बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१००० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| १००० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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अन्यको चख सकता है, अन्य अन्यको बोल सकता है, अन्य अन्यको सुन सकता है, अन्य अन्यका मनन कर सकता है, अन्य अन्यका स्पर्श कर सकता है, अन्य अन्यको जान सकता है ॥ ३१ ॥
| यत्र यस्मिञ्जागरिते स्वप्ने वा अन्यदिव आत्मनो वस्त्वन्तरमिवाविद्यया प्रत्युपस्थापितं भवति, तत्र तस्मादविद्याप्रत्युपस्थापितादन्यः अन्यमिव आत्मानं मन्यमानः, असत्यात्मनः प्रविभक्ते वस्त्वन्तरे, असति चात्मनि ततः प्रविभक्ते, अन्योऽन्यत् पश्येदुपलभेत। तच्च दर्शितं स्वप्ने प्रत्यक्षतो 'घ्नन्तीव जिनन्तीव' इति। तथान्योऽन्यञ्जिघ्रेद् रसयेद् वदेच्छृणुयान्मन्वीत स्पृशेद्विजानीयादिति ॥ ३१ ॥ | जहाँ-जिस जागरित या स्वप्नमें अन्यके समान अर्थात् अविद्याद्वारा उपस्थित की हुई आत्मासे भिन्न कोई और वस्तु होती है, वहाँ आत्मासे भिन्न किसी अन्य वस्तुके न होनेपर तथा आत्माके उससे भिन्न न होनेपर भी उस अविद्याद्वारा प्रस्तुत की हुई वस्तुसे अपनेको अन्यवत् मानता हुआ अन्य अन्यको देखता अर्थात् उपलब्ध करता है। यह बात स्वप्नावस्थामें 'मानो मारते हैं, मानो वशमें करते हैं' इस अनुभवद्वारा प्रत्यक्ष दिखायी गयी है। इसी प्रकार अन्य अन्यको सूँघ सकता है, चख सकता है, बोल सकता है, सुन सकता है, मनन कर सकता है, स्पर्श कर सकता है, जान सकता है ॥ ३१ ॥ |
सुषुप्तिगत आत्माकी अभिन्न स्थिति
| यत्र पुनः साविद्या सुषुप्ते वस्त्वन्तरप्रत्युपस्थापिका शान्ता, तेनान्यत्वेन अविद्याप्रविभक्तस्य वस्तुनोऽभावात् तत् केन कं पश्येज्जिघ्रेद् विजानीयाद् वा ? अतः— | किंतु जहाँ सुषुप्तावस्थामें अन्य वस्तुको प्रस्तुत करनेवाली वह अविद्या शान्त हो जाती है, वहाँ उससे भिन्न रूपसे अविद्याद्वारा विभक्त वस्तुका अभाव हो जानेके कारण वह किस इन्द्रियसे किसे देखे, सूँघे अथवा जाने ? इसलिये— |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १००१
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १००१
सलिल एको द्रष्टाऽद्वैतो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडिति हैनमनुशशास याज्ञवल्क्य एषास्य परमा गतिरेषास्य परमा सम्पदेषोऽस्य परमो लोक एषोऽस्य परम आनन्द एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति ॥ ३२ ॥
जैसे जलमें वैसे ही सुषुप्तिमें एक अद्वैत द्रष्टा है। हे सम्राट् ! यह ब्रह्मलोक है—ऐसा याज्ञवल्क्यने जनकको उपदेश दिया। यह इस (पुरुष) की परमगति है, यह इसकी परम सम्पत्ति है, यह इसका परम लोक है, यह इसका परमानन्द है। इस आनन्दकी मात्राके आश्रित ही अन्य प्राणी जीवन धारण करते हैं ॥ ३२ ॥
| स्वेनैव हि प्राज्ञेनात्मना स्वयंज्योतिःस्वभावेन सम्परिष्वक्तः समस्तः सम्प्रसन्न आप्तकाम आत्मकामः सलिलवत्स्वच्छीभूतः सलिल इव सलिल एको द्वितीयस्याभावात्। अविद्यया हि द्वितीयः प्रविभज्यते; सा च शान्तात्र अत एकः। द्रष्टा दृष्टेरविपरिलुप्तत्वादात्मज्योतिःस्वभावायाः, अद्वैतो द्रष्टव्यस्य द्वितीयस्याभावात्। | अपने ही स्वयंज्योतिःस्वभाव प्राज्ञात्मासे सम्यक् प्रकारसे आलिङ्गित, अपरिच्छिन्न, सम्यक् प्रसादयुक्त, आप्तकाम, आत्मकाम, जलके समान स्वच्छ, मानो जलमें [अर्थात् जैसे जलमें प्रतिबिम्बित उसका साक्षी शुद्ध जलरूप ही है वैसा ही] एक द्रष्टा है, क्योंकि उससे भिन्न दूसरेकी सत्ता नहीं है। दूसरेका विभाग तो अविद्याद्वारा ही होता है और वह यहाँ शान्त हो गयी है; इसलिये एक द्रष्टा है। आत्मज्योतिःस्वभावा दृष्टिका लोप न होनेके कारण वह द्रष्टा है तथा अन्य द्रष्टव्यका अभाव होनेके कारण वह अद्वैत है। |
| १००२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
| १००२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| Sanskrit | Hindi |
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| एतदमृतमभयम् । एष ब्रह्मलोको ब्रह्मव लोको ब्रह्मलोकः। पर एवायमस्मिन् काले व्यावृत्तकार्यकरणोपाधिभेदः स्वे आत्मज्योतिषि शान्तसर्वसम्बन्धो वर्तते हे सम्राट् ! इति हैवं हैन॑ जनकमनुशशास अनुशिष्टवान् याज्ञवल्क्य इति श्रुतिवचनमेतत् । | यह अमृत और अभय है। यह ब्रह्मलोक है—जहाँ ब्रह्म ही लोक है ऐसा यह ब्रह्मलोक है। हे सम्राट् ! इस समय अपनी देहेन्द्रियरूप उपाधिसे छूटकर सब सम्बन्धोंसे मुक्त हो परमात्मा ही अपनी आत्मज्योतिमें वर्तमान रहता है। इस प्रकार याज्ञवल्क्यने इस जनकको अनुशासन—उपदेश किया—यह श्रुतिका वाक्य है। |
