बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
[ २४ ]
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| पञ्चम ब्राह्मण | |
| २५४-प्रथमज सत्य-ब्रह्म और 'सत्य' नामके अक्षरोंकी उपासना | ११६४ |
| २५५-एक-दूसरेमें प्रतिष्ठित सत्यसंज्ञक आदित्यमण्डलस्थ और चाक्षुष पुरुष | ११६७ |
| २५६-अहःसंज्ञक आदित्यमण्डलस्थ पुरुषके व्याहृतिरूप अवयव | १२०० |
| २५७-अहंसंज्ञक चाक्षुष पुरुषके व्याहृतिरूप अवयव | १२०१ |
| षष्ठ ब्राह्मण | |
| २५८-हृदयस्थ मनोमय पुरुषकी उपासना | १२०२ |
| सप्तम ब्राह्मण | |
| २५९-विद्युद्ब्रह्मकी उपासना | १२०४ |
| अष्टम ब्राह्मण | |
| २६०-धेनुरूपसे वाक्की उपासना | १२०५ |
| नवम ब्राह्मण | |
| २६१-पुरुषान्तर्गत वैश्वानराग्नि, उसका घोष और मरणकालका सूचक अरिष्ट | १२०७ |
| दशम ब्राह्मण | |
| २६२-प्रकरणान्तर्गत उपासनाओंसे प्राप्त होनेवाली गति | १२०६ |
| एकादश ब्राह्मण | |
| २६३-व्याधि, श्मशानगमन और अग्निदाहमें परम तपदृष्टिका विधान | १२११ |
| द्वादश ब्राह्मण | |
| २६४-अन्न-प्राणरूप ब्रह्मकी उपासना और तद्विषयक आख्यान | १२१३ |
| त्रयोदश ब्राह्मण | |
| २६५-उक्थदृष्टिसे प्राणोपासना | १२१८ |
| २६६-यजुर्दृष्टिसे प्राणोपासना | १२१६ |
| २६७-सामदृष्टिसे प्राणोपासना | १२२० |
| २६८-क्षत्रदृष्टिसे प्राणोपासना | १२२१ |
| चतुर्दश ब्राह्मण | |
| २६९-गायत्र्युपासना | १२२२ |
| २७०-गायत्रीके प्रथम लोक-पादकी उपासना | १२२३ |
( २५ )
विषय
२७१—गायत्रीके द्वितीय त्रयीपादकी उपासना ... १२२४
२७२—गायत्रीके तृतीय प्राणादिपाद और तुरीय दर्शत परोरजापादकी उपासना ... १२२५
२७३—गायत्रीकी परमप्रतिष्ठा प्राण हैं, 'गायत्री' शब्दका निर्वचन और वटुको किये गये गायत्र्युपदेशका फल ... १२२८
२७४—अनुष्टुप् सावित्रीके उपदेशका निषेध और गायत्री-सावित्रीका महत्त्व १२३२
२७५—गायत्रीके प्रत्येक पदके महत्त्वका दिग्दर्शन ... १२३४
२७६—गायत्रीका उपस्थान और उसका फल ... १२३६
२७७—गायत्रीके मुखविधानके लिये अर्थवाद ... १२३६
पञ्चदश ब्राह्मण
२७८-ज्ञानकर्मसमुच्चयकारीकी अन्तकालमें आदित्य और अग्निसे प्रार्थना १२४१
षष्ठ अध्याय
प्रथम ब्राह्मण
२७९-ज्येष्ठ-श्रेष्ठ दृष्टिसे प्राणोपासना ... १२४८
२८०-वसिष्ठादृष्टिसे वाक्की उपासना ... १२५०
२८१-प्रतिष्ठादृष्टिसे चक्षुकी उपासना ... १२५१
२८२-सम्पदृदृष्टिसे श्रोत्रकी उपासना ... १२५२
२८३-आयतनदृष्टिसे मनकी उपासना ... १२५३
२८४-प्रजातिदृष्टिसे रेतस्की उपासना ... १२५४
२८५-अपनी श्रेष्ठताके लिये विवाद करते हुए वागादि प्राणोंका ब्रह्माके पास जाना और ब्रह्माका यह निर्णय करनेके लिये एक कसौटी बताना १२५५
२८६-अपनी उत्कृष्टताकी परीक्षाके लिये वाक्का उत्क्रमण और पुनः प्रवेश १२५६
२८७-चक्षुका उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश ... १२५७
२८८-श्रोत्रका उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश ... १२५८
२८९-मनका उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश ... १२५८
२९०-रेतस्का उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश ... १२५९
२९१-प्राणके उत्क्रमण करते ही अन्य इन्द्रियोंका विचलित हो जाना और उसकी श्रेष्ठता स्वीकार करना ... १२६०
२९२-वागादिकृत प्राणकी स्तुति और उसे अन्न तथा वस्त्र प्रदान ... १२६२
द्वितीय ब्राह्मण
२९३-प्रवाहणकी सभामें श्वेतकेतुका आना और प्रवाहणका उससे प्रश्न करना १२७३
२९४-प्रवाहणके पाँच प्रश्न और श्वेतकेतुका उन सभीके प्रति अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना ... १२७५
( २६ )
| विषय | पृष्ठ. |
|---|---|
| २६५-श्वेतकेतुका अपने पिताके पास आकर उलाहना देना | ... १२७६ |
| २६६-पिता आरुणिका उनके विषयमें अपनी अनभिज्ञता बताकर उसे शान्त करना और उनका उत्तर जाननेके लिये प्रवाहणके पास आना | १२८१ |
