बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| स्वरूपत्वेनाभिमतोऽविवेकिभिः। अविशेषेणैतन्मय इत्युक्तस्य विशेषेण वाङ्मयो मनोमयः प्राणमय इति स्फुटीकरणम् ॥ ३ ॥ | जो अविवेकियोंद्वारा आत्मस्वरूपसे माना गया है । सामान्यरूपसे 'एतन्मयः' इस प्रकार कहे हुएको ही 'वाङ्मय, मनोमय एवं प्राणमय' ऐसा कहकर स्पष्ट किया गया है ॥ ३ ॥ |
आत्मार्थ अन्नोंका आधिभौतिक विस्तार
| तेषामेव प्राजापत्यानामन्नानामाधिभौतिको विस्तारोऽभिधीयते- | उन्हीं प्राजापत्य अन्नोंका आधिभौतिक विस्तार कहा जाता है— |
त्रयो लोका एत एव वागेवायं लोको मनोऽन्तरिक्षलोकः प्राणोऽसौ लोकः ॥ ४ ॥
तीनों लोक ये ही हैं । वाक् ही यह लोक है, मन अन्तरिक्षलोक है और प्राण वह ( स्वर्ग ) लोक है ॥ ४ ॥
| त्रयो लोका भूर्भुवः स्वरित्याख्या एत एव वाङ्मनःप्राणाः, तत्र विशेषो वागेवायं लोकः, मनोऽन्तरिक्षलोकः, प्राणोऽसौ लोकः । ४ । | 'भूः, भुवः और स्वः' नामक तीनों लोक ये वाक्, मन और प्राण ही हैं। उनका विशेषरूप इस प्रकार है—वाक् ही यह लोक है, मन अन्तरिक्षलोक है और प्राण वह ( स्वर्ग ) लोक है ॥ ४ ॥ | | तथा— | इसी प्रकार— |
त्रयो वेदा एत एव वागेवर्ग्वेदो मनो यजुर्वेदः प्राणः सामवेदः ॥ ५ ॥ देवाः पितरो मनुष्या एत एव वागेव देवा मनः पितरः प्राणो मनुष्याः ॥ ६ ॥ पिता माता प्रजैत एव मन एव पिता वाङ्माता प्राणः प्रजा ॥ ७ ॥
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३४९
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३४९
तीनों वेद ये ही हैं। वाक् ही ऋग्वेद है, मन यजुर्वेद है और प्राण सामवेद है ॥ ५॥ देवता, पितृगण और मनुष्य ये ही हैं। वाक् ही देवता हैं, मन पितृगण हैं और प्राण मनुष्य हैं ॥ ६॥ पिता, माता और प्रजा ये ही हैं। मन ही पिता है, वाक् माता है और प्राण प्रजा है ॥ ७॥
| त्रयो वेदा इत्यादीनि वाक्यानि ऋज्वर्थानि ॥ ५-७ ॥ | 'त्रयो वेदाः' इत्यादि वाक्योंका अर्थ सरल है ॥ ५-७ ॥ |
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विज्ञातं विजिज्ञास्यमविज्ञातमेत एव यत्किञ्च विज्ञातं वाचस्तद्रूपं वाग्घि विज्ञाता वागेनं तद्भूत्वावति ॥ ८ ॥
विज्ञात, विजिज्ञास्य और अविज्ञात ये ही हैं। जो कुछ विज्ञात है वह वाक्का रूप है, वाक् ही विज्ञाता है, वाक् इस (अपने ज्ञाता) की विज्ञात होकर रक्षा करती है ॥ ८ ॥
| विज्ञातं विजिज्ञास्यमविज्ञातमेत एव। तत्र विशेषः—यत्किञ्च विज्ञातं विस्पष्टं ज्ञातं वाचस्तद्रूपम्। तत्र स्वयमेव हेतुमाह—वाग्घि विज्ञाता प्रकाशात्मकत्वात्। कथमविज्ञाता भवेद् यान्यानपि विज्ञापयति "वाचैव सम्राड्बन्धुः प्रज्ञायते" (४। १। २) इति हि वक्ष्यति। <br><br> वाग्विशेषविद इदं फलमुच्यते—वागेवैनं यथोक्तवाग्विभूति- | विज्ञात, विजिज्ञास्य और अविज्ञात ये ही हैं। उनका विशेष रूप इस प्रकार है—जो कुछ विज्ञात—विस्पष्टरूपसे ज्ञात है, वह वाक्का रूप है। उसमें श्रुति स्वयं ही हेतु बतलाती है—प्रकाशस्वरूप होनेके कारण वाक् ही विज्ञाता है। जो दूसरोंको विज्ञापित करती है, वह स्वयं किस प्रकार अविज्ञात हो सकती है। "हे सम्राट् ! वाणीसे ही बन्धुकी पहचान होती है" ऐसा आगे चलकर श्रुति कहेगी भी। <br><br> वाक्की विशेषताको जाननेवालेके लिये यह फल बतलाया जाता है—वाक् ही इसका—उपर्युक्त |
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३५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| विदं तद्विज्ञातं भूत्वा अवति पालयति, विज्ञातरूपेणैवास्यान्नं भोज्यतां प्रतिपद्यत इत्यर्थः ॥ ८ ॥ | वाक्की विभूतिको जाननेवालेका उसकी विज्ञात होकर अवन यानी पालन करती है, अर्थात् वह विज्ञात-रूपसे ही इसका अन्न होती यानी भोज्यताको प्राप्त होती है ॥ ८ ॥ | | तथा— | तथा— |
यत्किञ्च विजिज्ञास्यं मनसस्तद्रूपं मनो हि विजिज्ञास्यं मन एनं तद्भूत्वावति ॥ ९ ॥
जो कुछ विजिज्ञास्य है, वह मनका रूप है। मन ही विजिज्ञास्य है। मन विजिज्ञास्य होकर इसकी रक्षा करता है ॥ ९ ॥
| यत्किञ्च विजिज्ञास्यम्, विस्पष्टं ज्ञातुमिष्टं विजिज्ञास्यम्, तत्सर्वं मनसो रूपम्; मनो हि यस्मात्सन्दिह्यमानाकारत्वाद्विजिज्ञास्यम्। पूर्ववन्मनोविभूतिविदः फलम्—मन एनं तद्विजिज्ञास्यं भूत्वा अवति विजिज्ञास्यस्वरूपेणैवान्नत्वमापद्यते ॥ ९ ॥ | जो कुछ विजिज्ञास्य यानी विस्पष्ट जाननेके लिये इष्ट है, वह सब मनका रूप है; क्योंकि मन ही सन्देहयोग्य स्वरूपवाला होनेके कारण विजिज्ञास्य है। पहलेहीके समान मनकी विभूतिको जाननेवालेका फल बतलाया जाता है—मन उसका विजिज्ञास्य होकर उसकी रक्षा करता है, अर्थात् वह विजिज्ञास्य-स्वरूपसे ही उसके अन्नत्वको प्राप्त होता है ॥ ९ ॥ | | तथा— | तथा— |
