बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७९५
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७९५
उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता (पण्डित) है। याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो ! ] ।' [ याज्ञवल्क्य-] 'जिसे तुम सम्पूर्ण आध्यात्मिक कार्यकारणसंघातका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। यह जो शारीर पुरुष है, वही यह है। शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'अच्छा, उसका देवता कौन है?' तब याज्ञवल्क्यने 'अमृत' ऐसा कहा ॥ १० ॥
| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| पृथिव्येव यस्य देवस्यायतनमाश्रयः, अग्निर्लोको यस्य—लोकयत्यनेनेति लोकः, पश्यतीति—अग्निना पश्यतीत्यर्थः। मनोज्योतिः मनसा ज्योतिषा संकल्पविकल्पादिकार्यं करोति यः, सोऽयं मनोज्योतिः । पृथिवीशरीरोऽग्निदर्शनो मनसा संकल्पयिता पृथिव्यभिमानी कार्यकरणसंघातवान् देव इत्यर्थः । | जिस देवका पृथिवी ही आयतन अर्थात् आश्रय है, अग्नि जिसका लोक है—इसके द्वारा अवलोकन करता है, इसलिये यह इसका लोक है, 'लोकयति' का अर्थ है—देखता है अर्थात् वह अग्निसे देखता है। तथा मनोज्योति है—जो मनरूप ज्योतिसे संकल्प-विकल्पादि कार्य करता है, वह यह देव मनोज्योति है। तात्पर्य यह है कि यह पृथिवीका अभिमानी कार्यकारणसंघातवान् देव पृथिवीरूप शरीरवाला, अग्निरूप दर्शनशक्तिवाला और मनसे संकल्प करनेवाला है। |
| य एवं विशिष्टं वै तं पुरुषं विद्याद् विजानीयात् सर्वस्यात्मन आध्यात्मिकस्य कार्यकारणसंघातस्य आत्मनः परमयनं पर आश्रयस्तं परायणम् । मातृजेन त्वङ्मांसरुधिररूपेण क्षेत्रस्थानीयेन बीजस्थानीयस्य पितृजस्य अस्थि- | जो ऐसे लक्षणोंसे युक्त उस पुरुषको सम्पूर्ण आत्माका—आध्यात्मिक कार्य-करणसंघातरूप आत्माका परम अयन यानी परम आश्रय जानता है अर्थात् मातृजनित क्षेत्रस्थानीय त्वचा, मांस और रुधिररूपसे पितृजनित बीजस्थानीय अस्थि-मज्जा और |
७९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ७९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| मज्जाशुक्ररूपस्य परमयनम्, करणात्मनश्च, स वै वेदिता स्यात् । य एतदेवं वेत्ति स वै वेदिता पण्डितः स्यादित्यभिप्रायः । याज्ञवल्क्य त्वं तमजानन्नेव पण्डिताभिमानीत्यभिप्रायः । | वीर्यरूपका तथा इन्द्रियात्माका वह परम अयन है—ऐसा जानता है, वही जाननेवाला है। तात्पर्य यह है कि जो इसे इस प्रकार जानता है, वही वेत्ता यानी पण्डित है। 'हे याज्ञवल्क्य ! तुम तो उसे बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान करते हो'—ऐसा इसका अभिप्राय है। | | यदि तद्विज्ञाने पाण्डित्यं लभ्यते, वेद वै अहं तं पुरुषं सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ यं कथयसि तमहं वेद । तत्र शाकल्यस्य वचनं द्रष्टव्यम्—यदि त्वं वेत्थ तं पुरुषम्, ब्रूहि—किंविशेषणोऽसौ ? शृणु यद्विशेषणः सः—य एवायं शारीरः—पार्थिवांशे शरीरे भवः शारीरो मातृजकोशत्रयरूप इत्यर्थः, स एष देवः, यस्त्वया पृष्टः, हे शाकल्य । किन्त्वस्ति तत्र वक्तव्यं विशेषणान्तरम्, तद् वदैव पृच्छैवेत्यर्थः, हे शाकल्य । | [ याज्ञवल्क्य—] 'यदि उसके विज्ञानसे ही पाण्डित्यकी प्राप्ति होती है तो मैं उस पुरुषको तो जानता हूँ; तुम जिसे सम्पूर्ण आध्यात्मिक कार्य-करणसंघातका परायण बतलाते हो उस पुरुषका मुझे पता है।' यहाँ शाकल्यका यह वचन समझना चाहिये—'यदि तुम उस पुरुषको जानते हो तो बताओ वह किन विशेषणोंवाला है।' [ याज्ञवल्क्य—], अच्छा, वह जिन विशेषणोंसे युक्त है, सो सुनो—जो भी यह शारीर है—शरीररूप पार्थिवांशमें होनेवालेको शारीर कहते हैं अर्थात् जो मातृजनित कोशत्रयरूप है, हे शाकल्य ! वही वह देव है, जिसके विषयमें तुमने पूछा है। किंतु उसके विषयमें एक और विशेषण बतलाना आवश्यक है सो हे शाकल्य ! उसको कहो अर्थात् उसके सम्बन्धमें पूछो।' |
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९७
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९७
| स एवं प्रक्षोभितोऽमर्षवशग आह—तोत्त्रार्दित इव गजः— तस्य देवस्य शारीरस्य का देवता ? यस्मान्निष्पद्यते यः सा तस्य देवतेत्यस्मिन् प्रकरणे विवक्षितः; अमृतमिति होवाच । अमृतमिति यो भुक्तस्यान्नस्य रसो मातृजस्य लोहितस्य निष्पत्तिहेतुः । तस्माद्ध्यन्नरसाल्लोहितं निष्पद्यते स्त्रियां श्रितम्, ततश्च लोहितमयं शरीरं बीजाश्रयम् । समानमन्यत् ॥ १० ॥ | इस प्रकार अत्यन्त क्षुभित किये जानेपर उसने अंकुशसे पीडित हुए हाथीके समान क्रोधके वशीभूत होकर पूछा, 'उस शरीरमें होनेवाले देवका देवता कौन है ?' जिसके द्वारा जो निष्पन्न होता है वही उसका देवता है-ऐसा इस प्रकरणमें बताना अभीष्ट है [ शाकल्यके किये हुए प्रश्नके उत्तरमें ] 'वह अमृत है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । खाये हुए अन्नका जो रस मातृजनित लोहितकी निष्पत्तिका कारण होता है, वही अमृत है । उस अन्नके रससे ही स्त्रीमें आश्रित लोहित निष्पन्न होता है । उसीसे बीजका आश्रयभूत लोहितमय शरीर बनता है । आगेके अन्य पर्यायोंका अर्थ भी इसीके समान है ॥ १० ॥ |
