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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

५१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
एतन्मर्त्यम्--यदेतन्मूर्ताख्यं भूतत्रयमिदं मर्त्यं मरणधर्मि; कस्मात्? यस्मात्स्थितमेतत्; परिच्छिन्नं ह्यर्थान्तरेण सम्प्रयुज्यमानं विरुध्यते--यथा घटः स्तम्भकुड्यादिना; तथा मूर्तं स्थितं परिच्छिन्नम् अर्थान्तरसम्बन्धि ततोऽर्थान्तरविरोधान्मर्त्यम्; एतत्सद्विशेष्यमाणासाधारणधर्मवत्, तस्माद्धि परिच्छिन्नम्, परिच्छिन्नत्वान्मर्त्यम् अतो मूर्तम्; मूर्तत्वाद्वा मर्त्यम्, मर्त्यत्वात्स्थितम्, स्थितत्वात्सत् । अतोऽन्योन्याव्यभिचाराच्चतुर्णां धर्माणां यथेष्टं विशेषणविशेष्यभावो हेतुहेतुमद्भावश्च दर्शयितव्यः । सर्वथापि तु भूतत्रयं चतुष्टयविशेषणविशिष्टं मूर्तं रूपं ब्रह्मणः । तत्र चतुर्णामेकस्मिन्गृहीते विशेषणे इतरद्गृहीतमेव विशेषणमित्याह--तस्यैतस्य मूर्तस्य एतस्य मर्त्यस्य, एतस्य स्थितस्य, एतस्ययह मर्त्य है--यह जो मूर्तसंज्ञक तीन भूत हैं मर्त्य--मरणधर्मी हैं। क्यों ? क्योंकि ये स्थित हैं। परिच्छिन्न वस्तु ही किसी अन्य वस्तुसे संयोग किये जानेपर उससे विरुद्ध रहती है, जिस तरह स्तम्भ और भित्ति आदिसे घट। इस प्रकार मूर्त स्थित, परिच्छिन्न और अर्थान्तरसे सम्बन्ध रखनेवाला है, अतः अर्थान्तरसे विरोध होनेके कारण वह मर्त्य है। यह सत् अर्थात् विशेष्यमाण असाधारण धर्मोंवाला है, इसीसे परिच्छिन्न है, परिच्छिन्न होनेके कारण मर्त्य है और इसीसे मूर्त है। अथवा मूर्त होनेके कारण मर्त्य है, मर्त्य होनेके कारण स्थित है और स्थित होनेके कारण सत् है। अतः इन चारों धर्मोंका एक-दूसरेमें व्यभिचार न होनेके कारण इनका यथेष्ट विशेष्य-विशेषणभाव और कार्य-कारणभाव दिखलाना उचित है। यह चार विशेषणोंसे युक्त भूतत्रय सभी प्रकार ब्रह्मका मूर्तरूप है। इन चार विशेषणोंमेंसे किसी एकको ग्रहण करनेपर अन्य विशेषण भी गृहीत हो ही जाते हैं; इसीसे श्रुति कहती है--उस इस मूर्तका, इस मर्त्यका, इस स्थितका

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५१७

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५१७


| सत:--चतुष्टयविशेषणस्य भूतत्रयस्येत्यर्थः, एष रसः सारः इत्यर्थः।<br><br>त्रयाणां हि भूतानां सारिष्ठः सविता; एतत्साराणि त्रीणि भूतानि, यत एतत्कृतविभज्यमानरूपविशेषणानि भवन्ति; आधिदैविकस्यै वै कार्यस्यैतद्रूपम्- यत्सविता यदेतन्मण्डलं तपति; सतो भूतत्रयस्य हि यस्मादेष रस इत्येतद्गृह्यते। मूर्तो ह्येष सविता तपति, सारिष्ठश्च। यत्त्वाधिदैविकं करणं मण्डलस्याभ्यन्तरम्, तद्वक्ष्यामः॥ २ ॥ | और इस सत्का अर्थात् इन चार विशेषणोंसे युक्त भूतत्रयका यह रस यानी सार है।<br><br>तीनों ही भूतोंका सारतम सविता है। तीनों भूत इसी सारवाले हैं, क्योंकि वे इसीके द्वारा विभक्त किये हुए विभिन्न रूपोंवाले होते हैं। यह जो सविता है, जो यह सवितृमण्डल तपता है, वह आधिदैविक कार्यका रूप है; क्योंकि यह सद्रूप भूतत्रयका रस है—इस प्रकार ग्रहण किया जाता है। यह मूर्त सविता ही तपता है और सारतम भी है। और जो मण्डलान्तर्गत आधिदैविक करण है, उसका हम आगे वर्णन करेंगे॥ २ ॥ |


विशेषणोंसहित अमूर्त रूप और उसके रसका वर्णन

अथामूर्तं वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतमेतद्यदेतत्तयत्सैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषस्त्यस्य ह्येष रस इत्यधिदैवतम् ॥ ३ ॥

तथा वायु और अन्तरिक्ष अमूर्त हैं, ये अमृत हैं, ये यत् हैं और ये ही त्यत् हैं। उस इस अमूर्तका, इस अमृतका, इस यत्का, इस त्यत्का यह सार है, जो कि इस मण्डलमें पुरुष है, यही इस त्यत्का सार है। यह अधिदैवत-दर्शन है ॥ ३ ॥

५१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

५१८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| अथामूर्तम्— अथाधुनामूर्तमुच्यते। वायुश्चान्तरिक्षं च यत्परिशेषितं भूतद्वयम्—एतदमृतम्, अमूर्तत्वात्; अस्थितम्, अथोऽविरुद्धयमानं केनचित्, अमृतममरणधर्मि। एतद्यत्स्थितविपरीतम्,व्यापि, अपरिच्छिन्नम्, यस्मात् 'यत्' एतद् अन्येभ्योऽप्रविभज्यमानविशेषम्, अतस्त्यत्, 'त्यत्' इति परोक्षाभिधानार्हमेव--पूर्ववत्। | अब अमूर्तका वर्णन किया जाता है। वायु और अन्तरिक्ष जो दो भूत रह गये हैं, वे अमृत हैं; क्योंकि वे अमूर्त हैं तथा अमूर्त होनेके कारण ही वे अस्थित हैं। अतः किसीसे भी उनका विरोध नहीं है, अमृत कहते हैं अमरणधर्मीको, यह यत् (चल) अर्थात् स्थितसे विपरीत व्यापी यानी अपरिच्छिन्न है, चूँकि दूसरोंसे इस 'यत्' के विशेषण विभक्त नहीं हैं, इसलिये यह 'त्यत्' है, अर्थात् 'त्यत्' इस प्रकार पूर्ववत् परोक्षरूपसे ही पुकारे जाने योग्य है। | | तस्यैतस्यामूर्तस्य तस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्य चतुष्टयविशेषणस्यामूर्तस्यैष रसः;कोऽसौ? | उस इस अमूर्तका, इस अमृतका, इस यत् (गतिशील) का और इस त्यत् (परोक्ष) का अर्थात् इन चार विशेषणोंसे युक्त अमूर्तका यह रस है। वह कौन है? | | य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषः— करणात्मको हिरण्यगर्भः प्राण इत्यभिधीयते यः, स एषोऽमूर्तस्य भूतद्वयस्य रसः पूर्ववत्सारिष्ठः। | जो कि यह इस मण्डलमें पुरुष यानी इन्द्रियात्मा हिरण्यगर्भ यानी प्राण—ऐसा कहा जाता है। वही इस अमूर्त भूतद्वयका रस अर्थात् पूर्ववत् सारतम भाग है। | | एतत्पुरुषसारं चामूर्तं भूतद्वयम्--<br>हैरण्यगर्भलिङ्गारम्भाय हि भूतद्वयाभिव्यक्तिरव्याकृतात्। तस्मात्तादर्थ्यात्तत्सारं भूतद्वयम्। | अमूर्त भूतद्वय इस पुरुषरूप सारवाले हैं। हिरण्यगर्भरूप लिङ्गात्माके आरम्भके लिये ही अव्याकृतसे इन दोनों भूतोंकी अभिव्यक्ति होती है। अतः उसके लिये अर्थात् उसके साधन होनेसे ये भूतद्वय उस पुरुष- |

