बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| रित्युक्तम्। तमेव परामृशत्यन्यत्र प्रसङ्गो मा भूदिति । | ऐसा कहा जा चुका है। श्रुति उसीका यहाँ परामर्श ( उल्लेख ) करती है, जिससे किसी अन्यका प्रसंग न हो जाय । | | तद्यद्रेत आसीत्-तत्तत्र मिथुने यद्रेत आसीत्, प्रथमशरीरिणः प्रजापतेरुत्पत्तौ कारणं रेतो बीजं ज्ञानकर्मरूपम्, त्रय्यालोचनायां यदृष्टवानासीज्जन्मान्तरकृतम्; तद्भावभावितोऽपः सृष्ट्वा तेन रेतसा बीजेनाप्स्वनुप्रविश्य अण्डरूपेण गर्भीभूतः स संवत्सरोऽभवत्, संवत्सरकालनिर्माता संवत्सरः प्रजापतिरभवत् । न ह, पुरा पूर्वम्, ततस्तस्मात्संवत्सरकालनिर्मातुः प्रजापतेः, संवत्सरः कालो नाम नास न बभूव ह । | उससे जो रेत हुआ-उस मिथुन-से जो रेत हुआ, प्रथमशरीरी प्रजापतिसे उत्पत्तिमें हेतुभूत जो रेत यानी बीज हुआ, अर्थात् वेदकी आलोचना करनेपर उसने जो जन्मान्तरकृत ज्ञानकर्मरूप बीज देखा उस बीजभावसे भावित होकर जलकी रचना कर उस रेतरूप बीजके द्वारा जलमें प्रवेश कर अण्डरूपसे गर्भस्थ रह वह संवत्सर हुआ। अर्थात् वह संवत्सररूप कालका निर्माता संवत्सर प्रजापति हुआ। उस संवत्सरकालनिर्माता प्रजापतिसे पूर्व संवत्सरनामक काल नहीं था। | | तं संवत्सरकालनिर्मातारमन्तर्गर्भं प्रजापतिम्, यावानिह प्रसिद्धः काल एतावन्तमेतावत्संवत्सरपरिमाणं कालमबिभः भृतवान्मृत्युः। यावान्संवत्सर इह प्रसिद्धः, ततःपरस्तात्किं कृतवान् ? तमेतावतः कालस्य संवत्सरमात्रस्य परस्ताद् ऊर्ध्वमसृजत सृष्टवान्, अण्डमभिनदित्यर्थः तमेवं कुमारं जातमग्निं | उस संवत्सरकालनिर्माता गर्भस्थ प्रजापतिको, जितना कि यह प्रसिद्ध काल है उतने समयतक अर्थात् एक संवत्सरव्यापी कालतक मृत्युने धारण किया; जितना इस लोकमें संवत्सर प्रसिद्ध है [उतने समयतक गर्भमें रखा]। इसके पीछे उसने क्या किया ? इतने यानी संवत्सरमात्र कालके पश्चात् उसने उसकी रचना की अर्थात् उस अण्डेको फोड़ दिया। क्षुधायुक्त होनेके कारण मृत्युने |
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ [७५
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ [७५
| प्रथमशरीरिणम्, अशनायावत्त्वा-<br>न्मृत्युराभिव्याददान्मुखविदारणं<br>कृतवानत्तुम्; स च कुमारो भीतः<br>स्वाभाविकाविद्यया युक्तो भाणि-<br>त्येवं शब्दमकरोत् । सैव वाग-<br>भवत्, वाक्-शब्दोऽभवत् ॥४॥ | इस प्रकार उत्पन्न हुए उस प्रथम-<br>शरीरी कुमार अग्निके प्रति, उसे<br>खानेके लिये, मुँह फाड़ा । उस<br>कुमारने स्वाभाविकी अविद्यासे युक्त<br>होनेके कारण डरकर 'भाण्' ऐसा<br>शब्द किया। वही वाक् हुआ, वाक्<br>यानी शब्द हुआ ॥ ४ ॥ |
ऋगादिकी उत्पत्ति और मृत्युके अत्तृत्वका उपन्यास
स ऐक्षत यदि वा इममभिमꣳस्ये कनीयोऽन्नं करिष्य इति स तया वाचा तेनात्मनेदꣳसर्वमसृजत यदिदंकिञ्चर्चो यजूंꣳषि सामानि छन्दांꣳसि यज्ञान्प्रजाः पशून् । स यद्यदेवास्सृजत तत्तदत्तु मध्रियत सर्वं वा अत्तीति तददितेरदितित्वम् । सर्वस्यैतस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवमेतददितेरदितित्वं वेद॥५॥
उसने विचार किया, 'यदि मैं इसे मार डालूँगा तो यह थोड़ा-सा ही अन्न [ भोजन ] करूँगा।' अतः उसने उस वाणी और उन मनके द्वारा इन सबको रचा, जो कुछ भी ये ऋक्, यजुः, साम, छन्द, यज्ञ, प्रजा और पशु हैं। उसने जिस-जिसकी रचना की उसी-उसीको खानेका विचार किया। वह सबको खाता है, यही उस अदितिका अदितित्व है। जो इस प्रकार इस अदितिके अदितित्वको जानता है वह इस सबका अत्ता ( भोक्ता ) होता है और यह सब उसका अन्न होता है ॥ ५ ॥
| स ऐक्षत—स एवं भीतं कृतरवं<br>कुमारं दृष्ट्वा मृत्युरैक्षतेक्षितवान्<br>अशनायावानपि—यदि कदा-<br>चिद्वा इमं कुमारमभिमंस्ये— | उसने विचार किया—इस प्रकार<br>डरकर शब्द करनेवाले उस कुमार-<br>को देखकर मृत्युने क्षुधायुक्त होनेपर<br>भी विचार किया—यदि कदाचित् मैं<br>इस कुमारको मार डालूँगा—'अभि- |
७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| अभिपूर्वो मन्यतिर्हिंसार्थः—हिंसिष्य इत्यर्थः; कनीयोऽन्नं करिष्ये कनीयोऽल्पमन्नं करिष्य इति । | पूर्वक 'मन' धातुका अर्थ हिंसा होता है—अतः 'अभिमंस्ये' का अर्थ 'मार डालूँगा' ऐसा होगा, तो मैं कनीय अन्न करूँगा; कनीय यानी बहुत ही थोड़ा अन्न भोजन करूँगा। | | एवमीक्षित्वा तद्भक्षणादुपरराम बहु ह्यन्नं कर्तव्यं दीर्घकालभक्षणाय न कनीयः। तद्भक्षणे हि कनीयोऽन्नं स्याद्वीजभक्षण इव सस्याभावः। स एवम्प्रयोजनमन्नबाहुल्यमालोच्य तयैव त्रय्या वाचा पूर्वोक्तया तेनैव चात्मना मनसा मिथुनीभावमालोचनमुपगम्योपगम्येदं सर्वं स्थावरं जङ्गमं चासृजत यदिदं किञ्च यत्किञ्चेदम् । किं तत् ? ऋचो यजूंषि सामानि