बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१२४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ ]
| १२४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ ] |
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| प्राजापत्य प्रजापतेरीश्वरस्यापत्यं हिरण्यगर्भस्य वा हे प्राजापत्य व्यूह विगमय रश्मीन्। समूह संक्षिपात्मनस्तेजो येनाहं शक्नुयां द्रष्टुम्। तेजसा ह्यपहतदृष्टिर्न शक्नुयां तत्स्वरूपमञ्जसा द्रष्टुम्, विद्योतन इव रूपाणाम्; अतः उपसंहर तेजः।<br><br>यत्ते तव रूपं सर्वकल्याणानामप्यतिशयेन कल्याणं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि, पश्यामो वयं वचनव्यत्ययेन। योऽसौ भूर्भुवःस्स्वर्व्याहृत्यवयवः पुरुषः, पुरुषाकृतित्वात् पुरुषः, सोऽहमस्मि भवामि। अहरहमिति चोपनिषद उक्तत्वाद्रादित्यचाक्षुषयोस्तदेवेदं | करता है, इसलिये सूर्य है। 'हे प्राजापत्य'—प्रजापति अर्थात् ईश्वर अथवा हिरण्यगर्भके पुत्र होनेके कारण हे प्राजापत्य! रश्मियोंको 'व्यूह'—निवृत्त कर। और अपने तेजको 'समूह'—समेट ले, जिससे मैं सत्य-ब्रह्मको देख सकूँ। जिस प्रकार बिजलीकी चमकमें मनुष्य रूपोंको नहीं देख सकते, उसी प्रकार तेरे तेजसे दृष्टि नष्ट हो जानेके कारण मैं तेरे स्वरूपको साक्षात् नहीं देख सकता; अतः अपने तेजका उपसंहार कर।<br><br>तेरा जो सम्पूर्ण कल्याणोंमें अतिशय कल्याणमय कल्याणतम रूप है, तेरे उस रूपको मैं देखता हूँ। 'पश्यामो वयम्' इस प्रकार १वचनव्यत्ययके द्वारा बहुवचन करके 'हम देखते हैं' ऐसा अर्थ समझना चाहिये। यह जो 'भूर्भुवः स्वः' इन व्याहृतिरूप अवयवोंवाला पुरुष है, जो पुरुषाकार होनेके कारण पुरुष है, वह मैं ही हूँ। आदित्य और चाक्षुष पुरुषकी 'अहर्' और 'अहम्' ये उपनिषदें (गुह्यनाम) कही गयी हैं, अतः यहाँ उन्हींका परामर्श |
१. 'व्यत्ययो बहुलम्' इस पाणिनिसूत्रके अनुसार।
ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२४५
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२४५ |
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| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| परामृश्यते, सोऽहमस्म्यमृतमिति सम्बन्धः । | किया जाता है; अर्थात् 'सोऽहमस्मि अमृतम्'--वह मैं अमृत हूँ, इस प्रकार इसका सम्बन्ध है। |
| ममामृतस्य सत्यस्य शरीरपाते शरीरस्थो यः प्राणो वायुः सोऽनिलं बाह्यं वायुमेव प्रतिगच्छतु । तथान्या देवताः स्वां स्वां प्रकृतिं गच्छन्तु । अथेदमपि भस्मान्तं सत् पृथिवीं यातु शरीरम् । | शरीरपात होनेपर मुझ अमृतरूप सत्यका जो शरीरस्थ वायु-प्राण है वह अनिल अर्थात् बाह्य वायुको ही प्राप्त हो जाय ! तथा दूसरे देव अपने-अपने मूलको प्राप्त हो जायें । तथा यह शरीर भी भस्मशेष होकर पृथिवीको प्राप्त हो जाय । |
| अथेदानीमात्मनः संकल्पभूतां मनसि व्यवस्थितामग्निदेवतां प्रार्थयते— ॐ क्रतो—ओमिति क्रतो इति च सम्बोधनार्थाविह, ॐकारप्रतीकत्वादोम्, मनोमयत्वाच्च क्रतुः, हे ॐ हे क्रतो स्मर स्मर्त्तव्यम्, अन्तकाले हि त्वत्स्मरणवशादिष्टा गतिः प्राप्यते, अतः प्रार्थ्यते—यन्मया कृतं तत् स्मर । पुनरुक्तिरादरार्था । | अब इस समय मनमें स्थित अपने संकल्पभूत अग्निदेवताकी प्रार्थना की जाती है--ॐ क्रतो--'ॐ' शब्द और 'क्रतो' शब्द सम्बोधनके लिये हैं; अग्नि ओङ्कार रूप प्रतीकवाला होनेके कारण 'ॐ' तथा मनोमय होनेके कारण 'क्रतु' है, हे ॐ ! हे क्रतो ! जो स्मरण करनेयोग्य है, उसका स्मरण कर, अन्तकालमें तेरे स्मरणके अधीन ही इष्ट गति प्राप्त की जाती है; अतः प्रार्थना है कि मैंने जो कुछ किया है, उसे स्मरण कर । यहाँ 'ॐ क्रतो स्मर' इत्यादि वाक्यकी पुनरुक्ति आदरके लिये है । |
१२४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५
| १२४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |
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| किञ्च हे अग्ने नय प्रापय सुपथा शोभनेन मार्गेण राये धनाय कर्मफलप्राप्तय इत्यर्थः । न दक्षिणेन कृष्णेन पुनरावृत्तियुक्तेन, किं तर्हि ? शुक्लेनैव सुपथा अस्मान् । विश्वानि सर्वाणि हे देव वयुनानि प्रज्ञानानि सर्वप्राणिनां विद्वान् । किञ्च युयोध्यपनय वियोजयास्मदस्मत्तो जुहुराणं कुटिलमेनः पापं पापजातं सर्वम् । तेन पापेन विमुक्ता वयमेष्याम-उत्तरेण यथा त्वत्प्रसादात् ।<br><br>किंतु वयं तुभ्यं परिचर्यां कर्तुं न शक्नुमो भूयिष्ठां बहुतमां ते तुभ्यं नमउक्तिं नमस्कारवचनं विधेम, नमस्कारोक्त्या परिचरेमेत्यर्थः, अन्यत् कर्तुमशक्ताः सन्त इति ॥ १ ॥ | तथा हे अग्ने ! हमें ‘राये’ अर्थात् कर्मफलकी प्राप्तिके लिये सुपथसे--शुभमार्गसे ले चल । पुनरावृत्तियुक्त दक्षिण अर्थात् धूममार्गसे मत ले चल, तो किससे ? सुपथ अर्थात् उज्ज्वल [देवयान] मार्गसे ही हमें ले चल । हे देव ! तू सम्पूर्ण प्रज्ञानोंको जाननेवाला है । हमारे सम्पूर्ण जुहुराण--कुटिल एनस्--पापोंको हमसे ‘युयोधि’--दूर कर । उन पापोंसे विमुक्त होकर हम तेरी कृपासे उत्तरायणमार्गसे जायँगे ।<br><br>किंतु हम तेरी परिचर्या--सेवा करनेमें समर्थ नहीं हैं, अतः तेरे लिये अनेकों बार नमउक्ति--नमस्कार-वचनोंका विधान करें । अर्थात् और कुछ करनेमें असमर्थ होनेके कारण नमस्कारोक्तिद्वारा तेरी परिचर्या करें ॥ १ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये पञ्चदशं सूर्याग्निप्रार्थनाब्राह्मणम् ॥१५॥
