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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

५५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५५४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| त्मैवेति ग्रहीतुं शक्यते ? <br><br> चिन्मात्रानुगमात्सर्वत्र चित्स्वरूपतैवेति गम्यते । तत्र दृष्टान्त उच्यते—यत्स्वरूपव्यतिरेकेणाग्रहणं यस्य, तस्य तदात्मत्वमेव लोके दृष्टम् । | ऐसा किस प्रकार ग्रहण किया जा सकता है ? <br><br> उत्तर—सर्वत्र चिन्मात्रकी अनुवृत्ति होनेके कारण सबकी चित्स्वरूपता ही है—ऐसा जाना जाता है। इस विषयमें दृष्टान्त बताया जाता है—जिसका जिसके स्वरूपसे अलग ग्रहण नहीं किया जा सकता, वह तद्रूप ही होता है—ऐसा लोकमें देखा गया है। |

स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्शब्दाञ्शक्नुयाद्ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ७ ॥

वह दृष्टान्त ऐसा है कि जिस प्रकार ताडन किये जाते हुए दुन्दुभि (नक्कारे) के बाह्य शब्दोंको कोई ग्रहण नहीं कर सकता, किंतु दुन्दुभि या दुन्दुभिके आघातको ग्रहण करनेसे उसका शब्द भी ग्रहण कर लिया जाता है ॥ ७ ॥

| स यथा— स इति दृष्टान्तः, लोके यथा दुन्दुभेर्भेर्यादेः, हन्यमानस्य ताड्यमानस्य दण्डादिना, न, बाह्याञ्छब्दान् बहिर्भूताञ्छब्दविशेषान् दुन्दुभिशब्दसामान्यान्निष्कृष्टान् दुन्दुभिशब्दविशेषान् न शक्नुयाद् ग्रहणाय ग्रहीतुम्; | स यथा अर्थात् वह दृष्टान्त ऐसा है—लोकमें जिस प्रकार दण्डादिसे हनन-ताडन किये जाते हुए दुन्दुभि-भेरी आदिके बाह्य शब्दोंको अर्थात् बाहर फैले हुए शब्दविशेषोंको—दुन्दुभिके सामान्य शब्दमेंसे निकाले हुए दुन्दुभिके विशेष शब्दोंको कोई ग्रहण नहीं कर सकता । दुन्दुभिका ग्रहण |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५५५

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५५५


| दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन, दुन्दुभिशब्दसामान्यविशेषत्वेन दुन्दुभिशब्दा एत इति, शब्दविशेषा गृहीता भवन्ति, दुन्दुभिशब्दसामान्यव्यतिरेकेणाभावात्तेषाम् ।<br><br>दुन्दुभ्याघातस्य वा, दुन्दुभेराहननम् आघातः, दुन्दुभ्याघातविशिष्टस्य शब्दसामान्यस्य ग्रहणेन तद्गता विशेषा गृहीता भवन्ति, न तु त एव निर्भिद्य ग्रहीतुं शक्यन्ते, विशेषरूपेणाभावात्तेषाम् । तथा प्रज्ञानव्यतिरेकेण स्वप्नजागरितयोर्न कश्चिद्वस्तुविशेषो गृह्यते; तस्मात्प्रज्ञानव्यतिरेकेण अभावो युक्तस्तेषाम् ॥ ७ ॥ | होनेसे अर्थात् दुन्दुभिके सामान्य शब्दके विशेषरूपसे 'ये दुन्दुभिके शब्द हैं, इस प्रकार वे विशेष शब्द भी गृहीत हो जाते हैं, क्योंकि दुन्दुभिके सामान्य शब्दको छोड़कर तो उनकी सत्ता ही नहीं है ।<br><br>अथवा दुन्दुभिके आघात—दुन्दुभिके आहननका नाम आघात है--उस दुन्दुभ्याघातविशिष्ट शब्द सामान्यका ग्रहण होनेसे उसके अन्तर्वर्ती विशेषोंका भी ग्रहण हो जाता है । उससे अलग करके उनका ग्रहण नहीं हो सकता, क्योंकि विशेषरूपसे तो उनका अभाव है । इसी प्रकार स्वप्न और जागरितको किसी भी वस्तुविशेषका प्रज्ञानसे अलग ग्रहण नहीं किया जा सकता; अतः प्रज्ञानसे भिन्न उनका अभाव उचित ही है ॥ ७ ॥ |


स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्शब्दाञ्शक्नुयाद्ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥

वह [ दूसरा दृष्टान्त ] ऐसा है—जैसे कोई बजाये जाते हुए शङ्खके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं होता, किंतु शङ्खके अथवा शङ्खके बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है ॥ ८ ॥

| ५५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |

५५६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| तथा स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य शब्देन संयोज्यमानस्य आपूर्यमाणस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयादित्येवमादि पूर्ववत् । ८ । | तथा वह [दूसरा दृष्टान्त] ऐसा है—जिस प्रकार बजाये जाते हुए शब्दसे संयुक्त किये जाते हुए अर्थात् फूँके जाते हुए शङ्खके बाह्य शब्दोंको कोई ग्रहण नहीं कर सकता इत्यादि पूर्ववत् ऐसा ही अर्थ है ॥ ८ ॥ |


स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥

वह [तीसरा दृष्टान्त] ऐसा है—जैसे कोई बजायी जाती हुई वीणाके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं होता; किंतु वीणा या वीणाके स्वरका ग्रहण होनेपर उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है ॥ ९ ॥

| तथा वीणायै वाद्यमानायै—<br>वीणाया वाद्यमानायाः। अनेकदृष्टान्तोपादानमिह सामान्यबहुत्वख्यापनार्थम्—अनेके हि विलक्षणाश्चेतनाचेतनरूपाः सामान्यविशेषाः—तेषां पारम्पर्यगत्या यथैकस्मिन्महासामान्येऽन्तर्भावः प्रज्ञानघने, कथं नाम प्रदर्शयितव्य इति; दुन्दुभिशङ्खवीणाशब्दसामान्यविशेषाणां यथा | इसी प्रकार 'वीणायै वाद्यमानायै'<br>अर्थात् बजायी जाती हुई वीणाका इत्यादि समझना चाहिये। यहाँ अनेक दृष्टान्तोंका ग्रहण सामान्योंकी बहुलता प्रकट करनेके लिये है। चेतन और अचेतन, सामान्य एवं विशेष अनेक और विलक्षण हैं। उनका जिस प्रकार परम्परा गतिसे एक प्रज्ञानघन महासामान्यमें अन्तर्भाव है—यही किसी-न-किसी तरह दिखलाना है। जिस प्रकार दुन्दुभि, शङ्ख और वीणाके सामान्य एवं विशेष |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५५७

