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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

५४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

५४६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| अमृता किं स्यामिति व्यवहितेन सम्बन्धः। <br><br> प्रत्युवाच याज्ञवल्क्यः— कथमिति यद्याक्षेपार्थम्, अनुमोदनं नेति होवाच याज्ञवल्क्य इति; प्रश्नश्चेत्प्रतिवचनार्थम्; नैव स्या अमृता, किं तर्हि ! यथैव लोके उपकरणवतां साधनवतां जीवितं सुखोपायभोगसम्पन्नम्; तथैव तद्वदेव तव जीवितं स्यात्; अमृतत्वस्य तु नाशा मनसाप्यस्ति वित्तेन वित्तसाध्येन कर्मणेति ॥ २ ॥ | अग्निहोत्रादि कर्मसे क्या मैं अमर हो सकती हूँ—इस प्रकार इसका व्यवहित पदोंसे सम्बन्ध है। <br><br> याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया—'नहीं।' यदि 'कथम्' पदको आक्षेपार्थक माना जाय तो याज्ञवल्क्यने 'नहीं' ऐसा कहकर उसका अनुमोदन किया है; और यदि उसे प्रश्नार्थक माना जाय तो यह उत्तरके लिये है, अर्थात् तू उससे अमर नहीं हो सकती; तो क्या होगा ? लोकमें जैसा उपकरणवानोंका यानी नाना सामग्रियोंसे सम्पन्न लोगोंका जीवन सुखके साधनभूत भोगोंसे सम्पन्न होता है, वैसा ही तेरा जीवन भी हो जायगा; धनसे अर्थात् धनसाध्य कर्मसे अमृतत्वकी तो मनसे भी आशा नहीं है ॥ २ ॥ |


मैत्रेयीका अमृतत्वसाधनविषयक प्रश्न

सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान्वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥ ३ ॥

उस मैत्रेयीने कहा, 'जिससे मैं अमर नहीं हो सकती, उसे लेकर मैं क्या करूँगी ? श्रीमान् जो कुछ अमृतत्वका साधन जानते हों, वही मुझे बतलावें ॥ ३ ॥

सा होवाच मैत्रेयी; एवमुक्ता प्रत्युवाच मैत्रेयी—यद्येवं येनाहंउस मैत्रेयीने कहा; इस प्रकार कहे जानेपर मैत्रेयीने उत्तर दिया—यदि ऐसी बात है तो जिससे मैं

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मैत्रेयीको उपदेश

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५४७

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५४७


नामृता स्याम्, किम॒हं तेन वि॒त्तेन कुर्याम् ? यदेव भगवान्केवलममृतत्वसाधनं वेद, तदेवामृतत्वसाधनं मे मह्यं ब्रूहि ॥ ३ ॥अमृत नहीं हो सकती, उस धनसे मैं क्या करूँगी ? श्रीमान् जो कुछ केवल अमृतत्वका साधन जानते हों, उस अमृतत्वके साधनका ही मुझे उपदेश करें ॥ ३ ॥

याज्ञवल्क्यजीका आश्वासन

स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया बतारे नः सती प्रियं भाषस एह्यास्स्व व्याख्यास्यामि ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ४ ॥

उन याज्ञवल्क्यजीने कहा, 'धन्य ! अरी मैत्रेयी, तू पहले भी हमारी प्रिया रही है और इस समय भी प्रिय लगनेवाली ही बात कह रही है। अच्छा आ, बैठ जा, मैं तेरे प्रति उसकी व्याख्या करूँगा, तू व्याख्यान किये हुए मेरे वाक्योंके अर्थका चिन्तन करना' ॥ ४ ॥

स होवाच याज्ञवल्क्यः । एवं वित्तसाध्येऽमृतत्वसाधने प्रत्याख्याते, याज्ञवल्क्यः स्वाभिप्रायसम्पत्तौ तुष्ट आह; स होवाच—प्रियेष्टा, बतेत्यनुकम्प्याह, अरे मैत्रेयि नोऽस्माकं पूर्वमपि प्रिया सती भवन्ती इदानीं प्रियमेव चित्तानुकूलं भाषसे; अत एह्यास्स्वोपविश व्याख्यास्यामि—यत्ते तव इष्टम् अमृतत्वसाधनम् आत्मज्ञानं कथयिष्यामि। व्याचक्षाण-उन याज्ञवल्क्यजीने कहा। इस प्रकार धनसे निष्पन्न होनेवाले अमृतत्वके साधनका त्याग कर दिये जानेपर याज्ञवल्क्यने अपने अभिप्रायकी पूर्तिसे संतुष्ट होकर कहा। वे बोले—बत अर्थात् उन्होंने अनुकम्पा करते हुए कहा—अरी मैत्रेयी ! तू हमारी प्रिया–इष्टा है अर्थात् पहलेहीसे हमारी प्रिया होकर इस समय भी तू प्रिय यानी अनुकूल ही भाषण कर रही है; इसलिये आ, बैठ जा, मैं तेरे अभीष्ट अमृतत्वके साधनभूत आत्मज्ञानकी व्याख्या अर्थात् उपदेश

५४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५४८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| स्य तु मे मम व्याख्यानं कुर्वतो | करूँगा। मेरे व्याख्यान करनेपर | | निदिध्यासस्व वाक्यान्यर्थतो | तू उसका निदिध्यासन करना, अर्थात् मेरे वाक्योंका अर्थतः निश्चय | | निश्चयेन ध्यातुमिच्छेति ॥ ४ ॥ | करके ध्यान करनेकी इच्छा करना ॥ ४ ॥ |