यत्किञ्चाविज्ञातं प्राणस्य तद्रूपं प्राणो ह्यविज्ञातः प्राण एनं तद्भूत्वावति ॥ १० ॥
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३५१
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३५१
जो कुछ अविज्ञात है, वह प्राणका रूप है। प्राण ही अविज्ञात है। प्राण अविज्ञात होकर इसकी रक्षा करता है ॥ १० ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| यत्किञ्चाविज्ञातं विज्ञानागोचरं न च सन्दिह्यमानम्, प्राणस्य तद्रूपम्, प्राणो ह्यविज्ञातोऽविज्ञातरूपो हि यस्मात्प्राणोऽनिरुक्तश्रुतेः । विज्ञातविजिज्ञास्याविज्ञातभेदेन वाङ्मनःप्राणविभागे स्थिते त्रयो लोका इत्यादयो वाचनिका एव । सर्वत्र विज्ञातादिरूपदर्शनाद्वचनादेव नियमः स्मर्त्तव्यः ।<br><br>प्राण एनं तद्भूत्वा अवति—अविज्ञातरूपेणैवास्य प्राणोऽन्नं भवतीत्यर्थः । शिष्यपुत्रादिभिःसन्दिह्यमानावज्ञातोपकारा अप्याचार्यपित्रादयो दृश्यन्ते; तथा मनःप्राणयोरपि सन्दिह्यमानावज्ञातयोरन्नत्वोपपत्तिः ॥ १० ॥ | जो कुछ अविज्ञात यानी विज्ञानका अविषय है—केवल सन्देहयोग्य ही नहीं है—वह प्राणका रूप है; प्राण ही अविज्ञात है, क्योंकि अनिरुक्त-श्रुतिसे प्राण अविज्ञातरूप ही है। इस प्रकार विज्ञात, विजिज्ञास्य और अविज्ञातभेदसे वाक्, मन और प्राणका विभाग निश्चित हो जानेपर 'त्रयो लोकाः' इत्यादि निर्देश केवल वाचनिक (वचनसे प्राप्त) ही है। सर्वत्र विज्ञातादिका ही रूप देखा जाता है, अतः इनका नियम श्रुतिवचनसे ही माना जाता है।<br><br>प्राण तद्रूप होकर इसकी रक्षा करता है; अर्थात् प्राण अविज्ञातरूपसे ही इसका अन्न होता है। १ जिनके उपकारके विषयमें शिष्य एवं पुत्रादिको सन्देह और अज्ञान रहता है, ऐसे गुरु और पिता आदि [लोकमें] देखे जाते हैं। इसी प्रकार सन्दिह्यमान और अविज्ञात मन एवं प्राणका भी अन्न होना सम्भव है ॥ १० ॥ |
१. यदि कहो कि अविज्ञात रहते हुए प्राण किस प्रकार उपकारक हो सकता है ? तो इसके लिये आगे लिखी बातपर ध्यान देना चाहिये ।
३५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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आत्मार्थ अन्नोंका आधिदैविक विस्तार
| व्याख्यातो वाङ्मनःप्राणानामा-<br>धिभौतिको विस्तारः। अथायमा-<br>धिदैविकार्थ आरम्भः— | [इस प्रकार] वाक्, मन और प्राणके आधिभौतिक विस्तारकी व्याख्या तो कर दी गयी, अब यहाँसे आधिदैविक विषय आरम्भ किया जाता है— |
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तस्यै वाचः पृथिवी शरीरं ज्योतीरूपमयमग्निस्त-<br>द्यावत्येव वाक्तावती पृथिवी तावानयमग्निः ॥ ११ ॥
उस वाक्का पृथिवी शरीर है और यह अग्नि ज्योतीरूप है। तहाँ जितनी वाक् है, उतनी ही पृथिवी है और उतना ही यह अग्नि है ॥ ११ ॥
| तस्यै तस्याः वाचः प्रजापते-<br>रन्नत्वेन प्रस्तुतायाः पृथिवी शरीरं<br>बाह्य आधारः, ज्योतीरूपं प्रकाशा-<br>त्मकं करणं पृथिव्या आधेयभूत-<br>मयं पार्थिवोऽग्निः। द्विरूपा हि<br>प्रजापतेर्वाक्-कार्यमाधारोऽप्रकाशः<br>करणं चाधेयं प्रकाशः, तदुभयं<br>पृथिव्यग्नी वागेव प्रजापतेः।<br>तत्तत्र यावत्येव यावत्परिमा-<br>णैव अध्यात्माधिभूतभेदभिन्ना<br>सती वाग्भवति, तत्र सर्वत्र<br>आधारत्वेन पृथिवी व्यवस्थिता,<br>तावत्येव भवति कार्यभूता; | प्रजापतिके अन्नरूपसे प्रस्तुत हुए उस वाक्का पृथिवी शरीर यानी बाह्य आधार है तथा पृथिवी-का आधेयभूत यह पार्थिव अग्नि उसका ज्योतीरूप यानी प्रकाशा-त्मक करण है। प्रजापतिकी वाक् दो प्रकारकी है—(१) कार्य, आधार और अप्रकाशरूप तथा (२) करण, आधेय और प्रकाशरूप; वे दोनों पृथिवी और अग्नि प्रजापतिकी वाक् ही हैं।<br>उनमें जितनी अर्थात् जितने परिमाणवाली अध्यात्म और अधिभूत भेदोंसे भिन्न होनेवाली वाक् है, उसमें सर्वत्र उसके आधाररूपसे व्यवस्थित कार्यभूता पृथिवी भी उतनी ही है; |
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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५३
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५३
| तावानयमग्निः, आधेयः करणरूपो ज्योतीरूपेण पृथिवीमनुप्रविष्टस्तावतानेव भवति । समानमुत्तरम् ॥ ११ ॥ | तथा उतना ही अग्नि है, अर्थात् ज्योतीरूपसे पृथिवीमें अनुप्रविष्ट आधेय और करणरूप अग्नि भी उतना ही है। आगेके पर्यायोंमें भी ऐसा ही समझना चाहिये ॥ ११ ॥ |
इन्द्ररूप प्राणकी उत्पत्ति और उसकी उपासनाका फल
अथैतस्य मनसो द्यौः शरीरं ज्योतीरूपमसावादित्यस्तद्यावदेव मनस्तावती द्यौस्तावानसावादित्यस्तौ मिथुन ँ समैतां ततः प्राणोऽजायत स इन्द्रः स एषोऽसपत्नो द्वितीयो वै सपत्नो नास्य सपत्नो भवति य एवं वेद ॥ १२ ॥
