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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१२७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६

१२७८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६

| यद्येवं वेत्थ उ देवयानस्य पथो मार्गस्य प्रतिपदं प्रतिपद्यते येन सा प्रतिपत्, तां प्रतिपदं पितृयाणस्य वा प्रतिपदं प्रतिपच्छब्दवाच्यमर्थमाह—यत् कर्म कृत्वा यथाविशिष्टं कर्म कृत्वेत्यर्थः; देवयानं वा पन्थानं मार्गं प्रतिपद्यन्ते पितृयाणं वा यत् कर्म कृत्वा प्रतिपद्यन्ते तत् कर्म प्रतिपदुच्यते तां प्रतिपदं किं वेत्थ देवलोकपितृलोकप्रतिपत्तिसाधनं किं वेत्थेत्यर्थः । <br><br> अप्यत्रास्यार्थस्य प्रकाशकमृषेर्मन्त्रस्य वचो वाक्यं नः श्रुतमस्ति। मन्त्रोऽप्यस्यार्थस्य प्रकाशको विद्यत इत्यर्थः । कोऽसौ मन्त्रः ? इत्युच्यते—द्वे सृती द्वौ मार्गौवशृणवं श्रुतवानस्मि, तयोरेका पितॄणां प्रापिका पितृलोकसंबद्धा तया सृत्या पितृलोकं प्राप्नोतीत्यर्थः । अहमशृणवमिति व्यवहितेन संबन्धः । देवानाम्रुतापि देवानां संबन्धिन्यन्या देवान् प्रापयति सा । के पुनरुभाभ्यां | ‘यदि ऐसी बात है, तो क्या तू देवयानमार्गके प्रतिपद्—जिसके द्वारा पुरुष प्रतिपन्न होते (गमन करते) हैं, उसे प्रतिपद् कहते हैं, उस प्रतिपद्को तथा पितृयानके प्रतिपद्को जानता है?’ श्रुति ‘प्रतिपद्’ शब्दका अर्थ बतलाती है—जो कर्म करके अर्थात् यथाविशिष्ट कर्म करके देवयान या पितृयानमार्गको प्राप्त होते हैं, वह कर्म ‘प्रतिपद्’ कहलाता है, ‘उस प्रतिपद्को क्या तू जानता है? अर्थात् क्या तुझे देवलोक और पितृलोककी प्राप्तिके साधनका ज्ञान है?’ <br><br> ‘हमने इस अर्थके प्रकाशक ऋषि अर्थात् मन्त्रका वाक्य भी सुना है। अर्थात् इस अर्थका प्रकाशक मन्त्र भी विद्यमान है। वह मन्त्र कौन-सा है सो बतलाया जाता है—मैंने दो मार्ग सुने हैं; उनमें एक पितृगणकी प्राप्ति करानेवाला अर्थात् पितृलोकसे सम्बद्ध है, तात्पर्य यह है कि उस मार्गसे पुरुष पितृलोकको प्राप्त करता है।’ मूलमें ‘अहम् अशृणवम्’ इस प्रकार व्यवहित पदोंका सम्बन्ध है। ‘और दूसरा मार्ग देवताओंका यानी देवताओंसे सम्बद्ध है अर्थात् जो देवताओंको प्राप्त कराता है,वह है।’ |

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२७९

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२७९


संस्कृतहिन्दी
सृतिभ्यां पितॄन् देवांश्च गच्छन्ति ? इत्युच्यते—उतापि मर्त्यानां मनुष्याणां संबन्धिन्यौ मनुष्या एव हि सृतिभ्यां गच्छन्तीत्यर्थः। ताभ्यां सृतिभ्यामिदं विश्वं समस्तमेजद् गच्छत् समेति संगच्छते।<br><br>ते च द्वे सृती यदन्तरा ययो-रन्तरा यदन्तरा पितरं मातरं च मातापित्रोरन्तरा मध्य इत्यर्थः, कौ तौ मातापितरौ द्यावापृथिव्यावण्डकपाले; ‘इयं वै मातासौ पिता’ इति हि व्याख्यातं ब्राह्मणेन, अण्डकपालयोर्मध्ये संसारविषये एवैते सृती नात्यन्तिकामृतत्वगमनाय। इतर आह—नाहमतोऽस्मात् प्रश्नसमुदायादेकं च नैकंमपि प्रश्नं न वेद नाहं वेदेति होवाच श्वेतकेतुः ॥ २ ॥किंतु इन दोनों मार्गोंसे पितृगण और देवताओंके पास कौन जाते हैं? सो बतलाया जाता है—'ये दोनों मार्ग मर्त्योके यानी मनुष्योंके सम्बन्धी हैं, अर्थात् इन मार्गोंसे मनुष्य ही जाते हैं। उन मार्गोंसे जानेवाला यह सम्पूर्ण जगत् सम्यक् प्रकारसे जाता है।'<br><br>'वे दोनों मार्ग 'यदन्तरा'—जिनके मध्यवर्ती हैं, उन माता-पिताको [ क्या तू जानता है? ] अर्थात् ये माता-पिताके मध्यमें हैं, वे माता-पिता कौन हैं? द्युलोक और पृथिवी-रूप ब्रह्माण्डकपाल; 'यह (पृथिवी) ही माता है और वह (द्युलोक) पिता है'—इस प्रकार ब्राह्मणद्वारा व्याख्या की जा चुकी है, ब्रह्माण्डकपालोंके मध्यमें ये दोनों मार्ग संसारविषयक ही हैं, आत्यन्तिक अमृतत्वकी प्राप्तिके लिये नहीं हैं।' इसपर दूसरेने कहा, 'मैं इस प्रश्न-समुदायमेंसे एक भी प्रश्नको नहीं जानता—मुझे किसीका पता नहीं है,' ऐसा श्वेतकेतुने कहा ॥२॥

श्वेतकेतुका अपने पिताके पास आकर उलाहना देना

अथैनं वसत्योपमन्त्रयाञ्चक्रेऽनादृत्य वसतिं कुमारः प्रदुद्राव स आजगाम पितरं तꣳहोवाचेति वाव किल नो भवान् पुरानुशिष्टानवोच इति कथꣳ सुमेध इति

१२८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

१२८०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

पञ्च मा प्रश्नान् राजन्यबन्धुरप्राक्षीत्ततो नैकंचन वेदेति कतमे त इतीम इति ह प्रतीकान्युदाजहार ॥ ३ ॥