| कथं वानुशशास ? एषास्य विज्ञानमयस्य परमा गतिः। यास्त्वन्या देहग्रहणलक्षणा ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्ता अविद्याकल्पितास्ता गतयोऽतोऽपरमा अविद्याविषयत्वात् । इयं तु देवत्वादिगतीनां कर्मविद्यासाध्यानां परमोत्तमा यः समस्तात्मभावः, यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद् विजानातीति । | किस प्रकार उपदेश किया ?—इस विज्ञानमयकी यह परम गति है। इससे भिन्न जो ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त शरीरग्रहणरूपा गतियां हैं वे अविद्याकल्पित हैं, अतः अविद्याकी विषय होनेके कारण वे अपरमा (निकृष्ट) हैं। किंतु यह जो सर्वात्मभाव है, वह कर्म और उपासनाद्वारा साध्य देवत्वादि गतियोंसे परम—उत्तम है, जहाँ कि पुरुष किसी अन्यको नहीं देखता, किसी अन्यको नहीं सुनता और न किसी अन्यको जानता है। |
| एषैव चपरमा सम्पत् सर्वासां सम्पदां विभूतीनामियं परमा स्वाभाविकत्वादस्याः; कृतका ह्यन्याः सम्पदः। तथैषोऽस्यपरमो लोकः, येऽन्ये कर्मफलाश्रया | यही परम सम्पत् है, सम्पूर्ण सम्पदाओं अर्थात् विभूतियोंमें यह श्रेष्ठ है; क्योंकि यह स्वाभाविक है और दूसरे प्रकारकी सम्पत्तियाँ कृत्रिम हैं तथा यह इसका परम लोक है, दूसरे जो कर्मफलके आश्रित |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थं | १००३ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थं | १००३ |
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| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| लोकास्तेऽस्मदपरमाः । अयं तु न केनचन कर्मणा मीयते, स्वाभाविकत्वात्; एषोऽस्य परमो लोकः । | लोक हैं, वे इससे निकृष्ट हैं। किंतु यह स्वाभाविक होनेके कारण किसी भी कर्मद्वारा प्राप्त नहीं होता; अतः यह इसका परम लोक है। |
| तथैषोऽस्य परम आनन्दः । यान्यन्यानि विषयेन्द्रियसम्बन्धजनितान्यानन्दजातानि तान्यपेक्ष्य एषोऽस्य परम आनन्दो नित्यत्वात् । "यो वै भूमा तत् सुखम्" (छा० उ० ७।२३।१) इति श्रुत्यन्तरात् । यत्रान्यत् पश्यत्यन्यद् विजानाति तदल्पं मर्त्यममुख्यं सुखम्, इदं तु तद्विपरीतम्, अत एवैषोऽस्य परम आनन्दः । | तथा यह इसका परम आनन्द है। दूसरे जो विषय और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे होनेवाले आनन्द हैं, उनकी अपेक्षा यह उत्कृष्ट आनन्द है, क्योंकि यह नित्य है, जैसा कि "जो भूमा है, निश्चय वही सुख है" इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है। जहाँ अन्यको देखता है, अन्यको जानता है, वह अल्प, मर्त्य और अमुख्य सुख है, किंतु यह उससे विपरीत है, इसीसे यह इसका परम आनन्द है। |
| एतस्यैवानन्दस्य मात्रां कलामविद्याप्रत्युपस्थापितां विषयेन्द्रियसम्बन्धकालविभाव्यामन्यानि भूतान्युपजीवन्ति । कानि तानि ? तत एवानन्दादविद्यया प्रविभज्यमानस्वरूपाण्यन्यत्वेन तानि ब्रह्मणः परिकल्प्यमानान्यन्यानि सन्त्युपजीवन्ति भूतानि विषयेन्द्रियसम्पर्कद्वारेण विभाव्यमानाम् ॥ ३२ ॥ | इसी आनन्दकी अविद्याद्वारा प्रस्तुत तथा विषय और इन्द्रियोंके सम्बन्धके समय होनेवाली मात्रा कलाके आश्रित दूसरे जीव जीवन धारण करते हैं। वे जीव कौन हैं? जो उस आनन्दसे ही अविद्यावश विभक्त स्वरूप तथा ब्रह्मसे पृथक्-रूपसे परिकल्पित अन्य जीव हैं, वे विषय और इन्द्रियोंके सम्पर्क-द्वारा उस आनन्दकी कल्पित मात्रा-के उपजीवी होते हैं ॥ ३२ ॥ |
१००४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १००४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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निष्पाप और निष्काम श्रोत्रियके सार्वभौम आनन्दका दिग्दर्शन
| यस्य परमानन्दस्य मात्रा अवयवा ब्रह्मादिभिर्मनुष्यपर्यन्तैर्भूतैरुपजीव्यन्ते, तदानन्दमात्राद्वारेण मात्रिणं परमानन्दमधिजिगमयिषन्नाह, सैन्धवलवणशकलैरिव लवणशैलम् । | ब्रह्मासे लेकर मनुष्यपर्यन्त सभी जीव जिस परमानन्दकी मात्रा-अवयवके उपजीवी हैं उस आनन्दकी मात्राके द्वारा सेंधा नमकके टुकड़ेसे नमकके पर्वतका ज्ञान करानेके समान उसके मात्री (अंशी) परमानन्दका बोध करानेकी इच्छासे श्रुति कहती है— |
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स यो मनुष्याणाꣳ राद्धः समृद्धो भवत्यन्येषामधिपतिः सर्वैर्मानुष्यकैर्भोगैः सम्पन्नतमः स मनुष्याणां परम आनन्दोऽथ ये शतं मनुष्याणामानन्दाः स एकः पितॄणां जितलोकानामानन्दोऽथ ये शतं पितॄणां जितलोकानामानन्दाः स एको गन्धर्वलोक आनन्दोऽथ ये शतं गन्धर्वलोक आनन्दाः स एकः कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा देवत्वमभिसम्पद्यन्तेऽथ ये शतं कर्मदेवानामानन्दाः स एक आजानदेवानामानन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतमाजानदेवानामानन्दाः स एकः प्रजापतिलोक आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतं प्रजापतिलोक आनन्दाः स एको ब्रह्मलोक आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथैष एव परम आनन्द एष ब्रह्मलोकः सम्राडिति होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीत्यत्र ह याज्ञवल्क्यो
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १००५
