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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

५८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

५८२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| रथमात्रम्—विलक्षणमात्मज्योतिः सिद्धमिति ।<br><br>कार्यकरणसंघातभावभावित्वा-<br><br>आत्मनः संघात- च्च संघातधर्मत्वम्<br>साधर्म्यं युक्त्य- अनुमीयते ज्योतिषः<br>न्तरम् सामान्यतो दृष्टस्य<br><br>चानुमानस्य व्यभिचारित्वादप्रामाण्यम्; सामान्यतो दृष्टबलेन | ज्योति इनसे विलक्षण है—यह सिद्ध होता है' ऐसा कहना तुम्हारी मनमानी कल्पनामात्र है।<br><br>इसके सिवा देहेन्द्रियसंघातके रहनेपर ही रहती है, इसलिये यह चैतन्यज्योति [रूप आदिके समान] संघातका ही धर्म है, ऐसा भी अनुमान होता है। सामान्यतो दृष्ट अनुमान व्यभिचारी³ होता है, इसलिये उसकी प्रामाणिकता स्वीकार नहीं की जा सकती। आप सामान्यतो दृष्ट अनुमानके बलसे ही तो |


१. अनुमान वाक्य इस प्रकार है—चैतन्यं शरीरधर्मः, तद्भावभावित्वात्, रूपवत् ।
२. अनुमान साधारणतः तीन प्रकारका होता है—१. पूर्ववत्, २. शेषवत् और ३. सामान्यतो दृष्ट। कारण देखकर जो कार्यका अनुमान किया जाता है, वह 'पूर्ववत्' है, जैसे मेघकी घिरी हुई घटा देखकर वृष्टिका अनुमान। कार्य देखकर जो कारणका अनुमान होता है, वह 'शेषवत्' कहलाता है; जैसे नदीमें बाढ़ आयी देखकर पर्वतपर वृष्टि होनेका अनुमान। तथा प्रत्यक्षमूलक साधारण नियम या व्याप्तिके अनुसार जो परोक्षवस्तुका अनुमान किया जाता है, वह सामान्यतो दृष्ट अनुमान है; जैसे प्रत्येक कार्यका एक कर्ता देखा जाता है, चूँकि यह जगत् भी एक कार्य है, अतः इसका भी एक कर्ता अवश्य होगा। जो इसका कर्ता है, वही ईश्वर है। यहाँ 'विमतं चैतन्यज्योतिः संघाताद् भिन्नम् तद्भासकत्वात् आदित्यादिवत्' (विवादकी विषयभूत चैतन्यज्योति संघातसे भिन्न है; क्योंकि यह संघातको प्रकाशित करनेवाली है, जैसे आदित्य)—इस प्रकार 'प्रकाशक प्रकाश्यसे भिन्न होता है, इस व्याप्तिके अनुसार परोक्ष 'चैतन्यज्योति' को संघातसे भिन्न सिद्ध किया जा रहा है; अतः यह सामान्यतो दृष्ट अनुमान है।
३. नेत्र देहका प्रकाशक होकर भी देहसे पृथक् नहीं है; अतः संघातकी प्रकाशिका होनेके कारण जो चैतन्यज्योतिको संघातसे भिन्न सिद्ध करते हैं, उनका यह हेतु नेत्र आदिके विषयमें अनैकान्तिक (व्यभिचरित) हो गया है—इसी युक्तिसे पूर्वपक्षीने सामान्यतो दृष्ट अनुमानको व्यभिचारी कहा है।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८८३

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८८३


संस्कृत-मूल (शाङ्करभाष्यम्)हिन्दी-अनुवाद
हि भवानादित्यादिवद् व्यतिरिक्तं ज्योतिः साधयति कार्यकारणेभ्यः; न च प्रत्यक्षमनुमानेन बाधितुं शक्यते; अयमेव तु कार्यकारणसंघातः प्रत्यक्षं पश्यति शृणोति मनुते विजानाति च; यदि नाम ज्योतिरन्तरमस्योपकारकं स्यादादित्यादिवत्, न तदात्मा स्यात्, ज्योतिरन्तरम्, आदित्यादिवदेव; य एव तु प्रत्यक्षं दर्शनादिक्रियां करोति स एवात्मा स्यात् कार्यकारणसंघातः, नान्यः, प्रत्यक्षविरोधेऽनुमानस्याप्रामाण्यात् ।आदित्यादिके समान ज्योतिको देह और इन्द्रियोंसे भिन्न सिद्ध करते हैं; किंतु अनुमानके द्वारा प्रत्यक्षका बाध नहीं हो सकता; यह देहेन्द्रियसंघात ही तो प्रत्यक्ष देखता, सुनता, मनन करता और विशेषरूपसे जानता है; यदि आदित्यादिके समान इसका उपकार करनेवाली कोई अन्य ज्योति हो तो वह आत्मा नहीं हो सकती, अपितु आदित्यादिके समान ही कोई अन्य ज्योति होगी; जो भी प्रत्यक्ष दर्शनादि कर्म करता है, वह देहेन्द्रियसंघात ही आत्मा होना चाहिये, कोई दूसरा नहीं, क्योंकि प्रत्यक्षसे विरोध होनेपर अनुमानकी प्रामाणिकता नहीं हो सकती ।
(यथोक्तयुक्तैरनैकान्तिकत्वम्)<br>नन्वयमेव चेद्दर्शनादिक्रियाकर्ता आत्मा संघातः कथमविकलस्यैवास्य दर्शनादिक्रियाकर्तृत्वं कदाचिद् भवति कदाचन्नेति ।**सिद्धान्ती—**किंतु यदि यह संघात ही दर्शनादि क्रियाओंका करनेवाला आत्मा हो तो ऐसा क्यों होता है कि इसमें कोई विकार न आनेपर भी कभी तो इसमें दर्शनादि क्रियाओंका कर्तृत्व रहता है और कभी नहीं रहता है ?
(तन्निरासपूर्वकं स्वभावस्य निनिमित्तत्वनिरूपणम्)<br>नैष दोषः, दृष्टत्वात्; न हि दृष्टेऽनुपपन्नं नाम, न हि खद्योते प्रकाशाप्रकाशकत्वेन**पूर्व०—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि ऐसा देखा गया है और देखी हुई बातमें अनुपपत्ति नहीं होती; खद्योतको प्रकाशक और ,

