बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
२६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
| प्रतिपेदे ह प्रतिपन्नवान्किल। स एतस्मिन्ब्रह्मात्मदर्शनेऽवस्थित एतान्मन्त्रान्ददर्श—'अहं मनुरभवं सूर्यश्च' इत्यादीन्। 'तदेतद्ब्रह्म पश्यन्' इति ब्रह्मविद्या परामृश्यते। 'अहं मनुरभवं सूर्यश्च' इत्यादिना सर्वभावापत्तिं ब्रह्मविद्याफलं परामृशति। पश्यन्सर्वात्मभावं फलं प्रतिपेद इत्यस्मात्प्रयोगाद् ब्रह्मविद्यासहायसाधनसाध्यं मोक्षं दर्शयति; भुञ्जानस्तृप्यतीति यद्वत्। | ब्रह्मके दर्शनसे ही यह प्रतिपत्ति हुई—यह ज्ञान हुआ। इस ब्रह्मात्मदर्शनमें स्थित होकर उसने इन 'अहं मनुरभवं सूर्यश्च' इत्यादि मन्त्रोंका साक्षात्कार किया।<br>'तदेतद्ब्रह्म पश्यन्' इस वाक्यसे श्रुति ब्रह्मविद्याका परामर्श करती है तथा 'अहं मनुरभवं सूर्यश्च' इत्यादि वाक्यसे ब्रह्मविद्याके फल सर्वभावकी प्राप्तिका परामर्श करती है। ब्रह्मको देखनेवाले वामदेव ऋषि सर्वात्मभावरूप फलको प्राप्त हुए—इस प्रयोगसे वह मोक्षको ब्रह्मविद्याके सहायभूत साधनोंसे साध्य दिखलाती है, जैसे कि भोजन करनेवाला तृप्त होता है।^३ |
| सेयं ब्रह्मविद्यया सर्वभावापत्तिरासीन्महतां देवादीनां वीर्यातिशयात्। नेदानीमैंदंयुगीनानां विशेषतो मनुष्याणाम्, अल्पवीर्यत्वादिति स्यात्कस्यचिद्बुद्धिः, तदुत्थापनायाह— | ब्रह्मविद्याके द्वारा वह यह सर्वभावकी प्राप्ति देवादि महापुरुषोंको उनमें विशेष सामर्थ्य होनेके कारण हो गयी थी। अब वर्तमान युगके प्राणियोंको और उनमें भी अल्पवीर्य होनेके कारण मनुष्योंको उसकी प्राप्ति नहीं हो सकती—ऐसा यदि किसीका विचार हो तो उसे निवृत्त करनेके लिये श्रुति कहती है— |
१. मैं मनु हुआ और सूर्य भी। २. उस इस ब्रह्मको देखते हुए। ३. इस वाक्यमें जैसे भोजन-क्रिया तृप्तिका साधन प्रतीत होती है, उसी प्रकार मुक्तिका साधन ब्रह्मविद्या है।
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६७
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६७
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी भाष्यार्थ |
|---|---|
| तदिदं प्रकृतं ब्रह्म यत्सर्वभूतानुप्रविष्टं दृष्टिक्रियादिलिङ्गम्, एतर्हि तस्मिन्नपि वर्तमानकाले यः कश्चिद्व्यावृत्तबाह्यौत्सुक्य आत्मानमेवैवं वेद 'अहं ब्रह्मास्मि' इति—अपोह्योपाधिजनितभ्रान्तिविज्ञानाध्यारोपितान्विशेषान् संसारधर्मानागन्धितमनन्तरमबाह्यं ब्रह्मैवाहमस्मि केवलमिति—सोऽविद्याकृतासर्वत्वनिवृत्तेर्ब्रह्मविज्ञानादिदं सर्वं भवति । न हि महावीर्येषु वामदेवादिषु हीनवीर्येषु वा वार्तमानिकेषु मनुष्येषु ब्रह्मणो विशेषस्तद्विज्ञानस्य वास्ति । | उस इस प्रकृत ब्रह्मको, जो समस्त भूतोंमें अनुप्रविष्ट है तथा दृष्टि-क्रियादि जिसके लिङ्ग हैं, इस समय अर्थात् इस वर्तमानकालमें भी जो कोई बाह्य विषयोंकी अभिलाषासे मुक्त होकर आत्माको ही 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार जानता है अर्थात् उपाधिजनित मिथ्या ज्ञानसे आरोपित विशेषोंका बाध कर जो ऐसा अनुभव करता है कि मैं जिसमें संसारधर्मोंकी गंध भी नहीं है ऐसा अन्तर-बाह्यशून्य शुद्ध ब्रह्म ही हूँ, वह अविद्याकृत असर्वत्वकी निवृत्ति हो जानेसे ब्रह्मज्ञानके द्वारा यह सर्व हो जाता है । महान् प्रभावशाली वामदेवादि अथवा मन्दवीर्य आधुनिक पुरुषोंमें ब्रह्म अथवा उसके विज्ञानका कोई अन्तर नहीं है। |
| वार्तमानिकेषु पुरुषेषु तु ब्रह्मविद्याफले अनैकान्तिकता शङ्क्यत (ब्रह्मविद्या-माहात्म्यम्) इत्यत आह—तस्य ह ब्रह्मविज्ञातुर्यथोक्तेन विधिना देवा महावीर्याश्च नापि अभूत्य-अभवनाय ब्रह्मस्वभावस्य, नेशते न पर्याप्ताः, किमुतान्ये । | आधुनिक पुरुषोंमें ब्रह्मविद्याके फलकी अनिश्चितताकी शङ्का की जाती है, अतः श्रुति कहती है—महाप्रभावशाली देवगण भी उपर्युक्त विधिसे उस ब्रह्मको जाननेवालेकी अभूतिका अर्थात् ब्रह्मरूप सर्वभावको न होने देनेका सामर्थ्य नहीं रखते, फिर ओरोंकी तो बात ही क्याहै ? |
२६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| २६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| ब्रह्मविद्याफलप्राप्तौ विघ्नकरणे देवेभ्यः कथं विघ्नशङ्का <br><br> ब्रह्मविद्याफलप्राप्तौ देवादय ईशत इति का शङ्का ? इत्युच्यते—देवादान्प्रति ऋणवत्त्वान्मर्त्यानाम्। "ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्यः" इति हि जायमानमेवर्णवन्तं पुरुषं दर्शयति श्रुतिः। पशुनिदर्शनाच्च "अथोऽयं वा" (बृ० उ० १ । ४ । १६) इत्यादिश्लोकश्रुतेश्चात्मनो वृत्तिपरिपालयिषयाधमर्णानिव देवाः परतन्त्रान्मनुष्यान्प्रत्यमृतत्वप्राप्तिं प्रति विघ्नं कुर्युरिति न्याय्यैवैषा शङ्का। <br><br> स्वपशून्स्वशरीराणीव च रक्षन्ति देवाः। महत्तरां हि वृत्तिं