बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण ५] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७१५
| ब्राह्मण ५] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७१५ |
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| विक्याविद्यया ब्रह्मस्वरूपं रज्जुशुक्तिकागगनस्वरूपवदेव स्वेन रूपेण वर्तमानं केनचिदस्पृष्टस्वभावमपि सत्—नामरूपकृतकार्यकरणोपाधिभ्यो विवेकेन नावधार्यते, नामरूपोपाधिदृष्टिरेव च भवति स्वाभाविकी, तदा सर्वोऽयं वस्त्वन्तरास्तित्वव्यवहारः। | रज्जु, शुक्ति और आकाशके स्वरूपके समान किसीसे भी अछूते स्वभाववाला होकर अपने निजरूपसे विद्यमान रहते हुए भी ब्रह्मके स्वरूपका स्वाभाविकी अविद्याके कारण नामरूपजनित देहेन्द्रियरूप उपाधिसे अलग करके निश्चय नहीं किया जाता और स्वाभाविकिकी नाम-रूप उपाधिकी ही दृष्टि रहती है, उस समय यह ब्रह्मसे भिन्न वस्तुकी सत्तासे सम्बन्ध रखनेवाला सारा व्यवहार रहता है। | | अस्ति चायं भेदकृतो मिथ्याव्यवहारः, येषां ब्रह्मतत्त्वादअन्यत्वेन वस्तु विद्यते, येषां च नास्ति; परमार्थवादिभिस्तु श्रुत्यनुसारेण निरूप्यमाणे वस्तुनि—किं तत्त्वतोऽस्ति वस्तु किं वा नास्तीति, ब्रह्मैकमेवाद्वितीयं सर्वसंव्यवहारशून्यमिति निर्धार्यते; तेन न कश्चिद् विरोधः। | तथा यह भेदकृत मिथ्या व्यवहार तो, जिनकी दृष्टिमें ब्रह्मतत्त्वसे भिन्न वस्तु है और जिनकी दृष्टिमें नहीं है, उन दोनों को ही रहता है; किंतु जो परमार्थवादी हैं वे, कौन-सी वस्तु तत्त्वतः हे और कौन-सी नहीं है-इस प्रकार श्रुतिके अनुसार वस्तुका निरूपण किये जानेपर, यही निश्चय करते हैं कि सम्पूर्ण व्यवहारसे रहित एक अद्वितीय ब्रह्म ही सत्य है; इसलिये उनका व्यवहार रहनेमें भी कोई विरोध नहीं है। | | न हि परमार्थावधारणनिष्ठायां वस्त्वन्तरास्तित्वं प्रतिपद्यामहे—"एकमेवाद्वितीयम्" "अनन्तरमबाह्यम्" (बृ० उ० २।५।१९) | हम परमार्थनिश्चयकी निष्ठामें किसी अन्य वस्तुकी सत्ता स्वीकार नहीं करते, जैसा कि "एक ही अद्वितीय ब्रह्म है" "वह अन्तर बाह्यशून्य है" इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध |
७१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ७१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| इति श्रुतेः। न च नामरूपव्यवहारकाले त्वविवेकिनां क्रियाकारकफलादिसंव्यवहारो नास्तीति प्रतिषिध्यते। तस्माज्ज्ञानाज्ञाने अपेक्ष्य सर्वः संव्यवहारः शास्त्रीयो लौकिकश्च; अतो न काचन विरोधशङ्का। सर्ववादिनामप्यपरिहार्यः परमार्थसंव्यवहारकृतो व्यवहारः। | होता है और नाम-रूप व्यवहारकालमें अविवेकियोंकी दृष्टिमें भी क्रिया, कारक और फलादिका सम्यक् व्यवहार नहीं होता—ऐसा प्रतिषेध भी नहीं किया जाता। अतः शास्त्रीय और लौकिक सारा ही व्यवहार ज्ञान और अज्ञानकी अपेक्षासे हे; इसलिये इसमें विरोधकी कोई शङ्का नहीं हो सकती। परमार्थ और संव्यवहारकृत व्यवहार तो सभी वादियोंके लिये अपरिहार्य है। |
| तत्र परमार्थात्मस्वरूपमपेक्ष्य- <br><br> प्रश्नः पुनः—कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तर इति। | अब, पारमार्थिक आत्मस्वरूपकी अपेक्षासे ही पुनः प्रश्न किया जाता है, 'हे याज्ञवल्क्य ! वह सर्वान्तर आत्मा कौन-सा है?' |
| (परमार्थात्मस्वरूपनिरूपणम्) <br><br> प्रत्याहेतरः—योऽशनायापिपासे, अशितुमिच्छाशनाया, पातुमिच्छा पिपासा; ते अशनायापिपासे योऽत्येतीति वक्ष्यमाणेण सम्बन्धः, अविवेकिभिस्तलमलवदिव गगनं गम्यमानमेव तलमले अत्येति परमार्थतः; ताभ्यामसंस्पृष्टस्वभावत्वात्। तथा | इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—'जो अशनाया-पिपासा—अशनकी इच्छा अशनाया है और पीनेकी इच्छा पिपासा—उन अशनाया और पिपासाको जो अतिक्रमण किये हुए है—इस प्रकार इसका आगेसे सम्बन्ध है; अविवेकी पुरुष आकाशको तलमलादियुक्त मानते हैं, तो भी वस्तुतः वह उनसे अछूते स्वभाववाला होनेके कारण तलमलको अतिक्रमण किये हुए है। इसी प्रकार |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७१७ |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७१७ |
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| मूढैः अशनायापिपासादिमद्ब्रह्म गम्यमानमपि क्षुधितोऽहं पिपासितोऽहमिति, ते अत्येत्येव परमार्थतः । ताभ्यामसंस्पृष्टस्वभावत्वात्; "न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः" (क० उ० २ । २ । ११) इति श्रुतेः—अविद्वल्लोकाध्यारोपितदुःखेनेत्यर्थः । प्राणैकधर्मत्वात् समासकरणमशनायापिपासयोः ।<br><br>शोकं मोहम्—शोक इति कामः; इष्टं वस्तूद्दिश्य चिन्तयतो यदरमणम्, तत्तृष्णाभिभूतस्य कामबीजम्; तेन हि कामो दीप्यते; मोहस्तु विपरीतप्रत्ययप्रभवोऽविवेको भ्रमः, स चाविद्या सर्वस्यानर्थस्य प्रसवबीजम्; भिन्नकार्यत्वात्तयोः शोकमोहयोरसमासकरणम् । तौ | यद्यपि मूढलोग 'मैं भूखा हूँ, मैं प्यासा हूँ, ऐसा मानकर ब्रह्मको भूख-प्याससे युक्त समझते हैं तो भी उनसे असंस्पृष्ट स्वभाववाला होनेके कारण वह परमार्थतः उनका अतिक्रमण ही किये हुए है; इस विषयमें "वह लोकदुःखसे लिप्त नहीं होता, उससे बाह्य है" ऐसी श्रुति भी है। तात्पर्य यह है कि वह अविद्वान् पुरुषोंद्वारा आरोपित दुःखसे लिप्त नहीं होता। एक प्राणके ही धर्म होनेके कारण 'अशनाया' और 'पिपासा' पदोंका समास किया गया है।