बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ४९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| द्युपलब्धारः कर्तारश्च धर्माधर्मयोः प्रतिशरीरं भिन्ना अनुमीयन्ते संसारिणः; तत्र ब्रह्मैकत्वं ब्रुवतामनुमानविरोधश्च । तथा च आगमविरोधं वदन्ति—"ग्रामकामो यजेत" "पशुकामो यजेत" "स्वर्गकामो यजेत" इत्येवमादिवाक्येभ्यो ग्रामपशुस्वर्गादिकामास्तत्साधनाद्यनुष्ठातारश्च भिन्ना अवगम्यन्ते । <br><br> (उक्ताक्षेप-निरासः) <br> अत्रोच्यते—ते तु कुतर्कदूषितान्तःकरणा ब्राह्मणादिवर्णापसदा अनुकम्पनीया आगमार्थविच्छिन्नसम्प्रदायबुद्धय इति । कथम् ? श्रोत्रादिद्वारैः शब्दादिभिः प्रत्यक्षत उपलभ्यमानैर्ब्रह्मण एकत्वं विरुध्यत इति वदन्तो वक्तव्याः—किं शब्दादीनां भेदेनाकाशैकत्वं विरुध्यत | से शब्दादिको उपलब्ध करनेवाले तथा धर्माधर्मका अनुष्ठान करनेवाले संसारी जीव भी प्रत्येक शरीरमें भिन्न-भिन्न हैं—ऐसा अनुमान होता है। ऐसी स्थितिमें ब्रह्मकी एकता बतलानेवाले वाक्योंका अनुमान प्रमाणसे भी विरोध है। इसी तरह वे उनका शास्त्रप्रमाणसे भी विरोध बतलाते हैं, [ क्योंकि ] "ग्रामकी कामनावाला यज्ञ करे", "पशुकी कामनावाला यज्ञ करे", "स्वर्गकी कामनावाला यज्ञ करे", इत्यादि वाक्योंद्वारा ग्राम, पशु और स्वर्गकी कामनावाले तथा उनके साधनोंका अनुष्ठान करनेवाले पुरुष भिन्न-भिन्न जान पड़ते हैं। <br><br> अब इसके उत्तरमें कहा जाता है—कुतर्कके कारण जिनके अन्तःकरण दूषित हैं तथा जिनकी बुद्धि वेदार्थविषयक सम्प्रदायसे दूर है, ऐसे वे ये ब्राह्मणादि वर्णाधम दयाके ही पात्र हैं। सो कैसे ?—श्रोत्रादि द्वारोंसे प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेवाले शब्दादिसे ब्रह्मकी एकताका विरोध है—इस प्रकार कहनेवाले उन पुरुषोंसे यह कहना चाहिये कि क्या शब्दादिके भेदसे आकाशकी एकताका भी विरोध है ? यदि उसका |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४९५ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४९५ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| इति; अथ न विरुध्यते, न तर्हि प्रत्यक्षविरोधः। | विरोध नहीं है तो प्रत्यक्ष प्रमाणसे [ब्रह्मैकत्व प्रतिपादन करनेवाले वाक्योंका] विरोध नहीं हो सकता। |
| यच्चोक्तं प्रतिशरीरं शब्दाद्युपलब्धारो धर्माधर्मयोश्च कर्तारो भिन्ना अनुमीयन्ते, तथा च ब्रह्मैकत्वेऽनुमानविरोध इति; भिन्नाः कैरनुमीयन्त इति प्रष्टव्याः; अथ यदि ब्रूयुः—सर्वैरस्माभिरनुमानकुशलैरिति—के यूयमनुमानकुशला इत्येवं पृष्टानां किमुत्तरम्। | और ऐसा जो कहा कि प्रत्येक शरीरमें शब्दादिको उपलब्ध करनेवाले तथा धर्माधर्मका अनुष्ठान करनेवाले भी भिन्न-भिन्न ही अनुमान किये जाते हैं, इसलिये ब्रह्मकी एकता माननेपर अनुमानप्रमाणसे विरोध होगा, सो यह पूछना चाहिये कि वे भिन्न-भिन्न हैं—इसका अनुमान कौन करता है ? इसपर यदि वे कहें कि अनुमान करनेमें कुशल हम सब लोग ही इसका अनुमान करते हैं, तो 'अनुमान करनेमें कुशल तुम कौन हो ?' इस प्रकार पूछे जानेपर तुम्हारा क्या उत्तर होगा ? |
| शरीरेन्द्रियमनआत्मसु च प्रत्येकमनुमानकौशलप्रत्याख्याने, शरीरेन्द्रियमनःसाधना आत्मानो वयमनुमानकुशलाः, अनेककारकसाध्यत्वात्क्रियाणामिति चेत् ? | पूर्व०-शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मामेंसे क्रमशः एक-एकमें अनुमानकौशलका निषेध किये जानेपर जो शरीर, इन्द्रिय और मनरूप साधनोंवाले हम आत्मा हैं, वे ही अनुमान करनेमें कुशल हैं, क्योंकि क्रियाएँ अनेक कारकोंद्वारा साध्य होती हैं, ऐसा कहें तो ? |
| एवं तर्ह्यनुमानकौशलेभवतामनेकत्वप्रसङ्गः; अनेककारकसाध्या | सिद्धान्ती-यदि ऐसी बात है, तब तो अनुमानकी कुशलतामें तो तब आपकी अनेकता का प्रसङ्ग उपस्थित होता है। क्रिया अनेक कारकों- |
४९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ४९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| हि क्रियेति भवद्भिरेवाभ्युपगतम् । तत्रानुमानं च क्रिया; सा शरीरेन्द्रियमनआत्मसाधनैः कारकैरात्मकर्तृका निर्वर्त्येत इत्येतत्प्रतिज्ञातम् । तत्र वयमनुमानकुशला इत्येवं वदद्भिः—शरीरेन्द्रियमनःसाधना आत्मानः प्रत्येकं वयमनेक इत्यभ्युपगतं स्यात् । अहो अनुमानकौशलं दर्शितमपुच्छशृङ्गैस्तार्किकबलीवर्दैः। यो ह्यात्मानमेव न जानाति स कथं मूढस्तद्गतं भेदमभेदं वा जानीयात् ? | द्वारा साध्य होती है—ऐसा तो आपने ही स्वीकार किया है। तथा अनुमान भी क्रिया ही है। उसके विषयमें आपकी यह प्रतिज्ञा है कि आत्मा जिसका कर्ता है, ऐसी वह क्रिया शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मारूप कारकोंद्वारा निष्पन्न होती है। ऐसी स्थितिमें 'हम अनुमानकुशल हैं' ऐसा कहकर आप यह स्वीकार कर लेते हैं कि हम प्रत्येक शरीर, इन्द्रिय और मनरूप साधनवाले आत्मा अनेक हैं। अहो ! जिनके सींग और पूँछ नहीं हैं, ऐसे आप तार्किक-वृषभोंने यह अच्छा अनुमानकौशल दिखलाया। जो आत्माको ही नहीं जानता वह मूढ़ पुरुष किस प्रकार उसके भेद या अभेदको जान सकता है ? | | तत्र किमनुमिनोति ? केन वा लिङ्गेन ? न ह्यात्मनः स्वतो भेदप्रतिपादकं किञ्चिन्लिङ्गमस्ति,येन लिङ्गेनात्मभेदं साधयेत्; यानि लिङ्गान्यात्मभेदसाधनाय नाम- | ऐसी स्थितिमें वह क्या अनुमान करता है और किस लिङ्गके द्वारा करता है ? आत्माका अपनेसे भेद प्रतिपादन करनेवाला कोई लिङ्ग तो है नहीं, जिस लिङ्गके द्वारा कि वह आत्माओंका भेद सिद्ध कर सके। जिन नाम-रूपवान् लिङ्गोंका आत्मभेद सिद्ध करनेके लिये उल्लेख |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४९७ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४९७ |
