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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

७५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७५०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| हि कार्यं करणं च पृथिवीदेवतायाः; तदस्य स्वकर्माभावादन्तर्यामिणो नित्यमुक्तत्वात्।<br><br>परार्थकत्र्तव्यतास्वभावत्वात् परस्य यत् कार्यं करणं च तदेवास्य, न स्वतः; तदाह—यस्य पृथिवी शरीरमिति। | देवताको कार्य और करण (देह और इन्द्रिय) उसके कर्मानुसार प्राप्त हुए हैं; वे ही इस अन्तर्यामीके हैं; क्योंकि नित्यमुक्त होनेके कारण उसके कोई स्वकर्म नहीं हैं। परार्थ-कर्तव्यता—दूसरेके अर्थको करना यह अन्तर्यामीका स्वभाव है, अतः जो दूसरेके देह और इन्द्रिय हैं; वे ही इसके भी हैं, स्वतः इसके कोई देह या इन्द्रिय नहीं है; इसीसे श्रुति कहती है कि जिसका पृथिवी शरीर है। | | देवताकार्यकरणस्येश्वरसाक्षिमात्रसान्निध्येन हि नियमेन प्रवृत्तिनिवृत्ती स्याताम्; य ईदृगीश्वरो नारायणाख्यः, पृथिवीं पृथिवीदेवताम्, यमयति नियमयति स्वव्यापारे, अन्तरोऽभ्यन्तरस्तिष्ठन्, एष त आत्मा, ते तव, मम च सर्वभूतानां चेत्युपलक्षणार्थमेतत्; अन्तर्यामी यस्त्वया पृष्टः, अमृतः सर्वसंसारधर्मवर्जित इत्येतत् ॥ ३ ॥ | देवताके देह और इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति-निवृत्ति साक्षिमात्र ईश्वरके सांनिध्यसे नियमानुसार हुआ करती है, जो ऐसा नारायणसंज्ञक ईश्वर पृथिवीको—पृथिवी देवताको नियमित करता है—पृथिवीके भीतर विद्यमान रहकर अपने व्यापारमें नियुक्त करता है, यह तुम्हारा आत्मा है, तुम्हारा अर्थात् तुम्हारा और मेरा समस्त प्राणियोंका आत्मा है—इस प्रकार 'ते (तुम्हारा)' यह कथन सबके उपलक्षणके लिये है। यही अन्तर्यामी है, जिसके विषयमें तुमने पूछा है और यह अमृत यानी सम्पूर्ण संसार-धर्मोंसे रहित है ॥ ३ ॥ |

ब्राह्मण ७ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७५१

ब्राह्मण ७ ]शाङ्करभाष्यार्थ७५१

योऽप्सु तिष्ठन्नद्भ्योऽन्तरो यमापो न विदुर्यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥४॥ योऽग्नौ तिष्ठन्नग्नेरन्तरो यमग्निर्न वेद यस्याग्निः शरीरं योऽग्निमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥५॥ योऽन्तरिक्षे तिष्ठन्नन्तरिक्षादन्तरो यमन्तरिक्षं न वेद यस्यान्तरिक्षँ शरीरं योऽन्तरिक्षमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥६॥ यो वायौ तिष्ठन् वायोरन्तरो यं वायुर्न वेद यस्य वायुः शरीरं यो वायुमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ७ ॥ यो दिवि तिष्ठन् दिवोऽन्तरो यं द्यौर्न वेद यस्य द्यौः शरीरं यो दिवमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ८ ॥ य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यन्मन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥९॥ यो दिक्षु तिष्ठन् दिग्भ्योऽन्तरो यं दिशो न विदुर्यस्य दिशः शरीरं यो दिशोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥१०॥ यश्चन्द्रतारके तिष्ठँश्चन्द्रतारकादन्तरो यं चन्द्रतारकं न वेद यस्य चन्द्रतारकँ शरीरं यश्चन्द्रतारकमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥११॥ य आकाशे तिष्ठन्नाकाशादन्तरो यमाकाशो न वेद यस्याकाशः शरीरं य आकाशमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥१२॥ यस्तमसि तिष्ठँस्तमसोऽन्तरो यं तमो

७५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७५२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

न वेद यस्य तमः शरीरं यस्तमोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १३ ॥ यस्तेजसि तिष्ठꣳस्तेजोऽन्तरो यं तेजो न वेद यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृत इत्यधिदैवतमथाधिभूतम् ॥ १४ ॥

जो जलमें रहनेवाला जलके भीतर है, जिसे जल नहीं जानता, जल जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर जलका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥४॥ जो अग्निमें रहनेवाला अग्निके भीतर है, जिसे अग्नि नहीं जानता, अग्नि जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर अग्निका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥५॥ जो अन्तरिक्षमें रहनेवाला अन्तरिक्षके भीतर है, जिसे अन्तरिक्ष नहीं जानता, अन्तरिक्ष जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर अन्तरिक्षका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥६॥ जो वायुमें रहनेवाला वायुके भीतर है, जिसे वायु नहीं जानता, वायु जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर वायुका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥७॥ जो द्युलोकमें रहनेवाला द्युलोकके भीतर है, जिसे द्युलोक नहीं जानता, द्युलोक जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर द्युलोकका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥८॥ जो आदित्यमें रहनेवाला आदित्यके भीतर है, जिसे आदित्य नहीं जानता, आदित्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर आदित्यका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥९॥ जो दिशाओंमें रहनेवाला दिशाओंके भीतर है, जिसे दिशाएँ नहीं जानतीं, दिशाएँ जिसका शरीर हैं और जो भीतर रहकर दिशाओंका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥१०॥ जो चन्द्रमा और ताराओंमें रहनेवाला चन्द्रमा और ताराओंके भीतर है, जिसे चन्द्रमा और ताराएँ नहीं जानतीं, चन्द्रमा और ताराएँ जिसका

ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५३

ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५३


शरीर हैं और जो भातर रहकर चन्द्रमा और ताराओंका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ ११ ॥ जो आकाशमें रहनेवाला आकाशके भीतर है, जिसे आकाश नहीं जानता, आकाश जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर आकाशका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १२ ॥ जो तममें रहनेवाला तमके भीतर है, जिसे तम नहीं जानता, तम जिसका शरीर है और जो भोतर रहकर तमका नियमन करता है वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १३ ॥ जो तेजमें रहनेवाला तेजके भीतर है, जिसे तेज नहीं जानता, तेज जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर तेजका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है, यह अधिदैवत-दर्शन हुआ, आगे अधिभूत-दर्शन है ॥ १४ ॥

| समानमन्यत्। योऽप्सु तिष्ठन्—<br>अग्नौ, अन्तरिक्षे, वायौ, दिवि,<br>आदित्ये, दिक्षु, चन्द्रतारके,<br>आकाशे, यस्तमस्यावरणात्मके<br>बाह्ये तमसि, तेजसि तद्विपरीते<br>प्रकाशसामान्ये इत्येवमधिदैवतम्<br>अन्तर्यामिविषयं दर्शनं देवतासु।<br>अथाधिभूतं भूतेषु ब्रह्मादिस्त-<br>म्बपर्यन्तेषु अन्तर्यामिदर्शन-<br>मधिभूतम् ॥ ४-१४ ॥ | शेष सब तृतीय मन्त्रके समान ही<br>है। जो जलमें, अग्निमें, अन्तरिक्षमें,<br>वायुमें, द्युलोकमें, आदित्यमें,<br>दिशाओंमें, चन्द्रमा एवं ताराओंमें<br>और आकाशमें रहनेवाला है; जो<br>तम अर्थात् आवरणात्मक बाह्य<br>तममें, तेज अर्थात् तमसे विपरीत<br>सामान्य प्रकाशमें रहनेवाला है;<br>इस प्रकार यह अन्तर्यामिविषयक<br>अधिदैवत—देवतान्तर्गत दर्शन है,<br>इससे आगे अधिभूत-दर्शन है,<br>ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त<br>भूतोंमें जो अन्तर्यामिदर्शन है, वह<br>अधिभूत-दर्शन है ॥ ४-१४ ॥ |


यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुर्यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः

बृ० उ० ४८—

७५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७५४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृत इत्यधिभूतमथाध्यात्मम् ॥ १५ ॥ यः प्राणे तिष्ठन् प्राणादन्तरो यं प्राणो न वेद यस्य प्राणः शरीरं यः प्राणमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १६॥ यो वाचि तिष्ठन् वाचोऽन्तरो यं वाङ् न वेद यस्य वाक् शरीरं यो वाचमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १७ ॥ यश्चक्षुषि तिष्ठँश्चक्षुषोऽन्तरो यं चक्षुर्न वेद यस्य चक्षुः शरीरं यश्चक्षुरन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १८ ॥ यः श्रोत्रे तिष्ठञ्छ्रोत्रादन्तरो यँ श्रोत्रं न वेद यस्य श्रोत्रँ शरीरं यः श्रोत्रमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १९ ॥ यो मनसि तिष्ठन् मनसोऽन्तरो यं मनो न वेद यस्य मनः शरीरं यो मनोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ २० ॥ यस्त्वचि तिष्ठँस्त्वचोऽन्तरो यं त्वङ् न वेद यस्य त्वक् शरीरं यस्त्वचमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ २१ ॥ यो विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानँ शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ २२ ॥ यो रेतसि तिष्ठन् रेतसोऽन्तरो यँ रेतो न वेद यस्य रेतः शरीरं यो रेतोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतोऽदृष्टो द्रष्टाश्रुतः श्रोतामतो मन्ताविज्ञातो विज्ञाता नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता नान्योऽतोऽस्ति मन्ता नान्योऽतोऽस्ति

ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५५

ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५५


विज्ञातैष त आत्मान्तर्याम्यमृतोऽतोऽन्यदार्तं ततो होद्दालक आरुणिरुपरराम ॥ २३ ॥

जो समस्त भूतोंमें स्थित रहनेवाला समस्त भूतोंके भीतर है, जिसे समस्त भूत नहीं जानते, समस्त भूत जिसके शरीर हैं और जो भीतर रहकर समस्त भूतोंका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। यह अधिभूतदर्शन है, अब अध्यात्मदर्शन कहा जाता है ॥१५॥ जो प्राणमें रहनेवाला प्राणके भीतर है, जिसे प्राण नहीं जानता, प्राण जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर प्राणका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १६ ॥ जो वाणीमें रहनेवाला वाणीके भीतर है, जिसे वाणी नहीं जानती, वाणी जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर वाणीका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १७ ॥ जो नेत्रमें रहनेवाला नेत्रके भीतर है, जिसे नेत्र नहीं जानता, नेत्र जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर नेत्रका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १८ ॥ जो श्रोत्रमें रहनेवाला श्रोत्रके भीतर है, जिसे श्रोत्र नहीं जानता, श्रोत्र जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर श्रोत्रका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १६ ॥ जो मनमें रहनेवाला मनके भीतर है, जिसे मन नहीं जानता, मन जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर मनका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ २० ॥ जो त्वक्में रहनेवाला त्वक्‌के भीतर है, जिसे त्वक् नहीं जानती, त्वक् जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर त्वक्का नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ २१ ॥ जो विज्ञानमें रहनेवाला विज्ञानके भीतर है, जिसे विज्ञान नहीं जानता, विज्ञान जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर विज्ञानका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥२२॥ जो वीर्यमें रहनेवाला वीर्यके भीतर है, जिसे वीर्य नहीं जानता, वीर्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर वीर्यका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। वह दिखायी न

७५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७५६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

