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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

७३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७३०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| कदेशं भिक्षाचर्यं ग्राहयन्ती तत्स- | भिक्षाचर्याका ग्रहण करानेके कारण उससे सम्बद्ध अन्य एषणाओं- | | म्बद्धमन्यदपि ग्राहयतीति चेत् ? | का भी ग्रहण कराती ही है—यदि ऐसा कहें तो ! | | न, भिक्षाचर्यस्याप्रयोजकत्वाद् | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि हवनके पश्चात् भोजन | | हुत्वोत्तरकालभक्षणवत्। शेषप्रति- | करनेके समान भिक्षाचर्या किसी फलकी प्रयोजिका नहीं है, हवनके | | पत्तिकर्मत्वादप्रयोजकं हि तत्; | पश्चात् भोजन कराना भी शेषप्रतिपत्तिकर्म होनेके कारण किसी | | असंस्कारकत्वाच्च—भक्षणं पुरुष- | फलका प्रयोजक नहीं है; इसके सिवा संस्कार न करनेवाली होनेसे | | संस्कारकमपि स्यात्, न तु | भी भिक्षाचर्या प्रयोजिका नहीं है, हुतशेषका भक्षण तो पुरुषके संस्कार- | | भिक्षाचर्यम्; नियमादृष्टस्यापि | का हेतु भी होता है, किंतु भिक्षाचर्या वैसी भी नहीं है; क्योंकि नियमविधिजनित अदृष्ट भी ब्रह्म- | | ब्रह्मविदोऽनिष्टत्वात् । | वेत्ताको अनिष्ट ही है। | | नियमादृष्टस्यानिष्टत्वे किं | पूर्व०—यदि उसे नियमविधिजनित अदृष्ट इष्ट नहीं है तो भिक्षा- | | भिक्षाचर्येणेति चेत् ! | चर्याका क्या प्रयोजन है?—ऐसा कहें तो ? | | न, अन्यसाधनाद् व्युत्थानस्य | सिद्धान्ती—यह ठीक नहीं, क्योंकि अन्य साधनोंसे तो व्युत्थान करनेका विधान किया गया है। | | विहितत्वात् । तथापि किं तेनेति | इसपर भी यदि तुम कहो कि निष्क्रिय आत्मज्ञानसे सर्वनिवृत्ति तो हो ही जायगी फिर भिक्षा- | | चेत् ? यदि स्यात्, बाढमभ्यु- | चर्यासे क्या प्रयोजन है ? तो ठीक हे, यदि ऐसा हो जाय तो हम भी |

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७३१ |

ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ७३१

| पगम्यते हि तत् । यानि पारिव्राज्येऽभिहितानि वचनानि "यज्ञोपवीत्येवाधीयीत" इत्यादीनि, तान्यविद्वत्पारिव्राज्यमात्रविषयाणीति परिहृतानि; इतरथा आत्मज्ञानबाधः स्यादिति ह्युक्तम्; "निराशिपमनारम्भं निर्ममस्कारमस्तुतिम् । अक्षीणं क्षीणकर्माणं तं देवा ब्राह्मणं विदुः" इति सर्वकर्माभावं दर्शयति स्मृतिर्विदुषः; "विद्वाँल्लिङ्गविवर्जितः" "तस्मादलिङ्गो धर्मज्ञः" इति च । तस्मात् परमहंसपारिव्राज्यमेव व्युत्थानलक्षणं प्रतिपद्येतात्मवित् सर्वकर्मसाधनपरित्यागरूपमिति ।<br><br>यस्मात् पूर्वे ब्राह्मणा एतमात्मानम् असाधनफलस्वभावं विदित्वा | उसे स्वीकार करते हैं।^१ संन्यासाश्रममें जो "यज्ञोपवीती होकर ही अध्ययन करे" इत्यादि वचन कहे गये हैं, वे केवल अविद्वत्संन्यासमात्रसे सम्बन्ध रखनेवाले हैं—ऐसा कहकर उनका परित्याग किया जा चुका है; और यह भी कहा गया है कि यदि ऐसा न मानेंगे [ उन्हें विद्वत्संन्याससम्बन्धी समझेंगे ] तो आत्मज्ञानका बाध हो जायगा ।<br>"जिसे किसी प्रकारकी कामना नहीं है, जो सब प्रकारके आरम्भसे शून्य तथा नमस्कार और स्तुतिसे रहित है, जो स्वयं अक्षीण है, किंतु जिसके कर्मोंका क्षय हो चुका है, उसे देवगण ब्राह्मण ( ब्रह्मवेत्ता ) मानते हैं" यह स्मृति विद्वान्के समस्त कर्मोंका अभाव दिखाती है। तथा "विद्वान् लिङ्गरहित होता है" "अतः वह लिङ्गरहित और धर्मज्ञ होता है" इत्यादि वचन भी यही दिखलाते हैं। अतः आत्मवेत्ताको समस्त कर्म साधनोंके परित्यागरूप व्युत्थानलक्षण परमहंस पारिव्राज्यका ही आश्रय लेना चाहिये।<br><br>क्योंकि पूर्ववर्ती ब्राह्मण ( ब्रह्मज्ञ ) लोग इस असाधनफलस्वभाव आत्माको |


१. तथापि क्षुधादिकी निवृत्तिके लिये भिक्षाटनादिकी कर्तव्यता प्राप्त होनेके कारण उसकी विधि सार्थक ही है।

