बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९१
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९१
| संस्कृत | हिन्दी |
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| न हि प्राणापानव्यापारस्य प्राणनापाननलक्षणस्योपरमोऽस्ति । तस्मात्तदेवैकं व्रतं चरेद्धित्वेन्द्रियान्तरव्यापारं नेन्मा मां पाप्मा मृत्युः श्रमरूप्याप्नुवदाप्नुयात् । नेच्छब्दः परिभये--'यद्यहमस्माद् व्रतात्प्रच्युतः स्याम्, ग्रस्त एवाहं मृत्युना' इत्येवं त्रस्तो धारयेत्प्राणव्रतमित्यभिप्रायः । | करे, क्योंकि प्राण और अपानके व्यापार प्राणन और अपाननकी कभी निवृत्ति नहीं होती । अतः इस भयसे कि मुझे कहीं श्रमरूपी पापात्मा मृत्यु व्याप्त न कर ले, अन्य इन्द्रियोंके व्यापारको छोड़कर एक इसी व्रतका आचरण करे । यहाँ 'नेत्' शब्द परिभयके अर्थमें है । अभिप्राय यह है कि 'यदि मैं इस व्रतसे च्युत हो जाऊँगा तो अवश्य मृत्युसे ग्रस्त हो जाऊँगा' इस प्रकार डरता हुआ प्राणव्रतको धारण करे । |
| यदि कदाचिद् उ चरेत्प्रारभेत प्राणव्रतम्, समापिपयिषेत्समापयितुमिच्छेत्;यदि ह्यस्माद् व्रतादुपरमेत्प्राणः परिभूतः स्याद्देवाश्च; तस्मात्समापयेदेव । तेन उ तेनानेन व्रतेन प्राणात्मप्रतिपत्त्या सर्वभूतेषु—वागादयोऽग्न्यादयश्च मदात्मका एव, अहं प्राण आत्मा सर्वपरिस्पन्दकृत्—एवं तेनानेन व्रतधारणेन एतस्या एव प्राणदेवतायाः सायुज्यं सयुग्भावमेकात्मत्वं सलोकतां समानलोकतां वा एकस्थानत्वम्—विज्ञान- | यदि कभी प्राणव्रतका आचरण-आरम्भ करे तो उसे समाप्त करनेकी इच्छा रखे, क्योंकि यदि इस व्रतसे [ बीचमें ही ] हट जायगा तो प्राण और देवताओंका पराभव होगा; इसलिये इसे समाप्त करना ही चाहिये । 'तेन उ' अर्थात् उस इस प्राणात्मत्वकी प्राप्तिरूप व्रतसे समस्त भूतोंमें वागादि और अग्न्यादि मेरे ही स्वरूप हैं, मैं प्राणरूप आत्मा सबका परिस्पन्दन करनेवाला हूँ' इस प्रकार उस इस व्रतको धारण करनेसे इस प्राणदेवताके ही सायुज्य—संयोग अर्थात् एकरूपताको तथा विज्ञानकी मन्दताकी अपेक्षासे सलोकता—समानलोकता अर्थात् समानस्थानत्वको |
३९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| मान्द्यापेक्षमेतत्—जयति प्राप्नोतीति ॥ २३ ॥ | जीतता अर्थात् उसे प्राप्त कर लेता है ॥ २३ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये पञ्चमं सप्तान्नब्राह्मणम्॥५॥
षष्ठ ब्राह्मण
पूर्वोक्त अविद्याकार्यका उपसंहार—नामसामान्यभूता वाक्
| यदेतदविद्याविषयत्वेन प्रस्तुतं साध्यसाधनलक्षणं व्याकृतं जगत् प्राणात्मप्राप्त्यन्तोत्कर्षवदपि फलम्, या चैतस्य व्याकरणात्प्रागवस्थाऽव्याकृतशब्दवाच्या वृक्षबीजवत्सर्वमेतत्। | यह जो साध्य-साधनरूप व्याकृत जगत् और प्राणात्मप्राप्तिपर्यन्त उत्कर्षवाला उसका फल भी अविद्याके विषयरूपसे आरम्भ किया गया है तथा वृक्षके बीजके समान जो 'अव्याकृत' शब्दसे कही जानेवाली इसके व्याकरण (व्याप्त होने) से पूर्वकी अवस्था है, यह सब— |
त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म तेषां नाम्नां वागित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि नामान्युत्तिष्ठन्ति । एतदेषाꣳ सामैतद्धि सर्वैर्नामभिः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि नामानि बिभर्ति ॥ १ ॥
यह नाम, रूप और कर्म तीनका समुदाय है। उन नामोंकी 'वाक्' यह उक्थ (कारण) है, क्योंकि सारे नाम इसीसे उत्पन्न होते हैं। यह इनका साम है। यही सब नामोंमें समान है। यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यह समस्त नामोंको धारण करती है ॥ १ ॥
| त्रयम्; किं तत्त्रयम्? इत्युच्यते। | त्रय है। वह त्रय क्या है? सो बतलाया जाता है—नाम, रूप और | | नाम रूपं कर्म चेत्यनात्मैव। नात्मा | कर्म-यह अनात्मा ही वह त्रय है। |
ब्राह्मण ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३९३
| ब्राह्मण ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३९३ |