<br><br>'शोकं मोहम्' इनमें शोक यह काम है; इष्ट वस्तुके लिये चिन्तन करनेवालेका जो अरमण (खेद) है, वह तृष्णाभिभूत पुरुषके कामका बीज होता है; क्योंकि उससे काम उत्तेजित होता है; मोह विपरीत प्रतीतिसे होनेवाला अविवेक यानी भ्रम है; यही समस्त अनर्थोंकी उत्पत्तिकी बीजभूता अविद्या है;¹ शोक और मोहके कार्य भिन्न हैं, इसलिये इनका समास नहीं किया गया। |
१ योगदर्शनमें अविद्याका लक्षण इस प्रकार किया है—'अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या' अर्थात् अनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्मामें नित्य, शुचि, सुख और आत्मबुद्धि होना अविद्या है—यही विपरीत प्रतीति है।
७१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ७१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| मनोऽधिकरणौ; तथा शरीराधिकरणौ जरां मृत्युं चात्येति; जरेति कार्यकरणसङ्घातविपरिणामो वलीपालितादिलिङ्गः; मृत्युरिति तद्विच्छेदो विपरिणामावसानः; तौ जरामृत्यू शरीराधिकरणावत्येति । | इन दोनोंका अधिकरण मन है, इनको तथा शरीर जिनका अधिकरण है, उन जरा और मृत्युको भी आत्मा अतिक्रमण किये हुए है। जरा—यह देहेन्द्रियसङ्घातका विपरिणाम है, झुर्रियाँ पड़ जाना, बाल पक जाना आदि इसके चिह्न हैं तथा मृत्यु शरीरका विच्छेद और विपरिणामका अन्त हो जाना है; उन शरीररूप अधिकरणवाले जरामृत्युका वह अतिक्रमण किये हुए है। | | ये तेऽशनायादयः प्राणमनःशरीराधिकरणा प्राणिष्वनवरतं वर्तमाना अहोरात्रादिवत् समुद्रोर्मिवच्च प्राणिषु संसार इत्युच्यन्ते, योऽसौ दृष्टेर्द्रष्टेत्यादिलक्षणः साक्षादव्यवहितोऽपरोक्षादगौणः सर्वान्तर आत्मा ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानां भूतानामशनायापिपासादिभिः संसारधर्मैः सदा न स्पृश्यते; आकाश इव घनादिमलैः । | ये जो प्राण, मन और शरीररूप अधिकरणवाले तथा प्राणियोंमें दिन-रात और समुद्रकी तरङ्गोंके समान निरन्तर रहनेवाले क्षुधादि धर्म हैं, वे ही प्राणियोंमें 'संसार' इस नामसे कहे जाते हैं; किंतु यह जो दृष्टिका द्रष्टा आदि लक्षणोंवाला, साक्षात्—अव्यवहित और अपरोक्ष—अगौण सर्वान्तर—ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त भूतोंका आत्मा है, वह मेघादि मलोंसे आकाशके समान कभी संसारधर्मोंसे स्पर्श नहीं किया जाता। | | [विदुषो व्युत्थान-निरूपणम्]<br>तमेतं वै आत्मानं स्वं तत्त्वं विदित्वा ज्ञात्वा अयमहमस्मि परं ब्रह्म सदा सर्वसंसारविनिर्मुक्तं नित्य- | उस इस आत्मा—स्वरूपको यह सर्वदा सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे रहित नित्यतृप्त परब्रह्म मैं हूँ—ऐसा जानकर ब्राह्मणलोग—क्योंकि |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७१९ |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७१९ |
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| संस्कृत मूल / भाष्य | भाष्यार्थ |
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| वृत्तामिति, ब्राह्मणाः ब्राह्मणानाम् एवाधिकारो व्युत्थाने, अतो ब्राह्मणग्रहणम्, व्युत्थाय वैपरीत्येन उत्थानं कृत्वा; कुत इत्याह— | व्युत्थान (संन्यास) में ब्राह्मणोंका ही अधिकार है, इसलिये यहाँ ‘ब्राह्मण’ पद ग्रहण किया गया है— ‘व्युत्थाय’ विपरीतभावसे उत्थान करके, कहाँसे उत्थान करके ? सो बताते हैं— |
| पुत्रैषणायाः पुत्रार्थैषणा पुत्रैषणा—पुत्रेणेमं लोकं जयेयमिति लोकजयसाधनं पुत्रं प्रतीच्छा—एषणा दारसङ्ग्रहः । दारसङ्ग्रहमकृत्वेत्यर्थः— | पुत्रैषणासे, पुत्रके लिये जो एषणा (इच्छा) होती है, उसे पुत्रैषणा कहते हैं—मैं पुत्रके द्वारा यह लोक जीतूँगा, इसलिये लोकजयके साधन पुत्रके प्रति जो इच्छा होती है वही पुत्रैषणा है; यहाँ ‘एषणा’ से स्त्रीपरिग्रह लक्षित होता है। भाव यह कि स्त्रीसंग्रह न करके— |
| वित्तैषणायाश्च—कर्मसाधनस्य गवादेरुपादानम्—अनेन कर्म कृत्वा पितृलोकं जेष्यामीति, विद्यासंयुक्तेन वा देवलोकम्, केवलया वा हिरण्यगर्भविद्यया दैवेन वित्तेन देवलोकम् । | तथा वित्तैषणासे उत्थान करके, कर्मके साधनभूत गौ आदि मानुष-वित्तको इस भावसे ग्रहण करना कि इसके द्वारा कर्म करके मैं पितृलोकपर विजय प्राप्त करूँगा अथवा विद्यासंयुक्त कर्मसे देवलोक या केवल हिरण्यगर्भविद्यारूप देववित्तसे देवलोक प्राप्त करूँगा, [ इसका नाम वित्तैषणा है ] । |
| दैवाद् वित्ताद् व्युत्थानमेव नास्तीति केचित्, यस्मात्तद्बलेन हि किल व्युत्थानमिति; तदसत्, “एतावान्वै कामः” (बृ० उ० १ । ४ । १७) इति | किन्हीं-किन्हींका मत है कि दैव-वित्तसे तो व्युत्थान होता ही नहीं, क्योंकि उसके बलसे ही तो व्युत्थान होता है; किंतु यह ठीक नहीं है, क्योंकि “एतावान्वै कामः” इस |