७३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७३२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| सर्वस्मात्साधनफलस्वरूपादेषणा- | जानकर एषणालक्षण साधन और | | लक्षणाद् व्युत्थाय भिक्षाचर्यं | फलस्वरूप समस्त विषयोंसे ऊपर | | चरन्ति स्म, दृष्टादृष्टार्थं कर्म | उठकर अर्थात् दृष्ट और अदृष्ट फल- | | तत्साधनं च हित्वा, तस्माद् | वाले सम्पूर्ण कर्म और उसके | | अद्यत्वेऽपि ब्राह्मणो ब्रह्मवित् | साधनको छोड़कर भिक्षाचर्या | | पाण्डित्यं पण्डितभावम्, एतदा- | करते थे, इसलिये इस समय भी | | त्मविज्ञानं पाण्डित्यम्, निर्विद्य | ब्राह्मण यानी ब्रह्मवेत्ता पाण्डित्य— | | निःशेषं विदित्वा आत्मविज्ञानं | पण्डितभावको—यह आत्मज्ञान ही | | निरवशेषं कृत्वेत्यर्थः— | पाण्डित्य है, इसे निर्विद्य—निःशेष- | | आचार्यत आगमतश्च, एषणाभ्यो | तया जानकर अर्थात् आचार्य और | | व्युत्थाय—एषणाव्युत्थानाव- | शास्त्रसे पूर्णतया आत्मज्ञान सम्पा- | | सानमेव हि तत् पाण्डित्यम् | दन करके एषणाओंसे व्युत्थान कर, | | एषणातिरस्कारोद्भवत्वादेषणावि- | क्योंकि उस पाण्डित्यका पर्यवसान | | रुद्धत्वात्; एषणामतिरस्कृत्य न | एषणाओंसे व्युत्थान करनेमें ही है, | | ह्यात्मविषयस्य पाण्डित्यस्योद्भव | कारण, वह एषणाओंके तिरस्कारसे | | इत्यात्मज्ञानेनैव विहितमेषणा- | ही उत्पन्न होता है और एषणाओं- | | व्युत्थानम् आत्मज्ञानसमान- | से विरुद्ध भी है, एषणाओंका | | कर्तृकत्वाप्रत्ययोपादानलिङ्ग- | तिरस्कार किये बिना तो आत्म- | | श्रुत्या दृढीकृतम्। तस्मादेष- | विषयक पाण्डित्यका उदय ही नहीं | | णाभ्यो व्युत्थाय ज्ञानबलभावेन | हो सकता; अतः आत्मज्ञानद्वारा | | बाल्येन तिष्ठासेत् स्थातुमिच्छेत्। | ही एषणाओंसे व्युत्थान सम्पादित | | | होता है; आत्मज्ञान और व्युत्थान- | | | का एक ही कर्ता है—यह सूचित | | | करनेके लिये 'व्युत्थाय' इस पदमें | | | 'क्त्वा' प्रत्ययका प्रयोग किया गया | | | है, इसलिये इस लिङ्गभूता श्रुतिने | | | उक्त अभिप्रायको और भी पुष्ट कर | | | दिया है। अतः एषणाओंसे उत्थान | | | कर बाल्यसे—ज्ञानबलभावसे | | | 'तिष्ठासेत्'—स्थित रहनेकी इच्छा | | | करे। |

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३३

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३३


| साधनफलाश्रयणं हि बलमितरेषामनात्मविदाम्; तद् बलं हित्वा विद्वान् असाधनफलस्वरूपात्मविज्ञानमेव बलं तद्भावमेव केवलमाश्रयेत्, तदाश्रयणे हि करणान्येषणाविषये एनं हृत्वा स्थापयितुं नोत्सहन्ते; ज्ञानबलहीनं हि मूढं दृष्टादृष्टविषयायाम् एषणायामेवैनं करणानि नियोजयन्ति; बलं नाम आत्मविद्ययाशेषविषयदृष्टितिरस्करणम्; अतस्तद्भावेन बाल्येन तिष्ठासेत्; तथा "आत्मना विन्दते वीर्यम्" ( केन० २।४ ) इति श्रुत्यन्तरात् । "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः" (मु० उ० ३ । २ । ४ ) इति च । | अन्य जो अनात्मज्ञ हैं, उनका बल तो साधन और फलोंका आश्रय लेना ही है; उस बलको त्यागकर विद्वान्‌को जो असाधन-फलस्वरूप आत्मविज्ञान ही बल है, केवल उस बलभावका ही आश्रय लेना चाहिये । उसका आश्रय लेनेसे ( विषयलोलुप ) इन्द्रियाँ इसे आकृष्ट करके एषणाओंके विषयमें स्थापित करनेका साहस नहीं कर सकतीं । जो ज्ञानबलसे रहित है, उस मूढको ही इन्द्रियाँ दृष्ट और अदृष्ट विषयोंकी एषणामें नियुक्त कर देती हैं; आत्मज्ञानके द्वारा समस्त विषयदृष्टिका तिरस्कार कर देना ही बल है; अतः उस बलभावसे—बाल्यसे स्थित रहनेको इच्छा करे; ऐसा ही "आत्मज्ञानके द्वारा वीर्य (विषयदृष्टिके तिरस्कारका सामर्थ्य ) प्राप्त होता है" इस अन्य श्रुतिसे विदित होता है, तथा "यह आत्मा बलहीनको नहीं मिल सकता" यह श्रुति भी यहो कहती है । | | बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्य निःशेषं कृत्वाथ मननान्मुनिर्योगी भवति; एतावद्धि ब्राह्मणेन कर्तव्यम्, यदुत सर्वानात्मप्रत्यय- | इस प्रकार बाल्य और पाण्डित्यको निर्विद्य, निःशेष जान करके फिर मुनि—मनन करनेके कारण मुनि—योगी होता है। समस्त अनात्मप्रत्ययोंका तिरस्कार करना—यही ब्राह्मण |

७३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७३४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| तिरस्करणम्; एतत् कृत्वा कृतकृत्यो योगी भवति ।<br><br>अमौनं च आत्मज्ञानानात्मप्रत्ययतिरस्कारौ पाण्डित्यबाल्यसंज्ञकौ निःशेषं कृत्वा, मौनं नाम अनात्मप्रत्ययतिरस्करणस्य पर्यवसानं फलम्, तच्च निर्विद्याथ ब्राह्मणः कृतकृत्यो भवति—ब्रह्मैव सर्वमिति प्रत्यय उपजायते । स ब्राह्मणः कृतकृत्यः, अतो ब्राह्मणः; निरुपचरितं हि तदा तस्य ब्राह्मण्यं प्राप्तम्; अत आह—स ब्राह्मणः केन स्यात् केन चरणेन भवेत् ? येन स्याद् येन चरणेन भवेत्, तेनेदृश एवायम्—येन केनचिच्चरणेन स्यात् तेनेदृश एव उक्तलक्षण एव ब्राह्मणो भवति; येन केनचिच्चरणेनेति स्तुत्यर्थम्—येयं ब्राह्मण्यावस्था सेयं स्तूयते, न तु चरणेऽनादरः । | (ब्रह्मवेत्ता) का कर्तव्य है; ऐसा करके वह कृतकृत्य योगी हो जाता है ।<br><br>आत्मज्ञान और अनात्मप्रत्ययका तिरस्कार जिनकी पाण्डित्य और बाल्यसंज्ञा है—ये अमौन हैं, इन्हें निःशेष करके तथा अनात्मप्रत्यय तिरस्कारका पर्यवसान—फल मौन है, उसे भी निःशेष जान करके ब्राह्मण कृतकृत्य हो जाता है । उसे 'सब ब्रह्म ही है' ऐसा प्रत्यय उत्पन्न हो जाता है । वह ब्राह्मण कृतकृत्य है, इसलिये ब्राह्मण है; उस समय उसे उपचारशून्य ब्राह्मणत्व प्राप्त हो जाता है; इसीसे श्रुति कहती है—वह किससे अर्थात् किसी आचरणसे ब्राह्मण हो सकता है ? [ उत्तर— ] जिससे अर्थात् जिस आचरणसे भी हो वह ऐसा ही होगा—तात्पर्य यह है कि जिस किसी भी आचरणसे हो उससे ऐसा यानी ऐसे लक्षणोंवाला ही ब्राह्मण होता है; 'जिस किसी भी आचरणसे' यह कथन स्तुतिके लिये है; अर्थात् ऐसा कहकर यह जो ब्राह्मण्यावस्था है, उसकी स्तुति की जाती है, इससे आचरणमें अनादर प्रदर्शित नहीं होता । |

ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३५

ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३५


| अत एतस्माद् ब्राह्मणभावस्थानाद् अशनायाद्यतीतात्मस्वरूपाद् नित्यतृप्ताद् अन्यद् अविद्याविषयम् एषणालक्षणं वस्त्वन्तरम्, आर्तं विनाशि आर्तिपरिगृहीतम्, स्वप्नमायामरीच्युदकसमम् असारम्, आत्मैवै कः केवलो नित्यमुक्त इति। ततो ह कहोलः कौषीतकेयः उपरराम ॥ १ ॥ | अतः इस क्षुधादिरहित आत्मस्वरूप नित्यतृप्त ब्राह्मण्यपदमें स्थिति होनेसे भिन्न जो अविद्याकी विषयभूत एषणारूप अन्य वस्तुएं हैं, वे आर्त-विनाशी आर्तिसे व्याप्त अर्थात् स्वप्न, माया और मरुमरीचिकाके जलके समान असार हैं; केवल एक आत्मा ही नित्यमुक्त है। तब कौषीतकेय कहोल उपरत हो गया ॥ १ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये
पञ्चमं कहोलब्राह्मणम् ॥ ५ ॥


षष्ठ ब्राह्मण

याज्ञवल्क्य-गार्गी-संवाद

| यत् साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म सर्वान्तर आत्मेत्युक्तम्, तस्य सर्वान्तरस्य स्वरूपाधिगमाय आ शाकल्यब्राह्मणाद् ग्रन्थ आरभ्यते । पृथिव्यादीनि ह्याकाशान्तानि भूतानि अन्तर्बहिर्भावेन व्यवस्थितानि; तेषां यद् बाह्यं बाह्यम् अधिगम्याधिगम्य निराकुर्वन् द्रष्टुः साक्षात् सर्वान्तरोऽगौण आत्मा | जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म-सर्वान्तर आत्मा है—ऐसा कहा गया है, उस सर्वान्तरके स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये शाकल्यब्राह्मणपर्यन्त आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। पृथिवीसे लेकर आकाशपर्यन्त सम्पूर्ण भूत अन्तर्बहिर्भावसे स्थित हैं । उनमेंसे जो बाह्य-बाह्य भूत है, उसे जान-जानकर निराकरण करते हुए, जो सम्पूर्ण सांसारिक धर्मोंसे रहित साक्षात् सर्वान्तर मुख्य आत्मा है, |

७३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७३६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

सर्वसंसारधर्मविनिर्मुक्तो दर्शयि- <br> तव्य इत्यारम्भः—उसका दर्शन द्रष्टा (मुमुक्षु) को कराना है; इसलिये यह आरम्भ किया जाता है—

जलसे लेकर ब्रह्मलोकपर्यन्त उत्तरोत्तर अधिष्ठानतत्त्वोंका निरूपण

अथ हैनँ गार्गी वाचक्नवी पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदँ॒ सर्वमप्स्वोतं च प्रोतं च कस्मिन्नु खल्वाप ओताश्च प्रोताश्चेति वायौ गार्गीति कस्मिन्नु खलु वायुरोतश्च प्रोतश्चेत्यन्तरिक्षलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्वन्तरिक्षलोका ओताश्च प्रोताश्चेति गन्धर्व- लोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु गन्धर्वलोका ओताश्च प्रोताश्चेत्यादित्यलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्वा- दित्यलोका ओताश्च प्रोताश्चेति चन्द्रलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु चन्द्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति नक्षत्र- लोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु नक्षत्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति देवलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु देव- लोका ओताश्च प्रोताश्चेतीन्द्रलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्विन्द्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति प्रजापतिलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु प्रजापतिलोका ओताश्च प्रोता- श्चेति ब्रह्मलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु ब्रह्मलोका ओताश्च प्रोताश्चेति स होवाच गार्गि मातिप्राक्षीर्मा ते मूर्धा व्यपप्तदनतिप्रश्न्यां वै देवतामतिपृच्छसि गार्गि मातिप्राक्षीरिति ततो ह गार्गी वाचक्नव्युपरराम ॥१॥

फिर इस याज्ञवल्क्यसे वाचक्नुकी पुत्री गार्गीने पूछा; वह बोली, ‘हे याज्ञवल्क्य ! यह जो कुछ है, सब जलमें ओतप्रोत है, किंतु वह जल

ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३७

ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३७

किसमें ओतप्रोत है?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! वायुमें।' [गार्गी-] 'वायु किसमें ओतप्रोत है?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! अन्तरिक्षलोकोंमें।' [गार्गी-] 'अन्तरिक्षलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! गन्धर्वलोकोंमें।' [गार्गी-] 'गन्धर्वलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! आदित्यलोकोंमें।' [गार्गी-] आदित्यलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! चन्द्रलोकोंमें।' [गार्गी-] 'चन्द्रलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! नक्षत्रलोकोंमें।' [गार्गी-] 'नक्षत्रलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! देवलोकोंमें।' [गार्गी-] 'देवलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! इन्द्रलोकोंमें।' [गार्गी-] 'इन्द्रलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! प्रजापतिलोकोंमें।' [गार्गी-] 'प्रजापतिलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! ब्रह्मलोकोंमें।' [गार्गी-] 'ब्रह्मलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' इसपर याज्ञवल्क्यने कहा- 'हे गार्गि ! अतिप्रश्न मत कर। तेरा मस्तक न गिर जाय ! तू, जिसके विषयमें अतिप्रश्न नहीं करना चाहिये, उस देवताके विषयमें अतिप्रश्न कर रही है। हे गार्गि ! तू अतिप्रश्न न कर।' तब वचक्नुकी पुत्री गार्गी उपरत हो गयी ॥ १ ॥

