भारतकोश
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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८९९

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८९९


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
प्रक्रमते—दिखानेकी इच्छासे श्रुति आरम्भ करती है।
स समानः सन्नुभौ लोकावनुसञ्चरति । यः पुरुषः स्वयमेव ज्योतिरात्मा; स समानः सदृशः सन्—केन ? प्रकृतत्वात् सन्निहितत्वाच्च हृदयेन; ‘हृदि’ इति च हृच्छब्दवाच्या बुद्धिः प्रकृता सन्निहिता च; तस्मात्तयैव सामान्यम् ।वह पुरुष समान रहकर इस लोक और परलोक-दोनोंमें सञ्चार करता है। जो पुरुष स्वयंज्योतिः-स्वरूप आत्मा ही है, वह समान—एक जैसा रहकर; किसके समान रहकर ? प्रकरण-प्राप्त और समीपवर्ती होनेके करण हृदयके; ‘हृदि’ इससे ‘हृत्’ शब्दवाच्य बुद्धि ही प्रकरणप्राप्त है और वही समीपवर्तिनी भी है; अतः उसीसे आत्माकी समानता रहती है।
किं पुनः सामान्यम् ? अश्वमहिषवद् विवेकतॊऽनुपलब्धिः; अवभास्या बुद्धिः, अवभासकं तदात्मज्योतिः, आलोकवत्; अवभास्यावभासकयोर्विवेक्तोऽनुपलब्धिः प्रसिद्धा; विशुद्धत्वाद्वद्यालोकोऽवभास्येन सदृशो भवति; यथा रक्तमवभासयन् रक्तसदृशो रक्ताकारो भवति, यथा हरितं नीलं लोहितं च अवभासयन्नालोकःवह समानता किस प्रकारकी है ? घोड़े और भैंसेके समान उनका अलग-अलग उपलब्ध न होना; बुद्धि प्रकाश्य है और प्रकाशके समान आत्मज्योति प्रकाशक है; प्रकाश्य और प्रकाशकका अलग-अलग उपलब्ध न होना प्रसिद्ध ही है; क्योंकि प्रकाश शुद्ध होनेके कारण प्रकाश्यके समान हो जाता है, जिस प्रकार लाल रंगकी वस्तुको प्रकाशित करते समय वह लालके समान—लाल आकारवाला हो जाता है। एवं हरे, नीले और लोहित पदार्थोंको प्रकाशित करते

९०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

९००बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| तत्समानो भवति, तथा बुद्धिमवभासयन् बुद्धिद्वारेण कृत्स्नं क्षेत्रमवभासयति—इत्युक्तं मरकतमणिनिदर्शनेन। तेन सर्वेण समानो बुद्धिसामान्यद्वारेण। | समय वह तद्रूप हो जाता है। इसी प्रकार बुद्धिको प्रकाशित करते समय वह बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करने लगता है; यह बात मरकतमणिके दृष्टान्तसे बतला दी गयी है। इसीसे बुद्धिकी समानताके द्वारा वह सबके समान हो जाता है। | | 'सर्वमयः' इति चात एव वक्ष्यति; तेनासौ कुतश्चित् प्रविभज्य मुञ्जेषीकावत् स्वेन ज्योतिरूपेण दर्शयितुं न शक्यत इति, सर्वव्यापारं तत्राध्यारोप्य नामरूपगतम्, ज्योतिर्धर्मं च नामरूपयोः, नामरूपे चात्मज्योतिषि, सर्वो लोको मोमुह्यते—अयमात्मा नायमात्मा, एवंधर्मा नैवंधर्मा, कर्ताऽकर्ता, शुद्धोऽशुद्धो बद्धो मुक्तः, स्थितो गत आगतः, अस्ति नास्तीत्यादिविकल्पैः। | इसीसे श्रुति उसे 'सर्वमयः' ऐसा कहेगी; अतः यह मूँजसे सींकके समान किसीसे भी अलग करके अपने ज्योतिःस्वरूपसे नहीं दिखाया जा सकता। उसमें नाम-रूपके सारे व्यापारोंका, नाम-रूपमें ज्योतिके धर्मका तथा आत्मज्योतिमें नाम-रूपका आरोप करके सम्पूर्ण लोक 'यह आत्मा है, यह आत्मा नहीं है, आत्मा ऐसे धर्मोंवाला है, ऐसे धर्मोंवाला नहीं है, कर्ता है, अकर्ता है, शुद्ध है, अशुद्ध है, बद्ध है, मुक्त है, स्थित है, गत है, आगत है, सद्रूप है, असद्रूप है' इत्यादि विकल्पोंसे अत्यन्त मोहित हो रहा है। | | अतः समानः सन्नुभौ लोकौ प्रतिपन्नप्रतिपत्तव्यौ इहलोकपरलोकावुपात्तदेहेन्द्रियादिसङ्घातत्यागान्योपादानसन्तानप्रबन्धशतसन्निपातैरनुक्रमेण सञ्चरति। | अतः यह समान रहकर प्राप्त इहलोक और प्राप्त करने योग्य परलोक—इन दोनोंमें प्राप्त देहेन्द्रियसङ्घातके त्याग और अप्राप्त देहेन्द्रिय सङ्घातके ग्रहणकी परम्परासे निरन्तर सैकड़ों सम्बन्धोंके क्रमसे सञ्चार करता रहता है। तात्पर्य यह है कि उसके |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०१

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०१


संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी (भाष्यार्थ)
धीसादृश्यमेवोभयलोकसञ्चरणहेतुर्न स्वत इति ।दोनों लोकोंमें सञ्चारका कारण बुद्धिकी सदृशता ही है, वह स्वयं सञ्चार नहीं करता ।
तत्र नामरूपोपाधिसादृश्यं भ्रान्तिरेवात्मनः भ्रान्तिनिमित्तं यत्संसरणहेतुः तदेव हेतुर्न स्वतः, इत्येतदुच्यते—यस्मात् स समानः सन्नुभौ लोकावनुक्रमेण सञ्चरति—तदेतत् प्रत्यक्षमित्येतद्दर्शयति—यतो ध्यायतीव ध्यानव्यापारं करोतीव, चिन्तयतीव, ध्यानव्यापारवतीं बुद्धिं स तटस्थेन चित्स्वभावज्योतिरूपेणावभासयन् तत्सदृशस्तत्समानः सन् ध्यायतीव, आलोकवदेव—अतो भवति चिन्तयतीति भ्रान्तिर्लोकस्य; न तु परमार्थतो ध्यायति ।इस सञ्चारमें जो भ्रान्तिजनित नामरूपोपाधिकी सदृशता है, वही हेतु है, वह स्वतः सञ्चार नहीं करता—यही बात अब बतलायी जाती है; क्योंकि वह समान रहकर क्रमशः दोनों लोकोंमें सञ्चार करता है—यह बात प्रत्यक्ष ही है, सो श्रुति दिखलाती है—क्योंकि वह मानो ध्यान करता है—ध्यानव्यापार-सा करता है, चिन्तन-सा करता है । तात्पर्य यह है कि वह प्रकाशके समान ही अपने चित्स्वभाव ज्योतिःस्वरूपसे ध्यानव्यापारवती बुद्धिको तटस्थरूपसे प्रकाशित करता हुआ उसीके समान होकर मानो ध्यान करता है । इसीसे लोकको ऐसी भ्रान्ति होती है कि वह चिन्तन करता है; किंतु वह वस्तुतः ध्यान नहीं करता ।
तथा लेलायतीव अत्यर्थं चलतीव, तेष्वेव करणेषु बुद्ध्यादिषु वायुषु च चलत्सु तदवभासकत्वात् तत्सदृशं तदिति—लेलायतीव, न तु परमार्थतश्चलनधर्मकं तदात्मज्योतिः ।इसी प्रकार 'लेलायतीव'—मानो अधिक चलता है । उन इन्द्रियोंके अर्थात् बुद्धि आदि वायुओंके चलनेपर उनका अवभासक होनेके कारण वह उनके समान जान पड़ता है; इसीसे मानो अधिक चलता है । वास्तवमें तो वह आत्मज्योति चलनधर्मवाली नहीं है ।

