बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०८९
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०८९
चाहिये। यह ब्रह्म अप्रमेय, ध्रुव, निर्मल, [ अव्याकृतरूप ] आकाशसे भी सूक्ष्म, अजन्मा, आत्मा, महान् और अविनाशी है ॥ २० ॥
| संस्कृत भाष्य | भाष्यार्थ |
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| एकधैव एकेनैव प्रकारेण विज्ञानघनैकरसप्रकारेण आकाशवन्निरन्तरेण अनुद्रष्टव्यम्, यस्मादेतद् ब्रह्म अप्रमयम् अप्रमेयम्, सर्वैकत्वात्; अन्येन हि अन्यत् प्रमीयते; इदं त्वेकमेव, अतोऽप्रमेयम्; ध्रुवं नित्यं कूटस्थमविचालीत्यर्थः । | एकधा—एक प्रकारसे ही अर्थात् आकाशके समान निरन्तर एकमात्र विज्ञानघन रसस्वरूपसे ही अनुदर्शन करना चाहिये (आचार्योपदेशके अनन्तर देखना चाहिये ); क्योंकि यह ब्रह्म अप्रमय-अप्रमेय है, कारण ब्रह्ममें सबकी एकता है। अन्यके द्वारा ही अन्यकी प्रमिति (प्रमाबुद्धि) होती है, किंतु ब्रह्म तो एक ही है, इसलिये यह अप्रमेय है तथा ध्रुव—कूटस्थ यानी विचलित न होनेवाला है। |
| ननु विरुद्धमिदमुच्यते—अप्रमेयं ज्ञायत इति च; 'ज्ञायते' इति प्रमाणैर्मीयत इत्यर्थः, 'अप्रमेयम्' इति च तत्प्रतिषेधः । | शङ्का—किंतु 'ब्रह्म अप्रमेय है और वह जाना जाता है' यह कथन तो विरुद्ध है। जाना जाता है—इससे तो यही तात्पर्य है कि प्रमाणोंद्वारा उसका मान होता है और अप्रमेय—ऐसा कहनेसे उसका प्रतिषेध होता है। |
| नैष दोषः, अन्यवस्तुवद् अनागमप्रमाणप्रमेयत्वप्रतिषेधार्थत्वात्; यथा अन्यानि वस्तूनि आगमनिरपेक्षैः प्रमाणैर्विषयी- | समाधान—यहाँ यह दोष नहीं है; क्योंकि 'अप्रमेयम्' यह विशेषण, अन्य वस्तुओंके समान उसके आगमातिरिक्त प्रमाणसे प्रमित होनेका प्रतिषेध करनेके लिये है। जिस प्रकार अन्य वस्तुएँ आगमकी अपेक्षा न रखकर अन्य प्रमाणोंका विषय |
बृ० उ० ६९—
१०९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| १०९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| क्रियन्ते, न तथा एतदात्मतत्त्वं प्रमाणान्तरेण विषयीकर्तुं शक्यते; सर्वस्यात्मत्वे केन कं पश्येद् विजानीयात्—इति प्रमातृप्रमाणादिव्यापारप्रतिषेधेनैव आगमोऽपि विज्ञापयति, न तु अभिधानाभिधेयलक्षणवाक्यधर्माङ्गीकरणेन; तस्मान्नागमेनापि स्वर्गमेर्वादिवत् तत् प्रतिपाद्यते; प्रतिपादयित्रात्मभूतं हि तत्; प्रतिपादयितुः प्रतिपादनस्य प्रतिपाद्यविषयत्वात्, भेदे हि सति तद् भवति । | होती हैं, उस प्रकार यह आत्मतत्त्व किसी अन्य प्रमाणद्वारा विषय नहीं किया जा सकता। सभीके आत्मा होनेपर किसके द्वारा किसे देखे अर्थात् जाने—इस प्रकार शास्त्र भी प्रमाता-प्रमाणादि व्यवहारका प्रतिषेध करके ही उसका बोध कराता है, प्रतिपाद्य-प्रतिपादकरूप वाक्यके धर्मको स्वीकार करके नहीं। अतः शास्त्र भी उसका स्वर्ग एवं मेरु आदिके समान प्रतिपादन नहीं करता; क्योंकि वह तो प्रतिपादन करनेवालेका आत्मा ही है। प्रतिपादन करनेवालेका प्रतिपादन तो प्रतिपाद्यको विषय करनेवाला होता है और यह भेद होनेपर ही सम्भव है। | | ज्ञानं च तस्मिन् परात्मभावनिवृत्तिरेव; न तस्मिन् साक्षादात्मभावः कर्तव्यः, विद्यमानत्वादात्मभावस्य; नित्यो हि आत्मभावः सर्वस्य, अतद्विषय इव प्रत्यवभासते; तस्मादतद्विषयाभासनिवृत्तिव्यतिरेकेण न तस्मिन्नात्मभावो विधीयते; अन्यात्मभावनिवृत्तौ, आत्मभावः स्वात्मनि | यहाँपर अर्थात् देहादि अनात्मवस्तुओंमें आरोपित आत्मभावकी निवृत्ति ही ब्रह्मविषयक ज्ञान है। उस (ब्रह्म) में साक्षात् आत्मभाव करनेकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि आत्मभाव तो उसमें विद्यमान ही है। सबका ही ब्रह्मके साथ आत्मभाव नित्य सिद्ध है, केवल अज्ञानवश वह अब्रह्मविषयक-सा प्रतीत होता है; अतः अब्रह्मविषयक आत्मावभासकी निवृत्तिके सिवा उसमें आत्मभावका विधान नहीं किया जाता। अन्यात्मभावकी निवृत्ति हो जानेपर अपने आत्मामें |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०९१
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०९१
| स्वाभाविको यः, स केवलो भवतीति—आत्मा ज्ञायत इत्युच्यते; स्वतश्चाप्रमेयः प्रमाणान्तरेण न विषयीक्रियते इति उभयमप्यविरुद्धमेव । | जो स्वाभाविक आत्मभाव है, वह शुद्ध हो जाता है; इसलिये आत्मा जान लिया गया—ऐसा कहा जाता है; किंतु स्वयं वह अप्रमेय है—किसी भी अन्य प्रमाणका विषय नहीं होता; अतः उसका अप्रमेयत्व और ज्ञान दोनों विरुद्ध नहीं हैं। | | विरजो विगतरजः, रजो नाम धर्माधर्मादिमलम्, तद्रहित इत्येतत् । परः—परो व्यतिरिक्तः सूक्ष्मो व्यापी वा आकाशादपि अव्याकृताख्यात् । अजः—न जायते; जन्मप्रतिषेधाद् उत्तरेऽपि भावविकाराः प्रतिषिद्धाः, सर्वेषां जन्मादित्वात् । आत्मा, महान् परिमाणतो महत्तरः सर्वस्मात्, ध्रुवोऽविनाशी ॥ २० ॥ | विरज—रजोहीन है, रज धर्माधर्मादिरूप मलको कहते हैं, उससे रहित है। 'आकाशात्परः'—अव्याकृतसंज्ञक जो आकाश है, उससे भी पर—व्यतिरिक्त—सूक्ष्म अथवा व्यापक है। अज—जन्म नहीं लेता; जन्मका प्रतिषेध करनेसे 'अस्ति वर्धते' आदि आगेके भावविकारोंका भी प्रतिषेध हो जाता है; क्योंकि सबका आरम्भ जन्मरूप भावविकारसे ही होता है। वह आत्मा है, महान् है—परिमाणमें सबसे बड़ा है तथा ध्रुव—अविनाशी है॥ २० ॥ |