काम एव यस्यायतनँ हृदयं लोको मनो-ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणँ स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं काममयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति स्त्रिय इति होवाच ॥ ११ ॥
[ शाकल्य—] 'काम ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है और मन ज्योति है, उस पुरुषको जो भी सम्पूर्ण आध्यात्मिक कार्य-करण-
७९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ७९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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समूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता है। याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हों !] ।' [याज्ञवल्क्य-] 'जिसे तुम सम्पूर्ण आध्यात्मिक कार्य-करणसंघातका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। जो भी यह काममय पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य — ] 'उसका कौन देवता है ?' तब याज्ञवल्क्यने कहा—'स्त्रियां' ॥ ११ ॥
| काम एव यस्यायतनम्। स्त्रीव्यतिकराभिलाषः कामः कामशरीर इत्यर्थः। हृदयं लोको हृदयेन बुद्ध्या पश्यति । य एवायं काममयः पुरुषोऽध्यात्ममपि काममय एव । तस्य का देवतेति स्त्रिय इति होवाच; स्त्रीतो हि कामस्य दीप्तिर्जायते ॥ ११ ॥ | काम ही जिसका आयतन है। स्त्रीप्रसङ्गकी अभिलाषाका नाम काम है, अतः तात्पर्य यह है कि जो कामरूप शरीरवाला है। हृदय जिसका लोक है—जो हृदय यानी बुद्धिसे देखता है। जो भी यह काममय पुरुष है अर्थात् जो अध्यात्म भी काममय ही है । [ शाकल्य—] 'उसका देवता कौन है ?' याज्ञवल्क्यने 'स्त्रियां' ऐसा कहा, क्योंकि स्त्रीसे ही कामका उद्दीपन होता है ॥ ११ ॥ |
रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणँ स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवासावादित्ये पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति सत्यमिति होवाच ॥ १२ ॥
[ शाकल्य—] 'रूप ही जिसका आयतन है, चक्षु लोक है और मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता है। हे याज्ञवल्क्य ! [तुम तो बिना जाने ही
ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ७९९
ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ७९९
पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो!]’ [याज्ञवल्क्य-] ‘तुम जिसे सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। जो भी यह आदित्यमें पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य! और बोलो।’ [शाकल्य-] ‘उसका देवता कौन है?’ तब याज्ञवल्क्यने ‘सत्य’ ऐसा कहा ॥ १२ ॥
| रूपाण्येव यस्यायतनम् । रूपाणि शुक्लकृष्णादीनि । य एवासावादित्ये पुरुषः—सर्वेषां हि रूपाणां विशिष्टं कार्यमादित्ये पुरुषः। तस्य का देवतेति ? सत्यमिति होवाच । सत्यमिति चक्षुरुच्यते, चक्षुषो ह्यध्यात्मतः आदित्यस्याधिदैवतस्य निष्पत्तिः ॥ १२ ॥ | रूप ही जिसका आयतन हैं। रूप हैं शुक्ल-कृष्ण आदि। जो भी यह आदित्यमें पुरुष है—सम्पूर्ण रूपोंका जो विशिष्ट कार्य है वही आदित्यमें पुरुष है। उसका देवता कौन है? तब याज्ञवल्क्यने ‘सत्य’ ऐसा कहा। सत्य-इस शब्दसे चक्षु कहा गया है, क्योंकि अध्यात्म-चक्षु-से ही अधिदैवत आदित्यकी निष्पत्ति होती है ॥ १२ ॥ |
आकाश एव यस्यायतनँ श्रोत्रं लोको मनो- ज्योतियों वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणँ स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायँ श्रोत्रः प्रातिश्रुत्कः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति दिश इति होवाच ॥ १३ ॥
[शाकल्य-] ‘आकाश ही जिसका आयतन है, श्रोत्र लोक है और मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता है। हे याज्ञवल्क्य! [तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो!]’ [याज्ञवल्क्य-] ‘तुम जिसे सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण कहते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। जो भी यह श्रोत्रसम्बन्धी प्रातिश्रुत्क पुरुष है, यही वह है, हे शाकल्य!
