भारतकोश
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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१०३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४

१०३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४


| तदैष आत्मा सविज्ञानो भवति स्वप्न इव विशेषविज्ञानवान् भवति कर्मवशान्न स्वतन्त्रः; स्वातन्त्र्येण हि सविज्ञानत्वे सर्वः कृतकृत्यः स्यात्, नैव तु तल्लभ्यते; अत एवाह व्यासः—<br><br>“सदा तद्भावभावितः” (गीता ८।६) इति। कर्मणा तूद्भाव्यमानेनान्तःकरणवृत्तिविशेषाश्रितवासनात्मकविशेषविज्ञानेन सर्वो लोक एतस्मिन् काले सविज्ञानो भवति। सविज्ञानमेव च गन्तव्यमन्ववक्रामत्यनुगच्छति विशेषविज्ञानोद्भासितमेवेत्यर्थः। | उस समय यह आत्मा सविज्ञान होता है अर्थात् स्वप्नके समान अपने कर्मवश विशेष विज्ञानवान् होता है, स्वतन्त्रतासे नहीं; यदि स्वतन्त्रतासे विज्ञानवान् हो सकता तो सभी कृतकृत्य तो हो जाते; किंतु वह कृतकृत्यता तो [सभीको] प्राप्त नहीं होती; इसीसे व्यासदेवने कहा है—‘हृदयमें सदा उसी भावका चिन्तन करते रहनेसे [वह उसीको प्राप्त होता है]”। अतः इस समय सब लोग कर्मद्वारा उद्भूत अन्तःकरणकी वृत्तिविशेषके आश्रित रहनेवाले वासनात्मक विशेष ज्ञानसे सविज्ञान होते हैं। इस प्रकार सविज्ञान अर्थात् विशेष विज्ञानसे उद्भासित होकर ही अपने गन्तव्य स्थानको अनुक्रमण-अनुगमन करता है। | | तस्मात् तत्काले स्वातन्त्र्यार्थं योगधर्मानुसेवनं परिसंख्यानाभ्यासश्च विशिष्टपुण्योपचयश्च श्रद्दधानैः परलोकार्थिभिरप्रमत्तैः कर्तव्य इति। सर्वशास्त्राणां यत्नतो विधेयोऽर्थो दुश्चरिताच्चोपरमणम्। न हि तत्काले शक्यते किञ्चित् सम्पादयितुम्; कर्मणा नीयमा- | अतः परलोककी इच्छा रखनेवाले श्रद्धालु पुरुषोंको उस समय स्वातन्त्र्य प्राप्त करनेके लिये प्रमादहीन होकर निरन्तर योगधर्मोंका सेवन, विवेकका अभ्यास और विशेषरूपसे पुण्यका संचय करना चाहिये। सम्पूर्ण शास्त्रोंके विधेय अर्थका आचरण करना चाहिये तथा दुष्कर्मसे दूर रहना चाहिये। किंतु उस (उत्क्रान्तिके) समय कुछ भी सम्पादन नहीं किया जा सकता, |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३३

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
नस्य स्वातन्त्र्याभावात्; "पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन" (३।२।१३) इत्युक्तम्। एतस्य ह्यनर्थस्योपशमोपायविधानाय सर्वशाखोपनिषदः प्रवृत्ताः। न हि तद्विहितोपायानुसेवनं मुक्त्वा आत्यन्तिकोऽस्यानर्थस्योपशमोपायोऽस्ति; तस्मादत्रैवो पनिषद्विहितोपाये यत्नपरैर्भवितव्यमित्येष प्रकरणार्थः।क्योंकि कर्मद्वारा ले जाये जाते हुए जीवकी स्वतन्त्रता नहीं रहती; इस विषयमें "पुण्यकर्मसे पुरुष पुण्यवान् होता है और पापकर्मसे पापी" ऐसा ऊपर कहा जा चुका है। इस अनर्थकी निवृत्तिका उपाय बतानेके लिये ही समस्त शाखाओंकी उपनिषदें प्रवृत्त हुई हैं। उनके विधान किये हुए उपायके निरन्तर सेवनके बिना इस अनर्थ को आत्यन्तिक निवृत्तिका कोई और उपाय नहीं है; अतः इस उपनिषद्विहित उपायके अनुष्ठानमें ही प्रयत्न करते रहना चाहिये—यही इस प्रकरणका तात्पर्य है।
शकटवत् सम्भृतसम्भार उत्सर्जन् यातीत्युक्तं किं पुनस्तस्य परलोकाय प्रवृत्तस्य पथ्यदनं शाकटिकसम्भारस्थानीयम्, गत्वा वा परलोकं यद् भुङ्क्ते? शरीराद्यारम्भकं च यत् तत् किम्? इत्युच्यते—तं परलोकाय गच्छन्तमात्मानं विद्याकर्मणी, विद्या च कर्म च विद्याकर्मणी विद्या सर्वप्रकारा विहिता प्रतिषिद्धा च, अविहिताऊपर यह कहा गया है कि गाड़ीके समान जिसने बोझा धारण किया हुआ है, वह जीव शब्द करता हुआ जाता है; किंतु गाड़ीवानके राहखर्चके समान परलोकके लिये जानेवाले इस जीवकी रास्तेकी भोजनसामग्री क्या है, जिसे यह परलोकमें जाकर खाता है? तथा जो उसके शरीरादिका आरम्भक है, वह भी क्या है? सो बतलाया जाता है—परलोकको जानेवाले उस आत्माके साथ विद्या और कर्म—सब प्रकारकी विहित और प्रतिषिद्ध तथा अविहित और