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १००५
बिभयाञ्चकार मेधावी राजा सर्वेभ्यो मान्तेभ्य उदरौ- त्सीदिति ॥ ३३ ॥
वह जो मनुष्योंमें सब अङ्गोंसे पूर्ण समृद्ध, दूसरोंका अधिपति और मनुष्यसम्बन्धी सम्पूर्ण भोगसामग्रियोंद्वारा सबसे अधिक सम्पन्न होता है, वह मनुष्योंका परम आनन्द है। अब जो मनुष्योंके सौ आनन्द हैं, वह पितृलोकको जीतनेवाले पितृगणका एक आनन्द है। और जो पितृलोकको जीतनेवाले पितरोंके सौ आनन्द हैं, वह गन्धर्वलोकका एक आनन्द है। तथा जो गन्धर्वलोकके सौ आनन्द हैं, वह कर्मदेवोंका, जो कि कर्मके द्वारा देवत्वको प्राप्त होते हैं, एक आनन्द है। जो कर्मदेवोंके सौ आनन्द हैं, वह आजान (जन्मसिद्ध) देवोंका एक आनन्द है और जो निष्पाप, निष्काम श्रोत्रिय है [उसका भी वह आनन्द है] जो आजानदेवोंके सौ आनन्द हैं, वह प्रजापतिलोकका एक आनन्द है और जो निष्पाप निष्काम श्रोत्रिय है [उसका भी वह आनन्द हे] जो प्रजापतिलोकके सौ आनन्द हैं, वह ब्रह्मलोकका एक आनन्द है और जो निष्पाप निष्काम श्रोत्रिय है [उसका भी वह आनन्द है] तथा यही परम आनन्द है। हे सम्राट्! यह ब्रह्मलोक है—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। [जनक बोले-] 'मैं श्रीमान्को सहस्र [गौएँ] देता हूँ, अब आगे भी आप मोक्षके लिये ही उपदेश करें।' यह सुनकर याज्ञवल्क्यजी डर गये कि इस बुद्धिमान् राजाने तो मुझे सम्पूर्ण प्रश्नोंके निर्णयपर्यन्त [उत्तर देनेको] बाँध लिया ॥ ३३ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| स यः कश्चिन्मनुष्याणां मध्ये राद्धः संसिद्धोऽविकलः समग्रावयव इत्यर्थः, समृद्ध उपभोगोपकरणसम्पन्नो भवति; किञ्चान्येषां समानजातीयानामधिपतिः स्वतन्त्रः पतिर्न माण्डलिकः, सर्वैः समस्तैः, मानुष्यकैरिति | मनुष्योंमें जो कोई राद्ध—संसिद्ध—अविकल अर्थात् सम्पूर्ण अवयवोंसे युक्त, समृद्ध—भोगसामग्रीसे सम्पन्न तथा अन्य सजातीय पुरुषोंका अधिपति-स्वतन्त्र स्वामी होता है, माण्डलिक नहीं; एवं सम्पूर्ण मानुष्यक (मनुष्यसम्बन्धी) भोगोंसे—'मानुष्यकैः' |
१. जो सम्पूर्ण भूमण्डलका मालिक न होकर किसी छोटेसे मण्डलका शासक हो, उसे माण्डलिक कहते हैं।
१००६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १००६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| दिव्यभोगोपकरणनिवृत्त्यर्थम्, मनुष्याणामेव यानि भोगोपकरणानि तैः सम्पन्नानामप्यतिशयेन सम्पन्नः सम्पन्नतमः स मनुष्याणां परम आनन्दः । | इस पदका प्रयोग दिव्यभोगसामग्रीकी निवृत्तिके लिये है अर्थात् जो मनुष्योंकी ही भोगसामग्रियाँ हैं, उनसे जो लोग सम्पन्न हैं, उनमें भी जो सबसे अधिक सम्पन्न होता है, वह मनुष्योंका परम आनन्द है। |
| तत्र आनन्दानन्दिनोरभेदनिर्देशान्नार्थान्तरभूतत्वमित्येतत्। परमानन्दस्यैवेयं विषयविषय्याकारेण मात्रा प्रसृतेति ह्युक्तम् “यत्र वा अन्यदिव स्यात्” इत्यादिवाक्येन । तस्माद् युक्तोऽयम् 'परम आनन्दः' इत्यभेदनिर्देशः । युधिष्ठिरादितुल्यो राजात्रोदाहरणम् । | यहाँ आनन्द और आनन्दवान्के अभेदका निर्देश किया गया है, इस लिये आनन्दी आत्मासे आनन्द कोई भिन्न पदार्थ नहीं है । विषय और विषयीरूपसे यह परमानन्दका ही अंश फैला हुआ है—यह बात “जहाँ कोई दूसरेके समान हो” इत्यादि वाक्यसे कही गयी है। अतः यहाँ 'यह परम आनन्द है' ऐसी अभेदोक्ति उचित ही है । इसमें युधिष्ठिर आदिके समान राजा उदाहरण है। |
| दृष्टं मनुष्यानन्दमादिं कृत्वा शतगुणोत्तरोत्तरक्रमेणोन्नीय परमानन्दं यत्र भेदो निवर्तते तमधिगमयति । अत्रायमानन्दः शतगुणोत्तरोत्तरक्रमेण वर्धमानो यत्र वृद्धिकाष्ठामनुभवति, यत्र गणितभेदो निवर्तते, अन्यदर्शनश्रवण- | श्रुति अनुभवसिद्ध मानुष आनन्दसे आरम्भ करके उसका उत्तरोत्तर क्रमशः सौ-सौगुना उत्कर्ष दिखाते हुए जहाँ भेदकी निवृत्ति हो जाती है, उस परमानन्दको प्रदर्शित करती है। यह आनन्द क्रमशः उत्तरोत्तर सौगुना बढ़ता हुआ जहाँ वृद्धिकी पराकाष्ठातक पहुँच जाता है, जहाँ अन्य दर्शन, श्रवण और मननका अभाव हो जानेके कारण |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १००७
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १००७
| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी भाष्यार्थ |
|---|---|
| मननाभावात्, तं परमानन्दं विवक्षन्नाह— | संख्याका व्यवहार नहीं रहता, उस परमानन्दका वर्णन करनेकी इच्छासे यहाँ श्रुति कहती है— |
| अथ ये मनुष्याणामेवम्प्रकाराः शतमानन्दभेदाः स एकः पितॄणाम्। तेषां विशेषणं जितलोकानामिति, श्राद्धादिकर्मभिः पितॄं-स्तोषयित्वा तेन कर्मणा जितो लोको येषां ये जितलोकाः पितरः; तेषां पितॄणां जितलोकानां मनुष्यानन्दशतगुणीकृतपरिमाण एक आनन्दो भवति । | मनुष्योंके आनन्दके जो इस प्रकारके सौ भेद हैं, वह पितृगणका एक आनन्द है। 'जितलोक' यह उन पितृगणका विशेषण है, जिन्होंने श्राद्धादि कर्मोंसे पितरोंको संतुष्ट कर उस कर्मसे पितृलोकको जीता है; वे जितलोक पितृगण होते हैं; मनुष्यानन्दका सौ गुना किया हुआ परिमाण उन जितलोक पितृगणका एक आनन्द होता है। |