देनेवाला किंतु देखनेवाला है, सुनायी न देनेवाला किंतु सुननेवाला है, मननका विषय न होनेवाला किंतु मनन करनेवाला है और विशेषतया ज्ञात न होनेवाला किंतु विशेषरूपसे जाननेवाला है। यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। इससे भिन्न सब नाशवान् है। इसके पश्चात् अरुणका पुत्र उद्दालक प्रश्न करनेसे निवृत्त हो गया ॥ २३ ॥

| अथाध्यात्मम्—यः प्राणे प्राणवायुसहिते घ्राणे, यो वाचि, चक्षुषि, श्रोत्रे, मनसि, त्वचि, विज्ञाने, बुद्धौ, रेतसि प्रजनने। कस्मात् पुनः कारणात् पृथिव्यादिदेवता महाभागाः सत्यो मनुष्यादिवदात्मनि तिष्ठन्तमात्मनो नियन्तारमन्तर्यामिणं न विदुरित्यत आह—अदृष्टो न दृष्टो न विषयीभूतः चक्षुर्दर्शनस्य कस्यचित्, स्वयं तु चक्षुषि सन्निहितत्वादृशिस्वरूप इति द्रष्टा। | अब अध्यात्मदर्शन कहा जाता है—जो प्राणमें—प्राणवायुसहित घ्राणेन्द्रियमें, जो वाणीमें, नेत्रमें, श्रोत्रमें, मनमें, त्वक्में, विज्ञान यानी बुद्धिमें तथा रेत (वीर्य)—प्रजननेन्द्रियमें रहनेवाला है। किंतु पृथिवी आदि [के अधिष्ठाता] देवता बड़े प्रभावशाली होनेपर भी मनुष्यादिके समान अपने भीतर रहनेवाले अपने नियामक अन्तर्यामीको क्यों नहीं जानते ? इसपर याज्ञवल्क्य कहते हैं—वह अदृष्ट—न देखा हुआ अर्थात् किसीकी भी नेत्रदृष्टिका विषयीभूत नहीं है, किंतु स्वयं नेत्रमें सन्निहित होनेके कारण दर्शनस्वरूप है, इसलिये द्रष्टा है। | | तथाश्रुतः श्रोत्रगोचरत्वमनापन्नः कस्यचित्, स्वयं त्वलुप्तश्रवणशक्तिः सर्वश्रोत्रेषु सन्निहितत्वाच्छ्रोता। तथामतो मनःसङ्कल्प- | इसी प्रकार वह अश्रुत—किसीके भी श्रोत्रकी विषयताको अप्राप्त किंतु स्वयं जिसकी श्रवण-शक्ति लुप्त नहीं होती—ऐसा है और समस्त श्रोत्रोंमें सन्निहित होनेके कारण श्रोता है; ऐसे ही वह अमत-मनके संकल्पोंकी |

ब्राह्मण ७] शाङ्करभाष्यार्थ [७५७

ब्राह्मण ७] शाङ्करभाष्यार्थ [७५७


विषयतामनापन्नः; दृष्टश्रुते एव हि सर्वः सङ्कल्पयति; अदृष्टत्वादश्रुतत्वादेवामतः; अलुप्तमननशक्तित्वात् सर्वमनःसु सन्निहितत्वाच्च मन्ता। तथाविज्ञातो निश्चयगोचरतामनापन्नो रूपादिवत् सुखादिवद्वा, स्वयं त्वलुप्तविज्ञानशक्तित्वात्तत्सन्निधानाच्च विज्ञाता।विषयताको अप्राप्त है; क्योंकि सब लोग देखे-सुने पदार्थोंका ही संकल्प करते हैं, अतः अदृष्ट और अश्रुत होनेके कारण ही वह अमत है; तथा मनन-शक्ति लुप्त न होनेसे और समस्त मनोंमें सन्निहित होनेके कारण वह मन्ता है। इसी तरह अविज्ञात—रूपादि अथवा सुखादिके समान निश्चयकी विषयताको अप्राप्त किंतु स्वयं जिसकी विज्ञान-शक्ति लुप्त नहीं है—ऐसा एवं बुद्धिमें सन्निहित होनेके कारण विज्ञाता है।
तत्र यं पृथिवी न वेद यं सर्वाणि भूतानि न विदुरिति चान्ये नियन्तव्या विज्ञातारोऽन्यो नियन्ता अन्तर्यामीति प्राप्तम्, तदन्यत्वाशङ्कानिवृत्त्यर्थमुच्यते— नान्योऽतः, नान्यः अतोऽस्मादन्तर्यामिणो नान्योऽस्ति द्रष्टा, तथा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता, नान्योऽतोऽस्ति मन्ता, नान्योऽतोऽस्ति विज्ञाता।यहाँ 'जिसे पृथिवी नहीं जानती, जिसे समस्त भूत नहीं जानते' इत्यादि कथनसे यह बात सिद्ध होती है कि जिनका नियमन किया जाता है, वे विज्ञाता भिन्न हैं और उनका नियमन करनेवाला अन्तर्यामी उनसे भिन्न है। उनके भिन्नत्वकी आशङ्काको निवृत्त करनेके लिये यह कहा जाता है—'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा' अर्थात् अतः—इस अन्तर्यामीसे भिन्न कोई और द्रष्टा नहीं है। इसी प्रकार इससे भिन्न कोई श्रोता नहीं है, इससे भिन्न कोई मन्ता नहीं है, तथा इससे भिन्न कोई विज्ञाता नहीं है।

