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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८६९ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ८६९
संस्कृतहिन्दी
परेण जगदात्मा प्राणोपाधिः, ततोऽपि प्रविलाप्य जगदात्मानमुपाधिभूतं रज्ज्वादाविव सर्पादिकं विद्यया, 'स एष नेति नेति' इति साक्षात् सर्वान्तरं ब्रह्माधिगतम् । एवमभयं परिप्रापितो जनको याज्ञवल्क्येनागमतः संक्षेपतः ।सूक्ष्म प्राणोपाधिक जगदात्मा जाना गया । फिर रज्जु आदिमें सर्पादिके समान उपाधिभूत जगदात्माका भी ज्ञानद्वारा लय करके 'स एष नेति नेति' इस वाक्यद्वारा साक्षात् सर्वान्तर ब्रह्म जाना गया है । इस प्रकार संक्षेपतः शास्त्रद्वारा याज्ञवल्क्यसे जनक अभयको प्राप्त कराया गया है ।
अत्र च जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ततुरीयाण्युपन्यस्तान्यन्यप्रसङ्गेन—इन्धः, प्रविविक्ताहारतरः, सर्वे प्राणाः, स एष नेति नेतीति । इदानीं जाग्रत्स्वप्नादिद्वारेणैव महता तर्केण विस्तरतोऽधिगमः कर्तव्यः, अभयं प्रापयितव्यम्, सद्भावश्चात्मनो विप्रतिपत्त्याशङ्कानिराकरणद्वारेण—व्यतिरिक्तत्वं शुद्धत्वं स्वयंज्योतिष्ट्वमलुप्तशक्तिस्वरूपत्वं निरतिशयानन्दस्वाभाव्यम् अद्वैतत्वं चाधिगन्तव्यम्—इतीदमारभ्यते । आख्यायिका तु विद्यासम्प्रदानग्रहणविधिप्रकाशनार्था, विद्यास्तुतये च विशेषतः, वरदानादिसूचनात् ।यहाँ (द्वितीय ब्राह्मणमें) [उपासककी क्रममुक्तिरूप] अन्य प्रसङ्गसे 'इन्धः' 'प्रविविक्ताहारतरः' 'सर्वे प्राणाः' 'स एष नेति नेति' इत्यादि रूपसे जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीयका उल्लेख किया गया है । अब जाग्रत्, स्वप्नादिके द्वारा ही महान् तर्कसे उसका विस्तारपूर्वक बोध और अभय प्राप्त कराना है तथा विपरीत ज्ञानकी आशङ्काके निराकरणद्वारा आत्माके अस्तित्व, देहादिसे भिन्नत्व, शुद्धत्व, स्वयंप्रकाशत्व, अलुप्तशक्तिस्वरूपत्व, निरतिशयानन्दस्वभावत्व और अद्वैतत्वका भी बोध कराना है; इसीसे [आगेका ग्रन्थ] आरम्भ किया जाता है । आख्यायिका तो विद्याके दान और ग्रहणकी विधि प्रदर्शित करनेके लिये तथा विशेषतः विद्याकी स्तुतिके लिये है, वरदानादिकी सूचनासे यही बात ज्ञात होती है ।

८७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

८७०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

जनकके पास याज्ञवल्क्यका आना और राजाका पहले प्राप्त किये हुए इच्छानुसार प्रश्नरूप वरके कारण उनसे प्रश्न करना

जनकँ ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम स मेने न वदिष्य इत्यथ ह यज्जनकश्च वैदेहो याज्ञवल्क्यश्चाग्निहोत्रे समूदाते तस्मै ह याज्ञवल्क्यो वरं ददौ स ह कामप्रश्नमेव वव्रे तँ हास्मै ददौ तँ ह सम्राडेव पूर्वं पप्रच्छ ॥ १ ॥

विदेहराज जनकके पास याज्ञवल्क्य गये। उनका विचार था मैं कुछ उपदेश नहीं करूँगा। किंतु, पहले कभी विदेहराज जनक और याज्ञवल्क्यने अग्निहोत्रके विषयमें परस्पर संवाद किया था, उस समय याज्ञवल्क्यने उसे वर दिया था और उसने इच्छानुसार प्रश्न करना ही माँगा था। यह वर याज्ञवल्क्यने उसे दे दिया था; अतः उनसे पहले राजाने ही प्रश्न किया ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
जनकं ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम। स च गच्छन्नेवं मेने चिन्तितवान्—न वदिष्ये किञ्चिदपि राज्ञे; गमनप्रयोजनं तु योगक्षेमार्थम्। न वदिष्य इत्येवंसंकल्पोऽपि याज्ञवल्क्यो यद् यज्जनकः पृष्टवांस्तत्तत् प्रतिपेदे; तत्र को हेतुः संकल्पितस्यान्यथाकरणे—इत्यत्राख्यायिकामाचष्टे।विदेहराज जनकके पास याज्ञवल्क्य गये। उन्होंने जाते हुए ऐसा विचार किया—यह सोचा कि मैं राजाके प्रति कुछ उपदेश नहीं करूँगा; जानेका प्रयोजन तो योगक्षेमके लिये था। 'कुछ उपदेश नहीं करूँगा' इस प्रकार संकल्पवाले होनेपर भी याज्ञवल्क्यने जो-जो भी जनकने पूछा वह सभी बतलाया; इस प्रकार संकल्पित विचारके विरुद्ध करनेमें क्या हेतु था, इस विषयमें श्रुति आख्यायिका बतलाती है।
पूर्वत्र किल जनकयाज्ञवल्क्ययोः संवाद आसीदग्निहोत्रे निमित्ते। तत्र जनकस्याग्निहोत्रविषयं विज्ञा-इससे पहले याज्ञवल्क्य और जनकका अग्निहोत्रके निमित्तसे संवाद हुआ था। उसमें जनकके अग्निहोत्र-

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७१

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७१


| समुपलभ्य परितुष्टो याज्ञवल्क्यस्तस्मै जनकाय ह किल वरं ददौ; स च जनको ह कामप्रश्नमेव वरं वव्रे वृतवान्; तं च वरं हास्मै ददौ याज्ञवल्क्यः; तेन वरप्रदानसामर्थ्येन अव्याचिख्यासुमपि याज्ञवल्क्यं तूष्णीं स्थितमपि सम्म्राडेव जनकः पूर्वं पप्रच्छ । <br><br> तत्रैवानुक्तिर्ब्रह्मविद्यायाः कर्मणा विरुद्धत्वात्; विद्यायाश्च स्वातन्त्र्यात्—स्वतन्त्रा हि ब्रह्मविद्या सहकारिसाधनान्तरनिरपेक्षा पुरुषार्थसाधनेति च ॥१॥ | विषयक ज्ञानको देखकर उससे संतुष्ट हो याज्ञवल्क्यने जनकको वर दिया था, उस जनकने उस समय इच्छानुसार प्रश्न करनेका वर ही माँगा था और याज्ञवल्क्य ने उसे यह वर दे दिया था; उस वरप्रदानके सामर्थ्यसे कुछ कहनेकी इच्छावाले न होने और चुप बैठे रहनेपर भी पहले राजा जनकने ही याज्ञवल्क्यसे पूछा । <br><br> कर्मसे विरुद्ध होनेके कारण उस कर्मकाण्डके प्रसङ्गमें ही ब्रह्मविद्याका वर्णन नहीं किया गया, क्योंकि विद्या तो स्वतन्त्र है—ब्रह्मविद्या स्वतन्त्र है, अन्य सहकारी साधनकी अपेक्षासे रहित है और पुरुषार्थकी साधनभूत है ॥ १ ॥ |