प्रियतम आत्माके लिये ही अन्य वस्तुएँ प्रिय होती हैं

स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति । न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति । न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति । न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति । न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति । न वा अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति । न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति । न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति । न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति । न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५४९

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५४९


कामाय सर्वं प्रियं भवति । आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् ॥ ५ ॥

उन्होंने कहा—'अरी मैत्रेयि ! यह निश्चय है कि पतिके प्रयोजनके लिये पति प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये पति प्रिय होता है; स्त्रीके प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया नहीं होती, अपने ही प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया होती है; पुत्रोंके प्रयोजनके लिये पुत्र प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये पुत्र प्रिय होते हैं; धनके प्रयोजनके लिये धन प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये धन प्रिय होता है, ब्राह्मणके प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय होता है; क्षत्रियके प्रयोजनके लिये क्षत्रिय प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये क्षत्रिय प्रिय होता है; लोकोंके प्रयोजनके लिये लोक प्रिय नहीं होते अपने ही प्रयोजनके लिये लोक प्रिय होते हैं; देवताओंके प्रयोजनके लिये देवता प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये देवता प्रिय होते हैं; प्राणियोंके प्रयोजनके लिये प्राणी प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये प्राणी प्रिय होते हैं; तथा सबके प्रयोजनके लिये सब प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये सब प्रिय होते हैं, अरी मैत्रेयि ! यह आत्मा ही दर्शनीय, श्रवणीय, मननीय और ध्यान किये जाने योग्य है। हे मैत्रेयि ! इस आत्माके ही दर्शन, श्रवण, मनन एवं विज्ञानसे इस सबका ज्ञान हो जाता है ॥ ५ ॥

| स होवाच—अमृतत्वसाधनं वैराग्यमुपदिदिक्षुर्जायापतिपुत्रादिभ्यो विरागमुत्पादयति तत्संन्यासाय । न वै—वैशब्दः प्रसिद्धस्मरणार्थः; प्रसिद्धमेवैतल्लोके; | अमृतत्वके साधन वैराग्यका उपदेश करनेकी इच्छासे याज्ञवल्क्यजी स्त्री, पति एवं पुत्रादिसे, उनका त्याग करनेके लिये, वैराग्य उत्पन्न कराते हैं। उन्होंने कहा—'न वै'—यहाँ 'वै' शब्द प्रसिद्ध वस्तुकी याद दिलानेके लिये है अर्थात् लोकमें यह प्रसिद्ध ही है |

५५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५५०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| पत्युर्भर्तुः कामाय प्रयोजनाय जायायाः पतिः प्रियो न भवति, किं तर्ह्यात्मनस्तु कामाय प्रयोजनायैव भार्यायाः पतिः प्रियो भवति । तथा न वा अरे जायाया इत्यादि समानमन्यत्, न वा अरे पुत्राणाम्, न वा अरे वित्तस्य, न वा अरे ब्रह्मणः, न वा अरे क्षत्रस्य, न वा अरे लोकानाम्, न वा अरे देवानाम्, न वा अरे भूतानाम्, न वा अरे सर्वस्य, पूर्वं पूर्वं यथासन्ने प्रीतिसाधने वचनम्; तत्र तत्रेष्टतरत्वाद्वैराग्यस्य; सर्वग्रहणमुक्तानुक्तार्थम् । <br><br> तस्माल्लोकप्रसिद्धमेतत्—आत्मैव प्रियः, नान्यत् । 'तदेतत्प्रेयः पुत्रात्' इत्युपन्यस्तम्, तस्यैतद् वृत्तिस्थानीयं प्रपञ्चितम् । तस्मादात्मप्रीतिसाधनत्वाद्गौणी अन्यत्र प्रीतिः, आत्मन्येव मुख्या । तस्मा- | कि पति यानी भर्ताके प्रयोजनसे स्त्रीको पति प्रिय नहीं होता । तो फिर क्या बात है ? अपने लिये अर्थात् अपने ही प्रयोजनके लिये स्त्रीको पति प्रिय होता है। इसी प्रकार 'न वा अरे जायायै' इत्यादि शेष वाक्यका अर्थ भी इसीके समान समझना चाहिये। अर्थात् हे मैत्रेयि ! न पुत्रोंके, न धनके, न ब्राह्मणके, न क्षत्रियके, न लोकके, न देवोंके, न भूतोंके और न अन्य सभीके प्रयोजनके लिये वे प्रिय होते । यहाँ जो-जो प्रीतिके समीपतर साधन हैं, उनका पहले-पहले वर्णन किया है; क्योंकि उन-उनमें ही वैराग्य अधिकाधिक अभीष्ट है 'सर्व' शब्दका ग्रहण कहे और न कहे हुए सभी साधनोंको सूचित करनेके लिये है। <br><br> अतः यह लोकमें प्रसिद्ध है कि आत्मा ही प्रिय है, अन्य कुछ नहीं। इसका 'तदेतत्प्रेयः पुत्रात्' इस वाक्यसे उल्लेख किया है, उसी वाक्यका यह व्याख्यारूप वचन कहा है। अतः, आत्माकी प्रीतिका साधन होनेके कारण, जो अन्यत्र प्रीति है यह गौणी है, आत्मामें ही मुख्य प्रीति है। अतः हे मैत्रेयि ! आत्मा |