७५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७५८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| यस्मात् परो नास्ति द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता, योऽदृष्टो द्रष्टा, अश्रुतः श्रोता, अमतो मन्ता, अविज्ञातो विज्ञाता, अमृतः सर्वसंसारधर्मवर्जितः सर्वसंसारिणां कर्मफलविभागकर्ता—एष ते आत्मान्तर्याम्यमृतः अस्मादीश्वरादात्मनोऽन्यदार्तम् । ततो ह उद्दालक आरुणिरुपरराम ॥ १५–२३ ॥ | जिससे भिन्न कोई द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता नहीं है, जो दिखायी न देनेवाला किंतु देखनेवाला है, सुनायी न देनेवाला किंतु सुननेवाला है; मनका अविषय किंतु मनन करनेवाला है, स्वयं अविज्ञात किंतु विज्ञाता है तथा अमृत—सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे रहित एवं समस्त संसारियोंके कर्मफलोंका विभाग करनेवाला है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है; इस ईश्वर आत्मासे भिन्न और सब आर्त (विनाशी) है। तब अरुणका पुत्र उद्दालक निवृत्त हो गया ॥ १५–२३ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये सप्तममन्तर्यामिब्राह्मणम् ॥ ७ ॥


अष्टम ब्राह्मण

| अतः परमशनायादिविनिर्मुक्तं निरुपाधिकं साक्षादपरोक्षात् सर्वान्तरं ब्रह्म वक्तव्यमित्यत आरम्भः— | इससे आगे क्षुधादिरहित निरुपाधिक साक्षात् अपरोक्ष सर्वान्तर ब्रह्मका निरूपण करना है, इसलिये आरम्भ किया जाता है— |

दो प्रश्न पूछनेके लिये गार्गीका आज्ञा माँगना

अथ ह वाचक्नव्युवाच ब्राह्मणा भगवन्तो हन्ता-

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७५९

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७५९


हममं द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामि तौ चेन्मे वक्ष्यति न जातु युष्माकमिमं कश्चिद् ब्रह्मोद्यं जेतेति पृच्छ गार्गीति ॥ १॥

फिर वाचक्नवीने कहा, 'पूजनीय ब्राह्मणगण ! अब मैं इनसे दो प्रश्न पूछूँगी। यदि ये मेरे उन प्रश्नोंका उत्तर दे देंगे तो आपमेंसे कोई भी इन्हें ब्रह्मसम्बन्धी वादमें नहीं जीत सकेगा।' [ ब्राह्मण-] 'अच्छा गार्गि ! पूछ' ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अथ ह वाचक्नव्युवाच । पूर्वं याज्ञवल्क्येन निषिद्धा मूर्धपातभयादुपरता सती पुनः प्रष्टुं ब्राह्मणानाज्ञां प्रार्थयते—हे ब्राह्मणा भगवन्तः पूजावन्तः शृणुत मम वचः; हन्ताहमिमं याज्ञवल्क्यं पुनर्द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामि, यद्यनुमतिर्भवतामस्ति; तौ प्रश्नौ चेद्यदि वक्ष्यति कथयिष्यति मे, कथञ्चिन्न वै जातु कदाचिद् युष्माकं मध्ये इमं याज्ञवल्क्यं कश्चिद् ब्रह्मोद्यं ब्रह्मवदनं प्रति जेता न वै कश्चिद् भवेदिति । एवमुक्ता ब्राह्मणा अनुज्ञां प्रददुः—पृच्छ गार्गीति ॥ १ ॥फिर वाचक्नवीने कहा। पहले याज्ञवल्क्यके निषेध करनेपर मस्तक गिर जानेके भयसे मौन हुई वाचक्नवी पुनः प्रश्न करनेके लिये ब्राह्मणोंसे आज्ञा माँगती है—'हे भगवान्—पूजावान् ब्राह्मणगण ! मेरी बात सुनिये; यदि आपलोगोंकी अनुमति हो तो मैं इन याज्ञवल्क्यजीसे दो प्रश्न ओर पूछूँगी। यदि ये उन दो प्रश्नोंका मुझे उत्तर दे देंगे तो आपमेंसे कोई भी इन याज्ञवल्क्यजीको ब्रह्मसम्बन्धी वादमें कभी किसी प्रकार भी जीतनेवाला नहीं हो सकेगा। इस प्रकार कहे जानेपर ब्राह्मणोंने 'हे गार्गि ! तू पूछ' ऐसा कहकर अपनी अनुमति दे दी ॥ १ ॥

सा होवाचाहं वै त्वा याज्ञवल्क्य यथा काश्यो वा वैदेहो वोग्रपुत्र उज्ज्यं धनुरधिज्यं कृत्वा द्वौ बाणवन्तौ सपत्नातिव्याधिनौ हस्ते कृत्वोपोत्तिष्ठेदेवमेवाहं त्वा द्वाभ्यां प्रश्नाभ्यामुपोदस्थां तौ मे ब्रूहीति पृच्छ गार्गीति ॥ २ ॥

७६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७६०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

