बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| दिवादित्यौ पिता। योऽयमन-<br>योरन्तरा प्राणः, स प्रजेति व्या-<br>ख्यातम्। तत्र वित्तकर्मणी<br>सम्भावयितव्ये इत्यारम्भः— | द्युलोक और आदित्य पिता हैं, इन<br>दोनोंके बीचमें जो यह प्राण है, वह<br>प्रजा है—यह तो ऊपर व्याख्या<br>की जा चुकी है। अब उनमें वित्त<br>और कर्मकी सम्भावना दिखानी है,<br>इसलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ<br>किया जाता है— |
स एष संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलस्तस्य रात्रय एव पञ्चदश कला ध्रुवैवास्य षोडशी कला स रात्रिभिरेवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते सोऽमावास्याँ रात्रिमेतया षोडश्या कलया सर्वमिदं प्राणभृदनुप्रविश्य ततः प्रातर्जायते तस्मादेताँ रात्रिं प्राणभृतः प्राणं न विच्छिन्द्यादपि कृकलासस्यैतस्या एव देवताया अपचित्यै ॥ १४ ॥
वह यह (तीन अन्नरूप) संवत्सर प्रजापति सोलह कलाओंवाला है। उसकी रात्रियाँ ही पंद्रह कला हैं, इसकी सोलहवीं कला ध्रुवा (नित्य) ही है। वह रात्रियोंके द्वारा ही [शुक्लपक्षमें] वृद्धिको प्राप्त होता है तथा [कृष्णपक्षमें] क्षीण होता है। अमावास्याकी रात्रिमें वह इस सोलहवीं कलासे इन सब प्राणियोंमें अनुप्रविष्ट हो फिर [दूसरे दिन] प्रातःकालमें उत्पन्न होता है। अतः इस रात्रिमें किसी प्राणीके प्राणका विच्छेद न करे, यहाँतक कि इसी देवताकी पूजाके लिये [इस रात्रिमें] गिरगिटके भी प्राण न ले ॥ १४ ॥
| 'स एष संवत्सरः'—योऽयं<br>त्र्यन्नात्मा प्रजापतिः प्रकृतः, स एष<br>संवत्सरात्मना विशेषतो निर्दिश्यते। | 'स एष संवत्सरः'—यहाँ जिस<br>अन्नत्रयरूप प्रजापतिका प्रसङ्ग है,<br>उसीका संवत्सररूपसे विशेषतः<br>निर्देश किया जाता है। वह यह |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५९
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५९
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-भाष्यार्थ |
|---|---|
| षोडशकलः षोडश कला अवयवा अस्य सोऽयं षोडशकलः संवत्सरः संवत्सरात्मा कालरूपः। | संवत्सर—संवत्सरात्मा अर्थात् कालरूप प्रजापति षोडशकल है; जिसकी षोडश (सोलह) कलाएँ अर्थात् अवयव हों, उसे षोडशकल कहते हैं। |
| तस्य च कालात्मनः प्रजापतेः रात्रय एवाहोरात्राणि, तिथय इत्यर्थः, पञ्चदश कलाः। ध्रुवैव नित्यैव व्यवस्थिता अस्य प्रजापतेः षोडशी षोडशानां पूरणी कला। स रात्रिभिरेव तिथिभिः कलोक्ताभिरापूर्यते चापक्षीयते च। प्रतिपदाद्याभिर्हि चन्द्रमाः प्रजापतिः शुक्लपक्ष आपूर्यते कलाभिरुपचीयमानाभिर्वर्धते यावत्सम्पूर्णमण्डलः पौर्णमास्याम्। ताभिरेवापचीयमानाभिः कलाभिरपक्षीयते कृष्णपक्षे यावद् ध्रुवैका कला व्यवस्थिता | उस कालस्वरूप प्रजापतिकी रात्रियाँ—अहोरात्र अर्थात् तिथियाँ ही पंद्रह कलाएँ हैं तथा इस प्रजापतिकी सोलहवीं अर्थात् सोलह संख्याकी पूर्ति करनेवाली कला ध्रुवा—नित्य व्यवस्थिता ही है। वह रात्रियों अर्थात् कलारूपसे कही हुई तिथियोंसे ही पूर्ण और अपक्षीण होता है। वह चन्द्रमा प्रजापति शुक्लपक्षमें प्रतिपद् आदि तिथियोंसे बढ़ता है, वह बढ़ती हुई कलाओंसे तबतक बढ़ता रहता है, जबतक कि पूर्णमासीको पूर्णमण्डलाकार न हो जाय; तथा क्षीण होती हुई उन्हीं कलाओंके द्वारा कृष्णपक्षमें तबतक क्रमशः क्षीण होता जाता है, जबतक कि अमावास्यामें एक ध्रुवा कला ही शेष न रह जाय। |
| अमावास्यायाम्।<br>स प्रजापतिः कालात्मा अमावास्याममावास्यायां रात्रिं रात्रौ या व्यवस्थिता ध्रुवा कलोक्ता एतया षोडश्या कलया सर्वमिदं प्राण- | वह कालस्वरूप प्रजापति, 'अमावास्यां रात्रिम्'—अमावास्यामें रातके समय जो एक ऊपर बतलायी हुई ध्रुवा नामकी कला रहती है, उस सोलहवीं कलाके द्वारा इन समस्त प्राणधारियों |
३६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| भूतप्राणिजातमनुप्रविश्य यदपः पिबति यच्चौषधीरश्नाति तत्सर्वमेव ओषध्यात्मना सर्वं व्याप्यामावास्यां रात्रिमवस्थाय ततोऽपरेद्युः प्रातर्जायते द्वितीयया कलया संयुक्तः ।<br><br>एवं पाङ्क्तात्मकोऽसौ प्रजापतिः । दिवादित्यौ मनः पिता; पृथिव्यग्नी वाग्जाया माता; तयोश्च प्राणः प्रजा । चान्द्रमस्यस्तिथयः कला वित्तम्, उपचयापचयधर्मित्वा-द्वित्तवत् । तासां च कलानां काला-वयवानां जगत्परिणामहेतुत्वं कर्म । एवमेष कृत्स्नः प्रजापतिः “जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीय” (बृ० उ० १ । ४ । १७) इत्येषणानुरूप एव पाङ्क्तस्य कर्मणः फलभूतः संवृत्तः । कारणानुविधायि हि कार्यमिति लोकेऽपि स्थितिः ।<br><br>यस्मादेष चन्द्र एतां रात्रिं सर्वप्राणिजातमनुप्रविष्टो ध्रुवया कलया वर्तते, तस्माद्धेतोरेताम- | अर्थात् प्राणिसमुदायमें अनुप्रवेश कर जो जल पीता है और जो ओषधि खाता है, उन सभीमें ओषधिरूपसे व्याप्त हो अमावास्याकी रात्रिमें स्थित रह दूसरे दिन प्रातःकाल द्वितीय कलासे संयुक्त होकर उत्पन्न होता है ।