भारतकोश
संग्रह पर लौटें

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

२०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२०४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| तस्य च विषयीकरणे आत्मन एकत्वाद्दिषय्यभावप्रसङ्गः । | विषय कर ले तो विषयीके अभावका प्रसङ्ग उपस्थित हो जाय, क्योंकि आत्मा तो एक ही है।^१ | | एकस्यैव विषयविषयित्वं दीपवदिति चेत् ? | पूर्व०—दीपकके समान एकका ही विषय और विषयी भी होना सम्भव है। | | न; युगपदसम्भवात्, आत्मन्यंशानुपपत्तेश्च। एतेन विज्ञानस्य ग्राह्यग्राहकत्वं प्रत्युक्तम् । | सिद्धान्ती—नहीं, एक साथ ऐसा होना सम्भव नहीं है। इसके सिवा आत्मामें अंश होना सम्भव न होनेसे भी यही सिद्ध होता है। इससे विज्ञानका ग्राह्य-ग्राहक उभयरूप होना भी खण्डित हो जाता है। | | प्रत्यक्षानुमानविषययोश्च दुःखआत्मनोर्गुणगुणित्वे नानुमानम् । दुःखस्य नित्यमेव प्रत्यक्षविषयत्वात्, रूपादिसामानाधिकरण्याच्च । | प्रत्यक्ष प्रमाणके विषय दुःख और अनुमान प्रमाणके विषय आत्माके गुण और गुणी होनेमें अनुमान प्रमाण भी नहीं हो सकता; क्योंकि दुःख सर्वदा प्रत्यक्षका ही विषय है तथा रूपादिसे उसका सामानाधिकरण्य है। | | मनःसंयोगजत्वेऽप्यात्मनि दुःखस्य सावयवत्वविक्रियावत्त्वानित्यत्वप्रसङ्गात् । न ह्यविकृत्य संयोगि द्रव्यं गुणः कश्चिदुपयन्न- | आत्मामें दुःखको मनः संयोगजनित माना जाय तो भी आत्माके सावयवत्व, विकारित्व एवं अनित्यत्वका प्रसङ्ग उपस्थित होता है, क्योंकि संयोगी द्रव्यको विकृत किये बिना कोई गुण |


१ इसलिये यदि वह प्रत्यक्षविषयक ज्ञानका विषय हो जायगा तो विषयी कौन होगा ? क्योंकि एक ही पदार्थ एक ही ज्ञानका विषय और विषयी दोनों नहीं हो सकता।

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २०५

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २०५


संस्कृत (मूल)हिन्दी अनुवाद
पयन्वा दृष्टः क्वचित् । न च निरवयवं विक्रियमाणं दृष्टं क्वचिदनित्यगुणाश्रयं वा नित्यम् । न चाकाश आगमवादिभिर्नित्यतयाभ्युपगम्यते, न चान्यो दृष्टान्तोऽस्ति ।कहीं आता-जाता नहीं देखा गया । तथा निरवयव वस्तुको कहीं विकृत होते और नित्य वस्तुको अनित्य गुणोंका आश्रय होते नहीं देखा गया । आगमोक्तमतावलम्बिन्होंने आकाशको तो नित्य नहीं माना^१ और इसके सिवा कोई दूसरा दृष्टान्त नहीं है ।
विक्रियमाणमपि तत्प्रत्ययान्निवृत्तेर्नित्यमेवेति चेत् ?पूर्व०— विकृत होनेपर भी 'यह वही है' ऐसा ज्ञान निवृत्त न होनेके कारण वह नित्य ही है—ऐसा मानें तो ?^२
न, द्रव्यस्य अवयवान्यथात्वव्यतिरेकेण विक्रियानुपपत्तेः ।सिद्धान्ती— ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि द्रव्य पदार्थके अवयवोंमें परिवर्तन हुए बिना विकार होना सम्भव नहीं है ।
सावयवत्वेऽपि नित्यत्वमिति चेन्न;यदि कहो कि सावयव होनेपर भी वह नित्य है^३ तो ऐसा हो नहीं सकता,
सावयवस्यावयवसंयोगपूर्वकत्वे सति विभागोपपत्तेः ।क्योंकि सावयव पदार्थ अवयवसंयोगपूर्वक उत्पन्न होनेके कारण उसके अवयवोंका विभाग होना सम्भव है ।
वज्रादिष्वदर्शनान्नेति चेन्न, अनुमेयत्वात्सं-यदि कहो कि वज्रादिमें तो ऐसा नहीं देखा जाता^४ तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि उनकी अवयवसंयोग-

१. क्योंकि "आत्मन आकाशः सम्भूतः" ( तै० उ० २ । १ ) इस श्रुतिसे आत्मासे आकाशकी उत्पत्ति सिद्ध होती है और उत्पन्न होनेवाला पदार्थ नित्य नहीं हो सकता ।
२. यह परिणामवादियोंका मत है ।
३. ऐसा जैनी लोग मानते हैं ।
४. अर्थात् वज्रादि ( बिजली आदि ) सावयव होनेपर भी अवयवसंयोगपूर्वक उत्पन्न होते हों, ऐसा नहीं देखा जाता ।

| २०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |

२०६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| योगपूर्वत्वस्य। तस्मान्नात्मनो दुःखाद्यनित्यगुणाश्रयत्वोपपत्तिः। | पूर्वकत्वका अनुमान किया जा सकता है। अतः आत्माका अनित्य गुणोंका आश्रय होना सम्भव नहीं है। | | परस्यादुःखित्वेऽन्यस्य च दुःखिनोऽभावे दुःखोपशमनाय शास्त्रारम्भानर्थक्यमिति चेत् ? | पूर्व०—किंतु यदि परमात्मा दुःखी नहीं है और उससे भिन्न दूसरे दुःखी पदार्थका अभाव है तो ऐसी स्थितिमें [दुःखकी निवृत्तिके लिये] शास्त्रका आरम्भ होना व्यर्थ ही सिद्ध होता है। | | न, अविद्याध्यारोपितदुःखित्वभ्रमापोहार्थत्वात्, आत्मनि प्रकृतसङ्ख्यापूरणभ्रमापोहवत्। कल्पितदुःख्यात्माभ्युपगमाच्च। | सिद्धान्ती - ऐसा मत कहो, क्योंकि आत्मामें प्रकृत (दशम) संख्याकी अपूर्वरूप भ्रमकी निवृत्तिके समान¹ शास्त्र अविद्यासे आरोपित दुःखित्वरूप भ्रमकी निवृत्तिके लिये है। तथा कल्पित दुःखी आत्मा स्वीकार भी किया गया है²। | | जलसूर्यादिप्रतिबिम्बवदात्मप्रवेशश्च प्रतिबिम्बवद्व्याकृते कार्ये उपलब्धयत्वम्। प्रागुत्पत्तेरनुपलब्ध | जलमें पड़े हुए सूर्यादिके प्रतिबिम्बके समान व्याकृत कार्यमें आत्माका प्रतिबिम्बके समान उपलब्ध होना ही उसका कार्यमें प्रवेश है। जगत्‌की उत्पत्तिसे पूर्व जो |