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५५७


| शब्दत्वेऽन्तर्भावः, एवं स्थितिकाले तावत्सामान्यविशेषाव्यतिरेकाद् ब्रह्मैकत्वं शक्यमवगन्तुम् ॥ ९ ॥ | शब्दोंका शब्दत्वमें अन्तर्भाव हो जाता है, उसी प्रकार स्थितिकालमें सामान्य और विशेषसे अभिन्न होनेके कारण ब्रह्मकी एकताका ज्ञान भी हो सकता है ॥ ६ ॥ |


परमात्माके निःश्वासभूत ऋग्वेदादिका उनसे अभिन्नत्वप्रतिपादन

| एवमुत्पत्तिकाल प्रागुत्पत्तेर्ब्रह्मैवेति शक्यमवगन्तुम्। यथाग्नेर्विस्फुलिङ्गधूम्राङ्गारार्चिषां प्राग्विभागादग्निरिवेति भवत्यग्नेकत्वम्, एवं जगन्नामरूपविकृतं प्रागुत्पत्तेः प्रज्ञानघन एवेति युक्तं ग्रहीतुमित्येतदुच्यते— | इस प्रकार यह जाना जा सकता है कि उत्पत्तिकालमें उत्पत्तिसे पूर्व ब्रह्म ही था। जिस प्रकार अग्निकी चिनगारी, धूम, अंगार और ज्वालाओंका विभाग होनेसे पूर्व अग्नि ही है, अतः अग्निकी एकता सिद्ध होती है, उसी प्रकार नाम-रूप-विकारको प्राप्त हुआ जगत् उत्पत्तिसे पूर्व प्रज्ञानघन ही था—ऐसा ग्रहण करना उचित है—इसीसे यह कहा जाता है— |

स यथार्द्राग्नेरभ्याहितात्पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि निश्वसितानि ॥ १० ॥

वह [ चौथा दृष्टान्त— ] जिस प्रकार जिसका ईंधन गीला है, ऐसे आधान किये हुए अग्निसे पृथक् धुआँ निकलता है, हे मैत्रेयि ! इसी प्रकार ये जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वाङ्गिरस (अथर्ववेद), इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, मन्त्रविवरण और अर्थवाद हैं, वे इस महद्भूतके ही निःश्वास हैं ॥ १० ॥

| ५५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |

५५८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| स यथा—आर्द्रेन्धाग्नेः, आर्द्रैरेधोभिरिद्धोऽग्निरार्द्रेन्धाग्निः, तस्मात्, अभ्याहितात्पृथग्धूमाः, पृथग्, नानाप्रकारम्, धूमग्रहणं विस्फुलिङ्गादिप्रदर्शनार्थम्, धूमविस्फुलिङ्गादयो विनिश्चरन्ति विनिर्गच्छन्ति । | वह [चौथा दृष्टान्त-] जिस प्रकार आर्द्रेन्धा अग्निसे–जो आर्द्र (गीले) ईंधनसे बढ़ाया गया हो उसे आर्द्रेन्धाग्नि कहते हैं। उस आधान किये हुए अग्निसे जैसे पृथक् धूआं निकलता है, पृथक् यानी नाना प्रकारका धूआँ। यहाँ 'धूम' शब्दका ग्रहण चिनगारी आदिको प्रदर्शित करनेके लिये है। अर्थात् धूम और चिनगारी आदि निकलते हैं। | | एवम्— यथायं दृष्टान्तः, अरे मैत्रेय्यस्य परमात्मनः प्रकृतस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतत्, निश्वसितमिव निश्वसितम्; यथा अप्रयत्नेनैव पुरुषनिश्वासो भवत्येवं वा अरे। | इसी प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त है, हे मैत्रेयि ! इस परमात्मा यानी प्रकृत महद्भूतका यह निःश्वसित है अर्थात् निःश्वसितके समान निःश्वसित है; जिस प्रकार बिना प्रयत्नके ही पुरुषका निःश्वास होता है, अरे ! उसी प्रकार [उस विज्ञानघनसे यह जगत् उत्पन्न हुआ है]। | | किं तन्निश्वसितमिव ततो जातमित्युच्यते—यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः— चतुर्विधं मन्त्रजातम्, इतिहास इत्युर्वशीपुरूरवसोः संवादादिः—"उर्वशी हाप्सराः" इत्यादिब्राह्मणमेव, पुराणम् "असद्वा इदमग्र आसीत्" (तै० उ० २।६।१) इत्यादि, विद्या देवजनविद्या वेदः सोऽयमित्याद्या, उपनिषदः "प्रि- | उससे निःश्वासके समान क्या उत्पन्न हुआ है ? जो यह ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद चार प्रकारका मन्त्रसमुदाय है तथा इतिहास यानी उर्वशी-पुरूरवाका संवादादि "उर्वशी हाप्सराः" इत्यादि ब्राह्मण ही इतिहास है, पुराण–"आरम्भमें यह असत् ही था" इत्यादि, विद्या–'वेदः सोऽयम्' इत्यादि देवजनविद्या, |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ५५९

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ५५९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
यमित्येतदुपासीत" (बृ० उ० ४ । १ । ३) इत्याद्याः, श्लोका ब्राह्मणप्रभवा मन्त्राः "तदेते श्लोकाः" (बृ०उ० ४।३।११) इत्यादयः; सूत्राणि वस्तुसङ्ग्रहवाक्यानि वेदे यथा—"आत्मेत्येवोपासीत" (१ । ४ । ७) इत्यादीनि, अनुव्याख्यानानि मन्त्रविवरणानि, व्याख्यानान्यर्थवादाः, अथवा वस्तुसङ्ग्रहवाक्यविवरणान्यनुव्याख्यानानि यथा चतुर्थाध्याये 'आत्मेत्येवोपासीत' इत्यस्य, यथा वा 'अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवम्' (१ । ४ । १०) इत्यस्यायमेवाध्यायशेषः, मन्त्रविवरणानि व्याख्यानानि, एवमष्टविधं ब्राह्मणम्।उपनिषद्—"प्रिय है—इस प्रकार उपासना करे" इत्यादि, श्लोक—"तदेते श्लोकाः" इत्यादि ब्राह्मणभागके मन्त्र, सूत्र—वस्तुसंग्रहवाक्य—जिस प्रकार कि वेदमें "आत्मा है—इस प्रकार उपासना करे" इत्यादि मन्त्र हैं, अनुव्याख्यान—मन्त्रविवरण, व्याख्यान—अर्थवाद अथवा वस्तुसंग्रहवाक्यके विवरण ही अनुव्याख्यान हैं, जिस प्रकार चतुर्थ अध्यायमें 'आत्मेत्येवोपासीत' इस वाक्यकी व्याख्या है, अथवा 'अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवम्' इस वाक्यका व्याख्यान यह शेष अध्याय ही है। मन्त्रविवरणका अर्थ मन्त्रव्याख्यान है। इस प्रकार [इतिहासादि पदोंसे कहा हुआ] आठ प्रकारका ब्राह्मणभाग है।
एवं मन्त्रब्राह्मणयोरेव ग्रहणम्, नियतरचनावतो विद्यमानस्यैव वेदस्याभिव्यक्तिः पुरुषनिश्श्वासवत्, न च पुरुषबुद्धिप्रयत्नपूर्वकः; अतः प्रमाणं निरपेक्ष एव स्वार्थे; तस्माद्यत्तेनोक्तं तत्तथैव प्रतिपत्तव्यम्, आत्मनःइस प्रकार [निःश्वसित-श्रुतिके सामर्थ्यसे ऋग्वेदादि शब्दोंसे] मन्त्र और [इतिहासादिसे] ब्राह्मणोंका ही ग्रहण करना चाहिये। पुरुषके निःश्वासोंके समान नियतरचनावान् विद्यमान वेदकी ही अभिव्यक्ति हुई है, पुरुषकी बुद्धिके प्रयत्नपूर्वक इनकी रचना नहीं हुई। इसलिये यह अपने निरपेक्ष अर्थमें ही प्रमाण है। अतः उसने ज्ञान या कर्म जिसका जैसा

