बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२३
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२३
| किं तत्क्रियाप्रणुन्ना आहोस्वित् तत्कर्मवशात् स्वयमेव गच्छन्ति परलोकशरीरकर्तृणि च भूतानीति; अत्रोच्यते दृष्टान्तः— | करनेवाले आदित्यादि भूत जाते हैं, वे उसके वागादि व्यापार [ यानी कहने आदि ] से प्रेरित होकर जाते हैं अथवा उसके कर्मवश स्वयं ही जाते हैं—इसमें दृष्टान्त कहा जाता है। |
तद् यथा राजानं प्रयियासन्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽभिसमायन्त्येवमेवेममात्मानमन्तकाले सर्वे प्राणा अभिसमायन्ति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥३८॥
जिस प्रकार जानेके लिये तैयार हुए राजाके अभिमुख होकर उग्रकर्मा और पापकर्ममें नियुक्त सूत एवं गाँवके नेता लोग जाते हैं, उसी प्रकार जब यह ऊर्ध्वोच्छ्वास लेने लगता है तो अन्तकालमें सारे प्राण इस आत्माके अभिमुख होकर इसके साथ जाते हैं ॥ ३८ ॥
| तद् यथा राजानं प्रयियासन्तं प्रकर्षेण यातुमिच्छन्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्यस्तं यथाभिसमायन्त्याभिमुख्येन समायन्त्येकीभावेन तमभिमुखा आयन्त्यनाज्ञप्ता एव राज्ञा केवलं तज्जिगमिषामिज्ञाः, एवमेवेममात्मानं भोक्तारमन्तकाले मरणकाले सर्वे प्राणा वागादयोऽभिसमायन्ति। | वह दृष्टान्त–जिस प्रकार जानेकी तैयारी करनेवाले अर्थात् प्रकर्षसे जानेकी इच्छावाले अर्थात् जानेकी अत्यन्त इच्छा रखनेवाले राजाके अभिमुख होकर उसके उग्रकर्मा और पापकर्ममें नियुक्त सूत एवं गाँवके नेता लोग एक साथ मिलकर सामने आते हैं; राजाकी आज्ञाके बिना ही केवल उसकी जानेकी इच्छा जानकर ही तैयार हो जाते हैं, उसी प्रकार अन्तकाल यानी मरणसमयमें वागादि सम्पूर्ण प्राण भोक्ता आत्माके सम्मुख एकत्रित हो जाते हैं। |
१०२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
| यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवतीति व्याख्यातम् ॥ ३८ ॥ | 'यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति' इसकी व्याख्या पहले कर दी गयी है ॥३८॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये तृतीयं ज्योतिर्ब्राह्मणम् ॥ ३ ॥
चतुर्थ ब्राह्मण
मरणोन्मुख जीवकी दशाका वर्णन
| स यत्रायमात्मा---संसारोपवर्णनं प्रस्तुतम् । तत्रायं पुरुष एभ्योऽङ्गेभ्यः सम्प्रमुच्य इत्युक्तम् । तत् सम्प्रमोक्षणं कस्मिन् काले कथं वा ? इति सविस्तरं संसरणं वर्णयितव्यमित्यारभ्यते— | 'स यत्रायमात्मा' यहाँ संसारके उपवर्णनका प्रसङ्ग है । उसमें 'यह आत्मा इन अङ्गोंसे सम्यक् प्रकारसे मुक्त होकर' ऐसा कहा गया है । वह आत्माकी सम्यक् मुक्ति किस समय अथवा किस प्रकार होती है—इसका विस्तारपूर्वक वर्णन करना है—इसीसे आरम्भ किया जाता है— |
स यत्रायमात्माबल्यं न्येत्य सम्मोहमिव न्येत्यथैनमेते प्राणा अभिसमायन्ति स एतास्तेजोमात्राः समभ्याददानो हृदयमेवान्ववक्रामति स यत्रैष चाक्षुषः पुरुषः पराङ् पर्यावर्ततेऽथारूपज्ञो भवति ॥ १ ॥
वह यह आत्मा जिस समय दुर्बलताको प्राप्त हो मानो सम्मोहको प्राप्त हो जाता है, तब ये वागादि प्राण इसके प्रति अभिमुखतासे आते हैं। वह इन [ प्राणोंकी ] तेजोमात्राको सम्यक् प्रकारसे ग्रहण करके हृदयमें ही अनुक्रान्त ( अभिव्यक्त ज्ञानवान् ) होता है। जिस समय यह चाक्षुष पुरुष सर्व ओरसे व्यावृत्त होता है, उस समय मुमूर्षु रूपज्ञानहीन हो जाता है ॥ १ ॥
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| सोऽयमात्मा प्रस्तुतो यत्र यस्मिन् कालेऽबल्यमबलभावं न्येत्य गत्वा, यद् देहस्य दौर्बल्यं तदात्मन एव दौर्बल्यमित्युपचर्यतेऽबल्यं न्येत्येति, न ह्यसौ स्वतोऽमूर्तत्वादबलभावं गच्छति । तथा सम्मोहमिब—सम्मूढता सम्मोहो विवेकाभावः, सम्मूढतामिव न्येति निगच्छति । न चास्य स्वतः सम्मोहोऽसम्मोहो वास्ति, नित्यचैतन्यज्योतिःस्वभावत्वात् । तेनेवशब्दः सम्मोहमिव न्येतीति; उत्क्रान्तिकाले हि करणोपसंहारनिमित्तो व्याकुलीभावः, आत्मन इव लक्ष्यते लौकिकैः; तथा च वक्तारो भवन्ति, सम्मूढः सम्मूढोऽयमिति ।<br><br>अथवा उभयत्र इवशब्दप्रयोगो योज्यः, अबल्यमिव न्येत्य सम्मोहमिव न्येतीति, उभयस्य- | वह यह प्रस्तुत आत्मा जिस समय अबल्य–अबलभावको प्राप्त होकर, यहाँ जो देह की दुर्बलता है, वह आत्माकी ही दुर्बलता है, इस प्रकार उपचारसे कहा जाता है कि अबलभावको प्राप्त होकर, स्वयं अमूर्त होनेके कारण यह अबलभावको प्राप्त नहीं होता । तथा मानो सम्मोहको [ प्राप्त होता है ] सम्मूढताको ही सम्मोह कहते हैं, सम्मोह का अर्थ है विवेकका अभाव, इस प्रकारकी सम्मूढताको मानो प्राप्त होता है। इसे स्वतः सम्मोह अथवा असम्मोह है भी नहीं, क्योंकि यह नित्यचैतन्यज्योतिःस्वरूप है। इसीसे 'सम्मोहमिव न्येति' इसमें 'इव' शब्दका प्रयोग किया गया है; क्योंकि लौकिक पुरुषोंको उत्क्रान्तिके समय इन्द्रियोंके उपसंहारके कारण होनेवाली व्याकुलता आत्माकी-सी जान पड़ती है और ऐसा ही कहनेवाले कहते भी हैं कि यह सम्मूढ–अत्यन्त अचेत हो गया है।<br><br>अथवा 'अबल्यम्' और 'सम्मोहम्' दोनोंहीके साथ 'इव' शब्दका प्रयोग करना चाहिये; अर्थात् मानो अबलताको प्राप्त होकर मानो सम्मूढताको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि दोनों- |
