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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

११६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

११६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
पूर्णस्य कार्यात्मनो ब्रह्मणः पूर्णं पूर्णत्वमादाय गृहीत्वा आत्मस्वरूपैकरसत्वमापद्य, विद्यया अविद्याकृतं भूतमात्रोपाधिसंसर्गजमन्यत्वाभासं तिरस्कृत्य पूर्णमेवानन्तरमबाह्यं प्रज्ञानघनैकरसस्वभावं केवलं ब्रह्मावशिष्यते ।इस पूर्ण यानी कार्यरूप ब्रह्मका सम्पूर्ण पूर्णत्व 'आदाय'—लेकर अर्थात् उसे आत्मस्वरूपके साथ एकरस करके विद्याके द्वारा अविद्याकृत भूतमात्रोपाधिके संसर्गसे होनेवाली भेद-प्रतीतिको मिटा देनेपर पूर्ण ही अर्थात् अन्तरबाह्यशून्य प्रज्ञानघनैकरसस्वरूप शुद्ध ब्रह्म ही शेष रहता है ।
['ब्रह्म वै' इत्यादि-मन्त्रेण समानार्थत्व-प्रदर्शनम्]<br>यदुक्तम् 'ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेत् तस्मात्तत् सर्वमभवत्' (१ । ४ । १०) इत्येषोऽस्य मन्त्रस्यार्थः । तत्र ब्रह्मेत्यस्यार्थः पूर्णमद इति । इदं पूर्णमिति ब्रह्म वा इदमग्र आसीदित्यस्यार्थः । तथा च श्रुत्यन्तरम् "यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह" (क० उ० २ । १ । १०) इति । अतोऽदःशब्दवाच्यं पूर्णं ब्रह्म तदेवेदं पूर्णं कार्यस्थं नामरूपोपाधिसंयुक्तमविद्ययोद्रिक्तम् । तस्मादेव परमार्थस्वरूपादन्यदिव प्रत्यवभासमानम् । तद् यदात्मानमेव परं पूर्णं ब्रह्म विदित्वा 'अहमदः पूर्णंपहले जो यह कहा गया था 'ब्रह्म¹ वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेत् तस्मात् तत् सर्वमभवत्' यही इस मन्त्रका भी अर्थ है । इसमें 'ब्रह्म' इस पदका अर्थ है 'पूर्णमदः' और 'इदं पूर्णम्' यह 'ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्' इस वाक्यका अर्थ है । ऐसी ही एक दूसरी श्रुति भी है "यदेवेह² तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह ।" अतः 'अदः' शब्दवाच्य जो पूर्णब्रह्म है वही 'इदं पूर्णम्' अर्थात् कार्यवर्गमें स्थित नाम-रूपात्मक उपाधिसे युक्त अविद्याजनित (कार्यब्रह्म) है । वह उसी परमार्थस्वरूप परब्रह्मसे अन्यके समान प्रतीत होता है । ऐसी स्थितिमें जब अपनेको ही पूर्ण परब्रह्म जानकर 'मैं ही वह पूर्ण ब्रह्म हूँ'

१. आरम्भमें यह एक ब्रह्म ही था, उसने अपनेको जाना, इसलिये वह सर्व हो गया ।
२. जो यहाँ है, वही परलोकमें है और जो परलोकमें है, वही यहाँ (इस देहेन्द्रियरूप उपाधिमें) है ।

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११६५

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११६५


| ब्रह्मास्मि’ इत्येवं पूर्णमादाय तिरस्कृत्यापूर्णस्वरूपतामविद्याकृतां नामरूपोपाधिसम्पर्कजामेतया ब्रह्मविद्यया पूर्णमेव केवलमवशिष्यते । तथा चोक्तम्— ‘तस्मात्तत्सर्वमभवत्’ (१।४।१०) इति ।<br><br>यः सर्वोपनिषदर्थो ब्रह्म स एषोऽनेन मन्त्रेणानूद्यत उत्तरसम्बन्धार्थम् । ब्रह्मविद्यासाधनत्वेन हि वक्ष्यमाणानि साधनान्योङ्कारदमदानदयाख्यानि विधित्सितानि खिलप्रकरणसम्बन्धात् सर्वोपासनाङ्गभूतानि च ।<br><br>अत्रैके वर्णयन्ति पूर्णात् कारणात् पूर्णं कार्यमुद्रिच्यते । उद्रिक्तं कार्यं वर्तमानकालेऽपि पूर्णमेव परमार्थवस्तुभूतं द्वैतरूपेण । पुनः प्रलयकाले पूर्णस्य कार्यस्य पूर्णतामादायात्मनि धित्वा पूर्णमेवावशिष्यते कारणरूपम् । एवमुत्पत्तिस्थितिप्रलयेषु त्रिष्वपि<br>(द्वैताद्वैतवादिमत-प्रदर्शनम्) | इस प्रकार पूर्णत्वको लेकर इस ब्रह्मविद्याके द्वारा अविद्याकृत नामरूपाधिके संसर्गसे उत्पन्न हुई अपूर्णरूपताका तिरस्कार कर दिया जाता है तो केवल पूर्ण हो रह जाता है । यही बात ‘तस्मात्तत्सर्वमभवत्’ इस वाक्यके द्वारा कही गयी है ।<br><br>जो सारे उपनिषद्का अर्थभूत [ब्रह्म] है, उसीका आगेके ग्रन्थसे सम्बन्ध प्रदर्शित करनेके लिये इस मन्त्रके द्वारा अनुवाद किया जाता है तथा जो खिलप्रकरणके सम्बन्धसे सारी उपासनाओंके अङ्गभूत हैं, उन ओङ्कार, दम, दान और दयासंज्ञक साधनोंका भी यहाँ ब्रह्मविद्याके साधनरूपसे विधान करना अभीष्ट है ।<br><br>यहाँ एक पक्षवाले (द्वैताद्वैतवादी ) विद्वान् ऐसा वर्णन करते हैं कि पूर्ण कारणसे पूर्ण कार्य उत्पन्न होता है । वह उत्पन्न हुआ कार्य वर्तमान समयमें भी पूर्ण ही है, अर्थात् द्वैतरूपसे परमार्थ वस्तुभूत ही है । फिर प्रलयकालमें पूर्ण कार्यकी पूर्णताको लेकर उसका आत्मामें ही आधान करनेपर कारणरूप पूर्ण ही रह जाता है । इस प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय—तीनों ही कालोंमें |