७२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ७२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| पठितत्वादेषणामध्ये दैवस्य वित्तस्य; हिरण्यगर्भादिदेवताविषयैव विद्या वित्तमित्युच्यते; देवलोकहेतुत्वात्; न हि निरुपाधिकप्रज्ञानघनविषया ब्रह्मविद्या देवलोकप्राप्तिहेतुः, “तस्मात्तत्सर्वमभवत्” (बृ०उ० १।४।१०) “आत्मा ह्येषां स भवति” (१।४।१०) इति श्रुतेः तद्बलेन हि व्युत्थानम्, “एतं वै तमात्मानं विदित्वा” (३।५।१) इति विशेषवचनात् । | श्रुतिद्वारा दैववित्तको एषणाके बीचमें ही पढ़ा गया है और हिरण्यगर्भादि देवताविषयिणी विद्या ही दैववित्त कही जाती है, क्योंकि वह देवलोकप्राप्तिकी हेतु है। निरुपाधिक प्रज्ञानघनविषयिणी ब्रह्मविद्या देवलोककी प्राप्तिकी हेतु नहीं है, जैसा कि “अतः वह सर्व हो गया” “वह इनका आत्मा ही हो जाता है” इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है। और व्युत्थान भी ब्रह्मविद्याके ही बलसे होता है, क्योंकि इस विषयमें “उस इस आत्माको जानकर” ऐसा विशेष वाक्य है। |
| तस्मात् त्रिभ्योऽप्येतेभ्योऽनात्मलोकप्राप्तिसाधनेभ्य एषणाविषयेभ्यो व्युत्थाय—एषणा कामः “एतावान् वै कामः” (१।४।१७) इति श्रुतेः— एतस्मिंस्त्रिविधेऽनात्मलोकप्राप्तिसाधने तृष्णामकृत्वेत्यर्थः । | अतः एषणाके विषयभूत इन तीनों ही अनात्मलोकप्राप्तिके साधनोंसे व्युत्थान करके—“निश्चय इतना ही काम है” इस श्रुतिके अनुसार एषणा कामका ही नाम है—तात्पर्य यह है कि अनात्मलोककी प्राप्तिके इस त्रिविध साधनमें तृष्णा न करके [भिक्षाचर्या करते हैं।] |
| सर्वा हि साधनेच्छा फलेच्छैव, (एषणात्रयस्यैकत्वम्) अतो व्याचष्टे श्रुतिः एकैव एषणेति; कथम् ? या ह्येव पुत्रैषणा सा | साधनसम्बन्धिनी सारी इच्छा फलेच्छा ही है, इसलिये श्रुति ऐसी व्याख्या करती है कि एक ही एषणा है; किस प्रकार?—जो भी पुत्रैषणा है, वही वित्तैषणा है; क्योंकि |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७२१ |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७२१ |
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| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| वित्तैषणा, दृष्टफलसाधनत्वतुल्यत्वात्; या वित्तैषणा सा लोकैषणा; फलार्थैव सा; सर्वः फलार्थप्रयुक्त एव हि सर्वं साधनमुपादत्ते; अत एकैव एषणा, या लोकैषणा सा साधनमन्तरेण सम्पादयितुं न शक्यत इति, साध्यसाधनभेदेन उभे हि यस्मादेते एषणे एव भवतः; तस्माद् ब्रह्मविदो नास्ति कर्म कर्मसाधनं वा।<br><br>अतो येऽतिक्रान्ता ब्राह्मणाः<br><br>[भिक्षाचर्यविधानम्]<br>सर्वं कर्म कर्मसाधनं च सर्वं देवपितृमानुषनिमित्तं यज्ञोपवीतादि; तेन हि दैवं पित्र्यं मानुषं च कर्म क्रियते, “निवीतं मनुष्याणाम्” इत्यादिश्रुतेः। तस्मात् पूर्वे ब्राह्मणा ब्रह्मविदो व्युत्थाय कर्मभ्यः कर्मसाधनेभ्यश्च यज्ञोपवीतादिभ्यः, परमहंसपारिव्राज्यं प्रतिपद्य, भिक्षाचर्यं चरन्ति | उनका दृष्ट फलमें साधन होना समान है; और जो वित्तैषणा है वही लोकैषणा है, क्योंकि वह फलके ही लिये है; सब लोग फलरूप प्रयोजनसे प्रेरित होकर ही सारे साधनोंको स्वीकार करते हैं; अतः एक ही एषणा है; जो लोकैषणा है, उसका साधनके बिना सम्पादन नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस प्रकार साध्य-साधन-भेदसे ये दोनों एषणाएं ही हैं; अतः ब्रह्मवेत्ताके लिये कर्म और कर्मका साधन दोनों ही नहीं हैं।<br><br>अतः जो पूर्ववर्ती ब्राह्मण थे, वे सम्पूर्ण कर्म और देव, पितृ एवं मनुष्यलोकसम्बन्धी यज्ञोपवीतादि सम्पूर्ण कर्मसाधनोंको [छोड़कर], क्योंकि उन्हींसे देव, पितृ और मनुष्यलोकसम्बन्धी कर्म किये जाते हैं, जैसा कि “मनुष्योंके लिये निवीत¹ [पितरोंके लिये प्राचीनावीत² और देवोंके लिये उपवीत³ है]” इस श्रुतिसे ज्ञात होता है। अतः पूर्ववर्ती ब्राह्मण—ब्रह्मवेत्तालोग कर्म और कर्मके साधन यज्ञोपवीतादिसे व्युत्थान कर परमहंस परिव्राजकभावको प्राप्त होकर भिक्षाचर्या करते हैं। |
१. जनेऊको मालाकी भाँति पहनना। २. जनेऊको अपसव्यभावसे अर्थात् दायें कन्धेपर पहनना। ३. जनेऊको सव्यभावसे यानी बायें कन्धेपर पहनना।
बृ० उ० ४६—
| ७२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
| ७२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ | | :--- | :--- |