| ८८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |

८८४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृत (भाष्य)हिन्दी-अनुवाद
दृश्यमाने कारणान्तरमनुमेयम्; अनुमेयत्वे च केनचित् सामान्यात् सर्वं सर्वत्रानुमेयं स्यात्; तच्चानिष्टम्; न च पदार्थस्वभावो नास्ति; न ह्यग्नेरुष्णस्वाभाव्यम् अन्यनिमित्तम्, उदकस्य वा शैत्यम् । प्राणिधर्माधर्माद्यपेक्षमिति चेत्; धर्माधर्मादेर्निमित्तान्तरापेक्षस्वभावप्रसङ्गः । अस्त्विति चेत्, न; तदनवस्थाप्रसङ्गः; स चानिष्टः ।अप्रकाशकरूपसे देखनेमें किसी अन्य कारणका अनुमान नहीं करना चाहिये; यदि किसीसे समानता होनेके कारण उसके विषयमें भी अनुमान किया जाय तब तो सब जगह सबके विषयमें अनुमान ही करना होगा; और यह इष्ट नहीं है, क्योंकि पदार्थका कोई स्वभाव ही न हो—ऐसी बात नहीं है; अग्निका उष्णस्वभाव होना अथवा जलका शीतल होना किसी अन्य कारणसे नहीं है। यदि कहो कि स्वभाव भी प्राणियोंके धर्माधर्मकी अपेक्षासे होता है, तो धर्माधर्मादिका भी किसी अन्य निमित्तकी अपेक्षा रखनेवाला स्वभाव माननेका प्रसङ्ग होगा। यदि कहो कि होने दो, तो यह ठीक नहीं; क्योंकि इससे अनवस्थाका प्रसङ्ग होगा और वह इष्ट नहीं है।
[स्वभाववादिपक्षनिरसनम्]<br>न, स्वप्नस्मृत्योर्दृष्टस्यैव दर्शनात्—यदुक्तं स्वभाववादिना देहस्यैव दर्शनादिक्रिया न व्यतिरिच्यतेति, तन्न; यदि हि देहस्यैव दर्शनादिक्रिया स्वप्ने दृष्टस्यैव दर्शनं न स्यात्; अन्धः स्वप्नं पश्यन् दृष्टपूर्वमेव पश्यतिसिद्धान्ती—तुम्हारा कथन ठीक नहीं है, क्योंकि स्वप्न और स्मृतिमें देखे हुएका ही दर्शन होता है—स्वभाववादीने जो कहा कि दर्शनादि क्रिया देहके ही हैं, उससे भिन्नके नहीं हैं, सो ऐसी बात नहीं है; यदि दर्शनादि क्रिया देहकी ही होती तो स्वप्नमें देखे हुएको ही न देखा जाता। अन्धा पुरुष स्वप्न देखनेके समय पहले देखे हुए पदार्थों-

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८८५

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८८५


| न शाकद्वीपादिगतमदृष्टरूपम्; ततश्चैतत् सिद्धं भवति—यः स्वप्ने पश्यति दृष्टपूर्वं वस्तु, स एव पूर्वं विद्यमाने चक्षुष्यद्राक्षीत्, न देह इति; देहश्चेद् द्रष्टा, स येनाद्राक्षीत् तस्मिन्नुद्घृते चक्षुषि स्वप्ने तदेव दृष्टपूर्वं न पश्येत्; अस्ति च लोके प्रसिद्धिः—पूर्वं दृष्टं मया हिमवतः शृङ्गमद्याहं स्वप्नेऽद्राक्षमित्युद्घृतचक्षुषामन्धानामपि; तस्मादनुद्घृतेऽपि चक्षुषि यः स्वप्नदृक् स एव द्रष्टा, न देह इत्यवगम्यते । | को ही देखता है, जिन्हें पहले कभी नहीं देखा, उन शाकद्वीपादिके पदार्थोंको नहीं देखता; इससे यह सिद्ध होता है कि स्वप्नमें जो पहले देखे हुए पदार्थोंको देखता है, उसीने पहले नेत्रोंके रहते हुए उन पदार्थोंको देखा था, देहने नहीं; यदि देह ही देखनेवाला होता तो जिनके द्वारा उसने पहले देखा था उन नेत्रोंके निकाल लिये जानेपर उन पूर्वदृष्ट पदार्थोंको स्वप्नमें न देखता; किंतु जिनके नेत्र निकाल लिये गये हैं, उन अन्धोंके विषयमें भी लोकमें ऐसी प्रसिद्धि है कि आज स्वप्नमें मैंने पहले देखा हुआ हिमालयका शिखर देखा । इससे यह ज्ञात होता है कि जो स्वप्न देखनेवाला है, वही नेत्रोंके न निकालनेपर भी द्रष्टा है, देह द्रष्टा नहीं है । | | तथा स्मृतौ—द्रष्टृस्मर्त्रोरेकत्वे <br>(द्रष्टुर्देहेन्द्रियादि-व्यतिरिक्तत्वम्) सति य एव द्रष्टा स एव स्मर्ता; यदा चैवं तदा निमीलिताक्षोऽपि स्मरन् दृष्टपूर्वं यद् रूपं तद् दृष्टवदेव पश्यतीति; तस्माद् यन्निमीलितं तन्न द्रष्टृ; यन्निमीलिते चक्षुषि | इसी प्रकार स्मरणमें समझना चाहिये·द्रष्टा और स्मरण करनेवालेकी एकता होनेपर जो द्रष्टा होता है, वही स्मरण करनेवाला होता है । जब कि ऐसी बात है तभी आँख मूँदकर स्मरण करनेवाला भी जो पहले देखा हुआ रूप है, उसे देखे हुएके समान ही देखता है; अतः जिन्हें मूँद रखा है, वे नेत्र द्रष्टा नहीं |

८८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

८८६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४
संस्कृतहिन्दी
स्मरद् रूपं पश्यति तदेवानिमीलितेऽपि चक्षुषि द्रष्टृ आसीदित्यवगम्यते।हैं, जो नेत्रोंके मूँदनेपर स्मरण किये जानेवाले रूपको देखता है, वही नेत्रोंके न मूँदनेपर भी द्रष्टा था—ऐसा जाना जाता है।
मृते च देहेऽविकलस्यैव च रूपादिदर्शनाभावात्—देहस्यैव द्रष्टृत्वे मृतेऽपि दर्शनादिक्रिया स्यात्। तस्माद् यदपाये देहे दर्शनं न भवति, यद्भावे च भवति, तद् दर्शनादिक्रियाकर्तृ न देह इत्यवगम्यते।इसके सिवा शरीरके मर जानेपर उसमें कोई विकार न होनेपर भी वह रूपाधिका दर्शन नहीं करता—यदि देह ही द्रष्टा होता तो उसके मरनेपर भी उसमें दर्शनादि क्रिया होती। अतः जिसके देहमें न रहनेपर दर्शन नहीं होता और रहनेपर होता है, वही दर्शनादि क्रियाका कर्ता है, देह नहीं—ऐसा ज्ञात होता है।
चक्षुरादीन्येव दर्शनादिक्रियाकर्तॄणीति चेन्न, यदहमद्राक्षं तत् स्पृशामीति भिन्नकर्तृकत्वे प्रतिसंधानानुपपत्तेः मनस्तर्हीति चेन्न, मनसोऽपि विषयत्वाद् रूपाविवद् द्रष्टृत्वाद्यनुपपत्तिः।यदि कहो कि नेत्रादि इन्द्रियां ही दर्शनादि क्रिया करनेवाली हैं, तो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि [वैसी स्थितिमें] दर्शन और स्पर्श भिन्न कर्ताओंकी क्रिया होनेके कारण 'जिसे मैंने देखा था, उसका स्पर्श करता हूँ' ऐसा अनुभव नहीं हो सकता था; अच्छा तो, मन ही द्रष्टा है—ऐसा मानें तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि रूप आदिकी भांति विषय (दृश्य) होनेके कारण मनका भी द्रष्टा होना सम्भव नहीं है।
तस्मादन्तःस्थं व्यतिरिक्तमादित्यादिवदिति सिद्धम्।अतः यह सिद्ध हुआ कि चैतन्य-ज्योति अन्तःस्थ है और आदित्यादिके समान शरीरसे भिन्न है।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ८८७

