भारतकोश
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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१२३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

१२३६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| प्रतिग्रहीता वा गायत्रीविज्ञानस्तुतये कल्प्यते, दाता प्रतिग्रहीता च यद्यप्येवं सम्भाव्यते नासौ प्रतिग्रहोऽपराधक्षमः, कस्मात् ? यतोऽभ्यधिकमपि पुरुषार्थविज्ञानमवशिष्टमेव चतुर्थपादविषयं गायत्र्यास्तद्दर्शयति—<br><br>अथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति ।<br><br>यच्चैतन्नैव केनचन केनचिदपि प्रतिग्रहेणाप्यं नैव प्राप्यमित्यर्थः, यथा पूर्वोक्तानि त्रीणि पदानि । एतान्यपि नैवाप्यानि केनचित् कल्पयित्वैवमुक्तं परमार्थतः कुत उ एतावत् प्रतिगृह्णीयात् त्रैलोक्यादिसमम् । तस्माद् गायत्र्येवंप्रकारोपास्येत्यर्थः ॥ ६ ॥ | प्रतिग्रहीताकी केवल गायत्र्युपासनाकी स्तुतिके लिये ही कल्पना की गयी हो—ऐसी बात नहीं है; यद्यपि ऐसा दाता और प्रतिग्रह करनेवाला सम्भव हो सकता है, किंतु यह प्रतिग्रह कोई अपराध (दोष) करनेमें समर्थ नहीं है, क्यों ? क्योंकि गायत्रीके चतुर्थ पादका विषयभूत इससे भी अधिक पुरुषार्थविज्ञान अभी अवशिष्ट है ही। उसे श्रुति दिखलाती है—<br><br>और यह जो तपता है यही इसका तुरीय अर्थात् चौथा दर्शत परोरजा पद है। और यह जो है, किसी भी प्रतिग्रहके द्वारा आप्य अर्थात् प्राप्तव्य नहीं है, जिस प्रकार कि पूर्वोक्त तीन पद हैं। वास्तवमें तो ये भी किसीसे आप्य नहीं हैं, कल्पना करके ही ऐसा कहा है। वास्तवमें त्रैलोक्यादिके समान इतना कोई कहाँसे प्रतिग्रह करेगा ? अतः तात्पर्य यही है कि इस प्रकारकी गायत्रीकी ही उपासना करनी चाहिये ॥ ६ ॥ |


गायत्रीका उपस्थान और उसका फल

तस्या उपस्थानं गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपद्सि न हि पद्यसे । नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेऽसावदो मा प्रापदिति यं द्विष्यादसावस्मै

ब्राह्मण १४] शाङ्करभाष्यार्थ १२३७

ब्राह्मण १४] शाङ्करभाष्यार्थ १२३७


कामो मा समृद्धीति वा न हैवास्मै स कामः समृध्यते यस्मा एवमुपतिष्ठतेऽहमदः प्रापमिति वा ॥ ७ ॥

उस गायत्रीका उपस्थान—हे गायत्रि ! तू [त्रैलोक्यरूप प्रथम पादसे] एकपदी है, [ तीनों वेदरूप द्वितीय पादसे ] द्विपदी है, [ प्राण, अपान और व्यानरूप तीसरे पादसे ] त्रिपदी है और [ तुरीय पादसे ] चतुष्पदी है, [ इन सबसे परे निरुपाधिक स्वरूपसे तू ] अपद है; क्योंकि तू जानी नहीं जाती। अतः व्यवहारके अविषयभूत एवं समस्त लोकोंसे ऊपर विराजमान तेरे दर्शनीय तुरीय पदको नमस्कार है। यह पापरूपी शत्रु इस [ विघ्नाचरणरूप ] कार्यमें सफलता नहीं प्राप्त करे। इस प्रकार यह (विद्वान् ) जिससे द्वेष करता हो 'उसकी कामना पूर्ण न हो' ऐसा कहकर उपस्थान करे। जिसके लिये इस प्रकार उपस्थान किया जाता है, उसकी कामना पूर्ण नहीं होती। अथवा 'मैं इस वस्तुको प्राप्त करूँ' ऐसी कामनासे उपस्थान करे ॥ ७ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
तस्या उपस्थानं तस्या गायत्र्या उपस्थानमुपेत्य स्थानं नमस्कारणमनेन मन्त्रेण । कोऽसौ मन्त्रः ? इत्याह—हे गायत्र्यसि भवसि त्रैलोक्यपादेनैकपदी। त्रयीविद्यारूपेण द्वितीयेन द्विपदी। प्राणादिना तृतीयेन त्रिपद्यसि। चतुर्थेन तुरीयेण चतुष्पद्यसि। एवं चतुर्भिः पादैरूपासकैः पद्यसे ज्ञायसे ।<br><br>अतः परं परेण निरुपाधिकेन स्वेनात्मनापदसि । अविद्यमानं पदं यस्यास्तव येन पद्यसे साउस गायत्रीका इस मन्त्रसे उपस्थान—समीप जाकर स्थित होना अर्थात् नमस्कार होता है। वह मन्त्र कौन-सा है ? सो श्रुति बतलाती है—हे गायत्रि ! तू पूर्वोक्त रूपसे तीन लोकरूपी प्रथम पादद्वारा एकपदी है; त्रयीविद्यारूप द्वितीय पादसे द्विपदी है, प्राणादि तृतीय पादसे त्रिपदी है और चतुर्थ—तुरीय पादसे चतुष्पदी है। इस प्रकार चार पादोंसे तू उपासकोंद्वारा जानी जाती है।<br><br>इसके आगे अपने सर्वोत्तम निरुपाधिक स्वरूपसे तू अपद् है। जिस तेरा कोई पद, जिससे कि तेरा ज्ञान