| भिक्षार्थं चरणं भिक्षाचर्यम् चरन्ति त्यक्त्वा स्मार्तं लिङ्गं केवलम् आश्रममात्रशरणानां जीवनसाधनं पारिव्राज्यव्यञ्जकम्; विद्वाँल्लिङ्गवर्जितः—"तस्मादलिङ्गो धर्मज्ञोऽव्यक्तलिङ्गोऽव्यक्ताचारः" इत्यादिस्मृतिभ्यः, "अथ परिव्राड् विवर्णवासा मुण्डोऽपरिग्रहः" (जाबालोप० ५) इत्यादिश्रुतेः, "सशिखान् केशान्निकृत्य विसृज्य यज्ञोपवीतम्" (कठश्रुतिः १) इति च । | भिक्षाके लिये विचरना भिक्षाचर्या है, उसका चरण—आचरण करते हैं, जो केवल आश्रममात्रमें रहनेवालोंके जीवनका साधन और संन्यासका अभिव्यञ्जक है, उस [त्रिदण्डादि] स्मार्त चिह्नको त्याग कर भिक्षा करते हैं, बाह्य चिह्नोंसे रहित एवं विद्वान् होकर जैसा कि "इसलिये [यति] अलिङ्ग, धर्मज्ञ, अव्यक्तलिङ्ग और अव्यक्ताचार होता है" इत्यादि स्मृतियोंसे ज्ञात होता है तथा "परिव्राट् विवर्णवस्त्रयुक्त, मुण्डित और अपरिग्रह होता है" इत्यादि श्रुतिसे और "शिखाके सहित केशोंको काटकर यज्ञोपवीतको त्याग कर" इत्यादि वाक्यसे भी सिद्ध होता है। | | (व्युत्थानविधिराक्षिप्यते)<br>ननु 'व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति' इति वर्तमानापदेशादर्थवादोऽयम्; न विधायकः प्रत्ययः कश्चिच्छ्रूयते लिङ्ग्लोट्तव्यानाम् अन्यतमोऽपि। तस्मादर्थवादमात्रेण श्रुतिस्मृतिविहितानां यज्ञोपवीतादीनां साधनानां न शक्यते परित्यागः कारयितुम्; "यज्ञोपवीत्येवाधीयीत याजयेद्यजेत वा" | पूर्व०-किंतु 'व्युत्थान करके भिक्षाचर्या करते हैं' ऐसा वर्तमानकालिक प्रयोग होनेके कारण यह अर्थवाद ही है। लिङ्, लोट्, तव्य—इन विधिसूचक प्रत्ययोंमेंसे तो यहाँ किसीका भी श्रवण नहीं है; अतः केवल अर्थवादके ही कारण श्रुतिस्मृतिविहित यज्ञोपवीतादि साधनोंमेंसे किसीका भी त्याग नहीं कराया जा सकता; "यज्ञोपवीतीको ही अध्ययन, याजन अथवा यजन |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ७२३
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ७२३
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| पारिव्राज्ये तावदध्ययनं विहितम्—“वेदसंन्यसनाच्छूद्रस्तस्माद् वेदं न संन्यसेत्” इति । “स्वाध्याय एवोत्सृज्यमानो वाचम्” इति च आपस्तम्बः । “ब्रह्मोज्झं वेदनिन्दा च कौटसाक्ष्यं सुहृद्वधः । गर्हितान्नाद्ययोर्जग्धिः सुरापानसमानि षट् ॥” इति वेदपरित्यागे दोषश्रवणात् । “उपासने गुरूणां वृद्धानामतिथीनां होमे जप्यकर्मणि भोजन आचमने स्वाध्याये च यज्ञोपवीती स्यात्” इति परिव्राजकधर्मेषु च गुरूपसनस्वाध्यायभोजनाचमनादीनां कर्मणां श्रुतिस्मृतिषु कर्तव्यतया चोदितत्वाद् गुर्वाद्युपासनाङ्गत्वेन यज्ञोपवीतस्य विहितत्वात् तत्परित्यागो नैवावगन्तुं शक्यते । यद्यप्येषणाभ्यो व्युत्थानं विधीयत एव, तथापि पुत्राद्येषणाभ्यस्तिसृभ्य एव व्युत्थानं न तु सर्वस्मात् कर्मणः कर्मसाधनाच्च व्युत्थानम् | करना चाहिये।” पारिव्राज्यमें भी अध्ययन तो विहित है ही; “वेदका त्याग करनेसे शूद्र हो जाता है, इसलिये वेदका त्याग न करे।” आपस्तम्बने भी कहा है, “वाणीका त्याग करनेवालेको केवल स्वाध्याय ही करना चाहिये।” तथा “वेदका त्याग, वेदकी निन्दा, कूट-साक्ष्य, मित्रका वध तथा गर्हित अन्न और भक्ष्य भोजन करना—ये छः सुरापानके समान हैं” इस प्रकार वेदत्यागमें दोष सुना गया है। “गुरु, वृद्ध और अतिथियोंकी उपासनामें, होममें, जपकर्ममें, भोजनमें, आचमनमें और स्वाध्यायमें यज्ञोपवीती होना चाहिये।” इस प्रकार श्रुति और स्मृतियोंमें परिव्राजकोंके धर्मोंमें भी गुरुकी उपासना, भोजन और आचमन आदि कर्मोंका कर्तव्यरूपसे विधान किया गया है, इसलिये गुरु आदिकी उपासनाके अङ्गरूपसे यज्ञोपवीतका विधान होनेके कारण उसका परित्याग उचित नहीं माना जा सकता, यद्यपि एषणाओंसे व्युत्थान करनेका विधान है ही, तथापि पुत्रादि तीन ही एषणाओंसे व्युत्थान करना चाहिये, सारे ही कर्म और कर्मसाधनोंसे व्युत्थान करनेकी आवश्यकता नहीं |
७२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ७२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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| सर्वपरित्यागे चाश्रुतं कृतं स्यात् श्रुतं च यज्ञोपवीतादि हापितं स्यात्; तथा च महानपराधो विहिताकरणप्रतिषिद्धाचरणनिमित्तः कृतः स्यात्; तस्माद् यज्ञोपवीतादिलिङ्गपरित्यागोऽन्धपरम्परैव । <br><br> उक्ताक्षेपनिरासः<br> न; “यज्ञोपवीतं वेदांश्च सर्वं तद् वर्जयेद्यतिः” (कठश्रुतिः ४) इति श्रुतेः । अपि च आत्मज्ञानपरत्वात् सर्वस्या उपनिषदः—आत्मा द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्य इति हि प्रस्तुतम्; स चात्मैव साक्षादपरोक्षात् सर्वान्तरः अशनायादिसंसारधर्मवर्जित इत्येवं विज्ञेय इति तावत् प्रसिद्धम् । सर्वा हीयमुपनिषद् एवम्परेति विध्यन्तरशेषत्वं तावन्नास्ति, अतो नार्थवादः, आत्मज्ञानस्य कर्तव्यत्वात्; आत्मा च अशनायादिधर्मवान्न भवतीति साधनफलविलक्षणो ज्ञातव्यः, अतो- | है। सबका परित्याग करनेपर तो अविहितका अनुष्ठान और यज्ञोपवीतादि विहितका परित्याग हो जायगा। और इस प्रकार तो विहितका पालन न करने और निषिद्ध कर्मका आचरण करनेके कारण महान् अपराध हो जायगा। अतः यज्ञोपवीतादि लिङ्गोंका परित्याग अन्धपरम्परा ही है। <br><br> सिद्धान्ती— ऐसी बात नहीं है, क्योंकि “यति यज्ञोपवीत एवं वेद इन सभीका त्याग कर दे” ऐसी श्रुति है। इसके सिवा सारी उपनिषदें भी आत्मज्ञानपरक ही हैं—और 'आत्मा साक्षात् करनेयोग्य, श्रवण करनेयोग्य एवं मनन करने योग्य है' इस प्रकार आत्मज्ञानका उपक्रम किया गया है; तथा यह भी प्रसिद्ध ही है कि वह आत्मा ही साक्षात्, अपरोक्ष, सर्वान्तर और क्षुधादि संसारधर्मोंसे रहित है—इस प्रकार जानना चाहिये। इस सारी उपनिषद्का तात्पर्य इसीमें है, यह किसी दूसरी विधिके शेषभूत नहीं है, इसलिये अर्थवाद नहीं है; क्योंकि आत्मज्ञान तो कर्तव्य है और आत्मा क्षुधादि धर्मोंवाला है नहीं, इसलिये उसे साधन और फलसे विलक्षण ही |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७२५