८०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ८०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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और बोलो।' [ शाकल्य-] 'उसका कौन देवता है?' तब याज्ञवल्क्यने 'दिशाएँ' ऐसा कहा ॥ १३ ॥
| आकाश एव यस्यायतनम् य एवायं श्रोत्रे भवः श्रौत्रः, तत्रापि प्रतिश्रवणवेलायां विशेषतो भवतीति प्रातिश्रुत्कः, तस्य का देवतेति ? दिश इति होवाच । दिग्भ्यो ह्यसावाध्यात्मिको निष्पद्यते ॥ १३ ॥ | आकाश ही जिसका आयतन है। जो भी यह श्रोत्रमें रहनेवाला श्रोत्र और उसमें भी जो प्रतिश्रवणके समय विशेषरूपसे रहता है, वह प्रातिश्रुतक हे, उसका देवता कौन है ? इसपर [याज्ञवल्क्यने] कहा, 'दिशाएँ' क्योंकि दिशाओंसे ही यह आध्यात्मिक पुरुष निष्पन्न होता है ॥ १३ ॥ |
तम एव यस्यायतनꣳ हृदयं लोको मनो-
ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणꣳ
स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषꣳ
सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं छायामयः
पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति
मृत्युरिति होवाच ॥ १४ ॥
[ शाकल्य–] 'तम ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है, मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता है, याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो !]।' [ याज्ञवल्क्य–] 'तुम जिसे समस्त आध्यात्मिक कार्य-करणसमूहका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। जो भी यह छायामय पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य–] 'उसका कौन देवता है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'मृत्यु' ऐसा कहा ॥ १४ ॥
| तम एव यस्यायतनम् । तम इति शार्वराद्यन्धकारः परिगृह्यते । | तम ही जिसका आयतन है। 'तम' शब्दसे रात्रि आदिका अन्धकार |
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८०१
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८०१
| अध्यात्मं छायामयोऽज्ञानमयः पुरुषः । तस्य का देवतेति ? मृत्युरिति होवाच । मृत्युरधिदैवतं तस्य निष्पत्तिकारणम् ॥ १४ ॥ | ग्रहण किया जाता है । अध्यात्मपक्षमें छायामय—अज्ञानमय पुरुष ही तम है । उसका कौन देवता है । 'मृत्यु' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । अधिदैवत मृत्यु¹ ही उस ( छायामय पुरुष ) की निष्पत्तिका कारण है ॥ १४ ॥ |
रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणँ स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमादर्शे पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेत्यसुरिति होवाच ॥ १५॥
[ शाकल्य—] 'रूप ही जिसका आयतन है, नेत्र लोक है और मन ज्योति है, उस पुरुषको जो भी सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसंघातका परायण जानता है, वही ज्ञाता है । हे याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो ! ] १' [ याज्ञवल्क्य—] 'तुम जिसे सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसंघातका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । जो भी यह आदर्श ( दर्पण ) के भीतर पुरुष है, वही यह है । हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'उसका देवता कौन है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'असु' ऐसा कहा ॥ १५ ॥
| रूपाण्येव यस्यायतनम् । पूर्वं साधारणानि रूपाण्युक्तानि, इह तु | रूप ही जिसका आयतन है । पहले साधारण रूप कहे गये हैं, |
१. 'मृत्यु' शब्दसे यहाँ ईश्वर ( अव्याकृत ) समझना चाहिये, जैसा कि यह श्रुति कहती है—'मृत्युनैवेदमावृतमासीत्' अर्थात् पहले यह मृत्युसे ही व्याप्त था । अविवेककी प्रवृत्ति ईश्वरके ही अधीन है, इसलिये वह अज्ञानमय आध्यात्मिक पुरुषकी उत्पत्तिका कारण है ।
बृ० उ० — ५१
८०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ८०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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| प्रकाशकानि विशिष्टानि रूपाणि गृह्यन्ते। रूपायतनस्य देवस्य विशेषाsubयतनं प्रतिबिम्बाधारमादर्शादि तस्य का देवतेति ? असुरिति होवाच। तस्य प्रतिबिम्बाख्यस्य पुरुषस्य निष्पत्तिरसोः प्राणात् ॥ १५ ॥ | किंतु यहाँ प्रकाश करनेवाले विशिष्ट रूप ग्रहण किये जाते हैं। रूप जिसका आयतन (आश्रय) है, उस देवका विशेष आयतन प्रतिबिम्बके आधारभूत आदर्शादि हैं। उसका कौन देवता है ? इसपर याज्ञवल्क्यने कहा 'असु' ( प्राण ) । अर्थात् उस प्रतिबिम्ब-संज्ञक पुरुषकी निष्पत्ति असु¹—प्राणसे होती है ॥ १५ ॥ |
आप एव यस्यायतनँ हृदयं लोको मनो-ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणँ स वै वेदिता स्यात्। याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमप्सु पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति वरुण इति होवाच ॥ १६ ॥