| सोऽपि शतगुणीकृतो गन्धर्वलोके एक आनन्दो भवति । स च शतगुणीकृतः कर्मदेवानामेक आनन्दः। अग्निहोत्रादिश्रौतकर्मणा ये देवत्वं प्राप्नुवन्ति ते कर्मदेवाः। तथैव आजानदेवानामेक आनन्दः— आजानत एव उत्पत्तित एव ये देवास्ते आजानदेवाः। यश्च श्रोत्रियोऽधीतवेदः, अवृजिनो वृजिनं पापं तद्रहितो यथोक्तकारीत्यर्थः; अकामहतो वीततृष्ण आजानदेवेभ्योऽर्वाग्द्या- | वह भी सौ गुना किये जानेपर गन्धर्वलोकमें एक आनन्द होता है और वह सौ गुना करनेपर कर्मदेवोंका एक आनन्द है। अग्निहोत्रादि श्रौतकर्मके द्वारा जो देवत्व प्राप्त करते हैं, वे कर्मदेव कहलाते हैं। इसी प्रकार आजानदेवोंका एक आनन्द [ कर्मदेवोंके आनन्दसे सौगुना ] होता है। आजान अर्थात् उत्पत्तिसे ही जो देवता होते हैं, वे आजानदेव कहलाते हैं और जो श्रोत्रिय–वेद पढ़ा हुआ, अवृजिन–वृजिन पापको कहते हैं उससे रहित, अर्थात् शास्त्रोक्त कर्म करनेवाला है तथा अकामहत–आजानदेवोंसे नीचे जितने विषय हैं |
| १००८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
| १००८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ | | :--- | :--- |
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| वन्तो विषयास्तेषु; तस्य चैवम्भूतस्य आजानदेवैः समान आनन्द इत्येतदन्वाकृष्यते चशब्दात्। | उनमें तृणारहित है; उस इस प्रकारके पुरुषका आनन्द भी आजानदेवोंके समान ही होता है—यह अर्थ ['यश्च' इसके] 'च' शब्दसे निकलता है। |
| तच्छतगुणीकृतपरिमाणः प्रजापतिलोके एक आनन्दो विराट्शरीरे। तथा तद्विज्ञानवाञ्छ्रोत्रियोऽधीतवेदश्चावृजिन इत्यादि पूर्ववत्; तच्छतगुणीकृतपरिमाण एक आनन्दो ब्रह्मलोके हिरण्यगर्भात्मनि। यश्चेत्यादि पूर्ववदेव। अतः परं गणितनिवृत्तिः। | वह सौगुना किया हुआ आजानदेवोंका आनन्द प्रजापतिलोकमें—विराट् शरीरमें एक आनन्द है। तथा विराट्के उपासक श्रोत्रिय—अधीतवेद, निष्पाप, निष्काम पुरुषको भी वैसा ही आनन्द होता है—इत्यादि सब अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये। उसके भी सौगुने किये हुए परिमाणवाला ब्रह्मलोकमें अर्थात् हिरण्यगर्भात्मामें एक आनन्द है। 'यश्च' इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये। इससे आगे गणनाकी निवृत्ति हो जाती है। |
| एष परम आनन्द इत्युक्तः; यस्य च परमानन्दस्य ब्रह्मलोकाद्यानन्दा मात्राः, उदधेरिव विप्रुषः। | यह परम आनन्द है—ऐसा कहा गया है, समुद्रके बूँदके समान ब्रह्मलोकादिके आनन्द जिस परमानन्दके केवल अंशमात्र हैं। |
| एवं शतगुणोत्तरोत्तरवृद्ध्युपेता आनन्दा यत्रैकतां यान्ति, यश्च श्रोत्रियप्रत्यक्षोऽथैष एव सम्प्रसादलक्षणः परम आनन्दः। तत्र हि नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति; | इस प्रकार उत्तरोत्तर सौगुनी वृद्धिको प्राप्त हुए आनन्द जहाँ एकताको प्राप्त हो जाते हैं और जो श्रोत्रियको प्रत्यक्ष है, वही सम्प्रसादरूप परम आनन्द है। वहीं न कोई दूसरा देखता है, न कोई दूसरा |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १००९
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १००९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| अतो भूमा, भूमत्वादमृतः; इतरे तद्विपरीताः । | सुनता है; इसलिये वह भूमा है और भूमा होनेके कारण अमृत है। अन्य आनन्द उससे विपरीत [ अर्थात् नाशवान् ] हैं। |
| अत्र च श्रोत्रियत्वावृजिनत्वे तुल्ये, अकामहतत्वकृतो विशेष आनन्दशतगुणवृद्धिहेतुः । अत्रैतानि साधनानि श्रोत्रियत्वावृजिनत्वाकामहतत्वानि तस्य तस्यानन्दस्य प्राप्तावर्थादभिहितानि; यथा कर्माण्यग्निहोत्रादीनि देवानां देवत्वप्राप्तौ । तत्र च श्रोत्रियत्वावृजिनत्वलक्षणे कर्मणी अधरभूमिष्वपि समाने इति न उत्तरानन्दप्राप्तिसाधने अभ्युपेयेते । अकामहतत्वं तु वैराग्यतारतम्योपपत्तेरुत्तरोत्तरभूम्यानन्दप्राप्तिसाधनमित्यवगम्यते । स एष परम आनन्दो वितृष्णश्रोत्रियप्रत्यक्षोऽधिगतः । तथा च वेदव्यासः---"यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत् सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम्" इति । | यहाँ [ भिन्न-भिन्न पर्यायोंमें ] श्रोत्रियत्व और निष्पापत्व तो समान हैं, किंतु अकामहतत्वके कारण जो विशेषता है, वही आनन्दकी सौगुनी वृद्धिका कारण है। जिस प्रकार अग्निहोत्रादि कर्म देवताओंके देवत्वकी प्राप्तिके कारण हैं, उसी प्रकार यहाँ ये श्रोत्रियत्व, अवृजिनत्व और अकामहतत्व उस-उस आनन्दकी प्राप्तिमें साधन हैं—यह बात अर्थतः कह दी गयी। इनमें श्रोत्रियत्व और अवृजिनत्वरूप कर्म तो निम्नभूमियोंमें भी समान हैं, इसलिये वे आगेके आनन्दोंकी प्राप्तिमें हेतु नहीं माने जाते, किंतु अकामहतत्व तो वैराग्यका तारतम्य हो सकनेके कारण आगे-आगेकी भूमियोंके आनन्दोंकी प्राप्तिका साधन है—ऐसा ज्ञात होता है। वही तृष्णाहीन श्रोत्रियको प्रत्यक्ष होनेवाला परम आनन्द है—ऐसा ज्ञात होता है। ऐसा ही व्यासजी भी कहते हैं—"लोकमें जो भी कामजनित सुख है और जो दिव्य महान् सुख है, ये तृष्णाक्षयजनित सुखके सोलहवें अंशके समान भी नहीं हैं।" |
