इस प्रकार तुमने जो पूछा था कि चैतन्यात्मज्योतिःस्वरूप होनेपर भी वह इस अवस्थामें क्यों नहीं जानता, सो उसमें मैंने एकत्व यह हेतु बतलाया, जिस प्रकार कि परस्पर आलिङ्गित स्त्री और पुरुषका |
१. इस प्रसङ्गसे कोई यह न समझ ले कि सुषुप्तिमें जीव वस्तुतः आत्मनिष्ठ एक अद्वितीय एवं सर्वात्मा हो जाता है। यह तो बोधवान्का स्वरूप है। जो किसी अवस्थाविशेषसे परिच्छिन्न होगा, वह सर्वात्मा कैसे हो सकता है ? इस प्रकरणका तात्पर्य, जैसा कि पहले टिप्पणीमें बताया गया है, इतना ही है कि उस समय कुछ भी भान नहीं रहता; सुषुप्तिसे जागनेपर मनुष्य यही अनुभव सुनाता है कि 'मैं सुखसे सोया, कुछ नहीं जाना' इत्यादि। उसको सर्वात्मभावका बोध नहीं रहता; क्योंकि आवरण दूर हुए बिना यह बोध प्रकाशित नहीं होता और बोध हो जानेपर आवरण रहता नहीं; सुषुप्तिसे जीव पुनः जाग्रत्-अवस्थामें आता है; इससे इसकी स्वरूपस्थिति नहीं मानी जा सकती; स्त्री-पुरुषके मिलनका दृष्टान्त अथवा सुषुप्ति-का दृष्टान्त वस्तुको समझानेके लिये सब एकदेशी दृष्टान्तमात्र है; मुक्त पुरुषकी किसी दूसरेसे वास्तविक तुलना हो ही नहीं सकती।