५६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५६०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| श्रेय इच्छद्भिः, ज्ञानं वा कर्म वेति । | निरूपण किया है, कल्याणकामियोंको उसे वैसा ही समझना चाहिये। | | नामप्रकाशवशा हि रूपस्य विक्रियाव्यवस्था । नामरूपयोरेव हि परमात्मोपाधिभूतयोर्व्याक्रियमाणयोः सलिलफेनवत्तत्त्वान्यत्वेनानिर्वक्तव्ययोः सर्वावस्थयोः संसारत्वम्—इत्यतो नाम्न एव निश्वसितत्वमुक्तम्, तद्वचनेनैवेतरस्य निश्वसितत्वसिद्धेः । | रूपके विकारकी व्यवस्था नाम-प्रकाशके ही अधीन है। जल और फेनके समान जिनका वास्तविक अथवा अवास्तविक रूपसे निरूपण नहीं किया जा सकता; उन परमात्माके उपाधिभूत एवं विकारको प्राप्त होते हुए सम्पूर्ण अवस्थाओंमें स्थित नाम और रूपको ही संसार कहते हैं, इसलिये नामके ही निःश्वसित होनेका प्रतिपादन किया है; क्योंकि उसके निरूपणसे ही रूपका भी निःश्वसितत्व सिद्ध हो जाता है। | | अथवा सर्वस्य द्वैतजातस्य अविद्याविषयत्वमुक्तम्—"ब्रह्म तं परादात् ॰ ॰ ॰ 'इदं सर्वं यदयमात्मा" (२।४।६) इति । तेन वेदस्याप्रामाण्यमाशङ्क्यते । तदाशङ्कानिवृत्त्यर्थमिदमुक्तम् । पुरुषनिश्वासवदप्रयत्नोत्थितत्वात्प्रमाणं वेदः, न यथा अन्यो ग्रन्थ इति ॥ १० ॥ | अथवा "ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है...यह सब जो कुछ है आत्मा है" इस मन्त्रद्वारा सम्पूर्ण द्वैतवर्गको अविद्याका कार्य बतलाया है। इससे [अविद्याकल्पित सिद्ध होनेके कारण] वेदके अप्रामाणिक होनेकी आशङ्का होती है। उस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये ही यह कहा है—पुरुषके निःश्वासके समान बिना प्रयत्नके उत्पन्न हुआ होनेके कारण वेद प्रमाण है, यह अन्य ग्रन्थकी तरह [पुरुषप्रयत्नजनित] नहीं है ॥ १० ॥ |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५६१

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५६१

आत्मा ही सबका आश्रय है—इसमें दृष्टान्त

| किञ्चान्यत्, न केवलं स्थित्युत्पत्तिकालयोरेव प्रज्ञानव्यतिरेकेणाभावाज्जगतो ब्रह्मत्वम्, प्रलयकाले च। जलबुद्बुदफेनादीनामिव सलिलव्यतिरेकेणाभावः, एवं प्रज्ञानव्यतिरेकेण तत्कार्याणां नामरूपकर्मणां तस्मिन्नेव लीयमानानामभावः। तस्मादेकमेव ब्रह्म प्रज्ञानघनमेकरसं प्रतिपत्तव्यमित्यत आह। प्रलयप्रदर्शनाय दृष्टान्तः— | इसके सिवा दूसरी बात यह है कि जगत्‌का ब्रह्मत्व केवल उत्पत्ति और स्थितिकालमें ही प्रज्ञानको छोड़कर न रहनेके कारण नहीं है, अपि तु प्रलयकालमें भी है। जिस प्रकार जल, बुद्बुद और फेनादिकी सत्ता जलको छोड़कर नहीं है, उसी प्रकार प्रज्ञानसे भिन्न उसके कार्य और उसीमें लीन होनेवाले नाम, रूप और कर्मोंकी भी सत्ता नहीं है। इसलिये एक ही प्रज्ञानघन एकरस ब्रह्म है—ऐसा जानना चाहिये। इसीसे श्रुति [निम्नाङ्कित मन्त्र] कहती है। प्रलय प्रदर्शित करनेके लिये यहाँ दृष्टान्त दिया गया है— |

स यथा सर्वासामपाँ समुद्र एकायनमेवँ सर्वेषाँ स्पर्शानां त्वगेकायनमेवँ सर्वेषां गन्धानां नासिके एकायनमेवँ सर्वेषाँ रसानां जिह्वैकायनमेवँ सर्वेषाँ रूपाणां चक्षुरेकायनमेवँ सर्वेषाँ शब्दानाँ श्रोत्रमेकायनमेवँ सर्वेषाँ संकल्पानां मन एकायनमेवँ सर्वासां विद्यानाँ हृदयमेकायनमेवँ सर्वेषां कर्मणाँ हस्तावेकायनमेवँ सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवँ सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवँ सर्वेषामध्वनां पादावेकायनमेवँ सर्वेषां वेदानां वागेकायनम् ॥ ११ ॥


बृ० उ० ३६—

५६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५६२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

