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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १९१

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १९१


| तदुद्धरणे हि पुरुषार्थपरिसमाप्तिः। तथा चोक्तम्—“ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाखः” (२।३।१) इति काठके। गीतासु च “ऊर्ध्वमूलमधःशाखम्” (१५।१) इति। पुराणे च—“ब्रह्मवृक्षः सनातनः” इति। | उस संसारवृक्षके उखड़नेमें ही पुरुषार्थकी परिसमाप्ति होती है। ऐसा ही कठोपनिषदमें “ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाखः”, गीतामें “ऊर्ध्वमूलमधःशाखम्” और पुराणमें “ब्रह्मवृक्षः सनातनः” इत्यादि वाक्योंसे कहा भी है। |

तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियेतासौनामायमिदँ रूप इति तदिदमप्येतर्हि नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतेऽसौनामाऽयमिदँ रूप इति । स एष इह प्रविष्टः । आ नखाग्रेभ्यो यथा क्षुरः क्षुरधानेऽवहितः स्याद्विश्वम्भरो वा विश्वम्भरकुला ये तं न पश्यन्ति । अकृत्स्नो हि स प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति । वदन्वाक्पश्यँश्चक्षुः शृण्वञ्छ्रोत्रं मन्वानो मनस्तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव । स योऽत एकैकमुपास्ते न स वेदाकृत्स्नो ह्येषोऽत एकैकेन भवत्यात्मेत्येवोपासीतात्र ह्येते सर्व एकं भवन्ति । तदेतत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमात्मानेन ह्येतत्सर्वं वेद । यथा ह वै पदेनानुविन्देदेवं कीर्तिँ श्लोकं विन्दते य एवं वेद ॥७॥

वह यह जगत् उस समय (उत्पत्तिसे पूर्व) अव्याकृत था। वह नाम-रूपके योगसे व्यक्त हुआ; अर्थात् 'यह इस नाम और इस रूपवाला है' इस प्रकार व्यक्त हुआ। अतः इस समय भी यह अव्याकृत वस्तु 'इस नाम और इस रूपवाली है' इस प्रकार व्यक्त होती है। वह यह (व्याकर्ता) इस (शरीर) में नखाग्रपर्यन्त प्रवेश किये हुए है, जिस

१९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

१९२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

प्रकार कि छुरा छुरेके घरमें छिपा रहता है अथवा विश्वका भरण करने-वाला अग्नि अग्निके आश्रय (काष्ठादि) में गुप्त रहता है। परंतु उसे लोग देख नहीं सकते। वह असम्पूर्ण है; प्राणनक्रियाके कारण ही वह प्राण है, बोलनेके कारण वाक् है, देखनेके कारण चक्षु है, सुननेके कारण श्रोत्र है और मनन करनेके कारण मन है। ये इसके कर्मानुसारी नाम ही हैं। अतः इनमेंसे जो एक-एककी उपासना करता है वह नहीं जानता। वह असम्पूर्ण ही है। वह एक-एक विशेषणसे ही युक्त होता है। अतः 'आत्मा है' इस प्रकार ही उसकी उपासना करे, क्योंकि इस (आत्मा) में ही वे सब एक हो जाते हैं। यह जो आत्मा है वही इस सबका प्राप्तव्य है, क्योंकि यह आत्मा है, इस आत्माके ज्ञात होनेसे ही इस सब जगत्‌को जानता है। जिस प्रकार पदों (खुर आदिके चिह्नों) द्वारा [खोये हुए पशुको] प्राप्त कर लेते हैं उसी प्रकार जो ऐसा जानता है वह इसके द्वारा यश और इष्ट पुरुषोंका सहवास प्राप्त करता है ॥ ७ ॥

संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्)हिन्दी अनुवाद
तद्धेदं तदिति बीजावस्थं जगत्प्रागुत्पत्तेस्तर्हि तस्मिन्काले; परोक्षत्वात्सर्वनाम्नाप्रत्यक्षाभिधानेनाभिधीयते, भूतकालसम्बन्धित्वादव्याकृतभाविनो जगतः; सुखग्रहणार्थमैतिह्यप्रयोगो हशब्दः। एवं ह तदा आसीदित्युक्यमाने सुखं तां परोक्षामपि जगतो बीजा-'तद्धेदम्'—तत् अर्थात् उत्पत्तिसे पूर्व बीजरूपमें स्थित जगत् 'तर्हि' उस समय—यहाँ अव्याकृतसे होनेवाला जगत् भूतकालसे सम्बद्ध होनेके कारण परोक्ष होनेसे 'तत्' और 'इदम्' इन दो सर्वनामोंद्वारा परोक्षरूपसे कहा गया है। तथा 'ह' इस ऐतिह्यवाचक अव्ययका प्रयोग उस (परोक्ष जगत्) का सुगमतासे ग्रहण (बोध) करानेके लिये किया गया है। अर्थात् 'एवं ह तदा आसीत्'¹—इस प्रकार कहनेपर, परोक्ष होनेपर भी उस जगत्‌की बीजावस्थाको श्रोता अनायास ही

१. उस समय वह ऐसा था।

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १९३

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १९३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
वस्थां प्रतिपद्यते, युधिष्ठिरो ह किल राजासीदित्युकते यद्वत् । इदमिति व्याकृतनामरूपात्मकं साध्यसाधनलक्षणं यथावर्णितमभिधीयते । तदिदंशब्दयोः परोक्षाप्रत्यक्षावस्थजगद्वाचकयोः सामानाधिकरण्यादेकत्वमेव परोक्षाप्रत्यक्षावस्थस्य जगतोऽवगम्यते । तदेवेदमिदमेव च तद्व्याकृतमासीदिति । अथैवं सति नासत उत्पत्तिर्न सतो विनाशः कार्यस्येत्यवधृतं भवति ।ग्रहण कर लेता है, जैसे 'यु^१धिष्ठिरो ह किल राजासीद्' ऐसा कहनेपर [युधिष्ठिरको] । 'इदम्' इस शब्दसे जिसके नाम और रूप अभिव्यक्त हो गये हैं वह साध्यसाधनरूप पूर्वोक्त जगत् ही कहा जाता है । [ इस प्रकार ] परोक्ष और प्रत्यक्षरूपसे स्थित जगत्‌के वाचक 'तत् और 'इदम्' शब्दोंका सामानाधिकरण्य होनेसे प्रत्यक्ष और परोक्षावस्थ जगत्की एकता ज्ञात होती है । वह ( अव्याकृत ) ही यह जगत् है और यही वह अव्याकृत था । ऐसा होनेसे यह निश्चय होता है कि असत्‌की उत्पत्ति नहीं हो सकती और सत्कार्यका नाश नहीं हो सकता ।
तदेवम्भूतं जगदव्याकृतं सन्नामरूपाभ्यामेव नाम्ना रूपेणैव च व्याक्रियत । व्याक्रियेतेति कर्मकर्तृप्रयोगात्तत्स्वयमेवात्मैव व्याक्रियत, वि आ अक्रियत, विस्पष्टं नामरूपविशेषावधारणमर्यादं व्यक्तीभावमापद्यत सामर्थ्या-वह इस प्रकारका जगत् अव्याकृत रहकर 'नामरूपाभ्याम्—नाम और रूपके द्वारा ही व्याकृत हुआ । 'व्याक्रियत' ऐसा ^२कर्मकर्तृ प्रयोग होनेके कारण [ यह निश्चय होता है कि ] वह आत्मा ^३सामर्थ्यसे आक्षिप्त हुए नियन्ता, कर्ता और साधनरूप क्रियाके निमित्तोंवाले जगत्‌के रूपमें स्वयं ही 'व्याक्रियत'--