१०३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०३४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| अप्रतिषिद्धा च, तथा कर्म विहितं प्रतिषिद्धं च अविहित-मप्रतिषिद्धं च, समन्वारभेते सम्यगन्वारभेते अन्वालभेते अनुगच्छतः। पूर्वप्रज्ञा च--पूर्वानुभूतविषया प्रज्ञा पूर्वप्रज्ञा अतीतकर्म फलानुभववासनेत्यर्थः। | अप्रतिषिद्ध विद्या ही यहाँ विद्या है एवं विहित और प्रतिषिद्ध तथा अविहित और अप्रतिषिद्ध कर्म ही कर्म हैं-ये विद्या और कर्म सम्यक् अन्वारम्भ अन्वालम्भन अर्थात् अनुसरण करते हैं। तथा पूर्वप्रज्ञा पूर्वानुभवसम्बन्धिनी प्रज्ञा अर्थात् अतीत कर्मफलानुभवकी वासना भी [ साथ जाता है ]। | | सा च वासना अपूर्वकर्मारम्भे कर्मविपाके चाङ्गं भवति; तेनासावप्यन्वारभते, न हि तया वासनया विना कर्म कर्तुं फलं चोपभोक्तुं शक्यते; न ह्यनभ्यस्ते विषये कौशलमिन्द्रियाणां भवति। पूर्वानुभववासनाप्रवृत्तानां त्विन्द्रियाणामिहाभ्यासमन्तरेण कौशलमुपपद्यते; दृश्यते च केषाञ्चित् कासुचित् क्रियासु चित्रकर्मादिलक्षणासु विनैवेहाभ्यासेन जन्मत एव कौशलं कासुचिदत्यन्तसौकर्ययुक्तास्वप्यकौशलं केषाञ्चित्। यथा विषयोपभोगेषु स्वभावत एव केषाञ्चित् कौशलाकौशले दृश्येते। तच्चैतत् सर्वं पूर्व- | वह वासना ही अपूर्व कर्मके आरम्भ और कर्मविपाकमें अङ्ग होती है; अतः यह भी उसके साथ जाती है; उस वासनाके बिना यह कर्म करने और उसका फल भोगनेमें समर्थ नहीं होता; क्योंकि जिस विषयका अभ्यास नहीं होता, उसमें इन्द्रियोंकी कुशलता भी नहीं होती। यहाँ पूर्वानुभवकी वासनासे प्रवृत्त हुई इन्द्रियोंकी बिना अभ्यासके कुशलता होनी सम्भव है; यह बात देखी ही जाती है कि किन्हीं पुरुषोंकी तो चित्रकलादिके समान क्रियाओंमें भी बिना अभ्यासके जन्मसे ही कुशलता होती है और किन्हीं-किन्हींकी अत्यन्त सुगम क्रियाओंमें भी कुशलता नहीं होती। जैसे विषयोपभोगमें भी किन्हींकी स्वभावतः ही कुशलता या अकुशलता देखी जाती है। सो यह सब |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०३५

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०३५


संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
प्रज्ञोद्भावानुद्भवनिमित्तम्, तेन पूर्वप्रज्ञया विना कर्मणि वा फलोपभोगे वा न कस्यचित् प्रवृत्तिरुपपद्यते। <br><br> तस्मादेतत् त्रयं शाकटिकसम्भारस्थानीयं परलोकपथ्यदनं विद्याकर्मपूर्वप्रज्ञाख्यम्। यस्माद् विद्याकर्मणी पूर्वप्रज्ञा च देहान्तरप्रतिपत्त्युपभोगसाधनम्, तस्माद् विद्याकर्मादि शुभमेव समाचरेत् यथेष्टदेहसंयोगोपभोगौ स्यातामिति प्रकरणार्थः ॥ २ ॥पूर्वप्रज्ञाके उद्बुद्ध और अनुद्बुद्ध होनेके कारण ही होती है। इसलिये पूर्वप्रज्ञाके बिना किसीकी भी कर्म या उसके फलोपभोगमें प्रवृत्ति होनी सम्भव नहीं है। <br><br> अतः गाड़ीवानके राहखर्चकी सामग्रीके समान ये विद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञा नामक तीन पदार्थ ही परलोकके मार्गकी भोजन-सामग्री हैं। चूँकि विद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञा—ये देहान्तरकी प्राप्ति और उपभोगके साधन हैं, इसलिये शुभ विद्या और कर्मादिका ही आचरण करे, जिससे कि अभीष्ट देहकी प्राप्ति और उपभोग हों—यही इस प्रकरणका तात्पर्य है ॥ २ ॥
एवं विद्यादिसम्भारसम्भृतो देहान्तरं प्रतिपद्यमानः, मुक्त्वा पूर्वं देहं पक्षीव वृक्षान्तरं देहान्तरं प्रतिपद्यते। अथवा आतिवाहिकेन शरीरान्तरेण कर्मफलजन्मदेशं नीयते। <br><br> किञ्चात्रस्थस्यैव सर्वगतानां करणानां वृत्तिलाभो भवति।इस प्रकार विद्यादिके भारसे लदा हुआ, देहान्तरको प्राप्त करनेवाला जीव पूर्वदेहको छोड़कर वृक्षसे दूसरे वृक्षको जानेवाले पक्षीके समान, अन्य देहको प्राप्त करता है अथवा एक दूसरे आतिवाहिक देहसे कर्मफलके उद्भवस्थान (देवलोकादि) को ले जाया जाता है। <br><br> शङ्का—क्या उसे यहाँ स्थित रहते हुए ही सर्वगत इन्द्रियोंकी वृत्ति प्राप्त

१०३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०३६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| आहोस्विच्छरीरस्थस्य संकुचितानि करणानि मृतस्य भिन्नघटप्रदीपप्रकाशवत् सर्वतो व्याप्य पुनर्देहान्तरारम्भे संकोचमुपगच्छन्ति? किञ्च मनोमात्रं वैशेषिकसमय इव देहान्तरारम्भदेशं प्रति गच्छति? किं वा कल्पनान्तरमेव वेदान्तसमय इति। | हो जाती है? अथवा शरीरस्थ जीवकी संकुचित इन्द्रियाँ मरनेपर, फूटे हुए घड़ेके प्रकाशके समान सर्वत्र व्याप्त होकर, देहान्तरका आरम्भ होनेपर पुनः संकोचको प्राप्त हो जाती हैं? अथवा वैशेषिक सिद्धान्तवालोंके मतानुसार केवल मन ही देहान्तरके देशमें जाता है? किंवा वेदान्तसिद्धान्तके अनुसार कल्पनान्तर ही देहान्तरकी प्राप्ति है? | | उच्यते—"त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः" (बृ० उ० १।५।१३) इति श्रुतेः—सर्वात्मकानि तावत् करणानि, सर्वात्मकप्राणसंश्रयाच्च; तेषामाध्यात्मिकाधिभौतिकपरिच्छेदः प्राणिकर्मज्ञानभावनानिमित्तः। अतस्तद्वशात् स्वभावतः सर्वगतानामनन्तानामपि प्राणानां कर्मज्ञानवासनानुरूपेणैव देहान्तरारम्भवशात् प्राणानां वृत्तिः संकुचति विकसति च। तथा चोक्तम्—"समः प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः समोऽनेन सर्वेण" (बृ० उ० १। | समाधान-बतलाते हैं—"वे ये सभी समान और सभी अनन्त हैं" इस श्रुतिके अनुसार तथा सर्वात्मक प्राणके आश्रित होनेसे इन्द्रियाँ तो सर्वात्मक ही हैं; उनका आध्यात्मिक और आधिभौतिक परिच्छेद प्राणियोंके कर्म, ज्ञान और भावनाके कारण है। अतः उनके अधीन होनेके कारण, स्वभावतः सर्वगत और अनन्त होनेपर भी भोक्ता प्राणोंके कर्म, ज्ञान और वासनाके अनुसार ही देहान्तरके आरम्भवश प्राणोंकी वृत्तिका संकोच या विकास होता है। ऐसा ही कहा भी है "यह प्राण चींटीके प्रमाणका है, मच्छरके समान है, हाथीके बराबर है, इन तीनों लोकोंके समान है और इस सबके |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३७

