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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

१४६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| इत्युच्यते—समः प्लुषिणा पुत्तिकाशरीरेण, समो मशकेन मशकशरीरेण, समो नागेन हस्तिशरीरेण, सम एभिस्त्रिभिर्लोकैस्त्रैलोक्यशरीरेण प्राजापत्येन, समोऽनेन जगद्रूपेण हैरण्यगर्भेण। पुत्तिकादिशरीरेषु गोत्वादिवत्कार्त्स्न्येन परिसमाप्त इति समत्वं प्राणस्य; न पुनः शरीरमात्रपरिमाणेनेव, अमूर्तत्वात्सर्वगतत्वाच्च। न च घटप्रासादादिप्रदीपवत्संकोचविकासितया शरीरेषु तावन्मात्रं समत्वम्। “त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः” (बृह०उ० १।५।१३) इति श्रुतेः। सर्वगतस्य तु शरीरपरिमाणवृत्तिलाभो न विरुध्यते। | अब बतलाया जाता है--[ यह प्राण ] प्लुषि--पुत्तिका (छोटी मक्खी) के शरीरके समान है, मशक अर्थात् मच्छरके शरीरके समान है, नाग--हाथीके शरीरके समान है, इन तीनों लोकों अर्थात् त्रिलोकीरूप प्रजापतिके शरीरके समान है तथा इस जगद्रूप हिरण्यगर्भके शरीरके समान है। जिस प्रकार गोशरीरमें गोत्वकी पूर्णतया व्याप्ति होती है उसी प्रकार यह पुत्तिकादि शरीरोंमें पूर्णतया व्याप्त है--इसलिये ही प्राण उनके समान है, शरीरमात्रके बराबर होनेके कारण ही नहीं; क्योंकि यह अमूर्त्त और सर्वगत है। घट और महल आदिके दीपकके समान संकुचित और विकसित होनेवाला होनेसे शरीरोंमें उन्हींके बराबर रहनेसे इसका समत्व नहीं है; जैसा कि “वे ये सभी समान हैं और सभी अनन्त हैं” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। सर्वगत प्राणका शरीरके परिमाणानुसार वृत्ति लाभ करनेमें कोई विरोध नहीं है। | | एवं समत्वात्सामाख्यं प्राणं वेद यः श्रुतिप्रकाशितमहत्त्वं तस्यै- | इस प्रकार सम होनेके कारण सामसंज्ञक प्राणको, जिसका महत्त्व श्रुतिने प्रकाशित किया है, जो पुरुष |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४७

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४७


तत्फलम्-अश्नुते व्याप्नोति साम्नः प्राणस्य सायुज्यं सयुग्भावं समानदेहेन्द्रियाभिमानत्वम्, सालोक्यं समानलोकतां वा भावनाविशेषतः, य एवमेतद्यथोक्तं साम प्राणं वेद--आ प्राणात्माभिमानाभिव्यक्तेरुपास्ते इत्यर्थः ॥२२॥जानता है उसे यह फल प्राप्त होता है--वह सामसंज्ञक प्राणका सायुज्य-सयुग्भाव अर्थात् उसके साथ एक ही देह और इन्द्रियादिका अभिमान प्राप्त करता है तथा भावनाविशेषसे सालोक्य यानी समानलोकता प्राप्त करता है, जो इस प्रकार इस उपर्युक्त सामरूप प्राणको जानता है अर्थात् प्राणात्मत्वका अभिमान उदय होनेपर्यन्त उसकी उपासना करता है ॥ २२ ॥

प्राणके उद्गीथत्वकी उपपत्ति

एष उ वा उद्गीथः प्राणो वा उत्प्राणेन हीदँ सर्वमुत्तब्धं वागेव गीथोच्च गीथा चेति स उद्गीथः ॥ २३ ॥

यह ही उद्गीथ है। प्राण ही उत् है, प्राणके द्वारा ही यह सब उत्तब्ध--धारण किया हुआ है। वाक् ही गीथा है। वह उत् है और गीथा भी है; इसलिये उद्गीथ है ॥ २३ ॥


एष उ वा उद्गीथः । उद्गीथो नाम सामावयवो भक्तिविशेषो नोद्गानम्, सामाधिकारात् । कथमुद्गीथः प्राणः ? प्राणो वा उत्प्राणेन हि यस्मादिदं सर्वं जगदुत्तब्धमूर्ध्वं स्तब्धमुत्तम्भितं विधृतमित्यर्थः । उत्तब्धार्थाव-यह ही 'उद्गीथ' है। 'उद्गीथ' शब्दसे सामकी अवयवभूत भक्ति-विशेष अभिप्रेत है, उद्गान नहीं; क्योंकि यहाँ सामका ही अधिकरण है। प्राण उद्गीथ किस प्रकार है ?- प्राण ही 'उत्' है; क्योंकि प्राणसे ही यह सब जगत् उत्तब्ध--ऊपरकी ओर ठहरा हुआ अर्थात् विधृत है। 'उत्तब्ध' अर्थका द्योतन करनेवाला

१४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

१४८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| द्योतकोऽयमुच्छब्दः प्राणगुणाभि-धायकः, तस्मादुत्प्राणः। वागेव गीथाशब्दविशेषत्वादुद्गीथभक्तेः। गायतेः शब्दार्थत्वात्सा वागेव ! न ह्युद्गीथभक्तेः शब्दव्यतिरेकेण किञ्चिद्रूपमुत्प्रेक्ष्यते । तस्माद्युक्तमवधारणं वागेव गीथेति । उच्च प्राणो गीथा च प्राणतन्त्रा वागित्युभयमेकेन शब्देनाभिधीयते स उद्गीथः ॥ २३ ॥ | यह 'उत्' शब्द प्राणका गुण बतलानेवाला है। अतः प्राण उत् है। वाक् ही गीथा है; क्योंकि उद्गीथभक्ति शब्दविशेष ही है। 'गै' धातुका अर्थ शब्द करना है, अतः गीथा वाक् ही है। उद्गीथ-भक्तिके स्वरूपकी शब्दके सिवा और कोई उत्प्रेक्षा नहीं की जा सकती। अतः वाक् ही गीथा है—ऐसा निश्चय करना उचित ही है। उत् प्राण है और गीथा प्राणतन्त्रा वाक् है, अतः इन दोनोंका एक ही शब्दसे कथन होता है, वह शब्द 'उद्गीथ' है ॥ २२ ॥ |

उक्त अर्थकी पुष्टिके लिये आख्यायिका

तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाचायं त्यस्य राजा मूर्धानं विपातयताद्यदितोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोदगायदिति वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायदिति ॥ २४ ॥