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| यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म। तस्मादस्माद्विरज्येतेत्येवमर्थस्त्रयं वा इत्याद्यारम्भः। न ह्यस्मादनात्मनोऽव्यावृत्तचित्तस्य आत्मानमेव लोकमहं ब्रह्मास्मीत्युपासितुं बुद्धिः प्रवर्तते। बाह्यप्रत्यगात्मप्रवृत्त्योर्विरोधात्। तथा च काठके—<br>“पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्।<br>कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्” (क० उ० २।१।१) इत्यादि। | जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है वह आत्मा नहीं। अतः [मुमुक्षु] इससे विरक्त हो जाय—इसलिये 'त्रयं वा' इत्यादि मन्त्रका आरम्भ किया गया है। क्योंकि इस अनात्मासे जिसका चित्त नहीं हटा है, उसकी बुद्धि 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार आत्मलोककी ही उपासना करनेके लिये प्रवृत्त नहीं होती। कारण बाह्य प्रवृत्ति और प्रत्यगात्मविषयिणी वृत्तिमें परस्पर विरोध है। ऐसा ही कठोपनिषद्में भी कहा है—“स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है, इसलिये पुरुष बाह्य विषयोंको ही देखता है, अन्तरात्माको नहीं। अमृतत्वकी इच्छा करनेवाले किसी-किसी धीर पुरुषने ही इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाकर अन्तरात्माको देखा है” इत्यादि। | | कथं पुनरस्य व्याकृताव्याकृतस्य क्रियाकारकफलात्मनः संसारस्य नामरूपकर्मात्मकतैव? न पुनरात्मत्वम्? इत्येतत्सम्भावयितुं शक्यत इति; अत्रोच्यते—<br>तेषां नाम्नां यथोपन्यस्तानां वागिति शब्दसामान्यमुच्यते। | किंतु इस व्याकृत और अव्याकृत क्रिया-कारक-फलरूप संसारकी नाम-रूप-कर्मात्मकता ही क्यों है? आत्मस्वरूपता क्यों नहीं है? ऐसी सम्भावना की जा सकती है, अतः इस विषयमें कहते हैं—ऊपर जिनका उल्लेख किया गया है, उन नामोंका वाक् यह शब्दसामान्य कहा जाता |
३९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| “यः कश्च शब्दो वागेव सा” (१।५।३) इत्युक्तत्वाद्वागित्थे1तस्य शब्दस्य योऽर्थः शब्दसामान्यमात्रम् एतदेतेषां नामविशेषाणामुक्थं कारणमुपादानम्, सैन्धवलवणकणानामिव सैन्धवाचलः। | है। क्योंकि ऐसा कहा गया है कि “जो कुछ शब्द है वह वाक् ही है” इसलिये वाक् इस शब्दका जो अर्थ है वह शब्दसामान्यमात्र इन नाम-विशेषोंका उक्थ कारण अर्थात् उपादान है, जिस प्रकार सैन्धवगिरि सैन्धवलवणके कणोंका। | | तदाह—अतो ह्यस्मान्नामसामान्यात्सर्वाणि नामानि यज्ञदत्तो देवदत्त इत्येवमादिप्रविभागान्युत्तिष्ठन्त्युत्पद्यन्ते प्रविभज्यन्ते, लवणाचलादिव लवणकणाः; कार्यं च कारणेनाव्यतिरिक्तम्। तथा विशेषाणां च सामान्येऽन्तर्भावात्। | यही बात श्रुति कहती है—क्योंकि इस नामसामान्यसे ही लवणाचलसे लवणके कणोंके समान समस्त नाम—यज्ञदत्त, देवदत्त इत्यादि नामविभाग उत्पन्न अर्थात् विभक्त होते हैं और कार्य कारणसे अभिन्न होता है तथा विशेष भी सामान्यके अन्तर्गत रहते हैं। | | कथं सामान्यविशेषभाव इति— | किंतु नाम और वाक्का सामान्यविशेषभाव किस प्रकार है? | | एतच्छब्दसामान्यमेषां नामविशेषाणां साम। समत्वात्साम, सामान्यमित्यर्थः; एतद्धि यस्मात्सर्वैर्नामभिरात्मविशेषैः समम्। | [सो बतलाते हैं—] यह शब्दसामान्य ही इन नामविशेषोंका साम है। यह सम होनेके कारण साम अर्थात् सामान्य है; क्योंकि यही अपने विशेषभूत सम्पूर्ण नामोंसे सम है। तथा | | किञ्च आत्मलाभाविशेषाच्च नामविशेषाणाम्। यस्य च यस्मा- | जितने नामविशेष हैं, उन्हें नामसामान्यसे ही स्वरूपकी प्राप्ति होती है, अतः उनसे अविशेष (अभिन्न) होनेके कारण [ उनका नामसामान्यमें ही अन्तर्भाव होता है ]। जिससे |
Footnotes
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मूल पुस्तक में ‘द्वागित्येतस्य’ पाठ मुद्रित है। ↩
| ब्राह्मण ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ३९५ |
| ब्राह्मण ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ३९५ |
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| दात्मलाभो भवति स तेनाप्रवि- <br><br> भक्तो दृष्टः, यथा घटादीनां मृदा। <br><br> कथं नामविशेषाणामात्मलाभो <br><br> वाच इत्युच्यते—यत एतदेषां <br><br> वाक्छब्दवाच्यं वस्तु ब्रह्म आत्मा, <br><br> ततो ह्यात्मलाभो नाम्नाम्, शब्द- <br><br> व्यतिरिक्तस्वरूपानुपपत्तेः। तत्प्र- <br><br> तिपादयति—यतश्छब्दसामान्यं <br><br> हि यस्माच्छब्दविशेषान्सर्वाणि <br><br> नामानि बिभर्ति धारयति स्वरूप- <br><br> प्रदानेन। एवं कार्यकारणत्वोप- <br><br> पत्तेः सामान्यविशेषोपपत्तेरात्म- <br><br> प्रदानोपपत्तेश्च नामविशेषाणां <br><br> शब्दमात्रता सिद्धा। एवमुत्तर- <br><br> योरपि सर्वं योज्यं यथोक्तम्॥१॥ | जिसको अपने स्वरूपकी प्राप्ति होती है उससे वह अभिन्न ही देखा गया है, जैसे मृत्तिकासे घटादिका अभेद है। <br><br> नामविशेषोंको वाक् अर्थात् नामसामान्यसे अपने स्वरूपकी प्राप्ति किस प्रकार होती है ? सो बतलाया जाता है—क्योंकि वह 'वाक्' शब्दवाच्य वस्तु इन (नामविशेषों) का ब्रह्म—आत्मा है; कारण कि उसीसे नामोंको अपना स्वरूप प्राप्त होता है, क्योंकि शब्दसे भिन्न उनका कोई स्वरूप होना सम्भव हो नहीं है। इसीका श्रुति प्रतिपादन करती है—क्योंकि यह शब्दसामान्य ही शब्दविशेषरूप सम्पूर्ण नामोंको, उनका स्वरूप प्रदान करके, धारण करती है। इस प्रकार कार्य-कारणत्व सामान्य-विशेषत्व और आत्मप्रदानत्वकी उपपत्ति होनेसे नामविशेषोंकी शब्दमात्रता सिद्ध होती है। इसी प्रकार आगे कहे जानेवाले दो पर्यायोंमें भी उपर्युक्त सारी योजना लगा देनी चाहिये ॥ १ ॥ |