[ शाकल्य—] 'जल ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है और मन ज्योति है, उस पुरुषको जो भी सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसंघातका परायण जानता है, वही ज्ञाता है। हे याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही विद्वान् होनेका अभिमान कर रहे हो ! ]।' [ याज्ञवल्क्य—] 'जिसे तुम सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण बतलाते हो उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। जो भी यह जलमें पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'उसका कौन देवता है!' तब याज्ञवल्क्यने 'वरुण' ऐसा कहा ॥ १६ ॥
१. प्राणद्वारा घर्षण करनेपर ही आदर्शादि प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेके योग्य होते हैं; इसलिये असुको प्रतिबिम्बसंज्ञक पुरुषकी निष्पत्तिका कारण बतलाना उचित ही है।
ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८०३
ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८०३
| आप एव यस्य आयतनम् । साधारणाः सर्वा आप आयतनम्; वापीकूपतडागाद्याश्रयास्वप्सु विशेषावस्थानम् । तस्य का देवतेति ? वरुण इति; वरुणात् सङ्घातकर्योऽध्यात्ममाप एव वाप्याद्यपां निष्पत्तिकारणम् ॥ १६ ॥ | जल ही जिसका आयतन है। सभी साधारण जल जिसका आयतन हैं; वापी, कूप और तडागादिमें रहनेवाले जलमें जिसकी विशेष स्थिति है। उसका देवता कौन है ? इसपर याज्ञवल्क्यने कहा, 'वरुण'; क्योंकि वरुणके द्वारा संघात करनेवाला अध्यात्म जल ही वापी आदिके जलकी निष्पत्तिका कारण है¹॥ १६ ॥ |
रेत एव यस्यायतनꣳ हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणꣳ स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषꣳ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं पुत्रमयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति प्रजापतिरिति होवाच ॥ १७ ॥
[ शाकल्य— ] 'वीर्य ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है और मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसंघातका परायण जानता है, वही ज्ञाता है। हे याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही विद्वान् होनेका अभिमान कर रहे हो ! ]' [ याज्ञवल्क्य— ] 'जिसे तुम सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करण-संघातका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। जो भी यह पुत्ररूप पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य— ] 'उसका कौन देवता है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'प्रजापति' ऐसा कहा ॥ १७ ॥
१. वापी एवं कूपादिसे पिया हुआ जल जो शरीरमें मूत्रादि संघातको करता है वह वरुणसे ही होता है। रश्मियोंद्वारा पृथिवीपर गिरा हुआ जल 'वरुण' शब्दसे कहा जाता है; क्योंकि वह सूर्यकिरणोंसे पृथिवीपर गिरनेवाला जल ही पिये जानेवाले वापी-कूपादिके जलकी उत्पत्तिका कारण है, इसलिये वह जलमय अध्यात्म पुरुषका भी कारण है।
८०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ८०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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| रेत एव यस्यायतनम् । य एवायं पुत्रमयो विशेषायतनं रेत आयतनस्य, पुत्रमय इति च अस्थिमज्जाशुक्राणि पितुर्ज्ञातानि । तस्य का देवतेति ? प्रजापतिरिति होवाच । प्रजापतिः पितोच्यते, पितृतो हि पुत्रस्योत्पत्तिः ॥ १७ ॥ | वीर्य ही जिसका आयतन है। जो भी यह वीर्यरूप आयतनवाले पुरुषका पुत्ररूप विशेष आयतन है; पुत्रमय अर्थात् पितासे उत्पन्न हुए अस्थि, मज्जा और शुक्र। उसका देवता कौन है ? 'प्रजापति' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। 'प्रजापति' पिताको कहते हैं, क्योंकि पितासे ही पुत्रकी उत्पत्ति होती है ॥ १७ ॥ |
शाकल्यको चेतावनी
| अष्टधा देवलोकपुरुषभेदेन त्रिधा त्रिधा आत्मानं प्रविभज्यावस्थित एकैको देवः प्राणभेद एवोपासनार्थं व्यपदिष्टः । अधुना दिग्विभागेन पञ्चधा विभक्तस्य आत्मन्युपसंहारार्थमाह । तूष्णीम्भूतं शाकल्यं याज्ञवल्क्यो ग्रहेणेवावेशयन्नाह— | एक-एक देवता ही अपनेको देवलोक और पुरुषभेदसे¹ तीन-तीन भागोंमें विभक्त करके आठ प्रकारसे स्थित हुआ है; प्राणभेद अर्थात् पृथक्-पृथक् इन्द्रिय-समुदाय ही वह देवता है, उपासनाकी सुविधाके लिये यहाँ विभागपूर्वक उनका उपदेश किया गया है। अब विभिन्न दिशाओंके अनुसार पाँच भागोंमें विभक्त हुए उस प्राणभेदका आत्मामें उपसंहार करनेके लिये श्रुति कहती है। अपने प्रश्नोंका उत्तर पाकर मौन हुए शाकल्यको ग्रहाविष्ट-सा करते हुए याज्ञवल्क्यने कहा— |
शाकल्येति होवाच याज्ञवल्क्यस्त्वां स्विदिमे ब्राह्मणा अङ्गारावक्षयणमक्रता ३ इति ॥ १८ ॥
१. लोकका अर्थ है—सामान्य आकार, पुरुषका अर्थ है—विशेष-विशेष आकारमें स्थित चेतन तथा देवताका अर्थ है—इन दोनोंका कारण।
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८०५
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८०५
'शाकल्य !' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'इन ब्राह्मणोंने निश्चय ही तुम्हें अंगारे निकालनेका चिमटा बना रखा है' ॥ १८ ॥
| शाकल्येति होवाच याज्ञ- | 'हे शाकल्य !' ऐसा याज्ञ- |
|---|---|
| वल्क्यः। त्वां स्विदिति वितर्के, | वल्क्यने कहा। 'त्वां स्विद्' इसमें |
| इमे नूनं ब्राह्मणाः, अङ्गारावक्ष- | 'स्विद्' यह निपात वितर्क अर्थमें |