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३७


३।२२) इति। तथा चेदं वचनमनुकूलम्—“स यो हैताननन्तानुपास्ते” (बृ० उ० १।५। १६) इत्यादि “तं यथा यथोपासते” इति च।<br><br>तत्र वासना पूर्वप्रज्ञाख्या विद्याकर्मतन्त्रा जलूकावत्संततैव स्वप्नकाल इव कर्मकृतं देहाद्देहान्तरमारभते हृदयस्थैव। पुनर्देहान्तरारम्भे देहान्तरं पूर्वाश्रयं विमुञ्चति—इत्येतस्मिन्नर्थे दृष्टान्त उपादीयते—समान है”। इसी प्रकार “जो भी इन अनन्तोंकी उपासना करता है” तथा “उसकी जो जिस प्रकार उपासना करते हैं” इत्यादि वचन भी अनुकूल हो सकते हैं।<br><br>इनमें कर्म और ज्ञानके अधीन जो पूर्वप्रज्ञा नामकी वासना है, वह जोंकके समान सर्वत्र व्याप्त रहते हुए ही हृदयस्थित रहकर जैसे स्वप्नावस्थाके शरीरकी रचना करती है, उसी प्रकार इस देहसे भिन्न दूसरे कर्मजनित देहको रच लेती है। फिर देहान्तरका आरम्भ हो जानेपर अपने पूर्वाश्रित देहको त्याग देती है—इस विषयमें यह दृष्टान्त बतलाया जाता है—

देहान्तरगमनमें जोंकका दृष्टान्त

तद् यथा तृणजलायुका तृणस्यान्तं गत्वान्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरत्येवमेवायमात्मेदꣳ शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वान्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरति ॥ ३ ॥

वह दृष्टान्त—जिस प्रकार जोंक एक तृणके अन्तमें पहुँचकर दूसरे तृणरूप आश्रयको पकड़कर अपनेको सकोड़ लेती है, इसी प्रकार यह आत्मा इस शरीरको मारकर—अविद्या (अचेतनावस्था) को प्राप्त कराकर दूसरे आधारका आश्रय ले अपना उपसंहार कर लेता है ॥ ३ ॥

तत्तत्र देहान्तरसंचार इदं निदर्शनम्—यथा येन प्रकारेण तृणजलायुका तृणजलूका तृण-उस देहान्तरसंचारमें यह उदाहरण है—यथा जिस प्रकार तृण-जलूका (घासपर चलनेवाली जोंक)

१०३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०३८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| स्यान्तमवसानं गत्वा प्राप्य अन्यं तृणान्तरमाक्रमम्, आक्रम्यत इत्याक्रमस्तमाक्रममाक्रम्याश्रित्य, आत्मानम् आत्मनः पूर्वावयवम् उपसंहरत्यन्त्यावयवस्थाने; एवमेव अयमात्मा यः प्रकृतः संसारीदं शरीरं पूर्वोपात्तं निहत्य स्वप्नं प्रतिपित्सुरिव पातयित्वा अविद्यां गमयित्वा अचेतनं कृत्वा स्वात्मोपसंहारेण, अन्यमाक्रमं तृणान्तरमिव तृणजलूका शरीरान्तरं गृहीत्वा प्रसारिता वास नया आत्मानमुपसंहरति, तत्रात्मभावमारभते; यथा स्वप्ने देहान्तरमारभते स्वप्नदेहान्तरस्थ इव शरीरारम्भदेश आरभ्यमाणे देहे जङ्गमे स्थावरे वा। | तृणके अन्त-अन्तिम भागपर पहुँचकर दूसरे तृणरूप आक्रमका—जो आक्रान्त किया जाय उसे आक्रम कहते हैं, उस आक्रम यानी आधारका आश्रय ले अपनेको अर्थात् अपने पूर्वावयवको पिछले अवयवके स्थानमें सकोड़ लेती है; इसी प्रकार यह संसारी आत्मा, जिसका यहाँ प्रकरण है, इस अपने पूर्वप्राप्त शरीरको मारकर—स्वप्नप्राप्तिकी इच्छावालेके समान गिराकर, इसे अविद्याको प्राप्त कराकर अर्थात् अपने आत्माके उपसंहारद्वारा अचेतन कर, तृणजलूकाके एक तृणसे दूसरे तृणपर जानेके समान दूसरे आक्रम यानी शरीरान्तरको अपनी फैली हुई वासनासे ग्रहणकर अपना उपसंहार कर लेता है, अर्थात् उसीमें आत्मभाव करने लगता है; जिस प्रकार यह स्वप्नमें देहान्तरका आरम्भ करता है उसी प्रकार स्वप्नदेहान्तरस्थ जीवके समान यह शरीरारम्भदेशमें अर्थात् आरम्भ किये हुए जङ्गम या स्थावर देहमें आत्मभाव कर लेता है! | | तत्र च कर्मवशात् करणानि लब्धवृत्तीनि संहन्यन्ते; बाह्यं च कुशमृत्तिकास्थानीयं शरीरमारभ्यते। तत्र च करणव्यूहमपेक्ष्य | वहीं कर्मवश इन्द्रियाँ भी वृत्तियुक्त होकर संगठित हो जाती हैं और कुश मृत्तिकास्थानीय बाह्य शरीरका भी आरम्भ हो जाता है। फिर उसीमें इन्द्रियव्यूहकी अपेक्षासे |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३९

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३९


वागाद्यनुग्रहायाग्न्यादिदेवताः संश्रयन्ते । एष देहान्तरारम्भविधिः ॥ ३ ॥वागादि इन्द्रियोंका उपकार करनेके लिये अग्नि आदि देवता आश्रय ले लेते हैं। यही देहान्तरके आरम्भकी विधि है ॥ ३ ॥