| ११६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |

| ११६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ | | :--- | :--- |

| कालेषु कार्यकारणयोः पूर्णतैव । सा चैकैव पूर्णता कार्यकारणयोर्भेदेन व्यपदिश्यते । एवं च द्वैताद्वैतात्मकमेकं ब्रह्म । | कार्य-कारणकी पूर्णता ही है। यह एक पूर्णता ही कार्य-कारणके भेदसे कही जाती है। इस प्रकार द्वैताद्वैतरूप एक ही ब्रह्म है। | | यथा किल समुद्रो जलतरङ्गफेनबुद्बुदाद्यात्मक एव । यथा च जलं सत्यं तदुद्भवाश्च तरङ्गफेनबुद्बुदायः समुद्रात्मभूता एवाविर्भावतिरोभावधर्मिणः परमार्थसत्या एव । एवं सर्वमिदं द्वैतं परमार्थसत्यमेव जलतरङ्गादिस्थानीयम्, समुद्रजलस्थानीयं तु परं ब्रह्म । | जिस प्रकार समुद्र जल-तरङ्ग-फेन-बुद्बुदादिरूप ही है और उसमें जैसे जल सत्य है, उसी प्रकार उससे होनेवाले आविर्भाव-तिरोभाव-धर्मी तरङ्ग, फेन एवं बुद्बुदादि भी समुद्ररूप और परमार्थ सत्य ही हैं। इस प्रकार यह जलतरङ्गादिस्थानीय सारा द्वैत परमार्थ सत्य ही है और परब्रह्म तो समुद्रके जलस्थानीय ही है। | | एवं च किल द्वैतस्य सत्यत्वे कर्मकाण्डस्य प्रामाण्यम्, यदा पुनर्द्वैतं द्वैतमिवविद्याकृतं मृगतृष्णिकावदनृतम्, अद्वैतमेव परमार्थतः, तदा किल कर्मकाण्डं विषयाभावादप्रमाणं भवति । तथा च विरोध एव स्यात्— वेदैकदेशभूतोपनिषत् प्रमाणम्, परमार्थाद्वैतवस्तुप्रतिपादकत्वात्; अप्रमाणं कर्मकाण्डम्, असद्द्वैतविषयत्वात् । तद्विरोधपरिजिही- | इस प्रकार द्वैतके सत्य होनेपर ही कर्मकाण्डकी प्रामाणिकता हो सकती है। जब द्वैत केवल द्वैत-सा तथा अविद्याकृत और मृगतृष्णाके समान मिथ्या है, परमार्थतः अद्वैत ही सत्य है-ऐसा कहते हैं तब तो अपने विषयका अभाव हो जानेके कारण कर्मकाण्ड अप्रामाणिक ही हो जाता है और ऐसा माननेपर परमार्थ अद्वैत वस्तुका प्रतिपादन करनेवाली होनेके कारण वेदकी एकदेशभूत उपनिषदें तो प्रामाणिक हैं; किंतु असत् द्वैतविषयक होनेसे कर्मकाण्ड अप्रामाणिक है—यह विरोध अनिवार्य होगा, अतः उस विरोधका |

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११६७

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११६७


संस्कृत-मूलहिन्दी-अनुवाद
र्थथा श्रुत्यैतदुक्तं कार्यकारणयोः सत्यत्वं समुद्रवत् 'पूर्णमदः' इत्यादिनेति ।परिहार करनेकी इच्छासे ही 'पूर्णमदः' इत्यादि मन्त्रद्वारा श्रुतिने समुद्रके समान यह कार्य-कारणकी सत्यता बतलायी है।
तदसत्, विशिष्टविषयापवादविकल्पयोरसम्भवात् । न हीयं सुविवक्षिता कल्पना, कस्मात् ? यथा क्रियाविषय उत्सर्गप्राप्तस्यैकदेशेऽपवादः क्रियते, यथा "अहिंसन् सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः" (छा० उ० ८।१५।१) इति हिंसा सर्वभूतविषयोत्सर्गेण निवारिता, तीर्थे विशिष्टविषये ज्योतिष्टोमादावनुज्ञायते; न चसिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि [निर्विरोध ब्रह्ममें] विशिष्टके विषयभूत अपवाद और विकल्प सम्भव नहीं हैं। [आपकी] यह कल्पना सुविवक्षित (युक्तियुक्त) नहीं है ! क्यों ?—जिस प्रकार क्रियाके विषयमें उत्सर्गसे (सामान्यतः) प्राप्त किसी क्रियाका किसी एक देशमें [विशेष वचनद्वारा] अपवाद कर दिया जाता है; जैसे "तीर्थों (पुण्यकर्मों) को छोड़कर अन्यत्र सभी प्राणियोंकी हिंसा न करता हुआ" इस वाक्यमें जिस सब प्राणियोंकी हिंसाका सामान्यतः निवारण किया है, उसकी तीर्थ यानी विशिष्ट विषय—ज्योतिष्टोमादि यज्ञोंमें अनुज्ञा दी जाती है ।

* वास्तवमें इस श्रुतिके द्वारा कहीं भी हिंसाका विधान नहीं प्राप्त होता है। इसके द्वारा तो सर्वत्र अहिंसाका ही आदेश किया गया है। छान्दोग्य-उपनिषद्में श्रीशंकराचार्यने 'अन्यत्र तीर्थेभ्यः' की व्याख्या इस प्रकार की है—'भिक्षानिमित्तमटनादिनापि परपीडा स्यादित्यत आह--अन्यत्र तीर्थेभ्यः। तीर्थं नाम शास्त्रानुज्ञाविषयस्ततोऽन्यत्रेत्यर्थः।' इसका भाव इस प्रकार है--भिक्षाके लिये घूमने आदिसे भी तो दूसरोंको पीड़ा पहुँच सकती है, इसके निवारणके लिये कहा—अन्यत्र तीर्थेभ्यः। जो शास्त्राज्ञाका विषय है अर्थात् जिसके लिये शास्त्रकी आज्ञा है, उस कर्मको करते हुए यदि किसीको अनायास कष्ट पहुँच जाय तो उसके लिये कोई दोष नहीं होता; यदि ऐसी बात नहीं होती तो भिक्षाटनका दृष्टान्त नहीं दिया

११६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

११६८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| तथा वस्तुविषय इहाद्वैतं ब्रह्मोत्सङ्गेन प्रतिपाद्य पुनस्तदेकदेशेऽपवदितुं शक्यते, ब्रह्मणोऽद्वैतत्वादेवैकदेशानुपपत्तेः । | वैसा उस प्रकार वस्तुके विषयमें यहाँ सामान्यतः अद्वैत ब्रह्मका प्रतिपादन कर फिर उसके किसी एक देशमें ब्रह्मका अपवाद (बाध) नहीं किया जा सकता; क्योंकि अद्वैत होनेके कारण ब्रह्मका कोई एक देश नहीं हो सकता । | | तथा विकल्पानुपपत्तेश्च । यथा 'अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति' 'नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति' इति ग्रहणाग्रहणयोः पुरुषाधीनत्वाद् विकल्पो भवति; न त्विह तथा वस्तुविषये 'द्वैतं वा स्यादद्वैतं वा' इति विकल्पः सम्भवति, अपुरुषतन्त्रत्वादात्मवस्तुनः; विरोधाच्च द्वैताद्वैतत्वयोरेकस्य । तस्मान्न सुविवक्षितेयं कल्पना । | इसी प्रकार विकल्प न हो सकनेके कारण भी ऐसा होना असम्भव है । जिस प्रकार 'अतिरात्रयागमें षोडशीका ग्रहण करे' 'अतिरात्रयागमें षोडशीका ग्रहण नहीं करे' इस प्रकार ग्रहण और अग्रहण पुरुषके अधीन होनेके कारण उनमें विकल्प¹ हो सकता है, उस प्रकार यहाँ वस्तुके विषयमें 'वह द्वैत हो अथवा अद्वैत हो' ऐसा विकल्प¹ नहीं हो सकता, क्योंकि आत्मतत्त्व पुरुषके अधीन नहीं है । इसके सिवा एक ही वस्तुका द्वैताद्वैतरूप होना विरुद्ध भी है । इसलिये यह कल्पना सुविवक्षित नहीं है । | | श्रुतिन्यायविरोधाच्च — सैन्धवघनवत् प्रज्ञानैकरसघनं निरन्तरं | श्रुति और युक्तिसे विरुद्ध होनेके कारण भी ऐसा कहना ठीक नहीं है । 'सैन्धवघनके समान प्रज्ञानैक- |