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| रूपवन्त्युपन्यस्यन्ति, तानि नामरूपगतान्युपाधय एवात्मनो घटकरकापवरकभूच्छिद्राणीवाकाशस्य । यदाकाशस्य भेदलिङ्गं पश्यति, तदात्मनोऽपि भेदलिङ्गं लभेत सः; न ह्यात्मनः परतोऽपि विशेषमभ्युपगच्छद्भिस्तार्किकशतैरपि भेदलिङ्गमात्मनो दर्शयितुं शक्यते; स्वतःस्तु दूरादपनीतमेव, अविषयत्वादात्मनः । यद्यत्पर आत्मधर्मत्वेनाभ्युपगच्छति, तस्य तस्य नामरूपात्मकत्वाभ्युपगमात्, नामरूपाभ्यां चात्मनोऽन्यत्वाभ्युपगमात्, "आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म" ( छा० उ० ८ । १४ । १ ) इति श्रुतेः "नामरूपे व्याकरवाणि" ( छा० उ० ६ । ३ । २ ) इति च । उत्पत्तिप्रलयात्मके हि नामरूपे, तद्विलक्षणं च ब्रह्म—अतोऽनुमानस्यै- | किया जाता है, वे तो आकाशकी उपाधि घट, कमण्डलु, अपवरक ( झरोखा ) और भूच्छिद्रके समान आत्माकी नाम-रूपगत उपाधियाँ ही हैं। यदि वह आकाशके भेदका अनुमापक लिङ्ग देखता है तो आत्माके भेदका लिङ्ग भी पा सकता है । किंतु अन्य ( उपाधियों ) से भी आत्माका भेद माननेवाले सैकड़ों तार्किकोंद्वारा भी आत्माके भेदका वास्तविक लिङ्ग नहीं दिखलाया जा सकता है, स्वतः तो आत्मामें भेद होना दूरकी ही बात है; क्योंकि वह किसीका विषय नहीं है,^१ पूर्वपक्षी जिस-जिसको आत्माके धर्मरूपसे स्वीकार करता है, उसी-उसीको नाम-रूपात्मक माना गया है और "आकाश ( ब्रह्म ) ही नाम एवं रूपका निर्वाह करनेवाला है, ये जिसके अन्तर्गत हैं, वह ब्रह्म है" इस श्रुतिसे तथा "मैं नाम-रूपोंको व्यक्त करूँ" इस वाक्यसे भी नाम और रूपोंसे आत्माका अन्यत्व स्वीकार किया गया है । नाम और रूप ही उत्पत्ति एवं प्रलयरूप हैं तथा ब्रह्म उनसे भिन्न है, अतः अनुमानका |
१. तात्पर्य यह है कि आत्मामें औपाधिक और स्वाभाविक दोनों ही प्रकारका भेद नहीं हो सकता ।
बृ० उ० ३२—
४९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ४९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| वाविषयत्वात्कुतोऽनुमानविरोधः? <br><br> एतेनागमविरोधः प्रत्युक्तः। <br><br> यदुक्तं ब्रह्मैकत्वे यस्मा उपदेशः, यस्य चोपदेशग्रहणफलम्, तदभावादेकत्वोपदेशानर्थक्यमिति, तदपि न, अनेककारकसाध्यत्वात्क्रियाणां कश्चोद्यो भवति। एकस्मिन्ब्रह्मणि निरुपाधिके नोपदेशः, नोपदेष्टा, न चोपदेशग्रहणफलम्; तस्मादुपनिषदां चानर्थक्यमित्येतदभ्युपगतमेव। अथानेककारकविषयानर्थक्यं चोद्यते—न, स्वतोऽभ्युपगमविरोधादात्मवादिनाम् । | विषय ही न होनेके कारण अनुमानसे उसका विरोध कैसे हो सकता है? इससे शास्त्रविरोधका भी परिहार कर दिया गया।१ <br><br> ऐसा जो कहा कि ब्रह्मकी एकता स्वीकार करनेपर तो जिसको उपदेश किया जायगा और जिसे उपदेशग्रहणका फल होगा, उन दोनोंका अभाव होनेके कारण उसकी एकताके उपदेशकी व्यर्थता ही सिद्ध होगी, सो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि क्रियाएँ तो अनेक कारकोंद्वारा निष्पन्न होनेवाली होती ही हैं, अतः इस विषयमें किससे प्रश्न किया जा सकता है। एक निरुपाधिक ब्रह्ममें तो न उपदेश है, न उपदेष्टा है और न उपदेशग्रहणका फल ही है। अतः [ब्रह्मका ज्ञान हो जानेपर एकत्वोपदेशके साथ ही] सम्पूर्ण उपनिषदोंकी भी व्यर्थता सिद्ध होती है; और यह हमें भी मान्य ही है। यदि [ब्रह्मज्ञानके पहले भी] अनेक कारकोंके विषयभूत उपदेशको व्यर्थ बतावें तो ठीक नहीं है; क्योंकि इसका तो स्वयं आत्मज्ञानियोंके मतसे विरोध है।२ अतः यह अल्पबुद्धि |
१. क्योंकि औपाधिक भेदसे व्यवहार होना तो सम्भव है ही।
२. यहाँ जो एकत्वके उपदेशको व्यर्थ बताया गया है, इसके दो अभिप्राय हो सकते हैं—एक तो यह कि क्रियाएँ अनेक कारकोंद्वारा साध्य होती हैं, अतः
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९९
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९९
| तस्मात्तार्किकचाटभटराजाप्रवेश्यम् अभयं दुर्गमिदमल्पबुद्धथगम्यं शास्त्रगुरुप्रसादरहितैश्च, "कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति" (क० उ० १।२।२१) "देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा" (क० उ० १।१।२१) "नैषा तर्केण मतिरापनेया" (क० उ० | पुरुषोंके लिये अगम्य और शास्त्र एवं गुरुकी कृपासे रहित पुरुषोंद्वारा दुर्भेद्य अभय दुर्ग तार्किक-चाटभट-राजोंके¹ लिये प्रवेशयोग्य नहीं है। "उस सहर्ष और हर्षरहित देवको मेरे सिवा और कौन जान सकता है ?" "इस विषयमें पूर्वकालमें देवताओोंने भी संदेह किया था," "यह बुद्धि तर्कद्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं |
उपदेशरूप क्रिया भी अनेक कारकोंद्वारा साध्य होनेके कारण एकत्वका उपदेश उत्पन्न नहीं हो सकता। दूसरा अभिप्राय यह हो सकता है कि जब ब्रह्म एक और नित्य मुक्तस्वरूप है तो उसमें कभी भी द्वैतरूप बन्धन न होनेके कारण मुक्तिके लिये एकत्वका उपदेश निरर्थक है। इनमेंसे पहले अभिप्रायके अनुसार एकत्वके उपदेशको निरर्थक बताया गया है—ऐसा यदि कोई कहे तो उसके विरोधमें सिद्धान्ती कहता है—'तदपि न' इत्यादि। अर्थात् उक्त अभिप्रायसे एकत्वोपदेशको निरर्थक नहीं बताया जा सकता; क्योंकि क्रियाएँ तो अनेक कारकोंद्वारा निष्पन्न होनेवाली हैं ही, इसके लिये किससे प्रश्न किया जाय—कौन उत्तरदायी होगा ? इस अनेकताको ही दूर करनेके लिये तो एकत्वका उपदेश होता है, अतः वह असंगत नहीं हो सकता। यदि दूसरे अभिप्रायके अनुसार अर्थात् ब्रह्मके नित्यमुक्त होनेके कारण उक्त उपदेशकी व्यर्थता बतायी गयी हो तो यह जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मका ज्ञान हो जानेके बाद उक्त उपदेशकी व्यर्थता सिद्ध होती है या पहले ? यदि कहें बाद ही उसकी व्यर्थता है, तो इसको स्वयं भी स्वीकार करते हुए सिद्धान्ती कहता है—'एकस्मिन् ब्रह्मणि' इत्यादि। अर्थात् सब प्रकारकी उपाधियोंसे रहित एकमात्र ब्रह्ममें उपदेश, उपदेशक और उपदेशग्रहणका फल—यह कुछ भी नहीं है, इसलिये केवल एकत्वका उपदेश ही नहीं समस्त उपनिषदें ही उस अवस्थामें निरर्थक हैं और इसे हम भी स्वीकार करते ही हैं। यदि कहें 'ब्रह्मज्ञानके पहले भी एकत्वका उपदेश व्यर्थ है; क्योंकि यह अनेक कारकोंद्वारा साध्य होनेवाला है' तो ठीक नहीं, कारण कि अपनी मान्यताके विरुद्ध है। ज्ञानके पहले अविद्याकी निवृत्तिके लिये सभी आत्मज्ञानी एकत्वोपदेशकी सार्थकता स्वीकार करते हैं।
१. चाट=आर्यमर्यादाको तोड़नेवाले; भट=मिथ्यावादी।
| ५०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
| ५०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ | | :--- | :--- |
| १।२।९)—वरप्रसादलभ्यत्व-श्रुतिस्मृतिवादेभ्यश्च; “तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके” ( ईशा० उ० ५ ) इत्यादि-विरुद्धधर्मसमवायित्वप्रकाशकमन्त्रवर्णेभ्यश्च। गीतासु च— “मत्स्थानि सर्वभूतानि” ( ९ । ४ ) इत्यादि। तस्मात्परब्रह्मव्यतिरेकेण संसारी नाम नान्यद्वस्त्वन्तरमस्ति। तस्मात्सुष्ठूच्यते “ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेद् अहं ब्रह्मास्मि” ( १ । ४ । १०) “नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतॄ” ( ३ । ८ । ११ ) इत्यादिश्रुतिशतेभ्यः। तस्मात्परस्यैव ब्रह्मणः ‘सत्यस्य सत्यम्’ नामोपनिषत्परा। २०। | है” तथा देवतादिके वर और कृपाद्वारा उसके प्राप्यत्वका प्रतिपादन करनेवाले श्रुति एवं स्मृतिसम्बन्धी वाक्योंसे एवं “वह चलता है और वह नहीं चलता, वह दूर है और वह समीप भी है” इत्यादि ब्रह्ममें विरुद्ध धर्मोंका समवायित्व प्रकाशन करनेवाले मन्त्रवर्णोंसे भी यही सिद्ध होता है। गीतामें भी कहा है— “सब भूत मुझमें स्थित हैं” इत्यादि। अतः परब्रह्मसे भिन्न संसारी नामकी कोई अन्य वस्तु नहीं है। इसलिये “पहले यह ब्रह्म ही था, उसने अपनेको जाना कि मैं ब्रह्म हूँ” “इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है और इससे भिन्न कोई श्रोता भी नहीं है” इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंद्वारा ठीक ही कहा गया है। अतः ‘सत्यका सत्य है’ यह परम उपनिषद् परब्रह्मकी ही है॥ २०॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये प्रथममजातशत्रुब्राह्मणम् ॥ १ ॥
द्वितीय ब्राह्मण
| उपक्रमः | ‘ब्रह्म ज्ञापयिष्यामि’ इति प्रस्तुतम्; तत्र यतो जगज्जातं यन्मयं | ‘मैं तुम्हें ब्रह्मका बोध कराऊँगा’ इस प्रकार यहाँ प्रसंग आरम्भ हुआ है। सो, जिससे जगत् उत्पन्न हुआ |
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ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५०१
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५०१