उस [प्राण] के विषयमें यह आख्यायिका भी है--चैकितानेय ब्रह्मदत्तने यज्ञमें सोम भक्षण करते हुए कहा। "यदि अयास्य और आङ्गिरसनामक मुख्य प्राणने वाक्संयुक्त प्राणसे अतिरिक्त देवताद्वारा उद्गान किया हो तो यह सोम मेरा शिर गिरा दे।" अतः उसने प्राण और वाक्‌के ही द्वारा उद्गान किया था—ऐसा निश्चय होता है ॥ २४ ॥

तद्धापि तत्तत्रैतस्मिन्नुक्तेऽर्थे हाप्याख्यायिकापि श्रूयते ह स्म।'तद्धापि'--उस अर्थात् इस उपर्युक्त विषयमें यह आख्यायिका भी सुनी जाती है--ब्रह्मदत्त नाम-

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४९

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४९


| ब्रह्मदत्तो नामतः चिकितानस्यापत्यं चैकितानस्तदपत्यं युवा चैकितानेयः, राजानं यज्ञे सोमं भक्षयन्नुवाच । किम् ? अयं चमसस्थो मया भक्ष्यमाणो राजा त्यस्य तस्य ममानृतवादिनो मूर्धानं शिरो विपातयताद्विस्पष्टं पातयतु । तोरयं तातङादेशः आशिषि लोट्, विपातयतादिति । यदहमनृतवादी स्यामित्यर्थः ।<br><br>कथं पुनरनृतवादित्वप्राप्तिः ? इत्युच्यते—यद्यदीतोऽस्मात्प्रकृतात् प्राणाद्वाक्संयुक्तात्, अयास्यः-मुख्यप्राणाभिधायकेन | वाला चैकितानेय—चिकितानके पुत्र चैकितानका युवसंज्ञक¹ अपत्य (संतान) यज्ञमें राजा अर्थात् सोमका भक्षण करता हुआ बोला। क्या बोला—"यह मेरेद्वारा भक्षण किया जाता हुआ चमसस्थ सोम 'त्यस्य'—उस मुझ मिथ्यावादीके मस्तकको विपतित—विस्पष्टतया पतित कर दे, अर्थात् यदि मैं मिथ्यावादी होऊँ तो ऐसा हो।" यहाँ [आशिषि लिङ्लोटौ इस सूत्रके नियमानुसार ] आशीर्वाद अर्थमें लोट् लकार है। 'विपातयतु' के 'तु' प्रत्ययको तातङ् आदेश होकर 'विपातयतात्' यह रूप सिद्ध हुआ है।²<br><br>किंतु मुझे मिथ्यावादित्वकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? सो बतलाया जाता है—"यदि इस प्रकृत वाक्संयुक्त प्राणसे अयास्यने, जो मुख्यप्राणके वाचक अयास्याङ्गिरस शब्दद्वारा |


१. व्याकरणशास्त्रीय प्रक्रियामें अपत्य तीन प्रकारके माने गये हैं, १ अनन्तरापत्य, २ गोत्रापत्य और ३ युवापत्य । पुत्रको अनन्तरापत्य कहते हैं, पौत्रसे लेकर जितनी भी होनेवाली पीढ़ियाँ हैं, सभी गोत्रापत्य कहलाती हैं, किंतु जिसके पिता आदिमेंसे कोई भी जीवित हो, वह संतान यदि मूल पुरुषसे नीचेकी चौथी आदि पीढ़ियोंमेंसे है अर्थात् पौत्रका पुत्र आदि है तो उसको युवापत्य कहते हैं।
२. संस्कृतमें आज्ञा अर्थमें 'लोट्' लकार होता है। उसका आशीर्वादके अर्थमें भी प्रयोग होता है। उसके प्रथमपुरुषका एक वचन प्रत्यय 'ति' है, उसीके इकारको उकार आदेश होनेसे 'तु' होता है और फिर उसका 'तातङ्' आदेश होकर 'तात्' रूप बनता है।

१५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

१५०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| अयास्याङ्गिरसशब्देनाभिधीयते विश्वसृजां पूर्वर्षीणां सत्रे उद्गाता—सोऽन्येन देवतान्तरेण वाक्प्राणव्यतिरिक्तेनोद्गायदुद्गानं कृतवान्, ततोऽहमनृतवादी स्याम्, तस्य मम देवता विपरीतप्रतिपत्तुर्मूर्धानं विपातयतु, इत्येवं शपथं चकारेति विज्ञाने प्रत्ययदाढ्यं-कर्तव्यतां दर्शयति ।<br><br>तमिममार्थ्यायिकानिर्धारितमर्थं स्वेन वचसोपसंहरति श्रुतिः—वाचा च प्राणप्रधानया प्राणेन च स्वस्यात्मभूतेन सोऽयास्य आङ्गिरस उद्गातोद्गायदित्येषोऽर्थो निर्धारितः शपथेन ॥ २४ ॥ | कहा जाता है और जो विश्वकी रचना करनेवाले पूर्ववर्ती ऋषियोंके सत्रमें उद्गाता था, उसने यदि वाक्संयुक्त प्राणसे भिन्न किसी अन्य देवताद्वारा उद्गान किया हो तो मैं मिथ्यावादी ठहरूँगा, अतः देवता मुझ विपरीत ज्ञान रखनेवालेका मस्तक गिरा दे।” इस प्रकार उसने जो शपथ की यह विज्ञानमें प्रत्ययकी दृढ़ता करनी चाहिये—इस बातको प्रकट करती है।<br><br>आख्यायिकाद्वारा निश्चित इस अर्थका श्रुति अपने वचनसे उपसंहार करती है—उस अयास्य आङ्गिरस उद्गाताने प्राणप्रधान वाणीसे और अपने आत्मभूत प्राणसे ही उद्गान किया था—यही अर्थ इस शपथसे निश्चित होता है ॥ २४॥ |

सामके स्वभूत स्वरको सम्पादन करनेकी आवश्यकता

तस्य हैतस्य साम्नो यः स्वं वेद भवति हास्य स्वं तस्य वै स्वर एव स्वं तस्मादार्त्विज्यं करिष्यन्वाचिस्वरमिच्छेत तया वाचा स्वरसम्पन्नयार्त्विज्यं कुर्यात्तस्माद्यज्ञे स्वरवन्तं दिदृक्षन्त एव । अथो यस्य स्वं भवति भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्नः स्वं वेद ॥ २५ ॥