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५१९ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ५१९
शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
त्यस्य ह्येष रसः--यस्माद्यो मण्डलस्थः पुरुषो मण्डलवन्न गृह्यते सारश्च भूतद्वयस्य, तस्मादस्ति मण्डलस्थस्य पुरुषस्य भूतद्वयस्य च साधर्म्यम्, तस्माद्युक्तं प्रसिद्धवद्धेतूपादानम्--त्यस्य ह्येष रस इति।रूप सारवाले ही हैं। यह त्यत्का ही सार है; क्योंकि यह जो मण्डलस्थ पुरुष है, इसे मण्डलके समान ग्रहण नहीं किया जा सकता; इसलिये यह भूतद्वयका सार है; अतः मण्डलस्थ पुरुष और इन दोनों भूतोंका साधर्म्य है, अतः 'यह त्यत्का ही सार है' इस प्रकार प्रसिद्धके समान [ त्यत्को इसका ] हेतु बतलाना उचित ही है।
रसः कारणं हिरण्यगर्भविज्ञानात्मा चेतन इति केचित्। तत्र च किल हिरण्यगर्भविज्ञानात्मनः कर्म वाय्वन्तरिक्षयोः प्रयोक्तृ, तत्कर्म वाय्वन्तरिक्षाधारं सदन्येषां भूतानां प्रयोक्तृ भवति; तेन स्वकर्मणा वाय्वन्तरिक्षयोः प्रयोक्तेति तयो रसः कारणमुच्यत इति।किन्हींका मत है¹ कि हिरण्यगर्भविज्ञानात्मा चेतन रस यानी कारण है। उस अवस्थामें हिरण्यगर्भविज्ञानात्माका कर्म वायु और अन्तरिक्षका प्रेरक है, वह कर्म वायु और अन्तरिक्षरूप आधारवाला होकर अन्य भूतोंका प्रेरक होता है; उस अपने कर्मके द्वारा हिरण्यगर्भविज्ञानात्मा वायु और अन्तरिक्षका प्रेरक है, इसलिये उनका रस यानी कारण कहा जाता है।
तन्न, मूर्तरसेनातुल्यत्वात्। <br><br> मूर्तस्य तु भूतत्रयस्य रसो मूर्तमेव मण्डलं दृष्टं भूतत्रयसमानजातीयम्, न चेतनः; तथामूर्तयोरपि भूत-किंतु ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि मूर्तके रस (सार) से इसकी सदृशता नहीं है। तीन मूर्त भूतोंका रस तो मूर्तमण्डल ही देखा गया है, जो भूतत्रयसे समान जातिवाला अर्थात् जड है, उनका रस चेतन नहीं है। इसी प्रकार अमूर्त भूतोंका

१. भर्तृप्रपञ्चका।

५२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५२०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| योस्तत्समानजातीयेनैवामूर्तरसेन युक्तं भवितुम्; वाक्यप्रवृत्तेस्तुल्यत्वात्; यथा हि मूर्तामूर्ते चतुष्टयधर्मवती विभज्येते, तथा रसरसवतोरापि मूर्तामूर्तयोस्तुल्येनैव न्यायेन युक्तो विभागः, न त्वर्धवैशसम् । | भी उनके समानजातीय ही अमूर्त रस होना चाहिये¹; क्योंकि इन दोनों वाक्योंकी प्रवृत्ति समान ही है। जिस प्रकार चार धर्मोंसे युक्त मूर्त और अमूर्तका विभाग किया गया है² उसी प्रकार उसी न्यायसे मूर्तरसवान् और रस तथा अमूर्त्त रसवान् और रसका भी विभाग करना उचित है³; अर्धजरतीय न्यायका आश्रय लेना उचित नहीं है। | | मूर्तरसेऽपि मण्डलोपाधिश्चेतनो विवक्ष्यत इति चेत् ? | पूर्व०—[जिस प्रकार हम अमूर्त भूतोंके रसको चेतन मानते हैं, उसी प्रकार] यदि मूर्तभूतोंके रसमें भी मण्डलोपाधिक चेतन ही विवक्षित मानें तो ? | | अत्यल्पमिदमुच्यते, सर्वत्रैव तु मूर्तामूर्तयोर्ब्रह्मरूपेण विवक्षितत्वात् । | सिद्धान्ती—तुम्हारा यह कथन बहुत थोड़ा है, क्योंकि यहाँ [ मूर्त और अमूर्त रस ही नहीं] सर्वत्र ही मूर्त और अमूर्त भूतमात्र ब्रह्मरूपसे विवक्षित हैं। |


१. अर्थात् जिस प्रकार अमूर्त भूत—वायु और अन्तरिक्ष जड जातिके हैं, उसी प्रकार उनका रस भी अमूर्त एवं जड होना उचित है।
२. जैसे कि मन्त्र २ और ३ में यह बतलाया है कि ब्रह्मका मूर्त रूप 'मूर्तिमान्, मर्त्य, स्थित (परिच्छिन्न) और सत् है तथा अमूर्त रूप अमूर्तिमान्, अमृत, अस्थित (अपरिच्छिन्न) और त्यत् है।
३. जैसे रसवान् (भूत) मूर्त और अमूर्त दो प्रकारके हैं, तथा जड हैं, उसी प्रकार रस भी मूर्त और अमूर्त—दो प्रकारका तथा जड होना चाहिये। ऐसा विभाग नहीं करना चाहिये कि मूर्त रस तो जड है और अमूर्त रस चेतन है। क्योंकि ऐसी कल्पना अर्धजरतीय होगी, जो अनुचित है।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२१