१. प्रसिद्ध है कि युधिष्ठिरनामक एक राजा हुआ था ।
२. जहाँ कर्म ही कर्ताके रूपमें विवक्षित हो वह कर्मकर्ता कहलाता है ।
३. कारणके बिना कार्यकी उत्पत्ति होनी असम्भव है—इस सामर्थ्यसे

बृ० उ० १३—

१९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

१९४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| दाक्षिप्तमन्नियन्तृकर्तृसाधनक्रिया-<br><br>निमित्तम् ।<br><br>असौनामाति सर्वनाम्नाविशेष-<br><br>भिधानेन नाममात्रं व्यपदिशति।<br><br>देवदत्तो यज्ञदत्त इति वा नामास्य<br><br>इत्यसौनामायम् । तथेदमिति<br><br>शुक्लकृष्णादीनामविशेषः । इदं<br><br>शुक्लमिदं कृष्णं वा रूपमस्येतीदं-<br><br>रूपः । तदिदमव्याकृतं वस्तु<br><br>एतर्ह्येतस्मिन्नपि काले नामरूपा-<br><br>भ्यामेव व्याक्रियते असौनामा-<br><br>यमिदंरूप इति ।<br><br>यदर्थः सर्वशास्त्रारम्भः, यस्मि-<br><br>न्नविद्यया स्वाभाविक्या कर्तृक्रिया-<br><br>फलाध्यारोपणा कृता, यः कारणं<br><br>सर्वस्य जगतः, यदात्मके नामरूपे<br><br>सलिलादिव स्वच्छान्मलमिवफेन-<br><br>मव्याकृते व्याक्रियेते, यश्च ताभ्यां | वि आ अक्रियत अर्थात् विशिष्टरूपसे नामरूपविशेषके निश्चयकी मर्यादासे युक्त व्यक्तीभावको प्राप्त हुआ ।<br><br>‘असौनामा’ इस पदके ‘असौ’ इस सर्वनामसे किसी प्रकारका विशेष न बतलाकर श्रुति नाममात्रका प्रतिपादन करती है—देवदत्त या यज्ञदत्त इत्यादि इसके नाम हैं, इसलिये यह पुरुष ‘असौनामा’ है। तथा ‘इदम्’ यह शुक्ल-कृष्णादि वर्णोंका सामान्य वाचक है—यह ‘शुक्ल’ अथवा यह ‘कृष्ण’ इसका रूप है इसलिये यह इदंरूप है। इसीसे यह अव्याकृत वस्तु इस समय भी नाम-रूपके द्वारा ही ‘इस नामवाली है’, ‘इस रूपवाली है’ इस प्रकार व्यक्त होती है।<br><br>जिसके लिये सारे शास्त्रका आरम्भ हुआ है, जिसमें स्वाभाविकी अविद्यासे कर्ता, क्रिया और फलका आरोप किया गया है, जो सारे जगत्का कारण है, जिसके स्वरूपभूत नाम और रूप स्वच्छ जलसे मलरूप फेनके समान अव्याकृत-रूपसे स्थित हुए ही व्याकृत होते |


जिनका आक्षेप करना आवश्यक है उन नियन्ता—प्रेरक, कर्त्ता—उत्पत्तिका अनुकूल शरीर एवं इन्द्रियादिका व्यापार करनेवाला तथा साधन—इन्द्रियव्यापार इन क्रियाके निमित्तोंसे युक्त होकर व्यक्त हुआ ।

| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १९५ |

ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ१९५

| नामरूपाभ्यां विलक्षणः स्वतः नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः, स एषोऽव्याकृते आत्मभूते नामरूपे व्याकुर्वन्ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु देहेष्विह कर्मफलाश्रयेष्वशनायादिमत्सु प्रविष्टः । | हैं और जो उन नामरूपसे विलक्षण स्वयं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वरूप है वह यह [ आत्मा ] अव्याकृत एवं आत्मभूत नामरूपोंको व्यक्त करता हुआ ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त इन कर्मफलके आश्रयभूत एवं क्षुधादि-मान् समस्त देहोंमें प्रवेश किये हुए है । | | [व्याकृतप्रपञ्चे परमात्मानुप्रवेश-मीमांसा]<br>ननु अव्याकृतं स्वयमेव व्याक्रियतेत्युक्तम्, कथमिदानीम् उच्यते, पर एव तु आत्माव्याकृतं व्याकुर्वन्निह प्रविष्ट इति । | **शङ्का—**किंतु पहले यह कहा गया है कि अव्याकृत स्वयं ही व्याकृत होता है । अब यह कैसे कहा जाता है कि परमात्मा ही अव्याकृतको व्यक्त करता हुआ इसमें प्रविष्ट है । | | नैष दोषः, परस्याप्यात्मनोऽव्याकृतजगदात्मत्वेन विवक्षितत्वात् । आक्षिप्तनियन्तृकर्तृक्रियानिमित्तं हि जगदव्याकृतं व्याक्रियेतेत्यवोचाम । इदंशब्दसामानाधिकरण्याच्चाव्याकृतशब्दस्य ।<br><br>यथेदं जगन्नियन्त्राद्यनेककारकनिमित्तादिविशेषवद्व्याकृतम्, | **समाधान—**यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि यहाँ परमात्मा ही अव्याकृत जगद्रूपसे विवक्षित है । हमने कहा था कि [ सामर्थ्यसे ] आक्षिप्त हुए नियन्ता और कर्ता [ एवं साधन ] रूप क्रियाके निमित्तोंसे युक्त अव्याकृत जगत् ही व्याकृत होता है । इसके सिवा 'अव्याकृत' शब्दका 'इदम्' शब्दके साथ सामानाधिकरण्य होनेसे भी यही सिद्ध होता है ।<br><br>जिस प्रकार यह व्याकृत जगत् प्रेरक आदि अनेक कारणरूप निमित्तादि विशेषसे युक्त है उसी प्रकार वह |