जो उस इस सामशब्दवाच्य मुख्य प्राणके स्व (धन) को जानता है उसे धन प्राप्त होता है। निश्चय स्वर ही उसका धन है। अतः ऋत्विक्-

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थे [१५१

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थे [१५१


कर्म करनेवालेको वाणीमें स्वरकी इच्छा करनी चाहिये। उस स्वर-सम्पन्न वाणीसे ऋत्विक् कर्म करे। इसीसे यज्ञमें स्वरवान् उद्गाताको देखनेकी इच्छा करते ही हैं। लोकमें भी जिसके पास धन होता है [ उसे ही देखना चाहते हैं ]। जो इस प्रकार इस सामके धनको जानता है उसे धन प्राप्त होता है ॥ २५ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तस्येति प्रकृतं प्राणमभि- <br><br> सम्बध्नाति। हैतस्येति मुख्यं <br><br> व्यपदिशत्यभिनयेन। साम्नः <br><br> सामशब्दवाच्यस्य प्राणस्य यः स्वं <br><br> धनं वेद, तस्य ह किं स्यात् ? <br><br> भवति हास्य स्वम्। फलेन प्रलो- <br><br> भ्याभिमुखी कृत्य शुश्रूषवे आह— <br><br> तस्य वै साम्नः स्वर एव स्वम्। <br><br> स्वर इति कण्ठगतं माधुर्यं तदे- <br><br> वास्य स्वं विभूषणम्। तेन हि <br><br> भूषितमृद्धिमल्लक्ष्यत उद्गानम्। <br><br> यस्मादेवं तस्मादार्त्विज्यं <br><br> ऋत्विकर्मोद्गानं करिष्यन्वाचि <br><br> विषये वाचि वागाश्रितं स्वरमि- <br><br> च्छेन्न इच्छेत् साम्नो धनवत्तां <br><br> स्वरेण चिकीर्षुरुद्गाता। इदं तु'तस्य' इस सर्वनामसे श्रुति प्रकृत प्राणका सम्बन्ध दिखाती है। 'ह एतस्य' इन पदोंसे श्रुति मुख्यप्राणको अङ्गुलिनिर्देशद्वारा बतलाती है। साम अर्थात् साम-शब्दवाच्य मुख्यप्राणके स्व यानी धनको जो पुरुष जानता है उसे क्या फल मिलता है?—उसे धनकी प्राप्ति होती है। इस प्रकार फलके द्वारा प्रलोभित कर उसे अपनी ओर अभिमुख करके श्रुति श्रवणके इच्छुकसे कहती है—निश्चय उस सामका स्वर ही धन है। स्वर कण्ठगत मधुरताको कहते हैं, वही इसका धन—विभूषण है। उसके द्वारा भूषित होनेपर ही उद्गान समृद्धिमान् दिखायी देता है। <br><br> क्योंकि ऐसा है, इसलिये आर्त्विज्य यानी उद्गानरूप ऋत्विक्कर्म करते हुए स्वरके द्वारा सामकी समृद्धि सम्पादन करनेकी इच्छावाले उद्गाताको वाणीके विषयमें अर्थात् वाणीके आश्रित स्वरकी इच्छा करनी

| १५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |

१५२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| प्रासङ्गिकं विधीयते; साम्नः सौस्वर्येण स्वरवत्त्वप्रत्यये कर्तव्ये इच्छामatreण सौस्वर्यं न भवतीति दन्तधावनतैलपानादि सामर्थ्यात्कर्तव्यमित्यर्थः। तयैवं संस्कृतया वाचा स्वरसम्पन्नयाऽऽर्त्विज्यं कुर्यात्।<br><br>तस्माद्यस्मात्साम्नः स्वभूतः स्वरस्तेन स्वेन भूषितं साम अतो यज्ञे स्वरवन्तमुद्गातारं दिदृक्षन्त एव द्रष्टुमिच्छन्त एव धनिनमिव लौकिकाः। प्रसिद्धं हि लोकेऽथो अपि यस्य स्वं धनं भवति तं धनिनं दिदृक्षन्ते इति सिद्धस्य गुणावज्ञानफलसम्बन्धस्य उपसंहारः क्रियते— भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्नः स्वं वेदेति ॥ २५ ॥ | चाहिये। यह तो प्रासंगिक विधान किया गया है; सामकी सुस्वरता अर्थात् स्वरवत्त्व-प्रतीति कर्तव्य होनेपर इच्छामात्रसे ही उसकी सुस्वरता नहीं हो जाती। इसलिये तात्पर्य यह है कि दन्तधावन और तैलपानादिके बलसे सुस्वरताका सम्पादन करना चाहिये। इस प्रकार संस्कारयुक्त हुई उस स्वरसम्पन्न वाणीसे ऋत्विक्कर्म करे।<br><br>अतः क्योंकि स्वर सामका धन है, इसलिये उसीसे साम विभूषित होता है। इसीसे लौकिक पुरुष जिस प्रकार धनीको देखना चाहते हैं उसी प्रकार यज्ञमें स्वरसम्पन्न उद्गाताको ही देखनेकी इच्छा करते हैं। लोकमें यह प्रसिद्ध ही है कि जिसके पास स्व—धन होता है, उस धनीको लोग देखना चाहते हैं; इस प्रकार सिद्ध हुए गुणविज्ञानरूप फलके सम्बन्धका 'जो इस प्रकार इस सामके धनको जानता है उसे धन प्राप्त होता है' इस वाक्यद्वारा उपसंहार किया जाता है ॥ २५ ॥ |


सामके सुवर्णको जाननेका फल

अथान्यो गुणः सुवर्णवत्त्वलक्षणो विधीयते। असावपि सौस्वर्यमेव। एतावान्विशेषः—अब सुवर्णवत्तारूप दूसरे गुणका विधान किया जाता है। वह भी सुस्वरता ही है। अन्तर इतना ही

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १५३

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १५३

पूर्वं कण्ठगतमाधुर्यमिदं तु लाक्षणिकं सुवर्णशब्दवाच्यम् ।है कि पहली सुस्वरता कण्ठगत माधुर्य थी और वह सुवर्णशब्दवाच्य माधुर्य लाक्षणिक है ।

तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद भवति हास्य सुवर्णं तस्य वै स्वर एव सुवर्णं भवति हास्य सुवर्णं य एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेद ॥ २६ ॥

जो उस इस सामके सुवर्णको जानता है उसे सुवर्ण प्राप्त होता है। उसका स्वर ही सुवर्ण है। जो इस प्रकार इस सामके सुवर्णको जानता है। उसे सुवर्ण मिलता है ॥ २६ ॥

तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद भवति हास्य सुवर्णम् । सुवर्णशब्दसामान्यात्स्वरसुवर्णयोः लौकिकमेव सुवर्णं गुणविज्ञानफलं भवतीत्यर्थः । तस्य वै स्वर एव सुवर्णम् । भवति हास्य सुवर्णं य एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेदेति पूर्ववत्सर्वम् ॥ २६ ॥जो उस इस सामके सुवर्णको जानता है उसे सुवर्ण प्राप्त होता है। स्वर और सुवर्ण इन दोनोंके लिये सुवर्ण शब्दका प्रयोग समान-रूपसे होता है, इसलिये उस गुणके विज्ञानका फल लौकिक सुवर्ण ही होता है। निश्चय स्वर ही उस (साम) का सुवर्ण है। जो इस प्रकार इस सामके सुवर्णको जानता है उसे सुवर्ण मिलता है—इस प्रकार सब अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ २६ ॥

सामके प्रतिष्ठागुणको जाननेवालेका फल

तथा प्रतिष्ठागुणं विधित्सन्नाह—इसी प्रकार सामके प्रतिष्ठागुण-का विधान करनेकी इच्छासे श्रुति कहती है—

१५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

१५४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा वाचि हि खल्वेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयतेऽन्न इत्यु हैक आहुः ॥ २७ ॥

जो उस इस सामकी प्रतिष्ठाको जानता है वह प्रतिष्ठित होता है। उसकी वाणी ही प्रतिष्ठा है। निश्चय वाणीमें प्रतिष्ठित हुआ ही यह प्राण गाया जाता है। कोई-कोई यह कहते हैं कि ‘वह अन्नमें प्रतिष्ठित होकर गाया जाता है’ ॥ २७ ॥

तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद। प्रतितिष्ठत्यस्यामिति प्रतिष्ठा वाक्तां प्रतिष्ठां साम्नो गुणं यो वेद स प्रतितिष्ठति ह। “तं यथा यथोपासते” इति श्रुतेस्तद्गुणत्वं युक्तम्।जो पुरुष उस इस सामकी प्रतिष्ठाको जानता है। जिसमें [साम] प्रतिष्ठित है वह वाक् उसकी प्रतिष्ठा है, उस सामकी गुणभूत प्रतिष्ठाको जो जानता है वह प्रतिष्ठा होता है। “उसे जो जिस प्रकार उपासना करता है [वही हो जाता है]” इस श्रुतिके अनुसार उसका उसी गुणवाला हो जाना उचित ही है।
पूर्ववत्फलेन प्रलोभिताय का प्रतिष्ठेति शुश्रूषवे आह—तस्य वै साम्नो वागेव, वागिति जिह्वामूलीयादीनां स्थानानामाख्या, सैव प्रतिष्ठा, तदाह—वाचि हि जिह्वामूलीयादिषु हि यस्मात्प्रति-फलके द्वारा प्रलोभित हुए तथा ‘वह प्रतिष्ठित क्या है’ यह सुननेकी इच्छावाले पुरुषसे श्रुति पूर्ववत् कहती है—निश्चय उस सामकी वाक् ही, वाक् यह जिह्वामूलीयादि स्थानोंका नाम है, वही प्रतिष्ठा है। यही बात श्रुति कहती है—क्योंकि वाणी अर्थात् जिह्वामूलीयादि स्थानोंमें प्रतिष्ठित हुआ ही यह प्राण

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ [१५५

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ [१५५


| ष्ठितः सन्नेष प्राण एतद्गानं गीयते गीतिभावमापद्यते तस्मात्साम्नः प्रतिष्ठा वाक् । अन्ने प्रतिष्ठितो गीयत इत्यु हैकेऽन्ये आहुः । इह प्रतितिष्ठतीति युक्तम् । अनिन्दितत्वादेकीयपक्षस्य विकल्पेन प्रतिष्ठागुणविज्ञानं कुर्याद् वाग्वा प्रतिष्ठान्नं वेति ॥ २७ ॥ | यह गान गाया जाता है अर्थात् गीतिभावको प्राप्त होता है, अतः वाक् साम्‌की प्रतिष्ठा है। यह अन्नमें^१ प्रतिष्ठित हुआ गाया जाता है--ऐसा कोई-कोई—अन्य लोग कहते हैं। अतः यह इसमें प्रतिष्ठित है—ऐसा मानना उचित है । यह अन्य पुरुषोंका मत भी निर्दोष है, इसलिये विकल्पसे प्रतिष्ठागुणविज्ञान करे अर्थात् वाक् प्रतिष्ठा है अथवा अन्न प्रतिष्ठा है—ऐसी दृष्टि करे ॥२७॥ |


प्राणोपासकके लिये जपका विधान

| एवं प्राणविज्ञानवतो जपकर्म विधित्स्यते । यद्विज्ञानवतो जपकर्मण्यधिकारस्तद्विज्ञानमुक्तम् । | इस प्रकार प्राण-विज्ञानवान्‌के लिये जपकर्मका विधान इष्ट है। जिस विज्ञानसे युक्त पुरुषका जप-कर्ममें अधिकार है वह विज्ञान कह दिया गया। |

अथातः पवमानानामेवाभ्यारोहः । स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति स यत्र प्रस्तुयात्तदेतानि जपेत् । असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्मामृतं गमयेति । स यदाहासतो मा सद्गमयेति मृत्युर्वा असत्सदमृतं मृत्योर्मामृतं गमयामृतं मा कुर्वित्येवैतदाह । तमसो मा ज्योतिर्गमयेति मृत्युर्वै


१. अन्नके परिणामभूत शरीरमें।

१५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

१५६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

तमो ज्योतिरमृतं मृत्योर्मामृतं गमयामृतं मा कुर्वित्येवैतदाह । मृत्योर्मामृतं गमयेति नात्र तिरोहितमिवास्ति । अथ यानीतराणि स्तोत्राणि तेष्वात्मनेऽन्नाद्यमागायेत्तस्मादु तेषु वरं वृणीत यं कामं कामयेत तꣳ स एष एवंविदुद्गातात्मने वा यजमानाय वा यं कामं कामयते तमागायति तद्धैतल्लोकजिदेव न हैवालोक्यताया आशास्ति य एवमेतत्साम वेद ॥ २८ ॥