पुरुषके व्यवहारमें उपयोगी पाँच ज्योतियाँ

१—आदित्यज्योति

याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरयं पुरुष इति । आदित्यज्योतिः सम्राडिति होवाचादित्येनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥२॥

'हे याज्ञवल्क्य ! यह पुरुष किस ज्योतिवाला है ?' 'हे सम्राट् ! यह आदित्यरूप ज्योतिवाला है'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'यह आदित्यरूप ज्योतिसे ही बैठता, सब ओर जाता, कर्म करता और लौट जाता है । याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २ ॥

८७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

८७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| हे याज्ञवल्क्येत्येवं सम्बोध्याभिमुखीकरणाय, किं ज्योतिरयं पुरुष इति—किमस्य पुरुषस्य ज्योतिर्येन ज्योतिषा व्यवहरति, सोऽयं किं ज्योतिः ? अयं प्राकृतः कार्यकारणसंघातरूपः शिरःपाण्यादिमान् पुरुषः पृच्छयते । किमयं स्वावयवसंघातबाह्येन ज्योतिरन्तरेण व्यवहरति, आहो स्वित् स्वावयवसंघातमध्यपातिना ज्योतिषा ज्योतिष्कार्यमयं पुरुषो निर्वर्तयति, इत्येतदभिप्रेत्य पृच्छति । | 'हे याज्ञवल्क्य' इस प्रकार अपने अभिमुख करनेके लिये सम्बोधन करके जनक पूछता है—यह पुरुष किस ज्योतिवाला है ? अर्थात् इस पुरुषकी ज्योति क्या है, जिस ज्योतिसे कि यह व्यवहार करता है ? (इसी अभिप्रायसे पूछता है—) सो यह पुरुष किस ज्योतिवाला है ? यहाँ इस प्राकृत देहेन्द्रियसंघातरूप शिर और हाथ आदि अवयवोंवाले पुरुषके विषयमें प्रश्न किया जाता है। क्या यह अपने अवयवोंसे बाहर रहनेवाली किसी अन्य ज्योतिसे व्यवहार करता है, अथवा अपने अवयवोंके संघातमें रहनेवाली ज्योतिसे यह पुरुष ज्योतिका कार्य पूरा करता है—इस अभिप्रायसे ही जनक पूछता है। | | किं चातः, यदि व्यतिरिक्तेन यदि वाऽव्यतिरिक्तेन ज्योतिषा ज्योतिष्कार्यं निर्वर्तयति । शृणु यत्र कारणम्—यदि व्यतिरिक्तेनैव ज्योतिषा ज्योतिष्कार्यनिर्वर्तकत्वम् अस्य स्वभावो निर्धारितो भवति, ततोऽदृष्टज्योतिष्कार्यविषयेऽप्यनुमास्यामहे व्यतिरिक्तज्योतिर्निमित्तमेवेदं कार्यमिति; | किंतु देहादि संघातसे व्यतिरिक्त अथवा अव्यतिरिक्त किसी भी प्रकारकी ज्योतिसे यह ज्योतिका कार्य पूर्ण करता हो—इससे क्या हुआ ? इसमें जो कारण है, सो सुनो—यदि इसका स्वभाव किसी व्यतिरिक्त ज्योतिसे ही ज्योतिका कार्य पूरा करनेका निश्चय किया जाय तो जहाँ ज्योति नहीं देखी गयी है, उस कार्यके विषयमें भी हम ऐसा अनुमान करेंगे कि यह कार्य किसी व्यतिरिक्त ज्योतिके कारण ही हुआ है; और यदि |

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८७३ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ८७३

| अथाव्यतिरिक्तेनैव स्वात्मना ज्योतिषा व्यवहरति, ततोऽप्रत्यक्षेऽपि ज्योतिषि ज्योतिष्कार्यदर्शनेऽव्यतिरिक्तमेव ज्योतिरनुमेयम्; अथानियम एव—व्यतिरिक्तमव्यतिरिक्तं वा ज्योतिः पुरुषस्य व्यवहारहेतुः, ततोऽनध्यवसाय एव ज्योतिर्विषये—इत्येवं मन्वानः पृच्छति जनको याज्ञवल्क्यम्—किं ज्योतिरयं पुरुष इति । | यह अपनेसे अभिन्न ज्योतिद्वारा ही व्यवहार करता है तो ज्योतिका प्रत्यक्ष न होनेपर भी ज्योतिका कार्य देखनेपर अभिन्न ज्योतिका ही अनुमान करना होगा; यदि ऐसा मानें कि पुरुषके व्यवहारकी हेतु व्यतिरिक्त या अव्यतिरिक्त ज्योति है—इसका नियम है ही नहीं, तब तो ज्योतिके विषयमें अनिश्चय ही रहेगा—ऐसा मानकर ही जनक याज्ञवल्क्यसे पूछता है कि यह पुरुष किस ज्योतिवाला है? | | नन्वेवमनुमानकौशले जनकस्य किं प्रश्नेन, स्वयमेव कस्मान्न प्रतिपद्यत इति ? | **शङ्का—**किंतु यदि जनकमें ऐसा अनुमानकौशल है तो उसे प्रश्न करनेकी क्या आवश्यकता थी, उसने स्वयं ही [ अनुमान करके ] क्यों नहीं जान लिया ? | | सत्यमेतत्; तथापि लिङ्गलिङ्गिसम्बन्धविशेषाणामत्यन्तसौक्ष्म्याद् दुरवबोध्यतां मन्यते बहूनामपि पण्डितानाम्, किमुतैकस्य; अत एव हि धर्मसूक्ष्मनिर्णये परिषद्द्यापार इष्यते, पुरुषविशेषश्चापेक्ष्यते—दशावरा | **समाधान-**यह ठीक है; तथापि लिङ्ग और लिङ्गी [ अर्थात् व्यापक और व्याप्य ] के सम्बन्धविशेषोंकी अत्यन्त सूक्ष्मताके कारण वह उन्हें अनेकों विद्वानोंके लिये भी दुर्बोध समझता है, एककी तो बात ही क्या है; इसीसे धर्म-जैसे सूक्ष्म विषयका निर्णय करनेके लिये परिषद् व्यापार (अनेकोंकी गोष्ठी) की अपेक्षा होती है तथा विशिष्ट पुरुषकी भी अपेक्षा होती है। कम-से-कम दश पुरुषोंकी |