१. वह यह आत्मा पुत्रसे प्रिय है।

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ५५१

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ५५१


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
दात्मा वै अरे द्रष्टव्यो दर्शनार्हः, दर्शनविषयमापादयितव्यः; श्रोतव्यः पूर्वमाचार्यत आगमतश्च; पश्चान्मन्तव्यस्तर्कतः; ततो निदिध्यासितव्यो निश्चयेन ध्यातव्यः; एवं ह्यसौ दृष्टो भवति श्रवणमनननिदिध्यासनसाधनैर्निर्वर्तितैः । यदैकत्वमेतान्युपगतानि, तदा सम्यग्दर्शनं ब्रह्मैकत्वविषयं प्रसीदति, नान्यथा श्रवणमात्रेण ।ही द्रष्टव्य—दर्शन करने योग्य अर्थात् साक्षात्कारका विषय करने योग्य है, तथा पहले आचार्य और शास्त्रद्वारा श्रवण करनेयोग्य एवं पीछे तर्कद्वारा मनन करने योग्य है, इसके पश्चात् वह निदिध्यासितव्य अर्थात् निश्चयसे ध्यान करने योग्य है। क्योंकि इस प्रकार श्रवण, मनन एवं निदिध्यासनरूप साधनोंके सम्पन्न होनेपर ही इसका साक्षात्कार होता है। जिस समय इन सब साधनोंकी एकता होती है, उसी समय ब्रह्मैकत्वविषयक सम्यक् दर्शनका प्रसाद होता है । अन्यथा केवल श्रवणमात्रसे उसकी स्फुटता नहीं होती ।
यद्ब्रह्मक्षत्रादि कर्मनिमित्तं वर्णाश्रमादिलक्षणम् आत्मन्यविद्याध्यारोपितप्रत्ययविषयं क्रियाकारकफलात्मकमविद्याप्रत्ययविषयम्—रज्ज्वामिव सर्पप्रत्ययः, तदुपमर्दनार्थम् आह—आत्मामें अविद्यासे आरोपित प्रतीतिका विषयभूत जो ब्राह्मण और क्षत्रियादि वर्णाश्रमादिरूप कर्मका निमित्त है, वह क्रिया, कारक और फलरूप तथा रज्जुमें आरोपित सर्पप्रतीतिके समान अविद्याजनित प्रतीतिका विषय है । उसकी निवृत्तिके लिये श्रुति कहती है—
आत्मनि खल्वरे मैत्रेयि दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इदं सर्वं विदितं विज्ञातं भवति ॥ ५ ॥—हे मैत्रेयि ! आत्माका दर्शन, श्रवण, मनन और ज्ञान होनेपर निश्चय ही यह सब विदित अर्थात् ज्ञात हो जाता है ॥ ५ ॥

५५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

५५२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

आत्मा सबसे अभिन्न है, इसका प्रतिपादन

| ननु कथमन्यस्मिन्विदितेऽन्यद्विदितं भवति ? <br><br> नैष दोषः; न हि आत्मव्यतिरेकेणान्यत्किञ्चिदस्ति; यद्यस्ति न तद्विदितं स्यात्; न त्वन्यदस्ति; आत्मैव तु सर्वम्; तस्मात्सर्वमात्मनि विदिते विदितं स्यात् । कथं पुनरात्मैव सर्वमित्येतच्छावयति— | शङ्का—किंतु अन्यका ज्ञान होनेपर उससे भिन्न वस्तुका ज्ञान कैसे हो जाता है ? <br><br> समाधान—यह कोई दोष नहीं हैं; क्योंकि आत्माको छोड़कर और कोई भी वस्तु नहीं है; यदि होती तो [आत्मज्ञानसे ही] उसका ज्ञान भी न होता; किंतु अन्य वस्तु तो है ही नहीं, आत्मा ही तो सब कुछ है; अतः आत्माका ज्ञान होनेपर सभीका ज्ञान हो जाता है । किंतु आत्मा ही सब कुछ किस प्रकार है, सो श्रुति बतलाती है । |

ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः क्षत्रं वेद लोकास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो लोकान्वेद देवास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो देवान्वेद भूतानि तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेदेदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमानि भूतानीदँ सर्वं यदयमात्मा ॥ ६ ॥

ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है जो ब्राह्मणजातिको आत्मासे भिन्न जानता है। क्षत्रियजाति उसे परास्त कर देती है जो क्षत्रियजातिको आत्मासे भिन्न देखता है । लोक उसे परास्त कर देते हैं जो लोकोंको आत्मासे भिन्न देखता है । देवगण उसे परास्त कर देते हैं जो देवताओंको आत्मासे भिन्न देखता है। भूतगण उसे परास्त कर देते हैं जो भूतोंको आत्मासे भिन्न देखता

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ५५३

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ५५३


है। सभी उसे परास्त कर देते हैं जो सबको आत्मासे भिन्न देखता है। यह ब्राह्मणजाति, यह क्षत्रियजाति, ये लोक, ये देवगण, ये भूतगण और ये सब जो कुछ भी हैं, यह सब आत्मा ही है ॥ ६ ॥