तथा इस मनका द्युलोक शरीर है, ज्योतीरूप वह आदित्य है; वहाँ जितना मन है, उतना ही द्युलोक और उतना ही वह आदित्य है। वे (आदित्य और अग्नि) मिथुन (पारस्परिक संसर्ग) को प्राप्त हुए। तब प्राण उत्पन्न हुआ। वह इन्द्र है और वह असपत्न—शत्रुहीन है; दूसरा [अर्थात् प्रतिपक्षी] ही सपत्न होता है। जो ऐसा जानता है, उसका सपत्न नहीं होता ॥ १२ ॥
| अथैतस्य प्राजापत्यान्नोक्तस्यैव मनसो द्यौर्द्युलोकः शरीरं कार्यमाधारः, ज्योतीरूपं करणं योऽसावादित्यः । तत्तत्र यावत्परिमाणमेव अध्यात्ममधिभूतं वा मनस्तावती तावद्विस्तारा तावत्परिमाणा मनसो ज्योतीरूपस्य | तथा प्राजापत्य अन्नरूपसे कहे हुए इस मनका द्यौः—द्यु लोक शरीर—कार्य अर्थात् आधार है और वह आदित्य ज्योतीरूप—करण यानी आधेय है। उनमें जितना परिमाणवाला अध्यात्म और अधिभूत मन है उतना—उतने विस्तारवाला अर्थात् उतने ही परिमाणवाला मनके ज्योती- |
बृ० उ० २३—
३५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| करणस्य आधारत्वेन व्यवस्थिता द्यौः, तावानसावादित्यो ज्योतीरूपं करणमाधेयम्। | रूप यानी करणके आधाररूपसे व्यवस्थित द्युलोक है। तथा उतना ही वह ज्योतीरूप-करण यानी आधेय आदित्य है। | | तावग्न्यादित्यो वाङ्मनसे आधिदैविके मातापितरौ, मिथुनं मैथुनमितरेतरसंसर्गं समैतां समगच्छेताम्। 'मनसा आदित्येन प्रसूतं पित्रा, वाचाग्निना मात्रा प्रकाशितं कर्म करिष्यामि' इति, अन्तरा रोदस्योः। ततस्तयोरेव सङ्गमनात्प्राणो वायुरजायत परिस्पन्दाय कर्मणे। | वे अग्नि और आदित्य अर्थात् आधिदैविक वाक् और मन माता-पिता हैं, वे दोनों मिथुन अर्थात् एक-दूसरेके साथ संसर्गको प्राप्त हुए। 'पितृस्थानीय आदित्यरूप मनसे प्रसूत और मातृस्थानीय अग्निरूप वाणीसे प्रकाशित कर्म करूँगा' ऐसे अभिप्रायसे पृथिवी और द्युलोकके बीच उन दोनोंका समागम हुआ। तब उन्हींके समागमसे परिस्पन्द (चेष्टा) रूप कर्मके लिये प्राण यानी वायु हुआ।¹ | | यो जातः स इन्द्रः परमेश्वरः, न केवलमिन्द्र एवासपत्नोऽविद्यमानः सपत्नो यस्य; कः पुनः सपत्नो नाम ? द्वितीयो वै प्रतिपक्षत्वेनोपगतः स द्वितीयः सपत्न | जो उत्पन्न हुआ वह इन्द्र—परमेश्वर था। वह केवल इन्द्र ही नहीं था, असपत्न अर्थात् जिसका कोई सपत्न न हो—ऐसा भी था। किंतु सपत्न किसे कहते हैं ? द्वितीय अर्थात् जो प्रतिपक्षभावको प्राप्त हो वह दूसरा व्यक्ति ही सपत्न कहलाता |
१. ऊपर 'मन यह इसका आत्मा है, वाक् जाया है और प्राण प्रजा है' इस प्रकार अध्यात्मरूपसे तथा 'मन पिता है, वाक् माता है और प्राण प्रजा है' इस प्रकार अधिभूतरूपसे प्राणको मन और वाक्की प्रजा बतलाया है। इसी प्रकार यहाँ अधिदैवरूपसे भी उसे उनकी प्रजा बतलानेके लिये यह सब कहा गया है।
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ३५५
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ३५५
| इत्युच्यते। तेन द्वितीयत्वेऽपि सति वाङ्मनसे न सपत्नत्वं भजेते, प्राणं प्रति गुणभावोपगते एव हि ते अध्यात्ममिव।<br><br>तत्र प्रासङ्गिकासपत्नविज्ञानफलमिदम्—नास्य विदुषः सपत्नः प्रतिपक्षो भवति, य एवं यथोक्तं प्राणमसपत्नं वेद ॥ १२ ॥ | है। अतः वाक् और मन उससे अन्य होनेपर भी उसके सपत्नत्वको प्राप्त नहीं हैं। वे तो अध्यात्म मन और वाक्के समान प्राणके प्रति गौणभावको प्राप्त हैं।<br><br>तहाँ प्रसङ्गप्राप्त असपत्नविज्ञानका फल यह है—जो इस प्रकार उपर्युक्त प्राणको असपत्न जानता है, उस विद्वान्का कोई सपत्न यानी प्रतिपक्षी नहीं होता ॥ १२ ॥ |
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आत्मार्थ अन्नोंकी अन्तवान् और अनन्तरूपसे उपासना करनेका फल
अथैतस्य प्राणस्यापः शरीरं ज्योतीरूपमसौ चन्द्रस्तद्यावानेव प्राणस्तावत्य आपस्तावानसौ चन्द्रस्त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः स यो हैतानन्तवत उपास्तेऽन्तवन्तँ स लोकं जयत्यथ यो हैताननन्तानुपास्तेऽनन्तँ स लोकं जयति ॥ १३ ॥
तथा इस प्राणका जल शरीर है, वह चन्द्रमा ज्योतीरूप है। तहाँ जितना प्राण है, उतना ही जल है और उतना ही वह चन्द्रमा है। वे ये सभी समान हैं और सभी अनन्त हैं। जो कोई इन्हें अन्तवान् समझकर उपासना करता है, वह अन्तवान् लोकपर जय प्राप्त करता है और जो इन्हें अनन्त समझकर उपासना करता है वह अनन्त लोकपर जय प्राप्त करता है ॥ १३ ॥
| अथैतस्य प्रकृतस्य प्राजापत्यान्नस्य प्राणस्य, न प्रजोक्तस्यानन्तरनिर्दिष्टस्य, आपः शरीरं कार्यं | तथा इस प्रसङ्गप्राप्त प्रजापतिके अन्नरूप प्राणका, अभी प्रजारूपसे बतलाये हुए प्राणका नहीं, जल |