ब्रह्मनिष्ठामें अधिक शास्त्राभ्यास बाधक है
तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः ।
नानुध्यायाद् बहूञ्छब्दान् वाचो विग्लापनँ हि तदिति
बुद्धिमान् ब्राह्मणको उसे ही जानकर उसीमें प्रज्ञा करनी चाहिये। बहुत शब्दोंका अनुध्यान (निरन्तर चिन्तन) न करे; वह तो वाणीका श्रम ही है॥ २१॥
१०९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| तमीदृशमात्मानमेव, धीरो धीमान् विज्ञाय उपदेशतः शास्त्रतश्च, प्रज्ञां शास्त्राचार्योपदिष्टविषयां जिज्ञासापरिसमाप्तिकरीम्, कुर्वीत ब्राह्मणः—एवं प्रज्ञाकरणसाधनानि संन्यासशमदमोपरमतितिक्षासमाधानानि कुर्यादित्यर्थः ।<br><br>न अनुध्यायात्—नानुचिन्तयेत्, बहून् प्रभूतान् शब्दान्; तत्र बहुत्वप्रतिषेधात् केवलात्मैकत्वप्रतिपादकाः स्वल्पाः शब्दा अनुज्ञायन्ते, "ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम्" (मु० उ० २ । २ । ६) "अन्या वाचो विमुञ्चथ" (मु० उ० २ । २ । ५) इति च आथर्वणे । वाचो विग्लापनं विशेषेण ग्लानिकरं श्रमकरम्, हि यस्मात्, तद् बहुशब्दाभिध्यानमिति ॥ २१ ॥ | धीर अर्थात् बुद्धिमान् ब्राह्मण उस ऐसे आत्माको ही आचार्यके उपदेश और शास्त्रसे जानकर, शास्त्र और आचार्यने जिसके विषयका उपदेश किया है तथा जो जिज्ञासाकी सर्वथा समाप्ति कर देनेवाली है, ऐसी प्रज्ञा (बुद्धि) करे। तात्पर्य यह है कि इस प्रकारकी प्रज्ञा उत्पन्न करनेके साधन संन्यास, शम, दम, उपरति, तितिक्षा और समाधिका पालन करे।<br><br>बहुत-से शब्दोंका अनुध्यान—अनुचिन्तन न करे। यहाँ बहुत्वका प्रतिषेध करनेसे केवल आत्माका एकत्व प्रतिपादन करनेवाले थोड़े-से शब्दोंके अनुशीलनके लिये अनुमति सूचित होती है। आथर्वणश्रुतिमें भी कहा है—"आत्माका ॐ इस प्रकार ध्यान करे", "अन्य वाणीका त्याग करो" इत्यादि। क्योंकि वह अधिक शब्दोंका अनुध्यान वाणीका विग्लापन—विशेषरूपसे ग्लानि करनेवाला अर्थात् श्रम उत्पन्न करनेवाला है ॥ २१ ॥ |
आत्माके स्वरूप, उसकी उपलब्धिके साधनभूत संन्यास और आत्मज्ञकी स्थितिका प्रतिपादन
| सहेतुकौ बन्धमोक्षावभिहितौ मन्त्रब्राह्मणाभ्याम्; श्लोकैश्च पुन- | मन्त्र और ब्राह्मण दोनोंके द्वारा बन्ध और मोक्षका कारणसहित निरूपण किया गया; फिर मन्त्रोंके |
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९३
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९३
| मोक्षस्वरूपं विस्तरेण प्रतिपादितम् । एवमेतस्मिन् आत्मविषये सर्वो वेदो यथोपयुक्तो भवति, तत्तथा वक्तव्यमिति तदर्थेयं कण्डिका आरभ्यते । तच्च यथा अस्मिन् प्रपाठकेऽभिहितं सप्रयोजनमनूद्य अत्रैवोपयोगः कृत्स्नस्य वेदस्य काम्यराशिवर्जितस्य—इत्येवमर्थं उक्तार्थानुवादः ‘स वा एषः’ इत्यादिः । | द्वारा विस्तारसे मोक्षके स्वरूपका प्रतिपादन किया गया । इस प्रकार इस आत्मविषयमें जिस तरह सारा वेद उपयोगी होता है, उसे उसी प्रकार बतलाना है, अतः इसी प्रयोजनसे यह कण्डिका आरम्भ की जाती है । इस प्रपाठकमें सप्रयोजन (फलयुक्त) आत्मज्ञानका जिस प्रकार निरूपण किया गया है, उसी प्रकार उसका अनुवाद करके, काम्यवेदराशिको छोड़कर शेष सम्पूर्ण वेदका इसीमें उपयोग है—यह दिखानेके लिये, ‘स वा एषः’ इत्यादि मन्त्रमें उसका अनुवाद किया गया है— |
स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः स न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना कनीयानेष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसम्भेदाय तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेनैतमेव विदित्वा मुनिर्भवति । एतमेव प्रवाजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति । एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे विद्वाꣳसः प्रजां न कामयन्ते किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोक इति ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति या ह्येव
१०९४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
१०९४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
पुत्रैषणा सा वित्तैषणा या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवतः। स एष नेति नेत्यात्मागृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो न हि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यत्येतमु हैवैते न तरत इत्यतः पापमकरवमित्यतः कल्याणमकरवमित्युभे उ हैवैष एते तरति नैनं कृताकृते तपतः॥ २२॥