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ८८७


मूल संस्कृतभाष्यार्थ
यदुक्तम्—कार्यकरणसंघातसमानजातीयमेव ज्योतिरन्तरमनुमेयम्, आदित्यादिभिः तत्समानजातीयैरेव उपक्रियमाणत्वादिति—तदसत्, उपकार्योपकारकभावस्यानियमदर्शनात्; कथम् ? पार्थिवैरिन्धनैः पार्थिवत्वसमानजातीयैस्तृणोलपादिभिरग्नेः प्रज्वलनोपकारः क्रियमाणो दृश्यते; न च तावता तत्समानजातीयैरेवाग्नेः प्रज्वलनोपकारः सर्वत्रानुमेयः स्यात्, येनोदकेनापि प्रज्वलनोपकारो भिन्नजातीयेन वैद्युतस्याग्नेः जाठरस्य च क्रियमाणो दृश्यते; तस्माद् उपकार्योपकारकभावे समानजातीयासमानजातीयनियमो नास्ति; कदाचित् समानजातीया मनुष्या मनुष्यैरेवोपक्रियन्ते कदाचित् स्थावरपश्वादिभिश्च भिन्न-ऐसा जो कहा कि देहेन्द्रिय-संघातके समान जातिवाली ही किसी अन्य ज्योतिका अनुमान करना चाहिये, क्योंकि आदित्यादि तथा उसके समानजातीय ज्योतियोंसे ही संघातका उपकार होता है, सो भी ठीक नहीं है, क्योंकि उपकार्य-उपकारकभावका कोई नियम नहीं देखा जाता; किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] पार्थिव इन्धनसे एवं पार्थिवत्वमें समान जातिवाले तृण और उलप ( घास ) आदिसे अग्निका प्रज्वलनरूप उपकार होता देखा जाता है, किंतु इतनेहीसे सर्वत्र ऐसा अनुमान नहीं कर लेना चाहिये कि उनके समानजातीय पदार्थोंसे ही अग्निका प्रज्वलनरूप उपकार होगा, क्योंकि उनसे भिन्न जातिवाले जलसे भी बिजलीरूप अग्निका तथा पेटके भीतरकी अग्निका प्रज्वलनरूप उपकार होता देखा जाता है; अतः उपकार्योपकारकभावमें समानजातीय अथवा असमानजातीय होनेका नियम नहीं है; कभी तो समानजातीय मनुष्य मनुष्योंसे ही उपकृत होते हैं और कभी स्थावर एवं पशु आदि भिन्न जातिवालोंसे ही

८८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

८८८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
जातीयैः, तस्मादहेतुः कार्यकारणसंघातसमानजातीयैरेव आदित्यादिज्योतिर्भिरुपक्रियमाणत्वादिति।उनका उपकार होता है; अतः कार्यकारणसंघातके समानजातीय आदित्यादि ज्योतियोंसे उपकृत होनेके कारण ही आत्मज्योति संघातके समानजातीय ही होनी चाहिये—यह कोई हेतु नहीं है।
यत् पुनरात्थ—चक्षुरादिभिरादित्यादिज्योतिर्वद् अदृश्यत्वादित्ययं हेतुर्ज्योतिरन्तरस्यान्तःस्थत्वं वैलक्षण्यं च न साधयति, चक्षुरादिभिरनैकान्तिकत्वादिति—तदसत्, चक्षुरादिकरणेभ्योऽन्यत्वे सतीति हेतोर्विशेषणत्वोपपत्तेः।और तुमने जो ऐसा कहा कि आदित्यादिकी ज्योतिके समान चक्षु आदि इन्द्रियोंसे दिखायी देनेवाली न होनेके कारण [आत्मज्योति अन्तःस्थ और भिन्न प्रकारकी है]—यह हेतु तो चक्षु आदिसे व्यभिचरित होनेके कारण उस अन्य ज्योतिका अन्तःस्थ और विलक्षण होना सिद्ध नहीं कर सकता, सो ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि 'चक्षु आदि इन्द्रियोंसे भिन्न होते हुए' [उनसे न दिखायी देनेके कारण आत्मज्योति अन्तःस्थ एवं विलक्षण है] इस प्रकार उपर्युक्त हेतुमें विशेषण लगा देनेसे उसकी उपपत्ति हो सकती है।<sup></sup>

१. तात्पर्य यह है कि पहले अनुमानका स्वरूप यों था 'आत्मज्योतिः अन्तःस्थम्, आदित्यादिवच्चक्षुरादिभिरदृश्यत्वात्।' अर्थात् आत्मज्योति अपने भीतर है, क्योंकि वह सूर्य आदिकी भाँति आँखोंसे नहीं दिखायी देती। यह हेतु नेत्रके विषयमें व्यभिचरित था; क्योंकि अपना नेत्र भी अपने ही नेत्रसे नहीं देखा जा सकता। इस दोषको मिटानेके लिये सिद्धान्तीने हेतुमें 'चक्षुरादिकरणेभ्योऽन्यत्वे सति' यह विशेषण जोड़ दिया। अब अनुमानका स्वरूप इस प्रकार हो गया—'आत्मज्योतिः अन्तःस्थम्, चक्षुरादिकरणेभ्योऽन्यत्वे सति चक्षुरादिभिरदृश्यत्वात्।' अर्थात् आत्मज्योति अपने भीतर स्थित है; क्योंकि वह चक्षु आदि इन्द्रियोंसे भिन्न होती हुई उन इन्द्रियोंसे देखी नहीं जाती—ऐसा हेतु माननेपर कहीं भी दोष नहीं आता।

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थे ८८९

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थे ८८९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
कार्यकारणसंघातधर्मत्वं ज्योतिष इति यदुक्तम्, तन्न, अनुमानविरोधात्; आदित्यादिज्योतिर्वत् कार्यकारणसंघातादर्थान्तरं ज्योतिरिति ह्यनुमानमुक्तम्; तेन विरुध्यते इयं प्रतिज्ञा—कार्यकरणसंघातधर्मत्वं ज्योतिष इति।<br><br>तद्भावभावित्वं त्वसिद्धम्, मृते देहे ज्योतिषोऽदर्शनात्।तथा उस ज्योतिको जो देहेन्द्रियसंघातके धर्मवाली बतलाया, सो भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे अनुमानसे विरोध आता है; आदित्यादि ज्योतिके समान यह ज्योति देहेन्द्रियसंघातसे भिन्न पदार्थ है, ऐसा अनुमान कहा गया है; उस अनुमानसे इस प्रतिज्ञाका कि उस ज्योतिमें देहेन्द्रियसंघातका धर्मत्व है, विरोध आता है; देह तद्भावभावित है [अर्थात् जबतक देह है, तबतक उसके धर्मरूपसे चैतन्यज्योति भी रहती है] यह तुम्हारा हेतु तो असिद्ध है, क्योंकि मृत देहमें वह ज्योति नहीं देखी जाती।^१
सामान्यतो दृष्टस्यानुमानस्याप्रामाण्ये सति पानभोजनादिसर्वव्यवहारलोपप्रसङ्गः; स चानिष्टः; पानभोजनादिषु ही क्षुत्पिपासादिनिवृत्तिमुपलब्धवतः तत्सामान्यात् पानभोजनाद्युपादनं दृश्यमानं लोके न प्राप्नोति; दृश्यन्तेसामान्यतो दृष्ट अनुमानकी अप्रामाणिकता माननेपर तो भोजन और जलपानादि सभी व्यवहारोंके लोपका प्रसङ्ग उपस्थित होगा; और वह इष्ट नहीं है; क्योंकि तब तो, जलपान और भोजनादि करनेपर भूख और प्यासकी निवृत्ति देखनेवालेको उसीकी समानतासे लोकमें जलपान और भोजन ग्रहण करते दिखायी देना सिद्ध नहीं हो सकता [क्योंकि सामान्यतो दृष्ट नियमको वह