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३५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| करणाधारः, पूर्ववज्ज्योतीरूपमसौ चन्द्रः। तत्र यावानेव प्राणो यावत्परिमाणोऽध्यात्मदिभेदेषु, तावद्व्याप्तिमत्त्य आपः तावत्परिमाणाः, तावानसौ चन्द्रोऽस्वाधेयस्तास्वप्स्वनुप्रविष्टः करणभूतोऽध्यात्ममधिभूतं च तावद्व्याप्तिमानेव। तान्येतानि पित्रा पाङ्क्तेन कर्मणा सृष्टानि त्रीण्यन्नानि वाङ्मनःप्राणाख्यानि। अध्यात्ममधिभूतं च जगत्समस्तमेतैर्व्याप्तम्, नैतेभ्योऽन्यदतिरिक्तं किञ्चिदस्ति कार्यात्मकं करणात्मकं वा। समस्तानि त्वेतानि प्रजापतिः। | शरीर—कार्य अर्थात् करणका आधार है तथा पूर्ववत् वह चन्द्रमा ज्योतीरूप है। वहाँ जितना प्राण है अर्थात् अध्यात्मादि भेदोंमें जितने परिमाणवाला प्राण है, उतनी व्याप्तिवाला अर्थात् उतने ही परिमाणवाला जल है और उतना ही वह जलके आधेय उस जलमें अनुप्रविष्ट उसका करणभूत अध्यात्म और अधिभूत चन्द्रमा है, वह भी उतनी ही व्याप्तिवाला है। ये ही वे पिताके द्वारा पाङ्क्तकर्मसे रचे हुए वाक्, मन और प्राणसंज्ञक तीन अन्न हैं। सारा अध्यात्म और अधिभूत जगत् इनसे व्याप्त है। इनसे भिन्न कार्य और करणरूप कोई भी पदार्थ नहीं है। ये सब [ मिलकर ] ही प्रजापति हैं। | | त एते वाङ्मनःप्राणाः सर्वे एव समास्तुल्या व्याप्तिमन्तो यावत्प्राणिगोचरं साध्यात्माधिभूतं व्याप्य व्यवस्थिताः। अत एवानन्ता यावत्संसारभाविनो हि ते। न हि कार्यकारणप्रत्याख्यानेन संसारोऽवगम्यते। कार्यकारणात्मका हि त इत्युक्तम्। | वे ये वाक्, मन और प्राण सब समान अर्थात् तुल्य व्याप्तिवाले ही हैं। अध्यात्म और अधिभूतके सहित जितना भी प्राणियोंका विषय है, ये उस सबको व्याप्त करके स्थित हैं। अतः ये अनन्त हैं अर्थात् संसारकी स्थितिपर्यन्त रहनेवाले हैं; क्योंकि कार्य और करणको छोड़कर संसार अन्य कुछ नहीं जाना जाता और यह कहा ही जा चुका है कि ये कार्य-करणरूप हैं। |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५७
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५७
| स यः कश्चिद् हैतान्प्रजापते- <br> रात्मभूतानन्तवतःपरिच्छिन्नान- <br> ध्यात्मरूपेण वा अधिभूतरूपेण <br> वोपास्ते, स च तदुपासनानुरूपमेव <br> फलमन्तवन्तं लोकं जयति, परि- <br> च्छिन्न एव जायते नैतेषामात्म- <br> भूतो भवतीत्यर्थः । अथ पुनर्यो <br> हैताननन्तान्सर्वात्मकान्सर्वप्रा- <br> ण्यात्मभूतानपरिच्छिन्नानुपास्ते <br> सोऽनन्तमेव लोकं जयति ॥१३॥ | जो कोई प्रजापतिके स्वरूपभूत <br> इन सबको अन्तवान्—परिच्छिन्न <br> समझकर अध्यात्म या अधिभूतरूपसे <br> उपासना करता है, वह तो उस <br> उपासनाके अनुरूप फल अन्तवान् <br> लोकको ही जीतता है । अर्थात् वह <br> परिच्छिन्नरूपसे ही उत्पन्न होता है, <br> इनका आत्मभूत नहीं होता । और <br> जो इन्हें अनन्त—सर्वात्मक— <br> समस्त प्राणियोंके आत्मभूत अर्थात् <br> अपरिच्छिन्नरूपसे उपासना करता <br> है, वह अनन्त लोकपर ही विजय <br> प्राप्त करता है ॥ १३ ॥ |
तीन अन्नरूप प्रजापतिका षोडशकल संवत्सररूपसे निर्देश
| पिता पाङ्क्तेन कर्मणा सप्तान्नानि <br> सृष्ट्वा त्रीण्यन्नान्यात्मार्थमकरो- <br> दित्युक्तम् । तान्येतानि । पाङ्क्त- <br> कर्मफलभूतानि व्याख्यातानि । <br> तत्र कथं पुनः पाङ्क्तस्य कर्मणः <br> फलमेतानि ? इति उच्यते— <br> यस्मात्तेष्वपि त्रिष्वन्नेषु पाङ्क्त- <br> तावगम्यते, वित्तकर्मणोरपि तत्र <br> सम्भवात् । तत्र पृथिव्यग्नी माता, | पिताने पाङ्क्तकर्मसे सात अन्नोंको <br> उत्पन्न कर उनमेंसे तीन अपने लिये <br> निश्चित किये—यह ऊपर कहा <br> गया । पाङ्क्तकर्मके फलभूत उन <br> अन्नोंकी व्याख्या कर दी गयी । <br> किंतु वे पाङ्क्तकर्मके फल किस <br> प्रकार हैं ? सो बतलाया जाता <br> है—क्योंकि उन तीन अन्नोंमें भी <br> पाङ्क्तता देखी जाती है [ इसलिये <br> वे पाङ्क्त हैं ]; कारण, वित्त और <br> कर्मकी भी उनमें सम्भावना है । <br> उनमें पृथिवी और अग्नि माता हैं, |
३५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| दिवादित्यौ पिता। योऽयमन-<br>योरन्तरा प्राणः, स प्रजेति व्या-<br>ख्यातम्। तत्र वित्तकर्मणी<br>सम्भावयितव्ये इत्यारम्भः— | द्युलोक और आदित्य पिता हैं, इन<br>दोनोंके बीचमें जो यह प्राण है, वह<br>प्रजा है—यह तो ऊपर व्याख्या<br>की जा चुकी है। अब उनमें वित्त<br>और कर्मकी सम्भावना दिखानी है,<br>इसलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ<br>किया जाता है— |
स एष संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलस्तस्य रात्रय एव पञ्चदश कला ध्रुवैवास्य षोडशी कला स रात्रिभिरेवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते सोऽमावास्याँ रात्रिमेतया षोडश्या कलया सर्वमिदं प्राणभृदनुप्रविश्य ततः प्रातर्जायते तस्मादेताँ रात्रिं प्राणभृतः प्राणं न विच्छिन्द्यादपि कृकलासस्यैतस्या एव देवताया अपचित्यै ॥ १४ ॥