बृ० उ० ६४—
१०१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| एष ब्रह्मलोको हे सम्राडिति होवाच याज्ञवल्क्यः । सोऽहमेवमनुशिष्टो भगवते तुभ्यं सहस्रं ददामि गवाम् । अत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति व्याख्यातमेतत् । | 'हे सम्राट् ! यह ब्रह्मलोक है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । [ जनक बोले-] 'इस प्रकार उपदेश किया हुआ मैं श्रीमान्को-आपको सहस्र गौएँ देता हूँ। अब आगे मोक्षके लिये ही कहिये।' इस प्रकार इसकी पहले व्याख्या की जा चुकी है। |
| अत्र ह विमोक्षायेत्यस्मिन् वाक्ये याज्ञवल्क्यो बिभयाञ्चकार भीतवान् । याज्ञवल्क्यस्य भयकारणमाह श्रुतिः—न याज्ञवल्क्यो वक्तृत्वसामर्थ्याभावाद् भीतवानज्ञानाद् वा । किं तर्हि ? मेधावी राजा सर्वेभ्यो मा मामन्तेभ्यः प्रश्ननिर्णयावसानेभ्य उदरौत्सीदावृणोदवरोधं कृतवानित्यर्थः । यद् यन्मया निर्णीतं प्रश्नरूपं विमोक्षार्थं तत्तदेकदेशत्वेनैव कामप्रश्नस्य गृहीत्वा पुनः पुनर्मां पर्यनुयुङ्क्त एव, मेधावित्वादिति । एतद् भयकारणम्—सर्वं मदीयं विज्ञानं कामप्रश्नव्याजेनोपादित्सतीति ॥ ३३ ॥ | यहाँ 'मोक्षके लिये ही कहिये' इस वाक्यके कहनेपर याज्ञवल्क्यजी डर गये। श्रुति याज्ञवल्क्यजीके भयका कारण बतलाती है-याज्ञवल्क्यजी बोलनेका सामर्थ्य न रहनेसे अथवा अज्ञानवश नहीं डरे। तो फिर क्या बात थी ? इसलिये कि इस मेधावी राजाने मुझे सभी अन्तोंके लिये-प्रश्ननिर्णयोंके लिये उदरौत्सीत्-आवृत कर दिया अर्थात् रोक लिया। मैंने मोक्षके लिये जिस-जिस प्रश्नका निर्णय किया है, उसे यह मेधावी होनेके कारण कामप्रश्नके एकदेशरूपसे ग्रहण करके फिर भी प्रश्न किये ही जाता है। उनके भयका यही हेतु है कि कामप्रश्नके मिषसे ही यह तो मेरा सारा विज्ञान ले लेना चाहता है ॥ ३३ ॥ |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०११
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०११
सम्बन्ध-भाष्य
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| अत्र विज्ञानमयः स्वयंज्योतिरात्मा स्वप्ने प्रदर्शितः । स्वप्नान्तबुद्धान्तसंचारेण कार्यकारणव्यतिरिक्तता । कामकर्मप्रविवेकश्चासङ्गतया महामत्स्यदृष्टान्तेन प्रदर्शितः । पुनश्चाविद्याकार्यं स्वप्न एव घ्नन्तीवेत्यादिना प्रदर्शितम् । अर्थादविद्यायाः सतत्त्वं निर्धारितम्—अतद्धर्माध्यारोपणरूपत्वमनात्मधर्मत्वं च । | यहाँ स्वप्नमें विज्ञानमय आत्माको स्वयंज्योति दिखाया गया है। स्वप्नस्थान और जागरितस्थानमें संचारके द्वारा उसकी देह और इन्द्रियोंसे भिन्नता दिखायी गयी तथा महामत्स्यके दृष्टान्तसे असङ्गताके कारण उसका काम और कर्मोंसे पार्थक्य भी प्रदर्शित किया गया है। फिर ‘घ्नन्तीव’ इत्यादि वाक्यसे यह दिखाया गया है कि अविद्याका कार्य स्वप्न ही है। इससे स्वतः ही आत्मापर अनात्मधर्मोंका आरोप करना तथा अनात्मधर्म होना अविद्याका स्वरूप दिखलाया गया। |
| तथा विद्यायाश्च कार्यं प्रदर्शितं सर्वात्मभावः स्वप्न एव प्रत्यक्षतः ‘सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः’ इति । तत्र च सर्वात्मभावः स्वभावोऽस्य, एवम् अविद्याकामकर्मार्दिसर्वसंसारधर्मसम्बन्धातीतं रूपमस्य साक्षात् सुषुप्ते गृह्यते इत्येतद् विज्ञापितम् । | इसी तरह ‘मैं सर्व हूँ—ऐसा मानता है, वह इसका परमलोक है’ इस वाक्यद्वारा प्रत्यक्षतः स्वप्नमें ही सर्वात्मभाव विद्याका कार्य दिखलाया गया। वहाँ सर्वात्मभाव इसका स्वभाव है, इस प्रकार यह सूचित किया गया कि सुषुप्तावस्थामें इस आत्माका अविद्या, काम और कर्मादि सम्पूर्ण सांसारिक धर्मोंके सम्बन्धसे अतीत रूप प्रत्यक्ष ग्रहण किया जाता है। |
| स्वयंज्योतिरात्मा, एष परम आनन्दः; एष विद्याया विषयः; स एष परमः सम्प्रसादः सुखस्य | आत्मा स्वयंप्रकाश है, यह परम आनन्दस्वरूप है; यह विद्याका विषय है; वह यह आत्मा ही परम |
१०१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४]
१०१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४]
| Sanskrit | Hindi |
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| च परा काष्ठा--इत्येतदेवमन्तेन ग्रन्थेन व्याख्यातम् । तच्चैतत् सर्वं विमोक्षपदार्थस्य दृष्टान्तभूतं बन्धनस्य च । ते चैते मोक्षबन्धने सहेतुके सप्रपञ्चे निर्दिष्टे विद्याविद्याकार्ये, तत् सर्वं दृष्टान्तभूतमेवेति, तद्दार्ष्टान्तिकस्थानीये मोक्षबन्धने सहेतुके कामप्रश्नार्थभूते त्वया वक्तव्ये इति पुनः पर्यन्वयुङ्क्ते जनकः--अत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति । | सम्प्रसाद और सुखकी पराकाष्ठा है—यह सब यहाँतकके ग्रन्थद्वारा बतलाया गया और यह सब मोक्षपदार्थ तथा बन्धनका दृष्टान्तभूत है। विद्या और अविद्याके कार्यभूत उन इन मोक्ष और बन्धनका हेतु और विस्तारके सहित निरूपण किया गया, किंतु वह सब दृष्टान्तरूप ही है, अतः कामप्रश्नके विषयभूत तथा उनके दार्ष्टान्तिकस्थानीय मोक्ष और बन्धनोंका आपको हेतुके सहित वर्णन करना चाहिये-इसीसे जनक फिर प्रश्न करता है कि इससे आगे मोक्षके लिये ही उपदेश कीजिये। |