| ब्रह्म ब्राह्मणजातिस्तं पुरुषं परादात्परादध्यात्पराकुर्यात्; कम्? योऽन्यत्रात्मन आत्मस्वरूपव्यतिरेकेण—आत्मैवेन भवतीयं ब्राह्मणजातिरिति— तां यो वेद, तं परादध्यात्सा ब्राह्मणजातिरनात्मस्वरूपेण मां पश्यतीति; परमात्मा हि सर्वेषामात्मा। | ब्रह्म-ब्राह्मणजाति उस पुरुषको परादात्-पराहित-पराकृत यानी परास्त कर देती है; किसे ? जो आत्मासे भिन्न-आत्मस्वरूपको छोड़कर अर्थात् यह ब्राह्मणजाति आत्मा ही नहीं है, इस प्रकार जो उसे जानता है, उसे वह ब्राह्मणजाति यह सोचकर कि यह मुझे अनात्मारूपसे देखता है, परास्त कर देती है; क्योंकि परमात्मा ही सबका आत्मा है। | | तथा क्षत्रं क्षत्रियजातिः, तथा लोकाः, देवाः, भूतानि, सर्वम्। इदं ब्रह्मेति—यान्यनुक्रान्तानि तानि सर्वाणि, आत्मैव, यदयमात्मा—योऽयमात्मा द्रष्टव्यः श्रोतव्य इति प्रकृतः; यस्मादात्मनो जायत आत्मन्येव लीयत आत्ममयं च स्थितिकाले, आत्मव्यतिरेकेणाग्रहणात्, आत्मैव सर्वम् ॥ ६ ॥ | इसी प्रकार क्षत्र—क्षत्रियजाति तथा लोक, देव, भूत और सर्व, जिनका 'इदं ब्रह्म इदं क्षत्रम्' इत्यादिरूपसे अनुक्रम है, वे सब आत्मामें ही हैं। जो यह आत्मा कि द्रष्टव्यः, श्रोतव्यः इत्यादिरूपसे प्रकरणप्राप्त है; क्योंकि सब कुछ आत्मासे ही उत्पन्न होता है, आत्मामें ही लीन होता है तथा स्थितिकालमें भी आत्मस्वरूप ही है। आत्माको छोड़कर उपलब्ध न होनेके कारण सब कुछ आत्मा ही है ॥ ६ ॥ |


सबकी आत्मस्वरूपताके ग्रहणमें दुन्दुभि, शङ्ख और वीणाका दृष्टान्त

| कथं पुनरिदानीमिदं सर्वमा- | प्रश्न-किंतु इस समय (स्थितिकालमें) 'यह सब आत्मा ही है' |

५५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५५४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| त्मैवेति ग्रहीतुं शक्यते ? <br><br> चिन्मात्रानुगमात्सर्वत्र चित्स्वरूपतैवेति गम्यते । तत्र दृष्टान्त उच्यते—यत्स्वरूपव्यतिरेकेणाग्रहणं यस्य, तस्य तदात्मत्वमेव लोके दृष्टम् । | ऐसा किस प्रकार ग्रहण किया जा सकता है ? <br><br> उत्तर—सर्वत्र चिन्मात्रकी अनुवृत्ति होनेके कारण सबकी चित्स्वरूपता ही है—ऐसा जाना जाता है। इस विषयमें दृष्टान्त बताया जाता है—जिसका जिसके स्वरूपसे अलग ग्रहण नहीं किया जा सकता, वह तद्रूप ही होता है—ऐसा लोकमें देखा गया है। |

स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्शब्दाञ्शक्नुयाद्ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ७ ॥

वह दृष्टान्त ऐसा है कि जिस प्रकार ताडन किये जाते हुए दुन्दुभि (नक्कारे) के बाह्य शब्दोंको कोई ग्रहण नहीं कर सकता, किंतु दुन्दुभि या दुन्दुभिके आघातको ग्रहण करनेसे उसका शब्द भी ग्रहण कर लिया जाता है ॥ ७ ॥

| स यथा— स इति दृष्टान्तः, लोके यथा दुन्दुभेर्भेर्यादेः, हन्यमानस्य ताड्यमानस्य दण्डादिना, न, बाह्याञ्छब्दान् बहिर्भूताञ्छब्दविशेषान् दुन्दुभिशब्दसामान्यान्निष्कृष्टान् दुन्दुभिशब्दविशेषान् न शक्नुयाद् ग्रहणाय ग्रहीतुम्; | स यथा अर्थात् वह दृष्टान्त ऐसा है—लोकमें जिस प्रकार दण्डादिसे हनन-ताडन किये जाते हुए दुन्दुभि-भेरी आदिके बाह्य शब्दोंको अर्थात् बाहर फैले हुए शब्दविशेषोंको—दुन्दुभिके सामान्य शब्दमेंसे निकाले हुए दुन्दुभिके विशेष शब्दोंको कोई ग्रहण नहीं कर सकता । दुन्दुभिका ग्रहण |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५५५

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५५५


| दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन, दुन्दुभिशब्दसामान्यविशेषत्वेन दुन्दुभिशब्दा एत इति, शब्दविशेषा गृहीता भवन्ति, दुन्दुभिशब्दसामान्यव्यतिरेकेणाभावात्तेषाम् ।<br><br>दुन्दुभ्याघातस्य वा, दुन्दुभेराहननम् आघातः, दुन्दुभ्याघातविशिष्टस्य शब्दसामान्यस्य ग्रहणेन तद्गता विशेषा गृहीता भवन्ति, न तु त एव निर्भिद्य ग्रहीतुं शक्यन्ते, विशेषरूपेणाभावात्तेषाम् । तथा प्रज्ञानव्यतिरेकेण स्वप्नजागरितयोर्न कश्चिद्वस्तुविशेषो गृह्यते; तस्मात्प्रज्ञानव्यतिरेकेण अभावो युक्तस्तेषाम् ॥ ७ ॥ | होनेसे अर्थात् दुन्दुभिके सामान्य शब्दके विशेषरूपसे 'ये दुन्दुभिके शब्द हैं, इस प्रकार वे विशेष शब्द भी गृहीत हो जाते हैं, क्योंकि दुन्दुभिके सामान्य शब्दको छोड़कर तो उनकी सत्ता ही नहीं है ।<br><br>अथवा दुन्दुभिके आघात—दुन्दुभिके आहननका नाम आघात है--उस दुन्दुभ्याघातविशिष्ट शब्द सामान्यका ग्रहण होनेसे उसके अन्तर्वर्ती विशेषोंका भी ग्रहण हो जाता है । उससे अलग करके उनका ग्रहण नहीं हो सकता, क्योंकि विशेषरूपसे तो उनका अभाव है । इसी प्रकार स्वप्न और जागरितको किसी भी वस्तुविशेषका प्रज्ञानसे अलग ग्रहण नहीं किया जा सकता; अतः प्रज्ञानसे भिन्न उनका अभाव उचित ही है ॥ ७ ॥ |