८७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

८७४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| परिषत्, त्रयो वैको वेति; तस्माद् यद्यप्यनुमानकौशलं राज्ञः, तथापि तु युक्तो याज्ञवल्क्यः प्रष्टुम्, विज्ञानकौशलतारतम्योपपत्तेः पुरुषाणाम् । | परिषद् होती है, तथा [ सदाचारसम्पन्न ] तीन पुरुषोंकी और [ अध्यात्मनिष्ठ ] एक पुरुषकी भी परिषद् हो सकती है। इसलिये यद्यपि राजा में अनुमान करनेकी कुशलता है, तो भी याज्ञवल्क्यसे पूछना उचित ही है; क्योंकि पुरुषोंके विज्ञान और कौशलका तो तारतम्य होना सम्भव है। | | अथवा श्रुतिः स्वयमेव आख्यायिकाव्याजेन अनुमानमार्गमुपन्यस्य अस्मान् बोधयति पुरुषमतिमनुसरन्ती । | अथवा पुरुषकी बुद्धिका अनुसरण करनेवाली श्रुति आख्यायिकाके मिषसे अनुमानके मार्गका उल्लेख करके हमें स्वयं ही बोध करा रही है। [इसमें राजा अथवा मुनि किसीकी भी बुद्धिकी कुशलता अभिप्रेत नहीं है]। | | याज्ञवल्क्योऽपि जनकाभिप्रयाभिज्ञतया व्यतिरिक्तमात्मज्योतिर्बोधयिष्यन् जनकं व्यतिरिक्तप्रतिपादकमेव लिङ्गं प्रतिपेदे, यथा—प्रसिद्धमादित्यज्योतिः सम्राडिति होवाच । | जनकके अभिप्रायको जाननेवाले होनेसे याज्ञवल्क्यजीने भी देहादिसे व्यतिरिक्त आत्मज्योतिका बोध करानेके लिये जनकको व्यतिरिक्त ज्योतिका प्रतिपादक लिङ्ग ही बतलाया; यथा— हे सम्राट् ! वह प्रसिद्ध आदित्य ज्योतिवाला है, ऐसा उन्होंने कहा। | | कथम् ? आदित्येनैव स्वावयवसंघातव्यतिरिक्तेन चक्षुषोऽनुग्राहकेण ज्योतिषायं प्राकृतः पुरुष आस्ते उपविशति, पल्ययते पर्यति क्षेत्रमरण्यं वा तत्र गत्वा कर्म कुरुते, विपल्येति विपर्येति च यथागतम् अत्यन्तव्यतिरिक्तज्यो- | किस प्रकार आदित्य ज्योतिवाला है ? [ सो बतलाते हैं—] यह प्राकृत पुरुष अपने अवयवसंघातसे व्यतिरिक्त नेत्रेन्द्रियके अनुग्राहक आदित्यके द्वारा ही बैठता, इधर-उधर क्षेत्र या जंगलमें जाता, वहाँ जाकर कर्म-करता और जैसे गया था, वैसे लौट भी आता है। पुरुषके अत्यन्त व्यतिरिक्त ज्योतिष्ट्वकी |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८७५

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८७५


| लिङ्गप्रसिद्धताप्रदर्शनार्थम् अनेकविशेषणम्; बाह्यानेकज्योतिःप्रदर्शनं च लिङ्गस्याव्यभिचारित्वप्रदर्शनार्थम् ।<br>एवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २ ॥ | प्रसिद्धता प्रदर्शित करनेके लिये यहाँ अनेक विशेषण दिये गये हैं। और बाह्य अनेक ज्योतियोंका प्रदर्शन लिङ्गका अव्यभिचारित्व प्रदर्शित करनेके लिये है।<br>[ जनक— ] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २ ॥ |


२—चन्द्रज्योति

अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरेवायं पुरुष इति चन्द्रमा एवास्य ज्योतिर्भवतीति चन्द्रमसैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ३ ॥

[ जनक— ] 'हे याज्ञवल्क्य ! आदित्यके अस्त हो जानेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'उस समय चन्द्रमा ही उसकी ज्योति होता है, चन्द्रमारूप ज्योतिके द्वारा ही यह बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और लौट आता है।' [ जनक— ] 'हे याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ ३ ॥

| तथास्तमिते आदित्ये याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरेवायं पुरुष इति; चन्द्रमा एवास्य ज्योतिः ॥ ३ ॥ | 'तथा आदित्यके अस्त होनेपर हे याज्ञवल्क्य ! यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है ?' 'चन्द्रमा ही इसकी ज्योति होता है' ॥ ३ ॥ |


३—अग्निज्योति

अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते किं ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यग्निरेवास्य ज्योति-

८७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

८७६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

भवतीत्यग्निनेवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ४ ॥

'हे याज्ञवल्क्य ! आदित्यके अस्त हो जानेपर तथा चन्द्रमाके अस्त हो जानेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है?' 'अग्नि ही इसकी ज्योति होता है। यह अग्निरूप ज्योतिके द्वारा ही बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और लौट आता है।' 'हे याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥४॥

अस्तमिते आदित्ये चन्द्रमस्य-<br><br>स्तमितेऽग्निर्ज्योतिः ॥ ४ ॥आदित्यके अस्त होनेपर और चन्द्रमाके अस्त होनेपर अग्नि ज्योति होता है ॥ ४ ॥

४-वाग्ज्योति

अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ किं ज्योतिरेवायं पुरुष इतिवागे वास्य ज्योतिर्भवतीति वाचैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति तस्माद् वै सम्राडपि यत्र स्वः पाणिर्न विनिर्ज्ञायतेऽथ यत्र वागुच्चरत्युपैव तत्र न्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ५ ॥

'हे याज्ञवल्क्य ! आदित्यके अस्त होनेपर, चन्द्रमाके अस्त होनेपर और अग्निके शान्त होनेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है ?' 'वाक् ही इसकी ज्योति होती है। यह वाक्रूप ज्योतिके द्वारा ही बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और लौट आता है। इसीसे हे सम्राट् ! जहाँ अपना हाथ भी नहीं जाना जाता, वहाँ ज्यों ही वाणीका उच्चारण किया जाता है कि पास चला जाता है।' 'हे याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ ५ ॥

शान्तेऽग्नौ वाग्ज्योतिः; वागिति<br><br>शब्दः परिगृह्यते; शब्देन विष-अग्निके शान्त होनेपर वाक् ज्योति है। 'वाक्' इस शब्दसे शब्द ग्रहण किया जाता है; शब्द-