१९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

१९६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| तथा अपरि­त्यक्तान्यतमविशेषवदेव तद्व्याकृतम्। व्याकृताव्याकृतमात्रं तु विशेषः। | अव्याकृत भी उनमेंसे किसी विशेषका त्याग न करके उनसे युक्त ही है। उनमें व्याकृत और अव्याकृत होनेका ही अन्तर है। | | दृष्टश्च लोके विवक्षातः शब्दप्रयोगो ग्राम आगतो ग्रामः शून्य इति । कदाचिद् ग्रामशब्देन निवासमात्रविवक्षायां ग्रामः शून्य इति शब्दप्रयोगो भवति, कदाचिन्नितवासिजनविवक्षायां ग्राम आगत इति, कदाचिदुभयविवक्षायामपि ग्रामशब्दप्रयोगो भवति ग्रामं च न प्रविशेदिति यथा । तद्वदिहापि जगदिदं व्याकृतमव्याकृतं चेत्यभेदविवक्षायाम् आत्मानात्मनोर्भवति व्यपदेशः । तथेद्ं जगदुत्पत्तिविनाशात्मकमिति केवलजगद्व्यपदेशः। तथा “महानज आत्मा” (बृ० उ० ४ । ४ । २२) “अस्थूलोऽनणुः” “स एष नेति नेति” (बृ० उ० ३ । ९ । २६) इत्यादि केवलात्मव्यपदेशः । | लोकमें भी विवक्षाके अनुसार शब्दका प्रयोग होता देखा गया है जैसे ‘गाँव आ गया’, ‘गाँव सूना है’ इन वाक्योंमें कभी तो ‘गाँव’ शब्दसे निवासस्थानमात्र बतलाना अभीष्ट होनेपर ‘गाँव सूना है’ ऐसा शब्द प्रयोग होता है और कभी गाँवमें रहनेवाले लोगोंकी विवक्षासे ‘गाँव आ गया’ ऐसा प्रयोग होता है। तथा कभी दोनोंकी विवक्षासे भी ‘गाँव’ शब्दका प्रयोग होता है जैसे ‘गाँवमें प्रवेश न करे’ इस वाक्यमें। इसी प्रकार यहाँ भी ‘यह जगत् व्याकृत और अव्याकृत है’ इस वाक्यमें अभेदकी विवक्षासे आत्मा और अनात्माका निर्देश हुआ है तथा ‘यह जगत् उत्पत्ति-विनाशात्मक है’ इस वाक्यमें केवल जगत्का व्यपदेश है। इसी तरह “यह महान् अजन्मा आत्मा है”, “यह न स्थूल है, न अणु (सूक्ष्म)”, “वह यह आत्मा ऐसा (कारणरूप) नहीं है, ऐसा (कार्यरूप) नहीं है” इत्यादि श्रुतियोंमें केवल आत्माका व्यपदेश है। |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १९७

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १९७


ननु परेण व्याकर्त्रा व्याकृतं सर्वतो व्याप्तं सर्वदा जगत्, स कथमिह प्रविष्टः परिकल्प्यते ? अप्रविष्टो हि देशः परिच्छिन्नेन प्रवेष्टुं शक्यते, यथा पुरुषेण ग्रामादिः । नाकाशेन किञ्चिन्नित्यप्रविष्टत्वात् ।**शङ्का—**किंतु जगत्को व्यक्त करनेवाले परमात्माने उसे व्यक्त कर सर्वदा सब ओरसे व्याप्त कर रखा है; फिर 'उसने इसमें प्रवेश किया' ऐसी कल्पना क्यों की जाती है ? किसी परिच्छिन्न पदार्थद्वारा अपनेसे अप्रविष्ट देशमें ही प्रवेश किया जा सकता है, जैसे पुरुषसे ग्रामादि। आकाशके द्वारा किसी भी पदार्थमें प्रवेश नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह तो सबमें नित्य प्रविष्ट ही है।
पाषाणसर्पादिवद्धर्मान्तरेणेति चेत् । अथापि स्यात्, न पर आत्मा स्वेनैव रूपेण प्रविवेश, किं तर्हि ? तत्स्थ एव धर्मान्तरेणोपजायते, तेन प्रविष्ट इत्युपचर्यते । यथा पाषाणे सहजोऽन्तःस्थः सर्पो नालिकेरे वा तोयम् ।**सिद्धान्ती—**किंतु यदि पाषाण और सर्पादिके समान उसने धर्मान्तररूपसे प्रवेश किया हो तो ? अर्थात् ऐसा भी हो सकता है कि परमात्माने अपने ही रूपसे प्रवेश नहीं किया, तो फिर क्या हुआ ? वह उसमें स्थित हुआ ही धर्मान्तररूपसे उत्पन्न हो गया, इसीसे 'उसने प्रवेश किया' ऐसा उपचार होता है, जिस प्रकार कि पत्थरमें उसके भीतर रहनेवाला एवं उसके साथ उत्पन्न हुआ सर्प<sup></sup> अथवा नारियलमें जल।
न, “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्” (तै० उ० २ । ६ । १)**पूर्व०—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि “उसे रचकर वह उसीमें अनुप्रविष्ट हो गया”—ऐसी श्रुति है।

१. पाषाणमें स्थित जो पञ्चमहाभूत हैं उन्हींका परिणाम होनेसे सर्पको सहज (उसके साथ उत्पन्न होनेवाला) कहा है।