कर्माधीनां दर्शयिष्यति देवादीनां बहुपशुसमतयैकैकस्य पुरुषस्य। "तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनु- | किंतु ब्रह्मविद्याके फलकी प्राप्तिमें विघ्न करनेमें देवादि समर्थ होते हैं—ऐसी शङ्का क्यों होती है ? इसपर कहते हैं—क्योंकि देवातिके प्रति मनुष्य ऋणवान् हैं, जैसा कि "ब्रह्मचर्यके द्वारा ऋषियोंसे, यज्ञद्वारा देवताओंसे और पुत्रोत्पादनद्वारा पितरोंसे [ उऋण हो ]" यह श्रुति जन्ममात्रसे ही पुरुषको ऋणी दिखाती है तथा "अथो¹ अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः" इस श्रुतिसे मनुष्यको पशुरूप बतलाया जानेके कारण जिस प्रकार उत्तमर्ण (ऋण देनेवाला) अधमर्णों (ऋण लेनेवालों) को कष्ट देता है उसी प्रकार देवगण भी अपनी वृत्तिका निर्वाह करनेके लिये परतन्त्र मनुष्योंके प्रति अमृतत्वप्राप्तिमें विघ्न करें—यह शङ्का न्याय्य ही है। <br><br> देवगण अपने इन पशुओंकी अपने शरीरोंके समान रक्षा करते हैं। एक-एक पुरुषकी अनेकों पशुओंसे समता करके श्रुति उसे देवादि-की बहुत बड़ी कर्माधीन वृत्ति दिखलायगी और यह भी कहेगी कि "अतः उन्हें यह प्रिय नहीं है |
१. यह प्रसिद्ध आत्मा समस्त भूतोंका भोग्य है ।
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २६९
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २६९
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| ष्या विद्युः” ( १ । ४ । १० ) इति हि वक्ष्यति । “यथा ह वै स्वाय लोकायारिष्टमिच्छेदेवँ हैवंविदे सर्वाणि भूतान्यरिष्टिमिच्छन्ति” ( १ । ४ । १६ ) इति च । | कि मनुष्य इस आत्मतत्त्वको जानें”। तथा आगे चलकर यह भी कहेगी कि “जिस प्रकार पुरुष अपने शरीरका अविनाश चाहते हैं उसी प्रकार जो ऐसा (देवताओंसे उऋण होनेके लिये अपना कर्त्तव्य) जानता है उसका देवादि समस्त भूत अविनाश चाहते हैं”। |
| ब्रह्मवित्त्वे परार्थ्यनिवृत्तेर्न स्वलोकत्वं पशुत्वञ्चेत्यप्रियारिष्टवचनाभ्यामवगम्यते । तस्माद्ब्रह्मविदो ब्रह्मविद्याफलप्राप्तिं प्रति कुर्युुरेव विघ्नं देवाः, प्रभाववन्तश्च हि ते । | किंतु ब्रह्मज्ञान हो जानेपर परार्थ्य (अन्यका उपभोग होना) निवृत्त हो जानेसे उसके देहात्मत्व और देवपशुत्व नहीं रहते—यह अभिप्राय उपर्युक्त अप्रिय और अरिष्टवाक्योंसे विदित होता है। अतः ब्रह्मवेत्ताको ब्रह्मविद्याका फल प्राप्त होनेमें देवगण विघ्न करेंगे ही और वे हैं भी प्रभावशाली। |
| नन्वेवं सत्यन्यास्वपि कर्मफलप्राप्तिषु देवानां विघ्नकरणं पेयपानसमम् 1। हन्त तर्हि विस्रम्भोऽभ्युदयनिःश्रेयससाधनानुष्ठानेषु । तथेश्वरस्याचिन्त्यशक्तित्वाद्दिघ्नकरणे प्रभुत्वम् । तथा कालकर्ममन्त्रौषधितपसाम् । | **शङ्का—**ऐसी बात है तो अन्य कर्मफलोंकी प्राप्तिमें विघ्न करना भी देवताओंके लिये जल पीनेके समान [सुलभ] है। तब तो अभ्युदय (भोग) और निःश्रेयस (मोक्ष) के साधनोंके अनुष्ठानमें विश्वास नहीं हो सकता। इसी प्रकार अचिन्त्यशक्तिसम्पन्न होनेके कारण ईश्वर भी विघ्न करनेमें समर्थ हैं ही। तथा काल, कर्म, मन्त्र, ओषधि और तपका भी बहुत बड़ा प्रभाव है। शास्त्र एवं |
Footnotes
-
पार्श्व-टिप्पणी: विघ्नभयाच्छास्त्रार्थसम्पादनाविस्त्रम्भ इत्याशङ्कयते ↩
२७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| एषां हि फलसम्पत्तिविपत्तिहेतुत्वं शास्त्रे लोके च प्रसिद्धम्। अतोऽप्यनाश्वासः शास्त्रार्थानुष्ठाने। | लोकमें फलकी प्राप्ति या अप्राप्तिमें इनकी हेतुता प्रसिद्ध ही है। इसलिये भी शास्त्राज्ञाके अनुष्ठानमें अविश्वास ही रहेगा। | | न; सर्वपदार्थानां नियतनिमित्तोपादानात्,<br><br>तन्निराक्रियते<br><br>जगद्वैचित्र्यदर्शनाच्च। स्वभावपक्षे च तदुभयानुपपत्तेः। 'सुखदुःखादिफलनिमित्तं कर्म' इत्येतस्मिन्पक्षे स्थिते वेदस्मृतिन्यायलोकपरिगृहीते, देवेश्वरकालास्तावन्न कर्मफलविपर्यायकर्तारः, कर्मणां काङ्क्षितकारकत्वात्। कर्म हि शुभाशुभं पुरुषाणां देवकालेश्वरादिकारकमनपेक्ष्य नात्मानं प्रति लभते, लब्धात्मकर्मापि फलदानेऽसमर्थम्, क्रियाया हि कारकाद्यनेकनिमित्तोपादानस्वाभाव्यात्। तस्मात्क्रियानुगुणा हि देवेश्वरा- | समाधान—ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि सभी पदार्थोंके निश्चित कारण ग्रहण किये जाते हैं तथा जगत्में सुख-दुःखादिवैचित्र्य भी देखा जाता है। यदि इन्हें स्वाभाविक माना जाय तो ये दोनों बातें होनी सम्भव नहीं हैं। 'सुख-दुःखादि फलका निमित्त कर्म है' इस वेद, स्मृति, न्याय और लोकद्वारा गृहीत पक्षके निश्चित होनेपर यह निर्विवाद सिद्ध होता है कि देवता, ईश्वर और काल तो कर्मफलका विपर्यय करनेवाले हैं नहीं, क्योंकि वे तो कर्मानुष्ठानके अपेक्षित कारक हैं—देव, काल और ईश्वरादि कारकोंकी अपेक्षा न करके तो मनुष्योंका शुभाशुभ कर्म स्वतः सम्पन्न ही नहीं हो सकता। यदि सम्पन्न हो भी जाय तो वह फल देनेमें समर्थ नहीं होगा, क्योंकि कारकादि अनेकों निमित्तोंको ग्रहण करना क्रियाका स्वभाव ही है। अतः देवता और ईश्वरादि कर्मके गुणका अनुसरण करनेवाले ही हैं, इसलिये |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २७१