९०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

९०२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृतहिन्दी
कथं पुनरेतदवगम्यते, तत्समानत्वभ्रान्तिरेवोभयलोकसञ्चरणादिहेतुर्न स्वतः--इत्यस्यार्थस्य प्रदर्शनाय हेतुरुपदिश्यते—स आत्मा हि यस्मात् स्वप्नो भूत्वा, स यया धिया समानः, सा धीर्यद् यद् भवति तत्तदसावपि भवतीव; तस्माद् यदासौ स्वप्नो भवति स्वापवृत्तिं प्रतिपद्यते धीः, तदा सोऽपि स्वप्नवृत्तिं प्रतिपद्यते; यदा धीर्जिजागरिषति, तदा असावपि।<br><br>अत आह-स्वप्नो भूत्वा स्वप्नवृत्तिमवभासयन् धियः स्वापवृत्त्याकारो भूत्वेमं लोकं जागरितव्यवहारलक्षणं कार्यकारणसङ्घातात्मकं लौकिकशास्त्रीयव्यवहारास्पदम्, अतिक्रामत्यतीत्य क्रामति, विविक्तेन स्वेन आत्मज्योतिषा स्वप्नात्मिकां धीवृत्तिमवभासयन्न-किंतु यह कैसे जाना जाता है कि उन बुद्धि आदिकी समानताकी भ्रान्ति ही आत्माके दोनों लोकोंमें सञ्चारादि करनेका हेतु है, वह स्वतः सञ्चारादि नहीं करता-इसी अर्थको प्रदर्शित करनेके लिये हेतु बतलाया जाता है-'क्योंकि वह आत्मा ही स्वप्न होकर [ इस लोकका अतिक्रमण करता है ]।' वह जिस बुद्धिके समान होता है, वह बुद्धि जो-जो होती है, वही-वही मानो यह भी हो जाता है; इसलिये जिस समय वह स्वप्न होती है अर्थात् जिस समय बुद्धि स्वप्नवृत्तिको प्राप्त होती है, उस समय यह आत्मा भी स्वप्नवृत्तिको प्राप्त हो जाता है; और जिस समय बुद्धि जागनेकी इच्छा करती है उस समय यह भी जागना चाहता है।<br><br>इसलिये श्रुति कहती है—स्वप्न होकर-बुद्धिकी स्वप्नवृत्तिको प्रकाशित करता हुआ अर्थात् स्वप्नवृत्त्याकार होकर लौकिक एवं शास्त्रीय व्यवहारके योग्य इस देहेन्द्रियसङ्घातमय जागरित व्यवहाररूप लोकका अतिक्रमण कर जाता है अर्थात् इसको पार करके चला जाता है, उस समय चूँकि यह अपने विशुद्ध आत्मतेजसे बुद्धिकी स्वप्नात्मिका वृत्तिको प्रकाशित करता हुआ

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०३

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०३


संस्कृत शाङ्करभाष्यहिन्दी अनुवाद
वतिष्ठते यस्मात्—तस्मात् स्वयंज्योतिःस्वभाव एवासौ; विशुद्धः स कर्तृक्रियाकारकफलशून्यः परमार्थतः, धीसादृश्यमेव तु उभयलोकसञ्चारादिसंव्यवहारभ्रान्तिहेतुः।स्थित रहता है, इसलिये यह स्वयं-ज्योतिःस्वरूप ही है; वह वस्तुतः कर्ता, क्रिया, कारक एवं फलसे रहित शुद्धस्वरूप है, उसके दोनों लोकोंमें सञ्चारादि व्यवहाररूप भ्रान्तिकी हेतु बुद्धिके समान होना ही है।
मृत्यो रूपाणि, मृत्युः कर्माविद्यादिः, न तस्यान्यद् रूपं स्वतः, कार्यकारणान्येवास्य रूपाणि; अतस्तानि मृत्यो रूपाण्यतिक्रामति क्रियाफलाश्रयाणि।मृत्युके रूपोंको—कर्म एवं अविद्यादि ही मृत्यु हैं, इनके सिवा उसका स्वतः कोई रूप नहीं है; देह और इन्द्रियाँ ही उसके रूप हैं; अतः कर्म और फलके आश्रयभूत उन मृत्युके रूपोंको वह पार कर जाता है।
ननु नास्त्येव धिया समान-[व्यतिरिक्तात्म-सत्तायामाक्षेपः] मन्यद् धियोऽवभासकमात्मज्योतिः, धीव्यतिरेकेण प्रत्यक्षेण वा अनुमानेन वानुपलम्भात्—यथान्या तत्काल एव द्वितीया धीः। यच्चवभास्यावभासकयोरन्यत्वेऽपि विवेकानुपलम्भात् सादृश्यमिति घटाद्यालोकयोः—तत्र भवत्वन्यत्वे न आलोकस्योपलम्भाद् घटादेः, संश्लिष्टयोः सादृश्यं भिन्नयोरेव; न च तथेह घटादेरिव धियोऽव-पूर्व०—किंतु बुद्धिके समान बुद्धिको प्रकाशित करनेवाली कोई अन्य आत्मज्योति तो है नहीं, क्योंकि प्रत्यक्ष अथवा अनुमानसे भी बुद्धिसे व्यतिरिक्त उसकी उपलब्धि नहीं होती जिस प्रकार कि उसी कालमें [अर्थात् एक बुद्धिकी उपलब्धिके समय] दूसरी बुद्धिकी उपलब्धि नहीं होती। और ऐसा जो कहा कि अवभास्य घट आदि और अवभासक आलोकका भेद होनेपर भी विवेक न हो सकनेके कारण सादृश्य है, सो वहाँ आलोककी भिन्नरूपसे उपलब्धि होनेके कारण उन दोनोंके भिन्न होनेपर भी घटादिके साथ मिलनेपर सदृशता हो सकती है, किंतु यहाँ