रूपसामान्य चक्षुका वर्णन
अथ रूपाणां चक्षुरित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि रूपाण्युत्तिष्ठन्त्येतदेषा ँ सामैतद्धि सर्वै रूपैः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि रूपाणि बिभर्ति ॥ २ ॥
३९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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अब रूपोंका चक्षु सामान्य है; यह इसका उक्थ है। इसीसे सारे रूप उत्पन्न होते हैं। यह इनका साम है, क्योंकि यह समस्त रूपोंसे सम है। यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही समस्त रूपोंको धारण करता है॥ २॥
| अथेदानीं रूपाणां सितासितप्रभृतीनां चक्षुरिति चक्षुर्विषयसामान्यं चक्षुःशब्दाभिधेयं रूपसामान्यं प्रकाश्यमात्रमभिधीयते। अतो हि सर्वाणि रूपाण्युत्तिष्ठन्ति, एतद्देषां साम, एतद्धि सर्वै रूपैः समम्, एतद्देषां ब्रह्म, एतद्धि सर्वाणि रूपाणि बिभर्ति ॥ २ ॥ | अथ—अब शुक्ल-कृष्ण (गौर-श्याम) आदि रूपोंका चक्षु [सामान्य] है; अर्थात् चक्षुके विषयभूत रूपोंका सामान्य 'चक्षु' शब्दसे कहा जानेवाला, रूपसामान्य अथवा प्रकाश्यसामान्य कहा जाता है। इसीसे सब रूप उत्पन्न होते हैं। यह इनका साम है, क्योंकि यह समस्त रूपोंसे सम है। यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही समस्त रूपोंको धारण करता है ॥ २ ॥ |
कर्मसामान्य आत्मामें सबका अन्तर्भाव दिखाना
अथ कर्मणामात्मेत्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि कर्माण्युत्तिष्ठन्त्येतदेषाꣳ सामैतद्धि सर्वैः कर्मभिः सममेतद्देषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि कर्माणि बिभर्ति तदेतत्त्रयꣳ सदेकमयमात्मात्मो एकः सन्नेतत्त्रयं तदेतदमृतꣳ सत्येनच्छन्नं प्राणो वा अमृतं नामरूपे सत्यं ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः ॥ ३ ॥
अब कर्मोंका सामान्य आत्मा (शरीर) है। यह इनका उक्थ है। इसीसे सब कर्म उत्पन्न होते हैं। यह इनका साम है, क्योंकि यह समस्त कर्मोंसे सम है। यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही समस्त कर्मोंको धारण
ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९७
ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९७
करता है। वह यह तीन होते हुए भी एक आत्मा है और आत्मा भी एक होते यह तीन है। वह यह अमृत सत्यसे आच्छादित है। प्राण ही अमृत है और नाम-रूप सत्य हैं, उनसे यह प्राण आच्छादित है॥ ३॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| अथेदानीं सर्वकर्मविशेषाणां मननदर्शनात्मकानां चलनात्मकानां च क्रियासामान्यमात्रेऽन्तर्भाव उच्यते। कथम् ? सर्वेषां कर्मविशेषाणामात्मा शरीरं सामान्यमात्मा, आत्मनः कर्म आत्मेत्युच्यते। 'आत्मना हि शरीरेण कर्म करोति' इत्युक्तम्। शरीरे च सर्वं कर्माभिव्यज्यते। अतः तात्स्थ्यात्तच्छब्दं कर्म—कर्मसामान्यमात्रं सर्वेषामुक्थमित्यादि पूर्ववत्। | अब इस समय मनन-दर्शनात्मक एवं चलनस्वरूप समस्त कर्मविशेषोंका क्रिया सामान्यमात्रमें अन्तर्भाव बतलाया जाता है। किस प्रकार ? समस्त कर्मविशेषोंका आत्मा-शरीर सामान्य आत्मा है, आत्माका कार्य होनेसे यहाँ कर्मको 'आत्मा' कहा है। ऊपर यह कहा जा चुका है कि 'आत्मा यानी शरीरसे [जीव] कर्म करता है।' शरीरमें ही समस्त कर्मोंकी अभिव्यक्ति होती है। अतः आत्मस्थ होनेके कारण कर्मको उसी शब्दसे कहा जाता है, वह कर्म-सामान्यमात्र (आत्मा) समस्त कर्मोंका उक्थ है—इत्यादि सब पूर्ववत् समझना चाहिये। |
| तदेतद्यथोक्तं नाम रूपं कर्म त्रयमितरेतराश्रयम्, इतरेतराभिव्यक्तिकारणम्, इतरेतरप्रलयं संहतं त्रिदण्डविष्टम्भवत् सदेकम्। केनात्मनैकत्वम् ? इत्युच्यते— | वे ये उपर्युक्त नाम, रूप और कर्म—तीनों एक दूसरेके आश्रित, एक-दूसरेकी अभिव्यक्तिके कारण, एक-दूसरेमें लीन होनेवाले और परस्पर मिले हुए तीन दण्डोंके समूह-के समान एक हैं। उनकी किस रूपसे एकता है, सो बतलायी जाती |