वह यह महान् अजन्मा आत्मा, जो कि यह प्राणोंमें विज्ञानमय है, जो यह हृदयमें आकाश है, उसमें शयन करता है। वह सबको वशमें रखनेवाला, सबका शासन करनेवाला और सबका अधिपति है। वह शुभ कर्मसे बढ़ता नहीं और अशुभ कर्मसे छोटा नहीं होता। यह सर्वेश्वर है; यह भूतोंका अधिपति और भूतोंका पालन करनेवाला है। इन लोकोंकी मर्यादा भङ्ग न हो—इस प्रयोजनसे वह इनको धारण करनेवाला सेतु है। [ उपनिषदोंमें जिसके स्वरूपका दिग्दर्शन कराया गया है ] उस इस आत्माको ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्याय, यज्ञ, दान और निष्काम तपके द्वारा जाननेकी इच्छा करते हैं। इसीको जानकर मुनि होता है। इस आत्म-लोककी ही इच्छा करते हुए त्यागी पुरुष सब कुछ त्याग कर चले जाते (संन्यासी हो जाते) हैं। इस संन्यासमें कारण यह है—पूर्ववर्ती विद्वान् संतान [ तथा सकाम कर्म आदि ] की इच्छा नहीं करते थे। [ वे सोचते थे—] हमें प्रजासे क्या लेना है ? जिन हमको कि यह आत्मलोक अभीष्ट है। अतः वे पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणासे व्युत्थान कर फिर भिक्षाचर्या करते थे। जो भी पुत्रैषणा है, वही वित्तैषणा है और जो वित्तैषणा है, वही लोकैषणा है। ये दोनों एषणाएँ ही हैं। वह यह ‘नेति नेति’ इस प्रकार निर्देश किया गया आत्मा अगृह्य है, वह ग्रहण नहीं किया जाता, वह अशीर्य है, उसका नाश नहीं होता, असङ्ग है, वह कहीं आसक्त नहीं होता, बँधा नहीं है, इसलिये व्यथित नहीं होता तथा उसका क्षय नहीं होता। इस आत्मज्ञको ये दोनों ( पाप-पुण्यसम्बन्धी शोक,
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९५
हर्ष) प्राप्त नहीं होते। अतः इस निमित्तसे मैंने पाप किया है [—ऐसा पश्चात्ताप] और इस निमित्तसे मैंने पुण्य किया है [ऐसा हर्ष]—इन दोनोंको ही वह पार कर जाता है। इसे किया हुआ और न किया हुआ नित्यकर्म [फलप्रदान और प्रत्यवायके द्वारा] ताप नहीं देता ॥ २२ ॥
| स इति उक्तपरामर्शार्थः कोऽसावुक्तः परामृश्यते ? तं प्रतिनिर्दिशति—य एष विज्ञानमय इति । अतीतानन्तरवाक्योक्तसंप्रत्ययो मा भूदिति, य एषः। कतम एषः ? इत्युच्यते—विज्ञानमयः प्राणेष्विति । | 'सः' यह शब्द पूर्वोक्तके परामर्शके लिये है। वह पूर्वोक्त कौन है जिसका श्रुति परामर्श करती है ? 'य एष विज्ञानमयः' ऐसा कहकर श्रुति उसका प्रतिनिर्देश करती है। पूर्वोक्त मन्त्रके पहलेवाले ^१वाक्यमें कहे हुए आत्माको ही न समझ लिया जाय, इसलिये 'य एषः' (जो यह) ऐसा कहा है। यह कौन सा ? सो 'विज्ञानमयः प्राणेषु' इस वाक्यसे कहा जाता है। | | उक्तवाक्योल्लिङ्गनं संशयनिवृत्त्यर्थम्, उक्तं हि पूर्वं जनकप्रश्नारम्भे 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु' (४ । ३ । ७) इत्यादि । एतदुक्तं भवति—योऽयम् 'विज्ञानमयः प्राणेषु' इत्यादिना वाक्येन प्रतिपादितः स्वयंज्योतिरात्मा, स एष कामकर्माविद्यानामनात्मधर्मत्वप्रतिपादनद्वारेण | यहाँ पूर्वोक्त वाक्यका उल्लेख संशयनिवृत्तिके लिये है। पहले जनकके प्रश्नके आरम्भमें 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु' इत्यादि कहा है। यहाँ कहना यह है कि 'विज्ञानमयः प्राणेषु' इत्यादि वाक्यसे जिस स्वयंज्योति आत्माका प्रतिपादन किया गया है, उस इस आत्माको 'काम, कर्म और अविद्या—ये अनात्माके धर्म हैं' |
१. बीसवें मन्त्रके 'विरजः पर आकाशात्' इत्यादि वाक्यमें ।
१०९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| मोक्षितः, परमात्मभावमापादितः—पर एवायं नान्य इति; एष स साक्षान्महानज आत्मेत्युक्तः। | ऐसा कहकर उन धर्मोंसे मुक्त कर दिया गया है और 'यह पर ही है अन्य नहीं है' ऐसा कहकर उसे परमात्मभावको प्राप्त करा दिया गया है; वही यह साक्षात् 'महान् अजन्मा आत्मा है' ऐसा कहा गया है। | | योऽयं विज्ञानमयः प्राणेष्विति यथाव्याख्यातार्थ एव। | 'योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु, इसका अर्थ पूर्व व्याख्याके समान ही है। | | य एषोऽन्तर्हृदये—हृदयपुण्डरीकमध्ये य एष आकाशो बुद्धिविज्ञानसंश्रयः, तस्मिन्नाकाशे बुद्धिविज्ञानसहिते शेते तिष्ठति; अथवा संप्रसादकाले अन्तर्हृदये य एष आकाशः पर एव आत्मा निरुपाधिको विज्ञानमयस्य स्वस्वभावः, तस्मिन् स्वस्वभावे परमात्मन्याकाशाख्ये शेते; चतुर्थे^१ एतद् व्याख्यातम्—'कैष तदाऽभूत्' इत्यस्य प्रतिवचनत्वेन। | 'य एषोऽन्तर्हृदये'—हृदयकमलके भीतर जो यह बुद्धि-विज्ञानका आश्रयभूत आकाश है, उस बुद्धिविज्ञानसहित आकाशमें यह शयन करता अर्थात् रहता है अथवा सुषुप्तिके समय जो यह हृदयके भीतर आकाश अर्थात् विज्ञानमयका स्वस्वरूप निरुपाधिक परमात्मा ही है, उस अपने स्वरूपभूत परमात्मआकाशमें यह शयन करता है। ^१चतुर्थ प्रपाठकमें 'उस समय यह कहाँ था?' इस प्रश्नके उत्तररूपसे इसकी व्याख्या की जा चुकी है। | | स च सर्वस्य ब्रह्मेन्द्रादेः, वशी सर्वो हि अस्य वशे वर्तते; उक्तं च—"एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने" (३।