बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
५९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
इदँ सत्यँ सर्वेषां भूतानां मध्वस्य सत्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् सत्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मँ सात्यस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ १२ ॥
यह सत्य समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस सत्यके मधु हैं। यह जो इस सत्यमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म सत्यसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ १२ ॥
| तथा दृष्टेनानुष्ठीयमानेन आचाररूपेण सत्याख्यो भवति स एव धर्मः। सोऽपि द्विप्रकार एव सामान्यविशेषात्मरूपेण। सामान्यरूपः पृथिव्यादिसमवेतः, विशेषरूपः कार्यकारणसङ्घातसमवेतः। तत्र पृथिव्यादिसमवेते वर्तमानक्रियारूपे सत्ये, तथाध्यात्मं कार्यकारणसङ्घातसमवेते सत्ये भवः सात्यः—"सत्येन वायुरावाति" (महाना० २२।१) इति श्रुत्यन्तरात् ॥ १२ ॥ | इसी प्रकार वही धर्म दृष्ट-अनुष्ठीयमान यानी आचाररूपसे सत्य संज्ञावाला होता है। वह भी सामान्य और विशेषरूपसे दो प्रकारका ही है। सामान्यरूप पृथिवी आदिसे सम्बन्ध रखनेवाला है और विशेषरूप देहेन्द्रियसंधातसे सम्बद्ध है। तहाँ पृथिवी आदिसे सम्बद्ध वर्तमान क्रियारूप सत्यमें तथा अध्यात्म यानी देहेन्द्रियसंधातसे सम्बद्ध सत्यमें जो होनेवाला है, उसे सात्य कहते हैं; यह बात "सत्यसे वायु चलता है" इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होती है ॥ १२ ॥ |
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| धर्मसत्याभ्यां प्रयुक्तोऽयं कार्यकारणसङ्घातविशेषः, स येन जातिविशेषेण संयुक्तो भवति, स | यह देहेन्द्रियसंधातविशेष धर्म और सत्यद्वारा प्रेरित है, यह जिस जातिविशेषसे संयुक्त होता है, वह |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९३
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९३
| जातिविशेषो मानुषादिः। तत्र मानुषादिजातिविशिष्टा एव सर्वे प्राणिनिकायाः परस्परोपकार्योपकारकभावेन वर्तमाना दृश्यन्ते। अतः— | जातिविशेष मनुष्य आदि है। तहाँ सम्पूर्ण जीवसमुदाय मनुष्यादि जातिविशिष्ट होकर ही परस्पर उपकार्योपकारकभावसे विद्यमान दिखायी देते हैं। अतः— |
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इदं मानुषँ सर्व्वेषां भूतानां मध्वस्य मानुषस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् मानुषे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्व्वम् ॥ १३ ॥
यह मनुष्यजाति समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस मनुष्यजातिके मधु हैं। यह जो इस मनुष्यजातिमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म मानुष तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [इस श्रुतिद्वारा बतलाया गया है]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ १३ ॥
| मानुषादिजातिरपि सर्वेषां भूतानां मधु। तत्र मानुषादिजातिरपि बाह्या आध्यात्मिकी चेत्युभयथा निर्देशभाग्भवति। १३। | मनुष्यादि जाति भी समस्त भूतोंका मधु है। वह मनुष्यजाति भी बाह्य और आध्यात्मिक भेदसे दो तरहके निर्देशवाली है ॥ १३ ॥ |
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| यस्तु कार्यकारणसङ्घातो मानुषादिजातिविशिष्टः सः— | जो भी मनुष्यादि जातिविशिष्ट देहेन्द्रियसंधात है वह— |
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अयमात्मा सर्वेषां भूतानां मध्वस्यात्मनः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः
बृ० उ० ३८—
५९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ५९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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पुरुषो यश्चायमात्मा तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव
स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ १४ ॥
यह आत्मा(देह) समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आत्माके मधु हैं। यह जो इस आत्मामें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह आत्मा तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [इस वाक्यसे कहा गया है]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ १४ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| अयमात्मा सर्वेषां भूतानां मधु। | यह आत्मा (देह) समस्त भूतोंका मधु है। |
| नन्वयं शारीरशब्देन निर्दिष्टः पृथिवीपर्याय एव । | **शङ्का—**किंतु यह तो 'शारीर' शब्दसे बतलाया हुआ पृथिवीका पर्याय ही है।^१ |
| न; पार्थिवांशस्यैव तत्र ग्रहणात्। इह तु सर्वात्मा प्रत्यस्तमिताध्यात्मधिभूताधिदैवादिसर्वविशेषः सर्वभूतदेवतागणविशिष्टः कार्यकरणसङ्घातः सः 'अयमात्मा' इत्युच्यते । तस्मिन्नस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽमूर्तरसः सर्वात्मको निर्दिश्यते ।<br><br>एकदेशेन तु पृथिव्यादिषु निर्दिष्टः, अत्राध्यात्मविशेषाभावात् स न निर्दिश्यते । | **समाधान—**नहीं, क्योंकि वहाँ तो केवल पार्थिव अंशका ही ग्रहण किया गया है; किंतु यहाँ जो सर्वात्मा है, जिसमें अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवादि सब प्रकारके विशेषका अभाव है, जो समस्त भूत और देवगणसे विशिष्ट है तथा भूत और इन्द्रियोंका संघात है, वही यहाँ 'यह आत्मा' ऐसा कहा गया है। उस इस आत्मामें तेजोमय अमृतमय पुरुष सर्वात्मक अमूर्तरस ही बताया गया है। पृथिवी आदिमें तो अध्यात्मपुरुषका एकदेशरूपसे निर्देश किया है, किंतु यहाँ कोई अध्यात्मविशेष न होनेके कारण उसका निर्देश नहीं |
१. अतः इसका पुनः उल्लेख करनेसे पुनरुक्ति दोष आता है !
ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५९५
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५९५ |
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| यस्तु परिशिष्टो विज्ञानमयः—<br><br>यदर्थोऽयं देहलिङ्गसङ्घात आत्मा—<br><br>सः ‘यश्चायमात्मा’ इत्युच्यते ॥ १४ ॥ | किया गया। इससे भिन्न जो विज्ञानमय पुरुष रह जाता है, जिसके लिये कि यह देहेन्द्रियसंधात-रूप आत्मा है, वही ‘जो यह आत्मा है’ ऐसा कहकर बतलाया गया है ॥ १४ ॥ |
आत्माका सर्वाधिपतित्व और सर्वाश्रयत्वनिरूपण
स वा अयमात्मा सर्वेषां भूतानामधिपतिः सर्वेषां भूताना ँ राजा तद्यथा रथनाभौ च रथनेमौ चाराः सर्वे समर्पिता एवमेवास्मिन्नात्मनि सर्वाणि भूतानि सर्वे देवाः सर्वे लोकाः सर्वे प्राणाः सर्व एत आत्मानः समर्पिताः ॥ १५ ॥
वह यह आत्मा समस्त भूतोंका अधिपति एवं समस्त भूतोंका राजा है। इस विषयमें दृष्टान्त—जिस प्रकार रथकी नाभि और रथकी नेमिमें सारे अरे समर्पित रहते हैं, इसी प्रकार इस आत्मामें समस्त भूत, समस्त देव, समस्त लोक, समस्त प्राण और ये सभी आत्मा समर्पित हैं ॥ १५ ॥
| यस्मिन्नात्मनि परिशिष्टो विज्ञा-<br>नमयोऽन्त्ये पर्याये प्रवेशितः,<br>सोऽयमात्मा। तस्मिन्नविद्याकृत-<br>कार्यकरणसङ्घातोपाधिविशिष्टे ब्रह्म-<br>विद्यया परमात्मनि प्रवेशिते,<br>स एवमुक्तोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः<br>प्रज्ञानघनभूतः सर्वेषां भूतानाम- | जिसका पहलेके पर्यायोंमें उप-<br>देश नहीं हुआ, उस अवशिष्ट विज्ञान-<br>मयका अन्तिम पर्यायमें जिस<br>आत्मामें प्रवेश कराया गया है,<br>वह यहाँ ‘यह आत्मा’ इस प्रकार<br>कहा गया है। अविद्याकृत देहेन्द्रिय-<br>संघातरूप उपाधिसे युक्त जीवका<br>ब्रह्मविद्याके द्वारा उस परमार्थ<br>आत्मामें प्रवेश कराये जानेपर वह<br>इस प्रकार कहा हुआ आत्मा अर्थात्<br>आत्मभावको प्राप्त हुआ विद्वान्<br>अन्तर-बाह्यशून्य, पूर्ण और प्रज्ञान-<br>घनभूत है; यह समस्त भूतोंका आत्मा |
५९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ५९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| यमात्मा सर्वैरूपास्यः सर्वेषां भूतानामधिपतिः सर्वभूतानां स्वतन्त्रो न कुमारामात्यवत्, किं तर्हि ? सर्वेषां भूतानां राजा । राजत्वविशेषणमधिपतिरिति; भवति कश्चिद्राजोचितवृत्तिमाश्रित्य राजा, न त्वधिपतिः, अतो विशिनष्ट्यधिपतिरिति । एवं सर्वभूतात्मा विद्वान् ब्रह्मविन्मुक्तो भवति । | है, सबके द्वारा उपास्य है, सब भूतोंका अधिपति है और समस्त भूतोंमें स्वतन्त्र है, सो भी कुमार या मन्त्रीके समान नहीं, तो किस प्रकार ? समस्त भूतोंका राजा है। 'अधिपति' यह राजत्वका विशेषण है; कोई पुरुष राजोचितवृत्तिका आश्रय लेकर राजा तो हो जाता है, किंतु अधिपति नहीं होता' इसलिये उसका 'अधिपति' यह विशेषण देते हैं। ऐसा सर्वभूतात्मा ब्रह्मवेत्ता विद्वान् मुक्त हो जाता है । | | यदुक्तं 'ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते किमु तद्ब्रह्मावेद्यस्मात्तत्सर्वमभवत्' (१।४।९) इतीदं तद् व्याख्यातम् । एवमात्मानमेव सर्वात्मत्वेन आचार्यागमाभ्यां श्रुत्वा, मत्वा तर्कतो विज्ञाय साक्षादेवं यथा मधुब्राह्मणे दर्शितं तथा, तस्माद्ब्रह्मविज्ञानादेवंलक्षणात्, पूर्वमपि ब्रह्मैव सदविद्यया अब्रह्मासीत्, सर्वमेव च सदसर्वमासीत्, तां त्वविद्यामस्माद्विज्ञानात्तिरस्कृत्य | [ श्रुतिमें ] पहले जो यह कहा है कि 'ब्रह्मविद्यासे हम सर्वरूप हो जायेंगे-ऐसा मनुष्य मानते हैं, सो उस ब्रह्मने क्या जाना जिससे वह सर्वरूप हो गया' उसीकी यह व्याख्या की गयी है । इस प्रकार गुरु और शास्त्रसे आत्माको ही सर्वात्मभावसे सुनकर, तर्कद्वारा मनन कर तथा जिस प्रकार मधुब्राह्मणमें दिखाया गया है, उस प्रकार उक्त लक्षणवाले उस ब्रह्मविज्ञानसे ही साक्षात् जानकर, जो पहले भी ब्रह्म होते हुए ही अविद्यावश अब्रह्म बना हुआ था, एवं सर्वरूप होते हुए ही असर्व था, अब इस ज्ञानके द्वारा उस अविद्या- |
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ५९७
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ५९७
| संस्कृत | हिन्दी |
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| ब्रह्मविद्ब्रह्मैव सन्ब्रह्माभवत्, सर्वः स सर्वमभवत् । | को नष्ट कर वह ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म होते हुए ही ब्रह्म और सर्वरूप होते हुए ही सर्व हो गया है। |
