बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
| तृतीय ब्राह्मण | |
( १७ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ६०—श्रोत्रादि प्राणोंके सहित शिरमें चमस-दृष्टिका विधान | ... ५०८ |
| ६१—श्रोत्रादिमें विभागपूर्वक सप्तर्षि-दृष्टि | ... ५१० |
| तृतीय ब्राह्मण | |
| ६२—ब्रह्मके दो रूप | ... ५१३ |
| ६३—मूर्तामूर्तके विभागपूर्वक मूर्तरूप और उसके रसका वर्णन | ... ५१५ |
| ६४—विशेषणोंसहित अमूर्तरूप और उसके रसका वर्णन | ... ५१७ |
| ६५—अध्यात्म मूर्तामूर्तके विभागपूर्वक मूर्तका वर्णन | ... ५२१ |
| ६६—अध्यात्म अमूर्तका उसके विशेषणोंसहित वर्णन | ... ५२३ |
| ६७—इन्द्रियात्मा पुरुषके स्वरूपका वर्णन | ... ५२४ |
| चतुर्थ ब्राह्मण | |
| ६८—याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद | ... ५३८ |
| ६९—मैत्रेयीका अमृतत्वसाधनविषयक प्रश्न | ... ५४६ |
| १००—याज्ञवल्क्यजीका आश्वासन | ... ५४७ |
| १०१—प्रियतम आत्माके लिये ही अन्य वस्तुएँ प्रिय होती हैं | ... ५४८ |
| १०२—आत्मा सबसे अभिन्न है, इसका प्रतिपादन | ... ५५२ |
| १०३—सबकी आत्मस्वरूपताके ग्रहणमें दुन्दुभि, शङ्ख और वीणाका दृष्टान्त | ... ५५३ |
| १०४—परमात्माके निःश्वासभूत ऋग्वेदादिका उनसे अभिन्नत्वप्रतिपादन | ... ५५७ |
| १०५—आत्मा ही सबका आश्रय है—इसमें दृष्टान्त | ... ५६१ |
| १०६—विवेकद्वारा देहादिके विज्ञानघनस्वरूप होनेमें जलमें डाले हुए लवणखण्डका दृष्टान्त | ... ५६५ |
| १०७—मैत्रेयीकी शङ्का और याज्ञवल्क्यका समाधान | ... ५७२ |
| १०८—व्यवहार द्वैतमें है, परमार्थ व्यवहारातीत है | ... ५७४ |
| पञ्चम ब्राह्मण | |
| १०९—पृथिवी आदिमें मधुदृष्टि तथा उनके अन्तर्वर्ती पुरुषके साथ शारीर-पुरुषकी अभिन्नता | ... ५८२ |
| ११०—आत्माका सर्वाधिपतित्व और सर्वाश्रयत्वनिरूपण | ... ५९५ |
| १११—दध्यङ् ङाथर्वणद्वारा अश्विनीकुमारोंको मधुविद्याके उपदेशकी आख्यायिका | ... ६०० |
| षष्ठ ब्राह्मण | |
| ११२—मधुविद्याकी सम्प्रदायपरम्परा | ... ६१५ |
बृ० उ० २—
| तृतीय अध्याय | |
( १८ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ### तृतीय अध्याय | |
| प्रथम ब्राह्मण | |
| ११३—याज्ञवल्कीय काण्ड ... ... ... | ६१६ |
| ११४—राजा जनकका सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ताको सहस्र गौएँ दान करनेकी घोषणा करना ... ... ... | ६२० |
| ११५—याज्ञवल्क्यका गौएं ले जानेके लिये अपने शिष्यको आज्ञा देना, ब्राह्मणोंका कोप, अश्वलका प्रश्न ... ... ... | ६२२ |
| ११६—मृत्युग्रस्त कर्मसाधनोंकी आसक्तिसे पार पानेका उपाय ... | ६२५ |
| ११७—अहोरात्रादिरूप कालसे अतिमुक्तिका साधन ... ... | ६२६ |
| ११८—तिथ्यादिरूप कालरूपसे अतिमुक्तिका साधन ... ... | ६३१ |
| ११९—परिच्छेदके विषयभूत मृत्युको पार करनेके आश्रयका वर्णन ... | ६३३ |
| १२०—शस्त्रसम्बन्धी ऋचाएँ और उनसे प्राप्त होनेवाला फल ... | ६३७ |
| १२१—होम-सम्बन्धिनी आहुतियाँ और उनसे प्राप्त होनेवाले फल ... | ६३८ |
| १२२—ब्रह्माके यज्ञरक्षाके साधन और उससे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन ... ... ... | ६४१ |
| १२३—स्तवनसम्बन्धिनी ऋचाओंका और उनसे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन ... ... ... | ६४४ |
| द्वितीय ब्राह्मण | |
| १२४—याज्ञवल्क्य-आर्तभाग-संवाद ... ... | ६४७ |
| १२५—ग्रह और अतिग्रहकी संख्या एवं स्वरूप ... ... | ६५२ |
| १२६—घ्राणादि इन्द्रियोंका ग्रहत्व और गन्धादि विषयोंका अतिग्रहत्वनिरूपण | ६५५ |
| १२७—सर्वभक्षक मृत्यु किसका खाद्य है ? ... ... | ६५८ |
| १२८—तत्त्वज्ञके देहावसानका क्रम ... ... | ६६० |
| १२९—इन्द्रियाभिमानी देवताओंके निवृत्त हो जानेपर अस्वतन्त्र कर्ता पुरुषकी स्थितिका विचार ... ... | ६६३ |
