भारतकोश
संग्रह पर लौटें

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

६८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६८०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृतहिन्दी
चेत् कर्मफलं कल्पयितव्यम्, कर्माविरुद्धविषय एव श्रुतार्थापत्तेः क्षीणत्वान्नित्यो मोक्षः फलं कल्पयितुं न शक्यः, तद्व्यवधानाज्ञाननिवृत्तिर्वा; अविरुद्धत्वाद् दृष्टसामर्थ्यविषयत्वाच्चेति ।कल्पना करनी आवश्यक ही है तो श्रुतार्थापत्तिका पर्यवसान कर्मके अविरोधी विषयों (उत्पत्ति, आप्ति, संस्कार और विकार) में ही होनेके कारण उन्हींकी कल्पना करनी चाहिये, नित्य मोक्ष अथवा मोक्षके व्यवधानभूत अज्ञानकी निवृत्ति—ये कर्मोंके फलरूपसे कल्पना नहीं किये जा सकते; क्योंकि कर्म और अज्ञानका अविरोध है और जिन (उत्पत्ति आदि) में उनका सामर्थ्य देखा गया है, वे ही उनके विषय हैं।
पारिशेष्यन्यायान्मोक्ष एव कल्पयितव्य इति चेत्—सर्वेषां हि कर्मणां सर्वं फलम्, न चान्यदितरकर्मफलव्यतिरेकेण फलं कल्पनायोग्यमस्ति; परिशिष्टश्च मोक्षः, स चेष्टो वेदविदां फलम्; तस्मात् स एव कल्पयितव्य इति चेत् ?पूर्व०—पारिशेष्यन्यायसे मोक्षको ही नित्यकर्मोंका फल मानना चाहिये—ऐसा कहें तो ? तात्पर्य यह है कि सब कुछ समस्त कर्मोंका ही फल है, नित्य कर्मोंके सिवा अन्य जितने कर्म हैं, उनके फलोंसे भिन्न कोई और ऐसी वस्तु नहीं है, जो नित्य कर्मोंके फलरूपसे कल्पना किये जानेयोग्य हो; ऐसा तो केवल मोक्ष ही अवशिष्ट रहता है, अतः वेदवेत्ताओंको वही उसका फल इष्ट है; इसलिये उसीकी उसके फलरूपसे कल्पना करनी चाहिये—यदि ऐसा मानें तो ?
न, कर्मफलव्यक्तीनाम् आनन्त्यात्पारिशेष्यन्यायानुपपत्तेः ।सिद्धान्ती—यह ठीक नहीं है, क्योंकि कर्मफलकी व्यक्तियाँ तो अनन्त हैं, इसलिये उनमें पारिशेष्य-न्याय लगाना उचित नहीं है।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६८१

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६८१


| न हि पुरुषेच्छाविषयाणां कर्मफलानामेतावत्त्वं नाम केनचिद् असर्वज्ञेनावधृतम्, तत्साधनानां वा पुरुषेच्छानां वा अनियतदेशकालनिमित्तत्वात्, पुरुषेच्छाविषयसाधनानां च पुरुषेष्टफलप्रयुक्तत्वात् । प्रतिप्राणि चेच्छावैचित्र्यात् फलानां तत्साधनानां चानन्त्यसिद्धिः। तदानन्त्याच्चाशक्यमेतावत्त्वं पुरुषैर्ज्ञातुम् । अज्ञाते च साधनफलैतावत्त्वे कथं मोक्षस्य परिशेषसिद्धिरिति । | पुरुषकी इच्छाके विषयभूत कर्मफलोंकी इयत्ताका किसी भी असर्वज्ञ जीवने निश्चय नहीं किया; क्योंकि उनके साधन अथवा पुरुषकी इच्छाओंके देश, काल और निमित्त नियत नहीं हैं; कारण, वे पुरुषकी इच्छाके विषय और उनके साधन पुरुषके इष्ट फलोंद्वारा प्रेरित हैं। अतः प्रत्येक प्राणीकी इच्छाओंमें विचित्रता रहनेके कारण उनके साधन और फलोंकी अनन्तताकी भी सिद्धि होती है। उनकी अनन्तता होनेके कारण पुरुषोंको उनकी इयत्ताका ज्ञान होना असम्भव है तथा साधन और फलोंकी इयत्ताका ज्ञान न होनेपर मोक्षकी परिशेषता कैसे सिद्ध हो सकती है ? | | कर्मफलजातिपारिशेष्यमिति चेत् — सत्यपि इच्छाविषयाणां तत्साधनानां चानन्त्ये, कर्मफलजातित्वं नाम सर्वेषां तुल्यम् । मोक्षस्त्वकर्मफलत्वात् परिशिष्टः स्यात्। तस्मात् परिशेषात् स एव युक्तः कल्पयितुमिति चेत् ? | पूर्व०—कर्मफलोंकी जातिकी परिशेषता तो सिद्ध हो ही सकती है ? इच्छाके विषय और उनके साधन अनन्त होनेपर भी उन सबमें कर्मफलजातित्व तो समान ही है किंतु मोक्ष कर्मफल है नहीं, अतः वही अवशिष्ट होना चाहिये; इसलिये परिशेषतः उसीको नित्य कर्मोंका फल कल्पना करना उचित है—यदि ऐसा मानें तो ? |

६८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

६८२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| न, तस्यापि नित्यकर्मफलत्वाभ्युपगमे कर्मफलसमानजातीयत्वोपपत्तेः परिशेषानुपपत्तिः ।<br><br>तस्मादन्यथाप्युपपत्तेः क्षीणा श्रुतार्थापत्तिः । उत्पत्त्याप्तिविकारसंस्काराणामन्यतममपि नित्यानां कर्मणां फलमुपपद्यत इति क्षीणा श्रुतार्थापत्तिः । | सिद्धान्ती—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि यदि उसे भी नित्य कर्मोंका फल माना जायगा तो उसमें भी कर्मफलसे सजातीयताकी उपपत्ति होनेसे परिशेषकी उपपत्ति नहीं हो सकेगी। इससे भिन्न प्रकारसे भी नित्यकर्मोंके फलकी उपपत्ति हो सकती है, इसलिये वहीं यह श्रुतार्थापत्ति क्षीण हो जाती है। तात्पर्य यह है कि उत्पत्ति, आप्ति, विकार और संस्कारोंमेंसे कोई भी नित्यकर्मोंका फल हो सकता है, इसलिये उन्हींमें यह श्रुतार्थापत्ति क्षीण हो जाती है। | | चतुर्णामन्यतम एव मोक्ष इति चेत् ? | पूर्व०—यदि ऐसा मानें कि मोक्ष भी इन चारोंमेंसे ही कोई एक है तो ? | | न तावदुत्पाद्यो नित्यत्वात्, अत एवाविकार्यः, असंस्कार्यश्चात एवासाधनद्रव्यात्मकत्वाच्च, साधनात्थकं हि द्रव्यं संस्क्रियते, यथा पात्राज्यादि प्रोक्षणादिना न च संस्क्रियमाणः, संस्कारनिर्वर्त्यो वा यूपा- | सिद्धान्ती—नहीं, वह नित्य है, इसलिये उत्पाद्य नहीं हो सकता और इसी कारण विकार्य भी नहीं हो सकता और इसी कारणसे तथा साधनात्मक द्रव्य न होनेसे संस्कार्य भी नहीं हो सकता, क्योंकि संस्कार साधनात्मक द्रव्यका ही होता है, जैसे प्रोक्षणादिसे पात्र और घृत आदि। मोक्ष न तो संस्कृत किया जानेवाला है और न यूपादि-के समान संस्कारद्वारा निष्पन्न होने- |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६८३