वृ० उ० ६५—
१०२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
| परोपाधिनिमित्तत्वाविशेषात्; समानकर्तृकनिर्देशाच्च । | हीका अन्योन्नाविकृत होना समान है, तथा दोनोंहीका एक कर्ता बतलाया गया है। | | अथास्मिन् काले एते प्राणा वागादय एनमात्मानमभिसमायन्ति । तदास्य शरीरस्यात्मनोऽङ्गेभ्यः सम्प्रमोक्षणम् । कथं पुनः सम्प्रमोक्षणम् ? केन वा प्रकारेणात्मानमभिसमायन्ति ? इत्युच्यते— | इस समय ये वागादि प्राण इस आत्माके अभिमुख आते हैं। तब इस देही आत्माका अङ्गोंसे सर्वथा मोक्ष होता है। किंतु वह मोक्ष कैसे होता है और किस प्रकार ये आत्माके अभिमुख आते हैं ? सो बतलाया जाता है— | | स आत्मा एतास्तेजोमात्राः—तेजसो मात्रास्तेजोमात्रास्तेजोऽवयवा रूपादिप्रकाशकत्वाच्चक्षुरादीनि करणानीत्यर्थः, ता एताः समभ्याददानः सम्यङ् निर्लेपेनाभ्याददान आभिमुख्येनाददानः संहरमाणः—तत्स्वप्नापेक्षया विशेषणं समिति, न तु स्वप्ने निर्लेपेन सम्यगादानम्, अस्ति त्वादानमात्रम्, "गृहीता वाग् गृहीतं चक्षुः,' (बृ० उ० २ । १ । १७) "अस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामपादाय" (४।३।१६) "शुक्रमादाय" (४।३।११) | वह आत्मा इन तेजोमात्राओंको—तेजकी मात्रा तेजोमात्रा यानी तेजके अवयव अर्थात् रूपादिके प्रकाशक होनेके कारण चक्षु आदि इन्द्रियाँ तेजोमात्रा हैं, उन इन इन्द्रियोंका समभ्यादान—सम्यक् अर्थात् निर्लेपभावसे अभ्यादान—अभिमुखतया आदान अर्थात् उपसंहार कर, हृदय यानी पुण्डरीकाकाशमें ही अनुक्रान्त—अन्वागत होता है अर्थात् बुद्धि आदिके विक्षेपका उपसंहार हो जानेपर हृदयमें ही अभिव्यक्तविज्ञानवान् होता है। 'समभ्याददानः' इस क्रियापदमें 'सम्' यह विशेषण स्वप्नकी अपेक्षासे है, क्योंकि स्वप्नमें निर्लेपभावसे चक्षु आदिका उपसंहार नहीं होता, केवल आदान (उपसंहार) मात्र तो होता |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०२७
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०२७
| इत्यादिवाक्येभ्यः—हृदयमेव पुण्डरीकाकाशमन्ववक्रामत्यन्वागच्छति हृदयेऽभिव्यक्तविज्ञानो भवतीत्यर्थः, बुद्ध्यादिविक्षेपोपसंहारे सति । | है, जैसा कि “वाक् गृहीत हो जाती है, चक्षु गृहीत हो जाती है” “इस सर्ववान् लोककी मात्राको ग्रहण कर” “शुक्रको ग्रहण कर” इत्यादि वाक्योंसे सिद्ध होता है। |
| न हि तस्य स्वतश्चलनं विक्षेपोपसंहारादिविक्रिया वा; “ध्यायतीव लेलायतीव” (४।३।७) इत्युक्तत्वात् । बुद्ध्याद्युपाधिद्वारैव हि सर्वविक्रियाह्यारोप्यते तस्मिन् । | आत्माके चलन अथवा विक्षेपोपसंहारादि विकार स्वतः नहीं होते; जैसा कि “ध्यायतीव लेलायतीव” इत्यादि मन्त्रद्वारा कहा गया है। बुद्धि आदि उपाधियोंके द्वारा ही उसमें सब प्रकारके विकारका आरोप किया जाता है । |
| कदा पुनस्तस्य तेजोमात्राभ्यादानम् इत्युच्यते—स यत्रैवं चक्षुषि भवश्चाक्षुषः पुरुष आदित्यांशो भोक्तुः कर्मणा प्रयुक्तो यावद्देहधारणं तावच्चक्षुषोऽनुग्रहं कुर्वन् वर्तते, मरणकाले त्वस्य चक्षुरनुग्रहं परित्यजति, स्वमादित्यात्मानं प्रतिपद्यते। तदेतदुक्तम्—<br>“यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यम्” (३।२।१३) इत्यादि । | किंतु उसकी तेजोमात्राओंका उपसंहार कब होता है ? सो बतलाया जाता है—जिस समय भी वह चक्षुमें रहनेवाला चाक्षुष पुरुष आदित्यांश, जो भोक्ताके कर्मसे प्रेरित होकर जबतक देह धारण किया जाता है, तबतक उसके नेत्रोंका उपकार करता हुआ विद्यमान रहता है, मरणकालमें इसके चक्षुका उपकार करना छोड़ देता है, अर्थात् अपने आदित्यस्वरूपको प्राप्त हो जाता है । इसीसे यह कहा है—<br>“जब इस मृत पुरुषकी वागिन्द्रिय अग्निमें, प्राण वायुमें और नेत्र आदित्यमें लीन हो जाते हैं” इत्यादि । |
१०२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
| पुनर्देहग्रहणकाले संश्रयिष्यन्ति, तथा स्वप्स्यतः प्रबुध्यतश्च; तदेतदाह—चाक्षुषः पुरुषो यत्र यस्मिन् काले पराङ् पर्यावर्तते परि समन्तात् पराङ् व्यावर्तत इति, अथात्रास्मिन् कालेऽरूपज्ञो भवति, मुमूर्षू रूपं न जानाति । तदा अयमात्मा चक्षुरादितेजोमात्राः समभ्याददानो भवति स्वप्नकाल इव ॥ १ ॥ | ये देहग्रहणके समय पुनः उसका आश्रय ले लेंगे, ऐसा ही सोने और जागनेवाले पुरुषके विषयमें भी होता है। इसीसे श्रुति कहती है—जिस समय चाक्षुष पुरुष पराङ्-पर्यावर्तन-सब ओरसे अपनी ओर व्यावर्तन कर लेता है, उस समय पुरुष अरूपज्ञ हो जाता है अर्थात् मुमूर्षुको रूपका ज्ञान नहीं होता। उस समय स्वप्नकालके समान यह आत्मा चक्षु आदि तेजोमात्राओंको सब ओरसे सम्यक्-निर्लेपभावसे ग्रहण करनेवाला होता है ॥ १ ॥ |