आत्माके देहान्तरनिर्माणमें सुवर्णकारका दृष्टान्त

तत्र देहान्तरारम्भे नित्योपात्तमेवोपादानमुपमृद्योपमृद्य देहान्तरमारभते, आहोस्विदपूर्वमेव पुनः पुनरादत्त इति ? अत्रोच्यते दृष्टान्तः—उस देहान्तरके आरम्भमें जीव नित्य ग्रहण किये हुए उपादानको ही बिगाड़ बिगाड़कर उसीसे देहान्तरका आरम्भ करता है अथवा पुनः पुनः नवीन उपादान ग्रहण करता है। इसमें दृष्टान्त बतलाया जाता है—

तद् यथा पेशस्कारी पेशसो मात्रामुपादायान्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं तनुत एवमेवायमात्मेदꣳ शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वान्यन्नवतरं कल्याणतरꣳ रूपं कुरुते पित्र्यं वा गान्धर्वं वा दैवं वा प्राजापत्यं वा ब्राह्मं वान्येषां वा भूतानाम् ॥ ४ ॥

उसमें दृष्टान्त—जिस प्रकार सोनार सुवर्णका भाग लेकर दूसरे नवीन और कल्याणतर (अधिक सुन्दर) रूपकी रचना करता है, उसी प्रकार यह आत्मा इस शरीरको नष्ट कर—अचेतनावस्थाको प्राप्तकर दूसरे पितर, गन्धर्व, देव, प्रजापति, ब्रह्मा अथवा अन्यभूतोंके नवीन और कल्याणतर रूपकी रचना करता है ॥ ४ ॥

तत्तत्रैतस्मिन्नर्थे—यथा पेशस्कारी पेशः सुवर्णं तत् करोतीति पेशस्कारी सुवर्णकारः, पेशसःउस इस विषयमें यह दृष्टान्त है-जिस प्रकार पेशस्कारी-पेशस् सुवर्णको कहते हैं, उसे जो बनावे वह पेशस्कारी-सोनार, पेशस् अर्थात्

१०४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४


सुवर्णस्य मात्रामपादायापच्छिद्य गृहीत्वा अन्यत् पूर्वस्माद् रचनाविशेषान्नवतरमभिनवतरं कल्याणात् कल्याणतरं रूपं तनुते निर्मिनोति । एवमेवायमात्मेत्यादि पूर्ववत् ।<br><br>नित्योपात्तान्येव पृथिव्यादीन्याकाशान्तानि पञ्च भूतानि यानि 'द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे' इति चतुर्थे व्याख्यातानि पेशःस्थानीयानि, तान्येवोपमृद्योपमृद्य, अन्यदन्यच्च देहान्तरं नवतरं कल्याणतरं रूपं संस्थानविशेषं देहान्तरमित्यर्थः, कुरुते । पित्र्यं वा पितृभ्यो हितं पितृलोकोपभोगयोग्यमित्यर्थः, गान्धर्वं गन्धर्वाणामुपभोगयोग्यम्, तथा देवानां दैवम्, प्रजापतेः प्राजापत्यम्, ब्रह्मण इदं ब्राह्मं वा; यथाकर्म यथाश्रुतमन्येषां वा भूतानां सम्बन्धि शरीरान्तरं कुरुत इत्यभिसम्बध्यते ॥ ४ ॥सुवर्णकी मात्राका अपादान-अपच्छेदन अर्थात् ग्रहण कर; पूर्वरचनाविशेषसे भिन्न दूसरा नवीनतर और कल्याणसे भी कल्याणतर रूप बनाता है, उसी प्रकार यह आत्मा--इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है।<br><br>आत्माके नित्यगृहीत जो पृथ्वीसे लेकर आकाशपर्यन्त सुवर्णस्थानीय पाँच भूत हैं, जिनकी 'द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे' इस वाक्यसे चतुर्थ प्रपाठकमें व्याख्या की गयी है, उन्हींको बिगाड़-बिगाड़कर दूसरे-दूसरे देहान्तरको अर्थात् पूर्वापेक्षा नवीन और कल्याणतर रूप—संस्थानविशेष यानी देहान्तरको रच लेता है। पित्र्य—जो पितरोंके लिये उपयोगी हो अर्थात् पितृलोकके उपभोगके योग्य हो, गान्धर्व—जो गन्धर्वोंके उपभोगयोग्य हो, इसी प्रकार देवताओंके लिये उपयोगी—दैव, प्रजापतिके लिये उपयोगी—प्राजापत्य और जो ब्रह्माका है, उस ब्राह्म शरीरकी तथा इसी प्रकार कर्म और ज्ञानके अनुसार वह अन्य भूतोंसे सम्बद्ध शरीरान्तरकी रचना कर लेता है—इस प्रकार इसका सम्बन्ध है ॥ ४ ॥

१. उपनिषदके द्वितीय अध्यायमें।

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०४१

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०४१

सर्वमय आत्माकी कर्मानुसार विभिन्न गतियोंका निरूपण

येऽस्य बन्धनसंज्ञका उपाधिभूताः, यैः संयुक्तस्तन्मयोऽयमिति विभाव्यते, ते पदार्थाः पुञ्जीकृत्यैहकत्र प्रतिनिर्दिश्यन्ते--इस आत्माके जो बन्धनसंज्ञक उपाधिभूत पदार्थ हैं और जिनसे संयुक्त होकर यह तद्रूप है-ऐसा समझा जाता है, उन पदार्थोंका यहाँ एक जगह एकत्रित करके निर्देश किया जाता है—

स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः प्राणमयश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयः पृथिवीमय आपोमयो वायुमय आकाशमयस्तेजोमयोऽतेजोमयः काममयोऽकाममयः क्रोधमयोऽक्रोधमयो धर्ममयोऽधर्ममयः सर्वमयस्तद्यदेतदिदम्मयोऽदोमय इति यथाकारी यथाचारी तथा भवति साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति पुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन । अथो खल्वाहुः—काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते ॥ ५ ॥

वह यह आत्मा ब्रह्म है। वह विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, चक्षुर्मय, श्रोत्रमय, पृथिवीमय, जलमय, वायुमय, आकाशमय, तेजोमय, अतेजोमय, काममय, अकाममय, क्रोधमय, अक्रोधमय, धर्ममय, अधर्ममय और सर्वमय है। जो कुछ इदंमय ( प्रत्यक्ष ) और अदोमय ( परोक्ष ) है, वह वही है। वह जैसा करनेवाला और जैसे आचरणवाला होता है, वैसा ही हो जाता है। शुभ कर्म करनेवाला शुभ होता है और पापकर्मा पापी होता है। पुरुष पुण्यकर्मसे पुण्यात्मा होता है और पापकर्मसे पापी होता है। कोई-कोई कहते हैं कि यह पुरुष काममय ही है, वह जैसी कामनावाला होता है