छन्दांसि च सप्त गायत्र्यादीनि स्तोत्रशस्त्रादिकर्माङ्गभूतांस्त्रिविधान् मन्त्रान्गायत्र्यादिच्छन्दोविशिष्टान् यज्ञांश्च तत्साध्यान्प्रजास्तत्कर्त्रीः पशूंश्च ग्राम्यानारण्यान्कर्मसाधनभूतान् । | ऐसा सोचकर वह उसे भक्षण करनेसे रुक गया, [और सोचने लगा कि] बहुत समयतक खानेके लिये मुझे बहुत-सा अन्न [संग्रह] करना चाहिये, थोड़ा-सा नहीं। जिस प्रकार बीजको खा लेनेपर अनाज नहीं होता उसी प्रकार इसे खानेसे तो मेरे लिये थोड़ा-सा ही अन्न होगा। ऐसे उद्देश्यसे अन्नकी बहुलताके लिये विचारकर उसने उस पूर्वोक्त त्रयीरूपा वाणीसे तथा उसी आत्मा यानी मनसे मिथुनीभाव अर्थात् आलोचनाको प्राप्त हो-होकर यह जो कुछ है उस इस सारे स्थावर और जङ्गम जगत्की रचना की। वह क्या है ? ऋक्, यजुः, साम, गायत्री आदि सात छन्द यानी गायत्री आदि छन्दोंसे युक्त स्तोत्र-शस्त्रादि कर्मोंके अङ्गभूत तीन प्रकारके मन्त्र, उनसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञ, उन्हें करनेवाली प्रजा तथा कर्मके साधनभूत ग्राम्य और वन्य पशु [ इन सबको रचा ]। | | ननु त्रय्या मिथुनीभूतया- | शंका—किंतु पहले तो कहा |
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७७
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| सृजतेत्युक्तम्, ऋगादीनीह कथमसृजतेति ? | गया था कि मिथुनीभूत त्रयीरूपा वाणीसे उसने रचना की, फिर उसके द्वारा उसने ऋगादिको कैसे रचा ? |
| नैष दोषः, मनसस्त्वव्यक्तोऽयं मिथुनीभावस्त्रय्या, बाह्यस्तु ऋगादीनां विद्यमानानामेव कर्मसु विनियोगभावेन व्यक्तीभावः सर्ग इति । | समाधान—यह कोई दोष नहीं है। मनका जो त्रयीके साथ मिथुनीभाव है वह तो अव्यक्त है। उन [अव्यक्तरूपसे] विद्यमान ऋगादिका ही कर्ममें विनियोगरूपसे जो बाह्य व्यक्तीभाव है वही उनकी रचना है। |
| स प्रजापतिरेवमन्नवृद्धिं बुद्ध्वा यद्यदेव क्रियां क्रियासाधनं फलं वा किञ्चिदसृजत तत्तदत्तुं भक्षयितुमप्रियत धृतवान्मनः। सर्वं कृत्स्नं वै यस्मादत्तीति तत्तस्माददितेरदितिनाम्नो मृत्योरदितित्वं प्रसिद्धम् । तथा च मन्त्रः—‘‘अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता’’ (यजुः० सं० २५। २३) इत्यादिः । | उस प्रजापतिने इस प्रकार अन्नकी वृद्धि होती जानकर जिस-जिस भी क्रिया या क्रियाके साधनभूत फलकी रचना की उसी—उसीको भक्षण करनेके लिये मनमें विचार किया। इस प्रकार क्योंकि वह सभीको भक्षण करता है, इसलिये उस अदिति अर्थात् अदिति नामक मृत्युका अदितित्व प्रसिद्ध है। इस विषयमें यह मन्त्र प्रमाण है—‘‘अदिति द्युलोक है, अदिति अन्तरिक्ष है, अदिति माता है और वही पिता है’’ इत्यादि। |
| सर्वस्यैतस्य जगतोऽन्नभूतस्यात्ता सर्वात्मनैव भवत्यन्यथा विरोधात् । न हि कश्चित्सर्वस्यैकोऽत्ता दृश्यते तस्मात्सर्वात्मा भवतीत्यर्थः। | इस अन्नभूत सम्पूर्ण जगत्का वह सर्वात्मभावसे ही अत्ता (भक्षण करनेवाला) है, क्योंकि बिना सर्वात्मभावके सबका अत्ता होनेमें विरोध आता है। कोई भी एक सबका अत्ता हो, ऐसा देखा नहीं जाता; इसलिये तात्पर्य यह है कि |
७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १]
| ७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १] |
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| सर्वमस्यान्नं भवति; अत एव सर्वात्मनो ह्यत्तुः सर्वमन्नं भवतीत्युपपद्यते । य एवमेतद्यथोक्तमदितेर्मृत्योः प्रजापतेः सर्वस्यअदनाददितित्वं वेद तस्यैतत् फलम् ॥ ५ ॥ | [ इस प्रकार उपासना करनेवाला ] वह सर्वात्मा हो जाता है। सब कुछ उसका अन्न हो जाता है, अतः जो सर्वात्मभावसे अत्ता है उसीका सब कुछ अन्न होना सम्भव है। यह फल उसे मिलता है जो इस प्रकार इस उपर्युक्त अदितिसंज्ञक मृत्यु प्रजापतिका सबका अदन (भक्षण) करनेसे अदितित्व जानता है ॥ ५ ॥ |
प्रजापतिकी यज्ञकामना और उसके प्राण एवं वीर्यका निष्क्रमण
सोऽकामयत भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति । सोऽश्राम्यत्स तपोऽतप्यत तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य यशो वीर्यमुदक्रामत् । प्राणा वै यशो वीर्यं तत्प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीरँ श्वयितुमध्रियत तस्य शरीर एव मन आसीत् ॥ ६ ॥
उसने यह कामना की कि मैं पुनः बड़े भारी यज्ञसे यजन करूँ । इससे वह श्रमित हो गया । उसने तप किया । उस श्रमित और तपे हुए मृत्युका यश और वीर्य निकल गया । प्राण ही यश और वीर्य हैं । तब प्राणोंके निकल जानेपर शरीरने फूलना आरम्भ किया । किंतु उसका मन शरीरमें ही रहा ॥ ६ ॥