| तृतीय ब्राह्मण | |
| १३०—याज्ञवल्क्य-भुज्यु-संवाद ... ... ... | ६७१ |
| १३१—पारिक्षित कहाँ रहे ? ... ... ... | ६८० |
| १३२—पारिक्षितोंकी गतिका वर्णन ... ... ... | ६८४ |
| चतुर्थ ब्राह्मण | |
| १३३—याज्ञवल्क्य-उषस्त-संवाद ... ... ... | ६८८ |
( १६ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| १३४—सर्वान्तर आत्माका निरूपण ... | ... ६६८ |
| १३५—आत्माकी अनिर्वचनीयता ... | ... ७०२ |
पञ्चम ब्राह्मण
१३६—याज्ञवल्क्य-कहोल-संवाद ... ... | ... ७०६ १३७—संन्याससहित आत्मज्ञानका निरूपण ... | ... ७०६
षष्ठ ब्राह्मण
१३८—याज्ञवल्क्य-गार्गी-संवाद ... ... | ... ७३५ १३९—जलसे लेकर ब्रह्मलोकपर्यन्त उत्तरोत्तर अधिष्ठान तत्त्वोंका निरूपण ... ... , | ७३६
सप्तम ब्राह्मण
१४०—याज्ञवल्क्य-आरुणि-संवाद ... | ... ७४१ १४१—सूत्र और अन्तर्यामीके विषयमें प्रश्न ... | ... ७४१ १४२—सूत्रका निरूपण ... ... | ... ७४६ १४३—अन्तर्यामीका निरूपण ... ... | ... ७४६
अष्टम ब्राह्मण
१४४—दो प्रश्न पूछनेके लिये गार्गीका आज्ञा माँगना | १४५—पहला प्रश्न ... ... | ... ७६१ १४६—याज्ञवल्क्यका उत्तर ... ... | ... ७६२ १४७—उपक्रमसहित दूसरा प्रश्न ... ... | ... ७६४ १४८—याज्ञवल्क्यका उत्तर ... ... | ... ७६५ १४९—अनुमानप्रमाणद्वारा अक्षरका निरूपण ... | ... ७६६ १५०—अक्षरके ज्ञान और अज्ञानके परिणाम ... | ... ७७६ १५१—अक्षरका स्वरूप, लक्षण और अद्वितीयत्व ... | ... ७७८ १५२—गार्गीका निर्णय ... ... | ... ७८०
नवम ब्राह्मण
१५३—याज्ञवल्क्य-शाकल्य-संवाद ... ... | ... ७८४ १५४—देवताओंकी संख्या ... ... | ... ७८५ १५५—तैंतीस देवताओंका विवरण ... ... | ... ७८७ १५६—वसु कौन हैं ? ... ... | ... ७८८ १५७—रुद्र कौन हैं ? ... ... | ... ७८६
( २० )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| १५८—आदित्य कौन हैं ? | ७६० |
| १५९—इन्द्र और प्रजापति कौन हैं ? | ७६० |
| १६०—छः देवताओंका विवरण | ७६१ |
| १६१—देवताओंकी तीन, दो और डेढ़ संख्याओंका विवरण | ७६२ |
| १६२—डेढ़ और एक देवका विवरण | ७६३ |
| १६३—प्राणब्रह्मके आठ प्रकारके भेद | ७६४ |
| १६४—शाकल्यको चेतावनी | ८०४ |
| १६५—देवता और प्रतिष्ठासहित दिशाओंके ज्ञानकी प्रतिज्ञा | ८०५ |
| १६६—देवता और प्रतिष्ठासहित पूर्वदिशाका वर्णन | ८०६ |
| १६७—देवता और प्रतिष्ठाके सहित दक्षिण दिशाका वर्णन | ८०६ |
| १६८—देवता और प्रतिष्ठाके सहित पश्चिम दिशाका वर्णन | ८११ |
| १६९—देवता और प्रतिष्ठाके सहित उत्तर दिशाका वर्णन | ८१३ |
| १७०—देवता और प्रतिष्ठाके सहित ध्रुवा दिशाका वर्णन | ८१५ |
| १७१—हृदय और शरीरका अन्योन्याश्रयत्व | ८१६ |
| १७२—समानपर्यन्त शरीरादिकी प्रतिष्ठा तथा आत्मस्वरूपका वर्णन और शाकल्यका शिरःपतन | ८१७ |
| १७३—याज्ञवल्क्यका सभासदोंको प्रश्न करनेके लिये आमन्त्रण | ८२३ |
| १७४—याज्ञवल्क्यके प्रश्न | ८२४ |
चतुर्थ अध्याय
प्रथम ब्राह्मण
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| १७५—जनक-याज्ञवल्क्य-संवाद | ८४० |
| १७६—जनककी सभामें याज्ञवल्क्यका आगमन, जनकका प्रश्न | ८४१ |
| १७७—शैलिनिके बतलाये हुए वाक्-ब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन | ८४२ |
| १७८—उदङ्कोक्त प्राण-ब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन | ८४७ |
| १७९—बर्बुके बताये हुए चक्षुर्ब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन | ८४६ |
| १८०—गर्दभीविपीतके कहे हुए श्रोत्रब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन | ८५१ |
| १८१—जाबालोक्त मनोब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन | ८५३ |
| १८२—शाकल्योक्त हृदयब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन | ८५५ |