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
षष्ठ अध्याय
षष्ठ अध्याय
प्रथम ब्राह्मण
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| ॐ प्राणो गायत्रीत्युक्तम् । कस्मात् पुनः कारणात् प्राणभावो गायत्र्या न पुनर्वागादिभाव इति? यस्माज्ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च प्राणः; न वागादयो ज्येष्ठ्यश्रेष्ठ्यभाजः । कथं ज्येष्ठत्वं श्रेष्ठत्वं च प्राणस्येति तन्निर्दिधारयिषयेदमारभ्यते ।<br><br>अथवोक्थयजुःसामक्षत्रादिभावैः प्राणस्यैवोपासनमभिहितं सत्स्वप्यन्येषु चक्षुरादिषु । तत्र हेतुमात्रमिहानन्तर्येण सम्बध्यते । न पुनः पूर्वशेषता । विवक्षितं तु खिलत्वादस्य काण्डस्य पूर्वत्र यदनुक्तं विशिष्टफलं प्राणविषयमुपासनं तद् वक्तव्यमिति । | ॐ प्राण गायत्री है—ऐसा पहले कहा जा चुका है । किंतु गायत्रीका प्राणभाव ही किस कारणसे है, वागादिभाव क्यों नहीं है ? क्योंकि प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है, वागादि ज्येष्ठता और श्रेष्ठताके पात्र नहीं हैं । प्राणका ज्येष्ठत्व और श्रेष्ठत्व क्यों है—इसका निश्चय करनेकी इच्छासे यह [आगे-का ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है ।<br><br>अथवा उक्थ, यजुः, साम, क्षत्रादि भावोंसे चक्षु आदि अन्य इन्द्रियोंके रहते हुए भी प्राणकी ही उपासना बतलायी गयी है । यहाँ उसका हेतुमात्र है, जो उसके अनन्तर होनेके कारण उससे सम्बन्ध रखता है । यह पूर्व ग्रन्थका शेष नहीं है । इसका विवक्षित विषय विशिष्टफलवती प्राणोपासना ही है । यह काण्ड उसका खिलस्वरूप होनेके कारण जो पूर्वग्रन्थमें नहीं कहा गया, उसीको यहाँ बतलाना है । |
१२४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६
| १२४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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ज्येष्ठ-श्रेष्ठ-दृष्टिसे प्राणोपासना
ॐ यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवति प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥
जो कोई ज्येष्ठ और श्रेष्ठको जानता है, वह अपने ज्ञातिजनोंमें ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है। प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। जो इस प्रकार उपासना करता है, वह अपने ज्ञातिजनोंमें तथा और भी जिन लोगोंमें चाहता है, उनमें भी ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है ॥ १ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| यः कश्चिद्ध वा इत्यवधारणार्थौ। यो ज्येष्ठश्रेष्ठगुणं वक्ष्यमाणं यो वेदासौ भवत्येव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च। एवं फलेन प्रलोभितः सन् प्रश्नायाभिमुखीभूतस्तस्मै चाह—'प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ।<br><br>कथं पुनरवगम्यते प्राणो ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्चेति ? यस्मान्निषेककाल एव शुक्रशोणितसम्बन्धः प्राणादिकलापस्याविशिष्टः; तथापि नाप्राणं शुक्रं विरोहतीति प्रथमो वृत्तिलाभः प्राणस्य चक्षुरादिभ्यः अतो ज्येष्ठो वयसा प्राणः। | जो कोई; यहाँ 'ह' और 'वै' निश्चयार्थक हैं, जो आगे बतलाये जानेवाले ज्येष्ठ और श्रेष्ठ गुणवाले प्राणको जानता है, वह ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो ही जाता है। इस प्रकार फलसे प्रलोभित होनेपर जब साधक प्रश्नके लिये अभिमुख होता है तो उससे श्रुति कहती है—'प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है।'<br><br>किंतु यह जाना कैसे जाता है कि प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। क्योंकि गर्भाधानके समय ही यद्यपि प्राणादिसमूहका शुक्र और शोणितसे समान सम्बन्ध है, तो भी बिना प्राणके शुक्रमें शरीरका अङ्कुर नहीं होता; अतः चक्षु आदि इन्द्रियोंकी अपेक्षा प्राणको पहले वृत्तिलाभ होता है; इसलिये आयुके द्वारा प्राण ज्येष्ठ है। |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२४९ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२४९ |