१२३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

१२३८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५
संस्कृतहिन्दी
त्वमपदसि, यस्मान्न हि पद्यसे<br><br>नेति नेत्यात्मत्वात् ? अतोऽव्यव-<br><br>हारविषयाय नमस्ते तुरीयाय<br><br>दर्शताय पदाय परोरजसे ।हो, नहीं है, वह तू अपद् है; क्यों-<br>कि नेति-नेति स्वरूप होनेके कारण<br>तेरा ज्ञान नहीं होता; अतः<br>व्यवहारके अविषयभूत तेरे तुरीय<br>दर्शत ( दर्शनीय ) परोरजा (समस्त<br>लोकोंसे ऊपर विराजमान ) पदको<br>नमस्कार है ।
असौ शत्रुः पाप्मा त्वत्प्राप्ति-<br>विघ्नकरोऽदस्तदात्मनः कार्यं<br>यत् त्वत्प्राप्तिविघ्नकर्तृत्वं मा<br>प्रापन्मैव प्राप्नोतु । इतिशब्दो<br>मन्त्रपरिसमाप्त्यर्थः ।वह शत्रु पाप तेरी प्राप्तिमें<br>विघ्न करनेवाला है। वह तेरी<br>प्राप्तिमें विघ्न करनेरूप कार्यमें<br>समर्थ न हो। यहाँ 'इति' शब्द<br>मन्त्रकी समाप्तिके लिये है।
यं द्विष्याद् यं प्रति द्वेषं कुर्यात्<br><br>स्वयं विद्वांस्तं प्रत्यनेनोपस्था-<br><br>नम् । असौ शत्रुरमुकनामेति<br><br>नाम गृह्णीयादस्मै यज्ञदत्तायाभि-<br><br>प्रेतः कामो मा समृद्धि समृद्धिं<br><br>मा प्राप्नोत्विति वोपतिष्ठते । न<br><br>हैवास्मै देवदत्ताय स कामः<br><br>समृध्यते । कस्मै ? यस्मा<br><br>एवमुपतिष्ठते । अहमदो देव-<br>दत्ताभिप्रेतं प्रापमिति वोप-<br>तिष्ठते । असावदो मा प्राप-यह उपासक जिसके प्रति द्वेष<br>करता हो, उसके लिये यह<br>उपस्थान है। यह अमुक नाम-<br>वाला शत्रु-इस प्रकार यहाँ नाम<br>ले, अर्थात् इस यज्ञदत्तको इसका<br>अभिप्रेत अर्थ समृद्ध न हो अर्थात्<br>सम्पन्नताको प्राप्त न हो-ऐसा<br>कहकर उपस्थान करता है। ऐसा<br>करनेसे इस देवदत्तकी अभीष्ट<br>कामना पूर्ण नहीं ही होती है।<br>किस देवदत्तके लिये ऐसी बात<br>है ? जिसके उद्देश्यसे इस प्रकार<br>उपस्थान करता है, उसके<br>लिये । अथवा इस देवदत्तके<br>अभीष्ट अर्थको मैं प्राप्त कर लूँ-<br>इस उद्देश्यसे उपस्थान करता है।<br>'असौ' 'अदः' 'मा प्रापत्' इन

ब्राह्मण १४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२३९

ब्राह्मण १४ ]शाङ्करभाष्यार्थ१२३९

| दित्यादित्रयाणां मन्त्रपदानां यथाकामं विकल्पः ॥ ७ ॥ | तीन मन्त्रपदोंका उपासकके इच्छानुसार विकल्प हो सकता है१ ॥ ७ ॥ |


गायत्रीके मुखविधानके लिये अर्थवाद

| गायत्र्या मुखविधानायार्थवाद उच्यते— | गायत्रीका मुखविधान करनेके लिये अर्थवाद कहा जाता है— |

एतद्ध वै तज्जनको वैदेहो बुडिलमाश्वतराश्विमुवाच यन्नु हो तद् गायत्रीविदब्रूथा कथँ हस्तीभूतो वहसीति मुखँ ह्यस्याः सम्राण न विदांचकारेति होवाच तस्या अग्निरैव मुखं यदि ह वा अपि बह्विवाग्नावभ्यादधति सर्वमेव तत् संदहत्येवँ हैवैवंविद् यद्यपि बह्विव पापं कुरुते सर्वमेव तत् संप्साय शुद्धः पूतोऽजरोऽमृतः संभवति ॥ ८ ॥

उस विदेह जनकने बुडिल आश्वतराश्विसे यही बात कही थी कि 'तूने जो अपनेको गायत्रीविद् (गायत्री-तत्त्वका ज्ञाता) कहा था, तो फिर [प्रतिग्रहके दोषसे] हाथी होकर भार क्यों ढोता है?' इसपर उसने 'हे सम्राट् ! मैं इसका मुख ही नहीं जानता था' ऐसा कहा। [तब जनकने कहा—] 'इसका अग्नि ही मुख है। यदि अग्निमें लोग बहुत-सा ईंधन रख दें तो वह उस सभीको जला डालता है। इसी प्रकार ऐसा जाननेवाला बहुत-सा पाप करता रहा हो तो भी वह उस सबको भक्षण करके शुद्ध, पवित्र, अजर, अमर हो जाता है ॥ ८ ॥

| एतद्ध किल वै स्मर्यते। तत्तत्र गायत्रीविज्ञानविषये जनको वैदेहो बुडिलो नामतोऽश्वतराश्वस्यापत्य- | उस गायत्री-विज्ञानके विषयमें ऐसा ही स्मरण भी किया जाता है- विदेह जनकने बुडिल नामसे प्रसिद्ध व्यक्तिसे, जो अश्वतराश्वके पुत्र होनेके |


१. अर्थात् वह जिसके लिये जिस वस्तुकी प्राप्ति या अप्राप्तिकी कामना रखता हो; उन्हींका इनके स्थानमें उच्चारण किया जा सकता है।