३९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| अयमात्मायं पिण्डः कार्यकारणा-तमसङ्घातः तथाऽन्नत्रये व्याख्यातः 'एतन्मयो वा अयमात्मा' इत्यादिना; एतावद्धीदं सर्वं व्याकृतमव्याकृतं च यदुत नाम रूपं कर्मेति, आत्मा उ एकोऽयं कार्यकरणसङ्घातः सन्नध्यात्मधिभूताधिदैवभावेन व्यवस्थितमेतदेव त्रयं नाम रूपं कर्मेति । तदेतल्लक्ष्यमाणम् । | है—यह आत्मा—यह कार्य-करणात्मक सं build संघातरूप पिण्ड तथा अन्नत्रयके प्रकरणमें "यह आत्मा एतद्रूप है" इस श्रुतिसे जिसकी व्याख्या की गयी है वह, बस—यह जो नाम, रूप और कर्म है, इतना ही यह सारा व्याकृत और अव्याकृत [जगत्] है; और आत्मा भी एक यह कार्यकरणसंघातमात्र होते हुए यही एक अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव भावसे स्थित नाम, रूप, कर्म यह त्रय है। उसीका यह आगे वर्णन किया जाता है। |
| अमृतं सत्येनच्छन्नमित्येतस्य वाक्यस्यार्थमाह—प्राणो वा अमृतं करणात्मकोऽन्तरुपष्टम्भक आत्मभूतोऽमृतोऽविनाशी; नामरूपे सत्यं कार्यात्मके शरीरावस्थे; क्रियात्मकस्तु प्राणस्तयोरुपष्टम्भको बाह्याभ्यां शरीरात्मकाभ्यामुपजनापायधर्मिभ्यां मर्त्याभ्यां छन्नोऽप्रकाशीकृतः । एतदेव | अब श्रुति 'अमृतं सत्येनच्छन्नम्' इस वाक्यका अर्थ करती है—'प्राणो वा अमृतम्'—जो इन्द्रियरूप, शरीरका आन्तर आधारभूत और आत्मस्वरूप है वह प्राण ही अमृत—अविनाशी है तथा शरीरावस्थित कार्यात्मक नाम-रूपं सत्य हैं। उनका आधारभूत क्रियात्मक प्राण वृद्धि-क्षयशील, बाह्य, शरीरस्वरूप, मरणधर्मा नाम और रूपोंसे आच्छादित—अप्रकाशित किया हुआ है। यह |
ब्राह्मण ६] शाङ्करभाष्यार्थे ३९९
ब्राह्मण ६] शाङ्करभाष्यार्थे ३९९
| संसारसतत्त्वमविद्याविषयं प्रद-<br>र्शितम् । अत ऊर्ध्वं विद्याविषय<br>आत्माधिगन्तव्य इति चतुर्थ<br>आरभ्यते ॥ ३ ॥ | अविद्याका विषयभूत संसारका<br>स्वरूप दिखलाया गया है । इसके<br>आगे विद्याका विषयभूत आत्मा<br>ज्ञातव्य है, इसलिये चतुर्थ¹ अध्याय<br>आरम्भ किया जाता है ॥ ३ ॥ |
<div align="center">इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये षष्ठमुक्थब्राह्मणम् ॥ ६ ॥
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
</div>१. चतुर्थ अध्यायसे उपनिषद्का द्वितीय अध्याय समझना चाहिये । यही ब्राह्मणका चतुर्थ अध्याय है ।
द्वितीय अध्याय
द्वितीय अध्याय
प्रथम ब्राह्मण
उपक्रम
| आत्मेत्येवोपासीत, तदन्वेषणे च सर्वमन्विष्टं स्यात्; तदेव चात्मतत्त्वं सर्वस्मात्प्रेयस्त्वादन्वेष्टव्यम्। ‘आत्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि’ इत्यात्मतत्त्वमेकं विद्याविषयः <br><br> यस्तु भेददृष्टिविषयः सः— अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेदेति—अविद्याविषयः। <br><br> “एकधैवानुद्रष्टव्यम्” (बृ० उ० ४।४।२०) “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति” (४।४।१९) इत्ये- | ‘आत्मा है’ इस प्रकार उपासना करे, उसकी खोज कर लेनेपर सभीकी खोज हो जाती है; तथा वह आत्मतत्त्व ही सबसे अधिक प्रिय होनेके कारण खोजनेयोग्य है। ‘उसने आत्माको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ’ इस प्रकार [निर्दिष्ट होनेके कारण] एक आत्मतत्त्व ही ज्ञानका विषय है। जो भेददृष्टिका विषय है वह ‘यह अन्य है, मैं अन्य हूँ-इस प्रकार जो जानता है वह नहीं जानता’ ऐसा कहे जानेके कारण अविद्याका विषय है। <br><br> “आत्मतत्त्वको एक प्रकार ही देखना चाहिये” “जो यहाँ नानावत् देखता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त |
ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४०१
ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४०१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| वमादिभिः प्रविभक्तौ विद्या-विद्याविषयौ सर्वोपनिषत्सु। तत्र चाविद्याविषयः सर्व एव साध्यसाधनादिभेदविशेषविनियोगेन व्याख्यातः—आ तृतीयाध्यायपरिसमाप्तेः। | होता है" इस प्रकारके वाक्योंसे समस्त उपनिषदोंमें ज्ञान और अज्ञान-के विषयोंको पृथक्-पृथक् कर दिया गया है। उनमें साध्य-साधनादि भेदविशेषके विनियोगद्वारा अविद्याके सभी विषयकी तृतीय अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त व्याख्या कर दी गयी है। |