लिङ्गात्मामें विभिन्न इन्द्रियोंके लय और उसके उत्क्रमणका वर्णन
एकोभवति न पश्यतीत्याहुरेकीभवति न जिघ्रतीत्याहुरेकीभवति न रसयत इत्याहुरेकीभवति न वदतीत्याहुरेकीभवति न शृणोतीत्याहुरेकीभवति न मनुत इत्याहुरेकीभवति न स्पृशतीत्याहुरेकीभवति न विजानातीत्याहुस्तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति चक्षुषो वा मूर्ध्नो वान्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यस्तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति प्राणमनूत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति सविज्ञानो भवति सविज्ञानमेवान्ववक्रामति तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च ॥ २ ॥
[ चक्षु-इन्द्रिय लिङ्गात्मासे ] एकरूप हो जाती है, तो लोग 'नहीं देखता' ऐसा कहते हैं, [ घ्राणेन्द्रिय ] एकरूप हो जाती है, तो 'नहीं
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२९
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२९
सूँघता' ऐसा कहते हैं, [रसनेन्द्रिय] एक रूप हो जाती है तो 'नहीं चखता' ऐसा कहते हैं, [वागिन्द्रिय] एक रूप हो जाती है तो 'नहीं बोलता' ऐसा कहते हैं, [श्रोत्रेन्द्रिय] एक रूप हो जाती है तो 'नहीं सुनता' ऐसा कहते हैं, [मन] एकरूप हो जाता है तो 'मनन नहीं करता' ऐसा कहते हैं, [त्वगिन्द्रिय] एकरूप हो जाती है तो 'स्पर्श नहीं करता' ऐसा कहते हैं और यदि [बुद्धि लिङ्गात्मासे] एक रूप हो जाती है तो 'नहीं जानता' ऐसा कहते हैं। उस इस हृदयका अग्र (बाहर जानेका मार्ग) अत्यन्त प्रकाशित होने लगता है, उसीसे यह आत्मा नेत्रसे, मूर्द्धासे अथवा शरीरके किसी अन्य भागसे बाहर निकलता है। उसके उत्क्रमण करनेपर उसके साथ ही प्राण उत्क्रमण करता है, प्राणके उत्क्रमण करनेपर सम्पूर्ण प्राण (इन्द्रियवर्ग) उत्क्रमण करते हैं; उस समय यह आत्मा विशेष विज्ञानवान् होता है और विज्ञानयुक्त प्रदेशको ही जाता है; उस समय उसके साथ-साथ ज्ञान, कर्म और पूर्वप्रज्ञा (अनुभूत विषयोंकी वासना) भी जाते हैं॥ २॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एकीभवति करणजातं स्वेन लिङ्गात्मना, तदेनं पार्श्वस्था आहुर्न पश्यतीति । तथा घ्राणदेवतानिवृत्तौ घ्राणमेकीभवति लिङ्गात्मना, तदा न जिघ्रतीत्याहुः । समानमन्यत् । जिह्वायां सोमो वरुणो वा देवता, तन्निवृत्त्यपेक्षया न रसयत इत्याहुः । तथा न वदति न शृणोति न मनुते न स्पृशति न विजानातीत्याहुः । | जब इन्द्रियवर्ग अपने लिङ्गदेहके साथ एकरूप हो जाते हैं, तब आसपास बैठे हुए लोग कहते हैं—'यह नहीं देखता'। इसी प्रकार जब घ्राणदेवताके निवृत्त होनेपर घ्राणेन्द्रिय लिङ्गात्माके साथ एकरूप हो जाती है, तब 'नहीं सूँघता' ऐसा कहते हैं। शेष अर्थ इसीके समान है । जिह्वामें सोम या वरुण देवता है, उसकी निवृत्तिकी अपेक्षासे 'नहीं चखता' ऐसा कहते हैं। इसी तरह 'नहीं बोलता, नहीं सुनता, मनन नहीं करता, स्पर्श नहीं करता, नहीं जानता' ऐसा कहते हैं। |
१०३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
| तदोपलक्ष्यते देवतानिर्वृत्तिः करणानां च हृदय एकीभावः । <br><br> तत्र हृदय उपसंहृतेषु करणेषु योऽन्तर्व्यापारः स कथ्यते— तस्य हैतस्य प्रकृतस्य हृदयस्य हृदयच्छिद्रस्येत्येतत्, अग्रं नाडीमुखं निर्गमनद्वारं प्रद्योतते स्वप्नकाल इव स्वेन भासा तेजोमात्रादानकृतेन स्वेनैव ज्योतिषा आत्मनैव च । तेनात्मज्योतिषा प्रद्योतेन हृदयाग्रेणैष आत्मा विज्ञानमयो लिङ्गोपाधिर्निर्गच्छति निष्क्रामति ! तथा आथर्वणे "कस्मिन्नवहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन् वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति" (प्र० उ० ६ । ३) "स प्राणमसृजत" (प्र० उ० ६ । ४) इति । <br><br> तत्र चात्मचैतन्यज्योतिः सर्वदाभिव्यक्ततरम् । तदुपाधिद्वारा ह्यात्मनि जन्ममरणगमना- | उस समय इन्द्रियाभिमानी देवताओंकी निवृत्ति और इन्द्रियोंका हृदयमें एकीभाव उपलक्षित होता है। <br><br> उस समय इन्द्रियोंका हृदयमें उपसंहार हो जानेपर जो अन्तर्व्यापार होता है, उसका वर्णन किया जाता है—उस इस प्रकृत हृदयका अर्थात् हृदयच्छिद्रका अग्र नाडीमुख अर्थात् बाहर निकलनेका द्वार प्रद्योतित—अत्यन्त प्रकाशित होने लगता है, जिस प्रकार स्वप्नकालमें आत्मज्योतिसे स्थित रहता है, उसी प्रकार इस समय भी तेजोमात्राओंके ग्रहणके कारण आत्मज्योतिसे तथा स्वयं अपने-आपसे ही प्रकाशित हो जाता है। उस आत्मज्योतिसे प्रकाशित हृदयद्वारसे यह लिङ्गोपाधिक विज्ञानमय आत्मा निकल जाता है। ऐसा ही आथर्वण (प्रश्न) उपनिषद्में भी कहा है—"[उसने सोचा--] मैं किसके उत्क्रमण करनेपर उत्क्रान्त होऊँगा और किसके प्रतिष्ठित होनेपर प्रतिष्ठित हो जाऊँगा" "उसने प्राणकी रचना की" इत्यादि। <br><br> उस लिङ्गात्मामें आत्मचैतन्यज्योति सर्वदा अत्यन्त अभिव्यक्त रहती है। उस उपाधिके द्वारा ही आत्मामें जन्म, मरण, गमन, |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [१०३१