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७२५
| संस्कृत | हिन्दी |
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| ऽव्यतिरेकेणात्मनो ज्ञानमविद्या—"अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद" (बृ० उ० १।४।१०) "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति" (४।४।१९) "एकधैवानुद्रष्टव्यम्" (४।४।२०) "एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।१) "तत्त्वमसि" (छा० उ० ६।८—१६) इत्यादिश्रुतिभ्यः। क्रियाफलं साधनं च अशनायादिसंसारधर्मातीतादात्मनोऽन्यदविद्याविषयम्—"यत्र हि द्वैतमिव भवति" (बृ० उ० २।४।१४) "अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद" (१।४।१०) "अथ येऽन्यथातो विदुः" (छा० उ० ७।२५।२) इत्यादिवाक्यशतेभ्यः। | समझना चाहिये। अतः आत्माको इनसे अविलक्षणरूपसे जानना ही अविद्या है; जैसा कि "यह ब्रह्म अन्य है और मैं अन्य हूँ—ऐसा जो जानता है वह नहीं जानता", "जो यहाँ नानावत् देखता है, वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है", "निरन्तर एकरूपसे ही देखना चाहिये", "एक ही अद्वितीय ब्रह्म है", "वह तू है" इत्यादि श्रुतियोंसे विदित होता है। कर्मफल और उसके साधन तो क्षुधादि सांसारिक धर्मोंसे अतीत आत्मासे भिन्न अविद्याके अन्तर्गत हैं; जैसा कि "जहाँ द्वैत-सा होता है" "यह अन्य है, मैं अन्य हूँ—ऐसा जो जानता है, वह नहीं जानता", "और जो इससे अन्य प्रकारसे जानते हैं" इत्यादि सैकड़ों श्रौत वाक्योंसे सिद्ध होता है। |
| न च विद्याविद्ये एकस्य पुरुषस्य सह भवतः, विरोधात्—तमःप्रकाशविव; तस्मादात्मविदोऽविद्याविषयोऽधिकारो न द्रष्टव्यः क्रियाकारकफलभेदरूपः, मृत्योः | इसके सिवा एक ही पुरुषमें विद्या और अविद्या साथ-साथ रह नहीं सकतीं, क्योंकि उनमें अन्धकार और प्रकाशके समान परस्पर विरोध है; इसलिये आत्मवेत्ताका क्रिया, कारक और फलका भेदरूप अविद्या-विषयक अधिकार नहीं देखना |
| ७२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
| ७२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| स मृत्युमाप्नोति' इत्यादिनान्निन्दितत्वात्; सर्वक्रियासाधनफलानां चाविद्याविषयाणां तद्विपरीतात्मविद्यया हातव्यत्वेनेष्टत्वात्, यज्ञोपवीतादिसाधनानां च तद्विषयत्वात् ।<br><br>तस्मात्साधनफलस्वभावादात्मनोऽन्यविषया विलक्षणैषणा । उभे ह्येते साधनफले एषणे एव भवतः, यज्ञोपवीतादेस्तत्साध्यकर्मणां च साधनत्वात्, ‘उभे ह्येते एषणे एव’ इति हेतुवचनेनावधारणात् । यज्ञोपवीतादिसाधनात् तत्साध्येभ्यश्च कर्मभ्योऽविद्याविषयत्वाद् एषणारूपत्वाच्च जिहासितव्यरूपत्वाच्च व्युत्थानं विधित्सितमेव ।<br><br>(व्युत्थानश्रुतेः विद्यास्तुत्यर्थत्वमाशङ्क्यते) ननु उपनिषद आत्मज्ञानपरत्वाद् व्युत्थानश्रुतिः तत्स्तुत्यर्था, न विधिः । | चाहिये, क्योंकि 'वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है' इत्यादि रूपसे उसकी निन्दा की गयी है; तथा अविद्याके विषयभूत सम्पूर्ण क्रिया, साधन और फल उससे विपरीत आत्मविद्याद्वारा हेयरूपसे इष्ट हैं, एवं यज्ञोपवीतादि साधन भी उस (अविद्या) के विषय हैं।<br><br>अतः जो साधन और फलसे भिन्न स्वभाववाला है, उस आत्मासे एषणा भिन्नविषयीणी एवं विलक्षण है। ये साधन और फल दोनों एषणाएँ ही हैं, यज्ञोपवीतादि और उनसे साध्य कर्म भी साधन ही हैं; (अतः वे भी एषणाएँ हैं) क्योंकि 'ये (साध्य और साधन) दोनों एषणाएँ ही हैं'—इस हेतुसूचक वाक्यसे यही निश्चय किया गया है। अतः यज्ञोपवीतादि साधनसे और उससे साध्य कर्मोंसे व्युत्थानका विधान करना अभीष्ट ही है, क्योंकि वे अविद्याके विषय एवं एषणारूप हैं और इनका त्याग ही अभीष्ट है।<br><br>पूर्व०—किंतु उपनिषदें तो आत्मज्ञानपरक हैं, इसलिये व्युत्थानश्रुति उसकी स्तुतिके लिये है, वह विधि नहीं है। |
ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७२७
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७२७ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| न; विधित्सितविज्ञानेन समानकर्तृकत्वश्रवणात्।<br><br>(तन्निरसनम्)<br>न हि अकर्तव्येन कर्तव्यस्य समानकर्तृकत्वेन वेदे कदाचिदपि श्रवणं सम्भवति; कर्तव्यानामेव हि अभिषवहोमभक्षाणां यथा श्रवणम्, अभिषुत्य हुत्वा भक्षयन्तीति, तद्वदात्मज्ञानैषणाव्युत्थानभिक्षाचर्याणां कर्तव्यानामेव समानकर्तृकत्वश्रवणं भवेत्। | **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जिसकी विधि करनी अभीष्ट है, उस विज्ञानका और इसका श्रुतिने एक ही कर्ता बतलाया है। वेदमें अकर्तव्यके साथ कर्तव्यका समानकर्तृकरूपसे (अर्थात् वे दोनों एक ही कर्ताद्वारा कर्तव्य हैं—इस प्रकारसे) श्रवण होना कभी सम्भव नहीं है। जिस प्रकार सोम निकालना, हवन करना और भक्षण करना—इन कर्तव्यकर्मोंका ही ‘सोम निकालकर हवन करके भक्षण करते हैं’ इस प्रकार एककर्तृकरूपसे विधान किया गया है, उसी प्रकार आत्मज्ञान, एषणाव्युत्थान और भिक्षाचर्या—इन कर्तव्योंका ही समानकर्तृकत्व श्रवण होना सम्भव हो सकता है। |