फिर राजाने श्वेतकेतुसे ठहरनेके लिये प्रार्थना की। किंतु वह कुमार ठहरनेकी परवा न करके चल दिया। वह अपने पिताके पास आया और उनसे बोला, 'आपने यही कहा था न, कि मुझे सब विषयोंकी शिक्षा दे दी गयी है?' [ पिता- ] 'हे सुन्दर धारणाशक्तिवाले ! क्या हुआ?' [ पुत्र- ] 'मुझसे एक क्षत्रियबन्धुने पाँच प्रश्न पूछे थे, उनमेंसे मैं एकको भी नहीं जानता।' [ पिता— ] 'वे कौन-से थे?' [ पुत्र— ] 'ये थे' ऐसा कहकर उसने उन प्रश्नोंके प्रतीक बतलाये ॥ ३ ॥

अथानन्तरमपनीय विद्याभिमानगर्वमेनं प्रकृतं श्वेतकेतुं वसतया वसतिप्रयोजनेनोपमन्त्रयाञ्चक्रे-इह वसन्तु भवन्तः, पाद्यमर्घ्यं चानीयतामित्युपमन्त्रणं कृतवान् राजा। अनादृत्य तां वसतिं कुमारः श्वेतकेतुः प्रदुद्राव प्रतिगतवान् पितरं प्रति। स चाजगाम पितरमागत्य चोवाच तम्, कथमिति? वाव किलैवं किल नोऽस्मान् भवान् पुरा समावर्तनकालेऽनुशिष्टान् सर्वाभिर्विद्याभिरवोचोऽवोचदिति।इसके पश्चात् उसके विद्याभिमानको तोड़कर इस प्रकरणमें प्राप्त श्वेतकेतुसे राजाने 'वसति'-ठहरनेके प्रयोजनसे प्रार्थना की; अर्थात् [ श्वेतकेतुसे कहा— ] 'आप यहाँ ठहरिये' [और सेवकोंसे कहा—] 'अरे! पाद्य और अर्घ्य लाओ' इस प्रकार राजाने विनयपूर्वक निवेदन किया। किंतु वह कुमार उस निवासका निरादर कर 'प्रदुद्राव' अपने पिताके पास चल दिया। वह पिताके पास आया और वहाँ आकर उससे बोला, किस प्रकार बोला—'आपने पहले समावर्तन संस्कारके समय यही कहा था न, कि तुझे सब विद्याओंमें अनुशिक्षित कर दिया गया है?'

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ १२८१

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ १२८१


| सोपालम्भं पुत्रस्य वचः श्रुत्वाह पिता कथं केन प्रकारेण तव दुःखमुपजातं हे सुमेधः ! शोभना मेधा यस्येति सुमेधाः । शृणु मम यथा वृत्तम्—पञ्च पञ्चसंख्याकान् प्रश्नान् मा मां राजन्यबन्धू राजन्या बन्धवो यस्येति; परिभववचनमेतद्राजन्यबन्धुरिति, अप्राक्षीत् पृष्टवांस्ततस्तेषामन्नैकंचनैकमपि न वेद न विज्ञातवानस्मि । कतमे ते राज्ञा पृष्टाः प्रश्नाः' इति पित्रोक्तः पुत्रः 'इमे ते' इति ह प्रतीकानि मुखानि प्रश्नानामुदाजहारोदाहृतवान् ॥ ३ ॥ | पुत्रका उपालम्भयुक्त वचन सुनकर पिताने कहा, 'हे सुमेध ! तुझे किस प्रकार दुःख उत्पन्न हुआ है।' जिसकी सुन्दर मेधाशक्ति होती है, उसे सुमेधा कहते हैं। [पुत्र]-'मेरे साथ जैसा हुआ है; सो सुनिये-मुझसे एक राजन्य-बन्धु (क्षत्रबन्धु) ने पाँच प्रश्न पूछे थे, उनमेंसे मैं एकको भी नहीं जानता।' जिसके राजन्य (क्षत्रिय) बन्धु हों, उसे राजन्यबन्धु कहते हैं, यह राजन्यबन्धु तिरस्कारसूचक वचन है। 'राजाके द्वारा पूछे हुए वे प्रश्न कौन-से थे?' इस प्रकार पिताके पूछनेपर पुत्रने 'वे ये थे' ऐसा कहकर उन प्रश्नोंके प्रतीक-मुख (संकेत) बतलाये ॥ ३ ॥ |


पिता आरुणिका उनके विषयमें अपनी अनभिज्ञता बताकर उसे शान्त करना और उनका उत्तर जाननेके लिये प्रवाहणके पास आना

स होवाच तथा नस्त्वं तात जानीथा यथा यदहं किञ्च वेद सर्वमहं तत्तुभ्यमवोचं प्रेहि तु तत्र प्रतीत्य ब्रह्मचर्यं वत्स्याव इति भवानेव गच्छत्विति स आजगाम गौतमो यत्र प्रवाहणस्य जैवलेरास तस्मा आसनमाहृत्योदकमाहारयाञ्चकाराथ हास्मा अर्घ्यं चकार तँहोवाच वरं भगवते गौतमाय दद्म इति॥४॥

बृ० उ० ८१-

१२८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

१२८२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

उस पिताने कहा, 'हे तात ! तू हमारे कथनानुसार ऐसा समझ कि हम जो कुछ जानते थे वह सब हमने तुझसे कह दिया था। अब हम दोनों वहीं चलें और ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक उसके यहाँ निवास करेंगे।' [पुत्र—] 'आप ही जाइये।' तब वह गौतम जहाँ जैवलि प्रवाहणकी बैठक थी, वहां आया। उसके लिये आसन लाकर राजाने जल मँगवाया और उसे अर्घ्यदान किया। फिर बोला, 'मैं पूज्य गौतमको वर देता हूँ'१ ॥ ४ ॥

| स होवाच पिता पुत्रं क्रुद्धमुपशमयँस्तथा तेन प्रकारेण नोऽस्मांस्त्वं हे तात वत्स जानीथा गृह्णीथा यथा यदहं किञ्च विज्ञानजातं वेद सर्वं तत् तुभ्यमवोचमित्येव जानीथाः; कोऽन्यो मम प्रियतरोऽस्ति त्वत्तो यदर्थं रक्षिष्ये ? अहमप्येतन्न जानामि यद् राज्ञा पृष्टम् । तस्मात् प्रेहागच्छ तत्र प्रतीत्य गत्वा राज्ञि ब्रह्मचर्यं वत्स्यावो विद्यार्थमिति ।<br><br>स आह—भवानेव गच्छत्विति, नाहं तस्य मुखं निरीक्षितुमुत्सहे ।<br><br>स आजगाम गौतमो गोत्रतो गौतम आरुणिर्यत्र प्रवाहणस्य जैवलेरासनमास्थायिका; षष्ठी- | क्रुद्ध पुत्रको शान्त करनेके लिये उस पिताने कहा, 'हे तात ! हे वत्स ! तू हमसे इस प्रकार समझ कि जो कुछ विज्ञान मैं जानता था, वह सब मैंने तुझसे कह दिया था—ऐसा ही तू जान । भला तुझसे अधिक प्रिय मेरा और कौन है जिसके लिये उसे छिपाऊँगा । राजाने जो पूछा है, वह तो मैं भी नहीं जानता । अतः आ, वहाँ चलकर हम दोनों विद्योपार्जनके लिये राजाके यहाँ ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक निवास करेंगे।' उस (पुत्र) ने कहा, 'आप ही जाइये, मैं तो उसका मुँह भी नहीं देख सकता ।'<br><br>वह गौतम-गोत्रतः गौतम आरुणि, जहाँ प्रवाहण जैवलिका आस-आसन आस्थायिका अर्थात् बैठक थी, वहाँ आया । 'प्रवाहणस्य जैवलेः' ये दो |