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६८३


संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी (शाङ्करभाष्यार्थ)
दिवत्। परिशेष्यादाप्यः स्यात्, नाप्योऽपि, आत्मस्वभावत्वादेकत्वाच्च।वाला है। परिशेषतः आप्य हो सकता है, सो आत्माका स्वभाव और एकमात्र होनेके कारण आप्य भी नहीं है।
इतरैः कर्माभिर्वैलक्षण्यान्नित्यानां कर्मणां तत्फलेनापि विलक्षणेन भवितव्यमिति चेत् ?पूर्व०-किंतु नित्य कर्म अन्य कर्मोंसे विलक्षण हैं, इसलिये उनका फल भी विलक्षण ही होना चाहिये।
न, कर्मत्वसालक्षण्यात् सलक्षणं कस्मात् फलं न भवतीतरकर्मफलैः ?सिद्धान्ती-नहीं, कर्मत्वमें तो वे समान लक्षणवाले हैं, फिर उसका फल भी अन्य कर्मफलोंके समान लक्षणोंवाला ही क्यों न होगा ?
निमित्तवैलक्षण्यादिति चेत् ?पूर्व०-यदि कहें, अन्य कर्मोंसे निमित्तमें विलक्षणता होनेके कारण तो फलमें विलक्षणता होनी ही चाहिये तो ?
न, क्षामवत्यादिभिः समानत्वात्; यथा हि गृहदाहादौ निमित्ते क्षामवत्यादीष्टिः, यथा भिन्ने जुहोति स्कन्ने जुहोतीत्येवमादौ नैमित्तिकेषु कर्मसु न मोक्षः फलं कल्प्यते, तैश्चाविशेषान्नमित्तिकत्वेन, जीवनादिनिमित्ते च श्रवणात्, तथा नित्यानामपि न मोक्षः फलम्। आलो-सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि क्षामवती आदि इष्टियोंसे इनकी समानता है; जिस प्रकार गृहदाहादि निमित्त होनेपर क्षामवती आदि इष्टियोंका विधान है और जैसे 'भिन्ने जुहोति' 'स्कन्ने जुहोति' इत्यादि विधियोंमें भेदन और स्कन्दनके प्रायश्चित्तरूपसे किये हुए नैमित्तिक कर्मोंका फल मोक्ष नहीं कल्पना किया जा सकता, क्योंकि नैमित्तिकत्वमें ये भी उनके समान ही हैं, कारण, श्रुति जीवनादि निमित्तसे इनका विधान करती है, इसी प्रकार नित्य कर्मोंका फल भी मोक्ष नहीं हो सकता। प्रकाश

६८४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

६८४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

| कस्य सर्वेषां रूपदर्शनसाधनत्वे उलूकादय आलोकेन रूपं न पश्यन्तीत्युलूकादिचक्षुषो वैलक्षण्यादितरलोकचक्षुर्भिनं रसादि-विषयत्वं परिकल्प्यते; रसादि-विषये सामर्थ्यस्यादृष्टत्वात्। सुदूरमपि गत्वा यद्विषये दृष्टं सामर्थ्यं तत्रैव कश्चित् विशेषः कल्पयितव्यः।<br><br>यत् पुनरुक्तं विद्यामन्त्रशर्करा-दिसंयुक्तविषदध्यादिवन्नित्यानि कार्यान्तरमारभन्त इति; आर-भ्यतां विशिष्टं कार्यं तदिष्टत्वाद-विरोधः। निरभिसन्धेः कर्मणो विद्यासंयुक्तस्य विशिष्टकार्यान्त-रारम्भे न कश्चिद् विरोधः। देवयाज्यात्मयाजिनोरात्मयाजिनो विशेषश्रवणात् "देवयाजिनः श्रेयानात्मयाजी" इत्यादौ "यदेव | सबके लिये रूपदर्शनका साधन है, तथापि उल्लू आदिको प्रकाशसे रूपकी उपलब्धि नहीं होती; इस प्रकार उल्लूकी दृष्टिमें अन्य जीवोंकी दृष्टिसे विलक्षणता होनेसे भी उसका विषय रसादि नहीं कल्पना किया जाता; क्योंकि रसादि विषयमें नेत्रका सामर्थ्य नहीं देखा जाता। बहुत दूर जाकर भी जिस विषयमें जिसका सामर्थ्य देखा जाता है, उसीमें कुछ विशेषकी कल्पना करनी चाहिये; [सर्वथा विपरीत कल्पना करनी उचित नहीं है]।<br><br>और ऐसा जो कहा कि विद्या, मन्त्र एवं शर्करादियुक्त विष और दधि आदिके समान नित्यकर्म किसी अन्य कार्यका आरम्भ करते हैं, सो वे भले ही किसी विशिष्ट कार्यका आरम्भ करें, वह इष्ट होनेके कारण उससे हमारा कोई विरोध नहीं है। फलाशारहित विद्यासंयुक्त कर्मके विशिष्ट कार्यान्तर आरम्भ करनेमें हमारा कोई विरोध नहीं है; क्योंकि "देवयाजीसे आत्मयाजी श्रेष्ठ है" तथा "जो भी विद्यासे करता है वह बलवत्तर होता है" इत्यादि |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६८५