| यणम्—अङ्गारा अवक्षीयन्ते | है, निश्चय ही इन ब्राह्मणोंने तुम्हें |
| यस्मिन् सन्दंशादौ तदङ्गारावक्ष- | अङ्गारावक्षयण-जिस चिमटे आदि- |
| यणम्—तद् नूनं त्वामक्रत | पर अंगारे अवक्षीण होते अर्थात् |
| कृतवन्तो ब्राह्मणाः, त्वं तु तन्न | पड़ते हैं, उसे अङ्गारावक्षयण कहते |
| बुध्यसे आत्मानं मया दह्यमानम् | हैं-सो निश्चय ही तुम्हें इन ब्राह्मणों- |
| इत्यभिप्रायः ॥ १८ ॥ | ने आगमें जलनेवाला चिमटा ही |
| बना रखा है। अभिप्राय यह है कि | |
| मेरे द्वारा तुम्हारा दाह हो रहा | |
| है—किंतु तुम्हें इसका पता नहीं | |
| है ॥ १८ ॥ |
देवता और प्रतिष्ठासहित दिशाओंके ज्ञानकी प्रतिज्ञा
याज्ञवल्क्येति होवाच शाकल्यो यदिदं कुरु-
पञ्चालानां ब्राह्मणानत्यवादीः किं ब्रह्म विद्वानिति
दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति यद्दिशो वेत्थ
सदेवाः सप्रतिष्ठाः ॥ १९ ॥
'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा शाकल्यने कहा, 'यह जो तुम इन कुरुपाञ्चाल-देशीय ब्राह्मणोंपर आक्षेप करते हो सो क्या तुम ब्रह्मवेत्ता हो—ऐसी समझकर करते हो ?' [ याज्ञवल्क्य—मेरा ब्रह्मज्ञान यह है कि ] 'मैं देवता और प्रतिष्ठाके सहित दिशाओंका ज्ञान रखता हूँ।' [ शाकल्य— ] 'यदि तुम देवता और प्रतिष्ठाके सहित दिशाओंको जानते हो' ॥ १९ ॥
| याज्ञवल्क्येति होवाच शाकल्यः— | 'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा शाकल्यने |
|---|---|
| यदिदं कुरुपञ्चालानां ब्राह्मणा- | कहा, 'तुमने जो यह कुरुपाञ्चाल- |
| नत्यवादीः-अत्युक्तवानसि—स्वयं | देशीय ब्राह्मणोंका अतिवाद-अति- |
| भाषण (आक्षेपद्वारा तिरस्कार) किया |
८०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ८०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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| भीतास्त्वामङ्गारावक्षयणं कृतवन्त इति—किं ब्रह्म विद्वान् सन्नेवमधिक्षिपसि ब्राह्मणान् ? याज्ञवल्क्य आह—ब्रह्म विज्ञानं तावदिदं मम, किं तत् ? दिशो वेद दिग्विषयं विज्ञानं जाने । तच्च न केवलं दिश एव, सदेवा देवैः सह दिगधिष्ठातृभिः, किञ्च सप्रतिष्ठाः प्रतिष्ठाभिश्च सह । इतर आह—यद् यदि दिशो वेत्थ सदेवाः, सप्रतिष्ठा इति, सफलं यदि विज्ञानं त्वया प्रतिज्ञातम् ॥ १९ ॥ | है कि 'ये स्वयं भयग्रस्त होनेके कारण तुम्हें अंगारे निकालनेका चिमटा बनाये हुए हैं' सो क्या तुम ब्रह्मवेत्ता होनेके कारण इस प्रकार ब्राह्मणोंका तिरस्कार करते हो ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरा ब्रह्मज्ञान तो यह है, क्या है ? कि मैं दिशाओंको जानता हूँ, मुझे दिशासम्बन्धी विज्ञानका ज्ञान है । वह भी केवल दिशाओंका ही नहीं, सदेवा तथा सप्रतिष्ठा दिशाओंका ज्ञान है अर्थात् दिशाओंके अधिष्ठाता देवताओंके साथ और दिशाओंके अधिष्ठानसहित उन दिशाओंका मुझे ज्ञान है । इसपर शाकल्यने कहा, 'यदि तुम देव और प्रतिष्ठाके सहित दिशाओंको जानते हो—यदि तुमने फलसहित विज्ञानकी प्रतिज्ञा की है तो' ॥ १९ ॥ |
देवता और प्रतिष्ठासहित पूर्वदिशाका वर्णन
किन्दे॑वतोऽस्यां प्राच्यां दिश्यसीत्यादित्यदेवत इति स आदित्यः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति चक्षुषीति कस्मिन्नु चक्षुः प्रतिष्ठितमिति रूपेष्विति चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति कस्मिन्नु रूपाणि प्रतिष्ठितानीति हृदय इति होवाच हृदयेन हि रूपाणि जानाति हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि भवन्तीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २० ॥
ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८०७
ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८०७
'इस पूर्वदिशामें तुम किस देवतासे युक्त हो?' [ याज्ञवल्क्य— 'वहाँ मैं आदित्य (सूर्य) देवतावाला हूँ।' [शाकल्य-] 'वह आदित्य किसमें प्रतिष्ठित है?' [याज्ञवल्क्य-] 'नेत्रमें।' [शाकल्य-] 'नेत्र किसमें प्रतिष्ठित है? [याज्ञवल्क्य-] 'रूपोंमें, क्योंकि पुरुष नेत्रसे ही रूपोंको देखता है।' [शाकल्य-] 'रूप किसमें प्रतिष्ठित है?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'हृदयमें, क्योंकि पुरुष हृदयसे ही रूपोंको जानता है, अतः हृदयमें ही रूप प्रतिष्ठित हैं।' [शाकल्य-] 'हे याज्ञवल्क्य! यह बात ऐसी ही है' ॥ २० ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| किन्देवतः का देवतास्य तव दिग्भूतस्य । असौ हि याज्ञवल्क्यो हृदयमात्मानं दिक्षु पञ्चधा विभक्तं दिगात्मभूतम्, तद्द्वारेण सर्वं जगदात्मत्वेनोपगम्य, अहमस्मि दिगात्मेति व्यवस्थितः, पूर्वाभिमुखः—सप्रतिष्ठावचनाद्, यथा याज्ञवल्क्यस्य प्रतिज्ञा तथैव पृच्छति—किन्देवतस्त्वमस्यां दिश्यसीति । | तुम किस देवतावाले हो ? अर्थात् दिशास्वरूपमें स्थित हुए तुम्हारा कौन देवता है ? यहाँ इस प्रकार प्रश्न करनेका कारण यह है कि वे याज्ञवल्क्य दिशाओंमें पांच प्रकारसे विभक्त अपने हृदयोपाधिक आत्माको 'दिगात्म' स्वरूप समझकर और उसके द्वारा सम्पूर्ण जगत्को आत्मभावसे जानकर 'मैं दिक्स्वरूप हूँ' इस प्रकार स्थित हैं; वह पूर्वाभिमुख है [ इसलिये पहले पूर्वदिशाके विषयमें ही पूछा जाता है ] तथा उसका कथन है कि प्रतिष्ठासहित दिशाओंको जानता हूँ, [इससे यह जान पड़ता है कि वह समस्त जगत्को आत्मरूप जानकर स्थित है।] इसलिये जैसी याज्ञवल्क्यकी प्रतिज्ञा है, वैसे ही शाकल्य पूछता है—'तुम इस पूर्वदिशामें कौन-से देवतावाले हो ?' |