वह यह (तीन अन्नरूप) संवत्सर प्रजापति सोलह कलाओंवाला है। उसकी रात्रियाँ ही पंद्रह कला हैं, इसकी सोलहवीं कला ध्रुवा (नित्य) ही है। वह रात्रियोंके द्वारा ही [शुक्लपक्षमें] वृद्धिको प्राप्त होता है तथा [कृष्णपक्षमें] क्षीण होता है। अमावास्याकी रात्रिमें वह इस सोलहवीं कलासे इन सब प्राणियोंमें अनुप्रविष्ट हो फिर [दूसरे दिन] प्रातःकालमें उत्पन्न होता है। अतः इस रात्रिमें किसी प्राणीके प्राणका विच्छेद न करे, यहाँतक कि इसी देवताकी पूजाके लिये [इस रात्रिमें] गिरगिटके भी प्राण न ले ॥ १४ ॥
| 'स एष संवत्सरः'—योऽयं<br>त्र्यन्नात्मा प्रजापतिः प्रकृतः, स एष<br>संवत्सरात्मना विशेषतो निर्दिश्यते। | 'स एष संवत्सरः'—यहाँ जिस<br>अन्नत्रयरूप प्रजापतिका प्रसङ्ग है,<br>उसीका संवत्सररूपसे विशेषतः<br>निर्देश किया जाता है। वह यह |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५९
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५९
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-भाष्यार्थ |
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| षोडशकलः षोडश कला अवयवा अस्य सोऽयं षोडशकलः संवत्सरः संवत्सरात्मा कालरूपः। | संवत्सर—संवत्सरात्मा अर्थात् कालरूप प्रजापति षोडशकल है; जिसकी षोडश (सोलह) कलाएँ अर्थात् अवयव हों, उसे षोडशकल कहते हैं। |
| तस्य च कालात्मनः प्रजापतेः रात्रय एवाहोरात्राणि, तिथय इत्यर्थः, पञ्चदश कलाः। ध्रुवैव नित्यैव व्यवस्थिता अस्य प्रजापतेः षोडशी षोडशानां पूरणी कला। स रात्रिभिरेव तिथिभिः कलोक्ताभिरापूर्यते चापक्षीयते च। प्रतिपदाद्याभिर्हि चन्द्रमाः प्रजापतिः शुक्लपक्ष आपूर्यते कलाभिरुपचीयमानाभिर्वर्धते यावत्सम्पूर्णमण्डलः पौर्णमास्याम्। ताभिरेवापचीयमानाभिः कलाभिरपक्षीयते कृष्णपक्षे यावद् ध्रुवैका कला व्यवस्थिता | उस कालस्वरूप प्रजापतिकी रात्रियाँ—अहोरात्र अर्थात् तिथियाँ ही पंद्रह कलाएँ हैं तथा इस प्रजापतिकी सोलहवीं अर्थात् सोलह संख्याकी पूर्ति करनेवाली कला ध्रुवा—नित्य व्यवस्थिता ही है। वह रात्रियों अर्थात् कलारूपसे कही हुई तिथियोंसे ही पूर्ण और अपक्षीण होता है। वह चन्द्रमा प्रजापति शुक्लपक्षमें प्रतिपद् आदि तिथियोंसे बढ़ता है, वह बढ़ती हुई कलाओंसे तबतक बढ़ता रहता है, जबतक कि पूर्णमासीको पूर्णमण्डलाकार न हो जाय; तथा क्षीण होती हुई उन्हीं कलाओंके द्वारा कृष्णपक्षमें तबतक क्रमशः क्षीण होता जाता है, जबतक कि अमावास्यामें एक ध्रुवा कला ही शेष न रह जाय। |
| अमावास्यायाम्।<br>स प्रजापतिः कालात्मा अमावास्याममावास्यायां रात्रिं रात्रौ या व्यवस्थिता ध्रुवा कलोक्ता एतया षोडश्या कलया सर्वमिदं प्राण- | वह कालस्वरूप प्रजापति, 'अमावास्यां रात्रिम्'—अमावास्यामें रातके समय जो एक ऊपर बतलायी हुई ध्रुवा नामकी कला रहती है, उस सोलहवीं कलाके द्वारा इन समस्त प्राणधारियों |
३६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| भूतप्राणिजातमनुप्रविश्य यदपः पिबति यच्चौषधीरश्नाति तत्सर्वमेव ओषध्यात्मना सर्वं व्याप्यामावास्यां रात्रिमवस्थाय ततोऽपरेद्युः प्रातर्जायते द्वितीयया कलया संयुक्तः ।<br><br>एवं पाङ्क्तात्मकोऽसौ प्रजापतिः । दिवादित्यौ मनः पिता; पृथिव्यग्नी वाग्जाया माता; तयोश्च प्राणः प्रजा । चान्द्रमस्यस्तिथयः कला वित्तम्, उपचयापचयधर्मित्वा-द्वित्तवत् । तासां च कलानां काला-वयवानां जगत्परिणामहेतुत्वं कर्म । एवमेष कृत्स्नः प्रजापतिः “जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीय” (बृ० उ० १ । ४ । १७) इत्येषणानुरूप एव पाङ्क्तस्य कर्मणः फलभूतः संवृत्तः । कारणानुविधायि हि कार्यमिति लोकेऽपि स्थितिः ।<br><br>यस्मादेष चन्द्र एतां रात्रिं सर्वप्राणिजातमनुप्रविष्टो ध्रुवया कलया वर्तते, तस्माद्धेतोरेताम- | अर्थात् प्राणिसमुदायमें अनुप्रवेश कर जो जल पीता है और जो ओषधि खाता है, उन सभीमें ओषधिरूपसे व्याप्त हो अमावास्याकी रात्रिमें स्थित रह दूसरे दिन प्रातःकाल द्वितीय कलासे संयुक्त होकर उत्पन्न होता है ।<br><br>इस प्रकार यह प्रजापति पाङ्क्त-रूप है । द्युलोक, आदित्य और मन पिता हैं; पृथिवी, अग्नि और वाक् जाया—माता हैं; उन दोनों माता-पिताओंकी प्रजा प्राण है । चन्द्रमा-की तिथियाँ यानी कलाएँ वित्त हैं, क्योंकि वे वित्तके समान वृद्धि और ह्रासरूप धर्मवाली हैं । तथा उन कालावयवरूप कलाओंका जगत्के परिणाममें हेतु होना कर्म है । इस प्रकार यह सम्पूर्ण प्रजापति “मेरे जाया हो, फिर मैं प्रजारूपसे उत्पन्न होऊँ; मेरे धन हो, फिर मैं कर्म करूँ” इस प्रकारकी एषणाके अनुरूप ही पाङ्क्तकर्मका फलभूत हो जाता है । लोकमें भी ऐसी ही स्थिति है कि कार्य कारणका अनुवर्ती होता है ।<br><br>क्योंकि इस रात्रिमें यह चन्द्रमा अपनी ध्रुवा कलाके सहित समस्त प्राणिसमुदायमें अनुप्रविष्ट होकर विद्यमान रहता है, इसलिये इस |