जाता । भिक्षाटनमें किसीकी हिंसा नहीं की जाती; अनजानमें पैरसे दबकर किसी जीवको कष्ट पहुँचनेकी सम्भावनामात्र रहती है ।
१. विकल्प इस प्रकार है; 'क्वचिद् अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति क्वचिद् न गृह्णाति' अर्थात् 'कहीं अतिरात्रमें षोडशीका ग्रहण करे और कहीं न करे ।'

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११६९

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११६९


| पूर्वापरबाह्याभ्यन्तरभेदविवर्जितं सबाह्याभ्यन्तरमजं नेति नेत्य-स्थूलमनण्वह्रस्वमजरमभयम-मृतम्—इत्येवमाद्याः श्रुतयो निश्चिताथांः संशयविपर्यासाशङ्कारहिताः सर्वाः समुद्रे प्रक्षिप्ताः स्युरकिञ्चित्करत्वात् । <br><br> तथा न्यायविरोधोऽपि सावयवस्यानेकात्मकस्य क्रियावतो नित्यत्वानुपपत्तेः । नित्यत्वं चात्मनः स्मृत्यादिदर्शनादनुमीयते । तद्विरोधश्च प्राप्नोत्यनित्यत्वे, भवत्कल्पनानर्थक्यं च; स्फुटमेव चास्मिन् पक्षे कर्मकाण्डानर्थक्यम्; अकृताभ्यागमकृतविप्रणाशप्रसङ्गात् । <br><br> ननु ब्रह्मणो द्वैताद्वैतात्मकत्वे समुद्रादिदृष्टान्ता विद्यन्ते, कथमुच्यते भवतैकस्य द्वैताद्वैतत्वं विरुद्धमिति । | रसघनस्वरूप निरवकाश तथा पूर्वापर और बाह्याभ्यन्तर भेदसे रहित है' 'सबाह्याभ्यन्तर अज है' 'नेति नेति' 'अस्थूल, अनणु, अह्रस्व, अजर, अभय और अमृत है' इत्यादि श्रुतियां, जो निश्चितार्थ और संशय-विपर्यय एवं शङ्कासे रहित हैं, सारी ही समुद्रमें डाल देनी होंगी; क्योंकि रहकर भी वे कुछ कर नहीं सकतीं । <br><br> इसी प्रकार युक्तिसे भी विरोध आता है; क्योंकि सावयव, अनेकात्मक और क्रियावान् पदार्थका नित्य होना सम्भव नहीं है। और स्मृति आदि देखनेसे आत्माके नित्यत्वका अनुमान होता है। उसका अनित्यत्व माननेपर उस युक्तिसिद्ध नित्यत्वसे विरोध प्राप्त होता है । [ और यदि आत्माका अनित्यत्व स्वीकार भी किया जाय तो भी ] आपकी कल्पना व्यर्थ हो ठहरती है। इस पक्षमें कर्मकाण्डकी व्यर्थता स्पष्ट ही है, क्योंकि [ आत्माको अनित्य माननेपर ] बिना कियेकी प्राप्ति और किये हुएका नाश होने-का प्रसङ्ग उपस्थित होगा । <br><br> पूर्व०-किंतु ब्रह्मके द्वैताद्वैतरूप होनेमें समुद्रादि दृष्टान्त विद्यमान हैं, फिर आप ऐसा कैसे कहते हैं कि एकका द्वैताद्वैतरूप होना विरुद्ध है ? |

बृ० उ० ७४-

| ११७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |

११७०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ५
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
न, अन्यविषयत्वात्। नित्यनिरवयववस्तुविषयं हि विरुद्धत्वमवोचाम द्वैताद्वैतत्वस्य, न कार्यविषये सावयवे। तस्माच्छ्रुतिस्मृतिन्यायविरोधादनुपपन्नेयं कल्पना; अस्याः कल्पनाया वरमुपनिषत्परित्याग एव।सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है, क्योंकि [ हम जो विरोध दिखलाते हैं ] उसका विषय दूसरा है। हमने नित्य और निरवयव वस्तुके विषयमें द्वैताद्वैतका विरोध बतलाया है, सावयव कार्यके विषयमें नहीं। अतः श्रुति-स्मृति और युक्तिसे विरोध होनेके कारण यह कल्पना अनुचित है। इस कल्पनाकी अपेक्षा तो उपनिषद्का परित्याग कर देना ही अच्छा है।
अध्येयत्वाच्च न शास्त्रार्थेयं कल्पना। न हि जननमरणायनर्थशतसहस्रभेदसमाकुलं समुद्रवनादिवत् सावयवमनेकरसं ब्रह्म ध्येयत्वेन विज्ञेयत्वेन वा श्रुत्योपदिश्यते।सावयव ब्रह्मका ध्येयरूपसे उपदेश न होनेके कारण भी यह कल्पना शास्त्रका तात्पर्य नहीं हो सकती। जो जन्म-मरणादि सैकड़ों-सहस्रों अनर्थरूप भेदसे सम्पन्न और समुद्र एवं वनादिके समान सावयव तथा अनेक रस है, ऐसे ब्रह्मका श्रुतिद्वारा ध्येय या ज्ञेयरूपसे उपदेश नहीं किया जाता।
प्रज्ञानघनतां चोपदिशति, “एकधैवानुद्रष्टव्यम्” (बृ०उ० ४।४।२०) इति च अनेकधादर्शनापवादाच्च— “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति” (४।४।१९) इति।इसके सिवा श्रुति उसकी प्रज्ञानघनताका भी उपदेश देती है तथा ऐसा भी कहती है कि “उसे निरन्तर एक प्रकार ही देखना चाहिये।” “जो यहाँ नानावत् देखता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है”, इस प्रकार अनेकरूप देखनेकी निन्दा की जानेसे भी यही सिद्ध होता है। और