९०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

९०४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| भासकं ज्योतिरन्तरं प्रत्यक्षेण वानुमानेन वोपलभामहे; धीरेव हि चित्स्वरूपावभासकत्वेन स्वाकारा विषयाकारा च; तस्मान्नानुमानतो नापि प्रत्यक्षतो धियोऽवभासकं ज्योतिः शक्यते प्रतिपादयितुं व्यतिरिक्तम् । | तो घटादिके समान प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाणसे भी बुद्धिकी प्रकाशक कोई अन्य ज्योति हमें उपलब्ध नहीं होती; अपि तु चित्स्वरूपसे प्रकाशक होनेके कारण बुद्धि ही बुद्ध्याकार और विषयाकार हो जाती है । अतः बुद्धिकी अवभासक उससे भिन्न कोई अन्य ज्योति न तो अनुमानसे और न प्रत्यक्षसे ही बतलायी जा सकती है। | | यदपि दृष्टान्तरूपमभिहितम्, अवभास्यावभासकयोर्भिन्नयोरेव घटाद्यालोकयोः संयुक्तयोः सादृश्यमिति—तत्राभ्युपगममात्रमस्माभिरुक्तम्; न तत्र घटाद्यवभास्यावभासकौ भिन्नौ; परमार्थतस्तु घटादिरेवावभासात्मकः सालोकः; अन्योऽन्यो हि घटादिरुत्पद्यते; विज्ञानमात्रमेव सालोकघटादिविषयाकारमवभासते; यदैवम्, तदा न बाह्यो दृष्टान्तोऽस्ति, विज्ञानलक्षणमात्रत्वात् सर्वस्य । | इसके सिवा [स्वरूपतः] भिन्न किंतु परस्पर मिले हुए अवभास्य घटादि और अवभासक आलोकका जो दृष्टान्तरूपसे सादृश्य बतलाया गया है, उसे भी हमने एक प्रकारकी मान्यतामात्र कहा है; किंतु वहाँ घटादि अवभास्य और उनका अवभासक भिन्न नहीं हैं; वास्तवमें तो आलोकके सहित घटादि ही अवभासस्वरूप हैं । अन्य-अन्य घटादि उत्पन्न होते रहते हैं, केवल विज्ञान ही आलोकसहित घटादिरूप विषयके आकारमें भासित होता रहता है । जब कि ऐसी बात है, तो वस्तुतः कोई बाह्य दृष्टान्त नहीं है, क्योंकि सब कुछ विज्ञानस्वरूपमात्र ही है।¹ |


१. यहाँतक विज्ञानवादी बौद्धोंका मत कहा गया, इससे आगे इस मतका अनुवाद करते हुए शून्यवादी बौद्धोंका मत बतलाते हैं ।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०५

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०५


| शून्यवादिमतानुवादः एवं तस्यैव विज्ञानस्य ग्राह्यग्राहकाकारतामलं परिकल्प्य, तस्यैव पुनर्विशुद्धिं परिकल्पयन्ति; तद्ग्राह्यग्राहकविनिर्मुक्तं विज्ञानं स्वच्छीभूतं क्षणिकं व्यवतिष्ठत इति केचित् । तस्यापि शान्तिं केचिदिच्छन्ति; तदपि विज्ञानं संवृतं ग्राह्यग्राहकांशविनिर्मुक्तं शून्यमेव घटादिबाह्यवस्तुवदित्यपरे माध्यमिका आचक्षते । | सिद्धान्ती— इस प्रकार उस विज्ञानकी ही ग्राह्य-ग्राहकाकारताकी पूर्णतया कल्पना कर फिर उसीकी अत्यन्त शुद्धिकी कल्पना करते हैं; वह ग्राह्य-ग्राहकभावसे रहित विज्ञान स्वच्छ और क्षणिकरूपसे स्थित है—ऐसा किन्हीं-किन्हींका मत है। कोई तो उस क्षणिक विज्ञानकी भी शान्ति करना चाहते हैं; अविद्यासे आच्छादित वह विज्ञान भी घटादि बाह्य वस्तुओंके समान ग्राह्य-ग्राहकांशसे रहित शून्यमात्र ही है—ऐसा दूसरे माध्यमिक बौद्ध कहते हैं। | | तन्निरासः सर्वा एताः कल्पना बुद्धिविज्ञानावभासकस्य व्यतिरिक्तस्यात्मज्योतिषोऽपह्नवादस्य श्रेयोमार्गस्य प्रतिपक्षभूतावैदिकस्य । तत्र येषां बाह्योऽर्थोऽस्ति, तान् प्रत्युच्यते— | ये सारी कल्पनाएँ बुद्धिरूप विज्ञानके अवभासक एवं उससे व्यतिरिक्त आत्मज्योतिका त्याग करनेवाली होनेसे इस वैदिक कल्याणमार्गकी विघ्नरूपा हैं। अब जिनके मतमें घटादि बाह्य पदार्थकी सत्ता है, उनसे कहा जाता है— | | न तावत् स्वात्मावभासकत्वं घटादेः, तमस्यवस्थितो घटादिस्तावन्न कदाचिदपि स्वात्मनावभास्यते; प्रदीपाद्यालोकसंयोगेन तु नियमेनैवावभास्यमानो दृष्टः सालोको घट इति; संश्लिष्टयोरपि घटालोकयोरन्य- | घटादि स्वयं ही अपने प्रकाशक हों—ऐसी बात तो है नहीं; अँधेरेमें रखे हुए घटादि तो कभी अपने-आप प्रकाशित होते ही नहीं; हाँ, दीपकादिके प्रकाशसे संयोग होनेपर तो 'यह घट प्रकाशयुक्त है' इस प्रकार उसका नियमसे प्रकाशित होना देखा जाता है; मिले हुए घट और प्रकाश भी एक-दूसरे- |