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३६१
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३६१
| मावास्यां रात्रिं प्राणभृतः प्राणिनः प्राणं न विच्छिन्द्यात्प्राणिनं न प्रमापयेदित्येतत्, अपि कृकलासस्य । कृकलासो हि पापात्मा स्वभावेनैव हिंस्यते प्राणिभिर्दृष्टोऽप्यमङ्गल इति कृत्वा । <br><br> ननु प्रतिषिद्धैव प्राणिहिंसा "अहिंसन् सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः" (छा० उ० ८।१५।१) इति । <br><br> बाढं प्रतिषिद्धा, तथापि नामावास्याया अन्यत्र प्रतिप्रसवार्थं वचनं हिंसायाः कृकलासविषये वा, किं तर्हि ? एतस्याः सोमदेवताया अपचित्यै पूजार्थम् ॥१४॥ | अमावास्याकी रात्रिमें प्राणधारी यानी प्राणीके प्राणका विच्छेद न करे; अर्थात् प्राणीको न मारे। यहाँतक कि गिरगिटके भी प्राण न ले। गिरगिट पापी प्राणी है, इसलिये यह सोचकर कि यह देखनेसे भी अमङ्गलस्वरूप है, प्राणी स्वभावसे ही इसे मार डालते हैं [यहाँ उसकी भी हिंसाका निषेध है]। <br><br> शङ्का—परंतु "अहिंसन् सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः" इस वचनके अनुसार हिंसा तो सामान्यतः प्रतिषिद्ध ही है। [फिर यहाँ उसका अलग प्रतिषेध क्यों किया गया?] <br><br> समाधान—हाँ, प्रतिषिद्ध है, तथापि यहाँ जो श्रुतिका कथन है वह अमावास्यासे भिन्न समयमें सब प्राणियोंकी अथवा केवल गिरगिटकी हिंसाका प्रतिप्रसव (विशेष विधान) करनेके लिये नहीं है; तो फिर किस उद्देश्यसे है? इस सोम देवताकी अपचिति अर्थात् पूजाके लिये ही [यह कथन] है¹ ॥ १४॥ |
¹ यहाँ यह शङ्का होती है—श्रुतिमें सभी प्राणियोंकी हिंसाका निषेध करनेके लिये 'अहिंसन् सर्वभूतानि' यह सामान्य वचन है। इसके रहते हुए जो यहाँ 'अमावास्याकी रातमें गिरगिटतकका प्राण न ले' यह विशेष वचन श्रुतिमें कहा गया, इससे यह ध्वनि निकलती है कि अमावास्याके सिवा अन्य तिथियोंमें सभी
३६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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अन्नोपासक ही षोडशकल संवत्सर प्रजापति है
यो वै स संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलोऽयमेव स योऽयमेवंवित्पुरुषस्तस्य वित्तमेव पञ्चदश कला आत्मैवास्य षोडशी कला स वित्तेनैवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते तदेतन्नभ्यं यदयमात्मा प्रधिर्वित्तं तस्माद्यद्यपि सर्वज्यानिं जीयत आत्मना चेज्जीवति प्रधिनागादित्येवाहुः ॥ १५॥
जो भी यह सोलह कलाओंवाला संवत्सर प्रजापति है, वह यही है जो कि इस प्रकार जाननेवाला पुरुष है। वित्त ही उसकी पंद्रह कलाएँ हैं तथा आत्मा (शरीर) ही उसकी सोलहवीं कला है। वह वित्तसे ही बढ़ता और क्षीण होता है। यह जो आत्मा (पिण्ड) है, वह नभ्य (रथचक्रकी नाभिरूप) है और वित्त प्रधि (रथचक्रका बाहरका घेरा-नेमि) है। इसलिये यदि पुरुष सर्वस्वहरणके कारण ह्रासको प्राप्त हो जाय, किंतु शरीरसे जीवित रहे, तो यही कहते हैं कि केवल प्रधिसे ही क्षीण हुआ है ॥ १५ ॥
| यो वै परोक्षाभिहितः संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलः स नैवात्य- | जो भी सोलह कलाओंवाला संवत्सर प्रजापति परोक्षरूपसे कहा गया है, उसे अत्यन्त परोक्ष ही नहीं |
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प्राणियोंकी अथवा केवल गिरगिटकी हिंसा की जा सकती है। ऐसी दशामें पूर्वोक्त सामान्य वचनसे विरोध होगा। यद्यपि विधिकी अपेक्षा निषेधवचन बलवान् होते हैं, तथापि सामान्य निषेधकी अपेक्षा विशेष विधि ही बलवान् होता है, इसलिये पूर्वोक्त सामान्य निषेधको बाधकर इस विशेष वचनकी प्रवृत्ति होनेसे अमावास्यासे अन्यत्र हिंसाका प्रतिप्रसव (विशेष विधान) सिद्ध हो जायगा। निषेधके बाधक विधिको 'प्रतिप्रसव' कहते हैं। उक्त शङ्काका समाधान करते हुए भाष्यकार कहते हैं—यहाँ यह श्रुतिका विशेष वचन सोमदेवताकी पूजा करनेके लिये है अर्थात् 'अमावास्याकी रातमें सभी प्राणियोंमें सोमदेवता व्याप्त रहते हैं, इसलिये उस दिन किसी भी प्राणीको दुःख न दे' यह कहकर यहाँ सोमदेवताका सम्मान किया गया है, इससे हिंसाका प्रतिप्रसव (विशेष विधान) समझना भूल है।
ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३६३
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३६३ |