स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्शब्दाञ्शक्नुयाद्ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥

वह [ दूसरा दृष्टान्त ] ऐसा है—जैसे कोई बजाये जाते हुए शङ्खके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं होता, किंतु शङ्खके अथवा शङ्खके बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है ॥ ८ ॥

| ५५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |

५५६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| तथा स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य शब्देन संयोज्यमानस्य आपूर्यमाणस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयादित्येवमादि पूर्ववत् । ८ । | तथा वह [दूसरा दृष्टान्त] ऐसा है—जिस प्रकार बजाये जाते हुए शब्दसे संयुक्त किये जाते हुए अर्थात् फूँके जाते हुए शङ्खके बाह्य शब्दोंको कोई ग्रहण नहीं कर सकता इत्यादि पूर्ववत् ऐसा ही अर्थ है ॥ ८ ॥ |


स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥

वह [तीसरा दृष्टान्त] ऐसा है—जैसे कोई बजायी जाती हुई वीणाके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं होता; किंतु वीणा या वीणाके स्वरका ग्रहण होनेपर उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है ॥ ९ ॥

| तथा वीणायै वाद्यमानायै—<br>वीणाया वाद्यमानायाः। अनेकदृष्टान्तोपादानमिह सामान्यबहुत्वख्यापनार्थम्—अनेके हि विलक्षणाश्चेतनाचेतनरूपाः सामान्यविशेषाः—तेषां पारम्पर्यगत्या यथैकस्मिन्महासामान्येऽन्तर्भावः प्रज्ञानघने, कथं नाम प्रदर्शयितव्य इति; दुन्दुभिशङ्खवीणाशब्दसामान्यविशेषाणां यथा | इसी प्रकार 'वीणायै वाद्यमानायै'<br>अर्थात् बजायी जाती हुई वीणाका इत्यादि समझना चाहिये। यहाँ अनेक दृष्टान्तोंका ग्रहण सामान्योंकी बहुलता प्रकट करनेके लिये है। चेतन और अचेतन, सामान्य एवं विशेष अनेक और विलक्षण हैं। उनका जिस प्रकार परम्परा गतिसे एक प्रज्ञानघन महासामान्यमें अन्तर्भाव है—यही किसी-न-किसी तरह दिखलाना है। जिस प्रकार दुन्दुभि, शङ्ख और वीणाके सामान्य एवं विशेष |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५५७

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५५७


| शब्दत्वेऽन्तर्भावः, एवं स्थितिकाले तावत्सामान्यविशेषाव्यतिरेकाद् ब्रह्मैकत्वं शक्यमवगन्तुम् ॥ ९ ॥ | शब्दोंका शब्दत्वमें अन्तर्भाव हो जाता है, उसी प्रकार स्थितिकालमें सामान्य और विशेषसे अभिन्न होनेके कारण ब्रह्मकी एकताका ज्ञान भी हो सकता है ॥ ६ ॥ |


परमात्माके निःश्वासभूत ऋग्वेदादिका उनसे अभिन्नत्वप्रतिपादन

| एवमुत्पत्तिकाल प्रागुत्पत्तेर्ब्रह्मैवेति शक्यमवगन्तुम्। यथाग्नेर्विस्फुलिङ्गधूम्राङ्गारार्चिषां प्राग्विभागादग्निरिवेति भवत्यग्नेकत्वम्, एवं जगन्नामरूपविकृतं प्रागुत्पत्तेः प्रज्ञानघन एवेति युक्तं ग्रहीतुमित्येतदुच्यते— | इस प्रकार यह जाना जा सकता है कि उत्पत्तिकालमें उत्पत्तिसे पूर्व ब्रह्म ही था। जिस प्रकार अग्निकी चिनगारी, धूम, अंगार और ज्वालाओंका विभाग होनेसे पूर्व अग्नि ही है, अतः अग्निकी एकता सिद्ध होती है, उसी प्रकार नाम-रूप-विकारको प्राप्त हुआ जगत् उत्पत्तिसे पूर्व प्रज्ञानघन ही था—ऐसा ग्रहण करना उचित है—इसीसे यह कहा जाता है— |

स यथार्द्राग्नेरभ्याहितात्पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि निश्वसितानि ॥ १० ॥