अब आगे पवमानोंका ही अभ्यारोह कहा जाता है। वह प्रस्तोता निश्चय सामका ही प्रस्ताव (आरम्भ) करता है। जिस समय वह प्रस्ताव करे उस समय इन मन्त्रोंको जपे—'असतो मा सद्गमय', 'तमसो मा ज्योतिर्गमय', 'मृत्योर्मामृतं गमय'।^१ वह जिस समय कहता है—'मुझे असत्से सत्की ओर ले जाओ' यहाँ मृत्यु ही असत् है और अमृत सत् है। अतः वह यही कहता है कि मुझे मृत्युसे अमृतकी ओर ले जाओ अर्थात् मुझे अमर कर दो। जब कहता है—'मुझे अन्धकारसे प्रकाशकी ओर ले जाओ' तो यहाँ मृत्यु ही अन्धकार है और अमृत ज्योति है यानी उसका यही कथन है कि मृत्युसे अमृतकी ओर ले जाओ अर्थात् मुझे अमर कर दो। मुझे मृत्युसे अमृतकी ओर ले जाओ—इसमें तो कोई बात छिपी-सी है ही नहीं। इनके पीछे जो अन्य स्तोत्र हैं उनमें अपने लिये अन्नाद्यका आगान करे। उनका गान किये जानेपर यजमान वर माँगे और जिस भोगकी इच्छा हो उसे माँगे। वह यह इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता अपने या यजमानके लिये जिस भोगकी कामना करता है उसीका आगान करता है। वह यह प्राणदर्शन लोकप्राप्तिका साधन है। जो इस प्रकार इस सामको जानता है उसे अलोक्यताकी आशा (प्रार्थना) तो है ही नहीं॥ २८॥


१—'मुझे असत्से सत्की ओर ले जाओ', 'मुझे अन्धकारसे प्रकाशकी ओर ले जाओ', 'मुझे मृत्युसे अमरत्वकी ओर ले जाओ'।

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १५७ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ१५७
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
अथानन्तरं यस्माच्चैवं विदुषा प्रयुज्यमानं देवभावायाभ्यारोहफलं जपकर्म, अतस्तस्माद्विधीयत इह। तस्य चोद्गीथसम्बन्धात्सर्वत्र प्राप्तौ पवमानानामिति वचनात् पवमानेषु त्रिष्वपि कर्तव्यतायां प्राप्तायां पुनः कालसंकोचं करोति—स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति। स प्रस्तोता यत्र यस्मिन्काले साम प्रस्तुयात्प्रारभेत तस्मिन्काल एतानि जपेत्।इसके पश्चात्, क्योंकि इस प्रकार जाननेवाले उपासकके द्वारा प्रयोग किया हुआ अभ्यारोहफलवाला जपकर्म देवभावकी प्राप्ति करानेवाला है, इसलिये यहाँ उसका विधान किया जाता है। उद्गीथसे सम्बन्ध होनेके कारण उसकी सर्वत्र प्राप्ति होनेपर 'पवमानानाम्' (पवमानोंके) इस वचनसे तीन पवमानोंमें ही उसकी प्राप्ति होती है—ऐसा प्राप्त होनेपर 'स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति' इस वाक्यसे श्रुति उसका पुनः कालसंकोच करती है। अर्थात् जिस समय वह प्रस्तोता सामका प्रस्ताव—प्रारम्भ करे उस कालमें इनका जप करे।
अस्य च जपकर्मण आख्या अभ्यारोह इति। आभिमुख्येनारोहत्यनेन जपकर्मणैवंविद् देवभावात्मानमित्यभ्यारोहः। एतानीति बहुवचनात्त्रीणि यजूंषि। द्वितीयानिर्देशाद् ब्राह्मणोत्पन्न-इस जपकर्मका 'अभ्यारोह' यह नाम है। इस जपकर्मके द्वारा इस प्रकार प्राणकी उपासना करनेवाला पुरुष अभिमुखतासे अपने देवभावको आरूढ—प्राप्त हो जाता है, इसलिये यह अभ्यारोह है। 'एतानि' यह बहुवचनान्त होनेके कारण ये तीन यजुर्मन्त्र हैं तथा 'एतानि' शब्दमें द्वितीयानिर्देश और इन मन्त्रोंके

१५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

१५८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| त्वाच्च यथापठित एव स्वरः प्रयोक्तव्यो न मान्त्रः। याजमानं जपकर्म। <br><br> एतानि तानि यजूंषि—‘असतो मा सद्गमय’ ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ ‘मृत्योर्मामृतं गमय’ इति। मन्त्राणामर्थस्तिरोहितो भवतीति स्वयमेव व्याचष्टे ब्राह्मणं मन्त्रार्थम्—स मन्त्रो यदाह यदुक्तवान्कोऽसावर्थः? इत्युच्यते— <br><br> ‘असतो मा सद्गमय’ इति मृत्युर्वा असत्—स्वाभाविककर्मविज्ञाने मृत्युरित्युच्येते, असद् अत्यन्ताधोभावहेतुत्वात्। सदमृतम्—सच्छास्त्रीयकर्मविज्ञाने-ऽमरणहेतुत्वादमृतम्। तस्मादसतो असत्कर्मणोऽज्ञानाच्च मा मां सच्छास्त्रीयकर्मविज्ञाने गमय देवभावसाधनात्मभावमापादयेत्यर्थः। | ब्राह्मणभागजनित होनेके कारण इनमें इनके पाठके अनुसार ही स्वरका प्रयोग करना चाहिये, मान्त्रस्वरका नहीं १। यह जपकर्म यजमानका है। <br><br> वे यजुर्मन्त्र ये हैं—‘असतो मा सद्गमय’, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’, ‘मृत्योर्मामृतं गमय’। मन्त्रोंका अर्थ गूढ़ होता है, इसलिये ब्राह्मण स्वयं ही इन मन्त्रोंके अर्थकी व्याख्या करता है। जिसे वह मन्त्र कहता है, वह अर्थ क्या है ? सो बतलाया जाता है—‘असतो मा सद्गमय’ इस मन्त्रमें मृत्यु ही असत् है, स्वाभाविक कर्म और विज्ञानको मृत्यु कहते हैं। वह अत्यन्त अधोगतिका हेतु होनेके कारण असत् है। सत् अमृत है, सत् शास्त्रीय कर्म और विज्ञानका नाम है, वह अमरताका हेतु होनेके कारण अमृत है। अतः असत्—असत्कर्म अर्थात् अज्ञानसे मुझे सत्—शास्त्रीय कर्म और विज्ञानको प्राप्त कराओ। अर्थात् देवभावके साधनभूत आत्मभावकी प्राप्ति कराओ। यहाँ श्रुति वाक्यका |