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११७१

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११७१


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
यच्च श्रुत्या निन्दितं तन्न कर्तव्यम्, यच्च न क्रियते न स शास्त्रार्थः ब्रह्मणोऽनेकरसत्वमनेकधात्वं च द्वैतरूपं निन्दितत्वान्न द्रष्टव्यम्; अतो न शास्त्रार्थः। यत्त्वेकरसत्वं ब्रह्मणः, तद् द्रष्टव्यत्वात् प्रशस्तम्, प्रशस्तत्वाच्च शास्त्रार्थो भवितुमर्हति ।जिसकी श्रुतिने निन्दा की हो वह कर्तव्य नहीं हो सकता तथा जो किया नहीं जाता वह शास्त्रका तात्पर्य नहीं हो सकता । ब्रह्मके द्वैतरूप अनेकरसत्व और नानात्वकी निन्दा की गयी, इसलिये उसे ब्रह्ममें नहीं देखना चाहिये, अतएव वह शास्त्रका तात्पर्य नहीं है । ब्रह्मकी जो एकरसता है, वही द्रष्टव्य होनेके कारण प्रशस्त है और प्रशस्त होनेके कारण वह शास्त्रका तात्पर्य भी हो सकती है ।
यत्तूक्तं वेदैकदेशस्याप्रामाण्यं कर्मविषये द्वैताभावादद्वैते च प्रामाण्यमिति तन्न; यथाप्राप्तोपदेशार्थत्वात् । न हि द्वैतमद्वैतं वा वस्तु जातमात्रमेव पुरुषं ज्ञापयित्वा पश्चात् कर्म वा ब्रह्मविद्यां वोपदिशति शास्त्रम् ।और ऐसा जो कहा कि द्वैतका अभाव होनेके कारण वेदके कर्म-विषयक एक भागकी तो अप्रामाणिकता हो जायगी और अद्वैत-विषयमें प्रामाणिकता होगी, सो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि शास्त्र तो यथाप्राप्त वस्तुका उपदेश करनेके लिये है । जन्म लेते ही किसी पुरुषको द्वैत या अद्वैत-तत्त्वका बोध कराकर फिर उसे कर्म या ब्रह्मविद्याका उपदेश शास्त्र नहीं कर देता ।
न चोपदेशार्हं द्वैतम्; जातमात्रप्राणिबुद्धिगम्यत्वात् । न च द्वैतस्यानृतत्वबुद्धिः प्रथममेवइसके सिवा द्वैत तो उपदेशके योग्य है भी नहीं, क्योंकि वह तो प्रत्येक जन्मधारी जीवकी बुद्धिका विषय है । आरम्भसे ही किसीको द्वैतमें मिथ्यात्वबुद्धि नहीं होती,

११७२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

११७२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५


संस्कृतहिन्दी
कस्यचित् स्यात्, येन द्वैतस्य सत्यत्वमुपादिश्य पश्चादात्मनः प्रामाण्यं प्रतिपादयेच्छास्त्रम् । नापि पाषण्डिभिरपि प्रस्थापिताः शास्त्रस्य प्रामाण्यं न गृह्णीयुः ।जिससे कि शास्त्र उसे द्वैतका सत्यत्व समझाकर फिर अपनी प्रामाणिकताका प्रतिपादन करे । तथा [ बौद्धादि ] पाखण्डियोंद्वारा श्रेयोमार्गमें प्रवृत्त किये हुए शिष्य-गण भी शास्त्रका प्रामाण्य स्वीकार न करें-ऐसी बात भी नहीं है ।
तस्माद् यथाप्राप्तमेव द्वैतमविद्याकृतं स्वाभाविकमुपादाय स्वाभाविक्यैवाविद्यया युक्ताय रागद्वेषादिदोषवते यथाभिमतपुरुषार्थसाधनं कर्मोपदिशत्यग्रे पश्चात् प्रसिद्धक्रियाकारकफलस्वरूपदोषदर्शनवते तद्विपरीतौदासीन्यस्वरूपावस्थानफलार्थिने तदुपायभूतामात्मैकत्वदर्शनात्मिकां ब्रह्मविद्यामुपदिशति । अथैवं सति तदौदासीन्यस्वरूपावस्थाने फले प्राप्ते शास्त्रस्य प्रामाण्यं प्रत्यर्थित्वं निवर्तते । तदभावाच्छास्त्रस्यापि शास्त्रत्वं तं प्रति निवर्तत एव ।अतः अविद्याकृत यथाप्राप्त स्वाभाविक द्वैतको ही ग्रहणकर जो स्वाभाविक अविद्यासे युक्त और रागद्वेषवान् है, उस पुरुषको शास्त्र पहले उसके अभिमत कर्मरूप पुरुषार्थके साधनका उपदेश करता है । पीछे जो प्रसिद्ध क्रिया, कारक और फलस्वरूप कर्ममें दोष देखनेवाला तथा उससे विपरीत उदासीनरूपसे स्थितिरूप फलका इच्छुक होता है, उसे ही वह उसकी उपायभूता आत्मैकत्वदर्शनरूपा ब्रह्मविद्याका उपदेश करता है । फिर ऐसा होनेपर उस औदासीन्यस्वरूपमें स्थितिरूप फलकी प्राप्ति हो जानेपर शास्त्रके प्रामाण्यके प्रति आकांक्षाकी निवृत्ति हो जाती है । उसका अभाव हो जानेपर उसके लिये शास्त्रका शास्त्रत्व भी निवृत्त हो ही जाता है ।
तथा प्रतिपुरुषं परिसमाप्तं शास्त्रमिति न शास्त्रविरोधगन्धो-इस प्रकार प्रत्येक पुरुषके प्रति शास्त्रका प्रयोजन पूरा हो जाता है, इसलिये शास्त्रके विरोधकी तो गन्ध