द्वितीय ब्राह्मण
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| १८३—जनककी उपसत्ति | ८५७ |
| १८४—दक्षिणनेत्रस्थ इन्द्रसंज्ञक पुरुषका परिचय | ८६० |
( २१ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| १८५—वामनेत्रस्थ इन्द्रपत्नी तथा विराट्का परिचय और उन दोनोंके संस्ताव, अन्न, प्रावरण एवं मार्गादिका वर्णन | ... ८६१ |
| १८६—प्राणात्मभूत विद्वान्की सर्वात्मकताका वर्णन, जनककी अभयप्राप्ति और याज्ञवल्क्यके प्रति आत्मसमर्पण | ... ... ८६४ |
| तृतीय ब्राह्मण | |
| १८७—जनकके पास याज्ञवल्क्यका आना और राजाका पहले प्राप्त किये हुए इच्छानुसार प्रश्नरूप वरके कारण उनसे प्रश्न करना | ... ८७० |
| १८८—पुरुषके व्यवहारमें उपयोगी पाँच ज्योतियाँ | |
| १—आदित्यज्योति | ... ... ... ८७१ |
| २—चन्द्रज्योति | ... ... ... ८७५ |
| ३—अग्निज्योति | ... ... ... ८७५ |
| ४—वाग्ज्योति | ... ... ... ८७६ |
| ५—आत्मज्योति | ... ... ... ८७८ |
| १८९—आत्माका स्वरूप | ... ... ... ८८१ |
| १९०—आत्मा जन्म और मरणके साथ देहेन्द्रियरूप पापको ग्रहण और त्याग करता है | ... ... ... ८९१ |
| १९१—आत्माके दो स्थानोंका वर्णन | ... ... ... ८९३ |
| १९२—स्वप्नावस्थामें रथादिका अभाव है, इसलिये उस समय आत्मा स्वयं ज्योति है | ... ... ... ९३० |
| १९३—स्वप्नसृष्टिके विषयमें प्रमाणभूत मन्त्र | ... ... ९३५ |
| १९४—स्वप्नस्थानके विषयमें मतभेद और उसके स्वयंज्योतिष्ट्वका निश्चय | ... ९३८ |
| १९५—सुषुप्तिके भोगसे आत्माकी असङ्गता | ... ... ९४४ |
| १९६—स्वप्नावस्थाके भोगोंसे आत्माकी असङ्गता | ... ... ९५० |
| १९७—जागरित-अवस्थाके भोगोंसे आत्माकी असङ्गता | ... ९५२ |
| १९८—पुरुषके अवस्थान्तर-सञ्चारमें महामत्स्यका दृष्टान्त | ... ९५६ |
| १९९—सुषुप्ति आत्माका विश्रान्तिस्थान है, इसमें श्येनका दृष्टान्त | ... ९५६ |
| २००—स्वप्नदर्शनकी स्थानभूता हितानाम्नी नाड़ियोंका वर्णन | ... ९६१ |
| २०१—मोक्षका स्वरूप प्रदर्शित करनेमें स्त्रीसे मिले हुए पुरुषका दृष्टान्त | ... ९६८ |
| २०२—सुषुप्तिस्थ आत्माकी निःसङ्ग और निःशोक स्थितिका वर्णन | ... ९७४ |
| २०३—सुषुप्तिमें स्वयंज्योति आत्माकी दृष्टि आदिका अनुभव न होनेमें हेतु | ९८५ |
| २०४—जागरित और स्वप्नमें पुरुषको विशेष ज्ञान होनेमें हेतु | ... ९८६ |
| २०५—सुषुप्तिगत आत्माकी अभिन्न स्थिति | ... ... १००० |
( २२ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| २०६-निष्पाप और निष्काम श्रोत्रियके सार्वभौम आनन्दका दिग्दर्शन | १००४ |
| २०७-सम्बन्ध-भाष्य | १०११ |
| २०८-आत्माकी संसाररूप जागरित-स्थानमें पुनरावृत्ति | १०१३ |
| २०९-मुमूर्षु की दशाका वर्णन | १०१४ |
| २१०-ऊर्ध्वोच्छ्वास क्यों और किसलिये होता है ? | १०१६ |
| २११-देहान्तरग्रहणका प्रकार | १०२० |
| २१२-प्राणोंके देहान्तरगमनका प्रकार | १०२२ |
| चतुर्थ ब्राह्मण | |
| २१३-मरणोन्मुख जीवकी दशाका वर्णन | १०२४ |
| २१४-लिङ्गात्मामें विभिन्न इन्द्रियोंके लय और उसके उत्क्रमणका वर्णन | १०२८ |
| २१५-देहान्तरगमनमें जोंकका दृष्टान्त | १०३७ |
| २१६-आत्माके देहान्तरनिर्माणमें सुवर्णकारका दृष्टान्त | १०३६ |
| २१७-सर्वमय आत्माकी कर्मानुसार विभिन्न गतियोंका निरूपण | १०४१ |
| २१८-कामनाके अनुसार शुभाशुभ गति तथा निष्काम ब्रह्मज्ञके मोक्षका निरूपण | १०४८ |
| २१९-विद्वान्का अनुत्क्रमण | १०६५ |
| २२०-आत्मकामी ब्रह्मवेत्ताको मोक्ष प्राप्त होता है— इसमें प्रमाणभूत मन्त्र | १०७० |
| २२१-मोक्षमार्गके विषयमें मत-भेद | १०७३ |
| २२२-विद्या और अविद्यारत पुरुषोंकी गति | १०७७ |
| २२३-अज्ञानियोंको प्राप्त होनेवाले अनन्द लोकोंका वर्णन | १०७८ |