१. अर्थात् आप जिस प्रयोजनसे यहाँ पधारे हैं, वह कहिये; मैं उसको पूर्ति करूँगा।

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थे १२८३

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थे १२८३

द्वयं प्रथमास्थाने; तस्मै गौतमायागतायासनमनुरूपमाहृत्योदकं भृत्यैराहारयाञ्चकार; अथ हास्मा अर्घ्यं पुरोधसा कृतवान् मन्त्रवन्मधुपर्कं च; कृत्वा चैवं पूजां तं होवाच वरं भगवते गौतमाय तुभ्यं दद्म इति गोऽश्वादिलक्षणम् ॥ ४ ॥षष्ठी प्रथमाके स्थानमें हैं¹। अपने पास आये हुए उस गौतमके लिये राजाने उचित आसन देकर सेवकोंसे जल मँगवाया और फिर पुरोहितद्वारा अर्घ्य और मन्त्रयुक्त मधुपर्क कराया। इस प्रकार पूजाकर उसने गौतमसे कहा, 'मैं आप भगवान् गौतमको गौ-अश्वादिरूप वर देता हूँ' ॥ ४ ॥

आरुणिका प्रवाहणसे अपने पुत्रसे पूछी हुई बात कहनेकी प्रार्थना करना

स होवाच प्रतिज्ञातो म एष वरो यां तुकुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तां मे ब्रूहीति ॥ ५ ॥

उसने कहा, 'आपने मुझे जो वर देनेके लिये प्रतिज्ञा की है, उसके अनुसार आपने कुमारसे जो बात पूछी थी वह मुझसे कहिये' ॥ ५ ॥

स होवाच गौतमः प्रतिज्ञातो मे ममैष वरस्त्वयास्यां प्रतिज्ञायाम् दृढी कुर्वात्मानम्, यां तु वाचं कुमारस्य मम पुत्रस्यान्ते समीपे वाचमभाषथाः प्रश्नरूपां तामेव मे ब्रूहि स एव नो वर इति ॥५॥उस गौतमने कहा, 'आपने इस प्रतिज्ञामें मुझे यह वर देनेकी प्रतिज्ञा की है—'कुमार अर्थात् मेरे पुत्रके समीप आपने प्रश्नरूप जो बात कही थी, वही आप मुझसे कहिये, वही मेरा वर है। यह वर देनेके लिये अब आप अपनेको सुस्थिर कीजिये' ॥ ५ ॥

१. क्योंकि 'आस' यह क्रियापद है, अतः 'प्रवाहणः जैवलिः' यह उसका कर्ता होना चाहिये। षष्ठी होनेके कारण ही 'आस' का अर्थ 'आसन' किया गया है।

१२८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६

१२८४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६

प्रवाहणका उसे दैव वर बताकर अन्य मानुष वर माँगनेके लिये कहना

स होवाच दैवेषु वै गौतम तद् वरेषु मानुषाणां ब्रूहीति ॥ ६ ॥

उसने कहा, 'गौतम ! वह वर तो दैव वरोंमेंसे है; तुम मनुष्यसम्बन्धी वरोंमेंसे कोई वर माँगो' ॥ ६ ॥

| स होवाच राजा दैवेषु वरेषु तद् वै गौतम यस्त्वं प्रार्थयसे मानुषाणामन्यतमं प्रार्थय वरम् ॥ ६ ॥ | उस राजाने कहा, 'गौतम ! तुम जो वर मांगते हो, वह तो देव वरोंमेंसे है। मनुष्यसम्बन्धी वरोंमेंसे कोई वर माँगो' ॥ ६ ॥ |


आरुणिका आग्रह और प्रवाहणकी स्वीकृतिसे आरुणिद्वारा वाणीमात्रसे उसका शिष्यत्व स्वीकार करना

स होवाच विज्ञायते हास्ति हिरण्यस्यापात्तं गोअश्वानां दासीनां प्रवाराणां परिदानस्य मा नो भवान् बहोरनन्तस्यापर्यन्तस्याभ्यवदान्यो भूदिति स वै गौतम तीर्थेनेच्छासा इत्युपैम्यहं भवन्तमिति वाचा ह स्मैव पूर्व उपयन्ति स होपायनकीर्त्योवास ॥ ७ ॥

उस गौतमने कहा, आप जानते हैं, वह तो मेरे पास है। मुझे सुवर्णकी प्राप्ति तथा गौ, अश्व, दासी, परिवार और परिधानकी भी प्राप्ति है। आप महान्, अनन्त और निःसीम धनके दाता होकर मेरे लिये अदाता न हों।' [राजा--] 'तो गौतम ! तुम शास्त्रोक्त विधिसे उसे पानेकी इच्छा करो।' (गौतम--) 'अच्छा, मैं आपके प्रति शिष्यभावसे उपसन्न (प्राप्त) होता हूँ। पहले ब्राह्मणलोग वाणीसे ही क्षत्रियादिके प्रति उपसन्न होते रहे हैं।' इस प्रकार उपसत्तिका वाणीसे कथनमात्र करके गौतम वहां रहने लगा [सेवा आदिके द्वारा नहीं] ॥ ७ ॥