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२१


| पुरुषशब्दोऽचेतनेऽनुपपन्न इति चेत् ! <br><br> न, पक्षपुच्छादिविशिष्टस्यैव लिङ्गस्य पुरुषशब्ददर्शनात् । "न वा इत्थं सन्तः शक्ष्यामः प्रजाः प्रजनयितुमिमान्सप्त पुरुषानेकं पुरुषं करवामेति त एतान्सप्त पुरुषानेकं पुरुषमकुर्वन्" इत्यादौ अन्नरसमयादिषु च श्रुत्यन्तरे पुरुषशब्दप्रयोगात्। इत्यधिदैवतमित्युक्तोपसंहारोऽध्यात्मविभागोक्त्यर्थः ॥ ३ ॥ | पूर्व०-किंतु 'पुरुष' शब्दका अचेतनमें प्रयोग होना तो सम्भव नहीं है ! <br><br> सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है; [ तैत्तिरीय-श्रुतिमें तो ] पक्ष और पुच्छविशिष्ट लिङ्गशरीरको ही पुरुष-शब्दवाची देखा गया है । तथा "हम इस प्रकार अलग-अलग रहते हुए प्रजा उत्पन्न नहीं कर सकते । अतः इन सात^१ पुरुषोंको हम एक कर दें—ऐसा विचारकर उन्होंने इन सात पुरुषोंको एक कर दिया" इत्यादि अन्यश्रुतियोंके वाक्योंमें अन्नरसमयादिके अर्थमें पुरुष शब्दका प्रयोग किया गया है । 'यह अधिदैवत मूर्तामूर्त है' ऐसा कहकर जो पूर्वोक्तका उपसंहार किया गया है, वह अध्यात्म मूर्तामूर्तका विभाग बतलानेके लिये है ॥ ३ ॥ |


अध्यात्म मूर्तामूर्तके विभागपूर्वक मूर्तका वर्णन

अथाध्यात्ममिदमेव मूर्तं यदन्यत्प्राणाच्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतन्मर्त्यमेतत्स्थितमेतत्सतस्त्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो यच्चक्षुः सतो ह्येष रसः ॥ ४ ॥

अब अध्यात्म मूर्तामूर्तका वर्णन किया जाता है। जो प्राणसे तथा यह जो देहान्तर्गत आकाश है उससे भिन्न है, यही मूर्त है। यह मर्त्य है,


१. सात पुरुष ये हैं—श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, घ्राण, वाक् और मन।

५२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५२२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

यह स्थित है, यह सत् है। यह जो नेत्र है वही इस मूर्तका, इस मर्त्यका, इस स्थितका एवं इस सत्का सार है यह सत्का ही सार है ॥ ४ ॥

| अथाधुनाध्यात्मं मूर्तामूर्तयोर्विभाग उच्यते—किं तन्मूर्तम् ! इदमेव, किं चेदम् ! यदन्यत्प्राणाच्च वायोर्यश्चायमन्तरभ्यन्तरे आत्मन्नात्मन्याकाशः खं शरीरस्थश्च यः प्राण एतद् द्वयं वर्जयित्वा यदन्यच्छरीरारम्भकं भूतत्रयम्, एतन्मर्त्यमित्यादि समानमन्यत्पूर्वेण । | अथ-अब मूर्तामूर्तका अध्यात्म-विभाग बतलाया जाता है—वह मूर्त क्या है ? यह ही है, यह क्या है ? जो प्राणवायुसे भिन्न है अर्थात् इस आत्मा—शरीरके भीतर जो आकाश है और जो देहस्थ प्राण है इन दोनोंको छोड़कर जो शरीरके आरम्भक तीन भूत हैं वे ही मर्त्य हैं—इस प्रकार अन्य सब पूर्ववत् समझना चाहिये । | | एतस्य सतो ह्येष रसः--यच्चक्षुरिति;आध्यात्मिकस्य शरीरारम्भकस्य कार्यस्यैष रसः सारः;तेन हि सारेण सारवदिदं शरीरं समस्तं यथाधिदैवतमादित्यमण्डलेन । | इस सत्का हो, यह जो चक्षु है, रस है । अर्थात् आध्यात्मिक यानी शरीरारम्भक भूतोंका यही रस यानी सार है; जिस प्रकार अधिदैवत मूर्त-वर्ग आदित्यमण्डलके कारण सारवान् है, उसी प्रकार यह समस्त शरीर उस सारसे ही सारवान् है । | | प्राथम्याच्च--चक्षुषी एव प्रथमे सम्भवतः सम्भवत इति। "तेजो रसो निरवर्तताग्निः"इति लिङ्गात्; तैजसं हि चक्षुः; एतत्सारम् आध्यात्मिकं भूतत्रयम्; सतो | [शरीरके अवयवोंमें] प्रथम होनेके कारण भी चक्षु सार हैं । उत्पन्न होनेवाले जीवके सबसे पहले नेत्र ही उत्पन्न होते हैं । इस विषयमें "अग्नि तेजरूप रसवाला हुआ" यह लिङ्ग है । चक्षु भी तैजस ही हैं, आध्यात्मिक भूतत्रय चक्षुरूप सारवाले ही हैं । 'यह सत्का ही रस है' यह |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२३

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२३


ह्येष रस इति मूर्तत्वसारत्वे हेत्वर्थः ॥ ४ ॥कथन सत् (तीनों भूतों) का चक्षुके मूर्तत्व एवं सारत्वमें हेतुत्व-प्रतिपादन करनेके लिये है¹ ॥४॥

अध्यात्म अमूर्तका उसके विशेषणोंसहित वर्णन

अथामूर्तं प्राणश्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतदमृत-
मेतद्यदेतत्त्यत्तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत
एतस्य त्यस्यैष रसो योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तस्य
ह्येष रसः ॥ ५ ॥

अब अमूर्तका वर्णन करते हैं—प्राण और इस शरीरके अन्तर्गत जो आकाश है, वे अमूर्त हैं, यह अमृत है, यह यत् है और यही त्यत् है। उस इस अमूर्तका, इस अमृतका, इस यत्का, इस त्यत्का यह रस है जो कि यह दक्षिण नेत्रान्तर्गत पुरुष है यह त्यत्का ही रस है ॥ ५ ॥

अथाधुनामूर्तमुच्यते। यत्परिशेषितं भूतद्वयं प्राणश्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाशः, एतदमूर्तम्। अन्यत्पूर्ववत् । एतस्य त्यस्यैष रसः सारः, योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषः-दक्षिणेऽक्षन्निति विशेषग्रहणम्, शास्त्रप्रत्यक्षत्वात्; लिङ्गस्य हि दक्षिणेऽक्षिण विशेषतोऽधिष्ठातृत्वं शास्त्रस्य प्रत्यक्षं सर्वश्रुतिषुअथ-अब अमूर्तका वर्णन किया जाता है। जो बचे हुए दो भूत प्राण और यह देहान्तर्गत आकाश हैं, वे अमूर्त हैं। शेष अर्थ पूर्ववत् है। इस त्यत्का यह रस यानी सार है, जो कि यह दक्षिण नेत्रान्तर्गत पुरुष है, 'दक्षिण नेत्रमें' इस प्रकार विशेष नेत्रका ग्रहण शास्त्रप्रत्यक्ष होनेके कारण है। लिङ्गदेहका विशेषरूपसे दक्षिण नेत्रमें अधिष्ठातृत्व है, ऐसा शास्त्रका प्रत्यक्ष है, क्योंकि समस्त श्रुतियोंमें ऐसा ही प्रयोग देखा गया