१. यह आख्यायिका इस प्रकार है। एक बार दस आदमी विदेश गये। मार्गमें उन्होंने एक नदी पार की। उस पार पहुँचनेपर यह देखनेके लिये कि हम दस हैं या नहीं, आपसमें गणना करने लगे। परंतु जो गिनता वह अपनेको छोड़कर गिनता। इसलिये दस संख्याकी पूर्ति न होती। इतनेमें ही एक आप्त पुरुष आया, उसने उन्हें अलग-अलग गिनकर बता दिया कि तुम दस ही हो। इससे उनका भ्रमजनित दुःख दूर हो गया।

२. इसलिये भी शास्त्रारम्भ सार्थक है।

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०७

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०७


| आत्मा पश्चात्कार्ये च सृष्टे व्याकृते बुद्धेरन्तरुपलभ्यमानः सूर्यादिप्रतिबिम्बवज्जलादौ कार्यं सृष्ट्वा प्रविष्ट इव लक्ष्यमाणो निर्दिश्यते "स एष इह प्रविष्टः" (बृ० उ० १।४।७) "ताः सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्" "स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत" (ऐ० उ० २।१२) 'सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य" (छा० उ० ६।२।३) इत्येवमादिभिः। <br><br> न तु सर्वगतस्य निरवयवस्य दिग्देशकालान्तरापक्रमणप्राप्तिलक्षणःप्रवेशःकदाचिदप्युपपद्यते । न च परादात्मनोऽन्योऽस्ति द्रष्टा "नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्तश्रोतृ" (बृ० उ० ३।८।११) इत्यादिश्रुतेरित्यवोचाम। उपल- | आत्मा उपलब्ध नहीं होता था वह व्यक्त कार्यकी रचना हो जानेपर बुद्धिके भीतर उपलब्ध होनेसे जलादिमें सूर्यादिके प्रतिबिम्बके समान कार्यको रचकर उसमें प्रविष्ट हुआ-सा लक्षित होता है—ऐसा कहा जाता है;¹ जैसा कि वह यह आत्मा इसमें प्रवेश किये हुए है," "उन (शरीरों) को रचकर वह उनमें प्रवेश कर गया," "वह इस मूर्धसीमाको विदीर्णकर इसके द्वारा प्रवेश कर गया," "उस इस देवताने ईक्षण किया—अहो ! मैं इस जीवात्मारूपसे इन तीनों देवताओंमें प्रवेश कर" इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। <br><br> जो सर्वगत और निरवयव है उस आत्माका एक दिशा, देश या कालको छोड़कर अन्य दिशा, देश या कालको प्राप्त होनारूप प्रवेश कभी सम्भव नहीं है। तथा यह हम पहले ही कह चुके हैं कि "इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है" "इससे भिन्न कोई श्रोता नहीं है" इत्यादि श्रुतिके अनुसार परमात्मासे भिन्न और कोई द्रष्टा नहीं है। |


१ अर्थात् वस्तुतः वह प्रतिबिम्बके समान प्रवेश करता हो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि प्रतिबिम्बके आश्रयसे बिम्बके पार्थक्यके समान आत्माका बुद्धि आदिसे व्यवधान नहीं है।

२०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

२०८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
ब्ध्यर्थत्वाच्च सृष्टिप्रवेशस्थित्यप्य-तथा सृष्टि, प्रवेश, स्थिति और
यवाक्यानाम्, उपलब्धेः पुरुषार्थ-लयका प्रतिपादन करनेवाले वाक्य
त्वश्रवणात्। “आत्मानमेवावेत्”आत्मोपलब्धिके ही लिये हैं, क्योंकि
(बृ० उ० १।४।१०) “तस्मा-आत्मोपलब्धि ही पुरुषार्थ है—ऐसा
त्तत्सर्वमभवत्” (बृ० उ० १।सुना गया है; जैसा कि “उसने
४।१०) “ब्रह्मविदाप्नोतिअपनेहीको जाना,” “अतः वह
परम्” (तै० उ० २।१।१)सर्वरूप हो गया,” “ब्रह्मवेत्ता पर-
“स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेदमात्माको प्राप्त कर लेता है,” “वह
ब्रह्मैव भवति” (मु० उ० ३।जो कि उस परब्रह्मको जानता है
२।९) “आचार्यवान्पुरुषो वेद”ब्रह्म ही हो जाता है,” “आचार्यवान्
(छा० उ० ६।१४।२)पुरुषको ज्ञान होता है”, उसके
“तस्य तावदेव चिरम्” (छा०लिये तभीतक देरी है” इत्यादि
उ० ६।१४।२) इत्यादि-श्रुतियोंसे, तथा “तब मुझे तत्त्वतः
श्रुतिभ्यः। “ततो मां तत्त्वतोजानकर उसके पश्चात् मुझहीमें
ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्” (गीताप्रवेश करता है,” “वही समस्त
१८।५५) “तद्ध्यग्रयं सर्व-विद्याओंमें श्रेष्ठ है, क्योंकि उससे
विद्यानां प्राप्यते ह्यमृतं ततः”अमृतकी प्राप्ति होती है” इत्यादि
इत्यादिस्मृतिभ्यश्च। भेददर्शना-स्मृतियोंसे भी सिद्ध होता है। इसके
पवादाच्च सृष्ट्यादिवाक्यानाम्सिवा भेददर्शनकी निन्दा होनेसे भी
आत्मैकत्वदर्शनार्थपरत्वोपपत्तिः।सृष्ट्यादिविषयक वाक्योंका आत्मै-
तस्मात्कार्यस्थस्य उपलब्धृत्वमेवकत्वदर्शनपरक होना युक्त है। अतः
प्रवेश इत्युपचर्यते।कार्यस्थ आत्माका उपलब्ध होना ही
उसका प्रवेश है—ऐसा उपचारसे
कहा जाता है।
आ नखाग्रेभ्यो नखाग्रमर्यादम्‘आ नखाग्रेभ्यः’ अर्थात् नखाग्र-
आत्मनश्चैतन्यमुपलभ्यते। तत्रपर्यन्त आत्माका चैतन्य उपलब्ध होता

| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २०९ |

ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ२०९

| कथमिव प्रविष्टः ? इत्याह—यथा लोके क्षुरधाने क्षुरो धीयतेऽस्मिन्निति क्षुरधानं तस्मिन्नापितोपस्कराधाने, क्षुरोऽन्तःस्थ उपलभ्यते, अवहितः प्रवेशितः स्याद् यथा वा विश्वम्भरोऽग्निः, विश्वस्य भरणाद्विश्वम्भरः कुलाये नीडेऽग्निः काष्ठादाववहितः स्यादित्यनुवर्तते । तत्र हि स मथ्यमान उपलभ्यते । | है। वह उसमें किसके समान प्रविष्ट है, सो श्रुति बतलाती है—जिस प्रकार लोकमें क्षुरधानमें—जिसमें छुरा रखा जाय उसे क्षुरधान कहते हैं उसमें अर्थात् नापितके मुण्डन-सामग्री (औजार) रखनेके संदूकमें उसके भीतर रखा हुआ छुरा उपलब्ध होता अर्थात् उसमें अवहित (छिपा हुआ)—प्रविष्ट रहता है। अथवा जिस प्रकार विश्वम्भर—अग्नि, जो विश्वका भरण करनेके कारण विश्वम्भर है, कुलाय—नीड यानी काष्ठादिमें छिपा रहता है—इस प्रकार यहाँ 'अवहितः स्यात्' इसकी अनुवृत्ति होती है, वहाँ वह मन्थन करनेपर देखा जाता है। | | यथा च क्षुरः क्षुरधान एकदेशेऽवस्थितो यथा चाग्निः काष्ठादौ सर्वतो व्याप्यावस्थितः, एवं सामान्यतो विशेषतश्च देहं संव्याप्यावस्थित आत्मा । तत्र हि स प्राणनादिक्रियावान् दर्शनादिक्रियावांश्चोपलभ्यते । तस्मात्तत्रैवं प्रविष्टं तमात्मानं प्राणनादिक्रियाविशिष्टं न पश्यन्ति नोपलभन्ते । | तथा जिस प्रकार छुरा क्षुरधानके एक देशमें स्थित रहता है और अग्नि जैसे काष्ठादिमें उसे सब ओरसे व्याप्त करके विद्यमान रहता है इसी प्रकार आत्मा शरीरको सामान्य और विशेषरूपसे व्याप्त करके स्थित है। वहाँ वह प्राणनादि और दर्शनादि क्रियावाला देखा जाता है। अतः उस शरीरमें प्रविष्ट उस प्राणनादिक्रियाविशिष्ट आत्माको लोग नहीं देखते—उन्हें उसकी उपलब्धि नहीं होती। | | नन्वप्राप्तप्रतिषेधोऽयं तं न | शङ्का—किंतु 'उस आत्माको नहीं देखते यह तो अप्राप्तका प्रतिषेध |

बृ० उ० १४—

२१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२१०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| पश्यन्तीति, दर्शनस्याप्रकृतत्वात्। | है, क्योंकि यहाँ दर्शनका कोई प्रसंग नहीं है। | | नैष दोषः, सृष्ट्यादिवाक्यानाम् आत्मैकत्वप्रतिपत्त्यर्थपरत्वात्प्रकृतमेव तस्य दर्शनम्। "रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रति चक्षणाय" (बृ० उ० २। ५। १९) इति मन्त्रवर्णात्। | समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि सृष्ट्यादिपरक वाक्योंका तात्पर्य आत्मैकत्वबोध होनेके कारण उसका दर्शन प्रकृत ही है, जैसा कि "वह प्रत्येक रूपके अनुरूप हो गया है, उसका यह रूप उसके दर्शनके लिये है" इस मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है। | | तत्र प्राणनादिक्रियाविशिष्टस्यादर्शन हेतुमाह—<br>क्रियाविशिष्टस्यात्मनोऽसमस्तत्वप्रदर्शनम् | अकृत्स्नोऽसमस्तो हि यस्मात्स प्राणनादिक्रियाविशिष्टः। कुतः पुनरकृत्स्नत्वम्? इत्युच्यते—प्राणन्नेव प्राणनक्रियामेव कुर्वन्प्राणो नाम प्राणसमाख्यः प्राणाभिधानो भवति। प्राणनक्रियाकर्तृत्वाद्वि प्राणः प्राणीतीत्युच्यते नान्यां क्रियां कुर्वन्। यथा लावकः पाचक इति। तस्मात्क्रियान्तरविशिष्टस्य अनुपसंहारादकृत्स्नो हि सः। | अब श्रुति प्राणनादिक्रियाविशिष्ट आत्माके दिखायी न देनेमें हेतु बतलाती है-क्योंकि वह प्राणनादिक्रियाविशिष्ट आत्मा अकृत्स्न—असम्पूर्ण है। उसकी असम्पूर्णता क्यों है? सो बतलाया जाता है—प्राणन अर्थात् प्राणनक्रिया करनेसे ही वह प्राण यानी प्राणनामवाला होता है। [तात्पर्य यह है कि] प्राण क्रियाका कर्ता होनेसे ही 'प्राण प्राणन कर्ता है' ऐसा कहा जाता है, किसी अन्य क्रियाके करनेसे नहीं जैसे लावक, पाचक इत्यादि। अतः उसमें क्रियान्तरविशिष्टका उपसंहार (संग्रह) न होनेके कारण वह असम्पूर्ण ही है। इसी प्रकार 'वक्तीति वाक्' इस व्युत्पत्तिसे बोलने यानी वदनक्रिया करनेके कारण वह | | तथा वदन्वदनक्रियां कुर्वन्व- | |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २११