बृ० उ० ६६—

१०४२ | वृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०४२वृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

वैसा ही संकल्प करता है, जैसे संकल्पवाला होता है वैसा ही कर्म करता है और जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है ॥५॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
स वा अयम्, य एवं संसरत्यात्मा, ब्रह्मैव पर एव, योऽशनायाद्यतीतः। विज्ञानमयो विज्ञानं बुद्धिस्तेनोपलक्ष्यमाणस्तन्मयः। 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु' (४।३।७) इति ह्युक्तम्। विज्ञानमयो विज्ञानप्रायः, यस्मात्तद्धर्मत्वमस्य विभाव्यते “ध्यायतीव लेलायतीव” (४।३।७) इति।जो आत्मा इस प्रकार संसरित होता (इहलोक-परलोकमें गमनागमन करता) है, वह यह परब्रह्म ही है, जो कि क्षुधा-पिपासादि धर्मोंसे परे है। वह विज्ञानमय-विज्ञान बुद्धि को कहते हैं, उससे उपलक्षित होनेवाला अर्थात् तन्मय है। उसके विषयमें “यह आत्मा कौन है ? जो यह प्राणोंमें विज्ञानमय है” ऐसा कहा जा चुका है। विज्ञानमय अर्थात् विज्ञानप्राय; क्योंकि 'ध्यायतीव लेलायतीव” इत्यादि वाक्यसे इसका विज्ञानधर्मत्व प्रतीत होता है।
तथा मनोमयो मनःसंनिकर्षान्मनोमयः। तथा प्राणमयः प्राणः पञ्चवृत्तिस्तन्मयः, येन चेतनश्चलतीव लक्ष्यते। तथा चक्षुर्मयो रूपदर्शनकाले। एवं श्रोत्रमयः शब्दश्रवणकाले। एवं तस्य तस्येन्द्रियस्य व्यापारोद्भवे तत्तन्मयो भवति।इसी प्रकार वह मनोमय है—मनकी संनिधिके कारण वह मनोमय है तथा प्राणमय है—प्राण पाँच वृत्तियोंवाला है, तन्मय वह है, जिससे कि वह चेतन चलता हुआ-सा देखा जाता है तथा रूपदर्शनके समय वह चक्षुर्मय है। एवं शब्द सुननेके समय वह श्रोत्रमय है। इसी प्रकार उस-उस इन्द्रियके व्यापारका प्रादुर्भाव होनेपर वह तत्तद्रूप हो जाता है !
एवं बुद्धिप्राणद्वारेण चक्षुरादिकरणमयः सञ्शरीरारम्भक-इस प्रकार बुद्धि और प्राणके द्वारा वह चक्षु आदि इन्द्रियमय होकर शरीरा-

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०४३

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०४३


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
पृथिव्यादिभूतमयो भवति । तत्र पार्थिवशरीरारम्भे पृथिवीमयो भवति । तथा वरुणादिलोकेषु आप्यशरीरारम्भे आपोमयो भवति । तथा वायव्यशरीरारम्भे वायुमयो भवति । तथा आकाशशरीरारम्भे आकाशमयो भवति ।रम्भक पृथिवी आदि भूतमय हो जाता है। उस समय वह पार्थिव शरीरका आरम्भ होनेपर पृथिवीमय हो जाता है तथा वरुणादि लोकोंमें जलीय शरीरका आरम्भ होनेपर जलमय होता है एवं वायव्य शरीरका आरम्भ होनेपर वायुमय होता है और आकाशशरीरका आरम्भ होनेपर आकाशमय हो जाता है।
एवमेतानि तैजसानि देवशरीराणि तेष्वारभ्यमाणेषु तन्मयस्तेजोमयो भवति । अतो व्यतिरिक्तानि पश्चादिशरीराणि नरकप्रेतादिशरीराणि चातेजोमयानि । तान्यपेक्ष्याह—अतेजोमय इति ।इसी प्रकार ये देवशरीर तैजस हैं, इनका आरम्भ होनेपर वह तद्रूप अर्थात् तेजोमय हो जाता है। इनसे भिन्न पशु आदिके शरीर और नारकीय जीवोंके तथा प्रेतादिके शरीर अतेजोमय हैं। उनकी अपेक्षासे श्रुति कहती है—‘अतेजोमय’।
एवं कार्यकारणसङ्घातमयः सन्नात्मा प्राप्तव्यं वस्त्वन्तरं पश्यन्निदं मया प्राप्तमदो मया प्राप्तव्यमित्येवं विपरीतप्रत्ययस्तदभिलाषः काममयो भवति । तस्मिन् कामे दोषं पश्यतस्तद्विषयाभिलाषप्रशमे चित्तं प्रसन्नमकलुषं शान्तं भवति, तन्मयोऽकाममयः ।इस प्रकार यह आत्मा देहेन्द्रियसङ्घातमय होकर, अन्य प्राप्तव्य वस्तुको देखता हुआ, ‘यह मैंने प्राप्त कर ली है और वह मुझे प्राप्त करनी है’ इस प्रकार विपरीत ज्ञानयुक्त होकर उसकी अभिलाषावाला अर्थात् काममय होता है और उस कामनामें दोष देखनेपर जब तत्सम्बन्धी अभिलाषा निवृत्त हो जाती है, तब चित्त प्रसन्न—निष्कलुष अर्थात् शान्त हो जाता है, इसलिये तन्मय अर्थात् अकाममय होता है।