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [१०३१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| गमनादिसर्वविक्रियालक्षणः संव्यवहारः; तदात्मकं हि द्वादशविधं करणं बुद्ध्यादि । तत् सूत्रं तज्जीवनं सोऽन्तरात्मा जगतस्तस्थुषश्च । तेन प्रद्योतेन हृदयाग्रप्रकाशेन निष्क्रममाणः केन मार्गेण निष्क्रामति ? इत्युच्यते— | आगमन आदि सम्पूर्ण विकाररूप व्यवहार होते हैं और तद्रूप ही बुद्धि आदि बारह इन्द्रियाँ हैं । वह सूत्र है, वह जीवन है और वही स्थावर-जंगमका अन्तरात्मा है । उस प्रद्योतसे अर्थात् हृदयाग्रके प्रकाशसे निकलनेवाला आत्मा किस मार्गसे निकलता है, सो कहा जाता है- |
| चक्षुषो वा आदित्यलोकप्राप्तिनिमित्तं ज्ञानं कर्म वा यदि स्यात् । मूर्ध्नो वा ब्रह्मलोकप्राप्तिनिमित्तं चेत् । अन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यः शरीरावयवेभ्यो यथाकर्म यथाश्रुतम् । | यदि उसका ज्ञान या कर्म आदित्यलोककी प्राप्तिका कारण होता है तो वह चक्षुद्वारसे निकलता है । यदि ब्रह्मलोककी प्राप्तिका कारण होता है तो मूर्धदेशसे निकलता है । इसी प्रकार अपने कर्म और ज्ञानके अनुसार वह शरीरके अन्यान्य देश या अवयवोंसे निकल जाता है । |
| तं विज्ञानात्मानमुत्क्रामन्तं परलोकाय प्रस्थितं परलोकायोद्भूताकूतमित्यर्थः; प्राणः सर्वाधिकारिस्थानीयो राज्ञ इवानूत्क्रामति; तं च प्राणमनूत्क्रामन्तं वागादयः सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति । यथाप्रधानानूवाचिख्यासा इयम्, न तु क्रमेण सार्थवद् गमनमिह विवक्षितम् । | उस विज्ञानात्माके उत्क्रान्त-परलोकके लिये प्रस्थित अर्थात् परलोकगमनके लिये वासनायुक्त होनेपर, राजाके सर्वाधिकारीके समान प्राण उसके साथ-साथ उत्क्रमण करता है और उस प्राणके उत्क्रान्त होनेपर वागादि सारे ही प्राण उसके साथ-साथ उत्क्रमण करते हैं । यहाँ लोगोंके समूहके समान विज्ञानात्मा, प्राण और इन्द्रियोंका एक साथ मिलकर क्रमसे जाना विवक्षित नहीं है, बल्कि उनके प्राधान्यके अनुसार उसका उल्लेख करना अभीष्ट है । |
१०३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
१०३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
| तदैष आत्मा सविज्ञानो भवति स्वप्न इव विशेषविज्ञानवान् भवति कर्मवशान्न स्वतन्त्रः; स्वातन्त्र्येण हि सविज्ञानत्वे सर्वः कृतकृत्यः स्यात्, नैव तु तल्लभ्यते; अत एवाह व्यासः—<br><br>“सदा तद्भावभावितः” (गीता ८।६) इति। कर्मणा तूद्भाव्यमानेनान्तःकरणवृत्तिविशेषाश्रितवासनात्मकविशेषविज्ञानेन सर्वो लोक एतस्मिन् काले सविज्ञानो भवति। सविज्ञानमेव च गन्तव्यमन्ववक्रामत्यनुगच्छति विशेषविज्ञानोद्भासितमेवेत्यर्थः। | उस समय यह आत्मा सविज्ञान होता है अर्थात् स्वप्नके समान अपने कर्मवश विशेष विज्ञानवान् होता है, स्वतन्त्रतासे नहीं; यदि स्वतन्त्रतासे विज्ञानवान् हो सकता तो सभी कृतकृत्य तो हो जाते; किंतु वह कृतकृत्यता तो [सभीको] प्राप्त नहीं होती; इसीसे व्यासदेवने कहा है—‘हृदयमें सदा उसी भावका चिन्तन करते रहनेसे [वह उसीको प्राप्त होता है]”। अतः इस समय सब लोग कर्मद्वारा उद्भूत अन्तःकरणकी वृत्तिविशेषके आश्रित रहनेवाले वासनात्मक विशेष ज्ञानसे सविज्ञान होते हैं। इस प्रकार सविज्ञान अर्थात् विशेष विज्ञानसे उद्भासित होकर ही अपने गन्तव्य स्थानको अनुक्रमण-अनुगमन करता है। | | तस्मात् तत्काले स्वातन्त्र्यार्थं योगधर्मानुसेवनं परिसंख्यानाभ्यासश्च विशिष्टपुण्योपचयश्च श्रद्दधानैः परलोकार्थिभिरप्रमत्तैः कर्तव्य इति। सर्वशास्त्राणां यत्नतो विधेयोऽर्थो दुश्चरिताच्चोपरमणम्। न हि तत्काले शक्यते किञ्चित् सम्पादयितुम्; कर्मणा नीयमा- | अतः परलोककी इच्छा रखनेवाले श्रद्धालु पुरुषोंको उस समय स्वातन्त्र्य प्राप्त करनेके लिये प्रमादहीन होकर निरन्तर योगधर्मोंका सेवन, विवेकका अभ्यास और विशेषरूपसे पुण्यका संचय करना चाहिये। सम्पूर्ण शास्त्रोंके विधेय अर्थका आचरण करना चाहिये तथा दुष्कर्मसे दूर रहना चाहिये। किंतु उस (उत्क्रान्तिके) समय कुछ भी सम्पादन नहीं किया जा सकता, |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३३