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२८५

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२८५


| स होवाच गौतमो भवतापि विज्ञायते ह ममास्ति सः। न तेन प्रार्थितेन कृत्यं मम यं त्वं दित्ससि मानुषं वरम्, यस्मान्ममाप्यस्ति हिरण्यस्य प्रभूतस्यापात्तं प्राप्तं गोअश्वानाम्—अपात्तमस्तीति सर्वत्रानुषङ्गः; दासीनां प्रवाराणां परिवाराणां परिधानस्य च; न च यन्मम विद्यमानम्, तत् त्वत्तः प्रार्थनी˙ त्वया वा देयम्। प्रतिज्ञातश्च वरस्त्वया त्वमेव जानीषे यदत्र युक्तं प्रतिज्ञा रक्षणीया तवेति।<br><br>मम पुनरयमभिप्रायो मा भून्नोऽस्मानभ्यस्मानेव केवलान् प्रति भवान् सर्वत्र वदान्यो भूत्वा अवदान्यो मा भूत् कदर्यो मा भूदित्यर्थः। बहोः प्रभूतस्यानन्तस्यानन्तफलस्येत्येतत्, अपर्यन्तस्यापरिसमाप्तिकस्य पुत्रपौत्रादिगामिकस्येत्येतत्, ईदृशस्य वित्तस्य मां प्रत्येव केवलमदाता | उस गौतमने कहा, 'आप भी जानते हैं, वह तो मेरे पास है ही। आप जिस मनुष्यसम्बन्धी वरको मुझे देना चाहते हैं, उसके मांगनेसे तो मेरा कोई प्रयोजन है नहीं, क्योंकि मुझे भी बहुत-सा सुवर्ण प्राप्त है तथा गो-अश्वादिकी भी प्राप्ति है—इस प्रकार 'अपात्तम् अस्ति' इस क्रियापदका सर्वत्र सम्बन्ध लगाना चाहिये। अर्थात् दासी, परिवार और वस्त्र—इन सबकी मुझे भी प्राप्ति है। जो मेरे पास नहीं है, वही मुझे आपसे माँगना चाहिये और वही आपको देना भी चाहिये। आपने वर देनेकी प्रतिज्ञा तो की ही है, अब यहाँ क्या करना उचित है—यह आप ही जानें; आपको प्रतिज्ञाका पालन तो करना ही चाहिये।'<br><br>मेरा तो यह अभिप्राय है कि आप सर्वत्र दाता होकर भी हमारे प्रति ही, अर्थात् केवल हमारे लिये ही अदात न हों--कृपण न हों। 'बहोः'--बहुत-सी, 'अनन्तस्य'--अनन्त फलवाली, 'अपर्यन्तस्य'--समाप्त न होनेवाली अर्थात् पुत्र-पौत्रादिकोंमें भी जानेवाली--इस प्रकारकी सम्पत्तिके दाता होकर भी आप केवल मेरे |

१२८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६

१२८६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६

| मा भूद् भवान्; न चान्यत्रादेयमस्ति भवतः ।<br><br>एवमुक्त आह—स त्वं वै हे गौतम तीर्थेन न्यायेन शास्त्रविहितेन विद्यां मत्त इच्छासा इच्छान्वाप्तुमित्युक्तो गौतम आह—उपैम्युपगच्छामि शिष्यत्वेनाहं भवन्तमिति । वाचा ह स्मैव किल पूर्वे ब्राह्मणाः क्षत्रियान् विद्यार्थिनः सन्तो वैश्यान् वा क्षत्रिया वा वैश्यानापद्युपयन्ति शिष्यवृत्त्या ह्युपगच्छन्ति नोपायनशुश्रूषादिभिः । अतः स गौतमो होपायनकीर्त्योपगमनकीर्तनमात्रेणैवोवासोषितवान्नोपायनं चकार ॥ ७ ॥ | लिये ही अदाता न हों। दूसरोंके लिये तो आपको कुछ भी अदेय नहीं है।<br><br>इस प्रकार कहे जानेपर राजाने कहा, 'अच्छा तो हे गौतम ! तुम 'तीर्थेन'--शास्त्रविहित विधिसे मुझसे विद्याग्रहण करनेकी इच्छा करो।' ऐसा कहे जानेपर गौतमने कहा, 'उपैमि'—मैं शिष्यभावसे आपके प्रति उपसन्न होता हूँ। विद्या प्राप्त करनेकी इच्छावाले पूर्ववर्ती ब्राह्मणलोग क्षत्रिय या वैश्योंके प्रति अथवा क्षत्रियलोग वैश्योंके प्रति आपत्तिकालमें केवल वाणीद्वारा ही शिष्यवृत्तिसे उपसन्न होते थे, किसी प्रकारकी भेंट देकर अथवा शुश्रूषादिके द्वारा उनका शिष्यत्व स्वीकार नहीं करते थे।¹ अतः उस गौतमने 'उपायनकीर्त्या'--उपसत्तिके कथनमात्रसे ही वहाँ निवास किया, वस्तुतः सेवा आदिके द्वारा उपगमन नहीं किया ॥ ७ ॥ |


प्रवाहणकी क्षमाप्रार्थना और विद्यादानके लिये तत्पर होना

एवं गौतमेनापदन्तर उक्ते—गौतमके इस प्रकार आपदन्तर कहनेपर—

१. स्वयं विद्यानभिज्ञ होनेके कारण किसी हीन वर्णके पुरुषके पास शिष्यभावसे जाना—यह आपदन्तर (आपत्तिकाल) कहलाता है।

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२८७

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२८७


स होवाच तथा नस्त्वं गौतम मापराधास्तव च पितामहा यथेयं विद्येतः पूर्वं न कस्मिँश्चन ब्राह्मण उवास तां त्वहं तुभ्यं वक्ष्यामि को हि त्वैवं ब्रुवन्तमर्हति प्रत्याख्यातुमिति ॥ ८ ॥

उस राजाने कहा, 'गौतम ! जिस प्रकार तुम्हारे पितामहोंने हमारे पूर्वजोंका अपराध नहीं माना, उसी प्रकार तुम भी हमारा अपराध न मानना। इससे पूर्व यह विद्या किसी ब्राह्मणके यहाँ नहीं रही। उसे मैं तुम्हारे ही प्रति कहता हूँ। भला, इस प्रकार विनयपूर्वक बोलनेवाले तुमको निषेध करनेमें (विद्या देनेसे इनकार करनेमें) कौन समर्थ हो सकता है?' ॥ ८ ॥


स होवाच राजा पीडितं मत्वा क्षामयंस्तथा नोऽस्मान् प्रति मापराधा अपराधं मा कार्षीरस्मदीयोऽपराधो न ग्रहीतव्य इत्यर्थः तव च पितामहा अस्मत्पितामहेषु यथापराधं न जगृहुस्तथा पितामहानां वृत्तमस्मास्वपि भवता रक्षणीयमित्यर्थः । यथेयं विद्या त्वया प्रार्थिता, इतस्त्वत्संप्रदानात् पूर्वं प्राङ् न कस्मिन्नपि ब्राह्मणे उवासोषितवती तथा त्वमपि जानीषे सर्वदा क्षत्रियपरम्परयेयं विद्यागता;उसे पीडित समझकर उस राजाने क्षमा कराते हुए कहा, 'हमारे प्रति इसी प्रकार अपराध न करें, अर्थात् हमारे अपराधको आप इसी प्रकार ग्रहण न करें, जिस प्रकार कि आपके पितामहोंने हमारे पितामहोंका अपराध ग्रहण नहीं किया था; तात्पर्य यह है कि इस प्रकार आपको भी हमारे प्रति अपने पितामहोंके आचरणकी रक्षा करनी चाहिये। जिस प्रकार तुम्हारे द्वारा प्रार्थित यह विद्या इससे यानी तुम्हें सम्प्रदान करनेसे पूर्व किसी भी ब्राह्मणके यहाँ नहीं रही सो तुम भी जानते ही हो, यह विद्या सर्वदा क्षत्रिय-परम्परासे ही आयी है; यदि हो