१०४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४


संस्कृतहिन्दी
एवं तस्मिन् विहते कामे केनचित् स कामः क्रोधत्वेन परिणमते, तेन तन्मयो भवन् क्रोधमयः। स क्रोधः केनचिदुपायेन निवर्तितो यदा भवति तदा प्रसन्नमनाकुलं चित्तं सदक्रोध उच्यते, तेन तन्मयः। एवं कामक्रोधाभ्याम् अकामाक्रोधाभ्यां च तन्मयो भूत्वा धर्ममयोऽधर्ममयश्च भवति । न हि कामक्रोधादिभिर्विना धर्मादिप्रवृत्तिरुपपद्यते। "यद्यद्धि कुरुते कर्म तत्तत् कामस्य चेष्टितम्" इति स्मरणात् ।<br><br>धर्ममयोऽधर्ममयश्च भूत्वा सर्वमयो भवति। समस्तं धर्माधर्मयोः कार्यं यावत्किञ्चिद् व्याकृतम्, तत् सर्वं धर्माधर्मयोः फलं तत् प्रतिपद्यमानस्तन्मयो भवति। किं बहुना, तदेतत् सिद्धमस्य यदयमिदम्मयो गृह्यमाणविषयादिमयः, तस्मादय-इसी प्रकार किसीके द्वारा उस कामनाका विघात होनेपर वह काम क्रोधरूपमें परिणत हो जाता है, इसलिये तद्रूप होकर वह क्रोधमय हो जाता है। वह क्रोध जब किसी उपायसे निवृत्त हो जाता है, तब चित्त प्रसन्न और अनाकुल होनेपर अक्रोध कहा जाता है, उसके कारण वह अक्रोधमय हो जाता है। इस प्रकार काम-क्रोध और अकाम-अक्रोधके कारण तन्मय होकर वह धर्ममय और अधर्ममय भी हो जाता है, क्योंकि काम-क्रोधादिके बिना धर्मादिकी प्रवृत्ति होनी भी सम्भव नहीं है। "जीव जो-जो भी कर्म करता है, वह-वह कामकी ही चेष्टा है" इस स्मृतिसे भी यही सिद्ध होता है।<br><br>धर्ममय और अधर्ममय होकर वह सर्वमय हो जाता है। जितना कुछ व्याकृत है वह सब धर्म और अधर्मका ही कार्य है, वह सब धर्म और अधर्मका ही फल है, उसे प्राप्त करनेवाला भी तन्मय हो जाता है। अधिक क्या ? इसके विषयमें यह बात सिद्ध ही हे कि यह इदंमय—गृह्यमाण विषयादिमय है, इसलिये

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १०४६

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १०४६

शाङ्करभाष्यम्भाषार्थ
मदोमयः। अद इति परोक्षं कार्येण गृह्यमाणेन निर्दिश्यते। अनन्ता ह्यन्तःकरणे भावनाविशेषाः, नैव ते विशेषतो निर्देष्टुं शक्यन्ते। तस्मिंस्तस्मिन् क्षणे कार्यतोऽवगम्यन्ते, इदमस्य हृदि वर्ततेऽदोऽस्येति। तेन गृह्यमाणकार्येणेदंमयतया निर्दिश्यते, परोक्षोऽन्तःस्थो व्यवहारोऽयमिदानीमदोमय इति।अदोमय भी है। 'अदः' इस पदसे गृह्यमाण कार्यसे भिन्न परोक्ष वस्तुका निर्देश होता है। अन्तःकरणमें अनन्त भावनाविशेष हैं, उसका विशेषरूपसे निर्देश नहीं किया जा सकता। समय-समयपर उनके कार्यसे ही यह पता चलता है कि इसके हृदयमें यह भावना है और उसके हृदयमें यह। उस गृह्यमाण कार्यसे उनका इदंमयरूपसे निर्देश किया जाता है और जो अन्तःकरणमें स्थित परोक्ष व्यवहार है, वह इस समय अदोमय है।
संक्षेपतस्तु यथा कर्तुं यथा वा चरितुं शीलमस्य सोऽयं यथाकारी यथाचारी, स तथा भवति। करणं नाम नियता क्रिया विधिप्रतिषेधादिगम्या, चरणं नामानियतमिति विशेषः।संक्षेपतः तो, जिसका जैसा करने या आचरणमें लानेका स्वभाव है, वह यथाकारी और यथाचारी होता है, जो यथाकारी (जैसा करनेवाला) है वह वैसा ही हो जाता है। विधि और प्रतिषेधसे ज्ञात होनेवाली जो नियत क्रिया है, उसका नाम 'करना' है और अनियत आचरणका नाम 'आचरणमें लाना' है, यह इन दोनोंका भेद है।
साधुकारी साधुर्भवतीति यथाकारित्यस्य विशेषणम्, पापकारी पापो भवतीति च यथाचारीत्यस्य।साधु करनेवाला साधु होता है—यह 'यथाकारी' इस पदका विशेषण है और पाप करनेवाला पापी होता है—यह 'यथाचारी' इस पदका विशेषण है।
ताच्छील्यप्रत्ययोपादानाद्'यथाकारी और यथाचारी' इन पदोंमें

१०४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

१०४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४


अत्यन्ततात्पर्यतैव तन्मयत्वम्, न तु तत्कर्ममात्रेणेत्याशङ्क्याह—'णिनि' इस ताच्छील्य प्रत्ययको ग्रहण किया गया है, इसलिये कर्ममें अत्यन्त परायण होनेका स्वभाव ही तन्मयता है, केवल उस कर्म-मात्रसे तन्मयता नहीं होती—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है—
पुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति ।पुण्यकर्मसे पुरुष पुण्यवान् हो जाता है और पापकर्मसे पापी हो जाता है
पुण्यपापकर्ममात्रेणैव तन्मयता स्यान्न तु ताच्छील्यमपेक्षते । ताच्छील्ये तु तन्मयत्वातिशय इत्ययं विशेषः ।अर्थात् पुण्य-पापरूप कर्मसे ही पुरुषको तन्मयता प्राप्त हो जाती है, उसे वैसे स्वभाव होनेकी अपेक्षा नहीं रहती। ताच्छील्य (वैसा स्वभाव) होनेपर तो तन्मयताकी अधिकता होती है—इतना ही अन्तर है।
तत्र कामक्रोधादिपूर्वकपुण्यापुण्यकारिता सर्वमयत्वे हेतुः, संसारस्य कारणम्, देहाद्देहान्तरसंचारस्य च । एतत्प्रयुक्तो ह्यन्यदन्यद् देहान्तरमुपादत्ते । तस्मात् पुण्यापुण्ये संसारस्य कारणम् । एतद्विषयौ हि विधिप्रतिषेधौ । अत्र शास्त्रस्य साफल्यमिति ।ऐसी स्थितिमें कामक्रोधादिपूर्वक पुण्य या अपुण्यका आचरण करना ही जीवके सर्वमयत्वका हेतु, उसके संसारका कारण तथा एक देहसे दूसरे देहमें जानेका हेतु सिद्ध होता है। इससे प्रेरित होकर ही जीव दूसरे-दूसरे देहको ग्रहण करता है। अतः पुण्य और पाप संसारके कारण हैं। इन्हींके विषयमें विधि और प्रतिषेध होते हैं और यहीं शास्त्रकी सफलता है।