| यस्मिंश्च लीयते तदेकं ब्रह्मेति ज्ञापितम्। किमात्मकं पुनस्तज्जगज्जायते, लीयते च? पञ्चभूतात्मकम्; भूतानि च नामरूपात्मकानि; नामरूपे सत्यमिति ह्युक्तम्; तस्य सत्यस्य पञ्चभूतात्मकस्य सत्यं ब्रह्म। <br><br> कथं पुनर्भूतानि सत्यमिति मूर्तामूर्तब्राह्मणम्। मूर्तामूर्तभूतात्मकत्वात्कार्यकरणात्मकानि भूतानि प्राणा अपि सत्यम्। तेषां कार्यकरणात्मकानां भूतानां सत्यत्वनिर्दिधारयिषा ब्राह्मणद्वयमारभ्यते सैवोपनिषद्व्याख्या! कार्यकरणसत्यत्वावधारणद्वारेण हि सत्यस्य सत्यं ब्रह्मावधार्यते। अत्रोक्तम् 'प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम्' इति। तत्र के प्राणाः? कियत्यो वा प्राणविषया उपनिषदः? काः? इति च ब्रह्मोपनिषत्प्रसङ्गेन करणानां प्राणानां स्वरूपमवधार- | है, जो इसका स्वरूप है और जिसमें यह लीन हो जाता है, वह एक ही ब्रह्म है—ऐसा यहाँ बतलाया गया है। तो भला, यह जगत् किस रूपसे स्थित हुआ उत्पन्न और लीन होता है? पञ्चभूतरूपसे। वे भूत नाम-रूपात्मक हैं और नाम-रूप 'सत्य' हैं—ऐसा बतलाया जा चुका है। उस पञ्चभूतस्वरूप 'सत्य' का ब्रह्म सत्य है। <br><br> किंतु भूत सत्य किस प्रकार हैं, यह बतलानेके लिये ही यह मूर्तामूर्त ब्राह्मण है। मूर्तामूर्त भूतस्वरूप होनेके कारण देह-इन्द्रियरूप भूत और प्राण भी सत्य हैं। उन देहेन्द्रियस्वरूप भूतोंकी सत्यताका निश्चय करनेकी इच्छासे ये दो ब्राह्मण आरम्भ किये जाते हैं, यही इस उपनिषद्की व्याख्या है; क्योंकि देह और इन्द्रियोंके सत्यत्वका निश्चय करनेके द्वारा ही सत्यके सत्य ब्रह्मका निश्चय होता है। यहाँ यह बतलाया गया है कि 'प्राण ही सत्य हैं और यह उनका भी सत्य है;' सो प्राण कौन-से हैं? तथा प्राणविषयक उपनिषदें कितनी और कौन-कौन-सी हैं? इस प्रकार ब्रह्मोपनिषद्के प्रसङ्गसे, मार्गमें पड़नेवाले कुएँ और बगीचों आदिके |
५०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ५०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| यति-पथिगतकूपारामाद्यवधारणवत् । | निश्चयके समान, श्रुति इन्द्रियों और प्राणोंके स्वरूपका निश्चय करती है। |
शिशुसंज्ञक मध्यम प्राणका उसके उपकरणोंसहित वर्णन
यो ह वै शिशुँ साधानँ सप्रत्याधानँ सस्थूणँ सदामं वेद सप्त ह द्विषतो भ्रातृव्यानवरुणद्धि । अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणस्तस्येदमेवाधानमिदं प्रत्याधानं प्राणः स्थूणान्नं दाम ॥ १ ॥
जो कोई आधान, प्रत्याधान, स्थूणा और दाम (बन्धनरज्जु) के सहित शिशुको जानता है, वह अपनेसे द्वेष करनेवाले सात भ्रातृव्योंका अवरोध करता है। यह जो मध्यम प्राण है, वही शिशु है, उसका यह (शरीर) ही आधान है, यह (शिर) ही प्रत्याधान है, प्राण स्थूणा है और अन्न दाम है ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यो ह वै शिशुं साधानं सप्रत्याधानं सस्थूणं सदामं वेद, तस्येदं फलम्; किं तत् ? सप्त सप्तसंख्याकान् ह द्विषतो द्वेषकर्तॄन् भ्रातृव्यान् । भ्रातृव्या हि द्विविधा भवन्ति, द्विषन्तोऽद्विषन्तश्च, तत्र द्विषन्तो ये भ्रातृव्यास्तान् द्विषतो भ्रातृव्यानवरुणद्धि; सप्त ये शीर्षण्याः प्राणा विषयोपलब्धिद्वाराणि तत्प्रभवा विषयरागाः सहजत्वाद् भ्रातृव्याः । ते ह्यस्य स्वात्मस्थां दृष्टिं विषयविषयां | जो भी आधान, प्रत्याधान, स्थूणा और दामके सहित शिशुको जानता है, उसे यह फल प्राप्त होता है। वह फल क्या है ? वह द्वेष करनेवाले सात भ्रातृव्योंका अवरोध करता है। भ्रातृव्य दो प्रकारके होते हैं—द्वेष करनेवाले और द्वेष न करनेवाले, उनमें जो द्वेष करनेवाले भ्रातृव्य होते हैं, उन द्वेषी भ्रातृव्योंका वह अवरोध करता है। शिरमें स्थित जो सात प्राण विषयोपलब्धिके द्वार हैं, उनसे होनेवाले विषयसम्बन्धी राग साथ-साथ उत्पन्न होनेवाले होनेके कारण भ्रातृव्य हैं; क्योंकि वे ही उसकी आत्मस्थ दृष्टिको |
| ब्राह्मण २] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५०३ |
| ब्राह्मण २] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५०३ |
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| संस्कृत-भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| कुर्वन्ति, तेन ते द्वेष्टारो भ्रातृव्याः। प्रत्यगात्मेक्षणप्रतिषेधकरत्वात्। काठके चोक्तम्—"पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्" इत्यादि। (२।१।१) तत्र यः शिश्वादीन्वेद, तेषां याथात्म्यमवधारयति, स एतान् भ्रातृव्यानवरुणद्ध्यपावृणोति विनाशयति। | विषयोन्मुख करते हैं, अतः वे द्वेष करनेवाले भ्रातृव्य हैं; कारण, वे प्रत्यगात्मदर्शनको रोकनेवाले हैं। कठोपनिषद्में भी कहा है—"स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है, इसलिये जीव बाह्य विषयोंको देखता है, अन्तरात्माको नहीं देखता" इत्यादि। सो, जो कोई इन शिशु आदिको जानता है, इनके यथार्थ स्वरूपका निश्चय करता है, वह इन भ्रातृव्योंका अवरोध-अपावरण अर्थात् विनाश कर देता है। |
| तस्मै फलश्रवणेनाभिमुखीभूतायाह—अयं वाव शिशुः। कोऽसौ? योऽयं मध्यमः प्राणः, शरीरमध्ये यः प्राणो लिङ्गात्मा, यः पञ्चधा शरीरमाविष्टः—बृहन्पाण्डरवासः सोम राजन्नित्युक्तः, यस्मिन्वाङ्मनःप्रभृतीनि करणानि विषक्तानि-पड्वीशशङ्कुनिदर्शनात्; स एष शिशुरिव, विषयेष्वितरकरणवदपटुत्वात्; | इस प्रकार फलश्रवणसे अभिमुख हुए उस (गार्ग्य) से [अजातशत्रु] कहता है—निश्चय यही शिशु है। यह कौन? जो यह मध्यम प्राण है। शरीरके मध्यमें जो यह लिङ्गात्मा प्राण है, जो पाँच प्रकारसे शरीरमें प्रविष्ट होकर बृहन्, पाण्डरवास, सोम और राजन् इन नामोंसे कहा जाता है, जिसमें वाणी और मन आदि इन्द्रियाँ विशेषरूपसे निबद्ध हैं, जैसा कि घोड़ेके पैर बाँधनेके मेखोंके दृष्टान्तसे बतलाया गया है; वह यह प्राण शिशुके समान अन्य इन्द्रियोंकी तरह विषयोंमें पटु न होनेके कारण शिशु है। |