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| निषेककालादारभ्य गर्भं पुष्यति प्राणः; प्राणे हि लब्धवृत्तौ पश्चाच्चक्षुरादीनां वृत्तिलाभः; अतो युक्तं प्राणस्य ज्येष्ठत्वं चक्षुरादिषु । | गर्भाधानके समयसे ही प्राण गर्भका पोषण करता है। प्राणके वृत्तियुक्त हो जानेके पीछे ही चक्षु आदिको वृत्तिलाभ होता है; अतः चक्षु आदिमें प्राणका ज्येष्ठत्व उचित ही है। | | भवति तु कश्चित् कुले ज्येष्ठः; गुणहीनत्वान्न श्रेष्ठः। मध्यमः कनिष्ठो वा गुणाढ्यत्वाद् भवेच्छ्रेष्ठो न ज्येष्ठः। न तु तथेहेत्याह—‘प्राण एव तु ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च।’ कथं पुनः श्रेष्ठ्यमवगम्यते प्राणस्य ? तदिह संवादेन दर्शयिष्यामः । | कुलमें कोई व्यक्ति (आयुमें) ज्येष्ठ तो होता है, किंतु गुणहीन होनेके कारण वह श्रेष्ठ नहीं माना जाता। इसी प्रकार गुणसम्पन्न होनेके कारण मध्यम अथवा कनिष्ठ श्रेष्ठ तो होता है, किंतु ज्येष्ठ नहीं माना जाता; किंतु यहाँ ऐसा नहीं है। (यही बात श्रुति बतलाती है)—‘प्राण ही ज्येष्ठ है और श्रेष्ठ भी’। प्राणकी श्रेष्ठता कैसे जानी जाती है? यह बात यहाँ हम संवादसे प्रदर्शित करेंगे। | | सर्वथापि तु प्राणं ज्येष्ठश्रेष्ठगुणं यो वेदोपास्ते, स स्वानां ज्ञातीनां ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च भवति ज्येष्ठश्रेष्ठगुणोपासनसामर्थ्यात्। स्वव्यतिरेकेणापि च येषां मध्ये ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च भविष्यामीति बुभूषति भवितुमिच्छति तेषामपि ज्येष्ठश्रेष्ठप्राणदर्शी ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च भवति। | जो किसी भी १प्रकार ज्येष्ठ-श्रेष्ठगुणवाले प्राणको जानता अर्थात् उसकी उपासना करता है, वह ज्येष्ठ-श्रेष्ठ गुणवान्की उपासनाके सामर्थ्यसे अपनोंमें अर्थात् ज्ञातिजनोंमें ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है। अपनोंसे भिन्न दूसरे जिन-किन्हींमें भी वह ‘मैं ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाऊँ’ इस प्रकार ज्येष्ठ-श्रेष्ठ होनेकी इच्छा करता है, उनमें भी यह ज्येष्ठ-श्रेष्ठ प्राणोपासक ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाता है। |
१. अर्थात् प्राणका ज्येष्ठत्व और श्रेष्ठत्व आरोपित हो अथवा वास्तविक।
बृ० उ० ७६—
१२५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६
| १२५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| ननु वयोनिमित्तं ज्येष्ठत्वम्; तदिच्छात्तः कथं भवति ? इत्युच्यते । नैष दोषः, प्राणवद् वृत्तिलाभस्यैव ज्येष्ठत्वस्य विवक्षितत्वात् ॥ १ ॥ | किंतु ज्येष्ठत्व तो आयुके कारण होता है, वह इच्छासे कैसे हो सकता है। ऐसी शङ्का होनेपर कहते हैं—यह दोष नहीं है; क्योंकि प्राणके समान [यहाँ भी] वृत्तिलाभ ही ज्येष्ठत्वरूपसे विवक्षित है¹॥ १ ॥ |
वसिष्ठादृष्टिसे वाक्की उपासना
यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति वाग् वै वसिष्ठा वसिष्ठः स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ २ ॥
जो वसिष्ठाको जानता है, वह स्वजनोंमें वसिष्ठ होता है। वाक् ही वसिष्ठा है। जो ऐसी उपासना करता है, वह स्वजनोंमें तथा और भी जिनमें चाहता है, उनमें वसिष्ठ होता है ॥ २ ॥
| यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति । तद्दर्शनानुरूपेण फलम् । येषां च ज्ञातिव्यतिरेकेण वसिष्ठो भवितुमिच्छति तेषां च वसिष्ठो भवति । उच्यतां तर्हि कासौ वसिष्ठेति ? वाग् वै वसिष्ठा । वासयत्यतिशयेन वस्ते | जो वसिष्ठाको जानता है, वह स्वजनोंमें वसिष्ठ होता है। उसकी उपासनाके अनुसार ही फल होता है। तथा अपनी जातिसे भिन्न जिन लोगोंमें वह वसिष्ठ होना चाहता है, उनमें भी वसिष्ठ हो जाता है। अच्छा तो बतलाइये, वसिष्ठा कौन है? [इसपर कहते हैं—] वाक् ही वसिष्ठा है। अतिशयरूपसे बसाती है, अथवा |
१. जिस प्रकार अन्नभक्षणादिके कारण चक्षु आदि इन्द्रियोंके वृत्तिलाभका कारण होनेसे प्राण ज्येष्ठ है, उसी प्रकार अन्य जीवोंका जीवन प्राणोपासकके अधीन होनेसे वह उनमें ज्येष्ठ है। उसका ज्येष्ठत्व आयुके कारण नहीं है।
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५१
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५१
| वेति वसिष्ठा । वाग्मिनो हि धनवन्तो वसन्त्यतिशयेन ।<br><br>आच्छादनार्थस्य वा वसेर्वसिष्ठा । अभिभवन्ति हि वाचा वाग्मिनोऽन्यान् । तेन वसिष्ठगुणवत्परिज्ञानाद् वसिष्ठगुणो भवतीति दर्शनानुरूपं फलम् ॥ २ ॥ | बसती है, इसलिये यह वसिष्ठा है; क्योंकि जो अच्छे वक्ता धनवान् होते हैं, वे ही अतिशयतापूर्वक बसते हैं।<br><br>अथवा आच्छादनार्थक 'वस्' धातुसे 'वसिष्ठा' शब्द निष्पन्न होता है। वाक्कुशल लोग वाणीसे दूसरोंका पराभव कर देते हैं। अतः वसिष्ठगुणयुक्त पदार्थके विज्ञानसे उपासक वसिष्ठगुणवान् हो जाता है—इस प्रकार ज्ञानके अनुसार फल होता है ॥ २ ॥ |