| ब्राह्मण १] | शाङ्करभाष्यार्थे | ११७३ |

ब्राह्मण १]शाङ्करभाष्यार्थे११७३
संस्कृत (भाष्य)हिन्दी (भाष्यार्थ)
ऽप्यस्ति, अद्वैतज्ञानावसानत्वाच्छास्त्रशिष्यशासनादिद्वैतभेदस्य । अन्यतमावस्थाने हि विरोधः स्यादवस्थितस्य, इतरेतरापेक्षत्वात्तु शास्त्रशिष्यशासनानां नान्यतमोऽप्यवतिष्ठते । सर्वसमाप्तौ तु कस्य विरोध आशङ्क्येताद्वैते केवले शिवे सिद्धे ? नाप्यविरोधता अत एव ।भी नहीं है; क्योंकि शास्त्र, शिष्य और शासनादि द्वैतभेदकी तो अद्वैतज्ञान होनेपर समाप्ति हो जाती है। यदि इनमेंसे कोई भी रह जाता तो उस रहे हुएका विरोध रहता। किंतु ये शास्त्र, शिष्य और शासन तो एक-दूसरेकी अपेक्षा रखनेवाले हैं, इसलिये इनमेंसे कोई भी स्थित नहीं रहता इस प्रकार सबकी समाप्ति हो जानेपर तो एकमात्र, शिवस्वरूप, नित्यसिद्ध अद्वैतमें किसके विरोधकी आशङ्का की जाय ? और इसीसे उसका किसीसे अविरोध भी नहीं है।
अथाप्यभ्युपगम्य ब्रूमः— <br> द्वैताद्वैतात्मकत्वेऽपि शास्त्रविरोधस्य तुल्यत्वात् । यदापि समुद्रादिवद् द्वैताद्वैतात्मकमेकं ब्रह्माभ्युपगच्छामो नान्यद् वस्त्वन्तरम्, तदापि भवदुक्ताच्छास्त्रविरोधान्न मुच्यामहे ।अब हम ब्रह्मको द्वैताद्वैतरूप मानकर भी बतलाते हैं कि उसके द्वैताद्वैतरूप होनेपर भी शास्त्रका विरोध ऐसा ही है। जब हम समुद्रादिके समान द्वैताद्वैतरूप एक ही ब्रह्म स्वीकार करते हैं, उसके सिवा कोई दूसरी वस्तु नहीं मानते उस समय भी हम आपके बतलाये हुए शास्त्रविरोधसे मुक्त नहीं होते !
कथम् ? एकं हि परं ब्रह्म द्वैताद्वैतात्मकं तच्छोकमोहाद्यतीतत्वादुपदेशं न काङ्क्षति । नोपदेष्टा अन्यो ब्रह्मणो द्वैता-किस प्रकार ? [सो बतलाते हैं-] <br> द्वैताद्वैतरूप एक ही ब्रह्म है, वह शोकमोहादिसे अतीत होनेके कारण उपदेशकी आकांक्षा नहीं रख सकता । इसके सिवा उपदेश करनेवाला भी

| ११७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ |

११७४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| द्वैतरूपस्य ब्रह्मण एकस्यैवाभ्युपगमात् । | ब्रह्मसे भिन्न नहीं हो सकता; क्योंकि द्वैताद्वैतरूप एक ही ब्रह्म स्वीकार किया गया है । | | अथ द्वैतविषयस्यानेकत्वार्दन्योन्योपदेशो न ब्रह्मविषय उपदेश इति चेत् ? तदा द्वैताद्वैतात्मकमेकमेव ब्रह्म नान्यदस्तीति विरुध्यते । यस्मिन् द्वैतविषयेऽन्योन्योपदेशः सोऽन्योऽद्वैतं चान्यदेवेति समुद्रदृष्टान्तो विरुद्धः । न च समुद्रोदकैकत्ववद् विज्ञानैकत्वे ब्रह्मणोऽन्यत्रोपदेशग्रहणादिकल्पना सम्भवति । न हि हस्तादिद्वैताद्वैतात्मके देवदत्ते वाक्कर्णयोर्देवदत्तैकदेशभूतयोर्वागुपदेष्ट्री कर्णः केवल उपदेशस्य ग्रहीता, देवदत्तस्तु नोपदेष्टा नाप्युपदेशस्य ग्रहीतेति कल्पयितुं शक्यते; समुद्रैकोदकात्मत्ववदेकविज्ञानवत्त्वाद् देवदत्तस्य । त- | और यदि ऐसा कहो कि द्वैत विषय अनेकरूप है, इसलिये उसमें परस्पर उपदेश हो सकता है; ब्रह्मरूप विषयमें उपदेश नहीं होता, तब तो द्वैताद्वैतरूप एक ही ब्रह्म है, उससे भिन्न कोई नहीं है—इस कथनसे विरोध होगा । जिस द्वैतविषयमें परस्पर उपदेश होता है, वह तो अन्य होगा और अद्वैत अन्य होगा—इस प्रकार समुद्रका दृष्टान्त विरुद्ध ही रहा । यदि समुद्रके जलकी एकताके समान विज्ञानकी भी एकता है, तो ब्रह्मसे भिन्न उपदेशग्रहणादिकी कल्पना संभव नहीं हो सकती । हस्तपादादि द्वैताद्वैतरूप देवदत्तमें देवदत्तके एकदेशभूत वाणी और कर्णमेंसे केवल वाणी उपदेश करनेवाली है और अकेला कर्ण उपदेशको ग्रहण करनेवाला है, देवदत्त न तो उपदेश देनेवाला है और न उसे ग्रहण करनेवाला—ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती; क्योंकि जिस प्रकार समुद्र एकमात्र जलस्वरूप है, उसी प्रकार देवदत्त भी एक ही |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७५

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७५


| स्माच्छ्रुतिन्यायविरोधश्चाभिप्रेता- <br> र्थासिद्धिश्चैवंकल्पनायां स्यात्। <br><br> तस्माद् यथाव्याख्यात एवास्माभिः <br><br> 'पूर्णमदः' इत्यस्य मन्त्रस्यार्थः। | विज्ञानवान् है। अतः ऐसी कल्पना करनेमें श्रुति और युक्तिसे विरोध तथा अभिमत अर्थकी असिद्धि भी होगी। इसलिये 'पूर्णमदः' इत्यादि इस मन्त्रका अर्थ, जैसी हमने व्याख्या की है, वही है। |

ॐ खं ब्रह्म और उसकी उपासनाका वर्णन

ॐ खं ब्रह्म ! * खं पुराणं वायुरं खमिति ह स्माह कौरव्यायणीपुत्रो वेदोऽयं ब्राह्मणा विदुर्वेदैनेन यद् वेदितव्यम् ॥ १ ॥

आकाश ब्रह्म ॐकार है। आकाश [ यहाँ जड नहीं ] सनातन [ परमात्मा ] है। 'जिसमें वायु रहता, वह आकाश ही ख है'—ऐसा कौरव्यायणीपुत्रने कहा है। यह ओङ्कार वेद है—ऐसा ब्राह्मण जानते हैं; क्योंकि जो ज्ञातव्य है, उसका इससे ज्ञान होता है ॥ १ ॥

| ॐ खं ब्रह्मेति मन्त्रोऽयं चान्यत्राविनियुक्त इह ब्राह्मणेन ध्यानकर्मणि विनियुज्यते। अत्र च ब्रह्मेति विशेष्याभिधानं खमिति विशेषणम्। विशेषण-विशेष्ययोश्च सामानाधिकरण्येन निर्देशो नीलोत्पलवत् खं ब्रह्मेति। | 'ॐ खं ब्रह्म' यह मन्त्र है। इसका कहीं अन्यत्र विनियोग नहीं हुआ, यहाँ ब्राह्मण इसका ध्यान-कर्ममें विनियोग करता है। इसमें भी 'ब्रह्म' यह विशेष्य-नाम है और 'खम्' यह विशेषण है। इस प्रकार 'नील कमल' के समान 'खं ब्रह्म' इस विशेष्य और विशेषणका यहाँ १समानाधिकरणरूपसे निर्देश किया गया |


* 'ॐ खं ब्रह्म' यह मन्त्र है। इससे आगे इसका व्याख्यानभूत ब्राह्मण है।
१. जिन पदोंकी विभक्ति, वचन और लिङ्ग एक-से हों, वे 'समानाधिकरण' होते हैं। यहाँ 'ख' और 'ब्रह्म'—दोनों ही शब्दोंमें प्रथमा विभक्ति, एकवचन और नपुंसक लिङ्ग है।