| स च व्याख्यातोऽविद्याविषयः सर्व एव द्विप्रकारः—अन्तः प्राण उपष्टम्भको गृहस्येव स्तम्भादिलक्षणः प्रकाशकोऽमृतः, बाह्यश्च कार्यलक्षणोऽप्रकाशक उपजनापायधर्मकस्तृणकुशमृत्तिकासमो गृहस्येव सत्यशब्दवाच्यो मर्त्यः तेनामृतशब्दवाच्यः प्राणश्छन्न इति चोपसंहृतम्। स एव च प्राणो बाह्याधारभेदेष्वनेकधा विस्तृतः; प्राण एको देव इत्युच्यते। तस्यैव बाह्यः पिण्ड एकः साधा- | वह व्याख्या किया हुआ अविद्याका सारा ही विषय दो प्रकारका है—पहला इस शरीरके भीतर प्राण है जो गृहको धारण करनेवाले स्तम्भादिके समान शरीरका आधारभूत, प्रकाशक और अमृत है; तथा दूसरा है बाह्य कार्यरूप प्रपञ्च, जो अप्रकाशक, वृद्धि-क्षयशील, गृहके तृण, कुश और मृत्तिकाके समान मरणधर्मा और 'सत्य' शब्दका वाच्य है। उससे 'अमृत' शब्दवाच्य प्राण आच्छादित है—ऐसा ऊपर उपसंहार किया गया है। वही प्राण बाह्य आधार-भेदोंमें अनेक प्रकारसे फैला हुआ है और 'प्राण एक देव है' ऐसा कहा जाता है। उसीका एक बाह्य |
१. ब्राह्मणका तृतीय अध्याय उपनिषद्का प्रथम अध्याय है।
बृ० उ० २६—
४०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ४०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| रणः—विराड् वैश्वानर आत्मा पुरुषविधः प्रजापतिः को हिरण्यगर्भः—इत्यादिभिः पिण्डप्रधानैः शब्दैराख्यायते सूर्यादिप्रविभक्तकरणः। | साधारण (समष्टि) पिण्ड, जिसके सूर्यादि विभिन्न करण हैं, विराट्, वैश्वानर, आत्मा, पुरुषविध, प्रजापति, क और हिरण्यगर्भ आदि शरीरप्रधान शब्दोंसे पुकारा जाता है। | | एकं चानेकं च ब्रह्म एतावदेव, नातः परमस्ति, प्रत्येकं च शरीरभेदेषु परिसमाप्तं चेतनावत्कर्तृ भोक्तृ च—इत्यविद्याविषयमेव आत्मत्वेनोपगतो गार्ग्यो ब्राह्मणो वक्ता उपस्थाप्यते; तद्विपरीतात्मदृगजातशत्रुः श्रोता; एवं हि यतः पूर्वपक्षसिद्धान्ताख्यायिकारूपेण समर्प्यमाणोऽर्थः श्रोतुश्चित्तस्य वशमेति; विपर्यये हि तर्कशास्त्रवत् केवलार्थानुगमवाक्यैः समर्प्यमाणो दुर्विज्ञेयः स्यादत्यन्तसूक्ष्मत्वाद्वस्तुनः। तथा च काठके—<br><br>“श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः”<br><br>(क० उ० १ । २ । ७) इत्यादिवाक्यैः सुसंस्कृतदेवबुद्धिगम्य- | एक और अनेक ब्रह्म—बस इतना ही है, इसके सिवा और कुछ नहीं है, वह प्रत्येक शरीरभेदोंमें समाप्त होनेवाला (परिच्छिन्न) है, चेतनावान् है तथा कर्ता और भोक्ता है—इस प्रकार अविद्याके विषयको ही आत्मस्वरूपसे समझनेवाला गार्ग्य ब्राह्मण यहाँ वक्तारूपसे उपस्थित किया जाता है; तथा इससे विपरीत जाननेवाला आत्मदर्शी अजातशत्रु श्रोता है; क्योंकि इस प्रकार पूर्वपक्ष और सिद्धान्तकी आख्यायिकारूपसे समर्पित किया जानेवाला विषय श्रोताके चित्तके अधीन हो जाता है और इसके विपरीत तर्कशास्त्रके समान केवल वस्तुका बोध करानेवाले वाक्योंसे समर्पित किया जानेवाला विषय दुर्विज्ञेय होता है; क्योंकि आत्मतत्त्व अत्यन्त सूक्ष्म है। इसी प्रकार कठोपनिषद्में भी “जो बहुतोंको सुननेके लिये भी नहीं मिलता” इत्यादि वाक्योंसे आत्मतत्त्व सुसंस्कृत देवबुद्धि (सात्त्विकी बुद्धि) का विषय और |
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४०३
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४०३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| त्वं सामान्यमात्रबुद्ध्यगम्यत्वं च सप्रपञ्चं दर्शितम्। "आचार्यवान्पुरुषो वेद" (६।१४।२) "आचार्याद्धैव विद्या" (४।९।३) इति च्छान्दोग्ये। "उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः (४।३४) इति च गीतासु। इहापि च शाकल्ययाज्ञवल्क्यसंवादेन अतिगह्वरत्वं महता संरम्भेण ब्रह्मणो वक्ष्यति—तस्माच्छ्लिष्ट एव आख्यायिकारूपेण पूर्वपक्षसिद्धान्तरूपमापाद्य वस्तुसमर्पणार्थ आरम्भः। | सामान्यमात्र बुद्धिका अविषय है—यह विस्तारपूर्वक दिखलाया गया है। तथा "आचार्यवान् पुरुष जानता है" "आचार्यसे ही विद्या सफल होती है" इत्यादिरूपसे छान्दोग्योपनिषद्में और "तत्त्वदर्शी ज्ञानी लोग तुझे ज्ञानका उपदेश करेंगे" इस वाक्यसे गीतामें भी ऐसा ही कहा है। यहाँ (इस उपनिषद्में) भी शाकल्य और याज्ञवल्क्यके संवादद्वारा बड़े समारोहसे ब्रह्मतत्त्वकी अत्यन्त गहनताका प्रतिपादन किया जायगा; अतः आख्यायिकारूपसे पूर्वपक्ष और सिद्धान्तके स्वरूपका प्रतिपादन करके आत्मतत्त्वको समर्पण करनेके लिये आरम्भ करना उचित ही है। |