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २११


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
क्तीति वाक्, पश्यंश्चक्षुश्चष्ट इति-चक्षुर्द्रष्टा, शृण्वञ्शृणोतीति श्रोत्रम्।वाक् है, ‘चष्टे इति चक्षुः’ इस व्युत्पत्तिसे देखनेवाले यानी द्रष्टाका नाम चक्षु है और ‘शृणोतीति श्रोत्रम्’ इस व्युत्पत्तिसे जो सुनता है वह श्रोत्र है।
‘प्राणन्नेव प्राणः’ ‘वदन्वाक्’ इत्याभ्यां क्रियाशक्त्युद्भवः प्रदर्शितो भवति। ‘पश्यंश्चक्षुः’ ‘शृण्वञ्श्रोत्रम्’ इत्याभ्यां विज्ञानशक्त्युद्भवः प्रदर्श्यते, नामरूपविषयत्वाद्धिज्ञानशक्तेः। श्रोत्रचक्षुषी विज्ञानस्य साधने, विज्ञानं तु नामरूपसाधनम्। न हि नामरूपव्यतिरिक्तं विज्ञेयमस्ति। तयोश्चोपलम्भे करणं चक्षुःश्रोत्रे।‘प्राणन्नेव प्राणः’, ‘वदन्वाक्’ इन दोनों वाक्योंसे आत्मामें क्रियाशक्तिका उद्भव दिखाया गया है तथा ‘पश्यंश्चक्षुः’, ‘शृण्वञ्श्रोत्रम्’ इन दोनों वाक्योंसे विज्ञानशक्तिका प्राकट्य प्रदर्शित किया गया है, क्योंकि विज्ञानशक्ति नाम और रूपको विषय करनेवाली होती है। श्रोत्र और नेत्र विज्ञानके साधन हैं तथा विज्ञान नाम-रूपका साधन है; क्योंकि नाम-रूपके सिवा और कोई विज्ञेय नहीं है तथा उनकी उपलब्धिमें नेत्र और श्रोत्र करण हैं।
क्रिया च नामरूपसाध्या प्राणसमवायिनी, तस्याः प्राणाश्रयाया अभिव्यक्तौ वाक्करणम्। तथा पाणिपादपायूपस्थाख्यानि। सर्वेषामुपलक्षणार्था वाक्। एतदेव हि सर्वं व्याकृतम्। “त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म” (बृ० उ० १।६।१) इति हि वक्ष्यति।नाम और रूपसे साध्य जो क्रिया है वह प्राणके आश्रित है और उस प्राणाश्रिता क्रियाकी अभिव्यक्तिमें वाक् साधन है। इसी प्रकार पाणि, पाद, पायु और उपस्थ नामकी कर्मेन्द्रियाँ भी हैं। वाक् इन सबके उपलक्षणके लिये है। यही सब व्याकृत जगत् है। आगे “यह सारा नामरूप कर्म त्रयरूप ही है” इस श्रुतिसे यही बात कही जायगी।

२१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १

२१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १


संस्कृतहिन्दी
मन्वानो मनो मनुत इति ।<br><br>ज्ञानशक्तिविकासानां साधारणं करणं मनो मनुतेऽनेनेति । पुरुषस्तु कर्ता सन्मन्वानो मन इत्युच्यते ।<br><br>(विशिष्टात्मवेदिनोऽकृत्स्नत्वनिरूपणम्)<br>तान्येतानि प्राणादीन्यस्यात्मनः कर्मनामानि, कर्मजानि नामानि कर्मनामान्येव, न तु वस्तुमात्रविषयाणि । अतो न कृत्स्नात्मवस्तुवद्योतकानि। एवं ह्यसावात्मा प्राणनादिक्रियया तत्तत्क्रियाजनितप्राणादिनामरूपाभ्यां व्याक्रियमाणोऽवद्योत्यमानोऽपि । स योऽतोऽस्मात्प्राणनादिक्रियासमुदायाद् एकैकं प्राणं चक्षुरिति वा विशिष्टम् अनुपसंहृतेतरविशिष्टक्रियात्मकं मनसा अयमात्मेत्युपास्ते चिन्तयति, न स वेद न स जानाति ब्रह्म । कस्मात् ? अकृत्स्नोऽसमस्तो हि यस्मादेष आत्मा अस्मात्प्राणनादिसमुदायात् । अतः प्रविभक्त एकैकेन'मनुते इति मनः' इस व्युत्पत्तिसे मनन करनेपर उसका नाम मन हुआ। मन ज्ञानशक्तिके विकासोंका साधारण साधन है, क्योंकि इससे आत्मा मनन करता है । पुरुष ही कर्ता होनेपर जब मनन करता है तो 'मन' इस नामसे कहा जाता है।<br><br>वे ये प्राणादि इस आत्माके कर्मनाम अर्थात् कर्मजनित नाम ही हैं, ये वस्तुमात्रको विषय करनेवाले नहीं हैं। अतः ये सम्पूर्ण आत्मवस्तुके द्योतक नहीं हैं। इस प्रकार यह आत्मा प्राणनादि क्रियासे उस-उस क्रियाके कारण होनेवाले प्राणादि नाम और रूपोंसे व्यक्त होने अर्थात् प्रकाशित होनेपर भी [ पूर्णतया प्रकाशित नहीं होता ] । वह जो इस प्राणनादिक्रियासमुदायमेंसे किसी क्रियासे विशिष्ट प्राण या चक्षुकी, अन्य विशिष्टक्रियामय आत्माका उपसंहार न करके, मनके द्वारा 'यह आत्मा है' इस प्रकार उपासना यानी चिन्तन करता है वह नहीं जानता — उसे ब्रह्मका ज्ञान नहीं है। क्यों नहीं है ? क्योंकि इस प्राणनादिसमुदायसे विशिष्ट यह आत्मा अकृत्स्न-असम्पूर्ण है। इसलिये वह अन्य धर्मोंका उपसंहार न करनेके कारण प्रविभक्त

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१३

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
विशेषणेन विशिष्ट इतरधर्मान्तरानुपसंहाराद्भवति । यावदयमेवं वेद पश्यामि शृणोमि स्पृशामीति वा स्वभावप्रवृत्तिविशिष्टं वेद तावदञ्जसा कृत्स्नमात्मानं न वेद।यानी एक-एक विशेषणसे विशिष्ट होता है। अतः जबतक यह 'मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, मैं स्पर्श करता हूँ' इस प्रकार आत्माको स्वाभाविक प्रवृत्तियोंसे विशिष्ट जानता है तबतक यह साक्षात् रूपसे सम्पूर्ण आत्माको नहीं जानता।
कथं पुनः पश्यन्वेद ? इत्याह—तो फिर किस प्रकार देखनेपर वह उसे जानता है ? इसपर श्रुति कहती है—
(निरुपाधिकात्मोपासनमेव कृत्स्नत्वम्)<br>आत्मेत्येव, आत्मनि प्राणादीनि विशेषणानि यान्युक्तानि तानि यस्य स आप्नुवंस्तान्यात्मा इत्युच्यते । स तथा कृत्स्नविशेषोपसंहारी सन्कृत्स्नो भवति । वस्तुमात्ररूपेण हि प्राणाद्युपाधिविशेषक्रियाजनितानि विशेषणानि व्याप्नोति । तथा च वक्ष्यति— “ध्यायतीव लेलायतीव” (बृ० उ० ४ । ३ । ७) इति । तस्मादात्मेत्येवोपासीत ।'आत्मा है' इस प्रकार ही । आत्मा—ऊपर जिन प्राणादि विशेषणोंका वर्णन किया गया है, वे जिसके हैं, उन्हें व्याप्त करनेके कारण वह आत्मा कहा जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण विशेषणोंका अपनेमें उपसंहार करनेवाला होनेसे वह सम्पूर्ण है। वह अपने वस्तुमात्ररूपसे प्राणादि विशेष उपाधियोंकी क्रियासे होनेवाले विशेषणोंमें व्याप्त है। ऐसा ही “मानो ध्यान करता है, मानो चेष्टा करता है” इस वाक्यसे श्रुति कहेगी भी। अतः 'वह आत्मा है' इस प्रकार ही उसकी उपासना करनी चाहिये।
एवं कृत्स्नो ह्यसौ स्वेन वस्तुरूपेण गृह्यमाणो भवति । कस्मात्कृत्स्नः ? इत्याशङ्क्याह—अत्रा-इस प्रकार अपने वास्तविक स्वरूपसे ग्रहण किया जानेपर यह सम्पूर्ण है। क्यों सम्पूर्ण है ?—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है—