११७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

११७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५


ब्रह्मशब्दो बृहद्वस्तुमात्रास्पदोऽविशेषितः, अतो विशेष्यते खं ब्रह्मेति ।है । कोई विशेषण न होनेपर 'ब्रह्म' शब्द बृहत् वस्तुमात्रका वाचक है, इसलिये इसे 'खं ब्रह्म' इस प्रकार विशेषित किया जाता है ।
यत्तत् खं ब्रह्म तदोंशब्दवाच्यमोंशब्दस्वरूपमेव वा, उभयथापि सामानाधिकरण्यमविरुद्धम् । इह च ब्रह्मोपासनसाधनत्वार्थमोंशब्दः प्रयुक्तः । तथा च श्रुत्यन्तरात्—<br>"एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्" (क० उ० १ । २ । १७) "ओमित्यात्मानं युञ्जीत" (महानारा० २४ । १) "ओमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत" (प्र० उ० ५ । ५) "ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम्" (मु० उ० २ । २ । ६) इत्यादेः ।वह जो खं ब्रह्म है वह ॐ शब्दवाच्य है अथवा ॐ शब्दस्वरूप ही है, दोनों ही प्रकारसे इनके समानाधिकरणत्वमें कोई विरोध नहीं आता । यहाँ ब्रह्मोपासनाके साधनार्थ होनेके कारण ॐ शब्दका प्रयोग किया गया है । ऐसा ही "यह श्रेष्ठ आलम्बन है, यह उत्कृष्ट आलम्बन है", "ॐ इस प्रकार उच्चारण कर चित्तको संयत करे", "ॐ इस अक्षरके द्वारा ही परब्रह्मका ध्यान करे", "ॐ इस प्रकार आत्माका ध्यान करो" इत्यादि अन्य श्रुतियोंसे सिद्ध होता है ।
अन्यार्थासम्भवाच्चोपदेशस्य—<br>यथान्यत्र "ओमिति शंसत्योमित्युद्गायति" (छा० उ० १ । १ । ९) इत्येवमादौ स्वाध्यायारम्भापवर्गयोश्चोङ्कारप्रयोगो विनियोगादवगम्यते, न च तथार्थान्तरमिहावगम्यते । तस्माद् ध्यानसाधनत्वेनैवेहोङ्कारशब्दस्योपदेशः ।इसके सिवा इस उपदेशका कोई दूसरा अर्थ सम्भव न होनेसे भी उसे उपासनार्थ ही मानना चाहिये । जिस प्रकार "ॐ ऐसा कहकर शस्त्रपाठ करता है, ॐ ऐसा कहकर उद्गान करता है" इत्यादि स्थलोंमें विनियोगसे स्वाध्यायके आरम्भ और अन्तमें ओङ्कारका प्रयोग विदित होता है, उस प्रकार यहाँ इसका कोई अर्थान्तर ज्ञात नहीं होता । अतः यहाँ ध्यानके साधनरूपसे ही ओङ्कार शब्दका उपदेश किया गया है ।

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११७७

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११७७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
यद्यपि ब्रह्मात्मादिशब्दा ब्रह्मणो वाचकास्तथापि श्रुतिप्रामाण्याद् ब्रह्मणो नेदिष्ठमभिधानमोङ्कारः। अत एव ब्रह्मप्रतिपत्ताविदं परं साधनम्। तच्च द्विप्रकारेण प्रतीकत्वेनाभिधानत्वेन च। प्रतीकत्वेन यथा—<br><br>विष्ण्वादिप्रतिमाभेदेनैवमोङ्कारो ब्रह्मेति प्रतिपत्तव्यः। तथा ह्योङ्कारालम्बनस्य ब्रह्म प्रसीदति—<br>“एतदालम्बनं श्रेष्ठ-<br>मेतदालम्बनं परम्।<br>एतदालम्बनं ज्ञात्वा<br>ब्रह्मलोके महीयते॥”<br>(क०उ० १।२।१७) इतिश्रुतेः।<br><br>तत्र खमिति भौतिके खे प्रतीतिर्मा भूदित्याह—खं पुराणं चिरन्तनं खं परमात्माकाशमित्यर्थः। यत्तत् परमात्माकाशं पुराणं खं तच्चक्षुराद्यविषयत्वान्नि-यद्यपि 'ब्रह्म' और 'आत्मा' आदि शब्द ब्रह्मके वाचक हैं, तथापि श्रुतिप्रामाण्यसे ब्रह्मका अत्यन्त समीपवर्ती (प्रियतम) नाम ओङ्कार है। इसीसे यह ब्रह्मकी प्राप्तिमें परम साधन है। वह साधन भी दो प्रकारसे है—प्रतीकरूपसे और नामरूपसे। प्रतीकरूपसे, जैसे—विष्णु आदिकी प्रतिमाओंका विष्णु आदिके साथ अभेदरूपसे चिन्तन किया जाता है, उसी प्रकार 'ओंकार ही ब्रह्म है' ऐसा चिन्तन करना चाहिये। इस प्रकार ओङ्कार जिसका आलम्बन है, उससे ब्रह्म प्रसन्न होता है, जैसा कि “यह श्रेष्ठ आलम्बन है, यह परम आलम्बन है' इस आलम्बनको जानकर उपासक ब्रह्मलोकमें पूजित होता है,” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है।<br><br>यहाँ 'खम्' इससे भौतिक आकाश न समझ लिया जाय—इसलिये श्रुति कहती है¹—'खं पुराणम्'—सनातन आकाश अर्थात् परमात्माकाश। वह जो परमात्माकाशरूप पुरातन आकाश है, वह चक्षु आदिका विषय न

१. इसका विशद विचार ब्रह्मसूत्रके आकाशाधिकरणमें किया गया है। वहाँ अनेक युक्तियोंके द्वारा यह सिद्ध किया गया है कि उपनिषदोंमें आकाश, काल, इन्द्र आदि पद परमात्माके लिये ही आये हैं।