१२८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६

१२८८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६

| सा स्थितिर्मयापि रक्षणीया यदि शक्यते; इत्युक्तं दैवेषु गौतम तद् वरेषु मानुषाणां ब्रूहीति न पुनस्तवादेयो वर इति। इतः परं न शक्यते रक्षितुम्; तामपि विद्यामहं तुभ्यं वक्ष्यामि; को ह्यन्योऽपि हि यस्मादेवं ब्रुवन्तं त्वामर्हति प्रत्याख्यातुं न वक्ष्यामीति अहं पुनः कथं न वक्ष्ये तुभ्यमिति ॥ ८ ॥ | सके तो उस स्थितिकी रक्षा मुझे भी करनी चाहिये थी; इसीसे मैंने यह कहा था कि 'हे गौतम ! यह वर तो दैव वरोंमेंसे है, तुम मानुष वरोंमेंसे माँगो।' यह वर तुम्हारे लिये अदेय है—ऐसी बात नहीं है। अब आगे इसे छिपाना सम्भव नहीं है; मैं उस विद्याको भी तुम्हारे प्रति कहे देता हूँ क्योंकि इस प्रकार बोलनेवाले तुमको मेरे सिवा दूसरा भी ऐसा कौन है, जो 'मैं नहीं कहूँगा' ऐसा कहकर निषेध करनेमें समर्थ हो सके ? फिर भला मैं तुमसे वह विद्या क्यों न कहूँगा ?' ॥८॥ |


चतुर्थ प्रश्नका उत्तर—पञ्चाग्निविद्या

१—द्युलोकाग्नि

| असौ वै लोकोऽग्निर्गौतमेत्यादि चतुर्थः प्रश्नः प्राथम्येन निर्णीयते क्रमभङ्गस्त्वेतन्निर्णयायत्तत्वादितरप्रश्ननिर्णयस्य। | 'असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम' इत्यादि मन्त्रसे चौथे प्रश्नका पहले निर्णय किया जाता है। क्रमभंग तो इसलिये किया गया है कि इस प्रश्नके निर्णयके अधीन ही अन्य प्रश्नोंका निर्णय है। |

असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिर्दिशोऽङ्गारा अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुत्यै सोमो राजा संभवति ॥ ६ ॥

ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२८९

ब्राह्मण २ ]शाङ्करभाष्यार्थ१२८९

हे गौतम ! यह लोक ( द्युलोक ) ही अग्नि है। आदित्य ही उसका समिध् (ईंधन) है, किरणें धूम हैं, दिन ज्वाला है, दिशाएँ अङ्गार हैं, अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग ( चिनगारियाँ ) हैं। उस इस अग्निमें देवगण श्रद्धाको हवन करते हैं; उस आहुतिसे सोम राजा होता है ॥ ६ ॥

| असौ द्यौर्लोकोऽग्निर्वै गौतम; द्युलोकेऽग्निदृष्टिरग्नौ विधीयते, यथा योषित्पुरुषयोः; तस्य द्युलोकाग्नेरादित्य एव समित् समिन्धनात्; आदित्येन हि समिध्यतेऽसौ लोकः ।<br><br>रश्मयो धूमः समिध उत्थानसामान्यात्, आदित्याद् हि रश्मयो निर्गताः; समिधश्च धूमो लोक उत्तिष्ठति । अहरर्चिः प्रकाशसामान्यात्; दिशोऽङ्गारा उपशमसामान्यात्; अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गा विस्फुलिङ्गवद् विक्षेपात् ।<br><br>तस्मिन्नेतस्मिन्नेवंगुणावशिष्टे द्युलोकाग्नौ देवा इन्द्रादयः श्रद्धां | हे गौतम ! यह द्युलोक अग्नि है। स्त्री और पुरुषके समान अग्नि न होनेपर भी द्युलोकमें अग्निदृष्टिका विधान किया जाता है। उस द्युलोकरूप अग्निको सम्यक् प्रकारसे दीप्त करनेवाला होनेसे आदित्य उसका समिध् है, क्योंकि आदित्यसे ही उस लोकका सम्यक् प्रकारसे दीपन (प्रकाशन) होता है।<br><br>किरणें धूम हैं; क्योंकि जिस प्रकार ईंधनसे धुआं उठता है, उसी प्रकार आदित्यरूपी ईंधनसे उठनेमें इन किरणोंकी धूमसे समानता है; कारण, आदित्यसे ही किरणें निकलती हैं और लोकमें समिध् (ईंधन) से धूम निकलता है। प्रकाशमें समानता होनेके कारण दिन ज्वाला है; उपशममें समानता होनेसे दिशाएँ अङ्गारे हैं तथा विस्फुलिङ्गोंके समान बिखरी हुई होनेके कारण अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग हैं।<br><br>ऐसे गुणोंसे युक्त उस इस द्युलोकरूप अग्निमें इंद्रादि देवगण |

१२९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

१२९०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

| [आहुत्यादि-स्वरूपविचारः]<br>जुह्वत्याहुतिद्रव्यस्थानीयां प्रक्षिपन्ति। तस्या आहुत्या आहुतेः सोमो राजा पितॄणां ब्राह्मणानां च संभवति।<br><br>तत्र के देवाः १ कथं जुह्वति ? किं वा श्रद्धाख्यं हविः १ इत्यत उक्तमस्माभिः सम्बन्धेनैत्थैवैतयोत्थ्वमुत्क्रान्तिमित्यादि। पदार्थषट्कनिर्णयार्थमग्निहोत्र उक्तम्—ते वा एते अग्निहोत्राहुती हुते सत्यावुत्क्रामतः; ते अन्तरिक्षमाविशतः; ते अन्तरिक्षमाहवनीयं कुर्वाते वायुं समिधं मरीचीरेव शुक्रामाहुतिम्; ते अन्तरिक्षं तर्पयतः; ते तत उत्क्रामतः; ते दिवमाविशतः; ते दिवमाहवनीयं कुर्वाते आदित्यं समिधमित्येवमाद्युक्तम्। | आहुतिद्रव्यस्थानीय श्रद्धाको हवन करते अर्थात् डालते हैं। उस आहुतिसे पितरों और ब्राह्मणोंका राजा सोम उत्पन्न होता है।<br><br>तहाँ देवता कौन हैं ? वे किस प्रकार हवन करते हैं ? और श्रद्धासंज्ञक हवि भी क्या हैं ?¹ इन सब बातोंका विचार करना है-इसीसे हमने इस ब्राह्मणके सम्बन्ध-भाष्यमें कहा था कि 'तू इन सायंकालिक, प्रातःकालिक अग्निहोत्रकी दोनों आहुतियोंकी न तो उत्क्रान्तिको जानता है' इत्यादि। इसी प्रकार उत्क्रान्ति आदि छः पदार्थोंके निर्णयके लिये अग्निहोत्रप्रकरणमें कहा गया है—वे ये अग्निहोत्रकी दोनों आहुतियाँ हवन की जानेपर उत्क्रमण करती (ऊपर उठती) हैं; वे अन्तरिक्षमें प्रवेश करती हैं; वे अन्तरिक्षको ही आहवनीय अग्नि करती हैं, वायुको समिध् करती हैं और किरणोंको ही शुक्ल आहुति करती हैं; वे अन्तरिक्षको तृप्त करती हैं; वे उससे भी ऊपर जाती हैं; वे द्युलोकमें प्रवेश करती हैं; वहाँ वे द्युलोकको आहवनीय बनाती हैं और आदित्यको 'समिध्'; इत्यादि प्रकारसे वहाँ कहा गया है। |