| २६७-आरुणिका प्रवाहणसे अपने पुत्रसे पूछी हुई बात कहनेकी प्रार्थना करना | ... १२८३ |
| २६८-प्रवाहणका उसे दैववर बताकर अन्य मानुषवर माँगनेके लिये कहना | १२८४ |
| २६९-आरुणिका आग्रह और प्रवाहणकी स्वीकृतिसे वाणीद्वारा उसका शिष्यत्व स्वीकार करना | ... १२८४ |
| ३००-प्रवाहणकी क्षमा-प्रार्थना और विद्यादानके लिये तत्पर होना | ... १२८६ |
| ३०१-चतुर्थ प्रश्नका उत्तर—पञ्चाग्निविद्या | |
| १-द्युलोकाग्नि | ... १२८८ |
| २-पर्जन्याग्नि | ... १२९४ |
| ३-इहलोकाग्नि | ... १२९६ |
| ४-पुरुषाग्नि | ... १२९८ |
| ५-योषाग्नि | ... १२९६ |
| ३०२-प्रथम प्रश्नका उत्तर—अन्त्येष्टि संस्काररूप अन्तिम आहुति | ... १३०१ |
| ३०३-पञ्चम प्रश्नका उत्तर—देवयानमार्गका वर्णन | ... १३०२ |
| ३०४-धूमयानमार्गका वर्णन तथा द्वितीय और तृतीय प्रश्नका उत्तर | ... १३११ |
| तृतीय ब्राह्मण | |
| ३०५-श्रीमन्थकर्म और उसकी विधि | ... १३१८ |
| ३०६-मन्थकर्मकी सामग्री और हवनविधि | ... १३१६ |
| ३०७-हवनके मन्त्र | ... १३२४ |
| ३०८-मन्थाभिमर्शका मन्त्र | ... १३२६ |
| ३०९-मन्थको उठानेका मन्त्र | ... १३२७ |
| ३१०-मन्थभक्षणकी विधि | ... १३२७ |
| ३११-मन्थकर्मका वंश | ... १३३० |
| ३१२-मन्थकर्मकी सामग्रीका विवरण | ... १३३३ |
| चतुर्थ ब्राह्मण | |
| ३१३-संतानोत्पत्ति-विज्ञान अथवा पुत्रमन्थकर्म | ... १३३४ |
| ३१४-नाम-कर्म | ... १३६१ |
| पञ्चम ब्राह्मण | |
| ३१५-समस्त प्रवचनका वंश | ... १३६३ |
चित्र-सूची
| पृष्ठ | ||
|---|---|---|
| १—भाष्यकार भगवान् शंकर | ( तिरंगा ) | २६ |
| २—मैत्रेयीको उपदेश | ,, | ५४७ |
| ३—ब्रह्मचारियोंको याज्ञवल्क्यका आदेश | ,, | ६२२ |
| ४—शाकल्यका शिर गिरना | ,, | ८१८ |
| ५—जनक-याज्ञवल्क्य-संवाद | ,, | ८४१ |
| ६—प्रवाहणकी सभामें श्वेतकेतु | ,, | १२७६ |
ॐ
यस्मिन्नापूर्यमाणे पतति करतला-
च्छङ्करस्यापि शूलं
त्रासादुद्भ्रान्तचित्ता रविरथतुरगा
भ्रष्टमार्गाः प्रयान्ति ।
ब्रह्मा ब्रह्माण्डभाण्डस्फुटनपरिभया-
त्स्तौति नारायणाख्यं
सोऽस्मान्पायात्सुनादो वदनविनिहितः
पाञ्चजन्यो मुरारेः ॥
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बृहदारण्यकोपनिषद्
(चित्र: भाष्यकार भगवान् शङ्कर)
भाष्यकार भगवान् शङ्कर
तत्सद्ब्रह्मणे नमः
बृहदारण्यकोपनिषद्
मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित
शङ्करः शङ्कराचार्यः सद्गुरुः शर्वसन्निभः ।
सर्वेषां शङ्कराः सन्तु सच्चिदानन्दरूपिणः ॥
शान्तिपाठ
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
ॐ वह (परब्रह्म) पूर्ण है और यह (कार्यब्रह्म) भी पूर्ण है; क्योंकि पूर्णसे पूर्णकी ही उत्पत्ति होती है। तथा [प्रलयकालमें] पूर्ण (कार्यब्रह्म) का पूर्णत्व लेकर (अपनेमें लीन करके) पूर्ण (परब्रह्म) ही बच रहता है। त्रिविध तापकी शान्ति हो।
प्रथम अध्याय
प्रथम ब्राह्मण
सम्बन्ध-भाष्य
| ॐ नमो ब्रह्मादिभ्यो ब्रह्मविद्यासम्प्रदायकर्तृभ्यो वंशऋषिभ्यो नमो गुरुभ्यः । | ॐ ब्रह्मविद्या-सम्प्रदायके प्रवर्तक [^१]['वंश-ब्राह्मणोक्त ] गुरुपरम्परागत ब्रह्मादि वंश-ऋषियोंको तथा गुरुदेवको नमस्कार है। | | नामनिरुक्तिः<br>'उषा वा अश्वस्य' इत्येवमाद्या वाजसनेयिब्राह्मणोपनिषत् । तस्या इयमल्पग्रन्था वृत्तिरारभ्यते संसारव्याविवृत्सुभ्यः संसारहेतुनिवृत्तिसाधनब्रह्मात्मकत्वविद्याप्रतिपत्तये । सेयं ब्रह्मविद्या उपनिषच्छब्दवाच्या तत्पराणां सहेतोः संसारस्यात्यन्तावसादनात् । उपनिपूर्वस्य सदेस्तदर्थत्वात् । तादर्थ्याद् ग्रन्थोऽप्युपनिषद् उच्यते । | 'उषा वा अश्वस्य' इत्यादि मन्त्रसे आरम्भ होनेवाली वाजसनेयि-ब्राह्मणोपनिषद् है। संसार-बन्धनको दूर करनेकी इच्छावाले विरक्त पुरुषोंके लिये संसारके कारण (अज्ञान) की निवृत्तिके साधन ब्रह्मात्मैक्यबोधकी प्राप्तिके लिये उसकी यह अल्प ग्रन्थवाली (संक्षिप्त) व्याख्या आरम्भ की जाती है। यह ब्रह्मविद्या अपनेमें लगे हुए पुरुषोंके संसारका कारणसहित अत्यन्त अवसादन (उच्छेद) करती है, इसलिये उपनिषद् शब्दसे कही जाती है; क्योंकि 'उप' और 'नि' उपसर्गपूर्वक सद्घातुका यही (अवसादन ही) अर्थ है। उस ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिरूप प्रयोजनवाला होनेके कारण यह ग्रन्थ भी उपनिषद् कहा जाता है। |