प्रतिष्ठादृष्टिसे चक्षुकी उपासना
यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे चक्षुर्वै प्रतिष्ठा चक्षुषा हि समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं वेद ॥ ३ ॥
जो प्रतिष्ठाको जानता है, वह समान देश-कालमें प्रतिष्ठित होता है और दुर्गम देश-कालमें भी प्रतिष्ठित होता है। चक्षु ही प्रतिष्ठा है। चक्षुसे ही समान और दुर्गम देश-कालमें प्रतिष्ठित होता है। जो ऐसी उपासना करता है, वह समान और दुर्गममें प्रतिष्ठित होता है ॥ ३ ॥
| यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठत्यनयेति प्रतिष्ठा तां प्रतिष्ठां प्रतिष्ठागुणवतीं यो वेद तस्यैतत् फलम्—प्रतितिष्ठति समे देशे काले च तथा दुर्गे विषमे च दुर्गमने च देशे दुर्भिक्षादौ वा काले विषमे। | जो कोई प्रतिष्ठाको जानता है, जिससे प्रतिष्ठित होता है, उसे प्रतिष्ठा कहते हैं; उस प्रतिष्ठाको अर्थात् प्रतिष्ठागुणवती (चक्षु) को जो जानता है, उसे यह फल मिलता है कि वह समान देश और कालमें प्रतिष्ठित होता है तथा दुर्ग—विषम यानी दुर्गम्य देशमें और दुर्भिक्षादि विषम कालमें भी प्रतिष्ठित होता है। |
१२५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १२५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| यद्येवमुच्यतां काऽसौ प्रतिष्ठा ?<br><br>चक्षुर्वै प्रतिष्ठा । कथं चक्षुषः<br><br>प्रतिष्ठात्वम् ? इत्याह-‘चक्षुषा हि<br><br>समे च दुर्गे च दृष्ट्वा प्रतितिष्ठति’<br><br>अतोऽनुरूपं फलं प्रतितिष्ठति समे<br><br>प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं<br><br>वेदेति ॥ ३ ॥ | यदि ऐसी बात है, तो बताइये यह प्रतिष्ठा क्या है ? ( ऐसा प्रश्न होनेपर कहा जाता है-) चक्षु ही प्रतिष्ठा है। चक्षुका प्रतिष्ठात्व कैसे है ? यह श्रुति बतलाती है-‘क्योंकि सम और विषम देश-कालमें चक्षुसे देखकर ही पुरुष प्रतिष्ठित होता है। अतः जो ऐसी उपासना करता है,उसे उसके अनुरूप यह फल मिलता है कि वह सममें प्रतिष्ठित होता है और दुर्गमें भी प्रतिष्ठित होता है ॥३॥ |
सम्पदृष्टिसे श्रोत्रकी उपासना
यो ह वै संपदं वेद सँहास्मै पद्यते यं कामं कामयते श्रोत्रं वै संपच्छ्रोत्रे हीमे सर्वे वेदा अभिसंपन्नाः सँहास्मै पद्यते यं कामं कामयते य एवं वेद ॥४॥
जो सम्पदको जानता है, वह जिस भोगकी इच्छा करता है, वही उसे सम्यक् प्रकारसे प्राप्त हो जाता है। श्रोत्र ही सम्पद है। श्रोत्रमें ही ये सब वेद सब प्रकार निष्पन्न हैं। जो ऐसी उपासना करता है, वह जिस भोगकी इच्छा करता है, वही उसे सम्यक् प्रकारसे प्राप्त हो जाता है॥ ४॥
| यो ह वै संपदं वेद संपद्गुण-<br><br>युक्तं यो वेद तस्यैतत् फलमस्मै<br><br>विदुषे संपद्यते ह । किम् ? यं<br><br>कामं कामयते स कामः; किं पुनः<br><br>संपद्गुणकम्? श्रोत्रं वै संपत्, कथं | जो भी सम्पदको जानता है, अर्थात् सम्पदगुणवान्को जानता है,उसे यह फल मिलता है—उस विद्वान्को प्राप्त हो जाता है। क्या प्राप्त हो जाता है ? जिस भोगकी वह इच्छा करता है वह भोग। अच्छा तो, सम्पद्गुणयुक्त क्या है ? श्रोत्र ही |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२५३ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२५३ |
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| पुनः श्रोत्रस्य संपद्गुणत्वम् ? इत्युच्यते। श्रोत्रे सति हि यस्मात् सर्वे वेदा अभिसंपन्नाः श्रोत्रेेन्द्रियवतोऽध्येयत्वात्। वेदविहितकर्मायत्ताश्च कामास्तस्माच्छ्रोत्रं संपत् अतो विज्ञानानुरूपं फलम्; सं हास्मै पद्यते यं कामं कामयते य एवं वेद ॥ ४ ॥ | सम्पद है। किंतु श्रोत्रका सम्पद्गुणत्व किस प्रकार है? सो बतलाया जाता है। श्रोत्रके रहते ही सम्पूर्ण वेद सब प्रकार निष्पन्न होते हैं, क्योंकि वे श्रोत्रेन्द्रियवान्द्वारा हो अध्ययन किये जा सकते हैं और भोग तो वेदविहित कर्मोंके ही अधीन हैं, इसलिये श्रोत्र सम्पद् है। अतः विज्ञान (उपासना) के अनुरूप ही फल मिलता है। जो ऐसी उपासना करता है, वह जिस भोगकी इच्छा करता है, वही उसे मिल जाता है।४। |
आयतनदृष्टिसे मनकी उपासना
यो ह वा आयतनं वेदायतन ँस्वानां भवत्यायतनं जनानां मनो वा आयतनमायतनँ स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ॥ ५ ॥
जो आयतनको जानता है, वह स्वजनोंका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है। मन ही आयतन है जो इस प्रकार उपासना करता है; वह स्वजनोंका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है ॥ ५ ॥
| यो ह वा आयतनं वेद-आयतनमाश्रयस्तदू यो वेदायतनंस्वानां भवत्यायतनं जनानामन्येषामपि। किं पुनस्तदायतनम् इत्युच्यते-मनोवा आयतनमाश्रय इन्द्रियाणां | जो भी आयतनको जानता है-आयतन आश्रयको कहते हैं, उसे जो कोई जानता है, वह स्वजनोंका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है। अच्छा तो वह आयतन क्या है? इसपर कहा जाता है-मन ही आयतन अर्थात् इन्द्रिय |