<br><br>इस प्रकार यह प्रजापति पाङ्क्त-रूप है । द्युलोक, आदित्य और मन पिता हैं; पृथिवी, अग्नि और वाक् जाया—माता हैं; उन दोनों माता-पिताओंकी प्रजा प्राण है । चन्द्रमा-की तिथियाँ यानी कलाएँ वित्त हैं, क्योंकि वे वित्तके समान वृद्धि और ह्रासरूप धर्मवाली हैं । तथा उन कालावयवरूप कलाओंका जगत्के परिणाममें हेतु होना कर्म है । इस प्रकार यह सम्पूर्ण प्रजापति “मेरे जाया हो, फिर मैं प्रजारूपसे उत्पन्न होऊँ; मेरे धन हो, फिर मैं कर्म करूँ” इस प्रकारकी एषणाके अनुरूप ही पाङ्क्तकर्मका फलभूत हो जाता है । लोकमें भी ऐसी ही स्थिति है कि कार्य कारणका अनुवर्ती होता है ।<br><br>क्योंकि इस रात्रिमें यह चन्द्रमा अपनी ध्रुवा कलाके सहित समस्त प्राणिसमुदायमें अनुप्रविष्ट होकर विद्यमान रहता है, इसलिये इस |
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३६१
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३६१
| मावास्यां रात्रिं प्राणभृतः प्राणिनः प्राणं न विच्छिन्द्यात्प्राणिनं न प्रमापयेदित्येतत्, अपि कृकलासस्य । कृकलासो हि पापात्मा स्वभावेनैव हिंस्यते प्राणिभिर्दृष्टोऽप्यमङ्गल इति कृत्वा । <br><br> ननु प्रतिषिद्धैव प्राणिहिंसा "अहिंसन् सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः" (छा० उ० ८।१५।१) इति । <br><br> बाढं प्रतिषिद्धा, तथापि नामावास्याया अन्यत्र प्रतिप्रसवार्थं वचनं हिंसायाः कृकलासविषये वा, किं तर्हि ? एतस्याः सोमदेवताया अपचित्यै पूजार्थम् ॥१४॥ | अमावास्याकी रात्रिमें प्राणधारी यानी प्राणीके प्राणका विच्छेद न करे; अर्थात् प्राणीको न मारे। यहाँतक कि गिरगिटके भी प्राण न ले। गिरगिट पापी प्राणी है, इसलिये यह सोचकर कि यह देखनेसे भी अमङ्गलस्वरूप है, प्राणी स्वभावसे ही इसे मार डालते हैं [यहाँ उसकी भी हिंसाका निषेध है]। <br><br> शङ्का—परंतु "अहिंसन् सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः" इस वचनके अनुसार हिंसा तो सामान्यतः प्रतिषिद्ध ही है। [फिर यहाँ उसका अलग प्रतिषेध क्यों किया गया?] <br><br> समाधान—हाँ, प्रतिषिद्ध है, तथापि यहाँ जो श्रुतिका कथन है वह अमावास्यासे भिन्न समयमें सब प्राणियोंकी अथवा केवल गिरगिटकी हिंसाका प्रतिप्रसव (विशेष विधान) करनेके लिये नहीं है; तो फिर किस उद्देश्यसे है? इस सोम देवताकी अपचिति अर्थात् पूजाके लिये ही [यह कथन] है¹ ॥ १४॥ |
¹ यहाँ यह शङ्का होती है—श्रुतिमें सभी प्राणियोंकी हिंसाका निषेध करनेके लिये 'अहिंसन् सर्वभूतानि' यह सामान्य वचन है। इसके रहते हुए जो यहाँ 'अमावास्याकी रातमें गिरगिटतकका प्राण न ले' यह विशेष वचन श्रुतिमें कहा गया, इससे यह ध्वनि निकलती है कि अमावास्याके सिवा अन्य तिथियोंमें सभी
३६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
अन्नोपासक ही षोडशकल संवत्सर प्रजापति है
यो वै स संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलोऽयमेव स योऽयमेवंवित्पुरुषस्तस्य वित्तमेव पञ्चदश कला आत्मैवास्य षोडशी कला स वित्तेनैवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते तदेतन्नभ्यं यदयमात्मा प्रधिर्वित्तं तस्माद्यद्यपि सर्वज्यानिं जीयत आत्मना चेज्जीवति प्रधिनागादित्येवाहुः ॥ १५॥
जो भी यह सोलह कलाओंवाला संवत्सर प्रजापति है, वह यही है जो कि इस प्रकार जाननेवाला पुरुष है। वित्त ही उसकी पंद्रह कलाएँ हैं तथा आत्मा (शरीर) ही उसकी सोलहवीं कला है। वह वित्तसे ही बढ़ता और क्षीण होता है। यह जो आत्मा (पिण्ड) है, वह नभ्य (रथचक्रकी नाभिरूप) है और वित्त प्रधि (रथचक्रका बाहरका घेरा-नेमि) है। इसलिये यदि पुरुष सर्वस्वहरणके कारण ह्रासको प्राप्त हो जाय, किंतु शरीरसे जीवित रहे, तो यही कहते हैं कि केवल प्रधिसे ही क्षीण हुआ है ॥ १५ ॥
| यो वै परोक्षाभिहितः संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलः स नैवात्य- | जो भी सोलह कलाओंवाला संवत्सर प्रजापति परोक्षरूपसे कहा गया है, उसे अत्यन्त परोक्ष ही नहीं |
|---|
प्राणियोंकी अथवा केवल गिरगिटकी हिंसा की जा सकती है। ऐसी दशामें पूर्वोक्त सामान्य वचनसे विरोध होगा। यद्यपि विधिकी अपेक्षा निषेधवचन बलवान् होते हैं, तथापि सामान्य निषेधकी अपेक्षा विशेष विधि ही बलवान् होता है, इसलिये पूर्वोक्त सामान्य निषेधको बाधकर इस विशेष वचनकी प्रवृत्ति होनेसे अमावास्यासे अन्यत्र हिंसाका प्रतिप्रसव (विशेष विधान) सिद्ध हो जायगा। निषेधके बाधक विधिको 'प्रतिप्रसव' कहते हैं। उक्त शङ्काका समाधान करते हुए भाष्यकार कहते हैं—यहाँ यह श्रुतिका विशेष वचन सोमदेवताकी पूजा करनेके लिये है अर्थात् 'अमावास्याकी रातमें सभी प्राणियोंमें सोमदेवता व्याप्त रहते हैं, इसलिये उस दिन किसी भी प्राणीको दुःख न दे' यह कहकर यहाँ सोमदेवताका सम्मान किया गया है, इससे हिंसाका प्रतिप्रसव (विशेष विधान) समझना भूल है।
ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३६३
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३६३ |
|---|
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| न्तं परोक्षो मन्तव्यः, यस्मादयमेव स प्रत्यक्ष उपलभ्यते। कोऽसावयम्? यो यथोक्तं त्र्यन्नात्मकं प्रजापतिमात्मभूतं वेत्ति स एवंवित्पुरुषः। | मानना चाहिये; क्योंकि वह प्रत्यक्ष यही उपलब्ध होता है। वह यह कौन है?—जो उपर्युक्त अन्नत्रयरूप आत्मभूत प्रजापतिको जानता है, वह इस प्रकार जाननेवाला पुरुष। |
| केन सामान्येन प्रजापतिरिति तदुच्यते—तस्यैवंविदः पुरुषस्य गवादि वित्तमेव पञ्चदश कला उपचयापचयधर्मित्वात्; तद्वित्तसाध्यं च कर्म। तस्य कृत्स्नतायै आत्मैव पिण्ड एवास्य विदुषः षोडशी कला ध्रुवस्थानीया। स चन्द्रवद्वित्तेनैवापूर्यते चापक्षीयते च—तदेतल्लोके प्रसिद्धम्। | वह किस समानताके कारण प्रजापति है, सो बतलाया जाता है—उस इस प्रकार जाननेवाले पुरुषकी गौ आदि वित्त ही पंद्रह कलाएँ हैं, क्योंकि वे वित्त वृद्धि-ह्रास धर्मवाले हैं और कर्म भी उस वित्तसे ही साध्य है*। उसकी पूर्णताके लिये इस विद्वान्का आत्मा यानी पिण्ड ही ध्रुवस्थानीया सोलहवीं कला है। वह चन्द्रमाके समान वित्तसे ही बढ़ता और अपक्षीण होता है—यह लोकमें प्रसिद्ध है। |
| तदेतन्नभ्यम्, नाभ्यै हितं नभ्यं नाभिं वा अर्हतीति। किं तत्? यदयं योऽयमात्मा पिण्डः। प्रधिर्वित्तं परिवारस्थानीयं बाह्यं चक्र- | वह यह नभ्य है, 'नाभ्यै हितम्' अथवा 'नाभिम् अर्हति' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो नाभिके लिये हितरूप अथवा नाभिकी योग्यता रखता हो उसे 'नभ्य' अर्थात् चक्रका मध्य भाग कहते हैं। वह कौन? यह जो आत्मा अर्थात् पिण्ड है। वित्त प्रधि यानी बाह्य परिवाररूप है, जैसे |
* अर्थात् जिस प्रकार जगत्का विपरिणाम चन्द्रमाकी कलाओंसे साध्य है उसी प्रकार जगत्का समस्त कार्य वित्तसे साध्य है।
३६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| स्येवारनेम्यादि । तस्माद्यद्यपि सर्वज्यानिं सर्वस्वापहरणं जीयते हीयते ग्लानिं प्राप्नोति, आत्मना चक्रनाभिस्थानीयेन चेद्यदि जीवति प्रधिना बाह्येन परिवारेणायमगात्क्षीणोऽयं यथा चक्रमरनेमिविमुक्तमेवमाहुः। जीवंश्चेद् अरनेमिस्थानीयेन वित्तेन पुनरुपचीयत इत्यभिप्रायः ॥ १५ ॥ | कि पहियेके अरे और नेमि आदि । अतः यद्यपि सर्वज्यानि—सर्वस्वापहरण होनेसे पुरुष हीन हो जाता—ग्लानिको प्राप्त हो जाता है, तथापि यदि वह चक्रकी नाभिस्थानीय अपने देहपिण्डसे जीवित है तो लोग यही कहते हैं कि यह प्रधि यानी बाह्य परिवारसे चला गया अर्थात् क्षीण हो गया, जिस प्रकार कि अरे और नेमिसे रहित चक्र । तात्पर्य यह है कि यदि वह जीवित रहता है तो रथकी नेमिरूप धनसे फिर भी वृद्धि-को प्राप्त हो जाता है ॥ १५ ॥ |
लोकत्रयकी प्राप्तिके साधन तथा देवलोककी उत्कृष्टताका वर्णन
| एवं पाङ्क्तेन दैववित्तविद्यासंयुक्तेन कर्मणाऽन्नात्मकः प्रजापतिर्भवतीति व्याख्यातम् । अनन्तरं च जायादिवित्तं परिवारस्थानीयमित्युक्तम् । तत्र पुत्रकर्मापरविद्यानां लोकप्राप्तिसाधनत्वमात्रं सामान्येनावगतम्, न पुत्रादीनां लोकप्राप्तिफलं प्रति विशेषसम्बन्धनियमः । सोऽयं पुत्रादीनां साधनानां साध्यविशेषसम्बन्धो वक्तव्य इत्युत्तरकण्डिका प्रणीयते— | इस प्रकार दैववित्त और विद्यासंयुक्त पाङ्क्तकर्मके द्वारा प्रजापति अन्नत्रयरूप है—इसकी व्याख्या कर दी गयी । उसके पीछे परिवारस्थानीय स्त्री आदि वित्तका वर्णन किया गया । वहाँ पुत्र, कर्म और अपरविद्याका सामान्यरूपसे लोकप्राप्तिमें साधन होनामात्र विदित होता है; पुत्रादिका लोकप्राप्तिरूप फलके प्रति विशेष सम्बन्ध होनेका नियम नहीं जान पड़ता। वह पुत्रादि साधनोंका साध्यविशेषोंके साथ सम्बन्ध बतलाना है—इसीलिये आगेकी कण्डिका रची जाती है— |
|---|
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६५
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६५
अथ त्रयो वाव लोका मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोक इति सोऽयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव जय्यो नान्येन कर्मणा कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोको देवलोको वै लोकानाꣳ श्रेष्ठस्तस्माद्विद्यां प्रशꣳसन्ति ॥ १६ ॥
