भारतकोश
संग्रह पर लौटें

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४९

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४९


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
अथ यदा सुषुप्तो भवति--यदा स्वप्नयया चरति, तदाप्ययं विशुद्ध एव। अथ पुनर्यदा हित्वा दर्शनवृत्तिं स्वप्नं यदा यस्मिन्काले सुषुप्तः सुष्ठु सुप्तः सम्प्रसादं स्वाभाव्यं गतो भवति--सलिलमिवान्यसम्बन्धकालुष्यं हित्वा स्वाभाव्येन प्रसीदति। कदा सुषुप्तो भवति ? यदा यस्मिन्काले न कस्यचन न किञ्चनेत्यर्थः, वेद विजानाति; कस्यचन वा शब्दादेः सम्बन्धि वस्त्वन्तरं किञ्चन न वेदेत्यध्याहार्यम्; पूर्वं तु न्याय्यम्, सुप्ते तु विशेषविज्ञानाभावस्य विवक्षितत्वात्।'अथ यदा सुप्तो भवति'—जिस समय स्वप्नवृत्तिसे बर्तता है उस समय भी यह विशुद्ध ही होता है। इसके पश्चात् जब दर्शनवृत्तिरूप स्वप्नको त्याग कर जिस समय सुषुप्त—सम्यक् प्रकारसे सुप्त अर्थात् सम्प्रसाद—स्वाभाविक अवस्थाको प्राप्त हुआ होता है—जलके समान अन्य वस्तुके सम्बन्धसे प्राप्त हुई मलिनताको त्यागकर स्वभावतः प्रसन्न होता है। वह सुषुप्त कब होता है ?—जिस समय वह किसीके विषयमें नहीं अर्थात् कुछ भी नहीं जानता, अथवा कस्यचन—किसी शब्दादिके सम्बन्धवाली किसी अन्य वस्तुको नहीं जानता—ऐसा अध्याहार करना चाहिये। इनमें पहला अर्थ ही उचित है; क्योंकि यहाँ सोये हुए पुरुषके विशेष विज्ञानका अभाव बतलाना ही अभीष्ट है।
एवं तावद्विशेषविज्ञानाभावे सुषुप्तो भवतीत्युक्तम्। केन पुनः क्रमेण सुषुप्तो भवति? इत्युच्यते—इस प्रकार यहाँतक यह बतलाया गया कि विशेष विज्ञानके अभावमें पुरुष सुषुप्त होता है। वह किस क्रमसे सुषुप्त होता है, सो अब बतलाया जाता है—
हिता नाम हिता इत्येवंनाम्न्योहिता नाम—'हिता' इस नामवाली जो नाडियाँ अर्थात् अन्नके

बृ० उ० २६—

४५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४५०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| नाड्यः शिरा देहस्यान्नरसविपरिणामभूताः, ताश्च द्वासप्ततिः सहस्राणि, द्वे सहस्रे अधिके सप्ततिश्च सहस्राणि ता द्वासप्ततिःसहस्राणि, हृदयात्--हृदयं नाम मांसपिण्डः--तस्मान्मांसपिण्डात्पुण्डरीकाकारात् पुरीतातं हृदयपरिवेष्टनमाचक्षते, तदुपलक्षितं शरीरमिह पुरीत्तच्छब्देनाभिप्रेतम्--पुरीतमभिप्रतिष्ठन्त इति शरीरं कृत्स्नं व्याप्नुवन्त्योऽश्वत्थपर्णराजय इव बहिर्मुख्यः प्रवृत्ता इत्यर्थः । | रसकी विपरिणामभूता देहकी शिराएं हैं। वे 'द्वासप्ततिः सहस्राणि'—दो सहस्र अधिक सत्तर सहस्र अर्थात् बहत्तर सहस्र हैं, वे हृदयसे—हृदय नामका जो कमलके-से आकारवाला मांसपिण्ड है, उससे 'पुरीततम्'—पुरीतत् हृदयपरिवेष्टनको कहते हैं, यहाँ उससे उपलक्षित शरीर पुरीतत् शब्दसे अभिप्रेत है । अतः 'पुरीततमभिप्रतिष्ठन्ते' अर्थात् सम्पूर्ण शरीरको व्याप्त करती हुई बहिर्मुख होकर प्रवृत्त हैं, जैसे पीपलके पत्तेकी नसें बाहरकी ओर फैली रहती हैं । | | तत्र बुद्धेरन्तःकरणस्य हृदयं स्थानम्, तत्रस्थबुद्धितन्त्राणि चेतराणि बाह्यानि करणानि । तेन बुद्धिः कर्मवशाच्छ्रोत्रादीनि ताभिर्नाडीभिर्मत्स्यजालवत्कर्णशष्कुल्यादिस्थानेभ्यः प्रसारयति, प्रसार्य चाधितिष्ठति जागरितकाले । तां विज्ञानमयोऽभिव्यक्तस्वात्मचैतन्यावभासतया व्याप्नोति । सङ्कोचनकाले च तस्या अनुसङ्कुचति; सोऽस्य विज्ञानमयस्य स्वापः; जाग्रद्विकासानुभवो भोगः; | शरीरमें बुद्धि—अन्तःकरणका हृदय स्थान है, उसमें स्थित बुद्धिके अधीन अन्य बाह्य इन्द्रियाँ हैं । इसीसे बुद्धि कर्मवश श्रोत्रादि इन्द्रियोंको मत्स्यजालके समान उन नाडियोंद्वारा कर्णरन्ध्रादि स्थानोंसे बाहर फैलाती है, तथा उन्हें फैलाकर जागरित-अवस्था में उनकी अध्यक्ष होकर स्थित रहती है । उस बुद्धिको विज्ञानमय आत्मा अभिव्यक्तस्वात्मचैतन्यप्रकाशरूपसे व्याप्त कर लेता है, तथा संकुचित होनेके समय उसीके साथ संकुचित हो जाता है; वही इस विज्ञानमयका सोना है और जाग्रत्कालिक विकासका अनुभव |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५१