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६८५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
विद्यया करोति” (छा० उ० १ । १ । १०) इत्यादौ च ।<br><br>यस्तु परमात्मदर्शनविषये मनुनोक्त आत्मयाजिशब्दः “समं पश्यन्नात्मयाजी” (मनु० १२ । ९१) इत्यत्र, समं पश्यन्नात्मयाजी भवतीत्यर्थः, अथवा भूतपूर्वगत्या । आत्मयाजी आत्मसंस्कारार्थं नित्यानि कर्माणि करोति “इदं मेऽनेनाङ्गं संस्क्रियते” इति श्रुतेः । तथा “गार्भैर्होमैः” इत्यादिप्रकरणे कार्यकरणसंस्कारार्थत्वं नित्यानां कर्मणां दर्शयति । संस्कृतश्च य आत्मयाजी तैः कर्मभिः समं द्रष्टुं समर्थो भवति । तस्येह वा जन्मान्तरे वा सममात्मदर्शनमुत्पद्यते । समं पश्यन् स्वाराज्यमधिगच्छतीत्येषोऽर्थः । आत्मयाजिशब्दस्तु भूतपूर्वगत्या प्रयुज्यते, ज्ञानयुक्तानां नित्यानां कर्मणां ज्ञानोत्पत्तिसाधनत्वप्रदर्शनार्थम् ।वाक्योंमें देवयाजी और आत्मयाजियोंमें आत्मयाजी विशेष सुना गया है ।<br><br>मनुजीने जो “समं पश्यन्नात्मयाजी” इत्यादि वाक्यमें ‘आत्मयाजी’ शब्दका परमात्मदर्शनके विषयमें प्रयोग किया है, उसका तात्पर्य तो यह है कि समस्त भूतोंमें समदृष्टि रखनेवाला आत्मयाजी है, अथवा वहाँ भूतपूर्व गतिसे इसका प्रयोग हो सकता है । “इसके द्वारा मेरा यह अङ्ग संस्कारयुक्त होता है” इस श्रुतिके अनुसार आत्मयाजी आत्माके संस्कारके लिये नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करता है तथा “गर्भसम्बन्धी होमोंसे [ बीजगत पाप निवृत्त होते हैं ]” इत्यादि प्रकरणमें भी नित्य कर्मोंका प्रयोजन देहेन्द्रियसंघातका संस्कार दिखाया गया है । जो आत्मयाजी उन कर्मोंसे संस्कृत हो गया है, वही समदर्शनमें समर्थ होता है । उसको ही इस जन्ममें या जन्मान्तरमें सम आत्मदर्शन होना सम्भव है । इसका अर्थ यह है कि समदर्शन करनेवाला पुरुष स्वाराज्य प्राप्त कर लेता है । यहाँ ‘आत्मयाजी’ शब्दका प्रयोग तो ज्ञानयुक्त नित्य कर्मोंको ज्ञानोत्पत्तिकी साधनता प्रदर्शित करनेके लिये भूतपूर्व गतिसे किया जाता है ।

६८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६८६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| किञ्चान्यत् “ब्रह्मा विश्वसृजो<br>सकामानां नित्य- धर्मो महानव्यक्त-<br>कर्मणां फलम् मेव च । उत्तमां<br>सात्त्विकीमेतां गतिमाहुर्मनी-<br>षिणः” इति च देवसार्ष्टिव्यति-<br>रेकेण भूताप्ययं दर्शयति “भूता-<br>न्यप्येति पञ्च वै”। भूतान्यत्ये-<br>तीति पाठं ये कुर्वन्ति, तेषां वेद-<br>विषये परिच्छिन्नबुद्धित्वाददोषः। | इसके सिवा दूसरी बात यह भी कही है कि “ब्रह्मा, विश्वस्रष्टा ( प्रजापति ), धर्म, महत्तत्त्व और अव्यक्त-इन्हें विचारवान् पुरुष उत्तम सात्त्विकी गति बतलाते हैं ।¹” तथा “पाँच भूतोंमें लीन हो जाता है” यह स्मृति देवसार्ष्टिसे भूतोंमें लय होनेको पृथक् दिखलाती है । जो लोग यहाँ 'भूतान्यप्येति' के स्थानमें 'भूतान्यत्येति' ( भूतोंको पार कर जाता है ) ऐसा पाठ करते हैं, उनकी बुद्धि ही वेदके विषयमें सङ्कुचित है, अतः उनका कोई दोष नहीं है । | | न चार्थवादत्वमध्यायस्य<br><br>ब्रह्मान्तकर्मविपाकार्थस्य तद्व्यति-<br>रिक्तात्मज्ञानार्थस्य च कर्मकाण्डो-<br>पनिषद्द्वयां तुल्यार्थत्वदर्शनात् ।<br><br>विहिताकरणप्रतिषिद्धकर्मणां च<br><br>स्थावरश्वसूकरादिफलदर्शनात्,<br><br>वान्ताश्यादिप्रेतदर्शनाच्च । | ब्रह्मलोकपर्यन्त कर्मविपाक जिसका विषय है तथा उससे भिन्न जो आत्मज्ञान है, वह जिसका प्रयोजन है, ऐसे इस अध्यायको अर्थवाद भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि कर्मकाण्ड और उपनिषद् इन दोनोंसे इसकी समानार्थता देखी जाती है । तथा विहित कर्मोंके न करने और प्रतिषिद्धोंके करनेका फल स्थावर एवं श्वान-सूकरादि योनियोंकी प्राप्ति देखा जाता है और उन्हें वमन भक्षण करनेवाले आदि प्रेत होते भी देखा जाता है । |


१. इससे यह सिद्ध होता है कि ज्ञानयुक्त नित्य कर्मोंका फल संसार ही है, अवश्य ही है वह सात्त्विक ।
२. इष्टदेवके समान ऐश्वर्यप्राप्ति ।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६८७

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६८७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
न च श्रुतिस्मृतिविहितप्रतिषिद्धव्यतिरेकेण विहितानि वा प्रतिषिद्धानि वा कर्माणि केनचिदवगन्तुं शक्यन्ते, येषामकरणादनुष्ठानाच्च प्रेतश्वसूकरस्थावरादीनि कर्मफलानि प्रत्यक्षानुमानाभ्यामुपलभ्यन्ते; न चैषां कर्मफलत्वं केनचिदभ्युपगम्यते । तस्माद्विहिताकरणप्रतिषिद्धसेवांनां यथैते कर्मविपाकाः प्रेततिर्यक्स्थावरादयः, तथोत्कृष्टेष्वपि ब्रह्मान्तेषु कर्मविपाकत्वं वेदितव्यम् । तस्मात् 'स आत्मनो वपामुदखिदत्' 'सोऽरोदीत्' इत्यादिवन्नाभूतार्थवादत्वम् !और श्रुति-स्मृतिद्वारा जो विहित एवं प्रतिषिद्ध कर्म हैं, उनके सिवा दूसरे विहित अथवा प्रतिषिद्ध कर्मोंका किसीको भी ज्ञान नहीं हो सकता, जिनके न करने और करनेसे प्रत्यक्ष एवं अनुमानद्वारा प्रेत, श्वान, सूकर एवं स्थावरादि कर्मफल प्राप्त होते हैं। उनके कर्मफलोंकी कोई कल्पना ही कर लेता हो—ऐसी बात नहीं है। अतः जिस प्रकार विहित कर्मोंके न करने और प्रतिषिद्धोंके करनेके ये प्रेत, तिर्यक् एवं स्थावरादि कर्मफल हैं, उसी प्रकार ब्रह्मापर्यन्त उत्कृष्ट पदोंको भी कर्मफल ही समझना चाहिये। अतः 'स आत्मनो वपामुदखिदत्' [१] 'सोऽरोदीत्' [२] इत्यादि प्रकरणोंके समान इस अध्यायकी अभूतार्थवादता नहीं है।
तत्राप्यभूतार्थवादत्वं माभूदिति चेत् ? भवत्वेवम्; न चैतावता अस्य न्यायस्य बाधो भवति; न चास्मत्पक्षो वा दुष्यति, न च "ब्रह्मा विश्वसृजः" इत्यादीनां काम्यकर्मफलत्वं शक्यं वक्तुम्, तेषां देवसार्ष्टितायाः फलस्योक्तत्वात् ।यदि कहो कि इन प्रकरणोंमें भी अभूतार्थवादता नहीं माननी चाहिये तो ऐसा ही सही; किंतु इतनेहीसे इस न्यायका बाध नहीं होता और न हमारा पक्ष ही दूषित होता है। "ब्रह्मा विश्वसृजः" इत्यादिको काम्य कर्मोंका फल भी नहीं बतलाया जा सकता; क्योंकि उन काम्यकर्मोंका फल तो देवसार्ष्टिता बतलाया गया