| सर्वत्र हि वेदे यां यां देवतामुपास्ते, इहैव तद्भूतस्तां तां प्रति- | वेदमें सभी जगह पुरुष जिस-जिस देवताकी उपासना करता है, इस लोकमें तद्रूप हुआ ही वह |
८०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ८०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| पद्यत इति; तथा च वक्ष्यति— “देवो भूत्वा देवानप्येति” (बृ० उ० ४ । १ । २) इति। अस्यां प्राच्यां का देवता दिगात्मनस्तवाधिष्ठात्री, कया देवतया त्वं प्राचीदिग्रूपेण सम्पन्न इत्यर्थः। <br><br> इतर आह—आदित्यदेवत इति। प्राच्यां दिशि मम आदित्यो देवता, सोऽहमादित्यदेवतः। सदेवा इत्येतदुक्तम्, सप्रतिष्ठा इति तु वक्तव्यमित्याह— स आदित्यः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति ? चक्षुषीति। अध्यात्मतश्चक्षुष आदित्यो निष्पन्न इति हि मन्त्रब्राह्मणवादाः— “चक्षोः सूर्यो अजायत” (यजु० ३१ । १२) “चक्षुष आदित्यः” (ऐ० उ० १ । ४) इत्यादयः। कार्यं हि कारणे प्रतिष्ठितं भवति। <br><br> कस्मिन्नु चक्षुः प्रतिष्ठितमिति ? रूपेष्विति; रूपग्रहणाय हि रूपात्मकं चक्षू रूपेण प्रयुक्तम्; यैर्हि | उस-उस देवताको प्राप्त होता है। ऐसा ही “देव होकर देवोंमें लीन होता है” यह श्रुति कहेगी। [अतः प्रश्न यह है कि] दिशारूपमें स्थित हुए तुम्हारा इस पूर्व दिशामें कौन अधिष्ठाता देवता है ? अर्थात् किस देवताके द्वारा तुम प्राची दिशाके रूपमें सम्पन्न हुए हो ? <br><br> इतर (याज्ञवल्क्य) ने कहा, ‘[प्राची दिशामें] मैं आदित्यदेवतावाला हूँ। अर्थात् पूर्वदिशामें आदित्य मेरा देवता है, इसलिये मैं आदित्यदेवतावाला हूँ।’ इस प्रकार देवतासहित प्राची दिशा तो कह दी, अब प्रतिष्ठासहित कहनी है, इसलिये शाकल्य कहता है-‘वह आदित्य किसमें प्रतिष्ठित है?’ [याज्ञवल्क्य-] ‘चक्षुमें’। अध्यात्म चक्षुसे आदित्य निष्पन्न हुआ है—ऐसा “चक्षुसे सूर्य उत्पन्न हुआ” “चक्षुसे आदित्य” इत्यादि मन्त्र और ब्राह्मण कहते हैं। और कार्य कारणमें ही प्रतिष्ठित होता है; [अतः आदित्य चक्षुमें प्रतिष्ठित है]। <br><br> ‘चक्षु किसमें प्रतिष्ठित है?’ ‘रूपोंमें’; क्योंकि रूपात्मक चक्षु रूपको ग्रहण करनेके लिये ही रूपसे प्रेरित होता है; और जिन रूपों- |
| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८०९ |
| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८०९ |
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| रूपैः प्रयुक्तं तैरात्मग्रहणायारब्धं चक्षुः। तस्मात् सादित्यं चक्षुः सह प्राच्या दिशा सह तत्स्थैः सर्वै रूपेषु प्रतिष्ठितम्।<br><br>चक्षुषा सह प्राची दिक् सर्वा रूपभूता, तानि च कस्मिन्नु रूपाणि प्रतिष्ठितानीति ? हृदय इति होवाच। हृदयारब्धानि रूपाणि। रूपाकारेण हि हृदयं परिणतम्। यस्माद् हृदयेन हि रूपाणि सर्वो लोको जानाति। हृदयमिति बुद्धिमनसो एकीकृत्य निर्देशः; तस्माद् हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि। हृदयेन हि स्मरणं भवति रूपाणां वासना- त्मनाम्; तस्माद् हृदये रूपाणि प्रतिष्ठितानि इत्यर्थः। एवमेवै- तद् याज्ञवल्क्य ॥ २० ॥ | द्वारा वह प्रयुक्त होता है, उन्होंने अपनेको ग्रहण करनेके लिये ही चक्षुको उत्पन्न किया है। अतः आदित्यके सहित चक्षु प्राची दिशा और उस दिशामें स्थित समस्त पदार्थोंके सहित रूपोंमें प्रतिष्ठित है।<br><br>[ शाकल्य— ] चक्षुके सहित सम्पूर्ण प्राची दिशा रूपमात्र हैं, किंतु वे रूप किसमें प्रतिष्ठित हैं?' याज्ञवल्क्यने 'हृदयमें' ऐसा कहा। रूप हृदयसे आरम्भ (उत्पन्न) होने- वाले हैं; हृदय ही रूपाकारसे परि- णत होता है, क्योंकि सब लोग हृदयसे ही रूपको जानते हैं। 'हृदयम्' इस प्रकार मन और बुद्धि- को एक करके कहा गया है; अतः हृदयमें ही रूप प्रतिष्ठित हैं। वासनारूप रूपोंका हृदयसे ही स्मरण होता है; अतः तात्पर्य यह है कि हृदयमें ही रूप प्रतिष्ठित हैं। [शाकल्य—] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २० ॥ |
देवता और प्रतिष्ठाके सहित दक्षिण दिशाका वर्णन
किन्देवतोऽस्यां दक्षिणायां दिश्यसीति यमदेवत इति स यमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति यज्ञ इति कस्मिन्नु यज्ञः प्रतिष्ठित इति दक्षिणायामिति कस्मिन्नु दक्षिणा प्रतिष्ठि-
८१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ८१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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तेति श्रद्धायामिति यदा ह्येव श्रद्धत्तेऽथ दक्षिणां ददाति श्रद्धायाँ ह्येव दक्षिणा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु श्रद्धा प्रतिष्ठितेति हृदय इति होवाच हृदयेन हि श्रद्धां जानाति हृदये ह्येव श्रद्धा प्रतिष्ठिता भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २१ ॥