अथ हैनँ गार्गी नामतः,फिर उस याज्ञवल्क्यसे वाचकनवी
वाचकनवी वचक्नोर्दुहिता, पप्रच्छ;वचक्नुकी पुत्रीने, जो नामसे गार्गी थी, पूछा। उसने 'हे याज्ञवल्क्य !'
याज्ञवल्क्येति होवाच; यदिदंइस प्रकार सम्बोधित करके कहा— यह जो कुछ पार्थिव धातुसमुदाय है
सर्वं पार्थिवं धातुजातम् अप्सूदकेवह अप्—जलोंमें ओतप्रोत है; ओत—वस्त्रकी लंबाईके तन्तुके
ओतं च प्रोतं च, ओतं दीर्घपट-समान और प्रोत—वस्त्रकी चौड़ाईके तन्तुके समान अथवा इससे उलटा
तन्तुवत् प्रोतं तिर्यक्तन्तुवद् विप-समझो। तात्पर्य यह है कि यह अपने

बृ० उ० ४७—

७३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ ]

७३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ ]


संस्कृतहिन्दी
गीतं वा—अद्भिः सर्वतोऽन्तर्बहिर्भूताभिव्याप्तमित्यर्थः; अन्यथा सक्तुमुष्टिवद् विशीर्येत।बाहर-भीतर सब ओर विद्यमान हुए जलसे ही व्याप्त है, नहीं तो यह सत्तूकी मुट्ठीके समान छिन्न-भिन्न हो जाता।
इदं तावदनुमानमुपन्यस्तम्— यत् कार्यं परिच्छिन्नं स्थूलम्, कारणेनापरिच्छिन्नेन सूक्ष्मेण व्याप्तमिति दृष्टम्—यथा पृथिवी अद्भिः; तथा पूर्वं पूर्वमुत्तरेणोत्तरेण व्यापिना भवितव्यम्, इत्येष आ सर्वान्तरादात्मनः प्रश्नार्थः।यह तो अनुमानका उपन्यास किया गया, इससे यह देखा गया कि जो कार्य, परिच्छिन्न और स्थूल तत्त्व है, वह कारण, अपरिच्छिन्न और सूक्ष्म तत्त्वसे व्याप्त रहता है—जिस प्रकार पृथिवी जलसे व्याप्त है; उसी प्रकार पूर्व-पूर्व जलादि अपने उत्तरोत्तरवर्ती कारण वायु आदिसे व्याप्त हैं; सर्वान्तर आत्मापर्यन्त इस प्रश्नका यही तात्पर्य है।
तत्र भूतानि पञ्च संहतान्येवोत्तरमुत्तरं सूक्ष्मभावेन व्यापकेन कारणरूपेण च व्यवतिष्ठन्ते; न च परमात्मनोऽर्वाक् तद्व्यतिरेकेण वस्त्वन्तरमस्ति "सत्यस्य सत्यम्" (बृ० उ० २।१।२०) इति श्रुतेः। सत्यं च भूतपञ्चकम्, सत्यस्य सत्यं च पर आत्मा।तहाँ, भूत पाँच हैं, जो परस्पर मिलकर ही उत्तरोत्तर व्यापक सूक्ष्मभावसे और कारणरूपसे विद्यमान हैं। परमात्मासे नीचे उससे भिन्न और कोई वस्तु नहीं है जैसा कि "वह सत्य-का-सत्य है" इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है। पाँचों भूत तो सत्य हैं और परमात्मा सत्य-का-सत्य है।
कस्मिन्नु खल्वाप ओताश्च प्रोताश्चेति—तासामपि कार्यत्वात् स्थूलत्वात् परिच्छिन्नत्वाच्च क्वचिद्धि ओतप्रोतभावेन भवितव्यम्;[ अतः प्रश्न होता है कि ] जल किसमें ओत-प्रोत हैं? कार्य स्थूल और परिच्छिन्न होनेके कारण उन्हें भी किसीमें ओतप्रोतभावसे रहना चाहिये;

ब्राह्मण ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७३९

ब्राह्मण ६ ]शाङ्करभाष्यार्थ७३९
शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
क्क तासामोतप्रोतभाव इति । एवमुत्तरोत्तरप्रश्नप्रसङ्गो योजयितव्यः । वायौ गार्गीति ।तो उनका ओतप्रोतभाव कहाँ है ? इसी प्रकार आगे-आगेके प्रश्नोंके प्रसङ्गकी योजना करनी चाहिये । [ याज्ञवल्क्य— ] 'हे गार्गि ! वायुमें ।'
नन्वग्नाविति वक्तव्यम् !**शङ्का—**किंतु यहाँ तो याज्ञवल्क्यको 'अग्निमें' ऐसा कहना चाहिये था !
नैष दोषः; अग्नेः पार्थिवं वा आप्यं वा धातुमनाश्रित्य इतरभूतवत् स्वातन्त्र्येण आत्मलाभो नास्तीति तस्मिन्नोतप्रोतभावो नोपदिश्यते ।**समाधान—**ऐसा कहनेमें दोष नहीं है, क्योंकि अन्य भूतोंके समान अग्निके स्वरूपकी सिद्धि किसी पार्थिव या जलीय धातुका आश्रय लिये बिना नहीं होती, इसलिये उसमें ओतप्रोतभावका उपदेश नहीं किया जाता ।
कस्मिन्नु खलु वायुरोतश्च प्रोतश्चेत्यन्तरिक्षलोकेषु गार्गीति तान्येव भूतानि संहतान्यन्तरिक्षलोकाः; तान्यपि गन्धर्वलोकेषु, गन्धर्वलोका आदित्यलोकेषु, आदित्यलोकाश्चन्द्रलोकेषु, चन्द्रलोका नक्षत्रलोकेषु, नक्षत्रलोका देवलोकेषु, देवलोका इन्द्रलोकेषु, इन्द्रलोका विराट्शरीरारम्भकेषु भूतेषु प्रजापतिलोकेषु, प्रजापतिलोका ब्रह्मलोकेषु । ब्रह्मलोका नाम अण्डारम्भकाणि भूतानि; सर्वत्र हि सूक्ष्मतारतम्यक्रमेण( गार्गी— ) 'वायु किसमें ओत-प्रोत है ?' ( याज्ञवल्क्य— ) 'हे गार्गि ! अन्तरिक्षलोकोंमें ।' परस्पर संहत हुए ये भूत ही अन्तरिक्षलोक हैं। वे भी गन्धर्वलोकोंमें, गन्धर्वलोक आदित्यलोकोंमें, आदित्यलोक चन्द्रलोकोंमें, चन्द्रलोक नक्षत्रलोकोंमें, नक्षत्रलोक देवलोकोंमें, देवलोक इन्द्रलोकोंमें, इन्द्रलोक विराट् शरीरके आरम्भक भूतरूप प्रजापतिलोकोंमें और प्रजापतिलोक ब्रह्मलोकोंमें ओतप्रोत हैं। ब्रह्मलोक ब्रह्माण्डके आरम्भक भूतोंको कहते हैं; इन सभी लोकोंमें सूक्ष्मताके तारतम्यक्रमसे प्राणियोंके