| १९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |

१९८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
संस्कृतहिन्दी
इति श्रुतेः। यः स्रष्टा स भावान्तरमनापन्न एव कार्यं सृष्ट्वा पश्चात्प्राविशदिति हि श्रूयते। यथा भुक्त्वा गच्छतीति भुजिगमिक्रिययोः पूर्वापरकालयोरितरेतरविच्छेदोऽविशिष्टश्च कर्ता तद्वदिहापि स्यात्। न तु तत्स्थस्यैव भावान्तरोपजनन एतत्सम्भवति। न च स्थानान्तरेण वियुज्य स्थानान्तरसंयोगलक्षणः प्रवेशो निरवयवस्यापरिच्छिन्नस्य दृष्टः।जो स्रष्टा था उसने भावान्तरको प्राप्त हुए बिना ही कार्यकी रचना कर पीछेसे उसमें प्रवेश किया—ऐसा श्रुतिमें कहा गया है। जिस प्रकार 'भोजन करके जाता है' इस वाक्यमें पूर्वापरकालमें होनेवाली भोजन और गमनक्रियाओंका परस्पर विभेद है और उनका कर्ता अलग-अलग नहीं है, उसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिये। यह उसमें स्थितका ही भावान्तरको प्राप्त होनेपर सम्भव नहीं है। तथा जो निरवयव और अपरिच्छिन्न होता है उसका एक स्थानसे वियुक्त होकर दूसरे स्थानसे संयुक्त होना-रूप प्रवेश नहीं देखा जाता।
सावयव एव प्रवेशश्रवणादिति चेत् ?सिद्धान्ती—उसका प्रवेश सुना गया है, इसलिये यदि वह सावयव ही हो तो?
न; “दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः” (मु० उ० २।१।२) “निष्कलं निष्क्रियम्” (श्वे० उ० ६।१९) इत्यादिश्रुतिभ्यः, सर्वव्यपदेश्यधर्मविशेषप्रतिषेधश्रुतिभ्यश्च।पूर्व०—नहीं; “शरीररूप पुरमें रहनेवाला आत्मा दिव्य और अमूर्त है” “वह निरवयव और निष्क्रिय है” इत्यादि श्रुतियोंसे तथा सब प्रकारके व्यपदेश्य धर्मोंका निषेध करनेवाली श्रुतियोंसे ऐसा सिद्ध नहीं होता।
प्रतिबिम्बप्रवेशवदिति चेत् ?सिद्धान्ती—[दर्पणादिमें] प्रतिबिम्बके प्रवेशके समान उसका प्रवेश हो तो?

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १९९

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १९९


न, वस्त्वन्तरेण विप्रकर्षानुपपत्तेः ।पूर्व०—नहीं, क्योंकि वस्त्वन्तररूपसे उसका दूरस्थ होना सम्भव नहीं ^१ ।
द्रव्ये गुणप्रवेशवदिति चेत् ?सिद्धान्ती—द्रव्यमें गुणके प्रवेशके समान उसका प्रवेश माना जाय तो ?
न, अनाश्रितत्वात् । नित्यपरतन्त्रस्यैवाश्रितस्य गुणस्य द्रव्ये प्रवेश उपचर्यते । न तु ब्रह्मणः स्वातन्त्र्यश्रवणात्तथा प्रवेश उपपद्यते ।पूर्व०—नहीं, क्योंकि वह किसीके आश्रित नहीं है । जो नित्यपरतन्त्र और पराश्रित है उस गुणके ही द्रव्यमें प्रवेशका उपचार किया जाता है। ब्रह्मका उस प्रकार प्रवेश करना सम्भव नहीं है; क्योंकि उसका तो स्वातन्त्र्य सुना गया है।
फले बीजवदिति चेत् ?सिद्धान्ती—यदि वह [ प्रवेश ] फलमें बीजके समान हो तो ?
न; सावयवत्ववृद्धिक्षयोत्पत्तिविनाशादिधर्मवत्त्वप्रसङ्गात् । न चैवंधर्मवत्त्वं ब्रह्मणः “अजोऽजरः” इत्यादि श्रुतिन्यायविरोधात् ।पूर्व०—नहीं, ऐसा माननेसे उसके सावयवत्व तथा वृद्धि, क्षय एवं उत्पत्ति-विनाशादि धर्मयुक्त होनेका प्रसंग होगा । किंतु ब्रह्मका ऐसे धर्मोंवाला होना सम्भव नहीं है; क्योंकि ऐसा माननेपर “वह अजन्मा और अजर है” इत्यादि श्रुति और युक्तिसे विरोध उपस्थित होगा ।
तस्मादन्य एव संसारी परिच्छिन्न इह प्रविष्ट इति चेत् ?अतः यदि ऐसा मानें कि परमात्मासे भिन्न किसी संसारीने ही इसमें प्रवेश किया है तो ?

^१ क्योंकि प्रतिबिम्ब तभी पड़ता है जब कोई वस्तु प्रतिबिम्बके आश्रयभूत जल या दर्पणसे दूरस्थ हो । ब्रह्म व्यापक है, इसलिये उसका प्रतिबिम्बरूपसे प्रवेश नहीं हो सकता ।

२०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

२००बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
न; “सेयं देवतैक्षत” (छा० उ० ६।३।२) इत्यारभ्य “नामरूपे व्याकरवाणि” (६।२।३) इति तस्या एव प्रवेशव्याकरणकर्तृत्वश्रुतेः। तथा “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्” (तै० उ० २।६।१) “स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत” (ऐ० उ० ३।१२) “सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन्यदास्ते” “त्वं कुमार उत वा कुमारी त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि” (श्वे० उ० ४।३) “पुरश्चक्रे द्विपदः” (बृ० उ० २।५।१८) “रूपं रूपम्” (क० उ० २।२।९) इति च मन्त्रवर्णान्न परादन्यस्य प्रवेशः।सिद्धान्ती—ऐसा मानना ठीक नहीं; क्योंकि “उस इस देवताने ईक्षण किया” यहाँसे लेकर “मैं नाम-रूपोंकी अभिव्यक्ति करूँ” यहाँतक श्रुतिसे उसीका प्रवेश और अभिव्यक्त करना सिद्ध होता है। तथा “उसे रचकर वह पीछेसे उसीमें प्रविष्ट हो गया”, “वह इसी प्रकार मस्तकके अन्तिम भागको विदीर्ण कर उसके द्वारा प्रवेश कर गया”, “वह धीर समस्त रूपोंको जानकर उनके नाम रख उनके द्वारा बोलता रहता है”, “तू कुमार है, तू ही कुमारी है और तू ही वृद्ध होकर लाठीके सहारे चलता है”, “उसने दो चरणवाले शरीर बनाये”, “रूप-रूपके [अनुरूप हो गया]” इत्यादि मन्त्रवर्णोंसे भी परमात्मासे भिन्न किसी अन्यका प्रवेश सिद्ध नहीं होता।
प्रविष्टानामितरेतरभेदात्परानेकत्वमिति चेत् ?पूर्व०—किंतु प्रविष्ट होनेवाले पदार्थोंका एक दूसरेसे भेद हुआ करता है, इसलिये परमात्माका अनेकत्व प्राप्त होता है।
न, “एको देवो बहुधा सन्निविष्टः” “एकः सन्बहुधा विचचार” “त्वमेकोऽसि बहूननुप्रविष्टः” “एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा” (श्वे०सिद्धान्ती—नहीं, “एक ही देव अनेक प्रकारसे प्रविष्ट हुआ”, “एक होकर भी उसने अनेक रूपसे संचार किया”, “तुम एक ही अनेकोंमें अनुप्रविष्ट हो”, “सर्वभूतोंमें निहित एक देव है, वह सबमें व्याप्त और