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| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| न्तं परोक्षो मन्तव्यः, यस्मादयमेव स प्रत्यक्ष उपलभ्यते। कोऽसावयम्? यो यथोक्तं त्र्यन्नात्मकं प्रजापतिमात्मभूतं वेत्ति स एवंवित्पुरुषः। | मानना चाहिये; क्योंकि वह प्रत्यक्ष यही उपलब्ध होता है। वह यह कौन है?—जो उपर्युक्त अन्नत्रयरूप आत्मभूत प्रजापतिको जानता है, वह इस प्रकार जाननेवाला पुरुष। |
| केन सामान्येन प्रजापतिरिति तदुच्यते—तस्यैवंविदः पुरुषस्य गवादि वित्तमेव पञ्चदश कला उपचयापचयधर्मित्वात्; तद्वित्तसाध्यं च कर्म। तस्य कृत्स्नतायै आत्मैव पिण्ड एवास्य विदुषः षोडशी कला ध्रुवस्थानीया। स चन्द्रवद्वित्तेनैवापूर्यते चापक्षीयते च—तदेतल्लोके प्रसिद्धम्। | वह किस समानताके कारण प्रजापति है, सो बतलाया जाता है—उस इस प्रकार जाननेवाले पुरुषकी गौ आदि वित्त ही पंद्रह कलाएँ हैं, क्योंकि वे वित्त वृद्धि-ह्रास धर्मवाले हैं और कर्म भी उस वित्तसे ही साध्य है*। उसकी पूर्णताके लिये इस विद्वान्का आत्मा यानी पिण्ड ही ध्रुवस्थानीया सोलहवीं कला है। वह चन्द्रमाके समान वित्तसे ही बढ़ता और अपक्षीण होता है—यह लोकमें प्रसिद्ध है। |
| तदेतन्नभ्यम्, नाभ्यै हितं नभ्यं नाभिं वा अर्हतीति। किं तत्? यदयं योऽयमात्मा पिण्डः। प्रधिर्वित्तं परिवारस्थानीयं बाह्यं चक्र- | वह यह नभ्य है, 'नाभ्यै हितम्' अथवा 'नाभिम् अर्हति' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो नाभिके लिये हितरूप अथवा नाभिकी योग्यता रखता हो उसे 'नभ्य' अर्थात् चक्रका मध्य भाग कहते हैं। वह कौन? यह जो आत्मा अर्थात् पिण्ड है। वित्त प्रधि यानी बाह्य परिवाररूप है, जैसे |
* अर्थात् जिस प्रकार जगत्का विपरिणाम चन्द्रमाकी कलाओंसे साध्य है उसी प्रकार जगत्का समस्त कार्य वित्तसे साध्य है।
३६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| स्येवारनेम्यादि । तस्माद्यद्यपि सर्वज्यानिं सर्वस्वापहरणं जीयते हीयते ग्लानिं प्राप्नोति, आत्मना चक्रनाभिस्थानीयेन चेद्यदि जीवति प्रधिना बाह्येन परिवारेणायमगात्क्षीणोऽयं यथा चक्रमरनेमिविमुक्तमेवमाहुः। जीवंश्चेद् अरनेमिस्थानीयेन वित्तेन पुनरुपचीयत इत्यभिप्रायः ॥ १५ ॥ | कि पहियेके अरे और नेमि आदि । अतः यद्यपि सर्वज्यानि—सर्वस्वापहरण होनेसे पुरुष हीन हो जाता—ग्लानिको प्राप्त हो जाता है, तथापि यदि वह चक्रकी नाभिस्थानीय अपने देहपिण्डसे जीवित है तो लोग यही कहते हैं कि यह प्रधि यानी बाह्य परिवारसे चला गया अर्थात् क्षीण हो गया, जिस प्रकार कि अरे और नेमिसे रहित चक्र । तात्पर्य यह है कि यदि वह जीवित रहता है तो रथकी नेमिरूप धनसे फिर भी वृद्धि-को प्राप्त हो जाता है ॥ १५ ॥ |
लोकत्रयकी प्राप्तिके साधन तथा देवलोककी उत्कृष्टताका वर्णन
| एवं पाङ्क्तेन दैववित्तविद्यासंयुक्तेन कर्मणाऽन्नात्मकः प्रजापतिर्भवतीति व्याख्यातम् । अनन्तरं च जायादिवित्तं परिवारस्थानीयमित्युक्तम् । तत्र पुत्रकर्मापरविद्यानां लोकप्राप्तिसाधनत्वमात्रं सामान्येनावगतम्, न पुत्रादीनां लोकप्राप्तिफलं प्रति विशेषसम्बन्धनियमः । सोऽयं पुत्रादीनां साधनानां साध्यविशेषसम्बन्धो वक्तव्य इत्युत्तरकण्डिका प्रणीयते— | इस प्रकार दैववित्त और विद्यासंयुक्त पाङ्क्तकर्मके द्वारा प्रजापति अन्नत्रयरूप है—इसकी व्याख्या कर दी गयी । उसके पीछे परिवारस्थानीय स्त्री आदि वित्तका वर्णन किया गया । वहाँ पुत्र, कर्म और अपरविद्याका सामान्यरूपसे लोकप्राप्तिमें साधन होनामात्र विदित होता है; पुत्रादिका लोकप्राप्तिरूप फलके प्रति विशेष सम्बन्ध होनेका नियम नहीं जान पड़ता। वह पुत्रादि साधनोंका साध्यविशेषोंके साथ सम्बन्ध बतलाना है—इसीलिये आगेकी कण्डिका रची जाती है— |
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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६५
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६५
अथ त्रयो वाव लोका मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोक इति सोऽयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव जय्यो नान्येन कर्मणा कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोको देवलोको वै लोकानाꣳ श्रेष्ठस्तस्माद्विद्यां प्रशꣳसन्ति ॥ १६ ॥
अथ मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक—ये ही तीन लोक हैं। वह यह मनुष्यलोक पुत्रके द्वारा ही जीता जा सकता है, किसी अन्य कर्मसे नहीं। तथा पितृलोक कर्मसे और देवलोक विद्यासे जीते जा सकते हैं। लोकोंमें देवलोक ही श्रेष्ठ है; इसलिये विद्याकी प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| अथेति वाक्योपन्यासार्थः। त्रयः, वावेत्यवधारणार्थः। त्रय एव शास्त्रोक्तसाधनार्हा लोकाः, न न्यूना नाधिका वा। के ते? इत्युच्यते—मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोक इति। | 'अथ' यह शब्द वाक्यारम्भके लिये है। 'त्रयो वाव' इसमें 'वाव' निश्चयार्थक है। शास्त्रोक्त साधनसे प्राप्त होने योग्य तीन ही लोक हैं; न इससे कम हैं, न अधिक। वे कौन-से हैं? सो बतलाये जाते हैं—मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक। |