८।९) इति। न केवलं वशी, सर्वस्य ईशानः–ईशिता च ब्रह्मेन्द्रप्रभृतीनाम्। ईशितृत्वं च कदाचि- | वही ब्रह्मा एवं इन्द्रादि सबका वशी है; सभी इसके वशमें रहते हैं। [हे गार्गि!] "इस अक्षरके ही प्रशासनमें" ऐसा कहा भी है। केवल वशी ही नहीं, ब्रह्मा एवं इन्द्रादि सबका ईशान—ईशन अर्थात् शासन करनेवाला भी है। ईशितृत्व |
१. उपनिषदके द्वितीय अध्यायमें।
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७७
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७७
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| न्जातिकृतम्—यथा राजकुमारस्य बलवत्तरानपि भृत्यान् प्रति, <br><br> तन्माभूदित्याह—सर्वस्याधिपतिः—अधिष्ठाय पालयिता, <br><br> स्वतन्त्र इत्यर्थः, न राजपुत्रवदमात्यादिभृत्यतन्त्रः । | (शासकत्व) कभी कभी जातिकृत भी होता है, जैसा कि राजकुमारका अपनेसे अधिक बलशाली सेवकोंके प्रति भी शासन है, परमात्माका शासकत्व वैसा न समझा जाय इसलिये श्रुति कहती है—सबका अधिपति—सबका अधिष्ठाता होकर पालन करनेवाला अर्थात् स्वतन्त्र है, राजकुमारके समान मन्त्री आदि सेवकोंके अधीन नहीं है । |
| त्रयमप्येतद् वशित्वादि हेतुहेतुमद्रूपम्—यस्मात् सर्वस्याधिपतिः, ततोऽसौ सर्वस्येशानः, यो हि यमधिष्ठाय पालयति, स तं प्रतीष्ट एवेति प्रसिद्धम्, यस्माच्च सर्वस्येशानः, तस्मात् सर्वस्य वशीति । | ये वशित्वादि तीनों ही हेतुहेतुमद्रूप हैं ।^१ क्योंकि यह सबका अधिपति है, इसलिये यह सबका ईशान है । जो जिसका अधिष्ठाता होकर पालन करता है, वह उसके प्रति ईशन करता ही है—यह प्रसिद्ध है । और चूँकि यह सबका ईशान है, इसलिये सबका वशी है । |
| किं चान्यत्, स एवम्भूतो हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषो विज्ञानमयो न साधुना शास्त्रविहितेन कर्मणा भूयान् भवति, न वर्धते पूर्वावस्थातः केनचिद्धर्मेण, नो एव शास्त्रप्रतिषिद्धेन असाधुना कर्मणा कनीयान् अल्पतरो भवति, पूर्वावस्थातो न हीयत इत्यर्थः । | इसके सिवा दूसरी बात यह है कि वह इस प्रकारका हृदयस्थित ज्योतिःस्वरूप विज्ञानमय पुरुष साधु अर्थात् शास्त्रविहित कर्मसे भूयान् नहीं होता । अपनी पूर्वावस्थाकी अपेक्षा किसी धर्मके कारण बढ़ नहीं जाता और न किसी असाधु अर्थात् शास्त्रप्रतिषिद्ध कर्मसे कनीयान्—यानी बहुत छोटा ही होता है अर्थात् पूर्वावस्थासे हीन नहीं होता । |
१. अर्थात् एकमें दूसरा हेतु है ।
१०९८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४
१०९८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४
| किं च सर्वो हि अधिष्ठानपालनादि कुर्वन् परानुग्रहपीडाकृतेन धर्माधर्माख्येन युज्यते, अस्यैव तु कथं तदभाव इत्युच्यते—यस्मादेष सर्वेश्वरः सन् कर्मणोऽपीशितुं भवत्येव शीलमस्य, तस्माद्व न कर्मणा संबध्यते। किं च एष भूताधिपतिर्ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानां भूतानामधिपतिरित्युक्तार्थं पदम्।<br><br>एष भूतानां तेषामेव पालयिता रक्षिता। एष सेतुः, किंविशिष्ट इत्याह—विधरणः—वर्णाश्रमादिव्यवस्थाया विधारयिता, तदाह—एषां भूरादीनां ब्रह्मलोकान्तानां लोकानाम् असंभेदाय असंभिन्नमर्यादायै। परमेश्वरेण सेतुवदविधार्यमाणा लोकाः संभिन्नमर्यादाः स्युः, अतो लोकानामसंभेदाय | इसके सिवा [यह देखा जाता है कि] अधिष्ठान और पालनादि करनेवाले सभी लोग दूसरोंपर कृपा या कठोरताके कारण धर्म या अधर्म संज्ञक उनके फलसे युक्त होते हैं, इस आत्माको ही वे फल क्यों नहीं प्राप्त होते? सो बतलाया जाता है—क्योंकि यह सबका ईश्वर है, अतः इसका स्वभाव कर्मका शासन करनेका भी है, इसलिये कर्मसे इसका सम्बन्ध नहीं होता। तथा यह भूताधिपति अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त भूतोंका अधिपति है—इस प्रकार इस पदका अर्थ पहले कहा जा चुका है।<br><br>उन्हीं भूतोंका यह पालयिता—रक्षा करनेवाला है यह सेतु है; किन विशेषणोंवाला सेतु है। सो श्रुति बतलाती है—विधरण अर्थात् वर्णाश्रमादि व्यवस्थाका विधारण करनेवाला; यही बात श्रुति कहती है—इन भूर्लोकसे लेकर ब्रह्मलोकपर्यन्त लोकोंके असम्भेदके लिये अर्थात् मर्यादाका भेदन न होनेके लिये। यदि परमेश्वर सेतुके समान लोकोंका विधारण न करें तो उनकी मर्यादा टूट जाय। अतः लोकोंके |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०९९