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०१

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०१


मूल संस्कृतहिन्दी भाष्यार्थ
उ० ६।११) इत्यादिश्रुतिभ्यः।समस्त भूतोंका अन्तरात्मा है" इत्यादि श्रुतियोंसे ऐसा सिद्ध नहीं होता।
प्रवेश उपपद्यते नोपपद्यत इति तिष्ठतु तावत्। प्रविष्टानां संसारित्वात्तदनन्यत्वाच्च परस्य संसारित्वमिति चेत् ?पूर्व०—उत्पन्न किये हुए कार्यवर्गके भीतर परमात्माका प्रवेश होना सम्भव है अथवा नहीं है—यह प्रश्न तबतक अलग रहे, किंतु जो प्रविष्ट हैं वे संसारी हैं और उससे अभिन्न हैं, इसलिये परमात्माका भी संसारी होना प्राप्त होता है।
न, अशनायाद्यत्ययश्रुतेः ।<br><br>सुखित्वदुःखित्वादिदर्शनान्नेति चेन्न, "न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः" (क० उ० २।२।११) इति श्रुतेः ।सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि परमात्माको क्षुधादि सांसारिक धर्मोंसे परे बतानेवाली श्रुति है। यदि कहो कि उसको सुखी-दुःखी होना देखा जाता है, इसलिये यह कथन ठीक नहीं है तो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि "सबसे अलग रहनेवाला परमात्मा लौकिक दुःखसे लिप्त नहीं होता" ऐसी श्रुति है।
प्रत्यक्षादिविरोधादयुक्तमिति चेत् ?पूर्व०—किंतु प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे इस कथनका विरोध होनेके कारण यह मान्य नहीं है।
न, उपाध्याश्रयजनितविशेषविषयत्वात्प्रत्यक्षादेः। "न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येः" (बृ० उ० ३।४।२) "विज्ञातारमरे केन विजानीयात्" (बृ० उ० ४।५।१९) "अविज्ञातं विज्ञातृ" (बृ०सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो, क्योंकि प्रत्यक्षादि तो उपाधिके आश्रयसे होनेवाले विशेषको ही विषय करनेवाले होते हैं। "दृष्टिके द्रष्टाको मत देखो," "अरे, विज्ञाताको किसके द्वारा जाने?," "वह स्वयं अविज्ञात रहकर दूसरोंको जाननेवाला है"

२०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२०२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
संस्कृत-मूलहिन्दी-अनुवाद
उ० ३ । ८ । ११) इत्यादि श्रुतिभ्यो नात्मविषयं विज्ञानम् । किं तर्हि ? बुद्ध्याद्युपाध्यात्मप्रतिच्छायाविषयमेव सुखितोऽहं दुःखितोऽहमित्येवमादि प्रत्यक्षविज्ञानम् ।इत्यादि श्रुतियोंसे [ प्रमाणजनित ] ज्ञान आत्माको विषय करनेवाला नहीं है । तो फिर कैसा है? 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ' इत्यादि प्रत्यक्ष ज्ञान बुद्धि आदि उपाधिमें पड़नेवाले आत्माके प्रतिबिम्बको ही विषय करनेवाला है ।
अयमहंमिति विषयेण विषयिणः सामानाधिकरण्योपचारात्, "नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ" (बृ० उ० ३ । ८ । ११) इत्यन्यात्मप्रतिषेधाच्च, देहावयवविशेष्यत्वाच्च सुखदुःखयोर्विषयधर्मत्वम् ।इसके सिवा 'यह (देह) मैं हूँ' इस प्रकार विषयके साथ विषयीके सामानाधिकरण्यका उपचार होनेसे "इससे भिन्न कोई अन्य द्रष्टा नहीं है" इस श्रुति-वाक्यसे अन्य आत्माका निषेध होनेसे तथा देहके अवयवोंसे विशेष्य होनेके कारण सुख-दुःखकी विषयधर्मता सिद्ध होती है ।¹
"आत्मनस्तु कामाय" (बृ० उ० २ । ४ । ५) इत्यात्मार्थत्वश्रुतेरयुक्त इति चेन्न, "यत्र वा अन्यदिव स्यात्" इत्यविद्याविषया-यदि कहो कि "आत्माके लिये ही सब प्रिय होते हैं" ऐसी आत्मार्थत्वको प्रकट करनेवाली श्रुति होनेसे ऐसा कथन ठीक नहीं है तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि "जहाँ कोई अन्य-सा होता है" इस श्रुतिके अनुसार उसकी अविद्याजनित

१ तात्पर्य यह है कि अज्ञानवश देहके साथ आत्माका तादात्म्य होनेसे देहके सुख-दुःखादिका आत्मामें उपचार किया जाता है, आत्मासे भिन्न कोई और द्रष्टा नहीं है और द्रष्टा सर्वथा शुद्ध होता है, इसलिये आत्मामें सुख-दुःखादि धर्म नहीं रह सकते तथा सुख-दुःखकी जो प्रतीति होती है उसका आश्रय भी कोई-न-कोई देहका अवयव ही होता है, जैसे शिरःपीडा, उदरशूलादि । इससे भी वे अनात्मगत ही सिद्ध होते हैं ।

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २०३

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २०३


| त्मार्थत्वाभ्युपगमात् “तत्केन कं पश्येत्” (बृ० उ० ४। ५। १५) “नेह नानास्ति किञ्चन” (बृ० उ० ४। ४। १९) “तत्र को मोहःकः शोक एकत्वमनुपश्यतः” (ईशा० ७) इत्यादिना विद्याविषये तत्प्रतिषेधाच्च नात्मधर्मत्वम् । | आत्मार्थता मानी जाती है; “वहाँ कौन किसके द्वारा देखे,” “वहाँ नाना कुछ नहीं है,” “वहाँ एकत्व देखनेवालेको क्या मोह और क्या शोक हो सकता है?” इत्यादि वाक्योंसे ज्ञानदृष्टिमें तो उनका निषेध होनेके कारण आत्मधर्मत्व होना सम्भव नहीं है। | | तार्किकसमयविरोधादयुक्तमिति चेत् ? | पूर्व०-किंतु नैयायिकोंके सिद्धान्तसे विरोध होनेके कारण यह (आत्माका असंसारित्व) अयुक्त है।¹ | | न; युक्त्याप्यात्मनो दुःखित्वानुपपत्तेः। न हि दुःखेन प्रत्यक्षविषयेण आत्मनो विशेष्यत्वम् प्रत्यक्षाविषयत्वात्। आकाशस्य शब्दगुणवत्त्ववदात्मनो दुःखित्वमिति चेन्न, एकप्रत्ययविषयत्वानुपपत्तेः। न हि सुखग्राहकेण प्रत्यक्षविषयेण प्रत्ययेन नित्यानुमेयस्यात्मनो विषयीकरणमुपपद्यते | सिद्धान्ती-ऐसा मत कहो, क्योंकि युक्तिसे भी आत्माका दुःखी होना सिद्ध नहीं हो सकता। प्रत्यक्षके विषयभूत दुःखसे आत्मा विशिष्ट नहीं हो सकता; क्योंकि वह स्वयं प्रत्यक्षका अविषय है। यदि कहो कि जिस प्रकार आकाश शब्दगुणवाला माना जाता है उसी प्रकार आत्माका दुःखित्व भी सिद्ध हो सकता है तो यह भी होना सम्भव नहीं, क्योंकि उसका एक ज्ञानका विषय होना असम्भव है। सुखको ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्षविषयक ज्ञानके द्वारा नित्य अनुमेय आत्माको विषय करना सम्भव नहीं है। यदि वह उसे |