| सोऽकामयतेत्यश्वाश्वमेधयोर्निर्वचनार्थमिदमाह—भूयसा महता यज्ञेन भूयः पुनरपि यजेयेति । जन्मान्तरकरणापेक्षया भूयः- | 'सोऽकामयत' इत्यादि वाक्यसे श्रुति अश्व और अश्वमेधका निर्वचन करनेके लिये यह कहती है—मैं पुनः महान् यज्ञसे यजन करूँ। यहाँ जन्मान्तरमें यज्ञानुष्ठान करनेकी अपेक्षासे 'भूयस्' (महान्) शब्द |
| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७९ |
| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७९ |
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| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| शब्दः । स प्रजापतिः जन्मान्तरेऽश्वमेधेनायजत । स तद्भावभावित एव कल्पादौ व्यावर्तत । सोऽश्वमेधक्रियाकारकफलात्मत्वेन निर्वृत्तः सन्नकामयत भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति । एवं महत्कार्यं कामयित्वा लोकवदश्राम्यत् । | दिया है। उस प्रजापतिने जन्मान्तरमें अश्वमेध यज्ञद्वारा यजन किया था। इसलिये उसकी भावनासे युक्त हुआ ही वह कल्पके आरम्भमें प्रजापति हुआ। अश्वमेधके क्रिया, कारक और फलरूपसे सम्पन्न होकर उसने कामना की कि मैं पुनः महान् यज्ञद्वारा यजन करूँ। इस प्रकार महान् कार्यके लिये कामना करके वह अन्य लोगोंके समान श्रमित हो गया। |
| स तपोऽतप्यत । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्येति पूर्ववत्, यशो वीर्यमुदक्रामदिति । स्वयमेव पदार्थमाह—प्राणाश्चक्षुरादयो वै यशो यशोहेतुत्वात् तेषु हि सत्सु ख्यातिर्भवति, तथा वीर्यं बलमस्मिञ्शरीरे । न ह्युत्क्रान्तप्राणो यशस्वी बलवान्वा भवति । तस्मात्प्राणा एव यशो वीर्यं चास्मिञ्शरीरे । तदेवं प्राणलक्षणं यशो वीर्यमुदक्रामदुत्क्रान्तवत् । | उसने तप किया। उस श्रान्त और तपे हुएका—ऐसा पूर्ववत् समझना चाहिये-यश और वीर्य निकल गया। अब श्रुति स्वयं ही [यश और वीर्य] पदोंका अर्थ बतलाती है। चक्षु आदि जो प्राण हैं वे ही यशके हेतु होनेके कारण यश हैं क्योंकि उनके रहनेपर ही ख्याति होती है। तथा वे ही इस शरीरमें वीर्य यानी बल हैं। जिसके प्राण निकल गये हैं वह पुरुष यशस्वी या बलवान् नहीं होता। अतः इस शरीरमें प्राण ही यश और वीर्य हैं। वे इस प्रकारके प्राणरूप यश और वीर्य निकल गये। |
| तदेवं यशोवीर्यभूतेषु प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीरान्निष्क्रान्तेषु त- | तब इस प्रकार यश और वीर्यभूत प्राणोंके उत्क्रमण करनेपर अर्थात् शरीरसे निकल जानेपर |
८० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १
८० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १
| च्छरीरं प्रजापतेः श्वयितुमुच्छून-<br><br>भावं गन्तुमभ्रियतामेध्यं चाभवत्<br><br>तस्य प्रजापतेःशरीरान्निर्गतस्यापि<br><br>तस्मिन्नेव शरीरे मन आसीद्यथा<br><br>कस्यचित्प्रिये विषये दूरं गत-<br><br>स्यापि मनो भवति तद्वत् ॥६॥ | प्रजापतिके उस शरीरने श्वयन—<br>उच्छूनता (फूलनारूप विकार)<br>को प्राप्त होना आरम्भ किया;<br>अर्थात् वह अमेध्य (अपवित्र) हो<br>गया। किंतु जिस प्रकार किसी<br>प्रिय वस्तुके दूर हो जानेपर भी<br>उसीमें मन रहता है वैसे ही शरीरसे<br>निकल जानेपर भी उस प्रजापतिका<br>मन उस शरीरमें ही रहा ॥ ६ ॥ |
अश्वमेधोपासना और उसका फल
| स तस्मिन्नेव शरीरे गतमनाः सन्किमकरोत् ? इत्युच्यते— | उस शरीरमें ही जिसका मन लगा हुआ है ऐसे उस प्रजापतिने क्या किया ? सो बतलाया जाता है— |
सोऽकामयत मेध्यं म इदँ स्यादात्मन्व्यनेन स्यामिति। ततोऽश्वः समभवद्यदश्वत्तन्मेध्यमभूदिति तदेवाश्वमेधस्याश्वमेधत्वम्। एष ह वा अश्वमेधं वेद य एनमेवं वेद। तमनवरुध्यैवामन्यत। तँ संवत्सरस्य परस्तादात्मन आलभत। पशून्देवताभ्यः प्रत्यौहत्। तस्मात् सर्वदेवत्यं प्रोक्षितं प्राजापत्यमालभन्ते। एष ह वा अश्वमेधो य एष तपति तस्य संवत्सर आत्मायमग्निरर्कस्तस्येमे लोका आत्मानस्तावेतावार्काश्वमेधौ। सो पुनरेकैव देवता भवति मृत्युरेवाप पुनर्मृत्युं जयति नैनं मृत्युरानोति
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
मृत्यु॑रस्यात्मा भवत्येतासां॑ देवतानामेको॑ भवति ॥७॥
उसने कामना की मेरा यह शरीर मेध्य (यज्ञिय) हो, मैं इसके द्वारा शरीरवान् होऊँ; क्योंकि वह शरीर अश्वत् अर्थात् फूल गया था, इसलिये वह अश्व हो गया और वह मेध्य हुआ। अतः यही अश्वमेधका अश्वमेधत्व है। जो इसे इस प्रकार जानता है वही अश्वमेधको जानता है। उसने उसे अवरोधरहित (बन्धनशून्य) ही चिन्तन किया। उसने संवत्सरके पश्चात् उसका अपने ही लिये [अर्थात् इसका देवता प्रजापति है—ऐसे भावसे] आलभन किया तथा अन्य पशुओंको भी देवताओंके प्रति पहुँचाया। अतः याज्ञिकलोग मन्त्रद्वारा संस्कार किये हुए सर्व-देवसम्बन्धी प्राजापत्य पशुका आलभन करते हैं। यह जो [सूर्य] तपता है वही अश्वमेध है। उसका संवत्सर शरीर है, यह अग्नि अर्क है तथा उसके ये लोक आत्मा हैं। ये ही दोनों (अग्नि और आदित्य) अर्क और अश्वमेध हैं। किंतु वे मृत्युरूप एक ही देवता हैं। जो इस प्रकार जानता है वह पुनर्मृत्युको जीत लेता है, उसे मृत्यु नहीं पा सकता, मृत्यु उसका आत्मा हो जाता है तथा वह इन देवताओंमेंसे ही एक हो जाता है ॥७॥