| २२४-आत्मज्ञकी निश्चिन्त स्थिति | १०७८ |
| २२५-आत्मज्ञका महत्त्व | १०८० |
| २२६-आत्मज्ञानके बिना होनेवाली दुर्गति | १०८२ |
| २२७-अभेददर्शी आत्मज्ञकी निर्भयता | १०८४ |
| २२८-देवोंद्वारा उपास्य आयुसंज्ञक ब्रह्म | १०८५ |
| २२९-सर्वाधारभूत ब्रह्मको जाननेवाला मैं अमृत ही हूँ | १०८६ |
| २३०-ब्रह्मको प्राणका प्राणादि जाननेवाले ही उसे जानते हैं | १०८७ |
| २३१-नानात्वदर्शीकी दुर्गतिका वर्णन | १०८८ |
| २३२-ब्रह्मदर्शनकी विधि | १०८८ |
| २३३-ब्रह्मनिष्ठामें अधिक शास्त्राभ्यास बाधक है | १०९१ |
| २३४-आत्माके स्वरूप, उसकी उपलब्धिके साधनभूत संन्यास और आत्मज्ञकी स्थितिका प्रतिपादन | १०९६ |
पञ्चम ब्राह्मण
( २३ )
विषय | पृष्ठ
२३५-ब्रह्मवेत्ताकी स्थिति और याज्ञवल्क्यके प्रति जनकका आत्मसमर्पण १११७
२३६-आत्मा अन्नाद और वसुदान है—इस प्रकारकी उपासनाका फल ११२२
२३७-ब्रह्मके स्वरूप और ब्रह्मज्ञकी स्थितिका वर्णन ... ११२३
पञ्चम ब्राह्मण
२३८-याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद ... ११२७
२३९-याज्ञवल्क्य और उनकी दो स्त्रियाँ ... ११२८
२४०-याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद ... ११२९
२४१-मैत्रेयीका अमृतत्वसाधनविषयक प्रश्न ... ११३०
२४२-याज्ञवल्क्यजीका सान्त्वनापूर्वक समाधान ... ११३१
२४३-प्रियतम आत्माके लिये ही सब वस्तुएँ प्रिय होती हैं ... ११३२
२४४-भेददृष्टिसे हानि दिखाकर 'सब कुछ आत्मा ही है' इस तत्त्वका उपदेश ... ११३४
२४५-सबको 'आत्मा' रूपसे ग्रहण करनेमें दृष्टान्त ... ११३५
२४६-निर्विशेष आत्माके विषयमें मैत्रेयीकी शङ्का और याज्ञवल्क्यका समाधान .... ११३८
२४७-उपदेशका उपसंहार और याज्ञवल्क्यका संन्यास ... ११४०
षष्ठ ब्राह्मण
२४८-याज्ञवल्कीय काण्डकी वंश-परम्परा ... ११५८
पञ्चम अध्याय
प्रथम ब्राह्मण
२४९-पूर्णब्रह्म और उससे उत्पन्न होनेवाला पूर्ण कार्य ... ११६२
२५०-ॐ खं ब्रह्म और उसकी उपासनाका वर्णन ... ११७५
द्वितीय ब्राह्मण
२५१-प्रजापतिका देव, मनुष्य और असुर तीनोंको एक ही अक्षर 'द' से पृथक्-पृथक् दम, दान और दयाका उपदेश ... ११८०
तृतीय ब्राह्मण
२५२-हृदय-ब्रह्मकी उपासना ... ११८६
चतुर्थ ब्राह्मण
२५३-सत्य-ब्रह्मकी उपासना ... ११९१
[ २४ ]
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| पञ्चम ब्राह्मण | |
| २५४-प्रथमज सत्य-ब्रह्म और 'सत्य' नामके अक्षरोंकी उपासना | ११६४ |
| २५५-एक-दूसरेमें प्रतिष्ठित सत्यसंज्ञक आदित्यमण्डलस्थ और चाक्षुष पुरुष | ११६७ |
| २५६-अहःसंज्ञक आदित्यमण्डलस्थ पुरुषके व्याहृतिरूप अवयव | १२०० |
| २५७-अहंसंज्ञक चाक्षुष पुरुषके व्याहृतिरूप अवयव | १२०१ |
| षष्ठ ब्राह्मण | |
| २५८-हृदयस्थ मनोमय पुरुषकी उपासना | १२०२ |
| सप्तम ब्राह्मण | |
| २५९-विद्युद्ब्रह्मकी उपासना | १२०४ |
| अष्टम ब्राह्मण | |
| २६०-धेनुरूपसे वाक्की उपासना | १२०५ |
| नवम ब्राह्मण | |
| २६१-पुरुषान्तर्गत वैश्वानराग्नि, उसका घोष और मरणकालका सूचक अरिष्ट | १२०७ |
| दशम ब्राह्मण | |
| २६२-प्रकरणान्तर्गत उपासनाओंसे प्राप्त होनेवाली गति | १२०६ |
| एकादश ब्राह्मण | |
| २६३-व्याधि, श्मशानगमन और अग्निदाहमें परम तपदृष्टिका विधान | १२११ |
| द्वादश ब्राह्मण | |
| २६४-अन्न-प्राणरूप ब्रह्मकी उपासना और तद्विषयक आख्यान | १२१३ |
| त्रयोदश ब्राह्मण | |
| २६५-उक्थदृष्टिसे प्राणोपासना | १२१८ |
| २६६-यजुर्दृष्टिसे प्राणोपासना | १२१६ |
| २६७-सामदृष्टिसे प्राणोपासना | १२२० |
| २६८-क्षत्रदृष्टिसे प्राणोपासना | १२२१ |
| चतुर्दश ब्राह्मण | |
| २६९-गायत्र्युपासना | १२२२ |
| २७०-गायत्रीके प्रथम लोक-पादकी उपासना | १२२३ |
( २५ )
विषय
२७१—गायत्रीके द्वितीय त्रयीपादकी उपासना ... १२२४
२७२—गायत्रीके तृतीय प्राणादिपाद और तुरीय दर्शत परोरजापादकी उपासना ... १२२५