अथ मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक—ये ही तीन लोक हैं। वह यह मनुष्यलोक पुत्रके द्वारा ही जीता जा सकता है, किसी अन्य कर्मसे नहीं। तथा पितृलोक कर्मसे और देवलोक विद्यासे जीते जा सकते हैं। लोकोंमें देवलोक ही श्रेष्ठ है; इसलिये विद्याकी प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथेति वाक्योपन्यासार्थः। त्रयः, वावेत्यवधारणार्थः। त्रय एव शास्त्रोक्तसाधनार्हा लोकाः, न न्यूना नाधिका वा। के ते? इत्युच्यते—मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोक इति। | 'अथ' यह शब्द वाक्यारम्भके लिये है। 'त्रयो वाव' इसमें 'वाव' निश्चयार्थक है। शास्त्रोक्त साधनसे प्राप्त होने योग्य तीन ही लोक हैं; न इससे कम हैं, न अधिक। वे कौन-से हैं? सो बतलाये जाते हैं—मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक। |
| तेषां सोऽयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव साधनेन जय्यो जेतव्यः साध्यः—यथा च पुत्रेण जेतव्यस्तथोत्तरत्र वक्ष्यामः,—नान्येन कर्मणा, विद्यया वेति वाक्यशेषः। | उनमें वह यह मनुष्यलोक पुत्ररूप साधनके द्वारा ही जीता जा सकने योग्य, जीतनेके लायक अर्थात् साध्य (प्राप्त करने योग्य) है। वह पुत्रद्वारा किस प्रकार प्राप्तव्य है, सो आगे बतलावेंगे। किसी अन्य कर्म अथवा विद्यासे नहीं। यहाँ 'विद्यया वा' (अथवा विद्यासे) यह वाक्यशेष है। |
| कर्मणा अग्निहोत्रादिलक्षणेन केवलेन पितृलोको जेतव्यो न पुत्रेण नापि विद्यया। विद्यया | अग्निहोत्रादिरूप केवल कर्मसे पितृलोक जीतने योग्य है—पुत्रसे अथवा विद्यासे नहीं। तथा विद्यासे |
३६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| देवलोको न पुत्रेण नापि कर्मणा । | देवलोक प्राप्त होनेयोग्य है—पुत्रसे अथवा कर्मसे नहीं। |
| देवलोको वै लोकानां त्रयाणां श्रेष्ठः प्रशस्यतमः । तस्मात्तत्साधनत्वाद्दिद्यां प्रशंसन्ति ॥ १६ ॥ | तीनों लोकोंमें देवलोक ही श्रेष्ठ यानी सबसे अधिक प्रशंसनीय है। अतः उसका साधन होनेसे विद्याकी प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥ |
सम्प्रत्तिकर्म और उसका परिणाम
| एवं साध्यलोकत्रयफलभेदेन विनियुक्तानि पुत्रकर्मविद्याख्यानि त्रीणि साधनानि । जाया तु पुत्रकर्मार्थत्वान्न पृथक्साधनमिति पृथङ्नाभिहिता । वित्तं च कर्मसाधनत्वान्न पृथक्साधनम् । | इस प्रकार पुत्रकर्म और विद्यासंज्ञक तीन साधनोंका उनके साध्य लोकत्रयरूप फलके भेदसे विनियोग किया गया। स्त्री तो पुत्र और कर्मके लिये ही होनेके कारण कोई पृथक् साधन नहीं है; इसलिये उसका अलग वर्णन नहीं किया गया। वित्त भी कर्मका साधन होनेके कारण अलग साधन नहीं है। |
| विद्याकर्मणोर्लोकजयहेतुत्वं स्वात्मप्रतिलाभेनैव भवतीति प्रसिद्धम् । पुत्रस्य त्वक्रियात्मकत्वात्केन प्रकारेण लोकजयहेतुत्वमिति न ज्ञायते। अतस्तद्वक्तव्यमित्यथानन्तरमारभ्यते— | विद्या और कर्म अपने स्वरूपकी निष्पत्ति होनेसे ही लोकजयके हेतु होते हैं—यह प्रसिद्ध है। किन्तु पुत्र अक्रियात्मक है। वह किस प्रकार लोकजयका हेतु होता है—यह नहीं जाना जाता। अतः वह बतलाना है, इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है— |
अथातः सम्प्रत्तिर्यदा प्रैष्यन्मन्यतेऽथ पुत्रमाह त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोक इति स पुत्रः प्रत्याहाहं ब्रह्माहं
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६७
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६७
यज्ञोऽहं लोक इति यद्वै किञ्चानूक्तं तस्य सर्वस्य ब्रह्मेत्येकता । ये वै के च यज्ञास्तेषाँ सर्वेषां यज्ञ इत्येकता ये वै के च लोकास्तेषाँ सर्वेषां लोक इत्येकतैतावद्वा इदँसर्वमेतन्मा सर्वँ सन्नयमितोऽभुनजदिति तस्मात्पुत्रमनुशिष्टं लोक्यमाहुस्तस्मादेनमनुशासति स यदैवंविदस्माल्लोकात्प्रैत्यथैभिरेव प्राणैः सह पुत्रमाविशति । स यद्यनेन किञ्चिदक्ष्णयाऽकृतं भवति तस्मादेनँ सर्वस्मात्पुत्रो मुञ्चति तस्मात्पुत्रो नाम स पुत्रेणैवास्मिँल्लोके प्रतितिष्ठत्यथैनमेते दैवाः प्राणा अमृता आविशन्ति ॥ १७ ॥
अब सम्प्रत्ति [ कही जाती है— ] जब पिता यह समझता है कि मैं मरनेवाला हूँ तो वह पुत्रसे कहता है—'तू ब्रह्म है, तू यज्ञ है, तू लोक है।' वह पुत्र बदलेमें कहता है—'मैं ब्रह्म हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं लोक हूँ।' जो कुछ भी स्वाध्याय है, उस सबकी 'ब्रह्म' यह एकता है। जो कुछ भी यज्ञ हैं, उनकी 'यज्ञ' यह एकता है। और जो कुछ भी लोक हैं, उनकी 'लोक' यह एकता है। यह इतना ही गृहस्थ पुरुषका सारा कर्त्तव्य है। [ फिर पिता यह मानने लगता है कि ] यह मेरे इस भारको लेकर इस लोकसे जानेपर मेरा पालन करेगा। अतः इस प्रकार अनुशासन किये हुए पुत्रको 'लोक्य' ( लोकप्राप्तिमें हितकर ) कहते हैं। इसीसे पिता उसका अनुशासन करता है। इस प्रकार जाननेवाला वह पिता जब इस लोकसे जाता है तो अपने उन्हीं प्राणोंके सहित पुत्रमें व्याप्त हो जाता है। यदि किसी कोणच्छिद्र ( प्रमाद ) से उस ( पिता ) के द्वारा कोई कर्त्तव्य नहीं किया होता है तो उस सबसे पुत्र उसे मुक्त कर देता है। इसीसे उसका नाम 'पुत्र' है। वह पिता पुत्रके द्वारा ही इस लोकमें प्रतिष्ठित होता है। फिर उसमें ये हिरण्यगर्भसम्बन्धी अमृतप्राण प्रवेश करते हैं ॥ १७ ॥