| तत्र महामत्स्यवत् स्वप्नबुद्धान्तौ असङ्गः संचरत्येक आत्मा स्वयंज्योतिः--इत्युक्तम् । यथा चासौ कार्यकारणानि मृत्युरूपाणि परित्यजन्नुपाददानश्च महामत्स्यवत् स्वप्नबुद्धान्तावनुसंचरति तथा जायमानो म्रियमाणश्च तैरेव मृत्युरूपैः संयुज्यते वियुज्यते च । 'उभौ लोकावनुसंचरति' इति संचरणं स्वप्नबुद्धान्तानुसंचारस्य दार्ष्टान्तिकत्वेन सूचितम् । तदिह | ऊपर यह बतलाया गया था कि महामत्स्यके समान स्वप्न और जागरितमें एक ही स्वयंप्रकाश असङ्ग आत्मा संचार करता है। जिस प्रकार यह मृत्युके रूप देह और इन्द्रियोंको त्यागता एवं ग्रहण करता हुआ महामत्स्यके समान क्रमशः स्वप्न और जागरितस्थानोंमें संचार करता है, उसी प्रकार जन्म और मरणको प्राप्त होता हुआ भी मृत्युके रूपोंसे संयुक्त और वियुक्त होता है। 'दोनों लोकोंमें क्रमशः संचार करता है' इस वाक्यद्वारा संचारको स्वप्न और जागरितके अनुसंचारके दार्ष्टान्तिकरूपसे दिखाया है। उस संचारका यहां |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०१३
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०१३
| विस्तरेण सनिमित्तं संचरणं वर्णयितव्यमिति तदर्थोऽयमारम्भः। <br><br> तत्र च बुद्धान्तात् स्वप्नान्तम् अयमात्मानुप्रवेशितः। तस्मात् सम्प्रसादस्थानं मोक्षदृष्टान्तभूतम्। ततः प्रच्याव्य बुद्धान्ते संसारव्यवहारः प्रदर्शयितव्यः, इति तेनास्य सम्बन्धः। | उसके कारणसहित विस्तारपूर्वक वर्णन करना है—इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। <br><br> वहां (सतरहवें मन्त्रमें) इस आत्माका जागरितसे स्वप्नान्तमें अनुप्रवेश कराया गया है। अतः सम्प्रसाद (सुषुप्त)-स्थान मोक्षका दृष्टान्तभूत है। वहांसे च्युत करके जागरितमें संसारका व्यवहार प्रदर्शित करना है, अतः उसीसे इस (आगेके वाक्य) का सम्बन्ध है— |
आत्माकी संसाररूप जागरित-स्थानमें पुनरावृत्ति ·
स वा एष एतस्मिन् स्वप्नान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति बुद्धान्तायैव ॥ ३४ ॥
वह यह पुरुष इस स्वप्नान्तमें रमण और विहार कर तथा पुण्य और पापको देखकर ही पुनः गये हुए मार्गसे ही यथास्थान जागरित-अवस्थाको ही लौट आता है ॥ ३४ ॥
| स वै बुद्धान्तात् स्वप्नान्तक्रमेण सम्प्रसन्न एष एतस्मिन् सम्प्रसादे स्थित्वा, ततः पुनरीषत् प्रच्युतः स्वप्नान्ते रत्वा चरित्वेत्यादि पूर्ववद् बुद्धान्तायैव आद्रवति ॥ ३४ ॥ | जागरितसे स्वप्नान्तक्रमद्वारा सम्प्रसादको प्राप्त हुआ वह यह पुरुष इस सम्प्रसादमें स्थित रहकर फिर वहांसे थोड़ा च्युत हो स्वप्नान्तमें रमण और विहारकर—इत्यादि सब पूर्ववत् समझना चाहिये—फिर जागरितस्थानको ही लौट आता है ॥ ३४ ॥ |
१०१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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मुमूर्षु की दशाका वर्णन
| इत आरभ्यास्य संसारो वर्ण्यते; यथायमात्मा स्वप्नान्ताद् बुद्धान्तमागतः, एवमयमुस्माद् देहाद् देहान्तरं प्रतिपत्स्यत इत्याहात्र दृष्टान्तम्— | अब यहाँसे आगे संसारका वर्णन किया जाता है; जिस प्रकार यह आत्मा स्वप्नस्थानसे जागरित-स्थानमें आया है, उसी प्रकार यह इस देहसे दूसरे देहको प्राप्त होगा—सो इसमें श्रुति दृष्टान्त बतलाती है— |
तद् यथानः सुसमाहितमुत्सर्जद् यायादेवमेवायं शारीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनान्वारूढ उत्सर्जन्याति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥ ३५ ॥
लोकमें जिस प्रकार बहुत अधिक बोझ लादा हुआ छकड़ा शब्द करता चलता है, उसी प्रकार यह देही आत्मा प्राज्ञात्मासे अधिष्ठित हो शब्द करता हुआ जाता है, जब कि यह ऊर्ध्वोच्छ्वास छोड़नेवाला हो जाता है ॥ ३५ ॥
| तत्तत्र यथा लोकेऽनः शकटं सुसमाहितं सुष्ठु भृशं वा समाहितं भाण्डोपस्करणेन उलूखलमुसलशूर्पपिठरादिनान्नाद्येन च सम्पन्नं सम्भारेण आक्रान्तमित्यर्थः, तथा भाराक्रान्तं सदुत्सर्जञ्छब्दं कुर्वद् यथा यायाद् गच्छेच्छाकटिकेनाधिष्ठितं सत्, एवमेव यथोक्तो दृष्टान्तोऽयं शारीरः शरीरे भवः, | यहाँ जिस प्रकार लोकमें सुसमाहित—सुष्ठु अथवा अत्यन्त समाहित अर्थात् भाण्डादि गृहसामग्री—ऊखल, मूसल, सूप और पिठर^१ आदिसे तथा खाद्यसामग्रीसे सम्पन्न, तात्पर्य यह कि अत्यन्त बोझेसे लदा हुआ छकड़ा उपर्युक्त प्रकारसे बोझेसे दबा होनेके कारण गाड़ीवानके बैठकर हाँकनेपर शब्द करता चलता है, इसी प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त बताया गया है, यह शारीर अर्थात् शरीरमें |