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०९९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| सेतुभूतोऽयं परमेश्वरः, यः स्वयं ज्योतिरात्मैव एवंवित् सर्वस्य वशी—इत्यादि ब्रह्मविद्यायाः फलमेतन्निर्दिष्टम् ।<br><br>‘किंज्योतिरयं पुरुषः’ इत्येवमादिषष्ठप्रपाठकविहितायामेतस्यां ब्रह्मविद्यायाम् एवंफलायां काम्यैकदेशवर्जितं कृत्स्नं कर्मकाण्डं तादर्थ्येन विनियुज्यते, तत् कथमित्युच्यते—तमेतम् एवंभूतमौपनिषदं पुरुषम्, वेदानुवचनेन मन्त्रब्राह्मणाध्ययनेन नित्यस्वाध्याय लक्षणेन, विविदिषन्ति वेदितुमिच्छन्ति । के ? ब्राह्मणाः, ब्राह्मणग्रहणमुपलक्षणार्थम्, अविशिष्टो हि अधिकारः त्रयाणां वर्णानाम् । अथवा कर्मकाण्डेन मन्त्रब्राह्मणेन वेदानुवचनेन विविदिषन्ति, कथं विविदिषन्ति ? इत्युच्यते—यज्ञेनेत्यादि ।<br><br>ये पुनर्मन्त्रब्राह्मणलक्षणेन वेदानुवचनेन प्रकाश्यमानं विवि- | असम्भेदके लिये यह परमेश्वर, जो कि स्वयंज्योति आत्मा ही है, सेतुस्वरूप है । इस प्रकार जाननेवाला वशी है—इत्यादि वाक्यसे यह ब्रह्मविद्याका फल ही दिखाया गया है ।<br><br>‘किंज्योतिरयं पुरुषः’ इस प्रकार आरम्भ होनेवाले छठे १प्रपाठकमें विहित इस प्रकारके फलवाली ब्रह्मविद्यामें काम्यकर्मरूप एकदेशको छोड़कर शेष सारा कर्मकाण्ड ज्ञानोत्पत्तिके लिये उपयुक्त होता है; सो किस प्रकार । यह बतलाया जाता है—उस इस ऐसे औपनिषद पुरुषको वेदानुवचन अर्थात् नित्यस्वाध्यायरूप मन्त्र और ब्राह्मणभागके अध्ययनद्वारा जाननेकी इच्छा करते हैं । कौन ? ब्राह्मण; यहाँ ब्राह्मण शब्दका ग्रहण क्षत्रिय और वैश्यको भी उपलक्षित करानेके लिये है; क्योंकि इसमें तीनों ही वर्णोंका समान अधिकार है । अथवा कर्मकाण्डभूत मन्त्रब्राह्मणरूप वेदानुवचनके द्वारा उसे जाननेकी इच्छा करते हैं; किस प्रकार जाननेकी इच्छा करते हैं; सो ‘यज्ञेन’ इत्यादि वाक्यद्वारा कहा जाता है ।<br><br>किंतु जो ऐसी व्याख्या करते हैं कि मन्त्र-ब्राह्मणरूप वेदानुवचनके द्वारा प्रकाशित होनेवाले ब्रह्मको |
१. उपनिषद्के इस चतुर्थ अध्यायमें ।
११०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| दिषन्ति-इति व्याचक्षते, तेषाम् आरण्यकमात्रमेव वेदानुवचनं स्यात्, न हि कर्मकाण्डेन पर आत्मा प्रकाश्यते, "तं त्वौपनिषदम्" (३।९।२६) इति विशेषश्रुतेः । वेदानुवचनेनेति चाविशेषितत्वात् समस्तग्राहि इदं वचनम्, न च तदेकदेशोत्सर्गो युक्तः । | जाननेकी इच्छा करते हैं, उनके मतानुसार आरण्यकमात्र ही वेदानुवचन है; क्योंकि कर्मकाण्डद्वारा परमात्मा प्रकाशित नहीं होता; जैसा कि "उस औपनिषद पुरुषको पूछता हूँ" ऐसी विशेष श्रुतिसे ज्ञात होता है । किंतु 'वेदानुवचनेन' यह पद विशेषणयुक्त न होनेके कारण समस्त वेदको ही ग्रहण करनेवाला है, उसके एक भागको छोड़ देना उचित नहीं है । | | ननु त्वत्पक्षेऽप्युपनिषद्द्वर्जमित्येकदेशत्वं स्यात्— | शङ्का—किंतु [ दूसरी व्याख्याके अनुसार ] तुम्हारे पक्षमें भी 'उपनिषद्को छोड़कर' इस प्रकार एकदेशत्व हो ही जाता है ! | | न, आद्यव्याख्याने अविरोधादस्मत्पक्षे नैष दोषो भवति । यदा वेदानुवचनशब्देन नित्यः स्वाध्यायो विधीयते, तदा उपनिषदपि गृहीतैवेति, वेदानुवचनशब्दार्थैकदेशो न परित्यक्तो भवति। यज्ञादिसहपाठाच्च—यज्ञादीनि कर्माण्येव अनुक्रमिष्यन् वेदानुवचनशब्दं प्रयुङ्क्ते; तस्मात् कर्मैव वेदानुवचनशब्देनोच्यत इति गम्यते; कर्म हि नित्यस्वाध्यायः । | समाधान—नहीं, पहली व्याख्यामें ऐसा कोई विरोध न होनेके कारण हमारे पक्षमें यह दोष नहीं होता । जब कि वेदानुवचन शब्दसे नित्य स्वाध्यायका विधान किया गया है तो उसमें उपनिषद् भी आ ही गया; इस प्रकार वेदानुवचन शब्दके अर्थका एक देश नहीं छूटता । इसका यज्ञादिके साथ पाठ होनेसे भी यही सिद्ध होता है । श्रुति यज्ञादि कर्मोंका अनुक्रम करते हुए ही वेदानुवचन शब्दका प्रयोग करती है । इससे यह ज्ञात है कि वेदानुवचन शब्दसे कर्म ही कहा गया है क्योंकि नित्यस्वाध्याय तो कर्म ही है । |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११०१
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११०१