३६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| सम्प्रत्तिः सम्प्रदानम्; सम्प्रत्तिरिति वक्ष्यमाणस्य कर्मणो नामधेयम्। पुत्रे हि स्वात्मव्यापारसम्प्रदानं करोत्यनेन प्रकारेण पिता, तेन सम्प्रत्तिसंज्ञकमिदं कर्म। तत्कस्मिन्काले कर्तव्यम् ? इत्याह—स पिता यदा यस्मिन् काले प्रैष्यन् मरिष्यन् मरिष्यामीत्यरिष्टादिदर्शनेन मन्यते, अथ तदा पुत्रमाहूयाह—त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोक इति। स एवमुक्तः पुत्रः प्रत्याह; स तु पूर्वमेवानुशिष्टो जानाति मयैतत्कर्तव्यमिति, तेनाह—अहं ब्रह्माहं यज्ञोऽहं लोक इति। एतद्वाक्यत्रयम्। | ‘सम्प्रत्ति’ सम्प्रदानको कहते हैं। ‘सम्प्रत्ति’ यह आगे कहे जानेवाले कर्मका नाम है। पिता पुत्रमें अपने व्यापारका इस प्रकारसे सम्प्रदान करता है, इसलिये यह कर्म ‘सम्प्रत्ति’ नामवाला है। उसे किस समय करना चाहिये ? इसपर श्रुति कहती है—वह पिता जिस समय करनेको होता है अर्थात् अरिष्ट (मरणके पूर्वचिह्न) आदि देखकर यह समझता है कि ‘अब मैं मरूँगा’, उस समय पुत्रको बुलाकर इस प्रकार कहता है—‘तू ब्रह्म है, तू यज्ञ है, तू लोक है।’ इस प्रकार कहे जानेपर वह पुत्र उत्तरमें कहता है। वह शिक्षित होनेके कारण पहलेसे ही जानता है कि मुझे यह करना चाहिये, इसलिये कहता है—‘मैं ब्रह्म हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं लोक हूँ।’ ये तीन पृथक्-पृथक् वाक्य हैं। |
| एतस्यार्थस्तिरोहित इति मन्वाना श्रुतिर्व्याख्यानाय प्रवर्तते—यद्वै किञ्च यत्किञ्चावशिष्टमनूक्तमधीतमनधीतं च, तस्य सर्वस्यैव ब्रह्मेत्येतस्मिन्पदे एकता एकत्वम्, योऽध्ययनव्यापारो मम कर्तव्य आसीदेतावन्तं कालं | इन वाक्योंका अर्थ गूढ है—ऐसा समझकर श्रुति इसकी व्याख्या करनेके लिये प्रवृत्त होती है—जो कुछ भी अवशिष्ट—अनूक्त अर्थात् अध्ययन किया हुआ और अध्ययन नहीं किया हुआ है, उस सभीकी ‘ब्रह्म’ इस पदमें एकता है। तात्पर्य यह है कि जो वेदविषयक स्वाध्याय-कार्य इतने समयतक मेरे लिये कर्तव्य |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६९
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| वेदविषयः, स इत ऊर्ध्वं त्वं ब्रह्म त्वत्कर्तृकोऽस्त्वित्यर्थः । | था, वह आजके बादसे 'त्वं ब्रह्म'—त्वत्कर्तृक हो अर्थात् अब तू उसका करनेवाला हो । |
| तथा ये वै के च यज्ञा अनुष्ठेयाः सन्तो मया अनुष्ठिताश्चाननुष्ठिताश्च, तेषां सर्वेषां यज्ञ इत्येतस्मिन्पदे एकतैकत्वम्, मत्कर्तृका यज्ञा य आसन्, ते इत ऊर्ध्वं त्वं यज्ञः—त्वत्कर्तृका भवन्त्वित्यर्थः । ये वै के च लोका मया जेतव्याः सन्तो जिता अजिताश्च, तेषां सर्वेषां लोक इत्येतस्मिन्पदे एकता । इत ऊर्ध्वं त्वं लोकस्त्वया जेतव्यास्ते । इत ऊर्ध्वं मयाध्ययनयज्ञलोकजयकर्तव्यक्रतुस्त्वयि समर्पितः, अहं तु मुक्तोऽस्मि कर्तव्यताबन्धनविषयात्क्रतोः । स च सर्वं तथैव प्रतिपन्नवान्पुत्रोऽनुशिष्टत्वात् । | तथा मेरेद्वारा अनुष्ठेय (करनेयोग्य) जो कुछ भी अनुष्ठित (कृत) और अननुष्ठित (अकृत) यज्ञ थे, उन सब यज्ञोंकी ['त्वं यज्ञः' (तू यज्ञ है) इस वाक्यके] 'यज्ञः' पदमें एकता है । अर्थात् जो यज्ञ अबतक मेरेद्वारा किये जानेवाले थे वे अब तेरेद्वारा किये जानेवाले हों । तथा जो कोई भी लोक मेरेद्वारा जीते जानेयोग्य होकर जीते गये अथवा नहीं जीते गये उन सब लोकोंकी ['त्वं लोकः' इस वाक्यके] 'लोकः' पदमें एकता है । अबसे आगे 'त्वं लोकः' (तू लोक है) अर्थात् वे लोक तेरेद्वारा जीते जानेयोग्य हों । आजसे आगेके लिये अध्ययन, यज्ञ और लोकजयसम्बन्धी कर्त्तव्यका संकल्प तुझे सौंप दिया, अब मैं इनकी कर्तव्यताके बन्धनविषयक संकल्पसे मुक्त हो गया । शिक्षित होनेके कारण उस पुत्रने भी सब उसी प्रकार समझ लिया । |
| तत्रेमं पितुरभिप्रायं मन्वाना आचष्टे श्रुतिः—एतावदेतत्परिमाणं | यहाँ श्रुतिने यह बात पिताका ऐसा अभिप्राय मानकर कही है कि गृहस्थ पुरुषके लिये जो कर्तव्य है, |
बृ० उ० २४—
३७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| वै इदं सर्वं यद्गृहिणा कर्तव्यम्, यदुत वेदा अध्येतव्याः, यज्ञा यष्टव्याः, लोकाश्च जेतव्याः, । एतन्मा सर्वं सन्नयम्--सर्वं हीमं भारं मदधीनं मत्तोऽपच्छिद्य आत्मनि निधाय, इतोऽस्माल्लोकान्मा माम् अभुनजत्पालयिष्यतीति । लुट्र्थे लङ्, छन्दसि कालनियमाभावात् । | वह इतना ही है कि वेदोंका अध्ययन करना चाहिये, यज्ञोंका यजन करना चाहिये और लोकोंपर जय प्राप्त करनी चाहिये । 'एतन्मा सर्वं सन्नयम्'—इत्यादिका अभिप्राय यों है कि यह ( पुत्र ) स्वयं ये सब कुछ होकर अर्थात् मेरे अधीन रहनेवाले इस सारे भारको मुझसे लेकर अपने ऊपर रखकर इस लोकसे जानेपर 'माम् अभुनजत्'—मेरा पालन करेगा। यहाँ लृट्के अर्थमें लङ् लकारका प्रयोग हुआ है; क्योंकि वेदमें कालका नियम नहीं है। १ |