| अविद्याविषयत्वादेषणात्वाच्च अर्थप्राप्त आत्मज्ञानविधेरेव यज्ञोपवीतादिपरित्यागः, न तु विधातव्य इति चेत् ! | यदि कहो कि अविद्याका विषय और एषणारूप होनेके कारण यज्ञोपवीतादिका परित्याग तो आत्मज्ञानकी विधिसे ही स्वतः प्राप्त हो जाता है, उसके लिये विधि करनेकी आवश्यकता नहीं है—तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, |
| न, सुतरामात्म नविधिनेव विहितस्य समानकर्तृकत्वश्रवणेन | क्योंकि जिस प्रकार आत्मज्ञानकी विधिसे ही विहित व्युत्थानका उसी कर्ताके द्वारा कर्तव्यत्व श्रवण होनेसे और भी पुष्टि हो जाती है, उसी प्रकार ऐसी विधि |
७२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ७२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| दार्ढ्योपपत्तिः, तथा भिक्षाचर्यस्य च। | करनेसे भिक्षाचर्याकी भी दृढ़ता होती है; | | यत् पुनरुक्तं वर्तमानापदेशादर्थवादमात्रमिति— | और ऐसा जो कहा कि वर्तमानकालिक प्रयोग होनेसे यह केवल अर्थवादमात्र है, सो यह ठीक नहीं, क्योंकि (औदुम्बरो यूपो भवति—ऐसी) औदुम्बरयूपादिसम्बन्धी विधिके समान होनेके कारण यह भी निर्दोष है। | | न, औदुम्बरयूपादिविधिसमानत्वाददोषः। | | | विद्वदविद्वत्संन्यास-विवेचनम्<br>‘व्युत्थाय भिक्षाचर्यं चरन्ति’ इत्यनेन पारिव्राज्यं विधीयते, पारिव्राज्याश्रमे च यज्ञोपवीतादिसाधनानि विहितानि, लिङ्गं च श्रुतिभिः स्मृतिभिश्च। अतस्तद् वर्जयित्वा अन्यस्माद् व्युत्थानम् एषणात्वेऽपीति चेत् ? | पूर्व०—'व्युत्थाय भिक्षाचर्यं चरन्ति' इस वाक्यसे संन्यासका विधान किया जाता है और संन्यासाश्रममें श्रुति-स्मृतियोंद्वारा यज्ञोपवीतादि साधन एवं (त्रिदण्डादि) लिङ्गका विधान किया गया है। अतः एषणा होनेपर भी इन्हें छोड़कर अन्य एषणाओंसे ही व्युत्थान करना चाहिये ऐसा कहें तो ? | | न, विज्ञानसमानकर्तृकात् पारिव्राज्यादेषणाव्युत्थानलक्षणात् पारिव्राज्यान्तरोपपत्तेः; यदि तदेषणाभ्यो व्युत्थानलक्षणं पारिव्राज्यं तदात्मज्ञानाङ्गम्, आत्मज्ञान- | **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है क्योंकि विज्ञानका जो कर्ता है, उसीके द्वारा किये जानेवाले एषणाव्युत्थानरूप संन्याससे भिन्न प्रकारका भी संन्यास होना सम्भव है। यह जो एषणाओंसे ऊपर उठनारूप संन्यास है; वह आत्मज्ञानका अङ्ग है, क्योंकि यह |
१. इस वाक्यमें 'भवति' क्रिया वर्तमानकालिक होनेपर भी इसका 'गूलरका यूप होना चाहिये' ऐसा विधिपरक अर्थ किया जाता है।
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७२९
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७२९
| संस्कृत (मूल/भाष्य) | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| विरोध्येषणापरित्यागरूपत्वात्; अविद्याविषयत्वाच्चैषणायाः; तद्व्यतिरेकेण चास्त्याश्रमरूपं पारिव्राज्यं ब्रह्मलोकादिफलप्राप्तिसाधनम्, यद्विषयं यज्ञोपवीतादिसाधनविधानं लिङ्गविधानं च। | आत्मज्ञानकी विरोधिनी एषणाओंका परित्यागरूप है; कारण, एषणाएँ तो अविद्याका विषय हैं; उक्त संन्याससे भिन्न आश्रमरूप संन्यास ब्रह्मलोकादि फलकी प्राप्तिका साधन-भूत है, जिसके विषयमें कि यज्ञोपवीतादि साधन और लिङ्गोंका विधान किया गया है। |
| न च एषणारूपसाधनोपादानस्य आश्रमधर्ममात्रेण पारिव्राज्यान्तरे विषये सम्भवति सति, सर्वोपनिषद्विहितस्य आत्मज्ञानस्य बाधनं युक्तम्, यज्ञोपवीताद्यविद्याविषयैषणारूपसाधनोपादित्सायां चावश्यम् असाधनफलरूपस्य अशनायादिसंसारधर्मवर्जितस्य अहं ब्रह्मास्मि, इति विज्ञानं बाध्यते; न च तद्बाधनं युक्तम्, सर्वोपनिषदां तदर्थपरत्वात्। | तथा अन्य प्रकारके संन्यासमें आश्रमधर्ममात्रसे एषणारूप साधनोंका ग्रहण सम्भव है—इतनेहीसे सम्पूर्ण उपनिषदोंद्वारा प्रतिपाद्य आत्मज्ञानका बाध होना उचित नहीं है, यज्ञोपवीतादि अविद्याविषयक एषणारूप साधनोंको ग्रहण करनेकी इच्छा रहनेपर तो इस असाधन-फलरूप एवं क्षुधादि सांसारिक धर्मोंसे रहित आत्माके 'मैं ब्रह्म हूँ' विज्ञानका अवश्य बाध हो जायगा; और उसका बाध होना उचित नहीं है; क्योंकि समस्त उपनिषदोंका तात्पर्य उसीमें है। |
| 'भिक्षाचर्यं चरन्ति' इत्येषणां ग्राहयन्ती श्रुतिः स्वयमेव बाधत इति चेत्? अथापि स्यादेषणाभ्यो व्युत्थानं विधाय पुनरेषण- | पूर्व०-किंतु 'भिक्षाचर्यं चरन्ति' यह एषणाको ग्रहण करानेवाली श्रुति तो स्वयं ही उसका बाध कर रही है। तात्पर्य यह है कि यदि यह मान भी लिया जाय तो भी एषणाओंसे व्युत्थानका विधान करके श्रुति एषणाके ही एक देश |