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५१


| बुद्ध्युपाधिस्वभावानुविधायी हि सः, चन्द्रादिप्रतिबिम्ब इव जलाद्यनुविधायी। तस्मात्तस्या बुद्धेर्जाग्रद्विषयायास्ताभिर्नाडीभिः प्रत्यवसर्पणमनु प्रत्यवसृप्य पुरीतति शरीरे शेते तिष्ठति, तप्तमिव लोहपिण्डमविशेषेण संव्याप्याग्निवच्छरीरं संव्याप्य वर्तत इत्यर्थः। | इसका भोग है; जिस प्रकार चन्द्रादिका प्रतिबिम्ब [अपने आधारभूत] जलादिका अनुवर्तन करनेवाला होता है, उसी प्रकार वह बुद्धिरूप अपनी उपाधिके स्वभावका ही अनुवर्ती है। अतः उस जाग्रद्विषयिणी बुद्धिके व्यावर्तन (लौटने) के साथ-साथ वह उन नाड़ियोंद्वारा व्यावृत होकर पुरीतत्में—शरीरमें शयन करता—स्थित होता है, तात्पर्य यह है कि तपे हुए लोहपिण्डमें अग्निके समान वह सामान्यरूपसे शरीरमें व्याप्त होकर स्थित होता है।^१ | | स्वाभाविक एव स्वात्मनि वर्तमानोऽपि कर्मानुगतबुद्ध्यनुवृत्तित्वात्पुरीतति शेत इत्युच्यते। न हि सुषुप्तिकाले शरीरसम्बन्धोऽस्ति। "तीर्णो हि तदा सर्वान्शोकान्हृदयस्य" (४। ३। २२) इति हि वक्ष्यति। | वह अपने स्वाभाविक स्वरूपमें ही विद्यमान रहते हुए भी कर्मानुसारिणी बुद्धिका अनुवर्ती होनेके कारण 'शरीरमें शयन करता है' इस प्रकार कहा जाता है। सुषुप्तिकालमें उसका शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता। "उस समय वह हृदयके सारे शोकोंको पार कर लेता है" ऐसा श्रुति कहेगी भी। | | सर्वसंसारदुःखवियुक्ता इयमवस्थेत्यत्र दृष्टान्तः—स यथा | यह अवस्था संसारके सारे दुःखोंसे रहित है—इस विषयमें यह दृष्टान्त दिया जाता है—वह जिस |


१. अर्थात् उसकी किसी स्थानविशेषमें विशेष अभिव्यक्ति नहीं रहती, बुद्धिके संकोचके साथ उसका भी संकोच हो जाता है; केवल सामान्य सत्तामात्रसे अपने शुद्धस्वरूपमें स्थित रहता है।

४५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २

४५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २

संस्कृतहिन्दी
कुमारो वा अत्यन्तबालो वा, महाराजो वात्यन्तवश्यप्रकृतिर्यथोक्तकृत्, महाब्राह्मणो वा अत्यन्तपरिपक्वविद्याविनयसम्पन्नः, अतिघ्नीम्—अतिशयेन दुःखं हन्तीत्यतिघ्नी आनन्दस्यावस्था सुखावस्था तां प्राप्य गत्वा शयीतावतिष्ठेत।प्रकार कुमार—अत्यन्त छोटा बालक, अथवा जिसकी प्रजा अत्यन्त वशमें की हुई है, ऐसा कोई शास्त्रोक्त आचरण करनेवाला महाराज, अथवा अत्यन्त परिपक्व विद्या-विनय-सम्पन्न महाब्राह्मण 'अतिघ्नीम्'—जो अतिशयरूपसे दुःखका घात कर देती है ऐसी जो अतिघ्नी आनन्दकी अवस्था यानी सुखावस्था है, उसको प्राप्त होकर शयन करे अर्थात् स्थित हो।
एषां च कुमारादीनां स्वभावस्थानां सुखं निरतिशयं प्रसिद्धं लोके, विक्रियमाणानां हि तेषां दुःखं न स्वभावतः; तेन तेषां स्वाभाविक्यवस्था दृष्टान्तत्वेनोपादीयते प्रसिद्धत्वात्। न तेषां स्वाप एवाभिप्रेतः, स्वापस्य दार्ष्टान्तिकत्वेन विवक्षितत्वाद्विशेषाभावाच्च। विशेषे हि सति दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकभेदः स्यात्; तस्मान्न तेषां स्वापो दृष्टान्तः।अपने स्वभावमें स्थित इन कुमारादिका सुख लोकमें सबसे बढ़कर प्रसिद्ध है, उन्हें विकृत होनेपर ही दुःख होता है, स्वभावतः नहीं; अतः प्रसिद्ध होनेके कारण उनकी स्वाभाविक अवस्थाको दृष्टान्तरूपसे ग्रहण किया जाता है। यहाँ केवल उनकी सुषुप्तावस्थासे ही अभिप्राय नहीं है; क्योंकि सुषुप्तावस्था तो दार्ष्टान्तिकरूपसे ही ग्रहण की गयी है, इसलिये फिर तो दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकमें कोई विशेषता ही नहीं रहेगी। और दृष्टान्त-दार्ष्टान्तिकका भेद किसी विशेषताके रहनेपर ही हो सकता है; इसलिये यहाँ उनकी सुषुप्ति दृष्टान्त नहीं है।

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५३


एवमेव यथायं दृष्टान्तः, एष विज्ञानमय एतच्छयनं शेते इति, एतच्छब्दः क्रियाविशेषणार्थः । एवमयं स्वाभाविके स्वे आत्मनि सर्वसंसारधर्मातीतो वर्तते स्वापकाल इति ॥१९॥इसी प्रकार, जैसा कि यह दृष्टान्त है, यह विज्ञानमय 'एतत् शेते'—इस शयनमें सोता है। यहाँ 'एतत्' शब्द क्रियाविशेषणार्थक है। अर्थात् इस प्रकार सुषुप्तावस्थामें यह अपने स्वाभाविक स्वरूपमें सारे सांसारिक धर्मोंसे अतीत होकर विद्यमान रहता है ॥ १६॥
[कुत एतदागादिति प्रश्नो मीमांस्यते]<br>क्वैष तदाभूदित्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनमुक्तम् । अनेन च प्रश्ननिर्णयेन विज्ञानमयस्य स्वभावतो विशुद्धिरसंसारित्वं चोक्तम्। कुत एतदागात् ? इत्यस्य प्रश्नस्यापाकरणार्थ आरम्भः ।'उस समय यह कहाँ था ?' इस प्रश्नका उत्तर कह दिया गया । इस प्रश्नके निर्णयसे ही विज्ञानमय आत्माकी स्वभावतः विशुद्धि और असंसारिता भी बतला दी गयी । अब 'यह कहाँसे आया ?' इस प्रश्नके निराकरणके लिये आरम्भ किया जाता है ।
ननु यस्मिन्ग्रामे नगरे वा यो भवति सोऽन्यत्र गच्छंस्तत एव ग्रामान्नगराद्वा गच्छति नान्यतः तथा सति क्वैष तदाभूदित्येतावानेवास्तु प्रश्नः । यत्राभूत्तत एवागमनं प्रसिद्धं स्यान्नान्यत इति कुत एतदागादिति प्रश्नो निरर्थक एव ।पूर्व०—जो पुरुष जिस ग्राम या नगरमें रहता है, वह अन्यत्र जाते समय उसी ग्राम या नगरसे जाता है, किसी अन्य स्थानसे नहीं । ऐसी स्थितिमें 'उस समय यह कहाँ था ?' बस, इतना ही प्रश्न हो सकता है । जहाँ वह था, वहींसे उसका आगमन प्रसिद्ध होगा, अन्य स्थानसे नहीं । इसलिये 'यह कहाँसे आया ?' यह प्रश्न निरर्थक ही है ।
किं श्रुतिरुपालभ्यते भवता ?सिद्धान्ती—क्या आप श्रुतिको उलाहना देते हैं ?
न ।पूर्व०—नहीं ।