१. 'अभुनजत्'—यह 'भुज' धातुकी लङ् लकारकी क्रिया है। लङ् लकार अनद्यतन भूतकालमें प्रयुक्त होता है; इसका पर्याय 'अपालयत्' और अर्थ 'पालन किया' ऐसा होना चाहिये। किंतु भाष्यकार उक्त क्रियाका पर्याय 'पालयिष्यति' लिखते हैं; 'पालयिष्यति' सामान्य भविष्य-वाची 'लृट्' लकारकी क्रिया है, इसके अनुसार 'अभुनजत्' का अर्थ 'पालन करेगा'—ऐसा होता है। प्रकरणके अनुसार ऐसा ही अर्थ होना सुसंगत भी है। परंतु भूतकालिक क्रियाका भविष्यकालिक अर्थ हो कैसे सकता है?—यह प्रश्न सामने आता है। इसका ही उत्तर देते हुए भाष्यकार कहते हैं—'यहाँ 'लृट्' के अर्थमें 'लङ्' का प्रयोग समझना चाहिये; क्योंकि वेदमें कालका नियम नहीं होता।
परंतु इसका भाव यह नहीं समझना चाहिये कि 'वास्तवमें वेदमें कालका कोई निश्चित नियम ही नहीं है, सभी जगह विपरीत ही रूप मिलते हैं।' भाष्यकारके उस कथनका यह अभिप्राय जान पड़ता है कि वेदमें भूत, वर्तमान और भविष्यका निश्चित स्वरूप होते हुए भी कहीं-कहीं इसमें व्यत्यय (वैपरीत्य) भी देखा जाता है; इसलिये यहाँ कालका व्यत्यय समझना चाहिये अर्थात् भविष्यकालके ही अर्थमें भूतकालकी क्रियाका यहाँ प्रयोग हुआ है—ऐसा मानना चाहिये। सूत्रकार महर्षि पाणिनिने 'व्यत्ययो बहुलम्' (पा० सू० ३।१।८५) इस सूत्रके द्वारा ऐसे स्थलोंका निर्देश किया है। व्यत्यय केवल कालका
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७१
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७१
| यस्मादेवं सम्पन्नः पुत्रः पितरम् अस्माल्लोकात्कर्तव्यताबन्धनतो मोचयिष्यति, तस्मात्पुत्रमनुशिष्टं लोक्यं लोकहितं पितुराहुर्ब्राह्मणाः । अत एव ह्येनं पुत्रमनुशासति, लोक्योऽयं नः स्यादिति, पितरः । <br><br> स पिता यदा यस्मिन्काले एवंवित्पुत्रसमर्पितकर्तव्यताक्रतुः, अस्माल्लोकात्प्रैति म्रियते, अथ तदैभिरेव प्रकृतैर्वाङ्मनःप्राणैः पुत्रमाविशति पुत्रं व्याप्नोति । अध्यात्मपरिच्छेदहेत्वपगमात् पितुर्वाङ्मनःप्राणाःस्वेन आधिदैविकेन रूपेण पृथिव्यग्न्याद्यात्मना भिन्नघटप्रदीपप्रकाशवत्सर्वमाविशन्ति । | क्योंकि इस प्रकार सम्पन्न (कर्तव्यभारसे युक्त) हुआ पुत्र पिताको इस लोकसे कर्तव्यताके बन्धनसे मुक्त करा देगा, इसलिये ब्राह्मणगण इस प्रकार अनुशिष्ट—सुशिक्षित किये गये पुत्रको लोक्य--पिताके लिये लोकमें हितकर बतलाते हैं। इसीलिये इस आशयसे कि 'यह हमारे लिये लोक्य हो' पितृगण इस पुत्रका अनुशासन करते हैं। <br><br> इस प्रकार जाननेवाले पुत्रको जिसने अपनी कर्तव्यताका संकल्प सौंप दिया है वह पिता जिस समय इस लोकसे जाता है यानी मरता है तब वह इन प्रकृत वाक्, मन और प्राणोंसे ही पुत्रमें आविष्ट अर्थात् व्याप्त हो जाता है। अध्यात्मपरिच्छेदरूप हेतुकी निवृत्ति हो जानेके कारण पिताके वाक्, मन और प्राण अपने पृथिवी एवं अग्नि आदि आधिदैविक रूपसे फूटे हुए घड़ेके अन्तर्वर्ती दीपकके प्रकाशके समान सबमें व्याप्त |
ही नहीं होता, विकरण, सुप्, तिङ्, पद, लिङ्ग और पुरुष आदिका भी होता है, जैसा कि निम्नाङ्कित कारिकासे सिद्ध होता है—'सुप्तिङुपग्रहलिङ्गनराणां कालहलच्स्वरकर्तृयङां च। व्यत्ययमिच्छति शास्त्रकृदेषां सोऽपि च सिद्ध्यति बाहुलकेन ।।' उपर्युक्त 'अभुनजत्' क्रियामें विकरणका भी व्यत्यय हुआ है, अन्यथा 'अभुनक्' रूप ही होना उचित है। यहाँ 'श्नम्' और 'शप्' दो विकरणोंके होनेसे 'अभुनजत्' रूप बना है।
३७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| तैः प्राणैः सह पिताप्याविशति, वाङ्मनःप्राणात्मभावित्वात्पितुः। अहमस्म्यनन्ता वाङ्मनःप्राणा अध्यात्मादिभेदविस्तारा इत्येवंभावितो हि पिता। तस्मात्तत्प्राणानुवृत्तित्वं पितुर्भवतीति युक्तमुक्तम्—एभिरेव प्राणैः सह पुत्रमाविशतीति; सर्वेषां ह्यसावात्मा भवति पुत्रस्य च। | हो जाते हैं। उन प्राणोंके साथ पिता भी सबमें व्याप्त हो जाता है, क्योंकि वह तो वाक्, मन और प्राणका स्वरूपभूत ही है। पिताकी ऐसी भावना रही है कि 'मैं ही अध्यात्मादि भेद-विस्तारवाले अनन्त वाक्, मन और प्राण हूँ।' अतः पिताकी उन प्राणोंमें अनुवृत्ति होती है, इसलिये यह ठीक ही कहा है कि 'इन प्राणोंके साथ ही वह पुत्रमें व्याप्त होता है', क्योंकि वह सभीका और पुत्रका, भी आत्मा हो जाता है। | | एतदुक्तं भवति—यस्य पितुरेवमनुशिष्टः पुत्रो भवति सोऽस्मिन्नेव लोके वर्तते पुत्ररूपेण, नैव मृतो मन्तव्य इत्यर्थः। तथा च श्रुत्यन्तरे—"सोऽस्यायमितर आत्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयते" (ऐ० उ० ४ । ४) इति। | इससे यह प्रतिपादित होता है कि जिस पिताका इस प्रकार अनुशासन किया हुआ पुत्र होता है, वह पुत्ररूपसे इसी लोकमें विद्यमान रहता है, अर्थात् उसे मरा हुआ नहीं मानना चाहिये। ऐसा ही इस अन्य श्रुतिमें भी कहा है—"उसका यह दूसरा आत्मा पुण्य-कर्मोंके लिये प्रतिनिधि बना दिया जाता है" इत्यादि। | | अथेदानीं पुत्रनिर्वचनमाह—<br>स पुत्रो यदि कदाचिदनेन पित्रा अक्ष्णया कोणच्छिद्रतोऽन्तरा अकृतं भवति कर्तव्यम्, तस्मात्, | अब श्रुति पुत्रका निर्वचन (व्युत्पत्ति) बतलाती है—वह पुत्र, यदि कभी उसके इस पिताद्वारा 'अक्ष्णा'—'कोणच्छिद्र' (असावधानी) से बीचमें कोई कर्तव्य बिना किये |