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ८७७

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ८७७


| येण श्रोत्रमिन्द्रियं दीप्यते; श्रोत्रेन्द्रिये सम्प्रदीप्ते मनसि विवेक उपजायते; तेन मनसा बाह्यां चेष्टां प्रतिपद्यते—"मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति" ( बृ० उ० १ । ५ । ३ ) इति ब्राह्मणम् । | रूप विषयसे श्रोत्रेन्द्रिय दीप्त होती है; श्रोत्रेन्द्रियके सम्यक् प्रकारसे दीप्त होनेपर मनमें विवेक उत्पन्न होता है; उस मनसे बाह्य चेष्टाका अनुभव करता है; “मनसे ही देखता है, मनसे सुनता है” ऐसा प्रथम अध्यायके पञ्चम ब्राह्मणका कथन है। | | कथं पुनर्वाग्ज्योतिरिति, वाचो ज्योतिष्ट्वमप्रसिद्धमित्यत आह— तस्माद् वै सम्राड् यस्माद् वाचा ज्योतिषानुगृहीतोऽयं पुरुषो व्यवहरति, तस्मात् प्रसिद्धमेतद् वाचो ज्योतिष्ट्वम्; कथम् ? अपि-यत्र यस्मिन् काले प्रावृषि प्रायेण मेघान्धकारे सर्वज्योतिःप्रत्यस्तमये स्वोऽपि पाणिर्हस्तो न विस्पष्टं निर्ज्ञायते—अथ तस्मिन् काले सर्वचेष्टानिरोधे प्राप्ते बाह्यज्योतिषोऽभावाद् यत्र वागुच्चरति, श्वा वा भषति, गर्दभो वा रौति, उपव तत्र न्येति—तेन शब्देन ज्योतिषा श्रोत्रमनसोर्नैरन्तर्यं भवति, तेन ज्योतिष्कार्यत्वं वाक् प्रतिपद्यते, तेन वाचा ज्योतिषोपन्त्येत्येव— | किंतु वाक् किस प्रकार ज्योति है ? वाक्का ज्योति होना तो प्रसिद्ध नहीं है; इसीसे श्रुति कहती है;—इसीसे हे सम्राट् ! चूँकि यह पुरुष वाणीरूप ज्योतिसे अनुगृहीत होकर व्यवहार करता है, इसलिये इस वाणीका ज्योति होना प्रसिद्ध है । किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं—] जब-जिस समय वर्षाकालमें मेघके अन्धकारमें प्रायः समस्त ज्योतियोंके अस्त हो जानेपर अपने हाथका भी स्पष्टतया भान नहीं होता, उस समय समस्त चेष्टाओंका निरोध प्राप्त होनेपर बाह्यज्योतियोंका अभाव होनेसे जहाँ वाणीका उच्चारण होता है, कुत्ता भोंकता है अथवा गधा रेंकता है वहीं उसके समीप पुरुष चला जाता है; उस शब्दरूप ज्योतिसे श्रोत्र ओर मनकी निरन्तरता हो जाती है, इससे वाक् ज्योतिकी |

८७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

८७८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| उपगच्छत्येव तत्र संनिहितो भवतीत्यर्थः; तत्र च कर्म कुरुते, विपल्येति । <br><br> तत्र वाग्ज्योतिषो ग्रहणं गन्धादीनामुपलक्षणार्थम्; गन्धादिभिरपि हि घ्राणादिष्वनुगृहीतेषु प्रवृत्तिनिवृत्त्यादयो भवन्ति; तेन तैरप्यनुग्रहो भवति कार्यकारणसंघातस्य; एवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ५ ॥ | कार्यताको प्राप्त हो जाती है, तात्पर्य यह है कि उस वाणीरूप ज्योतिसे पुरुष उपन्येति समीप जाता अर्थात् निकटवर्ती हो जाता है और वह कर्म करता तथा पुनः लौट आता है। <br><br> जहाँ वाक्रूप ज्योतिका ग्रहण गन्धादिके उपलक्षणके लिये है; गन्धादिके द्वारा भी घ्राणादिके अनुगृहीत होनेपर प्रवृत्ति और निवृत्ति आदि होते हैं; अतः उनसे भी देहेन्द्रियसंघातका अनुग्रह होता है; [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ ५ ॥ |

५-आत्मज्योति

अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ शान्तायां वाचि किं ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यात्मैवास्य ज्योतिर्भवतीत्यात्मनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति ॥ ६ ॥

'हे याज्ञवल्क्य ! आदित्यके अस्त होनेपर, चन्द्रमाके अस्त होनेपर, अग्निके शान्त होनेपर और वाक्के भी शान्त होनेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला रहता है ?' 'आत्मा ही इसकी ज्योति होता है। यह आत्मज्योतिके द्वारा ही बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और फिर लौट आता है' ॥ ६ ॥

शान्तायां पुनर्वाचि, गन्धादिष्वपि च शान्तेषु बाह्येष्वनुग्राहकेषु, सर्वप्रवृत्तिनिरोधः प्राप्तोऽस्यवाणीके शान्त हो जानेपर तथा गन्धादि बाह्य अनुग्राहकोंके भी निवृत्त हो जानेपर इस पुरुषकी सम्पूर्ण प्रवृत्तियोंका निरोध प्राप्त होता

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८७९ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ८७९
शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
पुरुषस्य। एतदुक्तं भवति— जाग्रद्विषये बहिर्मुखानि करणानि चक्षुरादीन्यादित्यादिज्योतिर्भिरनुगृह्यमाणानि यदा, तदा स्फुटतरः संव्यवहारोऽस्य पुरुषस्य भवतीति; एवं तावज्जागरिते स्वावयवसंघातव्यतिरिक्तेनैव ज्योतिषा ज्योतिष्कार्यसिद्धिरस्य पुरुषस्य दृष्टा। तस्मात्ते वयं मन्यामहे—सर्वबाह्यज्योतिःप्रत्यस्तमयेऽपि स्वप्नसुषुप्तिकाले जागरिते च तादृगवस्थायां स्वावयवसंघातव्यतिरिक्तेनैव ज्योतिषा ज्योतिष्कार्यसिद्धिरस्येति, दृश्यते च स्वप्ने ज्योतिष्कार्यसिद्धिः—बन्धुसंगमनवियोगदर्शनं देशान्तरगमनादि च; सुषुप्ताच्चोत्थानम्—सुखमहमस्वाप्सं न किञ्चिदवेदिषमिति; तस्मादस्ति व्यतिरिक्तं किमपि ज्योतिः।है। यहाँ यह कहा गया है— जिस समय जाग्रत्-अवस्थामें आदित्यादि ज्योतियोंसे अनुगृहीत होनेवाली चक्षु आदि इन्द्रियाँ बहिर्मुख होती हैं, उस समय इस पुरुषका व्यवहार स्पष्टतर होता है; इस प्रकार जाग्रत्-अवस्थामें तो इस पुरुषके ज्योतिरसम्बन्धी कार्योंकी सिद्धि अपने अवयवसंघातसे व्यतिरिक्त ज्योतिके द्वारा ही देखी गयी है; अतः हम समझते हैं कि स्वप्न और सुषुप्तिकालमें सम्पूर्ण बाह्य ज्योतियोंके अस्त हो जानेपर तथा जाग्रत्कालमें भी ऐसी अवस्था आनेपर अपने अवयवसंघातसे व्यतिरिक्त ज्योतिके द्वारा ही इस पुरुषके ज्योतिरसम्बन्धी कार्यकी सिद्धि होती है; स्वप्नमें बन्धुओंके संयोग-वियोग दिखायी देने और देशान्तरमें जाने आदि ज्योतिके कार्योंकी सिद्धि देखी ही जाती है; इसी प्रकार सुषुप्तिसे उठना और 'मैं सुखसे सोया उस समय कुछ भी भान नहीं रहा' ऐसा अनुभव भी देखा ही जाता है। अतः कोई व्यतिरिक्त ज्योति है।