| परिसमाप्तः शास्त्रार्थो यदर्थः प्रस्तुततः । तस्मिन्नेतस्मिन् सर्वात्मभूते ब्रह्मविदि सर्वात्मनि सर्वं जगत् समर्पितमित्येतस्मिन्नर्थ दृष्टान्त उपादीयते—तद्यथा रथनाभौ च रथनेमौ चाराः सर्वे समर्पिता इति प्रसिद्धोऽर्थः, एवमेवास्मिन्नात्मनि परमात्मभूते ब्रह्मविदि सर्वाणि भूतानि ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानि, सर्वे देवा अग्न्यादयः, सर्वे लोका भूरादयः, सर्वे प्राणा वागादयः, सर्व एत आत्मानो जलचन्द्रवत् प्रतिशरीरानुप्रवेशिनोऽविद्याकल्पिताः, सर्वं जगदस्मिन् समर्पितम् । | जिसके लिये यह प्रकरण आरम्भ किया गया था वह शास्त्रका तात्पर्य समाप्त हो गया । उस इस सबके आत्मभूत सर्वात्म ब्रह्मवेत्तामें सारा जगत् समर्पित है, इस अर्थमें यह दृष्टान्त दिया जाता है—जिस प्रकार यह बात प्रसिद्ध है कि रथकी नाभि और रथकी नेमिमें सारे अरे समर्पित हैं, उसी प्रकार इस परमात्मभूत ब्रह्मवेत्ता आत्मामें ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त भूत, अग्नि आदि समस्त देव, भूर्लोक आदि समस्त लोक, वाक् आदि समस्त प्राण तथा जलमें प्रतिबिम्बित चन्द्रके समान प्रत्येक शरीरमें प्रवेश करनेवाले ये अविद्याकल्पित समस्त आत्मा समर्पित हैं। अभिप्राय यह है कि सारा जगत् इसीमें समर्पित है। |
| (ब्रह्मविदः सर्वात्मोपपादनम्)<br>यदुक्तं ब्रह्मविद्वामदेवः प्रतिपेदे—'अहं मनुरभवं सूर्यश्च' (१।४।१०) इति, स एष सर्वात्मभावो व्याख्यातः। स एष विद्वान् ब्रह्मवित् सर्वोपाधिः सर्वात्मा सर्वो | पहले जो श्रुतिने कहा था कि ब्रह्मवेत्ता वामदेवने जाना 'मैं मनु हुआ और सूर्य भी' वहाँ कहे हुए इस सर्वात्मभावकी यह व्याख्या हुई है। वह यह विद्वान् ब्रह्मवेत्ता सर्वोपाधि, सर्वात्मा और सर्वरूप हो जाता है। |
५९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ५९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| भवति। निरुपाधिर्निरुपाख्यः अनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघनोऽजोऽजरोऽमृतोऽभयोऽचलो नेति नेत्यस्थूलोऽणुरित्येवंविशेषणो भवति। | तथा उपाधिशून्य, संज्ञाशून्य, अन्तर-बाह्यशून्य, पूर्ण, प्रज्ञानघन, अजन्मा, अजर, अमर, अभय, अचल, नेति-नेति तथा अस्थूल और असूक्ष्म इत्यादि विशेषणोंवाला हो जाता है। | | तमेतमर्थमजानन्तस्तार्किकाः केचित् पण्डितम्मन्याश्चागमविदः शास्त्रार्थं विरुद्धं मन्यमाना विकल्पयन्तो मोहमगाधमुपयान्ति। तमेतमर्थमेतौ मन्त्रावनुवदतः— “अनेजदेकं मनसो जवीयः”^१ (ई० उ० ४) “तदेजति तन्नैजति”^२ (ई० उ० ५) इति। तथा च तैत्तिरीयके— “यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चित्” (तै० आर० १०। १०। २०) “एतत्साम गायन्नास्ते” (तै० उ० ३। १०। ५) “अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्” (तै० उ० ३। १०। ६) इत्यादि। तथा च छान्दोग्ये “जक्षत् क्रीडन्रममाणः” (८। १२। ३) “स यदि पितृलोककामः” (८। २। १) “सर्वगन्धः सर्वरसः” (३। | किंतु इस अर्थको न जाननेवाले कुछ तार्किक और अपनेको पण्डित माननेवाले लोग शास्त्रके तात्पर्यको इससे विपरीत मानकर विविध प्रकारकी कल्पना करते हुए अगाध मोहको प्राप्त होते हैं। उस इस अर्थका “अनेजदेकं मनसो जवीयः”^१ तथा “तदेजति तन्नैजति”^२ ये दो मन्त्र अनुवाद करते हैं। तथा तैत्तिरीय-श्रुतिमें भी कहा है— “जिससे पर और अपर कुछ भी नहीं है”, तथा “ब्रह्मवेत्ता यह सामगान करता रहता है—” “मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ—” इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद्में कहा है— “हँसता, खेलता और रमण करता हुआ [अपने शरीरकी सुधि न रखते हुए विचरता है]”, “वह यदि पितृलोककी कामना करनेवाला होता है [तो उसके संकल्पसे ही पितर वहाँ उपस्थित हो जाते हैं]”, “सर्वगन्ध, सर्वरस” इत्यादि। आथर्वण |
१. वह आत्मतत्त्व अपने स्वरूपसे विचलित न होनेवाला एक और मनसे भी अधिक वेगवान् है।
२. वह चलता है और नहीं भी चलता।
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९९
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९९
| १४।२) इत्यादि। आथर्वणे च “सर्वज्ञः सर्ववित्” (मु० उ० १।१।९) “दूरात् सुदूरे तदिहान्तिके च” (मु० उ० ३।१।७)। कठवल्लीष्वपि “अणोरणीयान् महतो महीयान्” (१।२।२०) “कस्तं मदामदं देवम्” (१।२।२१) “तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्” (ई० उ० ४) इति च। तथा गीतासु “अहं क्रतुरहं यज्ञः” (९।१६) “पिताहमस्य जगतः” (९।१७) “नादत्ते कस्यचित् पापम्” (५।१५) “समं सर्वेषु भूतेषु” (१३।२७) “अविभक्तं विभक्तेषु” (१८।२०) “ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च” (१३।