| ४५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |

४५४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| किं तर्हि ?<br>द्वितीयस्य प्रश्नस्यार्थान्तरं श्रोतुमिच्छाम्यत आनर्थक्यं चादयामि। | **सिद्धान्ती—**तो फिर क्या बात है?<br>**पूर्व०—**मैं दूसरे प्रश्नका कोई और अर्थ सुनना चाहता हूँ, इसी लिये इसकी व्यर्थताकी शङ्का करता हूँ। | | एवं तर्हि कुत इत्यपादानार्थता न गृह्यते; अपादानार्थत्वे हि पुनरुक्तता, नान्यार्थत्वे। अस्तु तर्हि निमित्तार्थः प्रश्नः—कुत एतदागात् किंनिमित्तमिहागमनम् ? इति। | **एकदेशी—**अच्छा, तो फिर ‘कुतः’ इस शब्दकी [‘कहाँसे’—इस प्रकार] अपादानार्थता ग्रहण नहीं की जाती; क्योंकि अपादानार्थता ग्रहण करनेपर ही पुनरुक्तिका दोष होता है, कोई अन्य अर्थ लेनेपर नहीं। अच्छा तो, इस प्रश्नको निमित्तार्थक माना जाय। अर्थात् ‘कुत एतत् आगात्’—किस निमित्तसे इसका यहाँ आना हुआ ? | | न निमित्तार्थतापि, प्रतिवचनवैरूप्यात्। आत्मनश्च सर्वस्य जगतोऽग्निविस्फुलिङ्गादिवदुत्पत्तिः प्रतिवचने श्रूयते। न हि विस्फुलिङ्गानां विद्रवणेऽग्निर्निमित्तमपादानमेव तु सः। तथा परमात्मा विज्ञानमयस्यात्मनोऽपादानत्वेन श्रूयते ‘अस्मादात्मनः’ इत्येतस्मिन्वाक्ये। तस्मात्प्रतिवचनवैलोम्यात्कुत इति प्रश्नस्य निमित्तार्थता न शक्यते वर्णयितुम्। | **सिद्धान्ती—**इसकी निमित्तार्थता भी नहीं हो सकती, क्योंकि ऐसा माननेसे इसका उत्तरसे विरोध होगा। उत्तरमें अग्निसे विस्फुलिङ्गादिके समान आत्मासे ही जगत्की उत्पत्ति सुनी जाती है। विस्फुलिङ्गों (चिनगारियों) के फैलनेमें अग्नि निमित्त नहीं है, वह तो अपादान ही है। इसी प्रकार ‘इस आत्मासे’ इस वाक्यमें परमात्मा विज्ञानमय आत्माके अपादानरूपसे सुना जाता है। अतः उत्तरसे विरोध आनेके कारण ‘कुतः’ इस प्रश्नकी निमित्तार्थता वर्णन नहीं की जा सकती। |

ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४५५

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४५५
संस्कृतहिन्दी
नन्वपादानपक्षेऽपि पुनरुक्तता-**पूर्व०—**किंतु अपादान-पक्षको
दोषः स्थित एव ।स्वीकार करनेपर भी पुनरुक्तताका दोष तो खड़ा ही रहता है ।
नैष दोषः, प्रश्नाभ्याम् आत्मनि**सिद्धान्ती—**यह कोई दोष नहीं
क्रियाकारकफलात्मतापोहस्य विव-है; क्योंकि इन प्रश्नोंसे आत्मामें
क्षितत्वात् । इह हि विद्याविद्या-क्रिया-कारक-फलात्मकताकी निवृत्ति
विषयावुपन्यस्तौ । "आत्मेत्येवो-प्रतिपादन करनी अभीष्ट है । यहाँ
पासीत" (१ । ४ । ७) "आ-विद्या और अविद्या दोनोंहीके
त्मानमेवावेत्" (१ । ४ । १०)विषयोंका वर्णन किया गया है
"आत्मानमेव लोकमुपासीत""आत्मा है—इस प्रकार उपासना
(१ । ४ । १५) इति विद्या-करे" "आत्माहीको जाना" "आत्म-
विषयः । तथा अविद्याविषयश्चलोककी ही उपासना करे" यह
पाङ्क्तं कर्म तत्फलं चान्नत्रयंविद्याका विषय है। तथा पाङ्क्तकर्म
नामरूपकर्मात्मकमिति । तत्रा-और उसका फल नामरूप-कर्मात्मक
विद्याविषये वक्तव्यं सर्वमुक्तम् ।अन्नत्रय—यह अविद्याका विषय
विद्याविषयस्त्वात्मा केवल उपन्य-है। इनमें अविद्याके विषयमें तो
स्तो न निर्णीतः । तन्निर्णयायदिया, विद्याके विषय आत्माका
'ब्रह्म ते ब्रवाणि' (२ । १ । १)तो केवल उल्लेख किया है, उसका
इति प्रक्रान्तं 'ज्ञापयिष्यामि'निर्णय नहीं किया । उसका निर्णय
(२ । १ । १५) इति च । अत-करनेके लिये ही 'मैं तुम्हें ब्रह्मका
स्तद्ब्रह्म विद्याविषयभूतं ज्ञापयि-उपदेश करूँगा' इस प्रकार तथा
तव्यं याथात्म्यतः । तस्य च'ज्ञान कराऊँगा' इस प्रकार प्रक-
याथात्म्यं क्रियाकारकफलभेद-रण उठाया है । अतः विद्याके
शून्यमत्यन्तविशुद्धमद्वैतमित्येत-विषयभूत उस ब्रह्मका यथार्थ
रीतिसे ज्ञान कराना है । उसका
यथार्थ स्वरूप क्रिया-कारक-फलरूप
भेदसे रहित, अत्यन्त विशुद्ध और
अद्वैत है—यह बतलाना अभीष्ट है ।