| शिशुं साधानमित्युक्तम्। किं पुनस्तस्य शिशोर्वत्सस्थानीयस्य | मूल मन्त्रमें 'शिशुं साधानम्' ऐसा कहा गया है। सो उस वत्सस्थानीय |
| ५०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
| ५०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| Sanskrit | Hindi |
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| करणात्मन आधानम् ?<br><br>तस्येदमेव शरीरमाधानं कार्यात्मकम्—आधीयतेऽस्मिन्नित्याधानम्; तस्य हि शिशोः प्राणस्येदं शरीरमधिष्ठानम्, अस्मिन्हि करणान्यधिष्ठितानि लब्धात्मकान्युपलब्धिद्वाराणि भवन्ति, न तु प्राणमात्रे विषक्तानि । तथा हि दर्शितमजातशत्रुणा—उपसंहृतेषु करणेषु विज्ञानमयो नोपलभ्यते, शरीरदेशव्यूढेषु तु करणेषु विज्ञानमय उपलभमान उपलभ्यते—तच्च दर्शितं पाणिपेषप्रतिबोधनेन । | इन्द्रियरूप शिशुका आधान क्या है ?<br><br>उसका यह कार्यरूप भौतिक शरीर ही आधान है—जिसमें कुछ रखा जाय उसे आधान कहते हैं, अतः उस शिशु अर्थात् प्राणका यह शरीर अधिष्ठान है; क्योंकि इसमें अधिष्ठित होकर अपने स्वरूपको प्राप्त करनेवाली इन्द्रियाँ विषयोंकी उपलब्धिका द्वार होती हैं; वे केवल प्राणमात्रमें ही निबद्ध नहीं होतीं । ऐसा ही अजातशत्रुने दिखलाया भी है—इन्द्रियोंका उपसंहार हो जानेपर विज्ञानमयकी उपलब्धि नहीं होती । शरीरस्थानमें एकत्रित हुई इन्द्रियोंमें तो उपलब्धिकर्ताके रूपमें ही विज्ञानमयकी उपलब्धि होती है—यह बात हाथ दबाकर जगानेके द्वारा दिखायी गयी है । |
| इदं प्रत्याधानं शिरः; प्रदेशविशेषेषु—प्रति प्रत्याधीयत इति प्रत्याधानम् । प्राणः स्थूणा अन्नपानजनिताशक्तिः—प्राणो बलमिति पर्यायः । बलावष्टम्भो हि प्राणोऽस्मिञ्छरीरे—"स यत्रायमात्मा बल्यं न्येत्य सम्मोहमेव" (बृ० उ० ४।४।१) इति दर्शनात् । | यह शिर प्रत्याधान है । इसका प्रदेशविशेषोंके प्रति प्रत्याधान किया जाता है, इसलिये यह प्रत्याधान है । प्राण, स्थूणा अर्थात् अन्नपानजनित शक्ति है । प्राण और बल ये पर्याय-वाची हैं । इस शरीरमें बलका आधार ही प्राण है, जैसा कि "जिस अवस्थामें यह जीव शरीरको निर्बल करता हुआ सम्मोहको प्राप्त होता है" इस वाक्यमें देखा जाता है । |
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५०५
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५०५
| यथा वत्सः स्थूणावष्टम्भ एवं शरीरपक्षपाती वायुः प्राणः स्थूणेति केचित् ।<br><br>अन्नं दाम—अन्नं हि भुक्तं त्रेधा परिणमते; यः स्थूलः परिणामः, स एतद्द्वयं भूत्वा इमामप्येति— मूत्रं च पुरीषं च । यो मध्यमो रसः स रसो लोहितादिक्रमेण स्वकार्यं शरीरं सप्तधातुकमुपचिनोति; स्वयोन्यन्नागमे हि शरीरमुपचीयतेऽन्नमयत्वात्; विपर्ययेऽपचीयते पतति; यस्त्वणिष्ठोरसः-अमृतम् ऊर्क् प्रभावः—इति च कथ्यते, स नाभेरूर्ध्वं हृदयदेशमागत्य, हृदयाद्विप्रसृतेषु द्वासप्ततिनाडीसहस्रेष्वनुप्रविश्य यत्तत्करणसङ्घातरूपं लिङ्गं शिशुसंज्ञकम्, तस्य | जिस प्रकार बछड़ा स्थूणा (खूँटे) के आश्रित होता है, उसी प्रकार शरीरपक्षपाती वायु-प्राण स्थूणा है—ऐसा किन्हींकाँ मत है।<br><br>अन्न दाम (बन्धन—रज्जु) है, क्योंकि भोजन किये जानेपर अन्न तीन प्रकारसे परिणामको प्राप्त हो जाता है। उसका जो स्थूल परिणाम होता है, वह मल और मूत्र दो रूपमें होकर इस भूमिको प्राप्त होता है। जो मध्यम परिणाम होता है वह रस है। वह रस लोहितादि क्रमसे अपने कार्यभूत सात धातुओंवाले शरीरको पुष्ट करता है। शरीर अन्नमय है, इसलिये अपने कारणभूत अन्नके आनेपर उसकी पुष्टि होती है, तथा उसके विपरीत होनेपर क्षीण होकर गिर जाता है। तथा जो सूक्ष्मतम रस होता है वह अमृत—ऊर्क् अथवा प्रभाव ऐसा कहा जाता है; वह नाभिसे ऊपर हृदयदेशमें आकर हृदयसे फैली हुई बहत्तर सहस्र नाड़ियोंमें प्रवेश कर स्थूणासंज्ञक बलको उत्पन्न करके जो शिशुसंज्ञक इन्द्रियसंघातरूप लिङ्गशरीर है, उसकी |
१. शरीरपक्षपाती वायुसे श्वासोच्छ्वास करनेवाला शरीरान्तर्वर्ती प्राण समझना चाहिये। उसके अधीन ही इन्द्रियाभिमानी प्राण ग्रहण किया जाता है, इसलिये यह उसके खूँटे (बन्धनस्थान) के समान है।
२. भर्तृप्रपञ्च आदिका।
५०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ५०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| शरीरे स्थितिकारणं भवति बलमुपजनयत्स्थूणाख्यम्; तेनान्नमुभयतः पाशवत्सदामवत् प्राणशरीरयोर्निबन्धनं भवति ॥१॥ | शरीरमें स्थिति रखनेका कारण होता है। इसीसे, जिसके दोनों ओर पाश हैं, ऐसी बछड़ा बाँधनेकी रस्सीके समान अन्न प्राण और शरीरका बन्धन है ॥ १ ॥ |
मध्यम प्राणरूप शिशुके नेत्रान्तर्गत सात अक्षितियाँ