| कथं पुनर्नित्यस्वाध्यायादिभिः कर्मभिरात्मानं विविदिषन्ति ? नैव हि तान्यात्मानं प्रकाशयन्ति, यथोपनिषदः । | शङ्का—किंतु नित्यस्वाध्यायादि कर्मोंसे आत्माको जाननेकी इच्छा किस प्रकार करते हैं ? क्योंकि उपनिषदोंके समान वे तो आत्माको प्रकाशित ही नहीं करते । | | नैष दोषः, कर्मणां विशुद्धिहेतुत्वात्; कर्मभिः संस्कृता हि विशुद्धात्मानः शक्नुवन्ति आत्मानमुपनिषत्प्रकाशितमप्रतिबन्धेन वेदितुम्; तथा ह्याथर्वणे—"विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः" (मु० उ० ३ । १ । ८) इति; स्मृतिश्च—"ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः" इत्यादि । | **समाधान—**यह दोष नहीं आ सकता; क्योंकि कर्म चित्तशुद्धिके कारण हैं। कर्मोंसे संस्कारयुक्त हुए विशुद्धचित्त पुरुष ही उपनिषत्प्रकाशित आत्माको बिना किसी रुकावटके जान सकते हैं। ऐसा ही "तब विशुद्धचित्त हुआ पुरुष ध्यान करके उस निष्कल आत्माको देखता है" इस आथर्वण श्रुतिसे भी सिद्ध होता है तथा "पापकर्मोंका क्षय हो जानेसे पुरुषोंको ज्ञान उत्पन्न होता है" ऐसी स्मृति भी है। | | कथं पुनर्नित्यानि कर्माणि संस्कारार्थानीत्यवगम्यते ? | **शङ्का—**किंतु नित्यकर्म चित्तशुद्धि करनेके लिये हैं—यह कैसे जाना जाता है ? | | "स ह वा आत्मयाजी यो वेदेदं मेऽनेनाङ्गं संस्क्रियत इदम् मेऽनेनाङ्गमुपधीयते" इत्यादिश्रुतेः सर्वेषु च स्मृतिशास्त्रेषु कर्माणि संस्कारार्थान्येव आचक्षते "अष्टाचत्वारिंशत्संस्काराः" इत्यादिषु । | समाधान—"वही आत्मयाजी है जो ऐसा जानता है कि इस कर्मसे मेरा यह अङ्ग संस्कारयुक्त होता है, इस कर्मसे मेरा यह अङ्ग योग्य होता है" इत्यादि श्रुतिसे यह जाना जाता है। "अड़तालीस संस्कार हैं" इत्यादि समस्त स्मृतिशास्त्रोंमें भी कर्मोंको चित्तशुद्धिके लिये ही बतलाया गया |
११०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| गीतासु च—“यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥” (१८।५) “सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥” (४।३०) इति । यज्ञेनेति—द्रव्ययज्ञा ज्ञानयज्ञाश्च संस्कारार्थाः; संस्कृतस्य च विशुद्धसत्त्वस्य ज्ञानोत्पत्तिरप्रतिबन्धेन भविष्यति; अतो यज्ञेन विविदिषन्ति ।<br><br>दानेन—दानमपि पापक्षयहेतुत्वाद् धर्मवृद्धिहेतुत्वाच्च ।<br><br>तपसा, तप इत्यविशेषेण कृच्छ्रचान्द्रायणादिप्राप्तौ विशेषणम्—अनाशकेनेति; कामानशनमनाशकम्, न तु भोजननिवृत्तिः; भोजननिवृत्तौ म्रियत एव, न आत्मवेदनम् ।<br><br>वेदानुवचनयज्ञदानतपःशब्देन सर्वमेव नित्यं कर्म उपलक्ष्यते; एवं काम्यवर्जितं नित्यं कर्मजातं | है। गीता में भी—"यज्ञ, दान और तप--ये बुद्धिमान् पुरुषोंको पवित्र करनेवाले हैं" "यज्ञोंद्वारा जिनके पाप नष्ट हो गये हैं—ऐसे ये सभी लोग यज्ञवेत्ता हैं" ऐसा कहा है। 'यज्ञेन' इस पदसे द्रव्ययज्ञ और ज्ञानयज्ञ लेने चाहिये, ये दोनों ही संस्कारके लिये हैं; संस्कारयुक्त विशुद्धचित्त पुरुषको ही बिना किसी प्रतिबन्धके ज्ञानोत्पत्ति होगी। इसीसे यज्ञद्वारा जाननेकी इच्छा करते हैं।<br><br>दानके द्वारा उसे जाननेकी इच्छा करते हैं, क्योंकि पापक्षयका कारण और धर्मवृद्धिका हेतु होनेके कारण दान भी ब्रह्मज्ञानका साधन है तथा तपके द्वारा, तपसे सामान्यतः कृच्छ्रचान्द्रायणादिकी प्राप्ति होती है, इसलिये 'अनाशकेन' यह उसका विशेषण दिया जाता है; मनमाना भोजन न करना ही अनाशक तप है, भोजनका सर्वथा त्याग कर देना नहीं। भोजनको सर्वथा त्याग देनेपर तो पुरुष मर ही जाता है, इससे आत्मज्ञान नहीं होता।<br><br>वेदानुवचन, यज्ञ, दान और तप--इन शब्दोंसे सारा ही नित्यकर्म उपलक्षित होता है। इस प्रकार काम्यकर्मरहित सम्पूर्ण नित्यकर्म |
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११०३ |
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११०३ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| सर्वम् आत्मज्ञानोत्पत्तिद्वारेण मोक्षसाधनत्वं प्रतिपद्यते; एवं कर्मकाण्डेनास्यैकवाक्यतावगतिः। | आत्मज्ञानकी उत्पत्तिके द्वारा मोक्षके साधन होते हैं। इस प्रकार कर्मकाण्डसे इस (ज्ञानकाण्ड) की एकवाक्यता ज्ञात होती है। |
| एवं यथोक्तेन न्यायेनैतमेव आत्मानं विदित्वा यथाप्रकाशितम्, मुनिर्भवति, मननान्मुनिः—योगी भवतीत्यर्थः; एतमेव विदित्वा मुनिर्भवति, नान्यम्। | इस प्रकार उपर्युक्त रीतिसे ऊपर मन्त्र एवं ब्राह्मणद्वारा बतलाये हुए इस आत्माको ही जानकर मुनि होता है। तात्पर्य यह है कि मनन करनेके कारण मुनि यानी योगी हो जाता है। इसीको जानकर मुनि होता है, किसी औरको नहीं। |
| ननु अन्यवेदनेऽपि मुनित्वं स्यात्; कथमवधार्यते—एतमेवेति ? | शङ्का—किंतु मुनि तो अन्य वस्तुको जाननेपर भी हो सकता है, फिर इसीको जानकर—इस प्रकार निश्चय क्यों किया जाता है ? |
| बाढम् अन्यवेदनेऽपि मुनिर्भवेत्; किन्त्वन्यवेदने न मुनिरेव स्यात्, किं तर्हि ? कर्म्यपि भवेत् सः; एतं त्वौपनिषदं पुरुषं विदित्वा मुनिरेव स्यात्; न तु कर्मी; अतोऽसाधारणं मुनित्वं विवक्षितमस्येत्यवधारयति—एतमेवेति। एतस्मिन् हि विदिते, केन कं पश्येदित्येवं क्रियासम्भवान्मननमेव स्यात्। | समाधान—ठीक है, दूसरेको जाननेपर भी मुनि हो सकता है, किंतु दूसरेको जाननेपर केवल मुनि ही नहीं होता, तो फिर क्या होता है ? वह कर्मी भी होता है। किंतु इस औपनिषद पुरुषको जाननेपर तो मुनि ही होता है, कर्मी नहीं होता। अतः इसका असाधारण मुनित्व बतलाना अभीष्ट है, इसीसे 'एतमेव' (इसीको) इस प्रकार श्रुति निश्चय करती है; क्योंकि इसे जान लेनेपर 'किसके द्वारा किसे देखे ?' इस श्रुतिके अनुसार क्रिया असम्भव हो जानेसे फिर मनन ही होगा। |