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| नस्य स्वातन्त्र्याभावात्; "पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन" (३।२।१३) इत्युक्तम्। एतस्य ह्यनर्थस्योपशमोपायविधानाय सर्वशाखोपनिषदः प्रवृत्ताः। न हि तद्विहितोपायानुसेवनं मुक्त्वा आत्यन्तिकोऽस्यानर्थस्योपशमोपायोऽस्ति; तस्मादत्रैवो पनिषद्विहितोपाये यत्नपरैर्भवितव्यमित्येष प्रकरणार्थः। | क्योंकि कर्मद्वारा ले जाये जाते हुए जीवकी स्वतन्त्रता नहीं रहती; इस विषयमें "पुण्यकर्मसे पुरुष पुण्यवान् होता है और पापकर्मसे पापी" ऐसा ऊपर कहा जा चुका है। इस अनर्थकी निवृत्तिका उपाय बतानेके लिये ही समस्त शाखाओंकी उपनिषदें प्रवृत्त हुई हैं। उनके विधान किये हुए उपायके निरन्तर सेवनके बिना इस अनर्थ को आत्यन्तिक निवृत्तिका कोई और उपाय नहीं है; अतः इस उपनिषद्विहित उपायके अनुष्ठानमें ही प्रयत्न करते रहना चाहिये—यही इस प्रकरणका तात्पर्य है। |
| शकटवत् सम्भृतसम्भार उत्सर्जन् यातीत्युक्तं किं पुनस्तस्य परलोकाय प्रवृत्तस्य पथ्यदनं शाकटिकसम्भारस्थानीयम्, गत्वा वा परलोकं यद् भुङ्क्ते? शरीराद्यारम्भकं च यत् तत् किम्? इत्युच्यते—तं परलोकाय गच्छन्तमात्मानं विद्याकर्मणी, विद्या च कर्म च विद्याकर्मणी विद्या सर्वप्रकारा विहिता प्रतिषिद्धा च, अविहिता | ऊपर यह कहा गया है कि गाड़ीके समान जिसने बोझा धारण किया हुआ है, वह जीव शब्द करता हुआ जाता है; किंतु गाड़ीवानके राहखर्चके समान परलोकके लिये जानेवाले इस जीवकी रास्तेकी भोजनसामग्री क्या है, जिसे यह परलोकमें जाकर खाता है? तथा जो उसके शरीरादिका आरम्भक है, वह भी क्या है? सो बतलाया जाता है—परलोकको जानेवाले उस आत्माके साथ विद्या और कर्म—सब प्रकारकी विहित और प्रतिषिद्ध तथा अविहित और |
१०३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
| अप्रतिषिद्धा च, तथा कर्म विहितं प्रतिषिद्धं च अविहित-मप्रतिषिद्धं च, समन्वारभेते सम्यगन्वारभेते अन्वालभेते अनुगच्छतः। पूर्वप्रज्ञा च--पूर्वानुभूतविषया प्रज्ञा पूर्वप्रज्ञा अतीतकर्म फलानुभववासनेत्यर्थः। | अप्रतिषिद्ध विद्या ही यहाँ विद्या है एवं विहित और प्रतिषिद्ध तथा अविहित और अप्रतिषिद्ध कर्म ही कर्म हैं-ये विद्या और कर्म सम्यक् अन्वारम्भ अन्वालम्भन अर्थात् अनुसरण करते हैं। तथा पूर्वप्रज्ञा पूर्वानुभवसम्बन्धिनी प्रज्ञा अर्थात् अतीत कर्मफलानुभवकी वासना भी [ साथ जाता है ]। | | सा च वासना अपूर्वकर्मारम्भे कर्मविपाके चाङ्गं भवति; तेनासावप्यन्वारभते, न हि तया वासनया विना कर्म कर्तुं फलं चोपभोक्तुं शक्यते; न ह्यनभ्यस्ते विषये कौशलमिन्द्रियाणां भवति। पूर्वानुभववासनाप्रवृत्तानां त्विन्द्रियाणामिहाभ्यासमन्तरेण कौशलमुपपद्यते; दृश्यते च केषाञ्चित् कासुचित् क्रियासु चित्रकर्मादिलक्षणासु विनैवेहाभ्यासेन जन्मत एव कौशलं कासुचिदत्यन्तसौकर्ययुक्तास्वप्यकौशलं केषाञ्चित्। यथा विषयोपभोगेषु स्वभावत एव केषाञ्चित् कौशलाकौशले दृश्येते। तच्चैतत् सर्वं पूर्व- | वह वासना ही अपूर्व कर्मके आरम्भ और कर्मविपाकमें अङ्ग होती है; अतः यह भी उसके साथ जाती है; उस वासनाके बिना यह कर्म करने और उसका फल भोगनेमें समर्थ नहीं होता; क्योंकि जिस विषयका अभ्यास नहीं होता, उसमें इन्द्रियोंकी कुशलता भी नहीं होती। यहाँ पूर्वानुभवकी वासनासे प्रवृत्त हुई इन्द्रियोंकी बिना अभ्यासके कुशलता होनी सम्भव है; यह बात देखी ही जाती है कि किन्हीं पुरुषोंकी तो चित्रकलादिके समान क्रियाओंमें भी बिना अभ्यासके जन्मसे ही कुशलता होती है और किन्हीं-किन्हींकी अत्यन्त सुगम क्रियाओंमें भी कुशलता नहीं होती। जैसे विषयोपभोगमें भी किन्हींकी स्वभावतः ही कुशलता या अकुशलता देखी जाती है। सो यह सब |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०३५
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०३५
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रज्ञोद्भावानुद्भवनिमित्तम्, तेन पूर्वप्रज्ञया विना कर्मणि वा फलोपभोगे वा न कस्यचित् प्रवृत्तिरुपपद्यते। <br><br> तस्मादेतत् त्रयं शाकटिकसम्भारस्थानीयं परलोकपथ्यदनं विद्याकर्मपूर्वप्रज्ञाख्यम्। यस्माद् विद्याकर्मणी पूर्वप्रज्ञा च देहान्तरप्रतिपत्त्युपभोगसाधनम्, तस्माद् विद्याकर्मादि शुभमेव समाचरेत् यथेष्टदेहसंयोगोपभोगौ स्यातामिति प्रकरणार्थः ॥ २ ॥ | पूर्वप्रज्ञाके उद्बुद्ध और अनुद्बुद्ध होनेके कारण ही होती है। इसलिये पूर्वप्रज्ञाके बिना किसीकी भी कर्म या उसके फलोपभोगमें प्रवृत्ति होनी सम्भव नहीं है। <br><br> अतः गाड़ीवानके राहखर्चकी सामग्रीके समान ये विद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञा नामक तीन पदार्थ ही परलोकके मार्गकी भोजन-सामग्री हैं। चूँकि विद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञा—ये देहान्तरकी प्राप्ति और उपभोगके साधन हैं, इसलिये शुभ विद्या और कर्मादिका ही आचरण करे, जिससे कि अभीष्ट देहकी प्राप्ति और उपभोग हों—यही इस प्रकरणका तात्पर्य है ॥ २ ॥ |