| सोऽकामयत, कथम् ? मेध्यं मेधाहं यज्ञियं मे ममेदं शरीरं स्यात् । किञ्च आत्मन्व्यात्मवांश्चानेन शरीरेण शरीरवान्स्यामिति प्रविवेश । यस्मात्तच्छरीरं तद्वियोगाद्गतयशोवीर्यं सद् अश्वद् अश्वयत् ततस्तस्मादश्वः समभवत् । ततोऽश्वनामा प्रजापतिरेव साक्षादिति | उसने कामना की। किस प्रकार ?—मेरा यह शरीर मेध्य—यज्ञिय हो जाय। तथा मैं आत्मन्वी—आत्मवान् अर्थात् इस शरीरसे शरीरवान् हो जाऊँ। ऐसा विचारकर उसने उसमें प्रवेश किया। क्योंकि वह शरीर उसके वियोगसे यशोवीर्यहीन होकर अश्वत्—अश्वयत् अर्थात् फूल गया था, अतः उससे अश्व उत्पन्न हुआ। इसीसे अश्व नामका साक्षात् प्रजापति ही |
बृ० उ० ६—
८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| स्तूयते । यस्माच्च पुनस्तत्प्रवेशाद्गतयशोवीर्यत्वादमेध्यं सन्मेध्यमभूत्तदेव तस्मादेवाश्वमेधस्याश्वमेधनाम्नः क्रतोरश्वमेधत्वम् अश्वमेधनामलाभः । क्रियाकारकफलात्मको हि क्रतुः । स च प्रजापतिरेवेति स्तूयते ।<br><br>ऋतुनिर्वर्तकस्याश्वस्य प्रजापतित्वमुक्तम् 'उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य' इत्यादिना । तस्यैवाश्वस्य मेध्यस्य प्रजापतिस्वरूपस्याग्नेश्च यथोक्तस्य ऋतुफलात्मरूपतया समस्योपासनं विधातव्यमित्यारभ्यते । पूर्वत्र क्रियापदस्य विधायकस्याश्रुतत्वात् क्रियापदापेक्षत्वाच्च प्रकरणस्य अयअर्थोऽवगम्यते । | है—इस प्रकार उसकी स्तुति की जाती है। क्योंकि उसके पुनः प्रवेशसे वह यशोवीर्यहीन और अमेध्य होनेपर भी मेध्य हो गया था इसीसे अश्वमेधका यानी अश्वमेधनामक यज्ञका अश्वमेधत्व है; अर्थात् उसे 'अश्वमेध' नाम मिला है। यज्ञ क्रिया, कारक और फलरूप होता है, अतः 'वह प्रजापति ही है' ऐसा कहकर उसकी स्तुति की जाती है।<br><br>'उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः' इत्यादि वाक्यसे यज्ञनिर्वाहक अश्वका प्रजापतित्व कहा गया। अब उसी प्रजापतिरूप मेध्य अश्वकी और यज्ञफलरूपसे उसीके समान उपर्युक्त अग्निकी उपासनाका विधान करना है, इसलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। पहले श्रुतिवाक्यमें विधिबोधक क्रियापदका श्रवण नहीं हुआ है और [ उपासनासम्बन्धी वाक्योंमें ] क्रियापदकी अपेक्षा होती है; इसलिये इस प्रकरणका यह अर्थ जाना जाता है।१ |
१ यद्यपि पहले 'य एवमेतददितेरदितित्वं वेद' ऐसा विधायक वाक्य आया है, परंतु यह प्रकरण अश्वमेधोपासनाका है, इसलिये वह मुख्य वाक्य नहीं है। अतः उस अभावकी पूर्ति करनेके लिये वहाँ श्रुति 'एष ह वा अश्वमेधं वेद य एनमेवं वेद' इस प्रकार साक्षाद्रूपसे उसका विधान करती है।
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८३
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| एष ह वा अश्वमेधं क्रतुं वेद य एनमेवं वेद, यः कश्चिदेनमश्वमग्निरूपमर्कं च यथोक्तमेवं वक्ष्यमाणेन समासेन प्रदर्श्यमानेन विशेषणेन विशिष्टं वेद, स एषोऽश्वमेधं वेद नान्यः। तस्मादेवं वेदितव्य इत्यर्थः। | जो इसे इस प्रकार जानता है, निश्चय वही अश्वमेधको जानता है। जो कोई भी इस अश्वको और ऊपर बतलाये हुए अग्निरूप अर्कको आगे कहे जानेवाले संक्षेपरूपसे प्रदर्शित विशेषणसे विशिष्ट जानता है वही अश्वमेधको जानता है, कोई दूसरा नहीं। अतः तात्पर्य यह है कि इसे इसी प्रकार जानना चाहिये। |
| कथम्? तत्र पशुविषयमेव तावद्दर्शनमाह। तत्र प्रजापतिर्भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति कामयित्वा आत्मानमेव पशुं मेध्यं कल्पयित्वा तं पशुमनवरुध्यैवोत्सृष्टं पशुमवरोधमकृत्वैव मुक्तप्रग्रहममन्यताचिन्तयत्। तं संवत्सरस्य पूर्णस्य परस्तादूर्ध्वमात्मने आत्मार्थमालभत—प्रजापतिदेवताकत्वेनेत्येतत्—आलभतालम्भं कृतवान्। पशूनन्यान ग्राम्यानारण्यांश्च देवताभ्यो यथादैवतं प्रत्यौहत्प्रतिगमितवान्। | किस प्रकार जानना चाहिये? सो इस विषयमें पहले श्रुति पशुविषयक दृष्टिका ही निरूपण करती है। प्रजापतिने ऐसी इच्छा करके कि मैं पुनः बड़े भारी यज्ञसे यजन करूँ अपनेहीको यज्ञिय पशु कल्पना कर उस पशुका अनवरोध कर उसे छूटा हुआ माना अर्थात् उसकी रोक-टोक न करते हुए उसे बन्धनहीन चिन्तन किया। फिर पूरे एक संवत्सरके पीछे उसे अपने ही लिये आलभन किया अर्थात् प्रजापति देवता-सम्बन्धी पशुरूपसे उसका आलभन किया; तथा अन्य देवताओंको भी तत्तद्देवसम्बन्धी अन्यान्य ग्राम्य एवं वन्य पशु प्राप्त कराये। |