वह [ चौथा दृष्टान्त— ] जिस प्रकार जिसका ईंधन गीला है, ऐसे आधान किये हुए अग्निसे पृथक् धुआँ निकलता है, हे मैत्रेयि ! इसी प्रकार ये जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वाङ्गिरस (अथर्ववेद), इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, मन्त्रविवरण और अर्थवाद हैं, वे इस महद्भूतके ही निःश्वास हैं ॥ १० ॥

| ५५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |

५५८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| स यथा—आर्द्रेन्धाग्नेः, आर्द्रैरेधोभिरिद्धोऽग्निरार्द्रेन्धाग्निः, तस्मात्, अभ्याहितात्पृथग्धूमाः, पृथग्, नानाप्रकारम्, धूमग्रहणं विस्फुलिङ्गादिप्रदर्शनार्थम्, धूमविस्फुलिङ्गादयो विनिश्चरन्ति विनिर्गच्छन्ति । | वह [चौथा दृष्टान्त-] जिस प्रकार आर्द्रेन्धा अग्निसे–जो आर्द्र (गीले) ईंधनसे बढ़ाया गया हो उसे आर्द्रेन्धाग्नि कहते हैं। उस आधान किये हुए अग्निसे जैसे पृथक् धूआं निकलता है, पृथक् यानी नाना प्रकारका धूआँ। यहाँ 'धूम' शब्दका ग्रहण चिनगारी आदिको प्रदर्शित करनेके लिये है। अर्थात् धूम और चिनगारी आदि निकलते हैं। | | एवम्— यथायं दृष्टान्तः, अरे मैत्रेय्यस्य परमात्मनः प्रकृतस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतत्, निश्वसितमिव निश्वसितम्; यथा अप्रयत्नेनैव पुरुषनिश्वासो भवत्येवं वा अरे। | इसी प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त है, हे मैत्रेयि ! इस परमात्मा यानी प्रकृत महद्भूतका यह निःश्वसित है अर्थात् निःश्वसितके समान निःश्वसित है; जिस प्रकार बिना प्रयत्नके ही पुरुषका निःश्वास होता है, अरे ! उसी प्रकार [उस विज्ञानघनसे यह जगत् उत्पन्न हुआ है]। | | किं तन्निश्वसितमिव ततो जातमित्युच्यते—यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः— चतुर्विधं मन्त्रजातम्, इतिहास इत्युर्वशीपुरूरवसोः संवादादिः—"उर्वशी हाप्सराः" इत्यादिब्राह्मणमेव, पुराणम् "असद्वा इदमग्र आसीत्" (तै० उ० २।६।१) इत्यादि, विद्या देवजनविद्या वेदः सोऽयमित्याद्या, उपनिषदः "प्रि- | उससे निःश्वासके समान क्या उत्पन्न हुआ है ? जो यह ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद चार प्रकारका मन्त्रसमुदाय है तथा इतिहास यानी उर्वशी-पुरूरवाका संवादादि "उर्वशी हाप्सराः" इत्यादि ब्राह्मण ही इतिहास है, पुराण–"आरम्भमें यह असत् ही था" इत्यादि, विद्या–'वेदः सोऽयम्' इत्यादि देवजनविद्या, |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ५५९

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ५५९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
यमित्येतदुपासीत" (बृ० उ० ४ । १ । ३) इत्याद्याः, श्लोका ब्राह्मणप्रभवा मन्त्राः "तदेते श्लोकाः" (बृ०उ० ४।३।११) इत्यादयः; सूत्राणि वस्तुसङ्ग्रहवाक्यानि वेदे यथा—"आत्मेत्येवोपासीत" (१ । ४ । ७) इत्यादीनि, अनुव्याख्यानानि मन्त्रविवरणानि, व्याख्यानान्यर्थवादाः, अथवा वस्तुसङ्ग्रहवाक्यविवरणान्यनुव्याख्यानानि यथा चतुर्थाध्याये 'आत्मेत्येवोपासीत' इत्यस्य, यथा वा 'अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवम्' (१ । ४ । १०) इत्यस्यायमेवाध्यायशेषः, मन्त्रविवरणानि व्याख्यानानि, एवमष्टविधं ब्राह्मणम्।उपनिषद्—"प्रिय है—इस प्रकार उपासना करे" इत्यादि, श्लोक—"तदेते श्लोकाः" इत्यादि ब्राह्मणभागके मन्त्र, सूत्र—वस्तुसंग्रहवाक्य—जिस प्रकार कि वेदमें "आत्मा है—इस प्रकार उपासना करे" इत्यादि मन्त्र हैं, अनुव्याख्यान—मन्त्रविवरण, व्याख्यान—अर्थवाद अथवा वस्तुसंग्रहवाक्यके विवरण ही अनुव्याख्यान हैं, जिस प्रकार चतुर्थ अध्यायमें 'आत्मेत्येवोपासीत' इस वाक्यकी व्याख्या है, अथवा 'अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवम्' इस वाक्यका व्याख्यान यह शेष अध्याय ही है। मन्त्रविवरणका अर्थ मन्त्रव्याख्यान है। इस प्रकार [इतिहासादि पदोंसे कहा हुआ] आठ प्रकारका ब्राह्मणभाग है।
एवं मन्त्रब्राह्मणयोरेव ग्रहणम्, नियतरचनावतो विद्यमानस्यैव वेदस्याभिव्यक्तिः पुरुषनिश्श्वासवत्, न च पुरुषबुद्धिप्रयत्नपूर्वकः; अतः प्रमाणं निरपेक्ष एव स्वार्थे; तस्माद्यत्तेनोक्तं तत्तथैव प्रतिपत्तव्यम्, आत्मनःइस प्रकार [निःश्वसित-श्रुतिके सामर्थ्यसे ऋग्वेदादि शब्दोंसे] मन्त्र और [इतिहासादिसे] ब्राह्मणोंका ही ग्रहण करना चाहिये। पुरुषके निःश्वासोंके समान नियतरचनावान् विद्यमान वेदकी ही अभिव्यक्ति हुई है, पुरुषकी बुद्धिके प्रयत्नपूर्वक इनकी रचना नहीं हुई। इसलिये यह अपने निरपेक्ष अर्थमें ही प्रमाण है। अतः उसने ज्ञान या कर्म जिसका जैसा