१२५४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६
१२५४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६
| विषयाणां च। मनआश्रिता हि विषया आत्मनो भोग्यत्वं प्रतिपद्यन्ते; मनःसंकल्पवशानि चेन्द्रियाणि प्रवर्तन्ते निवर्तन्ते च; अतो मन आयतनमिन्द्रियाणाम्। अतो दर्शनानुरूपेण फलमायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ॥ ५ ॥ | और विषयोंका आश्रय है। मनके आश्रित रहकर ही विषय आत्माके भोग्यत्वको प्राप्त होते हैं। मनके संकल्पके अधीन ही इन्द्रियाँ [ अपने अपने विषयोंमें] प्रवृत्त और [उनसे] निवृत्त होती हैं; अतः मन इन्द्रियोंका आयतन है। इसलिये जो ऐसी उपासना करता है, उसे इस दृष्टिके अनुरूप ही यह फल मिलता है कि वह स्वजनोंका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है ॥ ५ ॥ |
प्रजातिदृष्टिसे रेतस्की उपासना
यो ह वै प्रजातिं वेद प्रजायते ह प्रजया पशुभी रेतो वै प्रजातिः प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्य एवं वेद ॥ ६ ॥
जो भी प्रजापतिको जानता है वह प्रजा और पशुओंद्वारा प्रजात-(वृद्धिको प्राप्त) होता है। रेतस् ही प्रजापति है। जो ऐसा जानता है, वह प्रजा और पशुओंद्वारा प्रजात होता है ॥ ६ ॥
| यो ह वै प्रजातिं वेद प्रजायते ह प्रजया पशुभिश्च संपन्नो भवति।<br><br>रेतो वै प्रजातिः। रेतसा प्रजननेन्द्रियमुपलक्ष्यते। तद्विज्ञानानुरूपं फलं प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्य एवं वेद ॥ ६ ॥ | जो प्रजातिको जानता है, वह प्रजात होता अर्थात् प्रजा और पशुओंद्वारा सम्पन्न होता है। वीर्य ही प्रजाति है। 'रेतस्' शब्दसे प्रजननेन्द्रिय उपलक्षित होती है। जो ऐसी उपासना करता है, उसे उसकी दृष्टिके अनुरूप यह फल मिलता है कि वह प्रजा और पशुओंसे प्रजात (सम्पन्न) होता है ॥ ६ ॥ |
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५५
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५५
अपनी श्रेष्ठताके लिये विवाद करते हुए वागादि प्राणोंका ब्रह्माके पास जाना और ब्रह्माद्वारा उसका निर्णय करनेके लिये एक कसौटी बताना
ते हेमे प्राणा अहँश्रेयसे विवदमाना ब्रह्म जग्मुस्तद्धोचुः को नो वसिष्ठ इति तद्धोवाच यस्मिन् व उत्क्रान्त इदँ शरीरं पापीयो मन्यते स वो वसिष्ठ इति ॥ ७ ॥
वे ये प्राण 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' इस प्रकार विवाद करते हुए ब्रह्माके पास गये। उससे बोले 'हममें कौन वसिष्ठ है?' उसने कहा, 'तुममेंसे जिसके उत्क्रमण करनेपर (शरीरसे अलग हो जानेपर) यह शरीर अपनेको अधिक पापी मानता है, वही तुममें वसिष्ठ है ॥ ७ ॥
| ते हेमे प्राणा वागादयोऽहं श्रेयसेऽहं श्रेयानित्येतरस्मै प्रयोजनाय विवदमाना विरुद्धं वदमाना ब्रह्म जग्मुर्ब्रह्म गतवन्तो ब्रह्मशब्दवाच्यं प्रजापतिं गत्वा च तद् ब्रह्म होचुरुक्तवन्तः—को नोऽस्माकं मध्ये वसिष्ठः; कोऽस्माकं मध्ये वसति च वासयति च ?<br><br>तद् ब्रह्म तैः पृष्टं सद्धोवाचोक्तवद् यस्मिन् वो युष्माकं मध्य उत्क्रान्ते निर्गते शरीरादिदं शरीरं पूर्वस्मादतिशयेन पापीयः पापतरं मन्यते लोकः—शरीरं हि नामा- | वे ये वागादि प्राण 'अहं श्रेयसे'—'मैं श्रेष्ठ हूँ' इस प्रयोजनके लिये आपसमें विवाद करते हुए—एक दूसरेके विरुद्ध बोलते हुए ब्रह्माके पास गये। अर्थात् ब्रह्मशब्दवाच्य प्रजापतिके पास गये; उन्होंने जाकर उस ब्रह्मासे कहा—'हममें कौन वसिष्ठ है; हममेंसे कौन बसता और बसाता है?'<br><br>उनसे पूछे जानेपर वह ब्रह्मा बोला, 'तुममेंसे जिसके उत्क्रमण करनेपर—शरीरसे निकल जानेपर इस शरीरको लोग पहलेकी अपेक्षा अत्यन्त पापीय—अधिक पापमय (अपवित्र) मानते हैं—यों तो अनेकों अपवित्र वस्तुओंका संघात |
१२५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६
| १२५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| नेकाशुचिसंघातत्वाज्जीवतोऽपि पाप्मैव, ततोऽपिकष्टतरं यस्मिन्नुत्क्रान्ते भवति; वैराग्यार्थमिदमुच्यते—पापीय इति; स वो युष्माकं मध्ये वसिष्ठो भविष्यति। जानन्नपि वसिष्ठं प्रजापतिर्नोवाचायं वसिष्ठ इतीतरेषामप्रियपरिहाराय ॥ ७॥ | होनेके कारण जीवित पुरुषका भी शरीर पापमय ही है, किंतु जिसके उत्क्रमण करनेपर यह उससे भी अधिक कष्टतर (दुर्दशाग्रस्त) हो जाय वही तुममेंसे वसिष्ठ होगा।' 'पापीय:' यह बात वैराग्यके लिये कही गयी है। प्रजापतिने वसिष्ठको जानते हुए भी दूसरोंको अप्रिय न लगे इसके लिये 'यह वसिष्ठ है' ऐसा [स्पष्ट] नहीं कहा ॥ ७॥ |
अपनी उत्कृष्ट्ताकी परीक्षाके लिये वाक्का उत्क्रमण और पुनः प्रवेश