वह दृष्टान्त—जिस प्रकार समस्त जलोंका समुद्र एक अयन (प्रलयस्थान) है, इसी प्रकार समस्त स्पर्शोंका त्वचा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त गन्धोंका दोनों नासिकाएँ एक अयन है, इसी प्रकार समस्त रसोंका जिह्वा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त रूपोंका चक्षु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त शब्दोंका श्रोत्र एक अयन है, इसी प्रकार समस्त संकल्पोंका मन एक अयन है, इसी प्रकार समस्त विद्याओंका हृदय एक अयन है, इसी प्रकार समस्त कर्मोंका हस्त एक अयन है, इसी प्रकार समस्त आनन्दोंका उपस्थ एक अयन है और इसी प्रकार समस्त विसर्गोंका पायु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त मार्गोंका चरण एक अयन है और इसी प्रकार समस्त वेदोंका वाक् एक अयन है ॥ ११ ॥

| स इति दृष्टान्तः; यथा येन प्रकारेण, सर्वासां नदीवापीतडागादिगतानामपाम्, समुद्रोऽब्धिरेकायनम्, एकगमनमेकप्रलयोऽविभागप्राप्तिरित्यर्थः; यथायं दृष्टान्तः; एवं सर्वेषां स्पर्शानां मृदुकर्कशकठिनपिच्छिलादीनां वायोरात्मभूतानां त्वगेकायनम्, त्वगिति त्वग्विषयं स्पर्शसामान्यमात्रम्, तस्मिन्प्रविष्टाः स्पर्शविशेषाः—आप इव समुद्रम्—तद्व्यतिरेकेणाभावभूता भवन्ति; तस्यैव हि ते संस्थानमात्रा आसन् ।<br><br>तथा तदपि स्पर्शसामान्यमात्रं त्वक्शब्दवाच्यं मनःसंकल्पे मनो- | वह दृष्टान्त—जिस प्रकार सम्पूर्ण नदी, बावड़ी और तड़ागादिके जलोंका समुद्र एकायन—एक गमनस्थान—एक प्रलयस्थान अर्थात् अभेदप्राप्तिका स्थल है, जैसा कि यह दृष्टान्त है, उसी प्रकार वायुके स्वरूपभूत मृदु, कर्कश, कठोर और पिच्छिल आदि समस्त स्पर्शोंका त्वचा एक प्रलयस्थान है । त्वचासे त्वचासम्बन्धी स्पर्शसामान्यमात्र समझना चाहिये, उसीमें समुद्रमें जलके समान स्पर्शविशेष प्रविष्ट हैं, उसके बिना वे सत्ताशून्य हो जाते हैं; क्योंकि वे उसीके संस्थानमात्र (पृथक् आकारमात्र) थे ।<br><br>इसी प्रकार वह त्वक्शब्दवाच्य स्पर्शसामान्य, त्वचाके विषयमें स्पर्शविशेषोंके समान मनके विषय- |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५६३

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५६३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
विषयसामान्यमात्रे, त्वग्विषय इव स्पर्शविशेषाः; प्रविष्टं तद्व्यतिरेकेणाभावभूतं भवति; एवं मनोविषयोऽपि बुद्धिविषयसामान्यमात्रे प्रविष्टस्तद्व्यतिरेकेणाभावभूतो भवति; विज्ञानमात्रमेव भूत्वा प्रज्ञानघने परे ब्रह्मण्यप इव समुद्रे प्रलीयते।सामान्यमात्ररूप मनःसंकल्पमें प्रविष्ट होकर उससे पृथक् सत्ताशून्य हो जाता है इसी तरह मनका विषय भी बुद्धिके सामान्य विषयमात्रमें प्रवेश करके उससे पृथक् नहीं रहता तथा विज्ञानमात्र ही होकर समुद्रमें जलके समान प्रज्ञानघन परब्रह्ममें लीन हो जाता है।
एवं परम्पराक्रमेण शब्दादौ सह ग्राहकेण करणेन प्रलीने प्रज्ञानघने उपाध्यभावात्सैन्धवघनवत् प्रज्ञानघनमेकरसमनन्तमपारं निरन्तरं ब्रह्म व्यवतिष्ठते। तस्मादात्मैव एकमद्वयमिति प्रतिपत्तव्यम्।इस प्रकार परम्पराक्रमसे अपने ग्राहक इन्द्रियके सहित शब्दादिके प्रज्ञानघनमें लीन हो जानेपर कोई उपाधि न रहनेके कारण लवणखण्डके समान एकरस, अनन्त, अपार, अखण्ड, प्रज्ञानघन ब्रह्म ही रह जाता है। अतः एकमात्र अद्वितीय आत्मा ही है—ऐसा जानना चाहिये।
तथा सर्वेषां गन्धानां पृथिवीविशेषाणां नासिके घ्राणविषयसामान्यम्, तथा सर्वेषां रसानाम्-अब्-विशेषाणां जिह्वेन्द्रियविषयसामान्यम्, तथा सर्वेषां रूपाणां तेजोविशेषाणां चक्षुश्चक्षुर्विषयसामान्यम्, तथा शब्दानां श्रोत्रविषयसामान्यं पूर्ववत्। तथा श्रोत्रादिविषयसामान्यानां मनोविषयसामान्ये संकल्पे; मनो-इसी प्रकार पृथिवीके विशेषरूप समस्त गन्धोंका नासिकाएँ—घ्राणसम्बन्धी विषयसामान्य, जलके विशेषरूप समस्त रसोंका रसनेन्द्रियसम्बन्धी विषयसामान्य, तेजके विशेषरूप समस्त रूपोंका चक्षु—चक्षुसम्बन्धी विषयसामान्य और पहलेहीकी तरह शब्दोंका श्रोत्रसम्बन्धी विषयसामान्य आश्रय है। इसी प्रकार श्रोत्रादि विषयसामान्योंका मनके विषयसामान्यरूप संकल्पमें, मनके विषय-