| इदानीं तस्यैव शिशोः प्रत्याधान ऊढस्य चक्षुषि काश्चनोपनिषद उच्यन्ते— | अब प्रत्याधानमें आरूढ उसी शिशुके नेत्रमें कुछ उपनिषदें बतलायी जाती हैं— |
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तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते तद्या इमा अक्षन्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनꣳ रुद्रोऽन्वायत्तोऽथ या अक्षन्नापस्ताभिः पर्जन्यो या कनीनका तयादित्यो यत्कृष्णं तेनाग्निर्यच्छुक्लं तेनेन्द्रोऽधरयैनं वर्तन्या पृथिव्यन्वायत्ता द्यौरुत्तरया नास्यान्नं क्षीयते य एवं वेद ॥२॥
उसका ये सात अक्षितियाँ उपस्थान ( स्तवन ) करती हैं—उनमेंसे जो ये आँखमें लाल रेखाएँ हैं, उनके द्वारा रुद्र इस मध्यप्राणके अनुगत है और नेत्रमें जो जल है उसके द्वारा मेघ, जो कनीनका ( दर्शनशक्ति ) है उसके द्वारा आदित्य, जो कालिमा है उसके द्वारा अग्नि और जो शुक्लता है उसके द्वारा इन्द्र अनुगत है । नीचेके पलकद्वारा पृथिवी इसके अनुगत है एवं ऊपरके पलकद्वारा द्युलोक । जो इस प्रकार जानता है, उसका अन्न क्षीण नहीं होता ॥ २ ॥
| तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते—<br><br>तं करणात्मकं प्राणं शरीरेऽन्न- | उसमें ये सात अक्षितियाँ उपस्थान करती हैं—शरीरमें अन्नके कारण रहनेवाले नेत्रस्थानमें आरूढ़ उस |
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ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५०७
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५०७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| बन्धनं चक्षुष्यूढमेता वक्ष्यमाणाः सप्त सप्तसङ्ख्याका अक्षितयोऽक्षितिहेतुत्वादुपतिष्ठन्ते। यद्यपि मन्त्रकरणे तिष्ठतिरूपपूर्व आत्मनेपदी भवति, इहापि सप्त देवताभिधानांनि मन्त्रस्थानीयानि करणानि; तिष्ठतेरतोऽत्राप्यात्मनेपदं न विरुद्धम्। | इन्द्रियरूप प्राणमें ये आगे कही जानेवाली सात—सात संख्यावाली अक्षितियां जो अक्षिति (अक्षयता) का कारण होनेके कारण अक्षिति कहलाती हैं, रहती हैं। यद्यपि [उपान्मन्त्रकरणे (पा० सू० १। ३। २५) इस पाणिनिसूत्रके अनुसार] 'उप' पूर्वक 'स्था' धातु मन्त्रकरण अर्थमें आत्मनेपदी होता है, तथापि यहाँ भी रुद्रादि सप्त-देवतासंज्ञक करण मन्त्रस्थानीय ही हैं, इसलिये यहाँ भी उपपूर्वक 'स्था' धातुमें आत्मनेपद रहना विरुद्ध नहीं है। |
| कास्ता अक्षितयः? इत्युच्यन्ते—तत्तत्र या इमाः प्रसिद्धाः, अक्षन्नक्षणि लोहिन्यो लोहिता राजयो रेखाः, ताभिर्द्वारभूताभिरेनं मध्यं प्राणं रुद्रोऽन्वायत्तोऽनुगतः; अथ या अक्षन्नक्षण्यापो धूमादिसंयोगेनाभिव्यज्यमानाः, ताभिरद्भिर्द्वारभूताभिः पर्जन्यो देवतात्मान्वायत्तोऽनुगतः उपतिष्ठत इत्यर्थः। स चान्नभूतोऽक्षितिः प्राणस्य; “पर्जन्ये वर्षत्यानन्दिनः प्राणा भवन्ति” इति श्रुत्यन्तरात्। | वे अक्षितियाँ कौन-सी हैं? सो बतलायी जाती हैं—उनमें ये जो नेत्रके भीतर लोहित वर्णकी प्रसिद्ध राजियाँ—रेखाएँ हैं, उन द्वारभूता रेखाओंके द्वारा रुद्र इस मध्यम प्राणके अनुगत है। तथा नेत्रमें जो धूमादिके संयोगसे अभिव्यक्त होनेवाला जल है, उस द्वारभूत जलके द्वारा देवस्वरूप मेघ इसके अनुगत है। वह प्राणका अन्नभूत अक्षिति है जैसा कि “मेघके बरसनेपर प्राण आनन्दित हो जाते हैं” इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है। |
| या कनीनका दृक्शक्तिस्तया | जो कनीनका अर्थात् दर्शन-शक्ति |
५०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ५०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| कनीनकया द्वारेणादित्यो मध्यमं प्राणमुपतिष्ठते; यत्कृष्णं चक्षुषि तेनैनमग्निरुपतिष्ठते; यच्छुक्लं चक्षुषि तेनेन्द्रः; अधरया वर्तन्या पक्ष्मणैनं पृथिव्यन्वायत्ता, अधरत्व-सामान्यात् द्यौरुत्तरया, ऊर्ध्वत्व-सामान्यात्; एताः सप्तान्नभूताः प्राणस्य सन्ततमुपतिष्ठन्ते-इत्येवं यो वेद, तस्यैतत्फलम्-नास्यान्नं क्षीयते, य एवं वेद ॥ २ ॥ | है, उस कनीनकाके द्वारा आदित्य मध्यम प्राणमें प्रवेश करता है; नेत्र-में जो कृष्णवर्ण है उसके द्वारा अग्नि इसमें उपस्थित होता है; नेत्रमें जो शुक्लवर्ण है, उससे इन्द्र और नीचेके पलकद्वारा इसमें पृथिवी अनुगत है; क्योंकि इन दोनोंकी अधरत्वमें समानता है तथा ऊपरके पलकद्वारा द्युलोक अनुगत है; क्योंकि ऊर्ध्वत्वमें उन दोनोंकी समानता है; ये सातों निरन्तर प्राणके अन्न होकर उप-स्थित होते हैं, इस प्रकार जो जानता है उसे यह फल प्राप्त होता है—जो इस तरह उपासना करता है, उसके अन्नका कभी क्षय नहीं होता ॥ २ ॥ |
श्रोत्रादि प्राणोंके सहित शिरमें चमसदृष्टिका विधान
तदेष श्लोको भवति । अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन्यशो निहितं विश्वरूपम् । तस्यासत ऋषयः सप्त तीरे वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति । अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्न इतीदं तच्छिर एष ह्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन्यशो निहितं विश्वरूपमिति प्राणा वै यशो विश्वरूपं प्राणानेतदाह तस्यासत ऋषयः सप्त तीर इति प्राणा वा ऋषयः प्राणानेतदाह वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति वाग्घ्यष्टमी ब्रह्मणा संवित्ते ॥३॥