२७३—गायत्रीकी परमप्रतिष्ठा प्राण हैं, 'गायत्री' शब्दका निर्वचन और वटुको किये गये गायत्र्युपदेशका फल ... १२२८
२७४—अनुष्टुप् सावित्रीके उपदेशका निषेध और गायत्री-सावित्रीका महत्त्व १२३२
२७५—गायत्रीके प्रत्येक पदके महत्त्वका दिग्दर्शन ... १२३४
२७६—गायत्रीका उपस्थान और उसका फल ... १२३६
२७७—गायत्रीके मुखविधानके लिये अर्थवाद ... १२३६
पञ्चदश ब्राह्मण
२७८-ज्ञानकर्मसमुच्चयकारीकी अन्तकालमें आदित्य और अग्निसे प्रार्थना १२४१
षष्ठ अध्याय
प्रथम ब्राह्मण
२७९-ज्येष्ठ-श्रेष्ठ दृष्टिसे प्राणोपासना ... १२४८
२८०-वसिष्ठादृष्टिसे वाक्की उपासना ... १२५०
२८१-प्रतिष्ठादृष्टिसे चक्षुकी उपासना ... १२५१
२८२-सम्पदृदृष्टिसे श्रोत्रकी उपासना ... १२५२
२८३-आयतनदृष्टिसे मनकी उपासना ... १२५३
२८४-प्रजातिदृष्टिसे रेतस्की उपासना ... १२५४
२८५-अपनी श्रेष्ठताके लिये विवाद करते हुए वागादि प्राणोंका ब्रह्माके पास जाना और ब्रह्माका यह निर्णय करनेके लिये एक कसौटी बताना १२५५
२८६-अपनी उत्कृष्टताकी परीक्षाके लिये वाक्का उत्क्रमण और पुनः प्रवेश १२५६
२८७-चक्षुका उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश ... १२५७
२८८-श्रोत्रका उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश ... १२५८
२८९-मनका उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश ... १२५८
२९०-रेतस्का उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश ... १२५९
२९१-प्राणके उत्क्रमण करते ही अन्य इन्द्रियोंका विचलित हो जाना और उसकी श्रेष्ठता स्वीकार करना ... १२६०
२९२-वागादिकृत प्राणकी स्तुति और उसे अन्न तथा वस्त्र प्रदान ... १२६२
द्वितीय ब्राह्मण
२९३-प्रवाहणकी सभामें श्वेतकेतुका आना और प्रवाहणका उससे प्रश्न करना १२७३
२९४-प्रवाहणके पाँच प्रश्न और श्वेतकेतुका उन सभीके प्रति अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना ... १२७५
( २६ )
| विषय | पृष्ठ. |
|---|---|
| २६५-श्वेतकेतुका अपने पिताके पास आकर उलाहना देना | ... १२७६ |
| २६६-पिता आरुणिका उनके विषयमें अपनी अनभिज्ञता बताकर उसे शान्त करना और उनका उत्तर जाननेके लिये प्रवाहणके पास आना | १२८१ |
| २६७-आरुणिका प्रवाहणसे अपने पुत्रसे पूछी हुई बात कहनेकी प्रार्थना करना | ... १२८३ |
| २६८-प्रवाहणका उसे दैववर बताकर अन्य मानुषवर माँगनेके लिये कहना | १२८४ |
| २६९-आरुणिका आग्रह और प्रवाहणकी स्वीकृतिसे वाणीद्वारा उसका शिष्यत्व स्वीकार करना | ... १२८४ |
| ३००-प्रवाहणकी क्षमा-प्रार्थना और विद्यादानके लिये तत्पर होना | ... १२८६ |
| ३०१-चतुर्थ प्रश्नका उत्तर—पञ्चाग्निविद्या | |
| १-द्युलोकाग्नि | ... १२८८ |
| २-पर्जन्याग्नि | ... १२९४ |
| ३-इहलोकाग्नि | ... १२९६ |
| ४-पुरुषाग्नि | ... १२९८ |
| ५-योषाग्नि | ... १२९६ |
| ३०२-प्रथम प्रश्नका उत्तर—अन्त्येष्टि संस्काररूप अन्तिम आहुति | ... १३०१ |
| ३०३-पञ्चम प्रश्नका उत्तर—देवयानमार्गका वर्णन | ... १३०२ |
| ३०४-धूमयानमार्गका वर्णन तथा द्वितीय और तृतीय प्रश्नका उत्तर | ... १३११ |
| तृतीय ब्राह्मण | |
| ३०५-श्रीमन्थकर्म और उसकी विधि | ... १३१८ |
| ३०६-मन्थकर्मकी सामग्री और हवनविधि | ... १३१६ |
| ३०७-हवनके मन्त्र | ... १३२४ |
| ३०८-मन्थाभिमर्शका मन्त्र | ... १३२६ |
| ३०९-मन्थको उठानेका मन्त्र | ... १३२७ |
| ३१०-मन्थभक्षणकी विधि | ... १३२७ |
| ३११-मन्थकर्मका वंश | ... १३३० |
| ३१२-मन्थकर्मकी सामग्रीका विवरण | ... १३३३ |
| चतुर्थ ब्राह्मण | |
| ३१३-संतानोत्पत्ति-विज्ञान अथवा पुत्रमन्थकर्म | ... १३३४ |
| ३१४-नाम-कर्म | ... १३६१ |
| पञ्चम ब्राह्मण | |
| ३१५-समस्त प्रवचनका वंश | ... १३६३ |
चित्र-सूची
| पृष्ठ | ||
|---|---|---|