वह बोली, 'हे याज्ञवल्क्य ! जिस प्रकार काशी या विदेहका रहनेवाला कोई वीर-वंशज प्रत्यञ्चाहीन धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर शत्रुओंको अत्यन्त पीडा देनेवाले दो बाणवान् शर हाथमें लेकर खड़ा होता है, उसी प्रकार मैं दो प्रश्न लेकर तुम्हारे सामने उपस्थित होती हूँ; तुम मुझे उनका उत्तर दो।' इसपर याज्ञवल्क्यने कहा, गार्गि ! 'पूछ' ॥ २ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
लब्धानुज्ञा ह याज्ञवल्क्यं सा होवाच—अहं वै त्वा त्वां द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामीत्यनुषज्यते; कौ ताविति जिज्ञासायां तयोर्दु॒रुत्तरत्वं द्योतयितुं दृष्टान्तपूर्वकं तावाह— हे याज्ञवल्क्य यथा लोके काश्यः– काशिषु भवः काश्यः, प्रसिद्धं शौर्यं काश्ये, वैदेहो वा विदेहानां वा राजा, उग्रपुत्रः शूरान्वय इत्यर्थः, उज्ज्‍यं अवतारितज्यकं धनुः पुनरधिज्यम् आरोपितज्याकं कृत्वा द्वौ बाणवन्तौ—बाणशब्देन शराग्ने यो वंशखण्डः सन्धीयते, तेन विनापि शरो भवतीत्यतो विशिनष्टि बाणवन्ताविति—द्वौआज्ञा मिलनेपर उसने याज्ञवल्क्यसे कहा—'मैं तुमसे दो प्रश्न पूछूँगी' ऐसा इसका अन्वय है । वे प्रश्न कौन-से हैं ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर यह दिखलानेके लिये कि उनका उत्तर देना कठिन है, गार्गी उन्हें दृष्टान्तपूर्वक बतलाती है—'हे याज्ञवल्क्य ! जिस प्रकार लोकमें कोई काश्य—'काशी' प्रान्तमें उत्पन्न हुआ, काशि-प्रान्तमें उत्पन्न होनेवालोंमें शूरवीरता प्रसिद्ध है अथवा वैदेह—विदेह-निवासी या विदेह देशका राजा उग्रपुत्र अर्थात् जो वीर वंशमें उत्पन्न हुआ है, वह उज्ज्य—जिसकी ज्या ( डोरी ) उतार ली गयी है, ऐसे धनुषको पुनः ज्यायुक्त कर अर्थात् उसकी प्रत्यञ्चा चढ़ा करके दो बाणवान्—यहाँ 'बाण' शब्दसे यह व्यक्त होता है कि शरके अग्रभागोंमें जो बाँसका टुकड़ा लगाया जाता है, उसके बिना भी बाण होता है, इसीसे 'बाणवान्' यह विशेषण दिया गया है, तात्पर्य यह

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७६१

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७६१

बाणवन्तौ शरौ, तयोरेव विशेषणं सपत्नातिव्याधिनौ शत्रोः पीडाकरावतिशयेन, हस्ते कृत्वोपोत्तिष्ठेत् समीपतः आत्मानं दर्शयेत् एवमेवाहं त्वा त्वां शरस्थानीयाभ्यां प्रश्नाभ्यां द्वाभ्यामुपोदस्थां उत्थितवत्यस्मि त्वत्समीपे। तौ मे ब्रूहीति—ब्रह्मविच्चेत्। आहेतरः—पृच्छ गार्गीति ॥२॥कि दो बाणवान् शर, इन्हींका विशेषण है 'सपत्नातिव्याधिनौ', इसका अर्थ है—शत्रुओंको अत्यन्त पीडा देनेवाले, ऐसे बाणोंको हाथमें लेकर उपस्थित हो—अपनेको पास जाकर दिखाये, उसी प्रकार मैं शरस्थानीय दो प्रश्न लेकर तुम्हारे निकट उपस्थित हुई हूँ, अतः यदि तुम ब्रह्मवेत्ता हो तो उनका उत्तर दो।' इसपर इतर (याज्ञवल्क्य) ने कहा—'गार्गि ! पूछ' ॥ २ ॥

पहला प्रश्न

सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद् भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिंस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥३॥

वह बोली, 'हे याज्ञवल्क्य ! जो द्युलोकसे ऊपर है, जो पृथिवीसे नीचे है और जो द्युलोक और पृथिवीके मध्यमें है और स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जिन्हें भूत, वर्तमान और भविष्य-इस प्रकार कहते हैं, वे किसमें ओत-प्रोत हैं ?' ॥ ३ ॥

सा होवाच—यदूर्ध्वमुपरि दिवःअण्डकपालाद्यच्चावागधः पृथिव्या अधोऽण्डकपालात्, यच्चान्तरा मध्ये द्यावापृथिवीवह बोली, 'जो द्युलोकरूप अण्डकपालसे ऊर्ध्व—ऊपर है और जो पृथिवीसे यानी इस नीचेके अण्डकपालसे नीचे है तथा जो द्यावापृथिवीके मध्यमें है अर्थात् द्युलोक और

७६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७६२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| द्यावापृथिव्योः अण्डकपालयोः, इमे च द्यावापृथिवी, यद् भूतं यच्चातीतम्, भवच्च वर्तमानं स्वव्यापारस्थम्, भविष्यच्च वर्तमानादूर्ध्वकालभावि लिङ्ग-गम्यम्—यत् सर्वमेतदाचक्षते कथयन्त्यागमतः—तत् सर्वं द्वैतजातं यस्मिन्नेकीभवतीत्यर्थः—तत् सूत्रसंज्ञं पूर्वोक्तं कस्मिन्नोतं च प्रोतं च पृथिवीधातुरिवाप्सु ॥ ३ ॥ | पृथिवी—इन अण्डकपालोंके बीचमें है; एवं स्वयं जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जो कुछ भी भूत-यानी बीत चुका है, भवत्—वर्तमान अर्थात् अपने व्यापारमें स्थित और भविष्यत्—वर्तमानके बादके समयमें होनेवाला एवं अनुमानगम्य है—ऐसा जो यह सब आगमद्वारा कहा जाता है, वह सम्पूर्ण द्वैतवर्ग जिसमें एक हो जाता है, वह पहले बतलाया हुआ सूत्रसंज्ञक तत्त्व, जलमें पृथिवीतत्त्वके समान, किसमें ओत-प्रोत है?' ॥ ३ ॥ |


याज्ञवल्क्यका उत्तर

स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद् भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षत आकाशे तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ४ ॥

उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे गार्गि! जो द्युलोकसे ऊपर, पृथिवीसे नीचे और जो द्युलोक एवं पृथिवीके मध्यमें है और स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जिन्हें भूत, वर्तमान एवं भविष्य—इस प्रकार कहते हैं, वे सब आकाशमें ओतप्रोत हैं' ॥ ४ ॥

| स होवाचेतरः—हे गार्गि यत् त्वयोक्तम् ‘ऊर्ध्वं दिवः’ इत्यादि, तत् सर्वं यत् सूत्रमाचक्षते तत् सूत्रम्, आकाशे तदोतं प्रोतं च, | उस इतर याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे गार्गि! तूने जिसे द्युलोकसे ऊपर इत्यादि कहकर बतलाया वह सब, जिसे कि 'सूत्र' ऐसा कहते हैं-वह सूत्र आकाशमें ओतप्रोत है। यह |

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७६३

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७६३


यदेतद् व्याकृतं सूत्रात्मकं जगदव्याकृताकाशे, अप्स्विव पृथिवीधातुः, त्रिष्वपि कालेषु वर्तते उत्पत्तौ स्थितौ लये च ॥ ४ ॥जो सूत्रस्वरूप व्याकृत जगत् है, वह जलमें पृथिवीतत्त्वके समान उत्पत्ति स्थिति और लय तीनों कालोंमें अव्याकृत आकाशमें विद्यमान है' ॥ ४ ॥

सा होवाच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्य यो म एतं व्यवोचोऽपरस्मै धारयस्वेति पृच्छ गार्गीति ॥ ५ ॥

वह बोली, 'हे याज्ञवल्क्य ! आपको नमस्कार है, जिन्होंने मुझे इस प्रश्नका उत्तर दे दिया; अब आप दूसरे प्रश्नके लिये तैयार हो जाइये। [ याज्ञवल्क्य- ] 'गार्गि ! पूछ' ॥ ५ ॥

पुनः सा होवाच; नमस्तेऽस्त्वत्यादि प्रश्नस्य दुर्वचत्वप्रदर्शनार्थम्; यो मे ममैतं प्रश्नं व्यवोचो विशेषेणापाकृतवानसि; एतस्य दुर्वचत्वे कारणम्--सूत्रमेव तावदगम्यमितरैर्दुर्व्वाच्यम्, किमुत तत्, यस्मिन्नोतं च प्रोतं चेति; अतो नमोऽस्तु ते तुभ्यम् । अपरस्मै द्वितीयाय प्रश्नाय धारयस्व दृढीकुर्वात्मानमित्यर्थः । पृच्छ गार्गीतीतर आह ॥ ५ ॥उसने पुनः कहा; आपको नमस्कार है—इत्यादि कथन यह प्रदर्शित करनेके लिये है कि इस प्रश्नका उत्तर देना कठिन था। 'जिन आपने मेरे इस प्रश्नकी व्याख्या की है अर्थात् इसका विशेषरूपसे निराकरण किया है। इस प्रश्नकी कठिनाईमें कारण यह है कि प्रथम तों सूत्र ही अगम्य यानी किसी दूसरेके लिये दुर्वाच्य है, फिर जिसमें वह भी ओतप्रोत है, उसका तो कहना ही क्या है; इसलिये आपको नमस्कार है। अब अन्य यानी द्वितीय प्रश्नके लिये अपनेको तैयार यानी पक्का कर लीजिये। इसपर याज्ञवल्क्यने कहा, 'गार्गि ! पूछ' ॥ ५ ॥

७६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७६४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

उपक्रमसहित दूसरा प्रश्न

सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक्पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिंस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ६॥

वह बोली, ‘हे याज्ञवल्क्य ! जो द्युलोकसे ऊपर है, जो पृथिवीसे नीचे है और जो द्युलोक और पृथिवीके मध्यमें है और स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जिन्हें भूत, वर्तमान और भविष्य—इस प्रकार कहते हैं, वे किसमें ओतप्रोत हैं ?’ ॥ ६ ॥

| व्याख्यातमन्यत्; सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्येत्यादिप्रश्नः प्रतिवचनं च उक्तस्यार्थस्यावधारणार्थं पुनरुच्यते; न किञ्चिदपूर्वमर्थान्तरमुच्यते ॥ ६ ॥ | अन्य ( छठे मन्त्रके पदों ) की व्याख्या पहले (तृतीय मन्त्रमें) की जा चुकी है। ‘यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य’ इत्यादि प्रश्न और इसका उत्तर पूर्वोक्त अर्थका ही निश्चय करनेके लिये पुनः कहा गया है; यहाँ कोई दूसरा अपूर्व ( नूतन ) अर्थ नहीं कहा गया ॥ ६ ॥ |


स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षत आकाश एव तदोतं च प्रोतं चेति कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ७ ॥

उस याज्ञवल्क्यने कहा, ‘हे गार्गि ! जो द्युलोकसे ऊपर, पृथिवीसे नीचे और जो द्युलोक एवं पृथिवीके मध्यमें है तथा स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं और जिन्हें भूत, वर्तमान और भविष्य—इस प्रकार कहते हैं, वे सब आकाशमें ही ओतप्रोत हैं।’ [गार्गी—] ‘किंतु आकाश किसमें ओत-प्रोत है ?’ ॥ ७ ॥