| आचारविध्युपदेशार्थश्च—एवमाचारवतोर्वक्तृश्रोत्रोराख्यायिकानुगतोऽर्थोऽवगम्यते। केवलतर्कबुद्धिनिषेधार्था चाख्यायिका—"नैषा तर्केण मतिरापनेया" (क० उ० १।२।९) "न तर्कशास्त्रदग्धाय" इति श्रुतिस्मृतिभ्याम्। श्रद्धा च ब्रह्मविज्ञाने परमं साधनमित्याख्या- | आचारकी विधिका उपदेश करनेके लिये भी [इस प्रकार आरम्भ करना उचित है]। इस प्रकारके आचारवाले वक्ता और श्रोता होनेपर ही इस आख्यायिकामें प्रतिपादित विषयका ज्ञान होता है। यह आख्यायिका केवल तर्कबुद्धिका निषेध करनेके लिये भी है, जैसा कि "यह बुद्धि तर्कसे प्राप्त होनेयोग्य नहीं है" जिसको बुद्धि तर्कशास्त्रसे दग्ध हो गयी है उसे [ ज्ञान नहीं होता ]" इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंसे सिद्ध होता है। तथा आख्यायिकाका यह भी अभिप्राय है कि ब्रह्मज्ञानमें श्रद्धा ही |
४०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ४०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| यिकार्थः । यथा हि गार्ग्या-जातशत्र्वोर्तीव श्रद्धालुता दृश्यते आख्यायिकायाम्; “श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्” ( गीता ४ । ३९ ) इति च स्मृतिः । | सर्वोत्तम साधन है। इसीसे आख्यायिकामें गार्ग्य और अजातशत्रुकी अत्यन्त श्रद्धालुता देखी जाती है। “श्रद्धावान् पुरुष ज्ञान-लाभ करता है” ऐसी स्मृति भी है। |
ब्रह्मविद्याका उपदेश करनेके लिये अपने पास आये हुए गार्ग्यको अजातशत्रुका सहस्र गौ दान करना
ॐ । दृप्तबालाकिर्हानूचानो गार्ग्य आस स होवाचाजातशत्रुं काश्यं ब्रह्म ते ब्रवाणीति स होवाचाजातशत्रुः सहस्रमेतस्यां वाचि दद्मो जनको जनक इति वै जना धावन्तीति ॥ १ ॥
ॐ [ किसी समय कोई ] गार्ग्यगोत्रोत्पन्न दृप्त ( गर्वीला ) बालाकि बड़ा बोलनेवाला था। उसने काशिराज अजातशत्रुके पास जाकर कहा—'मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, इस वचनके लिये मैं आपको सहस्र [ गौएँ ] देता हूँ; लोग 'जनक, जनक' ऐसा कहकर दौड़ते हैं। [ अर्थात् सब लोग यही कहते हैं कि 'जनक बड़ा दानी है, जनक बड़ा श्रोता है'। ये दोनों बातें आपने अपने वचनसे मेरे लिये सुलभ कर दी हैं। इसलिये मैं आपको सहस्र गौएँ देता हूँ ] ॥ १ ॥
| तत्र पूर्वपक्षवादी अविद्याविषय-<br><br>ब्रह्मविद् दृप्तबालाकिः दृप्तो गर्वि-<br><br>तोऽसम्यग्ब्रह्मवित्त्वादेव, बलाकाया<br><br>अपत्यं बालाकिर्दृप्तश्चासौ बाला-<br><br>किश्चेति दृप्तबालाकिः, हशब्द | तहाँ क्वचित्—किसी काल-विशेषमें अविद्याके विषयको ही ब्रह्म जाननेवाला गोत्रतः 'गार्ग्य' पूर्वपक्षवादी दृप्तबालाकि, जो ब्रह्म-को सम्यग्रूपसे न जाननेके कारण ही दृप्त—गरबीला था और बलाकाका पुत्र होनेसे बालाकि कहलाता था; तथा इस प्रकार जो दृप्त और बालाकि होनेसे दृप्तबालाकि नामसे प्रसिद्ध |
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४०५
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४०५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| ऐतिह्यार्थ आख्यायिकायाम्, अनूचानः अनुवचनसमर्थो वक्ता वाग्मी; गार्ग्यो गोत्रतः, आस बभूव क्वचित्कालविशेषे । | था, वह अनूचान—अनुवचनमें समर्थ-बोलनेवाला अर्थात् बड़ा वाचाल था। 'ह' शब्द आख्यायिका-में ऐतिह्य (इतिहासप्राप्त अर्थ) की सूचना देनेके लिये है। |
| स होवाचाजातशत्रुमजातशत्रुनामानं काश्यं काशिराजमभिगम्य—ब्रह्म ते ब्रवाणीति ब्रह्म ते तुभ्यं ब्रवाणि कथयानि। स एवमुक्तोऽजातशत्रुरुवाच—सहस्रं गवां दद्म एतस्यां वाचि—यां मां प्रत्यवोचो ब्रह्म ते ब्रवाणीति, तावन्मात्रमेव गोसहस्रप्रदाने निमित्तमित्यभिप्रायः। | उसने अजातशत्रुसे—अजातशत्रुनामक काश्य—काशिराजसे, उसके पास जाकर कहा—'ब्रह्म ते ब्रवाणि—मैं तुम्हारे प्रति ब्रह्मका निरूपण करूँ।' इस प्रकार कहे जानेपर अजातशत्रुने कहा, आपने जो कहा है कि 'मैं तुम्हारे प्रति ब्रह्मका निरूपण करूँ' सो आपके इस कथनके लिये "मैं सहस्र गौएँ देता हूँ।' अभिप्राय यह है कि अजातशत्रुके सहस्र गौएँ देनेमें केवल इतना ही निमित्त था। |
| साक्षाद्ब्रह्मकथनमेव निमित्तं कस्मान्नापेक्ष्यते सहस्रदाने ? ब्रह्म ते ब्रवाणीतीयमेव तु वाङ्निमित्तमपेक्ष्यते ? इत्युच्यते; यतः श्रुतिरेव राज्ञोऽभिप्रायमाह—जनको दाता जनकः श्रोतेति चैतस्मिन्वाक्यद्वये पदद्वयमभ्यस्यते जनको जनक इति। वैशब्दः | सहस्र गौएँ देनेमें साक्षात् ब्रह्म-निरूपणकी ही अपेक्षा क्यों नहीं थी? केवल 'ब्रह्म ते ब्रवाणि' इस वाक्यकी ही अपेक्षा क्यों थी? सो बतलाया जाता है; क्योंकि राजाके अभिप्रायको श्रुति ही बतला रही है—'जनकः, जनकः' इन दो पदोंकी आवृत्ति 'जनक दाता है, जनक श्रोता है' इन दो वाक्योंके अर्थमें |