१. वह इसका स्वभाव है—इस अर्थमें होनेवाले प्रत्ययको ताच्छील्य-प्रत्यय कहते हैं। यहाँ 'सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये' (३।२।७८) इस पाणिनि-सूत्रके अनुसार 'णिनि' प्रत्यय हुआ है।

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १०४७

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १०४७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अथो अप्यन्ये बन्धमोक्षकुशलाः खल्वाहुः—सत्यं कामादिपूर्वकं पुण्यापुण्ये शरीरग्रहणकारणम्, तथापि कामप्रयुक्तो हि पुरुषः पुण्यापुण्ये कर्मणी उपचिनोति । कामप्रहाणे तु कर्म विद्यमानमपि पुण्यापुण्योपचयकरं न भवति । उपचिते अपि पुण्यापुण्ये कर्मणी कामशून्ये फलारम्भके न भवतः । तस्मात् काम एव संसारस्य मूलम् । तथा चोक्तमाथर्वणे—“कामान् यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते तत्र तत्र” (मु० उ० ३ । २ । २ ) इति । तस्मात् काममय एवायं पुरुषो यदन्यमयत्वं तदकारणं विद्यमानमपीत्यतोऽवधारयति काममय एवेति ।यहाँ दूसरे बन्धमोक्षकुशल पुरुष कहते हैं—यह ठीक है कि कामादिपूर्वक पुण्य और पाप ही शरीर-ग्रहणके कारण हैं तो भी कामनासे प्रेरित हुआ पुरुष ही पुण्य-पापरूप कर्मोंका संग्रह करता है। कामनाका नाश होनेपर तो विद्यमान कर्म भी पुण्य-पापकी वृद्धि करनेवाला नहीं होता तथा कामनारहित होनेपर संग्रह किये हुए पुण्य-पाप कर्म भी फलके आरम्भक नहीं होते। अतः कामना ही संसारका मूल है। ऐसा ही आथर्वणश्रुतिमें भी कहा है—"जो पुत्र-पशु आदि कामनाओंको ही सर्वश्रेष्ठ मानता हुआ उनकी इच्छा करता है, वह उन कामनाओंके कारण उन-उन स्थानोंमें जन्म लेता है।" अतः यह पुरुष काममय ही है; इसका जो अन्यमयत्व है, वह विद्यमान रहते हुए भी [इसके सर्वमयत्वका] कारण नहीं है, इसीसे श्रुति निश्चय करती है कि यह काममय ही है।
यस्मात् स च काममयः सन् यादृशेन कामेन यथाकामो भवति, तत्क्रतुर्भवति । स काम ईषदभिलाषमात्रेणाभिव्यक्तो यस्मिन् विषये भवति, सोऽविहन्यमानः स्फुटी-क्योंकि वह काममय होकर जैसी कामनासे युक्त अर्थात् 'यथाकाम' होता है 'तत्क्रतु' होता है। थोड़ी-सी अभिलाषामात्रसे अभिव्यक्त हुई वह कामना जिस विषयमें होती है, वह उससे आहत न होकर स्फुट

१०४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

१०४८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| भवन् क्रतुत्वमापद्यते। क्रतुर्नामाध्यवसायो निश्चयो यदनन्तरा क्रिया प्रवर्तते। <br><br> यत्क्रतुर्भवति यादृक्कामकार्येण क्रतुना यथारूपः क्रतुरस्य सोऽयं यत्क्रतुर्भवति, तत् कर्म कुरुते, यद्विषयः क्रतुस्तत्फलनिर्वृत्तये यद् योग्यं कर्म, तत् कुरुते निर्वर्तयति, यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते, तदीयं फलमभिसम्पद्यते। तस्मात् सर्वमयत्वेऽस्य संसारित्वे च काम एव हेतुरिति ॥ ५ ॥ | होनेपर क्रतुरूप हो जाती है। 'क्रतु' अध्यवसाय अर्थात् निश्चयको कहते हैं, जिसके पीछे क्रियाकी प्रवृत्ति होती है। <br><br> यह 'यत्क्रतु' होता है अर्थात् कामनाके कार्यरूप जिस प्रकारके क्रतुसे यह युक्त होता है, इस प्रकार यह जैसे क्रतुवाला होता है, वही कर्म करता है। इसका जिस विषयको लेकर क्रतु होता है, उसका फल सिद्ध करनेके लिये जो योग्य कर्म होता है, उसीको करता है और जैसा कर्म करता है, वही अभिसम्पन्न होता अर्थात् उसीका फल प्राप्त करता है। अतः इसके सर्वमयत्व और सांसारित्वमें कामना ही कारण है ॥ ५ ॥ |

कामनाके अनुसार शुभाशुभ गति तथा निष्काम ब्रह्मज्ञके मोक्षका निरूपण

तदेष श्लोको भवति। तदेव सक्तः सह कर्मणैति लिङ्गं मनो यत्र निषक्तमस्य। प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किञ्चेह करोत्ययम्। तस्माल्लोकात् पुनरैत्यस्मै लोकाय कर्मण इति नु कामयमानोऽथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आप्तकाम आत्मकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति ॥ ६॥

उस विषयमें यह मन्त्र है—इसका लिङ्ग अर्थात् मन जिसमें अत्यन्त आसक्त होता है, उसी फलको यह साभिलाष होकर कर्मके सहित प्राप्त