११७८ || बृहदारण्यकोपनिषद् || [अध्याय ५

११७८ || बृहदारण्यकोपनिषद् || [अध्याय ५


संस्कृतहिन्दी व्याख्या
रालम्बनमशक्यं ग्रहीतुमिति श्रद्धाभक्तिभ्यां भावविशेषेण चोङ्कार आवेशयति । यथा विष्ण्वङ्गाङ्कितायां शिलादिप्रतिमायां विष्णुं लोक एवम् ।होनेके कारण निरालम्बन है और ग्रहण नहीं किया जा सकता, इसलिये श्रुति श्रद्धाभक्तिपूर्वक भाव-विशेषके द्वारा उसका ओङ्कारमें आवेश करती है। जिस प्रकार लोक विष्णुके अङ्गोंसे अङ्कित शिलादिकी प्रतिमामें विष्णुका आवेश करता है, उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये।
वायुरं खं वायुरस्मिन् विद्यत इति वायुरं खं खमात्रं खमित्युच्यते न पुराणं खमित्येवमाह स्म । कोऽसौ ? कौरव्यायणीपुत्रः । वायुरे हि खे मुख्यः खशब्दव्यवहारः, तस्मान्मुख्ये सम्प्रत्ययो युक्त इति मन्यते ।'वायुरं खम्'—जिसमें वायु रहता है, ऐसा यह वायुर ख अर्थात् आकाशमात्र ही 'खम्' इस पदसे कहा जाता है, सनातन आकाश नहीं—ऐसा कहा है। वह कहने-वाला कौन है?—कौरव्यायणीपुत्र। ख शब्दका मुख्य व्यवहार वायुर आकाशमें ही है, अतः [गौण^१-मुख्य न्यायसे] इसका मुख्य अर्थमें ही प्रत्यय मानना उचित है—ऐसा वह मानता है।
तत्र यदि पुराणं खं ब्रह्म निरुपाधिकस्वरूपं यदि वा वायुरं खं सोपाधिकं ब्रह्म सर्वथाप्योङ्कारः, प्रतीकत्वेनैव प्रतिमावत् साधनत्वंसो यहाँ 'खम्' इस पदका अभिप्राय सनातन आकाशरूप निरुपाधिक ब्रह्मसे हो या वायुर आकाशरूप सोपाधिक ब्रह्मसे, सभी प्रकार प्रतिमाके समान प्रतीकरूपसे

१. 'गौणमुख्ययोर्मुख्ये कार्यसम्प्रत्ययः'—गौण और मुख्य—इनमेंसे मुख्यमें ही कार्यकी सम्यक् प्रतीति होती है—इस न्यायके अनुसार मुख्य अर्थमें प्रतीति ठीक ही है।

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७९

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७९


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-भाष्यार्थ
प्रतिपद्यते—"एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः” (प्र० उ० ५।२) इति श्रुत्यन्तरात्। केवलं खशब्दार्थे विप्रतिपत्तिः।ही ओङ्कारकी साधनता सिद्ध होती है, जैसा कि "हे सत्यकाम ! यह जो ओङ्कार है यही पर और अपर ब्रह्म है" इस दूसरी श्रुतिसे सिद्ध होता है। यहाँ जो मतभेद है, वह तो 'ख' शब्दके अर्थमें ही है।
वेदोऽयमोङ्कारो वेद विजानात्यनेन यद् वेदितव्यम्। तस्माद् वेद ॐकारो वाचकोऽभिधानम्। तेनाभिधानेन यद् वेदितव्यं ब्रह्म प्रकाश्यमानमभिधीयमानं वेद साधको विजानात्युपलभते। तस्माद् वेदोऽयमिति ब्राह्मणा विदुः। तस्माद् ब्राह्मणानामभिधानत्वेन साधनत्वमभिप्रेतमोङ्कारस्य।यह ओङ्कार वेद है। जो वेदितव्य है, उसका जिससे ज्ञान हो उसे 'वेद' कहते हैं। अतः ओङ्कार वेदवाचक यानी नाम है। उस नामसे जो वेदितव्य-प्रकाशित होनेवाला अर्थात् कहा जानेवाला ब्रह्म है; उसे साधक जानता यानी उपलब्ध करता है। अतः यह वेद हे-ऐसा ब्राह्मण जानते हैं। इसलिये ब्राह्मणोंको यह मान्य है कि ओङ्कार अभिधान (नाम) रूपसे ब्रह्म-साक्षात्कारका साधन है।
अथवा 'वेदोऽयम्' इत्याद्यर्थवादः। कथमोङ्कारो ब्रह्मणः प्रतीकत्वेन विहितः ? ॐ खं ब्रह्मेति सामानाधिकरण्यात् तस्य स्तुतिरिदानीं वेदत्वेन। सर्वो ह्ययं वेद ओङ्कार एव। एतत्प्रभव एतदात्मकः सर्व ऋग्यजुःसामादिभेदभिन्न एष ओङ्कारःअथवा 'वेदोऽयम्' इत्यादि वाक्य अर्थवाद है। किस प्रकार—ओङ्कारका ब्रह्मके प्रतीकरूपसे विधान किया गया है? क्योंकि 'ॐ खं ब्रह्म' इस प्रकार उनका सामानाधिकरण्य है। अब वेदरूपसे उसकी स्तुति की जाती है। यह सारा वेद ओङ्कार ही है। इससे प्रकट होनेवाला और इसीका स्वरूपभूत यह सब ऋक्, यजु और सामरूप भेदोंमें विभिन्न हुआ श्रुतिसमुदाय भी ओङ्कार ही है; जैसा कि

११८० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

११८० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

| “तद् यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि” (छा० उ० २ । २३ । ४) इत्यादिश्रुत्यन्तरात् । <br> इतश्चायं वेद ॐकारो यद् वेदितव्यं तत् सर्वं वेदितव्यमोङ्कारेणैव वेदेनेनातोऽयमोङ्कारो वेदः। इतरस्यापि वेदस्य वेदत्वमत एव तस्माद् विशिष्टोऽयमोङ्कारः साधनत्वेन प्रतिपत्तव्य इति । <br> अथवा वेदः सः, कोऽसौ ? यं ब्राह्मणा विदुराेङ्कारम् । ब्राह्मणानां ह्यसौ प्रणवोद्गीथादिविकल्पैर्विज्ञेयः । तस्मिन् हि प्रयुज्यमाने साधनत्वेन सर्वो वेदः प्रयुक्तो भवतीति ॥ १ ॥ | “जिस प्रकार शङ्कुसे सम्पूर्ण पत्ते व्याप्त रहते हैं” इत्यादि अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है । <br> यह वेद इसलिये भी ओङ्कार है, क्योंकि जो वेदितव्य है, वह सब इस ओङ्काररूप वेदसे ही जाना जा सकता है । अतः यह ओङ्कार वेद है इसीलिये इससे भिन्न वेदका भी वेदत्व है । उससे विशिष्ट जो यह ओङ्कार है, इसे साधनरूपसे जानना चाहिये । <br> अथवा वह वेद है । वह कौन ? जिसे ब्राह्मण ओङ्काररूपसे जानते हैं, क्योंकि यह ओङ्कार ब्राह्मणोंका प्रणव-उद्गीथादि विकल्परूपसे विज्ञेय (उपास्य) है । और उसका साधनरूपसे प्रयोग करनेपर सारे ही वेदका प्रयोग हो जाता है ॥ १ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये प्रथमम् ‘ॐ खं ब्रह्म’ ब्राह्मणम् ॥ १ ॥


द्वितीय ब्राह्मण

प्रजापतिका देव, मनुष्य और असुर तीनोंको एक ही अक्षर ‘द’ से पृथक्-पृथक् दम, दान और दयाका उपदेश

| अधुना दमादिसाधनत्रयविधानाथोऽयमारम्भः— | अब दमादि तीन साधनोंका विधान करनेके लिये यह आरम्भ किया जाता है— |