१. थाली या मथानी।
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१५
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१५
| मूल संस्कृत भाष्यार्थ | हिन्दी अनुवाद |
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| कोऽसौ ? आत्मा लिङ्गोपाधिः, यः स्वप्नबुद्धान्ताविव जन्ममरणाभ्यां पाप्मसंसर्गवियोगलक्षणाभ्यामिहलोकपरलोकावनुसंचरति । यस्योत्क्रमणमनु प्राणाद्युत्क्रमणम्, स प्राज्ञेन परेण आत्मना स्वयंज्योतिःस्वभावेन अन्वारूढोऽधिष्ठितः — अवभास्यमानः, तथा चोक्तम्—'आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते' इति, उत्सर्जन् याति । | रहनेवाला, कौन है वह ? लिङ्गदेहोपाधिक आत्मा, जो कि स्वप्न और जागरितस्थानोंके समान [ देह और इन्द्रियरूप ] पापके संयोग और वियोगरूप जन्म और मरणके द्वारा क्रमशः इस लोक और परलोकमें संचार करता है तथा जिसके उत्क्रमणके साथ-साथ प्राणादिका उत्क्रमण होता है, वह स्वयंज्योतिःस्वरूप प्राज्ञ अर्थात् परात्मासे अन्वारूढ-अधिष्ठित यानी अवभासित हुआ—जैसा कि कहा है कि 'यह आत्मज्योतिसे ही इधर-उधर जाता है'—शब्द करता जाता है । |
| तत्र चैतन्यात्मज्योतिषा भास्ये लिङ्गे प्राणप्रधाने गच्छति तदुपाधिरप्यात्मा गच्छतीव । तथा श्रुत्यन्तरम्—"कस्मिन्वहम्" ( प्र० उ० ६ । ३ ) इत्यादि "ध्यायतीव" ( बृ० उ० ४ । ३ । ७ ) इति च; अत एवोक्तं प्राज्ञेनात्मनान्वारूढ इति । अन्यथा प्राज्ञेनैकीभूतः शकटवत् कथमुत्सर्जन् याति ! तेन लिङ्गोपाधिरात्मा उत्सर्जन् मर्मसु निकृत्यमानेषु दुःखवेदनया आर्तः शब्दं कुर्वन् याति गच्छति । | उस समय चैतन्यात्मज्योतिसे भास्य प्राणप्रधान लिङ्गदेहके जाने-पर उस लिङ्गदेहरूप उपाधिवाला आत्मा भी जाता-सा जान पड़ता है। ऐसी ही "किसके उत्क्रमण करनेपर मैं उत्क्रान्त होता हूँ" तथा "ध्यानसा करता है" इत्यादि अन्य श्रुतियाँ भी हैं; इसीसे 'प्राज्ञात्मासे अधिष्ठित हुआ' ऐसा कहा है; नहीं तो प्राज्ञात्मासे एकीभूत होनेपर यह छकड़ेके समान शब्द करता कैसे जाता ? अतः लिङ्गोपाधिक आत्मा मर्मस्थानोंके छेदन किये जानेपर ( मर्मस्थानोंसे छूटनेपर ) दुःख और वेदनासे व्याकुल हो शब्द करता हुआ जाता है । |
१०१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| १०१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| तत् कस्मिन् काल इति । उच्यते यत्रैतद् भवति । एतदिति क्रियाविशेषणम् । ऊर्ध्वोच्छ्वासी यत्रोर्ध्वोच्छ्वासित्वमस्य भवतीत्यर्थः । दृश्यमानस्याप्यनुवदनं वैराग्यहेतोः—ईदृशः कष्टः खल्वयं संसारः, येनोत्क्रान्तिक काले मर्मसु उत्कृत्त्यमानेषु स्मृतिलोपो दुःखवेदनार्तस्य पुरुषार्थसाधनप्रतिपत्तौ चासामर्थ्यं परवशीकृतचित्तस्य । तस्माद् यावदियमवस्था नागमिष्यति, तावदेव पुरुषार्थसाधनकर्त्तव्यतायाम् अप्रमत्तो भवेदित्याह कारुण्याच्छ्रुतिः ॥ ३५ ॥ | [ यदि कहें । ऐसा किस समय होता है ? तो जिस समय ऐसा होता है, वह बतलाया जाता है । यहाँ 'एतत्' क्रियाविशेषण है । ऊर्ध्वोच्छ्वासी अर्थात् जहां इसका ऊर्ध्वोच्छ्वास हो जाता है । यह अवस्था दिखायी देनेवाली है, तो भी वैराग्यके लिये इसका अनुवाद किया जाता है—निश्चय ही यह संसार ऐसा कष्टप्रद है कि देहत्यागके समय मर्मस्थानोंका छेदन होनेपर दुःख और वेदनासे व्याकुल हुए पुरुषकी स्मृति नष्ट हो जाती है तथा उस परवशचित्त पुरुषका पुरुषार्थके साधनोंकी प्राप्तिमें कोई सामर्थ्य नहीं रहता । अतः जबतक यह अवस्था न आवे तबतक ही पुरुषको पुरुषार्थसाधनोंके करनेमें सावधान रहना चाहिये—ऐसा श्रुति करुणावश कहती है ॥ ३५ ॥ |
ऊर्ध्वोच्छ्वास क्यों और किसलिये होता है ?
| तदस्योर्ध्वोच्छ्वासित्वं कस्मिन् काले किंनिमित्तं कथं किमर्थं वा स्यात् । इत्येतदुच्यते-- | उसका ऊर्ध्वोच्छ्वास किस समय किस कारणसे किस प्रकार और किसलिये होता है। यह बतलाया जाता है— |
स यत्रायमणिमानं न्येति जरया वोपतपता वाणिमानं निगच्छति तद् यथाम्रं वोदुम्बरं वा पिप्पलं वा बन्ध-
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १०१७
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १०१७
नात् प्रमुच्यत एवमेवायं पुरुष एभ्योऽङ्गेभ्यः सम्प्रमुच्य पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति प्राणायैव ॥ ३६ ॥
वह यह देह जिस समय कृशताको प्राप्त होता है, वृद्धावस्था अथवा ज्वरादि रोगके कारण कृश हो जाता है, उस समय जैसे आम, गूलर अथवा पिप्पल-फल बन्धनसे छूट जाता है, वैसे ही यह पुरुष इन अङ्गोंसे छूटकर फिर जिस मार्गसे आया था, उसीसे प्रत्येक योनिमें प्राणकी विशेष अभिव्यक्तिके लिये ही चला जाता है ॥ ३६ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-भाष्यार्थ |