११०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| किं च एतमेव आत्मानं स्वं लोकमिच्छन्तः प्रार्थयन्तः प्रव्राजिनः प्रव्रजनशीलाः प्रव्रजन्ति प्रकर्षेण व्रजन्ति, सर्वाणि कर्माणि संन्यस्यन्तीत्यर्थः । | तथा इस आत्मा अर्थात् स्वलोककी इच्छा--प्रार्थना करनेवाले 'प्रव्राजी'—प्रव्रजनशील पुरुष प्रव्रजन--प्रकर्षसे व्रजन ( गमन ) करते हैं, अर्थात् सम्पूर्ण कर्मोंका संन्यास ( पूर्णतया त्याग ) कर देते हैं। |
| 'एतमेव लोकमिच्छन्तः, इत्यवधारणान्न बाह्यलोकत्रयेप्सूनां पारिव्राज्येऽधिकार इति गम्यते; न हि गङ्गाद्वारं प्रतिपित्सुः काशीदेशनिवासी पूर्वाभिमुखः प्रैति । तस्माद् बाह्यलोकत्रयार्थिनां पुत्रकर्मापरब्रह्मविद्याः साधनम्, “पुत्रेणायं लोको जय्यो नान्येन कर्मणा” इत्यादिश्रुतेः । अतस्तदर्थिभिः पुत्रादिसाधनं प्रत्याख्याय, न पारिव्राज्यं प्रतिपत्तुं युक्तम्, अतत्साधनत्वात् पारिव्राज्यस्य । तस्मात् 'एत- | 'इसी लोककी इच्छा करनेवाले' ऐसा निश्चय करनेसे जाना जाता है कि बाह्य तीनों लोकोंकी इच्छा करनेवालोंका संन्यासमें अधिकार नहीं है। गङ्गाद्वार (हरिद्वार ) पहुँचनेकी इच्छावाला कोई काशीनिवासी पूर्वाभिमुख होकर नहीं जाता। अतः जिन्हें बाह्य तीनों लोकोंकी इच्छा है, उनके लिये पुत्र, कर्म और अपरब्रह्मविद्या साधन हैं, जैसा कि “यह लोक पुत्रद्वारा प्राप्त किया जा सकता है, किसी और साधनसे नहीं” इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है । अतः उनकी इच्छा रखनेवालोंको पुत्रादि साधनका परित्याग कर संन्यास ग्रहण करना उचित नहीं है; क्योंकि संन्यास उनका साधन नहीं है। अतः 'इसी |
१. बृहदारण्यकमें इससे मिलती-जुलती श्रुति इस प्रकार है—'अयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव जय्यो नान्येन कर्मणा' ( १ । ५ । १६ ) ।
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थं [११०५
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थं [११०५
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मेव लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति' | लोककी इच्छा करनेवाले संन्यास करते हैं' ऐसा निश्चय करना ठीक ही हे । |
| इति युक्तमवधारणम् । | |
| आत्मलोकप्राप्तिर्हि अविद्यानिवृत्तौ स्वात्मन्यवस्थानमेव, तस्मादात्मानं चेल्लोकमिच्छति यः, तस्य सर्वक्रियोपरम एव आत्मलोकसाधनं मुख्यमन्तरङ्गम्, यथा पुत्रादिरेव बाह्यलोकत्रयस्य । पुत्रादिकर्मण आत्मलोकं प्रति असाधनत्वात् । असंभवेन च विरुद्धत्वमवोचाम। | अविद्याकी निवृत्ति होनेपर स्वात्मामें स्थित होना ही आत्मलोककी प्राप्ति है, अतः जिसे आत्मलोककी ही इच्छा है, उसके लिये सम्पूर्ण क्रियाओंसे उपरत होना ही आत्मलोकका मुख्य एवं अन्तरङ्ग साधन है, जिस प्रकार कि बाह्य तीनों लोकोंका साधन पुत्रादि ही हैं। पुत्रादि कर्म आत्मलोकके साधन नहीं हैं तथा पुत्रादि कर्म और संन्यास दोनोंका एक साथ होना असम्भव है — इसलिये हम इन्हें परस्परविरुद्ध बतलाते हैं। |
| तस्मादात्मानं लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्त्येव, सर्वक्रियाभ्यो निवर्तेरन्नेवेत्यर्थः । यथा च बाह्यलोकत्रयार्थिनः प्रति नियतानि पुत्रादीनि साधनानि विहितानि, एवमात्मलोकार्थिनः सर्वैषणानिवृत्तिः पारिव्राज्यं ब्रह्मविदो विधीयत एव । | अतः आत्मलोककी इच्छा करनेवाले परिव्राजक हो ही जायें, अर्थात् उन्हें सम्पूर्ण क्रियाओंसे निवृत्त हो ही जाना चाहिये। जिस प्रकार बाह्य तीनों लोकोंकी इच्छावालोंके लिये पुत्रादि नियत साधनोंका विधान किया गया है, इसी प्रकार आत्मलोकके इच्छुक ब्रह्मवेत्ताके लिये सम्पूर्ण एषणाओंकी निवृत्तिरूप पारिव्राज्य (संन्यास) का विधान है ही। |
बृ० उ० ७०—
| ११०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
| ११०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ | | :--- | :--- |