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २७१
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| दय इति कर्मसु तावन्न फलप्राप्तिप्रत्ययविस्रम्भः ।<br>कर्मणामप्येषां वशानुगत्वं क्वचित्, स्वसामर्थ्यस्याप्रणोद्यत्वात् । कर्मकालदैवद्रव्यादिस्वभावानां गुणप्रधानभावस्त्वनियतो दुर्विज्ञेयश्चेति तत्कृतो मोहो लोकस्य—कर्मैव कारकं नान्यत्फलप्राप्ताविति केचित्; दैवमेवेत्यपरे; काल इत्येके; द्रव्यादिस्वभाव इति केचित्; सर्वं एते संहता एवेत्यपरे । तत्र कर्मणः प्राधान्यमङ्गीकृत्य वेदस्मृतिवादाः—"पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन" (बृ० उ० ३।२।१३) इत्यादयः । यद्यप्येषां स्वविषये कस्यचित्प्राधान्योद्भव इतरेषां तत्कालीनप्राधान्यशक्तिस्तम्भः, तथापि | उनके कारण कर्मोंमें फलप्राप्तिके प्रति अविश्वास नहीं हो सकता ।<br>इसके सिवा इन (देवादि) का विघ्न करना कर्मोंके भी अधीन है, क्योंकि कर्मोंके अपने सामर्थ्यका कहीं बाध नहीं हो सकता ।¹ कर्म, काल, दैव और द्रव्यादि स्वभावोंका गौण और मुख्य भाव अनिश्चित एवं दुर्विज्ञेय है । इसीसे उनके कारण लोगोंको मोह हो जाता है । किन्हींका मत है कि फलप्राप्तिमें कर्म ही कारक है, और कोई नहीं; कोई कहते हैं-दैव उसका हेतु है; किन्हींका कथन है कि काल इसका कारण है; कोई द्रव्यादिके स्वभावको इसका हेतु बतलाते हैं और किन्हींका मत है कि वे सब मिलकर कर्मफलप्राप्तिके हेतु हैं । इनमें कर्मकी प्रधानताको लेकर ही "पुण्यकर्मसे पुरुष पुण्यवान् होता है और पापकर्मसे पापी होता है" इत्यादि वेद और स्मृतिवाद प्रवृत्त होते हैं । यद्यपि अपने-अपने विषयमें इनमेंसे किसी-किसीकी प्रधानताका उदय होता है और उस समय अन्य कारकोंकी प्राधान्यशक्तिका निरोध |
१. अतः जबतक कोई पापमय अदृष्ट नहीं होगा, तबतक दुःखादिकों प्राप्ति नहीं हो सकती ।
२७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| २७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| न कर्मणः फलप्राप्तिं प्रत्यनैकान्तिकत्वम्, शास्त्रन्यायनिर्धारितत्वात्कर्मप्राधान्यस्य । | हो जाता है तथापि फलप्राप्तिमें कर्मका अनैकान्तिकत्व (अप्राधान्य) नहीं है, क्योंकि शास्त्र और न्यायसे कर्मकी प्रधानता निश्चित है। |
| न; अविद्यापगममात्रत्वाद् ब्रह्मप्राप्तिफलस्य—यदुक्तं ब्रह्मप्राप्तिफलं प्रति देवा विघ्नं कुर्यु-रिति, तत्र न देवानां विघ्नकरणे सांमर्थ्यम्; कस्मात् ? विद्याकालानन्तरितत्वाद् ब्रह्मप्राप्तिफलस्य । | तथा ब्रह्मविद्याके फलमें विघ्न नहीं पड़ता, क्योंकि ब्रह्मप्राप्तिका फल तो केवल अविद्याकी निवृत्ति ही है। ऊपर जो यह कहा गया था कि विद्या (ज्ञान) के ब्रह्मप्राप्तिरूप फलमें देवगण विघ्न करेंगे सो उसमें विघ्न करनेकी देवताओंमें शक्ति नहीं है। क्यों नहीं है ? क्योंकि ब्रह्मप्राप्तिरूप फल तो ज्ञान होनेके समय ही प्राप्त हो जाता है। |
| कथम् ? यथा लोके द्रष्टुश्चक्षुष आलोकेन संयोगो यत्कालः, तत्काल एव रूपाभिव्यक्तिः । | किस प्रकार ? जिस प्रकार लोकमें देखनेवालेके नेत्रोंका प्रकाशके साथ जिस समय संयोग होता है उसी समय रूपकी अभिव्यक्ति हो जाती है। |
| एवमात्मविषयं विज्ञानं यत्कालम्, तत्काल एव तद्विषयाज्ञानतिरोभावः स्यात् । | उसी प्रकार जिस समय आत्मविषयक ज्ञान होता है उसी समय तद्विषयक अज्ञानकी निवृत्ति हो जाती है। |
| अतो ब्रह्मविद्यायां सत्यामविद्याकार्यानुपपत्तेः प्रदीप इव तमःकार्यस्य, केन कस्य | अतः जिस प्रकार दीपकके रहते हुए अन्धकारका कार्य नहीं रहता उसी प्रकार ब्रह्मविद्याके रहते हुए अविद्याका कार्य रहना असम्भव है। जब कि ब्रह्मवेत्ता देवताओंके आत्मत्वको ही |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे २७३
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे २७३
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| विघ्नं कुर्युर्देवाः—यन्नात्मत्वमेव देवानां ब्रह्मविदः। | प्राप्त हो जाता है तो देवगण किसके द्वारा किसे विघ्न करेंगे ? |