९०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

९०६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४
संस्कृतहिन्दी
त्वमेव; पुनः पुनः संश्लेषे विश्लेषे च विशेषदर्शनाद्रज्जुघटयोरिव । अन्यत्वे च व्यतिरिक्तावभासकत्वम्; न स्वात्मनैव स्वात्मानमवभासयति ।से हैं भिन्न ही; क्योंकि रस्सी और घटके समान उनका पुनः-पुनः संयोग और वियोग होनेपर उनमें विशेषता दिखायी देती है। इस प्रकार यदि उनका भेद है तो प्रकाश्य पदार्थोंका कोई अन्य प्रकाशक है—यह भी सिद्ध हो जाता है; वे स्वयं ही अपनेको प्रकाशित नहीं करते।
(विज्ञानस्य स्वयंप्रकाशत्वे प्रदीपदृष्टान्तोपन्यासः)<br>ननु प्रदीपः स्वात्मानमेवावभासयन् दृष्ट इति न हि घटादिवत् प्रदीपदर्शनाय प्रकाशान्तरमुपाददते लौकिकाः; तस्मात् प्रदीपः स्वात्मानं प्रकाशयति ।**पूर्व०—**किंतु दीपक तो स्वयं ही अपनेको प्रकाशित करता देखा जाता है; क्योंकि लौकिक पुरुष घटादिके समान दीपकको देखनेके लिये कोई अन्य प्रकाश ग्रहण नहीं करते; इसलिये दीपक स्वयं ही अपनेको प्रकाशित करता है।
(तन्निरासनम्)<br>न, अवभास्यत्वाविशेषात्; यद्यपि प्रदीपोऽन्यस्यावभासकः स्वयमवभासात्मकत्वात्, तथापि व्यतिरिक्तचैतन्यावभास्यत्वं न व्यभिचरति, घटादिवदेव यदा चैवम्, तदा व्यतिरिक्तावभास्यत्वं तावदवश्यम्भावि ।**सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है; क्योंकि प्रकाश्यत्वमें दीपककी घटादिसे समानता है, यद्यपि स्वयं प्रकाशस्वरूप होनेके कारण दीपक दूसरोंका प्रकाशक है, तथापि घटादिके समान ही वह अपनेसे भिन्न चैतन्यद्वारा प्रकाशित होनेकी योग्यताका त्याग नहीं करता; जब कि ऐसी बात है, तो अपनेसे भिन्नसे प्रकाशित होना तो अनिवार्य ही है।
ननु यथा घटश्चैतन्यावभास्यत्वेऽपि व्यतिरिक्तमालोकान्त-**पूर्व०—**किंतु जिस प्रकार चैतन्यसे अवभासित होने योग्य होनेपर भी घटको अपनेसे भिन्न दूसरे आलोककी

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ९०७

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ९०७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
रमपेक्षते, न त्वेवं प्रदीपोऽन्यमालोकान्तरमपेक्षते; तस्मात् प्रदीपोऽन्यावभास्योऽपि सन्नात्मानं घटं चावभासयति ।अपेक्षा होती है, उस प्रकार दीपकको तो किसी अन्य प्रकाशकी अपेक्षा नहीं होती; अतः अन्यसे अवभासित होनेवाला होनेपर भी दीपक अपनेको और घटको प्रकाशित करता है ।
न, स्वतः परतो वा विशेषाभावात्—यथा चैतन्यावभास्यत्वं घटस्य, तथा प्रदीपस्यापि चैतन्यावभास्यत्वमविशिष्टम् ।सिद्धान्ती—नहीं, उसमें स्वतः अथवा परतः कोई भी विशेषता नहीं है; जिस प्रकार घट चैतन्यसे अवभासित होनेवाला है, उसी प्रकार उसके समान ही दीपक भी चैतन्यसे अवभासित होनेवाला है ।
यत्तूच्यते, प्रदीप आत्मानं घटं चावभासयतीति, तदसत्; कस्मात् ? यदा आत्मानं नावभासयति, तदा कीदृशः स्यात् ? न हि तदा प्रदीपस्य स्वतो वा परतो वा विशेषः कश्चिदुपलभ्यते; स ह्यवभास्यो भवति, यस्यावभासकसंनिधावसंनिधौ च विशेष उपलभ्यते; न हि प्रदीपस्य स्वात्मसन्निधिरसन्निधिर्वा शक्यः कल्पयितुम्; असति च कादा-तथा ऐसा जो कहा जाता है कि दीपक अपनेको और घटको भी प्रकाशित करता है; सो यह भी ठीक नहीं है; क्यों नहीं है ? सो बतलाते हैं—जिस समय दीपक अपनेको प्रकाशित नहीं करता, उस समय वह कैसा रहता है ? उस अवस्था में तो दीपकका अपनेसे अथवा अन्यसे कोई भी अन्तर नहीं देखा जाता; अवभास्य तो वही होता है, जिसमें अवभासककी सन्निधि अथवा असन्निधि होनेपर कोई अन्तर देखा जाय । किंतु दीपककी अपनेसे ही सन्निधि अथवा असन्निधि होनेकी कल्पना नहीं की जा सकती; अतः इस प्रकार कभी-कभी [ सन्निधि अथवा असन्निधिके कारण ] होनेवाले अन्तर-

| ९०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |

९०८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| चित्के विशेषे, आत्मानं प्रदीपः प्रकाशयतीति मृषैवोच्यते । | के न होनेपर 'दीपक अपनेको प्रकाशित करता है' ऐसा मिथ्या ही कहा जाता है । | | चैतन्यग्राह्यत्वं तु घटादिभिरविशिष्टं प्रदीपस्य; तस्माद् विज्ञानस्यात्मग्राह्यग्राहकत्वे न प्रदीपो दृष्टान्तः । चैतन्यग्राह्यत्वं च विज्ञानस्य बाह्यविषयैरविशिष्टम् । | दीपकका चैतन्यग्राह्य होना तो घटादिके समान ही है; अतः विज्ञानके अपने ही ग्राह्य और ग्राहक होनेमें दीपक दृष्टान्त नहीं हो सकता । हां, विज्ञानका चैतन्य ग्राह्य होना तो बाह्य विषयोंके समान ही है । | | चैतन्यग्राह्यत्वे च विज्ञानस्य, किं ग्राह्यविज्ञानग्राह्यतैव, किं वा ग्राहकविज्ञानग्राह्यतेति तत्र सन्दिह्यमाने वस्तुनि, योऽन्यत्र दृष्टो न्यायः स कल्पयितुं युक्तो न तु दृष्टविपरीत:; तथा च सति यथा व्यतिरिक्तेनैव ग्राहकेण बाह्यानां प्रदीपानां ग्राह्यत्वं दृष्टम् तथा विज्ञानस्यापि चैतन्यग्राह्यत्वात् प्रकाशकत्वे सत्यपि प्रदीपवद् व्यतिरिक्तचैतन्यग्राह्यत्वं युक्तं कल्पयितुम्, न त्वनन्यग्राह्यत्वम्; यश्चान्यो विज्ञानस्य ग्रहीता, स | विज्ञानकी चैतन्यग्राह्यता सिद्ध होनेपर भी क्या ग्राह्य (विषय-विषयक) विज्ञानकी ग्राह्यता है अथवा ग्राहक (विषयिविषयक) विज्ञानकी ? इस प्रकार वस्तुके विषयमें संदेह होनेपर जो न्याय अन्य पदार्थोंके विषयमें देखा गया है, उसीकी यहाँ भी कल्पना करनी चाहिये, दृष्टन्यायसे विपरीत कल्पना करनी उचित नहीं है; ऐसी स्थितिमें, जिस प्रकार अपनेसे व्यतिरिक्त ग्राहकके द्वारा बाह्य प्रदीपोंकी ग्राह्यता देखी गयी है, उसी प्रकार विज्ञानकी भो चैतन्यग्राह्यता होनेके कारण, प्रकाशक होनेपर भी दीपकके समान अपनेसे भिन्न चैतन्यद्वारा ही ग्राह्यता कल्पना करनी चाहिये, उसकी अनन्यग्राह्यता (विज्ञानग्राह्यता) माननी उचित नहीं है, इस प्रकार जो विज्ञानका ग्रहीता |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ९०९