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| सोऽयं प्राकृतः शिरःपाण्यादिमान् पिण्डो यत्र यस्मिन् कालेऽप्यणिमानं अणोर्भावमणृत्वं कार्श्यमित्यर्थः, न्येति निगच्छति, किंनिमित्तम् ? जरया वा स्वयमेव कालपक्वफलवज्जीर्णः कार्श्यं गच्छति । उपतपतीत्युपतपञ्ज्वरादिरोगः, तेनोपतपता वा, उपतप्यमानो हि रोगेण विषमाग्नितयान्नं भुक्तं न जरयति, ततोऽन्नरसेनानुपचीयमानः पिण्डः कार्श्यमापद्यते । तदुच्यते उपतपता वेत्यणिमानं निगच्छति ।<br><br>यदा अत्यन्तकार्श्यं प्रतिपन्नो जरादिनिमित्तैः, तदोर्ध्वोच्छ्वा- | वह यह प्राकृत–शिर एवं हाथ-पांव आदि अवयवोंवाला पिण्ड जिस समय अणिमा–अणुभाव–अणुत्व अर्थात् कृशताको 'नेति' प्राप्त हो जाता है। किस कारणसे ? वृद्धावस्थासे–कालद्वारा पकाये हुए फलके समान स्वयं ही जीर्ण-कृश हो जाता है। अथवा उपतपत्से–जो समीप रहकर तपाता है, वह ज्वरादि रोग 'उपतपत्' (उपताप) कहलाता है, उससे; क्योंकि रोगसे उपतप्त हुआ पुरुष विषम अग्नि हो जानेके कारण खाये हुए अन्नको नहीं पचा सकता, अतः अन्नके रससे वृद्धिको प्राप्त न होनेवाला पिण्ड कृशताको प्राप्त हो जाता है। इसीसे यह कहा जाता है कि 'उपतपता वा'–अथवा ज्वरादि रोगसे कृशताको प्राप्त हो जाता है।<br><br>जिस समय वृद्धावस्थादि कारणोंसे शरीर अत्यन्त कृशताको प्राप्त हो जाता है, उस समय जीव ऊर्ध्वोच्छ्वास |
१०१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| सी भवति; यदोर्ध्वोच्छ्वासी, तदा भृशाहितसम्भारशकटवदुत्सर्जन् याति । जराभिभवो रोगादिपीडनं कार्श्यापत्तिश्च शरीरवतोऽवश्यम्भाविन एतेऽनर्था इति वैराग्यायेदमुच्यते । | लेने लगता है; और जिस समय ऊर्ध्वोच्छ्वास लेने लगता है, उस समय वह अत्यन्त भाराक्रान्त छकड़ेके समान शब्द करता हुआ प्रयाण करता है। देहधारीके लिये जरासे अभिभव, रोगादिकी पीड़ा और कृशताकी प्राप्ति—ये अनर्थ अवश्यम्भावी हैं; इसलिये वैराग्यके लिये ऐसा कहा जाता है। |
| यदासावुत्सर्जन् याति तदा कथं शरीरं विमुञ्चति ? इति दृष्टान्त उच्यते—तत्तत्र यथा आम्रं वा फलम्, उदुम्बरं वा पिप्पलं वा फलम्—विषमानेकदृष्टान्तोपादानं मरणस्यानियतनिमित्तत्वख्यापनार्थम्, अनियतानि हि मरणस्य निमित्तान्यसंख्यातानि च । एतदपि वैराग्यार्थमेव; यस्मादयमनेकमरणनिमित्तवांस्तस्मात् सर्वदा मृत्योरास्ये वर्तत इति—बन्धनात्—बध्यते येन वृन्तेन सह स बन्धनकारणो रसो यस्मिन् वा बध्यते इति वृन्तमेवोच्यते बन्धनम्,तस्माद् रसाद् वृन्ताद् वा | जिस समय वह शब्द करता हुआ प्रयाण करता है, उस समय किस प्रकार देहका त्याग करता है? इसमें दृष्टान्त कहा जाता है—सो जिस प्रकार आम्र-फल, उदुम्बर ( गूलर ) अथवा पिप्पलफल—यहाँ कई विषम दृष्टान्त मृत्युके अनियत-निमित्तत्वको सूचित करनेके लिये हैं, क्योंकि मृत्युके कारण अनिश्चित और अगणित हैं। यह कथन भी वैराग्यके लिये ही है; क्योंकि यह देह मरणके अनेकों कारणोंवाला है, इसलिये सर्वदा मृत्युके मुखमें ही पड़ा हुआ है। बन्धनसे—जिसके द्वारा फल वृन्तसे बँधा रहता है, वह बन्धनका कारणभूत रस अथवा जिसमें वह बँधा रहता है, वह वृन्त ही बन्धन कहा गया है, उस रस या वृन्तरूप |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे १०१९
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे १०१९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| बन्धनात् प्रमुच्यते वाताद्यनेकनिमित्तम्; एवमेवायं पुरुषो लिङ्गात्मा लिङ्गोपाधिरेभ्योऽङ्गेभ्यश्चक्षुरादिदेहावयवेभ्यः सम्प्रमुच्य सम्यङ्निर्लेपेन प्रमुच्य, न सुषुप्तगमनकाल इव प्राणेन रक्षन्; किं तर्हि ? सह वायुनोपसंहृत्य, पुनः प्रतिन्यायं पुनः शब्दात् पूर्वमप्ययं देहाद् देहान्तरमसकृद् गतवान् यथा स्वप्नबुद्धान्तौ पुनः पुनर्गच्छति तथा पुनः प्रतिन्यायं प्रतिगमनं यथागतमित्यर्थः । प्रतियोनि योनिं योनिं प्रति कर्मश्रुतादिवशादाद्रवति । | बन्धनसे वायु आदि अनेकों कारणोंवश [फल] छूट जाता है; वैसे ही यह पुरुष-लिङ्गात्मा-लिङ्गोपाधिक जीव इन अङ्गोंसे अर्थात् शरीरके चक्षु आदि अवयवोंसे सम्प्रमुक्त होकर अर्थात् सम्यक्-निर्लेपभावसे छूटकर जिस प्रकार सुषुप्तावस्थामें जानेके समय प्राणके द्वारा इसकी रक्षा करता है, उस प्रकार नहीं; तो किस प्रकार ? प्राणवायुके सहित इन्द्रियोंका उपसंहार करके पुनः प्रतिन्याय—यहाँ 'पुनः' शब्दसे यह आशय है कि जिस प्रकार जीव पुनः-पुनः जागरित और स्वप्न-अवस्थाओंमें जाता है, उसी प्रकार पहले भी यह एक देहसे दूसरे देहमें बारंबार गया था; अतः पुनः प्रतिन्याय—जैसे पहले आया था वैसे ही दूसरे देहमें चला जाता है। प्रतियोनि अर्थात् अपने कर्म और विद्याके अनुसार प्रत्येक योनिमें जाता है। |
| किमर्थम् ? प्राणायैव प्राणव्यूहायैवेत्यर्थः । सप्राण एव हि गच्छति, ततः प्राणायैवेति विशेषणमनर्थकम्; प्राणव्यूहाय हि गमनं देहाद् देहान्तरं प्रति; तेन | इसलिये जाता है ? प्राणके लिये ही अर्थात् प्राणव्यूहके लिये ही। प्राणके सहित तो जाता ही है, ऐसी स्थितिमें 'प्राणायैव' यह विशेषण व्यर्थ होगा; लिङ्गात्माका जो एक देहसे दूसरे देहमें जाना है, वह प्राणके |