४५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

४५६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| द्विवक्षितम् । अतस्तदनुरूपौ प्रश्नावुत्थाप्येते श्रुत्या 'क्वैष तदाभूत्' 'कुत एतदागात्' इति ।<br><br>तत्र यत्र भवति तदधिकरणं यद्भवति तदधिकर्त्तव्यम्, तयोश्चाधिकरणाधिकर्त्तव्ययोर्भेदो दृष्टो लोके । तथा यत आगच्छति तदपादानं य आगच्छति स कर्ता तस्मादन्यो दृष्टः । तथा आत्मा क्वाप्यभूदन्यस्मिन्नन्यः कुतश्चिदागादन्यस्मादन्यः केनचिद्भिन्नेन साधनान्तरेणेत्येवं लोकवत्प्राप्ता बुद्धिः । सा प्रतिवचनेन निवर्तयितव्येति । नायमात्मा अन्योऽन्यत्राभूदन्यो वा अन्यस्मादागतः साधनान्तरं वा आत्मन्यस्ति । किं तर्हि ? स्वात्मन्येवाभूत् "स्वम् (आत्मानम्) अपीतो भवति" (छा० उ० ६।८। १) "सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति" (छा० उ० ६ | इसलिये उसके अनुरूप ही श्रुति 'उस समय यह कहाँ था ?' और 'यह कहाँसे आया ?'—इन दो प्रश्नोंको उठाती है ।<br><br>उनमें, जहाँ रहता है वह अधिकरण होता है और जो रहता है वह अधिकर्त्तव्य होता है । लोकमें उन अधिकरण और अधिकर्त्तव्योंका भेद देखा गया है । इसी प्रकार जहाँसे आता है वह अपादान होता है और जो आता है वह कर्ता उससे भिन्न देखा जाता है । इस प्रकार आत्मा किसी अन्यमें उससे भिन्नरूपमें था और किसी अन्यस्थानसे उससे भिन्न रूपसे ही किसी भिन्न साधनान्तरके द्वारा आया है—इस प्रकार लोकवत् ऐसी बुद्धि प्राप्त होती है । इसका उत्तर देकर निराकरण करना है । [ अर्थात् यह बतलाना है कि ] यह आत्मा न तो अन्यरूपसे किसी अन्यस्थानमें अथवा न यह अन्यरूपसे अन्यके पाससे आया है और न आत्मामें कोई अन्य साधन ही है । तो फिर क्या बात है ?—यह अपने स्वरूपमें ही था; जैसा कि "स्वात्माको प्राप्त हो जाता है", "हे सोम्य ! उस समय यह सत्‌से सम्पन्न (संयुक्त) हो जाता |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४५७

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४५७

(८।१) "प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तः' (बृ० उ० ४।३।२१) "परे आत्मनि सम्प्रतिष्ठते" (प्र० उ० ४।७) इत्यादि-श्रुतिभ्यः। अत एव नान्योऽन्यस्मादागच्छति। तच्छ्रुत्यैव प्रदर्श्यते 'अस्मादात्मनः' इति। आत्मव्यतिरेकेण वस्त्वन्तराभावात्।है", "प्राज्ञात्मासे सम्यक् प्रकारसे आलिङ्गित रहता है", "परमात्मामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हो जाता है" इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। अतः अन्य आत्मा किसी अन्यके पाससे नहीं आता। यह बात 'इस आत्मासे' इत्यादि रूपसे श्रुति ही प्रदर्शित करती है; क्योंकि आत्मासे भिन्न वस्तुकी तो सत्ता ही नहीं है।
नन्वस्ति प्राणाद्यात्मव्यतिरिक्तं वस्त्वन्तरम्।पूर्व०—आत्मासे भिन्न प्राणादि वस्तुएँ हैं तो?
न, प्राणादेस्तत एव निष्पत्तेः।सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि प्राणादिकी निष्पत्ति तो उसीसे होती है।
तत्कथम् ?पूर्व०—सो किस प्रकार?
इत्युच्यते, तत्र दृष्टान्तः—सिद्धान्ती—बतलाते हैं, उसमें यह दृष्टान्त है—

आत्मासे जगत्की उत्पत्तिमें ऊर्णनाभि और अग्नि-विस्फुलिङ्गका दृष्टान्त

स यथोर्णनाभिस्तन्तुनोच्चरेद्यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति तस्योपनिषत्सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ २० ॥

जिस प्रकार वह ऊर्णनाभि (मकड़ा) तन्तुओंपर ऊपरकी ओर जाता है तथा जैसे अग्निसे अनेकों क्षुद्र चिनगारियाँ उड़ती हैं, उसी प्रकार इस आत्मासे समस्त प्राण, समस्त लोक, समस्त देवगण और समस्त भूत विविध रूपसे उत्पन्न होते हैं। 'सत्यका सत्य' यह उस आत्माकी उपनिषद् है। प्राण ही सत्य है। उन्हींका यह सत्य है ॥ २० ॥

४५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४५८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| स यथा लोक ऊर्णनाभिः । ऊर्णनाभिर्लूताकीट एक एव प्रसिद्धः सन्स्वात्माप्रविभक्तेन तन्तुनोच्चरेदुद्गच्छेत् । न चास्ति तस्योद्गमने स्वतोऽतिरिक्तं कारकान्तरम् । यथा चैकरूपादेकस्मादग्नेः क्षुद्रा अल्पा विस्फुलिङ्गाःस्फुलिङ्गाऽग्न्यवयवा व्युच्चरन्ति विविध नानावोच्चरन्ति । यथेमौ दृष्टान्तौ कारकभेदाभावेऽपि प्रवृत्तिं दर्शयतः, प्राक्प्रवृत्तेश्च स्वभावत एकत्वम्, एवमेवास्मादात्मनो विज्ञानमयस्य प्राक्प्रतिबोधाद्यत्स्वरूपं तस्मादित्यर्थः। सर्वे प्राणा वागादयः, सर्वे लोका भूरादयः, सर्वाणि कर्मफलानि, सर्वे देवाः प्राणलोकाधिष्ठातारोऽग्न्यादयः, सर्वाणि भूतानि ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानि प्राणिजातानि, सर्व एत आत्मान इत्यस्मिन्पाठे उपाधिसम्पर्कजनितप्रबुध्यमानविशेषात्मान इत्यर्थः, व्युच्चरन्ति । | लोकमें जिस प्रकार वह ऊर्णनाभि—जो लूताकीट (जाल बनानेवाला कीड़ा) प्रसिद्ध है वह अकेला ही अपनेसे सर्वथा भेद न रखनेवाले तन्तुओंके द्वारा ऊपरकी ओर जाता है; उसके ऊपर जानेमें अपनेसे भिन्न कोई अन्य साधन नहीं है । तथा जिस प्रकार एकरूप अर्थात् एक ही अग्निसे क्षुद्र-अल्प विस्फुलिङ्ग-चिनगारियाँ यानी अग्निकण विविध—नानाउड़ते हैं। जिस प्रकार ये दोनों दृष्टान्त कारकभेद न होनेपर भी प्रवृत्ति प्रदर्शित करते हैं और प्रवृत्तिसे पूर्व स्वरूपतः एकत्व दिखलाते हैं, इसी प्रकार इस आत्मासे अर्थात् बोध होनेसे पूर्व इस विज्ञानमय आत्माका जो स्वरूप है, उससे वागादि समस्त प्राण, भूर्लोकादि समस्त लोक यानी सम्पूर्ण कर्मफल, प्राण और लोकोंके अधिष्ठाता अग्नि आदि समस्त देवगण और समस्त भूत अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणिसमुदाय [इस आत्मासे] विविधरूपसे उत्पन्न होते हैं। जहाँ 'सर्वे एते आत्मानः'¹ ऐसा पाठ है, वहाँ 'उपाधिसंसर्गके कारण जिनका विशेष रूप जाना जाता है, वे अनेक आत्मा (जीव) उत्पन्न होते हैं'—ऐसा अर्थ करना चाहिये । |