१ क्योंकि नैयायिकोंके सिद्धान्तमें आत्मा बुद्धि आदि चौबीस गुणोंवाला है।

२०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२०४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| तस्य च विषयीकरणे आत्मन एकत्वाद्दिषय्यभावप्रसङ्गः । | विषय कर ले तो विषयीके अभावका प्रसङ्ग उपस्थित हो जाय, क्योंकि आत्मा तो एक ही है।^१ | | एकस्यैव विषयविषयित्वं दीपवदिति चेत् ? | पूर्व०—दीपकके समान एकका ही विषय और विषयी भी होना सम्भव है। | | न; युगपदसम्भवात्, आत्मन्यंशानुपपत्तेश्च। एतेन विज्ञानस्य ग्राह्यग्राहकत्वं प्रत्युक्तम् । | सिद्धान्ती—नहीं, एक साथ ऐसा होना सम्भव नहीं है। इसके सिवा आत्मामें अंश होना सम्भव न होनेसे भी यही सिद्ध होता है। इससे विज्ञानका ग्राह्य-ग्राहक उभयरूप होना भी खण्डित हो जाता है। | | प्रत्यक्षानुमानविषययोश्च दुःखआत्मनोर्गुणगुणित्वे नानुमानम् । दुःखस्य नित्यमेव प्रत्यक्षविषयत्वात्, रूपादिसामानाधिकरण्याच्च । | प्रत्यक्ष प्रमाणके विषय दुःख और अनुमान प्रमाणके विषय आत्माके गुण और गुणी होनेमें अनुमान प्रमाण भी नहीं हो सकता; क्योंकि दुःख सर्वदा प्रत्यक्षका ही विषय है तथा रूपादिसे उसका सामानाधिकरण्य है। | | मनःसंयोगजत्वेऽप्यात्मनि दुःखस्य सावयवत्वविक्रियावत्त्वानित्यत्वप्रसङ्गात् । न ह्यविकृत्य संयोगि द्रव्यं गुणः कश्चिदुपयन्न- | आत्मामें दुःखको मनः संयोगजनित माना जाय तो भी आत्माके सावयवत्व, विकारित्व एवं अनित्यत्वका प्रसङ्ग उपस्थित होता है, क्योंकि संयोगी द्रव्यको विकृत किये बिना कोई गुण |


१ इसलिये यदि वह प्रत्यक्षविषयक ज्ञानका विषय हो जायगा तो विषयी कौन होगा ? क्योंकि एक ही पदार्थ एक ही ज्ञानका विषय और विषयी दोनों नहीं हो सकता।

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २०५

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २०५


संस्कृत (मूल)हिन्दी अनुवाद
पयन्वा दृष्टः क्वचित् । न च निरवयवं विक्रियमाणं दृष्टं क्वचिदनित्यगुणाश्रयं वा नित्यम् । न चाकाश आगमवादिभिर्नित्यतयाभ्युपगम्यते, न चान्यो दृष्टान्तोऽस्ति ।कहीं आता-जाता नहीं देखा गया । तथा निरवयव वस्तुको कहीं विकृत होते और नित्य वस्तुको अनित्य गुणोंका आश्रय होते नहीं देखा गया । आगमोक्तमतावलम्बिन्होंने आकाशको तो नित्य नहीं माना^१ और इसके सिवा कोई दूसरा दृष्टान्त नहीं है ।
विक्रियमाणमपि तत्प्रत्ययान्निवृत्तेर्नित्यमेवेति चेत् ?पूर्व०— विकृत होनेपर भी 'यह वही है' ऐसा ज्ञान निवृत्त न होनेके कारण वह नित्य ही है—ऐसा मानें तो ?^२
न, द्रव्यस्य अवयवान्यथात्वव्यतिरेकेण विक्रियानुपपत्तेः ।सिद्धान्ती— ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि द्रव्य पदार्थके अवयवोंमें परिवर्तन हुए बिना विकार होना सम्भव नहीं है ।
सावयवत्वेऽपि नित्यत्वमिति चेन्न;यदि कहो कि सावयव होनेपर भी वह नित्य है^३ तो ऐसा हो नहीं सकता,
सावयवस्यावयवसंयोगपूर्वकत्वे सति विभागोपपत्तेः ।क्योंकि सावयव पदार्थ अवयवसंयोगपूर्वक उत्पन्न होनेके कारण उसके अवयवोंका विभाग होना सम्भव है ।
वज्रादिष्वदर्शनान्नेति चेन्न, अनुमेयत्वात्सं-यदि कहो कि वज्रादिमें तो ऐसा नहीं देखा जाता^४ तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि उनकी अवयवसंयोग-

१. क्योंकि "आत्मन आकाशः सम्भूतः" ( तै० उ० २ । १ ) इस श्रुतिसे आत्मासे आकाशकी उत्पत्ति सिद्ध होती है और उत्पन्न होनेवाला पदार्थ नित्य नहीं हो सकता ।
२. यह परिणामवादियोंका मत है ।
३. ऐसा जैनी लोग मानते हैं ।
४. अर्थात् वज्रादि ( बिजली आदि ) सावयव होनेपर भी अवयवसंयोगपूर्वक उत्पन्न होते हों, ऐसा नहीं देखा जाता ।