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ९०९


संस्कृतहिन्दी
आत्मा ज्योतिरन्तरं विज्ञानात् ।है, वह आत्मा विज्ञानसे भिन्न ज्योति है।
तदानवस्थेति चेन्न, ग्राह्यत्वमात्रं हि तद्ग्राहकस्य वस्त्वन्तरत्वे लिङ्गमुक्तं न्यायतः; न त्वेकान्ततो ग्राहकत्वे तद्ग्राहकान्तरास्तित्वे वा कदाचिदपि लिङ्गं सम्भवति; तस्मान्न तदनवस्थाप्रसङ्गः ।यदि कहो कि तब तो अनवस्था हो जायगी, तो ऐसी बात नहीं है। किसी वस्तुका ग्राह्य होना ही उसके ग्राहकके अन्य पदार्थ होनेमें न्यायतः लिङ्ग कहा गया है; किंतु उस आत्माके अव्यभिचारी ग्राहकत्व और उसके किसी अन्यग्राहकके अस्तित्वमें कभी कोई लिङ्ग होना सम्भव नहीं है, इसलिये उस अनवस्थाका प्रसङ्ग नहीं हो सकता।
विज्ञानस्य व्यतिरिक्तग्राह्यत्वे करणान्तरापेक्षायामनवस्थेति चेन्न, नियमाभावात्—न हि सर्वत्रायं नियमो भवति; यत्र वस्त्वन्तरेण गृह्यते वस्त्वन्तरम्, तत्र ग्राह्यग्राहकव्यतिरिक्तं करणान्तरं स्यादिति नैकान्तेन नियन्तुं शक्यते, वैचित्र्यदर्शनात्;यदि कहो कि विज्ञानको किसी अन्यसे ग्राह्य माननेपर इन्द्रियान्तरकी अपेक्षा होनेके कारण अनवस्था होगी तो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि ऐसा नियम नहीं है—सर्वत्र यही नियम नहीं होता, जहां किसी अन्य वस्तुसे कोई अन्य वस्तु ग्रहण की जाती है, वहां ग्राह्य और ग्राहकसे भिन्न कोई अन्य इन्द्रिय भी होनी चाहिये—ऐसा कोई अनिवार्य नियम नहीं किया जा सकता; क्योंकि इसमें विचित्रता
कथम् ? घटस्तावत् स्वात्मव्यतिरिक्तेनात्मना गृह्यते; तत्र प्रदीपादिरालोको ग्राह्यग्राहकव्यतिरिक्तं करणम्, न हि प्रदीपाद्यालोकोदेखी जाती है; किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] घट अपनेसे भिन्न आत्माके द्वारा गृहीत होता ही है; वहां ग्राह्य और ग्राहकसे भिन्न प्रदीपादि प्रकाश उसका करण है; क्योंकि प्रदीपादिका

९१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

९१०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृत मूल / भाष्यहिन्दी अनुवाद
घटांशश्चक्षूरंशो वा; घटवच्चक्षुर्ग्राह्यत्वेऽपि प्रदीपस्य, चक्षुःप्रदीपव्यतिरेकेण न बाह्यालोकस्थानीयं किञ्चित् करणान्तरमपेक्षते। तस्मान्नैव नियन्तुं शक्यते—यत्र यत्र व्यतिरिक्तग्राह्यत्वं तत्र तत्र करणान्तरं स्यादेवेति। तस्माद् विज्ञानस्य व्यतिरिक्तग्राहकग्राह्यत्वे न करणद्वारानवस्था, नापि ग्राहकत्वद्वारा कदाचिदप्युपपादयितुं शक्यते; तस्मात् सिद्धं विज्ञानव्यतिरिक्तमात्मज्योतिरन्तरमिति।आलोक न घटका अंश है और न नेत्रका ही; किंतु दीपक घटके समान नेत्रसे ग्राह्य होनेपर भी नेत्र और दीपकसे व्यतिरिक्त बाह्य प्रकाशस्थानीय किसी अन्य करणकी अपेक्षा नहीं करता। इसलिये ऐसा नियम नहीं किया जा सकता कि जहाँ-जहाँ अपनेसे भिन्न वस्तुद्वारा ग्राह्यता होती है, वहाँ-वहाँ कोई अन्य करण होना ही चाहिये। अतः विज्ञानकी व्यतिरिक्तग्राहकग्राह्यता होनेपर भी न तो करणके कारण और न ग्राहकत्वके द्वारा ही कभी अनवस्था सिद्ध की जा सकती है; अतः विज्ञानसे पृथक् आत्मज्योति दूसरी ही है—यह सिद्ध हुआ।
(विज्ञानातिरिक्तग्राह्यग्राहकस्यासत्त्वोपपादनं तन्निरासश्च)<br><br>ननु नास्त्येव बाह्योऽर्थो घटादिः प्रदीपो वा विज्ञानव्यतिरिक्तः, यद्धि यद्व्यतिरेकेण नोपलभ्यते, तत्तन्मात्रं वस्तु दृष्टम्—यथा स्वप्नविज्ञानग्राह्यं घटपटादिवस्तु स्वप्नविज्ञानव्यतिरेकेणानुपलम्भात् स्वप्नघटप्रदीपादेः स्वप्नविज्ञानमात्रतावगम्यते, तथा जागरितेऽपि घटप्रदीपादेर्जाग्रद्विज्ञानव्यतिरेकेणानुपलम्भाज्जाग्रद्विज्ञानमात्रतैवविज्ञानवादी— किंतु घटादि अथवा दीपक आदि कोई बाह्य पदार्थ विज्ञानसे व्यतिरिक्त तो है ही नहीं, जो वस्तु जिसके बिना उपलब्ध नहीं होती, वह तत्स्वरूप ही देखी गयी है—जिस प्रकार स्वप्नविज्ञानसे गृहीत होनेवाली घट-पटादि वस्तु स्वप्नविज्ञानसे अलग उपलब्ध न होनेके कारण स्वप्नदृष्ट घट-प्रदीपादिकी स्वप्नविज्ञानमात्रता ज्ञात होती है; इसी प्रकार जागरित-अवस्थामें भी घट एवं प्रदीपादिकी जाग्रद्विज्ञानके सिवा उपलब्धि न होनेके कारण जाग्रद्विज्ञान-