१. ऐतरेय उपनिषद्में इस मन्त्रका पाठ इस प्रकार है—सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयतेऽथास्यायमितर आत्मा...।
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३७३
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३७३
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| कर्तव्यतारूपात्पित्रा अकृतात् सर्वस्माल्लोकप्राप्तिप्रतिबन्धरूपात्पुत्रो मुञ्चति मोचयति तत्सर्वं स्वयमनुतिष्ठन्पूरयित्वा । तस्मात्पूरणेन त्रायते स पितरं यस्मात्तस्मात्पुत्रो नाम । इदं तत्पुत्रस्य पुत्रत्वं यत्पितुश्छिद्रं पूरयित्वा त्रायते। | (अपूर्ण) ही रह जाता है तो वह पिताद्वारा नहीं किये हुए लोकप्राप्ति-के प्रतिबन्धरूप उस समस्त कर्तव्यतारूप [बन्धन] से उस सबका स्वयं अनुष्ठान करते हुए उसकी पूर्ति करके पिताको मुक्त करा देता है। अतः वह पुत्र, चूँकि पूर्तिके द्वारा पिताका त्राण करता है, इसलिये 'पुत्र' कहलाता है। पुत्रका पुत्रत्व यही है कि वह पिताके छिद्रकी पूर्ति करके उसका त्राण करता है। |
| स पितैवंविधेन पुत्रेण मृतोऽपि सन्नमृतोऽस्मिन्नेव लोके प्रतितिष्ठति, एवमसौ पिता पुत्रेणेमं मनुष्यलोकं जयति । न तथा विद्याकर्मभ्यां देवलोकपितृलोकौ स्वरूपलाभसत्तामात्रेण; न हि विद्याकर्मणी स्वरूपलाभव्यतिरेकेण पुत्रवद्व्यापारान्तरापेक्षया लोकजयहेतुत्वं प्रतिपद्येते । अथ कृतसम्प्रत्तिकं पितरमेनमेते वागादयः प्राणा दैवा हैरण्यगर्भा अमृता अमरणधर्माण आविशन्ति ॥ १७ ॥ | इस प्रकारके पुत्रके कारण वह पिता मरकर भी अमृत रहता है; अर्थात् इसी लोकमें विद्यमान रहता है। इस प्रकार पुत्रके द्वारा पिता इस मनुष्यलोकपर जय प्राप्त करता है। विद्या और कर्मके द्वारा जिस प्रकार वह देवलोक और पितृलोकपर उनके स्वरूपलाभकी सत्तामात्रसे विजय प्राप्त करता है, उस प्रकार इसे नहीं करता। विद्या और कर्म [देव और पितृलोकके] स्वरूपलाभके सिवा पुत्रके समान किसी व्यापारान्तरकी अपेक्षासे लोकजयके हेतु नहीं होते। फिर, जिसने सम्प्रत्ति-कर्म किया है ऐसे उस पितामें ये वागादि दैव—हिरण्यगर्भसम्बन्धी अमृत—अमरण-धर्मा प्राण आविष्ट होते हैं ॥ १७ ॥ |
३७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
सम्प्रत्तिकर्मकर्तामें वागादि प्राणोंके आवेशका प्रकार
| पाङ्क्तकर्मणो मोक्षार्थत्वनिरासः<br>कथमिति वक्ष्यति पृथिव्यै चैनमित्यादि । एवं पुत्रकर्मापरविद्यानां मनुष्यलोकपितृलोकदेवलोकसाध्यार्थता प्रदर्शिता श्रुत्या स्वयमेव । अत्र केचिद्भावदूकाः श्रुत्युक्तविशेषार्थानभिज्ञाः सन्तः पुत्रादिसाधनानां मोक्षार्थतां वदन्ति । तेषां मुखापिधानं श्रुत्येदं कृतम्—जाया मे स्यादित्यादि पाङ्क्तं काम्यं कर्मेत्युपक्रमेण, पुत्रादीनां च साध्यविशेषविनियोगोपसंहारेण च । तस्मादृणश्रुतिरविद्वद्विषया न परमात्मविद्विषयेति सिद्धम् । वक्ष्यति च—"किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः" ( ४ । ४ । २२) इति । | किस प्रकार आविष्ट होते हैं, सो 'पृथिव्यै चैनम्' इत्यादि श्रुति बतलावेगी । इस प्रकार श्रुतिने स्वयं ही पुत्र, कर्म और अपरा विद्याको मनुष्यलोक, पितृलोक एवं देवलोककी प्राप्तिके साधनरूपसे दिखलाया । यहाँ कुछ वाचाललोग श्रुतिप्रतिपादित विशेष अर्थको न समझकर पुत्रादि साधनोंकी मोक्षार्थता बतलाते हैं। परंतु श्रुतिने—'मेरे स्त्री हो' इत्यादि पाङ्क्त काम्य कर्म है—इस उपक्रमसे तथा पुत्रादिका [ मनुष्यलोकादि ] साध्यविशेषमें विनियोग करनारूप उपसंहारसे उनका मुख बंद कर दिया है। इसलिये यह सिद्ध हुआ कि ऋणत्रयका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिका अधिकारी अज्ञानी है, परमात्मवेत्ता नहीं। आगे श्रुति कहेगी भी कि "हम, जिनका यह आत्मा ही लोक है, प्रजासे क्या करेंगे ?" इत्यादि। | | समुच्चयवाद-निराकरणम्<br>केचित्तु पितृलोकदेवलोकजयोऽपि पितृलोकदेवलोकाभ्यां व्यावृतिरेव; तस्मात्पुत्रकर्मापरविद्याभिः समुच्चितानुष्ठिताभिस्त्रिभ्य एते- | किन्हीं-किन्हींका मत है कि पितृलोक और देवलोकको जीतना भी पितृलोक और देवलोकसे निवृत्त होना ही है। अतः समुच्चयपूर्वक [अर्थात् एक साथ ] अनुष्ठान किये हुए पुत्र, कर्म और अपराविद्याद्वारा |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ३७५ |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ३७५ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| ख्यो लोकेभ्यो व्यावृत्तः परमात्मविज्ञानेन मोक्षमधिगच्छतीति परम्परया मोक्षार्थान्येव पुत्रादिसाधनानीच्छन्ति। तेषामपि मुखापिधानायेयमेव श्रुतिरुत्तरा कृतसम्प्रत्तिकस्य पुत्रिणः कर्मिणः त्र्यन्नात्मविद्याविदः फलप्रदर्शनाय प्रवृत्ता। | इन तीनों लोकोंसे निवृत्त हुआ पुरुष परमात्मज्ञानके द्वारा मोक्ष प्राप्त कर लेता है; इस प्रकार उनका मत है कि पुत्रादि साधन भी परम्परासे मोक्षके ही लिये हैं। उनका भी मुख बंद करनेके लिये यह आगेकी श्रुति, जिसने सम्प्रत्ति-कर्म किया है, उस पुत्रवान्, कर्मठ एवं त्र्यन्नात्मविद्याके ज्ञाताको मिलनेवाला फल बतलानेके लिये प्रवृत्त होती है। |