१ अतः इस हेतुके असिद्ध होनेसे तुम्हारा अनुमान अप्रामाणिक है, इससे आत्मज्योतिको देहेन्द्रियसंघातका धर्म नहीं सिद्ध किया जा सकता।

८९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

८९०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी अनुवाद
हुपलब्धपानभोजनाः सामान्यतः पुनः पानभोजनान्तरैः क्षुत्पिपासादिविनिवृत्तिमनुमिन्वन्तस्तादर्थ्येन प्रवर्त्तमानाः ।अप्रामाणिक मान लेगा ] किंतु जिन्होंने जलपान और भोजन किया है, वे लोग फिर भी जलपान और भोजन करनेसे क्षुधा-पिपासादिको निवृत्तिका अनुमान करके उसके लिये प्रवृत्त होते देखे ही जाते हैं।
यदुक्तम्—अयमेव तु देहो दर्शनादिक्रियाकर्तेति, तत् प्रथममेव परिहृतं स्वप्नस्मृत्योर्देहादर्थान्तरभूतो द्रष्टेति ।ऐसा जो कहा कि यही देह दर्शनादि क्रियाका कर्ता है; इसका तो ‘स्वप्न और स्मृतियोंका देहसे भिन्न कोई अन्य द्रष्टा है’ ऐसा कहकर पहले ही परिहार कर दिया गया है।
अनेनैव ज्योतिरान्तरस्य अनात्मत्वमपि प्रत्युक्तम् ।तथा इसीसे [ अर्थात् संघातके द्रष्टृत्वका निराकरण करके ] उस अन्य ज्योतिके अनात्मत्वका भी निषेध कर दिया है
यत् पुनः खद्योतादेः कादाचित्कं प्रकाशाप्रकाशकत्वम्, तदसत्, पक्षाद्यवयवसंकोचविकाशनिमित्तत्वात् प्रकाशाप्रकाशकत्वस्य ।तथा खद्योतका जो कभी प्रकाशकत्व और कभी अप्रकाशकत्व बतलाया, वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि वे प्रकाशकत्व और अप्रकाशकत्व तो पंख आदि अवयवोंके सिकोड़ने और खोलनेके कारण हैं
यत् पुनरुक्तम्, धर्माधर्मयोरवश्यं फलदातृत्वं स्वभावोऽभ्युपगन्तव्य इति—तदभ्युपगमे भवतः सिद्धान्तहानात् ।तथा यह जो कहा कि ‘अवश्य फल देना’—यह धर्म और अधर्मका स्वभाव ही स्वीकार कर लेना चाहिये; सो ऐसा स्वीकार करनेपर तुम्हारे ही सिद्धान्तकी हानि होगी।
एतेनानवस्थादोषः प्रत्युक्तः। तस्मा-और इसीसे (सिद्धान्तमें विरोध होनेके ही कारण ) तुम्हारे द्वारा आशङ्कित अनवस्था-दोषका भी निराकरण कर दिया गया। अतः

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८९१

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८९१


दस्ति व्यतिरिक्तं चान्तःस्थं ज्योतिरात्मेति ॥ ६ ॥संघातसे पृथक् और अपने भीतर ही स्थित आत्मज्योति है—यह सिद्ध हुआ ॥ ६ ॥
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आत्माका स्वरूप

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यद्यपि व्यतिरिक्तत्वादि सिद्धम् तथापि समानजातीयानुग्राहकत्वदर्शननिमित्तभ्रान्त्या करणानामेवान्यतमो व्यतिरिक्तो वा इत्यविवेकतः पृच्छति—यद्यपि आत्माका देहादिसे भिन्न होना इत्यादि बातें सिद्ध हो गयीं तो भी आदित्यादि समानजातीय पदार्थोंका ही अनुग्राहकत्व देखनेके कारण उत्पन्न हुई भ्रान्तिसे 'आत्मा इन्द्रियोंमेंसे ही कोई एक है अथवा उनसे भिन्न है' इसका विवेक न होनेसे जनक पूछता है—

कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः स समानः सन्नुभौ लोकावनुसञ्चरति ध्यायतीव लेलायतीव स हि स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति मृत्यो रूपाणि ॥ ७ ॥

'आत्मा कौन है ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'यह जो प्राणोंमें बुद्धिवृत्तियोंके भीतर रहनेवाला विज्ञानमय ज्योतिःस्वरूप पुरुष है, वह समान (बुद्धिवृत्तियोंके सदृश) हुआ इस लोक और परलोक दोनोंमें संचार करता है। वह [ बुद्धिवृत्तिके अनुसार ] मानो चिन्तन करता है और [ प्राणवृत्तिके अनुरूप होकर ] मानो चेष्टा करता है। वही स्वप्न होकर इस लोक (देहेन्द्रियसंघात) का अतिक्रमण करता है और [ शरीर तथा इन्द्रियरूप ] मृत्युके रूपोंका भी अतिक्रमण करता है ॥ ७ ॥

कतम इति; न्यायसूक्ष्मताया दुर्विज्ञेयत्वादुपपद्यते भ्रान्तिः । अथवा <br>(पार्श्वनोट: प्रश्नस्यौचित्यं बीजं च)'कतम इति'—सूक्ष्म युक्तियां कठिनतासे समझमें आती हैं; इसलिये भ्रान्ति होनी सम्भव ही है।