| तदेतदाह—आत्मा स्वरूपं ध्येयं यत्तत्सर्वशास्त्रैर्विज्ञेयं ब्रह्म, हि यस्मात्, एषां देवानाम्, स ब्रह्मविद्भवति। ब्रह्मविद्यासमकालमेवाविद्यामात्रव्यवधानापगमाच्छुक्तिकाया इव रजताभासायाः शुक्तिकात्वमित्यवोचाम। अतो नात्मनः प्रतिकूलत्वे देवानां प्रयत्नः सम्भवति। यस्य ह्यनात्मभूतं फलं देशकालनिमित्तान्तरितम्, तत्रानात्मविषये सफलः प्रयत्नो विघ्नाचरणाय देवानाम्। न त्विह विद्यासमकाल आत्मभूते देशकालनिमित्तानन्तरिते, अवसरानुपपत्तेः। | यही बात श्रुति कहती है—क्योंकि वह ब्रह्मवेत्ता इन देवताओंका आत्मा—ध्येयस्वरूप अर्थात् जो सम्पूर्ण शास्त्रोंसे विज्ञेय ब्रह्म है वही हो जाता है, क्योंकि हम कह चुके हैं कि रजतरूपसे भासनेवाली शुक्तिके शुक्तिकात्वका ज्ञान होते ही जैसे भ्रान्तिजनित रजतत्वकी निवृत्ति हो जाती है वैसे ही ब्रह्मज्ञान होनेके समय ही अविद्यामात्र व्यवधानकी निवृत्ति हो जाती है। अतः आत्माकी प्रतिकूलतामें देवताओंका प्रयत्न होना सम्भव नहीं है। जहाँ देश, काल और निमित्तसे व्यवहित अनात्मभूत फल होता है वहाँ अनात्मविषयमें ही विघ्न करनेके लिये देवताओंका प्रयत्न सफल हो सकता है। यहाँ देश, काल और निमित्तसे अव्यवहित और ज्ञानोदयकालमें ही देवताओंके आत्मत्वको प्राप्त हो जानेवाले ब्रह्मवेत्ताके प्रति विघ्न करनेमें उनका प्रयत्न सफल नहीं होता, क्योंकि इसके लिये उन्हें अवसर मिलना ही सम्भव नहीं है। |
बृ० उ० १८—
२७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| २७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| अविद्यानिवृत्तौ विद्यावृत्तेः सामर्थ्य-विवेचनम् | |
|---|---|
| एवं तर्हि विद्याप्रत्ययसन्तत्याभावाद् विपरीतप्रत्ययतत्कार्ययोश्च दर्शनाद् अन्त्य एवात्मप्रत्ययोऽविद्यानिवर्तको न तु पूर्व इति । | **पूर्व०—**यदि ऐसी बात है तो बोधवृत्तिके प्रवाहका अभाव होनेके कारण तथा विपरीत वृत्ति और उसका कार्य देखा जानेसे यह निश्चय होता है कि अन्तिम आत्माकारवृत्ति ही अविद्याकी निवृत्ति करनेवाली हो सकती है, पहली नहीं। |
| न; प्रथमेनानैकान्तिकत्वात् । | **सिद्धान्ती—**ऐसा मत कहो, क्योंकि प्रथम आत्मप्रत्ययकी तरह अन्तिम प्रत्यय भी व्यभिचारी हो सकता है। |
| यदि हि प्रथम आत्मविषयः प्रत्ययोऽविद्यां न निवर्तयति, तथान्त्योऽपि, तुल्यविषयत्वात् । | यदि आत्मविषयक प्रथम प्रत्यय अविद्याकी निवृत्ति नहीं करता तो उसी तरह अन्तिम प्रत्यय भी नहीं करेगा, क्योंकि दोनोंका विषय समान ही है। |
| एवं तर्हि सन्ततोऽविद्यानिवर्तको न विच्छिन्न इति । | **पूर्व०—**यदि ऐसी बात है तो संतत (अविच्छिन्न) आत्मप्रत्यय ही अविद्याका निवर्तक हो सकता है, विच्छिन्न नहीं। |
| न, जीवनादौ सति सन्तत्यनुपपत्तेः । | **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जीवनादिके रहते हुए आत्माकारवृत्तिकी सन्तति (अविच्छिन्नता) सम्भव नहीं है। |
| न हि जीवनादिहेतुके प्रत्यये सति विद्याप्रत्ययसन्ततिरूपपद्यते, विरोधात् । | जीवनादिकी हेतुभूता वृत्तिके रहते हुए बोधवृत्तिकी अविच्छिन्नता सम्भव नहीं है, क्योंकि उनमें विरोध है। |
| अथ जीवनादिप्रत्ययतिरस्करणेनैव आ मरणा- | यदि कहो, जीवनादिकी हेतुभूता वृत्तियोंका तिरस्कार करके ही मरण- |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| न्ताद्विद्यासन्ततिरिति चेन्न, प्रत्ययेयत्तासन्तानानवधारणाच्छास्त्रार्थानवधारणदोषात् । इयतां प्रत्ययानां सन्ततिरविद्याया निवर्तिकेत्यनवधारणाच्छास्त्रार्थो नावध्रियेत, तच्चानिष्टम् । | पर्यन्त बोधवृत्तिका प्रवाह रहेगा तो यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि बोधवृत्तियोंकी इयत्ताके प्रवाहका निश्चय न होनेके कारण शास्त्राभिप्रायके अनिश्चयका दोष आवेगा । अर्थात् इतनी वृत्तियोंका प्रवाह अविद्याकी निवृत्ति करनेवाला है—ऐसा निश्चय न होनेके कारण शास्त्रका तात्पर्य निश्चित नहीं होगा और यह इष्ट नहीं है । |
| सन्ततिमात्रत्वेऽवधारित एवेति चेत् ? | पूर्व०—यदि ऐसा मानें कि बोधवृत्तिकी संततिमात्र होनेमें तो शास्त्रका तात्पर्य निश्चित ही है, तो ? |
| न, आद्यन्तयोरविशेषात् । | सिद्धान्ती—ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसी अवस्थामें भी आद्य प्रवाह और अन्तिम प्रवाहमें कोई अन्तर नहीं है । |
| प्रथमा विद्याप्रत्ययसन्ततिर्मरणकालान्ता वेति विशेषाभावात्, आद्यन्तयोः प्रत्ययोः पूर्वोक्तौ दोषौ प्रसज्येयाताम् । | बोधवृत्तिका प्रथम प्रवाह हो अथवा मरणकालमें समाप्त होनेवाला हो—इन आद्य और अन्तिम प्रत्ययोंमें कोई अन्तर न होनेके कारण पूर्वोक्त दोनों दोषोंका प्रसंग होगा । |
| एवं तर्ह्यनिवर्तक एवेति चेत् ? | पूर्व०—तब तो आत्माकारवृत्ति अज्ञानकी निवृत्ति करनेवाली है ही नहीं !—ऐसा कहें तो ? |
| न, “तस्मात्तत्सर्वमभवत्” (बृ० उ० १।४।१०) इति श्रुतेः । “भिद्यते हृदयग्रन्थिः” | सिद्धान्ती—ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि “अतः वह सर्व हो गया” इस श्रुतिसे तथा “हृदयकी ग्रन्थि |