८८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

८८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
किं पुनस्तच्छान्तायां वाचि ज्योतिर्भवति ? इत्युच्यते—<br><br>आत्मैवास्य ज्योतिर्भवतीति ।<br><br>आत्मेति कार्यकारणस्वावयवसंघातव्यतिरिक्तं कार्यकारणावभासकम्, आदित्यादिबाह्यज्योतिर्वत् स्वयमन्येनानवभास्यमानमभिधीयते ज्योतिः; अन्तःस्थं च तत् पारिशेष्यात्—कार्यकरणव्यतिरिक्तं तदिति तावत् सिद्धम्; यच्च कार्यकरणव्यतिरिक्तं कार्यकरणसंघातानुग्राहकं च ज्योतिस्तद् बाह्यैश्चक्षुरादिकरणैरुपलभ्यमानं दृष्टम्; न तु तथा तच्चक्षुरादिभिरुपलभ्यते, आदित्यादिज्योतिःषूपरतेषु; कार्यं तु ज्योतिषो दृश्यते यस्मात्, तस्मादात्मनैवायं ज्योतिषा आस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति; तस्मान्नूनमन्तःस्थं ज्योतिरित्यवगम्यते । किं च आदित्यादिज्योतिर्विलक्षणं तदभौतिकं च; स एवकिंतु उस वाणीके शान्त होनेपर कौन ज्योति होती है ? सो बतलाया जाता है—उस समय आत्मा ही इस पुरुषकी ज्योति होता है। आत्मा—यह देहेन्द्रियरूप अपने अवयवसंघातसे व्यतिरिक्त, देह और इन्द्रियोंका अवभासक तथा आदित्यादि बाह्य ज्योतियोंके समान स्वयं किसी अन्यसे भासित न होनेवाली ज्योति कहा जाता है। तथा [किन्हीं बाह्य ज्योतियोंमें न होनेके कारण] वह पारिशेष्य न्यायसे अन्तःस्थ है; वह देह और इन्द्रियोंसे भिन्न है—यह तो सिद्ध ही हो चुका है; और जो ज्योति देहेन्द्रियसे भिन्न तथा देहेन्द्रियसंघातकी उपकारक होती है, वह नेत्रादि बाह्य इन्द्रियोंसे उपलब्ध होती देखी जाती है; किंतु आदित्यादि ज्योतियोंके निवृत्त हो जानेपर यह आत्मा उनकी तरह चक्षु आदिसे उपलब्ध नहीं होता; किंतु तो भी चूँकि ज्योतिका कार्य देखा ही जाता है, इसलिये यह पुरुष आत्मज्योतिसे ही बैठता, इधर उधर जाता, कर्म करता और फिर लौट आता है; अतः यह ज्ञात होता है कि निश्चय ही आत्मा अन्तःस्थ ज्योति है; यही नहीं, वह आदित्यादि ज्योतियोंसे विलक्षण और अभौतिक भी है; यही

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थं | ८८१ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थं८८१

| हेतुर्यच्चक्षुराद्यग्राह्यत्वम्, आदित्यादिवत् । | कारण है कि वह आत्मज्योति आदित्यादिके समान चक्षु आदिसे ग्राह्य नहीं है। | | (आत्मज्योतिषोऽन्यज्योतिर्वैलक्षण्ये आक्षेप:)<br><br>न, समानजातीयेनैवोपकारदर्शनात्—यदादित्यादिविलक्षणं ज्योतिरान्तरं सिद्धमिति, एतदसत्; कस्मात् ? उपक्रियमाणसमानजातीयेनैवादित्यादिज्योतिषा कार्यकारणसंघातस्य भौतिकस्य भौतिकेनैवोपकारः क्रियमाणो दृश्यते; यथादृष्टं चेदमनुमेयम्; यदि नाम कार्यकारणार्थान्तरं तदुपकारकमादित्यादिवज्ज्योतिः, तथापि कार्यकारणसंघातसमानजातीयमेवानुमेयम्, कार्यकारणसंघातोपकारकत्वात्, आदित्यादिज्योतिर्वत् । यत् पुनरन्तःस्थत्वादप्रत्यक्षत्वाच्च वैलक्षण्यमुच्यते, तच्चक्षुरादिज्योतिर्भिरनैकान्तिकम्; यतोऽप्रत्यक्षाण्यन्तःस्थानि च चक्षुरादिज्योतींषि भौतिकान्येव । तस्मात्तत्र मनो- | पूर्व०—यह नहीं हो सकता, क्योंकि समान जातिवाले पदार्थसे ही उपकार होता देखा जाता है, आदित्यादिसे भिन्न जो आन्तर ज्योति सिद्ध की गयी है, वह ठीक नहीं है; क्यों ? क्योंकि जिनका उपकार किया जाता है, उन भौतिक देहेन्द्रियसंघातका अपने समान जातिवाले भौतिक आदित्यादि ज्योतिसे ही उपकार होता देखा जाता है; और जैसा देखा गया है, वैसा ही इसका अनुमान करना चाहिये। यदि देह और इन्द्रियोंकी उपकारक ज्योति आदित्यादिके समान उनसे कोई भिन्न पदार्थ है, तो भी उसे देहेन्द्रियसंघातसे समान जातिवाली ही अनुमान करनी चाहिये; क्योंकि आदित्यादि ज्योतियोंके समान वह देहेन्द्रियसंघातका उपकार करनेवाली है। इसके सिवा अन्तःस्थ और अप्रत्यक्ष होनेके कारण जो उसकी विलक्षणता बतलायी जाती है, वह तो नेत्रादि ज्योतियोंके द्वारा व्यभिचरित है; क्योंकि अप्रत्यक्ष और अन्तःस्थ होनेपर भी नेत्रादि ज्योतियां भौतिक ही हैं। अतः 'आत्म- |