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५०९
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५०९
इस विषयमें यह श्लोक है। चमस नीचेकी ओर छिद्रवाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ होता है, उसमें विश्वरूप यश निहित है, उसके तीरपर सात ऋषिगण और वेदके द्वारा संवाद करनेवाली आठवीं वाक् रहती है। जो नीचेकी ओर छिद्रवाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ चमस है, वह शिर है; क्योंकि यही नीचेकी ओर छिद्रवाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ चमस है। उसमें विश्वरूप यश निहित है—प्राण ही विश्वरूप यश हैं, प्राणोंके विषयमें ही मन्त्र ऐसा कहता है। उसके तीरपर सात ऋषि रहते हैं, प्राण ही ऋषि हैं, प्राणोंके विषयमें ही मन्त्र ऐसा कहता है। वेदके द्वारा संवाद करनेवाली वाक् आठवीं है, वही वेदके द्वारा संवाद करती है॥ ३॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्तत्रैतस्मिन्नर्थे एष श्लोको मन्त्रो भवति—अर्वाग्बिलश्चमस इत्यादिः। तत्र मन्त्रार्थमाचष्टे श्रुतिः—अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्न इति। कः पुनरसावर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः इदं तत् शिरः, चमसाकारं हि तत्। कथम् एष ह्यर्वाग्बिलो मुखस्य बिलरूपत्वात्, शिरसो बुध्नाकारत्वादूर्ध्वबुध्नः। | तहाँ इस अर्थमें यह श्लोक-मन्त्र है—‘अर्वाग्बिलश्चमसः’ इत्यादि। अब श्रुति इस मन्त्रका अर्थ बतलाती है—‘अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः’ इत्यादि। किंतु यह नीचेकी ओर छिद्रवाला और ऊपरकी ओरसे उठा हुआ चमस कौन है? वह यह शिर है; क्योंकि वह चमसके समान आकारवाला है। किस प्रकार? क्योंकि यह नीचेकी ओर छिद्रवाला है, कारण, मुख छिद्ररूप है और शिर बुध्नाकार होनेके कारण यह ऊर्ध्वबुध्न है। |
| तस्मिन्यशो निहितं विश्वरूपमिति यथा सोमचमसे, एवं तस्मिञ्छिरसि विश्वरूपं नानारूपं निहितं स्थितं भवति। किं पुनस्तद् यशः। | इसमें विश्वरूप यश निहित है। जिस प्रकार चमसमें सोम रहता है, इसी प्रकार उस शिरमें विश्वरूप—नानारूप अर्थात् अनेक रूपोंवाला यश निहित-स्थित है। वह यश क्या है? |
५१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ५१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| प्राणा वै यशो विश्वरूपम्—प्राणाः श्रोत्रादयो वायवश्च मरुतः सप्तधा तेषु प्रसृता यशः--इत्येतदाह मन्त्रः, शब्दादज्ञानहेतुत्वात् ।<br><br>तस्यासत ऋषयः सप्त तीर इति—प्राणाः परिस्पन्दात्मकाः, त एव च ऋषयः प्राणानेतदाह मन्त्रः। वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति—ब्रह्मणा संवादं कुर्वती अष्टमी भवति; तद्धेतुमाह—वाग्ध्यष्टमी ब्रह्मणा संवित्त इति ॥ ३ ॥ | प्राण ही अनेक रूपोंवाला यश है। प्राण अर्थात् सात श्रोत्रादि^१ और उनमें सात भागोंमें विभक्त होकर फैले हुए मरुत् यानी वायु यश हैं—ऐसा मन्त्र कहता है, क्योंकि वे (श्रोत्रादि) शब्दादि विषयोंके ज्ञानके हेतु हैं।<br><br>उसके तीरपर सात ऋषि रहते हैं—यहाँ स्फुरणात्मक प्राण ही समझने चाहिये, वे ही ऋषि हैं, प्राणोंके विषयमें ही मन्त्र ऐसा कहता है। आठवीं वाक् वेदके द्वारा संवाद करती है। वह वेदके द्वारा संवाद करनेवाली वाक् आठवीं है। इसीसे कहा है—'वाक् ही आठवीं है, वह वेदके द्वारा संवाद करती है' इति ॥ ३ ॥ |
श्रोत्रादिमें विभागपूर्वक सप्तर्षि-दृष्टि
| के पुनस्तस्य चमसस्य तीर आसत ऋषय इति । | किंतु उस चमसके तीरपर कौन ऋषि रहते हैं, सो बतलाते हैं— |
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इमावेव गोतमभरद्वाजावयमेव गोतमोऽयं भरद्वाज इमावेव विश्वामित्रजमदग्नी अयमेव विश्वामित्रोऽयं जमदग्निरिमावेव वसिष्ठकश्यपावयमेव वसिष्ठोऽयं कश्यपो वागेवात्रिर्वाचा ह्यन्नमद्यतेऽत्तिर्ह वै नामैतद्यदत्रिरिति सर्वस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवं वेद ॥ ४ ॥
१. दो कान, दो नेत्र, दो नासिका और एक रसना—ये सात श्रोत्रादि हैं।
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५११
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५११