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९११

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९११


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
युक्ता भवितुम् । तस्मान्नास्ति बाह्योऽर्थो घटप्रदीपादिः, विज्ञानमात्रमेव तु सर्वम्; तत्र यदुक्तम्—विज्ञानस्य व्यतिरिक्तावभास्यत्वाद् विज्ञानव्यतिरिक्तमस्ति ज्योतिरन्तरं घटादेरिवेति, तन्मिथ्या, सर्वस्य विज्ञानमात्रत्वे दृष्टान्ताभावात् ।मात्रता ही होनी उचित है अतः घट एवं प्रदीपादि बाह्य पदार्थ हैं ही नहीं, सब कुछ विज्ञानमात्र ही है; ऐसी स्थितिमें जो यह कहा गया कि घटादिके समान विज्ञान भी अपनेसे भिन्न साक्षीद्वारा भाष्य है, इसलिये उससे व्यतिरिक्त कोई अन्य ज्योति है, सो यह ठीक नहीं, क्योंकि जब सभी विज्ञानमात्र है, तो [उससे भिन्न कोई अन्य ज्योति है; इसमें] कोई दृष्टान्त नहीं हो सकता।
न, यावत्तावदभ्युपगमात्— <br><br> न तु बाह्योऽर्थो भवता एकान्तेनैव नाभ्युपगम्यते;सिद्धान्ती—ऐसी बात मत कहो, जहांतक तुम बाह्यार्थकी सत्ता स्वीकार करते हो वहाँतक तो है ही। तुम सर्वथा ही बाह्यार्थ न मानते हो—ऐसी बात तो है नहीं।
ननु मया नाभ्युपगम्यत एव ।विज्ञान०—हां, मैं तो नहीं ही मानता।
न, विज्ञानं घटः प्रदीप इति च शब्दार्थपृथक्त्वाद् यावत्, तावदपि बाह्यमर्थान्तरमवश्यमभ्युपगन्तव्यम् । विज्ञानादर्थान्तरं वस्तु न चेदभ्युपगम्यते, विज्ञानं घटः पट इत्येवमादीनां शब्दानामेकार्थत्वे पर्यायशब्दत्वं प्राप्नोति ।सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि 'विज्ञान, घट, प्रदीप' इत्यादि शब्द और इनके अर्थ पृथक् हैं, जबतक ऐसा है, तबतक भी तुम्हें बाह्य अर्थान्तर अवश्य स्वीकार करना होगा । यदि विज्ञानसे भिन्न कोई अन्य पदार्थ नहीं माना जायगा तो विज्ञान, घट, पट इत्यादि शब्दोंका एक (विज्ञान-मात्र) ही अर्थ माननेपर इनका पर्याय शब्द होना सिद्ध होगा।

| ९१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |

९१२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| तथा साधनानां फलस्य चैकत्वे, साध्यसाधनभेदोपदेशशास्त्रानर्थक्यप्रसङ्गः; तत्कर्तुरज्ञानप्रसङ्गो वा। | इस प्रकार साधन और फलकी भी एकता होनेपर तो साध्य-साधनरूप भेदका उपदेश करनेवाले शास्त्रकी व्यर्थताका प्रसङ्ग उपस्थित होगा, तथा उनके रचयिताओंके भी अज्ञानका प्रसङ्ग होगा ! | | किञ्चान्यत्—विज्ञानव्यतिरेकेण वादिप्रतिवादिवाददोषाभ्युपगमात्; न ह्यात्मविज्ञानमात्रमेव वादिप्रतिवादिवादस्तद्दोषो वाभ्युपगम्यते, निराकर्तव्यत्वात् प्रतिवाद्यादीनाम्; न ह्यात्मीयं विज्ञानं निराकर्तव्यमभ्युपगम्यते, स्वयं वा आत्मा कस्यचित्; तथा च सति सर्वसंव्यवहारलोपप्रसङ्गः। | इसके सिवा दूसरी बात यह है कि वादी-प्रतिवादीके वाद और दोष ये विज्ञानसे व्यतिरिक्त ही स्वीकार किये जाते हैं; वादी और प्रतिवादीके वाद अथवा दोष—आत्मविज्ञानमात्र ही नहीं स्वीकार किये जाते; क्योंकि प्रतिवादी आदिके लिये इनका निराकरण करना आवश्यक होता है; किंतु किसीके भी लिये अपना विज्ञान अथवा स्वयं आत्मा ही निराकरणके योग्य नहीं होता, यदि ऐसा हो तब तो सब प्रकारके सम्यक् व्यवहारके लोपका ही प्रसङ्ग उपस्थित हो जाय। | | न च प्रतिवाद्यादयः स्वात्मनैव गृह्यन्त इत्यभ्युपगमः; व्यतिरिक्तग्राह्या हि तेऽभ्युपगम्यन्ते। तस्मात् तद्वत् सर्वमेव व्यतिरिक्तग्राह्यं वस्तु जाग्रद्विषयत्वात्, | प्रतिवादी आदि विज्ञानरूप आत्मासे ही ग्रहण किये जाते हैं—ऐसा विज्ञानवादीको स्वीकार भी नहीं है; वे अपनेसे भिन्न वादी आदिके द्वारा ही ग्रहण किये जाते हैं—ऐसी मान्यता है। अतः उन्हींके समान सब वस्तुएँ अपनेसे भिन्न ग्राहकद्वारा ही ग्राह्य हैं, क्योंकि वे जाग्रत्के विषय हैं, |

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९१३

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९१३

| जाग्रद्वस्तु प्रतिवाद्यादिवदिति सुलभो दृष्टान्तः; सन्तत्यन्तरवद् विज्ञानान्तरवच्चेति । तस्माद् विज्ञानवादिनापि न शक्यं विज्ञानव्यतिरिक्तं ज्योतिरन्तरं निराकर्तुम् । <br><br> स्वप्ने विज्ञानव्यतिरेकाभावाद्युक्तमिति चेन्न, अभावादपि भावस्य वस्त्वन्तरत्वोपपत्तेः भवतैव तावत् स्वप्ने घटादिविज्ञानस्य भावभूतत्वमभ्युपगतम्; तदभ्युपगम्य तद्व्यतिरेकेण घटाद्यभाव उच्यते, स विज्ञानविषयो घटादिर्यद्यभावो यदि वा भावः स्यात्, उभयथापि घटादिविज्ञानस्य भावभूतत्वमभ्युपगतमेव; न तु तन्निवर्तयितुं शक्यते, तन्निवर्तकन्यायाभावात्। | जाग्रत्-कालकी वस्तु प्रतिवादी आदिके समान, इस प्रकार यह [प्रतिज्ञा और हेतुसहित] दृष्टान्त सुलभ है; इसके सिवा दूसरी संतान तथा दूसरे विज्ञानके समान भी वे वस्तुएँ अपनेसे भिन्न ग्राहकद्वारा ग्रहण करने योग्य हैं।¹ अतः विज्ञानवादी भी विज्ञानसे पृथक् अन्य ज्योतिका निराकरण करनेमें समर्थ नहीं है। <br><br> यदि कहो कि स्वप्नमें तो विज्ञानके सिवा दूसरी वस्तुका अभाव है तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि अभावसे भी भावका भिन्न वस्तु होना तो सिद्ध होता ही है—स्वप्नमें घटादि विज्ञानकी भावस्वरूपता तो आप भी स्वीकार करते ही हैं, वैसा मानकर ही उससे भिन्न घटादिका अभाव बतलाया जाता है, उस विज्ञानका विषय घटादि अभाव हो अथवा भाव, दोनों ही प्रकार घटादि विज्ञानकी भावरूपता तो मान ही ली गयी, उसका तो निराकरण किया नहीं जा सकता; क्योंकि उसकी निवृत्ति करनेवाली |