१२४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

१२४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
माश्वतराश्विस्तं किलोक्तवान् । यन्नु इति वितर्के, हो अहो इत्येतत् तद् यत् त्वं गायत्रीविदब्रूथाः, गायत्रीविदस्मीति यदब्रूथाः किमिदं तस्य वचसोऽननुरूपम् ? अथ कथं यदि गायत्रीवित् प्रतिग्रहदोषेण हस्तीभूतो वहसीति ।कारण आश्वतराश्वि कहलाते थे, उनसे कहा था । 'यत् + नु' ये अव्यय वितर्कके अर्थमें हैं । 'हो ! अर्थात् अंहो ! तूने जो अपनेको गायत्रीका जानकार बतलाया था अर्थात् तू जो कहता था कि मैं गायत्रीका ज्ञाता हूँ, सो तेरे उस वचनके विपरीत ऐसा क्यों है ? यदि तू गायत्रीका ज्ञाता है तो प्रतिग्रहदोषके कारण तू हाथी बनकर भार क्यों ढोता है ?'
स प्रत्याह राज्ञा स्मारितो मुखं गायत्र्या हि यस्मादस्या हे सम्राण्न विदांचकार न विज्ञातवानस्मीति होवाच । एकाङ्गविकलत्वाद् गायत्रीविज्ञानं ममाफलं जातम् ।राजाके द्वारा स्मरण कराये जानेपर उसने उत्तर दिया, 'हे सम्राट् ! क्योंकि मैं इस गायत्रीका मुख नहीं जानता था, ऐसा उसने कहा, 'एक अङ्गसे रहित होनेके कारण मेरा गायत्रीविज्ञान निष्फल हो गया है ।'
शृणु तर्हि तस्या गायत्र्या अग्निरैव मुखम् । यदि ह वा अपि बह्विवेन्धनमग्नावभ्यादधति लौकिकाः सर्वमेव तत् संदहत्येवेन्धनमग्निः, एवं हैवैवंविद् गायत्र्या अग्निमुखमित्येवं वेत्तीत्येवंवित् स्यात् स्वयं गायत्र्यात्माग्निमुखः सन् । यद्यपि बह्विव पापं कुरुते प्रतिग्रहादिदोषं तत्[ तब जनकने कहा-] 'अच्छा तो सुन उस गायत्रीका अग्नि ही मुख है ! यदि लौकिक पुरुष अग्निमें बहुत-सा ईंधन भी डालें, तो वह अग्नि उस सभीको भस्म कर देता है । इसी प्रकार जो ऐसा जाननेवाला है, अर्थात् गायत्रीका मुख अग्नि है—ऐसा जो जानता है तथा स्वयं अग्नि मुख होकर गायत्रीका स्वरूप हो गया है, वह यद्यपि बहुत-सा पाप यानी प्रतिग्रहादि दोष भी करता रहा हो, उस

ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १२४१

ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १२४१


| सर्वं पापजातं संप्साय भक्षयित्वा शुद्धोऽग्निवत् पूतश्च तस्मात् प्रतिग्रहदोषाद् गायत्र्यात्माजरोऽमृतश्च सम्भवति ॥ ८ ॥ | सम्पूर्ण पापसमूहको 'संप्साय'—भक्षण करके वह गायत्र्यात्मा शुद्ध होकर और उस प्रतिग्रहदोषसे अग्निके समान पवित्र होकर अजर-अमर हो जाता है ॥ ८ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये
चतुर्दशं गायत्रीब्राह्मणम् ॥ १४ ॥


पञ्चदश ब्राह्मण

ज्ञानकर्मसमुच्चयकारीकी अन्तकालमें आदित्य और अग्निसे प्रार्थना

| यो ज्ञानकर्मसमुच्चयकारी सोऽन्तकाल आदित्यं प्रार्थयति, अस्ति च प्रसङ्गः, गायत्र्यास्तुरीयः पादो हि सः। तदुपस्थानं प्रकृतम्, अतः स एव प्रार्थ्यते— | जो ज्ञान और कर्मका समुच्चय करनेवाला है, वह अन्त समयमें आदित्यकी प्रार्थना करता है। यहाँ आदित्यका प्रसङ्ग तो है ही, क्योंकि वह गायत्रीका चतुर्थ पाद है। उसके उपस्थानका प्रकरण है, इसलिये उसीकी प्रार्थना की जाती है— |

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये । पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् । समूह तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि । योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि । वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तँ् शरीरम्। ॐ क्रतो स्मर कृतँ् स्मर क्रतो स्मर कृतँ् स्मर । अग्ने

१२४२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

१२४२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम १

सत्यसंज्ञक ब्रह्मका मुख ज्योतिर्मय पात्रसे आच्छादित है। हे संसारका पोषण करनेवाले सूर्यदेव ! तू उसे, मुझ सत्यधर्मके प्रति उसके दर्शनके लिये उघाड़ दे। हे पूषन् ! हे एकर्षे ! हे यम ! हे सूर्य ! हे प्राजापत्य ! अपनी किरणोंको हटा ले और तेजको समेट ले। तेरा जो अत्यन्त कल्याणमय रूप है, उसे मैं देखता हूँ। यह जो आदित्यमण्डलस्थ पुरुष है, वही मैं अमृतस्वरूप हूँ। [ मुझ अमृत एवं सत्यस्वरूप आत्माका शरीरपात हो जानेपर इस शरीरके भीतरका ] प्राणवायु इस बाह्यवायुको प्राप्त हो तथा यह शरीर भस्मशेष होकर पृथ्वीको प्राप्त हो। हे प्रणवरूप एवं मनोमय क्रतुरूप अग्निदेव ! जो स्मरण करने योग्य है, उसका स्मरण कर। मैंने जो किया है, उसका स्मरण कर। हे क्रतुरूप अग्निदेव ! जो स्मरण करने योग्य है, उसका स्मरण कर; किये हुएका स्मरण कर। हे अग्ने ! हमें तू कर्मफलकी प्राप्तिके लिये शुभ मार्ग [ यानी देवयानमार्ग ] से ले चल। हे देव ! तू सम्पूर्ण प्राणियोंके समस्त प्रज्ञानोंको जाननेवाला है। हमारे कुटिल पापोंको हमसे दूर कर। हम तुझे अनेकों बार नमस्कार करते हैं ॥ १ ॥

हिरण्मयेन ज्योतिर्मयेन पात्रेण यथा पात्रेणेष्टं वस्त्वपिधीयते, एवमिदं सत्याख्यं ब्रह्म ज्योतिर्मयेन मण्डलेनापिहितमिवासमाहितचेतसामदृश्यत्वात् । तदुच्यते— सत्यस्यापिहितं मुखं मुख्यं स्वरूपंहिरण्मय अर्थात् ज्योतिर्मय पात्रसे जिस प्रकार पात्रसे अपनी अभीष्ट वस्तु ढक दी जाती है, इसी प्रकार यह सत्यसंज्ञक ब्रह्म मानो ज्योतिर्मय मण्डलसे ढका हुआ है; क्योंकि जिनका चित्त समाहित (स्थिर एवं विशुद्ध) नहीं है, उन पुरुषोंके लिये यह अदृश्य है। वही बात कही जाती है। सत्यका मुख यानी मुख्य-