१. माध्यन्दिन-शाखाकी श्रुतिमें ऐसा पाठ है।

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४५९ |

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४५९
शाङ्करभाष्यहिन्दी-अनुवाद
यस्मादात्मनः स्थावरजङ्गमं जगदिदमग्निविस्फुलिङ्गवद्व्युच्चरत्यनिशम्, यस्मिन्नेव च प्रलीयते जलबुद्बुद्वत्, यदात्मकं च वर्तते स्थितिकाले, तस्यास्यात्मनो ब्रह्मणः, उपनिषद्; उपसमीपं निगमयतीत्यभिधायकः शब्द उपनिषदित्युच्यते, शास्त्रप्रामाण्यादेतच्छब्दगतो विशेषोऽवसीयेत उपनिगमयितृत्वं नाम ।अग्निसे विस्फुलिङ्गोंके समान जिस आत्मासे यह चराचर जगत् अहर्निश उत्पन्न होता रहता है और जलमें बुलबुलेके समान जिसमें यह लीन हो जाता है तथा स्थितिकालमें जिस स्वरूपसे यह विद्यमान रहता है, उपनिषत् है; उप अर्थात् समीपसे निगमन करता है; इसलिये अभिधायक (वाचक) शब्द ही 'उपनिषद्' कहा जाता है, 'उपनिषद्' शब्दमें रहनेवाली यह उपनिगमनकर्तृत्वरूप विशेषता शास्त्रप्रामाण्यसे जानी जाती है ।
कासावुपनिषदित्याह—सत्यस्य सत्यमिति । सा हि सर्वत्र चोपनिषदलौकिकार्थत्वाद् दुर्विज्ञेयार्था, इति तदर्थमाचष्टे—प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यमिति । एतस्यैव वाक्यस्य व्याख्यानायोत्तरं ब्राह्मणद्वयं भविष्यति ।वह उपनिषद् क्या है, सो श्रुति बतलाती है—'सत्यका सत्य' यह वह विशेषता है । अलौकिक अर्थवाली होनेके कारण उस उपनिषद्का अर्थ सर्वत्र दुर्विज्ञेय है, इसलिये श्रुति उसका अर्थ बतलाती है—प्राण ही सत्य हैं, यह (आत्मा) उनका भी सत्य है । आगेके दो ब्राह्मण इसी वाक्यकी व्याख्या करनेके लिये होंगे ।
भवतु तावदुपनिषद्व्याख्यानाइयमुपनिषत् योत्तरं ब्राह्मणद्वयम्, किंविषयेति यस्योपनिषदित्युक्तम्, मीमांस्यते तन्न जानीमः किं प्रकृतस्यात्मनो विज्ञानमयस्य पाणि-पूर्व०—आगेके दो ब्राह्मण भले ही इस उपनिषद्की व्याख्या करनेके लिये हों, परंतु ऊपर जो यह कहा गया है कि 'यह उसकी उपनिषद् है' इसमें हम यह नहीं जानते कि यह उपनिषद् हाथ दबानेसे उठे हुए

४६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४६०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| पेषणोत्थितस्य संसारिणः शब्दादिभुज इयमुपनिषदाहोस्वदंससारिणः कस्यचित् ? | शब्दादिका भोग करनेवाले प्रकृत विज्ञानमय संसारी आत्माकी है अथवा किसी असंसारीकी ? | | किञ्चातः ? | सिद्धान्ती—इससे तुम्हारा क्या प्रयोजन है ? | | यदि संसारिणस्तदा संसार्य्येव विज्ञेयः, तद्विज्ञानादेव सर्वप्राप्तिः। स एव ब्रह्मशब्दवाच्यस्तद्विद्यैव ब्रह्मविद्येति । अथ असंसारिणः, तदा तद्विषया विद्या ब्रह्मविद्या । तस्माच्च ब्रह्मविज्ञानात्सर्वभावापत्तिः । | पूर्व०—यदि यह उपनिषद् संसारीकी है, तब तो संसारी ही विशेषरूपसे ज्ञातव्य है, उसके विज्ञानसे ही सर्वभावकी प्राप्ति हो सकती है वही 'ब्रह्म' शब्दका वाच्य है तथा उसकी विद्या ही ब्रह्मविद्या है । और यदि वह असंसारीकी है तो असंसारी आत्मासे सम्बन्ध रखनेवाली विद्या ही ब्रह्मविद्या है, एवं उस ब्रह्मविज्ञानसे ही सर्वभावकी प्राप्ति होती है । | | सर्वमेतच्छास्त्रप्रामाण्याद्भविष्यति । किन्त्वस्मिन्पक्षे "आत्मेत्येवोपासीत" ( १ । ४ । ७ ) "आत्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि" ( १ । ४ । १४ ) इति परब्रह्मैकत्वप्रतिपादिकाः श्रुतयः कुप्येयुन्, संसारिणश्चान्यस्याभावे उपदेशानर्थक्यात् । यत एवं पण्डितानाम- | सिद्धान्ती—यह सब शास्त्रप्रामाण्यसे ही सिद्ध होगा । किंतु इस पक्षमें "ओत्मेत्येवोपासीत", "ओत्मानमेवावेदाहं ब्रह्मास्मि" इत्यादि परब्रह्मकी एकताका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियाँ बाधित हो जायँगी; क्योंकि ब्रह्मसे भिन्न किसी संसारीकी सत्ता न होनेके कारण उसका उपदेश निरर्थक होगा । इस प्रकार जिसका उत्तर नहीं दिया गया है, उस |


१. आत्मा है—इस प्रकार उपासना करे ।
२. आत्माको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ ।