१. जिस प्रकार व्यवहारमें रामकी संतानसे श्यामकी संतानका तथा असर्वज्ञोंके ज्ञानसे सर्वज्ञके ज्ञानका अनुमान होता है, उसी प्रकार नीलादि पदार्थ और उनके विज्ञानके भेदसे विज्ञान और उनके प्रकाशक आत्मज्योतिके भेदका भी अनुमान किया जा सकता है; अतः विज्ञानवादियोंका मत ठीक नहीं है।

बृ० उ० ५८—

९१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

९१४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| एतेन सर्वस्य शून्यता प्रत्युक्ता । | कोई युक्ति नहीं है। इससे सबकी शून्यताका निराकरण हो गया । | | प्रत्यगात्मग्राह्यता चात्मनोऽहमिति मीमांसकपक्षः प्रत्युक्तः । | तथा आत्मा 'अहम्' इस प्रकार प्रत्यगात्माद्वारा ग्राह्य है—ऐसा मीमांसकोंके पक्षका भी खण्डन हो गया ।^१ | | यत्तूक्तम्, सालोकोऽन्यश्चान्यश्च घटो जायत इति, तदसत्, क्षणान्तरेऽपि स एवायं घट इति प्रत्यभिज्ञानात्; सादृश्यात् प्रत्यभिज्ञानं कृत्तोत्थितकेशनखादिष्विवेति चेन्न, तत्रापि क्षणिकत्वस्यासिद्धत्वात्, जात्येकत्वाच्च । | ऐसा जो कहा कि प्रकाशसहित दूसरा-दूसरा घट उत्पन्न होता रहता है, यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि दूसरे क्षणमें भी 'यह वही घट है' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है; यदि कहो कि काट देनेपर पुनः बढ़े हुए केश और नखादिके समान उन घटोंमें समानता होनेके कारण ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है तो ऐसी बात भी नहीं है, क्योंकि वहाँ भी उनकी क्षणिकता सिद्ध नहीं की जा सकती; इसके सिवा उन केश और नखादिकी एक ही जाति होनेके कारण भी ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है। | | कृतेषु पुनरुत्थितेषु च केशनखादिषु केशनखत्वजातेरेकत्वात् केशनखत्वप्रत्ययस्तन्निमित्तोऽभ्रान्त एव । न हि दृश्यमानलूनोत्थितकेशनखादिषु व्यक्तिनिमित्तः स | काटे हुए और पुनः बढ़े हुए केश और नखादिकी केशत्व और नखत्वरूपसे एक ही जाति होनेके कारण उससे होनेवाली केशत्व और नखत्वकी प्रतीति अभ्रान्त ही है। साक्षात् काटे और बढ़े हुए केश एवं नखादिमें 'यह वही है' ऐसी प्रतीति व्यक्ति- |


१. क्योंकि एक ही आत्माका ग्राह्य और ग्राहक उभयरूप होना सम्भव नहीं है।

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९१५ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ९१५
शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
एवेति प्रत्ययो भवति; कस्यचिद् दीर्घकालव्यवहितदृष्टेषु च तुल्यपरिमाणेषु, तत्कालीनवालादितुल्या इमे केशनखाद्या इतिप्रत्ययो भवति, न तु त एवेति; घटादिषु पुनर्भवति स एवेति प्रत्ययः; तस्मान्न समो दृष्टान्तः।के लिये (एक-एक नख या केशके लिये) नहीं होती। किसी-किसीको दीर्घकालके पश्चात् देखे हुए समान परिमाणवाले केश-नखादिमें तो ये केश और नखादि उस समयके केश-नखादिके समान हैं—ऐसा प्रत्यय होता है, परंतु 'ये वही हैं' ऐसा नहीं होता; किंतु घटादिमें तो 'यह वही है' ऐसा प्रत्यय होता है; इसलिये यह (कटकर बढ़े हुए केश आदिका) दृष्टान्त ठीक नहीं है।
प्रत्यक्षेण हि प्रत्यभिज्ञायमाने वस्तुनि तदेवेति, न चान्यत्वमनुमातुं युक्तम्, प्रत्यक्षविरोधे लिङ्गस्याभासत्वोपपत्तेः; सादृश्यप्रत्ययानुपपत्तेश्च, ज्ञानस्य क्षणिकत्वात्; एकस्य हि वस्तुदर्शिनो वस्त्वन्तरदर्शने सादृश्यप्रत्ययः स्यात्; न तु वस्तुदर्शी एको वस्त्वन्तरदर्शनाय क्षणान्तरमवतिष्ठते; विज्ञानस्य क्षणिकत्वात् सकृद्वस्तुदर्शनेनैव क्षयोपपत्तेः।यदि किसी वस्तुके विषयमें प्रत्यक्षतया ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है कि यह वही है तो उसके अन्य होनेका अनुमान करना उचित नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्षसे विरोध होनेपर लिङ्गका आभासत्व सिद्ध होगा; तथा ज्ञान क्षणिक है, इसलिये सदृशताका भान होना भी सम्भव नहीं है। एक ही वस्तुदर्शीको किसी दूसरी वस्तुके देखनेपर सादृश्यप्रत्यय हो सकता है; और [तुम्हारे सिद्धान्तानुसार] एक वस्तुदर्शी दूसरी वस्तुको देखनेके लिये दूसरे क्षणमें रहता नहीं है; क्योंकि विज्ञान क्षणिक होनेके कारण उसका एक बार वस्तु देखनेसे ही क्षय होना सिद्ध हो जाता

९१६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

९१६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४


संस्कृतहिन्दी
तेनेदं सदृशमिति हि सादृश्यप्रत्ययो भवति; तेनेति दृष्टस्मरणम्, इदमिति वर्तमानप्रत्ययः; तेनेति दृष्टं स्मृत्वा, यावदिदमिति वर्तमानक्षणकालमवतिष्ठेत, ततः क्षणिकवादहानिः; अथ तेनेत्येवोपक्षीणः स्मार्तः प्रत्ययः, इदमिति चान्य एव वार्तमानिकः प्रत्ययः क्षीयते, ततः सादृश्यप्रत्ययानुपपत्तिस्तेनेदं सदृशमिति अनेकदर्शिन एकस्याभावात्; <br><br> व्यपदेशानुपपत्तिश्च—द्रष्टव्यदर्शनेनैवोपक्षयाद् विज्ञानस्येदं पश्याम्यदोऽद्राक्षमिति व्यपदेशानुपपत्तिः, दृष्टवतो व्यपदेशक्षणानवस्थानात्; अथावतिष्ठेत, क्षणिकवादहानिः; अथादृष्टवतो व्यपदेशः सादृश्यप्रत्ययश्च, तदानीं जात्यन्धस्येव रूपविशेषव्यपदेश-है, यह उसके समान है' ऐसा सादृश्यप्रत्यय हुआ करता है, 'उसके' यह पहले देखे हुएका स्मरण है और 'यह' इस पदसे वर्तमानकी प्रतीति होती है; यदि 'तेन' इस प्रकार पहले देखे हुएको स्मरण रखकर देखनेवाला 'इदम्' ऐसे अनुभवपर्यन्त वर्तमान क्षणकालतक रहेगा तो क्षणिकवादकी हानि होगी; और यदि 'तेन' इतनेहीसे स्मृतिज्ञान क्षीण हो गया और 'इदम्' ऐसा दूसरा ही वार्तमानिक ज्ञान क्षीण होता है तो ऐसी अवस्थामें सादृश्यज्ञान होना सम्भव नहीं है, 'क्योंकि यह उसके समान है' इस प्रकार [ इस और उस ] अनेक वस्तुओंको देखनेवाला कोई एक नहीं है। <br><br> [ विज्ञानकी क्षणिकता माननेपर ] व्यवहारकी भी सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि विज्ञान तो द्रष्टव्यको देखकर ही क्षीण हो जाता है। 'मैं यह देखता हूँ' 'मैंने इसे देखा' ऐसा व्यवहार सम्भव नहीं है, क्योंकि जो देखनेवाला है, वह ऐसा कहनेके क्षणमें नहीं रहता; यदि मानें कि रहता है तो क्षणिकवादकी हानि होती है; यदि वह कथन न देखनेवालेका है और कहो कि उसीको सादृश्यप्रत्यय होता है तो उस अवस्थामें वह जन्मान्धके