५६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५६०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| श्रेय इच्छद्भिः, ज्ञानं वा कर्म वेति । | निरूपण किया है, कल्याणकामियोंको उसे वैसा ही समझना चाहिये। | | नामप्रकाशवशा हि रूपस्य विक्रियाव्यवस्था । नामरूपयोरेव हि परमात्मोपाधिभूतयोर्व्याक्रियमाणयोः सलिलफेनवत्तत्त्वान्यत्वेनानिर्वक्तव्ययोः सर्वावस्थयोः संसारत्वम्—इत्यतो नाम्न एव निश्वसितत्वमुक्तम्, तद्वचनेनैवेतरस्य निश्वसितत्वसिद्धेः । | रूपके विकारकी व्यवस्था नाम-प्रकाशके ही अधीन है। जल और फेनके समान जिनका वास्तविक अथवा अवास्तविक रूपसे निरूपण नहीं किया जा सकता; उन परमात्माके उपाधिभूत एवं विकारको प्राप्त होते हुए सम्पूर्ण अवस्थाओंमें स्थित नाम और रूपको ही संसार कहते हैं, इसलिये नामके ही निःश्वसित होनेका प्रतिपादन किया है; क्योंकि उसके निरूपणसे ही रूपका भी निःश्वसितत्व सिद्ध हो जाता है। | | अथवा सर्वस्य द्वैतजातस्य अविद्याविषयत्वमुक्तम्—"ब्रह्म तं परादात् ॰ ॰ ॰ 'इदं सर्वं यदयमात्मा" (२।४।६) इति । तेन वेदस्याप्रामाण्यमाशङ्क्यते । तदाशङ्कानिवृत्त्यर्थमिदमुक्तम् । पुरुषनिश्वासवदप्रयत्नोत्थितत्वात्प्रमाणं वेदः, न यथा अन्यो ग्रन्थ इति ॥ १० ॥ | अथवा "ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है...यह सब जो कुछ है आत्मा है" इस मन्त्रद्वारा सम्पूर्ण द्वैतवर्गको अविद्याका कार्य बतलाया है। इससे [अविद्याकल्पित सिद्ध होनेके कारण] वेदके अप्रामाणिक होनेकी आशङ्का होती है। उस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये ही यह कहा है—पुरुषके निःश्वासके समान बिना प्रयत्नके उत्पन्न हुआ होनेके कारण वेद प्रमाण है, यह अन्य ग्रन्थकी तरह [पुरुषप्रयत्नजनित] नहीं है ॥ १० ॥ |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५६१

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५६१

आत्मा ही सबका आश्रय है—इसमें दृष्टान्त

| किञ्चान्यत्, न केवलं स्थित्युत्पत्तिकालयोरेव प्रज्ञानव्यतिरेकेणाभावाज्जगतो ब्रह्मत्वम्, प्रलयकाले च। जलबुद्बुदफेनादीनामिव सलिलव्यतिरेकेणाभावः, एवं प्रज्ञानव्यतिरेकेण तत्कार्याणां नामरूपकर्मणां तस्मिन्नेव लीयमानानामभावः। तस्मादेकमेव ब्रह्म प्रज्ञानघनमेकरसं प्रतिपत्तव्यमित्यत आह। प्रलयप्रदर्शनाय दृष्टान्तः— | इसके सिवा दूसरी बात यह है कि जगत्‌का ब्रह्मत्व केवल उत्पत्ति और स्थितिकालमें ही प्रज्ञानको छोड़कर न रहनेके कारण नहीं है, अपि तु प्रलयकालमें भी है। जिस प्रकार जल, बुद्बुद और फेनादिकी सत्ता जलको छोड़कर नहीं है, उसी प्रकार प्रज्ञानसे भिन्न उसके कार्य और उसीमें लीन होनेवाले नाम, रूप और कर्मोंकी भी सत्ता नहीं है। इसलिये एक ही प्रज्ञानघन एकरस ब्रह्म है—ऐसा जानना चाहिये। इसीसे श्रुति [निम्नाङ्कित मन्त्र] कहती है। प्रलय प्रदर्शित करनेके लिये यहाँ दृष्टान्त दिया गया है— |

स यथा सर्वासामपाँ समुद्र एकायनमेवँ सर्वेषाँ स्पर्शानां त्वगेकायनमेवँ सर्वेषां गन्धानां नासिके एकायनमेवँ सर्वेषाँ रसानां जिह्वैकायनमेवँ सर्वेषाँ रूपाणां चक्षुरेकायनमेवँ सर्वेषाँ शब्दानाँ श्रोत्रमेकायनमेवँ सर्वेषाँ संकल्पानां मन एकायनमेवँ सर्वासां विद्यानाँ हृदयमेकायनमेवँ सर्वेषां कर्मणाँ हस्तावेकायनमेवँ सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवँ सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवँ सर्वेषामध्वनां पादावेकायनमेवँ सर्वेषां वेदानां वागेकायनम् ॥ ११ ॥


बृ० उ० ३६—

५६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५६२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