| १—भाष्यकार भगवान् शंकर | ( तिरंगा ) | २६ |
| २—मैत्रेयीको उपदेश | ,, | ५४७ |
| ३—ब्रह्मचारियोंको याज्ञवल्क्यका आदेश | ,, | ६२२ |
| ४—शाकल्यका शिर गिरना | ,, | ८१८ |
| ५—जनक-याज्ञवल्क्य-संवाद | ,, | ८४१ |
| ६—प्रवाहणकी सभामें श्वेतकेतु | ,, | १२७६ |
ॐ
यस्मिन्नापूर्यमाणे पतति करतला-
च्छङ्करस्यापि शूलं
त्रासादुद्भ्रान्तचित्ता रविरथतुरगा
भ्रष्टमार्गाः प्रयान्ति ।
ब्रह्मा ब्रह्माण्डभाण्डस्फुटनपरिभया-
त्स्तौति नारायणाख्यं
सोऽस्मान्पायात्सुनादो वदनविनिहितः
पाञ्चजन्यो मुरारेः ॥
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बृहदारण्यकोपनिषद्
(चित्र: भाष्यकार भगवान् शङ्कर)
भाष्यकार भगवान् शङ्कर
तत्सद्ब्रह्मणे नमः
बृहदारण्यकोपनिषद्
मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित
शङ्करः शङ्कराचार्यः सद्गुरुः शर्वसन्निभः ।
सर्वेषां शङ्कराः सन्तु सच्चिदानन्दरूपिणः ॥
शान्तिपाठ
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
ॐ वह (परब्रह्म) पूर्ण है और यह (कार्यब्रह्म) भी पूर्ण है; क्योंकि पूर्णसे पूर्णकी ही उत्पत्ति होती है। तथा [प्रलयकालमें] पूर्ण (कार्यब्रह्म) का पूर्णत्व लेकर (अपनेमें लीन करके) पूर्ण (परब्रह्म) ही बच रहता है। त्रिविध तापकी शान्ति हो।
प्रथम अध्याय
प्रथम ब्राह्मण
सम्बन्ध-भाष्य
| ॐ नमो ब्रह्मादिभ्यो ब्रह्मविद्यासम्प्रदायकर्तृभ्यो वंशऋषिभ्यो नमो गुरुभ्यः । | ॐ ब्रह्मविद्या-सम्प्रदायके प्रवर्तक [^१]['वंश-ब्राह्मणोक्त ] गुरुपरम्परागत ब्रह्मादि वंश-ऋषियोंको तथा गुरुदेवको नमस्कार है। | | नामनिरुक्तिः<br>'उषा वा अश्वस्य' इत्येवमाद्या वाजसनेयिब्राह्मणोपनिषत् । तस्या इयमल्पग्रन्था वृत्तिरारभ्यते संसारव्याविवृत्सुभ्यः संसारहेतुनिवृत्तिसाधनब्रह्मात्मकत्वविद्याप्रतिपत्तये । सेयं ब्रह्मविद्या उपनिषच्छब्दवाच्या तत्पराणां सहेतोः संसारस्यात्यन्तावसादनात् । उपनिपूर्वस्य सदेस्तदर्थत्वात् । तादर्थ्याद् ग्रन्थोऽप्युपनिषद् उच्यते । | 'उषा वा अश्वस्य' इत्यादि मन्त्रसे आरम्भ होनेवाली वाजसनेयि-ब्राह्मणोपनिषद् है। संसार-बन्धनको दूर करनेकी इच्छावाले विरक्त पुरुषोंके लिये संसारके कारण (अज्ञान) की निवृत्तिके साधन ब्रह्मात्मैक्यबोधकी प्राप्तिके लिये उसकी यह अल्प ग्रन्थवाली (संक्षिप्त) व्याख्या आरम्भ की जाती है। यह ब्रह्मविद्या अपनेमें लगे हुए पुरुषोंके संसारका कारणसहित अत्यन्त अवसादन (उच्छेद) करती है, इसलिये उपनिषद् शब्दसे कही जाती है; क्योंकि 'उप' और 'नि' उपसर्गपूर्वक सद्घातुका यही (अवसादन ही) अर्थ है। उस ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिरूप प्रयोजनवाला होनेके कारण यह ग्रन्थ भी उपनिषद् कहा जाता है। |
[^१]. इस उपनिषद्के द्वितीय, चतुर्थ और षष्ठ अध्यायोंके अन्तिम ब्राह्मण 'वंशब्राह्मण' कहलाते हैं; क्योंकि उनमें इस ग्रन्थद्वारा प्रतिपादित विद्याओंकी आचार्यपरम्पराका उल्लेख किया गया है।
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३१ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३१ |
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| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| सेयं षडध्यायी अरण्येऽनूच्यमानत्वादारण्यकम्, बृहत्त्वात्परिमाणतो बृहदारण्यकम्। तस्यास्य कर्मकाण्डेन सम्बन्धोऽभिधीयते। सर्वोऽप्ययं वेदः प्रत्यक्षानुमानाभ्यामनवगतेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारोपायप्रकाशनपरः सर्वपुरुषाणां निसर्गत एव तत्प्राप्तिपरिहारयोरिष्टत्वात्। दृष्टविषये चेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारोपायज्ञानस्य प्रत्यक्षानुमानाभ्यामेव सिद्धत्वान्नागमान्वेषणा। | यह छः अध्यायवाली उपनिषद् अरण्य (वन) में कही जानेके कारण आरण्यक है और [अन्य उपनिषदोंकी अपेक्षा] परिमाणमें बृहद् (बड़ी) होनेके कारण बृहदारण्यक कही जाती है। अब इसका कर्मकाण्डके साथ सम्बन्ध बतलाया जाता है। यह सारा ही वेद, जिनका प्रत्यक्ष और अनुमान आदि अन्य प्रमाणोंसे ज्ञान नहीं होता, उन इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिके उपायोंको प्रकाशित करनेवाला है, क्योंकि सभी पुरुषोंको स्वभावसे ही इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्ति इष्ट है। जो विषय प्रत्यक्ष हैं उनमें इष्टप्राप्ति और अनिष्टनिवृत्तिके उपायोंका ज्ञान तो प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणोंसे ही सिद्ध है, इसलिये वहां आगमप्रमाण ढूँढनेकी आवश्यकता नहीं होती। |
| [आत्मतत्त्वनिरूपणे शास्त्रस्यार्थवत्त्वम्]<br>न चासति जन्मान्तरसम्बन्ध्यात्मास्तित्वविज्ञाने जन्मान्तरेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारेच्छा स्यात् स्वभाववादिदर्शनात्। तस्मा- | किंतु जन्मान्तरसे सम्बन्ध रखनेवाले आत्माके अस्तित्वका ज्ञान न होनेपर जन्मान्तर-सम्बन्धिनी इष्टप्राप्ति और अनिष्ट-निवृत्तिकी इच्छा भी नहीं हो सकती, जैसा कि स्वभाववादियों (चार्वाकादिकों) में देखा जाता है¹। अतः शास्त्र |
१. अर्थात् आत्माके अस्तित्वको न जाननेवाले लोकायतिक और बौद्धोंकी जन्मान्तरमें इष्ट-प्राप्ति और अनिष्ट-परिहारके उद्देश्यसे वैदिक क्रियाओंमें प्रवृत्ति नहीं होती—यह बात देखी गयी है।
३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| ज्जन्मान्तरसम्बन्ध्यात्मास्तित्वे जन्मान्तरेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारोपायविशेषे च शास्त्रं प्रवर्तते। “येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके” (क० उ० १ । १ । २०)- इत्युपक्रम्य “अस्तीत्येवोपलब्धव्यः” (क० उ० २ । ३ । १३) इत्येवमादिनिर्णयदर्शनात्। “यथा च मरणं प्राप्य” (क० उ० २ । २ । ६) इत्युपक्रम्य “योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः। स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्” (क० उ० २ । २ । ७) इति च। “स्वयञ्ज्योतिः” (बृ० उ० ४ । ३ । ६) इत्युपक्रम्य “तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते” (४ । ४ । २) “पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन” (३ । २ । १३) इति च। “ज्ञपयिष्यामि” (बृ० उ० २ । १ । १५) इत्युपक्रम्य “विज्ञानमयः” | जन्मान्तर--सम्बन्धी आत्माके अस्तित्व और जन्मान्तरकी इष्टप्राप्ति एवं अनिष्टनिवृत्तिके उपायविशेषका निरूपण करनेमें प्रवृत्त होता है। जैसा कि [श्रुतिमें] “मृत मनुष्यके विषयमें जो ऐसी शङ्का होती है कि कोई तो कहते हैं [शरीरादिसे अतिरिक्त देहान्तरसम्बन्धी] आत्मा रहता है और कोई कहते हैं यह नहीं रहता” इस प्रकार उपक्रम करके “आत्मा है—ऐसा ही जानना चाहिये” इत्यादि निर्णय देखा जाता है तथा “[ब्रह्मको न जाननेसे] मरणको प्राप्त होनेपर आत्मा जैसा हो जाता है” इस प्रकार आरम्भ करके “जिसने जैसा कर्म किया है तथा जिसने जैसा शास्त्रज्ञान प्राप्त किया है उसके अनुसार कोई तो देह धारण करनेके लिये किसी योनिको प्राप्त हो जाते हैं और कोई स्थावर हो जाते हैं” इस प्रकार कहा है। एवं “स्वयं प्रकाश है” इस प्रकार आरम्भ कर “ज्ञान और कर्म उसके जन्मान्तरके आरम्भक होते हैं” तथा “वह पुण्यकर्मसे पुण्यवान् और पापकर्मोंसे पापमय होता है” इत्यादि कहा गया है। इसी प्रकार “बतलाऊँगा” ऐसा उपक्रम कर “आत्मा विज्ञान- |
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३३
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३३