[^१]. इस उपनिषद्के द्वितीय, चतुर्थ और षष्ठ अध्यायोंके अन्तिम ब्राह्मण 'वंशब्राह्मण' कहलाते हैं; क्योंकि उनमें इस ग्रन्थद्वारा प्रतिपादित विद्याओंकी आचार्यपरम्पराका उल्लेख किया गया है।
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३१ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३१ |
|---|
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| सेयं षडध्यायी अरण्येऽनूच्यमानत्वादारण्यकम्, बृहत्त्वात्परिमाणतो बृहदारण्यकम्। तस्यास्य कर्मकाण्डेन सम्बन्धोऽभिधीयते। सर्वोऽप्ययं वेदः प्रत्यक्षानुमानाभ्यामनवगतेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारोपायप्रकाशनपरः सर्वपुरुषाणां निसर्गत एव तत्प्राप्तिपरिहारयोरिष्टत्वात्। दृष्टविषये चेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारोपायज्ञानस्य प्रत्यक्षानुमानाभ्यामेव सिद्धत्वान्नागमान्वेषणा। | यह छः अध्यायवाली उपनिषद् अरण्य (वन) में कही जानेके कारण आरण्यक है और [अन्य उपनिषदोंकी अपेक्षा] परिमाणमें बृहद् (बड़ी) होनेके कारण बृहदारण्यक कही जाती है। अब इसका कर्मकाण्डके साथ सम्बन्ध बतलाया जाता है। यह सारा ही वेद, जिनका प्रत्यक्ष और अनुमान आदि अन्य प्रमाणोंसे ज्ञान नहीं होता, उन इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिके उपायोंको प्रकाशित करनेवाला है, क्योंकि सभी पुरुषोंको स्वभावसे ही इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्ति इष्ट है। जो विषय प्रत्यक्ष हैं उनमें इष्टप्राप्ति और अनिष्टनिवृत्तिके उपायोंका ज्ञान तो प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणोंसे ही सिद्ध है, इसलिये वहां आगमप्रमाण ढूँढनेकी आवश्यकता नहीं होती। |
| [आत्मतत्त्वनिरूपणे शास्त्रस्यार्थवत्त्वम्]<br>न चासति जन्मान्तरसम्बन्ध्यात्मास्तित्वविज्ञाने जन्मान्तरेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारेच्छा स्यात् स्वभाववादिदर्शनात्। तस्मा- | किंतु जन्मान्तरसे सम्बन्ध रखनेवाले आत्माके अस्तित्वका ज्ञान न होनेपर जन्मान्तर-सम्बन्धिनी इष्टप्राप्ति और अनिष्ट-निवृत्तिकी इच्छा भी नहीं हो सकती, जैसा कि स्वभाववादियों (चार्वाकादिकों) में देखा जाता है¹। अतः शास्त्र |
१. अर्थात् आत्माके अस्तित्वको न जाननेवाले लोकायतिक और बौद्धोंकी जन्मान्तरमें इष्ट-प्राप्ति और अनिष्ट-परिहारके उद्देश्यसे वैदिक क्रियाओंमें प्रवृत्ति नहीं होती—यह बात देखी गयी है।
३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| ज्जन्मान्तरसम्बन्ध्यात्मास्तित्वे जन्मान्तरेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारोपायविशेषे च शास्त्रं प्रवर्तते। “येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके” (क० उ० १ । १ । २०)- इत्युपक्रम्य “अस्तीत्येवोपलब्धव्यः” (क० उ० २ । ३ । १३) इत्येवमादिनिर्णयदर्शनात्। “यथा च मरणं प्राप्य” (क० उ० २ । २ । ६) इत्युपक्रम्य “योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः। स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्” (क० उ० २ । २ । ७) इति च। “स्वयञ्ज्योतिः” (बृ० उ० ४ । ३ । ६) इत्युपक्रम्य “तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते” (४ । ४ । २) “पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन” (३ । २ । १३) इति च। “ज्ञपयिष्यामि” (बृ० उ० २ । १ । १५) इत्युपक्रम्य “विज्ञानमयः” | जन्मान्तर--सम्बन्धी आत्माके अस्तित्व और जन्मान्तरकी इष्टप्राप्ति एवं अनिष्टनिवृत्तिके उपायविशेषका निरूपण करनेमें प्रवृत्त होता है। जैसा कि [श्रुतिमें] “मृत मनुष्यके विषयमें जो ऐसी शङ्का होती है कि कोई तो कहते हैं [शरीरादिसे अतिरिक्त देहान्तरसम्बन्धी] आत्मा रहता है और कोई कहते हैं यह नहीं रहता” इस प्रकार उपक्रम करके “आत्मा है—ऐसा ही जानना चाहिये” इत्यादि निर्णय देखा जाता है तथा “[ब्रह्मको न जाननेसे] मरणको प्राप्त होनेपर आत्मा जैसा हो जाता है” इस प्रकार आरम्भ करके “जिसने जैसा कर्म किया है तथा जिसने जैसा शास्त्रज्ञान प्राप्त किया है उसके अनुसार कोई तो देह धारण करनेके लिये किसी योनिको प्राप्त हो जाते हैं और कोई स्थावर हो जाते हैं” इस प्रकार कहा है। एवं “स्वयं प्रकाश है” इस प्रकार आरम्भ कर “ज्ञान और कर्म उसके जन्मान्तरके आरम्भक होते हैं” तथा “वह पुण्यकर्मसे पुण्यवान् और पापकर्मोंसे पापमय होता है” इत्यादि कहा गया है। इसी प्रकार “बतलाऊँगा” ऐसा उपक्रम कर “आत्मा विज्ञान- |
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३३
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३३
| (२। १। १६) इति च व्यतिरिक्तात्मास्तित्वम् ।<br><br>तत्प्रत्यक्षविषयमेवेति चेन्न, प्रत्यक्षानुमानाभ्यां नात्मनोऽस्तित्वसिद्धिः वादिविप्रतिपत्तिदर्शनात् । न हि देहान्तरसम्बन्धिन आत्मनः प्रत्यक्षेणास्तित्वविज्ञाने लोकायतिका बौद्धाश्च नः प्रतिकूलाः स्युर्नास्त्यात्मेति वदन्तः । न हि घटादौ प्रत्यक्षविषये कश्चिद्विप्रतिपद्यते नास्ति घट इति । स्थाण्वादौ पुरुषादिदर्शनान्नेति चेन्न, निरूपितेऽभावात् । न हि प्रत्यक्षेण निरूपिते स्थाण्वादौ विप्रतिपत्तिर्भवति । वैनाशिकास्त्वहमितिप्रत्यये जायमानेऽपि देहान्तरव्यतिरिक्तस्य नास्तित्वमेव प्रतिजानते । तस्मात्प्रत्यक्षविषयवैलक्षण्यात् प्रत्यक्षान्नात्मास्तित्वसिद्धिः । | मय है'' इस प्रकार देहसे भिन्न आत्माका अस्तित्व बतलाया गया है।<br><br>यदि कहो कि आत्माका अस्तित्व तो प्रत्यक्ष प्रमाणका ही विषय है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि इसके सम्बन्धमें विभिन्न वादियोंका मतभेद देखा जाता है। यदि देहान्तरसम्बन्धी आत्माके अस्तित्वका ज्ञान प्रत्यक्ष होता तो लोकायतिक और बौद्ध 'आत्मा नहीं है' ऐसा कहते हुए हमारे प्रतिकूल न होते। घटादि जो प्रत्यक्षप्रमाणके विषय हैं, उनमें 'घट नहीं है' ऐसा संदेह किसीको नहीं होता। यदि कहो कि स्थाणु (ठूँठ) आदिमें पुरुषादिका भ्रम देखा जानेके कारण प्रत्यक्ष वस्तुमें संशयका अभाव नहीं बताया जा सकता तो यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि अच्छी तरह देख लेनेपर उस संशयका अभाव हो जाता है। स्थाणु आदिका प्रत्यक्ष निरूपण हो जानेपर उसमें किसीको संदेह नहीं रहता। किंतु वैनाशिक तो 'अहम्' ऐसी वृत्तिके उदय होनेपर भी देहान्तरसे भिन्न आत्माके न होनेका ही निश्चय करते हैं। अतः प्रत्यक्ष प्रमाणके विषयसे विलक्षण होनेके कारण प्रत्यक्षसे आत्माके अस्तित्वकी सिद्धि नहीं हो सकती। |
बृ० उ० ३—