'इस दक्षिण दिशामें तुम कौन-से देवतावाले हो ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'यमदेवतावाला हूँ' [ शाकल्य— ] 'वह यमदेवता किसमें प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'यज्ञमें।' [ शाकल्य— ] 'यज्ञ किसमें प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'दक्षिणामें।' [ शाकल्य— ] 'दक्षिणा किसमें प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'श्रद्धामें, क्योंकि जब पुरुष श्रद्धा करता है, तभी दक्षिणा देता है, अतः श्रद्धामें ही दक्षिणा प्रतिष्ठित है।' [ शाकल्य— ] 'श्रद्धा किसमें प्रतिष्ठित है ?' याज्ञवल्क्यने कहा, हृदयमें, क्योंकि हृदयसे ही पुरुष श्रद्धाको जानता है, अतः हृदयमें ही श्रद्धा प्रतिष्ठित है।' [ शाकल्य— ] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २१ ॥
| किन्देवतोऽस्यां दक्षिणायां दिश्यसीति पूर्ववत् । दक्षिणायां दिशि का देवता तव ? यमदेवत इति, यमो देवता मम दक्षिणादिग्भूतस्य । स यमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति ? यज्ञ इति—यज्ञे कारणे प्रतिष्ठितो यमः सह दिशा । कथं पुनर्यज्ञस्य कार्यं यमः ? इत्युच्यते—ऋत्विग्भिर्निष्पादितो यज्ञो दक्षिणया यजमानस्तेभ्यो यज्ञं निष्क्रीय तेन | 'किन्देवतोऽस्यां दक्षिणायां दिशि असि' इस वाक्यका अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये। अर्थात् दक्षिण दिशामें तुम्हारा कौन देवता है? 'मैं यम देवतावाला हूँ अर्थात् दक्षिण दिशारूपसे स्थित हुए मेरा यम देवता है।' 'वह यम किसमें प्रतिष्ठित है?' 'यज्ञमें' अर्थात् दिशाके सहित यम अपने कारणभूत यज्ञमें प्रतिष्ठित है। किंतु यम यज्ञका कार्य क्यों है ? सो बतलाया जाता है—यज्ञ ऋत्विजोंद्वारा निष्पन्न किया जाता है, उनसे दक्षिणाद्वारा यजमान यज्ञको खरीदकर उस यज्ञके द्वारा यमके |
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८११
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८११
| यज्ञेन दक्षिणां दिशं सह यमेनाभिजयति । तेन यज्ञे यमः कार्यत्वात् प्रतिष्ठितः सह दक्षिणया दिशा। | सहित दक्षिण दिशाको जीत लेता है। अतः [यज्ञका] कार्य होनेके कारण दक्षिण दिशाके सहित यम यज्ञमें प्रतिष्ठित है। |
| कस्मिन्नु यज्ञः प्रतिष्ठित इति ? दक्षिणायामिति—दक्षिणया स निष्क्रीयते, तेन दक्षिणाकार्यं यज्ञः। कस्मिन्नु दक्षिणा प्रतिष्ठितेति ? श्रद्धायामिति—श्रद्धा नाम दित्सुत्वम् आस्तिक्यबुद्धिभक्तिसहिता । कथं तस्यां प्रतिष्ठिता दक्षिणा ? यस्माद् यदा ह्येव श्रद्धत्तेऽथ दक्षिणां ददाति, नाश्रद्दधद् दक्षिणां ददाति; तस्माच्छ्रद्धायां ह्येव दक्षिणा प्रतिष्ठितेति । | 'यज्ञ किसमें प्रतिष्ठित है ?' इसके उत्तरमें कहा—'दक्षिणामें; क्योंकि वह दक्षिणासे खरीद लिया जाता है, इसलिये यज्ञ दक्षिणाका कार्य है। 'दक्षिणा किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'श्रद्धामें'—श्रद्धासे अभिप्राय है देनेकी इच्छा अर्थात् भक्तिसहित आस्तिक्यबुद्धि। उसमें दक्षिणा किस प्रकार प्रतिष्ठित है ? क्योंकि जब पुरुष श्रद्धा करता है, तभी दक्षिणा देता है; श्रद्धा किये बिना दक्षिणा नहीं देता। इसलिये श्रद्धामें ही दक्षिणा प्रतिष्ठित है। |
| कस्मिन्नु श्रद्धा प्रतिष्ठितेति ? हृदय इति होवाच—हृदयस्य हि वृत्तिः श्रद्धा यस्मात्, हृदयेन हि श्रद्धां जानाति, वृत्तिश्च वृत्तिमति प्रतिष्ठिता भवति । तस्माद् हृदये ह्येव श्रद्धा प्रतिष्ठिता भवतीति । एवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २१ ॥ | 'श्रद्धा किसमें प्रतिष्ठित है ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'हृदयमें'—क्योंकि श्रद्धा हृदयकी ही वृत्ति है, हृदयसे ही पुरुष श्रद्धाको जानता है और वृत्ति वृत्तिमान्में प्रतिष्ठित रहा करती है। इसलिये हृदयमें ही श्रद्धा प्रतिष्ठित है। [शाकल्य—] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २१ ॥ |
देवता और प्रतिष्ठाके सहित पश्चिमदिशाका वर्णन
किन्देवतोऽस्यां प्रतीच्यां दिश्यसीति वरुणदेवत इति स वरुणः कस्मिन् प्रतिष्ठित इत्यप्स्विति कस्मिन्नन्वापः प्रति-
८१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ८१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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ष्ठिता इति रेतसीति कस्मिन्नु रेतः प्रतिष्ठितमिति हृदय इति तस्मादपि प्रतिरूपं जातमाहुर्हृदयादिव सृप्तो हृदयादिव निर्मित इति हृदये ह्येव रेतः प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २२ ॥
'इस पश्चिम दिशामें तुम कौन-से देवतावाले हो ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'वरुणदेवतावाला हूँ।' [ शाकल्य—] 'वह वरुण किसमें प्रतिष्ठित है?' [ याज्ञवल्क्य—] 'जलमें।' [ शाकल्य—] 'जल किसमें प्रतिष्ठित है?' [ याज्ञवल्क्य—] 'वीर्यमें।' [ शाकल्य—] 'वीर्य किसमें प्रतिष्ठित है?' [ याज्ञवल्क्य—] 'हृदयमें, इसीसे पिताके अनुरूप उत्पन्न हुए पुत्रको लोग कहते हैं कि यह मानो पिताके हृदयसे ही निकला है, मानो पिताके हृदय-से ही बना है, क्योंकि हृदयमें ही वीर्य स्थित रहता है।' [ शाकल्य—] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २२ ॥