ब्राह्मण १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२४३

ब्राह्मण १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२४३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तदपिधानं पात्रमपिधानमिव दर्शनप्रतिबन्धकारणं तत् त्वं हे पूषन् ! जगतः पोषणात् पूषा सवितापोवृण्वपावृतं कुरु, दर्शनप्रतिबन्धकारणम् अपनयेत्यर्थः, सत्यधर्माय सत्यं धर्मोऽस्य मम सोऽहं सत्यधर्मा तस्मै त्वदात्मभूतायेत्यर्थः, दृष्टये दर्शनाय ।स्वरूप ढका हुआ है, उसके आवरक पात्रको जो ढक्कनके समान उसके दर्शनके प्रतिबन्धका कारण है, उसे हे पूषन् !—जगत्का पोषण करनेके कारण सूर्य 'पूषा' है—अपावृत कर; अर्थात् जो दर्शनमें रुकावट डालनेका कारण हो रहा है, उसे दृष्टये—दर्शनके लिये दूर कर दे । [ किस व्यक्तिके लिये ? ] जिस मेरा सत्य धर्म है, वह मैं सत्यधर्मा हूँ, उसके लिये अर्थात् तुम्हारे स्वरूपभूत मेरे लिये [ उस आवरणको हटा दो, जिससे मैं सत्यका साक्षात्कार करूँ ] ।
पूषन्नित्यादीनि नामान्यामन्त्रणार्थानि सवितुः, एकर्ष एकश्चासावृषिश्चैकर्षिदर्शनादृषिः, स हि सर्वस्य जगत आत्मा चक्षुश्च सन् सर्वं पश्यत्येको वा गच्छतीत्येकर्षिः—“सूर्य एकाकी चरति” इति मन्त्रवर्णात् । यम सर्वं हि जगतः संयमनं त्वत्कृतम्; सूर्य सुष्ठ्वीरयते रसान् रश्मीन् प्राणान् धियो वा जगत इति ।'पूषन्' इत्यादि नाम सूर्यको सम्बोधन करनेके लिये हैं । 'हे एकर्षे'—जो एक ऋषि हो, वह एकर्षि है। दर्शन करनेके कारण वह ऋषि है; क्योंकि वही सम्पूर्ण जगत्का आत्मा और नेत्र होकर सबको देखता है । अथवा वह अकेला ही चलता है, इसलिये एकर्षि है, जैसा कि “सूर्य अकेला चलता है” इस मन्त्रवर्णसे ज्ञात होता है । 'हे यम !'—क्योंकि सम्पूर्ण जगत्का संयमन तेरा किया हुआ ही है। 'हे सूर्य !'—जगत्के रस, रश्मि, प्राण ओर बुद्धिको सुष्ठु—सम्यक् प्रकारसे प्रेरित

१२४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ ]

१२४४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५ ]

| प्राजापत्य प्रजापतेरीश्वरस्यापत्यं हिरण्यगर्भस्य वा हे प्राजापत्य व्यूह विगमय रश्मीन्। समूह संक्षिपात्मनस्तेजो येनाहं शक्नुयां द्रष्टुम्। तेजसा ह्यपहतदृष्टिर्न शक्नुयां तत्स्वरूपमञ्जसा द्रष्टुम्, विद्योतन इव रूपाणाम्; अतः उपसंहर तेजः।<br><br>यत्ते तव रूपं सर्वकल्याणानामप्यतिशयेन कल्याणं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि, पश्यामो वयं वचनव्यत्ययेन। योऽसौ भूर्भुवःस्स्वर्व्याहृत्यवयवः पुरुषः, पुरुषाकृतित्वात् पुरुषः, सोऽहमस्मि भवामि। अहरहमिति चोपनिषद उक्तत्वाद्रादित्यचाक्षुषयोस्तदेवेदं | करता है, इसलिये सूर्य है। 'हे प्राजापत्य'—प्रजापति अर्थात् ईश्वर अथवा हिरण्यगर्भके पुत्र होनेके कारण हे प्राजापत्य! रश्मियोंको 'व्यूह'—निवृत्त कर। और अपने तेजको 'समूह'—समेट ले, जिससे मैं सत्य-ब्रह्मको देख सकूँ। जिस प्रकार बिजलीकी चमकमें मनुष्य रूपोंको नहीं देख सकते, उसी प्रकार तेरे तेजसे दृष्टि नष्ट हो जानेके कारण मैं तेरे स्वरूपको साक्षात् नहीं देख सकता; अतः अपने तेजका उपसंहार कर।<br><br>तेरा जो सम्पूर्ण कल्याणोंमें अतिशय कल्याणमय कल्याणतम रूप है, तेरे उस रूपको मैं देखता हूँ। 'पश्यामो वयम्' इस प्रकार १वचनव्यत्ययके द्वारा बहुवचन करके 'हम देखते हैं' ऐसा अर्थ समझना चाहिये। यह जो 'भूर्भुवः स्वः' इन व्याहृतिरूप अवयवोंवाला पुरुष है, जो पुरुषाकार होनेके कारण पुरुष है, वह मैं ही हूँ। आदित्य और चाक्षुष पुरुषकी 'अहर्' और 'अहम्' ये उपनिषदें (गुह्यनाम) कही गयी हैं, अतः यहाँ उन्हींका परामर्श |


१. 'व्यत्ययो बहुलम्' इस पाणिनिसूत्रके अनुसार।

ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२४५

ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ१२४५
शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
परामृश्यते, सोऽहमस्म्यमृतमिति सम्बन्धः ।किया जाता है; अर्थात् 'सोऽहमस्मि अमृतम्'--वह मैं अमृत हूँ, इस प्रकार इसका सम्बन्ध है।
ममामृतस्य सत्यस्य शरीरपाते शरीरस्थो यः प्राणो वायुः सोऽनिलं बाह्यं वायुमेव प्रतिगच्छतु । तथान्या देवताः स्वां स्वां प्रकृतिं गच्छन्तु । अथेदमपि भस्मान्तं सत् पृथिवीं यातु शरीरम् ।शरीरपात होनेपर मुझ अमृतरूप सत्यका जो शरीरस्थ वायु-प्राण है वह अनिल अर्थात् बाह्य वायुको ही प्राप्त हो जाय ! तथा दूसरे देव अपने-अपने मूलको प्राप्त हो जायें । तथा यह शरीर भी भस्मशेष होकर पृथिवीको प्राप्त हो जाय ।
अथेदानीमात्मनः संकल्पभूतां मनसि व्यवस्थितामग्निदेवतां प्रार्थयते— ॐ क्रतो—ओमिति क्रतो इति च सम्बोधनार्थाविह, ॐकारप्रतीकत्वादोम्, मनोमयत्वाच्च क्रतुः, हे ॐ हे क्रतो स्मर स्मर्त्तव्यम्, अन्तकाले हि त्वत्स्मरणवशादिष्टा गतिः प्राप्यते, अतः प्रार्थ्यते—यन्मया कृतं तत् स्मर । पुनरुक्तिरादरार्था ।अब इस समय मनमें स्थित अपने संकल्पभूत अग्निदेवताकी प्रार्थना की जाती है--ॐ क्रतो--'ॐ' शब्द और 'क्रतो' शब्द सम्बोधनके लिये हैं; अग्नि ओङ्कार रूप प्रतीकवाला होनेके कारण 'ॐ' तथा मनोमय होनेके कारण 'क्रतु' है, हे ॐ ! हे क्रतो ! जो स्मरण करनेयोग्य है, उसका स्मरण कर, अन्तकालमें तेरे स्मरणके अधीन ही इष्ट गति प्राप्त की जाती है; अतः प्रार्थना है कि मैंने जो कुछ किया है, उसे स्मरण कर । यहाँ 'ॐ क्रतो स्मर' इत्यादि वाक्यकी पुनरुक्ति आदरके लिये है ।