२७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| (मु० उ० २।२।८)। “तत्र को मोहः” (ईशा० ७) इत्यादि श्रुतिभ्यश्च। | टूट जाती है,” “उस अवस्था में क्या मोह है” इत्यादि श्रुतियोंसे [ज्ञान-द्वारा अज्ञानकी निवृत्ति] सिद्ध होती है। | | अर्थवाद इति चेत् ? | पूर्व०—वे श्रुतियाँ अर्थवाद हों तो ? | | न, सर्वशाखोपनिषदामर्थवादत्वप्रसङ्गात्। एतावन्मात्रार्थत्वोपपत्तीणा हि सर्वशाखोपनिषदः। | सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो, क्योंकि इस प्रकार तो समस्त शाखाओंकी उपनिषदोंके अर्थवाद होनेका प्रसंग उपस्थित होगा; क्योंकि समस्त शाखाओंकी उपनिषदोंका पर्यवसान केवल इतने ही अर्थमें है। | | प्रत्यक्षप्रमितात्मविषयत्वादस्त्येवेति चेत् ? | पूर्व०—यदि कहें, प्रत्यक्ष प्रमाणसे ज्ञात होनेवाले आत्मासे सम्बद्ध होनेके कारण उनका अर्थवादत्व है ही, तो ? | | न, उक्तपरिहारत्वात्। अविद्याशोकमोहभयादिदोषनिवृत्तेः प्रत्यक्षत्वादिति चोक्तः परिहारः। तस्मादाद्योऽन्त्यः सन्ततोऽसन्ततश्चेत्यचोद्यमेतत्। अविद्यादिदोषनिवृत्तिफलावसानत्वाद्धिद्यायाः। य एवाविद्यादिदोषनिवृत्तिफलकृत्प्रत्यय आद्योऽन्त्यः सन्ततोऽसन्ततो वा स एव विद्येत्यभ्युप- | सिद्धान्ती—नहीं, इसका परिहार पहले किया जा चुका है। इसके सिवा आत्मज्ञानसे अविद्या, शोक, मोह एवं भय आदि दोषोंकी निवृत्तिका प्रत्यक्ष अनुभव होनेसे भी इस शङ्काका परिहार किया जा चुका है। अतः आद्य हो, अन्त्य हो, अविच्छिन्न हो, विच्छिन्न हो, उसके विषयमें शङ्का नहीं की जा सकती, क्योंकि ज्ञान तो अविद्यादि दोषोंकी निवृत्तिरूप फलमें ही पर्यवसित होनेवाला है। जो भी प्रत्यय अविद्यादि दोषोंकी निवृत्तिरूप फल प्रदान करनेवाला हो वह आद्य, अन्त्य, अविच्छिन्न, विच्छिन्न कैसा ही हो, वही ज्ञान माना जाता है; |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २७७
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २७७
| गमान्न चोद्यावतारगन्धोऽप्यस्ति । | इसलिये इसमें शङ्का उठनेका तो अवकाश ही नहीं है। |
|---|---|
| यत्तूक्तं विपरीतप्रत्ययतत्कार्ययोश्च दर्शनादिति, न; तच्छेषस्थितिहेतुत्वात् । येन कर्मणा शरीरमारब्धं तद्विपरीतप्रत्ययदोषनिमित्तत्वात्तस्य तथाभूतस्यैव विपरीतप्रत्ययदोषसंयुक्तस्य फलदाने सामर्थ्यमिति, यावच्छरीरपातः तावत्फलोपभोगाङ्गतया विपरीतप्रत्ययं रागादिदोषं च तावन्मात्रमाक्षिपत्येव, मुक्तेषुवत्प्रवृत्तफलत्वात्तद्धेतुकस्य कर्मणः। तेन न तस्य निवर्तिका विद्या, अविरोधात् । किं तर्हि स्वाश्रयादेव स्वात्मविरोध्यविद्याकार्यं यदु- | और यह जो कहा कि [ 'मैं ब्रह्म नहीं हूँ' ऐसा ] विपरीत प्रत्यय और उसका कार्य देखे जानेसे आत्मज्ञान अविद्याका निवर्तक नहीं है, सो ठीक नहीं; क्योंकि वह तो प्रारब्धशेषकी स्थितिके कारण है। जिस कर्मसे विद्वान्के शरीरका आरम्भ हुआ है, वह विपरीत प्रत्यय और रागादि दोषजनित होनेके कारण उसका तद्रूपसे यानी विपरीत प्रत्यय और रागादि दोषोंसे संयुक्त रहकर ही फलप्रदानमें सामर्थ्य है, अतः जबतक शरीरपात नहीं होता तबतक वह फलोपभोगके अङ्गरूपसे उतना-सा विपरीत प्रत्यय और रागादि दोष उपस्थित कर ही देता है, क्योंकि वह शरीरारम्भक कर्म छोड़े हुए बाणके समान फलप्रदानमें प्रवृत्त हो चुका है। अतः ज्ञान उसकी निवृत्ति करनेवाला नहीं है, क्योंकि उससे उसका विरोध नहीं है। तो फिर वह किसकी निवृत्ति करता है?—स्वाश्रित होनेके कारण जो अपना विरोधी अविद्याका कार्य |
२७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| तिप्सु तन्निरुणद्धि, अनागतत्वात् । अतीतं हीतरत् ।<br><br>किञ्च, न च विपरीतप्रत्ययो विद्यावत उत्पद्यते, निर्विषयत्वात् । अनवधृतविषयविशेषस्यरूपं हि सामान्यमात्रमाश्रित्य विपरीतप्रत्यय उत्पद्यमान उत्पद्यते, यथा शुक्तिकायां रजतमिति । स च विषयविशेषावधारणवतोऽशेषविपरीतप्रत्ययाश्रयस्योपमर्दितत्वान्न पूर्ववत्सम्भवति, शुक्तिकादौ सम्यक्प्रत्ययोत्पत्तौ पुनरदर्शनात् ।<br><br>क्वचित्तु विद्यायाः पूर्वोत्पन्नविपरीतप्रत्ययजनितसंस्कारेभ्यो विपरीतप्रत्ययावभासाः स्मृतयो जायमाना विपरीतप्रत्ययभ्रान्तिमकस्मात्कुर्वन्ति; यथा विज्ञातदिग्विभागस्याप्यकस्माद्दिग्विपर्ययविभ्रमः । सम्यग्ज्ञानवतोऽपि चेत्पूर्ववद्विपरीतप्रत्यय उत्पद्यते, | उत्पन्न होनेवाला होता है, उसे ही वह रोकता है; क्योंकि वह अनागत है और प्रारब्ध तो अतीत है ।<br><br>इसके सिवा, विद्वान्को विपरीत प्रत्यय उत्पन्न हो भी नहीं सकता, क्योंकि उसके लिये कोई विषय नहीं रहता । विषयके विशेष स्वरूपका निश्चय न होनेपर उसके सामान्य स्वरूपको आश्रित करके उत्पन्न होनेवाला ही विपरीत प्रत्यय उत्पन्न होता है; जैसे शुक्तिमें रजत । किंतु जिसे विषयके विशेष रूपका निश्चय हो गया है, उसकी दृष्टिमें सब प्रकारके विपरीत प्रत्ययके आश्रयका बाध हो जानेके कारण उसका पूर्ववत् उत्पन्न होना सम्भव नहीं है; जैसे कि शुक्तिकादिमें, उनका सम्यग्ज्ञान हो जानेपर फिर रजतादिका भ्रम होता नहीं देखा जाता ।<br><br>परंतु कभी-कभी ज्ञानोदयसे पूर्व उत्पन्न हुए विपरीत प्रत्ययजनित संस्कारोंसे विपरीत प्रत्ययके समान भासनेवाली स्मृतियाँ उत्पन्न होकर अकस्मात् विपरीत प्रत्ययकी भ्रान्ति पैदा कर देती हैं, जिस प्रकार दिशाओंके विभागको अच्छी तरह जाननेवाले पुरुषको भी अकस्मात् दिग्भ्रम पैदा हो जाता है । यदि सम्यग्ज्ञानवान्को भी पूर्ववत् विपरीत |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे २७९