१. जहाँ मान्त्रस्वर विवक्षित होता है वह तृतीयासे निर्देश किया जाता है; जैसे—"उच्चैर्ऋचा क्रियते" "उच्चैःसाम्ना" "उपांशु यजुषा" इत्यादि वाक्योंमें कहा गया है। परंतु यहाँ 'एतानि' ऐसा द्वितीया विभक्तिका निर्देश है। इसलिये इस सनमें जपकर्मकी ही प्रतीति होती है, मान्त्रस्वरकी प्रतीति नहीं होती।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १५९

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १५९


संस्कृतहिन्दी
तत्र वाक्यार्थमाह—अमृतं मा कुर्वित्येवैतदाहेति ।फलित अर्थ बतलाती है—'मुझे अमर करो' यही कहता है।
तथा तमसो मा ज्योतिर्गमयेति । मृत्युर्वै तमः सर्वमज्ञानमावरणात्मकत्वात्तमः तदेव च मरणहेतुत्वान्मृत्युः। ज्योतिरमृतं पूर्वोक्तविपरीतं दैवं स्वरूपम् । प्रकाशात्मकत्वाज्ज्ञानं ज्योतिः, तदेवामृतमविनाशात्मकत्वात्। तस्मात्तमसो मा ज्योतिर्गमयेति पूर्ववन्मृत्योर्मामृतं गमयेत्यादि । अमृतं मा कुर्वित्येवैतदाह—दैवं प्राजापत्यं फलभावमापादयेत्यर्थः ।तथा 'तमसो मा ज्योतिर्गमय'—इस मन्त्रमें मृत्यु ही तम है; आवरणात्मक होनेके कारण सारा ही अज्ञान तम है और वही मरणका हेतु होनेके कारण मृत्यु है। अमृत ज्योति है; वह पहले बतलाये हुए मृत्युसे विपरीत दैव-देवतासम्बन्धी स्वरूप है। प्रकाशस्वरूप होनेके कारण ज्ञान ही ज्योति है; वही अविनाशात्मक होनेके कारण अमृत है। अतः 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' इसका अर्थ पूर्ववत् 'मुझे मृत्युसे अमृतकी ओर ले जाओ' इत्यादि है [उक्त वाक्यद्वारा जप करनेवाला] यही कहता है कि मुझे अमर करो अर्थात् मुझे देवता और प्रजापतिसम्बन्धी फल प्राप्त कराओ।
पूर्वो मन्त्रोऽसाधनस्वभावात् साधनभावमापादयेति । द्वितीयस्तु साधनभावादपि अज्ञानरूपात् साध्यभावमापादयेति । मृत्योर्मामृतं गमयेति पूर्वयोरेव मन्त्रयोः समुच्चितोऽर्थस्तृतीयेनइनमें पहला मन्त्र 'मुझे असाधनस्वभावसे साधनस्वभावको प्राप्त करो' ऐसा कहता है। दूसरा मन्त्र 'मुझे अज्ञानरूप साधनभावसे भी साध्य भावको प्राप्त करो' ऐसा कहता है। तथा 'मृत्योर्मामृतं गमय' इस तृतीय मन्त्रद्वारा पहले दोनों मन्त्रोंका ही समुच्चित अर्थ कहा गया है।

१६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

१६०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
संस्कृतहिन्दी
मन्त्रेणोच्यत इति प्रसिद्धार्थतैव । नात्र तृतीये मन्त्रे तिरोहितमन्तर्हितमिवार्थरूपं पूर्वयोरिव मन्त्रयोरस्ति, यथाश्रुत एवार्थः ।इसलिये इसका अर्थ तो प्रसिद्ध ही है । पूर्व दोनों मन्त्रोंके समान इस तृतीय मन्त्रमें कोई छिपा हुआ-सा अर्थका रूप नहीं है । इसका अर्थ यथाश्रुत (प्रसिद्धिके अनुसार) ही है ।
याजमानमुद्गानं कृत्वा पवमानेषु त्रिषु, अथानन्तरं यानीतराणि शिष्टानि स्तोत्राणि तेष्वात्मनेऽन्नाद्यमागायेत् प्राणविदुद्गाता प्राणभूतः प्राणवदेव । यस्मात्स एव उद्गातैवं प्राणं यथोक्तं वेत्ति, अतः प्राणवदेव तं कामं साधयितुं समर्थः । तस्माद्यजमानस्तेषु स्तोत्रेषु प्रयुज्यमानेषु वरं वृणीत, यं कामं कामयेत तं कामं वरं वृणीत प्रार्थयेत । यस्मात्स एष एवंविदुद्गातेति तस्माच्छब्दात्प्रागेव सम्बध्यते । आत्मने वा यजमानाय वा यं कामं कामयते इच्छत्युद्गाता तमागायत्यागानेन साधयति ।तीन पवमान स्तोत्रोंमें यजमान-सम्बन्धी उद्गान कर इसके पश्चात् जो अवशिष्ट स्तोत्र हैं उनमें प्राणोपासक उद्गाता प्राणभूत होकर प्राणके ही समान अपने लिये अन्नाद्यका आगान करे; क्योंकि वह उद्गाता इस प्रकार उपर्युक्त प्राणको जानता है, इसलिये प्राणके समान ही वह उस कामनाको सिद्ध करनेमें समर्थ है । अतः उन स्तोत्रोंका प्रयोग किये जानेपर यजमानको वर माँगना चाहिये । उसे जिस भोगकी इच्छा हो उसी भोगका वर माँगे; क्योंकि वह यह इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता अपने या यजमानके लिये जिस भोगकी इच्छा करता है उसीका आगान कर सकता है अर्थात् आगानद्वारा उसे सिद्ध कर लेता है—इस वाक्यका [ 'तस्मादु तेषु वरं वृणीत' इस वाक्यके ] तस्मादु शब्दके पहले अन्वय होगा ।
एवं तावज्ज्ञानकर्मभ्यां प्राणात्मापत्तिरित्युक्तम् । तत्र नास्त्या-इस प्रकार यहाँतक यह बतलाया गया कि ज्ञान और कर्म दोनोंके समुच्चयद्वारा प्राणात्मत्वकी प्राप्ति होती है । उसमें किसी आशङ्काकी