बृ० उ० ५६—

५८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

५८२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| रथमात्रम्—विलक्षणमात्मज्योतिः सिद्धमिति ।<br><br>कार्यकरणसंघातभावभावित्वा-<br><br>आत्मनः संघात- च्च संघातधर्मत्वम्<br>साधर्म्यं युक्त्य- अनुमीयते ज्योतिषः<br>न्तरम् सामान्यतो दृष्टस्य<br><br>चानुमानस्य व्यभिचारित्वादप्रामाण्यम्; सामान्यतो दृष्टबलेन | ज्योति इनसे विलक्षण है—यह सिद्ध होता है' ऐसा कहना तुम्हारी मनमानी कल्पनामात्र है।<br><br>इसके सिवा देहेन्द्रियसंघातके रहनेपर ही रहती है, इसलिये यह चैतन्यज्योति [रूप आदिके समान] संघातका ही धर्म है, ऐसा भी अनुमान होता है। सामान्यतो दृष्ट अनुमान व्यभिचारी³ होता है, इसलिये उसकी प्रामाणिकता स्वीकार नहीं की जा सकती। आप सामान्यतो दृष्ट अनुमानके बलसे ही तो |


१. अनुमान वाक्य इस प्रकार है—चैतन्यं शरीरधर्मः, तद्भावभावित्वात्, रूपवत् ।
२. अनुमान साधारणतः तीन प्रकारका होता है—१. पूर्ववत्, २. शेषवत् और ३. सामान्यतो दृष्ट। कारण देखकर जो कार्यका अनुमान किया जाता है, वह 'पूर्ववत्' है, जैसे मेघकी घिरी हुई घटा देखकर वृष्टिका अनुमान। कार्य देखकर जो कारणका अनुमान होता है, वह 'शेषवत्' कहलाता है; जैसे नदीमें बाढ़ आयी देखकर पर्वतपर वृष्टि होनेका अनुमान। तथा प्रत्यक्षमूलक साधारण नियम या व्याप्तिके अनुसार जो परोक्षवस्तुका अनुमान किया जाता है, वह सामान्यतो दृष्ट अनुमान है; जैसे प्रत्येक कार्यका एक कर्ता देखा जाता है, चूँकि यह जगत् भी एक कार्य है, अतः इसका भी एक कर्ता अवश्य होगा। जो इसका कर्ता है, वही ईश्वर है। यहाँ 'विमतं चैतन्यज्योतिः संघाताद् भिन्नम् तद्भासकत्वात् आदित्यादिवत्' (विवादकी विषयभूत चैतन्यज्योति संघातसे भिन्न है; क्योंकि यह संघातको प्रकाशित करनेवाली है, जैसे आदित्य)—इस प्रकार 'प्रकाशक प्रकाश्यसे भिन्न होता है, इस व्याप्तिके अनुसार परोक्ष 'चैतन्यज्योति' को संघातसे भिन्न सिद्ध किया जा रहा है; अतः यह सामान्यतो दृष्ट अनुमान है।
३. नेत्र देहका प्रकाशक होकर भी देहसे पृथक् नहीं है; अतः संघातकी प्रकाशिका होनेके कारण जो चैतन्यज्योतिको संघातसे भिन्न सिद्ध करते हैं, उनका यह हेतु नेत्र आदिके विषयमें अनैकान्तिक (व्यभिचरित) हो गया है—इसी युक्तिसे पूर्वपक्षीने सामान्यतो दृष्ट अनुमानको व्यभिचारी कहा है।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८८३

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८८३


संस्कृत-मूल (शाङ्करभाष्यम्)हिन्दी-अनुवाद
हि भवानादित्यादिवद् व्यतिरिक्तं ज्योतिः साधयति कार्यकारणेभ्यः; न च प्रत्यक्षमनुमानेन बाधितुं शक्यते; अयमेव तु कार्यकारणसंघातः प्रत्यक्षं पश्यति शृणोति मनुते विजानाति च; यदि नाम ज्योतिरन्तरमस्योपकारकं स्यादादित्यादिवत्, न तदात्मा स्यात्, ज्योतिरन्तरम्, आदित्यादिवदेव; य एव तु प्रत्यक्षं दर्शनादिक्रियां करोति स एवात्मा स्यात् कार्यकारणसंघातः, नान्यः, प्रत्यक्षविरोधेऽनुमानस्याप्रामाण्यात् ।आदित्यादिके समान ज्योतिको देह और इन्द्रियोंसे भिन्न सिद्ध करते हैं; किंतु अनुमानके द्वारा प्रत्यक्षका बाध नहीं हो सकता; यह देहेन्द्रियसंघात ही तो प्रत्यक्ष देखता, सुनता, मनन करता और विशेषरूपसे जानता है; यदि आदित्यादिके समान इसका उपकार करनेवाली कोई अन्य ज्योति हो तो वह आत्मा नहीं हो सकती, अपितु आदित्यादिके समान ही कोई अन्य ज्योति होगी; जो भी प्रत्यक्ष दर्शनादि कर्म करता है, वह देहेन्द्रियसंघात ही आत्मा होना चाहिये, कोई दूसरा नहीं, क्योंकि प्रत्यक्षसे विरोध होनेपर अनुमानकी प्रामाणिकता नहीं हो सकती ।
(यथोक्तयुक्तैरनैकान्तिकत्वम्)<br>नन्वयमेव चेद्दर्शनादिक्रियाकर्ता आत्मा संघातः कथमविकलस्यैवास्य दर्शनादिक्रियाकर्तृत्वं कदाचिद् भवति कदाचन्नेति ।**सिद्धान्ती—**किंतु यदि यह संघात ही दर्शनादि क्रियाओंका करनेवाला आत्मा हो तो ऐसा क्यों होता है कि इसमें कोई विकार न आनेपर भी कभी तो इसमें दर्शनादि क्रियाओंका कर्तृत्व रहता है और कभी नहीं रहता है ?
(तन्निरासपूर्वकं स्वभावस्य निनिमित्तत्वनिरूपणम्)<br>नैष दोषः, दृष्टत्वात्; न हि दृष्टेऽनुपपन्नं नाम, न हि खद्योते प्रकाशाप्रकाशकत्वेन**पूर्व०—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि ऐसा देखा गया है और देखी हुई बातमें अनुपपत्ति नहीं होती; खद्योतको प्रकाशक और ,