| (२। १। १६) इति च व्यतिरिक्तात्मास्तित्वम् ।<br><br>तत्प्रत्यक्षविषयमेवेति चेन्न, प्रत्यक्षानुमानाभ्यां नात्मनोऽस्तित्वसिद्धिः वादिविप्रतिपत्तिदर्शनात् । न हि देहान्तरसम्बन्धिन आत्मनः प्रत्यक्षेणास्तित्वविज्ञाने लोकायतिका बौद्धाश्च नः प्रतिकूलाः स्युर्नास्त्यात्मेति वदन्तः । न हि घटादौ प्रत्यक्षविषये कश्चिद्विप्रतिपद्यते नास्ति घट इति । स्थाण्वादौ पुरुषादिदर्शनान्नेति चेन्न, निरूपितेऽभावात् । न हि प्रत्यक्षेण निरूपिते स्थाण्वादौ विप्रतिपत्तिर्भवति । वैनाशिकास्त्वहमितिप्रत्यये जायमानेऽपि देहान्तरव्यतिरिक्तस्य नास्तित्वमेव प्रतिजानते । तस्मात्प्रत्यक्षविषयवैलक्षण्यात् प्रत्यक्षान्नात्मास्तित्वसिद्धिः । | मय है'' इस प्रकार देहसे भिन्न आत्माका अस्तित्व बतलाया गया है।<br><br>यदि कहो कि आत्माका अस्तित्व तो प्रत्यक्ष प्रमाणका ही विषय है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि इसके सम्बन्धमें विभिन्न वादियोंका मतभेद देखा जाता है। यदि देहान्तरसम्बन्धी आत्माके अस्तित्वका ज्ञान प्रत्यक्ष होता तो लोकायतिक और बौद्ध 'आत्मा नहीं है' ऐसा कहते हुए हमारे प्रतिकूल न होते। घटादि जो प्रत्यक्षप्रमाणके विषय हैं, उनमें 'घट नहीं है' ऐसा संदेह किसीको नहीं होता। यदि कहो कि स्थाणु (ठूँठ) आदिमें पुरुषादिका भ्रम देखा जानेके कारण प्रत्यक्ष वस्तुमें संशयका अभाव नहीं बताया जा सकता तो यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि अच्छी तरह देख लेनेपर उस संशयका अभाव हो जाता है। स्थाणु आदिका प्रत्यक्ष निरूपण हो जानेपर उसमें किसीको संदेह नहीं रहता। किंतु वैनाशिक तो 'अहम्' ऐसी वृत्तिके उदय होनेपर भी देहान्तरसे भिन्न आत्माके न होनेका ही निश्चय करते हैं। अतः प्रत्यक्ष प्रमाणके विषयसे विलक्षण होनेके कारण प्रत्यक्षसे आत्माके अस्तित्वकी सिद्धि नहीं हो सकती। |
बृ० उ० ३—
३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| कर्मज्ञानकाण्डयोः प्रयोजनम्<br><br>तथानुमानादपि¹ । श्रुत्यात्मास्तित्वे लिङ्गस्य दर्शितत्वाल्लिङ्गस्य च प्रत्यक्षविषयत्वान्नेति चेन्न, जन्मान्तरसम्बन्धस्याग्रहणात् । आगमेन त्वात्मास्तित्वेऽवगते वेदप्रदर्शितलौकिकलिङ्गविशेषैश्च तदनुसारिणो मीमांसकास्तार्किकाश्च अहम्प्रत्ययलिङ्गानि च वैदिकान्येव स्वमतिप्रभवाणीति कल्पयन्तो वदन्ति प्रत्यक्षश्चानुमेयश्चात्मेति ।<br><br>सर्वथाप्यस्त्यात्मा देहान्तरसम्बन्धीत्येवं प्रतिपत्तुर्देहान्तरगतेष्टा- | इसी प्रकार अनुमानसे भी [ आत्माका अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता ]¹ । यदि कहो कि श्रुतिने आत्माके अस्तित्वमें लिङ्ग² ( बीज ) दिखलाया है और लिङ्ग प्रत्यक्षप्रमाणका विषय होता है, इसलिये आत्मा [ प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाणका भी विषय है ] केवल आगमका ही विषय नहीं है—तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि जन्मान्तरके सम्बन्धका किसी अन्य प्रमाणसे ग्रहण नहीं होता । आगमप्रमाणसे तथा वेदोक्त लौकिक लिङ्गविशेषोंके द्वारा आत्माका अस्तित्व जान लेनेपर ही उसीका अनुसरण करनेवाले मीमांसक और नैयायिक वैदिक अहंंप्रतीति और वैदिक लिङ्गोंको ही ‘ये हमारी बुद्धिसे निकले हुए तर्क हैं’ ऐसी कल्पना करते हुए कहते हैं कि ‘आत्मा प्रत्यक्ष और अनुमानका भी विषय है’ ।<br><br>सब प्रकार देहान्तरसे सम्बन्ध रखनेवाला आत्मा है—ऐसा जाननेवाले तथा देहान्तरगत इष्टप्राप्ति और |
१. अनुमानका स्वरूप यों है—इच्छा आदि किसीके आश्रित होते हैं; क्योंकि वे गुण हैं, जैसे रूप आदि । इस प्रकारके अनुमानद्वारा इच्छादिके आश्रयरूपसे भी आत्माका अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि इच्छादिका अधिष्ठान मन ही प्रसिद्ध है, मनसे अतिरिक्त इच्छादिकी उपलब्धि नहीं होती ।
२. 'यः प्राणेन प्राणिति' इत्यादि श्रुतिके अनुसार प्राणनादि व्यापार ही आत्माके अस्तित्वमें लिङ्ग है ।