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे २७९
| सम्यग्ज्ञानेऽप्यविस्रम्भाच्छास्त्रार्थविज्ञानादौ प्रवृत्तिरसञ्जसा स्यात्सर्वं च प्रमाणमप्रमाणं सम्पद्येत प्रमाणाप्रमाणयोर्विशेषाद्यनुपपत्तेः। | प्रत्यय उत्पन्न हो जाय तो सम्यग्ज्ञानमें भी अविश्वास हो जानेसे शास्त्रके तात्पर्य और विज्ञानादिमें प्रवृत्ति होनी कठिन हो जाय और फिर सारा प्रमाण अप्रमाण हो जाय, क्योंकि उस अवस्थामें प्रमाण और अप्रमाणमें कोई अन्तर ही न रहेगा। |
|---|---|
| एतेन 'सम्यग्ज्ञानानन्तरमेव शरीरपाताभावः कस्मात्?' इत्येतत् परिहृतम्। ज्ञानोत्पत्तेः प्रागूर्ध्वं तत्कालजन्मान्तरसञ्चितानां च कर्मणामप्रवृत्तफलानां विनाशः सिद्धो भवति फलप्राप्तिविघ्ननिषेधश्रुतेरेव। "क्षीयन्ते चास्य कर्माणि" (मु० उ० २।२।८)। "तस्य तावदेव चिरम्" (छा० उ० ६।१४।२)। "सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते" (छा० उ० ५।२४।३)। "तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेन" (बृ० उ० ४।४।२३)। "एतमु हैवैते न तरतः" (४।४।२२)। "नैनं कृताकृते तपतः" (४।४।२२)। "एतं ह वाव न तपति" (तै० उ० २।९।१)। "न बिभेति कुतश्चन" (तै०उ०२।९।१) इत्यादि श्रुतिभ्यश्च। "ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते" (गीता | इस (छोड़े हुए बाणके) न्यायसे इस शङ्काका परिहार किया गया कि सम्यग्ज्ञानके पश्चात् तुरंत ही देहपात क्यों नहीं होता ? ज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व, उसके पीछे और उसकी उत्पत्तिके समय होनेवाले तथा जन्मान्तरके सञ्चित अप्रवृत्तफल कर्मोंका विनाश तो "तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशते" इस ज्ञानफलकी प्राप्तिके विघ्नका निषेध करनेवाली श्रुतिसे ही सिद्ध होता है। तथा "इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं", "उसके मोक्षमें तभीतक देरी है", "उसके सब पाप भस्म हो जाते हैं", "उसे जानकर पापकर्मसे लिप्त नहीं होता", "ये पाप-पुण्य इस (आत्मज्ञानी) का अतिक्रमण नहीं कर सकते", "इसे पाप-पुण्य संतप्त नहीं करते", "उसीको ताप नहीं देता", "किसीसे नहीं डरता" इत्यादि श्रुतियों और "ज्ञानाग्नि समस्त कर्मोंको भस्म कर |
२८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| ४ । ३७) इत्यादिस्मृतिभ्यश्च। | देती है" इत्यादि स्मृतियोंसे भी यही सिद्ध होता है। |
| [कर्मणामविद्याविषयत्वम्]<br>यत्तु ऋणैः प्रतिबध्यत इति, तन्न, अविद्यावद्विषयत्वात्। अविद्यावान्हि ऋणी, तस्य कर्तृत्वादुपपत्तेः। "यत्र वा अन्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येत्" (४। ३। ३१) इति हि वक्ष्यति। अनन्यत्सद्वस्त्वात्माख्यं यत्राविद्यायां सत्यामन्यदिव स्यात्तिमिरकृतद्वितीयचन्द्रवत्, तत्राविद्याकृतानेककारकापेक्षं दर्शनादिकर्म तत्कृतं फलं च दर्शयति, "तत्रान्योऽन्यत्पश्येत्" इत्यादिना। | और यह जो कहा गया कि यह ऋणोंसे बँधा हुआ है, सो ठीक नहीं, क्योंकि ऋणोंका सम्बन्ध तो अविद्वान्से ही है। अज्ञानी पुरुष ही ऋणी है; क्योंकि उसीमें कर्तृत्वादि रहने सम्भव हैं। "जहाँ अन्यके समान होता है वहीं अन्य अन्यको देख सकता है" ऐसा श्रुति कहेगी भी। तात्पर्य यह है कि आत्मा-संज्ञक सद्वस्तु अनन्य है, वह जहाँ अविद्यावस्थामें तिमिर रोगकृत द्वितीयचन्द्रके समान अन्यके समान होती है, वहींपर श्रुति "वहाँ अन्य अन्यको देखेगा" इस वाक्यसे अनेक कारकोंकी अपेक्षावाला अविद्याकृत दर्शनादि कर्म और उससे होनेवाला फल भी दिखाती है। |
| यत्र पुनर्विद्यायां सत्यामविद्याकृतानेकत्वभ्रमप्रहाणम्, "तत्केन कं पश्येत्" (४। ५। १५) इतिकर्मासम्भवं दर्शयति। तस्मादविद्यावद्विषय एव ऋणित्वम्, कर्मसम्भवात्; नेतरत्र। एतच्चोत्तरत्र | किंतु जहाँ ज्ञानका उदय होने-पर अज्ञानजनित अनेकत्वभ्रमका नाश हो जाता है, वहाँ "तब किसके द्वारा किसे देखे" यह श्रुति कर्मकी असम्भवता दिखलाती है। अतः ऋणित्वका अविद्वान्से ही सम्बन्ध है, क्योंकि उसीके द्वारा कर्म होना सम्भव है, अन्य (ज्ञानवान्) से नहीं। यही बात आगे, जिन वाक्यों- |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २८१
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २८१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| व्याचिख्यासिष्यमाणैरेव वाक्यैर्विस्तरेण प्रदर्शयिष्यामः । | की व्याख्या करनेकी हमारी इच्छा है, उनसे विस्तारपूर्वक दिखायेंगे। |