| एवं विद्यादिसम्भारसम्भृतो देहान्तरं प्रतिपद्यमानः, मुक्त्वा पूर्वं देहं पक्षीव वृक्षान्तरं देहान्तरं प्रतिपद्यते। अथवा आतिवाहिकेन शरीरान्तरेण कर्मफलजन्मदेशं नीयते। <br><br> किञ्चात्रस्थस्यैव सर्वगतानां करणानां वृत्तिलाभो भवति। | इस प्रकार विद्यादिके भारसे लदा हुआ, देहान्तरको प्राप्त करनेवाला जीव पूर्वदेहको छोड़कर वृक्षसे दूसरे वृक्षको जानेवाले पक्षीके समान, अन्य देहको प्राप्त करता है अथवा एक दूसरे आतिवाहिक देहसे कर्मफलके उद्भवस्थान (देवलोकादि) को ले जाया जाता है। <br><br> शङ्का—क्या उसे यहाँ स्थित रहते हुए ही सर्वगत इन्द्रियोंकी वृत्ति प्राप्त |
१०३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
| आहोस्विच्छरीरस्थस्य संकुचितानि करणानि मृतस्य भिन्नघटप्रदीपप्रकाशवत् सर्वतो व्याप्य पुनर्देहान्तरारम्भे संकोचमुपगच्छन्ति? किञ्च मनोमात्रं वैशेषिकसमय इव देहान्तरारम्भदेशं प्रति गच्छति? किं वा कल्पनान्तरमेव वेदान्तसमय इति। | हो जाती है? अथवा शरीरस्थ जीवकी संकुचित इन्द्रियाँ मरनेपर, फूटे हुए घड़ेके प्रकाशके समान सर्वत्र व्याप्त होकर, देहान्तरका आरम्भ होनेपर पुनः संकोचको प्राप्त हो जाती हैं? अथवा वैशेषिक सिद्धान्तवालोंके मतानुसार केवल मन ही देहान्तरके देशमें जाता है? किंवा वेदान्तसिद्धान्तके अनुसार कल्पनान्तर ही देहान्तरकी प्राप्ति है? | | उच्यते—"त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः" (बृ० उ० १।५।१३) इति श्रुतेः—सर्वात्मकानि तावत् करणानि, सर्वात्मकप्राणसंश्रयाच्च; तेषामाध्यात्मिकाधिभौतिकपरिच्छेदः प्राणिकर्मज्ञानभावनानिमित्तः। अतस्तद्वशात् स्वभावतः सर्वगतानामनन्तानामपि प्राणानां कर्मज्ञानवासनानुरूपेणैव देहान्तरारम्भवशात् प्राणानां वृत्तिः संकुचति विकसति च। तथा चोक्तम्—"समः प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः समोऽनेन सर्वेण" (बृ० उ० १। | समाधान-बतलाते हैं—"वे ये सभी समान और सभी अनन्त हैं" इस श्रुतिके अनुसार तथा सर्वात्मक प्राणके आश्रित होनेसे इन्द्रियाँ तो सर्वात्मक ही हैं; उनका आध्यात्मिक और आधिभौतिक परिच्छेद प्राणियोंके कर्म, ज्ञान और भावनाके कारण है। अतः उनके अधीन होनेके कारण, स्वभावतः सर्वगत और अनन्त होनेपर भी भोक्ता प्राणोंके कर्म, ज्ञान और वासनाके अनुसार ही देहान्तरके आरम्भवश प्राणोंकी वृत्तिका संकोच या विकास होता है। ऐसा ही कहा भी है "यह प्राण चींटीके प्रमाणका है, मच्छरके समान है, हाथीके बराबर है, इन तीनों लोकोंके समान है और इस सबके |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३७
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३७
| ३।२२) इति। तथा चेदं वचनमनुकूलम्—“स यो हैताननन्तानुपास्ते” (बृ० उ० १।५। १६) इत्यादि “तं यथा यथोपासते” इति च।<br><br>तत्र वासना पूर्वप्रज्ञाख्या विद्याकर्मतन्त्रा जलूकावत्संततैव स्वप्नकाल इव कर्मकृतं देहाद्देहान्तरमारभते हृदयस्थैव। पुनर्देहान्तरारम्भे देहान्तरं पूर्वाश्रयं विमुञ्चति—इत्येतस्मिन्नर्थे दृष्टान्त उपादीयते— | समान है”। इसी प्रकार “जो भी इन अनन्तोंकी उपासना करता है” तथा “उसकी जो जिस प्रकार उपासना करते हैं” इत्यादि वचन भी अनुकूल हो सकते हैं।<br><br>इनमें कर्म और ज्ञानके अधीन जो पूर्वप्रज्ञा नामकी वासना है, वह जोंकके समान सर्वत्र व्याप्त रहते हुए ही हृदयस्थित रहकर जैसे स्वप्नावस्थाके शरीरकी रचना करती है, उसी प्रकार इस देहसे भिन्न दूसरे कर्मजनित देहको रच लेती है। फिर देहान्तरका आरम्भ हो जानेपर अपने पूर्वाश्रित देहको त्याग देती है—इस विषयमें यह दृष्टान्त बतलाया जाता है— |
|---|
देहान्तरगमनमें जोंकका दृष्टान्त
तद् यथा तृणजलायुका तृणस्यान्तं गत्वान्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरत्येवमेवायमात्मेदꣳ शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वान्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरति ॥ ३ ॥
वह दृष्टान्त—जिस प्रकार जोंक एक तृणके अन्तमें पहुँचकर दूसरे तृणरूप आश्रयको पकड़कर अपनेको सकोड़ लेती है, इसी प्रकार यह आत्मा इस शरीरको मारकर—अविद्या (अचेतनावस्था) को प्राप्त कराकर दूसरे आधारका आश्रय ले अपना उपसंहार कर लेता है ॥ ३ ॥
| तत्तत्र देहान्तरसंचार इदं निदर्शनम्—यथा येन प्रकारेण तृणजलायुका तृणजलूका तृण- | उस देहान्तरसंचारमें यह उदाहरण है—यथा जिस प्रकार तृण-जलूका (घासपर चलनेवाली जोंक) |
|---|