१२४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५

१२४६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ५

| किञ्च हे अग्ने नय प्रापय सुपथा शोभनेन मार्गेण राये धनाय कर्मफलप्राप्तय इत्यर्थः । न दक्षिणेन कृष्णेन पुनरावृत्तियुक्तेन, किं तर्हि ? शुक्लेनैव सुपथा अस्मान् । विश्वानि सर्वाणि हे देव वयुनानि प्रज्ञानानि सर्वप्राणिनां विद्वान् । किञ्च युयोध्यपनय वियोजयास्मदस्मत्तो जुहुराणं कुटिलमेनः पापं पापजातं सर्वम् । तेन पापेन विमुक्ता वयमेष्याम-उत्तरेण यथा त्वत्प्रसादात् ।<br><br>किंतु वयं तुभ्यं परिचर्यां कर्तुं न शक्नुमो भूयिष्ठां बहुतमां ते तुभ्यं नमउक्तिं नमस्कारवचनं विधेम, नमस्कारोक्त्या परिचरेमेत्यर्थः, अन्यत् कर्तुमशक्ताः सन्त इति ॥ १ ॥ | तथा हे अग्ने ! हमें ‘राये’ अर्थात् कर्मफलकी प्राप्तिके लिये सुपथसे--शुभमार्गसे ले चल । पुनरावृत्तियुक्त दक्षिण अर्थात् धूममार्गसे मत ले चल, तो किससे ? सुपथ अर्थात् उज्ज्वल [देवयान] मार्गसे ही हमें ले चल । हे देव ! तू सम्पूर्ण प्रज्ञानोंको जाननेवाला है । हमारे सम्पूर्ण जुहुराण--कुटिल एनस्--पापोंको हमसे ‘युयोधि’--दूर कर । उन पापोंसे विमुक्त होकर हम तेरी कृपासे उत्तरायणमार्गसे जायँगे ।<br><br>किंतु हम तेरी परिचर्या--सेवा करनेमें समर्थ नहीं हैं, अतः तेरे लिये अनेकों बार नमउक्ति--नमस्कार-वचनोंका विधान करें । अर्थात् और कुछ करनेमें असमर्थ होनेके कारण नमस्कारोक्तिद्वारा तेरी परिचर्या करें ॥ १ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये पञ्चदशं सूर्याग्निप्रार्थनाब्राह्मणम् ॥१५॥

इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

षष्ठ अध्याय

षष्ठ अध्याय

प्रथम ब्राह्मण

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
ॐ प्राणो गायत्रीत्युक्तम् । कस्मात् पुनः कारणात् प्राणभावो गायत्र्या न पुनर्वागादिभाव इति? यस्माज्ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च प्राणः; न वागादयो ज्येष्ठ्यश्रेष्ठ्यभाजः । कथं ज्येष्ठत्वं श्रेष्ठत्वं च प्राणस्येति तन्निर्दिधारयिषयेदमारभ्यते ।<br><br>अथवोक्थयजुःसामक्षत्रादिभावैः प्राणस्यैवोपासनमभिहितं सत्स्वप्यन्येषु चक्षुरादिषु । तत्र हेतुमात्रमिहानन्तर्येण सम्बध्यते । न पुनः पूर्वशेषता । विवक्षितं तु खिलत्वादस्य काण्डस्य पूर्वत्र यदनुक्तं विशिष्टफलं प्राणविषयमुपासनं तद् वक्तव्यमिति ।ॐ प्राण गायत्री है—ऐसा पहले कहा जा चुका है । किंतु गायत्रीका प्राणभाव ही किस कारणसे है, वागादिभाव क्यों नहीं है ? क्योंकि प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है, वागादि ज्येष्ठता और श्रेष्ठताके पात्र नहीं हैं । प्राणका ज्येष्ठत्व और श्रेष्ठत्व क्यों है—इसका निश्चय करनेकी इच्छासे यह [आगे-का ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है ।<br><br>अथवा उक्थ, यजुः, साम, क्षत्रादि भावोंसे चक्षु आदि अन्य इन्द्रियोंके रहते हुए भी प्राणकी ही उपासना बतलायी गयी है । यहाँ उसका हेतुमात्र है, जो उसके अनन्तर होनेके कारण उससे सम्बन्ध रखता है । यह पूर्व ग्रन्थका शेष नहीं है । इसका विवक्षित विषय विशिष्टफलवती प्राणोपासना ही है । यह काण्ड उसका खिलस्वरूप होनेके कारण जो पूर्वग्रन्थमें नहीं कहा गया, उसीको यहाँ बतलाना है ।

१२४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६

१२४८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६

ज्येष्ठ-श्रेष्ठ-दृष्टिसे प्राणोपासना

ॐ यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवति प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥

जो कोई ज्येष्ठ और श्रेष्ठको जानता है, वह अपने ज्ञातिजनोंमें ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है। प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। जो इस प्रकार उपासना करता है, वह अपने ज्ञातिजनोंमें तथा और भी जिन लोगोंमें चाहता है, उनमें भी ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
यः कश्चिद्ध वा इत्यवधारणार्थौ। यो ज्येष्ठश्रेष्ठगुणं वक्ष्यमाणं यो वेदासौ भवत्येव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च। एवं फलेन प्रलोभितः सन् प्रश्नायाभिमुखीभूतस्तस्मै चाह—'प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ।<br><br>कथं पुनरवगम्यते प्राणो ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्चेति ? यस्मान्निषेककाल एव शुक्रशोणितसम्बन्धः प्राणादिकलापस्याविशिष्टः; तथापि नाप्राणं शुक्रं विरोहतीति प्रथमो वृत्तिलाभः प्राणस्य चक्षुरादिभ्यः अतो ज्येष्ठो वयसा प्राणः।जो कोई; यहाँ 'ह' और 'वै' निश्चयार्थक हैं, जो आगे बतलाये जानेवाले ज्येष्ठ और श्रेष्ठ गुणवाले प्राणको जानता है, वह ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो ही जाता है। इस प्रकार फलसे प्रलोभित होनेपर जब साधक प्रश्नके लिये अभिमुख होता है तो उससे श्रुति कहती है—'प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है।'<br><br>किंतु यह जाना कैसे जाता है कि प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। क्योंकि गर्भाधानके समय ही यद्यपि प्राणादिसमूहका शुक्र और शोणितसे समान सम्बन्ध है, तो भी बिना प्राणके शुक्रमें शरीरका अङ्कुर नहीं होता; अतः चक्षु आदि इन्द्रियोंकी अपेक्षा प्राणको पहले वृत्तिलाभ होता है; इसलिये आयुके द्वारा प्राण ज्येष्ठ है।

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२४९ |

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ१२४९

| निषेककालादारभ्य गर्भं पुष्यति प्राणः; प्राणे हि लब्धवृत्तौ पश्चाच्चक्षुरादीनां वृत्तिलाभः; अतो युक्तं प्राणस्य ज्येष्ठत्वं चक्षुरादिषु । | गर्भाधानके समयसे ही प्राण गर्भका पोषण करता है। प्राणके वृत्तियुक्त हो जानेके पीछे ही चक्षु आदिको वृत्तिलाभ होता है; अतः चक्षु आदिमें प्राणका ज्येष्ठत्व उचित ही है। | | भवति तु कश्चित् कुले ज्येष्ठः; गुणहीनत्वान्न श्रेष्ठः। मध्यमः कनिष्ठो वा गुणाढ्यत्वाद् भवेच्छ्रेष्ठो न ज्येष्ठः। न तु तथेहेत्याह—‘प्राण एव तु ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च।’ कथं पुनः श्रेष्ठ्यमवगम्यते प्राणस्य ? तदिह संवादेन दर्शयिष्यामः । | कुलमें कोई व्यक्ति (आयुमें) ज्येष्ठ तो होता है, किंतु गुणहीन होनेके कारण वह श्रेष्ठ नहीं माना जाता। इसी प्रकार गुणसम्पन्न होनेके कारण मध्यम अथवा कनिष्ठ श्रेष्ठ तो होता है, किंतु ज्येष्ठ नहीं माना जाता; किंतु यहाँ ऐसा नहीं है। (यही बात श्रुति बतलाती है)—‘प्राण ही ज्येष्ठ है और श्रेष्ठ भी’। प्राणकी श्रेष्ठता कैसे जानी जाती है? यह बात यहाँ हम संवादसे प्रदर्शित करेंगे। | | सर्वथापि तु प्राणं ज्येष्ठश्रेष्ठगुणं यो वेदोपास्ते, स स्वानां ज्ञातीनां ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च भवति ज्येष्ठश्रेष्ठगुणोपासनसामर्थ्यात्। स्वव्यतिरेकेणापि च येषां मध्ये ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च भविष्यामीति बुभूषति भवितुमिच्छति तेषामपि ज्येष्ठश्रेष्ठप्राणदर्शी ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च भवति। | जो किसी भी १प्रकार ज्येष्ठ-श्रेष्ठगुणवाले प्राणको जानता अर्थात् उसकी उपासना करता है, वह ज्येष्ठ-श्रेष्ठ गुणवान्की उपासनाके सामर्थ्यसे अपनोंमें अर्थात् ज्ञातिजनोंमें ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है। अपनोंसे भिन्न दूसरे जिन-किन्हींमें भी वह ‘मैं ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाऊँ’ इस प्रकार ज्येष्ठ-श्रेष्ठ होनेकी इच्छा करता है, उनमें भी यह ज्येष्ठ-श्रेष्ठ प्राणोपासक ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाता है। |


१. अर्थात् प्राणका ज्येष्ठत्व और श्रेष्ठत्व आरोपित हो अथवा वास्तविक।

बृ० उ० ७६—

१२५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६

१२५०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६

| ननु वयोनिमित्तं ज्येष्ठत्वम्; तदिच्छात्तः कथं भवति ? इत्युच्यते । नैष दोषः, प्राणवद् वृत्तिलाभस्यैव ज्येष्ठत्वस्य विवक्षितत्वात् ॥ १ ॥ | किंतु ज्येष्ठत्व तो आयुके कारण होता है, वह इच्छासे कैसे हो सकता है। ऐसी शङ्का होनेपर कहते हैं—यह दोष नहीं है; क्योंकि प्राणके समान [यहाँ भी] वृत्तिलाभ ही ज्येष्ठत्वरूपसे विवक्षित है¹॥ १ ॥ |

वसिष्ठादृष्टिसे वाक्‌की उपासना

यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति वाग् वै वसिष्ठा वसिष्ठः स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ २ ॥

जो वसिष्ठाको जानता है, वह स्वजनोंमें वसिष्ठ होता है। वाक् ही वसिष्ठा है। जो ऐसी उपासना करता है, वह स्वजनोंमें तथा और भी जिनमें चाहता है, उनमें वसिष्ठ होता है ॥ २ ॥

| यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति । तद्दर्शनानुरूपेण फलम् । येषां च ज्ञातिव्यतिरेकेण वसिष्ठो भवितुमिच्छति तेषां च वसिष्ठो भवति । उच्यतां तर्हि कासौ वसिष्ठेति ? वाग् वै वसिष्ठा । वासयत्यतिशयेन वस्ते | जो वसिष्ठाको जानता है, वह स्वजनोंमें वसिष्ठ होता है। उसकी उपासनाके अनुसार ही फल होता है। तथा अपनी जातिसे भिन्न जिन लोगोंमें वह वसिष्ठ होना चाहता है, उनमें भी वसिष्ठ हो जाता है। अच्छा तो बतलाइये, वसिष्ठा कौन है? [इसपर कहते हैं—] वाक् ही वसिष्ठा है। अतिशयरूपसे बसाती है, अथवा |