३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| कर्मज्ञानकाण्डयोः प्रयोजनम्<br><br>तथानुमानादपि¹ । श्रुत्यात्मास्तित्वे लिङ्गस्य दर्शितत्वाल्लिङ्गस्य च प्रत्यक्षविषयत्वान्नेति चेन्न, जन्मान्तरसम्बन्धस्याग्रहणात् । आगमेन त्वात्मास्तित्वेऽवगते वेदप्रदर्शितलौकिकलिङ्गविशेषैश्च तदनुसारिणो मीमांसकास्तार्किकाश्च अहम्प्रत्ययलिङ्गानि च वैदिकान्येव स्वमतिप्रभवाणीति कल्पयन्तो वदन्ति प्रत्यक्षश्चानुमेयश्चात्मेति ।<br><br>सर्वथाप्यस्त्यात्मा देहान्तरसम्बन्धीत्येवं प्रतिपत्तुर्देहान्तरगतेष्टा- | इसी प्रकार अनुमानसे भी [ आत्माका अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता ]¹ । यदि कहो कि श्रुतिने आत्माके अस्तित्वमें लिङ्ग² ( बीज ) दिखलाया है और लिङ्ग प्रत्यक्षप्रमाणका विषय होता है, इसलिये आत्मा [ प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाणका भी विषय है ] केवल आगमका ही विषय नहीं है—तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि जन्मान्तरके सम्बन्धका किसी अन्य प्रमाणसे ग्रहण नहीं होता । आगमप्रमाणसे तथा वेदोक्त लौकिक लिङ्गविशेषोंके द्वारा आत्माका अस्तित्व जान लेनेपर ही उसीका अनुसरण करनेवाले मीमांसक और नैयायिक वैदिक अहंंप्रतीति और वैदिक लिङ्गोंको ही ‘ये हमारी बुद्धिसे निकले हुए तर्क हैं’ ऐसी कल्पना करते हुए कहते हैं कि ‘आत्मा प्रत्यक्ष और अनुमानका भी विषय है’ ।<br><br>सब प्रकार देहान्तरसे सम्बन्ध रखनेवाला आत्मा है—ऐसा जाननेवाले तथा देहान्तरगत इष्टप्राप्ति और |
१. अनुमानका स्वरूप यों है—इच्छा आदि किसीके आश्रित होते हैं; क्योंकि वे गुण हैं, जैसे रूप आदि । इस प्रकारके अनुमानद्वारा इच्छादिके आश्रयरूपसे भी आत्माका अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि इच्छादिका अधिष्ठान मन ही प्रसिद्ध है, मनसे अतिरिक्त इच्छादिकी उपलब्धि नहीं होती ।
२. 'यः प्राणेन प्राणिति' इत्यादि श्रुतिके अनुसार प्राणनादि व्यापार ही आत्माके अस्तित्वमें लिङ्ग है ।
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३५
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| निष्टप्राप्तिपरिहारोपायविशेषार्थिनस्तद्विशेषज्ञापनाय कर्मकाण्डमारब्धम् । न त्वात्मन इष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारेच्छाकारणमात्मविषयमज्ञानं कर्तृभोक्तृस्वरूपाभिमानलक्षणं तद्विपरीतब्रह्मात्मस्वरूपविज्ञानेनापनीतम् । यावद्धि तन्नापनीयते तावदयं कर्मफलरागद्वेषादिस्वाभाविकदोषप्रयुक्तः शास्त्रविहितप्रतिषिद्धातिक्रमेणापि वर्तमानो मनोवाक्कायैर्दृष्टादृष्टानिष्टसाधनानि अधर्मसंज्ञकानि कर्माण्युपचिनोति बाहुल्येन, स्वाभाविकदोषबलीयस्त्वात् । ततः स्थावरान्ताधोगतिः । कदाचिच्छास्त्रकृतसंस्कारबलीयस्त्वम्, ततो मनआदिभिरिष्टसाधनं बाहुल्येनोपचिनोति धर्माख्यम् । तद्द्विविधम्-ज्ञानपूर्वकं केवलञ्च । तत्र केवलं पितृलोकादिप्राप्तिफलम् । ज्ञानपूर्वकं देवलोकादि- | अनिष्टनिवृत्तिके उपायविशेषको जाननेकी इच्छावाले पुरुषोंको उस विशेष उपायका ज्ञान करानेके लिये कर्मकाण्ड आरम्भ किया गया है। उसमें आत्माकी इष्टप्राप्ति एवं अनिष्टनिवृत्तिकी इच्छाके कारण कर्तृत्वभोक्तृत्वाभिमानरूप आत्मविषयक अज्ञानको उससे विपरीत ब्रह्मात्मस्वरूप ज्ञानके द्वारा दूर नहीं किया गया। जबतक उस (अज्ञान) की निवृत्ति नहीं होती, तबतक यह जीव कर्मफलके राग-द्वेषादिरूप स्वाभाविक दोषोंसे प्रेरित होनेके कारण शास्त्रकथित विधि और निषेधका उल्लङ्घन करके भी बर्तता हुआ मन, वाणी और शरीरसे दृष्ट और अदृष्ट अनिष्टके साधनभूत अधर्मसंज्ञक कर्मोंको अधिकतासे करता रहता है, क्योंकि स्वभावजनित दोष बहुत प्रबल होता है। इससे उसे स्थावरपर्यन्त अधोगति प्राप्त होती है। कभी शास्त्रोक्त संस्कारोंकी प्रबलता होती है, उस समय यह मन आदिसे अधिकतर धर्मसंज्ञक इष्टसाधनोंका सम्पादन करता है। वे ज्ञान (उपासना) पूर्वक और केवल भेदसे दो प्रकारके हैं। उनमें केवल धर्म पितृलोकादिकी प्राप्तिरूप फलवाले हैं और ज्ञानपूर्वक धर्म देवलोकसे |