५६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
विषयसामान्यस्यापि बुद्धिविषयसामान्ये विज्ञानमात्रे; विज्ञानमात्रे भूत्वा परस्मिन्प्रज्ञानघने प्रलीयते।सामान्यका भी बुद्धिके विषय-सामान्यरूप विज्ञानमात्रमें और फिर विज्ञानमात्र होकर प्रज्ञानघन परमात्मामें लय हो जाता है।
तथा कर्मेन्द्रियाणां विषया वदनादानगमनविसर्गानन्दविशेषाः तत्तत्क्रियासामान्येष्वेव प्रविष्टा न विभागयोग्या भवन्ति, समुद्र इवाब्विशेषाः; तानि च सामान्यानि प्राणमात्रम्, प्राणश्च प्रज्ञानमात्रमेव। "यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वै प्रज्ञा स प्राणः" (कौषी० उ० ३।३) इति कौषीतकिनोऽधीयते।इसी प्रकार कर्मेन्द्रियोंके भाषण, ग्रहण, गमन, त्याग और आनन्द-रूप विशेष विषय उन-उन क्रियाओंके सामान्योंमें प्रविष्ट होकर विभागके योग्य नहीं रहते, जिस प्रकार कि समुद्रमें गये हुए जल-विशेष। वे सारे सामान्य प्राणमात्र हैं और प्राण प्रज्ञानमात्र ही हैं। कौषीतकी शाखावाले कहते हैं— "जो प्राण है वही प्रज्ञा है और जो प्रज्ञा है वही प्राण है।"
ननु सर्वत्र विषयस्यैव प्रलयोऽभिहितः, न तु करणस्य; तत्र कोऽभिप्राय इति ?शङ्का—किंतु यहाँ सर्वत्र विषयका ही लय बतलाया गया है, इन्द्रियका नहीं—सो इसमें क्या कारण है ?
बाढम्; किन्तु विषयसमानजातीयं करणं मन्यते श्रुतिः, न तु जात्यन्तरम्; विषयस्यैव स्वात्मग्राहकत्वेन संस्थानान्तरं करणं नाम—यथा रूपविशेषस्यैव संस्थानं प्रदीपः करणं सर्वरूपप्रकाशने, एवं सर्वविषयविशेषाणामेव स्वा-समाधान—ठीक है, किंतु श्रुति इन्द्रियको विषयकी सजातीय मानती है, अन्य जातिवाली नहीं। विषयका ही अपने ग्राहकरूपसे जो अन्य स्वरूप है, उसीका नाम इन्द्रिय है। जिस प्रकार रूपविशेषका ही संस्थान-मात्र दीपक सब प्रकारके रूपोंको प्रकाशित करनेमें साधन है, इसी प्रकार दीपकहीकी तरह समस्त

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे ५६५

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे ५६५


संस्कृतहिन्दी
त्मविशेषप्रकाशकत्वेन संस्थानान्तराणि करणानि प्रदीपवत् । तस्मान्न करणानां पृथक्प्रलये यत्नः कार्यः, विषयसामान्यात्मकत्वाद्विषयप्रलयेनैव प्रलयः सिद्धो भवति करणानामिति ।। ११ ।।विषयविशेषोंके स्वरूपविशेषके प्रकाशकरूपसे इन्द्रियाँ उन्हींके अन्य संस्थानमात्र हैं । इसलिये इन्द्रियोंके प्रलयके लिये पृथक् प्रयत्न करनेकी आवश्यकता नहीं है, विषयसामान्य रूप होनेके कारण विषयके प्रलयसे ही इन्द्रियोंका भी प्रलय सिद्ध हो जाता है ॥ ११ ॥

विवेकद्वारा देहादिके विज्ञानघनस्वरूप होनेमें जलमें डाले हुए लवणखण्डका दृष्टान्त

संस्कृतहिन्दी
तत्र 'इदं सर्वं यदयमात्मा' (२ । ४ । ६) इति प्रतिज्ञातम्, तत्र हेतुरभिहितः—आत्मसामान्यत्वम्, आत्मजत्वम्, आत्मप्रलयत्वं च । तस्मादुत्पत्तिस्थितिप्रलयकालेषु प्रज्ञानव्यतिरेकेणाभावात् “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐ० उ० ५ । ३) “आत्मैवेदं सर्वम्” (छा० उ० ७ । २५ । २) इति प्रतिज्ञातं यत्, तत्तर्कतः साधितम् । स्वाभाविकोऽयं प्रलय इति पौराणिका वदन्ति । यस्तु बुद्धिपूर्वकः प्रलयो ब्रह्मविदां ब्रह्मविद्यानिमित्तः, अयमात्यन्तिक इत्याचक्षते—अविद्यानिरोधद्वारेण यो भवति; तदर्थोऽयं विशेषारम्भः—तहाँ यह प्रतिज्ञा की गयी है कि 'यह जो कुछ है सब आत्मा है ।' इसमें आत्मसामान्यत्व, आत्मजनितत्व और आत्मप्रलयत्व ये हेतु बतलाये हैं । अतः उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकालोंमें प्रज्ञानसे भिन्न किसीकी सत्ता न होनेके कारण जो ऐसी प्रतिज्ञा की थी कि “प्रज्ञान ब्रह्म है” “यह सब आत्मा ही है” उसे तर्कसे भी सिद्ध कर दिया । यह प्रलय स्वाभाविक है—ऐसा पौराणिक लोग कहते हैं । ब्रह्मवेत्ताओंका जो ब्रह्मविद्याजनित बुद्धिपूर्वक प्रलय होता है, वह आत्यन्तिक है—ऐसा कहते हैं, जो कि अविद्याके निरोधद्वारा होता है; उसीके लिये यह विशेष आरम्भ किया जाता है ।

१. कार्यका कारणके आश्रित रहना—यही इसकी स्वाभाविकता है ।

५६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २

५६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २

स यथा सैन्धवखिल्य उदके प्रास्त उदकमेवानु-
विलीयेत न हास्योद्ग्रहणायेव स्यात् । यतो यतस्त्वा-
ददीत लवणमेवैवं वा अर इदं महद्भूतमनन्तमपारं
विज्ञानघन एव । एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्ये-
वानु विनश्यति न प्रेत्य संज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति
होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥

इसमें यह दृष्टान्त है—जिस प्रकार जलमें डाला हुआ नमकका डला जलमें ही लीन हो जाता है। उसे जलसे निकालनेके लिये कोई समर्थ नहीं होता। जहाँ-जहाँसे भी जल लिया जाय वह नमकीन ही जान पड़ता है, हे मैत्रेयि! उसी प्रकार यह महद्भूत अनन्त, अपार और विज्ञान-घन ही है। यह इन [ सत्यशब्दवाच्य ] भूतोंसे प्रकट होकर उन्हींके साथ नाशको प्राप्त हो जाता है; देहेन्द्रियभावसे मुक्त होनेपर इसकी कोई विशेष संज्ञा नहीं रहती। हे मैत्रेयि! ऐसा मैं तुझसे कहता हूँ—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा ॥ १२ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-व्याख्या
तत्र दृष्टान्त उपादीयते—स यथेति। सैन्धवखिल्यः—सिन्धोर्विकारः सैन्धवः, सिन्धुशब्देनोदकमभिधीयते, स्यन्दनात्सिन्धुरुदकम्, तद्विकारस्तत्र भवो वा सैन्धवः सैन्धवश्चासौ खिल्यश्चेति सैन्धवखिल्यः, खिल एव खिल्यः स्वार्थे यत्प्रत्ययः; उदके सिन्धौ स्वयोनौ प्रास्तः प्रक्षिप्तः, उदकमेवयहाँ यह दृष्टान्त दिया जाता है—'स यथा' इत्यादि। सैन्धव-खिल्य—सिन्धुके विकारका नाम सैन्धव है, 'सिन्धु' शब्दसे जल कहा जाता है। स्यन्दन करने (बहने) के कारण जल सिन्धु है, उसका विकार अथवा उससे उत्पन्न होनेवाला सैन्धव कहलाता है। जो सैन्धव हो और खिल्य (डला) हो, उसे सैन्धवखिल्य कहते हैं। खिल ही खिल्य है। यहाँ स्वार्थमें यत् प्रत्यय है। वह अपने कारणभूत सिन्धु यानी जलमें डाले जानेपर जलके साथ घुलता हुआ