२१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १


| [आत्मोपासनस्याविधेयत्वम्]<br>स्मिन्नात्मनि हि यस्मान्निरुपाधिकजलसूर्यप्रतिबिम्बभेदा इवादित्ये प्राणाद्युपाधिकृता विशेषाः प्राणादिकर्मजनामाभिधेया यथोक्ता ह्येते एकमभिन्नतां भवन्ति प्रतिपद्यन्ते ।<br><br>‘आत्मत्येवोपासीत’ इति नापूर्वविधिः । पक्षे प्राप्तत्वात् “यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म” (बृ० उ० ३ । ४ । १) “कतम आत्मेति—योऽयं विज्ञानमयः” (बृ० उ० ४ । ३ । ७) इत्येवमाद्यात्मप्रतिपादनपराभिः श्रुतिभिरात्मविषयं विज्ञानमुत्पादितम् । तत्रात्मस्वरूपविज्ञानेनैव तद्विषयानात्माभिमानबुद्धिः कारकादिक्रियाफलाध्यारोपणात्मिका अविद्या निवर्तिता । तस्यां निवर्तितायां कामादिदोषानुपपत्तेः | क्योंकि इस निरुपाधिक आत्मामें, जिस प्रकार जलमें पड़े हुए सूर्य-प्रतिबिम्बके भेद सूर्यमें एक हो जाते हैं उसी प्रकार, ऊपर बतलाये हुए प्राणादि कर्मजन्य नामोंसे कहे जानेवाले प्राणादि उपाधियोंके कारण होनेवाले सम्पूर्ण विशेष एक होते अर्थात् अभिन्नताको प्राप्त हो जाते हैं।<br><br>‘आत्मत्येवोपासीत’ यह अपूर्वविधि नहीं है, क्योंकि यह एक पक्षमें स्वतः प्राप्त है।¹ “जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है” “आत्मा कौन-सा है, इसपर कहते हैं—यह जो विज्ञानमय है” इस प्रकारकी आत्माका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंसे आत्मविषयक ज्ञान उत्पन्न होता है। वहाँ आत्मस्वरूपके ज्ञानसे ही उसमें होनेवाली अनात्माभिमानबुद्धि अर्थात् कारकादि क्रिया एवं फलकी अध्यारोपरूपा अविद्या निवृत्त की जाती है। उसके निवृत्त हो जानेपर कामादि दोषोंकी सम्भावना |


१. जो अर्थ अत्यन्त अप्राप्त होता है उसके लिये जो विधि की जाती है उसे अपूर्वविधि कहते हैं। जैसे 'जिसे स्वर्गकी इच्छा हो वह अग्निहोत्र करे' यहाँ अग्निहोत्र अत्यन्त अप्राप्त था, अतः उसके लिये जो विधि की गयी है वह अपूर्वविधि है। आत्मा विधिका विषय नहीं है—यह बात आगेके विचारसे स्पष्ट हो जायगी।

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१५

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१५

अनात्मचिन्तानुपपत्तिः। पारिशेष्यादात्मचिन्तैव। तस्मात्तदुपासनमस्मिन्पक्षे न विधातव्यम्, प्राप्तत्वात्।न रहनेसे अनात्मचिन्तनकी सम्भावना नहीं रहती। फलतः आत्मचिन्तन ही रह जाता है। अतः इस पक्षमें आत्मोपासनाका विधान करनेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह स्वतः प्राप्त है।
उक्तार्थमीमांसा<br>तिष्ठतु तावत्पाक्षिक्यात्मोपासनप्राप्तिर्नित्या वेति, अपूर्वविधिः स्यात्; ज्ञानोपासनयोरेकत्वे सत्यप्राप्तत्वात्। 'न स वेद' इति विज्ञानं प्रस्तुत्य 'आत्मेत्येवोपासीत' इत्यभिधानाद्वेदोपासनशब्दयोरेकार्थतावगम्यते। "अनेन ह्येतत्सर्वं वेद" "आत्मानमेवावेत्" (बृ० उ० १।४।१०) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च विज्ञानमुपासनम्। तस्य चाप्राप्तत्वाद्विध्येयत्वम्।शङ्का—आत्मोपासनकी प्राप्ति पाक्षिक है अथवा नित्य है—इस विचारको अभी रहने दो, यह तो अपूर्वविधि ही है, क्योंकि यहाँ ज्ञान और उपासनाका एक ही अर्थ होनेके कारण वह स्वतः प्राप्त नहीं है। 'न स वेद' (वह नहीं जानता) इस वाक्यसे विज्ञानका आरम्भ कर 'आत्मेत्येवोपासीत' इस प्रकार कहनेके कारण यहाँ 'वेद' और 'उपासन' इन शब्दोंकी एकार्थता ज्ञात होती है। "इससे इस सबको जान लेता है" "आत्माको ही जाना" इत्यादि श्रुतियोंसे भी विज्ञान उपासनाहीका नाम है। और वह (उपासना) अप्राप्त होनेके कारण विधिकी योग्यता रखती है।¹
न च स्वरूपान्वाख्याने पुरुषप्रवृत्तिरुपपद्यते, तस्मादपूर्व-इसके सिवा स्वरूपके अनुवादमें पुरुषकी प्रवृत्ति होनी भी सम्भव नहीं

१. क्योंकि उपासना मानस कर्म है, वह स्वतः प्राप्त नहीं होता; इसलिये उसके लिये विधिकी आवश्यकता है।