१. क्योंकि न तो इन्द्रादि देवताओंका कर्ममें अधिकार है, न द्युलोकादिमें हवन किया जा सकता है और न श्रद्धामें द्रव्यत्व है।

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९१

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९१


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तत्राग्निहोत्राहुती ससाधने एवोत्क्रामतः। यथेह यैः साधनैर्विशिष्टे ये ज्ञायेते आहवनीयाग्निसमिद्धूमपाङ्गारविस्फुलिङ्गाहुतिद्रव्यैस्ते तथैवोत्क्रामतोऽस्माल्लोकादमुं लोकम्। तत्राग्निरग्नित्वेन समित् समित्त्वेन धूमो धूमत्वेनाङ्गारा अङ्गारत्वेन विस्फुलिङ्गा विस्फुलिङ्गत्वेनाहुतिद्रव्यमपि पयआद्याहुतिद्रव्यत्वेनैव सर्गादावव्याकृतावस्थायामपि परेण सूक्ष्मेणात्मना व्यवतिष्ठते।[ यजमानकी मृत्युके समय ] अग्निहोत्रकी आहुतियां साधनके सहित ही उत्क्रमण करती हैं। इस लोकमें जिस प्रकार वे जिन आहवनीयाग्नि, समिध्, धूम, अङ्गार, विस्फुलिङ्ग और आहुतिद्रव्यरूप साधनोंसे युक्त जानी जाती हैं, उसी प्रकार वे इस लोकसे उस लोकके प्रति उत्क्रमण करती हैं। वहाँ सर्गके आरम्भमें अव्यक्तावस्थामें भी अपने परम सूक्ष्मरूपसे, अग्नि अग्निभावसे, समिध् समिद्भावसे, धूम धूमभावसे, अङ्गार अङ्गारभावसे, विस्फुलिङ्ग विस्फुलिङ्गभावसे और आहुतिद्रव्य भी दुग्धादि आहुतिद्रव्यभावसे ही रहते हैं।^१
तद् विद्यमानमेव ससाधनमग्निहोत्रलक्षणं कर्मापूर्वेणात्मना व्यवस्थितं सत् तत्पुनर्व्याकरणकाले तथैवान्तरिक्षादीनामाहवनीयाद्यग्न्यादिभावं कुर्वद् विपरिणमते। तथैवेदानीमप्यग्निहोत्राख्यंवह साधनसहित अग्निहोत्ररूप कर्म अपूर्वरूपसे व्यवस्थित होकर विद्यमान रहता हुआ ही जगत्के अभिव्यक्त होनेके समय पुनः उसी प्रकार अन्तरिक्षादिका आहवनीयादि अग्निभाव करता हुआ विपरिणामको प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार इस समय भी अग्निहोत्रसंज्ञक कर्म

१. अर्थात् प्रलयमें इनका स्थूलरूप न रहनेपर भी ये सब पदार्थ अपनी शक्तियोंके रूपमें रहते हैं। अतः ये सब सामान्यभावको प्राप्त नहीं होते और जब अग्निहोत्रकी आहुतियोंसे उत्पन्न हुए अपूर्वसे पुनः सृष्टि आरम्भ होती है तो वे पुनः व्यक्त जगत्के रूपमें परिणत हो जाते हैं।

१२९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

१२९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६


संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
कर्म । एवमग्निहोत्राहुत्यपूर्वविपरिणामात्मकं जगत् सर्वमित्याहुत्योरेव स्तुत्यर्थत्वेनोत्क्रान्त्याद्या लोकं प्रत्युत्थायितान्ताः षट् पदार्थाः कर्मप्रकरणेऽधस्तान्निर्णीताः ।जगतका आरम्भक है । इस प्रकार यह सारा जगत् अग्निहोत्रसे उत्पन्न हुए अपूर्वका विपरिणामरूप है, अतः आगे कर्मप्रकरणमें आहुतियोंकी ही स्तुतिके लिये उत्क्रान्तिसे लेकर यजमानके पुनः परलोकगमनके लिये उत्थान करनेतक छः पदार्थोंका निर्णय किया गया है ।
इह तु कर्तुः कर्मविपाकविवक्षायां द्युलोकाग्न्याद्यारभ्य पञ्चाग्निदर्शनमुत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधनं विशिष्टकर्मफलोपभोगाय विधित्सितमिति द्युलोकाग्न्यादिदर्शनं प्रस्तूयते । तत्र य आध्यात्मिकाः प्राणा इहाग्निहोत्रस्य होतारस्त एवाधिदैविकत्वेन परिणताः सन्त इन्द्रादयो भवन्ति । त एव तत्र होतारो द्युलोकाग्नौ । ते चेहाग्निहोत्रस्य फलभोगायाग्निहोत्रं हुतवन्तः । त एव फलपरिणामकालेऽपि तत्फलभोक्तृत्वात् तत्र तत्र होतृत्वं प्रतिपद्यन्ते तथा तथा विपरिणममाना देवशब्दवाच्याः सन्तः ।यहाँ (इस ब्राह्मणमें) तो कर्ताके कर्मफलके निरूपणकी इच्छा होनेपर द्युलोकाग्नि इत्यादिसे आरम्भ करके, विशिष्टफलके उपभोगके लिये उत्तरमार्गकी प्राप्तिकी साधनभूता पञ्चाग्निविद्याका विधान करना अभीष्ट है, इसलिये द्युलोकाग्नि आदि दृष्टि प्रस्तुत की जाती है ।<br><br>अतः यहाँ व्यवहारमें जो आध्यात्मिक प्राण अग्निहोत्रके होता हैं, वे ही आधिदैविकरूपमें परिणत होनेपर इन्द्रादि हो जाते हैं । वे ही वहाँ द्युलोकाग्निमें हवन करनेवाले हैं । उन्होंने यहाँ (इस लोकमें) अग्निहोत्रका फल भोगनेके लिये अग्निहोत्र किया था । फलके परिणामकालमें भी वे ही उस फलके भोक्ता होनेके कारण उस-उस स्थानमें वैसे-वैसे ही रूपसे परिणत होकर देवशब्दवाच्य हुए होतृत्वको प्राप्त होते हैं ।