| तद्यथैव तावत्—अथ यः कश्चिदब्रह्मविद् अन्यामात्मनो व्यतिरिक्तां यां काञ्चिद्देवताम्, उपास्ते स्तुतिनमस्कारयागबल्युपहारप्रणिधानध्यानादिना उप आस्ते तस्या गुणभावमुपगम्य आस्ते—अन्योऽसावनात्मा मत्तः पृथक्, अन्योऽहमस्म्यधिकृतः, मयास्मै ऋणिवत्प्रतिकर्तव्यम्—इत्येवम्प्रत्ययः सन्नुपास्ते; न स इत्थम्प्रत्ययो वेद विजानाति तत्त्वम् । | वह बात [ ऐसी है ] जैसी कि यहाँ ( इस मन्त्रमें ) भी कही गयी है और जो कोई अब्रह्मज्ञ अन्य—अपनेसे भिन्न जिस किसी भी देवताकी उपासना करता है—स्तुति, नमस्कार, यज्ञ, बलि, उपहार, प्रणिधान ( सर्वकर्मार्पण ) और ध्यानादिद्वारा उसके समीप उपस्थित होता है अर्थात् उसके गुणभाव ( शेषत्व ) को प्राप्त होकर रहता है और [ मनमें यह भाव रखता है कि ] वह देवता अन्य—अनात्मा यानी मुझसे पृथक् है तथा मैं उपासनाका अधिकारी इससे भिन्न हूँ, मुझे ऋणीके समान इसके उपकारका बदला चुकाना चाहिये—ऐसे भावसे युक्त होकर उसको उपासना करता है, वह इस प्रकारके भाववाला पुरुष तत्त्वको नहीं जानता। |
| न स केवलमेवंभूतोऽविद्वानविद्यादोषवानेव, किं तर्हि? यथा पशुर्गवादिर्वाहनदोहनाद्युपकारैरुपभुज्यते, एवं स इज्याद्यनेकोपकारैरुपभोक्तव्यत्वादेकैकैन | वह ऐसा अज्ञानी केवल अविद्यारूप दोषसे ही युक्त नहीं है, तो फिर कैसा है ? जिस प्रकार गौ-बैल आदि पशु दोहन और वाहनादि उपकारोंसे उपभोगमें लाया जाता है, उसी प्रकार वह यज्ञादि अनेकों उपकारोंके कारण एक-एक देवादिका उपभोग्य होनेसे [ उनका पशु ही है ] । |
२८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| २८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| देवादीनाम्, अतः पशुखिव सर्वार्थेषु कर्मस्वधिकृत इत्यर्थः ।<br><br>एतस्य ह्यविदुषो वर्णाश्रमादिप्रविभागवतोऽधिकृतस्य कर्मणो विद्यासहितस्य केवलस्य च शास्त्रोक्तस्य कार्यं मनुष्यत्वादिको ब्रह्मान्त उत्कर्षः । शास्त्रोक्तविपरीतस्य च स्वाभाविकस्य कार्यं मनुष्यत्वादिक एव स्थावरान्तोऽपकर्षः । यथा चैतत्तथा “अथ त्रयो वाव लोकाः” ( १ । ५ । १६ ) इत्यादिना वक्ष्यामः कृत्स्नेनैवाध्यायशेषेण ।<br><br>विद्यायाश्च कार्यं सर्वात्मभावापत्तिरित्येतत्सङ्क्षेपतो दर्शितम् । सर्वाहीयमुपनिषद् विद्याविद्याविभागप्रदर्शनेनैवोपक्षीणा । यथा चैषोऽर्थः कृत्स्नस्य शास्त्रस्य तथा प्रदर्शयिष्यामः ।<br><br>यस्मादेवम्, तस्मादविद्यावन्तं पुरुषं प्रति देवा ईशत एव विघ्नं कर्तुमनुग्रहं चेत्येतद्दर्शयति—<br>(टिप्पणी: अविद्वांसं प्रत्येव देवानां निग्रहानुग्रहसामर्थ्यम्) | अतः तात्पर्य यह है कि वह पशुके समान सब प्रकारके फल देनेवाले कर्मोंका अधिकारी है ।<br><br>इस वर्णाश्रमादि विभागवान् कर्माधिकारी अविद्वान्के ज्ञानसहित तथा केवल शास्त्रोक्त कर्मोंका कार्य मनुष्यत्वसे लेकर ब्रह्मत्वपर्यन्त उत्कर्ष होना है तथा शास्त्रोक्तसे विरुद्ध जो स्वाभाविक कर्म है, उसका कार्य मनुष्यत्वसे लेकर स्थावर योनियोंतक अधोगति होना है । यह जिस प्रकार है, उस सबका हम इस अध्यायके अन्तमें “अथ त्रयो वाव लोकाः” इत्यादि वाक्यसे सम्यक् प्रकारसे वर्णन करेंगे ।<br><br>तथा ज्ञानका कार्य सर्वात्मभावकी प्राप्ति है, यह बात संक्षेपतः दिखलायी गयी है । यह सारी ही उपनिषद् ज्ञान और अज्ञानका विभाग प्रदर्शित करनेमें ही समाप्त हुई है । सम्पूर्ण शास्त्रोंका यही अभिप्राय जिस प्रकार है, सो हम आगे दिखलावेंगे ।<br><br>क्योंकि ऐसा है, इसलिये अब श्रुति यह दिखलाती है कि देवगण अविद्वान् पुरुषके प्रति ही विघ्न या अनुग्रह करनेमें समर्थ होते हैं । जिस |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २८३
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २८३
| यथा ह वै लोके बहवो गोअश्वादयः पशवो मनुष्यं स्वामिनमात्मनोऽधिष्ठातारं भुञ्ज्युः पालयैयुरेवं बहुपशुस्थानीय एकैकोऽविद्वान्पुरुषो देवान्—देवानिति पित्राद्युपलक्षणार्थम्—भुनक्ति पालयतीति। इम इन्द्रादयोऽन्ये मत्तो ममेशितारो भृत्य इवाहमेषां स्तुतिनमस्कारेज्यादिनाराधनं कृत्वाभ्युदयं निःश्रेयसं च तत्प्रत्तं फलं प्राप्स्यामीत्येवमभिसन्धिः। | प्रकार लोकमें गौ-घोड़े आदि बहुत-से पशु अपने स्वामी-अधिष्ठाता मनुष्यका भरण-पालन करते हैं, उसी प्रकार अनेक पशुस्थानीय एक-एक अज्ञानी पुरुष देवताओंका भरण-पालन करता है। 'देवान्' यह पद पितृगणादिका भी उपलक्षण कराता है। 