| किन्देवतोऽस्यां प्रतीच्यां दिश्यसीति ? तस्यां वरुणोऽधि-देवता मम । स वरुणः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति ? अप्स्विति—अपां हि वरुणः कार्यम्, "श्रद्धा वा आपः" "श्रद्धातो वरुणमसृजत" इति श्रुतेः । कस्मिन्नवापः प्रतिष्ठिता इति ? रेतसीति—"रेतसो ह्यापः सृष्टाः" इति श्रुतेः ।<br><br>कस्मिन्नु रेतः प्रतिष्ठितमिति ? हृदय इति—यस्माद् हृदयस्य कार्यं रेतः । कामो हृदयस्य वृत्तिः, | 'इस पश्चिम दिशामें तुम किस देवतावाले हो ?' 'उस दिशामें मेरा अधिष्ठातृदेव वरुण है।' 'वह वरुण किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'जलमें'—क्योंकि वरुण जलका ही कार्य है, जैसा कि "श्रद्धा ही जल है," "श्रद्धासे वरुणको रचा" इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है।' 'जल किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'वीर्यमें'—यह बात "वीर्यसे जलकी रचना हुई" इस श्रुतिसे कही गयी है।<br><br>'वीर्य किसमें प्रतिष्ठित है?' 'हृदयमें, —क्योंकि वीर्य हृदयका ही कार्य है। काम हृदयकी वृत्ति है, |
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१३
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१३
| कामिनो हि हृदयाद्रेतोऽधि-<br>स्कन्दति । तस्मादपि प्रतिरूप-<br>मनुरूपं पुत्रं जातमाहुर्लौकिकाः—<br>अस्य पितुर्हृदयादिवायं पुत्रः<br>स्रुतो निःसृतः, हृदयादिव<br>निर्मितो यथा सुवर्णेन निर्मितः<br>कुण्डलः। तस्मात् हृदये ह्येव रेतः<br>प्रतिष्ठितं भवतीति । एवमेवैतत्<br>याज्ञवल्क्य ॥ २२ ॥ | क्योंकि कामीके हृदयसे ही वीर्य<br>स्खलित होता है । इसीसे पिताके<br>प्रतिरूप-अनुरूप उत्पन्न हुए पुत्रके<br>विषयमें लौकिक पुरुष ऐसा कहते<br>हैं कि यह पुत्र मानो अपने पिताके<br>हृदयसे ही स्रुत-विशेषरूपसे निःसृत<br>हुआ है, स्वर्णसे बने हुए कुण्डलके<br>समान मानो यह उसके हृदयसे ही<br>बना है, अतः हृदयमें ही वीर्य<br>प्रतिष्ठित है ।' 'याज्ञवल्क्य ! यह<br>बात ऐसी ही है' ॥ २२ ॥ |
देवता और प्रतिष्ठाके सहित उत्तर दिशाका वर्णन
किन्देवतोऽस्यामुदीच्यां दिश्यसीति सोमदेवत<br> इति स सोमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति दीक्षायामिति<br> कस्मिन्नु दीक्षा प्रतिष्ठितेति सत्य इति तस्मादपि<br> दीक्षितमाहुः सत्यं वदेति सत्ये ह्येव दीक्षा प्रतिष्ठितेति<br> कस्मिन्नु सत्यं प्रतिष्ठितमिति हृदय इति होवाच<br> हृदयेन हि सत्यं जानाति हृदये ह्येव सत्यं प्रति-<br> ष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २३ ॥
'इस उत्तर दिशामें तुम किस देवतावाले हो ?' [ याज्ञवल्क्य— ]<br> सोमदेवतावाला हूँ ।' [ शाकल्य— ] 'वह सोम किसमें प्रतिष्ठित है ?'<br> [ याज्ञवल्क्य— ] 'दीक्षामें ।' [ शाकल्य— ] 'दीक्षा किसमें प्रतिष्ठित है ?'<br> [ याज्ञवल्क्य— ] 'सत्यमें, इसीसे दीक्षित पुरुषसे कहते हैं कि सत्य बोलो,<br> क्योंकि सत्यमें ही दीक्षा प्रतिष्ठित है ।' [ शाकल्य— ] 'सत्य किसमें<br> प्रतिष्ठित है ?' 'हृदयमें ।' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, क्योंकि पुरुष हृदयसे ही<br> सत्यको जानता है, अतः हृदयमें ही सत्य प्रतिष्ठित है । [ शाकल्य— ]<br> 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २३ ॥
८१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ ]
| ८१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ ] |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| किन्देवतोऽस्यामुदीच्यां दिश्यसीति ? सोमदेवत इति—सोम इति लतां सोमं देवतां चैकीकृत्य निर्देशः। स सोमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति ? दीक्षायामिति—दीक्षितो हि यजमानः सोमं क्रीणाति, क्रीतेन सोमेनेष्ट्वा ज्ञानवानुत्तरां दिशं प्रतिपद्यते सोमदेवताधिष्ठितां सौम्याम्। | 'इस उत्तर दिशामें तुम कौन देवतावाले हो ?' 'सोमदेवतावाला हूँ'—'सोम' इस शब्दसे सोमलता और सोमदेवताको एक मानकर निर्देश किया गया है। 'वह सोम किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'दीक्षामें'—क्योंकि दीक्षित यजमान ही सोमको खरीदता है और खरीदे हुए सोमसे यजन करके वह ज्ञानवान् सोमदेवतासे अधिष्ठित सोमसम्बन्धिनी उत्तर दिशाको प्राप्त होता है। |
| कस्मिन्नु दीक्षा प्रतिष्ठितेति ! सत्य इति; कथम् ? यस्मात् सत्ये दीक्षा प्रतिष्ठिता, तस्मादपि दीक्षितमाहुः—सत्यं वदेति; कारणभ्रेषे कार्यभ्रेषो मा भूदिति; सत्ये ह्येव दीक्षा प्रतिष्ठितेति। | 'दीक्षा किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'सत्यमें,; किस प्रकार ? क्योंकि दीक्षा सत्यमें प्रतिष्ठित है, इसीसे दीक्षित पुरुषसे कहते हैं कि 'सत्य बोलो' जिससे कि [ सत्यरूप ] कारणका नाश होनेसे [ दीक्षारूप ] कार्यका नाश न हो; अतः सत्यमें ही दीक्षा प्रतिष्ठित है। |
| कस्मिन्नु सत्यं प्रतिष्ठितमिति ? हृदय इति होवाच; हृदयेन हि सत्यं जानाति; तस्माद् हृदये ह्येव सत्यं प्रतिष्ठितं भवतीति। एवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥२३॥ | 'सत्य किसमें प्रतिष्ठित है ?' इसपर याज्ञवल्क्यने कहा, 'हृदयमें; क्योंकि हृदयसे ही सत्यको जानता है; इसलिये सत्य हृदयमें ही प्रतिष्ठित है।' [ शाकल्य— ] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २३ ॥ |