१. उस (ब्रह्मा) ने अपना वीर्य पतन किया।
२. वह (रुद्र) रोया।

६८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६८८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| [ निष्कामानां नित्यकर्मणामात्मसंस्कारार्थत्वनिरूपणम् ]<br><br>तस्मात् साभिसन्धीनां नित्यानां कर्मणां सर्वमेधाश्वमेधादीनां च ब्रह्मत्वादीनि फलानि। | है। अतः ये ब्रह्मत्वादि फलाकाङ्क्षासहित नित्यकर्मोंके और सर्वमेध, अश्वमेधादि यज्ञोंके फल हैं। | | येषां पुनर्नित्यानि निरभिसन्धीन्यात्मसंस्कारार्थानि, तेषां ज्ञानोत्पत्त्यर्थानि तानि। "ब्राह्मीयं क्रियते तनुः" इति स्मरणात् तेषामारादुपकारकत्वान्मोक्षसाधनान्यपि कर्माणि भवन्तीति न विरुध्यते। यथा चायमर्थः षष्ठे जनकाख्यायिकासमाप्तौ वक्ष्यामः। | किंतु जिनके फलाशाशून्य नित्यकर्म चित्तशुद्धिके लिये होते हैं, उनके वे ज्ञानोत्पत्तिके कारण होते हैं, जैसा कि "यह शरीर ब्रह्मभावकी प्राप्तिके योग्य किया जाता है" इस स्मृतिसे प्रमाणित होता है। उन (मुमुक्षुओं) के समीपसे उपकारक होनेके कारण वे कर्म मोक्षके भी साधन होते हैं, इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं है। यह किस प्रकार मोक्षका साधन है, यह बात हम छठे [अर्थात् इस उपनिषद्के चौथे] अध्यायमें जनकाख्यायिकाकी समाप्तिमें कहेंगे। | | यत्तु विषदध्यादिवादित्युक्तम्, तत्र प्रत्यक्षानुमानविषयत्वादविरोधः। यस्तु अत्यन्तशब्दगम्योऽर्थः, तत्र वाक्यस्याभावे तदर्थप्रतिपादकस्य न शक्यं कल्पयितुं विषदध्यादिसाधर्म्यम्। | ऊपर जो विष और दधि आदिके समान—ऐसा कहा है, सो वे (मन्त्र एवं शर्करादियुक्त विष और दधि आदि) तो प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणके विषय हैं, इसलिये उनके विषयसे वैसा कहनेमें कोई विरोध नहीं है। परंतु जो विषय सर्वथा शब्दसे ही जाना जा सकता है, उसके विषयमें उस अर्थका प्रतिपादन करनेवाला कोई वाक्य न होनेके कारण उसका विष एवं दधि आदिसे साधर्म्य नहीं कल्पना किया जा सकता। |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६८९

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६८९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
न च प्रमाणान्तरविरुद्धार्थविषये श्रुतेः प्रामाण्यं कल्प्यते, यथा शीतोऽग्निः क्लेदयतीति। श्रुते तु तादर्थ्ये वाक्यस्य प्रमाणान्तरस्य आभासत्वम्। यथा खद्योतोऽग्निरिति, तलमलिनमन्तरिक्षमिति बालानां यत् प्रत्यक्षमपि तद्विषय-प्रमाणान्तरस्य यथार्थत्वे निश्चिते, निश्चितार्थमपि बालप्रत्यक्षम् आभासीभवति।और जो विषय प्रमाणान्तरसे विरुद्ध है, उसमें श्रुतिप्रामाण्यकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, जैसे कोई कहे कि 'अग्नि शीतल होता है और भिगो देता है।'¹ वाक्यका वैसा अर्थ यदि श्रुतिसम्मत हो तो अन्य प्रमाण प्रमाणाभास हो जाते हैं। जैसे मूर्खोंको यह प्रत्यक्ष होता है कि खद्योत अग्नि है, अन्तरिक्षका तल मलिन होता है; तथापि उनके विषयमें यथार्थताका प्रमाणान्तरसे निश्चय हो जानेपर वह मूर्खोंद्वारा प्रत्यक्ष किया हुआ निश्चित अर्थ भी मिथ्या हो जाता है।
(प्रकरणार्थ-निर्धारणम्) तस्माद् वेदप्रामाण्यस्याव्यभिचारात्तादर्थ्ये सति वाक्यस्य तथात्वं स्यात्, न तु पुरुषमतिकौशलम्। न हि पुरुषमतिकौशलात् सविता रूपं न प्रकाशयति। तथा वेदवाक्यानिअतः वेदके प्रामाण्यका सर्वदा अव्यभिचार होनेके कारण उसका वैसा तात्पर्य होनेपर ही वाक्यकी यथार्थता होती है, केवल मनुष्यकी बुद्धिका कौशल ही वाक्यार्थका निर्णय नहीं कर सकता।² पुरुषकी बुद्धिके कौशलसे ही यह सिद्ध नहीं हो सकता कि सूर्य प्रकाश नहीं करता। इसी प्रकार वेदवाक्योंका भी

१. यह बात प्रत्यक्ष प्रमाणसे विरुद्ध है, इसलिये यदि कोई ऐसा वाक्य हो तो वह प्रमाण नहीं माना जा सकता।
२. तात्पर्य यह है कि उपक्रम और उपसंहारादि लिङ्गोंसे जिस वाक्यका जैसा तात्पर्य होता है, वही प्रमाणभूत माना जाता है, केवल बुद्धिकौशलसे कल्पना किया हुआ अर्थ प्रामाणिक नहीं होता।

बृ० उ० ४४—

६९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६९०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| श्रापि नान्यार्थानि भवन्ति तस्मान्न मोक्षार्थानि कर्माणीति सिद्धम् । अतः कर्मफलानां संसारत्वप्रदर्शनायैव ब्राह्मणमारभ्यते— | [विभिन्न बुद्धियोंके अनुसार] भिन्न-भिन्न अर्थ नहीं किया जा सकता अतः यह सिद्ध हुआ कि कर्मोंका फल मोक्ष नहीं है। अतः कर्मफलोंका संसारत्व प्रदर्शित करनेके लिये ही यह ब्राह्मण आरम्भ किया जाता है— |

पारिक्षित कहाँ रहे ?