| यस्माच्चैवं प्रजापतिरमन्यत तस्मादेवमन्योऽप्युक्तेन विधिनात्मानं पशुमश्वं मेध्यं कल्पयित्वा | क्योंकि प्रजापतिने ऐसा माना था, इसलिये दूसरे यज्ञकर्ताको भी उपर्युक्त विधिसे ही अपनेको यज्ञिय |
८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| —सर्वदेवत्योऽहं प्रोक्ष्यमाण आलभ्यमानस्त्वहं मदेवत्य एव स्याम्, अन्य इतरे पशवो ग्राम्यारण्या यथादैवतमन्याभ्यो देवताभ्य आलभ्यन्ते मदवयवभूताभ्य एव—इति विद्यात्। अत एवेदानीं सर्वदेवत्यं प्रोक्षितं प्राजापत्यमालभन्ते याज्ञिकाः। | अश्व मानकर 'मैं वेदमन्त्रोंद्वारा अभिषिक्त होकर सर्वदेवसम्बन्धी होता हूँ, किंतु आलभन किये जानेपर केवल अपने ही देवताके लिये होऊँ; तथा दूसरे ग्राम्य और वन्य पशु, अन्यान्य देवताओंके अनुसार मेरे ही अवयवभूत विभिन्न देवोंके लिये आलभन किये जाते हैं—ऐसा जाने। इसीलिये आजकल याज्ञिकलोग समस्त देवताओंके लिये [ मन्त्रोंद्वारा ] अभिषिक्त किये हुए प्रजापतिसम्बन्धी पशुका आलभन करते हैं। | | 'एवमेष ह वा अश्वमेधो य एष तपति'—यस्त्वेवं पशुसाधनकः क्रतुः स एष साक्षात्फलभूतो निर्दिश्यत एष ह वा अश्वमेधः। कोऽसौ ? य एष सविता तपति जगदवभासयति तेजसा। तस्यास्य क्रतुफलात्मनः संवत्सरः कालविशेषः, आत्मा शरीरं तन्निर्वर्त्यत्वात्संवत्सरस्य । | 'एवमेष ह वा अश्वमेधो य एष तपति' इसकी व्याख्या की जाती है—इस प्रकार यह जो पशुद्वारा साध्य क्रतु है वही 'एष ह वा अश्वमेधः' इस वाक्यसे साक्षात् फलरूपसे बतलाया जाता है। वह कौन-सा है ? जो कि सूर्य तपता अर्थात् अपने तेजसे जगत्को प्रकाशित करता है। उस इस यज्ञफलरूप सूर्यका संवत्सर—काल-विशेष आत्मा यानी शरीर है, क्योंकि उसीके द्वारा संवत्सर निष्पन्न होता है।^१ | | तस्यैव क्रत्वात्मनः, अग्नि- | उस यज्ञात्माका साधनभूत यह |
१ क्योंकि सूर्यके उदयास्तसे दिन-रातके द्वारा संवत्सर होता है। यहाँतक अश्वमेधकी सूर्यरूपता बतलाकर अब उसके साधनभूत अग्निका सूर्यत्व बतलाया जाता है।
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ८५
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ८५
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| साध्यत्वाच्च फलस्य क्रतुत्वरूपेणैव निर्देशः, अयं पार्थिवोऽग्निरर्कः साधनभूतः। तस्य चार्कस्य क्रतौ चित्यस्येमे लोकास्त्रयोऽप्यात्मानः शरीरावयवाः। तथा च व्याख्यातं 'तस्य प्राची दिक्' इत्यादिना। तावग्न्यादित्यावेतौ यथाविशेषितावर्काश्वमेधौ क्रतुफले। अर्को यः पार्थिवोऽग्निः स साक्षात्क्रतुरूपः क्रियात्मकः। क्रतोरग्निसाध्यत्वात्तद्रूपेणैव निर्देशः। क्रतुसाध्यत्वाच्च फलस्य क्रतुरूपेणैव निर्देश आदित्योऽश्वमेध इति। | पार्थिव अग्नि अर्क है; यज्ञफल अग्निसाध्य है, इसलिये उसका यज्ञरूपसे निर्देश किया गया है। यज्ञमें चयन किये जानेवाले उस अर्कके तीनों लोक आत्मा-शरीरके अवयव हैं। इसीसे 'उसका पूर्वदिशा शिर है' इत्यादि वाक्यसे उसकी व्याख्या की गयी है। वे ये अग्नि और आदित्य ऊपर दिये हुए विशेषणके अनुसार अर्क और अश्वमेध क्रमशः यज्ञ और फल हैं। अर्क जो पार्थिव अग्नि है वह साक्षात् क्रियात्मक यज्ञरूप है। यज्ञ अग्निसाध्य है, इसलिये अग्निरूपसे ही उसका निर्देश किया जाता है। तथा फल यज्ञसाध्य है इसलिये 'आदित्य अश्वमेध है' इस प्रकार यज्ञरूपसे ही उसका निर्देश किया जाता है। |
| तौ साध्यसाधनौ क्रतुफलभूतावग्न्यादित्यौ, सा उ पुनर्भूय एकैव देवता भवति। का सा? मृत्युरेव। पूर्वमप्येकैवासीत्क्रियासाधनफलभेदाय विभक्ता। तथा चोक्तम् "स त्रेधात्मानं व्यकुरुत" (बृ० उ० १।२।३) इति। सा पुनरपि क्रियानिर्वृत्त्युत्तरकाल- | वे यज्ञ एवं फलभूत अग्नि और आदित्य साध्य और साधन हैं। वे भी आपसमें मिलकर पुनः-फिर भी एक ही देवता हैं। यह एक देव कौन है? वह मृत्यु है। पहले भी वह (मृत्युदेवता) एक ही था, क्रियाके साधन और फलभेदके लिये उसका विभाग हो गया। ऐसा ही कहा भी है—"उसने अपनेको तीन प्रकारसे विभक्त किया" इत्यादि। वह फिर भी अर्थात् क्रियानिष्पत्तिके |