१. जिस प्रकार अन्नभक्षणादिके कारण चक्षु आदि इन्द्रियोंके वृत्तिलाभका कारण होनेसे प्राण ज्येष्ठ है, उसी प्रकार अन्य जीवोंका जीवन प्राणोपासकके अधीन होनेसे वह उनमें ज्येष्ठ है। उसका ज्येष्ठत्व आयुके कारण नहीं है।

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५१

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५१


| वेति वसिष्ठा । वाग्मिनो हि धनवन्तो वसन्त्यतिशयेन ।<br><br>आच्छादनार्थस्य वा वसेर्वसिष्ठा । अभिभवन्ति हि वाचा वाग्मिनोऽन्यान् । तेन वसिष्ठगुणवत्परिज्ञानाद् वसिष्ठगुणो भवतीति दर्शनानुरूपं फलम् ॥ २ ॥ | बसती है, इसलिये यह वसिष्ठा है; क्योंकि जो अच्छे वक्ता धनवान् होते हैं, वे ही अतिशयतापूर्वक बसते हैं।<br><br>अथवा आच्छादनार्थक 'वस्' धातुसे 'वसिष्ठा' शब्द निष्पन्न होता है। वाक्कुशल लोग वाणीसे दूसरोंका पराभव कर देते हैं। अतः वसिष्ठगुणयुक्त पदार्थके विज्ञानसे उपासक वसिष्ठगुणवान् हो जाता है—इस प्रकार ज्ञानके अनुसार फल होता है ॥ २ ॥ |


प्रतिष्ठादृष्टिसे चक्षुकी उपासना

यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे चक्षुर्वै प्रतिष्ठा चक्षुषा हि समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं वेद ॥ ३ ॥

जो प्रतिष्ठाको जानता है, वह समान देश-कालमें प्रतिष्ठित होता है और दुर्गम देश-कालमें भी प्रतिष्ठित होता है। चक्षु ही प्रतिष्ठा है। चक्षुसे ही समान और दुर्गम देश-कालमें प्रतिष्ठित होता है। जो ऐसी उपासना करता है, वह समान और दुर्गममें प्रतिष्ठित होता है ॥ ३ ॥


| यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठत्यनयेति प्रतिष्ठा तां प्रतिष्ठां प्रतिष्ठागुणवतीं यो वेद तस्यैतत् फलम्—प्रतितिष्ठति समे देशे काले च तथा दुर्गे विषमे च दुर्गमने च देशे दुर्भिक्षादौ वा काले विषमे। | जो कोई प्रतिष्ठाको जानता है, जिससे प्रतिष्ठित होता है, उसे प्रतिष्ठा कहते हैं; उस प्रतिष्ठाको अर्थात् प्रतिष्ठागुणवती (चक्षु) को जो जानता है, उसे यह फल मिलता है कि वह समान देश और कालमें प्रतिष्ठित होता है तथा दुर्ग—विषम यानी दुर्गम्य देशमें और दुर्भिक्षादि विषम कालमें भी प्रतिष्ठित होता है। |

१२५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

१२५२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

| यद्येवमुच्यतां काऽसौ प्रतिष्ठा ?<br><br>चक्षुर्वै प्रतिष्ठा । कथं चक्षुषः<br><br>प्रतिष्ठात्वम् ? इत्याह-‘चक्षुषा हि<br><br>समे च दुर्गे च दृष्ट्वा प्रतितिष्ठति’<br><br>अतोऽनुरूपं फलं प्रतितिष्ठति समे<br><br>प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं<br><br>वेदेति ॥ ३ ॥ | यदि ऐसी बात है, तो बताइये यह प्रतिष्ठा क्या है ? ( ऐसा प्रश्न होनेपर कहा जाता है-) चक्षु ही प्रतिष्ठा है। चक्षुका प्रतिष्ठात्व कैसे है ? यह श्रुति बतलाती है-‘क्योंकि सम और विषम देश-कालमें चक्षुसे देखकर ही पुरुष प्रतिष्ठित होता है। अतः जो ऐसी उपासना करता है,उसे उसके अनुरूप यह फल मिलता है कि वह सममें प्रतिष्ठित होता है और दुर्गमें भी प्रतिष्ठित होता है ॥३॥ |

सम्पदृष्टिसे श्रोत्रकी उपासना

यो ह वै संपदं वेद सँहास्मै पद्यते यं कामं कामयते श्रोत्रं वै संपच्छ्रोत्रे हीमे सर्वे वेदा अभिसंपन्नाः सँहास्मै पद्यते यं कामं कामयते य एवं वेद ॥४॥

जो सम्पदको जानता है, वह जिस भोगकी इच्छा करता है, वही उसे सम्यक् प्रकारसे प्राप्त हो जाता है। श्रोत्र ही सम्पद है। श्रोत्रमें ही ये सब वेद सब प्रकार निष्पन्न हैं। जो ऐसी उपासना करता है, वह जिस भोगकी इच्छा करता है, वही उसे सम्यक् प्रकारसे प्राप्त हो जाता है॥ ४॥

| यो ह वै संपदं वेद संपद्गुण-<br><br>युक्तं यो वेद तस्यैतत् फलमस्मै<br><br>विदुषे संपद्यते ह । किम् ? यं<br><br>कामं कामयते स कामः; किं पुनः<br><br>संपद्गुणकम्? श्रोत्रं वै संपत्, कथं | जो भी सम्पदको जानता है, अर्थात् सम्पदगुणवान्‌को जानता है,उसे यह फल मिलता है—उस विद्वान्‌को प्राप्त हो जाता है। क्या प्राप्त हो जाता है ? जिस भोगकी वह इच्छा करता है वह भोग। अच्छा तो, सम्पद्गुणयुक्त क्या है ? श्रोत्र ही |

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२५३ |

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ१२५३

| पुनः श्रोत्रस्य संपद्गुणत्वम् ? इत्युच्यते। श्रोत्रे सति हि यस्मात् सर्वे वेदा अभिसंपन्नाः श्रोत्रेेन्द्रियवतोऽध्येयत्वात्। वेदविहितकर्मायत्ताश्च कामास्तस्माच्छ्रोत्रं संपत् अतो विज्ञानानुरूपं फलम्; सं हास्मै पद्यते यं कामं कामयते य एवं वेद ॥ ४ ॥ | सम्पद है। किंतु श्रोत्रका सम्पद्गुणत्व किस प्रकार है? सो बतलाया जाता है। श्रोत्रके रहते ही सम्पूर्ण वेद सब प्रकार निष्पन्न होते हैं, क्योंकि वे श्रोत्रेन्द्रियवान्द्वारा हो अध्ययन किये जा सकते हैं और भोग तो वेदविहित कर्मोंके ही अधीन हैं, इसलिये श्रोत्र सम्पद् है। अतः विज्ञान (उपासना) के अनुरूप ही फल मिलता है। जो ऐसी उपासना करता है, वह जिस भोगकी इच्छा करता है, वही उसे मिल जाता है।४। |