१. तात्पर्य यह है कि चक्षु मूर्त है, अतः उसका तीनों मूर्त भूतोंका कार्य होना उचित ही है; क्योंकि वह मूर्तके समान धर्मवाला है तथा देहके सम्पूर्ण अवयवोंमें प्रधान होनेके कारण वह आध्यात्मिक तीनों भूतोंका रस—सार है—यह सिद्ध होता है।

५२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५२४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| तथा प्रयोगदर्शनात् । त्यस्य ह्येष रस इति पूर्ववद्विशेषतोऽग्रहणादमूर्तत्वसारत्वे एव हेत्वर्थः ॥ ५ ॥ | है। 'यह त्यत्‌का ही सार है' यह कथन पूर्ववत् विशेषरूपसे ग्रहण न होनेके कारण त्यत् (अमूर्त दोनों भूतों) का दक्षिण नेत्रस्थित पुरुषके अमूर्तत्व और सारत्वमें ही हेतुत्व प्रतिपादन करनेके लिये है ॥५॥ |


इन्द्रियात्मा पुरुषके स्वरूपका वर्णन

| ब्रह्मण उपाधिभूतयोर्मूर्तामूर्तयोः कार्यकारणविभागेन अध्यात्माधिदैवतयोर्विभागो व्याख्यातः सत्यशब्दवाच्ययोः। अथेदानीम्— | 'सत्य' शब्दके वाच्य एवं ब्रह्मके उपाधिभूत अध्यात्म और अधिदैवत मूर्तामूर्तके विभागका कार्यकारणभेदसे विभाग किया गया। अब — |

तस्य हैतस्य पुरुषस्य रूपम् । यथा महारजनं वासो यथा पाण्ड्वाविकं यथेन्द्रगोपो यथाग्न्यर्चिर्यथा पुण्डरीकं यथा सकृद्विद्युत्तँ सकृद्विद्युत्तेव ह वा अस्य श्रीर्भवति य एवं वेदाथात आदेशो नेति नेति न ह्येतस्मादिति नेत्यन्यत्परमस्त्यथ नामधेयँ सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ ६ ॥

उस इस पुरुषका रूप [ऐसा] है जैसा हल्दीमें रँगा हुआ वस्त्र, जैसा सफेद ऊनी वस्त्र, जैसा इन्द्रगोप¹, जैसी अग्निकी ज्वाला, जैसा श्वेत कमल और जैसी बिजलीकी चमक होती है। जो ऐसा जानता है, उसकी श्री बिजलीकी चमकके समान [ सर्वत्र एक साथ फैलनेवाली ] होती है। अब इसके पश्चात् 'नेति नेति' यह ब्रह्मका आदेश है। 'नेति नेति' इससे बढ़कर कोई उत्कृष्ट आदेश नहीं है। 'सत्यका सत्य' यह उसका नाम है। प्राण ही सत्य हैं, उनका यह सत्य है ॥ ६ ॥


१. वर्षा ऋतुमें उत्पन्न होनेवाला एक लाल रंगका कीड़ा।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२५

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२५


संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्)हिन्दी भाष्यार्थ
तस्य हैतस्य पुरुषस्य करुणात्मनो लिङ्गस्य रूपं वक्ष्यामो वासनामयं मूर्तामूर्तवासनाविज्ञानमयसंयोगजनितं विचित्रं पटभित्तिचित्रवन्मायेन्द्रजालमृगतृष्णिकोपमं सर्वव्यामोहास्पदम्—<br>एतावन्मात्रमेव आत्मेति विज्ञानवादिनो वैनाशिका यत्र भ्रान्ताः, एतदेव वासनारूपं पटरूपवदात्मनो द्रव्यस्य गुण इति नैयायिका वैशेषिकाश्च सम्प्रतिपन्नाः, इदमात्मार्थं त्रिगुणं स्वतन्त्रं प्रधानाश्रयं पुरुषार्थेन हेतुना प्रवर्तत इति साङ्ख्याः।उस इस इन्द्रियात्मा लिङ्गशरीररूप पुरुषके वासनामय, मूर्तामूर्त स्वरूपकी वासना और विज्ञानमयके संयोगसे उत्पन्न हुए वस्त्र या भित्तिपर लिखे हुए चित्रके समान विचित्र तथा माया-इन्द्रजाल एवं मृगतृष्णाके समान सब प्रकारके व्यामोहके आश्रयभूत रूपका वर्णन करते हैं, जिसमें कि विज्ञानवादी वैनाशिकोंको ऐसा भ्रम हो गया है कि बस इतना ही आत्मा है, नैयायिक और वैशेषिक ऐसा मानने लगे हैं कि यह वासनारूप ही पटके रूपके समान 'आत्मा' नामक द्रव्यका गुण है तथा सांख्यवादियोंका मत है कि यह तीन गुणवाला, स्वतन्त्र एवं प्रधानरूप आश्रयवाला [अन्तःकरण] पुरुषार्थके हेतुसे आत्माके लिये प्रवृत्त होता है।
(भर्तृप्रपञ्चमतोपन्यासः)<br>औपनिषद्ममन्या अपि केचित्प्रक्रियां रचयन्ति—<br>मूर्तामूर्तराशिरेकः, परमात्मराशिरुत्तमः ताभ्यामन्योऽयं मध्यमः किल तृतीयः कर्त्रा भोक्त्रा विज्ञानमयेन अजातशत्रुप्रतिबोधितेन सह विद्याकर्मपूर्वप्रज्ञासमुदायः, प्रयोक्ताकोई-कोई अपनेको उपनिषद्-सिद्धान्तावलम्बी माननेवाले भी ऐसी प्रक्रिया रचते हैं—एक तो मूर्तामूर्त-राशि है और दूसरी परमात्मसंज्ञक उत्तम राशि है! तथा अजातशत्रुद्वारा जगाये हुए कर्ता, भोक्ता विज्ञानमयके साथ जो विद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञाका समुदाय है, वह पूर्वोक्त दोनोंसे भिन्न तीसरी मध्यम राशि है। [विद्या, पूर्वप्रज्ञा और] कर्मका