८९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

८९२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| शरीरव्यतिरिक्ते सिद्धेऽपि करणा-<br>नि सर्वाणि विज्ञानवन्तीव, विवे-<br>कत आत्मनोऽनुपलब्धत्वात्;<br>अतोऽहं पृच्छामि-कतम<br>आत्मेति; कतमोऽसौ देहेन्द्रिय-<br>प्राणमनःसु, यस्त्वयोक्त आत्मा,<br>येन ज्योतिषास्त इत्युक्तम् । | अथवा आत्मा शरीरसे व्यतिरिक्त<br>सिद्ध होनेपर भी समस्त इन्द्रियाँ<br>विज्ञानवती-सी जान पड़ती हैं,<br>क्योंकि आत्मा उनसे पृथक्रूपसे<br>उपलब्ध नहीं होता । इसलिये मैं<br>पूछता हूँ कि आत्मा कौन-सा है ?<br>जिसका आपने उल्लेख किया है,<br>वह आत्मा शरीर, इन्द्रिय, प्राण<br>और मन—इनमेंसे कौन-सा है,<br>जिस ज्योतिके द्वारा पुरुष बैठता<br>है—ऐसा कहा गया है । | | अथवा योऽयमात्मा त्वया-<br>भिप्रेतो विज्ञानमयः, सर्व इमे<br>प्राणा विज्ञानमया इव, एषु<br>प्राणेषु कतमः ? यथा समुदितेषु<br>ब्राह्मणेषु, सर्व इमे तेजस्विनः<br>कतम एषु षडङ्गविदिति । | अथवा जो यह आत्मा आपको<br>विज्ञानमयरूपसे अभिप्रेत है, सो ये<br>सभी प्राण विज्ञानमयके समान हैं,<br>इन प्राणोंमें वह कौन-सा है ? जिस<br>प्रकार उपस्थित ब्राह्मणोंमें ये सभी<br>तेजस्वी हैं, इनमें छहों वेदाङ्गोंका<br>जाननेवाला कौन है ? [ ऐसा<br>प्रश्न किया जाय । ] | | पूर्वस्मिन् व्याख्याने कतम<br>आत्मेत्येतावदेव प्रश्नवाक्यम्,<br>योऽयं विज्ञानमय इति प्रति-<br>वचनम् ; द्वितीये तु व्याख्याने<br>प्राणेष्वित्येवमन्तं प्रश्नवाक्यम् ।<br>अथवा सर्वमेव प्रश्नवाक्यम्—<br>विज्ञानमयो हृद्यन्तर्ज्योतिः<br>पुरुषः कतम इत्येतदन्तम् ।<br>योऽयं विज्ञानमय इत्येतस्य<br>शब्दस्य निर्धारितार्थविशेष- | [ इन दोनों व्याख्याओंमेंसे ]<br>पूर्व व्याख्यामें 'कतम आत्मा'<br>(कौन-सा आत्मा है) इतना ही<br>प्रश्नवाक्य है, और 'योऽयं विज्ञान-<br>मयः' इत्यादि उत्तर है; तथा<br>दूसरी व्याख्यामें 'प्राणेषु' यहाँ तक<br>प्रश्न वाक्य हे अथवा 'विज्ञानमयो<br>हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः' कतमः यहाँ<br>तक सारा ही प्रश्नवाक्य है । किंतु<br>'योऽयं विज्ञानमयः' इस शब्दका<br>निश्चित अर्थविशेषसे सम्बन्ध |

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८६३ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ८६३
संस्कृतहिन्दी
विषयत्वम्, कतम आत्मेतीति-शब्दस्य प्रश्नवाक्यपरिसमाप्त्यर्थत्वम्—व्यवहितसम्बन्धमन्तरेण युक्तमिति कृत्वा, कतम आत्मेतीत्येवमन्तमेव प्रश्नवाक्यम्, योऽयमित्यादि परं सर्वमेव प्रतिवचनमिति निश्चीयते।<br><br>योऽयमित्यात्मनः प्रत्यक्षत्वा-[आत्मनो विज्ञानमयत्वविशेषणे हेतुः]निर्देशः; विज्ञानमयो विज्ञानप्रायो बुद्धिविज्ञानोपाधिसम्पर्कादविवेकाद् विज्ञानमय इत्युच्यते—बुद्धिविज्ञानसम्पृक्त एव हि यस्मादुपलभ्यते, राहुरिव चन्द्रादित्यसम्पृक्तः; बुद्धिर्हि सर्वार्थकरणम्, तमसीव प्रदीपः पुरोऽवस्थितः; 'मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति' इति ह्युक्तम्। बुद्धिविज्ञानालोकविशिष्टमेव हि सर्वं विषयजातमुपलभ्यते, पुरोऽवस्थितप्रदीपालोकविशिष्टमिव तमसि; द्वारमात्राणि त्वन्यानिरखनेवाला होना तथा 'कतमं आत्मेति' इसमें इति शब्दका प्रश्नवाक्यकी समाप्तिके लिये होना किसी व्यवहित सम्बन्धके बिना ही उचित है—ऐसा समझकर 'कतम आत्मेति' इसके इति शब्दपर्यन्त ही प्रश्नवाक्य है; 'योऽयम्' इत्यादि आगेका सारा वाक्य उत्तर ही है—ऐसा निश्चय होता है।<br><br>आत्मा प्रत्यक्ष है, इसलिये 'योऽयम्' (जो यह) ऐसा निर्देश किया गया है; विज्ञानमय-विज्ञानप्राय, बुद्धि-विज्ञानरूप उपाधिके सम्पर्कका विवेक न होनेके कारण यह विज्ञानमय कहा जाता है; क्योंकि जिस प्रकार राहु चन्द्रमा और सूर्यके सम्पर्कमें आकर ही उपलब्ध होता है, उसी प्रकार यह बुद्धिरूप विज्ञानसे सम्पर्क रखकर ही अनुभवमें आता है; अन्धकारमें सामने रखे हुए दीपकके समान बुद्धि ही सब प्रकारके व्यापारोंका साधन है; 'मनहीसे देखता है, मनहीसे सुनता है' ऐसा कहा भी है। जिस प्रकार अन्धकारमें समस्त पदार्थ सम्मुखस्थ दीपकके प्रकाशसे युक्त होकर ही उपलब्ध होते हैं, उसी प्रकार सारे पदार्थ बुद्धिरूप विज्ञानके आलोकसे विशिष्ट होकर ही उपलब्ध होते हैं। अन्य इन्द्रियां

८९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

८९४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृतहिन्दी
करणानि बुद्धेः; तस्मात्तेनैव विशेष्यते—विज्ञानमय इति ।तो बुद्धिकी द्वारमात्र हैं। इसलिये आत्माको उस (बुद्धि) के द्वारा ही विज्ञानमय इस प्रकार विशेषित किया जाता है।
[मयटो विकारार्थस्त्वनिराकरणम्]<br>येषां परमात्मविज्ञप्तिविकार इति व्याख्यानम्, तेषां 'विज्ञानमयः' 'मनोमयः' इत्यादौ विज्ञानमयशब्दस्य अन्यार्थदर्शनादश्रौतार्थतावसीयते; संदिग्धश्च पदार्थोऽन्यत्र निश्चितप्रयोगदर्शनान्निर्धारयितुं शक्यः; वाक्यशेषात्, निश्चितन्यायबलाद् वा; सधीरिति चोत्तरत्र पाठात्, 'हृद्यन्तः' इति वचनाद् युक्तं विज्ञानप्रायत्वमेव ।जिनके मतमें 'विज्ञानमय' शब्दकी व्याख्या 'परमात्माकी विज्ञप्तिका विकार' है, उनका यह अर्थ, 'विज्ञानमयः' 'मनोमयः' इत्यादि तैत्तिरीय श्रुतियोंमें विज्ञानमय शब्दका दूसरा अर्थ देखे जानेके कारण, श्रुतिविरुद्ध सिद्ध होता है।¹ जहाँ किसी पदके अर्थमें संदेह हो वहाँ अन्य स्थानमें निश्चित प्रयोग देखकर उसके अनुसार ही निश्चय किया जाता है; इसके सिवा वाक्यशेषसे अथवा निश्चित न्यायके बलसे भी उसका निश्चय हो सकता है।² तथा आगे 'सधीः' (बुद्धिके सहित) ऐसा पाठ है और 'हृद्यन्तः' ऐसा वचन भी है; इनसे भी उसका विज्ञानप्रायता—विज्ञानाधिक्य ही उचित है।
['प्राणेषु' 'हृदि' इत्यादिप्रयोगानामभिप्रायः]<br>प्राणेष्विति व्यतिरेकप्रदर्शनार्था सप्तमी—यथा वृक्षेषु पाषाण इति'प्राणेषु' यह सप्तमी व्यतिरेक प्रदर्शित करनेके लिये है; जैसे 'वृक्षेषु पाषाणः' यहाँ