३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| ब्रह्मलोकान्तप्राप्तिफलम् । तथा च शास्त्रम्—“आत्मयाजी श्रेयान्देवयाजिनः” (शत० ब्राह्म०) इत्यादि । स्मृतिश्च “द्विविधं कर्म वैदिकम्” (मनु० १२।८८) इत्याद्या । साम्ये च धर्माधर्मयोः मनुष्यत्वप्राप्तिः। एवं ब्रह्माद्या स्थावरान्ता स्वाभाविकाविद्यादिदोषवती धर्माधर्मसाधनकृता संसारगतिर्नामरूपकर्माश्रया । तदेवेदं व्याकृतं साध्यसाधनरूपं जगत्प्रागुत्पत्तेरव्याकृतमासीत् । स एष बीजाङ्कुरादिवदविद्याकृतः संसार आत्मनि क्रियाकारकफलाध्यारोपलक्षणोऽनादिरनन्तोऽनर्थः, इत्येतस्माद्विरक्तस्याविद्यानिवृत्तये तद्विपरीतब्रह्मविद्याप्रतिपत्तयेऽथोपनिषदारभ्यते । <br><br> अस्य त्वश्वमेधकर्मसम्बन्धिनो <br> (अश्वमेधब्राह्मण-प्रयोजनम्) विज्ञानस्य प्रयोजनं येषामश्वमेधे न | लेकर ब्रह्मलोकतककी प्राप्तिरूप फलवाले हैं। ऐसा ही शास्त्र भी कहता है—“देवोपासककी अपेक्षा आत्मोपासक श्रेष्ठ है।¹” तथा “वैदिक कर्म दो प्रकारका है” (प्रवृत्ति-प्रधान और निवृत्तिप्रधान) ऐसी स्मृति भी है। धर्म और अधर्मकी समान मात्रा होनेपर मनुष्यत्वकी प्राप्ति होती है। इस प्रकार धर्म एवं अधर्मरूप साधनसे होनेवाली ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त नाम, रूप एवं कर्मके आश्रित स्वाभाविक अविद्यादि दोषवाली सांसारिक गति है। वह यह साध्यसाधनरूप व्याकृत जगत् उत्पत्तिसे पूर्व अव्याकृत था। आत्मामें क्रिया, कारक एवं फलका आरोपरूप यह अविद्याकृत संसार बीजाङ्कुरादिके समान [प्रवाहरूपसे] अनादि और अनन्त अनर्थरूप है; अतः इससे विरक्त हुए पुरुषकी अविद्याकी निवृत्तिके लिये इससे विपरीत ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिरूप प्रयोजनवाली यह उपनिषद् आरम्भ की जाती है। <br><br> [इस उपनिषद्के आरम्भमें कहे हुए] इस अश्वमेधकर्मसम्बन्धी विज्ञानका तो यही प्रयोजन है कि |
१. सर्वत्र परमात्मबुद्धि रखकर नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करनेवाला पुरुष आत्मयाजी (आत्मोपासक) है और कामनापूर्वक देवताओंकी उपासना करनेवाला देवयाजी (देवोपासक) है।
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
| अधिकारस्तेषामस्मादेव विज्ञानात् फलप्राप्तिः। 'विद्यया वा कर्मणा वा' "तद्धैतल्लोकजिदेव" (बृ० उ० १।३।२८) इत्येवमादिश्रुतिभ्यः। | जिनका [असामर्थ्यवश] अश्वमेध यज्ञमें अधिकार नहीं है उन्हें इस विज्ञानसे ही उसके फलकी प्राप्ति हो जाय; जैसा कि “ज्ञान (उपासना) से अथवा कर्मसे [उसके फलकी प्राप्ति होती है]” “वह यह (प्राणदर्शन) लोक-प्राप्तिका साधन है” इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। | | कर्मविषयत्वमेव विज्ञानस्येति चेन्न, "योऽश्वमेधेन यजते य उ चैनमेवं वेद" इति विकल्पश्रुतेः। | यदि कहो कि अश्वमेधविज्ञान अश्वमेधकर्मसे ही सम्बन्ध रखता है तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि “जो अश्वमेधसे यजन करता है अथवा जो इसे इस प्रकार जानता है [वह सब पापोंको पार कर जाता है]” | | विद्याप्रकरणे चाम्नानात् कर्मान्तरे च सम्पादनदर्शनाद् विज्ञानात् तत्फलप्राप्तिरस्तीत्यवगम्यते। | इस प्रकार कर्मके ज्ञान और अनुष्ठानका विकल्प बतलानेवाली श्रुति है। इसके सिवा इसका उल्लेख उपासनाप्रकरणमें होनेसे तथा अश्वमेधसे भिन्न [चित्याग्नि] कर्ममें¹ इसका सम्पादन देखा जानेसे भी यह ज्ञात होता है कि अश्वमेध-विज्ञानसे भी अश्वमेधका ही फल मिलता है। | | सर्वेषां च कर्मणां परं कर्माश्वमेधः समष्टिव्यष्टिप्तिफलत्वात्। तस्य चेह ब्रह्मविद्याप्रारम्भ आम्नानं सर्वकर्मणां संसारविषयत्वप्रदर्श- | समष्टि और व्यष्टि हिरण्यगर्भकी प्राप्तिरूप फलवाला होनेसे समस्त कर्मोंमें अश्वमेध कर्म उत्कृष्ट है। यहाँ ब्रह्मविद्याके आरम्भमें उसका उल्लेख समस्त कर्मोंका |
¹ 'अयं वै लोकोऽग्निः' (बृ० उ० ६।२।११) इत्यादि वाक्यद्वारा।