८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| मेकैव देवता भवति मृत्युरेव फलरूपः।<br><br>यः पुनरेवमेनमश्वमेधं मृत्युमेकां देवतां वेद। अहमेव मृत्युरस्म्यश्वमेध एका देवता मद्रूपा अश्वाग्निसाधनसाध्येति सोऽपजयति पुनर्मृत्युं पुनर्मरणं सकृन्मृत्वा पुनर्मरणाय न जायत इत्यर्थः। अपजितोऽपि मृत्युरेनं पुनराप्नुयादित्याशङ्क्याह—नैनं मृत्युराप्नोति। कस्मात्? मृत्युरस्य एवंविद आत्मा भवति। किञ्च मृत्युरेव फलरूपः सन्ने-तासां देवतानामेको भवति। तस्यैतत् फलम् ॥ ७ ॥ | उत्तरकालमें भी एक ही देवता अर्थात् फलरूप मृत्यु ही हो जाता है।<br><br>जो इस प्रकार इस अश्वमेधको मृत्युरूप एक देवता जानता है; अर्थात् मैं ही अश्वमेधरूप मृत्यु हूँ—अग्नि और अश्वरूप साधनसे सिद्ध होनेवाली एक देवता मेरा ही रूप है—ऐसी जो उपासना करता है वह पुनर्मृत्युको जीत लेता है। तात्पर्य यह है कि एक बार मरकर वह पुनः मरनेके लिये उत्पन्न नहीं होता। इस प्रकार परास्त हो जानेपर भी मृत्यु इसे पुनः प्राप्त कर लेगा—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है—इसे मृत्यु पुनः प्राप्त नहीं कर सकता। क्यों? क्योंकि इस प्रकार जाननेवालेका मृत्यु आत्मा हो जाता है। बल्कि मृत्यु ही फलरूप होकर इन देवताओंमेंसे कोई एक हो जाता है। उस उपासकको यही फल प्राप्त होता है ॥ ७ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये
द्वितीयमग्निब्राह्मणम् ॥ २ ॥
तृतीय ब्राह्मण
तृतीय ब्राह्मण
| संस्कृत मूल / भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| द्वया हेत्याद्यस्य कः सम्बन्धः ?<br><br>प्रकरण-सम्बन्धः — कर्मणां ज्ञानसहितानां परा गतिरुक्ता मृत्यात्मभावोऽश्वमेधगत्युक्त्या । अथेदानीं मृत्यात्मभावसाधनभूतयोः कर्मज्ञानयोर्यत उद्भवस्तत्प्रकाशनार्थमुद्गीथब्राह्मणमारभ्यते । | 'द्वया ह' इत्यादि वाक्यसे आरम्भ होनेवाले इस ब्राह्मणका पूर्वब्राह्मणसे क्या सम्बन्ध है ?—<br><br>यहाँतक अश्वमेधकी गति (फल) बतानेके द्वारा ज्ञानसहित कर्मोंकी मृत्युस्वरूपताकी प्राप्तिरूप परागति बतलायी गयी है। अब आगे मृत्युस्वरूपताके साधनभूत कर्म और ज्ञानका जिससे उदय होता है उसका प्रकाशन करनेके लिये उद्गीथ ब्राह्मणका आरम्भ किया जाता है। |
| ननु मृत्यात्मभावः पूर्वत्र ज्ञानकर्मणोः फलमुक्तम्। उद्गीथज्ञानकर्मणोस्तु मृत्यात्मभावातिक्रमणं फलं वक्ष्यति अतो भिन्नविषयत्वात्फलस्य न पूर्वकर्मज्ञानोद्भवप्रकाशनार्थमिति चेत् । | **शङ्का—**पहले तो ज्ञान और कर्मका फल मृत्युस्वरूपताकी प्राप्ति बतलाया गया है; किंतु उद्गीथज्ञान और कर्मका फल मृत्युस्वरूपताका अतिक्रमण बतलाया जायगा। अतः इसके फलका विषय भिन्न होनेसे यह पूर्वोक्त कर्म और ज्ञानके उद्गम-स्थानको प्रकाशित करनेके लिये नहीं हो सकता। |
| नायं दोषः; अग्न्यादित्यात्मभावत्वादुद्गीथफलस्य । पूर्वत्राप्येतदेव फलमुक्तम् 'एतासां देवतानामेको भवति' इति । ननु 'मृत्युमतिक्रान्तः' इत्यादि | **समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि उद्गीथका फल अग्नि एवं आदित्यस्वरूपताकी प्राप्ति है। पहले भी 'इनमेंसे कोई एक देवता हो जाता है' इस वाक्यसे यही फल बतलाया गया है। यदि कहो कि 'मृत्युसे अतिक्रान्त हो जाता है' इतना कथन तो पहलेकी अपेक्षा |
८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| विरुद्धम्; न स्वाभाविकपाप्मा-<br>सङ्गविषयत्वादतिक्रमणस्य ।<br>कोऽसौ स्वाभाविकः पाप्मा-<br>सङ्गो मृत्युः ? कुतो वा<br>तस्योद्भवः ? केन वा तस्याति-<br>क्रमणम् ? कथं वा ? इत्ये-<br>तस्यार्थस्य प्रकाशनायाख्यायि-<br>कारभ्यते । कथम्— | विरुद्ध है ही—तो यह बात भी नहीं है, क्योंकि इस अतिक्रमणका विषय स्वाभाविक पापका सङ्ग होना है।<br>यह स्वाभाविक पापका सङ्गरूप मृत्यु क्या है ? कहाँसे उसकी उत्पत्ति होती है ? किसके द्वारा उसका अतिक्रमण हो सकता है ? और किस प्रकार हो सकता है ? इन सब बातोंको प्रकाशित करनेके लिये यह आख्यायिका आरम्भ की जाती है। सो किस प्रकार-- |
देव और असुरोंकी स्पर्धा, देवताओंका उद्गीथ-सम्बन्धी विचार
द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च। ततः कनीयसा एव देवा ज्यायसा असुरास्त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान्यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति ॥ १॥
प्रजापतिके दो प्रकारके पुत्र थे--देव और असुर। उनमें देव थोड़े ही थे और असुर अधिक थे। इन लोकोंमें वे परस्पर स्पर्धा (डाह) करने लगे। उनमेंसे देवताओंने कहा, 'हम यज्ञमें उद्गीथके द्वारा असुरोंका अतिक्रमण करें' ॥ १॥
| द्वया द्विप्रकाराः । हेति पूर्व-<br>वृत्तावद्योतको निपातः। वर्तमान-<br>प्रजापतेः पूर्वजन्मनि यद् वृत्तं<br>तदवद्योतयति हशब्देन । प्राजा- | द्वयाः—दो प्रकारके। 'ह' यह पूर्ववृत्तान्तका द्योतक निपात है। वर्तमान प्रजापतिके पूर्वजन्ममें जो कुछ हुआ था उसे ही श्रुति 'ह' शब्दसे द्योतित करती है। 'प्राजापत्याः'—जिस जन्ममें पूर्ववृत्त |
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ [८९
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ [८९