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७६५

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७६५


| सर्वं यथोक्तं गार्ग्या प्रत्युच्चार्य तमेव पूर्वोक्तमर्थमवधारितवानाकाश एवेति याज्ञवल्क्यः । <br><br> गार्ग्याह—कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्चेति । आकाशमेव तावत् कालत्रयातीतत्वाद् दुर्वाच्यम्, ततोऽपि कष्टतरमक्षरम्, यस्मिन्नाकाशमोतं च प्रोतं च, अतोऽवाच्यमिति कृत्वा, न प्रतिपद्यते सा अप्रतिपत्तिर्नाम निग्रहस्थानं तार्किकसमये; अथावाच्यमपि वक्ष्यति, तथापि विप्रतिपत्तिर्नाम निग्रहस्थानम्; विरुद्धा प्रतिपत्तिर्हि सा, यदवाच्यस्य वदनम्; अतो दुर्वचनं प्रश्नं मन्यते गार्गी ॥ ७ ॥ | गार्गीके पूर्वोक्त वाक्यको पुनः कहकर याज्ञवल्क्यने 'आकाशमें ही ओतप्रोत है' ऐसा कहकर पहले कही हुई बातकी ही पुष्टि की है। <br><br> गार्गीने कहा, 'किंतु आकाश किसमें ओतप्रोत है !' तीनों कालोंसे परे होनेके कारण पहले तो आकाशका ही बतलाना कठिन है, उससे भी क्लिष्टतर अक्षर है, जिसमें कि आकाश ओतप्रोत है; अतः यह समझकर कि वह अवाच्य है उसे कोई अनुभव नहीं कर सकता और अप्रतिपत्ति (अनुभव न होना)-यह तार्किकोंके सिद्धान्तमें निग्रहस्थान माना जाता है; और यदि याज्ञवल्क्यने इस अवाच्य विषयका भी वर्णन किया तो यह विप्रतिपत्तिरूप (विपरीत अनुभवरूप) निग्रहस्थान होगा, क्योंकि अवाच्यको कहना यह विरुद्ध प्रतिपत्ति ही है; इसलिये गार्गी इस प्रश्नका उत्तर बताना कठिन समझती है ॥ ७ ॥ |


याज्ञवल्क्यका उत्तर

तद् दोषद्वयमपि परिजिहीर्षन्नाह—इन (अप्रतिपत्ति और विप्रतिपत्ति) दोनों दोषोंको निवृत्त करनेकी इच्छासे याज्ञवल्क्य कहते हैं—

७६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७६६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

स होवाचैतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिव-
दन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छाय-
मतमोऽवाय्वनाकाशमसङ्गम्रसमगन्धमचक्षुष्कमश्रोत्र-
मवागमनोऽतेजस्कमप्राणममुखममात्रमनन्तरमबाह्यं
न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन ॥ ८ ॥

उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे गार्गि ! उस इस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्ता अक्षर कहते हैं; यह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न बड़ा है, न लाल है, न द्रव है, न छाया है, न तम (अन्धकार) है, न वायु है, न आकाश है, न सङ्ग है, न रस है, न गन्ध है, न नेत्र है, न कान है, न वाणी है, न मन है, न तेज है, न प्राण है, न मुख है, न माप है, उसमें न अन्तर है, न बाहर है, वह कुछ भी नहीं खाता, उसे कोई भी नहीं खाता' ॥ ८ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
स होवाच याज्ञवल्क्यः—एतद् वै तद् यत् पृष्टवत्यसि कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्चेति; किं तत् ? अक्षरम्—यन्न क्षीयते न क्षरतीति वाक्षरम्—तदक्षरं हे गार्गि ब्राह्मणा ब्रह्मविदोऽभि-वदन्ति । ब्राह्मणाभिवदनकथ-नेन—नाहमवाच्यं वक्ष्यामि न च न प्रतिपद्येयम्—इत्येवं दोष-द्वयं परिहरति ।उस याज्ञवल्क्यने कहा—तूने जिसके विषयमें पूछा था कि यह आकाश किसमें ओतप्रोत है ? वह यही है । वह क्या है ? अक्षर, जो क्षीण नहीं होता अथवा क्षरित नहीं होता, वह अक्षर है, सो हे गार्गि ! उसे ब्राह्मण ब्रह्मवेत्ता लोग अक्षर कहते हैं । 'ब्राह्मण कहते हैं' इस कथनके द्वारा—मैं अवाच्यका वर्णन नहीं करूँगा, तथा यह भी नहीं कि मैं उसे नहीं जानता—इस प्रकार सूचित करके दोनों दोषोंका परिहार करते हैं ।

| ब्राह्मण ८ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७६७ |

ब्राह्मण ८ ]शाङ्करभाष्यार्थ७६७
संस्कृतहिन्दी
एवमपाकृते प्रश्ने पुनर्गार्ग्याः प्रतिवचनं द्रष्टव्यम्—ब्रूहि किं तदक्षरम् ? यद् ब्राह्मणा अभिवदन्ति, इत्युक्त आह—अस्थूलं तत् स्थूलादन्यत्, एवं तर्ह्यणु ? अनणु, अस्तु तर्हि ह्रस्वम्, अह्रस्वम्; एवं तर्हि दीर्घम्, नापि दीर्घमदीर्घम्; एवमेतैश्चतुर्भिः परिमाणप्रतिषेधैर्द्रव्यधर्मः प्रतिषिद्धः, न द्रव्यं तदक्षरमित्यर्थः।इस प्रकार प्रश्नका निराकरण हो जानेपर फिर गार्गीका यह प्रश्न समझना चाहिये, 'अच्छा तो बताओ ब्रह्मवेत्ता लोग जिसका वर्णन करते हैं, वह अक्षर क्या है? ऐसा कहे जानेपर याज्ञवल्क्य कहते हैं—वह अस्थूल-स्थूलसे भिन्न है; तो क्या अणु (सूक्ष्म) है ? नहीं, अनणु (सूक्ष्मसे भिन्न) है; अच्छा तो ह्रस्व (छोटा) होगा ?—नहीं, वह ह्रस्व भी नहीं है; ऐसी बात है तो वह दीर्घ हो सकता है ? नहीं, दीर्घ भी नहीं है, अदीर्घ है; इस प्रकार उसके स्थूलत्व (मोटाई) आदि परिमाणका प्रतिषेध करनेवाले इन चार पदोंद्वारा द्रव्य-धर्मका निषेध किया गया है। तात्पर्य यह कि वह अक्षर द्रव्य नहीं है।
अस्तु तर्हि लोहितो गुणः, ततोऽप्यन्यदलोहितम्; आग्नेयो गुणो लोहितः; भवतु तर्ह्यपां स्नेहनम्, न, अस्नेहनम्; अस्तु तर्हिच्छाया, सर्वथाप्यनिर्देश्यत्वात्, छायाया अप्यन्यदच्छायम्; अस्तु तर्हि तमः, अतमः; भवतु वायुस्तर्हि, अवायुः; भवेत्तर्ह्याकाशम्,तो फिर वह लोहित ( लाल ) गुण हो सकता है ? नहीं उससे भी भिन्न अलोहित है; लोहित अग्निका गुण है; अच्छा तो जलका गुण स्नेहन ( द्रवीभाव ) होगा ? नहीं, वह अस्नेह है; तो फिर वह छाया होगा ? नहीं, सर्वथा ही अनिर्देश्य होनेके कारण छायासे भी भिन्न अच्छाय है; तो फिर तम होगा ? नहीं, अतम है; अच्छा तो वह वायु होगा ? नहीं, वह अवायु है; तो फिर आकाश