'मुझसे भिन्न ये इन्द्रादि मेरे शासक हैं, मैं सेवकके समान स्तुति, नमस्कार एवं यज्ञादिसे इनकी आराधना करके इनके दिये हुए भोग और मोक्ष सब फल प्राप्त करूँगा' इस प्रकार अज्ञानीका संकल्प होता है। | | तत्र लोके बहुपशुमतो यथैकस्मिन्नेव पशावादीयमाने व्याघ्रादिनापह्रियमाणे महदप्रियं भवति, तथा बहुपशुस्थानीय एकस्मिन्पुरुषे पशुभावाद् व्युत्तिष्ठत्यप्रियं भवतीति, किं चित्रं देवानां बहुपश्वपहरण इव कुटुम्बिनः। तस्मादेषां देवानां तन्न प्रियम्, किं तत् ? यदेतद्ब्रह्मात्मतत्त्वं कथञ्चन मनुष्या विद्युुर्विजानीयुः तथा च स्मरणमनुगीतासु भगवतो व्यासस्य— | ऐसी अवस्था में, जिस प्रकार लोकमें किसी बहुत-से पशुओंवाले पुरुषके एक पशुके भी चले जानेपर—व्याघ्रादि द्वारा हरण कर लिये जानेपर उसे बहुत बुरा मालूम होता है, उसी प्रकार किसी कुटुम्बीके बहुत-से पशु चुरा लिये जानेके समान अनेक पशुस्थानीय एक पुरुषके भी पशुभावसे उठ जानेपर यदि देवताओंको अच्छा नहीं लगता तो इसमें आश्चर्य क्या है ? अतः इन देवताओंको यह प्रिय नहीं है; क्या ? यही कि ये मनुष्य इस ब्रह्मात्मतत्त्वको किसी प्रकार भी जानें। ऐसी ही अनुगीतामें भगवान् |
२८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| “क्रियावद्भिर्हि कौन्तेय<br>देवलोकः समावृतः ।<br>न चैतदिष्टं देवानां<br>मर्त्यैरुपारि वर्तनम् ॥”<br>अतो देवाः पशूनिव व्याघ्रादिभ्यो ब्रह्मविज्ञानाद्विघ्नमाचिकीर्षन्ति; अस्मदुपभोग्यत्वान्मा व्युत्तिष्ठेरुरिति । यं तु मुमोचयिषन्ति तं श्रद्धादिभिर्योक्ष्यन्ति विपरीतमश्रद्धादिभिः । तस्मान्मुमुक्षुर्देवाराधनपरः श्रद्धाभक्तिपरः प्रगेयोऽप्रमादी स्याद्विद्याप्राप्तिं प्रति विद्यां प्रतीति वा काक्वैकतत्प्रदर्शितं भवति देवाप्रियवाक्येन ॥ १० ॥ | व्यासकी स्मृति भी है—“हे कौन्तेय ! देवलोक कर्मपरायण पुरुषोंसे भरा हुआ है। देवताओंको यह इष्ट नहीं है कि मनुष्य उनसे ऊपर (ब्रह्मलोकादिमें) रहें।”<br>अतः देवगण, यह सोचकर कि हमारे उपभोग्य होनेके कारण मनुष्य हमसे ऊपर न उठने पावें, पशुओंको व्याघ्रादिसे दूर रखनेके समान मनुष्योंको ब्रह्मविज्ञानसे दूर रखनेके लिये विघ्न उपस्थित करते हैं। वे जिसे मुक्त करना चाहते हैं उसे श्रद्धादि साधनोंसे सम्पन्न कर देते हैं और जिसे मुक्त नहीं करना चाहते उसे अश्रद्धादियुक्त कर देते हैं। अतः मोक्षकामी पुरुषको देवाराधनतत्पर, श्रद्धाभक्तिपरायण, देवताओंका प्रिय तथा ज्ञानप्राप्तिके साधन श्रवणादि अथवा उनके फलभूत ज्ञानके प्रति अप्रमादयुक्त होना चाहिये—यह भाव देवताओंका अप्रियत्व बतलानेवाले वाक्यसे काकूक्तिद्वारा¹ प्रदर्शित होता है॥ १०॥ |
१. शोक या भय आदिके कारण पुरुषके स्वरमें जो एक प्रकारका कम्प उत्पन्न होता है उसे ‘काकु’ कहते हैं। श्रुतिमें ‘देवताओंको यह प्रिय नहीं है’ ऐसा कहकर काकूक्तिसे यह बतलाया है कि मोक्षकामीको ज्ञानप्राप्तिके साधनोंमें तथा उपासनादिके द्वारा देवताओंकी प्रसन्नता सम्पादन करनेमें सावधान रहना चाहिये।
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २८५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २८५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| सूत्रितः शास्त्रार्थः ‘आत्मत्येवोपासीत’ इति । तस्य च व्याचिख्यासितस्य सार्थवादेन “तदाहुर्यद्ब्रह्मविद्यया” इत्यादिना सम्बन्धप्रयोजने अभिहिते । अविद्यायाश्च संसाराधिकारकारणत्वमुक्तम् “अथ योऽन्यां देवतामुपास्ते” इत्यादिना । तत्राविद्वानृणी पशुवद्देवादि कर्मकर्तव्यतया परतन्त्र इत्युक्तम् ।<br><br>किं पुनर्दैवादिकर्मकर्तव्यत्वे निमित्तम् ? वर्णा आश्रमाश्च । तत्र के वर्णाः ? इत्यत इदमारभ्यते। यन्निमित्तसम्बद्धेषु कर्मस्वयं परतन्त्र एवाधिकृतः संसारीति ।<br><br>एतस्यैवार्थस्य प्रदर्शनायाग्निसर्गानन्तरमिन्द्रादिसर्गो नोक्तः। अग्नेस्तु सर्गः प्रजापतेः सृष्टिपरिपूरणाय प्रदर्शितः। अयं च इन्द्रादिसर्गस्तत्रैव द्रष्टव्यस्तच्छेष- | ‘आत्मत्येवोपासीत’ इस वाक्यसे शास्त्रके तात्पर्यका सूत्ररूपमें संक्षेपसे वर्णन किया गया । फिर “तद्यो यो देवानां प्रत्यबुद्ध्यत” इत्यादि अर्थवादके सहित “तदाहुर्यद्ब्रह्मविद्यया” इत्यादि मन्त्रवाक्यद्वारा व्याख्या करनेके लिये अभीष्ट उस शास्त्रार्थके सम्बन्ध और प्रयोजन बतलाये गये, तथा “अथ योऽन्यां देवतामुपास्ते” इत्यादि वाक्यसे अविद्याको संसारोत्पत्तिमें कारण बताया । वहाँ यह कहा गया है कि अज्ञानी ऋणी होता है; अर्थात् पशुके समान देवकर्मादिकी कर्तव्यतासे युक्त होनेके कारण परतन्त्र होता है ।<br><br>किंतु देवादि कर्मोंकी कर्तव्यतामें कारण क्या है ? वर्ण और आश्रम । उनमें, जिस वर्णरूप निमित्तसे सम्बद्ध कर्मोंमें इस परतन्त्र संसारी जीवका ही अधिकार है, वे वर्ण कौन-से हैं?— ऐसा प्रश्न होनेपर यहाँसे आरम्भ किया जाता है। इस अर्थको प्रदर्शित करनेके प्रयोजनसे ही अग्निसर्गके पश्चात् इन्द्रादि सर्गका वर्णन नहीं किया। अग्निसर्गको तो प्रजापतिकी सृष्टिकी सब प्रकार पूर्ति करनेके लिये प्रदर्शित किया था। प्रजापति सर्गका शेषभूत होनेके कारण इस इन्द्रसर्गको वहीं (उसीके अन्तर्गत) समझना |