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थे १२९३

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थे १२९३


| अत्र च यत् पयोद्रव्यमग्निहोत्रकर्माश्रयभूतमिहाहवनीये प्रक्षिप्तमग्निना भक्षितमदृष्टेन सूक्ष्मेण रूपेण विपरिणतं सह कर्त्रा यजमानेनामुं लोकं धूमादिक्रमेणान्तरिक्षमन्तरिक्षाद् द्युलोकमाविशति । ताः सूक्ष्मा आप आहुतिकार्यभूता अग्निहोत्रसमवायिन्यः कर्तृसहिताः श्रद्धाशब्दवाच्याः सोमलोके कर्तुः शरीरान्तरारम्भाय द्युलोकं प्रविशन्त्यो हूयन्त इत्युच्यन्ते । तास्तत्र द्युलोकं प्रविश्य सोममण्डले कर्तुः शरीरमारभन्ते । तदेतदुच्यते देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुत्यै सोमो राजा सम्भवतीति । "श्रद्धा वा आपः" इति श्रुतेः ।<br><br>वेत्थ यतिथ्यामाहुत्यां हुतायामापः पुरुषवाचो भूत्वा समुत्थाय वदन्तीति प्रश्नः, तस्य च निर्णयविषये 'असौ वै लोकोऽग्निः' इति प्रस्तुतम् । तस्मादापः कर्मसम- | इस लोकमें जो अग्निहोत्रकर्मका आश्रयभूत दुग्धरूप द्रव्य आहवनीय अग्निमें डाला गया था, वह अग्निद्वारा भक्षित होकर अदृष्ट सूक्ष्मरूपमें परिणत हो कर्ता यजमानके सहित धूमादि क्रमसे उस अन्तरिक्षलोकमें और फिर अन्तरिक्षसे द्युलोकमें प्रवेश करता है वह आहुतिका कार्यभूत, श्रद्धाशब्दवाच्य, अग्निहोत्रसम्बन्धी सूक्ष्म आप सोमलोकमें कर्ताके शरीरान्तरका आरम्भ करनेके लिये कर्ताके सहित द्युलोकमें प्रवेश करते हुए 'हवन किया जाता है' ऐसा कहा जाता है, वह वहाँ द्युलोकमें प्रवेश कर सोममण्डलमें कर्ताका शरीर आरम्भ करता है। इसीसे यह कहा जाता है कि 'देवगण श्रद्धाको होमते हैं, उस आहुतिसे सोम राजा उत्पन्न होता है।' "श्रद्धा ही आप है" इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है।<br><br>'क्या तू जानता है कि कितनी संख्यावाली आहुतिके हवन किये जानेपर आप पुरुषशब्दवाच्य होकर उठकर बोलने लगता है ?' यह प्रश्न है। उसीका निर्णय करनेके प्रसङ्गमें 'यह द्युलोक ही अग्नि है' इस प्रकार आरम्भ किया गया है। अतः यह |

१२९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

१२९४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

| वायिन्यः कर्तुः शरीरारम्भकाः श्रद्धाशब्दवाच्या इति निश्चीयते। भूयस्त्वादापः पुरुषवाच इति व्यपदेशो न त्वितराणि भूतानि न सन्तीति। | निश्चय होता है कि कर्ताके शरीरका आरम्भ करनेवाला कर्मसम्बन्धी आप श्रद्धाशब्दवाच्य है। अन्य भूतोंकी अपेक्षा जलकी अधिकता होनेके कारण 'आपः पुरुषवाचः' ऐसा व्यपदेश किया जाता है, ऐसी बात नहीं है कि अन्य भूत हैं ही नहीं। | | कर्मप्रयुक्तश्च शरीरारम्भः, कर्म चाप्समवायि। ततश्चापां प्राधान्यं शरीरकर्तृत्वे। तेन चापः पुरुषवाच इति व्यपदेशः कर्मकृतो हि जन्मारम्भः सर्वत्र। तत्र यद्यप्यग्निहोत्राहुतिस्तुतिद्वारेणोत्क्रान्त्यादयः प्रस्तुताः षट्पदार्था अग्निहोत्रे तथापि वैदिकानि सर्वाण्येव कर्माण्यग्निहोत्रप्रभृतीनि लक्ष्यन्ते। दाराग्निसम्बद्धं हि पाङ्क्तं कर्म प्रस्तुत्योक्तम्—"कर्मणा पितृलोकः" (१। ५। १६) इति। वक्ष्यति च—"अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकाञ्जयन्ति (६। २। १६) इति॥ ९॥ | शरीरका आरम्भ कर्मप्रयुक्त ही है और कर्म आपसे सम्बन्ध रखता है। अतः शरीररचनामें 'आप' की प्रधानता है। इससे भी 'आपः पुरुषवाचः' ऐसा उल्लेख किया गया है। सभी जगह जन्मका आरम्भ कर्मके कारण ही है। वहाँ अग्निहोत्रके प्रकरणमें यद्यपि अग्निहोत्रकी आहुतियोंकी स्तुतिके द्वारा उत्क्रान्ति आदि छः पदार्थ प्रस्तुत किये गये हैं, तो भी उससे अग्निहोत्रादि सारे ही वैदिक कर्म लक्षित होते हैं। स्त्री और अग्निसे सम्बन्ध रखनेवाले पाङ्क्तकर्मका आरम्भ करके "कर्मसे पितृलोक प्राप्त होता है" ऐसा कहा गया है तथा आगे भी "जो यज्ञ, दान और तपसे लोकोंको जय करते हैं" ऐसा श्रुति कहेगी॥ ९॥ |

२—पर्जन्याग्नि

पर्जन्यो वा अग्निर्गौतम तस्य संवत्सर एव समिदभ्राणि धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा ह्रादुनयो विस्फुलिङ्गास्त-

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२९५

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२९५


स्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः सोमँ राजानं जुह्वति तस्या आहुत्यै वृष्टिः संभवति ॥ १० ॥