| त एवमुक्ता ब्रह्मणा प्राणा आत्मनो वीर्यपरीक्षणाय क्रमेणोच्चक्रमुः; तत्र— | ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उन प्राणोंने अपने पराक्रमकी परीक्षा करनेके लिये क्रमशः उत्क्रमण करना आरम्भ किया; उनमेंसे— |
वाघोच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत महते जीवितुमिति ते होचुर्यथाकला अवदन्तो वाचा प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वाँसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥
[पहले] वाक्ने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्षतक बाहर रहकर लौटकर कहा—'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके थे?' यह सुनकर उन्होंने कहा, 'जैसे मूक पुरुष वाणीसे न बोलते हुए भी प्राणसे प्राणक्रिया करते, नेत्रसे देखते, श्रोत्रसे सुनते, मनसे जानते और रेतस्से प्रजा
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५७
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५७
( सन्तान ) की उत्पत्ति करते हुए [ जीवित रहते हैं ], वैसे ही हम जीवित रहे।' यह सुनकर वाक्ने शरीरमें प्रवेश किया ॥ ८ ॥
| वागेव प्रथमं हास्माच्छरीरादुच्चक्रामोत्क्रान्तवती । सा चोत्क्रम्य संवत्सरं प्रोष्य प्रोषिता भूत्वा पुनरागत्योवाच—कथमशकत शक्तवन्तो यूयं मदृते मां बिना जीवितुमिति ? <br><br> त एवमुक्ता ऊचुर्यथा लोकेऽकला मूका अवदन्तो वाचा प्राणन्तः प्राणनव्यापारं कुर्वन्तः प्राणेन पश्यन्तो दर्शनव्यापारं चक्षुषा कुर्वन्तस्तथा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसा कार्याकार्यादिविषयं प्रजायमाना रेतसा पुत्रानुत्पादयन्त एवमजीविषम वयमित्येवं प्राणैर्दत्तोत्तरा वागात्मनोऽस्मिन्नवसिष्ठत्वं बुद्ध्वा प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥ | पहले वाक्ने ही इस शरीरसे उत्क्रमण किया । उसने उत्क्रमण कर एक वर्ष बाहर रहकर फिर लौटकर कहा, 'तुमलोग मेरे बिना किस प्रकार जीवित रह सके थे ?' <br><br> उससे इस प्रकार कहे जानेपर वे बोले, 'जिस प्रकार लोकमें अकल अर्थात् मूक पुरुष वाणीसे न बोलते हुए प्राणसे प्राणन अर्थात् प्राणव्यापार करते हुए, नेत्रसे देखते—दर्शनव्यापार करते हुए, इसी प्रकार श्रोत्रसे सुनते हुए, मनसे कार्याकार्यादि विषयको जानते हुए और वीर्यसे प्रजनन अर्थात् पुत्रादिकी उत्पत्ति करते हुए [जीवित रहते हैं], उसी प्रकार हम भी जीवित रहे; प्राणोंसे ऐसा उत्तर पाकर वाक्ने अपनेको वसिष्ठ न समझकर इस शरीरमें प्रवेश किया ॥ ८ ॥ |
चक्षुका उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश
चक्षुर्होच्चक्राम तत् संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथान्धा अपश्यन्तश्चक्षुषा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः
१२५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १२५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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श्रोत्रेण विद्वाꣳसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजी-
विष्मेति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥
चक्षुने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले—'जिस प्रकार अन्धे लोग नेत्रसे न देखते हुए भी प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, श्रोत्रसे सुनते, मनसे जानते और रेतस्से प्रजा उत्पन्न करते हुए [जीवित रहते हैं], उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर चक्षुने प्रवेश किया ॥ ९ ॥
श्रोत्रका उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश
श्रोत्रꣳ होच्चक्राम तत् संवत्सरं प्रोष्यागत्यो-
वाच कथमशकत महते जीवितुमिति ते होचुर्यथा
बधिरा अशृण्वन्तः श्रोत्रेण प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो
वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा विद्वाꣳसो मनसा प्रजायमाना
रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥
श्रोत्रने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले—'जिस प्रकार बहरे आदमी कानोंसे न सुनते हुए भी प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते, मनसे जानते और रेतस्से प्रजा उत्पन्न करते हुए [जीवित रहते हैं], उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर श्रोत्रने प्रवेश किया ॥ १० ॥
मनका उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश
मनो होच्चक्राम तत् संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच
कथमशकत महते जीवितुमिति ते होचुर्यथा मुग्धा अवि-
द्वाꣳसो मनसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्त-
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५९
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५९