आयतनदृष्टिसे मनकी उपासना

यो ह वा आयतनं वेदायतन ँस्वानां भवत्यायतनं जनानां मनो वा आयतनमायतनँ स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ॥ ५ ॥

जो आयतनको जानता है, वह स्वजनोंका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है। मन ही आयतन है जो इस प्रकार उपासना करता है; वह स्वजनोंका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है ॥ ५ ॥

| यो ह वा आयतनं वेद-आयतनमाश्रयस्तदू यो वेदायतनंस्वानां भवत्यायतनं जनानामन्येषामपि। किं पुनस्तदायतनम् इत्युच्यते-मनोवा आयतनमाश्रय इन्द्रियाणां | जो भी आयतनको जानता है-आयतन आश्रयको कहते हैं, उसे जो कोई जानता है, वह स्वजनोंका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है। अच्छा तो वह आयतन क्या है? इसपर कहा जाता है-मन ही आयतन अर्थात् इन्द्रिय |

१२५४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६

१२५४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६


| विषयाणां च। मनआश्रिता हि विषया आत्मनो भोग्यत्वं प्रतिपद्यन्ते; मनःसंकल्पवशानि चेन्द्रियाणि प्रवर्तन्ते निवर्तन्ते च; अतो मन आयतनमिन्द्रियाणाम्। अतो दर्शनानुरूपेण फलमायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ॥ ५ ॥ | और विषयोंका आश्रय है। मनके आश्रित रहकर ही विषय आत्माके भोग्यत्वको प्राप्त होते हैं। मनके संकल्पके अधीन ही इन्द्रियाँ [ अपने अपने विषयोंमें] प्रवृत्त और [उनसे] निवृत्त होती हैं; अतः मन इन्द्रियोंका आयतन है। इसलिये जो ऐसी उपासना करता है, उसे इस दृष्टिके अनुरूप ही यह फल मिलता है कि वह स्वजनोंका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है ॥ ५ ॥ |

प्रजातिदृष्टिसे रेतस्की उपासना

यो ह वै प्रजातिं वेद प्रजायते ह प्रजया पशुभी रेतो वै प्रजातिः प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्य एवं वेद ॥ ६ ॥

जो भी प्रजापतिको जानता है वह प्रजा और पशुओंद्वारा प्रजात-(वृद्धिको प्राप्त) होता है। रेतस् ही प्रजापति है। जो ऐसा जानता है, वह प्रजा और पशुओंद्वारा प्रजात होता है ॥ ६ ॥

| यो ह वै प्रजातिं वेद प्रजायते ह प्रजया पशुभिश्च संपन्नो भवति।<br><br>रेतो वै प्रजातिः। रेतसा प्रजननेन्द्रियमुपलक्ष्यते। तद्विज्ञानानुरूपं फलं प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्य एवं वेद ॥ ६ ॥ | जो प्रजातिको जानता है, वह प्रजात होता अर्थात् प्रजा और पशुओंद्वारा सम्पन्न होता है। वीर्य ही प्रजाति है। 'रेतस्' शब्दसे प्रजननेन्द्रिय उपलक्षित होती है। जो ऐसी उपासना करता है, उसे उसकी दृष्टिके अनुरूप यह फल मिलता है कि वह प्रजा और पशुओंसे प्रजात (सम्पन्न) होता है ॥ ६ ॥ |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५५

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५५


अपनी श्रेष्ठताके लिये विवाद करते हुए वागादि प्राणोंका ब्रह्माके पास जाना और ब्रह्माद्वारा उसका निर्णय करनेके लिये एक कसौटी बताना

ते हेमे प्राणा अहँश्रेयसे विवदमाना ब्रह्म जग्मुस्तद्धोचुः को नो वसिष्ठ इति तद्धोवाच यस्मिन् व उत्क्रान्त इदँ शरीरं पापीयो मन्यते स वो वसिष्ठ इति ॥ ७ ॥

वे ये प्राण 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' इस प्रकार विवाद करते हुए ब्रह्माके पास गये। उससे बोले 'हममें कौन वसिष्ठ है?' उसने कहा, 'तुममेंसे जिसके उत्क्रमण करनेपर (शरीरसे अलग हो जानेपर) यह शरीर अपनेको अधिक पापी मानता है, वही तुममें वसिष्ठ है ॥ ७ ॥

ते हेमे प्राणा वागादयोऽहं श्रेयसेऽहं श्रेयानित्येतरस्मै प्रयोजनाय विवदमाना विरुद्धं वदमाना ब्रह्म जग्मुर्ब्रह्म गतवन्तो ब्रह्मशब्दवाच्यं प्रजापतिं गत्वा च तद् ब्रह्म होचुरुक्तवन्तः—को नोऽस्माकं मध्ये वसिष्ठः; कोऽस्माकं मध्ये वसति च वासयति च ?<br><br>तद् ब्रह्म तैः पृष्टं सद्धोवाचोक्तवद् यस्मिन् वो युष्माकं मध्य उत्क्रान्ते निर्गते शरीरादिदं शरीरं पूर्वस्मादतिशयेन पापीयः पापतरं मन्यते लोकः—शरीरं हि नामा-वे ये वागादि प्राण 'अहं श्रेयसे'—'मैं श्रेष्ठ हूँ' इस प्रयोजनके लिये आपसमें विवाद करते हुए—एक दूसरेके विरुद्ध बोलते हुए ब्रह्माके पास गये। अर्थात् ब्रह्मशब्दवाच्य प्रजापतिके पास गये; उन्होंने जाकर उस ब्रह्मासे कहा—'हममें कौन वसिष्ठ है; हममेंसे कौन बसता और बसाता है?'<br><br>उनसे पूछे जानेपर वह ब्रह्मा बोला, 'तुममेंसे जिसके उत्क्रमण करनेपर—शरीरसे निकल जानेपर इस शरीरको लोग पहलेकी अपेक्षा अत्यन्त पापीय—अधिक पापमय (अपवित्र) मानते हैं—यों तो अनेकों अपवित्र वस्तुओंका संघात