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११८१

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११८१

त्रयाः प्राजापत्याः प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यमू-<br>षुर्देवा मनुष्या असुरा उषित्वा ब्रह्मचर्यं देवा ऊचुर्ब्र-<br>वीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदक्षरमुवाच द इति<br>व्यज्ञासिष्टा ३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्द्दाम्यतेति न<br>आत्थेत्योमिति होवाच व्याज्ञासिष्टेति ॥ १ ॥

देव, मनुष्य और असुर—इन प्रजापतिके तीन पुत्रोंने पिता प्रजापतिके यहाँ ब्रह्मचर्यवास किया। ब्रह्मचर्यवास कर चुकनेपर देवोंने कहा, 'आप हमें उपदेश कीजिये।' उनसे प्रजापतिने 'द' यह अक्षर कहा और पूछा 'समझ गये क्या ?' इसपर उन्होंने कहा, 'समझ गये, आपने हमसे दमन करो ऐसा कहा है।' तब प्रजापतिने कहा, 'ठीक है, तुम समझ गये' ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
त्रयास्त्रिसंख्याकाः प्राजापत्याः प्रजापतेरपत्यानि प्राजापत्यास्ते किं प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यं शिष्यत्ववृत्तेर्ब्रह्मचर्यस्य प्राधान्याच्छिष्याः सन्तो ब्रह्मचर्यमूषुरुषितवन्त इत्यर्थः । के ते ? विशेषतो देवा मनुष्या असुराश्च । ते चोषित्वा ब्रह्मचर्यं किमकुर्वन् ? इत्युच्यते तेषां देवा ऊचुः पितरं प्रजापतिम्, किमिति ? ब्रवीतु कथयतु नः अस्मभ्यं यदनुशासनं भवानिति ।'त्रयाः'—तीनसंख्यावाले 'प्राजापत्याः'—प्रजापतिके पुत्र थे। उन्होंने क्या किया—पिता प्रजापतिके पास ब्रह्मचर्यपूर्वक वास किया—शिष्यभावसे बर्तनेवाले पुरुषके जितने धर्म हैं, उनमें ब्रह्मचर्यकी प्रधानता है, इसलिये शिष्य होकर उन्होंने ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास किया—ऐसा इसका तात्पर्य है। वे कौन थे ? विशेषतः देव, मनुष्य और असुर। उन्होंने ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास करके क्या किया ? सो बतलाया जाता है—उनमेंसे देवताओंने पिता प्रजापतिसे कहा। क्या कहा ? आपका हमारे लिये जो अनुशासन हो वह आप कहिये।

११८२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

११८२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

| तेभ्य एवमर्थिभ्यो हैतदक्षरं वर्णमात्रमुवाच द इति—उक्त्वा च तान् पप्रच्छ पिता किं व्यज्ञासिष्टा ३ इति मयोपदेशार्थमभिहितस्याक्षरस्यार्थं विज्ञातवन्त आहोस्विन्न ? इति ।<br><br>देवा ऊचुः—व्यज्ञासिष्मेति विज्ञातवन्तो वयम् । यद्येवमुच्यतां किं मयोक्तम् ? इति, देवा ऊचुः—दाम्यत—अदान्ता यूयं स्वभावतः, अतो दान्ता भवत—इति नोऽस्मानात्थ कथयसि । इतर आह—ओमिति, सम्यग् व्यज्ञासिष्टेति ॥ १ ॥ | इस प्रकार प्रार्थना करनेवाले उन देवताओंसे प्रजापतिने 'द' यह अक्षर—केवल वर्णमात्र कहा। और उनसे कहकर पिता प्रजापतिने पूछा, 'समझ गये क्या ? अर्थात् मैंने उपदेशके लिये जो अक्षर उच्चारण किया, उसका अर्थ तुम समझ गये या नहीं ?'<br><br>देवताओंने कहा, 'समझ गये, हम आपका अभिप्राय जान गये।' [ प्रजापति बोले— ] 'यदि ऐसी बात है, तो बताओ, मैंने क्या कहा है ?' देवताओंने कहा, 'आप हमसे कहते हैं, दमन–इन्द्रियनिग्रह करो, तुमलोग स्वभावसे अदान्त (अजितेन्द्रिय) हो, इसलिये दमनशील बनो।' इतर (प्रजापति) ने कहा, 'हाँ, ठीक समझे हो' ॥ १ ॥ |


अथ हैनँ मनुष्या ऊचुर्ब्रवीतु नो भगवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा ३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दत्तेति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति ॥ २ ॥

फिर प्रजापतिसे मनुष्योंने कहा, 'आप हमें उपदेश कीजिये।' उनसे भी प्रजापतिने 'द' यह अक्षर ही कहा और पूछा, 'समझ गये क्या ?' मनुष्योंने कहा, 'समझ गये, आपने हमसे 'दान करो' ऐसा कहा है।' तब प्रजापतिने 'हां समझ गये' ऐसा कहा ॥ २ ॥

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थे ११८३

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थे ११८३


| समानमन्यत् । स्वभावतो लुब्धा यूयमतो यथाशक्ति संविभजत दत्त—इति नोऽस्मानात्थ किमन्यद् ब्रूयान्नो हितमिति मनुष्याः ॥ २ ॥ | इस मन्त्रका अन्य सब अर्थ पूर्ववत् है। ‘तुम स्वभावतः लोभी हो इसलिये यथाशक्ति संविभाग करो—दान दो—ऐसा आपने हमसे कहा है। इसके सिवा आप हमारे हितकी और क्या बात कहेंगे?’- ऐसा मनुष्योंने कहा ॥ २ ॥ |


अथ हैनमसुरा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा ३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दयध्वमिति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति तदेतदेवैषा दैवी वागनुवदति स्तनयित्नुर्द द द इति दाम्यत दत्त दयध्वमिति तदेतत् त्रयँ शिक्षेद्दमं दानं दयामिति ॥ ३ ॥

फिर प्रजापतिसे असुरोंने कहा, 'आप हमें उपदेश कीजिये।' उनसे भी प्रजापतिने 'द' यह अक्षर ही कहा और पूछा, 'समझ गये क्या?' असुरोंने कहा, 'समझ गये, आपने हमसे 'दया करो' ऐसा कहा है।' तब प्रजापतिने 'हाँ, समझ गये' ऐसा कहा। उस इस प्रजापतिके अनुशासनका मेघगर्जनारूपी दैवी वाक् आज भी द द द इस प्रकार अनुवाद करती है, अर्थात् दमन करो, दान दो, दया करो। अतः दम, दान और दया—इन तीनोंको सीखे ॥ ३ ॥

| तथा असुरा दयध्वमिति, क्रूरा यूयं हिंसादिपराः, अतो दयध्वं प्राणिषु दयां कुरुत—इति। तदेतत् प्रजापतेरनुशासन- | इसी प्रकार असुरोंने अपना अभिप्राय 'दया करो' ऐसा बतलाया, 'क्योंकि तुम क्रूर और हिंसापरायण हो, इसलिये 'दयध्वम्'—प्राणियोंपर दया करो।' प्रजापतिके इस अनुशासनकी आज भी अनु- |