अथ हैनँ भुज्युर्लाह्यायनिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । मद्रेषु चरकाः पर्यव्रजाम ते पतञ्चलस्य काप्यस्य गृहानैम तस्यासीद् दुहिता गन्धर्वगृहीता तमपृच्छाम कोऽसीति सोऽब्रवीत् सुधन्वाङ्गिरस इति तं यदा लोकानामन्तानपृच्छामाथैनमब्रूम क्व पारिक्षिता अभवन्निति क्व पारिक्षिता अभवन् स त्वा पृच्छामि याज्ञवल्क्य क्व पारिक्षिता अभवन्निति ॥ १ ॥

फिर इस याज्ञवल्क्यसे लाह्यायनि भुज्युने पूछा। वह बोला 'हे याज्ञवल्क्य ! हम व्रताचरण करते हुए मद्रदेशमें विचर रहे थे कि कपि-गोत्रोत्पन्न पतञ्चलके घर पहुँचे। उसकी पुत्री गन्धर्वसे गृहीत थी। [अर्थात् उसपर गन्धर्वका आवेश था] हमने उससे पूछा, 'तू कौन है?' वह बोला 'आङ्गिरस सुधन्वा हूँ।' जब उससे लोकोंके अन्तके विषयमें पूछा तो हमने उससे यों कहा, 'पारिक्षित कहाँ रहे ? पारिक्षित कहाँ रहे ?' सो हम तुमसे पूछते हैं कि 'पारिक्षित कहाँ रहे ?' ॥ १ ॥

| अथानन्तरम् उपरते जारत्कारवे, भुज्युरीति नामतो लह्यस्यापत्यं | फिर—इसके पश्चात् जरत्कारुपुत्र आर्तभागके चुप हो जानेपर भुज्युनामवाले |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६९१

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६९१


लाह्यस्तदपत्यं लाह्यायनिः पप्रच्छ ।<br>याज्ञवल्क्येति होवाच ।लाह्यायनि–लाह्यके पुत्रको लाह्य कहते हैं, उसके पुत्र लाह्यायनिने पूछा । उसने कहा, 'हे याज्ञवल्क्य !'
आदावुक्तमश्वमेधदर्शनम्;<br>समष्टिव्यष्टि फलश्चाश्वमेधक्रतुः,<br>ज्ञानसमुच्चितो वा केवलज्ञान-<br>सम्पादितो वा, सर्वकर्मणां परा<br>काष्ठा; भ्रूणहत्याश्वमेधाभ्यां न<br>परं पुण्यपापयोरिति हि स्मरन्ति;<br>तेन हि समष्टिव्यष्टीश्च प्राप्नोति;<br>तत्र व्यष्टयो निर्ज्ञाता अन्तरण्ड-<br>विषया अश्वमेधयागफलभूताः;<br>'मृत्युरास्यात्मा भवत्येतासां<br>देवतानामेका भवति' ( १ ।<br>२ । ७ ) इत्युक्तम् ।[ इस उपनिषद्के ] आरम्भमें अश्वमेधदर्शन कहा गया है । अश्वमेध यज्ञ समष्टि और व्यष्टि फल देनेवाला है । वह ज्ञानसमुच्चित हो अथवा केवल ज्ञानसम्पादित हो समस्त कर्मोंकी पराकाष्ठा है । भ्रूणहत्यासे बढ़कर कोई पाप और अश्वमेधसे बढ़कर कोई पुण्य नहीं है—ऐसी स्मृति है । उस ( अश्वमेध ) के द्वारा ही पुरुष समष्टि या व्यष्टि फलको प्राप्त करता है । उनमें जो अश्वमेधयागके फलभूत [ अग्नि, वायु और आदित्यादि ] अण्डान्तर्गत देवता हैं, वे व्यष्टि जाने गये हैं तथा [ समष्टि देवताके विषयमें ] 'मृत्यु इसका आत्मा हो जाता है, यह इन देवताओंमेंसे कोई एक हो जाता है' ऐसा कहा है ।
मृत्युश्चाशनायालक्षणो बुद्ध्या-<br>त्मा समष्टिः प्रथमजो वायुः सूत्रं<br>सत्यं हिरण्यगर्भः; तस्य व्याकृतो<br>विषयः–यदात्मकं सर्वं द्वैतैकत्वम्।वह मृत्यु क्षुधारूप बुद्ध्यात्मा और समष्टि है, वह प्रथमोत्पन्न वायु, सूत्रात्मा, सत्य और हिरण्यगर्भ है । जितना भी सम्पूर्ण द्वैत ( व्यष्टि ) और एकत्व ( समष्टि ) है, उसका जो स्वरूपभूत है, वह व्याकृत उसका

६९२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ३

६९२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ३


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
यः सर्वभूतान्तरात्मा लिङ्गम् अमूर्तरसो यदाश्रितानि सर्वभूतकर्माणि, यः कर्मणां कर्मसम्बद्धानां च विज्ञानानां परा गतिः परं फलम्, तस्य कियान् गोचरः कियती व्याप्तिः सर्वतः परिमण्डलीभूता, सा वक्तव्या; तस्याम् उक्तायां सर्वः संसारो बन्धगोचर उक्तो भवति । तस्य च समष्टिव्यष्ट्यात्मदर्शनस्य अलौकिकत्वप्रदर्शनार्थमाख्यायिकामात्मनो वृत्तां प्रकुरुते; तेन च प्रतिवादिबुद्धिं व्यामोहयिष्यामीति मन्यते ।विषय है । जो समस्त भूतोंका अन्तरात्मा, लिङ्ग और अमूर्तरस है, सम्पूर्ण भूत जिसके आश्रित हैं, जो कर्मों और कर्मोंसे सम्बद्ध विज्ञानोंकी परा गति और परम फल है, उसका कितना विषय है—सब ओरसे मण्डलाकार फैली हुई कितनी व्याप्ति है—यह बतलानी चाहिये; उसे बतला दिये जानेपर बन्धका विषयभूत सारा संसार बता दिया जायगा। उस समष्टि-व्यष्टिरूप दर्शनका अलौकिकत्व प्रदर्शित करनेके लिये भुज्यु अपने साथ बीती हुई आख्यायिका कहता है और समझता है कि इससे मैं अपने प्रतिवादीकी बुद्धिमें व्यामोह पैदा कर दूँगा ।
मद्रेषु मद्रा नाम जनपदास्तेषु, चरका अध्ययनार्थं व्रतचरणाच्चरका अध्वर्यवो वा, पर्यब्रजाम पर्यटितवन्तः; ते पतञ्चलस्य—ते वयं पर्यटन्तः, पतञ्चलस्य नामतः, काप्यस्य कपिगोत्रस्य, गृहान् ऐम गतवन्तः । तस्यासीद् दुहिता गन्धर्वगृहीता—गन्धर्वेण अमानुषेण सत्त्वेन केनचिदाविष्टा; गन्धर्वो वा धिष्ण्योऽग्निकर्त्विग्देवता विशिष्टविज्ञानत्वादव-हम मद्रोंमें—मद्र नामके जो देश हैं, उनमें, चरक—अध्ययनके लिये व्रताचरण करनेसे चरक अथवा अध्वर्यु होकर विचर रहे थे; वे हम विचरते-विचरते काप्य—कपिगोत्रोत्पन्न पतञ्चल नामवाले पुरुषके यहाँ पहुँचे । उसकी पुत्री गन्धर्व-गृहीता थी—गन्धर्व अर्थात् किसी अमानवजीवसे आविष्ट थी । अथवा विशिष्ट ज्ञानवान् होनेसे 'गन्धर्व' शब्दसे धिष्ण्य यानी गृह्य अग्नि ऋत्विग्देवता निश्चय किया