| ७६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |

७६८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अनाकाशम्; भवतु तर्हि सङ्गात्मकं जतुवत्, असङ्गम्; रसोऽस्तु तर्हि, अरसम्; तथा गन्धोऽस्त्वगन्धम्; अस्तु तर्हि चक्षुः, अचक्षुष्कम्—न हि चक्षुरस्य करणं विद्यतेऽतोऽचक्षुष्कम्; “पश्यत्यचक्षुः” ( श्वेता० उ० ३ । १९ ) इति मन्त्रवर्णात् ।<br><br>तथाश्रोत्रम्; “स शृणोत्यकर्णः” (श्वेता० उ० ३ । १९) इति; भवतु तर्हि वागवाक्; तथाऽमनः; तथाऽतेजस्कम्—अविद्यमानं तेजोऽस्य तदतेजस्कम्; न हि तेजोऽग्न्यादिप्रकाशवदस्य विद्यते; अप्राणम्—आध्यात्मिको वायुः प्रतिषिध्यतेऽप्राणमिति; मुखं तर्हि द्वारं तदमुखम्; अमात्रम्—मीयते येन तन्मात्रम् अमात्रं मात्रारूपं तन्न भवति, न तेन किञ्चिन्मीयते; अस्तु तर्हिच्छिद्रवत्, अनन्तरम्—नास्यान्तरमस्ति;होगा ? नहीं, अनाकाश है; तो फिर जतु ( लाक्षा ) के समान सङ्गवान् होगा ? नहीं, वह असङ्ग है; तो रस होगा ? नहीं, अरस है; अच्छा तो गन्ध होगा ? नहीं, अगन्ध है; तो फिर चक्षु होगा ? नहीं, अचक्षुष्क है; इसके चक्षु इन्द्रिय नहीं है; इसलिये यह अचक्षुष्क है; जैसा कि “यह चक्षुहीन होनेपर भी देखता है” इस मन्त्रवर्णसे प्रमाणित होता है।<br><br>इसी प्रकार “वह कर्णहीन होकर भी सुनता है” इस श्रुतिके अनुसार अश्रोत्र है; तो फिर वाक् होगा ? नहीं, अवाक् है; तथा अमन है और इसी प्रकार अतेजस्क जिसमें तेज नहीं है, ऐसा अतेजस्क, है, क्योंकि अग्नि आदिके प्रकाशके समान इसमें तेज नहीं है; अप्राण—ऐसा कहकर शरीरान्तर्गत वायुका प्रतिषेध किया जाता है, अतः अप्राण है। तो फिर वह मुख यानी द्वार है ? नहीं, वह अमुख है; वह अमात्र है, जिससे माप किया जाय उसे मात्र कहते हैं, वह अमात्र अर्थात् मात्रारूप नहीं है, उससे किसीका भी माप नहीं किया जाता; तो फिर वह छिद्रवान् होगा ? नहीं, वह अनन्तर है, उसमें अन्तर (छिद्र) नहीं है; तो फिर उसका

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७६९

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७६९


| सम्भवेत् तर्हि बहिस्तस्य, अवाह्यम्; अस्तु तर्हि भत्तयितृ तत् न तदश्नाति किञ्चन; भवेत्तर्हि भक्ष्यं कस्यचित्, न तदश्नाति कश्चन; सर्वविशेषणरहितमित्यर्थः; एकमेवाद्वितीयं हि तत् केन किं विशिष्यते ॥ ८ ॥ | बाह्य तो सम्भव हो ही सकता है? नहीं, वह अबाह्य है, अच्छा तो वह भक्षण करनेवाला होगा? नहीं, वह कुछ भी नहीं खाता; तब वह स्वयं ही किसी दूसरेका भक्ष्य हो सकता है? नहीं; उसे कोई भी नहीं खाता; तात्पर्य यह है कि वह समस्त विशेषणोंसे रहित है; वह तो द्वितीयसे रहित अकेला ही है, फिर किससे किसको विशेषित किया जाय? ॥ ८ ॥ |

अनुमानप्रमाणद्वारा अक्षरका निरूपण

| अनेकविशेषणप्रतिषेधप्रयासादस्तित्वं तावदक्षरस्योपगमितं श्रुत्या; तथापि लोकबुद्धिमपेक्ष्या शङ्क्यते यतः, अतोऽस्तित्वायानुमानं प्रमाणमुपन्यस्यति— | श्रुतिने अनेक विशेषणोंके प्रतिषेधरूप प्रयासद्वारा तबतक उस अक्षरका अस्तित्व समझा दिया है; तो भी चूँकि लोकबुद्धिकी अपेक्षासे उसके अस्तित्वमें आशङ्का की जाती है, इसलिये इसके लिये अनुमान-प्रमाणका उल्लेख करती है— |

एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि निमेषा मुहूर्ता अहोरात्राण्यर्धमासा मासा ऋतवः संवत्सरा इति विधृतास्तिष्ठन्त्येतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते श्वेतेभ्यः पर्वतेभ्यः प्रती-

बृ० उ० ४६—