| ५२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |

| ५२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ | | :--- | :--- |


| कर्मराशिः, प्रयोज्यः पूर्वोक्तो मूर्तामूर्तभूतराशिः साधनं चेति । तत्र च तार्किकैः सह सन्धिं कुर्वन्ति । लिङ्गाश्रयश्चैष कर्मराशिरित्युक्त्वा पुनस्ततस्त्रस्यन्तः साङ्ख्यत्वभयात्, सर्वः कर्मराशिः—पुष्पाश्रय इव गन्धः पुष्पवियोगेऽपि पुटतैलाश्रयो भवति तद्वत्—लिङ्गवियोगेऽपि परमात्मैकदेशमाश्रयति, स परमात्मैकदेशः किलान्यत आगतेन गुणेन कर्मणा सगुणो भवति निर्गुणोऽपि सन्, स कर्ता भोक्ता बध्यते मुच्यते च विज्ञानात्मा—इति वैशेषिकचित्तमप्यनुसरन्ति, स च कर्मराशिर्भूतराशेरागन्तुकः, स्वतो निर्गुण एव परमात्मैकदेशत्वात्; स्वत उत्थिता अविद्या अनागन्तुकाप्यूषरवदनात्मधर्मः—इत्यनया | समुदाय प्रयोजक है तथा पूर्वोक्त मूर्त्तामूर्त्तभूतराशि एवं ज्ञान-कर्मके साधन (कार्य-कारणसमूह) प्रयोज्य हैं। इस प्रकार तीन राशिकी कल्पना कर लेनेके पश्चात् वे तार्किकोंके साथ सन्धि कर लेते हैं। और यह कर्मराशि लिङ्गदेहके आश्रित है, ऐसा कहकर फिर उससे सांख्य-सिद्धान्त हो जानेके डरसे डरते हुए ऐसा कहने लगते हैं कि जिस प्रकार पुष्पके आश्रय रहनेवाला गन्ध पुष्पके न रहनेपर भी पुड़िया या तैलके आश्रित रहता है उसी प्रकार सम्पूर्ण कर्मराशि, लिङ्गदेहका वियोग होनेपर भो, परमात्माके एक देशको आश्रय करती है और परमात्माका वह एक देश अन्यसे प्राप्त हुए उस गुणरूप कर्मके द्वारा, निर्गुण होनेपर भी सगुण हो जाता है; तथा वह विज्ञानात्मा कर्ता भोक्ता ही बद्ध या मुक्त होता है—इस प्रकार वे वैशेषिकोंके चित्तका भी अनुसरण करते हैं। भूतराशिसे आनेवाली वह कर्मराशि स्वतः निर्गुण ही है; क्योंकि वह परमात्माका ही एक देश है। स्वयं उत्पन्न हुई अविद्या अनागन्तुका होनेपर भी [ पृथिवीके धर्म ] ऊसरके समान अनात्माका धर्म है। इस प्रकार इस |

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५२७ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ५२७

| कल्पनया साङ्ख्यचित्तमनुवर्तन्ते । <br><br> सर्वमेतत्तार्किकैः सह सामञ्ज- <br><br> तन्निरसनम् स्वकल्पनया रमणीयं <br><br> पश्यन्ति, नोपनिषत्सिद्धान्तं <br><br> सर्वंन्यायविरोधं च पश्यन्ति; <br><br> कथम्? उक्ता एव तावत्सावयवत्वे परमात्मनःसंसारित्वसव्रणत्वकर्मफलदेशसंसरणानुपपत्त्यादया दोषाः; नित्यभेदे च विज्ञानात्मनः परेणैकत्वानुपपत्तिः । <br><br> लिङ्गमेवेति चेत्परमात्मन <br><br> उपचारितदेशत्वेन कल्पितं घट- <br><br> करकभूच्छिद्राकाशादिवत्, तथा <br><br> लिङ्गवियोगेऽपि परमात्मदेशा- <br><br> श्रयणं वासनायाः । अविद्यायाश्च <br><br> स्वत उत्थानम् ऊषरवत्-इत्यादि- | कल्पनासे वे सांख्यमतावलम्बियोंके चित्तका भी अनुसरण करते हैं। <br><br> तार्किकोंके साथ सामञ्जस्यकी कल्पना करके वे इस सारी व्यवस्थाको रमणीय मानते हैं, किंतु औपनिषदसिद्धान्तको तथा सब प्रकारकी युक्तियोंसे आनेवाले विरोधको नहीं देखते। सो किस प्रकार ? परमात्माका सावयवत्व स्वीकार करनेपर उसमें संसारित्व, सच्छिद्रत्व तथा कर्मफलभोगके स्थानमें उत्पन्न होनेकी अनुपपत्ति आदि दोष बतलाये ही गये हैं। और यदि उनमें भेद माना जाय तो विज्ञानात्माका परमात्माके साथ अभेद होना सम्भव नहीं है। <br><br> और यदि यह कहो कि घटाकाश, करकाकाश और भूच्छिद्राकाशादिके समान लिङ्गशरीर ही परमात्माके औपचारिक एक देशरूपसे कल्पित है [अर्थात् लिङ्गरूप उपाधिसे कल्पित जो परमात्माका अंश है, वही जीवात्मा है] तो ऐसी अवस्थामें लिङ्गदेहका वियोग होनेपर भी वासना परमात्माके एक देशको आश्रित कर लेगी<sup></sup> तथा 'ऊसर भूमिके समान अविद्याका स्वयं ही उदय हुआ है' |


१. स्वप्न आदि अवस्थाओंमें लिङ्गदेहका वियोग होनेपर जीवात्मामें वासना नहीं रह सकती; क्योंकि लिङ्गका अभाव हो जानेपर उसके अधीन रहनेवाले जीवका भी अभाव हो जाना सम्भव है। अतः लिङ्गका अभाव होनेपर जीवमें वासना रहती है—यह प्रक्रिया असंगत होगी; इसलिये यह मत ठीक नहीं है।

५२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५२८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
कल्पनानुपपन्नैव । न च वास्यदेशव्यतिरेकेण वासनाया वस्त्वन्तरसञ्चरणं मनसापि कल्पयितुं शक्यम् ।इत्यादि कल्पना असंगत ही ठहरेगी। इसके सिवा अपने निवासयोग्य स्थानको छोड़कर किसी अन्य वस्तुमें वासनाके सञ्चरित होनेकी तो मनसे भी कल्पना नहीं की जा सकती ।
न च श्रुतयो गच्छन्ति "कामः संकल्पो विचिकित्सा" बृ० उ० १ । ५ । ३) "हृदये ह्येव रूपाणि" (३ । ९ । २०) "ध्यायतीव लेलायतीव" (४ । ३ । ७) "कामा येऽस्य हृदि श्रिताः" (४ । ४ । ७) "तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान्हृदयस्य" (४ । ३ । २२) इत्याद्याः । न चासां श्रुतीनां श्रुतादर्थान्तरकल्पना न्याय्या, आत्मनः परब्रह्मत्वोपपादनार्थपरत्वाद्रासाम्, एतावान्मात्रार्थोपपत्तयत्वाच्च सर्वोपनिषदाम् । तस्माच्छ्रुत्यर्थकल्पनाकुशलाः सर्व एवोपनिषदर्थमन्यथा कुर्वन्ति । तथापि वेदार्थश्चेत्स्यात्कामं भवतु, न मे द्वेषः ।तथा इस विषयमें "काम, संकल्प और संशय," "हृदयमें ही रूप प्रतिष्ठित हैं", "मानो ध्यान करता है, मानो वेगसे चल रहा है" "जो संकल्प इसके हृदयमें स्थित हैं", "उस समय वह हृदयके समस्त शोकोंसे पार हो जाता है" इत्यादि श्रुतियाँ भी सहमत नहीं हैं। इन श्रुतियोंका यथाश्रुत अर्थ छोड़कर किसी दूसरे अर्थकी कल्पना करनी उचित नहीं है; क्योंकि ये आत्माका परब्रह्मत्व प्रतिपादन करनेमें प्रवृत्त हैं तथा इसी अर्थमें समस्त उपनिषदोंका पर्यवसान होता है। अतः श्रुतिके अर्थकी कल्पना करनेमें कुशल ये सभी लोग उपनिषद्के अर्थको उलटा कर देते हैं। तो भी यदि वह वेदका तात्पर्य हो तो भले ही रहे, मेरा उससे कोई द्वेष नहीं है।
न च 'द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे' इति राशित्रयपक्षे समञ्जसम्;किंतु [भर्तृप्रपञ्चके] राशित्रयसिद्धान्तमें ब्रह्मके दो ही रूप हैं' ऐसा कहना उचित नहीं है; जब कि