ब्राह्मण ३ ] \hfill शाङ्करभाष्यार्थ \hfill ६९३

ब्राह्मण ३ ] \hfill शाङ्करभाष्यार्थ \hfill ६९३


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
सीयते; न हि सत्त्वमात्रस्येदृशं विज्ञानमुपपद्यते ।जाता है; क्योंकि केवल किसी जीवमात्रका ऐसा ज्ञान होना सम्भव नहीं है।
तं सर्वे वयं परिवारिताः सन्तोऽपृच्छाम—कोऽसीति, कस्त्वमसि किन्नामा किंसत्त्वः । सोऽब्रवीद् गन्धर्वः—सुधन्वा नामतः, आङ्गिरसो गोत्रतः । तं यदा यस्मिन् काले लोकानामन्तान् पर्यवसानानि अपृच्छाम अथैनं गन्धर्वमब्रूम—भुवनकोशपरिमाणज्ञानाय प्रवृत्तेषु सर्वेष्वात्मानं श्लाघयन्तः पृष्टवन्तो वयम्; कथम् ? क्व पारिक्षिता अभवन्निति ।हम सबने उसे चारों ओरसे घेरकर पूछा, 'तुम कौन हो ? तुम्हारा क्या नाम है और क्या स्वरूप है?' उस गन्धर्वने कहा, 'नामसे मैं सुधन्वा हूँ और गोत्रसे आङ्गिरस हूँ।' फिर जब उससे लोकोंके अन्त यानी पर्यवसानके विषयमें पूछा तो हमने उस गन्धर्वसे कहा, अर्थात् भुवनकोशका परिमाण जाननेके लिये प्रवृत्त होनेपर हम सबने अपनी प्रशंसा करते हुए पूछा। किस प्रकार पूछा—'पारिक्षित कहाँ रहे ?'
स च गन्धर्वः सर्वमस्मभ्यमब्रवीत् । तेन दिव्येभ्यो मया लब्धं ज्ञानम्, तत्तव नास्ति, अतो निगृहीतोऽसि, इत्यभिप्रायः । सोऽहं विद्यासम्पन्नो लब्धागमो गन्धर्वात् त्वा त्वां पृच्छामि याज्ञवल्क्य—क्वपारिक्षिता अभवन्—तत् त्वं किं जानासि ? हे याज्ञवल्क्य 'कथय क्व पृच्छामि पारिक्षिता अभवन्निति ॥ १ ॥और उस गन्धर्वने हमें सब बातें बता दीं। अतः मैंने दिव्य जीवोंसे ज्ञान प्राप्त किया है, वह तुमको प्राप्त नहीं है; इसलिये अब तुम हरा दिये गये—ऐसा इसका अभिप्राय है। मैं विद्यासम्पन्न हूँ और मुझे गन्धर्वसे शास्त्रज्ञान प्राप्त हुआ है, वही मैं तुमसे पूछता हूँ कि हे याज्ञवल्क्य ! क्या तुम जानते हो कि पारिक्षित कहाँ रहे ? हे याज्ञवल्क्य ! बताओ, मैं पूछता हूँ कि पारिक्षित कहाँ रहे ? ॥ १ ॥

६९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६९४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

पारिक्षितोंकी गतिका वर्णन

स होवाचोवाच वै सोऽगच्छन् वै ते तद्यत्राश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति क्व न्वश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति द्वात्रिँशतं वै देवरथाह्न्यान्त्ययं लोकस्तँ समन्तं पृथिवी द्विस्तावत् पर्येति ताँ समन्तं पृथिवी द्विस्तावत् समुद्रः पर्येति तद्यावती क्षुरस्य धारा यावद्वा मक्षिकायाः पत्रं तावानन्तरेणाकाशस्तानिन्द्रः सुपर्णो भूत्वा वायवे प्रायच्छत्तान् वायुरात्मनि धित्वा तत्रागमयद्यत्राश्वमेधयाजिनोऽभवन्नित्येवमिव वै स वायुमेव प्रशशँस तस्माद्वायुरेव व्यष्टिर्वायुः समष्टिरप पुनर्मृत्युं जयति य एवं वेद ततो ह भुज्युर्लाह्यायनिरुपरराम ॥ २ ॥

उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'उस गन्धर्वने निश्चय यह कहा था कि वे वहाँ चले गये, जहाँ अश्वमेध यज्ञ करनेवाले जाते हैं।' [भुज्यु] 'अच्छा तो, अश्वमेधयाजी कहाँ जाते हैं?' [ याज्ञवल्क्य-] 'यह लोक बत्तीस देवरथाह्न्य है। उसे चारों ओरसे दूनी पृथिवी घेरे हुए है। उस पृथिवीको सब ओरसे दूना समुद्र घेरे हुए है। सो जितनी पतली छुरेकी धार होती है, अथवा जितना सूक्ष्म मक्खीका पंख होता है, उतना उन अण्डकपालोंके मध्यमें आकाश है। इन्द्र (चित्य अग्नि) ने पक्षी होकर उन पारिक्षितोंको वायुको दिया। उन्हें वायु अपने स्वरूपमें स्थापित कर वहाँ ले गया, जहाँ अश्वमेधयाजी रहते हैं; इस प्रकार उस गन्धर्वने वायुकी ही प्रशंसा की थी। अतः वायु ही व्यष्टि है और वायु ही समष्टि है। जो ऐसा जानता है, वह पुनर्मृत्युको जीत लेता है।' तब लाह्यायनि भुज्यु चुप हो गया ॥ २॥