| कुतः पुनस्ते आत्मलोकार्थिनः प्रव्रजन्त्येवेत्युच्यते; तत्र अर्थवादवाक्यरूपेण हेतुं दर्शयति—एतद्ध स्म वै तत्। तदेतत् पारिव्राज्ये कारणमुच्यते—ह स्म वै किल पूर्वे अतिक्रान्तकालीना विद्वांसः—आत्मज्ञाः, प्रजां कर्म अपरब्रह्मविद्यां च; प्रजोपलक्षितं हि त्रयमेतद् बाह्यलोकत्रयसाधनं निर्दिश्यते 'प्रजाम्' इति। प्रजां किम् ? न कामयन्ते, पुत्रादिलोकत्रयसाधनं न अनुतिष्ठन्तीत्यर्थः। | किंतु वे आत्मलोकके इच्छुक पुरुष संन्यास करते ही हैं ऐसा क्यों कहा जाता है ? इसमें श्रुति अर्थवादवाक्यरूपसे हेतु दिखलाती है—"एतद्ध स्म वै तत्"—उस पारिव्राज्यमें यह कारण बतलाया जाता है—प्रसिद्ध है कि पूर्व अर्थात् भूतकालीन विद्वान् आत्मज्ञ प्रजा, कर्म और अपरब्रह्मविद्याकी [ कामना नहीं करते ]—'प्रजाम्' इस पदसे यहाँ इहलोक, पितृलोक और देवलोक—इन तीनों लोकोंके तीनों साधनोंका, जिनको 'प्रजा' शब्दसे उपलक्षित किया है, निर्देश किया जाता है। प्रजाका क्या करते हैं ? उसकी कामना नहीं करते। अर्थात् बाह्य लोकत्रयके पुत्रादि साधनोंका अनुष्ठान नहीं करते। | | ननु अपरब्रह्मदर्शनमनुतिष्ठन्त्येव, तद्बलाद्धि व्युत्थानम्। | शङ्का—किंतु अपरब्रह्मोपासनाका अनुष्ठान तो करते ही हैं, क्योंकि उसीके बलसे व्युत्थान होता है। | | न, अपवादात्; "ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद" (२।४।६) "सर्वं तं परादात्—" (२।४।६) इति अपरब्रह्मदर्शनमप्यपवदत्येव, अपर- | समाधान—नहीं, क्योंकि उसका तो अपवाद किया गया है। "जो आत्मासे ब्रह्मको पृथक् जानता है, ब्रह्म उसको परास्त कर देता है" "[ जो सर्वको आत्मासे पृथक् जानता है ] सर्व उसको परास्त कर देता है" इस प्रकार श्रुति अपरब्रह्मदर्शनका भी अपवाद ही करती है; क्योंकि |
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११०७ |
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११०७ |
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| ब्रह्मणोऽपि सर्वमध्यान्तर्भावात्; "यत्र नान्यत्पश्यति" (छा० उ० ७ । २४) इति च; पूर्वापरबाह्यान्तरदर्शनप्रतिषेधाच्च "अपूूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम्" (बृ० उ० २ । ५ । १९) इति; "तत्केन कं पश्येत्... विजानीयात्" (बृ० उ० २ । ४ । १४) इति च; तस्मान्न आत्मदर्शनव्यतिरेकेण अन्यद् व्युत्थानकारणमपेक्षते । | अपरब्रह्मका भी सर्वके भीतर ही अन्तर्भाव है। "जहाँ अन्यको नहीं देखता" ऐसा भी कहा ही है। तथा "ब्रह्म अपूर्व, अनपर, अनन्तर और अबाह्य है" इस प्रकार ब्रह्ममें पूर्व, अपर, बाह्य एवं अन्तर दृष्टियोंका भी प्रतिषेध किया ही है और "उस समय किसके द्वारा किसे जाने?" ऐसा भी कहा ही है। अतः आत्मदर्शनके सिवा व्युत्थानके किसी अन्य कारणकी अपेक्षा नहीं है। | | कः पुनस्तेषामभिप्रायः ? | तो फिर [ व्युत्थान करनेमें ] उनका क्या अभिप्राय होता है? | | **इत्युच्यते—**किं प्रयोजनं फलं साध्यं करिष्यामः प्रजया साधनेन; प्रजा हि बाह्यलोकसाधनं निर्ज्ञाता; स च बाह्यलोको नास्त्यस्माकमात्मव्यतिरिक्तः; सर्वं हि अस्माकमात्मभूतमेव, सर्वस्य च वयमात्मभूताः । आत्मा च नः आत्मत्वादेव न केनचित् साधनेनोत्पाद्य आप्यो विकार्यः संस्कार्यो वा । | सो बतलाया जाता है। हम प्रजारूप साधनसे किस प्रयोजन—फल अर्थात् साध्यका सम्पादन करेंगे? प्रजा तो बाह्यलोकका साधन समझी गयी है और वह बाह्यलोक हमारे लिये आत्मासे भिन्न नहीं है; हमारे लिये तो सब आत्मस्वरूप ही है और हम भी सबके आत्मस्वरूप ही हैं तथा हमारा आत्मा भी आत्मा होनेके कारण ही किसी साधनसे उत्पाद्य, आप्य, विकार्य अथवा संस्कार्य नहीं है। |
| ११०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
| ११०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| यदप्यात्मयाजिनः संस्कारार्थं कर्मेति, तदपि कार्यकारणात्मदर्शनविषयमेव, इदं मे अनेन अङ्गं संस्क्रियते—इत्यङ्गाङ्गित्वादिश्रवणात्; न हि विज्ञानघनैकरसनैरन्तर्यदर्शिनोऽङ्गाङ्गिसंस्कारोपधानदर्शनं संभवति । तस्मान्न किञ्चित् प्रजादिसाधनैः करिष्यामः; अविदुषां हि तत् प्रजादिसाधनैः कर्तव्यं फलम्; न हि मृगतृष्णिकायामुदकपानाय तदुदकदर्शी प्रवृत्त इति तत्र ऊषरमात्रमुदकाभावं पश्यतोऽपि प्रवृत्तिर्युक्ता; एवमस्माकमपि परमार्थात्मलोकदर्शिनां प्रजादिसाधनसाध्ये मृगतृष्णिकादिसमेऽविद्वद्दर्शनविषये न प्रवृत्तिर्युक्तेत्यभिप्रायः । | और ऐसा जो कहा है कि कर्म आत्मयाजीके संस्कारके लिये है, वह भी देह और इन्द्रियोंमें आत्मबुद्धि करनेको लक्ष्य करके ही है; क्योंकि इसके द्वारा मेरे इस अङ्गका संस्कार होता है—इस प्रकार श्रुतिसे उसमें अङ्गाङ्गित्व-भाव ज्ञात होता है । जो निरन्तर एक विज्ञानघनरसस्वरूपको ही देखता है, उसके लिये अङ्गाङ्गिसंस्कारोंका अवलम्ब देखना सम्भव नहीं है, इसलिये प्रजादि साधनोंसे हम कोई भी प्रयोजन नहीं सिद्ध करेंगे । जो अविद्वान् हैं, उन्हें ही उन प्रजादि साधनोंसे फल प्राप्त करना है । मृगतृष्णामें जल देखनेवाला जलपानके लिये उसकी ओर जाता है, इसलिये उसे ऊसरमात्र और उसमें जलका अभाव देखनेवालेकी भी प्रवृत्ति होनी ही चाहिये—ऐसी बात नहीं है । इसलिये जो अज्ञानियोंकी दृष्टिका विषय और मृगतृष्णादिके समान है, उस प्रजादिसाधनसे साध्य फलमें हम परमार्थ आत्मलोकदर्शियोंकी भी प्रवृत्ति होनी उचित नहीं है—ऐसा इसका अभिप्राय है । |