७३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ७३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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| कदेशं भिक्षाचर्यं ग्राहयन्ती तत्स- | भिक्षाचर्याका ग्रहण करानेके कारण उससे सम्बद्ध अन्य एषणाओं- | | म्बद्धमन्यदपि ग्राहयतीति चेत् ? | का भी ग्रहण कराती ही है—यदि ऐसा कहें तो ! | | न, भिक्षाचर्यस्याप्रयोजकत्वाद् | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि हवनके पश्चात् भोजन | | हुत्वोत्तरकालभक्षणवत्। शेषप्रति- | करनेके समान भिक्षाचर्या किसी फलकी प्रयोजिका नहीं है, हवनके | | पत्तिकर्मत्वादप्रयोजकं हि तत्; | पश्चात् भोजन कराना भी शेषप्रतिपत्तिकर्म होनेके कारण किसी | | असंस्कारकत्वाच्च—भक्षणं पुरुष- | फलका प्रयोजक नहीं है; इसके सिवा संस्कार न करनेवाली होनेसे | | संस्कारकमपि स्यात्, न तु | भी भिक्षाचर्या प्रयोजिका नहीं है, हुतशेषका भक्षण तो पुरुषके संस्कार- | | भिक्षाचर्यम्; नियमादृष्टस्यापि | का हेतु भी होता है, किंतु भिक्षाचर्या वैसी भी नहीं है; क्योंकि नियमविधिजनित अदृष्ट भी ब्रह्म- | | ब्रह्मविदोऽनिष्टत्वात् । | वेत्ताको अनिष्ट ही है। | | नियमादृष्टस्यानिष्टत्वे किं | पूर्व०—यदि उसे नियमविधिजनित अदृष्ट इष्ट नहीं है तो भिक्षा- | | भिक्षाचर्येणेति चेत् ! | चर्याका क्या प्रयोजन है?—ऐसा कहें तो ? | | न, अन्यसाधनाद् व्युत्थानस्य | सिद्धान्ती—यह ठीक नहीं, क्योंकि अन्य साधनोंसे तो व्युत्थान करनेका विधान किया गया है। | | विहितत्वात् । तथापि किं तेनेति | इसपर भी यदि तुम कहो कि निष्क्रिय आत्मज्ञानसे सर्वनिवृत्ति तो हो ही जायगी फिर भिक्षा- | | चेत् ? यदि स्यात्, बाढमभ्यु- | चर्यासे क्या प्रयोजन है ? तो ठीक हे, यदि ऐसा हो जाय तो हम भी |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७३१ |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७३१ |
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| पगम्यते हि तत् । यानि पारिव्राज्येऽभिहितानि वचनानि "यज्ञोपवीत्येवाधीयीत" इत्यादीनि, तान्यविद्वत्पारिव्राज्यमात्रविषयाणीति परिहृतानि; इतरथा आत्मज्ञानबाधः स्यादिति ह्युक्तम्; "निराशिपमनारम्भं निर्ममस्कारमस्तुतिम् । अक्षीणं क्षीणकर्माणं तं देवा ब्राह्मणं विदुः" इति सर्वकर्माभावं दर्शयति स्मृतिर्विदुषः; "विद्वाँल्लिङ्गविवर्जितः" "तस्मादलिङ्गो धर्मज्ञः" इति च । तस्मात् परमहंसपारिव्राज्यमेव व्युत्थानलक्षणं प्रतिपद्येतात्मवित् सर्वकर्मसाधनपरित्यागरूपमिति ।<br><br>यस्मात् पूर्वे ब्राह्मणा एतमात्मानम् असाधनफलस्वभावं विदित्वा | उसे स्वीकार करते हैं।^१ संन्यासाश्रममें जो "यज्ञोपवीती होकर ही अध्ययन करे" इत्यादि वचन कहे गये हैं, वे केवल अविद्वत्संन्यासमात्रसे सम्बन्ध रखनेवाले हैं—ऐसा कहकर उनका परित्याग किया जा चुका है; और यह भी कहा गया है कि यदि ऐसा न मानेंगे [ उन्हें विद्वत्संन्याससम्बन्धी समझेंगे ] तो आत्मज्ञानका बाध हो जायगा ।<br>"जिसे किसी प्रकारकी कामना नहीं है, जो सब प्रकारके आरम्भसे शून्य तथा नमस्कार और स्तुतिसे रहित है, जो स्वयं अक्षीण है, किंतु जिसके कर्मोंका क्षय हो चुका है, उसे देवगण ब्राह्मण ( ब्रह्मवेत्ता ) मानते हैं" यह स्मृति विद्वान्के समस्त कर्मोंका अभाव दिखाती है। तथा "विद्वान् लिङ्गरहित होता है" "अतः वह लिङ्गरहित और धर्मज्ञ होता है" इत्यादि वचन भी यही दिखलाते हैं। अतः आत्मवेत्ताको समस्त कर्म साधनोंके परित्यागरूप व्युत्थानलक्षण परमहंस पारिव्राज्यका ही आश्रय लेना चाहिये।<br><br>क्योंकि पूर्ववर्ती ब्राह्मण ( ब्रह्मज्ञ ) लोग इस असाधनफलस्वभाव आत्माको |
१. तथापि क्षुधादिकी निवृत्तिके लिये भिक्षाटनादिकी कर्तव्यता प्राप्त होनेके कारण उसकी विधि सार्थक ही है।
७३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ७३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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| सर्वस्मात्साधनफलस्वरूपादेषणा- | जानकर एषणालक्षण साधन और | | लक्षणाद् व्युत्थाय भिक्षाचर्यं | फलस्वरूप समस्त विषयोंसे ऊपर | | चरन्ति स्म, दृष्टादृष्टार्थं कर्म | उठकर अर्थात् दृष्ट और अदृष्ट फल- | | तत्साधनं च हित्वा, तस्माद् | वाले सम्पूर्ण कर्म और उसके | | अद्यत्वेऽपि ब्राह्मणो ब्रह्मवित् | साधनको छोड़कर भिक्षाचर्या | | पाण्डित्यं पण्डितभावम्, एतदा- | करते थे, इसलिये इस समय भी | | त्मविज्ञानं पाण्डित्यम्, निर्विद्य | ब्राह्मण यानी ब्रह्मवेत्ता पाण्डित्य— | | निःशेषं विदित्वा आत्मविज्ञानं | पण्डितभावको—यह आत्मज्ञान ही | | निरवशेषं कृत्वेत्यर्थः— | पाण्डित्य है, इसे निर्विद्य—निःशेष- | | आचार्यत आगमतश्च, एषणाभ्यो | तया जानकर अर्थात् आचार्य और | | व्युत्थाय—एषणाव्युत्थानाव- | शास्त्रसे पूर्णतया आत्मज्ञान