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४६१ |

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४६१
संस्कृतहिन्दी
प्येतन्महामोहस्थानम् अनुक्तप्रतिवचनप्रश्नविषयम्; अतो यथाशक्ति ब्रह्मविद्याप्रतिपादकवाक्येषु ब्रह्मविजिज्ञासूनां बुद्धिव्युत्पादनाय विचारयिष्यामः ।<br><br>न तावदसंसारी परः, पाणिपेषणप्रतिबोधिताच्छब्दादिभुजोऽवस्थान्तरविशिष्टादुत्पत्तिश्रुतेः । न प्रशासिताशनायादिवर्जितः परो विद्यते, कस्मात् ? यस्मात् 'ब्रह्म ज्ञापयिष्यामि' ( २ । १ । १५ ) इति प्रतिज्ञाय सुप्तं पुरुषं पाणिपेषं बोधयित्वा तं शब्दादिभोक्तृत्वविशिष्टं दर्शयित्वा तस्यैव स्वप्नद्वारेण सुषुप्त्याख्यमवस्थान्तरमुन्नीय तस्मादेवात्मनः सुषुप्त्यवस्थाविशिष्टाद् अग्निविस्फुलिङ्गोर्णनाभिदृष्टान्ताभ्यामुत्पत्तिं दर्शयति श्रुतिः “एवमेवास्मात्” (२ । १ । २०) इत्यादिना । न चान्यो जगदुत्पत्तिकारणमन्तराले श्रुतो-ऐकात्म्यविषयक प्रश्नका विषय पण्डितोंके लिये भी अत्यन्त मोहका स्थान है, इसलिये ब्रह्मजिज्ञासुओंकी बुद्धिको ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन करनेवाले वाक्योंमें प्रवृत्त करनेके लिये हम यथाशक्ति विचार करेंगे ।¹<br><br>इनमेंसे असंसारी (शुद्ध आत्मा) तो परमात्मा हो नहीं सकता; क्योंकि हाथ दबानेसे जगे हुए शब्दादिके भोक्ता एवं सुषुप्तिसंज्ञक अवस्थान्तरसे विशिष्ट जीवसे जगत्की उत्पत्ति सुनी गयी है । उससे भिन्न क्षुधादि जीवधर्मोंसे रहित शुद्ध ब्रह्म जगत्का शासक नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि 'मैं तुझे ब्रह्मका ज्ञान कराऊँगा' ऐसी प्रतिज्ञा कर हाथ दबानेके द्वारा सुषुप्त पुरुषको जगाकर उसे शब्दादिभोक्तृत्व-विशिष्ट दिखाकर, उसीकी स्वप्नके द्वारा सुषुप्तिसंज्ञक अवस्थान्तर प्रदर्शित कर श्रुति "एवमेवास्मात्"² इत्यादि वाक्यद्वारा सुषुप्तिअवस्थाविशिष्ट उस आत्मासे ही अग्नि-विस्फुलिङ्ग और ऊर्णनाभिके दृष्टान्तोंद्वारा जगत्की उत्पत्ति दिखलाती है। यहाँ बीचमें जगत्की उत्पत्तिका कोई दूसरा कारण सुना

१. इससे आगे पहले पूर्वपक्षकी बात कहते हैं ।
२. इसी प्रकार इससे ।

४६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

४६२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २
ऽस्ति, विज्ञानमयस्यैव हि प्रकरणम्। समानप्रकरणे च श्रुत्यन्तरे कौषीतकिनामादित्यादिपुरुषान्प्रस्तुत्य "स होवाच यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्ता यस्य वैतत्कर्म स वै वेदितव्यः" (कौ० उ० ४।१९) इति प्रबुद्धस्यैव विज्ञानमयस्य वेदितव्यतां दर्शयति, नार्थान्तरस्य।नहीं गया है और यह विज्ञानमयका ही प्रकरण है। इसके समान प्रकरणमें ही कौषीतकी-शाखावालोंकी एक अन्य श्रुतिमें आदित्यादि-पुरुषोंका प्रकरण उठाकर श्रुति "वह बोला, हे बालाके ! जो भी इन पुरुषोंका कर्त्ता है और जिसका यह जगद्रूप कर्म है वही निश्चय ज्ञातव्य है" इस प्रकार जगे हुए विज्ञानमयकी ही ज्ञातव्यता प्रदर्शित करती है, किसी अन्य वस्तुकी नहीं।
तथा च "आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति" (२।४।५) इत्युक्त्वा, य एवात्मा प्रियः प्रसिद्धस्तस्यैव द्रष्टव्यश्रोतव्यमन्तव्यनिदिध्यासितव्यतां दर्शयति। तथा च विद्योपन्यासकाले "आत्मेत्येवोपासीत" (१।४।७) "तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो वित्तात्" (१।४।८) "तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि" (१।४।१०) इत्येवमादिवाक्यानामानुलोम्यं स्यात्पराभावे। वक्ष्यति च— "आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः (४।४।१२) इति।इसी प्रकार "आत्माके लिये ही सब कुछ प्रिय होता है" ऐसा कहकर श्रुति यह दिखाती है कि जो आत्मा प्रियरूपसे प्रसिद्ध है, वही द्रष्टव्य, श्रोतव्य, मन्तव्य और निदिध्यासितव्य है। इस तरह यदि कोई विज्ञानमयसे भिन्न ज्ञातव्य न होगा, तभी आत्मज्ञानकी व्याख्या करते समय "आत्मा है—इस प्रकार उपासना करे" "वह यह आत्मा पुत्रसे प्रिय है और धनसे भी प्रिय है" तथा "उसने आत्माको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ" इत्यादि वाक्योंकी अनुकूलता हो सकती है। श्रुति आगे "यदि पुरुष आत्माको 'मैं यह हूँ' इस प्रकार जान जाय" ऐसा कहेगी भी।

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६३

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६३

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
सर्ववेदान्तेषु च प्रत्यगात्मवेद्यतैव प्रदर्श्यतेऽहमिति, न बहिर्वेद्यता शब्दादिवत्प्रदर्श्यतेऽसौ ब्रह्मेति। तथा कौषीतकिनामेव "न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात्" (कौ० उ० ३।८) इत्यादिना वागादिकरणैर्व्यावृत्तस्य कर्तुरेव वेदितव्यतां दर्शयति।समस्त वेदान्तोंमें ब्रह्मकी 'अहम्' इस रूपसे प्रत्यगात्मभावसे ही वेद्यता दिखायी गयी है, शब्दादिके समान 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार बहिर्वेद्यता नहीं दिखायी गयी। इसी प्रकार कौषीतकी शाखावालोंकी श्रुति भी "वाणीको जाननेकी इच्छा न करे, बोलनेवालेको जाने" इत्यादि वाक्यसे वागादि इन्द्रियोंसे भिन्न कर्ताकी ही वेद्यता प्रदर्शित करती है।
अवस्थान्तरविशिष्टोऽसंसारीति चेत्—अथापि स्याद्यो जागरिते शब्दादिभुग्विज्ञानमयः, स एव सुषुप्ताख्यमवस्थान्तरं गतोऽसंसारी परः प्रशासिता अन्यः स्यादिति चेन्न, अदृष्टत्वात्। न ह्येवंधर्मकः पदार्थो दृष्टोऽन्यत्र वैनाशिकसिद्धान्तात्। न हि लोके गौस्तिष्ठन् गच्छन्वा गौर्भवति—शयानस्त्वश्वादिजात्यन्तरमिति। न्यायाच्च— यद्धर्मको यः पदार्थः प्रमाणेनावगतो भवति, स देशकालाchannel/वस्था-यदि कहो कि अवस्थान्तरविशिष्ट होनेपर वह असंसारी हो जाता है। अर्थात् यदि ऐसा मानो कि जागरित-अवस्थामें जो विज्ञानमय शब्दादिका भोक्ता है, वही सुषुप्तसंज्ञक अन्य अवस्थामें जानेपर उससे भिन्न जगत्का शासक असंसारी हो जाता है, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा देखा नहीं गया। वैनाशिक-सिद्धान्तके सिवा और कहीं ऐसे धर्मवाला पदार्थ नहीं देखा गया। लोकमें ऐसा नहीं देखा गया कि बैठते या चलते समय तो गौ गौ रहे और सोनेपर वह अश्वादि कोई अन्य जातिका पशु हो जाय। युक्तिसे भी यही सिद्ध होता है कि जो पदार्थ प्रमाणद्वारा जिन धर्मोंवाला जाना जाता है, वह अन्य देश, काल अथवा अवस्थाओंमें भी