२१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२१६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| विधिरेवायम् । कर्मविधिसामान्याच्च । यथा 'यजेत' 'जुहुयात्' इत्यादयः कर्मविधयः, न तैरस्य "आत्मेत्येवोपासीत" (१।४।७) "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" (२ । ४ । ५) इत्याद्यात्मोपासनविधेर्विशेषोऽवगम्यते । मानसक्रियात्वाच्च विज्ञानस्य; तथा 'यस्यै देवतायै हविर्गृहीतं स्यात्तां मनसा ध्यायेद्वषट्करिष्यन्' इत्याद्या मानसी क्रिया विधीयते, तथा "आत्मेत्येवोपासीत" (१ । ४ । ७) "मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" (२ । ४ । ५) इत्याद्या क्रियैव विधीयते ज्ञानात्मिका । तथावोचाम वेदोपासनशब्दयोरेकार्थत्वमिति ।<br><br>भावनांशत्रयोपपत्तेश्च—यथा | है; इसलिये यह अपूर्वविधि ही है। तथा कर्मविधिसे इसकी समानता होनेके कारण भी [ यही बात सिद्ध होती है ] । जिस प्रकार 'यजन करे' 'हवन करे' इत्यादि कर्मविधियाँ हैं, उनसे "आत्मा है—इस प्रकार उपासना करे" "अयि मैत्रेयि ! यह आत्मा द्रष्टव्य है" इत्यादि आत्मोपासनसम्बन्धी विधियोंका कोई अन्तर नहीं जान पड़ता । तथा विज्ञान भी मानसक्रिया ही है [ इसलिये भी यह विधि है ] । जिस प्रकार 'जिस देवताके लिये हवि ग्रहण किया जाय उसका 'वषट्कार' करते हुए मनसे ध्यान करे' इत्यादिरूपसे मानसी क्रियाका विधान किया जाता है उसी प्रकार "आत्मा है—इस प्रकार उपासना करे", "आत्माका मनन करना चाहिये, निदिध्यासन करना चाहिये" इत्यादि रूपसे ज्ञानात्मिका क्रियाका ही विधान किया जाता है । तथा 'वेद' और 'उपासन' शब्दोंका एक ही अर्थ है—यह हम कह ही चुके हैं ।<br><br>इसके सिवा इस वाक्यमें भावनाके [ फल, करण और इतिकर्तव्यता-रूप ] तीनों अंश सम्भव होनेके |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१७

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१७


[शाङ्करभाष्यम्][भाष्यार्थ]
हि यजेत इत्यस्यां भावनायाम्-किं केन कथम् इति भाव्याद्याकाङ्क्षापनयकारणमंशत्रयमवगम्यते, तथा उपासीत इत्यस्यामपि भावनायां विधीयमानायाम् किमुपासीत ? केनोपासीत? कथमुपासीत? इत्यस्यामाकाङ्क्षायाम् आत्मानमुपासीत मनसा त्यागब्रह्मचर्यशमदमोपरमतितिक्षादीतिकर्तव्यतासंयुक्तः इत्यादि शास्त्रेणैव समर्थ्यतेऽशत्रयम् । यथा च कृत्स्नस्य दर्शपूर्णमासादिप्रकरणस्य दर्शपूर्णमासादिविध्युद्देशत्वेनोपयोगः, एवमौपनिषदाम् आत्मोपासनप्रकरणस्य आत्मोपासनविध्युद्देशत्वेनैवोपयोगः। "नेति नेति" ( २ । ३ । ६ ) "अस्थूलम्" (३।८।८) "एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६ । २ । १) 'अशना-कारण भी यह विधिवाक्य है। जिस प्रकार 'यजेत' ( यजन करे ) इस भावनामें 'किस उद्देश्यसे किस साधनसे और किस प्रकार [ यजन करे ]' ऐसी भाव्यादिसम्बन्धिनी आकाङ्क्षाओंकी निवृत्तिके कारणभूत तीन अंश देखे जाते हैं, उसी प्रकार 'उपासीत' इस विधान की जानेवाली भावनामें भी 'किसकी उपासना करे?' 'किसके द्वारा उपासना करे?' और 'किस प्रकार उपासना करे?' ऐसी आकाङ्क्षा होनेपर 'आत्माकी उपासना करे', 'मनसे करे' तथा 'त्याग, ब्रह्मचर्य, शम, दम, उपरति तथा तितिक्षादिरूप इतिकर्तव्यतासे युक्त होकर करे' इत्यादि शास्त्रसे ही तीन अंशोंका समर्थन होता है। तथा जिस प्रकार दर्शपूर्णमासादिसम्बन्धी शास्त्रके सम्पूर्ण प्रकरणका दर्शपूर्णमासकी विधिके उद्देशरूपसे ही उपयोग है उसी प्रकार उपनिषदोंके आत्मोपासनसम्बन्धी प्रकरणका भी आत्मोपासनकी विधिके उद्देशरूपसे ही उपयोग है । "नेति नेति" "अस्थूलम्" "एकमेवाद्वितीयम्"

१. 'शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्येत्' इत्यादि शास्त्र आत्मज्ञानके साधनका निरूपण करता है।

२१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२१८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| याद्यतीतः” इत्येवमादिवाक्यानाम् उपास्यआत्मस्वरूपविशेषसमर्पणेनोपयोगः। फलं च मोक्षोऽविद्यानिवृत्तिर्वा। | “अशनायाद्यतीतः” इत्यादि शास्त्रवाक्योंका उपयोग उपास्य आत्माके विशेष रूपको समर्पण करनेमें है तथा उसका फल मोक्ष या अविद्याकी निवृत्ति है। | | अपरे वर्णयन्ति उपासनेनात्मविषयं विशिष्टं विज्ञानान्तरं भावयेत्, तेनात्मा ज्ञायते, अविद्यानिवर्तकं च तदेव, नात्मविषयं वेदवाक्यजनितं विज्ञानमिति। एतस्मिन्नर्थे वचनान्यपि—“विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत” (बृ० उ० ४।४।२१) “द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः” (२।४।५) “सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः” (छा० उ० ४।७।१) इत्यादीनि। | कुछ अन्य लोगोंका कथन है कि उपासनाके द्वारा आत्मविषयक अन्य विशिष्ट विज्ञानकी भावना करनी चाहिये, उससे आत्माका ज्ञान होता है और वही अविद्याकी निवृत्ति करनेवाला है। आत्मविषयक वेदवाक्यजनित विज्ञान उसकी निवृत्ति करनेवाला नहीं है। इस विषयमें ये वचन भी हैं—“उसे जानकर तद्विषयक बुद्धि करे” आत्माका साक्षात्कार करे तथा उसका श्रवण, मनन और निदिध्यासन करे”, “उसका अन्वेषण करना चाहिये तथा उसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये” इत्यादि। | | न, अर्थान्तराभावात्। न च ‘आत्मेत्येवोपासीत’ इत्यपूर्वविधिः; कस्मात्? आत्मस्वरूपकथनानात्मप्रतिषेधवाक्यजनितविज्ञानव्यतिरेकेण अर्थान्तरस्य कर्तव्यस्य मानसस्य बाह्यस्य | समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इस वाक्यका कोई अर्थान्तर नहीं हो सकता। ‘आत्मेत्येवोपासीत’ यह अपूर्वविधि नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि आत्मस्वरूपके कथन और अनात्मप्रतिषेधवाक्यजनित विज्ञानसे भिन्न इसका मानसिक या बाह्य कर्तव्यसम्बन्धी कोई दूसरा अर्थ |

| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २१९ |

ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ२१९
संस्कृतहिन्दी
वाभावात्। तत्र हि विधेः साफल्यं यत्र विधिवाक्यश्रवणमात्रजनितविज्ञानव्यतिरेकेण पुरुषप्रवृत्तिर्गम्यते। यथा "दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत" इत्येवमादौ। न हि दर्शपूर्णमासविधिवाक्यजनितविज्ञानमेव दर्शपूर्णमासानुष्ठानम्; तच्चाधिकाराद्यपेक्षानुभावि।नहीं हो सकता। विधिकी सफलता वहीं होती है जहाँ विधिवाक्यके श्रवणमात्रसे होनेवाले विज्ञानके सिवा कोई अन्य पुरुषप्रवृत्ति भी जानी जाय। जैसे "स्वर्गकी कामनावाला दर्श-पूर्णमास यज्ञोंद्वारा यजन करे" इत्यादि वाक्योंमें। यहाँ दर्श-पूर्णमाससम्बन्धी विधिवाक्यसे होनेवाला विज्ञान ही दर्श-पूर्णमास यज्ञोंका अनुष्ठान नहीं है; वह तो अधिकारी आदिकी अपेक्षासे पीछे होनेवाला है।
न तु "नेति नेति" (२। ३। ६) इत्याद्यात्मप्रतिपादकवाक्यजनितविज्ञानव्यतिरेकेण दर्शपूर्णमासादिवत्पुरुषव्यापारः सम्भवति। सर्वव्यापारोपशमहेतुत्वात् तद्वाक्यजनितविज्ञानस्य।किन्तु "नेति नेति" इत्यादि आत्मप्रतिपादक वाक्योंसे होनेवाले विज्ञानके सिवा उससे, दर्श-पूर्णमासादिके समान, कोई और पुरुषव्यापार होना सम्भव नहीं है, क्योंकि इन वाक्योंसे होनेवाला विज्ञान तो सब प्रकारके व्यापारकी निवृत्तिका हेतु है। अतः उदासीन विज्ञान प्रवृत्तिका जनक नहीं हो सकता। इसके सिवा "एकमेवाद्वितीयम्" "तत्त्वमसि" इत्यादि वाक्य अब्रह्म और अनात्मविषयक विज्ञानकी निवृत्ति करनेवाले भी हैं और उसकी निवृत्ति होनेपर प्रवृत्तिका होना सम्भव नहीं है, क्योंकि अनात्मविज्ञानकी निवृत्ति और पुरुषप्रवृत्तिमें विरोध है।
न ह्युदासीनविज्ञानं प्रवृत्तिजनकम्, अब्रह्मानात्मविज्ञाननिवर्तकत्वाच्च "एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।१) "तत्त्वमसि" (छा० उ० ६।८—१६) इत्येवमादिवाक्यानाम्। न च तन्निवृत्तौ प्रवृत्तिरुपपद्यते; विरोधात्।
वाक्यजनितविज्ञानमात्रान्नाब्र-पूर्व०-किन्तु वाक्यजनित विज्ञान-

२२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२२०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| ज्ञानात्मविज्ञाननिवृत्तिरिति चेत् ? | मात्रसे ही अब्रह्म एवं अनात्मविज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती। | | न; "तत्त्वमसि" ( छा०उ० ६।८—१६) "नेति नेति" (बृ०उ०२।३।६) "आत्मैवेदम्" ( छा० उ० ७।२५।२) "एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।१) ब्रह्मैवेदममृतम्" (मु० उ० २।२।११) "नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ" (बृ० उ० ३।८।११) "तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि" (के०उ० १।४) इत्यादिवाक्यानां तद्वादित्वात्। | सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो, क्योंकि "तू वह है", "यह (कार्य) आत्मा नहीं है, यह (कारण) आत्मा नहीं है", "यह सब आत्मा ही है", "एक ही अद्वितीय है" "यह अमृत ब्रह्म ही है", "इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है", "उसीको तू ब्रह्म जान" इत्यादि वाक्य उस (अनात्मप्रतिषेध) का ही प्रतिपादन करनेवाले हैं। | | द्रष्टव्यविधेर्विषयसमर्पकाण्येतानीति चेत् ? | पूर्व०—ये तो ^१द्रष्टव्यविधिके विषयको समर्पण करनेवाले हैं। | | न, अर्थान्तराभावादित्युक्तोत्तरत्वात्। आत्मवस्तुस्वरूपसमर्पकैरेव वाक्यैः "तत्त्वमसि" इत्यादिभिः श्रवणकाल एव तद्दर्शनस्य कृतत्वाद् द्रष्टव्यविधेर्नानुष्ठानान्तरं कर्तव्यमित्युक्तोत्तरमेतत्। | सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो; क्योंकि 'इनका अर्थान्तर नहीं हो सकता' ऐसा कहकर हम इसका उत्तर पहले ही दे चुके हैं। आत्मवस्तुके स्वरूपको समर्पण करनेवाले "तत्त्वमसि" इत्यादि वाक्योंसे ही उनके श्रवणकालमें ही आत्मदर्शन हो जानेके कारण द्रष्टव्यविधिसे कोई अन्य अनुष्ठान कर्त्तव्य नहीं है—इस प्रकार इसका उत्तर पहले ही दिया जा चुका है। |


१. 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' इस वाक्यसे होनेवाली विधि।

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २२१

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २२१


संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
आत्मस्वरूपान्वाख्यानमात्रेण आत्मविज्ञाने विधिमन्तरेण न प्रवर्त्तत इति चेत् ?पूर्व०—किंतु बिना विधिके केवल आत्मस्वरूपके अनुवादमात्रसे ही पुरुष आत्मविज्ञानमें प्रवृत्त नहीं हो सकता।
न, आत्मवादिवाक्यश्रवणेन आत्मविज्ञानस्य जनितत्वात्--किं भो कृतस्य करणम् ? तच्छ्रवणेऽपि न प्रवर्त्तत इति चेन्न, अनवस्थाप्रसङ्गात् । यथा आत्मवादिवाक्यार्थश्रवणे विधिमन्तरेण न प्रवर्त्तते तथा विधिवाक्यार्थश्रवणेऽपि विधिमन्तरेण न प्रवर्त्तिष्यत इति विध्यन्तरापेक्षा । तथा तदर्थश्रवणेऽपीत्यनवस्था प्रसज्येत ।सिद्धान्ती—ऐसा नहीं है क्योंकि आत्मविज्ञान तो आत्मवादी वाक्यके श्रवणमात्रसे ही उत्पन्न हो जाता है। फिर किये हुएको करनेका अर्थ ही क्या है ? यदि कहो कि [ विधिके बिना ] पुरुष उसे सुननेमें भी प्रवृत्त नहीं होता तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि इससे अनवस्थादोषका प्रसंग उपस्थित होता है। जिस प्रकार [ तुम्हारे मतानुसार ] पुरुष विधिके बिना आत्मवादी वाक्यके अर्थको श्रवण करनेमें प्रवृत्त नहीं होता, इसी प्रकार वह विधिके बिना विधिवाक्यार्थको श्रवण करनेमें भी प्रवृत्त नहीं होगा, इसलिये एक दूसरी विधिकी आवश्यकता होगी। इसी प्रकार उस विध्यन्तरका अर्थ श्रवण करनेमें भी अन्य विधिके बिना प्रवृत्त नहीं होगा—इस तरह अनवस्थाका प्रसंग उपस्थित हो जायगा।
वाक्यजनितात्मज्ञानस्मृतिसंततेः श्रवणविज्ञानमात्रादर्थान्तरत्वमिति चेत् ?पूर्व०—तो भी श्रवणविज्ञानमात्रसे वाक्यजनित आत्मज्ञानकी स्मृतिका प्रवाह तो दूसरी ही चीज है ?