१६) इत्येवमाद्यागमार्थं विरुद्धमिव प्रतिभान्तं मन्यमानाः स्वचित्तसामर्थ्यादर्थनिर्णयाय विकल्पयन्तः, अस्त्यात्मा नास्त्यात्मा कर्ताकर्ता मुक्तो बद्धः क्षणिको विज्ञानमात्रं शून्यं चेत्येवं विकल्पयन्तो न पारमधिगच्छन्त्य- | (मुण्डक) उपनिषद्में कहा है—“वह सर्वज्ञ, सर्ववित् है”, “वह दूरसे भी दूर और यहाँ समीपमें भी है।” कठवल्लियोंमें भी कहा है—“वह अणुसे भी अणु और महान्से भी महान् आत्मा…”, “उस हर्षसहित और हर्षरहित देवको।” [ईशोपनिषद्में कहा है—] वह स्वयं स्थिर रहकर ही अन्य सब दौड़नेवालोंसे आगे पहुँचा रहता है।” तथा गीतामें भी कहा है—“मैं क्रतु हूँ, मैं यज्ञ हूँ”, “मैं इस जगत्का पिता हूँ”, “वह किसीके पाप [और पुण्य] को ग्रहण नहीं करता” “जो समस्त भूतोंमें परमेश्वरको समभावसे स्थित (देखता है)”, “पृथक्-पृथक् भूतोंमें अखण्ड रूपसे स्थित” “वह सबका संहार करनेवाला तथा सबको उत्पन्न करनेवाला है-ऐसा जानना चाहिये” इत्यादि प्रकारके शास्त्राभिप्रायको विरुद्ध-सा भासनेवाला मानकर अपने चित्तके सामर्थ्यसे अर्थ-निर्णय करनेके लिये तरह-तरहकी कल्पना करते हुए तथा ‘आत्मा है, आत्मा नहीं है, वह कर्ता है, वह अकर्ता है, मुक्त है, बद्ध है, क्षणिक विज्ञानमात्र है, शून्य है’ इत्यादि विकल्प करते हुए अविद्याका पार नहीं पाते; क्योंकि |
६०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ६०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| विद्यायाः, विरुद्धधर्मदर्शित्वात् सर्वत्र।<br><br>तस्मात्तत्र य एव श्रुत्याचार्यदर्शितमार्गानुसारिणः, त एवाविद्यायाः पारमधिगच्छन्ति। त एव चास्मान्मोहसमुद्रादगाधादुत्तरिष्यन्ति, नेतरे स्वबुद्धिकौशलानुसारिणः ॥ १५ ॥ | उन्हें सर्वत्र विरुद्ध धर्म ही दिखायी देता है।<br><br>अतः उनमें जो श्रुति और आचार्यके दिखाये हुए मार्गका अनुसरण करनेवाले हैं, वे ही अविद्याका पार पाते हैं और वे ही इस अगाध मोहसमुद्रसे तर जायंगे, दूसरे लोग, जो अपने बुद्धिकौशलका अनुसरण करनेवाले हैं, उसे नहीं तर सकेंगे ॥ १५ ॥ |
दध्यङ्ङाथर्वणद्वारा अश्विनीकुमारोंको मधुविद्याके उपदेशकी आख्यायिका
| [ब्रह्मविद्यास्तुति-लिङ्गानामुपन्यासः]<br>परिसमाप्ता ब्रह्मविद्यामृतत्वसाधनभूता, यां मैत्रेयी पृष्टवती भर्तारम् ‘यदेव भगवानमृतत्वसाधनं वेद तदेव मे ब्रूहि’ इति। एतस्या ब्रह्मविद्यायाः स्तुत्यर्थेयमाख्यायिका आनीता। तस्या आख्यायिकायाः सङ्क्षेपतोऽर्थप्रकाशनाथैवेतौ मन्त्रौ भवतः। एवं हि मन्त्रब्राह्मणाभ्यां स्तुतत्वात् अमृतत्वसर्वप्राप्तिसाधनत्वं ब्रह्मविद्यायाः प्रकटीकृतं राजमार्ग- | जिसके विषयमें मैत्रेयीने अपने पतिसे पूछा था कि ‘श्रीमान् जो भी अमृतत्वका साधन जानते हों, वही मेरे प्रति कहिये,’ वह अमृतत्वकी साधनभूता ब्रह्मविद्या तो समाप्त हो गयी। इस ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके लिये यह (आगे कही जानेवाली) आख्यायिका प्रस्तुत की जाती है। उस आख्यायिकाके तात्पर्यको संक्षेपसे प्रकाशित करनेके लिये ये दो मन्त्र हैं। इसी प्रकार मन्त्र और ब्राह्मण दोनोंके द्वारा स्तुत होनेके कारण ब्रह्मविद्याका अमृतत्व एवं सर्वप्राप्तिका साधनत्व प्रकट किया गया है तथा उसे राजमार्गको प्राप्त कराया गया |
ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६०१
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६०१ |
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| मुपनीतं भवति—यथादित्य उद्यञ्छार्वरं तमोऽपनयतीति तद्वत्। | है। जिस प्रकार उदय होनेवाला सूर्य रात्रिके अन्धकारको दूर कर देता है, उसी प्रकार [ उदय होनेवाली विद्या अविद्याका नाश कर देती है]। | | अपि चैवं स्तुता ब्रह्मविद्या— | इसके सिवा उस ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की गयी है | | या इन्द्ररक्षिता सा दुष्प्राप्या देवैरपि; यस्मादश्विभ्यामपि देवभिषग्भ्यामिन्द्ररक्षिता विद्या महतायासेन प्राप्ता। ब्राह्मणस्य शिरश्छित्त्वाऽश्व्यं शिरः प्रतिसन्धाय तस्मिन्निन्द्रेणच्छिन्ने पुनः स्वशिर एव प्रतिसन्धाय तेन ब्राह्मणस्य स्वशिरसवोक्ताशेषा ब्रह्मविद्या श्रुता। तस्मात्ततः परतरं किञ्चित् पुरुषार्थसाधनं न भूतं न भावि वा, कुत एव वर्तमानम्, इति नातः परा स्तुतिरस्ति। | कि जो इन्द्रसे सुरक्षिता थी, वह देवताओंके लिये भी दुष्प्राप्य हो रही थी; क्योंकि वह इन्द्ररक्षिता विद्या देववैद्य अश्विनीकुमारोंको भी बड़ी कठिनतासे प्राप्त हुई थी। उन्होंने ब्राह्मणका शिर काटकर उसपर घोड़ेका शिर लगाया और जब उसे इन्द्रने काट दिया तो पुनः उनका अपना शिर जोड़कर फिर ब्राह्मणके उस अपने शिरसे ही कहे जानेपर समग्र ब्रह्मविद्याका श्रवण किया। अतः उससे बढ़कर कोई अन्य पुरुषार्थका साधन न कभी हुआ है और न होगा ही, फिर वर्तमान तो हो ही कैसे सकता है; अतः इससे बढ़कर उसकी स्तुति नहीं हो सकती है। | | अपि चैवं स्तूयते ब्रह्मविद्या— | इसके सिवा ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की जाती है—यह | | सर्वपुरुषार्थानां कर्म हि साधनमिति लोके प्रसिद्धम्। तच्च कर्म वित्तसाध्यम्, तेनाशापि नास्त्यमृत- | लोकमें प्रसिद्ध है कि समस्त पुरुषार्थोंका साधन कर्म ही है। वह कर्म धनसाध्य है, अतः उससे तो अमृतत्वकी आशा भी नहीं है। यह |