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १६१

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १६१


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
शङ्कासम्भवः। अतः कर्मापाये प्राणापत्तिर्भवति वा न वा? इत्याशङ्क्यते। तदाशङ्कानिवृत्त्यर्थमाह—तद्धैतल्लोकजिदेवेति। तद्ध तदेतत्प्राणदर्शनं कर्मवियुक्तं केवलमपि, लोकजिदेवेति लोकसाधनमेव। न ह एवालोक्यतायै अलोकार्कत्वाय आशा आशंसनं प्रार्थनं नैवास्ति ह। न हि प्राणात्मनि उत्पन्नात्माभिमानस्य तत्प्राप्त्याशंसनं सम्भवति। न हि ग्रामस्थः कदा ग्रामं प्राप्नुयामित्यरण्यस्थ इवाशास्ते। असन्निकृष्टविषये ह्यनात्मन्याशंसनम्, न तत्स्वात्मनि सम्भवति। तस्मान्नाशास्ति कदाचित्प्राणात्मभावं न प्रपद्येयमिति।सम्भावना नहीं है। अतः अब यह शङ्का होती है कि कर्मके अभावमें [ केवल प्राणविज्ञानद्वारा ] प्राणात्मभावकी प्राप्ति होती है या नहीं? इस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये श्रुति कहती है—‘तद्धैतल्लोकजिदेव’ अर्थात् वह यह प्राणविज्ञान कर्मसे रहित अकेला होनेपर भी लोकजित्—लोकप्राप्तिका साधन ही है। अलोक्यता अर्थात् लोकप्राप्तिकी अयोग्यताके लिये तो आशा—आशंसन अर्थात् प्रार्थना होती ही नहीं है। जिसे प्राणात्मामें आत्मत्वका अभिमान उत्पन्न हो गया है उसे उसकी प्राप्तिकी आशा होना सम्भव नहीं है; क्योंकि जो पुरुष गाँवमें मौजूद है वह वनस्थ पुरुषके समान ‘मैं कब गाँवमें पहुँचूँगा’—ऐसी आशा नहीं करता। अपनेसे दूर रहनेवाली अनात्मवस्तुके लिये ही ऐसी आशा हो सकती है, अपने आत्माके लिये उसका होना सम्भव नहीं है। अतः वह ‘कदाचित् मैं प्राणात्मभावको प्राप्त न होऊँ’ ऐसी आशंका नहीं करता।
कस्यैतत्? य एवमेतत्साम प्राणं यथोक्तं निर्धारितमहिमानंयह फल किसे प्राप्त होता है? जो इस प्रकार इस सामको अर्थात् ऊपर निश्चित हुई महिमावाले यथोक्त प्राणको

बृ० उ० ११—

१६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

१६२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| वेद—अहमस्मि प्राण इन्द्रियविषयासङ्गैरसुरैः पाप्मभिरधर्षणीयो विशुद्धः, वागादिपञ्चकं च मदाश्रयत्वादग्न्याद्यात्मरूपं स्वाभाविकविज्ञानोत्थेन्द्रियविषयासङ्गजनितासुरपाप्मदोषवियुक्तं सर्वभूतेषु च मदाश्रयान्नाद्योपयोगबन्धनम्, आत्मा चाहं सर्वभूतानामाङ्गिरसत्वात्, ऋग्यजुःसामोद्गीथभूतायाश्च वाच आत्मा तद्व्याप्तेस्तन्निर्वर्तकत्वाच्च, मम साम्नो गीतिभावमापद्यमानस्य बाह्यं धनं भूषणं सौस्वर्यं ततोऽप्यन्तरं सौवर्णं लाक्षणिकं सौस्वर्यम्, गीतिभावमापद्यमानस्य मम कण्ठादिस्थानानि प्रतिष्ठा। एवं-गुणोऽहं पुत्तिकादिशरीरेषु कात्स्न्र्येन परिसमाप्तोऽमूर्तत्वात्सर्वगतत्वाच्च—इति आ एवमभिमानाभिव्यक्तेर्वेदोपास्त इत्यर्थः॥ २८ ॥ | जानता है। 'मैं इन्द्रियोंके विषयोंकी आसक्तिरूप आसुर पापोंसे अधर्षणीय विशुद्ध प्राण हूँ। वागादि पाँच प्राण मेरे आश्रित होनेके कारण स्वाभाविक विज्ञानजनित इन्द्रिय-विषयासक्तिसे होनेवाले आसुर पापरूप दोषसे रहित अग्न्यादि देवतास्वरूप और समस्त भूतोंमें मेरे आश्रयसे अन्नाद्यके उपयोगके हेतु हैं। आङ्गिरस होनेके कारण मैं समस्त भूतोंका आत्मा हूँ। ऋक्, यजुः, साम और उद्गीथरूपा वाणीका, उसमें व्याप्त और उसका निर्वर्तक होनेके कारण मैं आत्मा हूँ। गीतिभावको प्राप्त हुए मुझ सामका सुस्वरता बाह्य धन यानी भूषण है और लाक्षणिक सुस्वरतारूप सुवर्णता उसकी अपेक्षा आन्तर धन है। गीतिभावको प्राप्त हुए मेरी कण्ठादि स्थान प्रतिष्ठा हैं। ऐसे गुणोंवाला मैं अमूर्त्त और सर्वगत होनेके कारण पुत्तिकादि शरीरोंमें पूर्णतया व्याप्त हूँ'—इस प्रकारका अभिमान उत्पन्न होनेतक जो प्राणको जानता अर्थात् उसकी उपासना करता है [ उसे उपर्युक्त फल मिलता है ]॥ २८ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये
तृतीयमुद्गीथब्राह्मणम् ॥ ३ ॥

चतुर्थ ब्राह्मण

चतुर्थ ब्राह्मण

ग्रन्थ-सम्बन्ध

| ज्ञानकर्मभ्यां समुच्चिताभ्यां प्रजापतित्वप्राप्तिर्व्याख्याता केवलप्राणदर्शनेन च 'तद्वैतल्लोकजिदेव' इत्यादिना। प्रजापतेः फलभूतस्य सृष्टिस्थितिसंहारेषु जगतः स्वातन्त्र्यादिविभूत्युपवर्णनेन ज्ञानकर्मणोर्वैदिकयोः फलोत्कर्षो वर्णयितव्य इत्येवमर्थमारभ्यते। तेन च कर्मकाण्डविहितज्ञानकर्मस्तुतिः कृता भवेत्सामर्थ्यात्। <br><br> विवक्षितं त्वेतत्—सर्वमप्येतज्ज्ञानकर्मफलं संसार एव, भयारत्यादियुक्तत्वश्रवणात्, कार्यकारणलक्षणत्वाच्च स्थूलव्यक्तानित्यविषयत्वाच्चेति। ब्रह्मविद्यायाः केवलाया वक्ष्यमाणाया मोक्षहेतु- | [तृतीय ब्राह्मणमें] समुच्चित ज्ञान और कर्मसे तथा 'तद्वैतल्लोकजिदेव' इत्यादि वाक्यद्वारा केवल प्राणविज्ञानसे भी प्रजापतित्वकी प्राप्तिका व्याख्यान किया गया। अब उनके फलभूत प्रजापतिकी, जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहारमें, स्वतन्त्रतारूप विभूतिका वर्णन करके वैदिक ज्ञान और कर्मके फलोत्कर्षका वर्णन करना है, इसीलिये इस ब्राह्मणका आरम्भ किया जाता है। उस (फलोत्कर्षके वर्णन) से ही उसकी सामर्थ्यके कारण, कर्मकाण्डविहित ज्ञान और कर्मकी स्तुति हो जायगी। <br><br> कहना तो यह है कि यह ज्ञान और कर्मका सभी फल संसार ही है, क्योंकि इसका भय और अरति आदिसे युक्त होना सुना गया है, इसके अतिरिक्त यह कार्य-करणरूप है तथा स्थूल, व्यक्त और अनित्य-को विषय करनेवाला है। तथा अब कही जानेवाली केवल ब्रह्मविद्या मोक्षकी हेतु है—इस आगामी |