इच्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण प्रजायमाना रेतसैवमजी- विष्मेति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥
मनने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले, 'जिस प्रकार मुग्ध पुरुष मनसे न समझते हुए भी प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते, कानसे सुनते और रेतस्से प्रजा उत्पन्न करते हुए [ जीवित रहते हैं ], उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर मनने शरीरमें प्रवेश किया ॥ ११ ॥
रेतस्का उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश
रेतो होच्चक्राम तत् संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा क्लीबा अप्रजायमाना रेतसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वाꣳसो मनसैवम- जीविष्मेति प्रविवेश ह रेतः ॥ १२ ॥
रेतस्ने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर फिर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले, 'जिस प्रकार नपुंसक लोग रेतस्से प्रजा उत्पन्न न करते हुए भी प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते, श्रोत्रसे सुनते और मनसे जानते हुए [ जीवित रहते हैं ], उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर वीर्यने शरीरमें प्रवेश किया ॥ १२ ॥
| तथा चक्षुर्होच्चक्रामेत्यादि पूर्ववत् । श्रोत्रं मनः प्रजातिरिति ॥ ९—१२ ॥ | इसी प्रकार चक्षुर्होच्चक्राम' इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है। अबतक श्रोत्र, मन, प्रजाति [रेतस्] इत्यादिने उत्क्रमण किया ॥ ९—१२ ॥ |
१२६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १२६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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प्राणके उत्क्रमण करते ही अन्य इन्द्रियोंका विचलित हो जाना और उसकी श्रेष्ठता स्वीकार करना
अथ ह प्राण उत्क्रमिष्यन् यथा महासुहयः सैन्धवः पड्वीशशङ्कून् संवृहेदेवँ हैवेमान् प्राणान् संववर्ह ते होचुर्मा भगव उत्क्रमीर्न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुमिति तस्यो मे बलिं कुरुतेति तथेति ॥ १३ ॥
फिर प्राण उत्क्रमण करने लगा, तो जिस प्रकार सिन्धुदेशीय महान् अश्व पैर बांधनेके खूँटोंको उखाड़ डालता है, उसी प्रकार वह इन सब प्राणोंको स्थानच्युत करने लगा। उन्होंने कहा, 'भगवन् ! आप उत्क्रमण न करें, आपके बिना हम जीवित नहीं रह सकते।' प्राणने कहा, 'अच्छा तो मुझे बलि (भेंट) दिया करो।' [अन्य इन्द्रियोंने कहा—] 'बहुत अच्छा' ॥ १३ ॥
| अथ ह प्राण उत्क्रमिष्यन्नु- | फिर प्राण 'उत्क्रमिष्यन्'— |
|---|---|
| त्क्रमणं करिष्यंस्तदानीमेव स्वस्था- | उत्क्रमण करने लगा। उसी समय |
| नात् प्रचलिता वागादयः। | वागादि प्राण अपने स्थानसे |
| किमिव ? इत्याह—यथा लोके | चलायमान हो गये। किसके |
| महांश्चासौ सुहयश्च महासुहयः | समान ? यह बतलाते हैं—जिस |
| शोभनो हयो लक्षणोपेतो महान् | प्रकार लोकमें महासुहयः—जो |
| परिमाणतः सिन्धुदेशे भवः | महान् हो और सुहय—शोभन हय |
| सैन्धवोऽभिजनतः पड्वीशशङ्- | अर्थात् सुलक्षण-सम्पन्न अश्व |
| कून् पादबन्धनशङ्कून् पड्वी- | (घोड़ा) हो तथा परिमाणतः महान् |
| शाश्च ते शङ्कवश्च तान् संवृहे- | हो एवं सैन्धव'—सिन्धुदेशमें उत्पन्न |
| हुआ अर्थात् उत्तम जातिका हो, वह | |
| जिस प्रकार परीक्षाके लिये सवारके | |
| चढ़ते ही पड्वीश शङ्कुओंको—पैर | |
| बाँधनेके खूँटोंको—जो पड्वीश हों | |
| और शङ्कु हों, उनको संवृहेत्— |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | १२६१ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | १२६१ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-भाषार्थ |
|---|---|
| दुष्टच्छेद्युगपदुत्खनेदश्वारोह आरूढे परीक्षणाय; एवं हैवेमान् वागादीन् प्राणान् संववर्होत्खतवान् स्वस्थानाद् अंशितवान् । | उखाड़ डालता है; इसी प्रकार उसने इन वागादि प्राणोंको 'संवर्ह'—उखाड़ दिया—अपने स्थानसे विचलित कर दिया। |
| ते वागादयो होचुर्ह भगवो भगवन् मोत्क्रमीर्यस्मान्न वै शक्ष्यामस्त्वदृते त्वां विना जीवितुमिति । यद्येवं मम श्रेष्ठता विज्ञाता भवद्भिरहमत्र श्रेष्ठस्तस्य उ मे मम बलिं करं कुरुत करं प्रयच्छतेति । | उन वागादिने कहा, 'हे भगवन्! आप उत्क्रमण न करें; क्योंकि आपके बिना हम जीवित नहीं रह सकते।' [ प्राण बोला—] 'यदि ऐसी बात है तो तुमलोगोंको मेरी श्रेष्ठताका पता लग गया; यहाँ मैं ही श्रेष्ठ हूँ। अतः उस मुझको तुमलोग बलि दिया करो अर्थात् कर (भेंट) दिया करो। |