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| पत्याः प्रजापतेर्वृत्तजन्मावस्थस्यापत्यानि प्राजापत्याः। के ते? देवाश्चासुराश्च। तस्यैव प्रजापतेः प्राणा वागादयः। | घटित हुआ था उसमें होनेवाले प्रजापतिके पुत्र प्राजापत्य कहे गये हैं। वे कौन थे? देवता और असुर; अर्थात् उसी प्रजापतिके वागादि प्राण [इन्द्र-विरोचनादि नहीं]। |
| कथं पुनस्तेषां देवासुरत्वम् ?<br><br>(प्राणानां देवासुरत्व-निर्वचनम्)<br>उच्यते—शास्त्रजनितज्ञानकर्मभाविता द्योतनाद्देवा भवन्ति। त एव स्वाभाविकप्रत्यक्षानुमानजनितदृष्टप्रयोजनकर्मज्ञानभाविता असुराः। स्वेष्वेवासुषु रमणात् सुरेभ्यो वा देवेभ्योऽन्यत्वात्। | किंतु उनका देवासुरत्व कैसे माना जाता है? सो बतलाया जाता है। शास्त्र-जनित ज्ञान और कर्मसे भावित जो प्राण हैं, वे द्योतनशील (प्रकाशमय) होनेके कारण देव हैं; तथा वे (प्राण) ही स्वाभाविक प्रत्यक्ष एवं अनुमानजनित दृष्ट प्रयोजनवाले कर्म और ज्ञानसे भावित होनेपर असुर हैं। अपने ही असुओं (प्राणों) में रमण करनेके कारण अथवा सुर यानी देवोंसे भिन्न होनेके कारण वे असुर कहलाते हैं। |
| यस्माच्च दृष्टप्रयोजनज्ञानकर्मभाविता असुराः, ततस्तस्मात्कानीयसाः, कनीयांस एव कानीयसाः, स्वार्थेऽणि वृद्धिः। कनीयांसोऽल्पा एव देवाः। ज्यायसा | क्योंकि असुरगण दृष्ट प्रयोजन-वाले ज्ञान और कर्मकी भावनासे युक्त हैं, इसलिये देवगण कानीयस हैं। कनीयान् ही कानीयस हैं। यहाँ [कनीयस् शब्दसे] स्वार्थमें 'अण्' प्रत्यय होनेपर आदि स्वरकी वृद्धि हुई है, जिससे 'कानीयस' शब्द सिद्ध हुआ है। तात्पर्य यह कि देवगण कनीयान् अर्थात् थोड़े |
९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| असुरा ज्यायान्सोऽसुराः। स्वाभाविकी हि कर्मज्ञानप्रवृत्तिर्महत्तरा प्राणानां शास्त्रजनितायाः कर्मज्ञानप्रवृत्तेर्दृष्टप्रयोजनत्वात् । अत एव कनीयस्त्वं देवानां शास्त्रजनितप्रवृत्तेरल्पत्वात् । अत्यन्तयत्नसाध्या हि सा । | हो हैं। तथा असुरगण ज्यायस—ज्यायान् यानी अधिक हैं, क्योंकि दृष्ट प्रयोजनवाली होनेसे प्राणोंकी शास्त्रजनित कर्म-ज्ञानप्रवृत्तिकी अपेक्षा स्वाभाविक कर्म-ज्ञानप्रवृत्ति ही अधिकतर होती है। इसीसे शास्त्रजनित प्रवृत्तिकी अल्पताके कारण देवताओंकी भी अल्पता है, क्योंकि वह अत्यन्त यत्न करनेपर सिद्ध होनेवाली है। |
| ते देवाश्चासुराश्च प्रजापतिशरीरस्था एषु लोकेषु निमित्तभूतेषु स्वाभाविकेतरकर्मज्ञानसाध्येष्बु अस्पर्धन्त स्पर्धां कृतवन्तः। देवानां चासुराणां च वृत्त्युद्भवाभिभवौ स्पर्धा । कदाचिच्छास्त्रजनितकर्मज्ञानभावनारूपा वृत्तिः प्राणानामुद्भवति । यदा चोद्भवति तदा दृष्टप्रयोजना प्रत्यक्षानुमानजनितकर्मज्ञानभावनारूपा तेषामेव प्राणानां वृत्तिरासुर्यभिभूयते । स देवानां जयोऽसुराणां पराजयः। कदाचित्तद्विपर्ययेण देवानां वृत्तिरभिभूयत आसुर्या उद्भवः । सो- | प्रजापतिके शरीरमें रहनेवाले वे देव और असुर स्वाभाविक एवं अस्वाभाविक (शास्त्रजनित) कर्म और ज्ञानसे साध्य लोकोंके निमित्त स्पर्धा (डाह) करने लगे। दैवी और आसुरी वृत्तियोंका उठना और दबना ही देवता और असुरोंकी स्पर्धा है। कभी तो प्राणोंकी शास्त्रजनित कर्मज्ञानभावनारूपा वृत्ति उठती है, और जिस समय वह उठती है उस समय उन्हीं प्राणोंकी दृष्ट प्रयोजनवाली प्रत्यक्ष एवं अनुमानजनित कर्मज्ञानभावनारूपा आसुरी वृत्ति दब जाती है। यही देवताओंका जय और असुरोंका पराजय है। तथा कभी इसके विपरीत देवताओंकी वृत्ति दब जाता है और आसुरी वृत्तिका उत्थान |
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९१
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९१
| संस्कृत शाङ्करभाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऽसुराणां जयो देवानां पराजयः। एवं देवानां जये धर्मभूयस्त्वादुत्कर्ष आ प्रजापतित्वप्राप्तेः। असुरजयेऽधर्मभूयस्त्वादपकर्ष आ स्थावरत्वप्राप्तेः । उभयसाम्ये मनुष्यत्वप्राप्तिः । | होता है । वह असुरोंका विजय और देवोंका पराजय है। इस प्रकार देवताओंका विजय होनेपर धर्मकी अधिकता होनेके कारण प्रजापतिपदकी प्राप्तिपर्यन्त उत्कर्ष (ऊर्ध्वगमन) होता है तथा असुरोंका विजय होनेपर अधर्मकी अधिकता होनेके कारण स्थावरत्वप्राप्तिपर्यन्त अधोगति होती है और दोनोंकी समानता होनेपर मनुष्यत्वकी प्राप्ति होती है । |