७४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७४०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
प्राण्युपभोगाश्रयाकारपरिणतानि भूतानि संहतानि तान्येव पञ्चेति बहुवचनभाञ्जि।उपभोगके आश्रय (शरीर) के आकारमें परिणत हुए परस्परसंहत वे ही पाँच भूत हैं, इसलिये वे बहुवचनके भागी हैं।
कस्मिन्नु खलु ब्रह्मलोका ओताश्च प्रोताश्चेति—स होवाच याज्ञवल्क्यो हे गार्गि मातिप्राक्षीः स्वं प्रश्नम्, न्यायप्रकारमतीत्य आगमेन प्रष्टव्यां देवतामनुमानेन मा प्राक्षीरित्यर्थः; पृच्छन्त्याश्च मा ते तव मूर्धा शिरो व्यपप्तद् विस्पष्टं पतेत्; देवतायाः स्वप्रश्न आगमविषयः; तं प्रश्नविषयमतिक्रान्तो गार्ग्याः प्रश्नः; आनुमानिकत्वात् स यस्या देवतायाः प्रश्नः सातिप्रश्न्या, नातिप्रश्न्यानातिप्रश्न्या, स्वप्रश्नविषयैव, केवलागमगम्येत्यर्थः; तामनतिप्रश्न्यां वै देवतामतिपृच्छसि। अतो गार्गि मातिप्राक्षीः,[गार्गी—] 'अच्छा तो, वे ब्रह्मलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' इसपर उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे गार्गि! तू अपने प्रश्नको अतिप्रश्न न कर, अर्थात् न्यायोचित प्रकारको छोड़कर आचार्यपरम्पराद्वारा पूछनेयोग्य शास्त्रगम्य देवताको अनुमानसे मत पूछ। इस प्रकार पूछनेसे तेरा मूर्द्धा—मस्तक व्यपतित—विस्पष्टतया पतित न हो जाय!' यह देवताका स्वप्रश्न शास्त्रका विषय है; गार्गीका प्रश्न आनुमानिक होनेके कारण उस प्रश्नविषयका अतिक्रमण कर गया है; यह प्रश्न जिस देवताके विषयमें है, वह अतिप्रश्न्या हो रही है; किंतु वह नातिप्रश्न्या—अतिप्रश्न करनेके अयोग्य अर्थात् अपने प्रश्नकी ही विषय है; तात्पर्य यह है कि 'वह केवल आचार्योपदेशसे शास्त्रद्वारा ही जानी जा सकती है, उस अनतिप्रश्न्या देवताके विषयमें तू अतिप्रश्न करती है। अतः हे गार्गि! यदि तुझे मरनेकी इच्छा न हो तो

ब्राह्मण ७] शाङ्करभाष्यार्थ ७४१

ब्राह्मण ७] शाङ्करभाष्यार्थ ७४१


मर्तुं चेन्नेच्छसि। ततो ह गार्गी वाचक्नवी उपरराम ॥ १ ॥अतिप्रश्न न कर।' तब वचक्नुकी पुत्री गार्गी उपरत हो गयी ॥ १ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये षष्ठं गार्गीब्राह्मणम् ॥ ६ ॥


सप्तम ब्राह्मण

याज्ञवल्क्य-आरुणि-संवाद

इदानीं ब्रह्मलोकानामन्तरतमं सूत्रं वक्तव्यमिति तदर्थ आरम्भः; तच्च आगमेनैव प्रष्टव्यमितीतिहासने आगमोपन्यासः क्रियते—अब ब्रह्मलोकोंका जो अन्तरतम सूत्र है, उसे बतलाना है, इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। उसे आगम (आचार्योपदेश) के द्वारा ही विचारना चाहिये, इसलिये इतिहासके द्वारा आगमका उपन्यास किया जाता है—

सूत्र और अन्तर्यामीके विषयमें प्रश्न

अथ हैनमुद्दालक आरुणिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच मद्रेष्ववसाम, पतञ्चलस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयानास्तस्यासीद् भार्या गन्धर्वगृहीता तमपृच्छाम कोऽसीति सोऽब्रवीत् कबन्ध आथर्वण इति सोऽब्रवीत् पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकाँश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तत् सूत्रं येनायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्तीति सोऽब्रवीत् पतञ्चलः काप्यो नाहं तद् भगवन् वेदेति

७४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७४२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

सोऽब्रवीत् पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकाꣳश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तमन्तर्यामिणं य इमं च लोकं परं च लोकꣳ सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयतीति सोऽब्रवीत् पतञ्चलः काप्यो नाहं तं भगवन् वेदेति सोऽब्रवीत् पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकाꣳश्च यो वै तत् काप्य सूत्रं विद्यात्तं चान्तर्यामिणमिति स ब्रह्मवित् स लोकवित् स देववित् स वेदवित् स भूतवित् स आत्मवित् स सर्वविदिति तेभ्योऽब्रवीत्तदहं वेद तच्चेत्त्वं याज्ञवल्क्य सूत्रमविद्वाꣳस्तं चान्तर्यामिणं ब्रह्मगवीरुदजसे मूर्धा ते विपतिष्यतीति वेद वा अहं गौतम तत् सूत्रं तं चान्तर्यामिणमिति यो वा इदं कश्चिद् ब्रूयाद् वेद वेदेति यथा वेत्थ तथा ब्रूहीति ॥ १ ॥

फिर इस याज्ञवल्क्यसे आरुणि उद्दालकने पूछा; वह बोला, 'हे याज्ञवल्क्य ! हम मद्रदेशमें यज्ञशास्त्रका अध्ययन करते हुए कपिगोत्रोत्पन्न पतञ्चलके घर रहते थे। उसकी भार्या गन्धर्वद्वारा गृहीत थी। हमने उस (गन्धर्व) से पूछा, 'तू कौन है ?' उसने कहा, 'मैं आथर्वण कबन्ध हूँ।' उसने कपिगोत्रीय पतञ्चल और उसके याज्ञिकोंसे पूछा, 'काप्य ! क्या तुम उस सूत्रको जानते हो जिसके द्वारा यह लोक, परलोक और सारे भूत ग्रथित हैं ?' तब उस काप्य पतञ्चलने कहा, 'भगवन् ! मैं उसे नहीं जानता।' उसने पतञ्चल काप्य और याज्ञिकोंसे कहा, 'काप्य ! क्या तुम उस अन्तर्यामीको जानते हो जो इस लोक, परलोक और समस्त भूतोंको भीतरसे नियमित करता हे ?' उस पतञ्चल काप्यने कहा, 'भगवन् ! मैं उसे नहीं जानता।' उसने पतञ्चल काप्य और याज्ञिकोंसे कहा; 'काप्य ! जो कोई उस सूत्र और उस अन्तर्यामीको जानता है, वह ब्रह्मवेत्ता है, वह लोकवेत्ता है, वह देववेत्ता है, वह वेदवेत्ता है, वह भूतवेत्ता है, वह आत्मवेत्ता है और वह सर्ववेत्ता है।'

ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७४३

ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७४३


तथा इसके पश्चात् गन्धर्वने उन ( काप्य आदि ) से सूत्र और अन्तर्यामीको बताया। उसे मैं जानता हूँ। हे याज्ञवल्क्य ! यदि उस सूत्र और अन्तर्यामीको न जाननेवाले होकर ब्रह्मवेत्ताकी स्वभूत गौओंको ले जाओगे तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा।' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गौतम ! मैं उस सूत्र और अन्तर्यामीको जानता हूँ।' [उद्दालक-] 'ऐसा तो जो कोई भी कह सकता है—'मैं जानता हूँ, मैं जानता हूँ' [ किंतु यों व्यर्थ ढोल पीटनेसे क्या लाभ ? यदि वास्तवमें तुम्हें उसका ज्ञान है तो ] जिस प्रकार तुम जानते हो वह कहो' ॥ १ ॥

अथ हैनमुद्दालको नामतः, अरुणस्यापत्यमारुणिः पप्रच्छ; याज्ञवल्क्येति होवाच; मद्रेषु देशेष्ववसामोषितवन्तः, पतञ्चलस्य—पतञ्चलो नामतस्तस्यैव कपिगोत्रस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयाना यज्ञशास्त्राध्ययनं कुर्वाणाः । तस्यासीद् भार्या गन्धर्वगृहीता; तमपृच्छाम—कोऽसीति; सोऽब्रवीत् कबन्धो नामतः, अथर्वणोऽपत्यमाथर्वण इति ।फिर उस याज्ञवल्क्यसे उद्दालक नामसे प्रसिद्ध आरुणि—अरुणके पुत्रने पूछा। वह बोला, 'हे याज्ञवल्क्य ! हम मद्रदेशमें पतञ्चलके—जो नामसे पतञ्चल था उस काप्य-कपिगोत्रीयके घर यज्ञ—यज्ञशास्त्रका अध्ययन करते हुए रहते थे। उसकी भार्या गन्धर्वसे गृहीत थी [अर्थात् उसपर गन्धर्वका आवेश था]। उससे हमने पूछा, 'तू कौन है?' उसने कहा, 'मैं नामसे कबन्ध तथा गोत्रतः आथर्वण—अथर्वाका पुत्र हूँ।'
सोऽब्रवीद् गन्धर्वः पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकांश्च तच्छिष्यान्— वेत्थ नु त्वं हे काप्य जानीषे तत् सूत्रम् ? किं तत् ? येन सूत्रेणायं च लोक इदं च जन्म, परश्च लोकः परं चउस गन्धर्वने पतञ्चल काप्य और उसके याज्ञिक शिष्योंसे पूछा, 'हे काप्य ! क्या तुम उस सूत्रको जानते हो ? वह कौन ? जिस सूत्रके द्वारा यह लोक — यह जन्म, परलोक—

| ७४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [३. अध्याय ३ |

| ७४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [३. अध्याय ३ | | :--- | :--- |

| प्रतिपत्तव्यं जन्म, सर्वाणि च भूतानि ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानि, सन्दब्धानि सङ्ग्रथितानि स्रगिव सूत्रेण विष्टब्धानि भवन्ति येन—तत् किं सूत्रं वेत्थ ? सोऽब्रवीदेवं पृष्टः काप्यः—नाहं तद् भगवन् वेदेति, तत् सूत्रं नाहं जाने हे भगवन्निति सम्पूजयन्नाह । | आगे प्राप्त होनेवाला जन्म और ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण भूत संदृब्ध—संग्रथित—सूत्रसे मालाके समान सम्यक् प्रकारसे धारण किये हुए हैं, क्या उस सूत्रको तुम जानते हो ?' इस प्रकार पूछे जानेपर उस काप्यने कहा, 'भगवन् ! मैं उसे नहीं जानता।' 'हे भगवन् !' इस प्रकार सत्कार करते हुए उसने कहा, 'मैं उस सूत्रको नहीं जानता।' | | सोऽब्रवीत् पुनर्गन्धर्व उपाध्यायमस्मांश्च—वेत्थ न त्वं काप्य तमन्तर्यामिणम् ? अन्तर्यामीति विशेष्यते—य इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरोऽभ्यन्तरः सन् यमयति नियमयति, दारुयन्त्रमिव भ्रामयति, स्वं स्वमुचितव्यापारं कारयतीति । सोऽब्रवीदेवमुक्तः पतञ्चलः काप्यः—नाहं तं जाने भगवन्निति सम्पूजयन्नाह । | 'उस गन्धर्वने उपाध्यायसे और हमसे फिर पूछा, 'काप्य ! क्या तुम उस अन्तर्यामीको जानते हो ?' 'अन्तर्यामी' इस पदका विशेषण बतलाता है—'जो इस लोकको, परलोकको और सम्पूर्ण भूतोंको अन्तर--भीतर रहकर नियमित करता है—काष्ठयन्त्रके समान भ्रमित अर्थात् अपना-अपना उचित व्यापार कराता है [ क्या उसे तुम जानते हो ?]'। इस प्रकार कहे जानेपर उस पतञ्चल काप्यने 'भगवन् !' इस प्रकार सत्कार करते हुए कहा, 'मैं उसे नहीं जानता।' | | सोऽब्रवीत् पुनर्गन्धर्वः; सूत्रतदन्तर्गतान्तर्यामिणोर्विज्ञानं स्तूयते—यः कश्चिद् वै तत् सूत्रं हे काप्य विद्याद् विजानीयात् तं चान्तर्या- | 'उस गन्धर्वने फिर कहा; अब सूत्र और उसके अन्तर्वर्ती अन्तर्यामीके विज्ञानकी स्तुति की जाती है—'हे काप्य ! तुममेंसे जो कोई भी उस सूत्रको और सूत्रके अन्तर्गत उसी सूत्रके नियन्ता अन्तर्यामीको |