| ८८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |

८८४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृत (भाष्य)हिन्दी-अनुवाद
दृश्यमाने कारणान्तरमनुमेयम्; अनुमेयत्वे च केनचित् सामान्यात् सर्वं सर्वत्रानुमेयं स्यात्; तच्चानिष्टम्; न च पदार्थस्वभावो नास्ति; न ह्यग्नेरुष्णस्वाभाव्यम् अन्यनिमित्तम्, उदकस्य वा शैत्यम् । प्राणिधर्माधर्माद्यपेक्षमिति चेत्; धर्माधर्मादेर्निमित्तान्तरापेक्षस्वभावप्रसङ्गः । अस्त्विति चेत्, न; तदनवस्थाप्रसङ्गः; स चानिष्टः ।अप्रकाशकरूपसे देखनेमें किसी अन्य कारणका अनुमान नहीं करना चाहिये; यदि किसीसे समानता होनेके कारण उसके विषयमें भी अनुमान किया जाय तब तो सब जगह सबके विषयमें अनुमान ही करना होगा; और यह इष्ट नहीं है, क्योंकि पदार्थका कोई स्वभाव ही न हो—ऐसी बात नहीं है; अग्निका उष्णस्वभाव होना अथवा जलका शीतल होना किसी अन्य कारणसे नहीं है। यदि कहो कि स्वभाव भी प्राणियोंके धर्माधर्मकी अपेक्षासे होता है, तो धर्माधर्मादिका भी किसी अन्य निमित्तकी अपेक्षा रखनेवाला स्वभाव माननेका प्रसङ्ग होगा। यदि कहो कि होने दो, तो यह ठीक नहीं; क्योंकि इससे अनवस्थाका प्रसङ्ग होगा और वह इष्ट नहीं है।
[स्वभाववादिपक्षनिरसनम्]<br>न, स्वप्नस्मृत्योर्दृष्टस्यैव दर्शनात्—यदुक्तं स्वभाववादिना देहस्यैव दर्शनादिक्रिया न व्यतिरिच्यतेति, तन्न; यदि हि देहस्यैव दर्शनादिक्रिया स्वप्ने दृष्टस्यैव दर्शनं न स्यात्; अन्धः स्वप्नं पश्यन् दृष्टपूर्वमेव पश्यतिसिद्धान्ती—तुम्हारा कथन ठीक नहीं है, क्योंकि स्वप्न और स्मृतिमें देखे हुएका ही दर्शन होता है—स्वभाववादीने जो कहा कि दर्शनादि क्रिया देहके ही हैं, उससे भिन्नके नहीं हैं, सो ऐसी बात नहीं है; यदि दर्शनादि क्रिया देहकी ही होती तो स्वप्नमें देखे हुएको ही न देखा जाता। अन्धा पुरुष स्वप्न देखनेके समय पहले देखे हुए पदार्थों-

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८८५

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८८५


| न शाकद्वीपादिगतमदृष्टरूपम्; ततश्चैतत् सिद्धं भवति—यः स्वप्ने पश्यति दृष्टपूर्वं वस्तु, स एव पूर्वं विद्यमाने चक्षुष्यद्राक्षीत्, न देह इति; देहश्चेद् द्रष्टा, स येनाद्राक्षीत् तस्मिन्नुद्घृते चक्षुषि स्वप्ने तदेव दृष्टपूर्वं न पश्येत्; अस्ति च लोके प्रसिद्धिः—पूर्वं दृष्टं मया हिमवतः शृङ्गमद्याहं स्वप्नेऽद्राक्षमित्युद्घृतचक्षुषामन्धानामपि; तस्मादनुद्घृतेऽपि चक्षुषि यः स्वप्नदृक् स एव द्रष्टा, न देह इत्यवगम्यते । | को ही देखता है, जिन्हें पहले कभी नहीं देखा, उन शाकद्वीपादिके पदार्थोंको नहीं देखता; इससे यह सिद्ध होता है कि स्वप्नमें जो पहले देखे हुए पदार्थोंको देखता है, उसीने पहले नेत्रोंके रहते हुए उन पदार्थोंको देखा था, देहने नहीं; यदि देह ही देखनेवाला होता तो जिनके द्वारा उसने पहले देखा था उन नेत्रोंके निकाल लिये जानेपर उन पूर्वदृष्ट पदार्थोंको स्वप्नमें न देखता; किंतु जिनके नेत्र निकाल लिये गये हैं, उन अन्धोंके विषयमें भी लोकमें ऐसी प्रसिद्धि है कि आज स्वप्नमें मैंने पहले देखा हुआ हिमालयका शिखर देखा । इससे यह ज्ञात होता है कि जो स्वप्न देखनेवाला है, वही नेत्रोंके न निकालनेपर भी द्रष्टा है, देह द्रष्टा नहीं है । | | तथा स्मृतौ—द्रष्टृस्मर्त्रोरेकत्वे <br>(द्रष्टुर्देहेन्द्रियादि-व्यतिरिक्तत्वम्) सति य एव द्रष्टा स एव स्मर्ता; यदा चैवं तदा निमीलिताक्षोऽपि स्मरन् दृष्टपूर्वं यद् रूपं तद् दृष्टवदेव पश्यतीति; तस्माद् यन्निमीलितं तन्न द्रष्टृ; यन्निमीलिते चक्षुषि | इसी प्रकार स्मरणमें समझना चाहिये·द्रष्टा और स्मरण करनेवालेकी एकता होनेपर जो द्रष्टा होता है, वही स्मरण करनेवाला होता है । जब कि ऐसी बात है तभी आँख मूँदकर स्मरण करनेवाला भी जो पहले देखा हुआ रूप है, उसे देखे हुएके समान ही देखता है; अतः जिन्हें मूँद रखा है, वे नेत्र द्रष्टा नहीं |

८८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

८८६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४
संस्कृतहिन्दी
स्मरद् रूपं पश्यति तदेवानिमीलितेऽपि चक्षुषि द्रष्टृ आसीदित्यवगम्यते।हैं, जो नेत्रोंके मूँदनेपर स्मरण किये जानेवाले रूपको देखता है, वही नेत्रोंके न मूँदनेपर भी द्रष्टा था—ऐसा जाना जाता है।
मृते च देहेऽविकलस्यैव च रूपादिदर्शनाभावात्—देहस्यैव द्रष्टृत्वे मृतेऽपि दर्शनादिक्रिया स्यात्। तस्माद् यदपाये देहे दर्शनं न भवति, यद्भावे च भवति, तद् दर्शनादिक्रियाकर्तृ न देह इत्यवगम्यते।इसके सिवा शरीरके मर जानेपर उसमें कोई विकार न होनेपर भी वह रूपाधिका दर्शन नहीं करता—यदि देह ही द्रष्टा होता तो उसके मरनेपर भी उसमें दर्शनादि क्रिया होती। अतः जिसके देहमें न रहनेपर दर्शन नहीं होता और रहनेपर होता है, वही दर्शनादि क्रियाका कर्ता है, देह नहीं—ऐसा ज्ञात होता है।
चक्षुरादीन्येव दर्शनादिक्रियाकर्तॄणीति चेन्न, यदहमद्राक्षं तत् स्पृशामीति भिन्नकर्तृकत्वे प्रतिसंधानानुपपत्तेः मनस्तर्हीति चेन्न, मनसोऽपि विषयत्वाद् रूपाविवद् द्रष्टृत्वाद्यनुपपत्तिः।यदि कहो कि नेत्रादि इन्द्रियां ही दर्शनादि क्रिया करनेवाली हैं, तो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि [वैसी स्थितिमें] दर्शन और स्पर्श भिन्न कर्ताओंकी क्रिया होनेके कारण 'जिसे मैंने देखा था, उसका स्पर्श करता हूँ' ऐसा अनुभव नहीं हो सकता था; अच्छा तो, मन ही द्रष्टा है—ऐसा मानें तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि रूप आदिकी भांति विषय (दृश्य) होनेके कारण मनका भी द्रष्टा होना सम्भव नहीं है।
तस्मादन्तःस्थं व्यतिरिक्तमादित्यादिवदिति सिद्धम्।अतः यह सिद्ध हुआ कि चैतन्य-ज्योति अन्तःस्थ है और आदित्यादिके समान शरीरसे भिन्न है।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ८८७