४०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ४०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| प्रसिद्धावद्योतनार्थः; जनको दित्सुर्जनकः शुश्रूषुरिति ब्रह्म शुश्रूषवो विवक्तवः प्रतिजिघृक्षवश्च जना धावन्त्यभिगच्छन्ति। तस्मात्तत्सर्वं मय्यपि सम्भावितवानसीति ॥ १ ॥ | हुई है। 'वै' शब्द प्रसिद्धिको सूचित करनेके लिये है। 'जनक देनेकी इच्छावाला है, जनक श्रवणकी इच्छावाला है' यह समझकर 'ब्रह्म' तत्त्वको सुनने और कहनेकी इच्छावाले तथा प्रतिग्रहकी इच्छावाले लोग दौड़ते—उसीके पास जाते हैं। अतः [ इस वाक्यसे ] आपने वह सब मेरे लिये भी सम्भव कर दिया है, इसीसे [ इस वचनके लिये मैं सहस्र गौएँ देता हूँ ] ॥ १ ॥ |
गार्ग्यद्वारा आदित्यका ब्रह्मरूपसे प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान
| एवं राजानं शुश्रूषुमभिमुखीभूतम्— | इस प्रकार श्रवणके इच्छुक और अपने प्रति अभिमुख हुए राजासे— |
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स होवाच गार्ग्यो य एवासावादित्ये पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजेति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्तेऽतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजा भवति ॥ २ ॥
उस गार्ग्यने कहा, 'यह जो आदित्यमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा—नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। यह सबका अतिक्रमण करके स्थित है, समस्त भूतोंका मस्तक है और राजा (दीप्तिमान्) है—इस प्रकार मैं इसकी उपासना करता हूँ। जो पुरुष इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह सबका अतिक्रमण करके स्थित, समस्त भूतोंका मस्तक और राजा होता है ॥ २ ॥
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४०७ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४०७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
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| स होवाच गार्ग्यः— य एव असौ आदित्ये चक्षुषि चैकोऽभिमानी चक्षुर्द्वारेणेह हृदि प्रविष्टः 'अहं भोक्ता कर्ता च' इत्यवस्थितः, एतमेवाहं ब्रह्म पश्यामि, अस्मिन्कार्यकरणसङ्घाते उपासे। तस्मात्तमहं पुरुषं ब्रह्म तुभ्यं ब्रवीम्युपास्स्वेति। | उस गार्ग्यने कहा—'यह जो आदित्यमें और नेत्रमें उनका एक ही अभिमानी चक्षुके द्वारा यहाँ हृदयमें प्रविष्ट होकर 'मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ' इस प्रकार स्थित है, उसीको मैं ब्रह्म समझता हूँ, इस देहेन्द्रिय-संघातमें मैं उसीकी उपासना करता हूँ। अतः उस पुरुषको ही मैं तुम्हें ब्रह्मरूपसे बतलाता हूँ; तुम उसीकी उपासना करो।' |
| स एवमुक्तः प्रत्युवाच अजातशत्रुः 'मा मा' इति हस्तेन विनिवारयन्— एतस्मिन्ब्रह्मणि विज्ञेये मा संवदिष्ठाः; मा मेत्यावाधनार्थं द्विर्वचनम्। एवं समाने विज्ञानविषये आवयोरसमानविज्ञानवत इव दर्शयता बाधिताः स्याम, अतो मा संवदिष्ठाः—मा संवादं कार्षीरस्मिन्ब्रह्मणि। अन्यच्चेज्जानासि, तद्ब्रह्म वक्तुमर्हसि, न तु यन्मया ज्ञायत एव। | इस प्रकार कहे जानेपर उस अजातशत्रुने 'नहीं, नहीं' इस प्रकार हाथसे मना करते हुए कहा—'इस विज्ञेय ब्रह्मके विषयमें चर्चा मत करो। 'मा मा' यह द्विरुक्ति सब प्रकार रोकनेके लिये है; क्योंकि इस प्रकार हम दोनोंके विज्ञानका विषय समान होनेपर भी हमें अविज्ञानवान्-सा देखनेवाले तुमसे हम बाधित हो जायँगे, इसलिये इस ब्रह्मके विषयमें संवाद मत करो। यदि तुम कोई अन्य ब्रह्म जानते हो तो उसीका निरूपण करो, जिसे मैं जानता ही हूँ, उसका नहीं। |
| अथ चेन्मन्यसे— जानीषे त्वं ब्रह्ममात्रं न तु तद्विशेषणोपासनफलानीति—तन्न मन्तव्यम्, यतः | यदि तुम्हारा ऐसा विचार हो कि तुम तो केवल ब्रह्ममात्रको जानते हो, उसके विशेषणोंकी उपासनाके फलको तो नहीं जानते, सो तुम्हें ऐसा नहीं समझना चाहिये, क्योंकि |
४०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ४०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| सर्वमेतदहं जाने यद्ब्रवीषि । कथम्? अतिष्ठाः—अतीत्य भूतानि तिष्ठतीत्यतिष्ठाः । सर्वेषां च भूतानां मूर्धा शिरो राजेति वै— राजा दीप्तिगुणोपेतत्वात्, एतैर्विशेषणैर्विशिष्टमेतद्ब्रह्म अस्मिन्कार्यकरणसङ्घाते कर्तृ भोक्तृ चेत्यहमेतमुपास इति । फलमप्येवं विशिष्टोपासकस्य—स य एतमेवमुपास्तेऽतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजा भवति । यथागुणोपासनमेव हि फलम्; "तं यथा यथोपासते तदेव भवति" (मण्डल-ब्राह्मण) इति श्रुतेः ॥ २ ॥ | तुम जो कुछ कह रहे हो यह सभी मैं जानता हूँ। किस प्रकार?