६०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ६०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| त्वस्य। तदिदममृतत्वं केवलयात्मविद्यया कर्मनिरपेक्षया प्राप्यते; यस्मात् कर्मप्रकरणे वक्तुं प्राप्तापि सती प्रवर्ग्यप्रकरणे, कर्मप्रकरणादुत्तीर्य कर्मणा विरुद्धत्वात् केवलसंन्याससहिता अभिहिता अमृतत्वसाधनाय। तस्मान्नातः परं पुरुषार्थसाधनमस्ति। | अमृतत्व तो कर्मकी अपेक्षासे रहित केवल आत्मविद्याके द्वारा ही प्राप्त होता है; क्योंकि प्रवर्ग्यप्रकरणरूप कर्मके प्रकरणमें कहनेके लिये प्राप्त होनेपर भी कर्मसे विरुद्ध होनेके कारण उसे कर्मप्रकरणसे निकाल-कर अमृतत्वसाधनके लिये संन्यास-के साथ वर्णन किया है। अतः इससे बढ़कर कोई और पुरुषार्थका साधन नहीं है। |
| अपि चैवं स्तुता ब्रह्मविद्या— | इसके सिवा ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की गयी है— |
| सर्वो हि लोको द्वन्द्वारामः “स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते’ (बृ० उ० १।४।३) इति श्रुतेः। याज्ञवल्क्यो लोकसाधारणोऽपि सन्नात्मज्ञानबलाद्भार्यापुत्रवित्तादिसंसाररतिं परित्यज्य प्रज्ञानतृप्त आत्मरतिर्बभूव। | सारा ही लोक द्वन्द्वोंमें रमण करनेवाला है, जैसा कि “वह विराट् पुरुष [अकेला होनेके कारण] रममाण नहीं हुआ, इसीसे अकेला पुरुष रमण नहीं करता” इस श्रुति-से सिद्ध होता है। याज्ञवल्क्य साधारण लोकके समान होते हुए भी आत्मज्ञानके बलसे स्त्री, पुत्र एवं धन आदि संसारकी आसक्तिको छोड़कर ज्ञानतृप्त हो आत्मामें प्रेम करनेवाले हो गये थे। |
| अपि चैवं स्तुता ब्रह्मविद्या— | इसके सिवा ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की गयी है— |
| यस्माद्याज्ञवल्क्येन संसारमार्गाद् व्युत्तिष्ठतापि प्रियाय भार्यायै | क्योंकि संसार-मार्गसे निवृत्त होते हुए भी याज्ञवल्क्यजीने अपनी प्रेयसी भार्या- |
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ६०३
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ६०३
| प्रीत्यर्थमेवाभिहिता, "प्रियं भाषस एह्यास्स्व" (२।४।४) इति लिङ्गात्।<br><br>तत्रेयं स्तुत्यर्थाख्यायिकेत्यवोचाम। का पुनः सा आख्यायिका? इत्युच्यते— | को इसका प्रेमके कारण ही उपदेश किया था, जैसा कि "तू प्रिय भाषण करती है, अतः आ, बैठ जा" इस विशेष कथनरूप प्रमाणसे ज्ञात होता है।<br><br>यहाँतक हमने यह बतलाया कि यह आख्यायिका [ब्रह्मविद्याकी] स्तुतिके लिये है। किंतु वह आख्यायिका है क्या? सो अब बतलाया जाता है— |
इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच। तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत्। तद्वां नरा सनये दँस उग्रमाविष्कृणोमि तन्यतुर्न वृष्टिम्। दध्यङ् ह यन्मध्वाथर्वणो वामश्वस्य शीर्ष्णा प्र यदीमुवाचेति ॥ १६ ॥
उस इस मधुको दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिने अश्विनीकुमारोंसे कहा था। इस मधुको देखते हुए ऋषि (मन्त्र) ने कहा—'मेघ जिस प्रकार वृष्टि करता है, उसी प्रकार हे नराकार अश्विनीकुमारो! मैं लाभके लिये किये हुए तुम दोनोंका वह उग्र दंस कर्म प्रकट किये देता हूँ, जिस मधुका दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिने तुम्हारे प्रति अश्वके शिरसे वर्णन किया था॥ १६॥
| इदमित्यनन्तरनिर्दिष्टं व्यपदिशति, बुद्धौ सन्निहितत्वात्।<br><br>वैशब्दः स्मरणार्थः। तदित्याख्यायिकानिर्वृत्तं प्रकरणान्तराभिहितं परोक्षं वैशब्देन स्मारयन्निह व्यपदिशति। यत्तत् प्रवर्ग्यप्रकरणे | 'इदम्' यह पद पीछे बतलाये हुए विषयका समीपस्थ वस्तुकी भांति निर्देश करता है; क्योंकि वह बुद्धिमें सन्निहित है। 'वै' शब्द स्मरणके लिये है। 'तत्' पदसे आख्यायिका में आनेवाले एवं दूसरे प्रकरणमें कहे हुए परोक्ष मधुका 'वै' शब्दसे स्मरण कराकर यहां निर्देश करते हैं। जिस मधुको प्रवर्ग्यप्रकरणमें सूचित |
६०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ६०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| सूचितम्, नाविष्कृतं मधु, तदिदं मध्विहानन्तरं निर्दिष्टम्—‘इयं पृथिवी’ ( २ । ५ । १ ) इत्यादिना। | किया गया है, किंतु प्रकट नहीं किया गया, उसी मधुका यहाँ पास ही ‘इयं पृथिवी’ इत्यादि मन्त्रोंसे निर्देश किया गया है। | | कथं तत्र प्रकरणान्ते सूचितम्— | उस प्रकरणान्तरमें इसकी किस प्रकार सूचना दी है?— | | दध्यङ् ह वा आस्यामाथर्वणो मधु नाम ब्राह्मणमुवाच। तदेतयोः प्रियं धाम तदेवैनयोरेतेनोपगच्छति। स होवाचेन्द्रेण वा उक्तोऽस्म्येतच्चेदन्यस्मा अनुब्रूयास्तत एव ते शिरश्छिन्द्यामिति। तस्माद्वै बिभेमि, यद्वै मे स शिरो न छिन्द्यात् तद्वामुपनेष्य इति। तौ होचतुरावां त्वा तस्मात् त्रास्यावहे इति। कथं मा त्रास्येथे ? इति। यदा नावुपनेष्यसे; अथ ते शिरश्छित्त्वा अन्यत्राहृत्योपनिधास्यावः; अथाश्वस्य शिर आहृत्य तत्ते प्रतिधास्यावः; तेन नावनुवक्ष्यसि। यदा नावनुवक्ष्यसि, | आथर्वण दध्यङ्ने इन दोनों (अश्विनीकुमारों) को मधुब्राह्मण सुनाया। यह इनका प्रिय धाम है; यही आगे बतलाये जानेवाले प्रकारसे उपदेश करनेके लिये ब्राह्मण इन दोनोंके पास आचार्यरूपमें उपस्थित होता है। उस दध्यङ्ङाथर्वणने कहा, ‘इन्द्रने मुझसे कहा है कि यदि तुम इसे किसी अन्यके प्रति कहोगे तो उसी समय मैं तुम्हारा मस्तक काट दूँगा। इसीसे मैं डरता हूँ, यदि वह मेरा मस्तक न काटे तो मैं तुम दोनोंका उपनयन करूँगा।’ उन्होंने कहा, ‘हम उनसे आपकी रक्षा करेंगे।’ [ दध्यङ् ] ‘किस प्रकार मेरी रक्षा करोगे ?’ [ अश्विनीकुमार ] ‘जिस समय आप हमारा उपनयन करेंगे, उस समय आपका शिर काटकर दूसरी जगह ले जाकर रख देंगे, फिर घोड़ेका शिर लाकर आपके लगा देंगे; उससे आप हमें उपदेश करेंगे। जिस समय वे आप हमें उपदेश करेंगे |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६०५ |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६०५ | | :--- | :--- |
| अथ ते तदिन्द्रः शिरश्छेत्स्यति; अथ ते स्वं शिर आहृत्य तत्ते प्रतिधास्याव इति । | उस समय इन्द्र आपके उस मस्तकको काट देगा, फिर हम आपका निजी मस्तक लाकर उसे जोड़ देंगे।' | | तथेति तौ होपनिन्थे। तौ यदोपनिन्थे, अथास्य शिरच्छित्त्वान्यत्रोपनिदधतुः; अथाश्वस्य शिर आहृत्य तद्धास्य प्रतिदधतुः। तेन हाभ्यामनूवाच। स यदाभ्यामनूवाचाथास्य तदिन्द्रः शिरश्चिच्छेद। अथास्य स्वं शिर आहृत्य तद्धास्य प्रतिदधतुरिति। | तब 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर उन्होंने उनका उपनयन किया। जिस समय उनका उपनयन किया उस समय उन्होंने उनका मस्तक काटकर अन्यत्र रख दिया तथा घोड़ेका शिर लाकर उसे इनके जोड़ दिया। उससे दध्यङ्ने उन्हें उपदेश किया। जिस समय वे उन्हें उपदेश करने लगे तब इन्द्रने आकर उनका वह मस्तक काट दिया। फिर उनके अपने मस्तकको लाकर उसे उनके जोड़ दिया। | | यावत्तु प्रवर्ग्यकर्माङ्गभूतं मधु तावदेव तत्राभिहितम्, न तु कक्ष्यमात्मज्ञानाख्यम्। तत्र या आख्यायिकाभिहिता सेह स्तुत्यर्था प्रदर्श्यते। इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽनेन प्रपञ्चेनाश्विभ्यामुवाच। | किंतु वहाँ जितना प्रवर्ग्यका अङ्गभूत मधु है उतना ही कहा गया है, आत्मज्ञानसंज्ञक कक्ष्य मधुका वर्णन नहीं किया गया। वहाँ जो आख्यायिका कही गयी है, उसे यहाँ स्तुतिके लिये प्रदर्शित किया जाता है। उस इस मधुका इन दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंके प्रति इस प्रकार प्रपञ्चके साथ वर्णन किया है। | | तदेतदृषिः—तदेतत् कर्म, ऋषिर्मन्त्रः, पश्यन्नुपलभमानः, | उस इस ऋषिने—ऋषि यहाँ मन्त्रका वाचक है—इस कर्मको |
६०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ६०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| अवोचत्-उक्तवान्। कथम् ? तद्दंस इति व्यवहितेन सम्बन्धः। दंस इति कर्मणो नामधेयम्। | देखते हुए कहा। किस प्रकार कहा ? ‘तद्दंस’ इस प्रकार यहाँ ‘तत्’ और ‘दंस’ इन दूरवर्ती पदोंका अन्वय है। ‘दंस’ यह उस कर्मका नाम है। | | तच्च दंसः किंविशिष्टम् ? उग्रं क्रूरम्। वां युवयोः। हे नरा नराकारावश्विनौ। तच्च कर्म किंनिमित्तम् ? सनये लाभाय ! | वह दंस कर्म किस विशेषणसे युक्त है ? उग्र-क्रूर। वाम्-तुम दोनोंका। हे नरा-नराकार अश्विनीकुमारो ! वह कर्म किसलिये था ? सनये—लाभके लिये। | | लाभलुब्धो हि लोकेऽपि क्रूरं कर्माचरति, तथैवैतावुपलभ्येते यथा लोके। | क्योंकि लाभका लोभी पुरुष लोकमें भी क्रूर कर्म कर बैठता है। जिस प्रकार लोकमें होते हैं, वैसे ही ये दोनों भी देखे जाते हैं। | | तदाविः प्रकाशं कृणोमि करोमि यद्रहसि भवद्भ्यां कृतम्, किमिव ? इत्युच्यते—तन्यतुः पर्जन्यः, न इव। नकारस्तूपरिष्टादुपचार उपमार्थीयो वेदे, न प्रतिषेधार्थः; यथाश्वं न। अश्वमिवेति यद्वत्। | [ मन्त्र कहता है-] तुमने जो एकान्तमें किया है, उसे मैं प्रकट किये देता हूँ। किसके समान ? सो बतलाया जाता है—‘तन्यतुः’ ‘न’ अर्थात् मेघके समान। वेदमें जो नकार किसी पदके पीछे रहता है वह उपचारमात्रमें उपमाके अर्थमें होता है, निषेध अर्थमें नहीं होता। जैसे—‘अश्वं न’ यह वाक्य अश्वके समान-इस अर्थमें है, उसी प्रकार। | | तन्यतुरिव वृष्टिं यथा पर्जन्यो वृष्टिं प्रकाशयति स्तनयित्न्वादि-शब्दैः, तद्वदहं युवयोः क्रूरं कर्म आविष्कृणोमीति सम्बन्धः। | जैसे मेघ गर्जनादि शब्दोंके सहित वृष्टिको प्रकाशित करता है, उसी प्रकार मैं तुम दोनोंके क्रूर कर्मको प्रकट करता हूँ—ऐसा इसका सम्बन्ध है। |
ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६०७
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६०७ |