ये दोनों [कान] ही गोतम और भरद्वाज हैं; यह ही गोतम है और यह [दूसरा] भरद्वाज है। ये दोनों [नेत्र] ही विश्वामित्र और जमदग्नि हैं; यह ही विश्वामित्र है और यह दूसरा जमदग्नि है। ये दोनों [नासारन्ध्र] ही वसिष्ठ और कश्यप हैं; यह ही वसिष्ठ है और यह दूसरा कश्यप है। तथा वाक् ही अत्रि है; क्योंकि वागिन्द्रियद्वारा ही अन्न भक्षण किया जाता है। जिसे अत्रि कहते हैं, वह निश्चय 'अत्ति' नामवाला ही है। जो इस प्रकार जानता है, वह सबका अत्ता (भक्षण करनेवाला) होता है, सब इसका अन्न हो जाता है ॥ ४ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| इमावेव गोतमभरद्वाजौ कर्णौ—<br>अयमेव गोतमोऽयं भरद्वाजो दक्षिणश्चोत्तरश्च, विपर्ययेण वा। त चक्षुषी उपदिशन्नुवाच—इमावेव विश्वामित्रजमदग्नी दक्षिणं विश्वामित्रउत्तरं जमदग्निंविपर्ययेण वा।<br>इमावेव वसिष्ठकश्यपौ—नासिके उपदिशन्नुवाच; दक्षिणः पुटो भवति वसिष्ठः, उत्तरः कश्यपः पूर्ववत्। वागेवात्रिः अदनक्रियायोगात्सप्तमः; वाचा ह्यन्नमद्यते तस्मादत्तिर्ह वै प्रसिद्धं नामैतत्— | ये दोनों कर्ण ही गोतम और भरद्वाज हैं। ये दक्षिण और उत्तर कर्ण ही क्रमशः अथवा विपरीत क्रमसे गोतम और भरद्वाज हैं। इसी प्रकार नेत्रोंके विषयमें उपदेश करते हुए मन्त्रने कहा है कि ये ही विश्वामित्र और जमदग्नि हैं। इनमें दक्षिण नेत्र विश्वामित्र हे और वाम नेत्र जमदग्नि है, अथवा इससे विपरीत क्रमसे समझना चाहिये। फिर नासारन्ध्रोंके विषयमें उपदेश करते हुए मन्त्रने कहा है कि ये ही दोनों वसिष्ठ और कश्यप हैं; पूर्ववत् दायाँ छिद्र वसिष्ठ है और बायाँ कश्यप है। अदन (भक्षण) क्रियाका सम्बन्ध होनेके कारण वाक् ही सप्तम ऋषि अत्रि है; क्योंकि वागिन्द्रियके द्वारा ही अन्न भक्षण किया जाता है; अतः यह प्रसिद्ध अत्ति नामवाला है अर्थात् |
५१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २
५१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २
| अत्तृत्वादत्तिरिति, अत्तिरेव सन् यदत्रिरित्युच्यते परोक्षेण । <br><br> सर्वस्यैतस्यान्नजातस्य प्राणस्यात्रिनिर्वचनविज्ञानादत्ता भवति । अत्तैव भवति नामुष्मिन्नन्नेन पुनः प्रतिपद्यत इत्येतदुक्तं भवति--सर्वमस्यान्नं भवतीति । य एवमेतद्यथोक्तं प्राणयाथात्म्यं वेद, स एवं मध्यमः प्राणो भूत्वा आधान-प्रत्याधानगतो भोक्तैव भवति, न भोज्यम्, भोज्याद् व्यावर्तत इत्यर्थः ॥ ४ ॥ | अत्ता होनेके कारण यह 'अत्ति' है; जो कि 'अत्ति' होते हुए ही परोक्ष-रूपसे 'अत्रि' कहा जाता है। <br><br> इस 'अत्रि' शब्दकी निरुक्तिका ज्ञान होनेसे पुरुष प्राणके इस सम्पूर्ण अन्नसमुदायका अत्ता (भक्षण करने-वाला) होता है। यह अन्न भक्षण करनेवाला ही होता है, परलोकमें पुनः अन्नसे युक्त नहीं होता; 'सर्वमस्यान्नं भवति' इस वाक्यसे यही बात कही गयी है। जो इस प्रकार इस उपर्युक्त प्राणके यथार्थ स्वरूपको जानता है, वह इस तरह मध्यम प्राण होकर आधान-प्रत्याधानगत भोक्ता ही होता है, भोज्य नहीं होता अर्थात् भोज्यवर्गसे निवृत्त हो जाता है ॥ ४ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये
द्वितीयं शिशुब्राह्मणम् ॥ २ ॥
तृतीय ब्राह्मण
| तत्र प्राणा वै सत्यमित्युक्तम् । याः प्राणानामुपनिषदः, ता ब्रह्मोपनिषत्प्रसङ्गेन व्याख्याताः--एते ते प्राणा इति च । ते किमात्मकाः ? | ऊपर यह कहा गया है कि प्राण ही सत्य हैं। जो प्राणोंकी उपनिषदें हैं, उनकी 'वे ये प्राण हैं' ऐसा कहकर ब्रह्मोपनिषद्के प्रसङ्गसे व्याख्या कर दी गयी है। अब यह बतलाना है कि उनका स्वरूप क्या |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५१३ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५१३ |
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| कथं वा तेषां सत्यत्वम् ? इति च वक्तव्यमिति पञ्चभूतानां सत्यानां कार्यकारणात्मकानां स्वरूपावधारणार्थमिदं ब्राह्मणमारभ्यते—यदुपाधिविशेषापनयद्वारेण 'नेति नेति' इति ब्रह्मणः सतत्त्वं निर्दिधारयिषितम्। | है और उनकी सत्यता किस प्रकार है ? अतः शरीर एवं इन्द्रियरूप 'सत्य' संज्ञक पञ्चभूतोंके स्वरूपका निश्चय करनेके लिये यह ब्राह्मण आरम्भ किया जाता है, जिस उपाधिविशेषके निषेधद्वारा 'नेति-नेति' इत्यादि रूपसे श्रुतिको ब्रह्मके स्वरूपका निश्चय कराना अभीष्ट है। |
ब्रह्मके दो रूप
द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तं चैवामूर्तं च मर्त्यं चामृतं च स्थितं च यच्च सच्च त्यच्च ॥ १ ॥
ब्रह्मके दो रूप हैं—मूर्त और अमूर्त, मर्त्य और अमृत, स्थित और यत् (चर) तथा सत् और त्यत् ॥ १ ॥
| तत्र द्विरूपं ब्रह्म पञ्चभूतजनितकार्यकरणसम्बद्धं मूर्तामूर्ताख्यं मर्त्यामृतस्वभावं तज्जनितवासनारूपं च सर्वज्ञं सर्वशक्ति सोपाख्यं भवति । क्रियाकारकफलात्मकं च सर्वव्यवहारास्पदम् । तदेव ब्रह्म विगतसर्वोपाधिविशेषं सम्यग्दर्शनविषयम् अजमजरममृतमभयम्, वाङ्मनसयोरप्यविषयमद्वै- | पञ्चभूतजनित देह और इन्द्रियोंसे सम्बद्ध ब्रह्म दो रूपोंवाला है, मूर्त और अमूर्त संज्ञावाला, मर्त्य और अमृत स्वभाववाला, तज्जनित वासना रूप एवं सर्वज्ञ और सर्वशक्ति ब्रह्म सोपाख्य<sup>१</sup> (सोपाधिक) है। वह क्रिया, कारक और फलस्वरूप तथा समस्त व्यवहारका आश्रय है। वही ब्रह्म समस्त उपाधिविशेषोंसे रहित, सम्यग्ज्ञानका विषय, अजन्मा, अजर, अमर, अभय, वाणी और मनका भी अविषय है तथा |
१. जो शब्द-प्रतीतिका विषय हो उसे सोपाख्य कहते हैं।
बृ० उ० ३३—