वह दृष्टान्त—जिस प्रकार समस्त जलोंका समुद्र एक अयन (प्रलयस्थान) है, इसी प्रकार समस्त स्पर्शोंका त्वचा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त गन्धोंका दोनों नासिकाएँ एक अयन है, इसी प्रकार समस्त रसोंका जिह्वा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त रूपोंका चक्षु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त शब्दोंका श्रोत्र एक अयन है, इसी प्रकार समस्त संकल्पोंका मन एक अयन है, इसी प्रकार समस्त विद्याओंका हृदय एक अयन है, इसी प्रकार समस्त कर्मोंका हस्त एक अयन है, इसी प्रकार समस्त आनन्दोंका उपस्थ एक अयन है और इसी प्रकार समस्त विसर्गोंका पायु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त मार्गोंका चरण एक अयन है और इसी प्रकार समस्त वेदोंका वाक् एक अयन है ॥ ११ ॥

| स इति दृष्टान्तः; यथा येन प्रकारेण, सर्वासां नदीवापीतडागादिगतानामपाम्, समुद्रोऽब्धिरेकायनम्, एकगमनमेकप्रलयोऽविभागप्राप्तिरित्यर्थः; यथायं दृष्टान्तः; एवं सर्वेषां स्पर्शानां मृदुकर्कशकठिनपिच्छिलादीनां वायोरात्मभूतानां त्वगेकायनम्, त्वगिति त्वग्विषयं स्पर्शसामान्यमात्रम्, तस्मिन्प्रविष्टाः स्पर्शविशेषाः—आप इव समुद्रम्—तद्व्यतिरेकेणाभावभूता भवन्ति; तस्यैव हि ते संस्थानमात्रा आसन् ।<br><br>तथा तदपि स्पर्शसामान्यमात्रं त्वक्शब्दवाच्यं मनःसंकल्पे मनो- | वह दृष्टान्त—जिस प्रकार सम्पूर्ण नदी, बावड़ी और तड़ागादिके जलोंका समुद्र एकायन—एक गमनस्थान—एक प्रलयस्थान अर्थात् अभेदप्राप्तिका स्थल है, जैसा कि यह दृष्टान्त है, उसी प्रकार वायुके स्वरूपभूत मृदु, कर्कश, कठोर और पिच्छिल आदि समस्त स्पर्शोंका त्वचा एक प्रलयस्थान है । त्वचासे त्वचासम्बन्धी स्पर्शसामान्यमात्र समझना चाहिये, उसीमें समुद्रमें जलके समान स्पर्शविशेष प्रविष्ट हैं, उसके बिना वे सत्ताशून्य हो जाते हैं; क्योंकि वे उसीके संस्थानमात्र (पृथक् आकारमात्र) थे ।<br><br>इसी प्रकार वह त्वक्शब्दवाच्य स्पर्शसामान्य, त्वचाके विषयमें स्पर्शविशेषोंके समान मनके विषय- |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५६३

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५६३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
विषयसामान्यमात्रे, त्वग्विषय इव स्पर्शविशेषाः; प्रविष्टं तद्व्यतिरेकेणाभावभूतं भवति; एवं मनोविषयोऽपि बुद्धिविषयसामान्यमात्रे प्रविष्टस्तद्व्यतिरेकेणाभावभूतो भवति; विज्ञानमात्रमेव भूत्वा प्रज्ञानघने परे ब्रह्मण्यप इव समुद्रे प्रलीयते।सामान्यमात्ररूप मनःसंकल्पमें प्रविष्ट होकर उससे पृथक् सत्ताशून्य हो जाता है इसी तरह मनका विषय भी बुद्धिके सामान्य विषयमात्रमें प्रवेश करके उससे पृथक् नहीं रहता तथा विज्ञानमात्र ही होकर समुद्रमें जलके समान प्रज्ञानघन परब्रह्ममें लीन हो जाता है।
एवं परम्पराक्रमेण शब्दादौ सह ग्राहकेण करणेन प्रलीने प्रज्ञानघने उपाध्यभावात्सैन्धवघनवत् प्रज्ञानघनमेकरसमनन्तमपारं निरन्तरं ब्रह्म व्यवतिष्ठते। तस्मादात्मैव एकमद्वयमिति प्रतिपत्तव्यम्।इस प्रकार परम्पराक्रमसे अपने ग्राहक इन्द्रियके सहित शब्दादिके प्रज्ञानघनमें लीन हो जानेपर कोई उपाधि न रहनेके कारण लवणखण्डके समान एकरस, अनन्त, अपार, अखण्ड, प्रज्ञानघन ब्रह्म ही रह जाता है। अतः एकमात्र अद्वितीय आत्मा ही है—ऐसा जानना चाहिये।
तथा सर्वेषां गन्धानां पृथिवीविशेषाणां नासिके घ्राणविषयसामान्यम्, तथा सर्वेषां रसानाम्-अब्-विशेषाणां जिह्वेन्द्रियविषयसामान्यम्, तथा सर्वेषां रूपाणां तेजोविशेषाणां चक्षुश्चक्षुर्विषयसामान्यम्, तथा शब्दानां श्रोत्रविषयसामान्यं पूर्ववत्। तथा श्रोत्रादिविषयसामान्यानां मनोविषयसामान्ये संकल्पे; मनो-इसी प्रकार पृथिवीके विशेषरूप समस्त गन्धोंका नासिकाएँ—घ्राणसम्बन्धी विषयसामान्य, जलके विशेषरूप समस्त रसोंका रसनेन्द्रियसम्बन्धी विषयसामान्य, तेजके विशेषरूप समस्त रूपोंका चक्षु—चक्षुसम्बन्धी विषयसामान्य और पहलेहीकी तरह शब्दोंका श्रोत्रसम्बन्धी विषयसामान्य आश्रय है। इसी प्रकार श्रोत्रादि विषयसामान्योंका मनके विषयसामान्यरूप संकल्पमें, मनके विषय-