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| नन्वश्विनोः स्तुत्यर्थौ कथमिमौ मन्त्रौ स्यातां निन्दावचनौ हीमौ। | **शङ्का-**किंतु ये दोनों मन्त्र अश्विनीकुमारोंकी स्तुतिके लिये कैसे हो सकते हैं, ये तो उनकी निन्दाको ही बतलानेवाले हैं ? | | नैष दोषः; स्तुतिरेवैषा, न निन्दावचनौ । यस्मादीदृशमप्यतिक्रूरं कर्म कुर्वतोर्युवयोनँ लोम च मीयत इति । न चान्यत्किञ्चिद्धीयत एवेति । स्तुतावेतौ भवतः । निन्दां प्रशंसां हि लौकिकाः स्मरन्ति। तथा प्रशंसारूपा च निन्दा लोके प्रसिद्धा । | **समाधान-**यह दोष नहीं है; यह उनकी स्तुति ही है, ये मन्त्र निन्दावाचक नहीं हैं; क्योंकि ऐसा क्रूर कर्म करनेपर भी तुम दोनोंका बाल भी बाँका नहीं होता और न तुम्हारी दूसरी ही कोई हानि हो रही है। अतः ये उनकी स्तुतिमें ही हैं ! लौकिक पुरुष कहीं प्रशंसाको निन्दा मानते हैं, इसी प्रकार लोकमें प्रशंसारूपा निन्दा भी प्रसिद्ध है । | | दध्यङनाम आथर्वणः। हेत्यनर्थको निपातः। यन्मधु कक्ष्यमात्मज्ञानलक्षणमाथर्वणो वां युवाभ्यामश्वस्य शीर्षणा शिरसा प्र यत् ईम् उवाच यत् प्रोवाच मधु। ईमित्यनर्थको निपातः ॥१६॥ | दध्यङ् नामके आथर्वणने—यहाँ 'ह' निरर्थक निपात है—जिस आत्मज्ञानरूप कक्ष्य—मधुका तुम्हें घोड़ेके शिरसे 'प्र यत् ईम् उवाच' प्रवचन किया था अर्थात् जिस मधुका उपदेश किया था। यहाँ 'ईम्' यह निरर्थक निपात है ॥ १६ ॥ |
इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच । तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् । आथर्वणायाश्विनौ दधीचेऽश्व्यꣳ शिरः प्रत्यैरयतम् । स वां मधु प्रवोचदृतायन्त्वाष्ट्रं यदस्रावपि कक्ष्यं वामिति ॥ १७ ॥
६०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ६०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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उस इस मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया। इसे देखते हुए ऋषि (मन्त्रद्रष्टा) ने कहा है—हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों आथर्वण दध्यङ्के लिये घोड़ेका शिर लाये। उसने सत्यपालन करते हुए तुम्हें त्वाष्ट्र (सूर्यसम्बन्धी) मधुका उपदेश किया तथा हे दस्र (शत्रुहिंसक) जो [आत्मज्ञानसम्बन्धी] कक्ष्य (गोप्य) मधु था [वह भी तुमसे कहा] ॥ १७॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| इदं वै तन्मध्वित्यादि पूर्ववन्मन्त्रान्तरप्रदर्शनार्थम् । तथान्यो मन्त्रस्तामेव आख्यायिकामनुसरति स्म । आथर्वणो दध्यङ् नाम, आथर्वणोऽन्यो विद्यत इत्यतो विशिनष्टि दध्यङ्नामाथर्वणः । | ‘इदं वै तन्मधु’ इत्यादि कथन पूर्ववत् अन्य मन्त्र प्रदर्शित करनेके लिये है। अर्थात् इसी प्रकार दूसरे मन्त्रने भी उसी आख्यायिकाका अनुसरण किया। दध्यङ् नामवाला आथर्वण। आथर्वण तो दूसरा भी है इसलिये ‘दध्यङ्नामक आथर्वण’ ऐसा कहकर इसे विशेषणयुक्त करते हैं। |
| तस्मै दधीच आथर्वणाय हेऽश्विनावेति मन्त्रदृशो वचनम्, अश्व्यमश्वस्य स्वभूतं शिरः, ब्राह्मणस्य शिरसिच्छिन्नेऽश्वस्य शिरश्छित्त्वा ईदृशमतिक्रूरं कर्म कृत्वा अश्व्यं शिरो ब्राह्मणं प्रति ऐरयतं गमितवन्तौ युवाम् । स चाथर्वणो वां युवाभ्यां तन्मधु प्रवोचद् यत् पूर्वं प्रतिज्ञातं वक्ष्यामीति । | हे अश्विनीकुमारो! उस दध्यङ् आथर्वणके लिये—यह मन्त्रद्रष्टा ऋषिका वचन है—तुम अश्व्य—अश्वका स्वभूत शिर अर्थात् ब्राह्मणका शिर काट देनेपर तुम अश्वका शिर काटकर, ऐसा अत्यन्त क्रूर कर्म कर उस अश्वके शिरको तुमने ब्राह्मणके पास ‘ऐरयतम्’—पहुँचाया और उस आथर्वणने तुम्हें उस मधुका उपदेश किया जिसके लिये उसने पहले यह प्रतिज्ञा की थी ‘मैं कहूँगा।’ |
| स किमर्थमेवं जीवितसन्देहमारुह्य प्रवोचत्? इत्युच्यते। ऋता- | उसने इस प्रकार जीवनके संदेहमें पड़कर भी उसका उपदेश क्यों किया, सो बतलाया जाता है— |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६०९
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६०९
| यन् यत् पूर्वं प्रतिज्ञातं सत्यं तत् परिपालयितुमिच्छन् । जीवितादपि हि सत्यधर्मपरिपालना गुरुतरेत्येतस्य लिङ्गमेतत् ।<br><br>किं तन्न प्रवोचत् ? इत्युच्यते—त्वाष्ट्रम्, त्वष्टा आदित्यस्तस्य सम्बन्धि, यज्ञस्य शिरश्छिन्नं त्वष्टामभवत्, तत्प्रतिसन्धानार्थं प्रवर्ग्यं कर्म । तत्र प्रवर्ग्यकर्माङ्गभूतं यद् विज्ञानं तत्त्वाष्ट्रं मधु—यज्ञस्य शिरश्छेदनप्रतिसन्धानादिविषयं दर्शनं तत्त्वाष्ट्रं यन्मधु हे दस्रौ, दस्राविति परबलानामुपक्षपयितारौ शत्रूणां वा हिंसितारौ, अपि च न केवलं त्वाष्ट्रमेव मधु कर्मसम्बन्धि युवाभ्यामवोचत्, अपि च कक्ष्यं गोप्यं रहस्यं परमात्मसम्बन्धि यद् विज्ञानं मधु मधुब्राह्मणेनोक्तमध्यायद्वयप्रकाशितम्, तच्च वां युवाभ्यां प्रवोचदित्यनुवर्तते ॥ १७ ॥ | 'ऋतायन्'—जो पहले प्रतिज्ञा किया हुआ सत्य था, उसका पालन करनेके लिये । यह इस बातका सूचक है कि सत्यधर्मका पालन जीवनसे भी बढ़कर है ।