| २०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |

२०६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| योगपूर्वत्वस्य। तस्मान्नात्मनो दुःखाद्यनित्यगुणाश्रयत्वोपपत्तिः। | पूर्वकत्वका अनुमान किया जा सकता है। अतः आत्माका अनित्य गुणोंका आश्रय होना सम्भव नहीं है। | | परस्यादुःखित्वेऽन्यस्य च दुःखिनोऽभावे दुःखोपशमनाय शास्त्रारम्भानर्थक्यमिति चेत् ? | पूर्व०—किंतु यदि परमात्मा दुःखी नहीं है और उससे भिन्न दूसरे दुःखी पदार्थका अभाव है तो ऐसी स्थितिमें [दुःखकी निवृत्तिके लिये] शास्त्रका आरम्भ होना व्यर्थ ही सिद्ध होता है। | | न, अविद्याध्यारोपितदुःखित्वभ्रमापोहार्थत्वात्, आत्मनि प्रकृतसङ्ख्यापूरणभ्रमापोहवत्। कल्पितदुःख्यात्माभ्युपगमाच्च। | सिद्धान्ती - ऐसा मत कहो, क्योंकि आत्मामें प्रकृत (दशम) संख्याकी अपूर्वरूप भ्रमकी निवृत्तिके समान¹ शास्त्र अविद्यासे आरोपित दुःखित्वरूप भ्रमकी निवृत्तिके लिये है। तथा कल्पित दुःखी आत्मा स्वीकार भी किया गया है²। | | जलसूर्यादिप्रतिबिम्बवदात्मप्रवेशश्च प्रतिबिम्बवद्व्याकृते कार्ये उपलब्धयत्वम्। प्रागुत्पत्तेरनुपलब्ध | जलमें पड़े हुए सूर्यादिके प्रतिबिम्बके समान व्याकृत कार्यमें आत्माका प्रतिबिम्बके समान उपलब्ध होना ही उसका कार्यमें प्रवेश है। जगत्‌की उत्पत्तिसे पूर्व जो |


१. यह आख्यायिका इस प्रकार है। एक बार दस आदमी विदेश गये। मार्गमें उन्होंने एक नदी पार की। उस पार पहुँचनेपर यह देखनेके लिये कि हम दस हैं या नहीं, आपसमें गणना करने लगे। परंतु जो गिनता वह अपनेको छोड़कर गिनता। इसलिये दस संख्याकी पूर्ति न होती। इतनेमें ही एक आप्त पुरुष आया, उसने उन्हें अलग-अलग गिनकर बता दिया कि तुम दस ही हो। इससे उनका भ्रमजनित दुःख दूर हो गया।

२. इसलिये भी शास्त्रारम्भ सार्थक है।

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०७

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०७


| आत्मा पश्चात्कार्ये च सृष्टे व्याकृते बुद्धेरन्तरुपलभ्यमानः सूर्यादिप्रतिबिम्बवज्जलादौ कार्यं सृष्ट्वा प्रविष्ट इव लक्ष्यमाणो निर्दिश्यते "स एष इह प्रविष्टः" (बृ० उ० १।४।७) "ताः सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्" "स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत" (ऐ० उ० २।१२) 'सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य" (छा० उ० ६।२।३) इत्येवमादिभिः। <br><br> न तु सर्वगतस्य निरवयवस्य दिग्देशकालान्तरापक्रमणप्राप्तिलक्षणःप्रवेशःकदाचिदप्युपपद्यते । न च परादात्मनोऽन्योऽस्ति द्रष्टा "नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्तश्रोतृ" (बृ० उ० ३।८।११) इत्यादिश्रुतेरित्यवोचाम। उपल- | आत्मा उपलब्ध नहीं होता था वह व्यक्त कार्यकी रचना हो जानेपर बुद्धिके भीतर उपलब्ध होनेसे जलादिमें सूर्यादिके प्रतिबिम्बके समान कार्यको रचकर उसमें प्रविष्ट हुआ-सा लक्षित होता है—ऐसा कहा जाता है;¹ जैसा कि वह यह आत्मा इसमें प्रवेश किये हुए है," "उन (शरीरों) को रचकर वह उनमें प्रवेश कर गया," "वह इस मूर्धसीमाको विदीर्णकर इसके द्वारा प्रवेश कर गया," "उस इस देवताने ईक्षण किया—अहो ! मैं इस जीवात्मारूपसे इन तीनों देवताओंमें प्रवेश कर" इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। <br><br> जो सर्वगत और निरवयव है उस आत्माका एक दिशा, देश या कालको छोड़कर अन्य दिशा, देश या कालको प्राप्त होनारूप प्रवेश कभी सम्भव नहीं है। तथा यह हम पहले ही कह चुके हैं कि "इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है" "इससे भिन्न कोई श्रोता नहीं है" इत्यादि श्रुतिके अनुसार परमात्मासे भिन्न और कोई द्रष्टा नहीं है। |


१ अर्थात् वस्तुतः वह प्रतिबिम्बके समान प्रवेश करता हो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि प्रतिबिम्बके आश्रयसे बिम्बके पार्थक्यके समान आत्माका बुद्धि आदिसे व्यवधान नहीं है।

२०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

२०८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
ब्ध्यर्थत्वाच्च सृष्टिप्रवेशस्थित्यप्य-तथा सृष्टि, प्रवेश, स्थिति और
यवाक्यानाम्, उपलब्धेः पुरुषार्थ-लयका प्रतिपादन करनेवाले वाक्य
त्वश्रवणात्। “आत्मानमेवावेत्”आत्मोपलब्धिके ही लिये हैं, क्योंकि
(बृ० उ० १।४।१०) “तस्मा-आत्मोपलब्धि ही पुरुषार्थ है—ऐसा
त्तत्सर्वमभवत्” (बृ० उ० १।सुना गया है; जैसा कि “उसने
४।१०) “ब्रह्मविदाप्नोतिअपनेहीको जाना,” “अतः वह
परम्” (तै० उ० २।१।१)सर्वरूप हो गया,” “ब्रह्मवेत्ता पर-
“स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेदमात्माको प्राप्त कर लेता है,” “वह
ब्रह्मैव भवति” (मु० उ० ३।जो कि उस परब्रह्मको जानता है
२।९) “आचार्यवान्पुरुषो वेद”ब्रह्म ही हो जाता है,” “आचार्यवान्
(छा० उ० ६।१४।२)पुरुषको ज्ञान होता है”, उसके
“तस्य तावदेव चिरम्” (छा०लिये तभीतक देरी है” इत्यादि
उ० ६।१४।२) इत्यादि-श्रुतियोंसे, तथा “तब मुझे तत्त्वतः
श्रुतिभ्यः। “ततो मां तत्त्वतोजानकर उसके पश्चात् मुझहीमें
ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्” (गीताप्रवेश करता है,” “वही समस्त
१८।५५) “तद्ध्यग्रयं सर्व-विद्याओंमें श्रेष्ठ है, क्योंकि उससे
विद्यानां प्राप्यते ह्यमृतं ततः”अमृतकी प्राप्ति होती है” इत्यादि
इत्यादिस्मृतिभ्यश्च। भेददर्शना-स्मृतियोंसे भी सिद्ध होता है। इसके
पवादाच्च सृष्ट्यादिवाक्यानाम्सिवा भेददर्शनकी निन्दा होनेसे भी
आत्मैकत्वदर्शनार्थपरत्वोपपत्तिः।सृष्ट्यादिविषयक वाक्योंका आत्मै-
तस्मात्कार्यस्थस्य उपलब्धृत्वमेवकत्वदर्शनपरक होना युक्त है। अतः
प्रवेश इत्युपचर्यते।कार्यस्थ आत्माका उपलब्ध होना ही
उसका प्रवेश है—ऐसा उपचारसे
कहा जाता है।
आ नखाग्रेभ्यो नखाग्रमर्यादम्‘आ नखाग्रेभ्यः’ अर्थात् नखाग्र-
आत्मनश्चैतन्यमुपलभ्यते। तत्रपर्यन्त आत्माका चैतन्य उपलब्ध होता

| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २०९ |

ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ२०९

| कथमिव प्रविष्टः ? इत्याह—यथा लोके क्षुरधाने क्षुरो धीयतेऽस्मिन्निति क्षुरधानं तस्मिन्नापितोपस्कराधाने, क्षुरोऽन्तःस्थ उपलभ्यते, अवहितः प्रवेशितः स्याद् यथा वा विश्वम्भरोऽग्निः, विश्वस्य भरणाद्विश्वम्भरः कुलाये नीडेऽग्निः काष्ठादाववहितः स्यादित्यनुवर्तते । तत्र हि स मथ्यमान उपलभ्यते । | है। वह उसमें किसके समान प्रविष्ट है, सो श्रुति बतलाती है—जिस प्रकार लोकमें क्षुरधानमें—जिसमें छुरा रखा जाय उसे क्षुरधान कहते हैं उसमें अर्थात् नापितके मुण्डन-सामग्री (औजार) रखनेके संदूकमें उसके भीतर रखा हुआ छुरा उपलब्ध होता अर्थात् उसमें अवहित (छिपा हुआ)—प्रविष्ट रहता है। अथवा जिस प्रकार विश्वम्भर—अग्नि, जो विश्वका भरण करनेके कारण विश्वम्भर है, कुलाय—नीड यानी काष्ठादिमें छिपा रहता है—इस प्रकार यहाँ 'अवहितः स्यात्' इसकी अनुवृत्ति होती है, वहाँ वह मन्थन करनेपर देखा जाता है। | | यथा च क्षुरः क्षुरधान एकदेशेऽवस्थितो यथा चाग्निः काष्ठादौ सर्वतो व्याप्यावस्थितः, एवं सामान्यतो विशेषतश्च देहं संव्याप्यावस्थित आत्मा । तत्र हि स प्राणनादिक्रियावान् दर्शनादिक्रियावांश्चोपलभ्यते । तस्मात्तत्रैवं प्रविष्टं तमात्मानं प्राणनादिक्रियाविशिष्टं न पश्यन्ति नोपलभन्ते । | तथा जिस प्रकार छुरा क्षुरधानके एक देशमें स्थित रहता है और अग्नि जैसे काष्ठादिमें उसे सब ओरसे व्याप्त करके विद्यमान रहता है इसी प्रकार आत्मा शरीरको सामान्य और विशेषरूपसे व्याप्त करके स्थित है। वहाँ वह प्राणनादि और दर्शनादि क्रियावाला देखा जाता है। अतः उस शरीरमें प्रविष्ट उस प्राणनादिक्रियाविशिष्ट आत्माको लोग नहीं देखते—उन्हें उसकी उपलब्धि नहीं होती। | | नन्वप्राप्तप्रतिषेधोऽयं तं न | शङ्का—किंतु 'उस आत्माको नहीं देखते यह तो अप्राप्तका प्रतिषेध |

बृ० उ० १४—

२१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२१०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| पश्यन्तीति, दर्शनस्याप्रकृतत्वात्। | है, क्योंकि यहाँ दर्शनका कोई प्रसंग नहीं है। | | नैष दोषः, सृष्ट्यादिवाक्यानाम् आत्मैकत्वप्रतिपत्त्यर्थपरत्वात्प्रकृतमेव तस्य दर्शनम्। "रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रति चक्षणाय" (बृ० उ० २। ५। १९) इति मन्त्रवर्णात्। | समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि सृष्ट्यादिपरक वाक्योंका तात्पर्य आत्मैकत्वबोध होनेके कारण उसका दर्शन प्रकृत ही है, जैसा कि "वह प्रत्येक रूपके अनुरूप हो गया है, उसका यह रूप उसके दर्शनके लिये है" इस मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है। | | तत्र प्राणनादिक्रियाविशिष्टस्यादर्शन हेतुमाह—<br>क्रियाविशिष्टस्यात्मनोऽसमस्तत्वप्रदर्शनम् | अकृत्स्नोऽसमस्तो हि यस्मात्स प्राणनादिक्रियाविशिष्टः। कुतः पुनरकृत्स्नत्वम्? इत्युच्यते—प्राणन्नेव प्राणनक्रियामेव कुर्वन्प्राणो नाम प्राणसमाख्यः प्राणाभिधानो भवति। प्राणनक्रियाकर्तृत्वाद्वि प्राणः प्राणीतीत्युच्यते नान्यां क्रियां कुर्वन्। यथा लावकः पाचक इति। तस्मात्क्रियान्तरविशिष्टस्य अनुपसंहारादकृत्स्नो हि सः। | अब श्रुति प्राणनादिक्रियाविशिष्ट आत्माके दिखायी न देनेमें हेतु बतलाती है-क्योंकि वह प्राणनादिक्रियाविशिष्ट आत्मा अकृत्स्न—असम्पूर्ण है। उसकी असम्पूर्णता क्यों है? सो बतलाया जाता है—प्राणन अर्थात् प्राणनक्रिया करनेसे ही वह प्राण यानी प्राणनामवाला होता है। [तात्पर्य यह है कि] प्राण क्रियाका कर्ता होनेसे ही 'प्राण प्राणन कर्ता है' ऐसा कहा जाता है, किसी अन्य क्रियाके करनेसे नहीं जैसे लावक, पाचक इत्यादि। अतः उसमें क्रियान्तरविशिष्टका उपसंहार (संग्रह) न होनेके कारण वह असम्पूर्ण ही है। इसी प्रकार 'वक्तीति वाक्' इस व्युत्पत्तिसे बोलने यानी वदनक्रिया करनेके कारण वह | | तथा वदन्वदनक्रियां कुर्वन्व- | |