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५२९ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ५२९
संस्कृत मूल (भाष्य)हिन्दी भाष्यार्थ
यदा तु मूर्तामूर्ते तज्जनितवासनाश्च मूर्तामूर्ते द्वे रूपे, ब्रह्म च रूपि तृतीयम्, न चान्यच्चतुर्थमन्तराले—तदा एतदनुकूलमवधारणम्, द्वे एव ब्रह्मणो रूपे इति; अन्यथा ब्रह्मैकदेशस्य विज्ञानात्मनो रूपे इति कल्प्यम्, परमात्मनो वा विज्ञानात्मद्वारेणेति। तदा च रूपे एवेति द्विवचनमसमञ्जसम्, रूपाणीति वासनाभिः सह बहुवचनं युक्ततरं स्यात्—द्वे च मूर्तामूर्ते वासनाश्च तृतीयमिति।मूर्तामूर्त और तज्जनित वासनाएँ ये मूर्त और अमूर्त दो रूप हों और उनसे रूपवान् ब्रह्म तीसरा रूप हो तथा इनके बीचमें कोई चौथा रूप न हो, उसी समय ऐसा निश्चय करना ठीक होगा कि ब्रह्मके दो ही रूप हैं; नहीं तो ऐसा मानना होगा कि ये ब्रह्मके एक देश विज्ञानात्माके ही रूप हैं अथवा विज्ञानात्माके द्वारा परमात्माके रूप हैं। उस समय भी 'रूपे' ऐसा द्विवचनान्त प्रयोग उचित नहीं होगा, अपितु वासनाओंके साथ त्रित्व होनेके कारण 'रूपाणि' ऐसा बहुवचनान्त प्रयोग अधिक उचित होगा; अर्थात् दो तो मूर्त और अमूर्त एवं तीसरा रूप वासनाएँ।
अथ मूर्तामूर्ते एव परमात्मनो रूपे, वासनास्तु विज्ञानात्मन इति चेत्—तदा विज्ञानात्मद्वारेण विक्रियमाणस्य परमात्मनः—इतीयं वाचोयुक्तिरनर्थिका स्यात्, वासनाया अपि विज्ञानात्मद्वारत्वस्य अविशिष्टत्वात्; न च वस्तु वस्त्वन्तरद्वारेण विक्रियत इति मुख्यया वृत्त्या शक्यं कल्पयितुम्;यदि कहो कि परमात्माके रूप तो मूर्त और अमूर्त दो ही हैं, वासनाएँ तो विज्ञानात्माकी है तो उस अवस्था में [मूर्तामूर्तके विषयमें] ऐसी वाचोयुक्ति प्रदर्शित करना कि ये विज्ञानात्माके द्वारा विकारको प्राप्त होते हुए परमात्माके रूप हैं, व्यर्थ ही होगा, क्योंकि विज्ञानात्माका द्वारत्व तो वासनाओंके लिये भी ऐसा ही है। इसके सिवा एक वस्तु किसी अन्य वस्तुके द्वारा विकारको प्राप्त होती है—ऐसी मुख्यवृत्तिसे कल्पना

बृ० उ० ३४—

५३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५३०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| न च विज्ञानात्मा परमात्मनो वस्त्वन्तरम् तथा कल्पनायां सिद्धान्तहानात् । तस्माद् वेदार्थमूढानां स्वचित्तप्रभावा एवमादिकल्पना अक्षरबाह्याः; न ह्यक्षरबाह्यो वेदार्थो वेदार्थोपकारी वा, निरपेक्षत्वाद् वेदस्य प्रामाण्यं प्रति; तस्माद्राशित्रयकल्पना असमञ्जसा । | भी नहीं की जा सकती। और विज्ञानात्मा परमात्मासे कोई भिन्न वस्तु भी नहीं है, क्योंकि ऐसी कल्पना करनेमें तो अद्वैतसिद्धान्तकी ही हानि होती है। अतः वेदार्थसे अनभिज्ञ उन पुरुषोंकी ऐसी मनमानी कल्पना वेदाक्षरोंसे बाह्य है और अक्षरोंको छोड़कर किया हुआ अर्थ वास्तविक वेदार्थ अथवा वेदार्थमें उपयोगी नहीं हो सकता; क्योंकि अपने प्रामाण्यमें वेद किसीकी अपेक्षा नहीं रखता; अतः राशित्रयकी कल्पना ठीक नहीं है। | | ‘योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषः’ प्रकृतपरामर्शः इति लिङ्गात्मा प्रस्तुतोऽध्यात्मे, अधिदैवे च ‘य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषः’ इति, ‘तस्य’ इति प्रकृतोपादानात्स एवोपादीयते योऽसौ त्यस्यामूर्तस्य रसो न तु विज्ञानमयः । | ‘यह जो दक्षिण नेत्रान्तर्गत पुरुष है’ इस वाक्यद्वारा अध्यात्म-प्रकरणमें लिङ्गात्माका वर्णन आरम्भ किया गया है तथा अधिदैव-प्रकरणमें ‘यह जो इस आदित्यमण्डलमें पुरुष है’ इस प्रकार ‘तस्य’ इस पदसे प्रकृत [ लिङ्गात्मा ] का ग्रहण किये जानेके कारण वही ग्रहण किया गया है जो कि यह अमूर्त त्यत्का रस है, विज्ञानमयका ग्रहण नहीं किया गया। | | ननु विज्ञानमयस्यैवैतानि रूपाणि कस्मान्न भवन्ति ? विज्ञानमयस्यापि प्रकृतत्वात्, ‘तस्य’ इति च प्रकृतोपादानात् । | पूर्व०-यहाँ विज्ञानमयका भी प्रकरण है, इसलिये ये विज्ञानमयके ही रूप क्यों नहीं हैं ? क्योंकि ‘तस्य’ इस पदसे तो प्रकृतका ही ग्रहण किया गया है। |

ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५३१

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ५३१

| नैवम्, विज्ञानमयस्यारूपित्वेन विजिज्ञापयिषितत्वात्; यदि हि तस्यैव विज्ञानमयस्यैतानि माहारजनादीनि रूपाणि स्युस्तस्तस्यैव 'नेति नेति' इत्यनाख्येयरूपतयादेशो न स्यात्। | सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है, क्योंकि विज्ञानमयको अरूपवान्-रूपसे बतलाना अभीष्ट है। यदि ये माहारजनादिरूप उस विज्ञानमयके ही हों तो उसीका 'नेति-नेति' इस प्रकार अनिर्वचनीयरूपसे आदेश नहीं किया जा सकता। | | नन्वन्यस्यैवासावादेशो न तु विज्ञानमयस्येति ? | पूर्व०-किंतु यह आदेश तो किसी औरका ही है, विज्ञानमयका नहीं है? | | न, षष्ठान्ते उपसंहारात्—"विज्ञातारमरे केन विजानीयात्" इति विज्ञानमयं प्रस्तुत्य "स एष नेति नेति" (४।५।१५) इति; "विज्ञापयिष्यामि" इति च प्रतिज्ञाता अर्थवत्त्वात्। यदि च विज्ञानमयस्यैव असंव्यवहार्यमात्मस्वरूपं ज्ञापयितुमिष्टं स्यात्प्रध्वस्तसर्वोपाधिविशेषम्, तत इयं प्रतिज्ञार्थवती स्यात्—येनासौ ज्ञापितो जानात्यात्मानमेवाहं ब्रह्मास्मीति, शास्त्रनिष्ठां प्राप्नोति न बिभेति कुतश्चन। | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि, "अरे मैत्रेयि! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने" इस प्रकार [विज्ञानमयरूप-से] आरम्भ करके छठे अध्यायके अन्तमें "वह यह आत्मा ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है" इस प्रकार उपसंहार किया है तथा ऐसा माननेपर ही "विशेषरूपसे ज्ञान कराऊँगा" यह प्रतिज्ञा भी सार्थक हो सकती है। यहाँ यदि विज्ञानमयके ही सर्वोपाधिविनिर्मुक्त व्यवहारातीत आत्मस्वरूपका ज्ञान कराना अभीष्ट होगा तभी यह प्रतिज्ञा सार्थक हो सकेगी, जिसका ज्ञान कराये जाने-पर यह अपनेहीको 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा जानता और शास्त्रनिष्ठाको प्राप्त करता है तथा किसीसे भी भयको प्राप्त नहीं होता। |


१. अर्थात् उपनिषद्के चौथे अध्यायमें।

५३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

५३२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
अथ पुनरन्यो विज्ञानमयः, अन्यः 'नेति नेति' इति व्यपदिश्यते—तदान्यददो ब्रह्मान्योऽहमस्मीति विपर्ययो गृहीतः स्यात् न आत्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि' (१।४।९) इति। तस्मात् 'तस्य हैतस्य' इति लिङ्गपुरुषस्यैवैतानि रूपाणि।और यदि विज्ञानमय कोई अन्य हो तथा 'नेति नेति' इस वाक्यसे किसी अन्यका निर्देश किया गया हो तो उस अवस्थामें 'यह ब्रह्म अन्य है तथा मैं अन्य हूँ' ऐसा विपरीत ग्रहण किया जायगा; 'अपनेको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा ग्रहण नहीं होगा। अतः 'तस्य हैतस्य' इत्यादि मन्त्रसे बतलाये हुए ये रूप लिङ्गपुरुषके ही हैं।
(लिङ्गात्मस्वरूप-निरूपणम्)<br> सत्यस्य च सत्ये परमात्म-स्वरूपे वक्तव्ये निरवशेषं सत्यं वक्तव्यम्; सत्यस्य च विशेषरूपाणि वासनाः; तासामिमानि रूपाण्युच्यन्ते, एतस्य पुरुषस्य प्रकृतस्य लिङ्गात्मन एतानि रूपाणि; कानि तानि ? इत्युच्यन्ते—सत्यके सत्य परमात्माका स्वरूप बतलाना है, अतः यहाँ सम्पूर्ण सत्य बतलाना आवश्यक है। सत्यके ही विशेषरूप वासनाएँ हैं, उनके ये रूप बतलाये जाते हैं, ये इस प्रकृत लिङ्गात्मा पुरुषके रूप हैं; वे रूप कौन-से हैं ? सो बतलाये जाते हैं—
यथा लोके, महारजनं हरिद्रा तया रक्तं माहारजनं यथा वासो लोके, एवं स्त्र्यादिविषयसंयोगे तादृशं वासनारूपं रञ्जनाकारमुत्पद्यते चित्तस्य, येनासौ पुरुषो रक्त इत्युच्यते वस्त्रादिवत्।लोकमें जिस प्रकार माहारजन वस्त्र-महारजन हल्दीको कहते हैं, उससे रँगा हुआ जो वस्त्र होता है, वही माहारजन है, उसी प्रकार स्त्री आदि विषयका संयोग होनेपर चित्तका वैसा ही रञ्जनाकार वासनामय रूप उत्पन्न हो जाता है, जिसके कारण यह पुरुष वस्त्रादिके समान रक्त (रँगा हुआ या अनुरक्त) कहा जाता है।

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थं ५३३

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थं ५३३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
यथा च लोके पाण्ड्वाविकम्, अवेरिदम् आविकम् ऊर्णादि, यथा च तत्पाण्डुरं भवति, तथान्यद्वासनारूपम् । यथा च लोके इन्द्रगोपोऽत्यन्तरक्तो भवति एवमस्य वासनारूपम्। क्वचिद्विषयविशेषापेक्षया रागस्य तारतम्यम्, क्वचित्पुरुषचित्तवृत्त्यपेक्षया।तथा लोकमें जिस प्रकार पाण्डु आविक (सफेद ऊन) होता है, अवि (भेड़) के विकार ऊन आदिको आविक कहते हैं, जिस प्रकार वह पाण्डुर (श्वेतवर्ण) होता है, उसी प्रकार दूसरी वासनाका रूप है। इसी प्रकार लोकमें जैसे इन्द्रगोप कीड़ा अत्यन्त लाल रंगका होता है, वैसा ही इस पुरुषकी वासनाका भी रूप होता है। यहाँ कहीं तो विषयविशेषकी अपेक्षासे रागका तारतम्य है और कहीं पुरुषकी चित्तवृत्तिकी अपेक्षासे है।
यथा च लोकेऽग्न्यर्चिर्भास्वरं भवति, तथा क्वचित्कस्यचिद्वासनारूपं भवति। यथा पुण्डरीकं शुक्लम्, तद्वदपि च वासनारूपं कस्यचिद्भवति। यथा सकृद्विद्युत्तम्, यथा लोके सकृद्विद्योतनं सर्वतः प्रकाशकं भवति, तथा ज्ञानप्रकाशविवृद्ध्यपेक्षया कस्यचिद्वासनारूपमुपजायते। नैषां वासनारूपाणामादिरन्तो मध्यं सङ्ख्या वा, देशः कालो निमित्तं वावधार्यते—असङ्ख्येयत्वाद्वास-तथा लोकमें जिस प्रकार अग्निकी ज्वाला दीप्तिमती होती है, वैसे ही कहीं-कहीं किसीकी वासनाओंका रूप भी होता है। और जिस तरह पुण्डरीक (श्वेत कमल) सफेद रंगका होता है, उस प्रकार भी किसीकी वासनाओंका रूप होता है। जिस प्रकार सकृद्विद्युत्—लोकमें बिजलीका एक बार चमकना सब ओर प्रकाश करनेवाला होता है, वैसे ही ज्ञानरूप प्रकाशकी वृद्धिकी अपेक्षासे किसीकी वासनाका रूप हो जाता है। वासनाके इन रूपोंके आदि, अन्त, मध्य, संख्या अथवा देश, काल या निमित्तका कोई निश्चय नहीं किया जा सकता, क्योंकि वासनाएँ अगणित हैं और