| अयं च प्राणसंवादः कल्पितो विदुषः श्रेष्ठपरीक्षणप्रकारोपदेशः । अनेन हि प्रकारेण विद्वान् को नु खल्वत्र श्रेष्ठ इति परीक्षणं करोति । स एष परीक्षणप्रकारः संवादभूतः कथ्यते; न ह्यन्यथा संहत्यकारिणां सतामेषामञ्जसैव संवत्सरमात्रमेवैकैकस्य निर्गमनाद्युपपद्यते । तस्माद् विद्वानेवानेन प्रकारेण विचारयति वागादीनां प्रधानबुभुत्सुरुपासनाय । बलिं प्रार्थिताः सन्तः प्राणास्तथेति प्रतिज्ञातवन्तः ॥ १३ ॥ | यह प्राणसंवाद कल्पित है, इससे विद्वान्के लिये श्रेष्ठ पुरुषकी परीक्षा करनेके प्रकारका उपदेश दिया गया है। इसी प्रकार विद्वान् 'यहाँ श्रेष्ठ कौन है?' इसकी परीक्षा करता है। वह यह परीक्षाका प्रकार संवादरूपसे कहा गया है; नहीं तो इन मिलकर कार्य करनेवाले वागादिका एक-एक करके एक-एक वर्षतक साक्षात्रूपसे बाहर निकलना आदि सम्भव नहीं है। अतः वागादिमेंसे प्रधानको जाननेकी इच्छावाला उपासक ही उपासनाके लिये इस प्रकार विचार करता है। प्राणद्वारा बलि माँगे जानेपर वागादि प्राणोंने 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर प्रतिज्ञा की ॥ १३ ॥ |
१२६२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६
१२६२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६
वागादिकृत प्राणकी स्तुति और उसे अन्न तथा वस्त्र-प्रदान
सा ह वागुवाच यद् वा अहं वसिष्ठास्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीति यद् वा अहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठोऽसीति चक्षुर्यद् वा अहँ संपदस्मि त्वं तत् संपदसीति श्रोत्रं यद् वा अहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति मनो यद् वा अहं प्रजातिरस्मि त्वं तत्प्रजातिरसीति रेतस्तस्यो मे किमन्नं किं वास इति यदिदं किञ्चाश्वभ्य आ कृमिभ्य आ कीटपतङ्गेभ्यस्तत्तेऽन्नमापो वास इति न ह वा अस्यानन्नं जग्धं भवति नानन्नं प्रतिगृहीतं य एवमेतदनस्यान्नं वेद तद्विद्वाँ सः श्रोत्रिया अशिष्यन्त आचामन्त्यशित्वाचामन्त्येतमेव तदनमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते ॥ १४ ॥
उस वागिन्द्रियने कहा, 'मैं जो वसिष्ठा हूँ, सो तुम ही उस वसिष्ठ गुणसे युक्त हो।' 'मैं जो प्रतिष्ठा हूँ, सो तुम ही उस प्रतिष्ठासे युक्त हो' ऐसा नेत्रने कहा। 'मैं जो सम्पद् हूँ, सो तुम ही उस सम्पद्से युक्त हो' ऐसा श्रोत्रने कहा। 'मैं जो आयतन हूँ, सो तुम्हीं वह आयतन हो' ऐसा मनने कहा। 'मैं जो प्रजाति हूँ, सो तुम ही उस प्रजातिसे युक्त हो' ऐसा रेतस्ने कहा। [ प्राणने कहा—] 'किंतु ऐसे गुणोंसे युक्त होनेपर मेरा अन्न क्या है और वस्त्र क्या है?' [ वागादि बोले—] 'कुत्ते, कृमि और कीट-पतङ्गोंसे लेकर यह जो कुछ भी है, वह सब तेरा अन्न है और जल ही वस्त्र है।' [ उपासनाका फल —] 'जो इस प्रकार प्राणके अन्नको जानता है, उसके द्वारा अभक्ष्यभक्षण नहीं होता और अभक्ष्यका प्रतिग्रह (संग्रह) भी नहीं होता। ऐसा जाननेवाले श्रोत्रिय भोजन करनेसे पूर्व आचमन करते हैं तथा भोजन करके आचमन करते हैं। इसीको वे उस प्राणको अनग्न करना मानते हैं ॥ १४ ॥
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२६३
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२६३
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-भाष्यार्थ |
|---|---|
| सा ह वाक् प्रथमं बलिदानाय प्रवृत्ता ह किलोवाचोक्तवती यद् वा अहं वसिष्ठास्मि यन्मम वसिष्ठत्वं तत्तवैव तेन वसिष्ठगुणेन त्वं तद्वसिष्ठोऽसीति । यद् वा अहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठोऽसि या मम प्रतिष्ठा सा त्वमसीति चक्षुः । समानमन्यत्; संपदायतनप्रजातित्वगुणान् क्रमेण समर्पितवन्तः । | प्रथम बलि देनेके लिये प्रवृत्त हुई उस वागिन्द्रियने कहा, 'मैं जो वसिष्ठा हूँ-मेरा जो वसिष्ठत्व है, वह तुम्हारा ही है अर्थात् उस वसिष्ठत्वरूप गुणसे तुम्हीं वह वसिष्ठ हो।' 'और मैं जो प्रतिष्ठा हूँ; वह प्रतिष्ठा तुम्हीं हो, अर्थात् मेरी जो प्रतिष्ठा है वह तुम हो' ऐसा चक्षुने कहा। शेष अर्थ इसीके समान है। उन्होंने अपने सम्पद, आयतन और प्रजातित्व गुणोंको क्रमशः प्राणको समर्पित किया। |
| यद्येवं साधु बलिं दत्तवन्तो भवन्तो ब्रूत तस्य उ म एवं-गुणविशिष्टस्य किमन्नं किं वास इति ? आहुरितरे—यदिदं लोके किञ्च किञ्चिदन्नं नामापि—आ श्वभ्य आ कृमिभ्य आ कीटपतङ्गेभ्यः, यच्च श्वान्नं कृम्यन्नं कीटपतङ्गान्नं च तेन सह सर्वमेव यत् किञ्चित् प्राणिभिरद्यमानमन्नं तत् सर्वं तवान्नम्, सर्वं प्राणस्यान्नमिति दृष्टिरत्र विधीयते । | [ प्राण बोला—] 'यदि ऐसी बात है तो तुमलोगोंने अच्छी भेंट दी। अब यह बताओ कि उस ऐसे गुणवाले मेरा अन्न क्या है और वस्त्र क्या है?' अन्य प्राणोंने कहा, 'लोकमें कुत्ते, कृमि और कीट-पतङ्गादिसे लेकर जितना भी अन्न है, जो भी कुत्तेका अन्न, कृमिका अन्न और कीट-पतङ्गोंका अन्न है, उसके सहित प्राणियोंद्वारा भक्षण किया जानेवाला जितना अन्न है, वह सभी तुम्हारा अन्न है।' यहाँ 'यह सब प्राणका अन्न है' ऐसी दृष्टिका विधान किया जाता है। |