४६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| न्तरेष्वपि तद्धर्मक एव भवति । स चेत्तद्धर्मकत्वं व्यभिचरति, सर्वः प्रमाणव्यवहारो लुप्येत । तथा च न्यायविदः साङ्ख्यमीमांसकादयोऽसंसारिणोऽभावं युक्तिशतैः प्रतिपादयन्ति । | उन्हीं धर्मोंवाला रहता है। यदि वह उन धर्मोंका त्याग कर दे तो सारे ही प्रमाण-व्यवहारका लोप हो जाय। इसी प्रकार सांख्यवादी और मीमांसकादि न्यायवेत्ता भी सैकड़ों युक्तियोंसे असंसारी ईश्वरके अभावका प्रतिपादन करते हैं। | | संसारिणोऽपि जगदुत्पत्तिस्थितिलयक्रियाकर्तृत्वविज्ञानस्याभावाद् अयुक्तमिति चेत्—यन्महता प्रपञ्चेन स्थापितं भवता, शब्दादिसुक्संसार्येवावस्थान्तरविशिष्टो जगत इह कर्तेति—तदसत्; यतो जगदुत्पत्तिस्थितिलयक्रियाकर्तृत्वविज्ञानशक्तिसाधनाभावः सर्वलोकप्रत्यक्षः संसारिणः । सकथमस्मदादिः संसारी मनसापि चिन्तयितुमशक्यं पृथिव्यादिविन्यासविशिष्टं जगन्निर्मिनुयात् ? अतोऽयुक्तमिति चेन्न, शास्त्रात्; शास्त्रं | यदि कहो कि जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयरूप क्रियाके कर्तृत्वका ज्ञान न होनेके कारण संसारी जीवको भी जगत्का कर्ता मानना उचित नहीं है, अर्थात् तुमने जो बड़े विस्तारसे यहाँ यह सिद्ध किया है कि शब्दादिका भोक्ता अवस्थान्तरविशिष्ट संसारी जीव ही जगत्का कर्ता है, वह ठीक नहीं है; क्योंकि संसारी जीवमें जगत्को उत्पत्ति, स्थिति एवं लयरूप क्रियाके कर्तृत्वविज्ञानकी शक्तिके साधनोंका अभाव सभी लोकोंको प्रत्यक्ष है। वह हम-जैसा संसारी जीव इस पृथिवी आदिके यथास्थान स्थापनपूर्वक विभिन्न प्रकारकी रचनासे विशिष्ट एवं मनसे भी अचिन्तनीय जगत्‌की किस प्रकार रचना कर सकता है ? इसलिये ऐसा मानना उचित नहीं; ऐसी यदि कोई शङ्का करे तो ठीक नहीं, क्योंकि शास्त्रसे |

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४६५

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४६५


मूल संस्कृतभाषानुवाद
संसारिणः “एवमेवास्मादात्मनः” (२।१।२०) इति जगदुत्पत्त्यादि दर्शयति। तस्मात्सर्वं श्रद्धेयमिति स्यादयमेकः पक्षः।यही सिद्ध होता है। “इसी प्रकार इस आत्मासे” इत्यादि शास्त्र संसारीसे ही जगत्की उत्पत्ति आदि प्रदर्शित करता है; इसलिये इस सबमें विश्वास रखना चाहिये—ऐसा यह एक पक्ष हो सकता है। १
[असंसारिणो जगत्कारणत्वोपपादनम्] <br> “यः सर्वज्ञः सर्ववित्” (मु० उ० १।१।९) “योऽशनायापिपासे······अत्येति” (बृ० उ० ३।५।१) “असङ्गो न हि सज्यते” (३।९।२६) “एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने” (३।८।९) “यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् ····अन्तर्याम्यमृतः” (३।७।१५) “स यस्तान्पुरुषान्निरुह्य···अत्यक्रामत्” (३।९।२६) “स वा एष महानज आत्मा” (४।४।२२) “एष सेतुर्विधरणः” (४।४।२२) “सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः” (४।४।२२) “य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युः” (छा० उ० ८।७।१) “तत्तेजोऽसृजत” (छा० उ० ६।२।३) “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्” (ऐ० उ० १।१।१) “न लिप्यते लोक-“जो सर्वज्ञ और सर्ववेत्ता है”, “जो क्षुधा-पिपासासे अतीत है”, “जो असङ्ग है इसलिये किसीसे संयुक्त नहीं होता”, “इस अक्षरके ही शासनमें”, “जो समस्त भूतोंमें रहनेवाला, अन्तर्यामी और अमृत है”, “जो उन पुरुषोंका निरोध करके उनसे आगे बढ़ा हुआ है”, “वही यह महान् अजन्मा आत्मा है”, “यह विशेषरूपसे धारण करनेवाला सेतु है”, “यह सबको वशमें रखनेवाला और सबका शासक है”, “जो निष्पाप और अजर-अमर आत्मा है”, “उसने तेजको रचा”, “आरम्भमें यह एक आत्मा ही था”, “वह लोकदुःखसे लिप्त नहीं होता

१. यहाँतक सिद्धान्तीने संसारी जीवको ही जगत्का कारण माननेवाले पूर्वपक्षको प्रदर्शित किया है। इससे आगे असंसारीका जगत्कारणत्व प्रदर्शित किया जाता है।