१०३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
| स्यान्तमवसानं गत्वा प्राप्य अन्यं तृणान्तरमाक्रमम्, आक्रम्यत इत्याक्रमस्तमाक्रममाक्रम्याश्रित्य, आत्मानम् आत्मनः पूर्वावयवम् उपसंहरत्यन्त्यावयवस्थाने; एवमेव अयमात्मा यः प्रकृतः संसारीदं शरीरं पूर्वोपात्तं निहत्य स्वप्नं प्रतिपित्सुरिव पातयित्वा अविद्यां गमयित्वा अचेतनं कृत्वा स्वात्मोपसंहारेण, अन्यमाक्रमं तृणान्तरमिव तृणजलूका शरीरान्तरं गृहीत्वा प्रसारिता वास नया आत्मानमुपसंहरति, तत्रात्मभावमारभते; यथा स्वप्ने देहान्तरमारभते स्वप्नदेहान्तरस्थ इव शरीरारम्भदेश आरभ्यमाणे देहे जङ्गमे स्थावरे वा। | तृणके अन्त-अन्तिम भागपर पहुँचकर दूसरे तृणरूप आक्रमका—जो आक्रान्त किया जाय उसे आक्रम कहते हैं, उस आक्रम यानी आधारका आश्रय ले अपनेको अर्थात् अपने पूर्वावयवको पिछले अवयवके स्थानमें सकोड़ लेती है; इसी प्रकार यह संसारी आत्मा, जिसका यहाँ प्रकरण है, इस अपने पूर्वप्राप्त शरीरको मारकर—स्वप्नप्राप्तिकी इच्छावालेके समान गिराकर, इसे अविद्याको प्राप्त कराकर अर्थात् अपने आत्माके उपसंहारद्वारा अचेतन कर, तृणजलूकाके एक तृणसे दूसरे तृणपर जानेके समान दूसरे आक्रम यानी शरीरान्तरको अपनी फैली हुई वासनासे ग्रहणकर अपना उपसंहार कर लेता है, अर्थात् उसीमें आत्मभाव करने लगता है; जिस प्रकार यह स्वप्नमें देहान्तरका आरम्भ करता है उसी प्रकार स्वप्नदेहान्तरस्थ जीवके समान यह शरीरारम्भदेशमें अर्थात् आरम्भ किये हुए जङ्गम या स्थावर देहमें आत्मभाव कर लेता है! | | तत्र च कर्मवशात् करणानि लब्धवृत्तीनि संहन्यन्ते; बाह्यं च कुशमृत्तिकास्थानीयं शरीरमारभ्यते। तत्र च करणव्यूहमपेक्ष्य | वहीं कर्मवश इन्द्रियाँ भी वृत्तियुक्त होकर संगठित हो जाती हैं और कुश मृत्तिकास्थानीय बाह्य शरीरका भी आरम्भ हो जाता है। फिर उसीमें इन्द्रियव्यूहकी अपेक्षासे |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३९
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३९
| वागाद्यनुग्रहायाग्न्यादिदेवताः संश्रयन्ते । एष देहान्तरारम्भविधिः ॥ ३ ॥ | वागादि इन्द्रियोंका उपकार करनेके लिये अग्नि आदि देवता आश्रय ले लेते हैं। यही देहान्तरके आरम्भकी विधि है ॥ ३ ॥ |
|---|
आत्माके देहान्तरनिर्माणमें सुवर्णकारका दृष्टान्त
| तत्र देहान्तरारम्भे नित्योपात्तमेवोपादानमुपमृद्योपमृद्य देहान्तरमारभते, आहोस्विदपूर्वमेव पुनः पुनरादत्त इति ? अत्रोच्यते दृष्टान्तः— | उस देहान्तरके आरम्भमें जीव नित्य ग्रहण किये हुए उपादानको ही बिगाड़ बिगाड़कर उसीसे देहान्तरका आरम्भ करता है अथवा पुनः पुनः नवीन उपादान ग्रहण करता है। इसमें दृष्टान्त बतलाया जाता है— |
|---|
तद् यथा पेशस्कारी पेशसो मात्रामुपादायान्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं तनुत एवमेवायमात्मेदꣳ शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वान्यन्नवतरं कल्याणतरꣳ रूपं कुरुते पित्र्यं वा गान्धर्वं वा दैवं वा प्राजापत्यं वा ब्राह्मं वान्येषां वा भूतानाम् ॥ ४ ॥
उसमें दृष्टान्त—जिस प्रकार सोनार सुवर्णका भाग लेकर दूसरे नवीन और कल्याणतर (अधिक सुन्दर) रूपकी रचना करता है, उसी प्रकार यह आत्मा इस शरीरको नष्ट कर—अचेतनावस्थाको प्राप्तकर दूसरे पितर, गन्धर्व, देव, प्रजापति, ब्रह्मा अथवा अन्यभूतोंके नवीन और कल्याणतर रूपकी रचना करता है ॥ ४ ॥
| तत्तत्रैतस्मिन्नर्थे—यथा पेशस्कारी पेशः सुवर्णं तत् करोतीति पेशस्कारी सुवर्णकारः, पेशसः | उस इस विषयमें यह दृष्टान्त है-जिस प्रकार पेशस्कारी-पेशस् सुवर्णको कहते हैं, उसे जो बनावे वह पेशस्कारी-सोनार, पेशस् अर्थात् |
|---|
१०४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
१०४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| सुवर्णस्य मात्रामपादायापच्छिद्य गृहीत्वा अन्यत् पूर्वस्माद् रचनाविशेषान्नवतरमभिनवतरं कल्याणात् कल्याणतरं रूपं तनुते निर्मिनोति । एवमेवायमात्मेत्यादि पूर्ववत् ।<br><br>नित्योपात्तान्येव पृथिव्यादीन्याकाशान्तानि पञ्च भूतानि यानि 'द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे' इति चतुर्थे व्याख्यातानि पेशःस्थानीयानि, तान्येवोपमृद्योपमृद्य, अन्यदन्यच्च देहान्तरं नवतरं कल्याणतरं रूपं संस्थानविशेषं देहान्तरमित्यर्थः, कुरुते । पित्र्यं वा पितृभ्यो हितं पितृलोकोपभोगयोग्यमित्यर्थः, गान्धर्वं गन्धर्वाणामुपभोगयोग्यम्, तथा देवानां दैवम्, प्रजापतेः प्राजापत्यम्, ब्रह्मण इदं ब्राह्मं वा; यथाकर्म यथाश्रुतमन्येषां वा भूतानां सम्बन्धि शरीरान्तरं कुरुत इत्यभिसम्बध्यते ॥ ४ ॥ | सुवर्णकी मात्राका अपादान-अपच्छेदन अर्थात् ग्रहण कर; पूर्वरचनाविशेषसे भिन्न दूसरा नवीनतर और कल्याणसे भी कल्याणतर रूप बनाता है, उसी प्रकार यह आत्मा--इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है।