संस्कृतहिन्दी
स होवाच याज्ञवल्क्यः, उवाच<br><br>वै सः—वैशब्दः स्मरणार्थः—<br><br>उवाच वै स गन्धर्वस्तुभ्यम् ।उस याज्ञवल्क्यने कहा—'उसने निश्चय यही कहा था'—यहाँ 'वै' शब्द स्मरणके लिये है—उस गन्धर्वने निश्चय तुमसे यही कहा था कि वे

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९५

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९५


अगच्छन् वै ते पारिक्षिताः, तत् तत्र; क्व ? यत्र यस्मिन्नश्वमेधयाजिनो गच्छन्ति, इति निर्णीते प्रश्ने आह-क्व नु कस्मिन्नश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति । तेषां गतिविवक्षया भुवनकोशपरिमाण माह—पारिक्षित वहाँ चले गये। कहाँ ?-जहाँ अर्थात् जिस लोकमें अश्वमेधयाजी जाते हैं—इस प्रकार प्रश्नका निर्णय हो जानेपर भुज्यु बोला—'कहाँ अर्थात् किस लोकमें अश्वमेधयाजी जाते हैं?' तब याज्ञवल्क्य उनकी गति बतलानेकी इच्छासे भुवनकोशका परिमाण बताते हैं—
द्वात्रिंशतं वै, द्वे अधिके त्रिंशद् द्वात्रिंशतं वै, देवरथाह्नानि—देव आदित्यस्तस्य रथो देवरथस्तस्य रथस्य गत्या अह्ना यावत् परिच्छिद्यते देशपरिमाणं तद् देवरथाह्न्यम्, तद् द्वात्रिंशद्गुणितं देवरथाह्नानि, तावत्परिमाणोऽयं लोको लोकालोकगिरिणा परिक्षिप्तः; यत्र वैराजं शरीरं यत्र च कर्मफलोपभोगः प्राणिनां स एष लोकः; एतावाँल्लोकः, अतः परम् अलोकः ।यह लोक द्वात्रिंशत्—दो अधिक तीस अर्थात् बत्तीस देवरथाह्न्य है। देव है आदित्य (सूर्य) उसका रथ ही देवरथ है, उस रथकी गतिसे एक दिनमें संसारका जितना भाग मापा जाता है, उतना देवरथाह्न्य कहलाता है, उसको बत्तीसगुना करनेपर बत्तीस देवरथाह्न्य होते हैं। लोकालोकपर्वतसे घिरा हुआ यह लोक इतने परिमाणवाला है; जहां वैराज शरीर है और जिसमें प्राणियोंके कर्मफलका उपभोग होता है, वह यही लोक है। इतना तो लोक है; इससे आगे अलोक है।
तं लोकं समन्तं समन्ततः लोकविस्ताराद् द्विगुणपरिमाणविस्तारेण परिमाणेन, तं लोकं परिक्षिप्ता पर्येति पृथिवी; तां पृथिवीं तथैव समन्तम्, द्विस्तावद्उस लोकको चारों ओरसे लोकविस्तारकी अपेक्षा दूने परिमाणके विस्तारवाले परिमाणसे पृथिवी घेरे हुए है। इसी प्रकार उस पृथिवीको उससे दूने परिमाणसे सब ओरसे

६०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

६०६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| द्विगुणेन परिमाणेन समुद्रः पर्यति, यं घनोदमाचक्षते पौराणिकाः ।<br><br>तत्र अण्डकपालयोर्विवर-परिमाणमुच्यते, येन विवरेण मार्गेण बहिर्निर्गच्छन्तौ व्याप्नु-वन्त्यश्वमेधयाजिनः । तत्र यावती यावत्परिमाणा क्षुरस्य धारा अग्रम्, यावद्वा सौक्ष्म्येण युक्तं मक्षिकायाः पत्रम्, तावां-स्तावत्परिमाणः, अन्तरेण मध्ये अण्डकपालयोः, आकाश-श्छिद्रम्, तेनाकाशेनेत्येतत् ।<br><br>तान् पारिक्षितानश्वमेधया-जिनः प्राप्तानिन्द्रः परमेश्वरः— योऽश्वमेधेऽग्निश्चितः, सुपर्णः— यद्विषयं दर्शनमुक्तम्—'तस्य प्राची दिक्शिरः' इत्यादिना, सुपर्णः पक्षी भूत्वा पक्षपुच्छा-द्यात्मकः सुपर्णो भूत्वा, वायवे प्रायच्छत्—मूर्तत्वान्नास्त्यात्मनो गतिस्तत्रेति; तान् पारिक्षितान् वायुरात्मनि धित्वा स्थापयित्वा स्वात्मभूतान् कृत्वा तत्र तस्मिन्न-गमयत्;क्व ? यत्र पूर्वेऽतिक्रान्ताः पारिक्षिता अश्वमेधयाजिनोऽभव- | समुद्र घेरे हुए है, जिसे पौराणिक 'घनोद' कहते हैं।<br><br>अब अण्डकपालोंके छिद्रका परिमाण बतलाया जाता है, जिस छिद्ररूप मार्गसे बाहर जानेवाले अश्वमेधयाजी व्याप्त होते हैं। जितनी अर्थात् जितने परिमाणवाली छुरेकी धार होती है, यानी जितना छुरेका अग्रभाग होता है, अथवा जितनी सूक्ष्मतासे युक्त मक्खीका पंख होता है, उतने परिमाणवाला अण्डकपालोंके मध्यमें आकाश-छिद्र होता है। उस आकाशसे [वे जाते हैं]—ऐसा इसका तात्पर्य है।<br><br>उन प्राप्त हुए पारिक्षितों—अश्वमेधयाजियोंको इन्द्र—परमेश्वर-ने—जो अश्वमेधयागमें चयन किया हुआ अग्नि ही है, सुपर्ण होकर जिसके विषयमें कि 'उसका प्राची दिशा शिर है' इत्यादि मन्त्र-से दृष्टि करना बताया गया है, सुपर्ण—पक्षी होकर अर्थात् पंख और पूँछवाला पक्षी होकर वायुको दे दिया, क्योंकि मूर्त होनेके कारण उसे वहाँ अपनी गति दिखायी नहीं देती; उन पारिक्षितोंको वायुने अपनेमें स्थापित कर—उन्हें अपने स्वरूपभूत कर वहाँ पहुँचा दिया। कहाँ?—जहाँ पूर्ववर्ती अर्थात् अतीत पारिक्षित—अश्वमेधयाजी रहे। इस |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९७