३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| नार्थम् । तथा च दर्शयिष्यति फलमशनायामृत्युभावम् । | संसारसम्बन्धित्व प्रदर्शित करनेके लिये किया गया है। इसी प्रकार श्रुति हिरण्यगर्भको क्षुधारूप मृत्युभावकी प्राप्ति दिखलावेगी। | | न नित्यानां संसारविषयफलत्वमिति चेन्न, सर्वकर्मफलोपसंहारश्रुतेः। सर्वं हि पत्नीसम्बद्धं कर्म । “जाया मे स्यात्..... एतावान्वै कामः” (बृ०उ० १।४।१७) इति निसर्गत एव सर्वकर्मणां काम्यत्वं दर्शयित्वा, पुत्रकर्मापरविद्यानां च “मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोकः” (बृ०उ० १।५।१६) इति फलं दर्शयित्वा, त्र्यन्नात्मकतां चान्ते उपसंहरिष्यति “त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म” ( बृ० उ० १।६।१) इति। सर्वकर्मणां फलं व्याकृतं संसार एवेति । | यदि कहो कि नित्यकर्म संसारविषयक फलवाले नहीं हैं तो यह ठीक नहीं, क्योंकि समस्त कर्मफलोंका [ सांसारिक विषयोंमें ही ] उपसंहार किया जाता है—ऐसी श्रुति है। सारे ही कर्मोंका सम्बन्ध स्त्रीसे है। “मुझे स्त्री प्राप्त हो... इतनी ही कामना है” इस प्रकार स्वभावसे ही समस्तकर्मोंकी सकाम्यता दिखलाकर फिर पुत्र, कर्म और अपरा विद्याके “मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक” इस प्रकार विभिन्न फल दिखाते हुए श्रुति “यह जगत् नाम, रूप और कर्म—इन तीन अवयवोंसे युक्त है” ऐसा कहकर अन्तमें इसकी तीन अन्नरूपताका उपसंहार करेगी। तात्पर्य यह है कि समस्त कर्मोंका फल व्याकृत संसार ही है। | | इदमेव त्रयं प्रागुत्पत्तेस्तर्ह्यव्याकृतमासीत्। तदेव पुनः सर्वप्राणिकर्मवशाद्व्याक्रियते बीजादिव वृक्षः। सोऽयं व्याकृता- | यही त्रय उत्पत्तिसे पूर्व तो अव्याकृत ही था। वही बीजसे वृक्षके समान समस्त प्राणियोंके कर्मवश व्याकृत हो जाता है। वह यह व्यक्ताव्यक्तरूप संसार अविद्याका |
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
| संस्कृत मूल (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी अनुवाद |
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| व्याकृतरूपः संसारोऽविद्याविषयः; क्रियाकारकफलात्मकतया आत्मरूपत्वेनाध्यारोपितः अविद्ययैव मूर्त्तामूर्त्ततद्वासनात्मकः। अतो विलक्षणोऽनामरूपकर्मात्मकोऽद्वयो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावोऽपि क्रियाकारकफलभेदादिविपर्ययेणावभासते। अतोऽस्मात्क्रियाकारकफलभेदस्वरूपाद् एतावादिदमिति साध्यसाधनरूपाद्विरक्तस्य कामादिदोषकर्मबीजभूताविद्यानिवृत्तये रज्ज्वामिव सर्पविज्ञानापनयाय ब्रह्मविद्या आरभ्यते। | विषय है। अविद्यासे ही मूर्त्त, अमूर्त्त और उनकी वासनारूप यह संसार क्रिया, कारक और फलरूप होनेसे आत्मभावसे आरोपित होता है। इससे भिन्न आत्मा नाम, रूप और कर्मसे रहित, अद्वितीय तथा नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वरूप होनेपर भी क्रिया, कारक और फल-भेदादि विपरीत भावसे प्रतीत होता है। अतः इस साध्य-साधनरूप एवं क्रिया, कारक और फल-भेदरूप संसारसे 'यह इतना ही है' इस प्रकार विरक्त हुए पुरुषकी कामादि दोषमय कर्मोंकी बीजभूता अविद्याकी, रज्जुमें सर्पज्ञानके बाधके समान, निवृत्ति करनेके लिये ब्रह्मविद्याका आरम्भ किया जाता है। |
| तत्र तावदश्वमेधविज्ञानाय 'उषा वा अश्वस्य' इत्यादि। | उसमें अश्वमेधविद्याका वर्णन करनेके लिये 'उषा वा अश्वस्य' इत्यादि मन्त्र कहा जाता है। |
| तत्राश्वविषयमेव दर्शनमुच्यते प्राधान्यादश्वस्य। प्राधान्यं च तन्नामाङ्कितत्वात्क्रतोःप्राजापत्यत्वाच्च। | अश्वमेध यज्ञमें अश्वकी प्रधानता होनेके कारण यहाँ अश्वविषयक दृष्टि ही कही गयी है। यह यज्ञ 'अश्व' नामसे अङ्कित है और इसका देवता प्रजापति है, इसीलिये इसमें अश्वकी प्रधानता मानी गयी है। |
अश्वके अवयवोंमें कालादि-दृष्टि
ॐ उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः। सूर्य्यश्चक्षु-