१६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

१६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| त्वमित्युत्तरार्थं चेति । न हि संसारविषयात्साध्यसाधनादिभेदलक्षणाद् अविरक्तस्य आत्मैकत्वज्ञानविषयेऽधिकारः, अतृषितस्येव पाने । तस्माज्ज्ञानकर्मफलोत्कर्षवर्णनमुत्तरार्थम् । तथा च वक्ष्यति—"तदेतत्पदनीयमस्य" (बृ० उ० १ । ४ । ७) "तदेतत्प्रेयः पुत्रात्" (बृ० उ० १ । ४ । ८) इत्यादि । | विषयका प्रदर्शन करनेके लिये भी यह कथन है। जिस प्रकार तृषाहीनकी जल पीनेमें प्रवृत्ति नहीं होती उसी प्रकार जो साध्यसाधनादि भेदरूप सांसारिक विषयसे विरक्त नहीं है उसका आत्माके एकत्वज्ञानरूप विषयमें अधिकार नहीं है। अतः ज्ञान और कर्मके फलोत्कर्षका वर्णन आगेके विषय (ब्रह्मविद्या) के लिये है। ऐसा ही श्रुति कहेगी भी— "यह इसका प्राप्तव्य है", "यह पुत्रसे अधिक प्रिय है" इत्यादि। |

प्रजापतिके अहंनामा होनेका कारण और उसकी इस प्रकार उपासना करनेका फल

आत्मैवेदमग्र आसीत्पुरुषविधः सोऽनुवीक्ष्य नान्यदात्मनोऽपश्यत्सोऽहमस्मीत्यग्रे व्याहरत्ततोऽहंनामाभवत्तस्मादप्येतर्ह्यामन्त्रितोऽहमयमित्येवाग्र उक्त्वाथान्यन्नाम प्रब्रूते यदस्य भवति स यत्पूर्वोऽस्मात्सर्वस्मात्सर्वान्पाप्मन औषत्तस्मात्पुरुष ओषति ह वै स तं योऽस्मात्पूर्वो बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥

पहले यह पुरुषाकार आत्मा ही था। उसने आलोचना करनेपर अपनेसे भिन्न और कोई न देखा। उसने आरम्भमें 'अहमस्मि'¹ ऐसा कहा, इसलिये वह 'अहम्' नामवाला हुआ। इसीसे अब भी पुकारे जानेपर पहले 'अयमहम्'² ऐसा ही कहकर उसके पश्चात् अपना जो दूसरा नाम


१. मैं हूँ। २. यह मैं हूँ।

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६५

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६५


होता है वह बतलाता है; क्योंकि इस सबसे पूर्ववर्ती उस [ आत्मासंज्ञक प्रजापति ] ने समस्त पापोंको उषित—दग्ध कर दिया था इसलिये यह पुरुष हुआ। जो ऐसी उपासना करता है वह उसे दग्ध कर देता है जो उससे पहले प्रजापति होना चाहता है ॥ १ ॥

आत्मैवात्मेति प्रजापतिः प्रथमोऽण्डजः शरीर्यभिधीयते। वैदिकज्ञानकर्मफलभूतः स एव। किम् ? इदं शरीरभेदजातं तेन प्रजापतिशरीरेणाविभक्तम्। आत्मैवासीदग्रे प्राक्शरीरान्तरोत्पत्तेः। स च पुरुषविधः पुरुषप्रकारः शिरःपाण्यादिलक्षणो विराट्।'आत्मैव'—यहाँ 'आत्मा' इस शब्दसे अण्डेसे उत्पन्न हुआ प्रथम शरीरी प्रजापति ही कहा जाता है। वही वैदिक ज्ञान और कर्मका फलभूत है। ऐसा क्यों है ? क्योंकि यह शरीरादि भेदसमुदाय उस प्रजापतिके शरीरसे अभिन्न है। कारण, शरीरान्तरकी उत्पत्तिसे पूर्व आत्मा ही था। वह पुरुषविध—पुरुषकी तरह शिर एवं हाथ-पैर आदि लक्षणवाला विराट् पुरुष था।
स एव प्रथमः सम्भूतोऽनुवीक्ष्यान्वालोचनं कृत्वा, कोऽहं किंलक्षणो वास्मीति, नान्यद्वस्त्वन्तरम् आत्मनः प्राणपिण्डात्मकार्यकरणरूपान्न अपश्यन्न ददर्श। केवलं त्वात्मानमेव सर्वात्मानमपश्यत्। तथा पूर्वजन्मश्रौतविज्ञानसंस्कृतः, सोऽहं प्रजापतिः सर्वात्माहमस्मीत्यग्रे व्याहरद्व्याहृतवान्। ततस्तस्माद्यतः पूर्वज्ञानसंस्काराद् आत्मानमेवाहमित्यभ्यधादग्रेप्रथम उत्पन्न हुए उस प्रजापतिने अन्वीक्ष्य—अन्वालोचन कर 'मैं कौन हूँ और कैसे लक्षणोंवाला हूँ' इत्यादि रूपसे विचारकर अपने प्राणसमुदायरूप देहेन्द्रियसंघातसे भिन्न कोई और पदार्थ नहीं देखा। केवल अपनेको ही सर्वात्मरूपसे देखा तथा पूर्वजन्मके 'वह मैं सर्वात्मा प्रजापति हूँ' इस श्रौतविज्ञानजनित संस्कारसे युक्त होनेके कारण सबसे पहले “अहमस्मि” ऐसा कहा। इसीसे, क्योंकि पूर्वज्ञानके संस्कारसे उसने आरम्भमें अपनेको 'अहम्' ऐसा