| त एवं कनीयस्त्वादभिभूयमाना असुरैर्देवा बाहुल्यादसुराणां किं कृतवन्तः? इत्युच्यते—ते देवा असुरैरभिभूयमाना ह किलोचुरूक्तवन्तः । कथम्? हन्तेदानीम् अस्मिन्यज्ञे ज्योतिष्टोमे, उद्गीथेन उद्गीथकर्मपदार्थकर्तृस्वरूपाश्रयणेन अत्ययामातिगच्छामः। असुरानभिभूय स्वं देवभावं शास्त्रप्रकाशितं प्रतिपद्यामह इत्युक्तवन्तोऽन्योन्यम् । उद्गीथकर्मपदार्थकर्तृस्वरूपाश्रयणं च ज्ञानकर्मभ्याम् । | इस प्रकार असुरोंकी अपेक्षा स्वयं अल्पसंख्य होनेसे तथा असुरोंकी अधिकता होनेके कारण उनके द्वारा दबे हुए उन देवताओंने क्या किया ? सो बतलाया जाता है । कहते हैं, असुरोंसे अभिभूत होते हुए उन देवताओंने कहा । क्या कहा ?—'अहो ! अब इस ज्योतिष्टोम यज्ञमें उद्गीथके द्वारा—उद्गीथनामक जो कर्मका अङ्गभूत पदार्थ है उसे करनेवाले प्राणके स्वरूपका आश्रय करके हम असुरोंका अतिक्रमण करेंगे; अर्थात् असुरोंका पराभव कर अपने शास्त्रप्रकाशित देवभावको प्राप्त करेंगे'—इस प्रकार उन्होंने आपसमें कहा । उद्गीथ कर्मरूप पदार्थके कर्ताके स्वरूपका आश्रय ज्ञान और कर्मके- |
९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| कर्म वक्ष्यमाणं मन्त्रजपलक्षणं विधित्स्यमानं “तदेतानि जपेत्” इति। ज्ञानं त्विदमेव निरूप्यमाणम्। | द्वारा किया जा सकता है। उनमें कर्म तो “तदेतानि जपेत्” इस वाक्यद्वारा जिसका विधान करना इष्ट है वह आगे कहा जानेवाला मन्त्रजपरूप है और ज्ञान तो वही है जिसका निरूपण किया जा रहा है। | | नन्विदंमभ्यारोहजपविशेषोऽर्थवादो न ज्ञाननिरूपणपरम्। | शङ्का—किंतु यह तो अभ्यारोह¹ मन्त्रजपकी विधिको शेषभूत अर्थवाद है, ज्ञाननिरूपण-परक नहीं है। | | न; ‘य एवं वेद’ इति वचनात्। | समाधान—यह बात नहीं है, क्योंकि यहाँ ‘जो ऐसा जानता है’ ऐसा वचन है। | | (प्राणोपासनवाक्यस्य अन्यशेषत्व-निरासः)<br>उद्गीथप्रस्तावे पुराकल्पश्रवणादुद्गीथविधिपरमिति चेन्न, अप्रकरणात्। | यदि कहो कि उद्गीथके प्रकरणमें [‘द्वया ह’ इत्यादि] पूर्वकल्पसम्बन्धी श्रुति होनेसे यह उद्गीथ-विधिपरक है²—तो यह बात भी नहीं है, क्योंकि यह उद्गीथका प्रकरण ही नहीं है। | | उद्गीथस्य चान्यत्र विहितत्वात्। | उद्गीथका विधान तो अन्यत्र (कर्मकाण्डमें) किया गया है। | | विद्याप्रकरणत्वाच्चास्य। | यह तो विद्या (उपासना) का प्रकरण है। | | अभ्यारोहजपस्य चानित्यत्वात्, एवंवित्प्रयोज्यत्वात्; | इसके सिवा अभ्यारोहजप अनित्य होता है, क्योंकि प्राणवेत्ताद्वारा ही वह अनुष्ठान करनेयोग्य है और | | विज्ञानस्य च नित्यवच्छ्रवणात्। “तद्धैतल्लोक- | प्राणविज्ञान नित्यवत् सुना गया है।³ तथा “यह प्राणविज्ञान |
१. जिसके जपसे देवभावकी सम्मुखतासे प्राप्ति हो उस मन्त्रजपका नाम अभ्यारोह मन्त्रजप है।
२. अर्थात् उद्गीथविधिको शेषभूत अर्थवाद है।
३. तात्पर्य यह है कि अभ्यारोहजपका अधिकार प्राणवेत्ताको ही होनेके कारण,
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९३
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९३
| जिदेव'' (छा० उ० १ । ३ । २८) इति च श्रुतेः; प्राणस्य वागादीनां च शुद्धयशुद्धिवचनात् । न ह्यनुपास्यत्वे प्राणस्य शुद्धिवचनं वागादीनां च सहोपन्यस्तानाम्अशुद्धिवचनम् । वागादिनिन्दया मुख्यप्राणस्तुतिश्चाभिप्रेता उपपद्यते । 'मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते' इत्यादि फलवचनं च । प्राणस्वरूपापत्तेर्हि फलं तद्यद्वागाद्यग्न्यादिभावः । | लोकोंकी प्राप्ति करानेवाला ही है” इस श्रुतिसे और प्राण तथा वागादिकी शुद्धि और अशुद्धि बतलायी जानेसे भी यह विज्ञानका ही प्रकरण सिद्ध होता है। प्राणकी उपास्यता बतलाना अभीष्ट न होनेपर प्राणकी शुद्धिका प्रतिपादन करना और उसीके साथ जिनका उल्लेख किया गया है उन वागादिको अशुद्ध कहना सम्भव नहीं है। इससे वागादिकी निन्दाद्वारा मुख्य प्राणकी स्तुति अभिमत एवं युक्तियुक्त जान पड़ती है। 'मृत्युको पार करके प्रकाशित होता है' ऐसा इसका फलवचन भी है। वागादिको जो अग्न्यादिभावकी प्राप्ति है वह उनकी प्राणस्वरूपताकी प्राप्तिका ही फल है। |
| भवतु नाम प्राणस्योपासनम्, | **शङ्का—**यहाँ प्राणकी उपासना भले ही हो, परंतु उसका विशुद्धि आदि गुणोंसे युक्त होना तो सम्भव नहीं है। |
| न तु विशुद्ध्यादिगुणवत्तेति । | यदि कहो कि श्रुतिप्रतिपादित होनेके कारण ऐसा हो सकता है, तो ऐसा होना सम्भव नहीं है, क्योंकि श्रुति |
| ननु स्याच्छ्रुतत्वात्; न स्यात्; |
प्राणविज्ञानसे पूर्व उसका अनुष्ठान नहीं हो सकता; इसलिये वह अनित्य है। किंतु प्राणविज्ञान उसकी अपेक्षा नित्य है। क्योंकि 'य एवं विद्वान् पौर्णमासीं यजते' इस नित्य पौर्णमासयागके समान 'य एवं वेद' (जो इस प्रकार जानता है) इस प्रकार नित्यवत् विज्ञान (उपासना) का श्रवण होता है। यहाँ प्रयाज आदि पौर्णमासीके प्रयोजक नहीं हैं, अपितु पौर्णमासी ही प्रयाज आदिकी प्रयोजिका है, उसी प्रकार प्राणवित्प्रयोज्य जप प्राणविज्ञानका प्रयोजक नहीं है, बल्कि प्राण-विज्ञान ही जपका प्रयोजक है। अतः वह जपसे पूर्वसिद्ध है।