५३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५३४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| नायाः, वासनाहेतूनां चानन्त्यात् तथा च वक्ष्यति षष्ठे—"इदंमयोऽदोमयः" (४।४।५) इत्यादि।<br><br>तस्मान्न स्वरूपसङ्ख्यावधारणार्था दृष्टान्ताः—'यथा माहारजनं वासः' इत्यादयः, किं तर्हि ? प्रकारप्रदर्शनार्थाः—एवम्प्रकाराणि हि वासनारूपाणीति। यत्तु वासनारूपमभिहितमन्ते—सकृद्विद्योतनमिवेति, तत्किल हिरण्यगर्भस्य अव्याकृतात्प्रादुर्भवतः तडिद्वत्सकृदेव व्यक्तिर्भवतीति; तत्तदीयं वासनारूपं हिरण्यगर्भस्य यो वेद तस्य सकृद्विद्युत्तेव, ह वै इत्यवधारणार्थौ, एवमेवास्य श्रीः ख्यातिर्भवतीत्यर्थः; यथा हिरण्यगर्भस्य—एवमेतद्यथोक्तं वासनारूपमन्त्यं यो वेद। | वासनाओंके हेतुओंका भी कोई अन्त नहीं है; जैसा कि छठे (उपनिषद्के चौथे) अध्यायमें "इदंमयः अदोमयः" आदि श्रुति बतलावेगी।<br><br>अतः 'जिस प्रकार माहारजन वस्त्र होता है' इत्यादि दृष्टान्त स्वरूप-संख्याका निश्चय करनेके लिये नहीं हैं; तो फिर किसलिये हैं? रूपोंका प्रकार प्रदर्शित करनेके लिये हैं अर्थात् वासनाके रूप इस-इस प्रकारके हैं—यह दिखानेके लिये हैं। अन्तमें जो 'एक बार बिजलीके चमकनेके समान' वासनाका रूप दिखाया गया है, वह यह दिखानेके लिये है कि अव्याकृतसे प्रादुर्भूत होते हुए हिरण्यगर्भकी बिजलीके समान एक बार ही अभिव्यक्ति होती है। अतः जो उस हिरण्यगर्भकी वासनाके रूपको जानता है, उसकी सकृद्विद्युत्ता-सी होती है। यहाँ 'ह' और 'वै'—ये दोनों निपात निश्चयार्थक हैं। तात्पर्य यह है कि इस प्रकार जो वासनाके इस अन्तिम रूपको जानता है, उसकी इसी प्रकार श्री यानी ख्याति होती है, जैसी कि हिरण्यगर्भकी। |

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५३५ |

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५३५ | | :--- | :--- |

[संस्कृत-भाष्यम्][भाष्यार्थ]
एवं निरवशेषं सत्यस्य स्व- <br> <sub>परमात्मस्वरूप-</sub> रूपमभिधाय, यत्त- <br> <sub>निर्देशः</sub> त्सत्यस्य सत्यम- <br> वोचाम तस्यैव स्वरूपावधारणार्थं <br> <sub>ब्रह्मण</sub> इदमारभ्यते—अथा- <br> नन्तरं सत्यस्वरूपनिर्देशानन्तरम्, <br> यत्सत्यस्य सत्यं तदेवावशिष्यते <br> यस्मादतस्तस्मात्सत्यस्य सत्यं <br> स्वरूपं निर्देक्ष्यामः । आदेशो <br> निर्देशो ब्रह्मणः । कः पुनरसौ <br> निर्देशः ? इत्युच्यते--नेति नेती- <br> त्येवं निर्देशः । <br><br> ननु कथमाभ्यां 'नेति नेति' <br> इति शब्दाभ्यां सत्यस्य सत्यं <br> निर्दिदिक्षितम् इत्युच्यते— <br> सर्वोपाधिविशेषापोहेन । यस्मिन्न <br> कश्चिद्विशेषोऽस्ति—नाम वा रूपं <br> वा कर्म वा भेदो वा जातिर्वा <br> गुणो वा; तद्वारेण हि शब्द- <br> प्रवृत्तिर्भवति । न चैषां कश्चिद् <br> विशेषो ब्रह्मण्यस्ति; अतो न <br> निर्देष्टुं शक्यते—इदं तदिति <br> गौरसौ स्पन्दते शुक्लो विषाणीतिइस प्रकार सत्यके अशेष स्वरूपका निरूपण कर, जिसे हमने सत्यका सत्य कहा है, उसी ब्रह्मके स्वरूपका निश्चय करनेके लिये यह आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है-अथ-अनन्तर अर्थात् सत्यके स्वरूपका निरूपण करनेके पश्चात्, क्योंकि जो सत्यका सत्य है वही बच रहता है, अतः-इसलिये हम सत्यके सत्य स्वरूपका निर्देश करेंगे । आदेश अर्थात् ब्रह्मका निर्देश । किंतु वह 'निर्देश' क्या है? सो बताया जाता है—'नेति नेति' इस प्रकार किया हुआ निर्देश । <br><br> किंतु 'नेति नेति' इन दो शब्दोंद्वारा सत्यके सत्यका निरूपण किस प्रकार अभीष्ट है, सो बतलाया जाता है—समस्त उपाधिरूप विशेषके निषेधद्वारा [ उसका निरूपण किया गया है ] जिसमें कि नाम, रूप, कर्म, भेद, जाति अथवा गुणरूप कोई भी विशेषता नहीं है; क्योंकि शब्दकी प्रवृत्ति तो इन्हींके द्वारा होती है । किंतु ब्रह्ममें इनमेंसे कोई भी विशेषता नहीं है, इसलिये 'यह अमुक है' इस प्रकार उसका निर्देश नहीं किया जा सकता । जिस प्रकार लोकमें 'यह बैल चेष्टा करता है, श्वेत है, सींगोंवाला है' ऐसा कहकर