१. तात्पर्य यह है कि इन तैत्तिरीय-श्रुतियोंमें मयट् प्रत्यय प्राचुर्य (प्रायः अथवा आधिक्य) अर्थमें ही हो सकता है, विकारार्थक नहीं हो सकता; इसलिये यदि यहाँ इसका अर्थ विकार किया जायगा तो इसका उन श्रुतियोंसे विरोध होगा; इसलिये यहाँ भी इसे प्राचुर्यार्थक ही समझना चाहिये।
२. क्योंकि यदि आत्मा विज्ञानका विकार होगा तो उसे मोक्ष नहीं मिल सकता।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९५

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९५


| सामीप्यलक्षणा; प्राणेषु हि व्यतिरेकाव्यतिरेकता संदिह्यत आत्मनः; प्राणेषु प्राणेभ्यो व्यतिरिक्त इत्यर्थः; यो हि येषु भवति, स तद्व्यतिरिक्तो भवत्येव—यथा पाषाणेषु वृक्षः । | सामीप्य अर्थको लक्षित करानेवाली सप्तमी है<sup></sup> प्राणोंमें ही आत्माकी भिन्नता या अभिन्नताके विषयमें संदेह होता है; अतः 'प्राणेषु' अर्थात् प्राणोंसे भिन्न है, क्योंकि जो जिनमें होता है, वह उनसे भिन्न होता ही है; जैसे पाषाणोंमें होनेवाला वृक्ष [ पाषाणोंसे भिन्न होता है ] । | | हृदि तन्नैतत् स्यात्; प्राणेषु प्राणजातीयैव बुद्धिः स्यादित्यत आह—हृद्यन्तरिति । हृच्छब्देन पुण्डरीकाकारो मांसपिण्डम्, तात्स्थ्याद् बुद्धिर्हृत्, तस्यां हृदि बुद्धौ; अन्तरिति बुद्धिवृत्तिव्यतिरेकप्रदर्शनार्थम्, ज्योतिरवभासात्मकत्वादात्मोच्यते; तेन ह्यवभासकेन आत्मना ज्योतिषा आस्ते पल्ययते कर्म कुरुते, चेतनावानिव ह्ययं कार्यकारणपिण्डः—यथा आदित्यप्रकाशस्थो घटः । | 'हृदि'—हृदयमें, वहां यह रहता है; प्राणोंमें प्राणजातिकी ही बुद्धि रहेगी, इसलिये श्रुति कहती है—'हृद्यन्तः' । यहाँ 'हृत्' शब्दसे पुण्डरीकाकार मांसपिण्ड कहा गया है, उसमें रहनेके कारण बुद्धि हृत् है, उस हृत्में अर्थात् बुद्धिमें; 'अन्तः यह बुद्धिवृत्तिसे उसकी भिन्नता प्रदर्शित करनेके लिये है, प्रकाशस्वरूप होनेके कारण आत्मा 'ज्योतिः' कहा गया है; उस प्रकाशस्वरूप आत्मज्योतिसे चेतनावान्-सा होकर ही यह देहेन्द्रियसंघात सूर्यके प्रकाशमें स्थित घटके समान रहता, इधर उधर जाता और कर्म करता है । | | यथा वा मरकतादिर्मणिः क्षीरादिद्रव्ये प्रक्षिप्तः परीक्षणाय, आत्मच्छायमेव तत् क्षीरादिद्रव्यं | अथवा जिस प्रकार परीक्षाके लिये दुग्धादि द्रव्यमें डाली हुई मरकतादि मणि उस दुग्धादि द्रव्यको अपनी ही |


१ अतः 'वृक्षेषु पाषाणः' का अर्थ होता है—वृक्षके निकट पत्थर है ।

८९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

८९६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| करोति, तादृगेतदात्मज्योतिर्बुद्धेरपि हृदयात् सूक्ष्मत्वाद् हृदन्तस्थमपि हृदयादिकं कार्यकारणसंघातं चैकीकृत्य आत्मज्योतिश्छायं करोति, पारम्पर्येण सूक्ष्मस्थूलतारतम्यात्, सर्वान्तरतमत्वात्। | कान्तिवाला कर देती है, उसी प्रकार यह आत्मज्योति बुद्धि अर्थात् हृदयसे भी सूक्ष्म होनेके कारण हृत्पिण्डमें स्थित हृदयादिक और देहेन्द्रियसंघातको भी अपनेसे अभिन्न करके आत्मज्योतिकी कान्तिसे युक्त ही कर देता है, क्योंकि परम्परासे सूक्ष्म-स्थूल तारतम्यसे यह सबकी अपेक्षा अन्तरतम है। | | बुद्धिस्तावत् स्वच्छत्वादानन्तर्याच्चात्मचैतन्यज्योतिः प्रतिच्छाया भवति; (अनात्मन्यात्मचैतन्याभाससंक्रान्तेः क्रमः) तेन हि विवेकिनामपि तत्र आत्माभिमानबुद्धिः प्रथमा; ततोऽप्यानन्तर्यान्मनसि चैतन्यावभासता, बुद्धिसम्पर्कात्; तत इन्द्रियेषु, मनःसंयोगात्; ततोऽनन्तरं शरीरे, इन्द्रियसम्पर्कात्। एवं पारम्पर्येण कृत्स्नं कार्यकारणसंघातमात्मा चैतन्यस्वरूपज्योतिषावभासयति। तेन हि सर्वस्य लोकस्य कार्यकारणसंघाते तद्वृत्तिषु चानियतात्माभिमानबुद्धिर्यथाविवेकं जायते। | बुद्धि तो स्वच्छ है और आत्माकी समीपवर्तिनी है, इसलिये वह आत्मचैतन्यकी प्रतिच्छायासे युक्त हो जाती है; इसीसे विवेकियॉको भी पहले उसीमें आत्माभिमानबुद्धि होती है; उसका भी समीपवर्ती होनेसे बुद्धिके सम्पर्कसे मनमें चैतन्यावभासता आती है और मनका [ इन्द्रियोंसे ] सम्पर्क होनेके कारण मनसे इन्द्रियोंमें; फिर इन्द्रियोंका शरीरसे सम्पर्क होनेके कारण उनसे शरीरमें चैतन्यावभासता आ जाती है; इस प्रकार परम्परासे आत्मा सम्पूर्ण देहेन्द्रियसंघातको चैतन्यस्वरूप प्रकाशसे प्रकाशित कर देता है, इसीसे सब लोगोंकी देहेन्द्रियसंघात और उसकी वृत्तियोंमें अपने-अपने विवेकके अनुसार अनियत आत्माभिमानबुद्धि उत्पन्न हो जाती है। | | तथा च भगवतोक्तं गीतासु— | ऐसा ही भगवान्ने भी गीतामें |