<br><br>आत्माके नित्यगृहीत जो पृथ्वीसे लेकर आकाशपर्यन्त सुवर्णस्थानीय पाँच भूत हैं, जिनकी 'द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे' इस वाक्यसे चतुर्थ प्रपाठकमें व्याख्या की गयी है, उन्हींको बिगाड़-बिगाड़कर दूसरे-दूसरे देहान्तरको अर्थात् पूर्वापेक्षा नवीन और कल्याणतर रूप—संस्थानविशेष यानी देहान्तरको रच लेता है। पित्र्य—जो पितरोंके लिये उपयोगी हो अर्थात् पितृलोकके उपभोगके योग्य हो, गान्धर्व—जो गन्धर्वोंके उपभोगयोग्य हो, इसी प्रकार देवताओंके लिये उपयोगी—दैव, प्रजापतिके लिये उपयोगी—प्राजापत्य और जो ब्रह्माका है, उस ब्राह्म शरीरकी तथा इसी प्रकार कर्म और ज्ञानके अनुसार वह अन्य भूतोंसे सम्बद्ध शरीरान्तरकी रचना कर लेता है—इस प्रकार इसका सम्बन्ध है ॥ ४ ॥ |
१. उपनिषदके द्वितीय अध्यायमें।
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०४१
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०४१
सर्वमय आत्माकी कर्मानुसार विभिन्न गतियोंका निरूपण
| येऽस्य बन्धनसंज्ञका उपाधिभूताः, यैः संयुक्तस्तन्मयोऽयमिति विभाव्यते, ते पदार्थाः पुञ्जीकृत्यैहकत्र प्रतिनिर्दिश्यन्ते-- | इस आत्माके जो बन्धनसंज्ञक उपाधिभूत पदार्थ हैं और जिनसे संयुक्त होकर यह तद्रूप है-ऐसा समझा जाता है, उन पदार्थोंका यहाँ एक जगह एकत्रित करके निर्देश किया जाता है— |
|---|
स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः प्राणमयश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयः पृथिवीमय आपोमयो वायुमय आकाशमयस्तेजोमयोऽतेजोमयः काममयोऽकाममयः क्रोधमयोऽक्रोधमयो धर्ममयोऽधर्ममयः सर्वमयस्तद्यदेतदिदम्मयोऽदोमय इति यथाकारी यथाचारी तथा भवति साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति पुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन । अथो खल्वाहुः—काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते ॥ ५ ॥
वह यह आत्मा ब्रह्म है। वह विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, चक्षुर्मय, श्रोत्रमय, पृथिवीमय, जलमय, वायुमय, आकाशमय, तेजोमय, अतेजोमय, काममय, अकाममय, क्रोधमय, अक्रोधमय, धर्ममय, अधर्ममय और सर्वमय है। जो कुछ इदंमय ( प्रत्यक्ष ) और अदोमय ( परोक्ष ) है, वह वही है। वह जैसा करनेवाला और जैसे आचरणवाला होता है, वैसा ही हो जाता है। शुभ कर्म करनेवाला शुभ होता है और पापकर्मा पापी होता है। पुरुष पुण्यकर्मसे पुण्यात्मा होता है और पापकर्मसे पापी होता है। कोई-कोई कहते हैं कि यह पुरुष काममय ही है, वह जैसी कामनावाला होता है
बृ० उ० ६६—
१०४२ | वृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १०४२ | वृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
वैसा ही संकल्प करता है, जैसे संकल्पवाला होता है वैसा ही कर्म करता है और जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है ॥५॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| स वा अयम्, य एवं संसरत्यात्मा, ब्रह्मैव पर एव, योऽशनायाद्यतीतः। विज्ञानमयो विज्ञानं बुद्धिस्तेनोपलक्ष्यमाणस्तन्मयः। 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु' (४।३।७) इति ह्युक्तम्। विज्ञानमयो विज्ञानप्रायः, यस्मात्तद्धर्मत्वमस्य विभाव्यते “ध्यायतीव लेलायतीव” (४।३।७) इति। | जो आत्मा इस प्रकार संसरित होता (इहलोक-परलोकमें गमनागमन करता) है, वह यह परब्रह्म ही है, जो कि क्षुधा-पिपासादि धर्मोंसे परे है। वह विज्ञानमय-विज्ञान बुद्धि को कहते हैं, उससे उपलक्षित होनेवाला अर्थात् तन्मय है। उसके विषयमें “यह आत्मा कौन है ? जो यह प्राणोंमें विज्ञानमय है” ऐसा कहा जा चुका है। विज्ञानमय अर्थात् विज्ञानप्राय; क्योंकि 'ध्यायतीव लेलायतीव” इत्यादि वाक्यसे इसका विज्ञानधर्मत्व प्रतीत होता है। |
| तथा मनोमयो मनःसंनिकर्षान्मनोमयः। तथा प्राणमयः प्राणः पञ्चवृत्तिस्तन्मयः, येन चेतनश्चलतीव लक्ष्यते। तथा चक्षुर्मयो रूपदर्शनकाले। एवं श्रोत्रमयः शब्दश्रवणकाले। एवं तस्य तस्येन्द्रियस्य व्यापारोद्भवे तत्तन्मयो भवति। | इसी प्रकार वह मनोमय है—मनकी संनिधिके कारण वह मनोमय है तथा प्राणमय है—प्राण पाँच वृत्तियोंवाला है, तन्मय वह है, जिससे कि वह चेतन चलता हुआ-सा देखा जाता है तथा रूपदर्शनके समय वह चक्षुर्मय है। एवं शब्द सुननेके समय वह श्रोत्रमय है। इसी प्रकार उस-उस इन्द्रियके व्यापारका प्रादुर्भाव होनेपर वह तत्तद्रूप हो जाता है ! |
| एवं बुद्धिप्राणद्वारेण चक्षुरादिकरणमयः सञ्शरीरारम्भक- | इस प्रकार बुद्धि और प्राणके द्वारा वह चक्षु आदि इन्द्रियमय होकर शरीरा- |