| न चेदमेव फलं मोक्षफलमिति- <br><br> शक्यं वक्तुम्, त्र्यन्नसम्बन्धात्, मेधातपःकार्यत्वाच्चान्नानाम्, ‘पुनः पुनर्ज॑नयते’ इति दर्शनात्; ‘यद्वैतन्न कुर्यात्क्षीयेत ह’ इति च क्षयश्रवणात्। शरीरं ज्योतीरूपमिति च कार्यकरणत्वोपपत्तेः। ‘त्रयं वा इदम्’ इति च नामरूपकर्मात्मकत्वेनोपसंहारात्। | और यह कहा नहीं जा सकता कि यह फल ही मोक्षफल है; क्योंकि इसका अन्नत्रयसे सम्बन्ध है और अन्न मेधा एवं तपके कार्य हैं, कारण 'वह इन्हें पुनः-पुनः उत्पन्न करता है' ऐसा श्रुतिका वचन देखा जाता है तथा 'यदि वह इन्हें उत्पन्न न करे तो ये क्षीण हो जायँ' इस प्रकार इनका क्षय भी सुना गया है। एवं शरीर और ज्योतीरूप बतलाकर इनके कार्यत्व और करणत्वकी भी उपपत्ति दिखायी गयी है और 'त्रयं वा इदम्' ऐसा कहकर नाम-रूप-कर्मात्मक रूपसे इनका उपसंहार किया है। |
| न चेदमेव साधनत्रयं संहतं सत्कस्यचिन्मोक्षार्थं कस्यचित् | इस एक ही वाक्यसे ऐसा भी नहीं जाना जा सकता कि ये तीनों साधन मिलकर किसीके मोक्षके लिये |
३७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| त्र्यन्नात्मफलमित्यस्मादेव वाक्यादवगन्तुं शक्यम्, पुत्रादिसाधनानां त्र्यन्नात्मफलदर्शनेनैवोपक्षीणत्वाद् वाक्यस्य। | होते हैं और किसीके लिये त्र्यन्नात्मरूप फलवाले होते हैं, क्योंकि पुत्रादि साधनोंका त्र्यन्नात्मफल दिखाते हुए ही यह वाक्य समाप्त होता है। |
पृथिव्यै चैनमग्नेश्च दैवी वागाविशति सा वै दैवी वाग्यया यद्यदेव वदति तत्तद्भवति ॥ १८ ॥
पृथिवी और अग्निसे इसमें दैवी वाक्का आवेश होता है। दैवी वाक् वही है, जिससे पुरुष जो-जो भी बोलता है, वही-वही हो जाता है ॥ १८ ॥
| पृथिव्यै पृथिव्याः च एनम् अग्नेश्च <br><br> दैवी अधिदैवात्मिका वागेनं कृतसम्प्रत्तिकमाविशति। सर्वेषां हि वाच उपादानभूता दैवी वाक्पृथिव्यग्निलक्षणा, सा ह्याध्यात्मिकासङ्गादिदोषैर्निरुद्धा। विदुषस्तदोषापगमे आवरणभङ्ग इवोदकप्रदीपप्रकाशवच्च व्याप्नोति। तदेतदुच्यते—पृथिव्या अग्नेश्चैनं दैवी वागाविशतीति। <br><br> सा च दैवी वागनृतादिदोषरहिता शुद्धा, यया वाचा दैव्या यद्यदेव आत्मने परस्मै वा वदति | पृथिवी और अग्निसे इस सम्प्रत्तिकर्म करनेवालेमें दैवी—आधिदैविक वाक्का आवेश होता है। पृथिवी और अग्निरूपा दैवी वाक् सभीकी वाणीकी उपादानभूता है, निश्चय ही वह आध्यात्मिक (दैहिक) आसक्ति आदि दोषोंसे आवृत्त है, किंतु आवरण (व्यवधान) के निवृत्त होनेपर जैसे जल और प्रकाश फैल जाते हैं उसी प्रकार विद्वान्के उस (आध्यात्मिक आसक्तिरूप) दोषके निवृत्त हो जानेपर वह उसमें आविष्ट हो जाती है। इसीसे यह कहा है कि उसमें पृथिवी और अग्निसे दैवी वाक्का आवेश होता है। <br><br> वह दैवी वाक् अनृतादि दोषसे रहित और शुद्ध होती है, जिस दैवी वाणीसे वह अपने या दूसरेके लिये जो- |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७७
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७७
| तत्तद् भवति, अमोघा अप्रतिबद्धा अस्य वाग्भवतीत्यर्थः ॥ १८ ॥ | जो कहता है वही-वही हो जाता है। अर्थात् इसकी वाणी अमोघ—प्रतिबन्धरहित हो जाती है ॥ १८ ॥ |
| तथा— | तथा— |
दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति तद्वै दैवं मनो येनानन्द्येव भवत्यथो न शोचति ॥ १६ ॥
द्युलोक और आदित्यसे इसमें दैव मनका आवेश हो जाता है। दैव मन वही है, जिससे यह आनन्दी ही होता है, कभी शोक नहीं करता ॥ १६ ॥
| दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति—तच्च दैवं मनः; स्वभावनिर्मलत्वात्; येन मनसा असौ आनन्द्येव भवति सुख्येव भवति; अथो अपि न शोचति, शोकादिनिमित्तासंयोगात् ॥ १९ ॥ | द्युलोक और आदित्यसे इसमें दैव मन आविष्ट हो जाता है। स्वभावसे ही निर्मल होनेके कारण दैव मन वही है, जिस मनसे यह आनन्दी—सुखी ही होता है और शोकादिके कारणोंका संयोग न होनेसे कभी शोक नहीं करता ॥ १६ ॥ |
| तथा— | तथा— |
अद्भ्यश्चैनं चन्द्रमसश्च दैवः प्राण आविशति स वै देवः प्राणो यः सञ्चरँश्चासञ्चरँश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति। स एवंवित्सर्वेषां भूतानामात्मा भवति, यथैषा देवतैवँ स यथैतां देवताँ सर्वाणि भूतान्यवन्त्येवँ हैवंविदँ सर्वाणि भूतान्यवन्ति। यदु किञ्चेमाः प्रजाः