<br><br>उसने किस मधुका उपदेश किया ? सो कहा जाता है—त्वाष्ट्र मधुका । त्वष्टा सूर्यको कहते हैं, उससे सम्बन्ध रखनेवाले मधुका । यज्ञका शिर काटे जानेपर वह त्वष्टा हो गया, उसके प्रतिसन्धान (जोड़ने) के लिये प्रवर्ग्य कर्म है । वहाँ प्रवर्ग्यकर्मका अङ्गभूत जो विज्ञान है, वही त्वाष्ट्र मधु है । यज्ञके शिरश्छेदनके प्रतिसन्धानादिसे सम्बद्ध जो दर्शन है, वही त्वाष्ट्र मधु है । हे दस्रौ ! दस्र अर्थात् परपक्षकी सेनाका क्षय करनेवाले अथवा शत्रुओंके हिंसको ! इसके सिवा उन्होंने तुम्हें केवल कर्मसम्बन्धी त्वाष्ट्र मधुका ही उपदेश नहीं किया, अपितु कक्ष्य—गोप्य अर्थात् जो परमात्मसम्बन्धी रहस्यभूत मधु विज्ञान था, जिसका मधुब्राह्मणद्वारा वर्णन किया गया है और जो [ तृतीय और चतुर्थ ] दो अध्यायोंमें प्रकाशित किया गया, उसका भी तुम्हें उपदेश किया । यहाँ प्रवोचत् (उपदेश किया) इस क्रियापदकी अनुवृत्ति होती है । १७ ॥ |
वृ० उ० ३६—
६१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ६१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच । तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् । पुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः। पुरः स पक्षी भूत्वा पुरः पुरुष आविशदिति । स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयो नैनेन किञ्चनानावृतं नैनेन किञ्चनासंवृतम् ॥ १८ ॥
उस इस मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया। इसे देखते हुए ऋषिने कहा—परमात्माने दो पैरोंवाले शरीर बनाये और चार पैरोंवाले शरीर बनाये। पहले वह पुरुष पक्षी होकर शरीरोंमें प्रविष्ट हो गया। वह यह पुरुष समस्त पुरों ( शरीरों ) में पुरिशय है। ऐसा कुछ भी नहीं है, जो पुरुषसे ढका न हो तथा ऐसा भी कुछ नहीं है, जिसमें पुरुषका प्रवेश न हुआ हो—जो पुरुषसे व्याप्त न हो ॥ १८ ॥
| इदं वै तन्मध्विति पूर्ववत् । उक्तौ द्वौ मन्त्रौ प्रवर्ग्यसम्बन्ध्याख्यायिकोपसंहर्तारौ । द्वयोः प्रवर्ग्यकर्मार्थयोरध्याययोरर्थ आख्यायिकाभूताभ्यां मन्त्राभ्यां प्रकाशितः । ब्रह्मविद्यार्थयोस्त्वध्याययोरर्थउत्तराभ्यामृग्भ्यां प्रकाशयितव्यः, इत्यतःप्रवर्तते। यत् कक्ष्यं च मधूक्तवानाथर्वणो युवाभ्यामित्युक्तम् । किं पुनस्तन्मधु ? इत्युच्यते— | ‘इदं वै तन्मधु’ इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है। उपर्युक्त दो मन्त्र प्रवर्ग्यसम्बन्धी आख्यायिकाका उपसंहार करनेवाले हैं। प्रवर्ग्यकर्मसम्बन्धी दो अध्यायोंका अर्थ इन उपर्युक्त आख्यायिकाभूत दो मन्त्रोंद्वारा प्रकाशित किया गया है। ब्रह्मविद्यासम्बन्धी दो अध्यायोंका अर्थ आगेकी दो ऋचाओंद्वारा प्रकाशित करना है इसीसे श्रुति प्रवृत्त होती है। आथर्वणने तुम दोनोंसे जो कक्ष्य मधु कहा था—ऐसा ऊपर कहा गया है। वह मधु क्या था ? उसका वर्णन किया जाता है— |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६११ |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६११ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| पुरश्चक्रे, पुरः पुराणि शरीराणि, यत इयमव्याकृतव्याकरणप्रक्रिया—स परमेश्वरो नामरूपे अव्याकृते व्याकुर्वाणः प्रथमं भूरादीँल्लोकान् सृष्ट्वा चक्रे कृतवान्, द्विपदो द्विपादुपलक्षितानि मनुष्यशरीराणि पक्षिशरीराणि । तथा पुरः शरीराणि चक्रे चतुष्पदश्चतुष्पादुपलक्षितानि पशुशरीराणि । | 'पुरश्चक्रे'—पुर अर्थात् शरीर; क्योंकि यह अव्यक्तके व्यक्त होनेकी प्रक्रिया है। उसपरमेश्वरने अव्यक्त नामरूपको व्यक्त करते हुए पहले भूः आदि लोकोंकी रचना कर द्विपदोंको—दो पैरोंसे उपलक्षित मनुष्य-शरीर और पक्षिशरीरोंको 'चक्रे'—रचा। तथा चतुष्पद—चार पैरोंसे उपलक्षित पशुशरीरोंको बनाया। |
| पुरः पुरस्तात्, स ईश्वरः पक्षी लिङ्गशरीरं भूत्वा पुरः शरीराणि—पुरुष आविशदित्यस्यार्थमाचष्टे श्रुतिः—स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु सर्वशरीरेषु पुरिशयः, पुरि शेत इति पुरिशयः सन् पुरुष इत्युच्यते । नैनेनानेन किञ्चन किञ्चिदप्यनावृतमनाच्छादितम् । तथा नैनेन किञ्चनासंवृतमन्तरननुप्रवेशितं बाह्यभूतेनान्तर्भूतेन च न अनावृतम् । एवं स एव नामरूपात्मना अन्तर्बहिर्भावेन कार्यकारणरूपेण व्यवस्थितः । पुरश्चक्रे इत्यादिमन्त्रः सङ्क्षेपत आत्मैकत्वमाचष्ट इत्यर्थः ॥१८॥ | पुरः अर्थात् पहले वह ईश्वर पक्षी—लिङ्गशरीर होकर पुरू—शरीरोंमें पुरुषरूपसे प्रविष्ट हो गया—इसी वाक्यका अर्थ श्रुति करती है—वही यह पुरुष समस्त पुरों—सम्पूर्ण शरीरोंमें पुरिशय है, पुरमें शयन करता है, अतः पुरिशय होनेके कारण वह 'पुरुष' इस प्रकार कहा जाता है। इससे कुछ भी अनावृत—अनाच्छादित नहीं है। तथा इससे कुछ भी असंवृत नहीं है, अर्थात् ऐसा कुछ भी नहीं है, जहाँ पुरुष भीतर और बाहर रहकर स्वयं प्रविष्ट—व्याप्त न हो। इस प्रकार वही नामरूपात्मक अन्तर्बाह्यभावसे देह और इन्द्रियरूपमें स्थित है। तात्पर्य यह है कि यह 'पुरश्चक्रे' इत्यादि मन्त्र संक्षेपसे आत्माके एकत्वका निरूपण करता है ॥१८॥ |