हे गौतम ! मेघ ही अग्नि है। संवत्सर ही उसका समिध् है, अभ्र धूम हैं, विद्युत् ज्वाला है, अशनि (इन्द्रका वज्र) अङ्गार है, मेघगर्जन विस्फुलिङ्ग है। उस इस अग्निमें देवगण सोम राजाको हवन करते हैं। उस आहुतिसे वृष्टि होती है ॥ १० ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
पर्जन्यो वा अग्निर्गौतम द्वितीय आहुत्याधार आहुत्योरावृत्तिक्रमेण। पर्जन्यो नाम वृष्ट्युपकरणाभिमानी देवतात्मा, तस्य संवत्सर एव समित्—संवत्सरेण हि शरदादिभिर्ग्रीष्मान्तैः स्वावयवैर्विपरिवर्तमानेन पर्जन्योऽग्निर्दीप्यते।हे गौतम ! मेघ ही अग्नि है अर्थात् आहुतियोंकी आवृत्तिके क्रमसे द्वितीय आहुतिका आधार है। वृष्टिकी सामग्रीके अभिमानी देवताको पर्जन्य (मेघ) कहा गया है। उसका संवत्सर समिध् है। शरदसे लेकर ग्रीष्मपर्यन्त अपने अंशोंद्वारा विभिन्नरूपसे परिवर्तित होते हुए संवत्सरके द्वारा ही मेघरूप अग्नि दीप्त होता है।
अभ्राणि धूमः, धूमप्रभवत्वादू धूमवदुपलक्ष्यत्वाद्वा। विद्युदर्चिः, प्रकाशसामान्यात्। अशनिरङ्गाराः, उपशान्तत्वकाठिन्यसामान्याभ्याम्। ह्लादुनयो ह्लादुनयः स्तनयित्नुशब्दा विस्फुलिङ्गाः, विक्षेपानेकत्वसामान्यात्।अभ्र (बादल) धूम हैं; क्योंकि वे धूमसे उत्पन्न होते हैं अथवा धूमके समान दिखायी देते हैं। विद्युत् ज्वाला है; क्योंकि प्रकाशमें उनकी समानता है। उपशान्तत्व और कठिनतामें समानता होनेके कारण अशनि अङ्गारे हैं। 'ह्लादुनयः' अर्थात् मेघकी गर्जनाएँ विक्षेप और अनेकत्वमें समानता होनेके कारण विस्फुलिङ्ग हैं।
तस्मिन्नेतस्मिन्नित्याहुत्यधिकरणनिर्देशः। देवा इति त एव'उस इस (अग्नि) में' ऐसा कहकर आहुतिके अधिकरणका निर्देश किया गया है—देवगण अर्थात् वे

१२९६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६

१२९६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६

होतारः सोमं राजानं जुह्वति ।<br><br>योऽसौ द्युलोकाग्नौ श्रद्धायां हुतायामभिनिर्वृत्तः सोमः स द्वितीये पर्जन्याग्नौ हूयते; तस्याश्च सोमाहुतेर्वृष्टिः संभवति ॥ १० ॥ही होतृगण सोम राजाको होमते हैं। जो यह द्युलोकाग्निमें श्रद्धाका हवन करनेपर निष्पन्न हुआ सोम था, उसीको इस द्वितीय पर्जन्य (मेघ) रूप अग्निमें होमा जाता है। उस सोमकी आहुतिसे वृष्टि होती है ॥ १० ॥

३-इहलोकाग्नि

अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्य पृथिव्येव समिदग्निर्धूमो रात्रिरर्चिश्चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वृष्टिं जुह्वति तस्या आहुत्या अन्नँ संभवति ॥ ११ ॥

हे गौतम ! यह लोक ही अग्नि है। इसकी पृथिवी ही समिध् है, अग्नि धूम है, रात्रि ज्वाला है, चन्द्रमा अङ्गार है और नक्षत्र विस्फुलिङ्ग हैं। उस इस अग्निमें देवता वृष्टिको होमते हैं, उस आहुतिसे अन्न होता है ॥ ११ ॥

अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम;<br>अयं लोक इति प्राणिजन्मोपभोगाश्रयः क्रियाकारकफलविशिष्टः स तृतीयोऽग्निः;<br>तस्याग्नेः पृथिव्येव समित्; पृथिव्या ह्ययं लोकोऽनेकप्राण्युपभोगसंपन्नया समिध्यते ।हे गौतम ! यह लोक ही अग्नि है। यह लोक अर्थात् प्राणियोंके जन्म और उपभोगका आश्रयभूत तथा क्रिया, कारक और फलसे युक्त ऐसा जो यह लोक है, वही तृतीय अग्नि है। उस अग्निका पृथिवी ही समिध् है। प्राणियोंके अनेकों उपभोगोंसे सम्पन्न इस पृथिवीसे ही यह लोक दीप्त होता है।

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९७

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९७


अग्निर्धूमः; पृथिव्याश्रयोत्थानसामान्यात्; पार्थिवं हीन्धनद्रव्यमाश्रित्याग्निरुत्तिष्ठति, यथा समिदाश्रयेण धूमः ।अग्नि धूम है; क्योंकि पृथिवीरूप आश्रयसे उठनेमें इनकी समानता है; क्योंकि पार्थिव ईंधन द्रव्यको आश्रय करके ही अग्नि उठती है, जिस प्रकार कि समिधके आश्रयसे धूम उठता है ।
रात्रिरर्चिः, समित्सम्बन्धप्रभवसामान्यात्, अग्नेः समित्सम्बन्धेन ह्यर्चिः संभवति । तथा पृथिवीसमित्सम्बन्धेन शर्वरी, पृथिवीछायां हि शार्वरं तम आचक्षते ।रात्रि ज्वाला है, समिधके सम्बन्धसे उत्पन्न होनेमें इनकी समानता है; क्योंकि अग्निसे समिधका सम्बन्ध होनेसे ही ज्वाला उत्पन्न होती है और इसी प्रकार पृथिवीरूप समिधके सम्बन्धसे रात्रि होती है; पृथिवीकी छायाको ही रात्रिका अन्धकार कहते हैं ।
चन्द्रमा अङ्गाराः, तत्प्रभवत्वसामान्यात् । अर्चिषो ह्यङ्गाराः प्रभवन्ति तथा रात्रौ चन्द्रमा उपशान्तत्वसामान्याद् वा ।चन्द्रमा अङ्गार है; क्योंकि ज्वालासे उत्पन्न होनेमें इनकी समानता है । ज्वालासे ही अङ्गारे होते हैं, इसी प्रकार रात्रिमें चन्द्रमा होता है । अथवा उपशान्तत्वमें समानता होनेके कारण चन्द्रमा अङ्गार है ।
नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गाः, विस्फुलिङ्गवद् विक्षेपसामान्यात् ।नक्षत्र विस्फुलिङ्ग हैं, क्योंकि विस्फुलिङ्गोंके समान इधर-उधर बिखरे रहनेमें इनकी भी समानता है ।
तस्मिन्नेतस्मिन्नित्यादि पूर्ववत्।'तस्मिन्नेतस्मिन्' इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है ।
वृष्टिं जुह्वति तस्या आहुतेरन्नंइसमें वृष्टिको होमते हैं, उस आहुतिसे अन्न होता है;

बृ० उ०—८२