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५६७

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५६७


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
विलीयमानमनुविलीयेत; यत्तद्भौमतैजससम्पर्कात्काठिन्यप्राप्तिः खिल्यस्य स्वयोनिसम्पर्कादपगच्छति तदुदकस्य विलयनम्, तदनु सैन्धवखिल्यो विलीयत इत्युच्यते। तदेतदाह उदकमेवानुविलीयेतेति।उसीमें लीन हो जाता है। पार्थिव तैजसका सम्पर्क होनेसे जो उस डलेको कठिनताकी प्राप्ति हुई थी वह अपने कारणका संयोग होनेपर निवृत्त हो जाती है, यही जलका घुलना है, उसके साथ ही नमकका डला भी घुल गया—ऐसा कहा जाता है। इसीसे यह कहा गया है कि वह जलके साथ ही लीन हो जाता है।
न ह नैव अस्य खिल्यस्योद्ग्रहणायोद्धृत्य पूर्ववद् ग्रहणाय ग्रहीतुं नैव समर्थः कश्चित्स्यात्सुनिपुणोऽपि। इवशब्दोऽनर्थकः। ग्रहणाय नैव समर्थः; कस्मात्? यतो यतो यस्माद्यस्माद्देशात्तदुदकमाददीत गृहीत्वा स्वादयेत्, लवणास्वादमेव तदुदकं न तु खिल्यभावः।इस डलेके उद्ग्रहण अर्थात् पूर्ववत् निकालकर ग्रहण करनेके लिये कोई अत्यन्त निपुण पुरुष भी समर्थ नहीं होता। यहाँ 'इव' शब्द अर्थहीन है। उसे ग्रहण करनेके लिये समर्थ हो ही नहीं सकता। क्यों नहीं हो सकता? क्योंकि जिस-जिस जगहसे वह उस जलको ग्रहण करता है अर्थात् ग्रहण करके चखता है, वह जल लवणके ही स्वादवाला होता है, उसमें डलापन नहीं रहता।
यथायं दृष्टान्तः, एवमेव वा अरे मैत्रेयीदं परमात्माख्यं महद् भूतम्—यस्मान्महतो भूतादविद्यया परिच्छिन्ना सती कार्यकारणोपाधिसम्बन्धात्खिल्यभाव-जैसा कि यह दृष्टान्त है इसी प्रकार हे मैत्रेयि! यह परमात्मा नामका महद्भूत है, जिस महद्भूतसे तू अविद्यासे परिच्छिन्न होकर देहेन्द्रियरूप उपाधिके सम्बन्धसे खिल्यभावको प्राप्त हो गयी है तथा

| ५६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |

५६८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
मापन्नासि, मर्त्या जन्ममरणाशनायापिपासादिंसंसारधर्मवत्यसि, नामरूपकार्यात्मिका—अमुष्यान्वयाहमिति, स खिल्यभावस्तव कार्यकरणभूतोपाधिसम्पर्कभ्रान्तिजनितो महति भूते स्वयोनौ महासमुद्रस्थानीये परमात्मनि अजरेऽमरेऽभये शुद्धे सैन्धवघनवदेकरसे प्रज्ञानघनेऽनन्तेऽपारे निरन्तरेऽविद्याजनितभ्रान्तिभेदवर्जिते प्रवेशितः ।<br><br>तस्मिन्प्रविष्टे स्वयोनिग्रस्ते खिल्यभावेऽविद्याकृते भेदभावे प्रणाशिते—इदमेकमद्वैतं महद्भूतम् महच्च तद् भूतं च महद्भूतं सर्वमहत्तरत्वादाकाशादिकारणत्वाच्च ।<br><br>भूतं त्रिष्वपि कालेषु स्वरूपाव्यभिचारात्सर्वदैव परिनिष्पन्नमिति त्रैकालिको निष्ठाप्रत्ययः ।<br><br>अथवा भूतशब्दः परमार्थवाची, महच्च पारमार्थिकंमरणधर्मवाली, जन्म, मरण, क्षुधा और पिपासा आदि सांसारिक धर्मोंवाली एवं मैं नामरूपकार्यात्मिका और अमुक वंशमें उत्पन्न हुई हूँ—ऐसे भाववाली हो गयी है। देहेन्द्रियजनित उपाधिके सम्पर्कसे भ्रान्तिके कारण उत्पन्न हुआ तेरा वह खिल्यभाव अपने कारण महासमुद्रस्थानीय अजर, अमर, अभय, शुद्ध, सैन्धवघनके समान एकरस, प्रज्ञानघन, अनन्त, अपार, अखण्ड एवं अविद्याजनित भ्रान्तिमय भेदसे रहित परमात्मामें प्रविष्ट कर दिया गया है।<br><br>उसमें प्रविष्ट होनेपर उस खिल्यभावके अपने कारणद्वारा लीन कर लिये जानेपर अविद्याजनित भेदभावका नाश हो जानेसे यह एक अद्वैत महद्भूत ही रहता है। महान् भूत होनेसे वह महद्भूत कहलाता है; क्योंकि आकाशादिका कारण होनेसे वह सबसे महान् है। तीनों ही कालोंमें उसके स्वरूपका व्यभिचार नहीं होता, वह सर्वदा ही ज्यों-का-त्यों रहता है, इसलिये भूत है। 'भूत' शब्दमें 'त' यह निष्ठाप्रत्यय त्रैकालिक है।<br><br>अथवा 'भूत' शब्द परमार्थवाची है। अर्थात् वह महत् है और