२२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२२२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
न, अर्थप्राप्तत्वात्। यदैवात्मप्रतिपादकवाक्यश्रवणाद् आत्मविषयं विज्ञानमुत्पद्यते, तदैव तदुत्पद्यमानं तद्विषयं मिथ्याज्ञानं निवर्तयदेवोत्पद्यते। आत्मविषयमिथ्याज्ञाननिवृत्तौ च तत्प्रभवाः स्मृतयो न भवन्ति स्वाभाविक्योऽनात्मवस्तुभेदविषयाः।सिद्धान्ती—नहीं, वह तो अर्थतः प्राप्त है। जिस समय भी आत्मप्रतिपादक वाक्यके श्रवणसे आत्मविषयक ज्ञान उत्पन्न होता है उसी समय वह उत्पन्न होनेवाला ज्ञान आत्मविषयक मिथ्या ज्ञानकी निवृत्ति करता हुआ ही उत्पन्न होता है; तथा आत्मविषयक मिथ्या ज्ञानकी निवृत्ति हो जानेपर तज्जनित अनात्मवस्तुभेदविषयक स्वाभाविकी स्मृतियाँ भी नहीं होतीं।
अनर्थत्वावगतेश्च, आत्मावगतौ हि सत्यामन्यद्वस्त्वनर्थत्वेनावगम्यते, अनित्यदुःखाशुद्ध्यादिबहुदोषवत्त्वाद् आत्मवस्तुनश्च तद्विलक्षणत्वात्। तस्मादनात्मविज्ञानस्मृतीनाम् आत्मावगतेरभावप्राप्तिः। पारिशेष्यादात्मैकत्वविज्ञानस्मृतिसन्ततेरर्थत एव भावान्न विधेयत्वम्, शोकमोहभयायासादिदुःखदोषनिवर्तकत्वाच्च तत्स्मृतेः। विपरीतज्ञानप्रभवो हि शोकमोहादिदोषः। तथा चइसके सिवा अनात्मवस्तुविषयक स्मृतियाँ अनर्थकारिणी हैं—ऐसा बोध हो जानेसे भी उनकी आवृत्ति नहीं होती। आत्मज्ञान हो जानेपर अन्य वस्तुएँ अनर्थरूपसे ज्ञात होती हैं, क्योंकि वे अनित्यता, दुःख एवं अशुद्धि आदि अनेकों दोषोंसे युक्त हैं और आत्मवस्तु उनसे भिन्न स्वभावकी है। अतः आत्मज्ञान होनेपर अनात्मविज्ञानजनित स्मृतियोंका अभाव प्राप्त होता है। अन्ततोगत्वा आत्मैकत्वविज्ञानसम्बन्धी स्मृतिका प्रवाह अर्थतः प्राप्त होनेके कारण विधिका विषय नहीं है, क्योंकि आत्मस्मृति तो शोक, मोह, भय, श्रम आदि बहुत-से दुःख और दोषोंकी निवृत्ति करनेवाली है। शोकमोहादि दोष तो विपरीत ज्ञानसे ही होनेवाला है। इस विषयमें "उस

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे २२३

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे २२३


संस्कृत मूलहिन्दी भाषार्थ
“तत्र को मोहः” (ईशा० ७) “विद्वान्न बिभेति कुतश्चन” (तै० उ० २।९।१) “अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि” (बृ० उ० ४।२।४) “भिद्यते हृदयग्रन्थिः” (मु० उ० २।२।८) इत्यादिश्रुतयः ।अवस्थामें क्या मोह है”, “आत्मज्ञानी किसीसे भी भय नहीं मानता”, “हे जनक ! तू निश्चय अभयको प्राप्त हो गया है”, “हृदयकी ग्रन्थि टूट जाती है” इत्यादि श्रुतियाँ प्रमाण हैं।
निरोधस्त्वर्थान्तरमिति चेत् ।<br><br>अथापि स्याच्चित्तवृत्तिनिरोधस्य वेदवाक्यजनितात्मविज्ञानादर्थान्तरत्वात्, तन्त्रान्तरेषु च कर्तव्यतयावगतत्वाद्बिधेयत्वमिति चेत् ?**पूर्व०—**तथापि ज्ञानसे भिन्न निरोध भी तो एक मोक्षका साधन है। तात्पर्य यह है कि वेदवाक्यजनित आत्मविज्ञानसे अर्थान्तर होने और शास्त्रान्तरमें [मोक्षप्राप्तिके लिये] कर्तव्यरूपसे ज्ञात होनेके कारण चित्तवृत्तिनिरोधकी विधेयता तो है ही।
न; मोक्षसाधनत्वेनानवगमात्। न हि वेदान्तेषु ब्रह्मात्मविज्ञानाद् अन्यत्परमपुरुषार्थसाधनत्वेनावगम्यते । “आत्मानमेवावेत्” (बृ० उ० १।४।१०) “तस्मात्तत्सर्वमभवत्” (१।४।१०) “ब्रह्मविदाप्नोति परम्” (तै० उ० २।१।१) “स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति” (मु० उ० ३।२।९) “आचार्यवान्पुरुषो वेद” (छा० उ० ६।१४।२) “तस्य ताव-**सिद्धान्ती—**ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वह मोक्षके साधनरूपसे नहीं जाना जाता। वेदान्तशास्त्रोंमें ब्रह्मात्मविज्ञानके सिवा अन्य कुछ भी परमपुरुषार्थकी प्राप्तिके साधनरूपसे नहीं जाना जाता; जैसा कि “आत्माको ही जाना”, “अतः वह सर्वरूप हो गया”, “ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त कर लेता है”, “जो भी उस परब्रह्मको जानता है ब्रह्म ही हो जाता है,” “आचार्यवान् पुरुषको ज्ञान होता है,”