ब्राह्मण ७ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७४५

ब्राह्मण ७ ]शाङ्करभाष्यार्थ७४५

| मिणं सूत्रान्तर्गतं तस्यैव सूत्रस्य नियन्तारं विद्यात् यः—इत्येवमुक्तेन प्रकारेण, स हि ब्रह्मवित् परमात्मवित् स लोकांश्च भूरादीनन्तर्यामिणा नियम्यमानाँल्लोकान् वेत्ति, स देवांश्चाग्न्यादीँल्लोकस्थो जानाति, वेदांश्च सर्वप्रमाणभूतान् वेत्ति, भूतानि च ब्रह्मादीनि सूत्रेण ध्रियमाणानि तदन्तर्गतेनान्तर्यामिणा नियम्यमानानि वेत्ति, स आत्मानं च कर्तृत्वभोक्तृत्वविशिष्टं तेनैवान्तर्यामिणा नियम्यमानं वेत्ति, सर्वं च जगत् तथाभूतं वेत्तीति। | उक्त प्रकारसे जान ले वही ब्रह्मवित्—परमात्माको जाननेवाला है; वही अन्तर्यामीसे नियम्यमान भूरादि लोकोंको जानता है, सबके प्रमाणभूत वेदोंको जानता है तथा सूत्रसे धारण किये हुए और उसके अन्तर्वर्ती अन्तर्यामीसे नियमित होते हुए ब्रह्मादि भूतोंको जानता है। वह उस अन्तर्यामीसे ही नियमित होते हुए कर्तृत्व-भोक्तृत्वविशिष्ट आत्माको जानता है तथा सम्पूर्ण जगत्‌को भी ऐसा ही जानता है।' | | एवं स्तुते सूत्रान्तर्यामिविज्ञाने प्रलुब्धः काप्योऽभिमुखीभूतः, वयं च; तेभ्यश्चास्मभ्यमभिमुखीभूतेभ्योऽब्रवीद् गन्धर्वः सूत्रमन्तर्यामिणं च; तदहं सूत्रान्तर्यामिविज्ञानं वेद गन्धर्वाल्लब्धागमः सन्। तच्चेद् याज्ञवल्क्य सूत्रं तं चान्तर्यामिणमविद्वांश्चेदब्रह्मवित् सन् यदि ब्रह्मगवीरुदजसे ब्रह्मविदां स्वभूता गा उदजसे उन्नयसि त्वम् | 'सूत्र और अन्तर्यामीके विज्ञानकी इस प्रकार स्तुति होनेपर अत्यन्त लुब्ध होकर काप्य और हम उसके अभिमुख हुए; इस प्रकार अपने अभिमुख हुए हमलोगोंके प्रति उस गन्धर्वने सूत्र और अन्तर्यामीका वर्णन किया; सो मैं गन्धर्वसे आचार्योपदेश प्राप्त करके उस सूत्र और अन्तर्यामीके विज्ञानको जानता हूँ; अतः हे याज्ञवल्क्य ! यदि उस सूत्र और अन्तर्यामीको न जाननेवाले अर्थात् अब्रह्मवित् होकर तुम 'ब्रह्मगवी:'—ब्रह्मवेत्ताओंकी स्वभूता गोओंको अन्यायसे ले जाओगे तो |

७४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७४६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| अन्यायेन, ततो मच्छापदग्धस्य मूर्धा शिरस्ते तव विस्पष्टं पतिष्यति। | मेरे शापसे दग्ध तुम्हारा मूर्धा-शिर विस्पष्टतया (निश्चय ही) गिर जायगा।' | | एवमुक्तो याज्ञवल्क्य आह—<br>वेद जानाम्यहं हे गौतमेति गोत्रतः, तत् सूत्रं यद् गन्धर्वस्तुभ्यमुक्तवान् यं चान्तर्यामिणं गन्धर्वाद् विदितवन्तो यूयम्, तं चान्तर्यामिणं वेदाहमिति। | इस प्रकार कहे जानेपर याज्ञवल्क्यने 'हे गौतम!' इस प्रकार गोत्रतः सम्बोधन करते हुए कहा, 'तुम्हारे प्रति गन्धर्वने जिस सूत्रका वर्णन किया है, उसे मैं जानता हूँ तथा तुमलोगोंने जिस अन्तर्यामीको गन्धर्वसे जाना है, उस अन्तर्यामीको भी मैं जानता हूँ।' | | एवमुक्ते प्रत्याह गौतमः—<br>यः कश्चित् प्राकृत इदं यत्त्वयोक्तं ब्रूयात्—कथम् ? वेद वेदेति—आत्मानं श्लाघयन्, किं तेन गर्जितेन कार्येण दर्शय; यथा वेत्थ तथा ब्रूहीति ॥ १ ॥ | याज्ञवल्क्यके इस प्रकार कहनेपर गौतमने उत्तरमें कहा, 'जो कोई साधारण पुरुष भी ऐसा, जैसा कि तुमने कहा है, कह सकता है; किस प्रकार कह सकता है? 'मैं जानता हूँ, मैं जानता हूँ' इस प्रकार अपनी बड़ाई करता हुआ कह सकता है, परंतु उसके उस गर्जनसे क्या लाभ है? तुम कार्यद्वारा उसे दिखाओ जैसा जानते हो वैसा कहो' ॥ १ ॥ |

सूत्रका निरूपण

स होवाच वायुर्वै गौतम तत् सूत्रं वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि

ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७४७

ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७४७


सन्दब्धानि भवन्ति तस्माद्वै गौतम पुरुषं प्रेत-
माहुर्व्यस्र्ꣳसिषतास्याङ्गानीति वायुना हि गौतम
सूत्रेण सन्दब्धानि भवन्तीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्या-
न्तर्यामिणं ब्रूहीति ॥ २ ॥

उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे गौतम ! वायु ही वह सूत्र है; गौतम ! वायुरूप सूत्रके द्वारा ही यह लोक, परलोक और समस्त भूतसमुदाय गूँथे हुए हैं। हे गौतम ! इसीसे मरे हुए पुरुषको ऐसा कहते हैं कि इसके अङ्ग विस्रस्त (विशीर्ण) हो गये हैं; क्योंकि हे गौतम ! वे वायुरूप सूत्रसे ही संग्रथित होते हैं।' [आरुणि—] 'हे याज्ञवल्क्य ! ठीक है, यह तो ऐसा ही है, अब तुम अन्तर्यामीका वर्णन करो' ॥ २ ॥