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५६९

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५६९


संस्कृत-भाष्यम्भाष्यार्थ
चेत्यर्थः; लौकिकं तु यद्यपि महद्भवति, स्वप्नमायाकृतं हिमवदादिपर्वतोपमं न परमार्थवस्तु; अतो विशिनष्टि—इदं तु महच्च तद्भूतं चेति। अनन्तं नास्यान्तो विद्यत इत्यनन्तम्; कदाचिदापेक्षिकं स्यादित्यतो विशिनष्ट्यपारमिति विज्ञप्तिर्विज्ञानम्, विज्ञानं च तद्घनश्चेति विज्ञानघनः, घनशब्दो जात्यन्तरप्रतिषेधार्थः—यथा सुवर्णघनोऽयोघन इति; एवशब्दोऽवधारणार्थः—नान्यज्जात्यन्तरमन्तराले विद्यत इत्यर्थः।पारमार्थिक है; [ इसलिये महद्भूत है ]। यद्यपि हिमालयादि पर्वतोंके समान लौकिक वस्तु भी महान् होती है; किंतु वह स्वप्न या मायाके समान है, परमार्थवस्तु नहीं। इसीसे श्रुति इसे विशेषित करती है कि यह महत् है और भूत भी है। अनन्त अर्थात् इसका अन्त नहीं है, इसलिये अनन्त है। कदाचित् इसकी अनन्तता आपेक्षिक हो, इसलिये ‘अपारम्’ ऐसा विशेषण देती है। विज्ञप्तिका नाम विज्ञान है, जो विज्ञान हो और घन हो उसे विज्ञानघन कहते हैं। यहाँ घनशब्द [विज्ञानमें] अन्य जातिकी वस्तुका निषेध करनेके लिये है; जैसे कि सुवर्णघन, लोहघन आदि। ‘एव’ शब्द निश्चयार्थक है। तात्पर्य यह है कि इसके भीतर कोई दूसरी विजातीय वस्तु नहीं है।
यदीदमेकमद्वैतं परमार्थतः स्वच्छं संसारदुःखासम्पृक्तम्, किन्निमित्तोऽयं खिल्यभाव आत्मनो जातो मृतः सुखी दुःख्यहं ममेत्येवमादिलक्षणोऽनेक संसारधर्मोपद्रुतः ? इत्युच्यते—यदि यह आत्मतत्त्व एक, अद्वैत, परमार्थतः शुद्ध और सांसारिक दुःखोंसे असंस्पृष्ट है तो आत्माका यह खिल्यभाव क्यों है तथा यह मैं उत्पन्न हुआ, मरा, सुखी, दुःखी, अहं, मम इत्यादि लक्षणोंवाले अनेकों सांसारिक धर्मोंसे दूषित क्यों है ? इसपर कहा जाता है—

५७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

५७०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
एतेभ्यो भूतेभ्यो यान्येतानि कार्यकारणविषयाकारपरिणतानि नामरूपात्मकानि सलिलफेनबुद्बुदोपमानि स्वच्छस्य परमात्मनः सलिलोपमस्य, येषां विषयपर्यन्तानां प्रज्ञानघने ब्रह्मणि परमार्थविवेकज्ञानेन प्रविलापनमुक्तं नदीसमुद्रवत्—एतेभ्यो हेतुभूतेभ्यो भूतेभ्यः सत्यशब्दवाच्येभ्यः समुत्थाय सैन्धवखिल्यवत्—यथा अद्भ्यः सूर्यचन्द्रादिप्रतिबिम्बः, यथा वा स्वच्छस्य स्फटिकस्य अलक्तकाद्युपाधिभ्यो रक्तादिभावः, एवं कार्यकारणभूतभूतोपाधिभ्यो विशेषात्मखिल्यभावेन समुत्थाय सम्यगुत्थाय—येभ्यो भूतेभ्य उत्थितः तानि यदा कार्यकारणविषयाकारपरिणतानि भूतान्यात्मनो विशेषात्मखिल्यहेतुभूतानि शास्त्राचार्योपदेशेन ब्रह्मविद्यया नदीसमुद्रवत्प्रविलापितानि विनश्यन्ति, सलिलफेनबुद्बुदादिवत्तेषु विनश्यत्सु अन्वेवैष विशेषात्मखिल्यभावोइन भूतोंसे—ये जो देह और इन्द्रियरूप विषयके आकारमें परिणत जलके फेन और बुद्बुदोंके समान जलस्थानीय स्वच्छ परमात्माके नामरूपमय विकार हैं; जिनके सम्पूर्ण विषयोंतकका, समुद्रमें नदीके समान, पारमार्थिक विवेकज्ञानसे प्रज्ञानघन ब्रह्ममें लय होना बतलाया गया है, इन सबके हेतुभूत सत्य शब्दवाच्य भूतोंसे लवणखण्डके समान उत्पन्न होकर—जिस प्रकार जलसे सूर्य-चन्द्रादिका प्रतिबिम्ब अथवा जैसे अलक्तक (महावर) आदि उपाधियोंके कारण स्वच्छ स्फटिकका रक्तादि भाव हो जाता है, इसी प्रकार देहेन्द्रियरूप भूतोंकी उपाधियोंके कारण विशेषात्मरूप खिल्यभावसे समुत्थित अर्थात् सम्यक् प्रकारसे उत्पन्न होकर जिन भूतोंसे यह उत्पन्न हुआ है, वे देह और इन्द्रियोंके आकारमें परिणत एवं आत्माके खिल्यभावरूप विशेषत्वके हेतुभूत भूत जिस समय शास्त्र और आचार्यके ब्रह्मविद्याके उपदेशसे समुद्रमें नदीके समान लीन होते हुए नाशको प्राप्त होते हैं, जलमें फेन और बुद्बुदोंके समान उनके नाश होनेके साथ ही यह विशेषात्मरूप खिल्यभाव भी नष्ट हो जाता है।