| तेषां सोऽयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव साधनेन जय्यो जेतव्यः साध्यः—यथा च पुत्रेण जेतव्यस्तथोत्तरत्र वक्ष्यामः,—नान्येन कर्मणा, विद्यया वेति वाक्यशेषः। | उनमें वह यह मनुष्यलोक पुत्ररूप साधनके द्वारा ही जीता जा सकने योग्य, जीतनेके लायक अर्थात् साध्य (प्राप्त करने योग्य) है। वह पुत्रद्वारा किस प्रकार प्राप्तव्य है, सो आगे बतलावेंगे। किसी अन्य कर्म अथवा विद्यासे नहीं। यहाँ 'विद्यया वा' (अथवा विद्यासे) यह वाक्यशेष है। |
| कर्मणा अग्निहोत्रादिलक्षणेन केवलेन पितृलोको जेतव्यो न पुत्रेण नापि विद्यया। विद्यया | अग्निहोत्रादिरूप केवल कर्मसे पितृलोक जीतने योग्य है—पुत्रसे अथवा विद्यासे नहीं। तथा विद्यासे |
३६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| देवलोको न पुत्रेण नापि कर्मणा । | देवलोक प्राप्त होनेयोग्य है—पुत्रसे अथवा कर्मसे नहीं। |
| देवलोको वै लोकानां त्रयाणां श्रेष्ठः प्रशस्यतमः । तस्मात्तत्साधनत्वाद्दिद्यां प्रशंसन्ति ॥ १६ ॥ | तीनों लोकोंमें देवलोक ही श्रेष्ठ यानी सबसे अधिक प्रशंसनीय है। अतः उसका साधन होनेसे विद्याकी प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥ |
सम्प्रत्तिकर्म और उसका परिणाम
| एवं साध्यलोकत्रयफलभेदेन विनियुक्तानि पुत्रकर्मविद्याख्यानि त्रीणि साधनानि । जाया तु पुत्रकर्मार्थत्वान्न पृथक्साधनमिति पृथङ्नाभिहिता । वित्तं च कर्मसाधनत्वान्न पृथक्साधनम् । | इस प्रकार पुत्रकर्म और विद्यासंज्ञक तीन साधनोंका उनके साध्य लोकत्रयरूप फलके भेदसे विनियोग किया गया। स्त्री तो पुत्र और कर्मके लिये ही होनेके कारण कोई पृथक् साधन नहीं है; इसलिये उसका अलग वर्णन नहीं किया गया। वित्त भी कर्मका साधन होनेके कारण अलग साधन नहीं है। |
| विद्याकर्मणोर्लोकजयहेतुत्वं स्वात्मप्रतिलाभेनैव भवतीति प्रसिद्धम् । पुत्रस्य त्वक्रियात्मकत्वात्केन प्रकारेण लोकजयहेतुत्वमिति न ज्ञायते। अतस्तद्वक्तव्यमित्यथानन्तरमारभ्यते— | विद्या और कर्म अपने स्वरूपकी निष्पत्ति होनेसे ही लोकजयके हेतु होते हैं—यह प्रसिद्ध है। किन्तु पुत्र अक्रियात्मक है। वह किस प्रकार लोकजयका हेतु होता है—यह नहीं जाना जाता। अतः वह बतलाना है, इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है— |
अथातः सम्प्रत्तिर्यदा प्रैष्यन्मन्यतेऽथ पुत्रमाह त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोक इति स पुत्रः प्रत्याहाहं ब्रह्माहं
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६७
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६७
यज्ञोऽहं लोक इति यद्वै किञ्चानूक्तं तस्य सर्वस्य ब्रह्मेत्येकता । ये वै के च यज्ञास्तेषाँ सर्वेषां यज्ञ इत्येकता ये वै के च लोकास्तेषाँ सर्वेषां लोक इत्येकतैतावद्वा इदँसर्वमेतन्मा सर्वँ सन्नयमितोऽभुनजदिति तस्मात्पुत्रमनुशिष्टं लोक्यमाहुस्तस्मादेनमनुशासति स यदैवंविदस्माल्लोकात्प्रैत्यथैभिरेव प्राणैः सह पुत्रमाविशति । स यद्यनेन किञ्चिदक्ष्णयाऽकृतं भवति तस्मादेनँ सर्वस्मात्पुत्रो मुञ्चति तस्मात्पुत्रो नाम स पुत्रेणैवास्मिँल्लोके प्रतितिष्ठत्यथैनमेते दैवाः प्राणा अमृता आविशन्ति ॥ १७ ॥
अब सम्प्रत्ति [ कही जाती है— ] जब पिता यह समझता है कि मैं मरनेवाला हूँ तो वह पुत्रसे कहता है—'तू ब्रह्म है, तू यज्ञ है, तू लोक है।' वह पुत्र बदलेमें कहता है—'मैं ब्रह्म हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं लोक हूँ।' जो कुछ भी स्वाध्याय है, उस सबकी 'ब्रह्म' यह एकता है। जो कुछ भी यज्ञ हैं, उनकी 'यज्ञ' यह एकता है। और जो कुछ भी लोक हैं, उनकी 'लोक' यह एकता है। यह इतना ही गृहस्थ पुरुषका सारा कर्त्तव्य है। [ फिर पिता यह मानने लगता है कि ] यह मेरे इस भारको लेकर इस लोकसे जानेपर मेरा पालन करेगा। अतः इस प्रकार अनुशासन किये हुए पुत्रको 'लोक्य' ( लोकप्राप्तिमें हितकर ) कहते हैं। इसीसे पिता उसका अनुशासन करता है। इस प्रकार जाननेवाला वह पिता जब इस लोकसे जाता है तो अपने उन्हीं प्राणोंके सहित पुत्रमें व्याप्त हो जाता है। यदि किसी कोणच्छिद्र ( प्रमाद ) से उस ( पिता ) के द्वारा कोई कर्त्तव्य नहीं किया होता है तो उस सबसे पुत्र उसे मुक्त कर देता है। इसीसे उसका नाम 'पुत्र' है। वह पिता पुत्रके द्वारा ही इस लोकमें प्रतिष्ठित होता है। फिर उसमें ये हिरण्यगर्भसम्बन्धी अमृतप्राण प्रवेश करते हैं ॥ १७ ॥