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९१७ |

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९१७ | | :--- | :--- |

संस्कृतहिन्दी
स्तत्साहश्यप्रत्ययश्च; सर्वमन्धपरम्परेति प्रसज्येत सर्वज्ञशास्त्रप्रणयनादि; न चैतदिष्यते; अकृताभ्यागमकृतविप्रणाशदोषौ तु प्रसिद्धतरौ क्षणवादे ।रूप-विशेषकथन और उसीका सादृश्यज्ञान होगा; तब तो सर्वज्ञ बुद्धके शास्त्रप्रणयनादि सब-के-सब अन्धपरम्परा ही हैं—ऐसा कहनेका प्रसंग होगा और यह बात इष्ट नहीं है; इस क्षणिकवादमें बिना कियेकी प्राप्ति और किये हुएका नाश—ये दो दोष तो अत्यन्त प्रसिद्ध हैं।
दृष्टव्यपदेशहेतुः पूर्वोत्तरसहित एक एव हि शृङ्खलावत् प्रत्ययो जायत इति चेत्, 'तेनेदं सदृशम्' इति च; न वर्तमानातीतयोर्भिन्नकालत्वात्—तत्र वर्तमानप्रत्यय एकः शृङ्खलावयवस्थानीयः, अतीतश्चापरः, तौ प्रत्ययौ भिन्नकालौ; तदुभयप्रत्ययविषयस्पृक् चेच्छृङ्खलाप्रत्ययः, ततः क्षणद्वयव्यापित्वादेकस्य विज्ञानस्य पुनः क्षणवादहानिः; ममतवतादिविशेषानुपपत्तेश्च सर्वसंव्यवहारलोपप्रसङ्गः ।पूर्वदृष्टके निर्देशका हेतु पूर्वोत्तर प्रत्ययसे युक्त शृङ्खलाके समान एक ही ज्ञान होता है तथा 'उसके समान यह है' ऐसा भी प्रत्यय होता है—यदि यह कहो तो ठीक नहीं, क्योंकि वर्तमान और भूत तो भिन्न काल हैं—उनमें शृङ्खलाका अवयवरूप एक वर्तमान प्रत्यय है और दूसरा अतीत प्रत्यय है। वे दोनों प्रत्यय भिन्नकालिक हैं; यदि वह शृङ्खलाके समान प्रत्यय उन दोनों प्रत्ययोंके विषयोंको स्पर्श करनेवाला है तो एक ही विज्ञानके दो क्षणोंमें व्यापक होनेके कारण पुनः क्षणिकवादकी हानि होती है तथा मेरा-तेरा आदि भेदकी उपपत्ति न होनेके कारण सम्पूर्ण व्यवहारके लोपका प्रसङ्ग उपस्थित होता है।
सर्वस्य च स्वसंवेद्यविज्ञानमात्रत्वे, विज्ञानस्य च स्वच्छावबो-सब स्वसंवेद्य विज्ञानमात्र होनेपर तथा विज्ञानको स्वच्छ ज्ञानप्रकाश-

९१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

९१८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| धावभासमात्रस्वाभाव्याभ्युपगमात्, तद्दर्शिनश्चान्यस्याभावे, अनित्यदुःखशून्यानात्मत्वाद्यनेकरूपकल्पनानुपपत्तिः। न च दाडिमादेशिव विरुद्धानेकांशवत्त्वं विज्ञानस्य, स्वच्छावभासस्वाभाव्याद् ज्ञानस्य। अनित्यदुःखादीनां विज्ञानांशत्वे च सति—अनुभूयमानत्वाद् व्यतिरिक्तविषयत्वप्रसङ्गः।<br><br>अथ अनित्यदुःखाद्यात्मकत्वमेव विज्ञानस्य, तदा तद्वियोगाद् विशुद्धिकल्पनानुपपत्तिः; संयोगिमलवियोगाद्धि विशुद्धिर्भवति, यथा आदर्शप्रभृतीनाम्; न तु स्वाभाविकेन धर्मेण कस्यचिद् वियोगो दृष्टः; न ह्यग्नेः स्वाभाविकेन प्रकाशेन औष्ण्येन वा वियोगो | स्वरूप माननेपर यदि उसके साक्षी किसी अन्य पदार्थकी सत्ता नहीं मानी जायगी तो उसमें अनित्यत्व, दुःखत्व, शून्यत्व और अनात्मत्व आदि अनेकों कल्पनाओंकी उपपत्ति नहीं हो सकेगी। अनार आदिके समान विज्ञान बहुत-से विरुद्ध अंशोंसे युक्त हो—ऐसी बात भी है नहीं, क्योंकि विज्ञान तो स्वच्छ प्रकाशस्वरूप है। यदि अनित्य दुःखादिको विज्ञानका अंश माना जाय तो अनुभूत होनेवाले होनेके कारण उन्हें किसी दूसरेका विषय माननेका प्रसङ्ग होगा।<sup></sup><br><br>और यदि विज्ञानको अनित्य दुःखादिरूप ही माना जाय तो उनकी निवृत्तिद्वारा उसकी विशुद्धिकी कल्पना करनी सम्भव नहीं है, क्योंकि विशुद्धि तो लगे हुए मलको दूर करनेसे ही होती है, जैसे कि दर्पणादिकी; किंतु अपने स्वाभाविक धर्मसे किसीका भी वियोग होता नहीं देखा जाता; अग्निका अपने स्वाभाविक प्रकाश अथवा उष्णतासे वियोग |


१. क्योंकि विज्ञान ही अनुभव करनेवाला और अनित्यत्वादि विज्ञानके अंश ही उसके अनुभवके विषय हों—यह सम्भव नहीं है। कारण प्रमेय और प्रमाणका अंशांशिभाव अथवा धर्म-धर्मिभाव किसी भी प्रकार नहीं हो सकता, वे अवश्य पृथक्-पृथक् ही होने चाहिये।