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७१

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७१


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
विनश्यति; यथा उदकालक्तकादिहेत्वपनये सूर्यचन्द्रस्फटिकादिप्रतिबिम्बो विनश्यति, चन्द्रादिस्वरूपमेव परमार्थतो व्यवतिष्ठते, तद्वत्प्रज्ञानघनमनन्तमपारं स्वच्छं व्यवतिष्ठते।जिस प्रकार जल और अलक्तक आदि हेतुओंके हट जानेपर सूर्य, चन्द्र और स्फटिक आदिका प्रतिबिम्ब नष्ट हो जाता है, केवल चन्द्रादिका पारमार्थिक स्वरूप ही रह जाता है उसी प्रकार फिर अनन्त, अपार और स्वच्छ प्रज्ञानघन ही रह जाता है।
न तत्र प्रेत्य विशेषसंज्ञास्ति कार्यकारणसङ्घातेभ्यो विमुक्तस्य—इत्येवमरे मैत्रेयि ब्रवीमि नास्ति विशेषसंज्ञेति—अहमसावमुष्य पुत्रो ममेदं क्षेत्रं धनं सुखी दुःखीत्येवमादिलक्षणा, अविद्याकृतत्वात्तस्याः, अविद्यायाश्च ब्रह्मविद्यया निरन्वयतो नाशितत्वात्कुतो विशेषसंज्ञासम्भवो ब्रह्मविदश्चैतन्यस्वभावावस्थितस्य? शरीरावस्थितस्यापि विशेषसंज्ञा नोपपद्यते किमुत कार्यकारणविमुक्तस्य सर्वतः? इति होवाचोक्तवान्किल परमार्थदर्शनं मैत्रेय्यै भार्यायै याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥फिर प्रेत्य—देहेन्द्रियभावसे मुक्त होनेपर उसकी विशेष संज्ञा नहीं रहती, इसीसे हे मैत्रेयि! मैं यह कहता हूँ कि उसकी 'मैं अमुक हूँ, अमुकका पुत्र हूँ, यह क्षेत्र और धन मेरा है, मैं सुखी हूँ, दुःखी हूँ' इत्यादि प्रकारकी विशेष संज्ञा नहीं रहती; क्योंकि वह तो अविद्याजनित ही है, और अविद्याका उसके कारणके सहित ब्रह्मविद्यासे नाश हो चुका है, इसलिये चैतन्यस्वरूप ब्रह्मवेत्ताकी विशेषसंज्ञा रहनेकी सम्भावना कहाँ है? उसकी तो शरीरमें रहते हुए भी कोई संज्ञा होनी सम्भव नहीं है, फिर सब प्रकार देह और इन्द्रियोंसे मुक्त होनेपर तो रह ही कैसे सकती है? इस प्रकार याज्ञवल्क्यने अपनी भार्या मैत्रेयीके प्रति परमार्थदृष्टिका निरूपण किया ॥ १२ ॥

५७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

मैत्रेयीकी शङ्का और याज्ञवल्क्यका समाधान

एवं प्रतिबोधिता—इस प्रकार बोध कराये जानेपर—

सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवानमूमुहन्न प्रेत्य संज्ञास्तीति स होवाच न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यलं वा अर इदं विज्ञानाय ॥ १३ ॥

उस मैत्रेयीने कहा, 'शरीरपातके अनन्तर कोई संज्ञा नहीं रहती—ऐसा कहकर ही श्रीमान्ने मुझे मोहमें डाल दिया है।' याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे मैत्रेयि ! मैं मोहका उपदेश नहीं कर रहा हूँ, अरी ! यह तो उस (महद्भूत) का विज्ञान करानेके लिये पर्याप्त है' ॥ १३ ॥

सा ह किलोवाचोक्तवती मैत्रेयी—अत्रैव एतस्मिन्नेव एकस्मिन्वस्तुनि ब्रह्मणि विरुद्धधर्मवत्त्वमाचक्षाणेन भगवता मम मोहः कृतः; तदाह—अत्रैव मा भगवान्पूजावानमूमुहन्मोहं कृतवान्। कथं तेन विरुद्धधर्मवत्त्वम् उक्तमित्युच्यते—पूर्वं विज्ञानघन एवेति प्रतिज्ञाय पुनर्न प्रेत्य संज्ञास्तीति; कथं विज्ञानघन एव ? कथं वा न प्रेत्य संज्ञा-उस मैत्रेयीने कहा, यही—इस एक वस्तु ब्रह्ममें ही विरुद्ध धर्मवत्ताका वर्णन करनेवाले श्रीमान्ने तो मुझे मोह उत्पन्न कर दिया है। इसी बातको श्रुति कहती है—इस (ब्रह्मके) विषयमें ही मुझे आप भगवान्—पूजावान् अर्थात् पूज्य पुरुषने अमूमुहत्—मोह उत्पन्न कर दिया। उन्होंने ब्रह्मकी विरुद्धधर्मवत्ताका किस प्रकार वर्णन किया है—सो बतलाया जाता है—पहले 'वह विज्ञानघन ही है' ऐसी प्रतिज्ञा करके फिर 'देहपातके अनन्तर कोई संज्ञा नहीं रहती' ऐसा कहा है। सो किस प्रकार वह विज्ञानघन ही है और किस प्रकार देहपातके अनन्तर उसकी कोई संज्ञा नहीं रहती ? एक

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७३

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७३


संस्कृत-मूल / भाष्यहिन्दी-अनुवाद
स्त्वतीति ? न ह्युष्णः शीतश्चाग्नि-रेवैको भवति। अतो मूढास्म्यत्र।ही अग्नि उष्ण और शीतल दोनों प्रकारका नहीं हो सकता; अतः इस विषयमें मुझे मोह (भ्रम) हो गया है।
स होवाच याज्ञवल्क्यः—न वा अरे मैत्रेयहं मोहं ब्रवीमि—मोहनं वाक्यं न ब्रवीमीत्यर्थः। ननु कथं विरुद्धधर्मत्वमवोचः—विज्ञानघनं संज्ञाभावं च ? न मयेदमेकस्मिन्धर्मिण्यभिहितम्, त्वयैवेदं विरुद्धधर्मत्वेनैकं वस्तु परिगृहीतं भ्रान्त्या, न तु मयोक्तम्। मया त्विदमुक्तम्—यस्त्वविद्याप्रत्युपस्थापितः कार्यकारणसम्बन्धी आत्मनः खिल्यभावः, तस्मिन्विद्यया नाशिते, तन्निमित्ता या विशेषसंज्ञा शरीरादिसम्बन्धिनी अन्यत्वदर्शनलक्षणा, सा कार्यकारणसङ्घातोपाधौ प्रविलापिते नश्यति हेत्वभावाद् उदकाधारनाशादिव चन्द्रादिप्रतिबिम्ब-उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे मैत्रेयि ! मैं मोहका उपदेश नहीं कर रहा हूँ अर्थात् मोह उत्पन्न करनेवाली बात नहीं कह रहा हूँ।' [मैत्रेयी बोली] तो फिर 'वह विज्ञानघन है और उसकी कोई संज्ञा नहीं है, ये आपने उसके दो विरुद्ध धर्म क्यों बतलाये ? [याज्ञवल्क्यने कहा—] मैंने ये धर्म एक ही धर्मीमें नहीं बतलाये हैं; भ्रान्तिसे तूने ही एक वस्तुको विरुद्ध धर्मवाली समझ लिया है, मैंने ऐसा नहीं कहा। मैंने तो ऐसा कहा था कि आत्माका जो अविद्याद्वारा प्रस्तुत किया हुआ देहेन्द्रियसम्बन्धी खिल्यभाव है, उसका विद्याद्वारा नाश कर दिये जानेपर उस खिल्यभावके कारण पड़ी हुई जो शरीरादिसम्बन्धिनी अन्यत्वदर्शनरूपा विशेष संज्ञा होती है, वह कार्यकारणसंघातरूप उपाधिके लीन कर देनेपर कोई हेतु न रहनेके कारण इसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जिस प्रकार जलादि आधारका नाश हो जानेपर चन्द्रादिका प्रतिबिम्ब और