४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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वातः प्राणो व्यात्तमग्निर्वैश्वानरः संवत्सर आत्माश्वस्य मेध्यस्य । द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरं पृथिवी पाजस्यं दिशः पार्श्वे अवान्तरदिशः पर्शव ऋतवोऽङ्गानि मासाश्चार्धमासाश्च पर्वाण्यहोरात्राणि प्रतिष्ठा नक्षत्राण्यस्थीनि नभो मांसानि । ऊवध्यं सिकताः सिन्धवो गुदा यकृच्च क्लोमानश्च पर्वता ओषधयश्च वनस्पतयश्च लोमान्युद्यन्पूर्वार्धो निम्लोचञ्जघनार्धो यद्विजृम्भते तद्विद्योतते यद्विधूनुते तत्स्तनयति यन्मेहति तद्वर्षति वागेवास्य वाक् ॥ १ ॥
ॐ उषा (ब्राह्ममुहूर्त्त) यज्ञसम्बन्धी अश्वका शिर है, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, वैश्वानर अग्नि खुला हुआ मुख है और संवत्सर यज्ञीय अश्वका आत्मा है। द्युलोक उसका पीठ है, अन्तरिक्ष उदर है, पृथिवी पैर रखनेका स्थान है, दिशाएँ पार्श्वभाग हैं, अवान्तर दिशाएँ पसलियाँ हैं, ऋतुएँ अङ्ग हैं, मास और अर्द्धमास पर्व (सन्धिस्थान) हैं, दिन और रात्रि प्रतिष्ठा (पाद) हैं, नक्षत्र अस्थियाँ हैं, आकाश (आकाशस्थित मेघ) मांस हैं, बालू ऊवध्य (उदरस्थित अर्धपक्व अन्न) है, नदियाँ नाडी हैं, पर्वत यकृत् (जिगर) और हृदयगत मांसखण्ड हैं, ओषधि और वनस्पतियाँ लोम हैं, ऊपरकी ओर जाता हुआ सूर्य नाभिसे ऊपरका भाग और नीचेकी ओर जाता हुआ सूर्य कटिसे नीचेका भाग है। उसका जमुहाई लेना बिजलीका चमकना है और शरीर हिलाना मेघका गर्जन है। वह जो मूत्र त्याग करता है वही वर्षा है और वाणी ही उसकी वाणी है॥ १ ॥
| उषा इति, ब्राह्मो मुहूर्त उषाः । | ‘उषा वा’ इत्यादि। ब्राह्ममुहूर्तका नाम उषा है। | | वैशब्दः स्मरणार्थः प्रसिद्धं कालं स्मारयति । | ‘वै’ शब्द स्मरण करानेके लिये है। यह प्रसिद्ध काल-का स्मरण कराता है। | | शिरः प्राधान्यात् । | वह प्रसिद्ध उषाकाल प्रधान होनेके कारण |
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४१
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| शिरश्च प्रधानं शरीरावयवानाम् ।<br><br>अश्वस्य मेध्यस्य मेधार्हस्य यज्ञियस्योषाः शिर इति सम्बन्धः ।<br><br>कर्माङ्गस्य पशोः संस्कर्तव्यत्वात् कालादिदृष्टयः शिर आदिषु क्षिप्यन्ते । प्राजापत्यत्वं च प्रजापतिदृष्ट्यध्यारोपणात् । काल-लोकदेवतात्वाध्यारोपणं च प्रजापतित्वकरणं पशोः । एवंरूपो हि प्रजापतिः, विष्णुत्वादिकरणमिव प्रतिमादौ । | शिर है। शिर भी शरीरके अवयवोंमें प्रधान है। अतः मेध्य—मेधार्ह (यज्ञार्ह) यानी यज्ञसम्बन्धी अश्वका उषा शिर है—ऐसा इसका अन्वय है। कर्मके अङ्गभूत पशुका संस्कार किया जाना चाहिये, इसलिये उसके शिर आदिमें कालादिदृष्टियाँ की जाती हैं। उसमें प्रजापति-दृष्टिका अध्यारोप किया जाता है, इसीसे यह प्राजापत्य (प्रजापतिदेवतासम्बन्धी) है। काल, लोक और देवत्वका आरोप करना ही पशुका प्रजापतित्व सम्पादन करना है। जिस प्रकार प्रतिमादिमें विष्णुत्वादिकी प्रतिष्ठा की जाती है उसी प्रकार यह उक्तरूपसे प्रजापति है। |
| सूर्यश्चक्षुः शिरसोऽनन्तरत्वात् सूर्याधिदैवतत्वाच्च । वातः प्राणो वायुस्वाभाव्यात् । व्यात्तं विवृतं मुखमग्निर्वैश्वानरः । वैश्वानर इत्यग्नेर्विशेषणम् । वैश्वानरो नामाग्निर्विवृतं मुखमित्यर्थो मुखस्याग्निदैवतत्वात् । संवत्सर आत्मा, संवत्सरो द्वादशमासस्त्रि- | [जिस प्रकार उषाके अनन्तर सूर्य दिखायी देता है उसी प्रकार] शिरके अनन्तर नेत्र हैं और सूर्य ही नेत्रोंका अभिमानी देव है, इसलिये सूर्य उसका नेत्र है। वायु प्राण है, क्योंकि वह वायुके-से स्वभाववाला है। वैश्वानर अग्नि व्यात्त यानी खुला हुआ मुख है। 'वैश्वानर' यह अग्निका विशेषण है। अर्थात् वैश्वानर अग्नि उसका खुला हुआ मुख है; क्योंकि मुखका अधिष्ठातृदेव अग्नि ही है। संवत्सर आत्मा है; संवत्सर बारह या तेरह महीनेका होता है, |