सम्पा- | | सानमेव हि तत् पाण्डित्यम् | दन करके एषणाओंसे व्युत्थान कर, | | एषणातिरस्कारोद्भवत्वादेषणावि- | क्योंकि उस पाण्डित्यका पर्यवसान | | रुद्धत्वात्; एषणामतिरस्कृत्य न | एषणाओंसे व्युत्थान करनेमें ही है, | | ह्यात्मविषयस्य पाण्डित्यस्योद्भव | कारण, वह एषणाओंके तिरस्कारसे | | इत्यात्मज्ञानेनैव विहितमेषणा- | ही उत्पन्न होता है और एषणाओं- | | व्युत्थानम् आत्मज्ञानसमान- | से विरुद्ध भी है, एषणाओंका | | कर्तृकत्वाप्रत्ययोपादानलिङ्ग- | तिरस्कार किये बिना तो आत्म- | | श्रुत्या दृढीकृतम्। तस्मादेष- | विषयक पाण्डित्यका उदय ही नहीं | | णाभ्यो व्युत्थाय ज्ञानबलभावेन | हो सकता; अतः आत्मज्ञानद्वारा | | बाल्येन तिष्ठासेत् स्थातुमिच्छेत्। | ही एषणाओंसे व्युत्थान सम्पादित | | | होता है; आत्मज्ञान और व्युत्थान- | | | का एक ही कर्ता है—यह सूचित | | | करनेके लिये 'व्युत्थाय' इस पदमें | | | 'क्त्वा' प्रत्ययका प्रयोग किया गया | | | है, इसलिये इस लिङ्गभूता श्रुतिने | | | उक्त अभिप्रायको और भी पुष्ट कर | | | दिया है। अतः एषणाओंसे उत्थान | | | कर बाल्यसे—ज्ञानबलभावसे | | | 'तिष्ठासेत्'—स्थित रहनेकी इच्छा | | | करे। |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३३
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३३
| साधनफलाश्रयणं हि बलमितरेषामनात्मविदाम्; तद् बलं हित्वा विद्वान् असाधनफलस्वरूपात्मविज्ञानमेव बलं तद्भावमेव केवलमाश्रयेत्, तदाश्रयणे हि करणान्येषणाविषये एनं हृत्वा स्थापयितुं नोत्सहन्ते; ज्ञानबलहीनं हि मूढं दृष्टादृष्टविषयायाम् एषणायामेवैनं करणानि नियोजयन्ति; बलं नाम आत्मविद्ययाशेषविषयदृष्टितिरस्करणम्; अतस्तद्भावेन बाल्येन तिष्ठासेत्; तथा "आत्मना विन्दते वीर्यम्" ( केन० २।४ ) इति श्रुत्यन्तरात् । "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः" (मु० उ० ३ । २ । ४ ) इति च । | अन्य जो अनात्मज्ञ हैं, उनका बल तो साधन और फलोंका आश्रय लेना ही है; उस बलको त्यागकर विद्वान्को जो असाधन-फलस्वरूप आत्मविज्ञान ही बल है, केवल उस बलभावका ही आश्रय लेना चाहिये । उसका आश्रय लेनेसे ( विषयलोलुप ) इन्द्रियाँ इसे आकृष्ट करके एषणाओंके विषयमें स्थापित करनेका साहस नहीं कर सकतीं । जो ज्ञानबलसे रहित है, उस मूढको ही इन्द्रियाँ दृष्ट और अदृष्ट विषयोंकी एषणामें नियुक्त कर देती हैं; आत्मज्ञानके द्वारा समस्त विषयदृष्टिका तिरस्कार कर देना ही बल है; अतः उस बलभावसे—बाल्यसे स्थित रहनेको इच्छा करे; ऐसा ही "आत्मज्ञानके द्वारा वीर्य (विषयदृष्टिके तिरस्कारका सामर्थ्य ) प्राप्त होता है" इस अन्य श्रुतिसे विदित होता है, तथा "यह आत्मा बलहीनको नहीं मिल सकता" यह श्रुति भी यहो कहती है । | | बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्य निःशेषं कृत्वाथ मननान्मुनिर्योगी भवति; एतावद्धि ब्राह्मणेन कर्तव्यम्, यदुत सर्वानात्मप्रत्यय- | इस प्रकार बाल्य और पाण्डित्यको निर्विद्य, निःशेष जान करके फिर मुनि—मनन करनेके कारण मुनि—योगी होता है। समस्त अनात्मप्रत्ययोंका तिरस्कार करना—यही ब्राह्मण |
७३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ७३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| तिरस्करणम्; एतत् कृत्वा कृतकृत्यो योगी भवति ।<br><br>अमौनं च आत्मज्ञानानात्मप्रत्ययतिरस्कारौ पाण्डित्यबाल्यसंज्ञकौ निःशेषं कृत्वा, मौनं नाम अनात्मप्रत्ययतिरस्करणस्य पर्यवसानं फलम्, तच्च निर्विद्याथ ब्राह्मणः कृतकृत्यो भवति—ब्रह्मैव सर्वमिति प्रत्यय उपजायते । स ब्राह्मणः कृतकृत्यः, अतो ब्राह्मणः; निरुपचरितं हि तदा तस्य ब्राह्मण्यं प्राप्तम्; अत आह—स ब्राह्मणः केन स्यात् केन चरणेन भवेत् ? येन स्याद् येन चरणेन भवेत्, तेनेदृश एवायम्—येन केनचिच्चरणेन स्यात् तेनेदृश एव उक्तलक्षण एव ब्राह्मणो भवति; येन केनचिच्चरणेनेति स्तुत्यर्थम्—येयं ब्राह्मण्यावस्था सेयं स्तूयते, न तु चरणेऽनादरः । | (ब्रह्मवेत्ता) का कर्तव्य है; ऐसा करके वह कृतकृत्य योगी हो जाता है ।<br><br>आत्मज्ञान और अनात्मप्रत्ययका तिरस्कार जिनकी पाण्डित्य और बाल्यसंज्ञा है—ये अमौन हैं, इन्हें निःशेष करके तथा अनात्मप्रत्यय तिरस्कारका पर्यवसान—फल मौन है, उसे भी निःशेष जान करके ब्राह्मण कृतकृत्य हो जाता है । उसे 'सब ब्रह्म ही है' ऐसा प्रत्यय उत्पन्न हो जाता है । वह ब्राह्मण कृतकृत्य है, इसलिये ब्राह्मण है; उस समय उसे उपचारशून्य ब्राह्मणत्व प्राप्त हो जाता है; इसीसे श्रुति कहती है—वह किससे अर्थात् किसी आचरणसे ब्राह्मण हो सकता है ? [ उत्तर— ] जिससे अर्थात् जिस आचरणसे भी हो वह ऐसा ही होगा—तात्पर्य यह है कि जिस किसी भी आचरणसे हो उससे ऐसा यानी ऐसे लक्षणोंवाला ही ब्राह्मण होता है; 'जिस किसी भी आचरणसे' यह कथन स्तुतिके लिये है; अर्थात् ऐसा कहकर यह जो ब्राह्मण्यावस्था है, उसकी स्तुति की जाती है, इससे आचरणमें अनादर प्रदर्शित नहीं होता । |