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८९७

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८९७


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
“यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत।।” (१३।३३) “यदादित्यगतं तेजः” (१५।१२) इत्यादि च । “नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानाम्” (२।२।१४) इति च काठके । “तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति” (क० उ० २।२।१६) इति च । “येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः” इति च मन्त्रवर्णः । तेनायं हृद्यन्तर्ज्योतिः।कहा है—“हे भारत ! जिस प्रकार एक सूर्य इस सम्पूर्ण लोकको प्रकाशित करता है, उसी प्रकार क्षेत्री [आत्मा] सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करता है” “जो आदित्यगत तेज है [वह मेरा ही जानो]” इत्यादि । “जो अनित्योंमें नित्य और चेतनोंमें चेतन है” ऐसा कठोपनिषद्में भी कहा है और ऐसा भी कहा है कि “सब उसीके प्रकाशित होनेसे प्रकाशित होता है तथा यह सब उसीके तेजसे प्रकाशित है।” इनके सिवा “जिसके तेजसे तेजोमय होकर सूर्य तपता है” ऐसा मन्त्रवर्ण भी है। अतः यह आत्मा हृदयान्तर्गत ज्योति है।
पुरुषः—आकाशवत् सर्वगतत्वात् पूर्ण इति पुरुषः; निरतिशयं चास्य स्वयंज्योतिष्ट्वम्, सर्वविभासकत्वात् स्वयमन्यानवभास्यत्वाच्च । स एष पुरुषः स्वयमेव ज्योतिःस्वभावः, यं त्वं पृच्छसि—कतम आत्मेति‘पुरुषः’ आकाशके समान सर्वगत होनेके कारण पूर्ण है, इसलिये पुरुष है; सबका प्रकाशक और स्वयं दूसरोंसे अप्रकाश्य होनेके कारण इसकी स्वयंप्रकाशता सबसे बढ़कर है। वह यह पुरुष, जिसके विषयमें तुम पूछते हो कि ‘आत्मा कौन-सा है?’ स्वयं ही ज्योतिःस्वभाव है।
(आत्मनः सर्वव्यवहारहेतुत्वम्)<br>बाह्यानां ज्योतिषां सर्वकरणानुग्राहकाणां प्रत्यस्तमयेऽन्तःकरणद्वारेण हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुष आत्मानुग्राहकः करणानामित्युक्तम् ।समस्त इन्द्रियोंकी उपकारक बाह्य ज्योतियोंके अस्त हो जानेपर हृदयके भीतर अन्तर्ज्योतिःस्वरूप पुरुष—पूर्ण आत्मा अन्तःकरणके द्वारा इन्द्रियोंका उपकारक है—ऐसा पहले कहा गया

बृ० उ० ५७—

८९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

८९८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| यदापि बाह्यकरणानुग्राहकाणा- <br> मादित्यादिज्योतिषां भावः, तदा- <br> प्यादित्यादिज्योतिषां परार्थत्वात् <br> कार्यकरणसङ्घातस्याचैतन्ये स्वा- <br> र्थानुपपत्तेः स्वार्थज्योतिष <br> आत्मनोऽनुग्रहाभावेऽयं कार्य- <br> करणसङ्घातो न व्यवहाराय <br> कल्पते; आत्मज्योतिरनुग्रहेणैव <br> हि सर्वदा सर्वः संव्यवहारः, <br> “यदेतद् हृदयं मनश्चैतत् संज्ञा- <br> नम्” (ऐ० उ० ३। २) इत्यादि <br> श्रुत्यन्तरात्; साभिमानो हि <br> सर्वप्राणिसंव्यवहारः; अभिमान- <br> हेतुं च मरकतमणिदृष्टान्ते- <br> नावोचाम। <br> यद्यप्येवमेतत्, तथापि जाग्र- <br> द्विषये सर्वकरणागोचरत्वादात्म- <br> ज्योतिषो बुद्ध्यादिबाह्याभ्यन्तर- <br> कार्यकरणव्यवहारसन्निपातव्या- <br> कुलत्वान्न शक्यते तज्ज्योतिरा- <br> त्माख्यं मुञ्जेषीकावन्निष्कृष्य <br> दर्शयितुमित्यतः स्वप्ने दिदर्शयिषुः | है। जिस समय बाह्य इन्द्रियोंकी <br> उपकारक आदित्यादि ज्योतियोंकी <br> भी सत्ता रहती है, उस समय भी <br> आदित्यादि ज्योतियाँ परार्थ होनेके <br> कारण और कार्यकारणसङ्घात <br> अचेतन है, इसलिये उसमें स्वार्थका <br> भाव सम्भव न होनेसे स्वार्थज्योतिः <br> (जिसका प्रकाश अपने ही लिये है <br> उस) आत्माके अनुग्रहके बिना <br> यह देहेन्द्रियसङ्घात व्यवहारमें <br> समर्थ नहीं हो सकता; सारा व्यव- <br> हार सर्वदा आत्मज्योतिके अनुग्रहसे <br> ही होता है, “जो यह हृदय है, वही <br> मन है और वही संज्ञान है” ऐसी <br> एक अन्य श्रुतिसे भी यही सिद्ध <br> होता है। प्राणियोंका सारा व्यव- <br> हार अभिमानपूर्वक ही होता है <br> और अभिमानका हेतु हमने मर- <br> कतमणिके दृष्टान्तसे बतला दिया है। <br> यद्यपि यह बात ऐसी ही है, <br> तथापि जाग्रत्-कालमें आत्मज्योति <br> सारी ही इन्द्रियोंकी अविषय तथा <br> बुद्धि आदि बाह्य और आभ्यन्तर <br> देह एवं इन्द्रिय आदिके व्यवहार- <br> समूहसे चञ्चल रहती है, इसलिये <br> उस आत्मसंज्ञक ज्योतिको मूँजमेंसे <br> सींकके समान निकालकर <br> पृथक्रूपसे नहीं दिखाया जा <br> सकता, अतः उसे स्वप्नमें |