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९७


न्निति। एवमिव वै—एवमेव स गन्धर्वो वायुमेव प्रशंसंस पारिक्षितान् गतिम्।प्रकार उस गन्धर्वने पारिक्षितोंकी गतिरूप वायुकी ही प्रशंसा की थी।
समाप्ता आख्यायिका। आख्यायिकानिर्वृत्तं त्वर्थमाख्यायिकातोऽपसृत्य स्वेन श्रुतिरूपेणैव आचष्टेऽस्मभ्यम्; यस्माद्वायुः स्थावरजङ्गमानां भूतानामन्तरात्मा, बहिश्च स एव, तस्मादध्यात्मधिभूताधिदैवभावेन विविधा या अष्टिव्र्याप्तिः स वायुरेव—तथा समष्टिः केवलेन सूत्रात्मना वायुरेव। एवं वायुमात्मानं समष्टिव्यष्टिरूपात्मकत्वेनोपगच्छति यः—एवं वेद।आख्यायिका तो समाप्त हुई। आख्यायिकासे सिद्ध होनेवाला जो अर्थ है, उसे आख्यायिकासे निकाल-कर अपने श्रुतिरूपसे ही बतलाते हैं; क्योंकि वायु ही स्थावर-जङ्गम प्राणियोंका अन्तरात्मा है और वही बाहर भी है, अतः अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवभावसे जो भी विविध प्रकारकी अष्टि (व्यष्टि) यानी व्याप्ति है, वह वायु ही है तथा केवल सूत्ररूपसे वायु ही समष्टि है। इस प्रकार जो ऐसा जानता है, वह समष्टि-व्यष्टिभावसे अपने स्वरूपभूत वायुको ही प्राप्त होता है।
तस्य किं फलमित्याह—अप पुनर्मृत्युं जयति, सकृन्मृत्वा पुनर्न म्रियते। तत आत्मनः प्रश्ननिर्णयाद् भुज्युर्लाह्यायनि-रुपरराम ॥ २ ॥उसे क्या फल मिलता है सो बतलाते हैं—वह अपमृत्यु—पुन-र्मृत्युको जीत लेता है अर्थात् एक बार मरकर फिर नहीं मरता। तब अपने प्रश्नका निर्णय हो जानेसे लाह्यका पुत्र भुज्यु चुप हो गया ॥ २ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये तृतीयं भुज्युब्राह्मणम् ॥ ३ ॥

चतुर्थ ब्राह्मण

चतुर्थ ब्राह्मण

याज्ञवल्क्य-उषस्त-संवाद

| अथ हैनमुषस्तश्चाक्रायणः पप्रच्छ। पुण्यपापप्रयुक्तैर्ग्रहातिग्रहैर्गृहीतः पुनः पुनर्ग्रहातिग्रहांस्त्यजन् उपाददत् संसरतीत्युक्तम्। पुण्यस्य च पर उत्कर्षो व्याख्यातो व्याकृतविषयः समष्टिव्यष्टिरूपो द्वैतैकत्वात्मप्राप्तिः।<br><br>यस्तु ग्रहातिग्रहैर्ग्रस्तः संसरति, सोऽस्ति वा नास्ति ? अस्तित्त्वे च किंलक्षणः ? — इत्यात्मन एव विवेकाधिगमायोषस्तप्रश्न आरभ्यते। तस्य च निरुपाधिस्वरूपस्य क्रियाकारकविनिर्मुक्तस्वभावस्य अधिगमाद् यथोक्ताद् बन्धनाद् विमुच्यते सप्रयोजकात्; आख्यायिकासम्बन्धस्तु प्रसिद्धः॥ | 'अथ हैनमुषस्तश्चाक्रायणः पप्रच्छ' पहले यह कहा जा चुका है कि पुण्य-पापप्रयुक्त ग्रहातिग्रहोंसे गृहीत हुआ पुरुष पुनः-पुनः ग्रहातिग्रहोंको त्यागता और ग्रहण करता हुआ संसारको प्राप्त होता है। तथा पुण्यके परम उत्कर्षकी भी व्याख्या कर दी गयी, जो व्याकृतविषयक समष्टि-व्यष्टिरूप द्वैत और एकत्वभावको प्राप्त होना है।<br><br>[ अब प्रश्न होता है कि ] जो ग्रह और अतिग्रहोंसे ग्रस्त होकर संसारको प्राप्त होता है, वह है या नहीं और यदि है तो किन लक्षणोंवाला है ? इस प्रकार आत्माका ही विवेक करनेके लिए उषस्तका प्रश्न आरम्भ किया जाता है। उस निरुपाधिस्वरूप क्रियाकारकविनिर्मुक्तस्वभाव आत्माका साक्षात्कार होनेपर ही पुरुष प्रयोजकसहित उपर्युक्त बन्धनसे मुक्त होता है। आख्यायिकाका सम्बन्ध तो प्रसिद्ध ही है। |

सर्वान्तर आत्माका निरूपण

अथ हैनमुषस्तश्चाक्रायणः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ६९९

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ६९९

व्याचक्ष्वेत्येष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो यः प्राणेन प्राणिति स त आत्मा सर्वान्तरो योऽपानेनापानीति स त आत्मा सर्वान्तरॊ यो व्यानेन व्यानीति स त आत्मा सर्वान्तरो य उदानेनोदानिति स त आत्मा सर्वान्तर एष त आत्मा सर्वान्तरः ॥ १ ॥

फिर उस याज्ञवल्क्यसे चाक्रायण उषस्तने पूछा। वह बोला, 'हे याज्ञवल्क्य ! जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर आत्मा है, उसकी मेरे प्रति व्याख्या करो।' [ याज्ञवल्क्य-] 'यह तेरा आत्मा ही सर्वान्तर है।' [उषस्त] 'याज्ञवल्क्य ! वह सर्वान्तर कौन-सा है ?' [याज्ञवल्क्य—] 'जो प्राणसे प्राणक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है; जो अपानसे अपानक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है; जो व्यानसे व्यानक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है; जो उदानसे उदानक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है। यह तेरा आत्मा सर्वान्तर है' ॥ १ ॥

| अथ हैनं प्रकृतं याज्ञवल्क्यम्, <br><br> उषस्तो नामतः; चक्रस्यापत्यं <br><br> चाक्रायणः, पप्रच्छ । यद् ब्रह्म <br><br> साक्षाद् अव्यवहितं केनचिद् द्रष्टु- <br><br> रपरोक्षाद् अगौणम् न श्रोत्र- <br><br> ब्रह्मादिवत्, किं तत् ? य आत्मा <br><br> आत्मशब्देन प्रत्यगात्मोच्यते, <br><br> तत्र आत्मशब्दस्य प्रसिद्धत्वात् , | फिर इस प्रकृत याज्ञवल्क्यसे जो नामसे उषस्त था उस चाक्रायण— <br><br> चक्रके पुत्रने पूछा, 'जो ब्रह्म साक्षात् किसी भिन्न वस्तुसे व्यवधानको न प्राप्त हुआ और द्रष्टासे अपरोक्ष— <br><br> अगौण है, ( 'श्रोत्रं ब्रह्म मनो ब्रह्म' इत्यादि वाक्यमें कहे हुए ) श्रोत्र- <br><br> ब्रह्मादिके समान नहीं है, वह क्या है ? जो आत्मा है—यहाँ 'आत्मा' <br><br> शब्दसे प्रत्यगात्मा कहा गया है, क्योंकि इसी अर्थमें 'आत्मा' शब्द |