—यह अतिष्ठा है, अर्थात् समस्त भूतोंका अतिक्रमण करके स्थित है, इसलिये 'अतिष्ठा' कहा गया है। समस्त भूतोंका मस्तक है और दीप्ति-गुणयुक्त होनेके कारण राजा है—इन विशेषणोंसे विशिष्ट इस ब्रह्मकी, जो देहेन्द्रियसंग्हातमें कर्ता और भोक्ता है, मैं उपासना करता हूँ। इस प्रकारके विशेषणोंसे विशिष्ट ब्रह्मकी उपासना करनेवालेको फल भी ऐसा ही मिलता है—जो इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह सबका अतिक्रमण करके स्थित समस्त भूतोंका मस्तक और राजा होता है। जैसे गुणवालेकी उपासना की जाती है, वैसा ही फल होता है; जैसा कि, "उसकी जो जिस प्रकार उपासना करता है, तद्रूप ही हो जाता है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है ॥ २ ॥ |
गार्ग्यद्वारा चन्द्रान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान
| संवादेनादित्यब्रह्मणि प्रत्याख्यातेऽजातशत्रुणा चन्द्रमसि ब्रह्मान्तरं प्रतिपेदे गार्ग्यः । | संवादके द्वारा जब अजातशत्रुने आदित्यब्रह्मका निषेध कर दिया तो गार्ग्यने चन्द्रान्तर्गत दूसरे ब्रह्मका प्रतिपादन किया । |
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४०९
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४०९
स होवाच गार्ग्यो य एवासौ चन्द्रे पुरुष एत-
मेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैत-
स्मिन्संवदिष्ठा बृहन्पाण्डरवासाः सोमो राजेति वा
अहमेतमुपास इति स यए तमेवमुपास्तेऽहरहर्ह सुतः
प्रसुतो भवति नास्यान्नं क्षीयते ॥ ३ ॥
वह गार्ग्य बोला, 'यह जो चन्द्रमामें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। यह महान्, शुक्लवस्त्रधारी, सोम राजा है—इस प्रकार मैं इसकी उपासना करता हूँ। जो इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसके लिये नित्यप्रति सोम सुत और प्रस्तुत होता है तथा उसका अन्न क्षीण नहीं होता' ॥ ३ ॥
| संस्कृत-भाष्य | भाषार्थ |
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| य एवासौ चन्द्रे मनसि चैकः<br><br>पुरुषो भोक्ता कर्ता चेति पूर्ववद्वि-<br><br>शेषणम् । बृहन् महान् पाण्डरं<br><br>शुक्लं वासो यस्य सोऽयं पाण्डर-<br><br>वासाः, अप्शरीरत्वाच्चन्द्राभिमा-<br><br>निनः प्राणस्य, सोमो राजा चन्द्रः,<br><br>यश्चान्नभूतोऽभिषूयते लतात्मको | यह जो चन्द्रमा और मनमें एक ही पुरुष कर्ता और भोक्ता है—इस प्रकार इसके पूर्ववत् विशेषण समझने चाहिये। [ सूर्यमण्डलसे द्विगुण होनेके कारण ] जो बृहन् अर्थात् महान् है तथा जिसके पाण्डर-शुक्ल वास-वस्त्र हैं, वह यह 'पाण्डरवासाः' है, क्योंकि चन्द्राभिमानी प्राण जलमय शरीरवाला है [ और जलका शुक्ल वर्ण प्रसिद्ध ही है ], सोम राजा चन्द्रमाको कहते हैं तथा जो यज्ञमें पेय अन्नके रूपमें चुवाया जाता है, वह लतामय सोम अर्थात् सोमलता भी सोम है। उस चन्द्रमा एवं लतामय पुरुषको एक करके [ अर्थात् अहंग्रह- |
४१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ४१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| यज्ञे, तमेकीकृत्यैतमेवाहं ब्रह्मोपासे।<br><br>यथोक्तगुणं य उपास्ते तस्याहरहः<br><br>सुतः सोमोऽभिषुतो भवति यज्ञे,<br><br>प्रसुतः प्रकृष्टं सुतरां सुतो भवति<br><br>विकारे, उभयविधयज्ञानुष्ठानसा-<br><br>मर्थ्यं भवतीत्यर्थः। अन्नं चास्य<br><br>न क्षीयतेऽन्नात्मकोपासकस्य॥३॥ | उपासनाके द्वारा अपना स्वरूप मानकर ] इस विशेषणविशिष्ट ब्रह्मकी ही मैं उपासना करता हूँ। जो पुरुष उपर्युक्त गुणोंवाले ब्रह्मकी उपासना करता है, उसके लिये नित्यप्रति सुत होता है अर्थात् प्रकृतियज्ञमें सोमरस प्रस्तुत रहता है तथा प्रसुत होता है अर्थात् विकृतियज्ञमें अधिकतासे निरन्तर सोमरस प्रस्तुत रहता है यानी उसे प्रकृति-विकृतिरूप दोनों प्रकारके यज्ञानुष्ठानमें सामर्थ्य प्राप्त हो जाता है। तथा इस अन्नात्मक ब्रह्मोपासकका अन्न भी क्षीण नहीं होता ॥ ३॥ |
गार्ग्यद्वारा विद्युदभिमानी पुरुषका ब्रह्मरूपसे उपदेश तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान
स होवाच गार्ग्यो य एवासौ विद्युति पुरुष एत-
मेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मि-
न्संवदिष्ठास्तेजस्वीति वा अहमेतमुपास इति स य
एतमेवमुपास्ते तेजस्वी ह भवति तेजस्विनी हास्य
प्रजा भवति ॥ ४ ॥
वह गार्ग्य बोला, 'यह जो विद्युत्में पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसकी चर्चा मत करो; इसकी तो मैं तेजस्वीरूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह तेजस्वी होता है तथा उसकी प्रजा भी तेजस्विनी होती है' ॥ ४ ॥