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ८८७


मूल संस्कृतभाष्यार्थ
यदुक्तम्—कार्यकरणसंघातसमानजातीयमेव ज्योतिरन्तरमनुमेयम्, आदित्यादिभिः तत्समानजातीयैरेव उपक्रियमाणत्वादिति—तदसत्, उपकार्योपकारकभावस्यानियमदर्शनात्; कथम् ? पार्थिवैरिन्धनैः पार्थिवत्वसमानजातीयैस्तृणोलपादिभिरग्नेः प्रज्वलनोपकारः क्रियमाणो दृश्यते; न च तावता तत्समानजातीयैरेवाग्नेः प्रज्वलनोपकारः सर्वत्रानुमेयः स्यात्, येनोदकेनापि प्रज्वलनोपकारो भिन्नजातीयेन वैद्युतस्याग्नेः जाठरस्य च क्रियमाणो दृश्यते; तस्माद् उपकार्योपकारकभावे समानजातीयासमानजातीयनियमो नास्ति; कदाचित् समानजातीया मनुष्या मनुष्यैरेवोपक्रियन्ते कदाचित् स्थावरपश्वादिभिश्च भिन्न-ऐसा जो कहा कि देहेन्द्रिय-संघातके समान जातिवाली ही किसी अन्य ज्योतिका अनुमान करना चाहिये, क्योंकि आदित्यादि तथा उसके समानजातीय ज्योतियोंसे ही संघातका उपकार होता है, सो भी ठीक नहीं है, क्योंकि उपकार्य-उपकारकभावका कोई नियम नहीं देखा जाता; किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] पार्थिव इन्धनसे एवं पार्थिवत्वमें समान जातिवाले तृण और उलप ( घास ) आदिसे अग्निका प्रज्वलनरूप उपकार होता देखा जाता है, किंतु इतनेहीसे सर्वत्र ऐसा अनुमान नहीं कर लेना चाहिये कि उनके समानजातीय पदार्थोंसे ही अग्निका प्रज्वलनरूप उपकार होगा, क्योंकि उनसे भिन्न जातिवाले जलसे भी बिजलीरूप अग्निका तथा पेटके भीतरकी अग्निका प्रज्वलनरूप उपकार होता देखा जाता है; अतः उपकार्योपकारकभावमें समानजातीय अथवा असमानजातीय होनेका नियम नहीं है; कभी तो समानजातीय मनुष्य मनुष्योंसे ही उपकृत होते हैं और कभी स्थावर एवं पशु आदि भिन्न जातिवालोंसे ही

८८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

८८८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
जातीयैः, तस्मादहेतुः कार्यकारणसंघातसमानजातीयैरेव आदित्यादिज्योतिर्भिरुपक्रियमाणत्वादिति।उनका उपकार होता है; अतः कार्यकारणसंघातके समानजातीय आदित्यादि ज्योतियोंसे उपकृत होनेके कारण ही आत्मज्योति संघातके समानजातीय ही होनी चाहिये—यह कोई हेतु नहीं है।
यत् पुनरात्थ—चक्षुरादिभिरादित्यादिज्योतिर्वद् अदृश्यत्वादित्ययं हेतुर्ज्योतिरन्तरस्यान्तःस्थत्वं वैलक्षण्यं च न साधयति, चक्षुरादिभिरनैकान्तिकत्वादिति—तदसत्, चक्षुरादिकरणेभ्योऽन्यत्वे सतीति हेतोर्विशेषणत्वोपपत्तेः।और तुमने जो ऐसा कहा कि आदित्यादिकी ज्योतिके समान चक्षु आदि इन्द्रियोंसे दिखायी देनेवाली न होनेके कारण [आत्मज्योति अन्तःस्थ और भिन्न प्रकारकी है]—यह हेतु तो चक्षु आदिसे व्यभिचरित होनेके कारण उस अन्य ज्योतिका अन्तःस्थ और विलक्षण होना सिद्ध नहीं कर सकता, सो ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि 'चक्षु आदि इन्द्रियोंसे भिन्न होते हुए' [उनसे न दिखायी देनेके कारण आत्मज्योति अन्तःस्थ एवं विलक्षण है] इस प्रकार उपर्युक्त हेतुमें विशेषण लगा देनेसे उसकी उपपत्ति हो सकती है।<sup></sup>

१. तात्पर्य यह है कि पहले अनुमानका स्वरूप यों था 'आत्मज्योतिः अन्तःस्थम्, आदित्यादिवच्चक्षुरादिभिरदृश्यत्वात्।' अर्थात् आत्मज्योति अपने भीतर है, क्योंकि वह सूर्य आदिकी भाँति आँखोंसे नहीं दिखायी देती। यह हेतु नेत्रके विषयमें व्यभिचरित था; क्योंकि अपना नेत्र भी अपने ही नेत्रसे नहीं देखा जा सकता। इस दोषको मिटानेके लिये सिद्धान्तीने हेतुमें 'चक्षुरादिकरणेभ्योऽन्यत्वे सति' यह विशेषण जोड़ दिया। अब अनुमानका स्वरूप इस प्रकार हो गया—'आत्मज्योतिः अन्तःस्थम्, चक्षुरादिकरणेभ्योऽन्यत्वे सति चक्षुरादिभिरदृश्यत्वात्।' अर्थात् आत्मज्योति अपने भीतर स्थित है; क्योंकि वह चक्षु आदि इन्द्रियोंसे भिन्न होती हुई उन इन्द्रियोंसे देखी नहीं जाती—ऐसा हेतु माननेपर कहीं भी दोष नहीं आता।