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०४९

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०४९

करता है। इस लोकमें यह जो कुछ करता है, उस कर्मका फल प्राप्तकर उस लोकसे कर्म करनेके लिये पुनः इस लोकमें आ जाता है; अवश्य ही कामना करनेवाला पुरुष ही ऐसा करता है। अब जो कामना न करनेवाला पुरुष है [उसके विषयमें कहते हैं] जो अकाम, निष्काम, आप्तकाम और आत्मकाम होता है, उसके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता; वह ब्रह्म ही रहकर ब्रह्मको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-भाष्यार्थ
तत्तस्मिन्नर्थे एष श्लोको मन्त्रोऽपि भवति । तदेवैति तदेव गच्छति, सक्त आसक्तस्तत्रोद्भूताभिलाषः सन्नित्यर्थः, कथमिति ? सह कर्मणा यत् कर्म फलासक्तः सन्नकरोत्तेन कर्मणा सहैव तदेति तत् फलमेति । किं तत् ? लिङ्गं मनः—मनःप्रधानत्वाल्लिङ्गस्य मनो लिङ्गमित्युच्यते । <br><br> अथ वा लिङ्ग्यतेऽवगम्यतेऽवगच्छति येन तल्लिङ्गं तन्मनो यत्र यस्मिन्निषक्तं निश्चयेन सक्तमुद्भूताभिलाषमस्य संसारिणः, तदभिलाषो हि तत् कर्म कृतवान्, तस्मात्तन्मनोऽभिषङ्गवशा-तत्—उस विषयमें यह श्लोक अर्थात् मन्त्र भी है। तदेवैति–उसीको जाता है, सक्त-आसक्त होकर अर्थात् उसमें अपनी अभिलाषा प्रकट कर, किस प्रकार जाता है ? कर्मके सहित अर्थात् जिस कर्मको उसने फलासक्त होकर किया था, उस कर्मके सहित ही वह उसके फलके प्रति जाता है। वह (जानेवाला) कौन है ? लिङ्ग–मन, लिङ्गदेह मनःप्रधान है, इसलिये मनको 'लिङ्ग' ऐसा कहा जाता है। <br><br> अथवा जिसके द्वारा लिङ्गन — अवगम होता है अर्थात् जिससे साक्षी जानता है, उसे लिङ्ग कहते हैं, इस संसारीका वह मन जिसमें निष्क्त-निश्चयपूर्वक सक्त अर्थात् उद्भूताभिलाष होता है यानी अपनी अभिलाषा प्रकट करता है; उस अभिलाषासे युक्त होकर ही उसने वह कर्म किया था, इससे अर्थात् उस चित्तकी आसक्तिके कारण ही

१०५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

१०५०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| देवांस्य तेन कर्मणा तत्फल-प्राप्तिः। तेनैतत् सिद्धं भवति, कामो मूलं संसारस्येति। अत उच्छिन्नकामस्य विद्यमानान्यपि कर्माणि ब्रह्मविदो वन्ध्याप्रसवानि भवन्ति; "पर्याप्तकामस्य कृतात्मनश्च इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः" (मु० उ० ३। २। २) इति श्रुतेः। | इसे उस कर्मसे उस फलकी प्राप्ति हो जाती है। इससे यह सिद्ध होता है कि काम ही संसारका मूल है। अतः जिसकी कामना निवृत्त हो गयी है, उस ब्रह्मवेत्ताके विद्यमान कर्म भी वन्ध्याकी संतति हो जाते हैं; जैसा कि "आप्तकाम और शुद्धचित्त पुरुषकी सारी कामनाएँ यहीं लीन हो जाती हैं" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। | | किञ्च प्राप्यान्तं कर्मणः—प्राप्य भुक्त्वा अन्तमवसानं यावत् कर्मणः फलपरिसमाप्तिं कृत्वेत्यर्थः; कस्य कर्मणोऽन्तं प्राप्येत्युच्यते—तस्य यत्किञ्च कर्मेहास्मिँल्लोके करोति निर्वर्तयत्ययम्, तस्य कर्मणः फलं भुक्त्वा अन्त प्राप्य तस्माल्लोकात् पुन-रत्यागच्छत्यस्मै लोकाय कर्मणे। अयं हि लोकः कर्मप्रधानः, तेनाह—'कर्मणे' इति, पुनः कर्म-करणाय। पुनः कर्म कृत्वा फलासङ्गवशात् पुनरमुं लोकं यातीत्येवम्। इति नु एवं नु कामय- | तथा कर्मके अन्तको प्राप्तकर अर्थात् जहाँतक कर्मका अन्त यानी अवसान हो वहाँतक उसे पाकर—भोगकर यानी कर्मफलकी परिसमाप्ति करके; किस कर्मका अन्त पाकर ? सो बतलाया जाता है—इस लोकमें यह जो कुछ कर्म करता है उसका अर्थात् उस कर्मका फल भोगकर—उसका अन्त पाकर उस लोकसे, कर्म करनेके लिये, पुनः इस लोकमें आ जाता हैं। यह लोक ही कर्मप्रधान है, इसीसे श्रुति कहती है—'कर्मणे' अर्थात् पुनः कर्म करनेके लिये। इसी प्रकार पुनः कर्म करके फलासक्तिके कारण पुनः परलोकमें जाता है। इस प्रकार जो कामना |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०५१

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०५१

शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
मानः संसरति। यस्मात् काम-करनेवाला है वह संसार-बन्धनको
यमान एवैवं संसरत्यथ तस्मा-प्राप्त होता है। चूँकि कामना करने-
दकामयमानो न क्वचित् संसरति।वाला ही इस प्रकार संसरित होता
है, इसलिये जो कामना करनेवाला
नहीं है, वह कभी संसार-बन्धनमें
नहीं पड़ता।
फलासक्तस्य हि गतिरुक्ता।फलासक्तकी गति तो बतला दी
अकामस्य हि क्रियानुपपत्तेरका-गयी; किंतु जो निष्काम है, उसकी
मयमानो मुच्यत एव। कथंक्रिया सम्भव न होनेके कारण
पुनरकामयमानो भवति ? यो-कामना न करनेवाला पुरुष तो मुक्त
ऽकामो भवत्यसावकामयमानः।ही हो जाता है, किंतु जीव कामना
कथमकामतत्युच्यते-यो निष्का-न करनेवाला कैसे होता है ? जो
मो यस्मान्निर्गताः कामाः सो-अकाम होता है, वही कामना न
ऽयं निष्कामः। कथं कामा निग-करनेवाला है। अकामता कैसे होती
च्छन्ति ? य आप्तकामो भव-है? सो बतलाया जाता है—जो
त्याप्ताः कामा येन स आप्तकामः।निष्काम है अर्थात् जिससे कामनाएँ
निकल गयी हैं, वह पुरुष निष्काम
कहलाता है। कामनाएँ किस प्रकार
निकल जाती हैं ? जो आप्तकाम होता
है अर्थात् जिसने सब कामनाओंको
प्राप्त कर लिया है, वह आप्तकाम है
[उसकी कामनाएँ नहीं रहतीं]।
कथमाप्यन्ते कामाः ? आत्म-कामनाओंकी प्राप्ति कैसे होती
कामत्वेन। यस्यात्मैव नान्यःहै? आत्मकाम होनेसे। जिसकी
कामयितव्यो वस्त्वन्तरभूतःकामनाका विषय आत्मा ही होता
पदार्थो भवति। आत्मैवानन्तरो-है, कोई अन्य वस्तुरूप पदार्थ नहीं
ऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एक-होता। आत्मा ही अन्तर-बाह्यरहित,
पूर्ण प्रज्ञानघन और एकरस है;