बृ० उ० ३०—

४६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४६६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| दुःखेन बाह्यः” (क० उ० २ । २ । ११) इत्यादिश्रुतिशतेभ्यः, स्मृतेश्च “अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते” (गीता १० । ८) इति—परोऽस्त्यसंसारी श्रुतिस्मृतिन्यायेभ्यश्च; स च कारणं जगतः। | क्योंकि उससे बाहर है—” इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंसे तथा “मैं सबका उत्पत्तिस्थान हूँ और मुझसे ही सब उत्पन्न होता है” इत्यादि स्मृतियोंसे जीवसे भिन्न असंसारी परमात्मा सिद्ध होता है और श्रुति-स्मृति एवं युक्तिसे वही जगत्का कारण है। | | ननु “एवमेवास्मादात्मनः” (२ । १ । २०) इति संसारिण एवोत्पत्तिं दर्शयतीत्युक्तम्। | पूर्व०—किंतु “इसी प्रकार इस आत्मासे” इत्यादि श्रुति तो संसारी जीवसे ही जगत्की उत्पत्ति दिखलाती है—ऐसा ऊपर कहा जा चुका है। | | न; “य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः” (२ । १ । १७) इति परस्य प्रकृतत्वात् “अस्मादात्मनः” इति युक्तः परस्यैव परामर्शः। “क्वैष तदाभूत्” (२ । १ । १६) इत्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनत्वेन आकाशशब्दवाच्यः पर आत्मोक्तो “य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते” (२ । १ । १७) इति। “सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति” (छा० उ० ६ । ८ । १) “अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति” (छा० उ० ८ । ३ । २) “प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तः” (बृ० उ० ४ । ३ । २१) “पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते” (प्र० उ० | सिद्धान्ती—नहीं; “जो यह हृदयान्तर्गत आकाश है” इस प्रकार यहाँ परब्रह्मका ही प्रकरण होनेके कारण “इस आत्मासे” इत्यादि श्रुतिद्वारा परब्रह्मका ही परामर्श मानना उचित है। “उस समय यह कहाँ था?” इस प्रकार इस प्रश्नके उत्तररूपसे “यह जो हृदयके अन्तर्गत आकाश है, उसमें यह शयन करता है” इस वाक्यद्वारा आकाशशब्दवाच्य आत्मा ही कहा गया है। “हे सोम्य ! उस समय यह सत्से सम्पन्न रहता है” “प्रतिदिन वहाँ जाती हुई इस ब्रह्मलोकको नहीं प्राप्त करती है”, प्राज्ञात्मासे आलिङ्गित”, “पर आत्मामें सम्यक् प्रकारसे स्थित होती है” |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६७

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६७


संस्कृतहिन्दी
४।७) इत्यादिश्रुतिभ्य आकाशशब्दः पर आत्मेति निश्चीयते; "दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः" (छा० उ० ८।१।१) इति प्रस्तुत्य तस्मिन्नेवात्मशब्दप्रयोगाच्च। प्रकृत एव पर आत्मा। तस्माद्युक्तम् ‘एवमेवास्मादात्मनः’ इति परमात्मन एव सृष्टिरिति। संसारिणः सृष्टिस्थितिसंहारज्ञानसामर्थ्याभावं चावोचाम।इत्यादि श्रुतियोंसे आकाशशब्दसे कहा जानेवाला पर आत्मा ही है—ऐसा निश्चय होता है, तथा "इसमें अन्तराकाश दहर है" इस प्रकार प्रसङ्ग उठाकर उसी अर्थमें 'आत्मा' शब्दका प्रयोग भी किया गया है। इसलिये भी यहाँपर आत्माका ही प्रसङ्ग है। अतः 'इसी प्रकार इस आत्मासे' इस वाक्यद्वारा परमात्मासे ही सृष्टि होती है—ऐसा मानना ही उचित है। इसके सिवा हम संसारी जीवमें तो जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहारके ज्ञानकी शक्तिका अभाव भी बतला चुके हैं।
(द्वैतवादिपक्षोद्भावनम्)<br>अत्र च "आत्मेत्येवोपासीत" (१।४।७) "आत्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि" (१।४।१०) इति ब्रह्मविद्या प्रस्तुता। ब्रह्मविषयं च ब्रह्मविज्ञानमिति 'ब्रह्म ते ब्रवाणि' इति 'ब्रह्म ज्ञापयिष्यामि' इति प्रारब्धम्। तत्रेदानीमसंसारि ब्रह्म जगतः कारणमशनायाद्यतीतं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावम्, तद्विपरीतश्च संसारी, तस्मादहं ब्रह्मा-पूर्व०—यहाँ भी "आत्मा है-इस प्रकार ही उपासना करे", "आत्माको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ" इस प्रकार ब्रह्मविद्याका ही प्रसङ्ग है। तथा ब्रह्मविज्ञान ब्रह्मविषयक ही होता है, जो कि 'मैं तुझे ब्रह्मका उपदेश करूँ', 'तुझे ब्रह्मका बोध कराऊँगा' इत्यादि श्रुतियोंसे आरम्भ किया है। यहाँ क्षुधादिसे रहित, नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव असंसारी ब्रह्म जगत्का कारण बतलाया गया है। संसारी जीव उससे विपरीत स्वभाववाला है। इसलिये वह अपनेको 'मैं ब्रह्म हूँ'

४६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४६८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
संस्कृतहिन्दी
स्मीति न गृह्णीयात् परं हि देवमीशानं निकृष्टः संसार्थ्यात्मत्वेन स्मरन्कथं न दोषभाक् स्यात्? तस्मान्नाहं ब्रह्मास्मीति युक्तम् । तस्मात् पुष्पोदकाञ्जलिस्तुतिनमस्कारवल्युपहारस्वाध्यायाध्ययनयोगादिभिरारिराधयिषेत् । आराधनेन विदित्वा सर्वेशितृ ब्रह्म भवति । न पुनरसंसारि ब्रह्म संसार्थ्यात्मत्वेन चिन्तयेदग्निमिव शीतत्वेन आकाशमिव मूर्त्तिमत्त्वेन । ब्रह्मात्मत्वप्रतिपादकमपि शास्त्रमर्थवादो भविष्यति । सर्वतर्कशास्त्रलोकन्यायैश्चैवमविरोधः स्यात् ।इस प्रकार ग्रहण नहीं कर सकता । भला, निम्नकोटिका संसारी जीव परम देव ईश्वरको आत्मभावसे स्मरण करके किस प्रकार दोषका भागी न होगा ? इसलिये 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा मानना उचित नहीं हो सकता । अतः पुष्पाञ्जलि, स्तुति, नमस्कार, बलि, उपहार, जप, अध्ययन और योगादिके द्वारा उसकी आराधना करनेकी इच्छा करे। उसे आराधनाके द्वारा जानकर जीव सबका शासन करनेवाला ब्रह्म हो जाता है। जिस प्रकार अग्निको शीतरूपसे तथा आकाशको मूर्तरूपसे चिन्तन करना उचित नहीं है, उसी प्रकार संसारी जीव असंसारी ब्रह्मका आत्मभावसे चिन्तन नहीं कर सकता। आत्माकी ब्रह्मस्वरूपताका प्रतिपादन करनेवाला शास्त्र भी अर्थवाद ही होगा। तथा ऐसा माननेपर समस्त युक्ति, शास्त्र और लौकिक न्यायोंसे विरोध नहीं रह सकता।
न; मन्त्रब्राह्मणवादेभ्यस्तस्यैव<br>उक्तपक्षनिरासः प्रवेशश्रवणात् ।<br>“पुरश्चक्रे” इति प्रकृत्य “पुरः पुरुष आविशत् (बृ० उ० २ । ५ । १८) इति “रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्ष-सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि मन्त्र और ब्राह्मणवाक्योंद्वारा उस (परब्रह्म) का ही प्रवेश सुना गया है। “[शरीररूप] पुरोंकी रचना की” इस प्रकार प्रकरण उठाकर “पुरुषने पुरोंमें प्रवेश किया” “वह रूप-रूपके अनुरूप हो गया इसका वह रूप प्रत्यक्ष करनेके लिये