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८९९

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८९९


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
प्रक्रमते—दिखानेकी इच्छासे श्रुति आरम्भ करती है।
स समानः सन्नुभौ लोकावनुसञ्चरति । यः पुरुषः स्वयमेव ज्योतिरात्मा; स समानः सदृशः सन्—केन ? प्रकृतत्वात् सन्निहितत्वाच्च हृदयेन; ‘हृदि’ इति च हृच्छब्दवाच्या बुद्धिः प्रकृता सन्निहिता च; तस्मात्तयैव सामान्यम् ।वह पुरुष समान रहकर इस लोक और परलोक-दोनोंमें सञ्चार करता है। जो पुरुष स्वयंज्योतिः-स्वरूप आत्मा ही है, वह समान—एक जैसा रहकर; किसके समान रहकर ? प्रकरण-प्राप्त और समीपवर्ती होनेके करण हृदयके; ‘हृदि’ इससे ‘हृत्’ शब्दवाच्य बुद्धि ही प्रकरणप्राप्त है और वही समीपवर्तिनी भी है; अतः उसीसे आत्माकी समानता रहती है।
किं पुनः सामान्यम् ? अश्वमहिषवद् विवेकतॊऽनुपलब्धिः; अवभास्या बुद्धिः, अवभासकं तदात्मज्योतिः, आलोकवत्; अवभास्यावभासकयोर्विवेक्तोऽनुपलब्धिः प्रसिद्धा; विशुद्धत्वाद्वद्यालोकोऽवभास्येन सदृशो भवति; यथा रक्तमवभासयन् रक्तसदृशो रक्ताकारो भवति, यथा हरितं नीलं लोहितं च अवभासयन्नालोकःवह समानता किस प्रकारकी है ? घोड़े और भैंसेके समान उनका अलग-अलग उपलब्ध न होना; बुद्धि प्रकाश्य है और प्रकाशके समान आत्मज्योति प्रकाशक है; प्रकाश्य और प्रकाशकका अलग-अलग उपलब्ध न होना प्रसिद्ध ही है; क्योंकि प्रकाश शुद्ध होनेके कारण प्रकाश्यके समान हो जाता है, जिस प्रकार लाल रंगकी वस्तुको प्रकाशित करते समय वह लालके समान—लाल आकारवाला हो जाता है। एवं हरे, नीले और लोहित पदार्थोंको प्रकाशित करते

९०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

९००बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| तत्समानो भवति, तथा बुद्धिमवभासयन् बुद्धिद्वारेण कृत्स्नं क्षेत्रमवभासयति—इत्युक्तं मरकतमणिनिदर्शनेन। तेन सर्वेण समानो बुद्धिसामान्यद्वारेण। | समय वह तद्रूप हो जाता है। इसी प्रकार बुद्धिको प्रकाशित करते समय वह बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करने लगता है; यह बात मरकतमणिके दृष्टान्तसे बतला दी गयी है। इसीसे बुद्धिकी समानताके द्वारा वह सबके समान हो जाता है। | | 'सर्वमयः' इति चात एव वक्ष्यति; तेनासौ कुतश्चित् प्रविभज्य मुञ्जेषीकावत् स्वेन ज्योतिरूपेण दर्शयितुं न शक्यत इति, सर्वव्यापारं तत्राध्यारोप्य नामरूपगतम्, ज्योतिर्धर्मं च नामरूपयोः, नामरूपे चात्मज्योतिषि, सर्वो लोको मोमुह्यते—अयमात्मा नायमात्मा, एवंधर्मा नैवंधर्मा, कर्ताऽकर्ता, शुद्धोऽशुद्धो बद्धो मुक्तः, स्थितो गत आगतः, अस्ति नास्तीत्यादिविकल्पैः। | इसीसे श्रुति उसे 'सर्वमयः' ऐसा कहेगी; अतः यह मूँजसे सींकके समान किसीसे भी अलग करके अपने ज्योतिःस्वरूपसे नहीं दिखाया जा सकता। उसमें नाम-रूपके सारे व्यापारोंका, नाम-रूपमें ज्योतिके धर्मका तथा आत्मज्योतिमें नाम-रूपका आरोप करके सम्पूर्ण लोक 'यह आत्मा है, यह आत्मा नहीं है, आत्मा ऐसे धर्मोंवाला है, ऐसे धर्मोंवाला नहीं है, कर्ता है, अकर्ता है, शुद्ध है, अशुद्ध है, बद्ध है, मुक्त है, स्थित है, गत है, आगत है, सद्रूप है, असद्रूप है' इत्यादि विकल्पोंसे अत्यन्त मोहित हो रहा है। | | अतः समानः सन्नुभौ लोकौ प्रतिपन्नप्रतिपत्तव्यौ इहलोकपरलोकावुपात्तदेहेन्द्रियादिसङ्घातत्यागान्योपादानसन्तानप्रबन्धशतसन्निपातैरनुक्रमेण सञ्चरति। | अतः यह समान रहकर प्राप्त इहलोक और प्राप्त करने योग्य परलोक—इन दोनोंमें प्राप्त देहेन्द्रियसङ्घातके त्याग और अप्राप्त देहेन्द्रिय सङ्घातके ग्रहणकी परम्परासे निरन्तर सैकड़ों सम्बन्धोंके क्रमसे सञ्चार करता रहता है। तात्पर्य यह है कि उसके |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०१

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०१


संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी (भाष्यार्थ)
धीसादृश्यमेवोभयलोकसञ्चरणहेतुर्न स्वत इति ।दोनों लोकोंमें सञ्चारका कारण बुद्धिकी सदृशता ही है, वह स्वयं सञ्चार नहीं करता ।
तत्र नामरूपोपाधिसादृश्यं भ्रान्तिरेवात्मनः भ्रान्तिनिमित्तं यत्संसरणहेतुः तदेव हेतुर्न स्वतः, इत्येतदुच्यते—यस्मात् स समानः सन्नुभौ लोकावनुक्रमेण सञ्चरति—तदेतत् प्रत्यक्षमित्येतद्दर्शयति—यतो ध्यायतीव ध्यानव्यापारं करोतीव, चिन्तयतीव, ध्यानव्यापारवतीं बुद्धिं स तटस्थेन चित्स्वभावज्योतिरूपेणावभासयन् तत्सदृशस्तत्समानः सन् ध्यायतीव, आलोकवदेव—अतो भवति चिन्तयतीति भ्रान्तिर्लोकस्य; न तु परमार्थतो ध्यायति ।इस सञ्चारमें जो भ्रान्तिजनित नामरूपोपाधिकी सदृशता है, वही हेतु है, वह स्वतः सञ्चार नहीं करता—यही बात अब बतलायी जाती है; क्योंकि वह समान रहकर क्रमशः दोनों लोकोंमें सञ्चार करता है—यह बात प्रत्यक्ष ही है, सो श्रुति दिखलाती है—क्योंकि वह मानो ध्यान करता है—ध्यानव्यापार-सा करता है, चिन्तन-सा करता है । तात्पर्य यह है कि वह प्रकाशके समान ही अपने चित्स्वभाव ज्योतिःस्वरूपसे ध्यानव्यापारवती बुद्धिको तटस्थरूपसे प्रकाशित करता हुआ उसीके समान होकर मानो ध्यान करता है । इसीसे लोकको ऐसी भ्रान्ति होती है कि वह चिन्तन करता है; किंतु वह वस्तुतः ध्यान नहीं करता ।
तथा लेलायतीव अत्यर्थं चलतीव, तेष्वेव करणेषु बुद्ध्यादिषु वायुषु च चलत्सु तदवभासकत्वात् तत्सदृशं तदिति—लेलायतीव, न तु परमार्थतश्चलनधर्मकं तदात्मज्योतिः ।इसी प्रकार 'लेलायतीव'—मानो अधिक चलता है । उन इन्द्रियोंके अर्थात् बुद्धि आदि वायुओंके चलनेपर उनका अवभासक होनेके कारण वह उनके समान जान पड़ता है; इसीसे मानो अधिक चलता है । वास्तवमें तो वह आत्मज्योति चलनधर्मवाली नहीं है ।