| स होवाच याज्ञवल्क्यः। ब्रह्मलोका यस्मिन्नोताश्च प्रोताश्च वर्तमाने काले, यथा पृथिव्यप्सु, तत् सूत्रम् आगमगम्यं वक्तव्यमिति तदर्थं प्रश्नान्तरमुत्थापितम्; अतस्तन्निर्णयायाह—वायुर्वै गौतम तत् सूत्रम्, नान्यत्; वायुरिति सूक्ष्ममाकाशवद्विष्टम्भकं पृथिव्यादीनाम्, यदात्मकं सप्तदशविधं लिङ्गं कर्मवासनासमवायि प्राणिनाम्, यत्तत् समष्टिव्यष्ट्यात्मकम्, यस्य बाह्या भेदाः सप्तसप्त मरुद्गणाः | उस याज्ञवल्क्यने कहा। जिस प्रकार जलमें पृथिवी ओतप्रोत है उसी प्रकार जिसमें वर्तमान कालमें ब्रह्मलोक ओतप्रोत हैं, शास्त्रद्वारा जानने योग्य उस सूत्रका वर्णन करना है, इसीलिये एक अन्य प्रश्न उठाया गया था, उसका निर्णय करनेके लिये याज्ञवल्क्य कहते हैं, 'हे गौतम ! वायु ही वह सूत्र है, और कुछ नहीं।' यहाँ वायु—यह आकाशके समान सूक्ष्म तत्त्व है और पृथिवी आदि भूतोंको धारण करनेवाला है; प्राणियोंका यह कर्म-वासनासमवायी (कर्म-संस्कारसे युक्त) सत्रह अवयवोंवाला लिङ्गदेह जिससे उत्पन्न हुआ है, जो समष्टि एवं व्यष्टिरूप है तथा समुद्रकी तरङ्गोंके समान उन्चास मरुद्गण |

७४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७४८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृतहिन्दी
समुद्रस्येवोर्मयः, तदेतद् वायव्यं तत्त्वं सूत्रमित्यभिधीयते ।जिसके बाह्य भेद हैं, वह यह वायु-तत्त्व 'सूत्र' कहा जाता है ।
वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दब्धानि भवन्ति सङ्ग्रथितानि भवन्तीति प्रसिद्धमेतत्। अस्ति च लोके प्रसिद्धिः, कथम् ? यस्माद् वायुः सूत्रम्, वायुना विधृतं सर्वम्; तस्माद् वै गौतम पुरुषं प्रेतमाहुः कथयन्ति—व्यस्रंसिषत विस्रस्तान्यस्य पुरुषस्याङ्गानीति; सूत्रापगमे हि मण्यादीनां प्रोतानामवस्रंसनं दृष्टम्; एवं वायुः सूत्रम्, तस्मिन् मणिवत् प्रोतानि यद् यस्याङ्गानि स्युस्ततो युक्तमेतद् वाय्वपगमेऽवस्रंसनमङ्गानाम् अतो वायुना हि गौतम सूत्रेण सन्दब्धानि भवन्तीति निगमयति ।'हे गौतम ! वायुरूप सूत्रके द्वारा ही यह लोक, परलोक और सम्पूर्ण भूत सन्दब्ध—संग्रथित हैं- यह प्रसिद्ध है। लोकमें ऐसी प्रसिद्धि है, कैसी ? क्योंकि वायु सूत्र है, इसलिये वायुने सबको धारण किया है; इसीसे हे गौतम ! मृत पुरुषके विषयमें ऐसा कहते हैं कि इस पुरुषके अङ्ग विस्रस्त हो गये हैं; यह देखा गया है कि सूत्र (धागे) के न रहनेपर उसमें पिरोये हुए मणि आदि बिखर जाते हैं, इसी प्रकार वायु सूत्र है और यदि उसमें उस प्राणीके अङ्ग मणियोंके समान पिरोये हुए हैं, तो वायुके निवृत्त होनेपर इसके अङ्गोंका विशीर्ण हो जाना उचित ही है; इसीसे याज्ञवल्क्य ऐसा निगमन करते हैं कि 'हे गौतम ! ये वायुरूप सूत्रसे संग्रथित हैं।'
एवमेवैतद् याज्ञवल्क्य सम्यगुक्तं सूत्रम्; तदन्तर्गतं त्विदानीं तस्यैव सूत्रस्य नियन्तारमन्तर्यामिणं ब्रूहीत्युक्त आह ॥ २ ॥[गौतमने कहा—] 'याज्ञवल्क्य ! यह ठीक ऐसा ही है, तुमने सूत्रका यथार्थ वर्णन किया है। अब तुम उसके अन्तर्वर्ती और उस सूत्रके ही नियन्ता अन्तर्यामीका वर्णन करो।' गौतमके ऐसा कहनेपर याज्ञवल्क्य कहते हैं—॥ २ ॥

ब्राह्मण ७] शाङ्करभाष्यार्थ ७४९

ब्राह्मण ७] शाङ्करभाष्यार्थ ७४९


अन्तर्यामीका निरूपण

यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ३ ॥

जो पृथिवीमें रहनेवाला पृथिवीके भीतर है, जिसे पृथिवी नहीं जानती, जिसका पृथिवी शरीर है और जो भीतर रहकर पृथिवीका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ ३ ॥

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
यः पृथिव्यां तिष्ठन् भवति, सोऽन्तर्यामी, सर्वः पृथिव्यां तिष्ठतीति सर्वत्र प्रसङ्गो मा भूदिति विशिनष्टि—पृथिव्या अन्तरोऽभ्यन्तरः । तत्रैतत् स्यात् पृथिवीदेवतैव अन्तर्यामीत्यत आह—यमन्तर्यामिणं पृथिवी देवतापि न वेद मद्यन्यः कश्चिद्वर्तत इति । यस्य पृथिवी शरीरम्—यस्य च पृथिव्येव शरीरम्, नान्यत्—पृथिवीदेवताया यच्छरीरम्, तदेव शरीरं यस्य; शरीरग्रहणं चोपलक्षणार्थम्, करणं च पृथिव्याः, तस्य स्वकर्मप्रयुक्तंजो पृथिवीमें रहनेवाला है, वह अन्तर्यामी है; किंतु पृथिवीमें तो सभी रहते हैं, अतः इससे सर्वत्र अन्तर्यामीका प्रसङ्ग न हो जाय, इसलिये उसका विशेषण बतलाते हैं—'जो पृथिवीके अन्तर-भीतर है।' इससे यह शङ्का हो सकती है कि पृथिवी देवता ही अन्तर्यामी है, इसलिये फिर कहते हैं—'जिस अन्तर्यामीको पृथिवी देवता भी नहीं जानती कि 'मेरे भीतर और भी कोई है।' जिसका पृथिवी शरीर है अर्थात् पृथिवी ही जिसका शरीर है, कोई और नहीं; यानी जो पृथिवी देवताका शरीर है, वही जिसका शरीर है; यहां 'शरीर' शब्द उपलक्षणार्थक है, अर्थात् केवल शरीर ही नहीं, पृथिवी देवताका जो करण (इन्द्रिय) है, वही उसका करण भी है। पृथिवी